📍नई दिल्ली/मुंबई | 14 Aug, 2026, 11:07 AM
JT Cooler Missile Technology: मुंबई की एक स्टार्टअप कंपनी ने मिसाइलों में इस्तेमाल होने वाली ऐसी अत्याधुनिक कूलिंग टेक्नोलॉजी डेवलप की है, जो अब तक केवल अमेरिका, फ्रांस और इजराइल जैसे कुछ ही देशों के पास थी। यह तकनीक जूल-थॉमसन (JT) कूलर के नाम से जानी जाती है और इसका इस्तेमाल मिसाइल के इंफ्रारेड सीकर को बेहद कम तापमान तक ठंडा करने के लिए किया जाता है।
करीब 10 ग्राम वजन वाले इस छोटे से उपकरण को डेवलप करने में लगभग पांच साल लगे। इस प्रोजेक्ट को डीआरडीओ के टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट फंड (TDF) ने सपोर्ट किया है। अब यह तकनीक सफल परीक्षणों के बाद भारत की स्वदेशी मिसाइल क्षमताओं को मजबूत करने वाली महत्वपूर्ण उपलब्धियों में शामिल हो गई है।
JT Cooler Missile Technology: एक मुलाकात से शुरू हुआ सफर
इस तकनीक के विकास की कहानी साल 2017-18 के आसपास शुरू हुई। उस समय आईआईटी बॉम्बे के पूर्व छात्र और टेक्नो डिफेंस प्राइवेट लिमिटेड के सह-मालिक डॉ. प्रवीण सालिंकर की मुलाकात डीआरडीओ की एक प्रयोगशाला के निदेशक से हुई थी।
इस मुलाकात के दौरान डॉ. सालिंकर को एक ऐसी तकनीक विकसित करने की चुनौती मिली, जो भारत में उपलब्ध नहीं थी। उन्होंने इस चुनौती को स्वीकार किया और अपनी टीम के साथ काम शुरू किया। बाद में साल 2020 में डीआरडीओ के टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट फंड के तहत इस प्रोजेक्ट को वित्तीय मदद मिली।
डॉ. प्रवीण सालिंकर के साथ इस कंपनी के दूसरे सह-संस्थापक सुदर्शन सराफ भी आईआईटी मुंबई के पूर्व छात्र हैं। दोनों ने इंजीनियरों और तकनीशियनों की एक छोटी टीम के साथ इस जटिल प्रोजेक्ट पर काम किया। कंपनी के अनुसार टीम में बड़ी संख्या में महिला इंजीनियर और तकनीकी विशेषज्ञ भी शामिल थीं। (JT Cooler Missile Technology)
क्या होता है जूल-थॉमसन कूलर?
जूल-थॉमसन कूलर एक अत्यंत छोटा, हल्का और कंपन-मुक्त कूलिंग सिस्टम है। इसका मुख्य काम मिसाइलों में लगे इंफ्रारेड सेंसर और फोकल प्लेन एरे को बेहद कम तापमान तक ठंडा करना होता है।
यह सिस्टम सेंसर को लगभग माइनस 196 डिग्री सेल्सियस तक ठंडा कर सकता है। इस तापमान को क्रायोजेनिक तापमान की कैटेगरी में रखा जाता है।
मिसाइल में लगा इंफ्रारेड सीकर किसी भी टारगेट को पहचानने और उसका पीछा करने का काम करता है। इसे अक्सर मिसाइल की “आंख” भी कहा जाता है। यदि सेंसर सामान्य तापमान पर काम करता है तो वह खुद भी गर्मी पैदा करता है। इस गर्मी से बैकग्राउंड नॉइज या डार्क करंट पैदा होता है, जो टारगेट से आने वाले कमजोर इंफ्रारेड संकेतों को प्रभावित कर सकता है।
ऐसी स्थिति में मिसाइल के लिए दूर स्थित टारगेट की पहचान करना मुश्किल हो जाता है। जूल-थॉमसन कूलर इस आंतरिक गर्मी को कम करता है और सेंसर को साफ एवं सटीक संकेत प्राप्त करने में मदद करता है। (JT Cooler Missile Technology)
मिसाइल की मारक क्षमता में क्यों महत्वपूर्ण है यह तकनीक?
