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Chinese Spy Vessels: हिंद महासागर में फिर बढ़ीं चीन की गतिविधियां, ‘मछली पकड़ने’ के बहाने इस तरह हो रही भारतीय नौसेना की जासूसी?

Chinese Spy Vessels: Suspected Espionage in Indian Ocean Under ‘Fishing’ Cover?

Chinese Spy Vessels: हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की गतिविधियां फिर से एकाएक बढ़ गई हैं, जिसके बाद भारत समेत कई देशों की सुरक्षा एजेंसियां सतर्क हो गई हैं। इस बार चीन ने मत्स्य अनुसंधान (Fisheries Research) के नाम पर अपने दो जहाजों लान हाई 101 और 201 (Lan Hai 101 & 201) को अरब सागर में तैनात किया है। दावा किया जा रहा है कि ये जहाज चीन के जल कृषि क्षेत्र (Aquaculture) के लिए रिसर्च कर रहे हैं, लेकिन सुरक्षा विशेषज्ञों को इस बात का संदेह है कि यह सिर्फ एक कवर है और असल में चीन हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में भारत की समुद्री खुफिया जानकारियां एकत्र करने में जुटा हुआ है।

Chinese Spy Vessels: Suspected Espionage in Indian Ocean Under ‘Fishing’ Cover?

ओपन-सोर्स इंटेलिजेंस (OSINT) एक्सपर्ट डेमियन सायमन ने एक्स (Twitter) पर इन चीनी जहाजों की गतिविधियों को ट्रैक किया और उनकी रूट्स शेयर किए हैं। इन जहाजों की गतिविधियां केवल रिसर्च तक सीमित नहीं दिख रही हैं, बल्कि वे चीन की विस्तृत समुद्री रणनीति का हिस्सा हो सकते हैं। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ये जहाज चीन के डिस्टेंट वाटर फिशिंग फ्लीट और मिलिट्री ऑपरेशंस के लिए खुफिया जानकारी एकत्र कर रहे हैं।

Chinese Spy Vessels: मालदीव ने चीन को दी विशेष अनुमति

सबसे अधिक चिंता इस बात की है कि मालदीव की सरकार ने राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू के नेतृत्व में चीन के जहाज लान हाई 101 को अपने जल क्षेत्र में प्रवेश की अनुमति दी है। यह जहाज अत्याधुनिक उपकरणों, ड्रोन और रिमोट ऑपरेटिव व्हीकल्स से लैस है, जो समुद्री सतह का नक्शा बनाने और हाइड्रोग्राफिक डेटा एकत्र करने में सक्षम हैं। सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि यह डाटा पनडुब्बियों की तैनाती और समुद्री मार्गों की निगरानी के लिए बेहद उपयोगी हो सकता है।

चौंकाने वाली बात यह है कि चीन के इन जहाजों ने अपने ऑटोमैटिक ट्रांसपोंडर सिस्टम (AIS) को बंद कर दिया है, जिससे उन्हें रियल टाइम ट्रैक करना मुश्किल हो जाता है। यह पहली बार नहीं है जब चीन ने अपने जहाजों के ट्रांसपोंडर बंद कर दिए हों। इससे पहले भी चीन के “रिसर्च शिप” भारत के मिसाइल परीक्षण क्षेत्रों और नौसैनिक ठिकानों के पास संदिग्ध गतिविधियों में लिप्त पाए गए थे।

Chinese Spy Vessels: चीन का समुद्री जासूसी मिशन?

