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रीजनल विमानों से बदलेगा एविएशन सेक्टर का नक्शा, क्या है एम्ब्रेयर-अदाणी डील का पूरा मतलब?

Embbraer-Adani Mou
India Prepares for First Commercial Aircraft Manufacturing as Embraer Signs Landmark MoU with Adani Defence

Embbraer-Adani Mou: भारत के एविएशन सेक्टर के लिए 27 जनवरी का दिन बेहद खास माना जा रहा है। मंगलवार को ब्राजील की जानी-मानी ग्लोबल एयरोस्पेस कंपनी एम्ब्रेयर और अदाणी डिफेंस एंड एयरोस्पेस के बीच एक अहम एमओयू पर दस्तखत किए गए। इस समझौते का मकसद भारत में इंटीग्रेटेड रीजनल ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट इकोसिस्टम तैयार करना है।

यह समझौता इसलिए भी खास माना जा रहा है क्योंकि इसके जरिए भारत में पहली बार कमर्शियल फिक्स्ड-विंग एयरक्राफ्ट की फाइनल असेंबली लाइन (एफएएल) बनाई जाएगी। अब तक भारत में सैन्य विमान और हेलीकॉप्टर तो बनते रहे हैं, लेकिन यात्री विमानों की असेंबली देश के भीतर नहीं होती थी। (Embbraer-Adani Mou)

Embbraer-Adani Mou: आत्मनिर्भर भारत के विजन को मिलेगा नया आधार

यह एमओयू सरकार के आत्मनिर्भर भारत, मेक इन इंडिया और उड़ान योजना (यूडीएएन) के तहत किया गया है। सरकार लंबे समय से यह चाहती रही है कि भारत केवल विमान खरीदने वाला देश न रहे, बल्कि विमान बनाने वाले देशों की सूची में भी शामिल हो।

इस साझेदारी से भारत की पहचान एक एविएशन मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में उभर सकती है। साथ ही, ग्लोबल एविएशन सप्लाई चेन में भारत की भागीदारी भी मजबूत होगी। (Embbraer-Adani Mou)

रीजनल एयरक्राफ्ट पर रहेगा मुख्य फोकस

दोनों कंपनियों की इस साझेदारी का मुख्य फोकस रीजनल ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट पर रहेगा। इसमें एम्ब्रेयर के आधुनिक ई-190-ई2 और ई-195-ई2 जैसे विमान शामिल हैं, जो आमतौर पर 70 से 150 यात्रियों को ढो सकते हैं।

भारत में जहां छोटे और मध्यम शहरों के बीच हवाई कनेक्टिविटी तेजी से बढ़ रही है, ऐसे विमानों की मांग आने वाले वर्षों में काफी बढ़ने वाली है। ये विमान कम रनवे वाले एयरपोर्ट्स से भी ऑपरेट किए जा सकते हैं, जिससे टियर-2 और टियर-3 शहरों को फायदा मिलेगा। (Embbraer-Adani Mou)

फाइनल असेंबली लाइन क्यों है अहम

फाइनल असेंबली लाइन का मतलब होता है कि विमान के अलग-अलग हिस्सों को एक ही स्थान पर लाकर पूरा एयरक्राफ्ट तैयार किया जाए। इस एमओयू के तहत शुरुआत में विमानों की असेंबली भारत में की जाएगी और बाद में धीरे-धीरे इंडिजनाइजेशन बढ़ाया जाएगा।

आने वाले समय में ज्यादा से ज्यादा पार्ट्स और कंपोनेंट्स भारत में ही बनाए जाने की योजना है। इससे देश में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर होगा और स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग क्षमता मजबूत होगी। (Embbraer-Adani Mou)

सप्लाई चेन और रोजगार के नए मौके

इस प्रोजेक्ट के जरिए भारत में एक मजबूत एविएशन सप्लाई चेन तैयार की जाएगी। इसमें स्थानीय उद्योगों, एमएसएमई और निजी कंपनियों को जोड़ा जाएगा। इसका सीधा असर रोजगार पर पड़ेगा।

एविएशन मैन्युफैक्चरिंग, इंजीनियरिंग, क्वालिटी कंट्रोल और टेक्निकल सपोर्ट जैसे क्षेत्रों में हजारों हाई-स्किल नौकरियां पैदा होने की संभावना है। इससे न सिर्फ युवाओं को अवसर मिलेंगे, बल्कि भारत का स्किल बेस भी मजबूत होगा। (Embbraer-Adani Mou)

मेंटेनेंस और ट्रेनिंग इकोसिस्टम भी होगा तैयार

यह साझेदारी केवल विमान बनाने तक सीमित नहीं है। इसके तहत भारत में एमआरओ यानी मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल सुविधाएं विकसित करने की भी योजना है। इससे भारतीय एयरलाइंस को विमान मेंटेनेंस के लिए विदेशों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।

इसके साथ ही पायलट और टेक्नीशियन ट्रेनिंग प्रोग्राम्स भी शुरू किए जाएंगे, ताकि रीजनल एविएशन सेक्टर की बढ़ती जरूरतों को पूरा किया जा सके। (Embbraer-Adani Mou)

भारत को रीजनल विमानों की जरूरत क्यों

भारत आज दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा घरेलू एविएशन बाजार है, लेकिन इसके बावजूद कई छोटे शहर अभी भी सीधे हवाई नेटवर्क से नहीं जुड़े हैं। बड़े विमानों को हर रूट पर चलाना व्यावहारिक नहीं होता और ऑपरेशनल लागत भी ज्यादा आती है।

रीजनल एयरक्राफ्ट इस समस्या को दूर कर सकते हैं। उड़ान योजना के तहत छोटे शहरों को जोड़ने का लक्ष्य पहले से तय है और एम्ब्रेयर-अदाणी की यह साझेदारी इस योजना को जमीन पर उतारने में मददगार साबित हो सकती है। (Embbraer-Adani Mou)

अदाणी और एम्ब्रेयर दोनों को होगा फायदा

अदाणी ग्रुप पहले से ही एयरपोर्ट ऑपरेशन, डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग और ड्रोन सेक्टर में सक्रिय है। इस साझेदारी उन्हें कमर्शियल एविएशन मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में मजबूत पहचान दिला सकती है।

वहीं एम्ब्रेयर के लिए भारत एक तेजी से बढ़ता हुआ बाजार है। भारत में पहले से ही 50 से अधिक एम्ब्रेयर विमान ऑपरेट हो रहे हैं। इस करार से कंपनी को भारत में लंबे समय तक टिके रहने और विस्तार करने का मौका मिलेगा।

वहीं, इस एमओयू से भारत और ब्राजील के बीच रणनीतिक और औद्योगिक रिश्ते भी मजबूत होंगे। दोनों देश अब एविएशन और डिफेंस जैसे अहम सेक्टर में साझेदारी बढ़ाएंगे। (Embbraer-Adani Mou)

क्या है रीआर्म इनिशिएटिव? क्यों यूरोप फिर से हथियारों पर झोंक रहा है अरबों यूरो और कैसे भारत बन रहा है बड़ा पार्टनर

ReArm Initiative explainer
What is the EU’s ReArm Initiative (Readiness 2030) and Why India is Emerging as a Key Defence Partner

ReArm Initiative explainer: यूरोप एक बार फिर अपने सिक्योरिटी स्ट्रक्चर को नए सिरे से खड़ा करने की तैयारी में है। दशकों तक शांति, कूटनीति और अमेरिका की सुरक्षा के भरोसे रहने के बाद अब यूरोपीय संघ ने साफ संकेत दे दिया है कि वह अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी खुद उठाना चाहता है। शीत युद्ध के बाद लंबे समय तक यूरोपीय देशों ने यह मान लिया था कि बड़े युद्ध अब अतीत का हिस्सा बन चुके हैं और भविष्य में कूटनीति, आर्थिक साझेदारी और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं ही सुरक्षा की गारंटी होंगी। इसी भरोसे यूरोप ने न सिर्फ अपने रक्षा खर्च में कटौती की, बल्कि अमेरिका और नाटो की सुरक्षा छतरी पर निर्भरता भी बढ़ा दी।

लेकिन बीते कुछ वर्षों में बदले वैश्विक हालात ने इस सोच को पूरी तरह झकझोर दिया। रूस-यूक्रेन युद्ध, चीन की बढ़ती सैन्य ताकत, साइबर हमलों का खतरा और अमेरिका की बदलती प्राथमिकताओं ने यूरोप को यह एहसास करा दिया कि अब अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी उसे खुद उठानी होगी। इसी बदली हुई सोच से जन्म हुआ है ‘रीआर्म इनिशिएटिव’, जिसे अब आधिकारिक तौर पर रीडिनेस 2030 (Readiness 2030) कहा जाता है। (ReArm Initiative explainer)

यह पहल सिर्फ हथियार खरीदने या सेना मजबूत करने तक सीमित नहीं है। यह यूरोप की पूरी सुरक्षा सोच, रक्षा उद्योग, सप्लाई चेन और वैश्विक रणनीति को नए सिरे से गढ़ने की कोशिश है। इस प्रक्रिया में भारत भी एक अहम और भरोसेमंद भागीदार के रूप में उभरता दिखाई दे रहा है। (ReArm Initiative explainer)

ReArm Initiative explainer: रीआर्म इनिशिएटिव क्या है

रीआर्म इनिशिएटिव का पूरा नाम रीआर्म यूरोप प्लान / रीडिनेस 2030 है। इस योजना को यूरोपीय कमीशन की प्रेसिडेंट उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने पेश किया था। शुरुआत में इसका नाम “रीआर्म यूरोप” रखा गया था, लेकिन इटली और स्पेन जैसे कुछ देशों को यह नाम जरूरत से ज्यादा आक्रामक लगा। उनका तर्क था कि “रीआर्म” शब्द यूरोप की शांत छवि को नुकसान पहुंचा सकता है।

इसी आपत्ति के बाद इस योजना को रीडिनेस 2030 के नाम से रीब्रैंड किया गया। नाम बदला, लेकिन उद्देश्य वही रहा। इस पहल का सीधा और स्पष्ट लक्ष्य है कि वर्ष 2030 तक यूरोप को सैन्य रूप से पूरी तरह तैयार किया जाए, ताकि वह किसी भी बड़े खतरे का सामना अपने दम पर कर सके। (ReArm Initiative explainer)

यूरोप को अचानक हथियारों की जरूरत क्यों पड़ी

पिछले तीन से चार दशकों में यूरोप ने डिफेंस को प्राथमिकता सूची में काफी नीचे रखा। शीत युद्ध के खत्म होने के बाद यह धारणा मजबूत हो गई थी कि अब यूरोप में बड़े पैमाने पर युद्ध की संभावना नहीं है। इसी सोच के चलते कई देशों ने अपनी सेनाओं का साइज घटाया, हथियारों के भंडार कम किए और रक्षा बजट में लगातार कटौती की।

लेकिन वर्ष 2022 में शुरू हुआ रूस-यूक्रेन युद्ध इस सोच पर करारा तमाचा साबित हुआ। इस युद्ध ने यह साफ कर दिया कि यूरोप के पास न तो पर्याप्त गोला-बारूद है और न ही लंबे समय तक युद्ध झेलने की तैयारी। इसके साथ ही यह भी उजागर हुआ कि यूरोप अब भी अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका और नाटो पर जरूरत से ज्यादा निर्भर है।

तीसरा बड़ा सबक यह था कि आधुनिक युद्ध सिर्फ टैंक और सैनिकों तक सीमित नहीं रह गए हैं। साइबर अटैक, ड्रोन, मिसाइल और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर अब युद्ध का मुख्य हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे में पुरानी रणनीतियां और कमजोर सिक्योरिटी स्ट्रक्चर यूरोप के लिए बड़ा जोखिम बन गए। (ReArm Initiative explainer)

इसी बीच अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की वापसी और उनकी नई नेशनल डिफेंस स्ट्रैटेजी ने यूरोप की चिंता और बढ़ा दी। अमेरिका ने साफ कर दिया कि उसकी पहली प्राथमिकता अब चीन और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र है, न कि यूरोप। इसका मतलब यह था कि भविष्य में यूरोप को अमेरिकी सैन्य मदद सीमित तौर पर ही मिल सकती है। (ReArm Initiative explainer)

इन सभी कारणों ने मिलकर यूरोप को मजबूर कर दिया कि उसे अब खुद अपने पैरों पर खड़ा होना होगा।

