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Nepal Regime Change: क्या ट्रंप ने पहले ही दे दिए थे संकेत? बालेन शाह और सुदन गुरुंग का भारत विरोधी एजेंडा

डोनाल्ड लू ने पिछले साल दिसंबर में नेपाल का दौरा किया था। उस दौरान उन्होंने नेपाल सरकार के साथ एमसीसी (मिलेनियम चैलेंज कॉर्पोरेशन) समझौते को आगे बढ़ाया था। यह समझौता नेपाल में लंबे समय से विवादों में रहा है...

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📍काठमांडू | 10 Sep, 2025, 4:51 PM

Nepal Regime Change: नेपाल की राजधानी काठमांडू की सड़कों पर जमकर हिंसा हुई है। संसद भवन जलकर खाक हो गया है। प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल को इस्तीफा देना पड़ा है। देश में सुरक्षा की जिम्मेदारी अब सेना के हाथों में है। यह सब कुछ एक ऐसे आंदोलन के बाद हुआ है जिसे ‘जेन जेड’ यानी युवाओं का आंदोलन बताया जा रहा था। लेकिन अब इस आंदोलन के पीछे छिपे हाथों और अंतरराष्ट्रीय साजिश के सबूत सामने आ रहे हैं।

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Nepal Regime Change: क्या ट्रंप ने पहले ही दे दिए थे संकेत?

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 5 सितंबर 2025 को एक सोशल मीडिया पोस्ट में कहा था, “लगता है हमने भारत और रूस को सबसे गहरे, सबसे काले चीन के हवाले कर दिया है। काश वे साथ में लंबा और समृद्ध भविष्य रखें!” यह बयान उस समय आया जब नेपाल में जेनजेड आंदोलन तेज हो रहा था। ट्रंप के इस बयान को राजनीतिक विश्लेषकों ने एक सुनियोजित संकेत के रूप में देखा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप का यह बयान नेपाल में हो रहे उथल-पुथल से सीधे जुड़ा हुआ है। ट्रंप ने जानबूझकर भारत, रूस और चीन के बीच बढ़ते सहयोग पर चिंता व्यक्त की थी। नेपाल भारत और चीन के बीच स्थित एक रणनीतिक तौर महत्वपूर्ण देश है। एक अस्थिर नेपाल भारत और चीन दोनों के लिए सुरक्षा चुनौती पैदा कर सकता है। ट्रंप के इस बयान के अगले ही दिन नेपाल में हिंसक प्रदर्शन तेज हो गए थे, जिससे सरकार को इस्तीफा देना पड़ा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह ट्रंप की उस रणनीति का हिस्सा हो सकता है जिसमें वह दक्षिण एशिया में अमेरिकी प्रभाव बनाए रखना चाहते हैं।

Nepal Regime Change: आंदोलन का मास्टरमाइंड?

वहीं, इस पूरे प्रदर्शन के पीछे दो चेहरे सबसे आगे नजर आए। पहला है काठमांडू के मेयर बालेन शाह और दूसरा है एक गैर-सरकारी संगठन ‘हामी नेपाल’ के संस्थापक सुदन गुरुंग। ये दोनों ही शख्सियतें अचानक से चर्चा में आई हैं। बालेन शाह को प्रदर्शनकारी अगला प्रधानमंत्री बनाना चाहते हैं तो सुदन गुरुंग को इस आंदोलन का मास्टरमाइंड बताया जा रहा है।

35 वर्षीय बालेन मई 2022 से काठमांडू के 15वें मेयर है। उन्होंने एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीता और बिना किसी राजनीतिक दल के समर्थन के यह पद संभालने वाले पहले व्यक्ति बने। उन्होंने सोशल मीडिया के जरिए इस आंदोलन को समर्थन दिया। उन्होंने फेसबुक पर एक पोस्ट लिखकर युवाओं को सरकार के खिलाफ उतरने के लिए उकसाया। उनके इस पोस्ट के बाद ही नेपाल के सात से ज्यादा शहरों में युवा सड़कों पर उतर आए। शुरुआत सोशल मीडिया ऐप पर बैन के विरोध में हुई थी, लेकिन जल्द ही यह प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग तक पहुंच गया।

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Nepal Regime Change: अमेरिका से बालेन का कनेक्शन

