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पहलगाम के बाद पाकिस्तान ने AI से फैलाई थीं झूठी कहानियां, फर्जी नैरेटिव के लिए बना रहे CDS, सेना प्रमुख और IAF चीफ के डीफ फेक वीडियोज

Pahalgam AI fake narrative

Pahalgam AI fake narrative: कश्मीर के पहलगाम में जब आतंकी घटना हुई, तब हालात केवल जमीन पर ही नहीं बिगड़े, बल्कि डिजिटल दुनिया में भी एक अलग तरह की जंग शुरू हो गई। यह जंग बंदूक और बम से नहीं, बल्कि एआई-आधारित फेक नैरेटिव यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से बनाए गए झूठे कंटेंट से लड़ी गई। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) की जनवरी 2026 में जारी रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जरिए फैलाई जा रही गलत सूचनाएं आज के दौर में सबसे खतरनाक सुरक्षा चुनौतियों में से एक बन चुकी हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, एआई से बने फेक वीडियो, नकली सैटेलाइट इमेज और झूठे सैन्य दावे किसी भी संवेदनशील क्षेत्र में हालात को गलत तरीके से पेश कर सकते हैं।

सिपरी ने खास तौर पर पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत–पाकिस्तान के बीच हुए ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र करते हुए चेताया है कि इन्फॉर्मेशन डोमेन में फैला झूठ जमीनी हालात से अलग एक नकली तस्वीर बना देता है, जिससे गलत आकलन और जल्दबाजी में लिए गए फैसले बड़े सैन्य टकराव की वजह बन सकते हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अगर एआई आधारित डिसइन्फॉर्मेशन को समय रहते पहचाना और रोका नहीं गया, तो यह “मल्टी-डोमेन एस्केलेशन” को जन्म दे सकता है, जहां साइबर, सूचना और पारंपरिक सैन्य मोर्चे एक साथ भड़क सकते हैं। पहलगाम हमले के बाद सामने आए फेक नैरेटिव इसी खतरे का ताजा उदाहरण माने जा रहे हैं, जहां डिजिटल झूठ ने वास्तविक स्थिति को बिगाड़ने की कोशिश की। (Pahalgam AI fake narrative)

पहलगाम आतंकी हमले के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर कुछ ही घंटों के भीतर ऐसी तस्वीरें, वीडियो और दावे वायरल होने लगे, जिनका सच्चाई से कोई लेना-देना नहीं था, लेकिन उनका मकसद साफ था डर फैलाना, भ्रम पैदा करना और हालात को और भड़काना। (Pahalgam AI fake narrative)

Pahalgam AI fake narrative: फेक नैरेटिव क्या होता है?

फेक नैरेटिव का मतलब सिर्फ झूठी खबर नहीं होता। यह एक सोची-समझी रणनीति होती है, जिसे इस तरह पेश किया जाता है कि लोग उसे सच मान लें। इसमें आधी सच्चाई, भावनात्मक भाषा और डर पैदा करने वाले विजुअल्स का इस्तेमाल किया जाता है। पहलगाम मामले में भी ऐसा ही हुआ। कुछ पोस्ट्स में यह दावा किया गया कि बड़े इलाके पर कब्जा कर लिया गया है, कहीं यह बताया गया कि सुरक्षा बलों को भारी नुकसान हुआ है, तो कहीं पूरी तरह से नकली तस्वीरें दिखाकर माहौल को सनसनीखेज बनाने की कोशिश की गई।

एआई की मदद से यह काम पहले से कहीं ज्यादा आसान हो गया है। अब किसी को घंटों फोटो एडिटिंग करने की जरूरत नहीं पड़ती। कुछ सेकंड में डीपफेक वीडियो, एआई-जनरेटेड इमेज और नकली ऑडियो तैयार हो जाता है, जो असली जैसा दिखता है। (Pahalgam AI fake narrative)

पहलगाम के बाद सोशल मीडिया पर क्या हुआ?

घटना के तुरंत बाद सोशल मीडिया पर पोस्ट्स की बाढ़ आ गई। कुछ अकाउंट्स ने दावा किया कि यह हमला किसी बड़े युद्ध की शुरुआत है। कुछ ने यह दिखाने की कोशिश की कि हालात नियंत्रण से बाहर हो चुके हैं। यहां तक कि कुछ वीडियो ऐसे भी वायरल हुए, जो किसी और देश या पुराने संघर्ष से जुड़े थे, लेकिन उन्हें पहलगाम का बताकर शेयर किया गया।

समस्या यह थी कि इन पोस्ट्स को देखकर आम लोग घबरा गए। कई लोगों ने बिना जांचे-परखे इन्हें आगे शेयर कर दिया। देखते-ही-देखते फेक नैरेटिव सैकड़ों-हजारों लोगों तक पहुंच गया। यही वह बिंदु है जहां सूचना युद्ध खतरनाक बन जाता है। (Pahalgam AI fake narrative)

डीजीआईएसपीआर ने फैलाईं फेक न्यूज

ऑपरेशन सिंदूर के पहले ही दिन डीपफेक वीडियो, एडिट किए गए फुटेज और झूठी जानकारियां सिर्फ सोशल मीडिया पर ही नहीं, बल्कि ऑफिशियल चैनलों और प्रेस कॉन्फ्रेंस तक के जरिए फैलाने की कोशिश की गई। पाकिस्तान ने सूचना के जरिये हमला करने की रणनीति अपनाई और यह सब पकिस्तानी सेना की एजेंसी डीजीआईएसपीआर (DGISPR) के जरिए किया गया। (Pahalgam AI fake narrative)

एक ही दिन में 15 लाख से ज्यादा साइबर अटैक

ऑपरेशन सिंदूर वाले दिन पाकिस्तान की तरफ से 7 एडवांस्ड पर्सिस्टेंट थ्रेट (APT) साइबर ग्रुप्स सक्रिय थे और 7 मई को एक ही दिन में 15 लाख से ज्यादा साइबर अटैक किए गए। यही नहीं, ऑपरेशन के पहले दिन ही नेशनल स्टॉक एक्सचेंज पर करीब 3 करोड़ साइबर हमले दर्ज किए गए।

पाकिस्तान की तरफ से बड़ी संख्या में यूट्यूब चैनल, एक्स (पूर्व ट्विटर) अकाउंट्स और सरकारी हैंडल्स का इस्तेमाल फेक न्यूज फैलाने के लिए किया गया। हैरानी की बात यह थी कि 30 से 40 मिनट के अंदर एक जैसी भाषा और एक जैसे मैसेज बड़ी संख्या में पोस्ट किए गए। उन्होंने कहा कि सिर्फ 43 समान थ्रेड्स से एक लाख से ज्यादा वीडियो तैयार कर दिए गए, ताकि एक ही झूठी कहानी को बार-बार फैलाया जा सके।

इस सूचना युद्ध में इन्फ्लुएंसर्स के जरिए लोगों की राय बदलने की कोशिश की गई। इस संदर्भ में ज्योति मल्होत्रा केस का जिक्र किया जा सकता है जो यह दिखाता है कि किस तरह प्रभावशाली चेहरों का इस्तेमाल किया गया। (Pahalgam AI fake narrative)

सेना प्रमुख से जुड़े 23 डीपफेक वीडियोज

ऑपरेशन सिंदूर के आठ महीने बाद भी यह सिलसिला अभी भी रुका नहीं है।  पिछले चार महीनों में 217 डीपफेक मामलों सामने आए, जिनमें से 164 भारतीय सेना से जुड़े थे। इनमें सीडीएस से जुड़े 9, थलसेना प्रमुख से जुड़े 23, वायुसेना प्रमुख से जुड़े 4 और नौसेना प्रमुख से जुड़े 3 डीपफेक शामिल हैं।

आज हालात ऐसे हो गए हैं कि जब भी कोई सैन्य प्रमुख किसी मंच से बोलता है, तो आधे घंटे के भीतर उसका एआई-आधारित डीपफेक वीडियो तैयार कर दिया जाता है, जिसमें बस थोड़े-बहुत बदलाव किए जाते हैं, ताकि वह पूरी तरह असली लगे। यह आज के दौर में राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बेहद गंभीर चुनौती बन चुका है। (Pahalgam AI fake narrative)

एआई कैसे बना रहा है झूठ को और खतरनाक?

पहले झूठी खबरें पहचानना थोड़ा आसान था। फोटो धुंधली होती थी, वीडियो की क्वालिटी खराब होती थी या भाषा में साफ गलती दिख जाती थी। लेकिन अब एआई ने यह फर्क लगभग खत्म कर दिया है। डीपफेक टेक्नोलॉजी किसी व्यक्ति का चेहरा, आवाज और हाव-भाव इतनी सफाई से कॉपी कर सकती है कि आम आदमी के लिए सच और झूठ में फर्क करना मुश्किल हो जाता है।

पहलगाम से जुड़े कुछ वीडियो में सुरक्षाबलों की कार्रवाई को गलत तरीके से दिखाया गया। कुछ में ऐसे बयान जोड़ दिए गए, जो कभी दिए ही नहीं गए थे। इन सबका मकसद सिर्फ एक था लोगों के दिमाग में शक और डर पैदा करना। (Pahalgam AI fake narrative)

क्यों होता है ऐसा फेक नैरेटिव?

फेक नैरेटिव यूं ही नहीं फैलता। इसके पीछे कई मकसद होते हैं। पहला मकसद होता है अफरा-तफरी फैलाना। जब लोग डरते हैं, तो वे तर्क से नहीं, भावना से फैसले लेते हैं। दूसरा मकसद होता है राजनीतिक या रणनीतिक दबाव बनाना। अगर यह दिखा दिया जाए कि हालात बहुत खराब हैं, तो सरकार और सुरक्षा एजेंसियों पर दबाव बढ़ता है।

तीसरा और सबसे खतरनाक मकसद होता है एस्केलेशन यानी टकराव को बढ़ाना। अगर झूठे दावों के आधार पर कोई गलत फैसला लिया जाए, तो हालात तेजी से बिगड़ सकते हैं। (Pahalgam AI fake narrative)

पहलगाम और मल्टी-डोमेन खतरा

आज की जंग सिर्फ जमीन, हवा और समुद्र तक सीमित नहीं है। अब इसमें साइबर, स्पेस और इन्फॉर्मेशन डोमेन भी शामिल हो चुके हैं। यही बात अंतरराष्ट्रीय रिसर्च संस्थाएं भी लगातार कह रही हैं। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिपरी) की जनवरी 2026 की एक पॉलिसी पेपर में साफ कहा गया है कि एआई-आधारित डिसइन्फॉर्मेशन जैसे मल्टी-डोमेन टूल्स परमाणु शक्ति संपन्न देशों के बीच भी हालात को खतरनाक मोड़ पर ले जा सकते हैं। खास तौर पर भारत-पाकिस्तान जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में यह जोखिम और ज्यादा है ।

इस रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई है कि अगर फेक नैरेटिव्स को समय रहते नहीं रोका गया, तो वे वास्तविक सैन्य हालात को गलत तरीके से पेश कर सकते हैं, जिससे गलत आकलन और गलत फैसले हो सकते हैं। (Pahalgam AI fake narrative)

सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती

पहलगाम के बाद भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के सामने दोहरी चुनौती थी। एक तरफ जमीन पर हालात को काबू में रखना और दूसरी तरफ डिजिटल दुनिया में फैल रहे झूठ को रोकना। यह काम आसान नहीं होता, क्योंकि फेक कंटेंट सेकंडों में फैल जाता है, जबकि सच तक पहुंचने में वक्त लगता है।

