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Explained: क्या है भारतीय नौसेना का प्रोजेक्ट 28ए, जिसे चार साल बाद CCS ने दी मंजूरी, कीमत बढ़ी 4,000 करोड़ रुपये!

इस प्रोजेक्ट को जून 2022 में डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (डीएसी) से एक्सेप्टेंस ऑफ नेसेसिटी (एओएन) मिल गई थी। उस समय इसकी अनुमानित लागत करीब 36,000 करोड़ रुपये थी...

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📍नई दिल्ली | 30 Oct, 2026, 11:37 AM

Indian Navy Project 28A: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्योरिटी (सीसीएस) ने 29 अक्टूबर को भारतीय नौसेना के लिए आठ नेक्स्ट जेनरेशन कॉर्वेट (एनजीसी) बनाने के प्रोजेक्ट को मंजूरी दे दी। इस प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत 40,000 करोड़ रुपये से ज्यादा है। इसके तहत गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (जीआरएसई), कोलकाता और गोवा शिपयार्ड लिमिटेड (जीएसएल) में युद्धपोत बनाए जाएंगे।

इस प्रोजेक्ट को जून 2022 में डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (डीएसी) से एक्सेप्टेंस ऑफ नेसेसिटी (एओएन) मिल गई थी। उस समय इसकी अनुमानित लागत करीब 36,000 करोड़ रुपये थी। लेकिन अंतिम मंजूरी मिलने तक इसकी लागत बढ़कर 40,000 करोड़ रुपये से ज्यादा हो गई है। वहीं, भारतीय नौसेना को पहला कॉर्वेट 2030 तक मिलने की उम्मीद है।

क्या है Indian Navy Project 28A?

प्रोजेक्ट 28ए भारतीय नौसेना के लिए आठ नए नेक्स्ट जेनरेशन कॉर्वेट बनाने की योजना है। कॉर्वेट साइज में फ्रिगेट और डिस्ट्रॉयर जैसे बड़े युद्धपोतों से छोटे होते हैं, लेकिन इनकी रफ्तार ज्यादा होती है, जिससे मिशन के हिसाब से काम करने की क्षमता बढ़ती है।

इन युद्धपोतों को समुद्री निगरानी, दुश्मन के जहाजों पर कार्रवाई, दूसरे युद्धपोतों को सुरक्षा देने और तटीय इलाकों की रक्षा जैसे कामों के लिए तैयार किया जाएगा। ये भारतीय नौसेना के बड़े युद्धपोतों के साथ मिलकर भी काम कर सकेंगे और जरूरत पड़ने पर अलग से मिशन भी पूरा कर सकेंगे।

रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, नेक्स्ट जेनरेशन कॉर्वेट कई तरह के ऑपरेशन के लिए यूजफुल प्लेटफॉर्म होंगे। इनमें सर्विलांस मिशन, एस्कॉर्ट ऑपरेशन, डिटरेंस, सर्फेस एक्शन ग्रुप (एसएजी) ऑपरेशन, सर्च एंड अटैक और कोस्टल डिफेंस शामिल हैं।

इन जहाजों का डिजाइन भारतीय नौसेना के वॉरशिप डिजाइन ब्यूरो ने तैयार किया है। निर्माण में आधुनिक शिपबिल्डिंग तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। (Indian Navy Project 28A)

चार साल से ज्यादा समय बाद मिली मंजूरी

इस प्रोजेक्ट को 6 जून 2022 को डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल से एओएन मिला था। एओएन का मतलब है कि रक्षा खरीद के लिए जरूरत को सैद्धांतिक मंजूरी मिल गई है। यह अंतिम खरीद मंजूरी या निर्माण का कॉन्ट्रैक्ट नहीं होता।

इसके बाद प्रोजेक्ट को तकनीकी मूल्यांकन, टेंडर प्रक्रिया, शिपयार्डों की बोलियों और कीमत पर बातचीत जैसे चरणों से गुजरना पड़ा। मई 2025 में जीआरएसई सबसे कम बोली लगाने वाला यानी एल-1 बिडर बना। इसके बाद कीमत से जुड़े मामलों पर बातचीत की गई।