रीआर्म इनिशिएटिव का सबसे बड़ा लक्ष्य

रीआर्म इनिशिएटिव का सबसे बड़ा और सबसे महत्वाकांक्षी लक्ष्य है लगभग 800 बिलियन यूरो, यानी करीब 80 लाख करोड़ रुपये का डिफेंस इन्वेस्टमेंट जुटाना। यह राशि किसी एक बजट या एक स्रोत से नहीं आएगी। इसके लिए अलग-अलग वित्तीय रास्ते अपनाए जाएंगे, जिनमें सरकारी बजट, यूरोपीय संस्थानों की फंडिंग, लोन और प्राइवेट निवेश शामिल होंगे।

यूरोपीय संघ का मानना है कि अगर उसे 2030 तक पूरी तरह तैयार होना है, तो उसे रक्षा क्षेत्र में उसी स्तर का निवेश करना होगा, जैसा शीत युद्ध के दौर में किया गया था। (ReArm Initiative explainer)

रक्षा खर्च बढ़ाने की नई सोच

रीआर्म इनिशिएटिव के तहत यूरोपीय देशों से कहा गया है कि वे अपने रक्षा खर्च को धीरे-धीरे बढ़ाकर जीडीपी का 3.5 फीसदी तक ले जाएं। वर्ष 2024 में यह औसतन सिर्फ 1.9 फीसदी थी। यूरोप अब इस निष्कर्ष पर पहुंच चुका है कि मजबूत अर्थव्यवस्था और सुरक्षित समाज के लिए मजबूत सेना भी जरूरी है। बिना पर्याप्त रक्षा क्षमता के न तो व्यापार सुरक्षित रह सकता है और न ही नागरिकों की सुरक्षा की गारंटी दी जा सकती है। (ReArm Initiative explainer)

इस योजना के पांच बड़े स्तंभ

सेफ (SAFE) और संयुक्त खरीद की रणनीति

रीआर्म इनिशिएटिव का एक अहम हिस्सा है सेफ यानी सिक्योरिटी एक्शन फॉर यूरोप। इसके तहत यूरोपीय संघ कैपिटल मार्केट से करीब 150 बिलियन यूरो तक का लोन जुटाएगा। यह पैसा सदस्य देशों को दिया जाएगा ताकि वे मिलकर हथियार और रक्षा सिस्टम खरीद सकें।

इस संयुक्त खरीद का मकसद लागत कम करना, टैक्निकल स्टैंडर्ड्स एक जैसे रखना और आपसी तालमेल बढ़ाना है। मिसाइल डिफेंस सिस्टम, ड्रोन, एयर डिफेंस और साइबर सिक्योरिटी जैसे क्षेत्रों में इसका खास फोकस रहेगा। (ReArm Initiative explainer)

फिस्कल नियमों में छूट और ज्यादा खर्च की आजादी

यूरोपीय संघ के सख्त वित्तीय नियम आमतौर पर देशों को ज्यादा घाटा करने से रोकते हैं। लेकिन रीआर्म इनिशिएटिव के तहत रक्षा खर्च को लेकर इन नियमों में अस्थायी छूट दी गई है।

अब सदस्य देश बिना नियम तोड़े अपने जीडीपी का अतिरिक्त 1.5 फीसदी डिफेंस पर खर्च कर सकेंगे। इससे करीब 650 बिलियन यूरो का अतिरिक्त रक्षा निवेश संभव हो सकेगा। (ReArm Initiative explainer)

कोहेशन फंड और यूरोपियन इन्वेस्टमेंट बैंक की नई भूमिका

अब तक यूरोपीय संघ के कोहेशन फंड मुख्य रूप से क्षेत्रीय और सामाजिक विकास के लिए इस्तेमाल होते थे। लेकिन नई रणनीति के तहत इन फंड्स का कुछ हिस्सा रक्षा से जुड़े प्रोजेक्ट्स में भी लगाया जा सकेगा।

इसके साथ ही यूरोपियन इन्वेस्टमेंट बैंक को रक्षा कंपनियों को ज्यादा लोन देने की अनुमति दी गई है। यह एक बड़ा बदलाव है, क्योंकि पहले यह बैंक रक्षा क्षेत्र से दूरी बनाए रखता था। (ReArm Initiative explainer)

प्राइवेट निवेश को रक्षा क्षेत्र से जोड़ने की कोशिश

रीआर्म इनिशिएटिव सिर्फ सरकारी पैसे पर निर्भर नहीं रहना चाहता। यूरोपीय संघ चाहता है कि पेंशन फंड, इंश्योरेंस कंपनियां और बड़े निवेशक भी रक्षा उद्योग में निवेश करें।

इसके लिए सेविंग्स एंड इन्वेस्टमेंट यूनियन जैसे प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल किया जा रहा है, ताकि प्राइवेट कैपिटल को डिफेंस सेक्टर की ओर मोड़ा जा सके। (ReArm Initiative explainer)

यूरोपीय रक्षा उद्योग को आत्मनिर्भर बनाना

यूरोपीय संघ ने इसके लिए व्हाइट पेपर ऑन यूरोपियन डिफेंस – रीडिनेस 2030 जारी किया है। इसका उद्देश्य यूरोप के भीतर ही मिसाइल डिफेंस, आर्टिलरी, ड्रोन, एयर डिफेंस, स्पेस और साइबर डिफेंस जैसी क्षमताओं को मजबूत करना है।

इसके साथ ही यूक्रेन की रक्षा उद्योग को भी यूरोपीय रक्षा ढांचे से जोड़ा जा रहा है, ताकि युद्ध के अनुभव का इस्तेमाल पूरे यूरोप की सुरक्षा के लिए किया जा सके। (ReArm Initiative explainer)

अमेरिका की नई रणनीति से बढ़ी यूरोप की चिंता

जनवरी 2026 में अमेरिका ने अपनी नई नेशनल डिफेंस स्ट्रैटेजी जारी की, जिसमें चीन को सबसे बड़ा रणनीतिक चुनौती बताया गया। इस दस्तावेज में साफ किया गया कि अमेरिका की प्राथमिकता अब इंडो-पैसिफिक क्षेत्र है।

यूरोप के लिए यह एक स्पष्ट संकेत था कि भविष्य में उसे अपनी पारंपरिक रक्षा की जिम्मेदारी खुद उठानी होगी। यही बयान यूरोप के लिए एक बड़े वेक-अप कॉल की तरह साबित हुआ। (ReArm Initiative explainer)

भारत का एंट्री पॉइंट कहां है

27 जनवरी यानी आज ही भारत और यूरोपीय संघ के बीच सिक्योरिटी एंड डिफेंस पार्टनरशिप पर हस्ताक्षर हुए। इस मौके पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने साफ कहा कि भारत की रक्षा इंडस्ट्री रीआर्म इनिशिएटिव में अहम भूमिका निभा सकती है।

यूरोपीय संघ अब हथियारों के लिए सीमित सप्लायर्स पर निर्भर नहीं रहना चाहता। वह सप्लाई चेन को डाइवर्सिफाई करना चाहता है और यहीं भारत एक भरोसेमंद साझेदार के रूप में सामने आता है।

भारत और यूरोप का पुराना रक्षा रिश्ता

भारत और यूरोप के बीच रक्षा सहयोग कोई नई बात नहीं है। राफेल फाइटर जेट, स्कॉर्पीन सबमरीन और सी-295 ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट जैसे प्रोजेक्ट पहले से इस रिश्ते का हिस्सा हैं।

अब फर्क यह है कि भारत सिर्फ हथियार खरीदने वाला देश नहीं, बल्कि यूरोपीय रक्षा सप्लाई चेन का सक्रिय हिस्सा बनता जा रहा है।

इसी के साथ-साथ भारत की निजी रक्षा कंपनियां भी यूरोप की मदद कर रही हैं। भारतीय कंपनियां यूरोपीय देशों को गोला-बारूद, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, नौसैनिक जहाजों की मरम्मत सेवाएं और नए तरह के बिना पायलट वाले सिस्टम (अनमैन्ड सिस्टम) सप्लाई कर रही हैं। दरअसल, यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोप ने तेजी से अपने हथियार और सैन्य तैयारियां बढ़ानी शुरू की हैं, लेकिन इस दौरान वहां इन चीजों की कमी सामने आई है। ऐसे में भारत की निजी रक्षा कंपनियां इन जरूरतों को पूरा करने में अहम भूमिका निभा रही हैं। (ReArm Initiative explainer)

इंडियन ओशन में यूरोप की मौजूदगी

इस साझेदारी का एक अहम नतीजा यह भी है कि यूरोपीय संघ अब अपना एक लायजन ऑफिसर भारतीय नौसेना के इंफॉर्मेशन फ्यूजन सेंटर–इंडियन ओशन रीजन (आईएफसी-आईओआर) गुरुग्राम में तैनात करेगा।

इससे काउंटर पाइरेसी, समुद्री सुरक्षा और खतरे के आकलन में भारत और यूरोप के बीच तालमेल और मजबूत होगा।

रीआर्म इनिशिएटिव पर उठते सवाल

हर बड़ी योजना की तरह रीआर्म इनिशिएटिव पर भी सवाल उठ रहे हैं। कुछ देशों को चिंता है कि इससे सोशल और ग्रीन प्रोजेक्ट्स के लिए फंड कम हो सकता है। कुछ को डर है कि यूरोपीय संघ जरूरत से ज्यादा सेंट्रलाइज्ड हो रहा है।

इसके बावजूद ज्यादातर यूरोपीय देश मानते हैं कि मौजूदा वैश्विक हालात में यह कदम टालना संभव नहीं था। (ReArm Initiative explainer)

जब लॉ ग्रेजुएट्स ने संभाली परेड की कमान, गणतंत्र दिवस पर वकील अफसरों ने लीड किए मिलिट्री कंटिंजेंट

Republic Day 2026 lawyer officers
Law Graduates Lead Military Contingents at Republic Day Parade 2026, Creating History

Republic Day 2026 lawyer officers: 77वें गणतंत्र दिवस परेड में इस बार कर्तव्य पथ पर सिर्फ हथियारों और सैन्य ताकत की झलक ही नहीं दिखी, बल्कि भारतीय सेनाओं की बदलती सोच और नई पीढ़ी की तस्वीर भी सामने आई। गणतंत्र दिवस परेड में एक खास बात यह रही कि दो ऐसे सैन्य अधिकारी महत्वपूर्ण कंटिंजेंट्स का नेतृत्व करते नजर आए, जिनकी पढ़ाई-लिखाई का बैकग्राउंड कानून यानी लॉ से जुड़ा हुआ है। (Republic Day 2026 lawyer officers)

Republic Day 2026 lawyer officers: जब लॉ यूनिवर्सिटी से निकलकर पहनी सेना की वर्दी

इस गणतंत्र दिवस परेड में लेफ्टिनेंट अमित चौधरी और असिस्टेंट कमांडेंट लक्षिता सिंह दो ऐसे नाम रहे, जिन्होंने अपने नेतृत्व से लोगों का ध्यान खींचा। दोनों ने देश की सेवा के लिए लॉ की पढ़ाई के बाद सैन्य सेवा का रास्ता चुना और आज वे उसी कर्तव्य पथ पर मार्चिंग कंटिंजेंट्स का नेतृत्व करते दिखे। (Republic Day 2026 lawyer officers)

लेफ्टिनेंट अमित चौधरी: कानून से सीमा सुरक्षा तक का सफर

लेफ्टिनेंट अमित चौधरी ने मिक्स्ड स्काउट्स मार्चिंग कंटिंजेंट का नेतृत्व किया। यह कंटिंजेंट खास इसलिए था क्योंकि इसमें भारत की ऊंचाई वाले सीमावर्ती इलाकों में तैनात स्काउट्स यूनिट्स शामिल थीं।

लेफ्टिनेंट अमित ने नेशनल लॉ इंस्टीट्यूट यूनिवर्सिटी (एनएलआईयू), भोपाल से कानून की पढ़ाई की है। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने भारतीय सेना की जज एडवोकेट जनरल (जैग) ब्रांच को चुना, जो सेना की कानूनी शाखा होती है। जैग ऑफिसर्स सेना को कानूनी सलाह देने, कोर्ट मार्शल और मिलिट्री लॉ से जुड़े मामलों को संभालने का काम करते हैं। (Republic Day 2026 lawyer officers)