कई बार एजेंसियों को अपना कीमती समय और संसाधन सिर्फ इस बात पर लगाने पड़ते हैं कि कौन-सी खबर फर्जी है और उसे कैसे काउंटर किया जाए। यही वजह है कि आजकल सुरक्षा एजेंसियां इन्फ़ॉर्मेशन वॉरफेयर को भी उतनी ही गंभीरता से ले रही हैं, जितनी पारंपरिक सुरक्षा को। (Pahalgam AI fake narrative)

मीडिया और आम लोगों की भूमिका

फेक नैरेटिव के खिलाफ लड़ाई सिर्फ सरकार या सेना नहीं जीत सकती। इसमें मीडिया और आम लोगों की भूमिका सबसे अहम है। पहलगाम के मामले में भी देखा गया कि कुछ जिम्मेदार मीडिया संस्थानों ने बिना पुष्टि के खबरें नहीं चलाईं। उन्होंने आधिकारिक जानकारी का इंतजार किया और अफवाहों से दूरी बनाए रखी।

वहीं आम लोगों के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि वे हर वायरल पोस्ट पर भरोसा न करें। किसी भी वीडियो या तस्वीर को शेयर करने से पहले यह सोचना जरूरी है कि इसका सोर्स क्या है और क्या यह जानकारी किसी भरोसेमंद जगह से आई है। (Pahalgam AI fake narrative)

फेक नैरेटिव का सबसे बड़ा खतरा

फेक नैरेटिव का सबसे बड़ा खतरा यह नहीं है कि लोग कुछ देर के लिए गुमराह हो जाते हैं। असली खतरा यह है कि यह भरोसे को कमजोर कर देता है। जब लोग यह नहीं समझ पाते कि क्या सच है और क्या झूठ, तो वे हर जानकारी पर शक करने लगते हैं। इससे समाज में तनाव बढ़ता है और हालात और बिगड़ते हैं।

पहलगाम जैसे संवेदनशील इलाके में यह खतरा और ज्यादा होता है, क्योंकि यहां की हर खबर का असर सिर्फ स्थानीय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पड़ता है। (Pahalgam AI fake narrative)

कैसे रोका जाए एआई-फेक नैरेटिव?

आने वाले समय में एआई-आधारित फेक नैरेटिव और भी खतरनाक हो सकते हैं। इसलिए इससे निपटने के लिए ठोस रणनीति जरूरी है। सबसे पहले, टेक्नोलॉजी के स्तर पर ऐसे टूल्स विकसित करने होंगे, जो डीपफेक और फर्जी कंटेंट को जल्दी पहचान सकें।

दूसरा, लोगों को डिजिटली एजुकेट करना होगा, ताकि वे खुद समझ सकें कि कौन-सी जानकारी भरोसेमंद है और कौन-सी नहीं। तीसरा, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की जिम्मेदारी भी तय करनी होगी, ताकि वे फेक कंटेंट को फैलने से पहले रोक सकें। (Pahalgam AI fake narrative)

एयर चीफ एपी सिंह बोले- मल्टी-डोमेन होंगे भविष्य के युद्ध, भारत को अभी से रहना होगा तैयार

Subroto Mukerjee International Seminar 2026

Subroto Mukerjee International Seminar 2026: भारतीय वायुसेना के चीफ ऑफ एयर स्टाफ एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने कहा कि किसी भी देश की राष्ट्रीय सुरक्षा की असली ताकत उसकी सैन्य क्षमता में होती है, और मौजूदा दौर में वायु शक्ति सबसे तेज और निर्णायक भूमिका निभाती है। बदलते वैश्विक हालात और बहु-आयामी खतरों के बीच भारत को अपनी सुरक्षा तैयारियों को भविष्य की जरूरतों के हिसाब से लगातार मजबूत करना होगा। उन्होंने यह बात 22वें सुब्रोतो मुखर्जी इंटरनेशनल सेमिनार के उद्घाटन अवसर पर कही, जहां राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े अहम मुद्दों पर गहन मंथन किया गया।

Subroto Mukerjee International Seminar 2026: वायु शक्ति की भूमिका बेहद निर्णायक

देश की राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े बड़े और गंभीर मुद्दों पर मंथन के लिए 21 जनवरी को राजधानी नई दिल्ली में 22वां सुब्रोतो मुखर्जी इंटरनेशनल सेमिनार आयोजित किया गया। इस सेमिनार का आयोजन सेंटर फॉर एयरोस्पेस पावर एंड स्ट्रैटेजिक स्टडीज (कैप्स – CAPSS) द्वारा किया जाता है। यह सेमिनार हर साल भारतीय वायुसेना के पहले भारतीय चीफ ऑफ एयर स्टाफ एयर मार्शल सुब्रोतो मुखर्जी की स्मृति में आयोजित किया जाता है, जिन्हें भारतीय वायुसेना के दूरदर्शी संस्थापकों में गिना जाता है। (Subroto Mukerjee International Seminar 2026)

इस साल सेमिनार का विषय “नेशनल सिक्योरिटी इम्पेरेटिव्स” रखा गया था। इसका मकसद बदलते वैश्विक और क्षेत्रीय सुरक्षा माहौल, नई तकनीकों और उभरती चुनौतियों पर खुलकर विचार-विमर्श करना था। यह सेमिनार कैप्स के सिल्वर जुबली ईयर के तहत आयोजित होने वाला पहला प्रमुख कार्यक्रम भी था।

सेमिनार का उद्घाटन भारतीय वायुसेना के चीफ ऑफ एयर स्टाफ एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने किया। अपने उद्घाटन भाषण में उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि किसी भी देश की राष्ट्रीय सुरक्षा का अंतिम आधार उसकी सैन्य शक्ति होती है, और इसमें वायु शक्ति की भूमिका बेहद निर्णायक है। (Subroto Mukerjee International Seminar 2026)

Subroto Mukerjee International Seminar 2026

एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने कहा कि केवल आर्थिक ताकत या कूटनीति किसी देश की संप्रभुता की पूरी तरह रक्षा नहीं कर सकती। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि दुनिया में ऐसे कई देश रहे हैं, जहां आर्थिक संसाधन होने के बावजूद कमजोर सैन्य क्षमता के कारण अस्थिरता और सुरक्षा संकट पैदा हुए। उनके अनुसार, “मिलिट्री पावर जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है उस शक्ति का सही समय पर इस्तेमाल करने का राजनीतिक और रणनीतिक संकल्प।”

उन्होंने यह भी कहाा कि आज के दौर में युद्ध सिर्फ जमीन, समुद्र या हवा तक सीमित नहीं रह गए हैं। अब युद्ध मल्टी-डोमेन ऑपरेशंस का रूप ले चुके हैं, जिनमें साइबर स्पेस, स्पेस, सूचना युद्ध और टेक्नोलॉजी की बड़ी भूमिका होती है। ऐसे में राष्ट्रीय सुरक्षा की परिभाषा भी लगातार बदल रही है। (Subroto Mukerjee International Seminar 2026)

एयर चीफ ने अपने संबोधन में भारतीय वायुसेना की क्षमताओं का जिक्र करते हुए कहा कि आधुनिक युद्ध में एयर पावर सबसे तेज और निर्णायक परिणाम देने वाली ताकत बन चुकी है। उन्होंने बताया कि भारतीय वायुसेना ने बीते सालों में कई बार यह साबित किया है कि वह कम समय में सटीक और प्रभावी कार्रवाई करने में सक्षम है। चाहे संकटग्रस्त क्षेत्रों से नागरिकों को सुरक्षित निकालने का अभियान हो या आतंकवादी ठिकानों पर सटीक स्ट्राइक, वायु शक्ति ने हमेशा अहम भूमिका निभाई है। (Subroto Mukerjee International Seminar 2026)

उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी देश को अपने पिछले गौरव पर टिके नहीं रहना चाहिए, बल्कि भविष्य की चुनौतियों के लिए लगातार तैयार रहना चाहिए। तेजी से बदलते वैश्विक हालात, नई तकनीकों और भू-राजनीतिक समीकरणों के बीच सुरक्षा से जुड़े फैसले और भी जटिल होते जा रहे हैं। ऐसे में कैप्स जैसे थिंक टैंक और सेमिनार सैन्य नेतृत्व और नीति निर्माताओं को बौद्धिक रूप से तैयार रखने में बड़ी भूमिका निभाते हैं।

इस सेमिनार में देश और विदेश से आए पॉलिसी मेकर्स, स्कॉलर्स, प्रैक्टिशनर्स, सरकारी प्रतिनिधि और रक्षा मामलों के जानकार शामिल हुए। सभी का उद्देश्य भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े उन प्रमुख कारकों पर चर्चा करना था, जो आने वाले वर्षों में देश की रणनीतिक दिशा तय करेंगे। (Subroto Mukerjee International Seminar 2026)

सेमिनार के दौरान मुख्य रूप से दो अहम विषयों पर गहन चर्चा हुई। पहला विषय था “मल्टी डोमेन ऑपरेशंस में नेशनल सिक्योरिटी इम्पेरेटिव्स”, जिसमें यह समझने की कोशिश की गई कि अलग-अलग डोमेन्स में एक साथ काम करने की क्षमता कैसे राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत बनाती है। दूसरा विषय था “मल्टी-पोलर वर्ल्ड में नेशनल सिक्योरिटी को री-इमैजिन करना”, जिसमें बदलती वैश्विक शक्ति संरचना और उसके भारत पर पड़ने वाले प्रभावों पर चर्चा की गई। (Subroto Mukerjee International Seminar 2026)

विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि आज की दुनिया अब एक ध्रुवीय नहीं रही। कई पावर सेंटर उभर चुके हैं और ऐसे माहौल में भारत को अपनी सुरक्षा रणनीति को ज्यादा लचीला, आत्मनिर्भर और तकनीक आधारित बनाना होगा। रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता, आधुनिकरण और मजबूत सैन्य क्षमता आने वाले समय में भारत की सुरक्षा नीति की रीढ़ बने रहेंगे। (Subroto Mukerjee International Seminar 2026)

देवलाली में गरजी भारतीय आर्टिलरी; Exercise TOPCHI 2026 में पहली बार शामिल हुई BSF और नौसेना

Exercise TOPCHI 2026

Exercise TOPCHI 2026: भारतीय सेना की आर्टिलरी रेजिमेंट ने एक बार फिर साबित कर दिया कि आधुनिक युद्ध में उसकी भूमिका कितनी निर्णायक है। महाराष्ट्र के देवलाली फील्ड फायरिंग रेंज में 21 जनवरी को आयोजित एक्सरसाइज तोपची 2026 में भारतीय आर्टिलरी ने अपनी फायरपावर, तकनीकी क्षमता और ऑपरेशनल तैयारी को दिखाया। यह अभ्यास हर साल स्कूल ऑफ आर्टिलरी द्वारा आयोजित किया जाता है, जिसमें फायरपावर डेमॉन्स्ट्रेशन और ट्रेनिंग इवेंट के साथ सेना की अग्नि शक्ति को जमीनी स्तर पर परखा और प्रदर्शित किया जाता है।

Exercise TOPCHI 2026: बीएसएफ और भारतीय नौसेना के जवानों के साथ भागीदारी

इस साल का अभ्यास इसलिए खास रहा क्योंकि इसमें न सिर्फ सेना की आधुनिक और स्वदेशी तोपखाना प्रणालियों ने हिस्सा लिया, बल्कि पहली बार सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) और भारतीय नौसेना के जवानों ने भी ड्रोन के साथ भागीदारी की। जो इस बात का संकेत है कि भविष्य के युद्ध सेना केवल अकेले नहीं लड़ेगी बल्कि बल्कि जॉइंट और इंटीग्रेटेड ऑपरेशंस की मदद से लड़े जाएंगे। (Exercise TOPCHI 2026)

