📍नई दिल्ली | 14 Oct, 2026, 6:25 PM
US naval logistics India: मध्य-पूर्व में ईरान के साथ जारी सैन्य संघर्ष ने अमेरिकी नौसेना के लॉजिस्टिक्स सिस्टम पर दबाव बढ़ा दिया है। लंबे समय तक समुद्र में तैनात अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर और उनके साथ चलने वाले युद्धपोतों को ईंधन, जरूरी सामान, मरम्मत और नाविकों के आराम के लिए सुरक्षित बंदरगाहों की जरूरत होती है। लेकिन बहरीन में अमेरिकी नौसैनिक सुविधाओं को हुए नुकसान के बाद वॉशिंगटन दूसरे विकल्पों पर विचार कर रहा है। इसी बीच अमेरिकी नौसेना के वरिष्ठ अधिकारी एडमिरल सैमुअल पैपारो की भारतीय नौसेना के अंडमान और निकोबार कमांड के प्रमुख वाइस एडमिरल विनीत मैकार्टी से मुलाकात की है।
अमेरिकी नौसेना के प्रमुख एडमिरल डैरिल कॉडल पहले ही कह चुके हैं कि अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर को आराम, रसद और दूसरे जरूरी कामों के लिए अफ्रीका, भारत और सिंगापुर जैसे स्थानों पर भेजने के विकल्पों पर विचार किया जा रहा है। हालांकि, भारत ने अंडमान और निकोबार में अमेरिकी नौसेना को नियमित बंदरगाह सुविधा या स्थायी सैन्य ठिकाना देने का कोई आधिकारिक एलान नहीं किया है।
US naval logistics India: ईरान संघर्ष ने बढ़ाईं अमेरिकी नौसेना की मुश्किलें
अमेरिकी नौसेना के लिए मध्य-पूर्व में लगातार सैन्य अभियान चलाना आसान नहीं है। एयरक्राफ्ट कैरियर अकेले कहीं नहीं मूव करते, बल्कि उनके साथ पूरा कैरियर बैटल साथ सााथ चलता है, जिनमें डेस्ट्रॉयर शिप, दूसरे वॉरशिप्स, पनडुब्बियां और लड़ाकू विमानों शामिल होते हैं। इस ग्रुप को लंबे समय तक एक्टिव रखने के लिए लगातार रसद की जरूरत होती है।
अमेरिकी नौसेना के लिए बहरीन लंबे समय से मध्य पूर्व में एक प्रमुख लॉजिस्टिक्स केंद्र रहा है। यहां अमेरिकी पांचवीं फ्लीट का मुख्यालय और नेवल सपोर्ट फैसिलिटीज मौजूद हैं। लेकिन ईरान के साथ जंग के दौरान अमेरिकी नौसैनिक सुविधाओं को हुए नुकसान के चलते यूएस का यह सिस्टम दबाव में है।
खुद एक्टिंग नेवी सेक्रेटरी ने खुद कहा था, “उन्होंने बहरीन को तबाह कर दिया।” नतीजतन, अमेरिकी युद्धपोत अब आसपास के खाड़ी पोर्ट्स का इस्तेमाल नहीं कर पा रहे। रसद के लिए जहाजों को 2200 समुद्री मील दूर डिएगो गार्सिया या 3700 मील दूर सिंगापुर तक जाना पड़ रहा है। लंबे समय तक समुद्र में रहने से नाविकों के मनोबल पर असर पड़ रहा है और रखरखाव की समस्याएं बढ़ गई हैं।
