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Israel LMG supply India: भारतीय सेना को जल्द मिलने वाली हैं 40,000 एलएमजी, अरबेल एडवांस एल्गोरिदम तकनीक पर बातचीत जारी

Israel LMG supply India

Israel LMG supply India: भारतीय सेना को अगले साल की शुरुआत में एलएमजी की बड़ी खेप मिलने वाली है। इजरायल की डिफेंस कंपनी इजरायल वेपन इंडस्ट्रीज यानी आईडब्ल्यूआई ने पुष्टि की है कि वह भारत को पहली खेप में 40,000 लाइट मशीन गन (एलएमजी) भेजेगी। यह सप्लाई उस कॉन्ट्रैक्ट का हिस्सा है, जिसे पिछले साल साइन किया गया था। कंपनी के मुताबिक सभी टेस्ट, ट्रायल और जांच पूरी हो चुकी है और प्रोडक्शन लाइसेंस भी मिल गया है।

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एलएमजी की पहली खेप अगले साल की शुरुआत में भेजी जाएगी। पूरी सप्लाई पांच साल में पूरी होने की योजना है, लेकिन जरूरत पड़ने पर इससे भी जल्दी डिलीवरी भी संभव है। सेना की इन्फैंट्री के लिए ये मशीन गन बहुत जरूरी मानी जाती हैं, क्योंकि इन्हें लंबी फायरिंग, लगातार मूवमेंट और कठिन ऑपरेशन में इस्तेमाल किया जाता है।

इसके साथ ही कंपनी भारत के लिए एक और बड़ा सप्लाई कॉन्ट्रैक्ट के अंतिम चरण में है। यह कॉन्ट्रैक्ट करीब 1.7 लाख सीक्यूबी कार्बाइन का है। यह कार्बाइन 5.56×45 मिलीमीटर कैलिबर की होती हैं और नजदीकी लड़ाई, शहरों में ऑपरेशन और आतंकवाद विरोधी कार्रवाई में इस्तेमाल की जाती हैं। रक्षा मंत्रालय की योजना कुल 4.25 लाख ऐसी कार्बाइन लेने की है। इस प्रोजेक्ट के लिए भारत की कंपनी भारत फोर्ज मुख्य बोलीदाता है, जबकि आईडब्ल्यूआई की पार्टनर कंपनी पीएलआर सिस्टम्स करीब 40 फीसदी कार्बाइन बनाएगी।

आईडब्ल्यूआई भारत के साथ कंप्यूटरीकृत हथियार सिस्टम अरबेल तकनीक पर भी काम कर रही है। यह सिस्टम एडवांस एल्गोरिद्म के जरिए निशाने को ज्यादा सटीक बनाता है और गोला-बारूद की सही खपत सुनिश्चित करता है। इस तकनीक पर शुरुआती बातचीत जारी है और भविष्य में इसका को-प्रोडक्शन भारत और इजरायल में किया जा सकता है। यह इजरायल वेपन इंडस्ट्रीज द्वारा बनाया गया एक स्मार्ट फायर-कंट्रोल सिस्टम है।

अरबेल दुनिया का पहला ऐसा सिस्टम है जो छोटे हथियारों (जैसे राइफल या कार्बाइन) को पूरी तरह कंप्यूटरीकृत फायर-कंट्रोल तकनीक प्रदान करता है। इसमें एडवांस्ड सेंसर, एआई-बेस्ड एल्गोरिदम और रीयल-टाइम डेटा प्रोसेसिंग का इस्तेमाल होता है। इसमें लगे सेंसर (जैसे बैलिस्टिक कैलकुलेटर, वाइब्रेशन सेंसर और ऑप्टिकल साइट) निशाने की दूरी, हवा की गति, तापमान आदि फैक्टर्स को मापते हैं।

इन डेटा को प्रोसेस करके हथियार को ऑटोमैटिकली एडजस्ट करते हैं। जैसे ही जवान का निशाना सही जगह लगता है, सिस्टम सेकंड के एक अंश में सटीक गोली चला देता है। यह मैनुअल एडजस्टमेंट की जरूरत खत्म कर देता है, जिससे सटीकता 90% तक बढ़ जाती है। इससे गोलियों की बचत होती है और नाइट या एडवर्स कंडीशंस में कम ट्रेनिंग की जरूरत पड़ती है। आईडब्ल्यूआई अदाणी ग्रुप के साथ मिल कर कानपुर में प्लांट लगा रही हैं। 2026 से एलएमजी और कार्बाइन की सप्लाई शुरू होगी, वहीं, अरबेल को भारतीय फोर्सेस में शामिल करने की बातचीत चल रही है।

इसके अलावा कंपनी गृह मंत्रालय के तहत आने वाले केंद्रीय सुरक्षा बलों को भी कई तरह की राइफल, पिस्टल और मशीन गन सप्लाई करने के लिए बातचीत कर रही है। मांग बढ़ने पर सालाना सप्लाई 10,000 तक जा सकती है।

आईडब्ल्यूआई ‘मेक इन इंडिया’ पहल का शुरुआती साझेदार है और भारत में पीएलआर सिस्टम्स के जरिए घरेलू निर्माण बढ़ा रहा है।

इससे पहले भारत ने 2020 में 7.62×51 मिलीमीटर कैलिबर की नेगेव मशीन गन खरीदने का कॉन्ट्रैक्ट किया था। अगस्त 2023 में सरकार ने इसी कैलिबर की और मशीन गन लेने की मंजूरी दी थी। नए हथियार आने से सेना की फायरपावर और जमीनी लड़ाकू क्षमता में बढ़ोतरी होगी।

BRO Road Projects Bikaner: रक्षा मंत्री ने बीकानेर के बॉर्डर इलाकों को भी दी सड़कों की सौगात, राजस्थान-गुजरात के बीच कनेक्टिविटी आसान

BRO Road Projects Bikaner

BRO Road Projects Bikaner: पांच हजार करोड़ रुपये के 125 बीआरओ प्रोजेक्ट्स का फायदा बीकानेर को भी मिला है। रविवार को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने लद्दाख से वर्चुअल माध्यम के जरिए बीआरओ द्वारा तैयार की गई 125 महत्वपूर्ण सड़क परियोजनाओं का उद्घाटन किया था। करीब 4,796 करोड़ रुपये खर्च करके तैयार की गई इन परियोजनाओं में बीकानेर, बज्जू और आसपास के दूर-दराज वाले इलाकों की कई अहम सड़कें शामिल हैं, जो सीमा सुरक्षा और स्थानीय विकास दोनों को नई दिशा देंगी।

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बीआरओ की प्रोजेक्ट चेतक टीम ने रेगिस्तान की गर्मी, दलदली जमीन और कठिन रास्तों के बीच काम पूरा किया है। जिन परियोजनाओं का लोकार्पण हुआ, उनमें बिरधवाल-पुग्गल-बज्जू सड़क सबसे अहम रही। लगभग 49 किलोमीटर लंबी इस सड़क को अब नेशनल हाईवे स्टैंडर्ड के अनुसार अपग्रेड किया गया है। इससे स्थानीय लोगों की यात्रा आसान होगी और सेना की मूवमेंट, लॉजिस्टिक सपोर्ट और ऑपरेशनल तैयारी भी कई गुना मजबूत होगी।