एक्सरसाइज तोपची 2026 का आयोजन लेफ्टिनेंट जनरल एनएस सरना के नेतृत्व में किया गया, जो स्कूल ऑफ आर्टिलरी के कमांडेंट और आर्टिलरी रेजिमेंट के कर्नल कमांडेंट भी हैं। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डिफेंस सर्विसेज स्टाफ कॉलेज, वेलिंग्टन के कमांडेंट लेफ्टिनेंट जनरल मनीष एरी थे। इस अभ्यास को देखने के लिए डिफेंस सर्विसेज स्टाफ कॉलेज और डिफेंस सर्विसेज टेक्निकल स्टाफ कोर्स के स्टूडेंट ऑफिसर्स, नेपाल आर्मी कमांड एंड स्टाफ कॉलेज के अधिकारी, भारतीय सेना के वरिष्ठ अधिकारी, नागरिक प्रशासन के प्रतिनिधि, स्थानीय नागरिक और महाराष्ट्र के विभिन्न स्कूल-कॉलेजों के छात्र मौजूद रहे। (Exercise TOPCHI 2026)

अभ्यास के दौरान यह दिखाया गया कि किस तरह आधुनिक युद्ध में फायरपावर और सर्विलांस टेक्नोलॉजी का सटीक तालमेल जरूरी है। तोप, मोर्टार, रॉकेट सिस्टम, ड्रोन और एविएशन एसेट्स को एक साथ जोड़कर लाइव फायरिंग की गई। यह केवल हथियार चलाने का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि यह संदेश भी था कि भारतीय सेना नेटवर्क-सेंट्रिक वॉरफेयर की दिशा में कितनी आगे बढ़ चुकी है। (Exercise TOPCHI 2026)

इस अभ्यास का सबसे बड़ा आकर्षण स्वदेशी और मॉडर्न आर्टिलरी सिस्टम्स की लाइव फायरिंग रही। के-9 वज्र सेल्फ प्रोपेल्ड गन ने अपनी तेज रफ्तार और लंबी मारक रेंज से सभी को प्रभावित किया। इसके साथ ही पहाड़ी इलाकों में तैनाती के लिए बेहद अहम एम-777 अल्ट्रा लाइट हॉवित्जर ने अपनी सटीक फायरिंग का प्रदर्शन किया। पुराने लेकिन भरोसेमंद 155 एमएम एफएच-77बी02 बोफोर्स, स्वदेशी धनुष गन, 105 एमएम इंडियन फील्ड गन, लाइट फील्ड गन, 120 एमएम मोर्टार, ग्रैड बीएम-21 और पूरी तरह स्वदेशी पिनाका मल्टीपल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम ने मिलकर यह दिखा दिया कि भारतीय आर्टिलरी किसी भी चुनौती के लिए तैयार है। (Exercise TOPCHI 2026)

पिनाका रॉकेट सिस्टम की फायरिंग के दौरान आसमान में गूंज और जमीन पर कंपन साफ महसूस किया गया। यह वही सिस्टम है, जिसने हाल के वर्षों में भारतीय सेना की लंबी दूरी की स्ट्राइक क्षमता को नई ऊंचाई दी है। अभ्यास में यह भी दिखाया गया कि ड्रोन के जरिए टारगेट की पहचान कर किस तरह सटीक और टाइम-बाउंड फायरिंग की जाती है।

Exercise TOPCHI 2026

इस साल अभ्यास में एक और नया और अहम पहलू देखने को मिला। पहली बार बीएसएफ की गन डिटैचमेंट्स और भारतीय नौसेना के सेलर्स ने ड्रोन के साथ हिस्सा लिया। इससे यह साफ हो गया कि सीमाओं की सुरक्षा और भविष्य के युद्धों में विभिन्न बलों के बीच तालमेल कितना जरूरी होता जा रहा है। इसके अलावा, पैराशूट रेजिमेंट के पैराट्रूपर्स ने पैरामोटर और हैंग ग्लाइडर के साथ अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन किया। (Exercise TOPCHI 2026)

एक्सरसाइज तोपची 2026 ने यह भी दिखाया कि भारतीय सेना किस तरह आत्मनिर्भर भारत की दिशा में आगे बढ़ रही है। अभ्यास में शामिल अधिकांश हथियार और प्रणालियां स्वदेशी थीं या भारत में ही निर्मित और अपग्रेड की गई थीं। यह दिखाता है कि सेना अब विदेशी निर्भरता को कम करते हुए अपने संसाधनों पर भरोसा बढ़ा रही है।

इस पूरे अभ्यास का उद्देश्य केवल प्रदर्शन नहीं था, बल्कि युवा अधिकारियों और भविष्य के सैन्य नेतृत्व को आधुनिक युद्ध की वास्तविक तस्वीर दिखाना भी था। नेपाल आर्मी के अधिकारियों की मौजूदगी ने यह संदेश दिया कि भारत क्षेत्रीय सहयोग और सैन्य प्रशिक्षण में भी अहम भूमिका निभा रहा है। (Exercise TOPCHI 2026)

114 राफेल के बाद भी क्यों रूस से Su-57 खरीदना चाहती है भारतीय वायुसेना? ये है पर्दे के पीछे की पूरी कहानी

IAF Su-57 after Rafale
Why Indian Air Force Is Considering Russia’s Su-57 Even After 114 Rafale Deal

IAF Su-57 after Rafale: भारतीय वायुसेना इस समय एक बेहद अहम और चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रही है। एक तरफ चीन और पाकिस्तान से लगातार हवाई खतरा बढ़ रहा है, तो दूसरी तरफ वायुसेना के पास लड़ाकू स्क्वाड्रनों की भारी कमी बनी हुई है। इसी बीच भारत 114 अतिरिक्त राफेल लड़ाकू विमानों की खरीदने की भी तैयारी कर रहा है। लेकिन इसके बावजूद एक सवाल लगातार उठ रहा है भारत अगर मल्टीरोल फाइटर जेट राफेल खरीद रहा है, तो फिर भारतीय वायुसेना को रूस के पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर सु-57 Su-57 की जरूरत क्यों महसूस हो रही है।

IAF Su-57 after Rafale: स्क्वाड्रन की हो रही कमी: सबसे बड़ी मजबूरी

आज की तारीख में भारतीय वायुसेना के पास करीब 29 से 31 ऑपरेशनल स्क्वाड्रन ही बचे हैं, जबकि जरूरत 42 स्क्वाड्रन की है। यानी वायुसेना लगभग 11–13 स्क्वाड्रन की भारी कमी से जूझ रही है। लेकिन यह कमी अचानक नहीं आई। पिछले कुछ सालों में मिग-21, मिग-27, पुराने जगुआर रिटायर हो चुके हैं, जबकि मिराज-2000 जैसे फाइटर जेट भी 2030 तक सेवा से बाहर कर दिए जाएंगे।

दूसरी तरफ, चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी एयर फोर्स के पास 2030–35 तक 70 से ज्यादा स्क्वाड्रन होने का अनुमान है। चीन पहले ही जे-20 जैसे पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर बड़ी संख्या में तैनात कर चुका है। वहीं पाकिस्तान भी भविष्य में चीन से जे-35 जैसे स्टील्थ विमान खरीदने की तैयारी में है। ऐसे में भारत के सामने दो मोर्चों पर हवाई चुनौती लगातार गंभीर होती जा रही है। (IAF Su-57 after Rafale)

ऐसे में भारतीय वायुसेना के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि AMCA (एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट) आने तक इस खतरनाक गैप को कैसे भरा जाए।

IAF Su-57 after Rafale: AMCA में अभी लगेगा वक्त

भारत का स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी का फाइटर विमान AMCA भारतीय वायुसेना के लिए उम्मीद की किरण जरूर है, लेकिन इसकी वास्तविकता यह है कि इसके बड़े पैमाने पर वायुसेना में शामिल होने में अभी काफी समय लगेगा। पहली उड़ान, इंजन डेवलपमेंट, स्टील्थ टेक्नोलॉजी, सेंसर और प्रोडक्शन- इन सभी चरणों को पूरा करने में कम से कम एक दशक का समय लग सकता है। खुद वायुसेना के पूर्व अधिकारियों का मानना है कि अगर AMCA 2035 से पहले आ भी जाए, तो वह बड़ी उपलब्धि होगी। इसका मतलब यह हुआ कि अगले 10 से 12 साल तक भारत के पास कोई स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी का विकल्प नहीं होगा। वहीं, चीन और पाकिस्तान के स्टील्थ विमानों के सामने संतुलन बनाए रखना रणनीतिक मजबूरी है। (IAF Su-57 after Rafale)

केवल राफेल क्यों काफी नहीं है?

इस बात में कोई शक नहीं कि राफेल दुनिया के सबसे बेहतरीन 4.5 जनरेशन फाइटर विमानों में से एक है। इसमें मिटिओर बीवीआर मिसाइल, स्पेक्ट्रा इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम और बेहतरीन एवियोनिक्स हैं। ऑपरेशन सिंदूर जैसे अभियानों में इसकी क्षमता साबित भी हो चुकी है। लेकिन राफेल पूरी तरह स्टील्थ विमान नहीं है। इसकी रडार क्रॉस सेक्शन सीमित रूप से कम की गई है और यह दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम को चकमा देने के लिए मुख्य रूप से इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग पर निर्भर करता है। इसका रडार क्रॉस सेक्शन लगभग 0.3–1 m² है। वहीं हाई-थ्रेट एयरस्पेस, जहां एस-400 या एचक्यू-9 जैसे एडवांस्ड एयर डिफेंस सिस्टम तैनात हों, वहां राफेल के लिए डीप स्ट्राइक करना ज्यादा जोखिम भरा हो सकता है। यही वह जगह है जहां पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर की जरूरत महसूस होती है। (IAF Su-57 after Rafale)

Su-57 है डीप स्ट्राइक के लिए

इसके उलट सु-57 को शुरुआत से ही स्टील्थ पेनेट्रेशन और डीप स्ट्राइक के लिए डिजाइन किया गया है। इसकी स्टील्थ शेपिंग, रडार-एब्जॉर्बिंग मटीरियल और इंटरनल वेपन बे इसे दुश्मन के रडार से काफी हद तक छिपाकर अंदर तक जाने की क्षमता देते हैं। वहीं इसका रडार क्रॉस सेक्शन 0.1–0.5 m² है, जो राफेल से बेहतर है। वहीं, इंटरनल वेपन बे होने से रडार क्रॉस सेक्शन कम होता है। जबकि राफेल में एक्सटर्नल वेपन बे है। हालांकि सु-57 की यह कमजोरी भी है, क्योंकि इंटरनल वेपन बे होने से यह ज्यादा बड़े हथियार नहीं सकता। लेकिन सु-57 की लंबी रेंज, ज्यादा पेलोड और भविष्य में हाइपरसोनिक हथियार ले जाने की क्षमता इसे एक खास तरह का स्ट्राइक प्लेटफॉर्म बनाती है। (IAF Su-57 after Rafale)

यही वजह है कि भारतीय वायुसेना सु-57 को राफेल के विकल्प के तौर पर नहीं, बल्कि उसके कॉम्प्लीमेंटरी के तौर पर देख रही है। वायुसेना की सोच यह है कि राफेल एयर सुपीरियरिटी, मल्टी-रोल और रोजमर्रा के अभियानों में मुख्य भूमिका निभाएगा, जबकि सु-57 जैसे स्टील्थ विमान का इस्तेमाल डे-वन मिशन, डीप स्ट्राइक और हाई-वैल्यू टारगेट्स को निशाना बनाने के लिए किया जा सकता है। यह विमान दुश्मन के इलाके में रडार से बचते हुए अंदर घुसकर, एयर डिफेंस सिस्टम, रडार स्टेशन, कमांड सेंटर और एयरबेस जैसे हाई-वैल्यू टारगेट्स को निशाना बना सकता है। वहीं, 2035 तक AMCA आने तक सु-57 इंटरिम फिफ्थ जनरेशन ब्रिज का काम करेगा। अगर डील फाइनल होती है, तो यह राफेल की तरह ही सफल कॉम्बिनेशन साबित हो सकता है। (IAF Su-57 after Rafale)