अमेरिकी नौसेना के चीफ ऑफ नेवल ऑपरेशंस एडमिरल डैरिल कॉडल ने अगस्त 2026 में पत्रकारों से बातचीत के दौरान बताया था कि नौसेना अब अरब सागर में तैनात एयरक्राफ्ट कैरियर के लिए वैकल्पिक बंदरगाहों और रसद सुविधाओं की तलाश कर रही है। बहरीन में 5वीं फ्लीट मुख्यालय पर ईरानी हमले के बाद नौसेना अफ्रीका, भारत और सिंगापुर जैसे पोर्ट्स पर विचार कर रही है। ताकि समुद्र में तैनात रहने वाले जहाजों को रुकने, जरूरी सामान लेने और अपने चालक दल को आराम देने की सुविधा मिल सके।
सात से आठ महीने तक समुद्र में तैनात रह रहे अमेरिकी नाविक
लंबे सैन्य अभियानों का असर केवल युद्धपोतों पर नहीं पड़ता। जहाजों पर तैनात हजारों सेलर्स को भी लगातार कई महीनों तक समुद्र में रहना पड़ता है। इससे उनकी दिनचर्या, मानसिक स्वास्थ्य, परिवार और काम करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
अमेरिकी नौसेना के अनुसार, यूएसएस अब्राहम लिंकन जैसे एयरक्राफ्ट कैरियर को लंबे समय तक बिना बंदरगाह पर रुके अभियान चलाना पड़ा। अमेरिकी नौसेना के प्रमुख एडमिरल कॉडल ने कहा कि लगातार तैनाती के दौरान बंदरगाह पर रुकने का मौका मिलना सेलर्स के लिए महत्वपूर्ण होता है।
उन्होंने कहा, “मुझे सात महीने की तैनाती पसंद है। मैं आमतौर पर तैनाती की अवधि बढ़ाने के पक्ष में नहीं हूं और इसके खिलाफ मजबूती से अपनी बात रखता हूं। लेकिन दुश्मन को भी अपनी चाल चलने का मौका मिलता है।”
अमेरिकी नौसेना के अधिकारियों के मुताबिक, एयरक्राफ्ट कैरियर की तैनाती बढ़ाने से नाविकों के परिवारों के लिए भी योजना बनाना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में सुरक्षित बंदरगाहों पर रुकने से चालक दल को आराम देने, जहाज की जांच करने और जरूरी सामान लेने में मदद मिलती है। (US naval logistics India)
एडमिरल पैपारो और वाइस एडमिरल मैकार्टी की मुलाकात क्यों है अहम?
अमेरिकी पैसिफिक कमांड के कमांडर एडमिरल सैमुअल जे. पैपारो ने 3 से 8 अक्टूबर तक भारत का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने भारतीय रक्षा मंत्रालय, तीनों सेनाओं के शीर्ष अधिकारियों और विदेश मंत्री एस. जयशंकर से मुलाकात की।
12 अक्टूबर को भारत स्थित अमेरिकी दूतावास ने बताया कि जापान जाते समय एडमिरल पैपारो ने अंडमान और निकोबार कमांड के कमांडर-इन-चीफ वाइस एडमिरल विनीत मैकार्टी से मुलाकात की। इस बैठक में दोनों देशों की सेनाओं के बीच सहयोग जारी रखने पर चर्चा हुई। अमेरिकी दूतावास ने इसे भारत-अमेरिका मेजर डिफेंस पार्टनरशिप को मजबूत करने की दिशा में एक कदम बताया।
वाइस एडमिरल विनीत मैकार्टी ने 1 जून 2026 को अंडमान और निकोबार कमांड के 20वें कमांडर-इन-चीफ के रूप में पदभार संभाला था। वह भारतीय नौसेना में गनरी और मिसाइल एक्सपर्ट हैं। उन्हें समुद्री अभियानों, प्रशिक्षण और तीनों सेनाओं के बीच तालमेल से जुड़े क्षेत्रों में 36 वर्ष से अधिक का अनुभव है। (US naval logistics India)
भारत क्यों है महत्वपूर्ण?
