CATS Warrior: भारत के डिफेंस सेक्टर में पिछले कई दिनों से एक चौंकाने वाले नाम CATS Warrior की जमकर चर्चा हो रही है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) का बनाया यह अत्याधुनिक स्टील्थ ड्रोन एरो इंडिया 2025 में सभी के लिए आकर्षण का केंद्र बनने जा रहा है। बेंगलुरु के येलहंका एयर फोर्स स्टेशन पर 10 से 14 फरवरी के बीच आयोजित हो रहे एशिया के सबसे बड़े एयरोस्पेस शो में CATS Warrior का फुल-स्केल डेमोंस्ट्रेटर पहली बार आम जनता के सामने पेश किया जाएगा।
क्या है CATS Warrior?
दरअसल CATS Warrior (Combat Air Teaming System) एक अत्याधुनिक स्वदेशी स्टील्थ ड्रोन है, जिसे भारतीय वायुसेना के फाइटर जेट्स के साथ मिलकर काम करने के लिए डिजाइन किया गया है। इस ड्रोन को स्टील्थ तकनीक से लैस किया गया है, जिससे दुश्मन के रडार इसे आसानी से नहीं पकड़ सकेंगे। इसे “लॉयल विंगमैन” के रूप में जाना जाता है, जिसका मतलब है कि यह वायुसेना के पायलट ऑपरेटेड फाइटर जेट्स के साथ मिशनों में हिस्सा लेगा, जैसे कि रिपोर्टिंग, स्ट्राइक मिशन, इलेक्ट्रॉनिक अटैक आदि। इस ड्रोन की सबसे खास बात यह है कि यह खतरनाक मिशनों को अंजाम देगा, जिससे वायुसेना के पायलटों पर खतरा कम होगा।
एरो इंडिया 2025 में क्या होगा खास?
CATS Warrior की पहली उड़ान इस साल के अंत तक होनी है। लेकिन इससे पहले इसका फुल-स्केल डेमोंस्ट्रेटर एरो इंडिया 2025 में पेश किया गया है। इस ड्रोन को भारत के ‘आत्मनिर्भर भारत’ मिशन के तहत पूरी तरह स्वदेशी तकनीक से बनाया गया है। इसका डिजाइन और क्षमता अमेरिका के Boeing MQ-28 Ghost Bat और चीन के Feihong FH-97 जैसे लेटेस्ट ड्रोन के समान है। इसमें HAL के PTAE-W टर्बोजेट इंजन का इस्तेमाल किया गया है, जो पहले से ही भारत के टारगेट ड्रोन ‘लक्ष्य’ में अपनी क्षमता दिखा चुका है। हाल ही में HAL ने CATS Warrior का सफल इंजन ग्राउंड रन पूरा किया था।
अब अगले चरण में CATS Warrior के टैक्सी ट्रायल शुरू किए जाएंगे, जिसमें ग्राउंड हैंडलिंग, कंट्रोल सिस्टम्स और सिस्टम इंटीग्रेशन की जांच की जाएगी। इन ट्रायल्स के सफल होने के बाद इस ड्रोन की पहली उड़ान के लिए हरी झंडी मिलने की उम्मीद है।
CATS Warrior केवल एक ड्रोन नहीं है, बल्कि यह HAL के Combat Air Teaming System (CATS) प्रोग्राम का एक प्रमुख हिस्सा है। इस प्रोग्राम के तहत एक क्रूज मिसाइल, क्लोज कॉम्बैट मिसाइल, स्वार्म ड्रोन और एक प्स्योडो सैटेलाइट नेटवर्क भी डेवलप किया जा रहा है, जो तेजस और भविष्य में आने वाले AMCA फाइटर जेट्स के साथ नेटवर्क में काम करेगा।
भारतीय वायुसेना के लिए क्यों जरूरी CATS Warrior?
भारतीय वायुसेना के पास लड़ाकू विमान स्क्वाड्रन कमी है। 42 स्क्वाड्रनों के मुकाबले फिलहाल सिर्फ 31 स्क्वाड्रन ही एक्टिव हैं। ऐसे में वायुसेना को अपनी ताकत बढ़ाने के लिए नए तरीकों की जरूरत है। तेजस Mk1A जैसे स्वदेशी लड़ाकू विमानों के उत्पादन के साथ-साथ CATS Warrior जैसे अनमैंड कॉम्बैट एयरक्राफ्ट भविष्य में इस कमी को पूरा करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
यह ड्रोन गहराई तक स्ट्राइक मिशन, दुश्मन की हवाई सुरक्षा को निष्क्रिय करने और निगरानी जैसी भूमिकाएं निभा सकता है। भारत निर्मित Smart Anti-Airfield Weapons (SAAWs) के साथ यह ड्रोन दुश्मन के ठिकानों पर सटीक हमला भी कर सकेगा। इसके अलावा, यह ड्रोन युद्ध के दौरान रियल-टाइम बैटलफील्ड अवेयरनेस की भूमिका निभाएगा।
CATS Warrior की पहली उड़ान इस साल के अंत तक होनी है। अमेरिका, चीन और रूस पहले से ही अपने-अपने AI-अनेबल्ड UCAVs पर काम कर रहे हैं, जिनमें Boeing MQ-28 Ghost Bat और चीन का Feihong FH-97 प्रमुख हैं। इस ड्रोन के साथ-साथ HAL और अन्य प्राइवेट कंपनियां जैसे NewSpace Research and Technologies (NRT) भी AI-ऑपरेटेड ड्रोन्स पर काम कर रही हैं। NRT का Abhimanyu नामक ड्रोन भी जल्द ही पेश किया जाएगा।
LCA Tejas Engine: भारत के स्वदेशी लड़ाकू विमान तेजस (Tejas) के लिए अच्छी खबर है। लगभग दो साल से जीई की तरफ से इंजन सप्लाई में हो रही देरी के चलते भारतीय सेनाओं को तेजस की डिलीवरी नहीं हो रही थी। लेकिन अब अमेरिकी कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक (GE) ने तेजस लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (LCA) के लिए F-404 इंजन की सप्लाई फिर से शुरू करने का वादा किया है।
LCA Tejas Engine: वायुसेना में स्क्वाड्रन की कमी
भारतीय वायुसेना इन दिनों स्क्वाड्रन की कमी से जूझ रही है। वायुसेना के पास फिलहाल 31 एक्टिव स्क्वाड्रन हैं, जबकि 42 स्क्वाड्रन की जरूरत है। जिसके चलते वायुसेना पर नए लड़ाकू विमानों की कमी को पूरा करने का जबरदस्त दबाव है। तेजस की प्रोडक्शन में तेजी आने से भारतीय सेना को थोड़ी राहत मिल सकती है।
जीई का वादा- इस साल मार्च से पहला इंजन
जनरल इलेक्ट्रिक ने एकबार फिर से तेजस Mk-1 के लिए F-404 इंजन की सप्लाई जल्द शुरू करने का वादा किया है। अब कंपनी ने कहा है कि वह इस साल मार्च से इंजन डिलीवरी करना शुरू कर देगी। रिपोर्ट्स के मुताबिक, GE 26 इंजनों की आपूर्ति में पीछे है, लेकिन उन्होंने पहला इंजन समय पर भेजने का वादा किया है और इसके बाद उत्पादन में तेजी लाई जाएगी। जीई को तेजस के लिए एक साल में 26 इंजन सप्लाई करने हैं और पहला इंजन वह मार्च तक भेज देगी। हालांकि कंपनी की तरफ से कोई तारीख तय नहीं हुई है।
हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के लिए दो साल चुनौती भरे रहे हैं। लेकिन अब नए डिलीवरी शेड्यूल के साथ, HAL को उम्मीद है कि इंजन के आते ही तेजस के उत्पादन में तेजी लाई जा सकेगी। एचएएल सूत्रों का कहना है कि पहले की तरह ही वे सिर्फ इंतजार कर सकते हैं। अब देखते हैं कि जीई इस बार भी अपना वादा पूरा करती है या फिर से कोई नई डेडलाइन जारी करती है।
LCA Tejas Engine: नासिक में नई असेंबली लाइन लगाने की तैयारी
HAL के पास बेंगलुरु में दो और नासिक में एक प्रोडक्शन लाइन है। नासिक फैसिलिटी से मार्च तक पहला तेजस विमान डिलीवर किया जाएगा और GE के इंजनों के आने के बाद प्रोडक्शन में बढ़ोतरी होने की उम्मीद है। नए डिलीवरी शिड्यूल के मुताबिक HAL की मार्च या अप्रैल तक पांच तेजस Mk-1A फाइटर जेट और चार ट्रेनर एयरक्राफ्ट तैयार करने की योजना है। अगर इंजन समय पर आते हैं, तो असेंबली कुछ ही दिनों में पूरी हो सकती है।
वहीं, एचएएल कंपनी नासिक में चौथी असेंबली लाइन स्थापित करने की तैयारी कर रही है। HAL की बेंगलुरु में दो असेंबली लाइन्स की सालाना उत्पादन क्षमता आठ लड़ाकू विमानों की है। इसके अलावा नासिक में भी एक असेंबली लाइन है, जो सालाना आठ तेजस विमान बना सकती है। हालांकि, नासिक में नई असेंबली लाइन बनाने की योजना तभी पूरी हो सकेगी जब GE इंजन की नियमित आपूर्ति शुरू करेगा। नई असेंबली लाइन को तैयार करने में लगभग 1.5 साल का समय लगने की संभावना है।
वायुसेना को 180 तेजस Mk-1A और 108 तेजस Mk-2 विमानों की जरूरत
रक्षा मंत्रालय ने 2021 में HAL के साथ 83 तेजस Mk-1A विमानों की सप्लाई के लिए 45,696 करोड़ रुपये का बड़ा सौदा किया था। इसमें 73 फाइटर जेट और 10 ट्रेनर विमान शामिल हैं। इन विमानों के लिए GE को 99 F-404 इंजन की सप्लाई करनी थी। अब तक HAL ने 40 तेजस LCA विमानों में से 38 की डिलीवरी भारतीय वायुसेना को कर दी है। वहीं, भारतीय वायुसेना को कम से कम 180 तेजस Mk-1A और 108 तेजस Mk-2 विमानों की जरूरत है।
