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भारत का सीक्रेट हाइपरसोनिक रेलगन प्रोजेक्ट! चीन-अमेरिका के बाद DRDO बना रहा 200 किमी दूर तक वार करने वाला इलेक्ट्रोमैग्नेटिक लॉन्चर

पारंपरिक तोपों में गोले को आगे बढ़ाने के लिए बारूद या कैमिकल प्रोपेलेंट का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन इलेक्ट्रोमैग्नेटिक लॉन्चर पूरी तरह अलग सिद्धांत पर काम करता है...

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📍नई दिल्ली/पुणे | 24 Sep, 2026, 9:33 PM

India Electromagnetic Railgun Program: भविष्य के बैटलफील्ड में गेम-चेंजर मानी जाने वाली इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेलगन टेक्नोलॉजी पर भारत ने एक और बड़ा कदम बढ़ाया है। आर्मामेंट रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट (एआरडीई) लैब ने इलेक्ट्रोमैग्नेटिक लॉन्चर सिस्टम के महत्वपूर्ण हिस्सों बैरल प्लेटफॉर्म और ड्राइव्स के डिजाइन, डेवलपमेंट और मैन्युफैक्चरिंग के लिए एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (ईओआई) जारी किया है। रक्षा क्षेत्र में यह तकनीक भविष्य के हाइपरसोनिक हथियारों, लंबी दूरी की सटीक मारक क्षमता और आधुनिक नौसैनिक प्रणालियों के लिए बेहद अहम मानी जाती है।

India Electromagnetic Railgun Program: क्या है इलेक्ट्रोमैग्नेटिक लॉन्चर?

पारंपरिक तोपों में गोले को आगे बढ़ाने के लिए बारूद या कैमिकल प्रोपेलेंट का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन इलेक्ट्रोमैग्नेटिक लॉन्चर पूरी तरह अलग सिद्धांत पर काम करता है।

इस तकनीक में अत्यधिक इलेक्ट्रिक करेंट और शक्तिशाली चुंबकीय बल का इस्तेमाल किया जाता है। दो समानांतर रेलों के बीच लाखों एम्पीयर करंट प्रवाहित किया जाता है, जिससे लोरेंज फोर्स पैदा होती है। यही फोर्स प्रोजेक्टाइल को बेहद तेज रफ्तार से आगे धकेलता है।

इस प्रक्रिया में किसी विस्फोटक प्रोपेलेंट की जरूरत नहीं होती। एनर्जी सीधे पावर सिस्टम से आती है, जिससे प्रोजेक्टाइल बहुत अधिक रफ्तार प्राप्त कर सकता है। यही वजह है कि रेलगन को भविष्य की हाइपरसोनिक हथियार तकनीक के रूप में देखा जाता है।

डीआरडीओ ने पहले भी हासिल की है बड़ी सफलता

एआरडीई पिछले कई सालों से इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेलगन तकनीक पर काम कर रहा है। संगठन ने 10 मेगाजूल क्षमता वाला रेलगन सिस्टम डेवलप किया है।

इस सिस्टम की क्षमता लगभग एक किलोग्राम वजन वाले प्रोजेक्टाइल को 2000 मीटर प्रति सेकंड से अधिक रफ्तार देने की है। यह रफ्तार ध्वनि की रफ्तार से कई गुना अधिक है।

अब डीआरडीओ का लक्ष्य शक्तिशाली 100 मेगाजूल क्षमता वाले सिस्टम का डेवलपमेंट करना है। इस स्तर का सिस्टम लगभग 50 किलोग्राम वजन के प्रोजेक्टाइल को करीब 200 किलोमीटर दूरी तक हाइपरसोनिक रफ्तार से लॉन्च कर सकता है।

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यही कारण है कि बैरल प्लेटफॉर्म और ड्राइव्स जैसे महत्वपूर्ण सब-सिस्टम्स के डेवलपमेंट को कार्यक्रम का अगला बड़ा चरण माना जा रहा है। (India Electromagnetic Railgun Program)

बैरल प्लेटफॉर्म क्यों है सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा?

रेलगन का बैरल सामान्य तोप के बैरल जैसा नहीं होता। यह पूरे सिस्टम का सबसे संवेदनशील और तकनीकी रूप से जटिल हिस्सा होता है।

हर फायरिंग के दौरान रेलों के बीच अत्यधिक करंट प्रवाहित होता है। इससे बहुत अधिक गर्मी पैदा होती है और धातु पर भारी मेकेनिकल प्रेशर पड़ता है। लगातार इस्तेमाल के दौरान रेलों का घिसाव भी एक बड़ी समस्या बन जाता है।

इसी वजह से बैरल प्लेटफॉर्म को ऐसे डिजाइन और सामग्री से बनाना पड़ता है जो उच्च तापमान, अत्यधिक विद्युत प्रवाह और लगातार फायरिंग के दबाव को सह सके।

साथ ही प्रभावी थर्मल मैनेजमेंट भी जरूरी होता है ताकि सिस्टम का तापमान नियंत्रित रखा जा सके और उसकी कार्यक्षमता प्रभावित न हो। (India Electromagnetic Railgun Program)

ड्राइव्स की भूमिका भी बेहद अहम

ईओआई में जिन ड्राइव्स का उल्लेख किया गया है, वे लॉन्च सिस्टम की सटीकता और स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण हैं।