खास बात यह है कि लेफ्टिनेंट अमित दूसरी पीढ़ी के आर्मी ऑफिसर हैं। उनके पिता भी 1990 में गणतंत्र दिवस परेड में हिस्सा ले चुके हैं। बचपन से परेड देखना, मार्चिंग की आवाज सुनना और सेना का माहौल उनके जीवन का हिस्सा रहा। 2026 में वही सपना उन्होंने खुद पूरा किया। (Republic Day 2026 lawyer officers)

मिक्स्ड स्काउट्स कंटिंजेंट की खासियत

लेफ्टिनेंट अमित जिस कंटिंजेंट का नेतृत्व कर रहे थे, उसमें अरुणाचल स्काउट्स, गढ़वाल स्काउट्स, लद्दाख स्काउट्स, सिक्किम स्काउट्स, डोगरा स्काउट्स और कुमाऊं स्काउट्स जैसी यूनिट्स शामिल थीं। ये यूनिट्स ऊंचाई वाले और कठिन इलाकों में काम करने के लिए जानी जाती हैं।

इनका काम सीमा पर निगरानी रखना, दुर्गम इलाकों में गश्त करना और जरूरत पड़ने पर तेजी से कार्रवाई करना होता है। परेड में यह कंटिंजेंट पहली बार इस मिश्रित रूप में शामिल हुआ और उसने दृढ़ता और अनुशासन का संदेश दिया। (Republic Day 2026 lawyer officers)

लॉ ग्रेजुएट हैं कोस्ट गार्ड में असिस्टेंट कमांडेंट लक्षिता सिंह

गणतंत्र दिवस परेड में दूसरा खास चेहरा रहीं असिस्टेंट कमांडेंट लक्षिता सिंह। उन्होंने इंडियन कोस्ट गार्ड के महिला कंटिंजेंट का नेतृत्व करने वाली टीम का हिस्सा बनकर परेड में मार्च किया।

लक्षिता ने ओ.पी. जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल से कानून की पढ़ाई की है। इसके बाद उन्होंने इंडियन कोस्ट गार्ड जॉइन किया और आज असिस्टेंट कमांडेंट के पद पर देश की समुद्री सीमाओं की सुरक्षा में तैनात हैं।

यह कोस्ट गार्ड का ऑल-वुमन कंटिंजेंट था, जिसने आत्मविश्वास और सटीक कदमताल के साथ कर्तव्य पथ पर मार्च किया। यह दृश्य न सिर्फ महिला सशक्तिकरण का प्रतीक बना, बल्कि यह भी दिखाया कि आज महिलाएं हर मोर्चे पर नेतृत्व की भूमिका निभा रही हैं। (Republic Day 2026 lawyer officers)

समुद्री सुरक्षा की जिम्मेदारी

इंडियन कोस्ट गार्ड का काम समुद्र में देश की सुरक्षा करना, तटीय इलाकों की निगरानी रखना, सर्च एंड रेस्क्यू ऑपरेशन चलाना और तस्करी व समुद्री अपराधों को रोकना होता है। परेड में इस कंटिंजेंट की मौजूदगी ने समुद्री सुरक्षा के महत्व को रेखांकित किया।

77वें गणतंत्र दिवस परेड की थीम “वंदे मातरम के 150 वर्ष” पर आधारित थी। परेड में ऑपरेशन सिंदूर से जुड़े हथियार, आधुनिक सैन्य प्लेटफॉर्म और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की झलक भी देखने को मिली।

लेकिन इन सबके बीच लॉ ग्रेजुएट ऑफिसर्स का नेतृत्व यह संदेश दे गया कि भारतीय सेनाएं अब विविध पृष्ठभूमि वाले युवाओं के लिए भी खुली हैं। आज सेना में केवल फिजिकल फिटनेस ही नहीं, बल्कि सोच, शिक्षा और बहुमुख प्रतिभा के धनी स्टूडेंट्स को भी महत्व दिया जा रहा है। (Republic Day 2026 lawyer officers)

रक्षा मंत्री बोले- ‘सर्वाइवल ऑफ द फास्टेस्ट’ का दौर, ऑपरेशन सिंदूर से मिला बड़ा सबक

DRDO indigenous defence systems
Operation Sindoor proved indigenous defence systems are strengthening India’s operational readiness: Rajnath Singh

DRDO indigenous defence systems: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि ऑपरेशन सिंदूर ने साफ तौर पर यह साबित कर दिया है कि भारत के स्वदेशी रक्षा सिस्टम अब देश की ऑपरेशनल तैयारी को मजबूत कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भरता अब केवल एक सरकारी नीति नहीं रही, बल्कि यह देश की राष्ट्रीय सोच बन चुकी है।

डीआरडीओ के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले वैज्ञानिकों और तकनीकी कर्मचारियों को संबोधित करते हुए रक्षा मंत्री ने कहा कि यह बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में आत्मनिर्भर भारत की दिशा में जो प्रयास किए गए हैं, उनका असर अब जमीन पर साफ दिखाई दे रहा है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान युद्ध क्षेत्र में डीआरडीओ की विकसित तकनीकों का प्रभावी इस्तेमाल हुआ और इससे भारतीय सशस्त्र बलों की ताकत और भरोसा दोनों बढ़े। (DRDO indigenous defence systems)

DRDO indigenous defence systems: युद्ध में काम आई स्वदेशी तकनीक

रक्षा मंत्री ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान यह साफ हुआ कि भारत अब केवल विदेश से खरीदे हथियारों पर निर्भर नहीं है। स्वदेशी हथियार प्रणालियां, सेंसर, मिसाइल, ड्रोन और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम्स ने भारतीय सेना, वायुसेना और नौसेना की तैयारी को और मजबूत किया। उन्होंने डीआरडीओ की तारीफ करते हुए कहा कि संगठन रक्षा क्षेत्र के तेजी से बदलते स्वरूप में अहम भूमिका निभा रहा है।

उन्होंने कहा कि आज के दौर में तकनीक बहुत तेजी से बदल रही है। जो तकनीक आज नई लगती है, वह चार-पांच साल में पुरानी हो सकती है। ऐसे में केवल सबसे ताकतवर बने रहना काफी नहीं है, बल्कि सबसे तेज सोचने और काम करने वाला देश ही आगे रहेगा। (DRDO indigenous defence systems)

‘सर्वाइवल ऑफ द फास्टेस्ट’ का दौर

राजनाथ सिंह ने वैज्ञानिकों से कहा कि आज के समय में हमें ‘सर्वाइवल ऑफ द फास्टेस्ट’ की सोच के साथ आगे बढ़ना होगा, न कि केवल ‘सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट’ पर निर्भर रहना होगा। उन्होंने कहा कि जो देश तेजी से सोचता है, जल्दी फैसले लेता है और नई तकनीक को तुरंत तैनात करता है, वही युद्ध और सुरक्षा के क्षेत्र में आगे रहता है।

उन्होंने डीआरडीओ के वैज्ञानिकों से अपील की कि वे इनोवेशन करें, तेजी से काम करें और जोखिम लेने से न डरें। रक्षा मंत्री ने कहा कि रिसर्च में असफलताएं आती हैं, लेकिन उनसे सीखना जरूरी है। (DRDO indigenous defence systems)

रिसर्च से तैनाती तक समय घटाने की जरूरत

रक्षा मंत्री ने इस बात पर खास जोर दिया कि रिसर्च से प्रोटोटाइप, प्रोटोटाइप से टेस्टिंग और टेस्टिंग से तैनाती के बीच लगने वाला समय कम किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि सशस्त्र बलों में किसी भी सिस्टम की समय पर शामिल होना ही सबसे बड़ा पैमाना होना चाहिए।

राजनाथ सिंह ने कहा कि डीआरडीओ आमतौर पर डिजाइन और प्रोटोटाइप पर ध्यान देता है, जबकि उत्पादन का काम उद्योग करता है। लेकिन इस दोनों के बीच की दूरी को कम करना जरूरी है। उन्होंने सुझाव दिया कि अंतरराष्ट्रीय मॉडल की तरह को-डेवलपमेंट अप्रोच अपनाई जा सकती है, जिसमें इंडस्ट्री को शुरुआत से ही डिजाइन और विकास प्रक्रिया में शामिल किया जाए। (DRDO indigenous defence systems)

निजी क्षेत्र, स्टार्टअप और अकादमिक संस्थानों से साझेदारी

रक्षा मंत्री ने कहा कि अब समय आ गया है कि डीआरडीओ पारंपरिक क्षेत्रों से आगे बढ़े और पब्लिक सेक्टर, प्राइवेट सेक्टर, एमएसएमई, स्टार्टअप और अकादमिक संस्थानों के साथ मिलकर काम करे। उन्होंने कहा कि लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट तेजस इसका सबसे अच्छा उदाहरण है, जो डीआरडीओ और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के सहयोग से संभव हुआ।

उन्होंने कहा कि सरकार का समर्थन तभी सार्थक होगा, जब डीआरडीओ एकाधिकार वाले रिसर्च मॉडल से निकलकर सहयोग आधारित इकोसिस्टम की ओर बढ़े। इससे ही आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को हासिल किया जा सकेगा। (DRDO indigenous defence systems)

रक्षा निर्यात में रिकॉर्ड बढ़ोतरी

राजनाथ सिंह ने बताया कि आत्मनिर्भरता के प्रयासों के चलते भारत का रक्षा निर्यात पिछले एक दशक में तेजी से बढ़ा है। वर्ष 2014 में जहां रक्षा निर्यात 1,000 करोड़ रुपये से भी कम था, वहीं आज यह बढ़कर लगभग 24,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है।

उन्होंने कहा कि सरकार ने 2029-30 तक 50,000 करोड़ रुपये के रक्षा निर्यात का लक्ष्य तय किया है। इसके लिए डीआरडीओ को डिजाइन के शुरुआती चरण से ही निर्यात बाजार को ध्यान में रखना होगा। खासकर ड्रोन, रडार, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम और गोला-बारूद जैसे क्षेत्रों में भारत के पास बड़ी संभावनाएं हैं।

रक्षा मंत्री ने कहा कि निर्यात पर ध्यान देने से लागत की भरपाई होती है, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भरोसा बढ़ता है और रणनीतिक साझेदारियां मजबूत होती हैं। (DRDO indigenous defence systems)

वैज्ञानिक ही डीआरडीओ की असली ताकत

राजनाथ सिंह ने डीआरडीओ के वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और तकनीशियनों को संगठन की असली ताकत बताया। उन्होंने कहा कि इन लोगों को सीखने के अवसर देने के साथ-साथ नेतृत्व की जिम्मेदारियां भी दी जानी चाहिए। साथ ही यह भरोसा भी होना चाहिए कि उनके विचारों को सुना जाएगा।

उन्होंने कहा कि रिसर्च में असफलता कोई अंत नहीं होती, बल्कि वह सीखने का मौका होती है। जरूरी यह है कि आगे बढ़ते रहें।

इस मौके पर डीआरडीओ ने अपने समर्पित वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों को सम्मानित किया। डॉ. भगवंतम टेक्नोलॉजी लीडरशिप अवॉर्ड 2024 हैदराबाद स्थित एडवांस्ड सिस्टम्स लैबोरेटरी के निदेशक बी. वी. पापाराव को दिया गया। उन्हें अग्नि मिसाइल और लंबी दूरी की हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल के लिए एमआईआरवी तकनीक के विकास में योगदान के लिए सम्मानित किया गया। (DRDO indigenous defence systems)

डॉ. नागचौधुरी लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड 2024 चेन्नई स्थित सीवीआरडीई के पूर्व वैज्ञानिक डॉ. बालगुरु वी को दिया गया। उन्होंने एमबीटी अर्जुन एमके-1 और भारतीय लाइट टैंक ‘जोरावर’ जैसे अहम प्लेटफॉर्म को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इसके अलावा, तीन सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक उत्कृष्टता पुरस्कार और दो सर्वश्रेष्ठ तकनीकी उत्कृष्टता पुरस्कार भी प्रदान किए गए।

DRDO indigenous defence systems
Operation Sindoor proved indigenous defence systems are strengthening India’s operational readiness: Rajnath Singh

आकाश मिसाइल पर किताब का विमोचन

कार्यक्रम के दौरान ‘आकाश’ मिसाइल सिस्टम पर आधारित एक किताब का भी विमोचन किया गया। यह किताब आकाश मिसाइल के पहले प्रोजेक्ट डायरेक्टर डॉ. प्रह्लाद राम राव और पूर्व प्रोजेक्ट डायरेक्टर डॉ. जी. चंद्रमौली ने मिलकर लिखी है। यह किताब आकाश मिसाइल की यात्रा को अवधारणा से लेकर सफल तैनाती तक विस्तार से बताती है।