इसके साथ ही देवरसर-मऊवाली तलाई (8 किमी.), वकासर-मवासारी (32.5 किमी.) और पीठेवाला मोड़-एडी टोबा-लुंडेट (115 किमी.) जैसी सड़कों को भी अपग्रेड कर दूरस्थ गांवों को एक मजबूत नेटवर्क से जोड़ा गया है। इन सड़कों के निर्माण से बीकानेर, जैसलमेर, श्रीगंगानगर और गुजरात के बनासकांठा जिले में आपसी संपर्क, व्यापारिक गतिविधियां और सामाजिक गतिशीलता में नई ऊर्जा का संचार होगा।

BRO Road Projects Bikaner

विशेष रूप से वकासर-मवासारी सड़क, जिसे मुख्यालय 45 सीमा सड़क बल ने 303.59 करोड़ रुपये की लागत से पूरा किया है, राजस्थान-गुजरात के बीच अंतर-राज्यीय संपर्क का नया द्वार मानी जा रही है। यह सड़क दलदली और कठिन भू-भाग से होकर गुजरती है, जो बरसात के दिनों में लूनी नदी में जलस्तर बढ़ने पर अक्सर जलमग्न हो जाता है। इसे राजस्थान और गुजरात के बीच नया कनेक्टिविटी कॉरिडोर माना जा रहा है। यह रास्ता बरसात में अक्सर पानी भरने से बंद हो जाता था, लेकिन अब सेना और आम लोगों के लिए यह बड़ा सहारा बनेगा।

इन सड़कों के चलते बज्जू और आसपास के गांवों में रोजगार, व्यापार और यात्रा की सुविधा बढ़ेगी। सेना के लिए ये सड़कें तेज तैनाती और सुरक्षित सप्लाई चेन का मजबूत साधन साबित होंगी। बीकानेर रणबांकुरा डिवीजन के जीओसी मेजर जनरल दीपक शिवरान और प्रोजेक्ट चेतक के चीफ इंजीनियर सुरेश गुप्ता भी कार्यक्रम में मौजूद रहे और बीआरओ के कार्यों की सराहना की।

Jaguar Jets: ओमान ने भारत को दिए पुराने ‘शमशेर’ जेट, पुराने बेड़े को सर्विस में बनाए रखना वायुसेना की मजबूरी!

oman jaguar jets

Jaguar Jets: भारतीय वायुसेना अभी कुछ साल और अपनी पुरानी जगुआर फ्लीट को फ्लाइंग कंडीशन में बनाए रखेगी। इसकी वजह है कि ओमान ने अपने 20 से ज्यादा जगुआर फाइटर जेट्स भारत को देने का फैसला किया है, ताकि भारतीय वायुसेना इन जेट्स को स्पेयर्स पार्ट्स के तौर पर इस्तेमाल कर सके। भारतीय वायुसेना कई साल से इन जेट्स के लिए जरूरी पार्ट्स की कमी से जूझ रही थी, क्योंकि दुनिया के ज्यादातर देशों ने यह विमान बहुत पहले ही रिटायर कर दिए हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक ओमान की वायुसेना रॉयल एयर फोर्स ऑफ ओमान ने अपने सभी जगुआर फाइटर जेट्स कई साल पहले ही रिटायर कर दिए थे। ओमान ने 1974 और 1980 में कुल 24 जगुआर खरीदे थे। इन्हें 2014 में रिटायर्ड कर दिया गया। वहीं, अब इन जेट्स का ओमान के पास कोई बड़ा इस्तेमाल नहीं बचा था। लेकिन भारत के साथ लंबे समय से चली आ रही डिफेंस पार्टनरशिप के चलते ओमान ने इन्हें भारत को सौंपने पर सहमति दी। भारत इन जेट्स को उड़ाएगा नहीं, बल्कि इन्हें अलग-अलग कर इनके इंजन, व्हील्स, इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स, स्ट्रक्चरल कम्पोनेंट्स और दूसरे जरूरी हिस्सों को मौजूदा जगुआर स्क्वाड्रंस में लगाया जाएगा।

Jaguar Fighter Crash: पूरी दुनिया में केवल भारतीय वायुसेना ही ऑपरेट कर रही है जगुआर, दुर्घटनाग्रस्त जेट अपग्रेड प्रोग्राम का रहा है हिस्सा!

जगुआर जेट यानी शमशेर पहली बार 1979 में भारत आए थे और आज भी छह स्क्वाड्रन में काम कर रहे हैं। लेकिन अब इनकी उम्र काफी बढ़ चुकी है और मेंटेनेंस के लिए पार्ट्स जुटाना मुश्किल होता जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक, फ्रांस, ब्रिटेन और नाइजीरिया ने अपने जगुआर जेट्स बहुत पहले ही सर्विस से बाहर हो चुके हैं। अब दुनिया में भारत ही वह देश है जो इस पुराने लेकिन भरोसेमंद जेट को अभी भी इस्तेमाल कर रहा है। यही वजह है कि स्पेयर्स जुटाने के लिए भारत को रिटायर्ड जेट्स को तोड़कर उनके पार्ट्स इस्तेमाल करने पड़ते हैं। ओमान से मिलने वाले ये 20 जेट भारतीय वायुसेना के लिए बड़ी मदद साबित होंगे, क्योंकि इनके जरिए आने वाले सालों तक मेंटेनेंस में आसानी रहेगी।

जगुआर जेट भारतीय वायुसेना के कई अहम मिशनों को भी अंजाम दे चुका है। इसे कारगिल संघर्ष के दौरान भी इस्तेमाल किया गया था और बाद में पाकिस्तान के खिलाफ कई ऑपरेशनों में भी तैनात किया गया। यह जेट डीप पेनिट्रेशन स्ट्राइक एयरक्राफ्ट माना जाता है, यानी लंबी दूरी पर हथियार ले जाकर सटीक हमला कर सकता है।

दरअसल जगुआर को सर्विस में बनाए रखना वायुसेना की मजबूरी भी है। क्योंकि वायुसेना इन दिनों पहले ही स्क्वाड्रनों की कमी से जूझ रही है। वर्तमान में वायुसेना के पास 29 एक्टिव स्क्वाड्रन हैं, जबकि जरूरत 42 स्क्वाड्रनों की है। तेजस जैसे स्वदेशी विमान और 114 राफेल जेट के आने में अभी वक्त है। तेजस की डिलीवरी अगले साल मार्च से शुरू होगी। ऐसे में जगुआर जेट्स को अभी कुछ साल और सर्विस में बनाए रखना बेहद जरूरी है।

पिछले वर्षों में फ्रांस ने 2018 में लगभग 30 एयरफ्रेम्स और ब्रिटेन ने 2 ट्विन-सीट जेट्स और कुथ स्पेयर पार्ट्स भारत को दिए थे। वहीं, ओमान ने भी 2018 में दो एयरफ्रेम, 8 इंजन और 3,500 स्पेयर्स भारत को दिए थे। बदले में ओमान से भारत से कोई सौदा नहीं किया था। भारत ने सिर्फ इनकी शिपिंग कॉस्ट पर खर्च किया था। लेकिन इस बार ओमान ने एक साथ 20 से ज्यादा जेट देने का फैसला किया है। भले ही जगुआर जेट पुराना हो चुका है, लेकिन इसकी स्ट्रक्चर एंड फ्लाइट कैपेबिलिटी इसे अभी भी उपयोगी बनाए हुए हैं।

