📍नई दिल्ली | 28 Oct, 2026, 6:34 PM
Navy Permanent Commission: सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय नौसेना की एक महिला अधिकारी को परमानेंट कमीशन (पीसी) देने से इनकार करने के मामले में सिलेक्शन बोर्ड के फैसले पर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने कहा कि अधिकारी की एनुअल कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट (एसीआर) में अच्छे प्रदर्शन और प्रमोशन के लिए जरूरी ग्रेडिंग होने के बावजूद उसे परमानेंट कमीशन के लिए अयोग्य कैसे माना जा सकता है।
चीफ जस्टिस की अगुवाई वाली बेंच ने पाया कि नौसेना के सिलेक्शन बोर्ड ने 12 अप्रैल 2024 को अधिकारी के मामले पर फैसला लेते समय उसकी कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट से जुड़े अहम पहलुओं को नजरअंदाज किया। कोर्ट ने बोर्ड को दोबारा बैठक कर अधिकारी के मामले पर विचार करने और छह हफ्ते के भीतर प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया है।
Navy Permanent Commission: क्या है पूरा मामला?
यह मामला भारतीय नौसेना की जज एडवोकेट जनरल यानी जेएजी ब्रांच में कार्यरत एक महिला अधिकारी को परमानेंट कमीशन नहीं देने से जुड़ा है। परमानेंट कमीशन मिलने पर अधिकारी को निर्धारित सर्विस रूल्स के तहत लंबे समय तक नौसेना में सेवा जारी रखने का अवसर मिलता है। इसके उलट, शॉर्ट सर्विस कमीशन के तहत नियुक्त अधिकारियों की सर्विस तय अवधि और लागू नियमों के अनुसार होती है।
महिला अधिकारी के मामले में नौसेना के सिलेक्शन बोर्ड ने 12 अप्रैल 2024 को परमानेंट कमीशन देने के दावे को खारिज कर दिया था। बोर्ड ने अपने फैसले में अधिकारी की पिछले पांच साल की रिपोर्ट का हवाला दिया। उसका कहना था कि अलग-अलग जगहों और जिम्मेदारियों के दौरान वरिष्ठ अधिकारियों ने उसे परमानेंट कमीशन देने की सिफारिश नहीं की थी।
अधिकारी ने इस फैसले को चुनौती देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के पहले के आदेश में उसके मामले पर स्वतंत्र रूप से विचार करने का निर्देश दिया गया था। इसके बावजूद नौसेना ने पुरानी नकारात्मक सिफारिशों को उसके खिलाफ इस्तेमाल किया। (Navy Permanent Commission)
एसीआर में अच्छी ग्रेडिंग के बावजूद कमीशन से इनकार क्यों?
सुप्रीम कोर्ट ने मामले से जुड़े ऑरिजनल रिकॉर्ड देखने के बाद पाया कि महिला अधिकारी की ज्यादातर एनुअल कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट में प्रमोशन के लिए जरूरी ग्रेडिंग मौजूद थी।
कोर्ट ने खास तौर पर 18 जनवरी 2017 और 17 नवंबर 2018 की रिपोर्ट का उल्लेख किया। अधिकारी के वकील के अनुसार, इन दोनों रिपोर्ट में प्रमोशन पोटेंशियल की ग्रेडिंग सात थी।
सुनवाई के दौरान अधिकारी के वकील ने सवाल उठाया कि जब किसी अधिकारी को प्रमोशन के योग्य माना गया है, तो उसे परमानेंट कमीशन के लिए अनुपयुक्त कैसे ठहराया जा सकता है।
कोर्ट ने भी इसी पहलू पर सवाल किया। बेंच ने कहा कि अगर किसी अधिकारी को प्रमोशन के लिए जरूरी ग्रेडिंग मिलती है, तो यह समझना मुश्किल है कि उसे परमानेंट कमीशन के लिए अयोग्य क्यों माना गया।
कोर्ट ने यह भी कहा कि अधिकारी की कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट उसके अच्छे प्रदर्शन को दिखाती हैं। ऐसे में पुराने समय में परमानेंट कमीशन के लिए सिफारिश नहीं किया जाना उसकी पूरी सर्विस रिपोर्ट पर हावी नहीं होना चाहिए। (Navy Permanent Commission)
खाली कॉलम को अधिकारी के खिलाफ नहीं माना जा सकता
सुप्रीम कोर्ट ने महिला अधिकारी की रिपोर्ट में परमानेंट कमीशन की सिफारिश वाले कॉलम को भी महत्वपूर्ण माना। रिकॉर्ड के मुताबिक, अधिकारी को 2013 और 2014 में परमानेंट कमीशन के लिए सिफारिश मिली थी। वहीं, 14 जुलाई 2008 से 31 अक्टूबर 2014 के बीच की कुछ संबंधित रिपोर्ट में सिफारिश वाले कॉलम में कोई टिप्पणी दर्ज नहीं थी।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी रिपोर्ट में सिफारिश का कॉलम खाली रहने का मतलब यह नहीं है कि अधिकारी को परमानेंट कमीशन के लिए सिफारिश नहीं मिली थी। केवल कॉलम खाली होने के आधार पर अधिकारी को नुकसान नहीं पहुंचाया जा सकता।
बेंच ने निर्देश दिया कि 14 जुलाई 2008 से 31 अक्टूबर 2014 तक की संबंधित रिपोर्ट को परमानेंट कमीशन के पक्ष में सकारात्मक सिफारिश वाली रिपोर्ट माना जाए।
कोर्ट ने कहा कि सिलेक्शन बोर्ड ने इस पहलू पर ध्यान नहीं दिया और यही उसके फैसले में एक बड़ी गलती थी। (Navy Permanent Commission)
