📍कोलकाता | 30 Oct, 2026, 1:07 PM
GRSE German Shipbuilding Project: भारत की सरकारी जहाज निर्माण कंपनी गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स लिमिटेड (जीआरएसई) ने जर्मनी के लिए बनाए जा रहे पांचवें मल्टी-पर्पज वेसल (एमपीवी) का कील लेइंग किया। यह जहाज जर्मनी की कंपनी कार्स्टन रेहडर शिफ्समैकलर एंड रीडेराई जीएमबीएच एंड कंपनी केजी के लिए बनाया जा रहा है। जीआरएसई रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत आने वाली नवरत्न कंपनी है।
यह प्रोजेक्ट जीआरएसई का अब तक का सबसे बड़ा कॉमर्शियल शिपबिल्डिंग एक्सपोर्ट ऑर्डर है। इसके तहत कुल 12 कॉरल 7500 डेडवेट टनेज (डीडब्ल्यूटी) मल्टी-पर्पज वेसल का डिजाइन और निर्माण किया जा रहा है। इन जहाजों का इस्तेमाल अलग-अलग तरह का माल समुद्र के रास्ते ले जाने के लिए किया जाएगा।
पांचवें जहाज का कील लेइंग इस प्रोजेक्ट के दूसरे कॉन्ट्रैक्ट के तहत किया गया है।
GRSE German Shipbuilding Project: तीन कॉन्ट्रैक्ट के तहत बनाए जा रहे हैं 12 जहाज
जीआरएसई और जर्मनी की कार्स्टन रेहडर के बीच जहाज निर्माण प्रोजेक्ट को तीन कॉन्ट्रैक्ट में बांटा गया है। पहला कॉन्ट्रैक्ट जून 2024 में हुआ था। इसके तहत चार मल्टी-पर्पज वेसल बनाने का समझौता किया गया।
इसके बाद अक्टूबर 2024 में दूसरा कॉन्ट्रैक्ट हुआ। इसमें चार और जहाजों के निर्माण को शामिल किया गया। अब पांचवें जहाज का कील लेइंग इसी कॉन्ट्रैक्ट के तहत किया गया है। यानी यह दूसरे कॉन्ट्रैक्ट के तहत बनाया जा रहा पहला जहाज है।
तीसरा कॉन्ट्रैक्ट सितंबर 2025 में किया गया था। इसके तहत चार हाइब्रिड प्रोपल्शन वाले मल्टी-पर्पज वेसल बनाए जाने हैं। इन जहाजों में हाइब्रिड प्रोपल्जन सिस्टम का इस्तेमाल किया जाएगा। तीनों कॉन्ट्रैक्ट में कुल 12 जहाज हैं।
इस प्रोजेक्ट में जीआरएसई जहाजों के डिजाइन और निर्माण का काम कर रही है। इसके लिए जर्मनी की समुद्री कंपनियों के साथ भी सहयोग किया जा रहा है।
120 मीटर लंबाई और 7,500 टन डेडवेट क्षमता
कॉरल 7500 डीडब्ल्यूटी क्लास के हर जहाज की लंबाई 120 मीटर होगी। इसकी चौड़ाई, जिसे समुद्री इंजीनियरिंग में बीम कहा जाता है, 17 मीटर होगी। जहाज का ड्राफ्ट 5.85 मीटर निर्धारित किया गया है। ड्राफ्ट का मतलब जहाज के पानी में डूबे हुए हिस्से की गहराई से है।
प्रत्येक जहाज की डेडवेट क्षमता 7,500 टन होगी। डेडवेट टनेज का मतलब जहाज अपने वजन के अलावा कितना कुल भार ले जा सकता है। इसमें कार्गो के साथ ईंधन, पानी, आपूर्ति और अन्य परिचालन भार भी शामिल होते हैं।
इन जहाजों को अलग-अलग तरह के कार्गो परिवहन को ध्यान में रखकर तैयार किया जा रहा है। इनके डिजाइन में बड़े कार्गो होल्ड की व्यवस्था होगी, जिससे कई तरह का माल एक ही जहाज में ले जाया जा सकेगा। (GRSE German Shipbuilding Project)
बल्क कार्गो से लेकर विंड टर्बाइन ब्लेड तक ले जाने की क्षमता
इन मल्टी-पर्पज वेसल की प्रमुख खूबी अलग-अलग तरह के माल को ले जाने की क्षमता है। इनके कार्गो होल्ड में बल्क कार्गो, जनरल कार्गो और प्रोजेक्ट कार्गो रखा जा सकेगा।
बल्क कार्गो में आमतौर पर ऐसा माल शामिल होता है जिसे अलग-अलग पैकेट या कंटेनर में रखने के बजाय बड़ी मात्रा में ले जाया जाता है। जनरल कार्गो में पैक किया हुआ सामान और विभिन्न प्रकार की औद्योगिक सामग्री शामिल हो सकती है। वहीं, प्रोजेक्ट कार्गो में बड़े आकार की मशीनें, औद्योगिक उपकरण और ऐसे सामान आते हैं जिन्हें सामान्य कंटेनरों में ले जाना आसान नहीं होता।
जहाजों के डिजाइन में हैच कवर पर कंटेनर ले जाने की सुविधा भी होगी। इसके अलावा, जहाजों के डेक पर कई विंड टर्बाइन ब्लेड ले जाने की व्यवस्था होगी। पवन ऊर्जा प्रोजेक्ट में इस्तेमाल होने वाले ये ब्लेड आकार में काफी लंबे होते हैं। ऐसे सामान को ले जाने के लिए जहाज के डेक पर पर्याप्त जगह और उपयुक्त व्यवस्था की जरूरत होती है।
इस तरह के डिजाइन से जहाजों को सामान्य माल के साथ-साथ बड़े आकार के औद्योगिक सामान के परिवहन में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। (GRSE German Shipbuilding Project)
बनाए जाएंगे हाइब्रिड प्रोपल्शन वाले जहाज
इस प्रोजेक्ट के तीसरे कॉन्ट्रैक्ट में शामिल चार जहाज हाइब्रिड प्रोपल्शन वाले होंगे। प्रोपल्शन का काम जहाज को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी पावर उपलब्ध कराना है। हाइब्रिड प्रोपल्शन में एक से ज्यादा तरह की प्रोपल्शन तकनीक या एनर्जी सोर्सेज का संयोजन किया जा सकता है। (GRSE German Shipbuilding Project)
डिजाइन और सर्टिफिकेशन में कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियां
इन जहाजों के निर्माण में जीआरएसई के साथ कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियां भी जुड़ी हैं। प्रोजेक्ट में जर्मनी की एफ.एच. बर्टलिंग, फॉरेस्टवेव नेविगेशन और शुल्टे एंड ब्रुन्स के साथ डेल्फ्ट शिपिंग शामिल हैं।
जहाजों के तकनीकी डिजाइन में एसईडीएस, जीआरएसई के साथ मिलकर मदद दे रही है। वहीं, डीएनवी जहाजों के क्लासिफिकेशन और सर्टिफिकेशन का काम संभालेगा।
कोलकाता स्थित जीआरएसई भारतीय नौसेना और भारतीय तटरक्षक बल के लिए भी जहाजों का निर्माण करती है। रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत आने वाली यह कंपनी अब व्यावसायिक जहाज निर्माण और निर्यात के क्षेत्र में भी काम कर रही है। (GRSE German Shipbuilding Project)
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