📍नई दिल्ली | 3 Oct, 2026, 7:00 AM
94 Years of IAF: भारतीय वायुसेना 8 अक्टूबर को अपनी 94वीं वर्षगांठ मना रही है। 8 अक्टूबर 1932 को जब भारतीय वायुसेना यानी इंडियन एयर फोर्स की शुरुआत हुई थी, तब उसके पास केवल चार वेस्टलैंड वापिटी बाइप्लेन और कुछ भारतीय पायलट थे। उस दौर में हवाई युद्ध का मतलब था दुश्मन के ऊपर जाकर हमला करना और जमीनी सेना मदद देना था। लेकिन 94 साल बाद तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। अब लड़ाई केवल आसमान में मौजूद रहने की नहीं, बल्कि सैकड़ों किलोमीटर दूर से सटीक हमला करने की क्षमता की है।
ऑपरेशन सिंदूर में इस बदलाव को पूरी दुनिया ने देखा। इस ऑपरेशन में भारतीय वायुसेना ने दिखाया कि आधुनिक युद्ध में जीत केवल टारगेट के ऊपर बम बरसा कर नहीं, बल्कि सुरक्षित दूरी से सटीक हमले करके भी हासिल की जा सकती है।
94 Years of IAF: चार बाइप्लेन से शुरू हुआ था सफर
1932 में जब रॉयल इंडियन एयर फोर्स की स्थापना हुई थी, तब उसके पास केवल कुछ वेस्टलैंड वापिटी बाइप्लेन विमान होते थे। उस दौर में विमान मुख्य रूप से टोही मिशन, सीमित बमबारी और जमीनी सैनिकों की मदद के लिए इस्तेमाल किए जाते थे। शुरुआती वर्षों में इसकी भूमिका बेहद सीमित थी। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बर्मा मोर्चे पर भारतीय पायलटों ने महत्वपूर्ण अभियान चलाए और जमीनी सेना को हवाई मदद दी।
उस समय इस्तेमाल होने वाले हथियार साधारण बम, मशीन गन और अनगाइडेड रॉकेट थे। पायलटों को टारगेट के बेहद करीब जाकर हमला करना पड़ता था। किसी प्रकार की गाइडेड वेपन तकनीक मौजूद नहीं थी।
1947-48 के जम्मू-कश्मीर अभियान में डकोटा परिवहन विमानों ने सैनिकों और रसद को पहुंचाने का काम किया, जबकि लड़ाकू विमानों ने बेहद सीमित एयर सपोर्ट दिया था। उस दौरान भी स्टैंड-ऑफ हथियारों जैसा कोई कॉन्सैप्ट नहीं था।
लेकिन 1947 में स्वतंत्रता के बाद वायुसेना ने तेजी से विस्तार किया। 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में भारतीय वायुसेना ने हंटर, मिस्टेयर, वैम्पायर, ग्नैट और कैनबरा जैसे विमानों का इस्तेमाल किया। उस समय मुख्य हथियार 1000 पाउंड और 4000 पाउंड के साधारण बम, अनगाइडेड रॉकेट और विमान की तोपें थीं। किसी टारगेट को नष्ट करने के लिए विमान को सीधे उसके ऊपर या बहुत करीब पहुंचना पड़ता था।
कैनबरा बमवर्षक विमानों ने तो पाकिस्तान के सरगोधा और पेशावर जैसे ठिकानों पर रात में हमले किए। हंटर और मिस्टेयर विमानों ने दिन के समय एयरबेस, टैंकों और रसद केंद्रों पर हमला किया था।
हालांकि इन अभियानों में साहस की कमी नहीं थी, लेकिन तकनीकी सीमाएं साफ दिखाई देती थीं। उस समय लंबी दूरी से सटीक हमला करने की क्षमता लगभग नहीं के बराबर थी। (94 Years of IAF)