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29 अक्टूबर को सीसीएस की मंजूरी मिलने के बाद प्रोजेक्ट पर दस्तखत किए जाएंगे। अधिकारियों के मुताबिक, आठ युद्धपोतों के निर्माण के कॉन्ट्रैक्ट आने वाले दिनों में जीआरएसई और जीएसएल के साथ किए जाने हैं।

जून 2022 में प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत करीब 36,000 करोड़ रुपये आंकी गई थी। लेकिन अब यह बढ़कर 40,000 करोड़ रुपये से ज्यादा हो गई है। (Indian Navy Project 28A)

जीआरएसई बनाएगा पांच और गोवा शिपयार्ड तीन युद्धपोत

आठ कॉर्वेट के निर्माण का काम दो सरकारी शिपयार्डों के बीच बांटा गया है। कोलकाता स्थित गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स पांच युद्धपोत बनाएगा, जबकि गोवा शिपयार्ड लिमिटेड को तीन युद्धपोत बनाने की जिम्मेदारी मिलेगी।

जीआरएसई भारतीय नौसेना के लिए पहले भी कई तरह के युद्धपोत बना चुका है। वहीं, गोवा शिपयार्ड लिमिटेड भी नौसेना और भारतीय तटरक्षक बल के लिए जहाजों का निर्माण करता है।

दोनों शिपयार्डों को एक जैसी प्रति युनिट लागत पर काम करना है। वहीं, कॉन्ट्रैक्ट पर दस्तखत होने के बाद ही डिजाइन, जरूरी उपकरणों की खरीद और निर्माण से जुड़े काम आगे बढ़ेंगे।

नौसेना को पहला कॉर्वेट 2030 तक मिलने की उम्मीद है। शिपयार्ड निर्माण प्रक्रिया को तेज करने और जहाजों की डिलीवरी तय समय से पहले करने के विकल्पों पर भी विचार कर रहे हैं। (Indian Navy Project 28A)

करीब 2,000 टन वजन और 30 नॉट की रफ्तार

इन कॉर्वेट का वजन यानी डिस्प्लेसमेंट करीब 2,000 टन होगा। इनकी अधिकतम रफ्तार लगभग 30 नॉट होगी। एक नॉट का मतलब एक समुद्री मील प्रति घंटा होता है। 30 नॉट की रफ्तार लगभग 55.6 किलोमीटर प्रति घंटा के बराबर है।

इनकी रेंज करीब 4,000 नॉटिकल मील होगी और ये बिना दोबारा ईंधन या अन्य जरूरी सामान लिए लगभग 14 से 30 दिन तक समुद्र में तैनात रह सकेंगे। इनका डिजाइन ऐसा होगा कि दुश्मन के रडार पर इनकी पहचान करना मुश्किल हो और इनसे निकलने वाली गर्मी, आवाज तथा चुंबकीय संकेत भी कम हों।

ये कॉर्वेट तटीय और समुद्र के नजदीकी क्षेत्रों में तेजी से ऑपरेशन करेंगे। इन जहाजों में आधुनिक एईएसए रडार, कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम जैसी तकनीकें भी होंगी।

कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम अलग-अलग सेंसर से मिलने वाली जानकारी को एक साथ जोड़ता है। इससे जहाज पर मौजूद ऑपरेटर समुद्र में दूसरे जहाजों, संभावित खतरों और अपने आसपास की गतिविधियों की स्थिति समझ सकते हैं। (Indian Navy Project 28A)

8 ब्रह्मोस होंगी तैनात

हथियारों की बात करें तो इन पर आठ एक्सटेंडेड रेंज ब्रह्मोस मिसाइलें लगाई जा सकती हैं, जो दुश्मन के जहाजों और अन्य सतही ठिकानों को निशाना बनाएंगी। हवाई हमलों से बचाव के लिए इनमें 16 से 32 वीएल-एसआरएसएएम मिसाइलें लगी होंगी। इसके अलावा, 76 एमएम की आधुनिक नौसैनिक तोप, एके-630 जैसी क्लोज-इन वेपन सिस्टम और पनडुब्बियों को निशाना बनाने के लिए टॉरपीडो ट्यूब भी होंगी। पनडुब्बियों का पता लगाने के लिए इनमें सोनार सिस्टम भी लगे होंगे।

