📍नई दिल्ली | 9 Oct, 2026, 2:41 PM
K30 Biho Air Defence System: क्या भारतीय सेना दक्षिण कोरिया के फ्लाइंग टाइगर के नाम से मशहूर के-30 बिहो हाइब्रिड एयर डिफेंस सिस्टम की खरीदने की तैयारी कर रही है? सितंबर के आखिर में नई दिल्ली में भारत और दक्षिण कोरिया के अधिकारियों के बीच हुई रक्षा सहयोग बैठक में इस सिस्टम को लेकर बातचीत हुई थी। यह वही एयर डिफेंस सिस्टम है, जिसने भारतीय सेना के पुराने ट्रायल में रूसी सिस्टमों को पीछे छोड़ते हुए अपनी जगह बनाई थी। हालांकि, अभी इसकी खरीद का कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है।
दक्षिण कोरिया की डिफेंस प्रोक्योरमेंट एजेंसी के मुताबिक, बैठक में दोनों देशों ने रक्षा उद्योग से जुड़े प्रमुख प्रोजेक्ट्स की स्थिति की समीक्षा हुई थी। इनमें बिहो हाइब्रिड एयर डिफेंस सिस्टम के साथ भारतीय सेना में पहले से इस्तेमाल हो रहीं के-9 वज्र सेल्फ-प्रोपेल्ड हॉवित्जर तोप भी शामिल थीं।
K30 Biho Air Defence System: 29 सितंबर की बैठक में क्या चर्चा हुई?
भारत और दक्षिण कोरिया के अधिकारियों के बीच रक्षा उद्योग और लॉजिस्टिक्स से जुड़ी संयुक्त समिति की बैठक नई दिल्ली में हुई थी। इसमें भारतीय रक्षा मंत्रालय और दक्षिण कोरिया की डिफेंस एक्विजिशन प्रोग्राम एडमिनिस्ट्रेशन (डीएपीए) के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया था।
दक्षिण कोरियाई एजेंसी ने अपने बयान में कहा कि बैठक में दोनों पक्षों ने रक्षा उद्योग में सहयोग की मौजूदा स्थिति का आकलन किया और विभिन्न क्षेत्रों में संभावित साझेदारी पर विचार किया गया।
डीएपीए के मुताबिक, “दक्षिण कोरियाई ने बिहो हाइब्रिड सिस्टम और भारतीय सेना द्वारा इस्तेमाल की जा रही के-9 सेल्फ-प्रोपेल्ड हॉवित्जर तोप सहित प्रमुख प्रोजेक्ट्स की प्रगति और ऑपरेशनल सहयोग सुनिश्चित करने के उपायों पर चर्चा की।”
सूत्रों का कहना है कि भारत अपने मिलिट्री मॉडर्नाइजेशन की कोशिशों के तहत काउंटर-ड्रोन प्लेटफॉर्म खरीदने की बढ़ती जरूरत के बीच बिहो हाइब्रिड सिस्टम की खरीद को लेकर फिर से नए सिरे से विचार कर रहा है। लेकिन इसकी खरीद की मंजूरी या कॉन्ट्रैक्ट पर अभी तक कोई दस्तखत नहीं हुए हैं।
बैठक में दोनों देशों ने साल 2020 के डिफेंस पार्टनरशिप रोडमैप को फिर से सक्रिय करने और रक्षा उद्योग तथा शैक्षणिक संस्थानों के बीच सहयोग बढ़ाने पर भी चर्चा हुई थी।
पैंटसिर और तुंगुस्का से बेहतर बिहो?