आकाश मिसाइल सिस्टम डीआरडीओ की वैज्ञानिक क्षमता और आत्मनिर्भर भारत की भावना का मजबूत प्रतीक माना जाता है। (DRDO indigenous defence systems)

हिंद महासागर में बढ़ेगी भारत-EU की ताकत; जर्मनी के बाद IFC-IOR में तैनात होगा यूरोपीय संघ का लायजन ऑफिसर

India EU defence cooperation
Raksha Mantri's meeting with the High Representative/Vice President of the European Union Commission held in New Delhi on January 27, 2026

India EU defence cooperation: भारतीय नौसेना और यूरोपीय संघ के बीच समुद्री सुरक्षा सहयोग अब एक नए स्तर पर पहुंचने जा रहा है। इंडियन ओशन रीजन में बढ़ती चुनौतियों और सुरक्षा जरूरतों को देखते हुए यूरोपीय संघ ने एक अहम फैसला लिया है। ईयू अब अपना एक लायजन ऑफिसर (एलओ) भारतीय नौसेना के गुरुग्राम स्थित इंफॉर्मेशन फ्यूजन सेंटर–इंडियन ओशन रीजन (आईएफसी-आईओआर) में तैनात करेगा। इस कदम से समुद्री निगरानी, सूचना साझा करने और साझा सुरक्षा प्रयासों को और मजबूती मिलने की उम्मीद है।

भारत और यूरोपीय संघ के बीच रक्षा और सुरक्षा सहयोग को लेकर 27 जनवरी को नई दिल्ली में एक अहम बैठक हुई। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने यूरोपीय संघ (ईयू) की हाई रिप्रेजेंटेटिव और यूरोपीय कमीशन की वाइस प्रेसिडेंट काजा कलास से मुलाकात की। इस दौरान दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय सुरक्षा, रक्षा उद्योग सहयोग और इंडियन ओशन रीजन में साझा रणनीति पर विस्तार से चर्चा की।

यह मुलाकात ऐसे समय में हुई है, जब भारत और यूरोपीय संघ अपने रिश्तों को सिर्फ कूटनीतिक स्तर तक सीमित न रखकर जमीन पर ठोस सहयोग में बदलने की कोशिश कर रहे हैं। रक्षा मंत्री ने साफ कहा कि भारत और ईयू लोकतंत्र, बहुलवाद और कानून के शासन जैसे मूल्यों को साझा करते हैं, और यही साझा सोच दोनों को एक मजबूत साझेदारी की ओर ले जाती है। (India EU defence cooperation)

India EU defence cooperation: रक्षा उद्योगों की साझेदारी पर जोर

बैठक के दौरान राजनाथ सिंह ने कहा कि भारतीय और यूरोपीय रक्षा उद्योगों को मिलकर काम करना चाहिए। उन्होंने इसे “लार्जर ग्लोबल गुड” यानी बड़े वैश्विक हित के लिए जरूरी बताया। रक्षा मंत्री के अनुसार, यह सहयोग भारत के आत्मनिर्भर भारत विजन के अनुरूप है और साथ ही यूरोपीय संघ की स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी यानी रणनीतिक आत्मनिर्भरता के लक्ष्य से भी मेल खाता है।

उन्होंने कहा कि अगर भारत और ईयू की रक्षा सप्लाई चेन एक-दूसरे से जुड़ती हैं, तो इससे एक भरोसेमंद और मजबूत डिफेंस इकोसिस्टम तैयार होगा। यह साझेदारी भविष्य की जरूरतों के हिसाब से सैन्य क्षमताएं विकसित करने में मदद करेगी और एक फोर्स मल्टीप्लायर की तरह काम करेगी। (India EU defence cooperation)

रीआर्म इनिशिएटिव’ में भारत की भूमिका

राजनाथ सिंह ने यह भी कहा कि भारत की रक्षा इंडस्ट्री यूरोपीय संघ की ‘रीआर्म इनिशिएटिव’ में अहम भूमिका निभा सकती है। यूरोपीय संघ इस समय अपने रक्षा क्षेत्र में सप्लायर डाइवर्सिफिकेशन पर जोर दे रहा है, ताकि किसी एक देश पर निर्भरता कम की जा सके। ऐसे में भारत एक भरोसेमंद पार्टनर के रूप में उभर सकता है।

उन्होंने कहा कि भारत के पास आज रक्षा उत्पादन, मैन्युफैक्चरिंग और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में मजबूत आधार है, जिसे यूरोपीय जरूरतों के साथ जोड़ा जा सकता है। इससे दोनों पक्षों को फायदा होगा।

रक्षा मंत्री ने काजा कलास की भारत यात्रा को खास बताया, क्योंकि यह भारत के 77वें गणतंत्र दिवस के मौके पर हुई। उन्होंने कहा कि इस अवसर पर यूरोपीय संघ की मौजूदगी दोनों के बीच बढ़ते विश्वास और सहयोग का प्रतीक है।

काजा कलास ने भी गणतंत्र दिवस समारोह में शामिल होने पर खुशी जताई। उन्होंने कहा कि कर्तव्य पथ पर परेड में यूरोपीय संघ की भागीदारी उनके लिए गर्व का विषय है और यह भारत–ईयू रिश्तों की गहराई को दर्शाता है। (India EU defence cooperation)

India EU defence cooperation
India–EU Defence Cooperation Gains Momentum as EU to Deploy Liaison Officer at Indian Navy’s IFC-IOR

इंडियन ओशन रीजन में मिलकर काम करने पर सहमति

काजा कलास ने बैठक के दौरान कहा कि भारत और यूरोपीय संघ को इंडियन ओशन रीजन में मिलकर काम करना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह क्षेत्र ग्लोबल ट्रेड और समुद्री सुरक्षा के लिहाज से बेहद अहम है। दोनों पक्ष एक-दूसरे के अनुभव और बेस्ट प्रैक्टिस से सीख सकते हैं।

उन्होंने जॉइंट एक्सरसाइज के जरिए सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया। इससे न सिर्फ आपसी समझ मजबूत होगी, बल्कि समुद्री खतरों से निपटने की क्षमता भी बढ़ेगी। (India EU defence cooperation)

भारतीय नौसेना के IFC-IOR में ईयू की मौजूदगी

इस बैठक में एक और अहम मुद्दे पर सहमति बनी। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने यूरोपीय संघ के उस प्रस्ताव का स्वागत किया, जिसके तहत ईयू एक लायजन ऑफिसर (एलओ) को भारतीय नौसेना के इंफॉर्मेशन फ्यूजन सेंटर–इंडियन ओशन रीजन (आईएफसी-आईओआर), गुरुग्राम में तैनात करेगा।

यह लायजन ऑफिसर समुद्री डकैती यानी काउंटर पाइरेसी और इंडियन ओशन रीजन में उभरते खतरों के आकलन में भारतीय नौसेना के साथ बेहतर तालमेल बनाएगा। इससे ऑपरेशनल कोऑर्डिनेशन मजबूत होगा और दोनों पक्षों के बीच रियल टाइम जानकारी साझा करना आसान होगा।

इससे पहले जर्मनी के चांसलर की भारत यात्रा के दौरान इंडियन ओशन रीजन में साझा सुरक्षा और सूचना साझेदारी को लेकर अहम सहमति बनी थी। जर्मनी ने भी अपना लायजन ऑफिसर आईएफसी-आईओआर में तैनात करने पर सहमति दी थी। (India EU defence cooperation)

क्या है आईएफसी-आईओआर

इंफॉर्मेशन फ्यूजन सेंटर–इंडियन ओशन रीजन (आईएफसी-आईओआर) भारतीय नौसेना का एक बेहद अहम केंद्र है, जिसकी स्थापना समुद्री सुरक्षा को मजबूत करने के लिए की गई है। यह केंद्र गुरुग्राम में स्थित है और इसका मुख्य काम हिंद महासागर क्षेत्र में होने वाली हर तरह की गतिविधियों पर नजर रखना है।

आईएफसी-आईओआर के जरिए अलग-अलग देशों की नौसेनाएं और समुद्री एजेंसियां आपस में जानकारी साझा करती हैं। यहां से जहाजों की आवाजाही, समुद्री डकैती, तस्करी, आतंकवादी गतिविधियों और संदिग्ध मूवमेंट पर लगातार निगरानी रखी जाती है। अगर किसी इलाके में कोई खतरा दिखता है, तो उसकी जानकारी तुरंत संबंधित देशों तक पहुंचाई जाती है। (India EU defence cooperation)

आईएफसी-आईओआर को भारतीय नौसेना द्वारा होस्ट किया जाता है और इसमें मुख्य रूप से भारतीय नौसेना के अधिकारी काम करते हैं। इसके साथ ही केंद्र में अंतरराष्ट्रीय लियाजन अफसर भी तैनात होते हैं, जो अन्य देशों से आते हैं। ये साझेदारी भागीदार देशों के प्रतिनिधि होते हैं और साझा समुद्री सुरक्षा जानकारी और सहयोग को बढ़ाते हैं।

अब तक आईएफसी-आईओआर में लगभग 12 देशों के लियाजन अफसर तैनात रहे हैं। इनमें ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, इटली, जापान, मालदीव, मॉरीशस, म्यांमार, श्रीलंका, सेशेल्स, सिंगापुर, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका के अफसर शामिल रहे हैं। केंद्र में तकनीकी और एनालिटिकल टीमों के सदस्य भी काम करते हैं, जो 24×7 समुद्री जानकारी एकत्रित और विश्लेषित करते हैं।

यह केंद्र हिंद महासागर के मैरिटाइम (समुद्री) सुरक्षा पर नजर रखता है और 28 देशों से 76 से ज्यादा लिंक-अप्स बनाए हुए है, जिसमें विभिन्न देशों और मल्टी-नेशनल सुरक्षा केंद्र शामिल होते हैं। (India EU defence cooperation)

भारत–ईयू रिश्तों में नया अध्याय

कुल मिलाकर, यह मुलाकात भारत और यूरोपीय संघ के रक्षा संबंधों में एक नए अध्याय की शुरुआत मानी जा रही है। जहां एक ओर भारत आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर यूरोपीय संघ भी भरोसेमंद साझेदारों के साथ अपनी सुरक्षा रणनीति को मजबूत करना चाहता है। (India EU defence cooperation)

पाकिस्तान का झूठ फिर बेनकाब, जिस राफेल को गिराने का किया दावा, वही गणतंत्र दिवस परेड में आसमान में गरजा

Rafale BS-022
Rafale BS-022

Rafale BS-022: पाकिस्तान की तरफ से फैलााई गई मनगढ़ंत और झूठी खबरों की पोल एक बार फिर दुनिया के सामने खुल गई है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान ने झूठ, आधे-अधूरे दावे और बिना सबूत की कहानियां गढ़कर अपनी नाकामियों पर पर्दा डालने की कोशिश की थी। ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तानी सेना और वहां के कुछ मीडिया प्लेटफॉर्म्स ने यह दावा करना शुरू कर दिया था कि पाकिस्तान एयर फोर्स (पीएएफ) ने भारतीय वायुसेना (आईएएफ) के राफेल फाइटर जेट को मार गिराया है। इस दावे को ऐसे पेश किया गया जैसे यह कोई बड़ी सैन्य जीत हो। लेकिन अब 26 जनवरी पर ही पाकिस्तान की इस पूरे झूठे नैरेटिव की पूरी तरह पोल खुल गई है।

Rafale BS-022: ऑपरेशन सिंदूर के बाद क्यों फैलाया झूठा प्रचार

मई 2025 में शुरू हुआ ऑपरेशन सिंदूर पाकिस्तान के लिए सैन्य और मनोवैज्ञानिक दोनों स्तरों पर बड़ा झटका था। भारत ने आतंकवादी हमलों के जवाब में पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकी और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। 100 से ज्यादा आतंकी ढेर किए। इस दौरान भारतीय वायुसेना, मिसाइल सिस्टम, ड्रोन और आर्टिलरी का इस्तेमाल हुआ। पाकिस्तान न सिर्फ इन हमलों को रोकने में नाकाम रहा, बल्कि उसे कुछ ही दिनों में सीजफायर के लिए गिड़गिड़ाना पड़ा। (Rafale BS-022)