रूस का क्या है ऑफर

इस पूरे समीकरण में रूस का ऑफर भी एक अहम भूमिका निभा रहा है। रूस भारत को सु-57 के लिए लगभग पूरा टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, सोर्स कोड एक्सेस और लाइसेंस्ड प्रोडक्शन का प्रस्ताव दे रहा है। यह वही मॉडल है, जिस पर पहले सु-30एमकेआई भारत में बनाया गया था। इसके अलावा कीमत भी पश्चिमी स्टील्थ विमानों की तुलना में काफी कम बताई जा रही है। इससे भारत को न सिर्फ लागत में फायदा होगा, बल्कि स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी भी मिलेगी, यानी किसी एक देश या सैंक्शन पर पूरी तरह निर्भरता नहीं रहेगी। वहीं, इसमें ब्रह्मोस-एनजी को भी इंटीग्रट किया जा सकेगा। (IAF Su-57 after Rafale)

इंजन और सैंक्शन की चिंता

हालांकि चुनौतियां भी कम नहीं हैं। सु-57 का नया इंजन AL-51 अभी पूरी तरह मैच्योर नहीं माना जाता और रूस पर लगे पश्चिमी सैंक्शन भी एक बड़ा जोखिम हैं। इसके अलावा यह भी चिंता है कि कहीं विदेशी डील्स की वजह से स्वदेशी तेजस और AMCA प्रोग्राम पर असर न पड़े। इस मुद्दे पर एक्सपर्ट्स की राय बंटी हुई है। कुछ का मानना है कि ज्यादा विदेशी खरीद से स्वदेशी प्रोजेक्ट्स में देरी होगी, जबकि दूसरे कहते हैं कि यह इंटरिम समाधान है, जो AMCA को बिना दबाव के डेवलप होने का समय देगा।

असल में भारतीय वायुसेना अब “या तो यह, या वह” वाली सोच से आगे निकल चुकी है। उसकी रणनीति लेयर्ड और बैलेंस्ड फ्लीट बनाने की है, जिसमें सु-30एमकेआई हैवी फायरपावर देगा, तो राफेल हाई-टेक मल्टी-रोल भूमिका निभाएगा, वहीं, तेजस बड़ी संख्या में स्वदेशी ताकत बनेगा और भविष्य में AMCA पांचवीं पीढ़ी की रीढ़ बनेगा। अगर सु-57 आता भी है, तो वह इसी स्ट्रक्चर में एक खास भूमिका निभाएगा। (IAF Su-57 after Rafale)

मुख्य फाइटर एयरक्राफ्ट और उनके रोल्स

दरअसल वायुसेना ने अपनी फ्लीट को परतदार यानी लेयर्ड तरीके से तैयार किया है, जिसमें हर तरह के लड़ाकू विमान की अपनी अलग जिम्मेदारी तय है।

सुखोई-30

इस पूरी फ्लीट की रीढ़ माने जाते हैं सु-30एमकेआई लड़ाकू विमान। संख्या के लिहाज से भी यही विमान सबसे ज्यादा हैं और भूमिका के लिहाज से भी इन्हें वायुसेना का हेवीवेट फाइटर माना जाता है। सु-30 का इस्तेमाल एयर सुपीरियरिटी हासिल करने, लंबी दूरी से दुश्मन के विमानों को इंटरसेप्ट करने और भारी ग्राउंड अटैक व डीप स्ट्राइक मिशनों में किया जाता है। इसके अलावा यह एयर डिफेंस सिस्टम को दबाने वाले मिशनों में भी अहम भूमिका निभाता है। ब्रह्मोस जैसी लंबी दूरी की मिसाइल ले जाने की क्षमता और सुपरक्रूज जैसी खूबियों की वजह से यह दो मोर्चों की जंग की स्थिति में वायुसेना की सबसे बड़ी ताकत बना हुआ है। फिलहाल इसे और ज्यादा सक्षम बनाने के लिए ‘सुपर सुखोई’ अपग्रेड पर भी काम चल रहा है। (IAF Su-57 after Rafale)

राफेल

इसके बाद आता है राफेल लड़ाकू विमान, जिसे वायुसेना का हाई-एंड मल्टी-रोल प्लेटफॉर्म माना जाता है। अभी वायुसेना के पास राफेल के 36 विमान हैं, जिनकी तैनाती अंबाला और हाशिमारा में की जा चुकी है। राफेल की भूमिका एयर सुपीरियरिटी से लेकर सटीक प्रिसिजन स्ट्राइक, न्यूक्लियर डिलीवरी और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर के जरिए दुश्मन के एयरस्पेस में घुसपैठ तक फैली हुई है। मिटिओर बीवीआर मिसाइल और स्पेक्ट्रा इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सूट इसे बेहद खतरनाक बनाते हैं। यही वजह है कि सरकार ने 114 अतिरिक्त राफेल विमानों की खरीद को भी मंजूरी दी है, ताकि मीडियम वेट सेगमेंट में वायुसेना की ताकत को तेजी से बढ़ाया जा सके। (IAF Su-57 after Rafale)

एचएएल तेजस  

स्वदेशी मोर्चे पर एचएएल का बनाायाा लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट एलसीए तेजस वायुसेना की भविष्य की संख्या आधारित ताकत के रूप में उभर रहा है। तेजस मार्क-1 और मार्क-1A को लाइट मल्टी-रोल फाइटर के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। इन्हें दरअसल मिग-21 विमानों की पुरानी होती फ्लीट को रिप्लेस करने के लिए बनाया गया था। लेकिन 1980 से शुरू हुआ यह प्रोजेक्ट आज भी वायुसेना की जरूरत को पूरा नहीं कर पाया है। तेजस विमानों की भूमिका मुख्य रूप से एयर डिफेंस, क्लोज एयर सपोर्ट, हल्के ग्राउंड अटैक और पायलटों के ट्रांजिशन व ट्रेनिंग से जुड़ी है। तेजस पूरी तरह स्वदेशी प्लेटफॉर्म है और आने वाले वर्षों में इसकी संख्या तेजी से बढ़ने की उम्मीद है। मार्क-1ए के बड़े ऑर्डर के बाद वायुसेना को भरोसा है कि तेजस भविष्य में उसकी रीढ़ बनेगा, जबकि मार्क-2 को मीडियम वेट कैटेगरी में 2030 के बाद लाने की योजना है। (IAF Su-57 after Rafale)

मिराज-2000

वायुसेना की फ्लीट में कुछ पुराने लेकिन भरोसेमंद विमान भी अभी अहम भूमिका निभा रहे हैं। मिराज-2000 ऐसा ही एक विमान है, जिसने कारगिल जैसे अभियानों में अपनी क्षमता साबित की थी। अपग्रेड के बाद यह अभी भी मल्टी-रोल और प्रिसिजन स्ट्राइक मिशनों में इस्तेमाल किया जा रहा है। हालांकि, 2030 के आसपास इसे धीरे-धीरे फेज-आउट करने की योजना है। (IAF Su-57 after Rafale)

मिग-29

इसी तरह मिग-29 अपग्रेडेड संस्करण भी अभी एयर डिफेंस और इंटरसेप्शन की भूमिका में तैनात हैं। हालांकि ये विमान अब उम्र के उस पड़ाव पर पहुंच चुके हैं, जहां अगले एक-दो दशक में इन्हें भी सेवा से हटाना तय माना जा रहा है। जगुआर जैसे विमान, जो कभी डीप पेनेट्रेशन और टैक्टिकल बॉम्बिंग के लिए जाने जाते थे, अब तकनीकी रूप से पुराने हो चुके हैं। दारिन-3 जैसे अपग्रेड के बावजूद इन्हें भी 2030 तक चरणबद्ध तरीके से रिटायर करने की तैयारी है। (IAF Su-57 after Rafale)

ओवरलोडेड डंपर से टूटा अहम रणनीतिक पुल, BRO ने 14 घंटे में जोड़ी चिनाब घाटी की लाइफलाइन

BRO Ghalar Sansari road restoration

BRO Ghalar Sansari road restoration: जम्मू-कश्मीर के दुर्गम पहाड़ी जिले किश्तवाड़ में एक बार फिर सीमा सड़क संगठन यानी बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइजेशन (बीआरओ) ने अपनी तेज कार्यशैली और इंजीनियरिंग क्षमता का शानदार उदाहरण पेश किया है। गलहर-संसारी मार्ग पर अचानक एक बेली ब्रिज के ढह जाने के बाद बीआरओ ने रिकॉर्ड समय में इस रणनीतिक मार्ग पर यातायात दोबारा बहाल कर दिया। यह पूरा काम 14 घंटे से भी कम समय में पूरा कर लिया गया, जबकि मौसम बेहद खराब और हालात चुनौतीपूर्ण थे।

BRO Ghalar Sansari road restoration: चिनाब घाटी को हिमाचल प्रदेश से जोड़ता है यह रास्ता

यह घटना उस समय हुई, जब एक ओवरलोडेड डंपर गलहर-संसारी सड़क पर बने बेली ब्रिज से गुजर रहा था। अधिक वजन के कारण पुल अचानक ढह गया, जिससे इस मार्ग पर यातायात पूरी तरह ठप हो गया। यह मार्ग चिनाब घाटी को हिमाचल प्रदेश से जोड़ने वाला एक बेहद अहम और रणनीतिक रास्ता है। खासतौर पर सर्दियों के मौसम में, जब भारी बर्फबारी के कारण अन्य संपर्क मार्ग बंद हो जाते हैं, तब यही सड़क किश्तवाड़ के कई दूरदराज और बर्फ से ढके इलाकों के लिए एकमात्र ऑल-वेदर लाइफलाइन बन जाती है। (BRO Ghalar Sansari road restoration)

पुल के ढहने की सूचना मिलते ही बीआरओ की टीम बिना समय गंवाए मौके पर पहुंच गई। प्रोजेक्ट संपर्क के तहत काम कर रही 35 बॉर्डर रोड्स टास्क फोर्स (बीआरटीएफ) की 118 रोड कंस्ट्रक्शन कंपनी (आरसीसी) के इंजीनियरों और जवानों ने तुरंत रेस्क्यू और बहाली का काम शुरू कर दिया। उस समय इलाके में कड़ाके की ठंड, तेज हवाएं और बेहद कम तापमान था, लेकिन इसके बावजूद टीम ने पूरी रात काम किया। (BRO Ghalar Sansari road restoration)

इस ऑपरेशन का नेतृत्व 118 आरसीसी के ऑफिसर कमांडिंग लेफ्टिनेंट कर्नल जिवितेश रजोरा ने किया। सबसे पहले मौके पर पहुंचकर पुल की जांच की। इसके बाद भारी इंजीनियरिंग मशीनरी को युद्ध स्तर पर तैनात किया गया। बीआरओ की टीम ने रातों-रात एक अस्थायी डायवर्शन तैयार किया, ताकि यातायात को जल्द से जल्द दोबारा शुरू किया जा सके। इसके साथ-साथ एक अतिरिक्त सुरक्षित डायवर्शन की तैयारी का काम भी समानांतर रूप से शुरू कर दिया गया। (BRO Ghalar Sansari road restoration)