LCA Tejas Engine: तेजस Mk-1A में एडवांस AESA रडार
तेजस Mk-1A में एडवांस AESA रडार लगाया गया है, जो दुश्मन के विमानों और मिसाइलों को दूर से ट्रेक कर सकता है। इस रडार के जरिए विमान कई टारगेट्स पर एक साथ हमला कर सकता है और दुश्मन की जामिंग टेक्नोलॉजी से भी बच सकता है। इसके अलावा, तेजस Mk-1A में एडवांस कंप्यूटर सिस्टम, बेहतर कॉकपिट डिस्प्ले और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम लगाए गए हैं। तेजस में अस्त्रा और डर्बी जैसी एयर-टू-एयर मिसाइलें भी लगाई जा सकती हैं।
वहीं, तेजस का सबसे एडवांस वर्जन तेजस Mk-2 है, जो अभी डेवलपमेंट फेज में है। Mk-2 का साइज बड़ा होगा और यह ज्यादा ताकतवर इंजन के साथ आएगा, जिससे यह ज्यादा ईंधन और हथियार ले जा सकेगा। इसमें और भी एडवांस रडार और वेपन सिस्टम्स लगे होंगे। जिससे भारत की मल्टी-रोल फाइटर (बहु-भूमिका वाले लड़ाकू विमान) की जरूरतें पूरी होंगी।
Indian Army Helicopter Fleet: भारतीय सेना ने मॉर्डनाइजेशन की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए अपने एविएशन सेक्टर को मजबूत करने की योजना बनाई है। इस योजना के तहत, सेना जल्द ही निगरानी और टोही अभियानों के लिए लगभग 250 नए हेलिकॉप्टरों को शामिल करने जा रही है। यह कदम सेना की पुरानी हो चुकी हेलिकॉप्टर फ्लीट को बदलने के लिए उठाया जा रहा है, जिससे सेना की ऑपरेशनल कैपेबिलिटी में जबरदस्त सुधार होगा।
Indian Army Helicopter Fleet: चेतक और चीता भी बदले जाएंगे
सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, “हमारी हेलिकॉप्टर फ्लीट अब पुरानी हो चुकी है और इसे बदलना समय की मांग है। चेतक और चीता जैसे हेलिकॉप्टर, जो पिछले कई दशकों से सेना की सेवा में हैं, अब पुराने पड़ चुके हैं। ये हेलिकॉप्टर 1960 के दशक में बनाए गए थे और 1970 के दशक में सेना में शामिल हुए थे। हालांकि, इन पर आज भी भरोसा किया जा सकता है। लेकिन आज के समय में इनमें लेटेस्ट एवियोनिक्स, सेफ्टी फीचर्स और ऑपरेशनल फ्लेक्सिबिलिटी की कमी है।
उन्होंने बताया कि सरकार की ‘मेक इन इंडिया’ नीति के तहत स्वदेशी उत्पादन पर जोर दिया जा रहा है।” सेना के लिए प्रस्तावित मुख्य हेलिकॉप्टरों में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) का लाइट यूटिलिटी हेलिकॉप्टर (LUH), रूस का कामोव-226T, और एयरबस H125 शामिल हैं।
Indian Army Helicopter Fleet: सिंगल इंजन बड़ी समस्या
सूत्रों के मुताबिक इन पुराने हेलिकॉप्टरों की एक और बड़ी समस्या उनकी सिंगल-इंजन कॉन्फ़िगरेशन है, जिससे ऑपरेशन के दौरन जोखिम बढ़ जाता है। इसके अलावा, उनकी पेलोड क्षमता भी सीमित है, एक बड़ी समस्या है, जिससे सैनिकों और सैन्य साजोसामान को ले जाने में कठिनाई होती है। इन हेलिकॉप्टरों के लिए स्पेयर पार्ट्स भी नहीं मिल पाते, जिससे इनके मेंटेनेंस में समस्याएं आ रही हैं।
Indian Army Helicopter Fleet: लाइट यूटिलिटी हेलिकॉप्टर (LUH) प्रमुख दावेदार
मेक इन इंडिया पहल के तहत हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) का लाइट यूटिलिटी हेलिकॉप्टर (LUH) प्रमुख दावेदार माना जा रहा है। यह हेलिकॉप्टर हाई एस्टीट्यूड इलाकों में बेहतरीन प्रदर्शन करता है और चेतक और चीता हेलिकॉप्टरों की जगह लेने की तैयारी में है।
इसके अलावा, रूस के कामोव-226T और एयरबस का H125 भी इस रेस है। कामोव-226T एक डबल इंजन वाला हेलिकॉप्टर है, जो अपनी सेफ्टी और मॉड्यूलर डिज़ाइन के लिए जाना जाता है। हालांकि, रूस-यूक्रेन युद्ध और अन्य जियोपॉलिटिकल परिस्थितियों के चलते इस हेलिकॉप्टर की खरीद में देरी हुई है। दूसरी तरफ, एयरबस का H125 दुनियाभर में अपनी हाई एल्टीट्यूड कैपेबिलिटी और एडवांस एवियोनिक्स के लिए जाना जाता है।
सेना के एविएशन कोर की चुनौतियां
भारतीय सेना का एविएशन कोर, भले ही सेना की सबसे लेटेस्ट ब्रांचों में से एक है, लेकिन मॉर्डन वारफेयर में इसका रोल बेहद अहम है। यह ब्रांच वॉर मिशन, निगरानी, लॉजिस्टिक्स, घायल सैनिकों की निकासी और मानवीय मदद में सबसे आगे रहती है।
भारतीय सेना दुनिया के कुछ सबसे दुर्गम इलाकों में काम करती है, जहां हेलिकॉप्टरों से कनेक्टिविटी संभव है। लद्दाख, सियाचिन ग्लेशियर, उत्तर सिक्किम, और अरुणाचल प्रदेश जैसे हाई एल्टीट्यूड इलाकों में माइन जीरो डिग्री टेंपरेचर, खराब मौसम और पतली हवा में हेलिकॉप्टर ऑपरेट करना बेहद मुश्किल होता है। इन्हीं चुनौतियों को देखते हुए, भारतीय सेना ने अपनी हेलिकॉप्टर फ्लीट को अपग्रेड करने की व्यापक योजना शुरू की है।
सेना की एविएशन कोर होगी मजबूत
जुलाई 2023 में रक्षा मंत्रालय ने 20 टोही और निगरानी हेलिकॉप्टरों को किराए पर लेने के लिए एक आरएफआई (Request for Information) जारी किया था, जो पांच सालों के लिए ग्राउंड सपोर्ट एक्विपमेंट्स के साथ आएंगे। फिलहाल, भारतीय सेना की एविएशन कोर लेह, मिसामारी और जोधपुर में तीन ब्रिगेड तैनात हैं, जिनके पास लगभग 190 चीता, चेतक और चीताल हेलिकॉप्टर, 145 ALH (एडवांस्ड लाइट हेलिकॉप्टर) और 75 रुद्र (ALH-WSI) हेलिकॉप्टर हैं। इसके अलावा, 25 ALH Mk-III हेलिकॉप्टरों के लिए भी ऑर्डर दिए गए हैं।
सेना के एक अधिकारी ने कहा, “हम न केवल पुराने हेलिकॉप्टरों को बदलने पर फोकस कर रहे हैं, बल्कि यह भी सुनिश्चित कर रहे हैं कि नए हेलिकॉप्टर मॉर्डन वारफेयर की सभी जरूरतों को पूरा करें। यह कदम भारतीय सेना को वैश्विक स्तर पर और मजबूत बनाएगा।”
ALH Dhruv Grounded: भारतीय सेना एडवांस लाइट कॉम्बैट हेलीकॉप्टर ALH ध्रुव के ग्राउंड होने के असर अब भारतीय सेना की ऑपरेशनल तैयारियों पर दिखने लगा है। इसके चलते सेना को सीमावर्ती इलाकों में जरूरी सामान और रसद पहुंचाने के लिए अब सिविल एविएशन कंपनियों की मदद लेनी पड़ रही है। बुधवार को जारी एक आधिकारिक बयान में बताया गया कि सेना के ‘सूर्य कमान’ ने थम्बी एविएशन प्राइवेट लिमिटेड के साथ करार कर सिविल हेलीकॉप्टरों के जरिये हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊं क्षेत्रों में फॉरवर्ड पोस्ट तक सप्लाई शुरू कर दी है।
ग्राउंड है ‘वर्क हॉर्स’
भारतीय के ‘वर्क हॉर्स’ कहे जाने वाले स्वदेशी एडवांस्ड लाइट हेलीकॉप्टर (ALH) ‘ध्रुव’ का बेड़ा तकनीकी खामियों के चलते ग्राउंड कर दिया गया और इसकी उड़ानों पर पूर्णतया रोक लगा दी गई। पिछले महीने 5 जनवरी को पोरबंदर में हुए हादसे के बाद यह फैसला लिया गया था। इस हादसे में भारतीय तटरक्षक बल के ALH मार्क-III हेलीकॉप्टर की ट्रेनिंग उड़ान के दौरान क्रैश हो जाने से तीन कर्मियों की मौत हो गई थी। देशभर में मौजूद लगभग 330 ALH हेलीकॉप्टर हैं, और सभी को ग्राउंड कर दिया गयाा है। यहां तक कि 15 सितंबर को मनाए जाने वाले आर्मी डे और रिपब्लिक डे पर भी ध्रुव और इसके दूसरे वैरिएंट्स ने उड़ान नहीं भरी थी।
ALH Dhruv Grounded: थंबी एविएशन के साथ करार
सेना ने थंबी एविएशन प्राइवेट लिमिटेड के साथ कॉन्ट्रैक्ट करके सिविल हेलिकॉप्टर सेवाएं शुरू की हैं, जिनका ऑपरेशन गुरुवार से शुरू हो गया। थंबी एविएशन बेल 412 हेलिकॉप्टरों का उपयोग करती है, जो आमतौर पर पैसेंजर ट्रांसपोर्ट, वीआईपी उड़ानों और मेडिकल इमरजेंसी सेवाओं के लिए उपयोग किए जाते हैं। अधिकारियों के अनुसार, सेना की जरूरतों के आधार पर इन हेलिकॉप्टरों की संख्या तय की जाएगी।