भारत भौगोलिक रूप से मध्य पूर्व और इंडो-पैसिफिक के बीच स्थित है। भारतीय पोर्ट्स (जैसे मुंबई, कोचीन, विशाखापत्तनम और भविष्य में अंडमान) बड़े युद्धपोतों को संभालने की क्षमता रखते हैं।
वहीं, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह हिंद महासागर में भारत की समुद्री सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। यह क्षेत्र मलक्का जलडमरूमध्य के करीब स्थित है। मलक्का जलडमरूमध्य हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के बीच व्यापारिक जहाजों तथा नौसैनिक गतिविधियों के लिए प्रमुख समुद्री मार्ग है।
चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देशों के लिए ऊर्जा और व्यापार से जुड़ी बड़ी मात्रा में समुद्री आवाजाही इसी क्षेत्र से होती है। इसलिए यहां होने वाली गतिविधियों पर भारत की नजर रहती है।
भारत ने अंडमान और निकोबार में पहली तीनों सेनाओं की ट्राई-सर्विस कमांड बनाई है। इसे अंडमान और निकोबार कमांड यानी एएनसी कहा जाता है। यह भारत की एकमात्र ऐसी कमान है जिसमें थलसेना, नौसेना और वायुसेना साथ मिल कर काम करती हैं।
इस कमान का काम द्वीपों और आसपास के समुद्री क्षेत्र की सुरक्षा, निगरानी तथा संयुक्त सैन्य अभियानों के बीच तालमेल बनाए रखना है। इसकी भौगोलिक स्थिति भारत को हिंद महासागर के महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर नजर रखने में मदद करती है।
अमेरिका के लिए भी हिंद महासागर में सुरक्षित लॉजिस्टिक्स नेटवर्क महत्वपूर्ण है। मध्य पूर्व में अभियान चलाने वाले युद्धपोतों को जरूरत पड़ने पर हिंद महासागर के दूसरे हिस्सों में रसद सहायता उपलब्ध होना उनकी तैनाती को बनाए रखने में मदद कर सकता है।
लेकिन अंडमान और निकोबार में अमेरिकी जहाजों की संभावित मौजूदगी और वहां नियमित लॉजिस्टिक्स सुविधा मिलने के बीच अंतर है। किसी जहाज का निर्धारित दौरे पर बंदरगाह आना, आपात स्थिति में सहायता लेना और नियमित सैन्य इस्तेमाल के लिए सुविधाएं उपलब्ध होना अलग-अलग व्यवस्थाएं हैं। (US naval logistics India)
भारत-अमेरिका के बीच पहले से मौजूद है लॉजिस्टिक्स एग्रीमेंट
भारत और अमेरिका के बीच सैन्य लॉजिस्टिक्स सहयोग के लिए पहले से एक महत्वपूर्ण समझौता मौजूद है। इसे लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट (LEMOA) कहा जाता है।
इस समझौते पर 2016 में हस्ताक्षर किए गए थे। इसके तहत दोनों देश तय नियमों और पारस्परिक सहमति के आधार पर एक-दूसरे की सैन्य सुविधाओं का इस्तेमाल ईंधन, मरम्मत, स्पेयर पार्ट्स और दूसरी लॉजिस्टिक्स जरूरतों के लिए कर सकते हैं।
लेकिन भारत अब तक लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट जैसे समझौतों के जरिए सीमित सहयोग देता रहा है, और स्थायी या नियमित अमेरिकी पोर्ट एक्सेस देने से बचता रहा है।
इसका मतलब यह नहीं है कि अमेरिका को भारत के किसी भी बंदरगाह या सैन्य अड्डे का बिना अनुमति इस्तेमाल करने का अधिकार मिल गया है। हर मामले में संबंधित नियमों, अनुमति और दोनों देशों की सहमति का महत्व बना रहता है।
भारत और अमेरिका मालाबार जैसे नौसैनिक अभ्यासों में भी हिस्सा लेते हैं। इन अभ्यासों में समुद्री निगरानी, एंटी-सबमरीन वॉरफेयर, कम्युनिकेशन और विभिन्न नेवल युनिट्स के बीच तालमेल का अभ्यास किया जाता है।
इस तरह दोनों देशों के बीच सैन्य सहयोग पहले से मौजूद है। लेकिन किसी विशेष बंदरगाह पर अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर को नियमित रूप से ठहरने की अनुमति देना बिल्कुल अलग फैसला होगा। (US naval logistics India)
रीप्लेनिशमेंट एट सी