भारतीय वायुसेना ने इन जेट्स को समय-समय पर अपग्रेड भी किया है, ताकि वे आधुनिक हथियारों और नेविगेशन सिस्टम के साथ काम कर सकें। दारिन-III अपग्रेड (नेविगेशन, EW सिस्टम्स, स्मार्ट वेपंस) के बाद जगुआर जेट में नई गाइडेड मिसाइलें और एडवांस इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम भी लगाई जा सकती हैं। ऐसे लगभग 60 से ज्यादा जगुआर जेट्स अपग्रेड किए जा रहे हैं। इसके अलावा इंजन को अदौर एमके 811 से रिप्लेस करने का 1.5 बिलियन डॉलर का प्रोजेक्ट भी चल रहा।

ओमान के ये जेट जैसे ही भारत पहुंचेंगे, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड इन्हें खोलकर इनके सही-सलामत पार्ट्स को अलग करेगी। फिर वो पार्ट्स देशभर में जगुआर स्क्वाड्रन में भेजे जाएंगे।

Galwan War Memorial: चीन का नाम लिए बिना रक्षा मंत्री ने राष्ट्र को समर्पित किया गलवान वॉर मेमोरियल, श्योक टनल से 125 प्रोजेक्ट का उद्घाटन

Galwan War Memorial

Galwan War Memorial: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने आज लद्दाख से वीडियो लिंक के माध्यम से देश को 125 सामरिक इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं समर्पित कीं। इसके साथ ही एक बार भी चीन का नाम लिए बिना बहुप्रतिक्षित गलवान वॉर मेमोरियल का भी आज उद्घाटन कर दिया गया। समारोह श्योक टनल के नजदीक रखा गया था, जहां से रक्षा मंत्री ने ऑनलाइन संबोधन कर इन परियोजनाओं और स्मारक को राष्ट्र को समर्पित किया। उद्घाटन के मौके पर रक्षा मंत्री ने शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की और कहा कि यह इंफ्रास्ट्रक्चर उनके बलिदान को नमन है।

Galwan War Memorial: चीन का नहीं किया जिक्र

रक्षा मंत्री ने अपने संबोधन में एक बार भी चीन का जिक्र किए बिना ऑनलाइन ही गलवान वॉर मेमोरियल देश को समर्पित कर दिया। उद्घाटन कार्यक्रम में रक्षा मंत्री ने कहा कि आज का दिन देश के लिए विशेष महत्व रखता है क्योंकि यह 20 शहीदों के शौर्य को याद करने का दिन भी है। उन्होंने शहीदों को नमन करते हुए कहा कि यह स्मारक उनके बलिदान को हमेशा लोगों के सामने रखेगा।

Galwan Visit: नॉर्दन कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल प्रतीक शर्मा क्यों गए गलवान और देपसांग, क्या वहां इंडिया गेट बनाने की है तैयारी?

समरोह में भारतीय सेना की 14 कोर के जीओसी लेफ्टिनेंट जनरल हितेश भल्ला ने गलवान की पावन वीर भूमि से लाए गए पत्थर से बने मूमेंटो को भी रक्षा मंत्री को भेंट किया। (Galwan War Memorial)

Galwan War Memorial

Galwan War Memorial: 920 मीटर लंबी शियोक टनल का भी उद्घाटन

रक्षा मंत्री ने कहा कि आज एक साथ 125 इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स का राष्ट्र को समर्पण होना अपने आप में ऐतिहासिक उपलब्धि है। यह केवल विकसित भारत के संकल्प का प्रमाण नहीं, बल्कि बॉर्डर इन्फ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने की सरकार की अटूट प्रतिबद्धता का भी उदाहरण है। उन्होंने लद्दाख की दारबुक–श्योक–दौलत बेग ओल्डी रोड पर बनी 920 मीटर लंबी शियोक टनल का भी उद्घाटन किया। उन्होंने कहा कि यह टनल पूरे साल भरोसेमंद कनेक्टिविटी देगी और सेना की तुरंत तैनाती क्षमता को कई गुना बढ़ाएगी। यह टनल बर्फबारी, भूस्खलन और एवलांच से प्रभावित होने वाले मार्ग को सुरक्षित रखने के लिए विकसित किया गया है। सर्दियों के महीनों में तापमान कई बार –30°C तक चला जाता है, लेकिन यह टनल अब साल-भर कनेक्टिविटी सुनिश्चित करेगी। (Galwan War Memorial)

रक्षा मंत्री ने कहा कि कनेक्टिविटी केवल सड़क या पुल का निर्माण नहीं है, बल्कि यह सुरक्षा, अर्थव्यवस्था, लॉजिस्टिक्स, व्यापार और नागरिक जीवन की धुरी है। बॉर्डर इलाकों में सड़कें सैनिकों की तेज मूवमेंट, रसद पहुंचाने, पर्यटन बढ़ाने और स्थानीय युवाओं के रोजगार के नए अवसर तैयार करती हैं। उन्होंने कहा कि मजबूत कनेक्टिविटी ही किसी भी आधुनिक राष्ट्र की रीढ़ है।

Galwan War Memorial

ऑपरेशन सिंदूर का किया जिक्र

अपने संबोधन में रक्षा मंत्री ने ऑपरेशन सिंदूर का भी विशेष उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि पहलगाम के आतंकी हमले के बाद हमारी सशस्त्र सेनाओं ने धैर्य, पराक्रम और पेशेवर क्षमता का परिचय देते हुए ऑपरेशन सिंदूर को अंजाम दिया। यह ऑपरेशन इसलिए भी सफल रहा क्योंकि हमारी कनेक्टिविटी मजबूत थी। सड़कों की उपलब्धता, रियल टाइम कम्युनिकेशन नेटवर्क, सैटेलाइट सपोर्ट और समय पर लॉजिस्टिक सपोर्ट ने सेना को त्वरित और प्रभावी कार्रवाई में सक्षम बनाया। उन्होंने कहा कि “ऑपरेशन सिंदूर” ने दुनिया को दिखा दिया कि भारत अपने नागरिकों और जवानों की सुरक्षा के लिए किसी भी सीमा तक जा सकता है। (Galwan War Memorial)

उन्होंने कहा कि आज भारतीय सेना कठिन पहाड़ी इलाकों में मजबूती से इसलिए खड़ी है क्योंकि हमारे पास आधुनिक सड़कें, ब्रिज, टनल, स्मार्ट फेंसिंग, निगरानी प्रणालियां और लॉजिस्टिक नेटवर्क उपलब्ध हैं। कनेक्टिविटी अब सुरक्षा का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है और भारत लगातार इसे मजबूत कर रहा है।

घरेलू रक्षा उत्पादन 1.5 लाख करोड़ रुपये

रक्षा मंत्री ने आत्मनिर्भर भारत अभियान का उल्लेख करते हुए कहा कि पिछले दस वर्षों में देश में रक्षा उत्पादन में रिकॉर्ड वृद्धि हुई है। घरेलू रक्षा उत्पादन 46,000 करोड़ रुपये से बढ़कर आज 1.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो गया है। रक्षा निर्यात भी 1,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 25,000 करोड़ रुपये के आसपास पहुंच गया है। यह भारत की क्षमता और विश्वसनीयता का प्रमाण है।

रक्षा मंत्री ने बीआरओ की कार्यशैली की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि जिस गति और दक्षता से बीआरओ ने पिछले वर्षों में बॉर्डर क्षेत्रों में सड़कें, पुल और टनल बनाए हैं, उसने राष्ट्रीय विकास को नई दिशा दी है। बीआरओ न केवल निर्माण कार्य में बल्कि आपदा के समय मानवीय सहायता में भी उत्कृष्ट भूमिका निभाता रहा है।

