📍नई दिल्ली | 26 May, 2026, 12:06 PM
105mm Light Field Gun Upgrade: भारतीय सेना ने अपनी पुरानी लेकिन बेहद भरोसेमंद 105 मिमी लाइट फील्ड गन को नई डिजिटल तकनीक से लैस कर दिया है। सेना ने हाल ही में मध्य प्रदेश के इटारसी स्थित सेंट्रल प्रूफ एस्टेब्लिशमेंट (CPE) में इस गन के ऑटो लेइंग टेक्नोलॉजी अपग्रेड का सफल फायरिंग ट्रायल और वैलिडेशन पूरा किया। यह अपग्रेडन 506 आर्मी बेस वर्कशॉप (506 ABW) ने किया है।
रक्षा सूत्रों के मुताबिक मई 2026 के मध्य में इस सिस्टम का ट्रायल किया गया था। इस अपग्रेड के बाद अब गन को निशाने पर सेट करने के लिए जवानों को हाथ से डायल घुमाने और लंबी कैलकुलेशंस करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। नया इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम कुछ ही सेकंड में गन को सही दिशा और एंगल पर सेट कर देगा। इससे गन की फायरिंग स्पीड, एक्यूरेसी और युद्ध के दौरान सर्वाइवल क्षमता काफी बढ़ जाएगी।
105mm Light Field Gun Upgrade: भारतीय सेना की भरोसेमंद फील्ड गन
105 मिमी लाइट फील्ड गन लंबे समय से भारतीय सेना की आर्टिलरी ताकत का अहम हिस्सा रही है। यह गन खास तौर पर पहाड़ी इलाकों, रेगिस्तान और कठिन युद्ध क्षेत्रों में इस्तेमाल की जाती है। वजन में हल्की होने के कारण इसे हेलीकॉप्टर, ट्रक या खच्चरों की मदद से भी फॉरवर्ड पोस्ट्स तक पहुंचाया जा सकता है।
भारतीय सेना ने इस गन का इस्तेमाल कई दशकों से किया है। लाइन ऑफ कंट्रोल और ऊंचाई वाले इलाकों में यह गन काफी प्रभावी मानी जाती रही है। हालांकि समय के साथ आधुनिक युद्ध का तरीका बदल गया। अब युद्ध में गोले दागने के अलावा तेजी से निशाना साधना और तुरंत पोजिशन बदलना भी जरूरी हो गया है। इसी जरूरत को देखते हुए सेना ने पुरानी गन को नई तकनीक से अपग्रेड करने का फैसला किया।
पहले कैसे काम करती थी गन
पुराने सिस्टम में गन को टारगेट पर सेट करने का पूरा काम मैनुअली होता था। गन क्रू को हाथ से डायल घुमाकर दिशा और ऊंचाई सेट करनी पड़ती थी। इसके अलावा हवा की रफ्तार, तापमान, गोले के प्रकार और बैरल की स्थिति जैसी चीजों की गणना भी मैनुअली की जाती थी।
सूत्रों का कहना है कि जंग के दौरान यह प्रक्रिया समय लेती थी। कई बार दुश्मन की जवाबी फायरिंग शुरू होने से पहले गन पोजिशन बदलना मुश्किल हो जाता था। मॉडर्न काउंटर-बैटरी रडार कुछ ही सेकंड में पता लगा लेते हैं कि किस जगह से गोले दागे गए हैं। इसके बाद दुश्मन की तरफ से तुरंत जवाबी हमला हो सकता है। यही वजह थी कि भारतीय सेना अपनी पुरानी आर्टिलरी को ज्यादा तेज और डिजिटल बनाना चाहती थी।
क्या है ऑटो लेइंग टेक्नोलॉजी
ऑटो लेइंग टेक्नोलॉजी का मतलब है कि गन खुद इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम की मदद से निशाने पर सेट हो जाए। इसमें डिजिटल फायर कंट्रोल सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक सेंसर और मोटराइज्ड कंट्रोल लगाए गए हैं।
अब गन में मौजूद कंप्यूटर खुद यह तय करेगा कि टारगेट पर हमला करने के लिए गन को किस दिशा और एगंल पर सेट करना है। इसके लिए सिस्टम हवा की दिशा, तापमान, बैरल वियर और इस्तेमाल किए जा रहे गोले का डेटा खुद प्रोसेस करेगा।
इसके बाद इलेक्ट्रॉनिक मोटर गन को अपने आप सही दिशा में घुमा देगी। इससे समय भी बचेगा और गलती की संभावना भी काफी कम हो जाएगी। (105mm Light Field Gun Upgrade)
कुछ सेकंड में रेडी होगी गन