एयरक्राफ्ट कैरियर समुद्र में चलते-फिरते हवाई अड्डे की तरह काम करते हैं। इन पर लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर, हथियार, ईंधन, तकनीकी उपकरण और बड़ी संख्या में नाविक तैनात रहते हैं। इनके साथ चल रहे अन्य युद्धपोत हवाई तथा मिसाइल हमलों से बचाव में मदद करते हैं।
लंबे अभियान के दौरान इन जहाजों को भोजन, चिकित्सा सामग्री, विमान के स्पेयर पार्ट्स, इंजन के पुर्जों और दूसरे जरूरी सामान की लगातार सप्लाई करनी पड़ती है। जहाजों के तकनीकी सिस्टम की जांच और मरम्मत भी जरूरत होती है।
समुद्र में एक जहाज से दूसरे जहाज तक सामान पहुंचाने की प्रक्रिया को रीप्लेनिशमेंट एट सी कहा जाता है। इससे जहाजों को हर बार बंदरगाह पर जाने की जरूरत नहीं पड़ती। लेकिन समुद्र में सामान की सप्लाई बंदरगाह पर मिलने वाली सभी सुविधाओं का विकल्प नहीं बन सकती।
अमेरिकी नौसेना के अधिकारियों ने बताया है कि अरब सागर में तैनात कैरियर स्ट्राइक ग्रुप के लिए राशन सप्लाई को अधिक व्यवस्थित बनाया गया है। इसमें डिएगो गार्सिया के अलावा सिंगापुर, जापान और फिलीपींस से मिलने वाली आपूर्ति भी शामिल है। (US naval logistics India)
भारत के लिए रणनीतिक संतुलन की चुनौती
भारत लंबे समय से “स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी” की नीति पर चल रहा है। विदेशी सैन्य मौजूदगी (चाहे सीमित ही क्यों न हो) भारत की स्वतंत्र विदेश नीति पर असर डाल सकती है।
वहीं, अंडमान और निकोबार की भौगोलिक स्थिति इसे भारत की समुद्री सुरक्षा के लिए संवेदनशील बनाती है। यहां विदेशी नौसैनिक गतिविधियों को बढ़ाने से जुड़े किसी भी फैसले का असर केवल लॉजिस्टिक्स तक सीमित नहीं रहेगा। इसमें भारत की रणनीतिक स्वायत्तता, क्षेत्रीय सुरक्षा और दूसरे देशों के साथ संबंध भी महत्वपूर्ण होंगे।
अगर अमेरिका किसी क्षेत्रीय संघर्ष (जैसे ताइवान या मध्य पूर्व) में उलझता है, तो अंडमान में उसके जहाजों की मौजूदगी भारत को अप्रत्यक्ष रूप से निशाना बना सकती है। वहीं, चीन अंडमान-निकोबार को मलक्का जलडमरूमध्य की निगरानी का महत्वपूर्ण केंद्र मानता है। यहां अमेरिकी मौजूदगी को चीन अपनी “स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स” रणनीति के खिलाफ सीधा कदम मान सकता है। इससे भारत-चीन संबंध और तनावपूर्ण हो सकते हैं। चीन बंगाल की खाड़ी या भारतीय महासागर में अपनी नौसैनिक गतिविधियां बढ़ा सकता है। इसके अलावा इंडोनेशिया, मलेशिया और सिंगापुर जैसे पड़ोसी देश भी चिंतित हो सकते हैं, क्योंकि मलक्का जलडमरूमध्य क्षेत्रीय सहयोग का मुद्दा है।
भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग बढ़ रहा है, लेकिन दोनों देशों की विदेश नीति और सैन्य प्राथमिकताएं हर मुद्दे पर एक जैसी नहीं हैं। भारत अपने समुद्री हितों की रक्षा के साथ-साथ अलग-अलग देशों के साथ संबंधों में संतुलन बनाए रखने की नीति अपनाता है।
अंडमान और निकोबार में किसी भी विदेशी सैन्य गतिविधि को लेकर भारत को ऑपरेशन संबंधी जरूरतों के साथ सुरक्षा और पर्यावरण से जुड़े पहलुओं पर भी विचार करना होगा। द्वीपों का इकोसिस्टम संवेदनशील है और यहां मिलिट्री और सिविल इंफ्रास्ट्रक्चर के डेवलपमेंट के लिए विशेष सावधानी की जरूरत होती है। बड़े जहाजों (खासकर एयरक्राफ्ट कैरियर) के आने-जाने से समुद्री प्रदूषण, कोरल रीफ को नुकसान और स्थानीय आदिवासी समुदायों (जैसे शॉम्पेन) पर असर पड़ सकता है। वहीं, ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट पर पहले से ही पर्यावरणविद विरोध कर रहे हैं। विदेशी सैन्य गतिविधियां इसे और विवादास्पद बना सकती है। इसके अलावा भूकंप और सुनामी का हाई रिस्क एरिया होने के चलते कोई भी बड़ा सैन्य बुनियादी ढांचा महंगा और जोखिम भरा साबित हो सकता है। (US naval logistics India)
Author
हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।