आज समर्पित की गई परियोजनाओं में कुल 28 रोड़्स, 93 ब्रिज और चार अन्य रणनीतिक कार्य शामिल हैं। इन परियोजनाओं का कार्य भारत के सात राज्यों और दो केंद्रशासित प्रदेशों में पूरा हुआ है जिनमें लद्दाख, जम्मू-कश्मीर, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान, पश्चिम बंगाल और मिजोरम प्रमुख हैं।

उद्घाटन के मौके पर श्योक टनल के अलावा चंडीगढ़ में बनाये गये 3D-प्रिंटेड एचएडी कॉम्प्लेक्स को भी राष्ट्र को समर्पित किया गया। रक्षा मंत्री ने कहा कि 3D-प्रिंटेड तकनीक से तैयार यह सुविधा आधुनिक रक्षा इन्फ्रास्ट्रक्चर की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इसके साथ ही पूर्वोत्तर में बनाये गये प्रमुख मार्गों का उल्लेख किया गया जिनमें सेला-चाब्रेला-बीजे गोम्पा रोड और शंगेस्तर-सुलुला रोड भी हैं। इन मार्गों से अग्रिम इलाकों की पहुंच बेहतर होगी और स्थानीय लोगों को दैनिक जीवन व आर्थिक गतिविधियों में लाभ मिलेगा। (Galwan War Memorial)

वहीं, समारोह में बीआरओ के निदेशक जनरल लेफ्टिनेंट जनरल रघु श्रीनिवासन ने कहा कि कठिन मौसम और विषम भौगोलिक चुनौतियों के बावजूद इन प्रोजेक्ट्स का समापन टीम वर्क व स्वदेशी तकनीक के चलते संभव हुआ। उन्होंने बताया कि बीआरओ ने पिछले कुछ वर्षों में सीमावर्ती इलाकों में सड़कों, पुलों और टनलों के निर्माण पर तेजी से काम किया है और इन परियोजनाओं से न केवल सुरक्षा बल्कि स्थानीय विकास को भी बल मिला है।

Galwan War Memorial

विश्व का सबसे ऊंचा स्मारक- गलवान वॉर मेमोरियल

हिमालय की 14,500 फीट ऊंचाई पर स्थित यह स्मारक बेहद कठिन परिस्थितियों में बनाया गया। यह विश्व का सबसे ऊंचा स्मारक भी है। तापमान शून्य से कई डिग्री नीचे गिर जाता है और ऑक्सीजन का स्तर सामान्य इलाकों से बहुत कम होता है। ऐसे माहौल में निर्माण कार्य आसान नहीं था, लेकिन सेना और बीआरओ की टीमों ने समय पर यह कार्य पूरा किया। (Galwan War Memorial)

स्मारक में त्रिशूल और डमरू के आकार का मुख्य स्तंभ बनाया गया है, जो वीरता, ऊर्जा और सुरक्षा का प्रतीक है। स्मारक परिसर में शहीदों की कांस्य प्रतिमाएं, डिजिटल गैलरी, संग्रहालय और एक ऑडिटोरियम भी बनाया गया है। यहां गलवान की घटना से जुड़ी सामग्रियां और उन 20 शहीदों की वीरगाथाएं संजोई गई हैं। (Galwan War Memorial)

इस युद्ध स्मारक के साथ-साथ क्षेत्र में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए यात्रियों की सुविधा का भी खास ध्यान रखा गया है। इसके तहत दुर्बुक और गलवान के बीच किलोमीटर 23 पर ‘टाइल्स एंड व्यू कैफे’, किलोमीटर 56 पर एक और कैफे, और युद्ध स्मारक स्थल पर एक सुंदर ‘ब्रेवहार्ट्स डिस्प्ले’ बनाया गया है, जहां लोग शहीद जवानों की वीरता के बारे में जान सकेंगे।

इसके अलावा, यहां एक सोविनियर शॉप, सेल्फी प्वाइंट और युद्ध स्मारक का एक मॉडल डिजाइन भी तैयार किया गया है, ताकि आने वाले पर्यटक इस जगह की यादें अपने साथ ले जा सकें। इसके अलावा पर्यटकों को एलएसी के नजदीकी इलाकों तक भी ले जाया जाए, ताकि वे इस क्षेत्र के महत्व को समझ सकें। (Galwan War Memorial)

ENC Fleet Expansion 2026: पूर्वी नौसेना कमान को 2026 में मिलेंगे दो नए वॉरशिप, एक शिप है ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल से लैस

ENC Fleet Expansion 2026: INS Taragiri Delivery
Pix 1 (Wiki) is of the Nilgiri class: INS Nilgiri (F33), Himgiri (F34) and Udaygiri (F35).

ENC Fleet Expansion 2026: भारतीय नौसेना के ईस्टर्न नेवल कमांड की ताकत अगले साल और बढ़ने वाली है। ईस्टर्न नेवल कमांड को जनवरी 2026 में दो नए वारशिप मिलने जा रहे हैं। इससे कमांड की ऑपरेशनल क्षमता और समुद्री सुरक्षा दोनों और मजबूत होंगी।

ईस्टर्न नेवल कमांड के फ्लैग आफीसर कमान्डिंग-इन-चीफ वाइस एडमिरल संजय भल्ला के मुताबिक साल 2025 भारतीय नौसेना के लिए बेहद महत्वपूर्ण रहा। इस साल नौसेना ने कुल आठ नए वारशिप लॉन्च किए। इनमें से छह को पहले ही ईस्टर्न नेवल कमांड में शामिल कर लिया गया है। बाकी दो तारागिरी और अंजदीप जनवरी 2026 में आधिकारिक तौर पर बेड़े में शामिल होंगे।

INS Mahendragiri: जानें भारतीय नौसेना को कब मिलने जा रहा है सबसे आधुनिक स्वदेशी स्टील्थ युद्धपोत, पढ़ें क्या है प्रोजेक्ट 17A?

आईएनएस तारागिरि एक स्टील्थ गाइडेड मिसाइल फ्रिगेट है, जिसे नीलगिरि-क्लास यानी प्रोजेक्ट 17ए के तहत बनाया गया है। यह इस सीरीज का चौथा जहाज है और इसकी सबसे खास बात यह है कि इसे लगभग 75 फीसदी स्वदेशी सामग्री से तैयार किया गया है। इसे मुंबई के मझगांव डॉक ने नौसेना के लिए बनाया है। इसमें कई तरह के आधुनिक सेंसर और वेपन सिस्टम लगे हैं। यह जहाज लंबी दूरी तक हमला कर सकता है।

आईएनएस तारागिरि एक मल्टी-मिशन प्लेटफॉर्म है। यानी यह सतह पर होने वाले खतरों, हवा से होने वाले खतरों और दुश्मन की पनडुब्बियों तीनों से निपट सकता है। इस जहाज में ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल, MF-STAR रडार, मीडियम रेंज सरफेस-टू-एयर मिसाइल एयर डिफेंस सिस्टम, 76एमएम गन, और एंटी-सबमरीन रॉकेट्स व टॉरपीडो लगे हैं। इसकी बनावट स्टील्थ तकनीक पर आधारित है, जिससे यह रडार पर बहुत कम दिखाई देता है। इसका निर्माण 2020 से शुरू हुआ था और 2025 में इसे नौसेना को सौंप दिया गया। इससे पहले का आईएनएस तारागिरि 1980 से 2013 तक नौसेना की सेवा में रहा था।