चीन की तथाकथित डिस्टेंट वाटर फिशिंग फ्लीट (Distant-Water Fishing Fleet) पर लंबे समय से अवैध, अनियंत्रित और अनियमित मत्स्य पालन (Illegal, Unreported, and Unregulated (IUU) Fishing) के आरोप लगते रहे हैं।

भारत, श्रीलंका और पाकिस्तान जैसे कई देशों के मछुआरे लंबे समय से चीनी ट्रॉलरों द्वारा ज्यादा मछली पकड़ने के कारण आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं। स्थानीय मछुआरों का कहना है कि चीनी ट्रॉलर ज्यादा मछली पकड़ने की तकनीकों का उपयोग करते हैं, जिससे समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचता है।

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इससे भी अधिक चिंता की बाात यह है कि चीन इन जहाजों का इस्तेमाल खुफिया जानकारियां जुटाने के लिए कर सकता है। कई सुरक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि ये चीनी जहाज सैन्य रणनीतिक ठिकानों की निगरानी और “ग्रे ज़ोन वॉरफेयर” नीति के तहत गुप्त जासूसी अभियानों को अंजाम दे सकते हैं।

चीन संग पाकिस्तान की नौसैनिक आयोजित कर रही है AMAN-25

चीन के ये जहाज ऐसे समय में हिंद महासागर में एक्टिव हुए हैं, जब पाकिस्तानी नौसेना कराची में 7 से 11 फरवरी 2025 को मल्टीलेटरल नेवल एक्सरसाइज AMAN-25 आयोजित करने जा रही है। इस अभ्यास में चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नेवी (PLA Navy) भी हिस्सा ले रही है। माना जा रहा है कि इस एक्सरसाइज के जरिए हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में चीन और पाकिस्तान अपना दबदबा बढ़ाना चाहते हैं।

यह पहली बार नहीं है जब चीन के जहाज भारत के स्ट्रेटेजिक ठिकानों के पास देखे गए हैं। पहले भी बंगाल की खाड़ी में भारत के मिसाइल परीक्षणों के दौरान और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के पास चीन के जहाजों की संदिग्ध गतिविधियां देखी गई थीं।

हिंद महासागर में चीन की बढ़ती गतिविधियों को देखते हुए सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अपनी नेवल सर्विलांस कैपेबिलिटी को और मजबूत करने की जरूरत है। इसके लिए भारत को अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान और अन्य देशों के साथ समुद्री सहयोग को बढ़ाना होगा। साथ ही, भारत को मालदीव, श्रीलंका, बांग्लादेश और अफ्रीकी देशों के साथ अपने संबंधों को और मजबूत करना होगा, ताकि हिंद महासागर में चीन के प्रभाव को संतुलित किया जा सके। इसके अलावा भारत को अपनी पनडुब्बी और जंगी बेड़े को और मजबूत करना होगा और समुद्री सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए अत्याधुनिक रडार और सैटेलाइट सर्विलांस मैकेनिज्म को डेवलप करना होगा।

PM Modi US Visit: अमेरिका दौरे में मोदी पर F-21 या F-35A फाइटर जेट की खरीद का दबाव बना सकते हैं ट्रंप! लेकिन भारत नहीं है तैयार, ये है वजह

PM Modi US Visit: Trump May Push for F-21 or F-35A Deal, But India Unlikely to Agree! Here's Why

PM Modi US Visit: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 12 से 14 फरवरी के बीच अमेरिका की यात्रा पर जाएंगे, जहां उनकी मुलाकात राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से होगी। इस साल ट्रंप से मिलने वाले वह तीसरे वैश्विक नेता होंगे, इससे पहले इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और जॉर्डन के किंग अब्दुल्ला II नए अमेरिकी राष्ट्रपति से मुलाकात कर चुके हैं। इस दौरे के दौरान भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सौदों को लेकर अहम बातचीत होने की संभावना है। ट्रंप प्रशासन चाहता है कि भारत अमेरिकी हथियारों और डिफेंस टेक्नोलॉजी की खरीद को और बढ़ाए।

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अमेरिका भारत पर दबाव बना रहा है कि वह अपनी रक्षा जरूरतों के लिए और अधिक अमेरिकी हथियारों और डिफेंस सिस्टम की खरीद करे। 2007 से अब तक भारत ने अमेरिका से 25 अरब डॉलर से अधिक के डिफेंस इक्विपमेंट्स खरीदे हैं, लेकिन ट्रंप प्रशासन चाहता है कि यह सहयोग और आगे बढ़े। इसके तहत फाइटर जेट्स, आर्मर्ड व्हीकल्स, एरो-इंजन और मिसाइलों की खरीद के लिए अमेरिका भारत को राजी करने की कोशिश करेगा।