#IndianArmy#SuryaCommand achieved yet another milestone by integrating civil aviation helicopters for Air maintenance of far flung forward posts in Himachal, Garhwal and Kumaon regions. The initiative will go a long way in optimising integral resources besides ensuring logistic… pic.twitter.com/glic7mdJ1h
ALH Dhruv Grounded: हाई एल्टीट्यूड इलाकों में परफॉरमेंस शानदार
भारतीय सेना ध्रुव हेलीकॉप्टरों का इस्तेमाल हाई एल्टीट्यूड इलाकों में रसद, सैनिक साजोसामान और इमरजेंसी सेवाओं में करती है। हाई एल्टीट्यूड इलाकों में इनकी परफॉरमेंस शानदार है। लेकिन हाल के कुछ सालों में बार-बार तकनीकी खामियों और दुर्घटनाओं के चलते इनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे हैं। इसी के चलते अब सेना ने सीमावर्ती इलाकों में रसद आपूर्ति और इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट के लिए प्राइवेट एविएशन कंपनियों का रुख किया है।
थंबी एविएशन के हेलीकॉप्टरों की मदद से सेना सीमावर्ती इलाकों में तैनात जवानों को खाद्य सामग्री, दवाइयां और अन्य जरूरी सामान पहुंचाने के साथ-साथ सीमा पर चल रहे इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए निर्माण सामग्री भी समय पर भेज सकेगी।
भारत-चीन सीमा पर 3,488 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के आसपास कई इलाके ऐसे हैं जो अभी भी सड़क मार्ग से जुड़े नहीं हैं। ऐसे इलाकों में रसद पहुंचाने के लिए वायुसेना और सेना के हेलीकॉप्टर ही एकमात्र विकल्प होते हैं। लेकिन ध्रुव हेलीकॉप्टरों के ग्राउंड होने के कारण यह चुनौती और भी बढ़ गई थी। ALH हेलीकॉप्टर भारतीय सेना और वायुसेना के लिए एक वर्कहॉर्स की तरह काम करते हैं। अकेले 2024 में भारतीय सेना में ALH हेलीकॉप्टरों ने 5,000 फीट से अधिक ऊंचाई वाले इलाकों में 40,000 घंटे से अधिक की उड़ान भरी थी।
पिछले साल भी हुआ था करार
इससे पहले पिछले साल अक्टूबर में भारतीय सेना ने पहली बार बॉर्डर इलाकों आवश्यक सप्लाई के लिए निजी सिविल एविएशन कंपनियों के साथ करार किया था। यह कदम खासतौर पर उन फॉरवर्ड पोस्ट के लिए उठाया गया था, जो सर्दियों के दौरान भारी बर्फबारी के कारण अन्य हिस्सों से कट जाती हैं। इसके तहत सेना ने अपने एविएशन रिसोर्सेज की जगह सिविलियन हेलिकॉप्टरों के इस्तेमाल का फैसला किया था, जिससे न केवल लागत में कमी आएगी, बल्कि सैन्य हेलिकॉप्टरों को युद्ध और इमरजेंसी सेवाओं के लिए सुरक्षित रखा जा सकेगा।
इस करार के तहत जम्मू क्षेत्र की 16 रिमोट चौकियों को पूरे साल और कश्मीर और लद्दाख की 28 चौकियों को 150 दिनों तक सिविल हेलिकॉप्टरों के जरिये सप्लाई दी जाएगी। इस पहल के तहत हेलिकॉप्टर ऑपरेशन के लिए लद्दाख में सात, कश्मीर में दो और जम्मू क्षेत्र में एक माउंटिंग बेस बनाए गए हैं, जो कुल 44 चौकियों को कवर करेंगे। इन बेसों का डेवलपमेंट बॉर्डर एरिया डेवलपमेंट प्रोग्राम और पीएम गति शक्ति योजना के तहत किया गया है, ताकि सीमावर्ती इलाकों में एक इंटीग्रेटेड लॉजिस्टिक्स नेटवर्क तैयार किया जा सके।
Chinese Spyware: रक्षा मंत्रालय ने भारतीय सेना के लिए देश की निजी कंपनियों की तरफ से बनाए जा रहे ड्रोन्स में चीनी पार्ट्स के इस्तेमाल पर कड़ी कार्रवाई की है। रक्षा मंत्रालय ने 400 लॉजिस्टिक्स ड्रोन्स के तीन बड़े सौदों को रद्द कर दिया है। यह कदम देश की साइबर सिक्योरिटी और सैन्य गोपनीयता को ध्यान में रखते हुए उठाया गया है। सूत्रों का कहना है कि चीनी पुर्जों के चलते ड्रोन्स में हैकिंग और डेटा लीक जैसी घटनाओं का खतरा बढ़ गया था। इससे पहले भी पिछले साल जून में रक्षा मंत्रालय ने लॉजिस्टिक्स ड्रोनों के एक बड़े ऑर्डर को कैंसिल किया था।
Chinese Spyware: ड्रोन्स की कुल कीमत 230 करोड़
रक्षा मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक, इन सौदों में 200 मीडियम-एल्टीट्यूड, 100 हैवी-वेट और 100 लाइट-वेट लॉजिस्टिक्स ड्रोन्स शामिल थे। इन ड्रोन्स की कुल कीमत 230 करोड़ रुपये से अधिक थी। ये ड्रोन्स मुख्य रूप से भारत-चीन सीमा पर 3,488 किलोमीटर लंबे लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) पर तैनात किए जाने थे। चीन के साथ पूर्वी लद्दाख में 2020 से जारी सैन्य तनाव के बीच इन ड्रोन्स की तैनाती बेहद अहम मानी जा रही थी।
रक्षा मंत्रालय के एक अधिकारी के मुताबिक, “कुछ भारतीय कंपनियां सेना के लिए बनाए जा रहे ड्रोन्स में चीन में बने इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स का इस्तेमाल कर रही थीं।, जो कि साइबर सिक्योरिटी के लिए एक बड़ा खतरा है। इसके चलते हमारे मिलिट्रीपरेंशन की जानकारी लीक हो सकती थी। ऐसे पार्ट्स के जरिए दुश्मन इन ड्रोन्स को हैक कर सकता है या उन्हें जाम कर सकता है।”
PoK में चला गया था एक ड्रोन
इससे पहले अगस्त 2024 में जम्मू-कश्मीर के राजौरी सेक्टर में एलओसी के पास तैनात एक इन्फैंट्री यूनिट का एक ड्रोन अचानक कंट्रोल से बाहर हो गया था और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में चला गया। इस घटना की जांच में पता चला कि ड्रोन में तकनीकी गड़बड़ी थी। सूत्रों का कहना है कि इसके पीछे चीनी पर्ट्स के इस्तेमाल की बात कही गई थी। इस घटना की जांच के बाद ड्रोन निर्माता कंपनी को भी तलब किया गया था।
चीनी पार्ट्स या सॉफ्टवेयर कोड न हो
रक्षा मंत्रालय ने अब ड्रोन्स की खरीद फरोख्त में सख्त नियम लागू करने का फैसला किया है। इन मानकों के तहत ड्रोन निर्माताओं को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके प्रोडक्ट्स में 50 फीसदी से अधिक सामग्री स्वदेशी हो। ड्रोन बनाने वाली कंपनियों को अब यह साबित करना होगा कि उनके ड्रोन्स में किसी भी प्रकार के चीनी पार्ट्स या सॉफ्टवेयर कोड का इस्तेमाल नहीं किया गया है। इसके अलावा, इंडिपेंडेंट टेक्निकल चेक एंड वेरिफिकेशन सिस्टम भी लागू किया जाएगा, ताकि किसी भी तरह की सुरक्षा चूक को रोका जा सके।
साथ ही, रक्षा मंत्रालय ने देश के प्रमुख उद्योग निकायों फिक्की, सीआईआई और एसोचैम को भी निर्देश दिया है कि वे अपने मैंबर्स कंपनियों को ड्रोन मैन्युफैक्चरिंग में चीनी पार्ट्स के इस्तेमाल से बचने के लिए जागरूकता अभियान चलाएं।
भारत सरकार ने 2020 में गलवान हिंसा के बाद से चीन के साथ सीमा विवाद के चलते कई मिलिट्री इक्विपमेंट्स और टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाए थे। इसके बावजूद देश की कई ड्रोन बनाने वाली कंपनियां लागत कम रखने के लिए चीनी पार्ट्स का इस्तेमाल कर रही थीं, जिससे साइबर सुरक्षा में सेंध लगाने का खतरा बढ़ गया था।
Chinese Spyware: जून 2024 में एक कंपनी का रद्द किया था ऑर्डर
इससे पहले पिछले साल जून में रक्षा मंत्रालय (MoD) ने लॉजिस्टिक्स ड्रोनों के एक बड़े ऑर्डर को रोक दिया था। आर्मी डिजाइन ब्यूरो (ADB) के अतिरिक्त महानिदेशक मेजर जनरल सीएस मान ने रक्षा समाचार को बताया था कि यह बड़ा खतरा है। सरकार पहले ही मिलिट्री सिस्टम्स में चीनी कंपोनेंट्स की घुसपैठ को रोकने के लिए कदम उठा चुकी है। भारतीय सेना ने चेन्नई की धक्षा अनमैन्ड सिस्टम्स प्राइवेट लिमिटेड के 200 लॉजिस्टिक ड्रोन की खरीद पर रोक लगाई थी। कंपनी पर अपने ड्रोन में चीनी उपकरणों के इस्तेमाल का आरोप था। धक्षा कोरामंडल इंटरनेशनल की सहायक कंपनी है। रक्षा मंत्रालय (MoD) ने 25 जून को CII, FICCI और ASSOCHAM को पत्र लिखकर धक्षा और दो अन्य कंपनियों से रक्षा उपकरण खरीद में सतर्कता बरतने की सलाह दी थी। हालांकि धक्षा कंपनी के प्रवक्ता ने आरोपों को “असत्य और निराधार” बताते हुए कहा था, “हम अपने डिफेंस ड्रोन में किसी भी चीनी पुर्जों का इस्तेमाल नहीं करते।”