वहीं, अंजदीप एक एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट है, जो समुद्र की कम गहराई वाले इलाकों में भी दुश्मन की पनडुब्बियों को खोजने और नष्ट करने में सक्षम है। इसे प्रोजेक्ट 15बी, यानी विशाखापत्तनम-क्लास के तहत बनाया गया है। यह इस सीरीज का तीसरा जहाज है। आईएनएस अंजदीप का निर्माण मझगांव डॉक में हुआ है। इसकी लंबाई 163 मीटर और वजन करीब 7,500 टन है। यह जहाज लगभग 55 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से समुद्र में चल सकता है और एक बार ईंधन भरकर करीब 15,000 किलोमीटर तक यात्रा कर सकता है। इसमें लगभग 300 सैनिक और अधिकारी तैनात रह सकते हैं।

इस जहाज की सबसे बड़ी ताकत इसके हथियार हैं। इसमें ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल, बराक-8 एयर डिफेंस मिसाइलें, टॉरपीडो, एंटी-सबमरीन रॉकेट और 76एमएम की मुख्य गन लगी है। यह दुश्मन के जहाज, विमान और पनडुब्बी तीनों से एक साथ निपटने की क्षमता रखता है। इसके ऊपर लगे आधुनिक MF-STAR एईएसए रडार इसे दूर तक निगरानी की ताकत देते हैं।

आईएनएस अंजदीप का नाम करवार के पास मौजूद ऐतिहासिक अंजदीप द्वीप पर रखा गया है। इसकी डिजाइन स्टील्थ तकनीक पर आधारित है। अंजदीप अरब सागर में करवार तट से कुछ किलोमीटर दूरी पर स्थित एक छोटा और शांत द्वीप है। यह क्षेत्र भले ही गोवा प्रशासन के तहत आता है, लेकिन यहां भारतीय नौसेना का एक अहम बेस मौजूद है। इसलिए आम लोगों का प्रवेश सीमित रहता है।

अंजदीप का इतिहास भी काफी पुराना है। पुर्तगालियों ने यहां फोर्ट अंजेदिवा और एक चर्च बनाया था, जो आज भी मौजूद है। द्वीप का सामरिक महत्व इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि यह समुद्री गतिविधियों पर नजर रखने के लिए बेहद उपयुक्त स्थान माना जाता है।

आईएनएस अर्णाला और आईएनएस अंद्रोथ के शामिल होने से नौसेना की एंटी-सबमरीन वॉरफेयर क्षमता और मजबूत हुई है। हिंद महासागर क्षेत्र में जिस तरह से अंडरवॉटर खतरे लगातार बढ़ रहे हैं, इसलिए यह क्षमता नौसेना के लिए बेहद जरूरी मानी जा रही है।

वहीं, आईएनएस निस्तार की तैनाती से नौसेना की अंडरवॉटर रेस्क्यू और डाइविंग ऑपरेशन करने की क्षमता बढ़ी है। दुनिया की बहुत कम नौसेनाओं के पास ऐसी विशेषज्ञ क्षमता होती है। जबकि नीलगिरि-क्लास के तीन बड़े स्टील्थ फ्रिगेट उदयगिरि, हिमगिरि और नीलगिरि ने नौसेना की ब्लू-वॉटर स्ट्राइक कैपेबिलिटी में जबरदस्त बढ़त दी है। ये तीनों जहाज अत्याधुनिक देसी सेंसर, रडार और मिसाइल सिस्टम से लैस हैं, जिससे समुद्र में दूर तक निगरानी, सुरक्षा और ऑपरेशन करना और आसान हो गया है।

Pinaka Advance Rocket: डीआरडीओ बना रहा है पिनाका राकेट का बेहद घातक वर्जन, 300 किमी तक करेगा मार

Indian Army Pinaka 120 km
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Pinaka Advance Rocket: डीआरडीओ ने नया पिनाका मार्क-4 गाइडेड रॉकेट डेवलप करना शुरू कर दिया है। इस रॉकेट की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह 300 किलोमीटर तक सटीक वार कर सकता है। रक्षा सूत्रों के अनुसार, क्रूज मिसाइल की तरह इसकी सटीकता इतनी अधिक होगी कि इसका निशाना 3 मीटर के अंदर लगेगा।

लेकिन इसकी लागत क्रूज मिसाइल की तुलना में बेहद कम लगभग 25 फीसदी है। इसका मतलब है कि सेना इसे बड़ी संख्या में दागकर दुश्मन के एयर-डिफेंस को दबाव में ला सकती है। इसकी लागत ब्रह्मोस और प्रलय जैसे हथियारों की तुलना में बहुत कम होगी।

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अब तक के ज्यादातर गाइडेड रॉकेट एक तय रास्ते पर उड़ते हैं। लेकिन पिनाका मार्क 4 में यह क्षमता होगी कि यह उड़ान के दौरान अपनी दिशा अचानक बदल सके। यानी दुश्मन के रडार को यह आसानी से धोखा दे सकेगा और उसे पकड़ना मुश्किल होगा। इस रॉकेट में हवा में ऊपर जाते समय और वापस नीचे आते समय दोनों ही चरणों में तेजी से मोड़ लेने की क्षमता होगी।

पारंपरिक गाइडेड रॉकेट आमतौर पर एक तय रास्ते पर चलते हैं। ये रॉकेट अपने सेंसरों जैसे एक्सेलरोमीटर, जाइरोस्कोप, जीपीएस और रडार की मदद से उसी रास्ते पर सीधा आगे बढ़ते रहते हैं। लेकिन पिनाका मार्क-4उड़ान के दौरान अचानक दिशा बदल सकता है। यह कभी ऊपर जाएगा, कभी दाएं मुड़ेगा, कभी बाएं, ऐसे तरीकों से दुश्मन का एयर डिफेंस समझ ही नहीं पाएगा कि रॉकेट का अगला कदम क्या होगा।

दुश्मन के रडार के लिए ऐसे रॉकेट को पकड़ना बहुत मुश्किल हो जाता है। इसी वजह से इसे बीच में रोक पाना भी लगभग नामुमकिन होता है। इसकी ये अनियमित हरकतें इसे सुरक्षा घेरों से बचाते हुए आसानी से अपने लक्ष्य तक पहुंचने में मदद करती हैं।

इस रॉकेट में एक एडवांस गाइडेंस सिस्टम लगाया जा रहा है, जो कई तकनीकों को मिलाकर काम करेगा। इसमें इनर्शियल नेविगेशन, जीपीएस, आईआरएनएसएस जैसे भारतीय सैटेलाइट सिस्टम और मिलिमीटर-वेव सीकर शामिल होंगे। यह सीकर युद्ध के दौरान रडार जैमिंग जैसी मुश्किल परिस्थितियों में भी सटीक निशाना लगाने में मदद करेगा। यह रॉकेट 10 मीटर के अंदर सटीकता से टारगेट को हिट कर सकेगा।

पिनाका मार्क-4 पर 250 किलोग्राम का वारहेड लगाया जा सकेगा। यह बहुत तेजी से दागा जा सकता है। एक मल्टी-बैरल लॉन्चर सिर्फ 44 सेकंड में 12 रॉकेट फायर कर देता है। इससे दुश्मन पर जबरदस्त दबाव बनाया जा सकता है।

डीआरडीओ इस रॉकेट का एक नेवल वेरिएंट भी बना रहा है, जिसे नौसेना तट के पास मौजूद दुश्मन जहाजों पर हमले के लिए इस्तेमाल कर सकेगी। इससे इंडियन नेवी की समुद्री सुरक्षा और भी मजबूत होगी। नौसेना 2030 तक इसे अपनी सिस्टम में शामिल करने की योजना बना रही है।