बालेन शाह का अमेरिका से सीधा कनेक्शन भी सामने आया है। वह अमेरिकी राजदूत डीन आर थॉम्पसन से कई बार मिल चुके हैं। साल 2022 में हुई उनकी पहली मुलाकात की तस्वीरें खुद अमेरिकी राजदूत ने सोशल मीडिया पर साझा की थीं। साल 2023 में अमेरिकी पत्रिका ‘टाइम’ ने बालेन शाह को दुनिया के टॉप 100 उभरते हुए नेताओं की सूची में शामिल किया था। इसके अलावा ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ जैसे प्रकाशनों में भी उन पर लेख छप चुके हैं।

Nepal Regime Change: कार्यालय में एक ‘ग्रेटर नेपाल’ का नक्शा

शिक्षा से इंजीनियर बालेन ने सिविल इंजीनियरिंग की डिग्री प्राप्त की है और उनका भारत से सीधा संबंध रहा है। उन्होंने कर्नाटक की विश्वेश्वरय्या टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी से स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है। बालेन शाह के भारत-विरोधी रुख पर भी चर्चा हो रही है। साल 2023 में बालेंद्र शाह ने भारत की नई संसद भवन में ‘अखंड भारत’ के नक्शे के जवाब में अपने कार्यालय में अपने कार्यालय में एक ‘ग्रेटर नेपाल’ का नक्शा लगाया। इस नक्शे में उन्होंने भारत के उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और सिक्किम के कुछ हिस्सों को नेपाल का अंग बताया।

साल 2023 में उन्होंने प्रभास की फिल्म ‘आदिपुरुष’ में एक संवाद का विरोध करते हुए नेपाल की राजधानी काठमांडू में भारतीय बॉलीवुड फिल्मों पर प्रतिबंध लगाने की धमकी भी दी थी। उनका तर्क था कि फिल्म में यह संवाद कि ‘सीता भारत की बेटी हैं’ नेपाल की सांस्कृतिक संप्रभुता का उल्लंघन है। हालांकि नेपाल के सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद उन्हें यह प्रतिबंध हटाना पड़ा था। उन्होंने नेपाली संस्थानों पर “भारतीय गुलाम” होने का आरोप लगाया। वे नेपाली राष्ट्रवाद को बढ़ावा देते हैं, इसलिए उन्हें आमतौर पर भारत-समर्थक नहीं माना जाता।

Nepal Regime Change: सुदन गुरुंग की फंडिंग का खुलासा

दूसरी तरफ सुदन गुरुंग हैं, जो ‘हामी नेपाल’ नाम के एनजीओ का नेतृत्व करते हैं। इसी एनजीओ ने नेपाल में युवाओं को इकट्ठा करने और प्रदर्शन करने का काम किया। सुदन गुरुंग ने इंस्टाग्राम पर ‘हाउ टू प्रोटेस्ट’ यानी ‘कैसे प्रदर्शन करें’ नाम से वीडियो शेयर किए और युवाओं को भड़काया। उनके एनजीओ को कोका-कोला, वाइबर और गोल्डस्टार जैसे अंतरराष्ट्रीय ब्रांडों से बीस करोड़ नेपाली रुपए की वित्तीय सहायता मिली है। ये सभी विदेशी ब्रांड्स हैं और इस फंडिंग ने सवाल खड़े किए हैं कि क्या यह आंदोलन वास्तव में युवाओं का उबााल था या इसे अंतरराष्ट्रीय ताकतों द्वारा प्रायोजित किया गया था।

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लेकिन इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि संगठन को विवादास्पद व्यवसायियों का भी खुला समर्थन मिला। इनमें दीपक भट्टा जैसे अंतरराष्ट्रीय हथियार डीलर शामिल हैं, जिन पर इतालवी कंपनी के साथ बंदूक खरीद सौदे में भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे हैं। इसी तरह शंकर ग्रुप से जुड़े साहिल अग्रवाल भी इस संगठन को फंड कर रहे हैं, जिन पर COVID-19 महामारी के दौरान ब्लैक मार्केट में थर्मामीटर गन बेचने के आरोप में गिरफ्तारी तक हुई थी।