भारतीय सेना को ऐसे सेल्फ-प्रोपेल्ड एयर डिफेंस सिस्टम की जरूरत है, जो मैकेनाइज्ड सेना के साथ आगे बढ़ सके और दुश्मन के कम ऊंचाई पर उड़ने वाले विमानों, हेलीकॉप्टरों तथा ड्रोन को निशाना बना सके। इस जरूरत के लिए गन और मिसाइल, दोनों से लैस मोबाइल सिस्टम की तलाश की गई थी।
पहले हुए भारतीय ट्रायल्स में दक्षिण कोरिया का के-30 बिहो हाइब्रिड सिस्टम कथित तौर पर एकमात्र ऐसा प्लेटफॉर्म था, जो निर्धारित टेक्निकल और ऑपरेशनल स्टैंडर्ड्स पर खरा उतरा था। इसने रूस के पैंटसिर-एस1 और तुंगुस्का-एम1 जैसे सिस्टमों के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन किया था।
इसकी प्रमुख वजहों में कम ऊंचाई पर उड़ने वाले टारगेट्स को निशाना बनाने की क्षमता, मैकेनिकल विश्वसनीयता, कीमत और डिलीवरी की समयसीमा शामिल बताई गई थीं। रूसी प्रस्तावों को लेकर ऑफसेट संबंधी शर्तों और लंबे समय तक रखरखाव पर आने वाले खर्च को लेकर भी सवाल उठे थे।
उस दौरान भारत ने लगभग 104 बिहो सिस्टम खरीदने पर विचार किया था। इस सौदे की अनुमानित कीमत करीब 2.5 अरब अमेरिकी डॉलर बताई गई थी। हालांकि, 2020 में घरेलू रक्षा उत्पादन को प्राथमिकता देने और रूसी पक्ष की आपत्तियों के बीच खरीद प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी।

भारत में बना सकती है एलएंडटी!
के-30 बिहो हाइब्रिड एयर डिफेंस सिस्टम को दक्षिण कोरिया की हानवा एरोस्पेस बनाती है। भारत की घरेलू रक्षा उत्पादन और आत्मनिर्भर भारत की नीति को देखते हुए एलएंडटी इसे भारत में बना सकती है।
सूत्रों का कहना है कि एलएंडटी को दक्षिण कोरियाई कंपनी हनवा एयरोस्पेस के के-9 वज्र-टी सेल्फ-प्रोपेल्ड हॉवित्जर कार्यक्रम में पहले से साझेदारी का अनुभव है। इसी वजह से भारत में बिहो एयर डिफेंस सिस्टम के निर्माण के लिए भी एलएंडटी को संभावित औद्योगिक साझेदार माना जा रहा है। हालांकि, अभी इस साझेदारी की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।
वहीं कंपनी ने चरणबद्ध लोकलाइजेशन मॉडल का प्रस्ताव भी दिया है। इसके तहत 50वें सिस्टम तक स्वदेशी सामग्री की हिस्सेदारी बढ़ाकर करीब 80 प्रतिशत करने का लक्ष्य रखा गया है।
दोनों कंपनियां गुजरात के हजीरा स्थित संयंत्र में के-9 वज्र-टी सेल्फ-प्रोपेल्ड तोप का निर्माण करती हैं। के-9 वज्र-टी और बिहो दोनों ट्रैक्ड प्लेटफॉर्म हैं। ऐसे में इसके निर्माण में भी आसानी होगी। इससे उत्पादन की लागत और समय कम करने में मदद मिल सकती है। इसके अलावा कंपनी ने हाइब्रिड बिहो मॉडल में दक्षिण कोरियाई चेसिस के साथ भारतीय रडार और मिसाइल सिस्टम जोड़ने का भी प्रस्ताव रखा है, ताकि सिस्टम में स्वदेशी उपकरणों की हिस्सेदारी बढ़ाई जा सके। (K30 Biho Air Defence System)
फायरिंग रेट लगभग 600 राउंड प्रति मिनट
के30 बिहो हाइब्रिड एक ट्रैक्ड शॉर्ट-रेंज एयर डिफेंस सिस्टम है। इसे खास तौर पर उन हवाई खतरों से निपटने के लिए तैयार किया गया है, जो कम ऊंचाई पर उड़ते हैं और जिन्हें पहचानने तथा रोकने के लिए बहुत कम समय मिलता है।
इस सिस्टम की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें 30 मिलीमीटर की ऑटोमैटिक तोपें और शॉर्ट-रेंज सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलें एक ही प्लेटफॉर्म पर लगाई गई हैं। इससे अलग-अलग दूरी पर आने वाले हवाई खतरों के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है।