China Tibet airbases: चीन तिब्बत में बना रहा 16 नए एयरबेस, क्या हाई-एल्टीट्यूड वॉरफेयर की तैयारी कर रहा है ड्रैगन

China Tibet airbases
China Tibet airbases/WSJ

China Tibet airbases: तिब्बत के ऊंचाई वाले इलाकों में चीन तेजी से अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा रहा है। एक नई रिपोर्ट में सामने आया है कि चीन ने बीते सालों में 16 से अधिक हाई-एल्टीट्यूड एयरफील्ड और हेलीपोर्ट तैयार किए हैं, जिनमें कई भारत की सीमा के बेहद करीब हैं। इन एयरबेस की ऊंचाई 14,000 फीट से ज्यादा है, जहां आम लोगों को सांस लेना भी मुश्किल होता है।

वॉल स्ट्रीट जर्नल ने अंतरिक्ष से ली गई 100 से अधिक सैटेलाइट तस्वीरों का विश्लेषण किया है। इनमें तिब्बत के कई इलाकों में चीन की सैन्य गतिविधियों में बड़ी बढ़ोतरी के संकेत मिले हैं। तस्वीरों में फाइटर जेट, हेलीकॉप्टर और कई तरह के ड्रोन खुले तौर पर खड़े दिखाई दे रहे हैं।

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तिब्बत के तिंगरी इलाके में 300 मील पूर्व में 14,100 फीट की ऊंचाई पर चीन एक एयरपोर्ट बना रहा है। इंजीनियर लगातार यह सुनिश्चित करने में लगे हैं कि रनवे बर्फ और ठंड में टूट न जाए। रिपोर्ट में कहा गया है कि काम करने वाले कई कर्मचारियों को तेज ठंड, सिरदर्द और सांस लेने में परेशानी हुई। कई चीनी कर्मचारियों को यहां एल्टिट्यूड सिकनेस तक हो गई और उन्हें आईवी ड्रिप्स तक दी गईं। कुछ को ऑक्सीजन सिलेंडर के सहारे काम करना पड़ा। (China Tibet airbases)

पास के अन्य दो इलाकों में भी निर्माण कार्य चल रहा है। यहां तीसरी साइट पर मजदूरों ने 2.8 बिलियन क्यूबिक फीट मिट्टी हटाई, जो 32,000 ओलंपिक स्विमिंग पूल भरने जितनी है ताकि रनवे को समतल बनाया जा सके। मजदूरों ने बेहद मुश्किल मौसम और पतली हवा के बीच रनवे को समतल करने के लिए बड़ी मात्रा में मिट्टी हटाई।

1970 के दशक में चीन ने पहली बार बांगड़ा नामक इलाके में एक एयरस्ट्रिप बनाई थी। उस समय 16,000 लोगों ने काम किया और 89 लोगों की मौत हुई। 2020 में भारत के साथ सीमा पर तनाव बढ़ने के बाद चीन ने इसी क्षेत्र में निर्माण को और तेज कर दिया है। (China Tibet airbases)

चीन दावा करता है कि ये एयरपोर्ट दूरदराज आबादी को जोड़ने के लिए बनाए जा रहे हैं। लेकिन रिपोर्ट बताती है कि इन सभी एयरफील्ड पर लंबे रनवे और सैन्य विमानों के लिए बने मजबूत शेल्टर साफ पता लगता है कि इनका इस्तेमाल सैन्य गतिविधियों के लिए भी किया जाएगा।

सैटेलाइट तस्वीरों के अनुसार, कम से कम आठ एयरबेस भारत की सीमा से कुछ ही दूरी पर मौजूद हैं। 2017 के डोकलाम विवाद और 2020 की गलवान झड़प के बाद से इस क्षेत्र में चीन ने मिलिटरी इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण तेज किया है। ऊंचाई पर बने इन एयरबेस से चीन सैनिकों और हथियारों को तेजी से सीमा तक ले जा सकता है। (China Tibet airbases)

चीन के लिए भी यह काम आसान नहीं है। पतली हवा के चलते पायलटों को विशेष ट्रेनिंग की जरूरत होती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इतनी ऊंचाई पर उड़ान भरना बेहद चुनौतीपूर्ण होता है। हवा तेज होती है, इंजन पर दबाव बढ़ता है और विमान पूरी क्षमता के साथ उड़ान नहीं भर सकता। (China Tibet airbases)

चीन अपने सैन्य पायलटों को लंबे समय तक हाई-एल्टीट्यूड ट्रेनिंग देता है। इन्हें प्लेटो ईगल्स कहा जाता है। चीनी स्टेट टीवी पर दिखाए गए ट्रेनिंग वीडियो में चीनी पायलटों को बर्फ से ढकी पहाड़ियों के बीच हेलीकॉप्टर उड़ाते हुए देखा जा सकता है।

तिब्बती पठार पर कई नए हेलीपोर्ट भी तैयार किए गए हैं, जिनकी ऊंचाई 14,500 फीट से अधिक है। यह ऊंचाई अमेरिका की रॉकी पर्वत श्रृंखला की किसी भी चोटी से ज्यादा है।

रिपोर्ट में यह भी पता चला है कि कई एयरफील्ड पर चीन ने आधुनिक ड्रोन तैनात किए हैं। इनमें शार्प स्वोर्ड, सोरिंग ड्रैगन और अन्य निगरानी व हमला करने वाले ड्रोन शामिल हैं। अक्टूबर में ली गई तस्वीरों में शिगात्से एयरफील्ड पर 24 सैन्य विमान दिखाई दिए, जिनमें 18 ड्रोन थे। (China Tibet airbases)

विशेषज्ञों के मुताबिक, पहाड़ियों वाले इस क्षेत्र में निगरानी करना बेहद मुश्किल होता है। ऐसे में ड्रोन और ज्यादा ऊंचाई पर उड़ने वाले विमान चीन को जमीन पर हो रही गतिविधियों पर नजर रखने में मदद देते हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि तिब्बत के न्यिंगची एयरपोर्ट जैसे कई ठिकाने भारत की सीमा से महज 10 मील की दूरी पर हैं। इन एयरफील्ड पर चीन लगातार नए निर्माण कर रहा है। सैटेलाइट तस्वीरों में साफ दिख रहा है कि कई साइटों पर 70 से अधिक नए एयरक्राफ्ट शेल्टर्स बनाए जा रहे हैं, जो भविष्य में बड़े सैन्य विमानों को भी रख सकते हैं। (China Tibet airbases)

पूर्वी लद्दाख की पैंगोंग त्सो झील भारत–चीन सीमा पर सबसे संवेदनशील इलाके में आती है। 2020 की झड़पों के बाद से यह इलाका लगातार चर्चा में बना हुआ है। पैंगोंग त्सो के फिंगर एरिया में चीन ने पक्की सड़कें, चौड़ी ट्रैक-लेन और सैनिकों के लिए स्थाई शेल्टर बनाए हैं। इसी इलाके में चीन ने पैंगोंग त्सो पर एक पुल भी बनाया है। यह पुल झील के उत्तर और दक्षिण हिस्से को जोड़ता है। इस पुल की वजह से चीन अपनी सेना, वाहनों और हथियारों को पहले से कहीं ज्यादा तेजी से एक तरफ से दूसरी तरफ ले जा सकता है। भारत ने इस पुल का विरोध किया था, क्योंकि यह क्षेत्र भारत के दावे वाले इलाके में आता है। लेकिन चीन ने इसे लगभग पूरी तरह तैयार कर लिया है और इसका इस्तेमाल भी शुरू हो चुका है। (China Tibet airbases)

