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Karan Singh: कांग्रेस नेता डॉ. करण सिंह बोले- पाकिस्तान से बिना लड़ाई के नहीं मिलेगा POK, जम्मू-कश्मीर के हरियाणा-हिमाचल से भी छोटा होने पर जताई चिंता

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📍नई दिल्ली | 29 Dec, 2024, 12:16 PM

Karan Singh: जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 की ऐतिहासिक भूमिका और इसके हटने के बाद के प्रभावों पर चर्चा करते हुए, कश्मीर के महाराजा और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता डॉ. करण सिंह ने हाल ही में अमर उजाला के सलाहकार संपादक विनोद अग्निहोत्री के पॉडकास्ट कार्यक्रम “खरी बात”में उन्होंने अनुच्छेद 370 की जरूरत, इसके ऐतिहासिक संदर्भ और वर्तमान परिदृश्य पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 370 एक समय में घाटी के लोगों के हितों की रक्षा के लिए जरूरी था। उन्होंने उम्मीद जताई कि जम्मू-कश्मीर को जल्द ही पूर्ण राज्य का दर्जा मिलेगा। साथ ही उन्होंने इस बात पर भी तकलीफ जताई कि हमें हमेशा भारत का मुकुट कहा जाता था। लेकिन आज हम हरियाणा और हिमाचल प्रदेश से भी छोटा हो गए हैं। केंद्र शासित प्रदेश बन जाना कश्मीरी और डोगरा दोनों को आहत करता है।

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Karan Singh: अनुच्छेद 370 की जरूरत क्यों पड़ी?

डॉ. करण सिंह ने कहा, “जब अनुच्छेद 370 लाया गया, उस समय जम्मू-कश्मीर और भारत के बीच एक संवैधानिक संबंध स्थापित करने की आवश्यकता थी। हमारे संविधान ने 1950 में आकार लिया, लेकिन 1947 में जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय के बाद के दो वर्षों में यह स्पष्ट नहीं था कि राज्य का भारत के संविधान में क्या स्थान होगा। इसलिए, इसे एक अस्थाई प्रावधान के रूप में लाया गया।” इसका उद्देश्य था जम्मू-कश्मीर के लोगों को भारतीय संविधान के साथ जोड़ने का एक रास्ता देना, जबकि राज्य अपनी अलग पहचान बनाए रख सके।

उन्होंने कहा, “1947 में मेरे पिता महाराजा हरि सिंह ने भारत के साथ विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए थे। इसके बाद भी जम्मू-कश्मीर और भारत के बीच संवैधानिक संबंध स्पष्ट नहीं थे। भारतीय संविधान 1950 में लागू हुआ और तब तक जम्मू-कश्मीर के लिए विशेष प्रावधान लाना जरूरी था।”

डॉ. करण सिंह ने बताया कि उनके पिता महाराजा हरि सिंह ने 1927 में दो बड़े फैसले लिए थे। पहला, राज्य के बाहर के लोग कश्मीर में जमीन नहीं खरीद सकते थे, और दूसरा, बाहरी लोग यहां नौकरी नहीं कर सकते थे।

उन्होंने कहा, “कश्मीर उस समय आर्थिक रूप से कमजोर था। अगर बाहरी लोग जमीन खरीद लेते या नौकरियां ले लेते, तो स्थानीय लोगों का हक पूरी तरह से खत्म हो जाता।” उन्होंने बताया कि अनुच्छेद 370 इन्हीं अधिकारों की सुरक्षा के लिए जरूरी था।

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Karan Singh: हरियाणा और हिमाचल प्रदेश से भी छोटा हुआ जम्मू-कश्मीर

डॉ. सिंह ने इस साक्षात्कार में स्पष्ट किया कि जम्मू-कश्मीर केवल कश्मीर तक सीमित नहीं है। “यह जम्मू राज्य था, जिसमें कश्मीर, लद्दाख, गिलगित-बाल्टिस्तान जैसे क्षेत्र शामिल थे। परंतु 1947 के युद्ध के बाद गिलगित-बाल्टिस्तान पाकिस्तान के कब्जे में चला गया, और अक्साई चिन को चीन ने हड़प लिया।”

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उन्होंने कहा, “हमें हमेशा भारत का मुकुट कहा जाता था। लेकिन आज हम हरियाणा और हिमाचल प्रदेश से भी छोटा हो गए हैं। केंद्र शासित प्रदेश बन जाना कश्मीरी और डोगरा दोनों को आहत करता है।”

उन्होंने आगे उम्मीद जताई कि जम्मू-कश्मीर को जल्द ही पूर्ण राज्य का दर्जा मिलेगा। उन्होंने कहा, “सरकार ने चुनाव कराने की बात कही है और सुप्रीम कोर्ट में भी कहा है कि उचित समय पर राज्य का दर्जा वापस मिलेगा।”

Karan Singh: अनुच्छेद 370 हटने के बाद हालात

डॉ. सिंह ने कहा कि अनुच्छेद 370 के हटने के बाद कई बदलाव हुए हैं। उन्होंने माना कि पत्थरबाजी और बंद जैसी घटनाएं बंद हो गई हैं, लेकिन आतंकवाद अभी भी समाप्त नहीं हुआ है, लेकिन स्थिति पहले से बेहतर है। । “आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई जारी है, लेकिन यह समस्या पूरी तरह से खत्म नहीं हुई है। पत्थरबाजी और बंद का दौर खत्म हो गया है।”