BRO Ghalar Sansari road restoration

बीआरओ की इस तेज कार्रवाई का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि गुलाबगढ़, संसारी और आसपास के गांवों का संपर्क पूरी तरह से कटने से बच गया। अगर समय रहते यह रास्ता नहीं खोला जाता, तो इन इलाकों में रहने वाले लोगों को जरूरी राशन, दवाइयों और अन्य आवश्यक वस्तुओं की सप्लाई में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता। साथ ही सैन्य और प्रशासनिक आवाजाही भी प्रभावित होती। (BRO Ghalar Sansari road restoration)

इस बहाली अभियान के दौरान बीआरओ ने मानवीय पहलू का भी पूरा ध्यान रखा। रास्ते में फंसे यात्रियों और स्थानीय लोगों के लिए मौके पर ही रिफ्रेशमेंट और जरूरी मदद उपलब्ध कराई गईं। स्थानीय निवासियों और यात्रियों ने बीआरओ के जवानों की तारीफ करते हुए कहा कि इतनी कठिन परिस्थितियों में इतनी तेजी से काम होना अपने-आप में एक बड़ी उपलब्धि है।

बीआरओ का कहना है कि पुल ढहने की इस घटना के लिए ओवरलोडिंग जिम्मेदार है। ऐसे में भविष्य में निर्धारित लोड लिमिट और ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल अस्थायी डायवर्शन के जरिए नियंत्रित तरीके से यातायात चलाया जा रहा है, जबकि पुल की स्थायी मरम्मत और मजबूत संरचना के निर्माण का काम भी साथ-साथ आगे बढ़ाया जा रहा है। (BRO Ghalar Sansari road restoration)

पूरे ऑपरेशन की निगरानी 35 बीआरटीएफ (उधमपुर) के कमांडर एसके सिंह ने की। उनकी देखरेख में यह सुनिश्चित किया गया कि सुरक्षा, गुणवत्ता और समय – तीनों पर कोई समझौता न हो।

बीआरओ का आदर्श वाक्य “श्रमेण सर्वं साध्यम”, यानी मेहनत से सब कुछ संभव है, इस पूरे ऑपरेशन में पूरी तरह साकार होता दिखाई दिया। गलहर-संसारी एक्सिस की बहाली एक बार फिर यह साबित करती है कि बीआरओ देश के सबसे कठिन और चुनौतीपूर्ण इलाकों में भी संपर्क बनाए रखने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। ऊंचे पहाड़, खराब मौसम और सीमित संसाधनों के बावजूद बीआरओ लगातार यह दिखाता आया है कि उसके लिए कोई भी काम असंभव नहीं है। (BRO Ghalar Sansari road restoration)

आत्मनिर्भरता से नारी शक्ति तक: रिपब्लिक डे 2026 में क्या खास दिखाने जा रही है भारतीय नौसेना?

Indian Navy Republic Day Parade 2026

Indian Navy Republic Day Parade 2026: इस साल रिपब्लिक डे परेड में भारतीय नौसेना न केवल अपनी सैन्य ताकत का प्रदर्शन करेगी, बल्कि इस बार आत्मनिर्भरता, नारी शक्ति, समुद्री विरासत और भविष्य की समुद्री शक्ति की एक पूरी कहानी भी दिखाई देगी। कर्तव्य पथ पर उतरने वाला नौसेना का मार्चिंग कंटिंजेंट, भव्य नौसेना झांकी और जोशीला नेवल बैंड, तीनों मिलकर भारत की समुद्री ताकत को प्रभावी तरीके से देश-दुनिया के सामने रखेंगे।

Indian Navy Republic Day Parade 2026: रिपब्लिक डे परेड क्यों खास है नौसेना के लिए

मंगलवार नई दिल्ली में आयोजित रिपब्लिक डे परेड 2026 से पहले भारतीय नौसेना के प्रेस प्रीव्यू के दौरान कंटिंजेंट कमांडर लेफ्टिनेंट करण नाग्याल ने कहा कि रिपब्लिक डे परेड सिर्फ एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह देश की एकता, विविधता, सांस्कृतिक विरासत, सैन्य क्षमता और टेक्नोलॉजी की प्रगति का जीवंत प्रदर्शन है। उन्होंने बताया कि भारतीय नौसेना इस परेड में अपने विजन – “कॉम्बैट रेडी, कोहीसिव और आत्मनिर्भर फोर्स, जो विकसित और समृद्ध भारत के लिए समुद्रों की सुरक्षा करे”– को पूरी मजबूती से दर्शाएगी। (Indian Navy Republic Day Parade 2026)

मार्चिंग कंटिंजेंट: मिनी इंडिया की झलक

इस साल भारतीय नौसेना का मार्चिंग कंटिंजेंट 144 युवा नौसैनिकों का होगा, जो कर्तव्य पथ पर कंधे से कंधा मिलाकर कदमताल करते दिखेंगे। यह कंटिंजेंट भारतीय नौसेना को एक आधुनिक, मजबूत और प्रगतिशील समुद्री ताकत के रूप में पेश करेगा।

इस कंटिंजेंट की सबसे खास बात यह है कि यह एक तरह से “मिनी इंडिया” है। इसमें देश के अलग-अलग राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से आए नौसैनिक शामिल हैं। इन सभी की औसत उम्र करीब 25 साल है, यानी यह भारत की युवा शक्ति और भविष्य की झलक भी है।

इन जवानों को नौसेना की अलग-अलग ब्रांचेज से बेहद सोच-समझकर चुना गया है। रिपब्लिक डे परेड जैसे बड़े आयोजन की जरूरतों को पूरा करने के लिए इन सभी ने दो महीने से ज्यादा की विशेष ट्रेनिंग ली है। लंबी ड्रिल, सटीक कदमताल और अनुशासन– हर पहलू पर इन्हें तैयार किया गया है।

मार्चिंग कंटिंजेंट का नेतृत्व लेफ्टिनेंट करण नाग्याल करेंगे। उनके साथ लेफ्टिनेंट पवन कुमार गांडी, लेफ्टिनेंट प्रीति कुमारी और लेफ्टिनेंट वरुण द्रेवेरिया प्लाटून कमांडर के रूप में जिम्मेदारी संभालेंगे। (Indian Navy Republic Day Parade 2026)

Indian Navy Republic Day Parade 2026

नौसेना झांकी में क्या होगा खास

भारतीय नौसेना का टेबल्यू इस साल परेड का सबसे आकर्षक हिस्सा माना जा रहा है। यह टेबल्यू एक साफ संदेश देता है – “स्ट्रॉन्ग नेवी फॉर अ स्ट्रॉन्ग नेशन”। टेबल्यू में भारत की प्राचीन समुद्री विरासत से लेकर आधुनिक और आत्मनिर्भर नौसेना तक की यात्रा को एक ही मंच पर दिखाया गया है।

इसकी शुरुआत होती है 5वीं शताब्दी ईस्वी के एक प्राचीन स्टिच्ड शिप से, जिसे अब आईएनएसवी कौंडिन्य नाम दिया गया है। यह जहाज भारत की प्राचीन शिपबिल्डिंग कौशल और समुद्री व्यापार परंपरा का प्रतीक है। हाल ही में इस जहाज ने पोरबंदर से मस्कट तक की यात्रा कर भारत और ओमान के साझा समुद्री इतिहास को फिर से जीवित किया है।

इसके बाद टेबल्यू में मराठा नौसेना के ‘गुराब’ क्लास जहाजों को दिखाया गया है, जो यह बताते हैं कि भारत में समुद्री ताकत की समझ कोई नई बात नहीं है। (Indian Navy Republic Day Parade 2026)

Indian Navy Republic Day Parade 2026

आधुनिक और आत्मनिर्भर नौसेना की ताकत

टेबल्यू का अगले हिस्से में भारत की आधुनिक नौसेना की असली ताकत दिखेगी। जिसमें भारत का पहला स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत, प्रोजेक्ट 17ए के तहत बने नीलगिरि क्लास स्टेल्थ फ्रिगेट्स – आईएनएस हिमगिरि और आईएनएस उदयगिरि, कलवरी क्लास सबमरीन, जो भारत की अंडरवॉटर स्ट्राइक कैपेबिलिटी को दिखाती है और जीसैट-7आर (प्रोजेक्ट रोहिणी) – नौसेना का एडवांस कम्युनिकेशन सैटेलाइट शामिल होगा।

खास बात यह है कि आईएनएस उदयगिरि और आईएनएस हिमगिरि, भारतीय नौसेना के वारशिप डिजाइन ब्यूरो द्वारा डिजाइन किए गए 100वें और 101वें स्वदेशी युद्धपोत हैं। यह आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। (Indian Navy Republic Day Parade 2026)

नारी शक्ति की दिखेगी झलक

टेबल्यू में नारी सशक्तिकरण को भी बेहद प्रभावशाली तरीके से दिखाया गया है। इसके लिए नाविका सागर परिक्रमा-2 मिशन के तहत आईएनएसवी तारिणी पर दुनिया का चक्कर लगाने वाली लेफ्टिनेंट कमांडर दिलना और लेफ्टिनेंट कमांडर रूपा की यात्रा के रूट को टेबल्यू के फ्रंट हिस्से में दर्शाया गया है।

इसके अलावा, सी कैडेट्स कॉर्प्स की युवा बालिका कैडेट्स भी टेबल्यू के साथ मार्च करेंगी। यह एक गैर-सरकारी संगठन है, जो मुंबई में युवाओं को बेसिक नौटिकल स्किल्स सिखाता है। खास बात यह है कि सी कैडेट्स कॉर्प्स की लड़कियां 1980 के दशक के बाद पहली बार रिपब्लिक डे परेड में हिस्सा ले रही हैं। (Indian Navy Republic Day Parade 2026)

नेवल बैंड: संगीत में अनुशासन और जोश

भारतीय नौसेना का नेवल बैंड, जिसमें 80 म्यूजिशियन शामिल हैं, इस साल भी दर्शकों को मंत्रमुग्ध करेगा। बैंड का नेतृत्व एम एंटनी राज, एमसीपीओ म्यूजिशियन फर्स्ट क्लास करेंगे। 29 जनवरी को होने वाले बीटिंग द रिट्रीट सेरेमनी में यह बैंड देशभक्ति से भरी और जोशीली धुनों की शानदार प्रस्तुति देगा। अलग-अलग फॉर्मेशंस के साथ तालमेल बिठाती यह परफॉर्मेंस परंपरा और आधुनिकता का सुंदर मेल होगी। इस बैंड में छह महिला अग्निवीर म्यूजिशियन भी शामिल हैं। (Indian Navy Republic Day Parade 2026)

आत्मनिर्भर और वैश्विक नौसेना की तस्वीर

कंट्रोलर पर्सनल सर्विसेज वाइस एडमिरल प्रवीण नायर ने बताया कि रिपब्लिक डे परेड में नौसेना की भागीदारी सिर्फ ताकत दिखाने के लिए नहीं है। यह भारत की समुद्री सुरक्षा, आत्मनिर्भरता और ‘समुद्र से समृद्धि’ के प्रधानमंत्री के विजन को दर्शाती है।

वहीं रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता विजय कुमार ने कहा कि रिपब्लिक डे परेड एक राष्ट्रीय प्रयास है, जिसमें तीनों सेनाएं मिलकर संयुक्त योजना और समन्वय के साथ हिस्सा लेती हैं। यह परेड भारत की डिफेंस फोर्सेज की जॉइंटनेस, प्रोफेशनलिज्म और रेडीनेस को साफ तौर पर दिखाती है। (Indian Navy Republic Day Parade 2026)

China’s 200,000-Satellite Space Plan: Why India Should Be Deeply Concerned

China LEO satellite constellations
China LEO Satellite Constellations: Strategic Risks and Implications for India

China LEO satellite constellations: With ambitious projects like Guowang and G60 Starlink, China’s rapid expansion into LEO satellite constellations is a clear indication of China positioning itself as a major player in satellite-based communications and Earth observation. For India, a neighbouring country with its own space ambitions and complex geopolitical relationship with China, these developments carry grave implications across almost all domains.