ऐसे में पाकिस्तान के सामने अपनी घरेलू जनता और सेना का मनोबल बनाए रखने की बड़ी चुनौती थी। इसी दबाव में वहां की सेना और समर्थक मीडिया ने यह झूठा दावा उछाल दिया कि उन्होंने भारत के राफेल जैसे अत्याधुनिक फाइटर जेट को मार गिराया है। सोशल मीडिया पर पुराने फोटो, एडिट किए गए वीडियो और भ्रामक ग्राफिक्स फैलाए गए। कभी कहा गया कि एक राफेल गिराया गया, तो कभी संख्या बढ़ाकर चार, पांच या आठ तक बता दी गई। दावों की संख्या बदलती रही, लेकिन सबूत एक भी नहीं दिया गया। (Rafale BS-022)

वह राफेल शामिल हुआ गणतंत्र दिवस फ्लाइपास्ट में

पाकिस्तान के झूठ की सबसे बड़ी पोल इस साल 26 जनवरी को खुद-ब-खुद खुल गई। नई दिल्ली में आयोजित गणतंत्र दिवस परेड के दौरान भारतीय वायुसेना का भव्य फ्लाइपास्ट हुआ। इस फ्लाइपास्ट में कई आधुनिक फाइटर जेट्स, ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट और हेलीकॉप्टर शामिल थे। इसी दौरान आसमान में राफेल फाइटर जेट्स की गर्जना भी सुनाई दी।

सबसे अहम बात यह रही कि फ्लाइपास्ट में राफेल BS-022 भी शामिल था। यही वही एयरक्राफ्ट है, जिसके बारे में पाकिस्तान ने दावा किया था कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान उसे मार गिराया गया था। अगर पाकिस्तान का दावा सच होता, तो यह राफेल न तो भारतीय वायुसेना के बेड़े में मौजूद होता और न ही देश के सबसे बड़े राष्ट्रीय समारोह में उड़ान भरता नजर आता। (Rafale BS-022)

BS-022 का पूरी क्षमता के साथ उड़ान भरना इस बात का सीधा और ठोस सबूत है कि पाकिस्तान का दावा पूरी तरह झूठा था। वहीं भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान की तरह ढोल पीटते हुए उसके दावे पर न तो किसी तरह का बयान या प्रेस रिलीज जारी नहीं की, बल्कि खुले आसमान में पूरी दुनिया के सामने पाकिस्तान के झूठ नैरेटिव का अपने अंदाज में जवाब दिया। (Rafale BS-022)

ऑपरेशन सिंदूर फॉर्मेशन से दिया जवाब

26 जनवरी के मौके पर भारतीय वायुसेना ने खास सिंदूर फॉर्मेशन तैयार की थी। यह फॉर्मेशन मई 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर को ट्रिब्यूट थी, जिसमें भारत ने पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी हमले के जवाब में सर्जिकल स्ट्राइक्स की थीं। इस फॉर्मेशन का उद्देश्य भारतीय वायुसेना की सटीकता, हवाई श्रेष्ठता और ऑपरेशन सिंदूर में इस्तेमाल की गई रणनीति को दर्शाना था। यह पहली बार था जब भारतीय वायुसेना ने इस नाम की फॉर्मेशन को गणतंत्र दिवस फ्लाईपास्ट में शामिल किया, जो पाकिस्तानी प्रोपेगैंडा को भी बेनकाब करने का एक तरीका था।

सिंदूर फॉर्मेशन की खूबी यह थी कि यह फॉर्मेशन एक “स्पीयरहेड” या कॉम्पैक्ट एरे शेप में थी, जो ऑपरेशन सिंदूर की स्ट्राइक पैकेज को मिरर करती थी। इसमें 7-विमान शामिल थे। जिसमें 2 राफेल फाइटर जेट्स, 2 मल्टी-रोल फाइटर्स सुखोई-30, 2 मिग-29 और ग्राउंड अटैक के लिए प्रसिद्ध एक जगुआर शामिल था। इन दो राफेल में से एक BS-022 था, जिसे पाकिस्तान ने ऑपरेशन सिंदूर में मार गिराने का झूठा दावा किया था। (Rafale BS-022)

झूठा प्रोपेगैंडा कोई नई बात नहीं

राफेल को लेकर फैलाया गया यह झूठ पाकिस्तान की पुरानी आदतों का ही हिस्सा है। इससे पहले भी बालाकोट एयरस्ट्राइक के बाद पाकिस्तान ने तरह-तरह के झूठे दावे किए थे। कभी कहा गया कि भारतीय एयरस्ट्राइक में कोई नुकसान नहीं हुआ, कभी यह दावा किया गया कि भारत के कई फाइटर जेट मार गिराए गए। बाद में वही पाकिस्तान अपने ही बयानों से पलटता नजर आया।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद भी वही पैटर्न दोहराया गया। सोशल मीडिया पर कुछ अकाउंट्स ने खुद को “डिफेंस एक्सपर्ट” बताकर राफेल के गिरने की कहानियां गढ़ीं। पाकिस्तानी टीवी चैनलों ने बिना किसी जांच-पड़ताल के इन्हें चला दिया। लेकिन जब समय आया, तो सच्चाई ने खुद ही झूठ का पर्दाफाश कर दिया। (Rafale BS-022)

राफेल F4 अपग्रेड ने भी किया साफ इशारा

पाकिस्तान के झूठ को उजागर करने वाला एक और बड़ा फैक्ट भारतीय वायुसेना का राफेल एफ4 अपग्रेड है। भारत ने अपने राफेल फ्लीट को और आधुनिक बनाने के लिए एफ4 स्टैंडर्ड अपग्रेड का फैसला किया है। यह अपग्रेड 35 राफेल विमानों के लिए किया जा रहा है।

अगर ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सच में कोई राफेल नष्ट हुआ होता, जैसा कि पाकिस्तान दावा कर रहा था, तो विमानों की संख्या में फर्क साफ नजर आता। लेकिन 35 राफेल्स के लिए किया गया अपग्रेड यह दिखाता है कि भारतीय वायुसेना का राफेल बेड़ा पूरी तरह सुरक्षित है।

एफ4 अपग्रेड में बेहतर रडार, ज्यादा एडवांस्ड इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम, नए हथियार और बेहतर नेटवर्क-सेंट्रिक कैपेबिलिटी शामिल होंगी। यह अपग्रेड इस बात का संकेत है कि भारतीय वायुसेना भविष्य की चुनौतियों के लिए अपने बेड़े को लगातार मजबूत कर रही है, न कि किसी नुकसान से उबरने की कोशिश कर रही है। (Rafale BS-022)

भारत की रणनीति: शोर नहीं, केवल सबूत

इस पूरे मामले में भारत का रवैया भी गौर करने लायक है। पाकिस्तान के दावों पर भारत ने न तो तुरंत प्रतिक्रिया दी और न ही किसी तरह की बयानबाजी की। भारतीय वायुसेना ने हमेशा की तरह प्रोफेशनल अप्रोच अपनाई। न कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस, न सोशल मीडिया पर जवाबी हमले।

भारत ने तथ्यों को अपने आप सामने आने दिया। गणतंत्र दिवस पर राफेल की उड़ान ही सबसे बड़ा जवाब बन गई। यह दिखाता है कि भारत की रणनीति शोर मचाने की नहीं, बल्कि काम करके दिखाने की है। (Rafale BS-022)

पाकिस्तान की विश्वसनीयता पर सवाल

रक्षा मामलों के जानकारों का मानना है कि ऐसे झूठे दावों से पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय साख लगातार कमजोर हो रही है। जब कोई देश बार-बार बिना सबूत के बड़े-बड़े दावे करता है और बाद में वे झूठ साबित होते हैं, तो दुनिया उसे गंभीरता से लेना बंद कर देती है। (Rafale BS-022)

पाकिस्तान की तरफ से 791 ड्रोन इंट्रूजन्स के बाद सेना ने बदली रणनीति, बनाएगी एयर कमांड सेंटर, हजारों ड्रोन होंगे तैनात

Indian Army drone monitoring
Indian Army takes control of drone monitoring up to 35 km from borders after Operation Sindoor

Indian Army drone monitoring: बॉर्डर इलाकों में ड्रोन के बढ़ते खतरे को देखते हुए भारतीय सेना ने एक बड़ा और अहम फैसला लिया है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद से लगातार पश्चिमी और उत्तरी सीमाओं में पाकिस्तान की तरफ से भेजे गए ड्रोनों की लगातार स्पॉटिंग हो रही है। जिसके बाद देश की सीमाओं से 35 किलोमीटर अंदर तक और तीन किलोमीटर ऊंचाई तक उड़ने वाले सभी ड्रोन और संदिग्ध हवाई गतिविधियों की निगरानी की जिम्मेदारी सीधे भारतीय सेना ने संभाल ली है।

सेना का यह कदम ऑपरेशन सिंदूर के दौरान मिले अनुभवों के बाद उठाया गया है। खुद 13 जनवरी को सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने साफ किया कि पाकिस्तान को डीजीएमओ स्तर पर चेतावनी दी जा चुकी है। उन्होंने बताया कि हाल के दिनों में जम्मू क्षेत्र में पांच ड्रोन घुसपैठ की घटनाएं सामने आई हैं। एक अन्य मामले में ड्रोन के जरिए हथियार भी गिराए गए, जिनमें पिस्तौल और ग्रेनेड शामिल थे। सेना ने इन घटनाओं को गंभीरता से लिया और सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत किया। (Indian Army drone monitoring)

Indian Army drone monitoring: ऑपरेशन सिंदूर से मिली बड़ी सीख

मई 2025 में शुरू हुए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने भारतीय सेना और वायुसेना के ठिकानों को निशाना बनाने के लिए हथियारबंद ड्रोनों का इस्तेमाल किया था। इन ड्रोन हमलों में तुर्की और चीन में बने ड्रोन शामिल थे। ड्रोन से सीमा के पास सैन्य ठिकानों, लॉजिस्टिक एरिया और एयर बेस की रेकी की गई और कुछ मामलों में हथियार गिराने की कोशिश भी हुई।

इसी दौरान चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने भी लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल पर ड्रोन तैनात कर भारतीय सेना की गतिविधियों पर नजर रखी। इससे यह साफ हो गया कि भारत को अब ड्रोन खतरे को हल्के में लेने की गलती नहीं करनी चाहिए। (Indian Army drone monitoring)

ड्रोन गतिविधियों में बढ़ोतरी

जनवरी 2026 की शुरुआत से ही जम्मू-कश्मीर से लगी सीमा पर ड्रोन गतिविधियों में बढ़ोतरी देखी जा रही है। अब तक पाकिस्तान की ओर से इंटरनेशनल बॉर्डर और लाइन ऑफ कंट्रोल के अलग-अलग सेक्टरों में कम से कम 10 से 12 ड्रोन भेजे जा चुके हैं। ये ड्रोन साइज में छोटे हैं और मुख्य रूप से निगरानी के लिए इस्तेमाल किए जा रहे हैं। ये कम ऊंचाई पर उड़ते हैं और अक्सर इनकी लाइट्स ऑन रहती हैं, जिससे सेना को इनकी मौजूदगी का पता चल जाता है।

वहीं, 9 जनवरी से 15-16 जनवरी के बीच सांबा, पूंछ और राजौरी जैसे इलाकों में कई बार ड्रोन देखे गए। 11 जनवरी को सांबा, राजौरी और पूंछ सेक्टर में कम से कम पांच ड्रोन मूवमेंट दर्ज की गईं थीं। इसके बाद सेना ने तुरंत फायरिंग की और सर्च ऑपरेशन शुरू किए। 13 जनवरी को राजौरी के केरी सेक्टर में एक साथ पांच पाकिस्तानी ड्रोन नजर आए, जिन पर जवाबी कार्रवाई की गई। 15 जनवरी को पूंछ और सांबा के रामगढ़ सेक्टर में ड्रोन दिखे, जिसके बाद एंटी-ड्रोन सिस्टम को सक्रिय किया गया। (Indian Army drone monitoring)

गणतंत्र दिवस से ठीक पहले, 25 और 26 जनवरी की रात को कठुआ जिले में इंटरनेशनल बॉर्डर के पास कम से कम चार ड्रोन देखे जाने की खबरें सामने आईं। स्थानीय लोगों और मीडिया रिपोर्ट्स में इनका जिक्र हुआ, हालांकि उस समय तक इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई थी। इसके बावजूद सुरक्षा एजेंसियां पूरी तरह अलर्ट पर रहीं। (Indian Army drone monitoring)