1971 युद्ध: एयर सुपीरियरिटी ने बदले युद्ध के नतीजे
1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध भारतीय वायुसेना के इतिहास का स्वर्णिम अध्याय माना जाता है। पूर्वी मोर्चे पर आईएएफ ने कुछ ही दिनों में पाकिस्तान की हवाई क्षमता को लगभग बेकार कर दिया था। तेजगांव और कुर्मितोला एयरबेस पर लगातार हमलों के बाद पाकिस्तानी विमान उड़ान ही नहीं भर सके। क्योंकि मिग-21 ने पांच दिसंबर को 500 किलो के साधारण बम से तेजगांव और कुर्मितोला के रनवे बेकार कर दिए थे।
उस समय लड़ाकू विमान अपेक्षाकृत कम दूरी से हमला करते थे और पायलटों को दुश्मन के एयर डिफेंस के काफी करीब जाना पड़ता था।
उस दौरान मिग-21, हंटर, एसयू-7, कैनबरा और एचएफ-24 मारुत जैसे विमानों ने हजारों सॉर्टी उड़ाईं। चौदह दिसंबर को 57 मिलीमीटर के रॉकेट से ढाका के गवर्नमेंट हाउस और अन्य महत्वपूर्ण ठिकानों पर भी हमले हुए।
वहीं, लोंगेवाला की लड़ाई में हंटर विमानों ने पाकिस्तानी बख्तरबंद वाहनों पर रॉकेट और तोपों से हमला कर भारतीय सेना की मदद की।
लेकिन एक महत्वपूर्ण बात यह थी कि अधिकांश हथियार अब भी अनगाइडेड थे। रनवे को नुकसान पहुंचाने, टैंकों को नष्ट करने और दुश्मन के ठिकानों पर हमला करने के लिए विमानों को जोखिम लेकर लक्ष्य के करीब जाना पड़ता था।
लेकिन 1971 ने यह साबित किया कि अगर एयर सुपीरियरिटी मिल जाए, तो जमीन पर जीत हासिल करना आसान हो जाता है। (94 Years of IAF)
कारगिल युद्ध ने बदली सोच
1999 का कारगिल युद्ध भारतीय वायुसेना के लिए एक अहम मोड़ साबित हुआ। ऑपरेशन सफेद सागर के दौरान भारतीय विमानों को 16,000 से 18,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित दुश्मन के ठिकानों को निशाना बनाना था। ऊंचाई, मौसम और पाकिस्तानी सैनिकों के पास मौजूद स्टिंगर जैसी मिसाइलों के खतरे ने चुनौती बढ़ा दी थी।
शुरुआत में साधारण बमों का इस्तेमाल किया गया, लेकिन जल्द ही साफ हो गया कि ज्यादा सटीक हथियारों की जरूरत है।
यही वह समय था जब भारतीय वायुसेना ने पहली बार वास्तविक युद्ध में लेजर गाइडेड बम और सैटेलाइट असिस्टेड टारगेट सिस्टम का इस्तेमाल किया था।
इसी दौरान मिराज-2000 विमानों पर लेजर गाइडेड बम और लाइटनिंग टारगेटिंग पॉड का इस्तेमाल किया गया। मुंथो ढालो सप्लाई डंप और टाइगर हिल जैसे लक्ष्यों पर सटीक हमलों ने युद्ध की दिशा बदल दी। चार मिराज-2000 विमानों ने 250 किलोग्राम के छह-छह बम गिराए और बड़े सप्लाई केंद्र को नष्ट कर दिया।
हालांकि भारत ने पहले ही पेववे सीरीज लेजर गाइडेड बम और लाइटनिंग टार्गेटिंग पॉड खरीदे थे। लेकिन 1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण इनकी मिराज-2000 विमान के साथ पूरी तरह इंटीग्रेशन नहीं हो पाया था।