इनका काम प्रोजेक्टाइल की रफ्तार को कंट्रोल करना, लॉन्च प्रक्रिया को स्थिर बनाना और पूरे सिस्टम को निर्धारित दिशा में संचालित रखना होता है। हाइपरसोनिक रफ्तार पर मामूली गलती भी टारगेट पर बड़े अंतर का कारण बन सकती है। इसलिए ड्राइव सिस्टम का डिजाइन अत्यधिक सटीक होना जरूरी है।

मई 2025 में डीआरडीओ ने पुणे में सेंटर फॉर इलेक्ट्रोमैग्नेटिक लॉन्च टेक्नोलॉजी (सीईएमएएलटी) की स्थापना की थी। यह केंद्र विशेष रूप से रेलगन और अन्य इलेक्ट्रोमैग्नेटिक लॉन्च सिस्टम्स के रिसर्च एवं डेवलपमेंट के लिए बनाया गया है।

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यहां पल्स पावर सप्लाई, आर्मेचर डिजाइन, बैरल इंजीनियरिंग, थर्मल मैनेजमेंट और एडवांस मैटेरियल साइंस जैसे क्षेत्रों में काम चल रहा है। (India Electromagnetic Railgun Program)

भारत दो अलग-अलग तकनीकी रास्तों पर कर रहा काम

भारत में इलेक्ट्रोमैग्नेटिक लॉन्च टेक्नोलॉजी केवल रेलगन तक सीमित नहीं है। जहां एआरडीई रेलगन का डेवलपमेंट कर रहा है, वहीं गांधीनगर स्थित इंस्टीट्यूट फॉर प्लाज्मा रिसर्च (आईपीआर) भी इस क्षेत्र में काम कर रहा है।

मई 2026 में आईपीआर ने 8 किलोन्यूटन क्षमता वाले लीनियर इंडक्शन मोटर बेस्ड लॉन्चर का सफल प्रदर्शन किया था। यह सिस्टम लगभग 170 किलोग्राम वजन को 18 से 20 मीटर प्रति सेकंड की रफ्तार दे सकता है।

यह तकनीक भविष्य में नौसेना के विमानवाहक पोतों और औद्योगिक प्रणालियों में इस्तेमाली हो सकती है। (India Electromagnetic Railgun Program)

भारतीय नौसेना की भी है बड़ी रुचि

इलेक्ट्रोमैग्नेटिक लॉन्च टेक्नोलॉजी में भारतीय नौसेना की विशेष दिलचस्पी है। दुनिया के सबसे आधुनिक विमानवाहक पोतों में इलेक्ट्रोमैग्नेटिक एयरक्राफ्ट लॉन्च सिस्टम (ईएमएएलएस) का इस्तेमाल किया जा रहा है।

अमेरिका के फोर्ड क्लास एयरक्राफ्ट कैरियर पर यह सिस्टम पहले से तैनात है। चीन ने भी अपने फुजियान विमानवाहक पोत में इसी तरह की तकनीक को शामिल किया है।

भारत भविष्य के इंडिजिनस एयरक्राफ्ट कैरियर-3 के लिए स्वदेशी ईएमएएलएस डेवलप करने की दिशा में काम कर रहा है। (India Electromagnetic Railgun Program)

आसान नहीं हैं तकनीकी चुनौतियां

रेलगन तकनीक दुनिया की सबसे जटिल डिफेंस टेक्नोलॉजीज में गिनी जाती है। सबसे बड़ी चुनौती रेलों का तेजी से घिसना है। इसके अलावा विशाल पल्स पावर सिस्टम को कॉम्पैक्ट बनाना, एनर्जी स्टोरेज, कूलिंग सिस्टम और लगातार फायरिंग की क्षमता डेवलपमेंट करना भी मुश्किल काम है।

डीआरडीओ के मौजूदा 10 मेगाजूल सिस्टम में 25 मॉड्यूलर कैपेसिटर बैंक लगाए गए हैं। प्रत्येक बैंक की क्षमता लगभग 400 किलोजूल है। इन्हें लिथियम बैटरी बैंक और 15 किलोवाट डीजल जनरेटर की मदद से चार्ज किया जाता है। (India Electromagnetic Railgun Program)

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उद्योग को सीधे जोड़ा जा रहा है

आमतौर पर डीआरडीओ किसी तकनीक का प्रोटोटाइप डेवलपमेंट करने के बाद उसे सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों या निजी उद्योग को ट्रांसफर करता है। लेकिन इस बार बैरल प्लेटफॉर्म जैसे कॉम्प्लैक्स कंपोनेंट्स के लिए शुरुआती चरण में ही उद्योग से साझेदारी मांगी गई है।

चयनित कंपनियां डिजाइन, प्रोटोटाइप निर्माण, परीक्षण और अंतिम सप्लाई प्रक्रिया में भाग लेंगी। इससे देश में उच्च स्तरीय रक्षा विनिर्माण क्षमता डेवलपमेंट करने में मदद मिलेगी।

चुनिंदा देशों के क्लब में शामिल होने की कोशिश

दुनिया में अमेरिका, चीन और कुछ यूरोपीय देश ही इलेक्ट्रोमैग्नेटिक लॉन्च टेक्नोलॉजी पर गंभीरता से काम कर रहे हैं। अमेरिका ने कुछ समय के लिए अपने रेलगन कार्यक्रम की रफ्तार धीमी की थी, लेकिन काउंटर-ड्रोन सिस्टम और स्पेस लॉन्च जैसे सेक्टर्स में इसके इस्तेमाल पर फिर से काम हो रहा है। चीन भी इस तकनीक में बड़े पैमाने पर निवेश कर रहा है। (India Electromagnetic Railgun Program)

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  • herry passport

    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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