साल 2025 में 791 ड्रोन इंट्रूजन्स दर्ज

अगर पूरे 2025 और 2026 के ट्रेंड को देखा जाए तो ऑपरेशन सिंदूर के बाद पश्चिमी सीमा पर ड्रोन घुसपैठ के मामले तेजी से बढ़े हैं। साल 2025 में पश्चिमी सीमा, खासकर पंजाब और राजस्थान के इलाकों में 791 ड्रोन इंट्रूजन्स दर्ज किए गए। कुल मिलाकर 801 से ज्यादा कोशिशों को नाकाम किया गया। जनवरी 2026 में, खासतौर पर गणतंत्र दिवस से पहले, इस तरह की गतिविधियों में फिर से बढ़ोतरी देखी गई।

सेना का मानना है कि इन ड्रोन का इस्तेमाल मुख्य रूप से निगरानी, हथियार या नशीले पदार्थ गिराने और भारतीय पोजीशन्स की जांच करने के लिए किया जा रहा है। सेना प्रमुख ने कहा है कि ये भले ही छोटे और सीमित क्षमता वाले ड्रोन हों, लेकिन किसी भी तरह की उकसावे वाली कार्रवाई को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। (Indian Army drone monitoring)

35×3 किलोमीटर का नया सुरक्षा घेरा

इन चुनौतियों के जवाब में भारतीय सेना ने सीमा से 35 किलोमीटर अंदर तक और 3 किलोमीटर की ऊंचाई तक ड्रोन निगरानी का जिम्मा अपने हाथ में ले लिया है। इस दायरे में होने वाली करीब 97 फीसदी ड्रोन और एंटी-ड्रोन गतिविधियों को सेना खुद संभालेगी।

इसके लिए चीन और पाकिस्तान सीमा के पास एयर कमांड एंड कंट्रोल सेंटर बनाए जा रहे हैं। इन सेंटरों से न सिर्फ ड्रोन की निगरानी होगी, बल्कि जरूरत पड़ने पर सेना अपने ड्रोन लॉन्च कर सकेगी और दुश्मन के ड्रोन को मार गिराने की कार्रवाई भी यहीं से की जाएगी। (Indian Army drone monitoring)

हजारों ड्रोन तैनात करने की तैयारी

भारतीय सेना अब ड्रोन युद्ध के दौर को ध्यान में रखते हुए अपनी क्षमता को बड़े स्तर पर बढ़ाने की तैयारी में है। जानकारी के मुताबिक, पश्चिमी मोर्चे यानी पाकिस्तान से लगी सीमा पर करीब 10 हजार ड्रोन ऑपरेट करने की क्षमता विकसित की जा रही है। वहीं चीन के साथ लगी 3,488 किलोमीटर लंबी लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल पर 20 हजार से ज्यादा ड्रोन तैनात करने की योजना है। इन ड्रोन का इस्तेमाल निगरानी, टारगेट पहचान, हमले और एंटी-ड्रोन ऑपरेशन में किया जाएगा। हर इलाके में तैनात कोर कमांडर, वहां के एयर फोर्स कमांडर और इंटेलिजेंस एजेंसियों के साथ मिलकर काम करेंगे। (Indian Army drone monitoring)

रॉकेट फोर्स यूनिट तैनात

ड्रोन के साथ-साथ सेना ने अपनी जमीनी मारक ताकत भी काफी मजबूत की है। हाल के वर्षों में दो नई रॉकेट फोर्स यूनिट्स तैनात की गई हैं और आर्टिलरी की मारक क्षमता को पहले के 150 किलोमीटर से बढ़ाकर अब एक हजार किलोमीटर तक कर दिया गया है। इसके अलावा दो रुद्र ब्रिगेड, जिन्हें कंबाइंड आर्म्ड ब्रिगेड कहा जाता है, बनाई गई हैं और 21 भैरव बटालियन भी खड़ी की गई हैं। ये सभी कदम चीन द्वारा पूर्वी लद्दाख में रॉकेट रेजिमेंट की तैनाती और पाकिस्तान द्वारा ऑपरेशन सिंदूर के दौरान फतह-1 और फतह-2 रॉकेट के इस्तेमाल से मिली चुनौतियों को ध्यान में रखकर उठाए गए हैं। (Indian Army drone monitoring)

भैरव बटालियन आधुनिक युद्ध के लिए तैयार

नई भैरव बटालियन को आधुनिक युद्ध की जरूरतों के हिसाब से तैयार किया गया है। इन बटालियनों को सीमा के पास तैनात किया जाएगा और इनके पास आर्मड ड्रोन, निगरानी ड्रोन और लोइटरिंग म्यूनिशन होंगे। इन बटालियनों का काम सीमा के पास टैक्टिकल रोल निभाना है। वहीं, स्पेशल फोर्सेस को दुश्मन के इलाके में गहराई तक जाकर स्ट्रैटेजिक ऑपरेशन के लिए रखा जाएगा। यानी अब हर यूनिट की भूमिका साफ-साफ तय की जा रही है। (Indian Army drone monitoring)

2020 के गलवान से लेकर अब तक

भारत-चीन रिश्तों में 2020 के गलवान घाटी संघर्ष के बाद भारी गिरावट आई थी। इसके बाद एलएसी पर तनाव लंबे समय तक बना रहा। हालांकि अक्टूबर 2024 में डेमचोक और डेपसांग जैसे आखिरी विवादित इलाकों से डिसएंगेजमेंट पूरा होने के बाद हालात कुछ हद तक नियंत्रित हुए हैं। लेकिन इसके बावजूद चीन ने ड्रोन और रॉकेट फोर्स की तैनाती कम नहीं की। इसी को देखते हुए भारत भी अब अपनी सैन्य रणनीति को और मजबूत बना रहा है। (Indian Army drone monitoring)

 

चीन की AI-पावर्ड ड्रोन स्वार्म टेक्नोलॉजी; एक सैनिक कंट्रोल करेगा 200 से ज्यादा UAV, भारत भी तैयार

China AI Drone Swarm

China AI Drone Swarm: आधुनिक युद्ध की तस्वीर तेजी से बदल रही है। अब लड़ाई सिर्फ बंदूकों, टैंक और फाइटर जेट्स तक सीमित नहीं रह गई है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ड्रोन और ऑटोनॉमस सिस्टम्स ने युद्ध के मैदान को पूरी तरह बदल दिया है। हाल ही में चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी यानी पीएलए ने एआई-पावर्ड ड्रोन स्वार्म टेक्नोलॉजी दिखाकर पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। चीन का दावा है कि उसकी नई तकनीक के जरिए एक ही सैनिक 200 से ज्यादा ड्रोन को एक साथ लॉन्च और कंट्रोल कर सकता है।

यह खबर ऐसे समय सामने आई है, जब भारत भी तेजी से काउंटर-यूएवी यानी एंटी-ड्रोन सिस्टम्स पर काम कर रहा है। खास बात यह है कि भारत की रणनीति सिर्फ जवाब देने तक सीमित नहीं है, बल्कि भविष्य की चुनौतियों को ध्यान में रखकर बनाई जा रही है। (China AI Drone Swarm)

China AI Drone Swarm: हर ड्रोन में एआई-आधारित इंटेलिजेंट एल्गोरिदम

चीन के सरकारी चैनल सीसीटीवी पर दिखाए गए एक डिफेंस प्रोग्राम में बताया गया कि यह ड्रोन स्वार्म टेस्ट पीएलए से जुड़ी नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ डिफेंस टेक्नोलॉजी ने किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, बड़ी संख्या में फिक्स्ड-विंग ड्रोन कुछ ही सेकंड में अलग-अलग वाहनों से लॉन्च किए गए और आसमान में फैल गए।

इन ड्रोन की सबसे बड़ी ताकत यह है कि ये अकेले-अकेले नहीं, बल्कि झुंड की तरह काम करते हैं। हर ड्रोन में एआई-आधारित इंटेलिजेंट एल्गोरिदम लगा होता है, जिससे वे आपस में बात कर सकते हैं और खुद तय कर सकते हैं कि कौन निगरानी करेगा, कौन दुश्मन का ध्यान भटकाएगा और कौन हमला करेगा।

इसे “ऑटोनॉमस नेगोशिएशन” कहा जा रहा है। इसका मतलब यह है कि अगर किसी ड्रोन को नुकसान पहुंचता है या वह गिर जाता है, तो बाकी ड्रोन तुरंत अपनी रणनीति बदल लेते हैं। वे यह तय कर लेते हैं कि खाली जगह कौन भरेगा और मिशन कैसे पूरा होगा। (China AI Drone Swarm)

क्या होते हैं ड्रोन स्वार्म?

ड्रोन स्वार्म का मतलब होता है बड़ी संख्या में छोटे-छोटे ड्रोन, जो अकेले-अकेले नहीं बल्कि एक समूह यानी झुंड की तरह काम करते हैं। ये ड्रोन आपस में जुड़े रहते हैं और एआई एल्गोरिदम की मदद से खुद तय करते हैं कि किसे क्या काम करना है। कोई ड्रोन निगरानी करता है, कोई दुश्मन का ध्यान भटकाता है और कोई हमला करता है। इस पूरे प्रोसेस में इंसानी दखल बहुत कम होता है। (China AI Drone Swarm)

सिग्नल कटने पर भी मिशन जारी

ड्रोन युद्ध में सबसे बड़ी चुनौती होती है इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग, यानी दुश्मन द्वारा सिग्नल को जाम कर देना। चीन का दावा है कि उसके ड्रोन स्वार्म में एंटी-जैमिंग एल्गोरिदम लगाए गए हैं।

टेस्ट के दौरान जब जानबूझकर सिग्नल में रुकावट डाली गई, तब भी ड्रोन स्वार्म ने उड़ान जारी रखी और अपने टास्क पूरे किए। यानी अगर ऑपरेटर से संपर्क टूट भी जाए, तब भी ड्रोन आपस में तालमेल बनाकर मिशन को आगे बढ़ाते रहते हैं। (China AI Drone Swarm)

एक सैनिक, 200 से ज्यादा ड्रोन

सीसीटीवी की रिपोर्ट में बताया गया कि इस टेक्नोलॉजी के जरिए एक ही सैनिक 200 से ज्यादा फिक्स्ड-विंग ड्रोन को एक साथ कंट्रोल कर सकता है। ये ड्रोन अलग-अलग वाहनों से एक साथ लॉन्च किए जाते हैं और कुछ ही सेकंड में आसमान में फैल जाते हैं।

ड्रोन स्वार्म को इस तरह डिजाइन किया गया है कि वे खुद-ब-खुद फॉर्मेशन बना लेते हैं और इलाके को कवर करते हैं। जरूरत पड़ने पर ये ड्रोन आपस में काम बांट लेते हैं और कई टारगेट्स पर एक साथ नजर रख सकते हैं या हमला कर सकते हैं। (China AI Drone Swarm)

पहले भी दिखा चुका है चीन ड्रोन स्वार्म

चीन ने पहली बार 2021 में झुहाई एयर शो में अपने ड्रोन स्वार्म सिस्टम को दुनिया के सामने दिखाया था। उस वक्त “स्वार्म-1” सिस्टम की चर्चा हुई थी। इसके बाद 2024 में एक और एडवांस वर्जन दिखाया गया, जिसमें ज्यादा रफ्तार, लंबी उड़ान क्षमता और अलग-अलग पेलोड ले जाने की सुविधा थी।

अब 2026 की शुरुआत में सामने आई यह नई जानकारी बताती है कि चीन इस टेक्नोलॉजी को लगातार आगे बढ़ा रहा है और इसे वास्तविक युद्ध की जरूरतों के हिसाब से तैयार कर रहा है। (China AI Drone Swarm)

क्यों चिंता का विषय है यह तकनीक

रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, ड्रोन स्वार्म तकनीक भविष्य की लड़ाइयों में बड़ा रोल निभा सकती है। ताइवान स्ट्रेट, साउथ चाइना सी और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अगर कभी हालात बिगड़ते हैं, तो ऐसे ड्रोन स्वार्म बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किए जा सकते हैं।

ड्रोन स्वार्म का फायदा यह है कि इन्हें पूरी तरह रोकना बेहद मुश्किल होता है। अगर कुछ ड्रोन गिर भी जाएं, तब भी सैकड़ों ड्रोन टारगेट की ओर बढ़ते रहते हैं। यही वजह है कि दुनिया की बड़ी सेनाएं अब काउंटर-ड्रोन सिस्टम्स पर ज्यादा ध्यान दे रही हैं। (China AI Drone Swarm)