China’s LEO Constellation Programs

China currently has several mega-constellation projects in active deployment that collectively aim to deploy approximately 38,000-40,000 satellites. As of late 2025, around 300+ satellites have been successfully deployed across all active constellations.

Guowang and G60 Starlink: Beijing’s Answer to Starlink

As of December 2025, China is steadily expanding its low-Earth-orbit satellite ecosystem through multiple large-scale constellations led by state-owned and private players. The most ambitious of these is the Guowang project, which plans to deploy 12,992 satellites. So far, 136 satellites have been launched. The programme is being executed by China Satellite Network Group Co., Ltd., and is widely viewed as Beijing’s flagship answer to global mega-constellations such as Starlink, with strong strategic and national-level backing.

Similarly, Qianfan constellation, also known as “Thousand Sails” or G60 Starlink, led by Shanghai Spacesail Technologies. This project aims to place 15,000 satellites in orbit, making it one of the largest planned constellations in the world. By December 2025, 108 satellites have already been launched. Qianfan is positioned as a commercially driven but state-supported network, with a strong focus on broadband connectivity and industrial applications.

Another major proposal is Honghu-3, which envisions a massive constellation of 10,000 satellites. However, this project is still at an early stage. Only test satellites have been launched so far, indicating that Honghu-3 remains largely in the validation and technology-demonstration phase. The programme is being developed by Hongqing Technology, and its full deployment timeline has yet to be clearly defined.

Commercial Players, Strategic Backing: Geespace, Galaxy Space and Beyond

In the commercial and mobility-oriented segment, Geespace, a company under Geely Future Mobility, plans a constellation of around 6,000 satellites. Approximately 72 satellites have been launched to date. Unlike broadband-heavy systems, Geespace is primarily focused on Internet of Things (IoT) services, high-precision positioning, and support for autonomous driving, aligning closely with China’s smart mobility and connected-vehicle ambitions.

China also had earlier satellite initiatives known as Hongyan and Hongyun, which together planned 320 and 156 satellites respectively. These are now considered legacy projects, as they have been merged into the larger Guowang programme. The consolidation reflects China’s strategy to streamline overlapping efforts and concentrate resources into fewer, more powerful national-level constellations.

Overall, the scale and pace of these programmes highlight China’s determination to build a comprehensive and self-reliant satellite communications architecture. With tens of thousands of satellites planned across multiple constellations, Beijing is clearly positioning itself as a dominant player in the future of space-based connectivity, navigation, and strategic communications.

December 2025 ITU Filings: China’s 200,000-Satellite Shock

In addition to the constellations already under development, December 2025 marked a dramatic escalation in China’s space ambitions. During this period, China submitted a series of filings to the International Telecommunication Union (ITU) for new satellite constellations that, taken together, amount to nearly 200,000 satellites—a scale unprecedented in global space planning.

At the core of these filings are two massive constellations, CTC-1 and CTC-2. Each of these systems is planned to include 96,714 satellites, deployed across 3,660 orbital planes. Combined, CTC-1 and CTC-2 alone account for more than 190,000 satellites, underscoring China’s intent to secure long-term spectrum rights and orbital slots on an extraordinary scale, far exceeding any existing or currently operational constellation.

Alongside these mega-projects, China also filed for several additional networks with more targeted roles. The CHINAMOBILE-L1 constellation, planned by China Mobile, envisions 2,520 satellites, reflecting the telecom giant’s push to integrate space-based connectivity with terrestrial mobile networks. Similarly, the SAILSPACE-1 network proposes 1,296 satellites, aimed at expanding space-based communications capacity.

Another notable filing is the TIANQI-3G system, which plans 1,132 satellites. This system builds on China’s existing Tianqi satellite programmes and is expected to support narrowband communications, data relay, and Internet of Things–related services.

Why China Is Racing for Orbital and Spectrum Control

China also included a smaller but strategically important proposal from China Satcom, which involves 24 satellites in medium Earth orbit (MEO). These satellites are linked to the broader Guowang architecture and are likely intended to complement low-Earth-orbit systems by enhancing coverage, resilience, and redundancy.

Galaxy Space, one of China’s leading private space companies, filed plans for a 91-satellite constellation, reflecting the growing role of commercial players within China’s state-guided space ecosystem.

Taken together, these ITU filings signal China’s clear intention to dominate future orbital real estate and spectrum allocation. Even if only a fraction of these proposed satellites are eventually launched, the sheer scale of the filings positions China to exert long-term influence over global satellite communications, space governance, and the strategic balance in low-Earth and medium-Earth orbits.

While the above-mentioned filings require technical examination by the ITU Radiocommunication Bureau and potential coordination with other nations, China’s strategic intent is clear: securing long-term spectrum priority and preventing China from being crowded out by Western filings.

Strategic Motivations and Deployment Progress

China’s investment in LEO constellations is driven by multiple objectives. Economically, these systems will help capture a share of the growing global satellite internet market, reducing dependence on Western providers. Technologically, they advance China’s capabilities in satellite manufacturing, launch services, and space operations. Most significantly from a strategic perspective, these constellations provide China with independent communication networks that cannot be easily disrupted by adversaries, alongside enhanced reconnaissance and surveillance capabilities.

The urgency behind China’s massive ITU filings stems from the “first come, first served” principle governing satellite spectrum and orbital resource allocation. According to ITU data, LEO can theoretically accommodate approximately 60,000 satellites. Currently, the USA dominates with 75.94% of spacecraft in orbit, while China accounts for only 9.43%. This asymmetry, combined with SpaceX’s Starlink network already comprising the majority of active LEO satellites, has driven China to secure its position through pre-emptive filings.

Surveillance from Space: Implications for India’s Borders

1. Pressure on India’s Space and Launch Capabilities

(a) Enhanced Surveillance Capabilities along the disputed Sino-Indian border. The increased frequency of satellite passes over Indian territory, particularly sensitive military installations and border regions, raises concerns about operational security and strategic surprise.

(b) In any potential conflict scenario, China’s robust satellite communication network could provide decisive advantages in command and control, coordination of forces, and resilience against jamming or disruption. This asymmetry becomes particularly relevant given the challenging terrain of the Himalayan border regions where terrestrial communications infrastructure is limited.

(c) China’s LEO constellations, potentially equipped with dual-use technologies, reflect its understanding of space as an integral component of modern warfare. The ability to rapidly deploy, replace, or repurpose satellites provides flexibility that India must account for in its defense planning.

2. Military Communications and Warfighting Advantages

(a) China’s aggressive constellation deployment schedule puts pressure on India’s own space program to accelerate development. While ISRO has announced plans for its own LEO constellation and has demonstrated significant capabilities, the scale and pace of Chinese projects present a competitive challenge.

(b) Chinese satellite internet services, once operational, could undercut India’s domestic and regional market for connectivity services. This has implications for India’s digital economy, rural connectivity initiatives, and the commercial viability of Indian space ventures.

(c) China’s substantial investment in launch infrastructure, including reusable rocket technology and high-cadence launch capabilities, enables rapid constellation deployment. India’s current launch capacity, while growing, cannot yet match Chinese throughput, potentially widening the strategic gap.

3. Military Communications and Warfighting Advantages

(a) China is likely to offer satellite connectivity services to Belt and Road Initiative (BRI) partner countries, potentially including nations in South Asia and the Indian Ocean Region. This could extend Chinese influence in India’s immediate neighbourhood and provide it with leverage over regional communications infrastructure.

(b) Countries in India’s periphery adopting Chinese satellite internet systems may raise concerns about data security, surveillance, and dependence on Chinese infrastructure—issues that resonate with broader debates about technological sovereignty.

4. Regional Influence through Satellite Connectivity

(a) The December 2025 ITU filings for nearly 200,000 satellites, combined with existing mega-constellations from multiple nations, dramatically increases the risk of orbital debris, collisions, and the Kessler Syndrome—a cascade of collisions that could render certain orbital zones unusable. While LEO can theoretically accommodate approximately 60,000 satellites, the race to file for hundreds of thousands creates significant sustainability concerns. This affects all spacefaring nations, including India, which rely on LEO for Earth observation, communications, and navigation satellites.

(b) Absence of binding international regulations on mega-constellations creates uncertainty. China’s approach to space sustainability and debris mitigation will have direct consequences for India’s ability to safely operate its own space assets. The sheer scale of China’s ambitions—from current deployments to the 200,000+ satellite filings—raises questions about whether existing international frameworks can effectively manage this unprecedented expansion of space activity.

The Strategic Meaning of Space as the New High Ground

China’s ambitious LEO satellite constellation programs represent a fundamental shift in the space domain with far-reaching implications for India. With China currently holding only 9.43% of global spacecraft compared to USA’s 75.94%, it is racing to close the gap through massive investment and rapid deployment. The race for LEO is ultimately a test of India’s ability to adapt to the changing character of strategic competition in the 21st century—one where control of the high ground takes on a literal meaning extending hundreds of kilometers above Earth’s surface, and where the competition now involves not thousands but potentially hundreds of thousands of satellites.

105 मिनट में कूटनीति का बड़ा खेल; यूएई राष्ट्रपति की ‘शॉर्ट विजिट’ में छुपा है बड़ा रणनीतिक संकेत

UAE President India visit

UAE President India visit: संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान की हालिया भारत यात्रा देखने में भले ही बहुत छोटी थी, लेकिन इसके संकेत काफी बड़े हैं। राष्ट्रपति का विमान शाम करीब 4 बजकर 20 मिनट पर नई दिल्ली में उतरा। ठीक 25 मिनट बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनकी मुलाकात हुई और फिर करीब 6 बजकर 5 मिनट पर वे वापस रवाना हो गए। यानी जमीन पर कुल मिलाकर सिर्फ 105 मिनट। आम तौर पर इतने कम समय की यात्रा को औपचारिक दौरा नहीं कहा जाता, लेकिन कूटनीति की दुनिया में ऐसी संक्षिप्त यात्राएं कई बार लंबे शिखर सम्मेलनों से ज्यादा संदेश देती हैं।

UAE President India visit: लैंडिंग से टेकऑफ तक कुल समय सिर्फ 105 मिनट

राष्ट्राध्यक्ष यूं ही किसी देश में उतरते नहीं हैं। इसके लिए सुरक्षा, प्रोटोकॉल और राजनीतिक तैयारी की जरूरत होती है। अगर बात सिर्फ व्यापार, निवेश या सामान्य द्विपक्षीय मुद्दों की होती, तो यह काम मंत्रियों या वरिष्ठ अधिकारियों के जरिए भी हो सकता था। लेकिन खुद राष्ट्रपति का आना और प्रधानमंत्री से आमने-सामने मिलना यह बताता है कि मामला कुछ ज्यादा ही अहम था। इसीलिए इस स्टॉपओवर को सामान्य शिष्टाचार मुलाकात मानना ठीक नहीं होगा।

सरकारी बयान में हमेशा की तरह भारत-यूएई आर्थिक साझेदारी, नॉन-ऑयल ट्रेड को 100 बिलियन डॉलर तक ले जाने, ऊर्जा और टेक्नोलॉजी सहयोग जैसे विषयों का जिक्र किया गया। ये सभी मुद्दे महत्वपूर्ण हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि ऐसे विषयों पर बातचीत महीनों चलती है। इन्हें आगे बढ़ाने के लिए 105 मिनट की राष्ट्रपति यात्रा की जरूरत नहीं होती। यहीं से साफ होता है कि बातचीत का असली फोकस कुछ और रहा होगा। (UAE President India visit)