आधुनिक मिसाइलों में टारगेट की पहचान और ट्रैकिंग सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया होती है। यदि मिसाइल का सीकर टारगेट को सही तरीके से नहीं देख पाए तो पूरे सिस्टम के कमकाज पर असर पड़ सकता है।
इसी कारण इंफ्रारेड सीकर को अत्यधिक ठंडा रखा जाता है। कम तापमान पर सेंसर अधिक संवेदनशील हो जाता है और बहुत कमजोर इंफ्रारेड संकेतों को भी पहचान सकता है।
इस तकनीक की मदद से मिसाइलें टारगेट की स्थिति को बेहतर तरीके से ट्रैक कर सकती हैं। विशेष रूप से वे मिसाइलें जो इंफ्रारेड सीकर का इस्तेमाल करती हैं, उनके लिए यह तकनीक अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।
हालांकि सैटेलाइट नेविगेशन या अन्य गाइडेंस सिस्टम्स पर आधारित सभी मिसाइलों में इस प्रकार की कूलिंग की आवश्यकता नहीं होती। (JT Cooler Missile Technology)
कुछ देशों तक सीमित थी तकनीक
जूल-थॉमसन कूलर को रणनीतिक तकनीक माना जाता है। यह तकनीक मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रिजीम (MTCR) के दायरे में आती है। एमटीसीआर एक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था है, जिसका उद्देश्य संवेदनशील मिसाइल और संबंधित तकनीकों के प्रसार को नियंत्रित करना है। इसी कारण इस प्रकार की तकनीक का निर्यात और हस्तांतरण सख्त नियमों के तहत होता है।
सूत्रों के मुताबिक लंबे समय तक अमेरिका, फ्रांस और इजराइल जैसे कुछ देशों के पास ही इस स्तर की तकनीकी क्षमता मौजूद थी। भारत में इसका सफल विकास स्वदेशी रक्षा निर्माण के लिए महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
आसान नहीं था विकास का रास्ता
जूल-थॉमसन कूलर के निर्माण में अत्यधिक सटीकता की जरूरत होती है। टेक्नो डिफेंस ने विदेशी सिस्टम्स की नकल करने के बजाय अपना अलग डिजाइन डेवलप किया। इसके लिए कंपनी ने विशेष उत्पादन तकनीकें और उपकरण तैयार किए।
इस प्रक्रिया में देश के छोटे और सूक्ष्म उद्योगों की भी मदद ली गई। कई महत्वपूर्ण पुर्जों का निर्माण स्थानीय स्तर पर कराया गया।
कंपनी के अनुसार इस उपकरण की असेंबली माइक्रोस्कोप के नीचे की जाती है। इसके लिए अत्यंत शुद्ध सामग्री, साफ वातावरण और कड़े गुणवत्ता मानकों की जरूरत होती है। रक्षा क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों के लिए विश्वसनीयता सबसे महत्वपूर्ण मानक होती है। (JT Cooler Missile Technology)
2023-24 में पूरे हुए परीक्षण
कंपनी के अनुसार साल 2023-24 तक प्रोजेक्ट का विकास कार्य पूरा कर लिया गया था। इसके बाद प्रणाली को परीक्षणों के लिए डीआरडीओ को सौंपा गया।
डीआरडीओ द्वारा किए गए ट्रायल सफल रहे। परीक्षणों के दौरान यह देखा गया कि कूलर निर्धारित तापमान प्राप्त करने और सेंसर को स्थिर प्रदर्शन देने में सक्षम है। इन सफल परीक्षणों के बाद इस तकनीक ने रक्षा क्षेत्र में विशेष ध्यान आकर्षित किया है। (JT Cooler Missile Technology)
विदेशों से भी मिल रही है वाहवाही
कंपनी का कहना है कि सफल परीक्षणों के बाद इस उत्पाद में विदेशों की भी रुचि दिखाई देने लगी है। कुछ देशों के साथ इस तकनीक के निर्यात को लेकर बातचीत चल रही है।
हालांकि यह एक रणनीतिक रक्षा तकनीक है और एमटीसीआर नियमों के अंतर्गत आती है। इसलिए इसके निर्यात के लिए विशेष सरकारी अनुमति की आवश्यकता होती है।
फिलहाल भारत में इस जूल-थॉमसन कूलर का उत्पादन करने वाली टेक्नो डिफेंस एकमात्र कंपनी बताई जा रही है। मिसाइल निर्माण से जुड़ी भारतीय कंपनियों को इस तकनीक की आवश्यकता होने पर इसी कंपनी के साथ काम करना होगा। (JT Cooler Missile Technology)
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