रक्षा सूत्रों के मुताबिक पहले जहां गन को तैयार करने में दो से तीन मिनट तक लगते थे, वहीं नए सिस्टम के बाद यह काम कुछ ही सेकंड में हो जाएगा।
युद्ध के मैदान में यह बड़ा बदलाव माना जा रहा है। क्योंकि अब गन तेजी से फायर कर तुरंत दूसरी जगह शिफ्ट हो सकेगी। “शूट एंड स्कूट” क्षमता को मॉडर्न युद्ध में यह बहुत जरूरी माना जाता है। खासकर तब, जब दुश्मन के पास काउंटर-बैटरी रडार और लंबी दूरी की आर्टिलरी मौजूद हो।
इटारसी स्थित सेंट्रल प्रूफ एस्टेब्लिशमेंट में इस सिस्टम की टेस्टिंग ऑपरेशनल परिस्थितियों में की गई। अलग-अलग मौसम और फायरिंग स्थितियों में गन की परफॉर्मेंस जांची गई।
सूत्रों के मुताबिक ट्रायल के दौरान गन ने कम समय में ज्यादा सटीक तरीके से टारगेट को हिट किया। गन क्रू का काम भी पहले की तुलना में काफी आसान हो गया। इस अपग्रेड के बाद फर्स्ट राउंड हिट प्रोबेबिलिटी यानी पहले गोले में टारगेट को हिट करने की संभावना भी बढ़ गई है। (105mm Light Field Gun Upgrade)
506 आर्मी बेस वर्कशॉप की बड़ी भूमिका
इस अपग्रेड को 506 आर्मी बेस वर्कशॉप ने तैयार किया है। यह वर्कशॉप सेना के इलेक्ट्रॉनिक्स एंड मैकेनिकल इंजीनियर्स (EME) नेटवर्क का हिस्सा है। सेना की ये वर्कशॉप्स पुराने हथियारों और सैन्य उपकरणों को अपग्रेड करने का काम करती हैं। पिछले कुछ वर्षों में इन वर्कशॉप्स ने कई पुराने सिस्टम्स को डिजिटल तकनीक से जोड़ने का काम किया है।
रक्षा जानकारों का कहना है कि यह प्रोजेक्ट “आत्मनिर्भर भारत” अभियान का भी हिस्सा है। क्योंकि इसमें इस्तेमाल की गई तकनीक और इंटीग्रेशन का बड़ा हिस्सा देश में ही विकसित किया गया है। (105mm Light Field Gun Upgrade)
पुरानी गन को मिली नई लाइफ
भारतीय सेना के पास बड़ी संख्या में 105 मिमी फील्ड गन मौजूद हैं। नई गन खरीदने में काफी ज्यादा खर्च आता। इसलिए सेना ने पुरानी गन को ही आधुनिक तकनीक से अपग्रेड करने का रास्ता चुना।
सूत्रों के मुताबिक यह तरीका ज्यादा किफायती और व्यावहारिक माना जाता है। इससे सेना को नई क्षमता भी मिल जाती है और पुराने सिस्टम का उपयोग भी जारी रहता है। इस अपग्रेड के बाद गन की सर्विस लाइफ भी बढ़ जाएगी।
यह गन खास तौर पर पहाड़ी और दुर्गम इलाकों में इस्तेमाल होती है। लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) और लाइन ऑफ कंट्रोल (LoC) जैसे क्षेत्रों में इसकी तैनाती महत्वपूर्ण मानी जाती है। (105mm Light Field Gun Upgrade)
काउंटर-बैटरी फायर बड़ा खतरा
आधुनिक युद्ध में सबसे बड़ा खतरा काउंटर-बैटरी फायर होता है। जब कोई गन फायर करती है, तो दुश्मन का रडार तुरंत उसकी लोकेशन ट्रैक कर लेता है। इसके बाद उसी स्थान पर जवाबी हमला किया जाता है।
नई ऑटो लेइंग तकनीक से गन तेजी से फायर करके तुरंत अपनी पोजिशन बदल सकेगी। इससे दुश्मन के जवाबी हमले से बचने की संभावना बढ़ जाएगी।
रक्षा सूत्रों के मुताबिक यही तकनीक दुनिया के आधुनिक आर्टिलरी सिस्टम्स में इस्तेमाल हो रही है।
बता दें कि भारतीय सेना पिछले कुछ वर्षों से अपने आर्टिलरी सिस्टम को तेजी से आधुनिक बना रही है। सेना ने धनुष, के-9 वज्र, एम-777 और एटीएजीएस जैसी नई तोपें शामिल की हैं।
इसके अलावा पिनाका मल्टी बैरल रॉकेट सिस्टम और प्रिसिजन गाइडेड म्यूनिशन पर भी जोर दिया जा रहा है। 105 मिमी लाइट फील्ड गन का यह अपग्रेड उसी बड़े आधुनिकीकरण कार्यक्रम का हिस्सा माना जा रहा है। (105mm Light Field Gun Upgrade)