ड्रोन्स में चीनी पुर्जों के खतरे
रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, चीनी पुर्जों के इस्तेमाल से सबसे बड़ा खतरा डेटा लीक और मिलिट्री ऑपरेशंस की जानकारी लीक होने का है। चीनी इलेक्ट्रॉनिक्स में ‘बैकडोर’ प्रोग्रामिंग हो सकती है, जो सिक्योरिटी सिस्टम को बाइपास कर संवेदनशील जानकारी दुश्मनों तक पहुंचा सकती है। कम्यूनिकेशन मॉड्यूल, कैमरा सिस्टम और कंट्रोल सिस्टम में छुपे ये कोड ड्रोन के ऑपरेशन में दिक्कत पैदा कर सकते हैं या दुश्मन के नियंत्रण वाले इलाके में ले जा सकते हैं।
DGMI ने 2010 और 2015 में जारी किए थे निर्देश
रक्षा मंत्रालय के एक इंटरनल नोट के मुताबिक, डायरेक्टर जनरल मिलिट्री इंटेलिजेंस (DGMI) ने 2010 और 2015 में निर्देश जारी कर सेंसिटिव सिक्योरिटी डिवाइसेज में चीनी पार्ट्स के इस्तेमाल पर रोक लगाने के निर्देश दिया था।
बावजूद इसके, ड्रोन मैन्युफैक्चरिंग में इस निर्देश का पूरी तरह पालन नहीं किया गया। 2017 में चीन में लागू एक कानून के तहत वहां की सभी टेक कंपनियों को सरकारी एजेंसियों के साथ डेटा शेयर करना जरूरी है, जिससे चीनी टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल के जोखिम और भी बढ़ जाते हैं। सेना का कहना है कि ड्रोन में लगे सेंसर और फ्लाइट कंट्रोलर रियल-टाइम डेटा और लोकेशन को उन देशों के सर्वर पर शेयर कर सकते हैं।
भारत का ड्रोन बाजार अगले दशक में 40 अरब डॉलर (लगभग 3.36 लाख करोड़ रुपये) तक पहुंचने की संभावना है। सरकार उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना और ड्रोन रेगुलेशन 2021 जैसे सुधारों के जरिए स्थानीय स्तर पर ड्रोन मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा दे रही है। भारतीय सेना भी अगले कुछ सालों में 2,500 से अधिक मिलिट्री ड्रोन खरीदने की योजना बना रही है, जिन पर लगभग 3,000 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे।
Chabahar Port: पहले तो अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने 104 भारतीय नागरिकों को जबरन एक अमेरिकी मिलिट्री एयरक्राफ्ट सी-17 ग्लोबमास्टर के जरिए अमृतसर भेजा। वहीं अब ट्रंप ने भारत को दूसरा झटका दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के चाबहार पोर्ट से जुड़े प्रतिबंधों पर दी गई छूट को रद्द करने का आदेश दिया है। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब भारत ने चाबहार पोर्ट के डेवलपमेंट के लिए ईरान के साथ 10 साल का समझौता किया था, जिससे अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक भारत की सीधी पहुंच सुनिश्चित होती।
Chabahar Port: पहले छूट दी, फिर वापस ली
अमेरिका ने पहले चाबहार पोर्ट के मॉडर्नाइजेशन को प्रतिबंधों से छूट दी थी, क्योंकि यह पोर्ट भारत के लिए अफगानिस्तान तक मानवीय मदद पहुंचाने का एक महत्वपूर्ण मार्ग था। नवंबर 2018 में राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत को चाबहार पोर्ट के डेवलपमेंट के लिए छूट प्रदान की थी, जिससे भारत को पाकिस्तान को बायपास कर अफगानिस्तान तक सीधी पहुंच मिलती थी।
क्या है नेशनल सिक्योरिटी मेमोरेंडम में?
हालांकि, अब व्हाइट हाउस की तरफ से जारी ‘प्रेसिडेंशियल नेशनल सिक्योरिटी मेमोरेंडम’ में ईरान के खिलाफ कई कदम उठाने का एलान किया गया है। मेमोरेंडम में लिखा गया है, “विदेश मंत्री मार्को रुबियो को ऐसे सभी प्रतिबंध छूट को संशोधित या समाप्त करने का निर्देश दिया जाता है, जो ईरान को किसी भी प्रकार की आर्थिक या वित्तीय राहत प्रदान करते हैं, जिसमें ईरान के चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट से संबंधित छूट भी शामिल है।”
भारत के लिए क्यों है चिंता की बात?
पिछले साल मई में भारत और ईरान के बीच एक 10 वर्षीय समझौता हुआ था, जिसका उद्देश्य चाबहार पोर्ट को एक क्षेत्रीय कनेक्टिविटी हब के रूप में डेवलप करना था। इस पोर्ट के जरिए भारत को अफगानिस्तान, मध्य एशिया और यूरेशिया तक सीधी पहुंच मिलती। यह परियोजना न केवल व्यापारिक दृष्टि से बल्कि रणनीतिक लिहाज से भी भारत के लिए अत्यंत जरूरी थी।
इस परियोजना के तहत भारत पोर्ट के विकास के लिए करीब 120 मिलियन डॉलर का निवेश करने वाला था। इसके अलावा, भारत ने ईरान को चाबहार पोर्ट के बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर को डेवलप करने के लिए 250 मिलियन डॉलर का क्रेडिट भी ऑफर किया था। भारत पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड (IPGL) और ईरान के पोर्ट्स एंड मैरीटाइम ऑर्गनाइजेशन (PMO) के बीच हुए समझौते के मुताबिक IPGL अगले 10 सालों तक इस पोर्ट को विकसित और संचालित करने वाला था। इसके बाद दोनों देशों के बीच सहयोग को और आगे बढ़ाने की योजना थी।
ईरान के तटीय शहर चाबहार में स्थित यह पोर्ट भारत के रणनीतिक और आर्थिक हितों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। भारत और ईरान के बीच चाबहार पोर्ट के डेवलपमेंट को लेकर 2003 में सहमति बनी थी, लेकिन इस परियोजना ने असल रफ्तार 2016 में पकड़ी, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरान का दौरा किया। 15 सालों में यह किसी भारतीय प्रधानमंत्री का पहला ईरानी दौरा था, और इसी दौरान चाबहार पोर्ट के डेवलपमेंट के समझौते को मंज़ूरी मिली।
2019 में पहली बार चाबहार पोर्ट के जरिए पाकिस्तान को साइडलाइन करके अफगानिस्तान से माल भारत लाया गया। यह पोर्ट इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) का हिस्सा है, जो भारत, ईरान, अफगानिस्तान, रूस, और यूरोप के बीच 7,200 किलोमीटर लंबा ट्रांसपोर्ट नेटवर्क है। इससे भारत की मध्य एशिया और यूरोप तक पहुंच आसान हो जाती है, जो न केवल आर्थिक तौर पर बल्कि कूटनीतिक तौर से भी फायदेमंद है।
हालांकि 2020 में कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया था कि ईरान ने भारत को एक रेलवे प्रोजेक्ट से अलग कर दिया है, जिससे दोनों देशों के रिश्तों में तनाव आया। लेकिन अब दोनों देशों के बीच फिर से चाबहार पर अहम समझौता हुआ है, जिसे रिश्तों में सुधार के संकेत के तौर पर देखा गया।
चाबहार पोर्ट का पाकिस्तान और चीन के ग्वादर पोर्ट के मुकाबले भारत के लिए रणनीतिक तौर पर बेहद अहम है। ग्वादर पोर्ट चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) का हिस्सा है, भारत के लिए चिंता का विषय रहा है। ऐसे में चाबहार पोर्ट न केवल भारत के लिए व्यापार का एक वैकल्पिक मार्ग है, बल्कि यह चीन की अरब सागर में बढ़ती मौजूदगी को संतुलित करने का एक साधन भी है।
तालिबान की अफगानिस्तान में वापसी के बाद भारत का मध्य एशिया से संपर्क सीमित हो गया था। ऐसे में चाबहार पोर्ट भारत को काबुल तक अपनी पहुंच बनाए रखने और मध्य एशियाई देशों के साथ व्यापारिक संबंध मजबूत करने का मौका देता है। इस पोर्ट के माध्यम से भारत अफगानिस्तान को मानवीय मदद भी पहुंचा सकता है, जिससे उसकी इस क्षेत्र में पकड़ भी बनी रहती है।
चाबहार को INSTC से जोड़ने की तैयारी
चाबहार पोर्ट को इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) से भी जोड़ा जाएगा, जिससे भारत, ईरान, अफगानिस्तान, रूस और यूरोप के बीच 7,200 किलोमीटर लंबा परिवहन नेटवर्क तैयार होगा। इससे भारत को मध्य एशिया और यूरोप के साथ व्यापारिक कनेक्टिविटी बढ़ाने में मदद मिलेगी और पाकिस्तान को दरकिनार कर सीधा व्यापार मार्ग मिलेगा। साथ ही, यह पोर्ट अरब सागर में चीन की मौजूदगी को चुनौती देने के लिए भारत के लिए एक अहम रणनीतिक साधन भी साबित होगा।