युद्ध शुरू होने के बाद भारतीय और इजराइली विशेषज्ञों ने केवल 12 दिनों में इस सिस्टम को तैयार कर दिया। उस दौरान जून 1999 तक आईएएफ 1,200 से अधिक स्ट्राइक मिशन पूरा कर चुकी थी।
कारगिल पहला मौका था जब भारतीय वायुसेना ने युद्ध में आधुनिक प्रिसिजन गाइडेड म्यूनिशन का प्रभावी तरीके से इस्तेमाल किया। यहीं से यह समझ पैदा हुई कि हर टारगेट को नष्ट करने के लिए विमान को उसके ऊपर ले जाना जरूरी नहीं है। (94 Years of IAF)
बालाकोट: नई पीढ़ी की प्रिसिजन स्ट्राइक
फरवरी 2019 में पुलवामा आतंकी हमले के बाद भारतीय वायुसेना ने ऑपरेशन बंदर के तहत बालाकोट में जैश-ए-मोहम्मद के प्रशिक्षण केंद्र को निशाना बनाया। इस मिशन में मिराज-2000 विमानों ने इजरायली स्पाइस-2000 प्रिसिजन गाइडेड म्यूनिशन का इस्तेमाल किया।
स्पाइस-2000 बमों में पहले से जीपीएस कॉर्डिनेट्स फीड किए जाते हैं और आखिर में इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल गाइडेंस सिस्टम टारगेट की पहचान करता है। इन बमों की एरर मार्जिन सीमा तीन मीटर से भी कम थी।
यह हथियार दर्जनों किलोमीटर दूर से छोड़ा जा सकता है। बालाकोट ने दिखाया कि 1971 के बाद पहली बार भारतीय वायुसेना बिना सीमा पार किए पाकिस्तान के अंदर तक हमला कर सकती है। यह कारगिल के बाद प्रिसिजन स्ट्राइक क्षमता का अगला बड़ा चरण था। (94 Years of IAF)
ऑपरेशन सिंदूर बना स्टैंडऑफ हथियारों की मिसाल
ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय वायुसेना की सबसे बड़ी ताकत सिर्फ हथियारों की संख्या नहीं थी, बल्कि दुश्मन से सुरक्षित दूरी बनाकर सटीक हमला करने की क्षमता थी। इस अभियान में लड़ाकू विमान पाकिस्तान के एयर डिफेंस नेटवर्क के अंदर गए बिना ही अपने लक्ष्य पर हमला करके सुरक्षित लौट आए। आधुनिक युद्ध में इसे “स्टैंड-ऑफ स्ट्राइक” कहा जाता है, जहां विमान खुद जोखिम में पड़े बिना लंबी दूरी से हथियार छोड़ते हैं।
ऑपरेशन सिंदूर में वायुसेना ने पाकिस्तान के मुरीदके स्थित लश्कर-ए-तैयबा का मुख्यालय और बहावलपुर स्थित जैश-ए-मोहम्मद का मुख्यालय को निशाना बनाया था। वहीं, बाद में संघर्ष बढ़ने पर एयरबेस, रडार स्टेशन और अन्य मिलिट्री स्ट्रक्चर को निशाना बनाया गया।
सेंटर फॉर एयरोस्पेस पावर एंड स्ट्रैटेजिक स्टडीज के एयर वाइस मार्शल प्रशांत मोहन के मुताबिक एक कॉर्डिनेटेड अटैक में लगभग 19 ब्रह्मोस मिसाइलें और लगभग उतनी ही स्काल्प क्रूज मिसाइलें इस्तेमाल की गईं थीं।
वहीं भारतीय वायुसेना के तत्कालीन उप वायुसेना प्रमुख एयर मार्शल नर्मदेश्वर तिवारी ने जुलाई 2025 में कहा था कि एयरबेस और रडार ठिकानों पर 50 से कम एयर-लॉन्च हथियारों के इस्तेमाल किया गया था, जिसके बाद पाकिस्तान सीज फायर के गिड़गिड़ाने लगा था।