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इन जहाजों से एएलएच ध्रुव या सी किंग जैसे हेलीकॉप्टरों का संचालन भी किया जा सकेगा। (Indian Navy Project 28A)

समुद्री निगरानी से लेकर तटीय रक्षा तक होगी भूमिका

इन युद्धपोतों की खासियत यह होगी कि ये आकार में छोटे होने के बावजूद काफी ताकतवर होंगे। डिस्ट्रिब्यूटेड लेथैलिटी की कॉन्सैप्ट के तहत ये बड़े फ्रिगेट और डिस्ट्रॉयर के साथ मिलकर भी काम कर सकेंगे और जरूरत पड़ने पर स्वतंत्र रूप से मिशन भी पूरा कर सकेंगे।

इन कॉर्वेट का एक प्रमुख काम समुद्री निगरानी होगा। इसके तहत जहाज समुद्री क्षेत्र में आने-जाने वाले जहाजों और संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखने वाले अभियानों में हिस्सा ले सकते हैं।

एस्कॉर्ट ऑपरेशन में युद्धपोत किसी दूसरे नौसैनिक जहाज या महत्वपूर्ण समुद्री समूह को सुरक्षा देते हैं। ऐसी भूमिका में कॉर्वेट बड़े युद्धपोतों के साथ काम कर सकते हैं। उनकी रफ्तार और आकार उन्हें अलग-अलग समुद्री हालात में तैनात करने में मदद करते हैं।

सर्फेस एक्शन ग्रुप ऑपरेशन में कई नौसैनिक प्लेटफॉर्म मिलकर समुद्र की सतह पर मौजूद दुश्मन के जहाजों के खिलाफ कार्रवाई करते हैं। इसमें अलग-अलग जहाज अपनी सेंसर और हथियार क्षमता के अनुसार भूमिका निभाते हैं।

कोस्टल डिफेंस यानी तटीय रक्षा के तहत समुद्र के नजदीकी इलाकों, बंदरगाहों और महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों की सुरक्षा की जाती है। भारत के लिए यह भूमिका इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश की समुद्री सुरक्षा हिंद महासागर और उसके आसपास के समुद्री रास्तों से जुड़ी है। (Indian Navy Project 28A)

पुराने खुकरी और कोरा क्लास कॉर्वेट की लेंगे जगह

प्रोजेक्ट 28ए के कॉर्वेट को भारतीय नौसेना के पुराने खुकरी और कोरा क्लास के जहाजों की जगह लेने वाले प्लेटफॉर्म के रूप में देखा जा रहा है। ये जहाज 1980 और 1990 के दशक में विकसित किए गए थे और अब इन्हें आधुनिक तकनीक से लैस करने की जरूरत है। इन पुराने जहाजों ने नौसेना की समुद्री निगरानी, तटीय सुरक्षा और सतह पर मौजूद लक्ष्यों के खिलाफ कार्रवाई जैसी जरूरतों में भूमिका निभाई है।

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समय के साथ युद्धपोतों के उपकरणों और सेंसरों को आधुनिक बनाए रखने की जरूरत बढ़ जाती है। पुराने प्लेटफॉर्म में नए सिस्टम लगाने के लिए जगह, बिजली उत्पादन, कूलिंग और दूसरे तकनीकी बदलावों की जरूरत पड़ती है। वहीं, नए जहाज बनाना लंबे समय के लिए अधिक व्यावहारिक विकल्प होता है। नए कॉर्वेट का डिजाइन भारतीय नौसेना की इन-हाउस जरूरतों के अनुसार तैयार किया गया है। (Indian Navy Project 28A)

Author

  • Harendra Chaudhary

    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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