PM Modi US Visit: F-21 या F-35A स्टेल्थ फाइटर जेट देने की पेशकश

सूत्रों के मुताबिक अमेरिकी सरकार भारत पर दबाव बना रही है कि वह अपने मल्टी-रोल फाइटर एयरक्राफ्ट (MRFA) प्रोजेक्ट के तहत Lockheed Martin के F-21 या Boeing के F-15EX को चुन ले। बदले में, अमेरिका ने भारत को कुछ व्यापारिक रियायतें (तेजस के इंजन और अपाचे AH-64E हेलीकॉप्टर की डिलीवरी) देने की पेशकश की है। हालांकि भारतीय वायुसेना (IAF) इस सौदे को लेकर तैयार नहीं है। वहीं अमेरिका ने भारत को F-35A स्टेल्थ फाइटर जेट देने की पेशकश भी की है, लेकिन इसके साथ कई सख्त शर्तें रखी गई हैं।

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PM Modi US Visit: वायुसेना को चाहिए 114 नए मल्टीरोल फाइटर जेट

भारतीय वायुसेना लंबे समय से 114 नए मल्टीरोल फाइटर जेट (MRFA) खरीदने की योजना बना रही है, जिसकी अनुमानित लागत 1.25 लाख करोड़ रुपये है। इस सौदे को लेकर अमेरिकी कंपनियां बोइंग और लॉकहीड मार्टिन अपने लड़ाकू विमानों F-16 और F-35 को भारत में पेश करने के लिए तैयार हैं। 10 से 14 फरवरी को बेंगलुरु में होने वाले एयरो इंडिया शो में अमेरिका अपने F-16 और पांचवीं पीढ़ी के F-35 फाइटर जेट का भी प्रदर्शन करेगा, लेकिन उसकी डेमो फ्लाइट नहीं करेगा।

PM Modi US Visit: कमजोर हैं F-21 और F-15EX

वायुसेना सूत्रों के मुताबिक भारतीय वायुसेना का मानना है कि F-21 और F-15EX भले ही आधुनिक तकनीकों से लैस हों, लेकिन ये विमान चीन और पाकिस्तान के स्टेल्थ फाइटर जेट्स के मुकाबले कमजोर साबित हो सकते हैं। भारत का सबसे बड़ा डर यह है कि चीन के J-20 और J-35A जैसे लेटेस्ट पांचवीं पीढ़ी के स्टेल्थ फाइटर जेट्स के मुकाबले ये अमेरिकी विमान किसी मुकाबले में नहीं हैं।  वहीं, पाकिस्तान भी चीनी स्टेल्थ लड़ाकू विमानों को शामिल करने की योजना बना रहा है। ऐसे में, भारत ऐसे फाइटर जेट्स नहीं खरीदना चाहता जो तकनीकी रूप से पिछड़ सकते हैं।

PM Modi US Visit: Trump May Push for F-21 or F-35A Deal, But India Unlikely to Agree! Here's Why
F-35A Fighter Jet

PM Modi US Visit: फाइटर जेट बेचने के लिए ये हैं अमेरिकी शर्तें

इसके अलावा, भारतीय वायुसेना इस बात से भी चिंतित है कि अमेरिका द्वारा बेचे गए लड़ाकू विमानों पर ऑपरेशनल प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। ऐसा पहले भी हो चुका है कि अमेरिका अपने मिलिट्री एक्सपोर्ट्स को सख्त निगरानी के साथ बेचता है, जिससे किसी भी देश की सैन्य स्वायत्तता (Operational Sovereignty) प्रभावित होती है। अमेरिकी शर्तें भारत के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती हैं, क्योंकि भारतीय वायुसेना ऐसे कोई भी वेपन सिस्टम्स नहीं चाहती जिस पर बाहरी नियंत्रण हो।