ऑपरेशन सिंदूर में सभी टारगेट्स लक्ष्यों पर एक जैसे हथियार नहीं चलाए गए थे। टारगेट की दूरी, सुरक्षा व्यवस्था और महत्व को देखते हुए अलग-अलग हथियारों का इस्तेमाल किया गया था।
जैसे ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल को सुखोई-30 एमकेआई लड़ाकू विमानों से दागा गया। यह दुनिया की सबसे तेज ऑपरेशनल क्रूज मिसाइलों में गिनी जाती है।
ब्रह्मोस का इस्तेमाल उन बड़े और मजबूत सैन्य ठिकानों के खिलाफ किया गया जिन्हें नष्ट करने के लिए ज्यादा क्षमता वाले हथियारों की जरूरत थी। सेवा में शामिल होने के करीब दो दशक बाद यह ब्रह्मोस का पहला युद्धक इस्तेमाल था।
वहीं, राफेल लड़ाकू विमानों से फ्रांसीसी स्काल्प क्रूज मिसाइलें दागी गईं। स्काल्प की खासियत यह है कि यह जमीन के बेहद करीब उड़ान भरती है, जिससे दुश्मन के रडार के लिए इसे पकड़ना मुश्किल हो जाता है। मुरीदके और बहावलपुर जैसे सुरक्षित ठिकानों को निशाना बनाने में इसी मिसाइल का इस्तेमाल किया गया। आतंकवादी ठिकानों के खिलाफ स्काल्प का यह पहला बड़ा युद्धक इस्तेमाल था।
इसके अलावा रफेल पर लगीं फ्रेंच हैमर मिसाइलों ने भी जमकर कहर बरपाया। हैमर का पूरा नाम “हाईली एजाइल मॉड्यूलर म्यूनिशन एक्सटेंडेड रेंज” है। यह लगभग 50 से 70 किलोमीटर की दूरी तक हमला कर सकती है।
जहां टारगेट बहुत दूर नहीं था लेकिन फिर भी विमान को सुरक्षित दूरी बनाए रखनी थी, वहां हैमर का इस्तेमाल किया गया। विशेष रूप से घाटियों, आबादी वाले इलाकों या मध्यम दूरी के टारगेट् पर यह हथियार बेहद इस्तेमाली साबित हुआ।
जहां स्काल्प गहरे और मजबूत लक्ष्यों के लिए इस्तेमाल हुई, वहीं हैमर ने बीच की दूरी वाले टारगेट्स को संभाला।
ऑपरेशन सिंदूर में इजरायली मूल के क्रिस्टल मेज और रैम्पेज हथियारों का भी इस्तेमाल हुआ। सु-30एमकेआई पर लगीं, सुपरसोनिक हवा से जमीन पर मार करने वाली रैम्पेज 200 किलोमीटर से अधिक दूरी से हमला करने वाला स्टैंड-ऑफ हथियार मानी जाती है।
2019 के बालाकोट अभियान के दौरान खराब मौसम और बादलों के कारण मिराज-2000 पर लगीं क्रिस्टल मेज मिसाइलों का इस्तेमाल नहीं हो पाया था, क्योंकि इसके अंतिम चरण में पायलट को टारगेट की विजुअल पहचान करनी होती है।
वहीं, ऑपरेशन सिंदूर के दौरान मौसम और मिशन प्लानिंग दोनों अनुकूल रहे, जिससे इन हथियारों का प्रभावी इस्तेमाल संभव हुआ।
साथ ही, ऑपरेशन सिंदूर में डीआरडीओ द्वारा विकसित “स्मार्ट एंटी-एयरफील्ड वेपन” यानी एसएएडब्ल्यू का भी इस्तेमाल किया गया। करीब 125 किलोग्राम वजन वाला यह ग्लाइड बम लगभग 100 किलोमीटर की दूरी तक हमला कर सकता है। इसका मुख्य उद्देश्य दुश्मन के रनवे, टैक्सी ट्रैक और एयरफील्ड ढांचे को नुकसान पहुंचाना है।
एक सुखोई-30 एमकेआई चार एसएएडब्ल्यू ले जा सकता है, जबकि जगुआर विमान छह तक हथियार ले जाने में सक्षम है। इससे महंगी क्रूज मिसाइलों को बड़े और महत्वपूर्ण लक्ष्यों के लिए सुरक्षित रखा जा सका, जबकि रनवे पर हमले का काम अपेक्षाकृत कम लागत वाले स्वदेशी हथियारों ने किया।