अमेरिका ने खाड़ी क्षेत्र को बनाया अस्थिर

इस पूरी यात्रा को पश्चिम एशिया के मौजूदा हालात से जोड़कर देखना जरूरी है। गाजा संकट, ईरान से जुड़े तनाव, लाल सागर और अरब सागर में शिपिंग रूट्स पर बढ़ते खतरे और अमेरिका की बदलती वैश्विक प्राथमिकताओं ने खाड़ी क्षेत्र को अस्थिर बना दिया है। लंबे समय तक खाड़ी की सुरक्षा अमेरिकी छतरी के नीचे रही, लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। ऐसे में यूएई जैसे देश अपनी रणनीति को नए सिरे से संतुलित कर रहे हैं। (UAE President India visit)

UAE President India visit

यूएई और सऊदी अरब के बीच रिश्ते बिगड़े

इसके अलावा खाड़ी के भीतर भी समीकरण पहले जैसे नहीं रहे। यूएई और सऊदी अरब के बीच रिश्ते अब पूरी तरह समान दिशा में नहीं चलते। आर्थिक नेतृत्व, क्षेत्रीय प्रभाव और रणनीतिक स्वतंत्रता को लेकर दोनों के रास्ते अलग-अलग दिखने लगे हैं। ऐसे माहौल में यूएई उन देशों से रिश्ते मजबूत करना चाहता है जो भरोसेमंद हों, तेजी से फैसले ले सकें और जिनके साथ किसी तरह की वैचारिक या राजनीतिक शर्तें न जुड़ी हों। (UAE President India visit)

भारत बना रणनीतिक साझेदार

यहीं पर भारत यूएई के लिए सिर्फ एक बाजार नहीं, बल्कि एक रणनीतिक साझेदार बनकर उभरता है। भारत की इंडियन ओशन में मजबूत मौजूदगी है, उसकी अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है और उसकी विदेश नीति संतुलित और व्यावहारिक मानी जाती है। भारत किसी देश पर विचारधारा थोपने या शासन बदलने की बात नहीं करता। यही वजह है कि अस्थिर हालात में भारत यूएई के लिए एक सुरक्षित और भरोसेमंद विकल्प नजर आता है।

जानकारों का मानना है कि इस छोटी लेकिन अहम मुलाकात का असली एजेंडा सुरक्षा और रणनीतिक समन्वय से जुड़ा था। पिछले कुछ वर्षों में भारत और यूएई के बीच काउंटर-टेररिज्म, खुफिया जानकारी साझा करने और समुद्री सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग काफी बढ़ा है। इन मुद्दों पर ज्यादातर बातचीत सार्वजनिक नहीं होती, क्योंकि सुरक्षा सहयोग आम तौर पर शांत कूटनीति के तहत चलता है।

ऐसे संवेदनशील मामलों पर चर्चा के लिए लंबी बैठकों या बड़ी घोषणाओं की जरूरत नहीं होती। कई बार सीधी, आमने-सामने बातचीत ही सबसे असरदार होती है। यही कारण है कि राष्ट्रपति का खुद दिल्ली आना और कम समय में लौट जाना एक मजबूत संकेत देता है कि दोनों देशों के बीच संवाद का स्तर काफी ऊंचा है। (UAE President India visit)

खाड़ी के दूसरे देशों के लिए संकेत है यह यात्रा

यह यात्रा सिर्फ भारत के लिए संदेश नहीं थी। इसका असर पूरे क्षेत्र पर पड़ता है। खाड़ी के दूसरे देशों, वैश्विक ताकतों और उन सभी पक्षों के लिए यह संकेत था कि भारत और यूएई के रिश्ते सक्रिय हैं और जरूरत पड़ने पर तुरंत उच्च स्तर पर संपर्क किया जा सकता है। आज की कूटनीति में हर चीज संधियों और समझौतों से तय नहीं होती। कई बार एक छोटी सी यात्रा भी बहुत बड़ा संदेश दे देती है।

इस मुलाकात से किसी बड़े समझौते या नई घोषणा की उम्मीद करना सही नहीं होगा। यह यात्रा घोषणाओं के लिए नहीं थी। इसका मकसद था तेजी से बदलते हालात में आपसी समझ बनाए रखना और रणनीतिक तालमेल को मजबूत करना। कूटनीति में कई बार रिश्ते बनाने से ज्यादा जरूरी होता है, बने हुए रिश्तों का सही समय पर इस्तेमाल करना।

यूएई राष्ट्रपति की यह 105 मिनट की स्टॉपओवर यात्रा यही बताती है कि भारत-यूएई संबंध अब उस स्तर पर पहुंच चुके हैं, जहां संकट या अनिश्चितता के समय सीधा और त्वरित संवाद सबसे अहम हथियार बन जाता है। शायद इसी वजह से यह छोटी-सी यात्रा कई लंबे शिखर सम्मेलनों से ज्यादा मायने रखती है। (UAE President India visit)

10 महीने, 13 देश, 22,000 नॉटिकल माइल; आईएनएस सुदर्शिनी का मिशन ‘लोकायन 26’

INS Sudarshini Lokayan 26
INS Sudarshini Lokayan 26

INS Sudarshini Lokayan 26: भारतीय नौसेना का सेल ट्रेनिंग शिप आईएनएस सुदर्शिनी एक बार फिर भारत की समुद्री परंपरा और नौसैनिक कौशल को दुनिया के सामने पेश करने जा रहा है। 20 जनवरी को आईएनएस सुदर्शिनी ऐतिहासिक ट्रांसओसैनिक सेल एक्सपीडिशन “लोकायन 26” पर रवाना होगी। यह यात्रा पूरे 10 महीने चलेगी, जिसमें जहाज 22,000 नॉटिकल माइल से अधिक की दूरी तय करते हुए 13 देशों के 18 विदेशी बंदरगाहों पर पहुंचेगा।

यह अभियान केवल एक प्रशिक्षण यात्रा नहीं है, बल्कि यह भारत की समुद्री विरासत, वसुधैव कुटुम्बकम की भावना और वैश्विक समुद्री सहयोग का एक सशक्त प्रतीक माना जा रहा है। लोकायन 26 अभियान में शामिल हो कर भारतीय नौसेना समुद्रों के जरिए ब्रिज ऑफ कोऑपरेशन बना रही है और आने वाली पीढ़ियों के लिए समुद्री परंपरा को जीवित रख रही है। (INS Sudarshini Lokayan 26)

INS Sudarshini Lokayan 26: क्या है लोकायन 26 अभियान

लोकायन 26 भारतीय नौसेना की एक प्रमुख सेल ट्रेनिंग डिप्लॉयमेंट है, जिसका मकसद युवा नौसैनिकों को पारंपरिक सेलिंग, लंबी दूरी की समुद्री नेविगेशन और ओपन ओशन ऑपरेशंस का वास्तविक अनुभव देना है। इस अभियान के दौरान आईएनएस सुदर्शिनी हिंद महासागर, अटलांटिक महासागर और अन्य समुद्री मार्गों से होते हुए कई महाद्वीपों तक पहुंचेगी।

नौसेना के अनुसार, यह यात्रा भारत की उस परंपरा को आगे बढ़ाती है, जहां सदियों पहले भारतीय नाविक समुद्र के रास्ते व्यापार, संस्कृति और ज्ञान का आदान-प्रदान करते थे। (INS Sudarshini Lokayan 26)

अंतरराष्ट्रीय आयोजनों में भारत का प्रतिनिधित्व

इस यात्रा का सबसे बड़ा आकर्षण आईएनएस सुदर्शिनी की दो प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय टॉल-शिप इवेंट्स में भागीदारी होगी।

पहला आयोजन है एस्काल आ सेत (Escale à Sète), जो फ्रांस के सेत बंदरगाह पर आयोजित किया जाता है। यह दुनिया के सबसे प्रसिद्ध सेलिंग और टॉल-शिप फेस्टिवल्स में से एक माना जाता है। यहां आईएनएस सुदर्शिनी भारत की पारंपरिक नौकायन संस्कृति और सेलिंग विरासत को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करेगी।

दूसरा बड़ा आयोजन है सेल 250 (SAIL 250), जो अमेरिका के न्यूयॉर्क में आयोजित होगा। इस कार्यक्रम में दुनिया भर से ऐतिहासिक और आधुनिक टॉल शिप्स हिस्सा लेती हैं। इस दौरान आईएनएस सुदर्शिनी भारतीय नौसेना का प्रतिनिधित्व करते हुए भारत की समुद्री ताकत और अनुशासन को दर्शाएगी। (INS Sudarshini Lokayan 26)

200 से अधिक प्रशिक्षुओं को मिलेगा समुद्र का असली अनुभव

लोकायन 26 अभियान के दौरान भारतीय नौसेना और भारतीय तटरक्षक बल के 200 से अधिक प्रशिक्षु इस जहाज पर सवार रहेंगे। ये सभी प्रशिक्षु इस लंबी यात्रा के दौरान गहन सेल ट्रेनिंग से गुजरेंगे।

उन्हें पारंपरिक सीमैनशिप, ओशन नेविगेशन, मौसम की समझ, हवा और लहरों के अनुसार जहाज संचालन, और खुले समुद्र में जीवन की बारीकियां सिखाई जाएंगी। नौसेना के अधिकारियों का कहना है कि इस तरह की लंबी समुद्री यात्राएं युवा नाविकों के आत्मविश्वास, नेतृत्व क्षमता और टीमवर्क को मजबूत करती हैं। (INS Sudarshini Lokayan 26)

विदेशी नौसेनाओं के साथ प्रशिक्षण और संवाद

आईएनएस सुदर्शिनी की यह यात्रा केवल प्रशिक्षण तक सीमित नहीं है। जिन देशों के बंदरगाहों पर यह जहाज पहुंचेगा, वहां संबंधित देशों की नौसेनाओं के साथ ट्रेनिंग इंटरैक्शन, प्रोफेशनल एक्सचेंज और मैरीटाइम पार्टनरशिप एक्टिविटीज आयोजित की जाएंगी।

इन कार्यक्रमों के जरिए भारतीय नौसेना समुद्री सुरक्षा, नेविगेशन और संयुक्त संचालन जैसे विषयों पर अनुभव साझा करेगी। यह पहल भारत की महा सागर (म्यूचुअल एंड होलिस्टिक एडवांसमेंट फॉर सिक्योरिटी एंड ग्रोथ अक्रॉस रीजन) की सोच को आगे बढ़ाती है। (INS Sudarshini Lokayan 26)

सांस्कृतिक कूटनीति का मजबूत संदेश

लोकायन 26 को एक कल्चरल डिप्लोमेसी मिशन के तौर पर भी देखा जा रहा है। अलग-अलग देशों के बंदरगाहों पर आईएनएस सुदर्शिनी भारत की संस्कृति, अनुशासन और मित्रता का संदेश लेकर पहुंचेगी।

जहां भी जहाज रुकेगा, वहां स्थानीय लोगों, नौसेना अधिकारियों और युवाओं को जहाज देखने और भारतीय नौसेना की कार्यप्रणाली समझने का अवसर मिलेगा। इससे देशों के बीच विश्वास और सहयोग को और मजबूती मिलेगी। (INS Sudarshini Lokayan 26)

आईएनएस सुदर्शिनी दूसरा सेल ट्रेनिंग शिप

आईएनएस सुदर्शिनी भारतीय नौसेना का दूसरा सेल ट्रेनिंग शिप है। अब तक यह जहाज 1,40,000 नॉटिकल माइल से अधिक की दूरी तय कर चुका है। यह जहाज पहले भी कई अंतरराष्ट्रीय अभियानों और प्रशिक्षण यात्राओं का हिस्सा रह चुका है।