ट्रंप के फैसले का क्या पड़ेगा असर
अमेरिका के इस फैसले से भारत की कई योजनाओं पर असर पड़ सकता है। चाबहार बंदरगाह के दो पोर्ट हैं- शाहिद बेहेस्ती और शाहिद कलंतरी। चाबहार पोर्ट के जरिए भारत, चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) को टक्कर देने की रणनीति पर काम कर रहा था। यह पोर्ट भारत को चीन-पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट के विकल्प के तौर पर अपनी पकड़ मजबूत करने का मौका देता है। इसके अलावा भारत और ईरान के बीच चाबहार पोर्ट के जरिए मजबूत होते संबंधों को भी इस फैसले से झटका लग सकता है। ईरान, भारत के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार रहा है, खासकर ऊर्जा क्षेत्र में।
इसके अलावा, भारत अफगानिस्तान में निर्माण परियोजनाओं, दवाइयों और खाद्य आपूर्ति के लिए चाबहार पोर्ट का इस्तेमाल करता रहा है। चाबहार पोर्ट का इस्तेमाल भारत के लिए एक सस्ता और सुरक्षित विकल्प था। अब अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के बाद भारत को वैकल्पिक मार्गों की तलाश करनी पड़ सकती है, जिससे लागत और समय दोनों बढ़ सकते हैं। साथ ही, अमेरिका के इस कदम के बाद भारत को अपने निवेश और पोर्ट ऑपरेशन के लिए नए विकल्प तलाशने पड़ सकते हैं, या फिर अमेरिकी दबाव के तहत इन योजनाओं को सीमित करना पड़ सकता है।
तालिबान से हुई थी बैठक
8 जनवरी 2025 को दुबई में भारत और तालिबान के बीच चाबहार पोर्ट को लेकर एक महत्वपूर्ण बैठक हुई थी। भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री और अफगानिस्तान के कार्यवाहक विदेश मंत्री मौलवी आमीर खान मुत्ताकी के बीच हुई इस हाई-लेवल मीटिंग में चाबहार पोर्ट के जरिए व्यापार बढ़ाने पर चर्चा हुई। इस बैठक के बाद चीन और पाकिस्तान की चिंताएं बढ़ गईं, क्योंकि चाबहार पोर्ट ग्वादर पोर्ट के लिए एक बड़ा रणनीतिक विकल्प है, जिसे चीन और पाकिस्तान मिलकर विकसित कर रहे हैं।
बैठक के बाद भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जयसवाल ने सोशल मीडिया पर बताया था कि दोनों पक्षों ने अफगानिस्तान को दी जा रही मानवीय सहायता, द्विपक्षीय मुद्दों और सुरक्षा स्थिति पर चर्चा की। चाबहार पोर्ट के माध्यम से व्यापार को बढ़ावा देने पर सहमति व्यक्त की। अब तक भारत चाबहार के जरिए अफगानिस्तान को 25 लाख टन गेहूं और 2 हजार टन दालें भेज चुका है।
Illegal Indian Migrants: अमेरिका से 104 भारतीय नागरिकों को जबरन एक अमेरिकी मिलिट्री एयरक्राफ्ट सी-17 ग्लोबमास्टर के जरिए हाल ही में अमृतसर भेजा गया। अमेरिका के इस तरह वापस भेजे जाने को लेकर सोशल मीडिया पर नई बहस छिड़ गई है कि जिस तरह से अमेरिका ने इन्हें वापस भेजा है क्या यह अमेरिका का रवैया सही है। ये नागरिक अवैध प्रवासी थे, जो अच्छे जीवन और बेहतर रोजगार की तलाश में डंकी रूट से अमेरिका में घुसे थे। इन्हें अमेरिकी सेना के विमान में हथकड़ियां और पैरों में बेड़ियां डालकर भारत भेजा गया। यह घटना तब घटी जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 13-14 फरवरी को अमेरिकी दौरे पर जा रहे हैं, जहां उनकी मुलाकात राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से होने वाली है। सवाल यह उठता है कि क्या ट्रंप अब भी भारत के ‘फ्रेंड’ हैं?
इस घटना के फोटो और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गए हैं। सोशल मीडिया पर लोग भारत सरकार की चुप्पी पर हैरान हैं। सबसे पहला सवाल तो यही है कि क्या अमेरिका ने अपने सैन्य विमान में भारतीय नागरिकों को अपराधियों की तरह भेजकर भारत का अपमान किया है? और अगर ऐसा है, तो भारत सरकार ने इसका विरोध क्यों नहीं किया? कोलंबिया और मेक्सिको जैसे देशों ने जब अमेरिकी सेना के विमानों में उनके नागरिकों को हथकड़ियों में भेजा गया, तो उन्होंने विरोध जताया और अपने नागरिकों को सम्मान के साथ वापस लाने के लिए अपने विमान भेजे। लेकिन भारत ने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया।
Illegal Indian Migrants: कैसे हुआ यह सब?
सूत्रों के अनुसार, इन भारतीयों को अमेरिका में अवैध रूप से प्रवेश करने और रहने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। अमेरिका की इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट (ICE) एजेंसी ने इन्हें डिपोर्ट करने का फैसला कियाया। हालांकि, जिस तरीके से यह डिपोर्टेशन किया गया, उसने ह्यूमन राइट्स एंड डिप्लोमेटिक एटिकेट्स पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
हाथों में हथकड़ी, पैरों में बेड़ियां और कमर में जंजीरें बांधकर इन लोगों को अमेरिका के सैन्य विमान में बैठाया गया। यह वही तरीका है, जिसे आमतौर पर खतरनाक अपराधियों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इन अवैध भारतीयों में 25 महिलाएं और 12 नाबालिग बच्चे भी शामिल थे।
Illegal Indian Migrants: अमृतसर एयरपोर्ट पर गुप्त तरीके से लैंडिंग
इस सैन्य विमान की लैंडिंग के समय मीडिया को एयरपोर्ट तक पहुंचने की अनुमति नहीं दी गई। किसी भी पत्रकार या फोटोग्राफर को विमान की तस्वीरें लेने या प्रवासियों से बातचीत करने की इजाजत नहीं दी गई। हालांकि, कुछ स्थानीय लोगों ने विमान के उतरने का वीडियो बना लिया, जो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।
सरकार की ओर से इस मामले पर कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया गया, जिससे यह सवाल उठता है कि आखिर सरकार ने इस शर्मनाक स्थिति पर प्रतिक्रिया क्यों नहीं दी?
Illegal Indian Migrants: कोलंबिया और मेक्सिको का रुख
जहां कोलंबिया और मेक्सिको जैसे देशों ने अमेरिका के इस कदम का विरोध किया, वहीं भारत ने इस मामले में चुप्पी साध ली। कोलंबिया के राष्ट्रपति गुस्ताव पेट्रो ने अमेरिकी सैन्य विमान को अपने देश में उतरने की अनुमति नहीं दी थी। उन्होंने अपने नागरिकों को वापस लाने के लिए खुद का विमान भेजा और यह सुनिश्चित किया कि उन्हें सम्मानजनक तरीके से वापस लाया जाए।
कोलंबिया के राष्ट्रपति ने कहा, “प्रवासियों को हथकड़ी पहनाना और अपराधियों जैसा व्यवहार करना उनकी गरिमा का अपमान है।”
इसके विपरीत, भारत सरकार ने न केवल अमेरिकी सैन्य विमान को अपने एयरपोर्ट पर उतरने दिया, बल्कि इस मुद्दे पर कोई विरोध भी दर्ज नहीं कराया। इस पर सवाल उठ रहे हैं कि भारत ने अपने नागरिकों की गरिमा की रक्षा के लिए कोई कदम क्यों नहीं उठाया?
भारतीयों को क्यों नहीं मिला सम्मानजनक वापसी का अधिकार?
इस घटना के बाद सवाल उठता है कि क्या भारत सरकार को अपने नागरिकों के सम्मान की परवाह नहीं है? क्या भारत की विदेश नीति में इतनी मजबूती नहीं है कि वह अपने नागरिकों के लिए आवाज उठा सके? वहीं, विदेश मंत्रालय की ओर से जारी एक संक्षिप्त बयान में कहा गया कि, “भारत अवैध प्रवास के खिलाफ है और अमेरिका के साथ इस मुद्दे पर सहयोग जारी रखेगा।” हालांकि, मंत्रालय ने हथकड़ी और बेड़ियों में लाए गए भारतीय नागरिकों के बारे में कोई टिप्पणी नहीं की। यह भी स्पष्ट नहीं किया गया कि क्या भारत ने अमेरिका से इस अमानवीय व्यवहार पर स्पष्टीकरण मांगा है या नहीं।
लेकिन सवाल यह है कि इस सहयोग का मतलब क्या है? क्या इसका मतलब यह है कि भारत अपने नागरिकों के साथ हो रहे अपमानजनक व्यवहार को भी नजरअंदाज कर देगा?