वहीं, हरोप लॉइटरिंग म्यूनिशन का इस्तेमाल लाहौर, सियालकोट और सरगोधा क्षेत्र के रडार ठिकानों के खिलाफ किया गया। हरोप पहले टारगेट एरिया के ऊपर मंडराता है और रडार या अन्य टारगेट की पहचान होने पर सीधे उससे टकराकर उसे नष्ट कर देता है।
इस तरह के हथियार आधुनिक युद्ध में एयर डिफेंस नेटवर्क को कमजोर करने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। इसी के चलते अस्त्र एयर-टू-एयर मिसाइल की बढ़ी हुई रेंज, स्मार्ट एंटी एयरफील्ड वेपन (एसएएडब्ल्यू), ग्लाइड बम और अन्य लंबी दूरी के हथियारों पर काम किया जा रहा है। (94 Years of IAF)
ऑपरेशन सिंदूर में सबसे लंबे किल का रिकॉर्ड
ऑपरेशन सिंदूर कई मायनों में खास था। इसमें वायुसेना ने न केवल जमीन पर मौजूद टारगेट्स को निशाना बनाया बल्कि लॉन्ग रेंज किल का भी इतिहास भी रचा। इस ऑपरेशन के दौरान भारतीय वायुसेना की एक एस-400 यूनिट ने 314 किलोमीटर दूर एक पाकिस्तानी स्पेशल मिशन साब 2000 एरीआई एवॉक्स (एईडब्ल्यू एंड सी) विमान को मार गिराया था। भारतीय रडार ने टारगेट को गुपचुप ट्रैक किया और लंबी दूरी की मिसाइल को उसकी अधिकतम सीमा तक निर्देशित किया गया, जिसने टारगेट को डायरेक्ट हिट किया। जो सरगोधा के मुशाफ बेस के आसपास पाकिस्तानी हवाई गतिविधि को सपोर्ट कर रहा था। (94 Years of IAF)
94 साल बाद बदल चुकी है एरियल बैटल की परिभाषा
ऑपरेशन सिंदूर के बाद रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि आईएएफ की ऑपरेशनल सोच और अधिक परिपक्व हुई है। 1932 में भारतीय वायुसेना का मुख्य काम जमीनी सेना को नजदीकी हवाई सहायता देना था। वहीं, 1971 में सफलता का आधार एरियल सुपीरियरिटी था। 2025 में नेटवर्क, इंटेलिजेंस और स्टैंड-ऑफ स्ट्राइक क्षमता की वजह से ऑपरेशन सिंदूर सफल हुआ।
वहीं 2026 में वही वायुसेना नेटवर्क बेस्ड, मल्टी-डोमेन और स्टैंड-ऑफ स्ट्राइक क्षमता से लैस आधुनिक एयर पावर में बदल चुकी है।
आज भारतीय वायुसेना की सबसे बड़ी ताकत केवल लड़ाकू विमान नहीं हैं, बल्कि उसका नेटवर्क सेट्रिंक वॉरफेयर भी है। आईएसीसीएस यानी इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम देशभर के रडार, अवाक्स, ड्रोन और अन्य सेंसरों से जानकारी लेकर एक साझा हवाई तस्वीर तैयार करता है।
क्योंकि अब लक्ष्य केवल दुश्मन के एयरस्पेस में प्रवेश करना नहीं, बल्कि न्यूनतम जोखिम के साथ ज्यादा असर पैदा करना है। 94 वर्षों की यात्रा में भारतीय वायुसेना ने इसी बदलाव को अपनाते हुए अपनी भूमिका को लगातार नए दौर की जरूरतों के अनुसार ढाला है। (94 Years of IAF)
Author
हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।