सुप्रीम कोर्ट का पहले का रिव्यू जजमेंट
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के पहले के रिव्यू जजमेंट का भी महत्व है। रिव्यू पिटीशन नंबर 1036 ऑफ 2023 में कोर्ट ने महिला अधिकारी के मामले पर स्वतंत्र रूप से विचार करने का निर्देश दिया था।
इस आदेश में इस्तेमाल किए गए ‘स्टैंडअलोन’ शब्द को लेकर सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों के बीच बहस हुई। अधिकारी के वकील का कहना था कि नौसेना ने उसी पुराने रिकॉर्ड और पहले की सिफारिशों के आधार पर फैसला लिया, जिन्हें पहले के आदेश के तहत उसके खिलाफ इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए था।
वहीं, अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने कहा कि नौसेना ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन किया है। उनके मुताबिक, स्टैंडअलोन विचार का मतलब यह है कि अधिकारी की तुलना दूसरे अधिकारियों से न की जाए और रिक्तियों के आधार पर उसके मामले का आकलन न हो। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि उसकी कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया जाए।
बेंच ने स्पष्ट किया कि ‘स्टैंडअलोन’ का मतलब है कि अधिकारी के मामले की तुलना दूसरे अधिकारियों के मामलों से नहीं की जा सकती। कोर्ट ने यह भी कहा कि उसे देखना होगा कि अधिकारियों ने पहले दिए गए न्यायिक निर्देशों का पालन किया या नहीं और फैसला निष्पक्ष तरीके से लिया गया या नहीं। (Navy Permanent Commission)
नौसेना ने पुराने रिकॉर्ड को बताया था अहम
सिलेक्शन बोर्ड ने महिला अधिकारी के मामले को खारिज करते समय तीन प्रमुख पहलुओं को आधार बनाया था। पहला, बोर्ड ने उन्हीं कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट को ध्यान में रखा था, जिनकी जानकारी अधिकारी को दी गई थी। दूसरा, वरिष्ठ अधिकारियों की कुछ संख्यात्मक ग्रेडिंग परमानेंट कमीशन के चयन के मानदंडों को हर बार पूरा नहीं करती थी। तीसरा, बोर्ड के अनुसार, पांच साल की अवधि में अलग-अलग जिम्मेदारियों और स्थानों पर तैनात वरिष्ठ अधिकारियों ने अधिकारी को परमानेंट कमीशन देने की सिफारिश नहीं की थी। (Navy Permanent Commission)
नौसेना ने इस रिकॉर्ड को अधिकारी की उपयुक्तता तय करने में अहम माना था।
अटॉर्नी जनरल ने सुनवाई के दौरान कहा कि अलग-अलग वरिष्ठ अधिकारियों ने अलग-अलग समय पर अधिकारी का आकलन किया था। उनके अनुसार, किसी ने भी पहले से तय धारणा के आधार पर रिपोर्ट नहीं लिखी थी और बोर्ड ने पूरे रिकॉर्ड की जांच की थी।
हालांकि, महिला अधिकारी के वकील ने कहा कि रिपोर्ट में कोई प्रतिकूल टिप्पणी दर्ज नहीं थी। उन्होंने सवाल किया कि अगर अधिकारी के प्रदर्शन को लेकर कोई खराब टिप्पणी नहीं थी, तो केवल परमानेंट कमीशन की सिफारिश नहीं होने को उसके खिलाफ महत्वपूर्ण आधार कैसे बनाया जा सकता है। (Navy Permanent Commission)
छह हफ्ते में दोबारा विचार करने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने ऑरिजनल रिकॉर्ड देखने के बाद माना कि सिलेक्शन बोर्ड ने अधिकारी की ग्रेडिंग और उसकी परफॉरमेंस का सही आकलन नहीं किया। कोर्ट ने 12 अप्रैल 2024 के फैसले को स्वीकार करने से इनकार करते हुए बोर्ड को दोबारा बैठक करने और महिला अधिकारी के दावे पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया।
बेंच ने साफ किया कि उसका आदेश सभी अधिकारियों की पूरी सर्विस हिस्ट्री को हर मामले में देखने का सामान्य निर्देश नहीं है। कोर्ट के अनुसार, वह केवल यह स्पष्ट कर रहा है कि जिन संबंधित एसीआर में परमानेंट कमीशन की सिफारिश वाला कॉलम खाली था, उन्हें अधिकारी के खिलाफ न माना जाए और उन्हें सकारात्मक सिफारिश वाली रिपोर्ट के रूप में देखा जाए।
अटॉर्नी जनरल ने इस आदेश के व्यापक प्रभाव को लेकर चिंता जताई थी। उन्होंने कहा कि इससे दूसरे मामलों में भी आखिरी पांच कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट के बजाय लंबे सर्विस रिकॉर्ड पर विचार करने की मांग उठ सकती है। इस पर बेंच ने स्पष्ट किया कि संबंधित रिपोर्टों में खाली कॉलम को सकारात्मक सिफारिश मानने का निर्देश दिया जा रहा है, जबकि किन रिपोर्टों पर चयन के दौरान विचार किया जाना है, यह संबंधित अधिकारियों को तय करना होगा।
कोर्ट ने नौसेना के सिलेक्शन बोर्ड को छह हफ्ते के भीतर दोबारा विचार की प्रक्रिया पूरी करने का आदेश दिया है। (Navy Permanent Commission)
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