Illegal Indian Migrants: भारत को करना चाहिए था विरोध
अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने भी इस मुद्दे पर अपनी राय दी है। अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार ब्रह्मा चेलानी कहते हैं, मेक्सिको और कोलंबिया ने हथकड़ी लगे प्रवासियों को ले जाने वाली अमेरिकी सैन्य उड़ानों को रोक दिया। जबकि कोलंबिया ने निर्वासितों को “अमानवीय व्यवहार” के बिना लाने के लिए अपना खुद का विमान भेजा। लेकिन भारत ने न केवल हथकड़ी लगे निर्वासितों के साथ एक अमेरिकी जहाज को लैंड करने दिया, बल्कि यह भी दावा किया कि अवैध प्रवास का मुकाबला करने में “भारत और अमेरिका के बीच सहयोग मजबूत और प्रभावी है”। उनका कहना है कि जब अमेरिकी विमान भारतीयों को ला रहा था, तो भारत को इस बात पर जोर देना चाहिए था कि निर्वासितों के साथ मानवीय व्यवहार किया जाए, न कि उनके हाथों और पैरों को अपराधियों की तरह बेड़ियों से बांधा जाए।
इस घटना के समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रयागराज में गंगा स्नान कर रहे थे। कई लोगों का मानना है कि यह समय जानबूझकर चुना गया, ताकि मीडिया का ध्यान कहीं और लगा रहे और इस मुद्दे पर ज्यादा हंगामा न हो।
सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे पर सरकार की चुप्पी की आलोचना हो रही है। कई यूजर्स ने सवाल उठाया है कि अगर यह घटना किसी अन्य सरकार के कार्यकाल में हुई होती, तो क्या मोदी सरकार और समर्थक इतने चुप रहते?
क्या बदल रहे हैं भारत-अमेरिका संबंध?
यह घटना ऐसे समय पर हुई है जब प्रधानमंत्री मोदी अमेरिका दौरे पर जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटना भारत-अमेरिका संबंधों में संभावित तनाव का संकेत हो सकती है।
डोनाल्ड ट्रंप के फिर से राष्ट्रपति बनने के बाद भारत-अमेरिका संबंधों में बदलाव आ सकता है। ट्रंप के कार्यकाल में भारत को अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी में प्राथमिकता दी गई थी, लेकिन अब ऐसा लगता है कि अमेरिका का रुख बदल रहा है।
विदेश और रक्षा मामलों के एक दूसरे जानकार प्रवीण साहनी कहते हैं, अमेरिका ने जिस तरह से 100 से अधिक भारतीय अवैध प्रवासियों, जिनमें महिलाएं और नाबालिग भी शामिल थे, को हथकड़ी और बेड़ियों में जकड़कर सैन्य विमान के जरिए भारत वापस भेजा। यह सिर्फ अवैध प्रवासियों को वापस भेजने का मामला नहीं है, बल्कि इससे पता चलता है कि भारत-अमेरिका संबंधों में एक गंभीर दरार पैदा हो गई है। इस पूरे घटनाक्रम के पीछे कई राजनीतिक और कूटनीतिक कारण छिपे हुए हैं।
वह कहते हैं, यह घटना बताती है कि ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में अमेरिका अपनी ताकत को बढ़ाने पर जोर देगा और भारत को ज्यादा प्राथमिकता नहीं दी जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि चीन के खिलाफ हिंद महासागर क्षेत्र में अमेरिका के सहयोगी के रूप में भारत की भूमिका अब अमेरिका की प्राथमिकता नहीं होगी। वह आगे कहते हैं कि मोदी 2024 में अमेरपिका दौरे पर आए थे, लेकिन उन्होंने ट्रंप की चुनावी रैली में हिस्सा नहीं लिया। जबकि ट्रंप ने रैली में एलान किया था कि उनके मित्र मोदी आएंगे। साहनी के मुताबिक, ट्रंप व्यक्तिगत अपमान को गंभीरता से लेते हैं।
वह आगे कहते हैं कि ट्रंप जानते हैं कि मोदी विश्व नेता के रूप में अपनी छवि को पेश करने में मदद के लिए अमेरिका के समर्थन पर बहुत अधिक निर्भर हैं। प्रवीण के मुताबिक यह बेहद दुख की बात है कि ट्रंप के इतना करने के बावजूद मोदी ‘व्यक्तिगत संबंध’ की खातिर ट्रंप से मिलने के लिए अमेरिका जाएंगे। वह कहते हैं कि ट्रंप ने जिस तरह से देश का अपमान किया है, कोई भी स्वाभिमानी देश ट्रंप के नखरे और अपमान को सहन नहीं करेगा।
सरकार की चुप्पी और मीडिया का रवैया
इस घटना पर भारत सरकार की चुप्पी और मीडिया की चुप्पी भी सवालों के घेरे में है। जब ऑपरेशन गंगा के तहत यूक्रेन से भारतीय छात्रों को लाया गया था, तब मीडिया ने इसे बड़े जोर-शोर से दिखाया था। लेकिन इस बार जब भारतीय नागरिकों को बेड़ियों में जकड़कर लाया गया, तो मीडिया ने इसे नजरअंदाज कर दिया। क्या यह सरकार की नाकामी को छिपाने की कोशिश थी?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गुजरात से भी कई नागरिक इस विमान में थे। सवाल यह है कि जब गुजरात को विकास का मॉडल बताया जाता है, तो वहां के लोग क्यों अवैध तरीके से अमेरिका जाने की कोशिश कर रहे हैं? क्या यह विकास के दावों पर सवाल नहीं उठाता?
अवैध प्रवासियों के बढ़ते मामले और भारत की चुनौती
यह पहली बार नहीं है जब भारतीय नागरिकों को अवैध प्रवास के आरोप में गिरफ्तार कर वापस भेजा गया है। पिछले कुछ वर्षों में अवैध रूप से अमेरिका और कनाडा जाने की घटनाओं में वृद्धि हुई है।
कनाडा में भी हजारों भारतीय छात्रों के लापता होने की खबरें आई हैं, जिन पर अवैध प्रवास का शक जताया गया है। गुजरात और पंजाब के युवा विशेष रूप से अमेरिका और कनाडा में बसने के लिए अवैध रास्ते अपनाते हैं।
Indian Navy Aircraft Carrier: भारतीय नौसेना की तीन एयरक्राफ्ट कैरियर को ऑपरेट करने की योजना को सरकार ने खारिज कर दिया है। इसके बजाय, नौसेना अब अपने दूसरे स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर (IAC) को INS विक्रमादित्य के रिप्लेसमेंट के तौर पर डेवलप करने की तैयारी कर रही है। रिपोर्ट्स के अनुसार, सरकार इस योजना का समर्थन नहीं कर रही है कि नौसेना के पास एक साथ तीन एयरक्राफ्ट कैरियर हों। भारतीय नौसेना का कहना था कि अगर तीन एयरक्राफ्ट कैरियर उपलब्ध रहते हैं, तो उनमें से दो हमेशा एक्टिव रह सकते हैं, जबकि एक मरम्मत या अपग्रेड के लिए डॉक में रहे।
INS Vikramaditya
Indian Navy Aircraft Carrier: बदलती रणनीति और चीन की बढ़ती समुद्री शक्ति
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब रिपोर्ट्स में कहा गया है कि चीन अपने न्यूक्लियर-पावर्ड एयरक्राफ्ट कैरियर प्रोग्राम को आगे बढ़ा रहा है। चीन का चौथा एयरक्राफ्ट कैरियर न्यूक्लियर एनर्जी से ऑपरेट हो सकता है, जिससे उसकी नौसैनिक ताकत और अधिक बढ़ सकती है।
भारतीय नौसेना ने पहले तीन एयरक्राफ्ट कैरियर की रणनीति बनाई थी, लेकिन अब यह योजना बदली जा रही है। इससे पहले, कई नौसेना प्रमुखों ने तीन एयरक्राफ्ट कैरियर होने की बात कही थी, जिनमें पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल हरी कुमार भी शामिल थे।
हालांकि, सरकार का नजरिया इससे अलग रहा है। 2020 से ही सरकार का झुकाव पनडुब्बियों (Submarines) को प्राथमिकता देने की ओर है। पूर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल बिपिन रावत ने भी तीन एयरक्राफ्ट कैरियर की जरूरत पर संदेह जताया था और इन्हें “सिटिंग डक” (आसानी से निशाना बनने वाले) कहकर इनकी उपयोगिता पर सवाल उठाए थे। सरकार को लगता है कि एयरक्राफ्ट कैरियर की तुलना में पनडुब्बियां समुद्री युद्ध में ज्यादा प्रभावी भूमिका निभा सकती हैं, खासकर ऐसे समय में जब चीन एंटी-शिप बैलिस्टिक मिसाइल (ASBM) विकसित कर रहा है, जो बड़े जहाजों को निशाना बनाने में सक्षम हैं।
Indian Navy Aircraft Carrier: INS विक्रमादित्य का भविष्य
पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल हरी कुमार ने INS विक्रांत जैसे दूसरे एयरक्राफ्ट कैरियर के निर्माण का प्रस्ताव दिया था। लेकिन उनके पहले के नौसेना प्रमुखों ने सुझाव दिया था कि नया एयरक्राफ्ट कैरियर बड़ा और अधिक क्षमता वाला होना चाहिए, ताकि ज्यादा फाइटर जेट पार्क हो सकें। उनके अनुसार, CATOBAR (Catapult Assisted Take-Off Barrier Arrested Recovery) टेक्नोलॉजी से लैस एयरक्राफ्ट कैरियर कारगर साबित हो सकता है और युद्ध में अधिक प्रभावी भूमिका निभा सकता है।