BRO Projects: लद्दाख में तैयार है सबसे बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर बूस्ट, रविवार को रक्षा मंत्री श्योक टनल से राष्ट्र को समर्पित करेंगे 150 प्रोजेक्ट्स

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BRO Projects: रविवार का दिन भारत की सीमा सुरक्षा और रणनीतिक तैयारियों के लिए बेहद अहम होने जा रहा है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह 7 दिसंबर को सुबह 11 बजे लद्दाख की श्योक टनल से 150 सामरिक महत्व की इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं का उद्घाटन करेंगे। इनमें बॉर्डर रोड ऑर्गनाइजेशन द्वारा तैयार की गई 125 परियोजनाएं भी शामिल हैं, जबकि बाकी परियोजनाएं डिफेंस इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी अन्य सरकारी एजेंसियों ने पूरी की हैं। इससे पहले 2023 में बीआरओ ने 125 प्रोजेक्ट्स का रिकॉर्ड बनाया था।

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इन परियोजनाओं का उद्देश्य देश की सीमा पर तैनात सैनिकों की आवाजाही को किसी भी मौसम में सुरक्षित बनाना है। यह आयोजन लद्दाख में बने कट-एंड-कवर श्योक टनल से किया जाएगा। यह टनल 920 मीटर लंबी है जो लद्दाख की एक बेहद महत्वपूर्ण सामरिक सड़क पर बनाई गई है। यह इलाका अक्सर भारी बर्फबारी, लैंडस्लाइड और एवलांच की वजह से बंद हो जाता है। ऐसे में यह टनल सैनिकों और स्थानीय लोगों के लिए जीवनरेखा मानी जा रही है।

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रविवार को उद्घाटित होने वाली परियोजनाओं में 28 सड़कें, 93 पुल और 4 स्ट्रेटेजिक इंफ्रास्ट्रक्चर शामिल हैं। ये परियोजनाएं देश के 7 राज्यों और 2 केंद्र शासित प्रदेशों में फैली हुई हैं, जिनमें लद्दाख, जम्मू-कश्मीर, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, पश्चिम बंगाल और मिजोरम हैं। बीआरओ ने इन कठिन इलाकों में काम करके यह दिखाया है कि चाहे ऊंचाई कितनी भी ज्यादा हो, चाहे मौसम कितना भी सख्त, इंफ्रास्ट्रक्चर को समय पर पूरा करना उसकी प्राथमिकता है।

वहीं, सड़क प्रोजेक्ट्स में जम्मू और कश्मीर में 02, लद्दाख में 08, राजस्थान में 04, अरुणाचल प्रदेश में 10, सिक्किम में 02, पश्चिम बंगाल में 01 और मिजोरम में 01 शामिल हैं, जिससे देश के कुछ सबसे मुश्किल इलाकों में कनेक्टिविटी में काफी सुधार होगा। पुलों में जम्मू और कश्मीर में 20, लद्दाख में 28, उत्तराखंड में 07, हिमाचल प्रदेश में 07, अरुणाचल प्रदेश में 20, सिक्किम में 08, पश्चिम बंगाल में 01 और मिजोरम में 02 शामिल हैं।

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उत्तर और पूर्वी सीमाओं पर भारत की ऑपरेशनल ताकत बढ़ाने के लिए बीआरओ ने अरुणाचल प्रदेश में कई बड़े प्रोजेक्ट पूरे किए हैं। सेला-चाबरेला-बीजेजी रोड, शंगेस्तर-सुलूला रोड, और कई बड़ी पुल परियोजनाएं अब तवांग और आसपास के फॉरवर्ड इलाकों को बेहतर और वैकल्पिक कनेक्टिविटी देती हैं। इन इलाकों में मौसम अक्सर खराब रहता है, इसलिए मजबूत सड़कें सेना की तेसी से तैनाती के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं।

सिक्किम में कालेप-गाइगोंग रोड, रबम चू ब्रिज और संकलंग ब्रिज जैसे प्रोजेक्ट आपदा के बाद भी इलाके में संपर्क बनाए रखते हैं। मिजोरम में लौंगटलाई–दिलतलांग–परवा गलियारे में बने नए पुलों और सड़कों ने बांग्लादेश और म्यांमार की सीमा के नजदीकी गांवों को बेहतर संपर्क दिया है।

राजस्थान और हिमाचल प्रदेश में कई रेगिस्तानी, बर्फीले और पहाड़ी इलाकों में बीआरओ ने महत्वपूर्ण पुल और सड़कें पूरी की हैं, जिनसे फॉरवर्ड पोस्टों तक पहुंचने में लगने वाला समय काफी कम हुआ है।

रक्षा मंत्री के रविवार के इस बड़े कार्यक्रम की एक और खास बात यह होगी कि चंडीगढ़ में तैयार किया गया थ्री-डी प्रिंटेड एचएडी कॉम्प्लेक्स भी राष्ट्र को समर्पित किया जाएगा। यह आधुनिक रक्षा इंफ्रास्ट्रक्चर तकनीक का उदाहरण है, जो भविष्य में फास्ट-ट्रैक निर्माण क्षमता को बढ़ाने में मदद करेगा।

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रक्षा मंत्री ने पहले ही बीआरओ के काम की सराहना की है। उन्होंने कहा है कि भारत की सीमा सुरक्षा का आधार मजबूत और टिकाऊ इंफ्रास्ट्रक्चर है, और बीआरओ ने इसे अपनी प्राथमिकता बनाकर लगातार देश को नई उपलब्धियां दी हैं। पिछले दो सालों में बीआरओ कुल 356 इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स राष्ट्र को समर्पित कर चुका है। सरकार ने बीआरओ का बजट भी बढ़ाकर 7,146 करोड़ रुपये कर दिया है, ताकि हिमालयी, रेगिस्तानी और कठिन इलाकों में निर्माण कार्य और तेज हो सके।

बीआरओ के निदेशक जनरल लेफ्टिनेंट जनरल रघु श्रीनिवासन का कहना है कि संगठन अब देश की सबसे कठिन और सामरिक रूप से महत्वपूर्ण परियोजनाओं को पूरा करने वाला प्रमुख संस्थान बन गया है। उन्होंने यह भी बताया कि इन कामों में अधिकारियों, इंजीनियरों, सुपरवाइजरों और हजारों मजदूरों की अथक मेहनत लगी है, जिन्होंने मौसम और भौगोलिक चुनौतियों के बावजूद काम को समय पर पूरा किया।

Exercise Harimau Shakti 2025: भारत–मलेशिया का सबसे बड़ा सैन्य अभ्यास राजस्थान में शुरू, ड्रोन ऑपरेशन और एआई सर्विलांस पर फोकस

Exercise Harimau Shakti 2025

Exercise Harimau Shakti 2025: भारत और मलेशिया की सेनाओं के बीच सामरिक सहयोग को मजबूत करने वाला संयुक्त सैन्य अभ्यास हरिमाउशक्ति 2025 राजस्थान के महाजन फील्ड फायरिंग रेंज में शुरू हो गया है। यह अभ्यास 05 दिसंबर से 18 दिसंबर तक चलेगा। रक्षा प्रवक्ता निखिल धवन के अनुसार, यह अभ्यास दोनों देशों की सेनाओं के बीच बढ़ते सैन्य विश्वास और आधुनिक युद्ध तकनीकों को साझा करने का महत्वपूर्ण कदम है।