भारत की रणनीति: जवाब से आगे की सोच

चीन की इस क्षमता के सामने भारत भी हाथ पर हाथ रखकर बैठा नहीं है। सीमा पर ड्रोन के जरिए जासूसी, हथियार और ड्रग्स की तस्करी जैसी घटनाओं के बाद भारत ने काउंटर-यूएवी टेक्नोलॉजी को प्राथमिकता दी है।

डीआरडीओ, भारतीय वायुसेना, थल सेना और निजी कंपनियां मिलकर ऐसे सिस्टम्स विकसित कर रही हैं, जो दुश्मन के ड्रोन को पहचानने, जाम करने और जरूरत पड़ने पर नष्ट करने में सक्षम हों। (China AI Drone Swarm)

डीआरडीओ का इंटीग्रेटेड ड्रोन डिटेक्शन सिस्टम

डीआरडीओ द्वारा विकसित इंटीग्रेटेड ड्रोन डिटेक्शन एंड इंटरडिक्शन सिस्टम मार्क-2 भारत के काउंटर-यूएवी प्रयासों की रीढ़ माना जा रहा है। इस सिस्टम में रडार, रेडियो फ्रीक्वेंसी सेंसर्स, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल ट्रैकर्स और लेजर हथियार शामिल हैं।

यह सिस्टम 360 डिग्री कवरेज देता है और कई किलोमीटर की दूरी पर मौजूद ड्रोन को पहचानकर उन्हें जाम या नष्ट कर सकता है। खास बात यह है कि यह पूरी तरह स्वदेशी है और एक साथ कई ड्रोन से निपटने की क्षमता रखता है। (China AI Drone Swarm)

मोबाइल काउंटर-ड्रोन सिस्टम की ताकत

भारत ने स्टेबल सिस्टम्स के साथ-साथ मोबाइल काउंटर-ड्रोन प्लेटफॉर्म पर भी काम किया है। डीआरडीओ और निजी क्षेत्र की साझेदारी से तैयार किए गए व्हीकल बेस्ड काउंटर-ड्रोन सिस्टम को जरूरत के मुताबिक कहीं भी तैनात किया जा सकता है।

इसमें सॉफ्ट किल यानी जैमिंग और हार्ड किल यानी लेजर या काइनेटिक हथियार, दोनों ऑप्शन मौजूद हैं। इससे बॉर्डर इलाकों में तेजी से जवाब देना संभव हो जाता है। (China AI Drone Swarm)

इंद्रजाल: ड्रोन रोकने को डिजिटल कवच तैयार 

भारत में बना इंद्रजाल ऑटोनॉमस ड्रोन डिफेंस डोम को भी काफी अहम माना जा रहा है। यह एक तरह का डिजिटल सुरक्षा कवच है, जो बड़े इलाके को ड्रोन और लोइटरिंग म्यूनिशन से बचाने में सक्षम है।

इस सिस्टम में एआई-आधारित सेंसर्स और ऑटोमेटेड डिसीजन मेकिंग का इस्तेमाल होता है, जिससे यह बिना इंसानी दखल के भी काम कर सकता है। एयरबेस, संवेदनशील ठिकानों और शहरों की सुरक्षा में इसे बेहद उपयोगी माना जा रहा है। (China AI Drone Swarm)

मल्टी-लेयर डिफेंस पर फोकस

भारतीय वायुसेना और थल सेना अब मल्टी-लेयर काउंटर-यूएएस सिस्टम्स पर जोर दे रही हैं। इसका मतलब है कि ड्रोन को पहले दूर से पहचाना जाए, फिर जाम किया जाए और आखिरी जरूरत पड़ने पर उसे नष्ट किया जाए। हाल के सालों में बॉर्डर इलाकों में ड्रोन घुसपैठ के मामलों में इन सिस्टम्स की उपयोगिता भी सामने आई है। (China AI Drone Swarm)

पूरी दुनिया में बढ़ रही ड्रोन रेस

चीन अकेला देश नहीं है जो इस दिशा में काम कर रहा है। अमेरिका, रूस और यूरोप के कई देश भी ड्रोन स्वार्म और लेजर-आधारित एंटी-ड्रोन सिस्टम पर काम कर रहे हैं। अमेरिका माइक्रोवेव और लेजर हथियारों से एक साथ कई ड्रोन गिराने के प्रयोग कर रहा है। (China AI Drone Swarm)

भारत बनेगा एयरोस्पेस मैन्यूफैक्चरिंग का हब, सितंबर 2026 तक सी-295 का फ्लाइंग मॉडल होगा रोलआउट

Made in India C-295 aircraft

Made in India C-295 aircraft: भारतीय वायु सेना के लिए तैयार किया जा रहा पहला ‘मेक इन इंडिया’ सी-295 मिलिटरी ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट अब अपने अंतिम चरण में पहुंच चुका है। उम्मीद जताई जा रही है कि यह विमान सितंबर 2026 तक गुजरात के वडोदरा स्थित टाटा-एयरबस प्लांट से रोलआउट कर दिया जाएगा।

विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने 21 जनवरी को नई दिल्ली में यह घोषणा की। उन्होंने कहा कि भारत-स्पेन रक्षा औद्योगिक सहयोग अब सिर्फ तकनीक लेने-देने तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि भारत अब खरीदार से सह-निर्माता की स्थिति में पहुंच रहा है। (Made in India C-295 aircraft)

Made in India C-295 aircraft: 2021 की डील से 2026 तक का सफर

सी-295 एक मीडियम-रेंज, ट्विन-इंजन टर्बोप्रॉप टैक्टिकल ट्रांसपोर्ट विमान है, जो मूल रूप से स्पेन की एयरबस डिफेंस एंड स्पेस ने डेवलप किया था। सी-295 एयरक्राफ्ट प्रोजेक्ट की शुरुआत साल 2021 में हुई थी, जब भारत सरकार और एयरबस डिफेंस एंड स्पेस के बीच करीब 21,935 करोड़ रुपये का समझौता हुआ था। इस डील के तहत भारतीय वायु सेना के लिए कुल 56 सी-295 विमान खरीदे जाने हैं। इनमें से शुरुआती 16 विमान स्पेन के सेविल प्लांट से पूरी तरह तैयार हालत में भारत लाए गए, जबकि शेष 40 विमानों का निर्माण और असेंबली भारत में की जानी है।

इन 40 विमानों की जिम्मेदारी टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड को सौंपी गई है। वडोदरा में बनी फाइनल असेंबली लाइन का उद्घाटन अक्टूबर 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और स्पेन के प्रधानमंत्री ने संयुक्त रूप से किया था। (Made in India C-295 aircraft)

पुराने एवरो विमानों की जगह लेगा सी-295

सी-295 विमान भारतीय वायु सेना के पुराने और उम्र पूरी कर चुके एवरो-748 विमानों की जगह लेगा। एवरो विमान दशकों से सेवा में थे, लेकिन आधुनिक युद्ध और लॉजिस्टिक्स की जरूरतों के हिसाब से अब वे पर्याप्त नहीं रह गए थे। सी-295 को खास तौर पर सैनिकों की तुरंत तैनाती, कार्गो ट्रांसपोर्ट, मेडिकल इवैकुएशन और आपदा राहत अभियानों के लिए डिजाइन किया गया है।

यह विमान कम रनवे से उड़ान भरने और उतरने में सक्षम है, जिससे पहाड़ी इलाकों, द्वीपों और सीमावर्ती क्षेत्रों में इसकी उपयोगिता काफी बढ़ जाती है। (Made in India C-295 aircraft)

भारत में कितना स्वदेशी, कितना विदेशी?

सी-295 को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा इस बात पर हो रही है कि यह कितना स्वदेशी है। आधिकारिक जानकारी के मुताबिक, इस विमान के 85 फीसदी से ज्यादा स्ट्रक्चरल वर्क भारत में हो रहा है। इसके अलावा विमान के लिए इस्तेमाल होने वाले करीब 13 हजार डिटेल पार्ट्स भारतीय कंपनियां बना रही हैं।

हालांकि, इंजन और कुछ प्रमुख सिस्टम अभी भी स्पेन से आते हैं, लेकिन इनके साथ टेक्नोलॉजी ट्रांसफर भी हो रहा है। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि दुनिया में आज कोई भी आधुनिक मिलिटरी एयराक्रफ्ट नहीं है जो पूरी तरह एक ही देश में बनता हो। अहम बात यह है कि भारत अब ग्लोबल सप्लाई चेन का हिस्सा बन रहा है, सिर्फ असेंबली नहीं कर रहा। (Made in India C-295 aircraft)

Made in India C-295 aircraft

क्या है सी-295 की ताकत

सी-295 का इस्तेमाल भारतीय वायु सेना द्वारा जल्दी तैनाती, सैनिकों के परिवहन, भारी सामान ढोने और आपदा राहत अभियानों में किया जा सकता है। यह लगभग 9 टन पेलोड ले जाने की क्षमता रखता है। इसमें लगभग 71 जवानों या पैराट्रूपर्स को एक साथ ले जाया जा सकता है। साथ ही, यह शॉर्ट टेक-ऑफ एंड लैंडिंग (STOL) क्षमता से लैस है, जिससे यह छोटे रनवे से भी उड़ान भर सकता है। (Made in India C-295 aircraft)

“स्वदेशी या विदेशी” के संकरे नजरिये से देखना सही नहीं

रक्षा और एयरोस्पेस मामलों के जानकार मानते हैं कि सी-295 को लेकर चल रही बहस को सिर्फ “स्वदेशी या विदेशी” के संकरे नजरिये से देखना सही नहीं है। पूर्व डीआरडीओ वैज्ञानिक और रक्षा मामलों के लेखक रवि कुमार गुप्ता का कहना है कि आज के दौर में कोई भी आधुनिक सैन्य विमान ऐसा नहीं है, जिसके सभी पुर्जे एक ही देश में बनते हों। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि चाहे सी-295 हो या राफेल, इनके कॉम्पोनेंट्स भी कई देशों में तैयार होते हैं। ऐसे में किसी एक प्रोजेक्ट को निशाना बनाकर स्वदेशीकरण पर सवाल उठाना व्यावहारिक सोच नहीं है। (Made in India C-295 aircraft)

रवि कुमार गुप्ता ने यह भी याद दिलाया कि तेजस लड़ाकू विमान का मूल उद्देश्य 1950 के दशक के आयातित मिग-21 विमानों को बदलना था, जिन्हें लंबे समय तक “फ्लाइंग कॉफिन” कहा गया। उनके मुताबिक, आज का तेजस एमके-1 उन पुराने मिग-21 विमानों से कई गुना बेहतर, ज्यादा ताकतवर और कहीं ज्यादा सुरक्षित है। उनका कहना है कि अगर रक्षा मंत्रालय ने जनवरी 2001 में तेजस की पहली उड़ान के बाद ही 600 से 1000 विमानों का बड़ा ऑर्डर दे दिया होता, तो न केवल कई कीमती जानें बचाई जा सकती थीं, बल्कि भारत की एयरोस्पेस इंडस्ट्री भी कहीं ज्यादा मजबूत स्थिति में होती। इससे भारतीय वायु सेना को स्क्वॉड्रन की कमी जैसी समस्याओं का भी सामना नहीं करना पड़ता। (Made in India C-295 aircraft)

इसी संदर्भ में विशेषज्ञ मानते हैं कि मेड-इन-इंडिया सी-295 सिर्फ एक नया विमान शामिल करने का मामला नहीं है। यह भारत को वैश्विक एयरोस्पेस इकोसिस्टम के भीतर मजबूती से स्थापित करता है और उसे सप्लायर्स के दबाव या आपूर्ति रोकने जैसी रणनीतियों से बाहर निकालता है। यह बदलाव भारत की रणनीतिक सोच और रक्षा आत्मनिर्भरता दोनों के लिए अहम माना जा रहा है। (Made in India C-295 aircraft)

खरीदार से भागीदार बनने की दिशा में भारत

सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता महेश जेठमलानी, इस पूरे घटनाक्रम को “इंडस्ट्रियल जियोपॉलिटिक्स ऐट स्केल” बताते हैं। उनके अनुसार, सी-295 परियोजना भारत की भूमिका को खरीदार से आगे बढ़ाकर डिफेंस पार्टनर में बदल रही है। उन्होंने कहा कि वडोदरा से सितंबर 2026 तक पहले मेड-इन-इंडिया सी-295 का रोलआउट होना इसी बदलाव का प्रतीक है।