नौसेना के सूत्रों के मुताबिक, INS विक्रमादित्य, जो रूसी मूल का एक एयरक्राफ्ट कैरियर है, अगले 10-12 वर्षों में रिटायर हो सकता है। ऐसे में नौसेना का मानना है कि नए स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर को INS विक्रमादित्य के रिप्लेसमेंट के तौर पर देखा जाना चाहिए, न कि एक अतिरिक्त एयरक्राफ्ट कैरियर के तौर पर। चूंकि एक नए नए स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर (IAC-2) को बनाने में कम से कम 10-12 साल लगते हैं, इसलिए नौसेना INS विक्रमादित्य के रिप्लेसमेंट की तैयारियां अभी से करना चाहती है।
राजनाथ सिंह ने कही थी ये बात
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने मई 2024 में यह एलान किया था कि भारत जल्द ही अपने तीसरे एयरक्राफ्ट कैरियर का निर्माण शुरू करेगा, जो INS विक्रमादित्य की जगह लेगा। हालांकि, INS विक्रांत की तरह 45,000 टन का यह विमानवाहक पोत कोचीन शिपयार्ड में निर्मित किया जाएगा और इसमें पारंपरिक इंजन (Conventional Propulsion) होगा।
Indian Navy Aircraft Carrier: भारत के पास दो एयरक्राफ्ट कैरियर
भारत फिलहाल दो एयरक्राफ्ट कैरियर ऑपरेट कर रहा है। इनमें पहला INS विक्रमादित्य है, जो 2014 में भारतीय नौसेना में शामिल हुआ। यह रूस से खरीदा गया था और इसमें स्की-जंप टेकऑफ सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता है। जबकि INS विक्रांत 2022 में भारत में बना पहला स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर है। इसे कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड ने बनाया है और यह भी स्की-जंप टेक्नोलॉजी पर आधारित है।
दोनों विमानवाहक पोत करीब 25-30 फिक्स्ड-विंग लड़ाकू विमानों और 10 हेलीकॉप्टरों को ऑपरेट कर सकते हैं। अगर तीसरा विमानवाहक पोत भी इसी साइज का होता है, तो इसकी क्षमता भी समान होगी।
मनोहर पर्रिकर की ये थी प्लानिंग
पूर्व रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर के कार्यकाल में भारत के दूसरे स्वदेशी विमानवाहक पोत (IAC-2) को 65,000 टन वजन और CATOBAR तकनीक के साथ डिजाइन करने की योजना थी। इस एय़रक्राफ्ट कैरियर को न्यूक्लियर एनर्जी से संचालित करने पर विचार किया गया था। साथ ही, योजना थी कि इस पर 54 फाइटर जेट्स पार्क किए जा सकें। इसके अलावा भविष्य में जरुरत पड़ने पर एय़रक्राफ्ट कैरियर को इलेक्ट्रोमैग्नेटिक कैटापल्ट लॉन्च सिस्टम (EMALS) जैसी अत्याधुनिक तकनीक से लैस किया जा सके।
भारत की तीन एयरक्राफ्ट कैरियर की नीति क्यों बदली?
भारत सरकार ने नौसेना को स्पष्ट कर दिया है कि अब एय़रक्राफ्ट कैरियर के बजाय पनडुब्बियों को प्राथमिकता दी जाएगी। इसकी जो प्रमुख वजहें बताई गई हैं, उनके अनुसार एक एय़रक्राफ्ट कैरियर न केवल अपने आप में बहुत महंगा होता है, बल्कि उसके साथ काम करने वाले कैरीयर बैटल ग्रुप (CBG) और लड़ाकू विमानों की लागत भी बहुत अधिक होती है।
इसके अलावा चीन ने लंबी दूरी की एंटी-शिप बैलिस्टिक मिसाइलें (ASBM) विकसित की हैं, जो विशेष रूप से अमेरिकी विमानवाहक पोतों को निशाना बनाने के लिए डिज़ाइन की गई हैं। अमेरिका के विमानवाहक पोत ज्यादा बड़े और सुरक्षित हैं, फिर भी वे खतरे में हैं। ऐसे में भारत के छोटे और कम प्रोटेक्टेड एय़रक्राफ्ट कैरियर के लिए यह एक गंभीर चुनौती हो सकती है।
सरकार ने 30 वर्षीय सबमरीन कंस्ट्रक्शन प्लान को संशोधित किया है। पहले इसमें 24 पारंपरिक पनडुब्बियों को शामिल किया जाना था, लेकिन अब इसे घटाकर 18 डीजल-इलेक्ट्रिक और 6 परमाणु ऊर्जा संचालित हमलावर पनडुब्बियों (SSN) तक सीमित कर दिया गया है। साथ ही, भारत परमाणु बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी (SSBN) प्रोग्राम को भी आगे बढ़ा रहा है।
चीन का न्यूक्लियर एयरक्राफ्ट कैरियर प्रोजेक्ट
नवंबर 2024 में खबरें आई थीं कि चीन अपने परमाणु-संचालित विमानवाहक पोत कार्यक्रम पर तेज़ी से काम कर रहा है। दक्षिण चीन मॉर्निंग पोस्ट (SCMP) के अनुसार, चीन एक प्रोटोटाइप न्यूक्लियर रिएक्टर विकसित कर रहा है, जिसे भविष्य में अपने एयरक्राफ्ट कैरियर्स में इस्तेमाल किया जा सकता है।
परमाणु-संचालित विमानवाहक पोतों की खासियत यह होती है कि वे लंबे समय तक समुद्र में तैनात रह सकते हैं और उन्हें बार-बार ईंधन भरने की जरूरत नहीं होती। इससे उनकी ऑपरेशनल रेंज भी बढ़ जाती है और वे ज्यादा हथियार और ईंधन ले जा सकते हैं। चीन 2035 तक छह एयरक्राफ्ट कैरियर्स को ऑपरेट करने की योजना बना रहा है।
चीन ने हाल ही में अपना तीसरा विमानवाहक पोत फ़ुजियान (Fujian) लॉन्च किया है, जो इलेक्ट्रोमैग्नेटिक कैटापल्ट सिस्टम (EMALS) से लैस है। यह तकनीक अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर्स में उपयोग होती है, जिससे ज्यादा भारी और बड़े विमान कम रनवे पर उड़ान भर सकते हैं। फ़ुजियान का उत्तराधिकारी टाइप 004 (Type 004) कहा जा रहा है, जो परमाणु-संचालित हो सकता है।
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AFT On OROP: सशस्त्र बल अधिकरण (Armed Forces Tribunal – AFT) ने केंद्र सरकार की उस पॉलिसी को खारिज कर दिया है जिसमें प्री-मैच्योर रिटायरमेंट (PMR) लेने वाले सैन्य अधिकारियों को ‘वन रैंक वन पेंशन’ (OROP) योजना का लाभ देने से इनकार किया गया था। ट्रिब्युनल ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन बताया, जो समानता के अधिकार और सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर की गारंटी देते हैं।
File Photo
AFT On OROP: सैन्य अधिकारियों ने दायर की थी याचिका
आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल की इस मुख्य बेंच में जस्टिस राजेंद्र मेनन और रियर एडमिरल (सेवानिवृत्त) धीरन विग शामिल थे। बेंच ने 31 जनवरी को फैसला सुनाया। इस मामले में थलसेना, नौसेना और वायुसेना के कई अधिकारियों ने याचिकाएं दायर की थीं, जिन्होंने प्री-मैच्योर रिटायरमेंट के आधार पर OROP से वंचित किए जाने को चुनौती दी थी।
आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल के फैसले से पहले, प्री-मैच्योर रिटायरमेंट लेने वाले अधिकारियों को तीन श्रेणियों में बांटा गया था। इनमें कैटेगरी A में वे अधिकारी थे, जिन्होंने 1 जुलाई 2014 से पहले रिटायरमेंट लिया था, जिन्हें OROP का लाभ दिया गया था।, कैटेगरी B में वे अधिकारी थे, जिन्होंने 1 जुलाई 2014 से 7 नवंबर 2015 के बीच रिटायरमेंट लिया था। जबकि कैटेगरी C में उन अधिकारियों को शामिल किया गयाा था, जिन्होंने 7 नवंबर 2015 के बाद रिटायरमेंट लिया था, जिन्हें OROP का लाभ नहीं दिया गया।
वहीं, आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल ने कैटेगरी C के अधिकारियों के पक्ष में फैसला सुनाया, जो सरकार की नीति से OROP के लाभ से वंचित थे।
AFT On OROP: 1973 से पहले सभी को मिलता था OROP
1973 से पहले, सभी सैन्य कर्मियों को समान सेवा अवधि और समान रैंक के आधार पर समान पेंशन दी जाती थी, जिसे ‘वन रैंक वन पेंशन’ (OROP) कहा जाता था। लेकिन, तीसरे वेतन आयोग (3rd Pay Commission) ने इसे बंद कर दिया। इसके बाद, रिटायरमेंट की तारीख के आधार पर पेंशन में असमानता आ गई, जिससे पूर्व सैनिकों में नाराजगी बढ़ी।
1987 से 2000 तक, 5वें और 6वें वेतन आयोग में OROP पर चर्चा तो हुई, लेकिन उस पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई। 2004 में सरकार ने इसे लागू करने की बात कही, लेकिन 2008 में इनकार कर दिया, जिसके बाद देशभर में भूतपूर्व सैनिकों ने बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किए। 2009 में वॉर वेटरंस ने अपने पदक वापस कर दिए थे।
इन विरोध प्रदर्शनों के चलते सरकार को 10-सदस्यीय “कोश्यारी कमेटी” गठित करनी पड़ी, जिसने 2011 में अपनी रिपोर्ट में OROP लागू करने की सिफारिश की।
कटऑफ डेट से शुरू हुआ विवाद
सरकार ने 2014 में OROP लागू करने क एलान किया और इसे 2014-15 के वित्तीय वर्ष से लागू करने की बात कही। लेकिन नवंबर 2015 में जारी की गई पॉलिसी में एक विवादास्पद कटऑफ डेट रखी गई, जिसमें 1 जुलाई 2014 के बाद प्री-मैच्योर रिटायरमेंट लेने वाले अधिकारियों को OROP का लाभ नहीं देने का प्रावधान किया गया।