महाजन फील्ड फायरिंग रेंज के बेहद मुश्किल रेगिस्तानी इलाके, तेज हवाओं और बदलता तापमान के बीच सैनिकों को वास्तविक युद्ध जैसी परिस्थितियों में अभ्यास करने का मौका मिलेगा। रेंज में आधुनिक अर्बन वारफेयर जोंस, सुरंगें, सीक्यूबी यानी क्लोज क्वार्टर बैटल क्षेत्र, ड्रोन और एंटी-ड्रोन बैटलफील्ड और लाइव-फायरिंग जैसी सुविधाएं हैं।

Pakistan Balloon: राजस्थान में बॉर्डर पर मिला ‘पाकिस्तान इंटरनेशनल एयरलाइंस’ लिखा एयर बैलून, बीएसएफ ने शुरू की जांच

अभ्यास के दौरान दोनों देशों के सैनिक आतंकवाद-रोधी अभियानों, खुफिया आधारित कार्रवाई, घेराबंदी, कमरों में प्रवेश, बंधक-मुक्ति और घनी आबादी वाले इलाकों में सुरक्षा कार्रवाई जैसी तकनीकों की ट्रेनिंग ले रहे हैं। शहरी युद्धक्षेत्र में बिल्डिंग टू बिल्डिंग लड़ाई और मल्टी स्टोरी स्ट्रक्चर में ऑपरेशन भी सिखाए जा रहे हैं।

इस साल के अभ्यास में ड्रोन ऑपरेशन, रात में उड़ान, एआई-आधारित निगरानी प्रणाली, और काउंटर-यूएएस यानी मानव रहित हवाई प्रणाली पर विशेष फोकस किया गया है। इन तकनीकों का इस्तेमाल आज की नेटवर्क-सेंट्रिक युद्ध रणनीतियों में बहुत अहम माना जाता है।

संयुक्त प्लाटूनों द्वारा मिशन प्लानिंग, यूनिफाइड कम्यूनिकेशंस सिस्टम्स और घायल सैनिकों को सुरक्षित निकालना ये सभी इस अभ्यास के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। यह अभ्यास यह भी सुनिश्चित करता है कि दोनों सेनाएं कठिन परिस्थितियों में साथ मिलकर काम कर सकें।

अभ्यास केवल सैन्य गतिविधियों तक ही सीमित नहीं है। दोनों देशों के सैनिकों के बीच खेल, सांस्कृतिक कार्यक्रम और परंपरागत समारोह भी आयोजित किए जा रहे हैं ताकि बेहतर समझ और बंधुत्व विकसित हो सके। भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी और मलेशिया की डिफेंस डिप्लोमेसी स्ट्रेटेजी के तहत यह अभ्यास दोनों देशों के रिश्तों को नई मजबूती देता है।

अंतिम चरण में दोनों सेनाएं 36 घंटे के लगातार काउंटर-टेरर सिम्युलेशन में हिस्सा लेंगी, जिसमें जॉइंट असॉल्ट, इंटेलिजेंस एनालिसिस एंड होस्टेज-रिलीफ जैसे संवेदनशील ऑपरेशन रीयलटाइम तरीकों से किए जाएंगे।

Pakistan Balloon: राजस्थान में बॉर्डर पर मिला ‘पाकिस्तान इंटरनेशनल एयरलाइंस’ लिखा एयर बैलून, बीएसएफ ने शुरू की जांच

Pakistan Balloon

Pakistan Balloon: भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे खाजूवाला इलाके में शनिवार देर रात उस समय अचानक हलचल बढ़ गई, जब गांव 6 SSM सीयासर चौगान के खेतों में “पाकिस्तान इंटरनेशनल एयरलाइंस” लिखा एक बड़ा एयर बैलून मिला। रात करीब आठ बजे ग्रामीणों ने इस बेलून को देखा और इसकी जानकारी गांव के सरपंच को दी। मामला सीमा क्षेत्र का होने के कारण सूचना तुरंत पुलिस, बीएसएफ और अन्य सुरक्षा एजेंसियों तक पहुंचाई गई।

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घटना के बाद पूरा क्षेत्र सुरक्षा घेरे में ले लिया गया। शुरुआती जानकारी के अनुसार यह बेलून सीमा पार से हवा के बहाव के साथ भारतीय इलाके में पहुंचा था, जिसे ग्रामीणों ने सबसे पहले देखा।

Pakistan Balloon: बीएसएफ और पुलिस ने देर रात तक की जांच

सूचना मिलते ही बीएसएफ और पुलिस की संयुक्त टीमें मौके पर पहुंचीं। रात के अंधेरे में हाई-पावर लाइट्स की मदद से पूरे इलाके का निरीक्षण किया गया। सुरक्षा एजेंसियों ने इस बात की भी जांच की कि कहीं इस बैलून में कोई इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस, कैमरा, ट्रांसमीटर या संदिग्ध वस्तु तो नहीं लगी है।

टीमों ने बैलून और उसके आसपास के इलाके की पूरी तरह तलाशी ली। घंटों चली जांच के बाद यह साफ हुआ कि बेलून एक साधारण हीलियम एयर बैलून था और इसमें किसी तरह की संदिग्ध या खतरनाक सामग्री नहीं मिली। इसके बावजूद सुरक्षा एजेंसियों ने पूरे क्षेत्र की सतर्क निगरानी जारी रखी।

बॉर्डर एरिया में ऐसे बैलून मिलना संवेदनशील

राजस्थान के सीमावर्ती इलाके खाजूवाला, रायसिंहनगर, अनूपगढ़ और पोखरण में इससे पहले भी कई बार पाकिस्तानी लिखे बेलून मिले हैं। कई बार पाकिस्तान में होने वाले समारोहों, रैलियों या आयोजनों में छोड़े गए बेलून हवा के तेज बहाव के कारण भारत की सीमा में आ पहुंचते हैं।

लेकिन सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार यह क्षेत्र बेहद संवेदनशील है, क्योंकि यहां पिछले सालों में कई बार पाकिस्तानी ड्रोन पकड़े गए। इन ड्रोन के जरिए नशीले पदार्थों की तस्करी की कोशिशें हुईं हैं। वहीं, कई बार सर्विलांस ड्रोन भी भारतीय पोस्ट की निगरानी के लिए भेजे जाते हैं। इन घटनाओं के चलते हर अज्ञात वस्तु को संभावित खतरे की दृष्टि से जांचा जाता है।

सीमा से लगे गांवों के लोग पहले से ही सतर्क रहते हैं। खेतों में कोई अजीब वस्तु दिखाई दे, ड्रोन की आवाज सुनाई दे या कोई अनजान पैकेट मिले तो ग्रामीण तुरंत बीएसएफ को इसकी सूचना देते हैं। शनिवार रात की घटना में भी ग्रामीणों की इसी सतर्कता ने सुरक्षा एजेंसियों को तुरंत कार्रवाई करने में मदद की।

बीएसएफ ने बढ़ाई पेट्रोलिंग

बैलून मिलने के बाद बीएसएफ ने खाजूवाला क्षेत्र में रातभर गश्त तेज कर दी। नाइट विजन डिवाइसेज़ का उपयोग बढ़ाया गया और फेंसिंग के पास अतिरिक्त निगरानी की गई। पुलिस ने औपचारिक रिपोर्ट दर्ज की है और बैलून को दस्तावेजी प्रक्रिया के लिए जब्त कर लिया है। जानकारी को इंटेलिजेंस एजेंसियों के साथ भी साझा किया गया है।