उन्होंने कहा कि आतंकवाद के लिए सीमा पार से आने वाले आतंकियों और स्थानीय आतंकियों दोनों की भूमिका है। उन्होंने कहा कि इस समस्या का हल बातचीत और सख्ती दोनों से निकाला जा सकता है।

बिना युद्ध के नहीं मिलेगा पीओके

पाकिस्तान के साथ संबंधों और पीओके पर भारत की स्थिति के बारे में डॉ. सिंह ने कहा, “संसद का संकल्प है कि पीओके को वापस लिया जाएगा, लेकिन यह बिना युद्ध के संभव नहीं है। पाकिस्तान के साथ बातचीत पर करण सिंह का मानना है कि भारत को किसी से बात करने से डरना नहीं चाहिए। पाकिस्तान हमारा पड़ोसी है, और पड़ोसियों के साथ अच्छे संबंध रखना जरूरी है। अगर बातचीत से समाधान निकले, तो इसमें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।”

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उन्होंने कहा कि पूर्व में अटल बिहारी वाजपेयी और डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में पाकिस्तान के साथ समाधान के करीब पहुंचा गया था, लेकिन दुर्भाग्यवश, राजनीतिक परिस्थितियां बदल गईं।

गाली-गलौज और व्यक्तिगत हमलों का चलन बढ़ा

डॉ. सिंह ने राजनीति के बदलते स्वरूप पर अपनी राय देते हुए कहा, “पहले राजनीतिक विरोध में भी गरिमा और मर्यादा थी। आजकल, गाली-गलौज और व्यक्तिगत हमलों का चलन बढ़ गया है। यह हमारी संस्कृति और लोकतांत्रिक परंपराओं के खिलाफ है।”

उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान में चुनावों में धन का प्रभाव बहुत बढ़ गया है। “पहले जहां विचारधारा और नेतृत्व पर जोर होता था, अब पैसे और जातिगत समीकरण हावी हो गए हैं। आज टिकट पाना करोड़ों रुपये का खेल हो गया है। इससे गरीब और ईमानदार व्यक्ति के लिए राजनीति में आना मुश्किल हो गया है।”

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देश में बढ़ते धार्मिक और राजनीतिक तनाव पर भी डॉ. करण सिंह ने चिंता जताई। उन्होंने कहा, “धर्म और जाति के नाम पर दुश्मनी बढ़ाना भारत की महान संस्कृति के खिलाफ है।” उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की उस रोक का समर्थन किया, जिसमें धार्मिक स्थलों को लेकर नए विवाद उठाने पर पाबंदी लगाई गई।

वन नेशन, वन इलेक्शन और यूसीसी पर विचार

वन नेशन, वन इलेक्शन पर डॉ. सिंह ने कहा, “यह एक दिलचस्प विचार है, लेकिन इसके कार्यान्वयन में व्यावहारिक चुनौतियां हैं। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में इसे लागू करना आसान नहीं होगा।”

यूनिफॉर्म सिविल कोड पर उन्होंने कहा, “भारत में विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों की विविधता को देखते हुए, यह विषय बेहद संवेदनशील है। इसे लागू करने से पहले गहराई से विचार करना होगा।”

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संविधान और संशोधन की प्रक्रिया

डॉ. सिंह ने भारतीय संविधान की प्रशंसा करते हुए कहा, “हमारा संविधान एक मजबूत और विस्तृत दस्तावेज है, जिसे समय-समय पर संशोधित किया गया है। लेकिन संशोधन रचनात्मक होने चाहिए, न कि राजनीतिक लाभ के लिए। संविधान में बदलाव से पहले इसके मूल ढांचे का ध्यान रखना बेहद जरूरी है।”

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नेहरू और वर्तमान राजनीति पर चर्चा

अपने सार्वजनिक जीवन के अनुभव पर करण सिंह ने कहा कि राजनीति का धर्म ही उथल-पुथल है। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और अन्य नेताओं के साथ अपने अनुभव साझा किए। जवाहरलाल नेहरू की आलोचना पर उन्होंने कहा, “नेहरू जी को सभी समस्याओं का जिम्मेदार ठहराना अनुचित है। उन्होंने देश को आजादी के बाद स्थिर करने में अहम भूमिका निभाई। उनके योगदान को कम करके आंकना इतिहास के साथ अन्याय है।”

उनका कहना है कि राजनीति में आने वाले लोगों को वाणी में संयम और दृष्टिकोण में उदारता रखनी चाहिए। राजनीति केवल सत्ता का खेल नहीं है, बल्कि यह देश और समाज की सेवा का माध्यम भी है।

उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नेतृत्व क्षमता की भी प्रशंसा की, लेकिन यह जोड़ा कि राजनीति में संवाद और सहिष्णुता की कमी चिंता का विषय है।

विदेश में हिंदुओं पर हमले

कनाडा और ऑस्ट्रेलिया में हिंदू मंदिरों पर बढ़ते हमलों पर उन्होंने कहा, “यह बहुत चिंताजनक है। सरकार को इस पर सख्त रुख अपनाना चाहिए और अन्य देशों से इसे रोकने के लिए ठोस कदम उठाने की मांग करनी चाहिए।”

दो पार्टी प्रणाली और छोटी पार्टियां

भारत में दो पार्टी प्रणाली की आवश्यकता पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा, “भारत में इतनी विविधता है कि दो पार्टी प्रणाली व्यावहारिक नहीं है। लेकिन छोटे राजनीतिक दल जो केवल पैसे और सत्ता के लिए बने हैं, उन्हें हटाया जाना चाहिए।”

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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