इन सबके अलावा, ‘हामी नेपाल’ को अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से जुड़े फंड भी मिले हैं। सीआईए द्वारा स्थापित मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित डॉ. सांदुक रूत जैसे लोग इस संगठन को वित्तीय सहायता प्रदान कर रहे हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि USAID और NED (नेशनल एंडोमेंट फॉर डेमोक्रेसी) जैसी अमेरिकी एजेंसियों से भी अप्रत्यक्ष फंडिंग के स्पष्ट संकेत मिले हैं। इन एजेंसियों ने “लोकतंत्र को बढ़ावा देने” और “युवा सशक्तिकरण” के नाम पर इस संगठन को भारी मात्रा में धन उपलब्ध कराया है।

Nepal Regime Change: भारत विरोधी है गुरुंग?

सुदन गुरुंग का एनजीओ पहले भी भारत-विरोधी गतिविधियों में शामिल रहा है। साल 2025 की शुरुआत में जब भारत के ओडिशा में एक नेपाली छात्रा की मौत हुई थी, तब ‘हामी नेपाल’ ने नेपाल में भारत-विरोधी भावनाओं को भड़काने का काम किया था। उन्होंने भारतीय दूतावास के सामने प्रदर्शन किए और भारत सरकार के खिलाफ आपत्तिजनक नारेबाजी की।

Nepal Regime Change: पेट्रोल बम बनाने के तरीके बताए

नेपाल की स्थानीय मीडिया की रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रदर्शनकारियों को जमीन पर उतारने और हिंसा भड़काने का काम डिस्कोर्ड और टेलीग्राम जैसे प्लेटफॉर्म पर किया गया। इन ग्रुप्स में पेट्रोल बम बनाने के तरीके भी बताए गए। लोगों से कहा गया कि वे ‘हत्यारा सरकार’ लिखी हुई डीपी लगाएं। नेपाल पुलिस और सैन्य बल की तस्वीरों को ‘शार्प शूटर’ बताकर शेयर किया गया। इन ग्रुप चैट में हिंसा और नरसंहार तक की बातें हुईं।

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डोनाल्ड लू का नेपाल कनेक्शन

इस पूरे घटनाक्रम में एक और नाम चर्चा में है, वह है अमेरिकी राजदूत डोनाल्ड लू का। डोनाल्ड लू अमेरिकी विदेश विभाग में दक्षिण एशियाई मामलों के सहायक मंत्री हैं। उन पर आरोप लगते रहे हैं कि वह दक्षिण एशिया के देशों में ‘रिजीम चेंज’ यानी सरकार बदलवाने की साजिश में शामिल हैं। पाकिस्तान में इमरान खान की सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने और बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार को उखाड़ फेंकने में भी उनकी भूमिका की बात कही जाती है।

डोनाल्ड लू ने पिछले साल दिसंबर में नेपाल का दौरा किया था। उस दौरान उन्होंने नेपाल सरकार के साथ एमसीसी (मिलेनियम चैलेंज कॉर्पोरेशन) समझौते को आगे बढ़ाया था। यह समझौता नेपाल में लंबे समय से विवादों में रहा है। आलोचकों का मानना है कि यह समझौता नेपाल की संप्रभुता के खिलाफ है।

नेपाल में हुए इन हिंसक प्रदर्शनों ने भारत के लिए चिंता बढ़ा दी है। नेपाल भारत का पड़ोसी देश है और दोनों देशों के बीच रोटी-बेटी का संबंध रहा है। नेपाल में अशांति का सीधा असर भारत की सुरक्षा पर पड़ सकता है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल में शांति बहाली की अपील की है। उन्होंने कहा कि नेपाल की स्थिरता और शांति भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

नेपाली सेना ने अब देश में कर्फ्यू लगा दिया है और स्थिति को नियंत्रण में लाने का प्रयास कर रही है। सेना प्रमुख जनरल अशोक राज सिगडेल ने प्रदर्शनकारियों से शांति बनाए रखने की अपील की है। हालांकि, अभी तक स्थिति पूरी तरह से शांत नहीं हुई है। नेपाल के इतिहास में यह एक अहम मोड़ है, जहां युवाओं के आंदोलन ने एक सरकार को गिरा दिया, लेकिन इसके पीछे की अंतरराष्ट्रीय राजनीति अब धीरे-धीरे सामने आ रही है।

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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