सरकार के इस फैसले का विरोध हुआ, क्योंकि 2015 में गठित न्यायिक आयोग ने भी प्री-मैच्योर रिटायरमेंट लेने वाले अधिकारियों को OROP से बाहर रखने पर कोई टिप्पणी नहीं की थी।
आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल ने अपने फैसले में कहा कि OROP लाभ देने के लिए किसी कटऑफ डेट को आधार बनाना गैर-कानूनी है। फैसले में बेंच ने कहा, “एक समान समूह में कटऑफ डेट के आधार पर अंतर करना असंवैधानिक है। यह अनुच्छेद 14 और 16 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन करता है।” ट्रिब्यूनल ने यह भी कहा कि राज्य सरकार को संविधान के तहत समानता का पालन करना होगा और उसे किसी भी तारीख को आधार बनाकर भेदभाव नहीं करना चाहिए। आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल के अनुसार, OROP के तहत सभी प्री-मैच्योर रिटायरमेंट अधिकारियों को समान लाभ मिलना चाहिए और सरकार का यह फैसला ‘क्लासिफिकेशन एन क्लास’ करने के समान है, जो संविधान की भावना के खिलाफ है।
सरकार को OROP पर नया फैसला लेना होगा
आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल ने 2015 की नीति को खारिज करते हुए सरकार को निर्देश दिया कि प्री-मैच्योर रिटायरमेंट अधिकारियों को भी अन्य अधिकारियों के समान OROP का लाभ दिया जाए। बेंच के इस फैसले के बाद अब सरकार के पास या तो नए दिशा-निर्देश जारी करने या फिर सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का विकल्प बचा है।
पूर्व सैनिकों में खुशी की लहर
आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल के फैसले के बाद पूर्व सैनिकों में खुशी की लहर है। एक पूर्व सैन्य अधिकारी ने कहा, “यह फैसला हमारे संघर्ष की जीत है। जो लोग 2015 के बाद रिटायर हुए हैं, उनके साथ भी समान व्यवहार होना चाहिए।” वहीं, कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को अब OROP की सभी विसंगतियों को दूर करके इसे पूरी तरह से पारदर्शी तरीके से लागू करना चाहिए।
वहीं, आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल के इस ऐतिहासिक फैसले के बाद अब OROP के तहत सभी प्री-मैच्योर रिटायरमेंट अधिकारियों को शामिल करना सरकार की जिम्मेदारी बन गई है। हालांकि, सरकार इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे सकती है, लेकिन संविधान और न्यायिक उदाहरणों के आधार पर इस फैसले को पलट पाना मुश्किल होगा। इस फैसले के बाद यह भी संभावना बढ़ गई है कि सरकार अब OROP की समीक्षा कर सकती है और भविष्य में सभी सैनिकों को समान पेंशन देने के लिए एक स्थायी नीति बना सकती है।
Chinese Spy Vessels: हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की गतिविधियां फिर से एकाएक बढ़ गई हैं, जिसके बाद भारत समेत कई देशों की सुरक्षा एजेंसियां सतर्क हो गई हैं। इस बार चीन ने मत्स्य अनुसंधान (Fisheries Research) के नाम पर अपने दो जहाजों लान हाई 101 और 201 (Lan Hai 101 & 201) को अरब सागर में तैनात किया है। दावा किया जा रहा है कि ये जहाज चीन के जल कृषि क्षेत्र (Aquaculture) के लिए रिसर्च कर रहे हैं, लेकिन सुरक्षा विशेषज्ञों को इस बात का संदेह है कि यह सिर्फ एक कवर है और असल में चीन हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में भारत की समुद्री खुफिया जानकारियां एकत्र करने में जुटा हुआ है।
ओपन-सोर्स इंटेलिजेंस (OSINT) एक्सपर्ट डेमियन सायमन ने एक्स (Twitter) पर इन चीनी जहाजों की गतिविधियों को ट्रैक किया और उनकी रूट्स शेयर किए हैं। इन जहाजों की गतिविधियां केवल रिसर्च तक सीमित नहीं दिख रही हैं, बल्कि वे चीन की विस्तृत समुद्री रणनीति का हिस्सा हो सकते हैं। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ये जहाज चीन के डिस्टेंट वाटर फिशिंग फ्लीट और मिलिट्री ऑपरेशंस के लिए खुफिया जानकारी एकत्र कर रहे हैं।
Chinese Spy Vessels: मालदीव ने चीन को दी विशेष अनुमति
सबसे अधिक चिंता इस बात की है कि मालदीव की सरकार ने राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू के नेतृत्व में चीन के जहाज लान हाई 101 को अपने जल क्षेत्र में प्रवेश की अनुमति दी है। यह जहाज अत्याधुनिक उपकरणों, ड्रोन और रिमोट ऑपरेटिव व्हीकल्स से लैस है, जो समुद्री सतह का नक्शा बनाने और हाइड्रोग्राफिक डेटा एकत्र करने में सक्षम हैं। सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि यह डाटा पनडुब्बियों की तैनाती और समुद्री मार्गों की निगरानी के लिए बेहद उपयोगी हो सकता है।
1/Feb 02, 2025: Fisheries science vessels, Lan Hai 101 & 201 are in the Arabian Sea conducting research for China’s aquaculture sector gaining information that will likely support Beijing’s distant-water fishing fleet that operates in the region.
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चौंकाने वाली बात यह है कि चीन के इन जहाजों ने अपने ऑटोमैटिक ट्रांसपोंडर सिस्टम (AIS) को बंद कर दिया है, जिससे उन्हें रियल टाइम ट्रैक करना मुश्किल हो जाता है। यह पहली बार नहीं है जब चीन ने अपने जहाजों के ट्रांसपोंडर बंद कर दिए हों। इससे पहले भी चीन के “रिसर्च शिप” भारत के मिसाइल परीक्षण क्षेत्रों और नौसैनिक ठिकानों के पास संदिग्ध गतिविधियों में लिप्त पाए गए थे।
Chinese Spy Vessels: चीन का समुद्री जासूसी मिशन?
चीन की तथाकथित डिस्टेंट वाटर फिशिंग फ्लीट (Distant-Water Fishing Fleet) पर लंबे समय से अवैध, अनियंत्रित और अनियमित मत्स्य पालन (Illegal, Unreported, and Unregulated (IUU) Fishing) के आरोप लगते रहे हैं।
भारत, श्रीलंका और पाकिस्तान जैसे कई देशों के मछुआरे लंबे समय से चीनी ट्रॉलरों द्वारा ज्यादा मछली पकड़ने के कारण आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं। स्थानीय मछुआरों का कहना है कि चीनी ट्रॉलर ज्यादा मछली पकड़ने की तकनीकों का उपयोग करते हैं, जिससे समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचता है।
इससे भी अधिक चिंता की बाात यह है कि चीन इन जहाजों का इस्तेमाल खुफिया जानकारियां जुटाने के लिए कर सकता है। कई सुरक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि ये चीनी जहाज सैन्य रणनीतिक ठिकानों की निगरानी और “ग्रे ज़ोन वॉरफेयर” नीति के तहत गुप्त जासूसी अभियानों को अंजाम दे सकते हैं।
चीन संग पाकिस्तान की नौसैनिक आयोजित कर रही है AMAN-25
चीन के ये जहाज ऐसे समय में हिंद महासागर में एक्टिव हुए हैं, जब पाकिस्तानी नौसेना कराची में 7 से 11 फरवरी 2025 को मल्टीलेटरल नेवल एक्सरसाइज AMAN-25 आयोजित करने जा रही है। इस अभ्यास में चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नेवी (PLA Navy) भी हिस्सा ले रही है। माना जा रहा है कि इस एक्सरसाइज के जरिए हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में चीन और पाकिस्तान अपना दबदबा बढ़ाना चाहते हैं।
यह पहली बार नहीं है जब चीन के जहाज भारत के स्ट्रेटेजिक ठिकानों के पास देखे गए हैं। पहले भी बंगाल की खाड़ी में भारत के मिसाइल परीक्षणों के दौरान और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के पास चीन के जहाजों की संदिग्ध गतिविधियां देखी गई थीं।
हिंद महासागर में चीन की बढ़ती गतिविधियों को देखते हुए सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अपनी नेवल सर्विलांस कैपेबिलिटी को और मजबूत करने की जरूरत है। इसके लिए भारत को अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान और अन्य देशों के साथ समुद्री सहयोग को बढ़ाना होगा। साथ ही, भारत को मालदीव, श्रीलंका, बांग्लादेश और अफ्रीकी देशों के साथ अपने संबंधों को और मजबूत करना होगा, ताकि हिंद महासागर में चीन के प्रभाव को संतुलित किया जा सके। इसके अलावा भारत को अपनी पनडुब्बी और जंगी बेड़े को और मजबूत करना होगा और समुद्री सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए अत्याधुनिक रडार और सैटेलाइट सर्विलांस मैकेनिज्म को डेवलप करना होगा।
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