नौसेना के अनुसार, लोकायन 26 के जरिए आईएनएस सुदर्शिनी एक बार फिर भारत की समुद्री क्षमता, प्रोफेशनलिज्म और गुडविल को वैश्विक स्तर पर प्रदर्शित करेगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे अभियान भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी, नेबरहुड फर्स्ट और इंडो-पैसिफिक विजन को मजबूत करते हैं। यह दिखाता है कि भारत केवल सैन्य ताकत के रूप में नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार समुद्री राष्ट्र के रूप में दुनिया से जुड़ना चाहता है। (INS Sudarshini Lokayan 26)

मिलिट्री ड्रोन बनाने के लिए कड़े होंगे नियम, चीनी पार्ट्स पर लगेगा पूरा ब्रेक, नया सिक्योरिटी फ्रेमवर्क तैयार

Chinese Parts in Military Drones

Chinese Parts in Military Drones: सेना के लिए बनाए जाने वाले मिलिट्री ड्रोनों में चीनी पार्ट्स के इस्तेमाल को लेकर गंभीर रक्षा मंत्रालय के स्तर पर ऐसा सिक्योर्ड मिलिट्री ड्रोन फ्रेमवर्क तैयार किया गया है, जिसका मकसद भारतीय ड्रोन सिस्टम्स में किसी भी तरह के चीनी मूल के अवैध या अनकंट्रोल्ड कंपोनेंट्स के इस्तेमाल को पूरी तरह रोकना है। यह फ्रेमवर्क अब अंतिम मंजूरी की प्रक्रिया में है और जल्द ही ड्रोन इंडस्ट्री के लिए एक बाइंडिंग डॉक्यूमेंट के तौर पर लागू किया जा सकता है।

यह फ्रेमवर्क भारतीय सेना के आर्मी डिजाइन ब्यूरो (एडीबी) ने तैयार किया है। इसकी जरूरत तब महसूस हुई, जब पिछले कुछ सालों में सामने आया कि कई घरेलू कंपनियां अपने ड्रोन को “मेक इन इंडिया” बताकर बेच रही थीं, लेकिन उनके अंदर इस्तेमाल होने वाला सॉफ्टवेयर, कोड और हार्डवेयर चीनी मूल के थे। यह मामला सीधे तौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ है, क्योंकि ऐसे कंपोनेंट्स में बैकडोर या रिमोट एक्सेस का खतरा रहता है। (Chinese Parts in Military Drones)

Chinese Parts in Military Drones: किस स्टेज पर है मंजूरी प्रक्रिया

सूत्रों के मुताबिक, इस फ्रेमवर्क को डायरेक्टर जनरल (एक्विजिशन) की मंजूरी मिल चुकी है। अब फाइल डिफेंस सेक्रेटरी आरके सिंह के पास है। डिफेंस सेक्रेटरी को इस मुद्दे पर पहले भी प्रेजेंटेशन दिया जा चुका है। उनकी मंजूरी के बाद यह फाइल रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के पास जाएगी, जहां से अंतिम हरी झंडी मिलने की उम्मीद है।

एक बार रक्षा मंत्री की मंजूरी मिलते ही यह फ्रेमवर्क पब्लिक कर दिया जाएगा और सभी ड्रोन मैन्युफैक्चरर्स को इसका पालन करना होगा। यानी जो कंपनी भारतीय सेना, नौसेना या वायु सेना को ड्रोन सप्लाई करना चाहती है, उसे इस नए सिक्योरिटी फ्रेमवर्क के सभी नियम पूरे करने होंगे। (Chinese Parts in Military Drones)

क्यों जरूरी हो गया नया ड्रोन फ्रेमवर्क

पिछले कुछ सालों में ड्रोन युद्ध का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। आज ड्रोन सिर्फ निगरानी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे सर्विलांस, टारगेटिंग, लॉइटरिंग म्यूनिशन, अटैक और लॉजिस्टिक्स जैसे अहम रोल निभा रहे हैं। ऐसे में अगर ड्रोन सिस्टम अनसेफ हुआ, तो वह दुश्मन के लिए हथियार बन सकता है।

2020 में गलवान झड़प के दौरान यह सामने आया था कि कई भारतीय ड्रोन हैक हो गए थे और उनकी फीड दुश्मन तक पहुंचने का खतरा बना था। इसके बाद पश्चिमी और उत्तरी सीमाओं पर भी ड्रोन हैकिंग की घटनाओं की रिपोर्ट आईं। यही वजह है कि ड्रोन आर्किटेक्चर को मजबूत करने की जरूरत और ज्यादा महसूस हुई।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी यह बात साफ हो गई कि ड्रोन सिक्योरिटी सिर्फ टेक्नोलॉजी का मुद्दा नहीं, बल्कि सीधे-सीधे ऑपरेशनल सर्वाइवल से जुड़ा विषय है। (Chinese Parts in Military Drones)

क्या है इस नए फ्रेमवर्क में

यह नया फ्रेमवर्क अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्य ओडब्ल्यूएएसपी 4.0 (ओपन वेब एप्लिकेशन सिक्योरिटी प्रोजेक्ट) स्टैंडर्ड पर आधारित है, लेकिन इसे भारतीय जरूरतों के हिसाब से और ज्यादा सख्त बनाया गया है। इसका मतलब यह है कि अब ड्रोन सिर्फ उड़ने और काम करने भर से पास नहीं होगा, बल्कि उसकी साइबर और हार्डवेयर सिक्योरिटी की भी गहराई से जांच होगी।

फ्रेमवर्क के तहत ड्रोन सिस्टम को 30 से ज्यादा अलग-अलग टेस्ट्स से गुजरना होगा। ये टेस्ट्स सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त लैब्स जैसे एसटीक्यूसी आईटी सर्विसेज, ईटीडीसी बेंगलुरु और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय से जुड़ी अन्य संस्थाओं में किए जाएंगे। (Chinese Parts in Military Drones)

किन चीजों की होगी जांच

नए फ्रेमवर्क के तहत ड्रोन के हर महत्वपूर्ण हिस्से की जांच की जाएगी। इसमें सबसे पहले सॉफ्टवेयर और कोड लेवल पर टेस्ट होंगे, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि ड्रोन किसी अनधिकृत सर्वर या इकाई को डेटा न भेज रहा हो।

इसके अलावा ड्रोन के ऑटोपायलट मॉड्यूल, चिप, सिम्युलेटर, फील्ड प्रोग्रामर, पावर इंटरफेस और ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन की भी गहनता से जांच होगी। खास बात यह है कि ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन के लिए इस्तेमाल होने वाले विंडोज वर्कस्टेशन और स्मार्टफोन तक को टेस्टिंग के दायरे में लाया गया है।

ड्रोन में इस्तेमाल होने वाला अपडेट सिस्टम भी जांच के दायरे में होगा। यानी अब यह देखा जाएगा कि ड्रोन में सॉफ्टवेयर अपडेट कैसे होता है, क्या अपडेट सुरक्षित है और कहीं ऐसा तो नहीं कि किसी डाउनग्रेड अटैक के जरिए सिस्टम को कमजोर किया जा सके। (Chinese Parts in Military Drones)

हार्डवेयर पर भी सख्त नजर

अब तक ड्रोन सुरक्षा चर्चा ज्यादातर सॉफ्टवेयर तक सीमित रहती थी, लेकिन नया फ्रेमवर्क हार्डवेयर को भी उतनी ही अहमियत देता है। हर ड्रोन के बिल ऑफ मटीरियल की जांच होगी। इसका मतलब यह कि कौन-सा पार्ट कहां से आया है, किस देश में बना है और उसकी सप्लाई चेन क्या है, यह सब साफ-साफ बताना होगा।

सूत्रों ने बताया कि कई मामले ऐसे भी सामने आए थे, जिनमें देखा गया था ड्रोन में इस्तेमाल होने वाले पार्ट्स चीन से खरीदे गए, लेकिन कई रूट्स और कई देशों से होकर इन कंपनियों के पास पहुंचे। अब इसकी भी गहनता से जांच होगी और पार्ट्स पर लगी बारीक से बारीक मार्किंग को भी ध्यान से जांचा जाएगा।

सरकार का साफ संदेश है कि इनिमिकल देशों, खासकर चीन से जुड़े कंपोनेंट्स के लिए जीरो टॉलरेंस नीति होगी। अगर किसी ड्रोन में ऐसे कंपोनेंट्स पाए गए, तो उसे सेना में शामिल होने की अनुमति नहीं मिलेगी। (Chinese Parts in Military Drones)

खरीद प्रक्रिया के हर स्टेज में लागू होगा नियम

इस फ्रेमवर्क की सबसे अहम बात यह है कि यह सिर्फ फाइनल डिलीवरी तक सीमित नहीं रहेगा। यह आरएफआई (रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन) से लेकर आरएफपी (रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल) और फिर कॉन्ट्रैक्ट के बाद की पूरी प्रक्रिया पर लागू होगा।

यानी ड्रोन कंपनी को शुरुआत से ही यह साबित करना होगा कि उसका सिस्टम सुरक्षित है। बाद में अगर किसी स्टेज पर गड़बड़ी पाई जाती है, तो कॉन्ट्रैक्ट पर भी असर पड़ सकता है।

हालांकि इस फ्रेमवर्क से ड्रोन इंडस्ट्री में शुरुआती दौर में थोड़ी परेशानी जरूर हो सकती है, क्योंकि अब कंपनियों को ज्यादा टेस्टिंग और डॉक्यूमेंटेशन करना होगा। लेकिन लंबे समय में इसका फायदा उन्हीं कंपनियों को मिलेगा, जो असल में स्वदेशी और सुरक्षित टेक्नोलॉजी पर काम कर रही हैं।

इससे फर्जी “मेक इन इंडिया” के दावे अपने आप बाहर हो जाएंगे और भारतीय ड्रोन इंडस्ट्री की साख मजबूत होगी। साथ ही यह भारत को भविष्य में ड्रोन एक्सपोर्ट के लिए भी ज्यादा भरोसेमंद बनाएगा। (Chinese Parts in Military Drones)

राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए क्यों अहम है यह कदम

आज की जंग सिर्फ बॉर्डर पर नहीं लड़ी जाती। साइबर स्पेस, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और ड्रोन वारफेयर अब उतने ही अहम हो चुके हैं। ऐसे में अगर ड्रोन सिस्टम सुरक्षित नहीं होगा, तो वह दुश्मन के लिए भारत की कमजोरी बन सकता है।

यह नया फ्रेमवर्क इस खतरे को काफी हद तक कम कर देगा। इससे यह सुनिश्चित होगा कि भारतीय सैनिक जिस ड्रोन पर भरोसा कर रहे हैं, वह सिर्फ उड़ने में नहीं, बल्कि डेटा और कंट्रोल के मामले में भी पूरी तरह सुरक्षित है।

वहीं, डिफेंस सेक्रेटरी और रक्षा मंत्री की मंजूरी के बाद यह फ्रेमवर्क आधिकारिक रूप से लागू हो जाएगा। इसके बाद ड्रोन इंडस्ट्री को नए नियमों के मुताबिक खुद को ढालना होगा। कुल मिलाकर, यह फ्रेमवर्क भारत की ड्रोन स्ट्रैटेजी में एक टर्निंग पॉइंट माना जा रहा है। यह कदम भारत को सिर्फ ड्रोन यूजर नहीं, बल्कि सिक्योर और भरोसेमंद ड्रोन पावर बनाने की दिशा में आगे ले जाएगा। (Chinese Parts in Military Drones)