रक्षा जानकारों का कहना है कि यह पहली बार है जब भारत में किसी सैन्य परिवहन विमान का बड़े पैमाने पर निर्माण हो रहा है। दशकों तक भारत ऐसे विमानों के लिए आयात पर निर्भर रहा, वह भी बिना तकनीक हस्तांतरण और स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग के। सी-295 इस परंपरा को तोड़ता है और देश को डिजाइन, निर्माण और रखरखाव की दिशा में आत्मनिर्भर बनाता है। (Made in India C-295 aircraft)

आज के समय में जब पहाड़ों, द्वीपों और समुद्री क्षेत्रों में तेजी से सैनिक और संसाधन पहुंचाना बेहद जरूरी हो गया है, तब एयर मोबिलिटी की भूमिका और भी अहम हो जाती है। ऐसे में भारत की यह क्षमता कि वह अपने परिवहन विमानों को खुद बना सके और उन्हें लंबे समय तक ऑपरेट व मेंटेन कर सके, देश की डिटरेंस क्रेडिबिलिटी को मजबूत करती है। खासकर ऐसे पड़ोसियों के बीच, जहां आपूर्ति बाधित करना भी एक रणनीति के तौर पर इस्तेमाल किया जाता रहा है।

कुल मिलाकर, सी-295 परियोजना को सिर्फ असेंबली लाइन तक सीमित करके देखना सही नहीं होगा। यह भारत के लिए डिपेंडेंस से लीवरेज की ओर बढ़ने का संकेत है। रक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि यह कदम भारत को धीरे-धीरे असेंबली से आगे ले जाकर सॉवरेन कैपेबिलिटी की दिशा में स्थापित करता है, जहां देश न केवल अपनी जरूरतें पूरी करता है, बल्कि भविष्य में वैश्विक रक्षा बाजार में एक मजबूत खिलाड़ी भी बन सकता है। (Made in India C-295 aircraft)

एयरोस्पेस हब बनने की ओर भारत

‘मेक इन इंडिया’ के तहत, 2040 तक भारत का एयरोस्पेस सेक्टर 100 बिलियन डॉलर का हो सकता है, जिसमें सी-295 जैसे प्रोजेक्ट निर्यात को 20-30% बढ़ा देंगे। वहीं, सी-295 प्रोजेक्ट अकेला नहीं है। इसके साथ-साथ भारत में एयरोस्पेस मैन्युफैक्चरिंग को लेकर काफी काम हो रहा है। अडानी ग्रुप और एम्ब्राएर मिलकर 70 से 146 सीट वाले कमर्शियल विमानों के लिए असेंबली लाइन लगाने की तैयारी कर रहे हैं। इसके लिए गुजरात और आंध्र प्रदेश को चुना जा सकता है। इसके अलावा टाटा और एयरबस की साझेदारी पहले से ही एयरबस ए320 के लिए दो फाइनल असेंबली लाइन भी बना रहे हैं।

सरकार भी छोटे विमानों के निर्माण को बढ़ावा देने के लिए एक नई पीएलआई स्कीम पर विचार कर रही है, जिसमें अगले छह सालों के लिए हजारों करोड़ रुपये के इंसेंटिव दिए जा सकते हैं। मकसद यह है कि भारत सिर्फ स्क्रू-ड्राइवर असेंबली नहीं, बल्कि पूरा मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम खड़ा करे। (Made in India C-295 aircraft)

रोजगार, स्किल और सप्लाई चेन पर असर

सी-295 परियोजना से भारत में हजारों नई नौकरियां पैदा होने की उम्मीद है। इससे 18,000 से ज्यादा नौकरियां पैदा होंगी और लोकल सप्लाई चेन मजबूत होगी। इसके साथ ही लोकल सप्लाई चेन, इंजीनियरिंग स्किल्स और मेंटेनेंस कैपेबिलिटी को भी मजबूती मिलेगी। आने वाले वर्षों में भारत न सिर्फ इन विमानों का निर्माण करेगा, बल्कि उनके मेंटेनेंस और अपग्रेड का काम भी खुद कर सकेगा। रक्षा जानकारों का मानना है कि यह मॉडल भविष्य में दूसरे सैन्य विमानों और हेलीकॉप्टर प्रोजेक्ट्स के लिए भी रास्ता खोल सकता है। (Made in India C-295 aircraft)

Border 2 में दिखी भारतीय सेनाओं की असली ताकत, INS विक्रांत और टैंकों ने बढ़ाया देशभक्ति का जोश

Border 2 Indian Armed Forces

Border 2 Indian Armed Forces: इस साल आई फिल्म बॉर्डर 2 ने एक बार फिर लोगों के दिलों में देशभक्ति का जोश भर दिया है। यह फिल्म सिर्फ युद्ध की कहानी नहीं दिखाती, बल्कि यह बताती है कि भारतीय थल सेना, नौसेना और वायु सेना मिलकर देश की रक्षा कैसे करती हैं। फिल्म 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध से प्रेरित है और इसमें सैनिकों के साहस के साथ-साथ उनकी ताकत और हथियारों को भी साफ तौर पर दिखाया गया है।

फिल्म की खास बात यह है कि इसमें पुराने जमाने के हथियारों के साथ-साथ आज के आधुनिक हथियार भी दिखाए गए हैं। (Border 2 Indian Armed Forces)

Border 2 Indian Armed Forces: जमीन पर थल सेना की ताकत

फिल्म में सबसे ज्यादा जोर थल सेना पर है। सीमावर्ती इलाकों में टैंकों के साथ आगे बढ़ते जवान, दुश्मन के ठिकानों पर हमले और आमने-सामने की लड़ाई बहुत ही असली लगती है।

फिल्म में टी-55 टैंक को दिखाया गया है, जो 1971 के युद्ध में भारतीय सेना की बड़ी ताकत था। भारी भरकम शरीर, लंबी तोप और दुश्मन के बंकरों को तबाह करने की क्षमता के साथ यह टैंक पर्दे पर खूब गरजता नजर आता है। कुछ एक्शन सीन्स में टी-72 टैंक जैसे आधुनिक टैंकों की झलक भी दी गई है, ताकि आज की पीढ़ी को मौजूदा सैन्य ताकत का अंदाजा हो सके।

इन्फैंट्री के जवानों के हाथों में एके-47, इंसास राइफल, 7.62 एमएम राइफल और आरपीजी-7 रॉकेट लॉन्चर जैसे हथियार दिखाए गए हैं। दुश्मन के टैंकों पर आरपीजी से हमले वाले सीन दर्शकों की सांसें रोक देते हैं। इसके अलावा मोर्टार, 105 एमएम फील्ड गन और हैंड ग्रेनेड का इस्तेमाल भी फिल्म में बड़े पैमाने पर दिखाया गया है। (Border 2 Indian Armed Forces)

Border 2 Indian Armed Forces

INS विक्रांत बना फिल्म का सबसे बड़ा आकर्षण

फिल्म का सबसे खास हिस्सा है भारतीय नौसेना और आईएनएस विक्रांत। यह भारत का स्वदेशी युद्धपोत है, जिसे फिल्म में समुद्र में भारत की ताकत के रूप में दिखाया गया है। फिल्म के कई सीन समुद्र में सेट हैं, जहां आईएनएस विक्रांत से फाइटर जेट उड़ान भरते नजर आते हैं। डेक पर खड़े नौसैनिक, रडार रूम, मिसाइल सिस्टम और कमांड सेंटर के दृश्य फिल्म को रियल और दमदार बनाते हैं। दर्शकों को यह महसूस होता है कि भारतीय नौसेना समुद्र में कितनी मजबूत स्थिति में है।

आईएनएस विक्रांत पर तैनात मिग-29के फाइटर जेट, कामोव हेलीकॉप्टर, बराक एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम और एके-630 क्लोज-इन वेपन सिस्टम जैसे हथियारों की झलक फिल्म में दिखाई गई है। कुछ सीन में गैटलिंग गन का इस्तेमाल करते भी दिखाया गया है, जो दुश्मन पर लगातार गोलियों की बारिश करते हैं। फिल्म के पोस्टर में अहान शेट्टी को गैटलिंग गन लेकर दुश्मन पर फायरिंग दिखाया गया है। यह शिप बोर्ड फाइटिंग या कमांडो ऑपरेशन में इस्तेमाल होता है। (Border 2 Indian Armed Forces)

Border 2 Indian Armed Forces

फिल्म के प्रमोशन के दौरान अभिनेता सनी देओल और पूरी टीम का असली आईएनएस विक्रांत पर जाना भी चर्चा में रहा। यह दौरा कारवार नेवल बेस (गोवा के पास) पर हुआ था। वहां उन्होंने नौसेना के अधिकारियों और सैनिकों से मिले। सनी देओल ने वहां “अवाज कहां तक जानी चाहिए” वाला डायलॉग भी बोला था, जो फिल्म का फेमस डायलॉग है। टीम ने विक्रांत पर म्यूजिक परफॉर्मेंस भी की थी, एक स्पेशल गाना “मिट्टी के बेटे” वहां लाइव गाया था।

आईएनएस विक्रांत भारत की आत्मनिर्भर ताकत का प्रतीक है। यह 2022 में कमीशन हुआ था। 40,000 टन वजन का यह जहाज 262 मीटर लंबा है। इसमें 30 से ज्यादा एयरक्राफ्ट रखे जा सकते हैं। फिल्म में इसे दिखाकर देश को जोश से भर दिया है और यह संदेश दिया कि हमारी नौसेना कितनी मजबूत है। (Border 2 Indian Armed Forces)

वायु सेना का दम: आसमान में भारतीय ताकत

बॉर्डर 2 में वायु सेना की भूमिका भी बेहद अहम है। आसमान में उड़ते फाइटर जेट, दुश्मन के ठिकानों पर बमबारी और जमीन पर लड़ रहे सैनिकों को एयर सपोर्ट – ये सब सीन फिल्म को बड़े पैमाने का एहसास देते हैं।

फिल्म में मिग-21 फाइटर जेट को खास तौर पर दिखाया गया है, जो 1971 के युद्ध का प्रतीक माना जाता है। इसके अलावा आधुनिक टच देने के लिए मिग-29 और सुखोई-30 एमकेआई जैसे विमानों की झलक भी मिलती है।

एयर-टू-ग्राउंड बम, मिसाइल और मी-17 हेलीकॉप्टर से सैनिकों की आवाजाही जैसे दृश्य दिखाते हैं कि वायु सेना किस तरह थल सेना और नौसेना के साथ मिलकर काम करती है। (Border 2 Indian Armed Forces)

Border 2 Indian Armed Forces

जॉइंट ऑपरेशन: तीनों सेनाओं का तालमेल

फिल्म की सबसे बड़ी ताकत यह है कि इसमें तीनों सेनाओं का जॉइंट ऑपरेशन दिखाया गया है। जमीन पर टैंक आगे बढ़ते हैं, समुद्र से आईएनएस विक्रांत दुश्मन पर दबाव बनाता है और आसमान से फाइटर जेट हमला करते हैं। यह वही रणनीति है, जिसे आधुनिक युद्ध में सबसे अहम माना जाता है।

क्लाइमेक्स में तीनों सेनाओं का एक साथ एक्शन दर्शकों को सीट से बांधकर रखता है। यह साफ संदेश जाता है कि भारत की सुरक्षा सिर्फ एक फोर्स के भरोसे नहीं, बल्कि तीनों सेनाओं की संयुक्त ताकत पर टिकी है। (Border 2 Indian Armed Forces)

हथियारों से ज्यादा जज्बे की जीत

हालांकि फिल्म में हथियारों और तकनीक को शानदार तरीके से दिखाया गया है, लेकिन कहानी का मूल संदेश यही है कि युद्ध सिर्फ हथियारों से नहीं जीता जाता, बल्कि जवानों के साहस, अनुशासन और बलिदान से जीता जाता है।

बॉर्डर 2 में हथियार कहानी को मजबूत बनाते हैं, लेकिन असली नायक वही सैनिक हैं, जो हर हाल में देश की रक्षा के लिए तैयार रहते हैं। यही वजह है कि फिल्म देखने के बाद दर्शकों का सिर गर्व और सम्मान से चौड़ा हो जाता है। (Border 2 Indian Armed Forces)