बिहो में दो 30 मिलीमीटर ऑटोकैनन लगी हैं। प्रत्येक तोप का फायरिंग रेट लगभग 600 राउंड प्रति मिनट है। इस तरह दोनों तोपों की संयुक्त फायरिंग दर लगभग 1,200 राउंड प्रति मिनट तक पहुंच सकती है। प्रत्येक तोप में आम तौर पर 300 राउंड गोला-बारूद रखा जाता है।
इन तोपों की प्रभावी एंगेजमेंट रेंज लगभग तीन किलोमीटर है। कम दूरी पर तेजी से आगे बढ़ रहे ड्रोन और अन्य एरियल टारगेट्स के खिलाफ इनका इस्तेमाल किया जा सकता है। (K30 Biho Air Defence System)
सात किलोमीटर तक मार करने वाली मिसाइलें
तोपों के अलावा बिहो हाइब्रिड में शिंगुंग मिसाइलें लगाने का विकल्प भी है। इन्हें केपी-एसएएम या शिरोन नाम से भी जाना जाता है। ये इंफ्रारेड गाइडेड शॉर्ट-रेंज सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलें हैं।
इन मिसाइलों की किल रेंज लगभग सात किलोमीटर है। सिस्टम पर आम तौर पर चार मिसाइलें तैयार अवस्था में रखी जा सकती हैं। इन्हें टरेट के दोनों ओर लगे पॉड में लगाया जाता है।
यहां गन और मिसाइल की भूमिका अलग-अलग है। लगभग तीन किलोमीटर की दूरी के भीतर आने वाले टारगेट्स को तोपों से निशाना बनाया जा सकता है, जबकि अपेक्षाकृत दूर मौजूद टारगेट्स के खिलाफ मिसाइल इस्तेमाल की जा सकती है। इस तरह एक ही व्हीकल में एयर डिफेंस की दो लेयर्स मिलती हैं।
इसका फायदा यह है कि सेना को हर तरह के हवाई खतरे के लिए अलग-अलग व्हीकल पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। (K30 Biho Air Defence System)
रडार और इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सिस्टम कैसे करते हैं काम?
बिहो में टारगेट का पता लगाने और उस पर निशाना साधने के लिए रडार तथा इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सेंसरों का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें टीपीएस-830के सर्च रडार है, जिसकी डिटेक्शन रेंज लगभग 17 किलोमीटर है।
वहीं, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सेंसर और फ्लिर यानी फॉरवर्ड लुकिंग इंफ्रारेड तकनीक टारगेट को ट्रैक करने में मदद करती है। लेजर रेंजफाइंडर से टारगेट की दूरी का अनुमान लगाया जा सकता है। इन उपकरणों की मदद से सिस्टम दिन और रात में काम कर सकता है। इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग जैसी परिस्थितियों में भी ऑप्टिकल सेंसर उपयोगी हो सकते हैं, हालांकि यह मौसम और विजिबिलिटी पर निर्भर करता है। (K30 Biho Air Defence System)
टैंक और मैकेनाइज्ड सेना के साथ चलने की क्षमता
बिहो को ट्रैक्ड चेसिस पर बनाया गया है। यह पहियों के बजाय ट्रैक की मदद से चलता है, जैसा कि टैंकों और कई बख्तरबंद सैन्य वाहनों में होता है। इस डिजाइन से इसे कठिन जमीन और मैकेनाइज्ड मिलिट्री फॉर्मेशन के साथ चलने में मदद मिलती है।
इसका वजन लगभग 25 से 26.5 टन के बीच है। इसमें चार सैनिकों का क्रू होता है। सड़क पर इसकी अधिकतम गति लगभग 65 किलोमीटर प्रति घंटा और ऑपरेशनल रेंज करीब 500 किलोमीटर तक है।
इस तरह का मोबाइल एयर डिफेंस सिस्टम टैंकों और बख्तरबंद वाहनों के साथ आगे बढ़ सकता है। इससे सेना की उन टुकड़ियों को हवाई सुरक्षा देने में मदद मिल सकती है, जो तेजी से अपनी स्थिति बदलती हैं। स्टेशनरी एयर डिफेंस सिस्टम की तुलना में ऐसे व्हीकल को युद्धक्षेत्र में जरूरत के अनुसार दूसरी जगह ले जाना भी आसान होता है। (K30 Biho Air Defence System)
Author
हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।