हालांकि अमेरिका ने भारत को F-35A स्टेल्थ फाइटर जेट देने की पेशकश भी की है, लेकिन इसके साथ कई सख्त शर्तें रखी गई हैं। सूत्रों के अनुसार, यदि भारत F-35A लड़ाकू विमान खरीदने का फैसला करता है, तो उसे अमेरिका की ओर से तीन प्रमुख शर्तें माननी होंगी। इनमें पहली शर्त भारतीय एयरबेस पर नियमित निरीक्षण शामिल है। अमेरिकी प्रस्ताव के मुताबिक, F-35A की तैनाती वाले भारतीय एयरबेस का नियमित निरीक्षण किया जाएगा। अमेरिका यह सुनिश्चित करना चाहता है कि विमान का संचालन, रखरखाव और तकनीकी इस्तेमाल उनकी निर्धारित प्रक्रियाओं के मुताबिक हो। इससे भारत की डिफेंस स्ट्रेटेजी पर अमेरिकी की निगरानी बढ़ सकती है।

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वहीं, अमेरिका चाहता है कि भारत F-35A की तैनाती और उसके इस्तेमाल पर अमेरिकी डिफेंस एक्सपर्ट्स की निगरानी हो। इसका मतलब यह होगा कि भारत को हर मिलिट्री मिशन के दौरान अमेरिका को जानकारी देनी होगी, जिसका असर भारत की ऑपरेशनल प्लानिंग पर पड़ सकता है। इसके अलावा तीसरी शर्त भारत में प्रोडक्शन को लेकर है। भारत लंबे समय से अपनी ‘मेक इन इंडिया’ और आत्मनिर्भर भारत रणनीति के तहत रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भर बनने की कोशिश कर रहा है। लेकिन अमेरिका ने साफ कर दिया है कि F-35A का प्रोडक्शन भारत में नहीं होगा। इससे भारत को इस विमान के लिए पूरी तरह अमेरिका पर निर्भर रहना पड़ेगा, जिससे लॉजिस्टिक और मेंटेनेंस पर लागत बढ़ सकती है।

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इन प्रतिबंधों के चलते F-35A को खरीदना भारत के लिए फायदेमंद नहीं होगा। अमेरिकी कंपनी Lockheed Martin ने भारत में F-35 के प्रोडक्शन की किसी भी संभावना से इनकार किया है। उसका कहना है कि भारत का ऑर्डर केवल 114 विमानों का है, इसलिए वह यहां इसकी प्रोडक्शन लाइन नहीं लगा सकती है। वहीं अमेरिका की इस रणनीति से भारत को टेक्नोलॉजी ट्रांसफर का फायदा नहीं मिलेगा और वह अमेरिका पर निर्भर रहेगा।

F-16 का मॉडर्न वर्जन है F-21

भारतीय वायुसेना के लिए MRFA टेंडर के तहत मीडियम-वेट फाइटर (Medium-Weight Fighter) की तलाश है। लेकिन F-15EX एक हेवी-कैटेगरी लड़ाकू विमान है। IAF पहले से ही Su-30MKI जैसे हेवी फाइटर जेट्स ऑपरेट कर रही है। ऐसे में एक और भारी लड़ाकू विमान खरीदना वायुसेना के लिए व्यावहारिक नहीं होगा। वहीं, F-21 के बारे में भी कई सवाल उठाए जा रहे हैं, क्योंकि यह Lockheed Martin के पुराने F-16 का एक मॉडर्न वर्जन है। ऐसे में, भारत इसे लॉन्ग-टर्म इन्वेस्टमेंट के रूप में नहीं देख रहा है। भारतीय वायुसेना चाहती है कि वह एक ऐसा फाइटर जेट खरीदे जो तकनीकी रूप से एडवांस हो, मीडियम-वेट हो और सस्ता भी हो। F-21 और F-15EX दोनों ही इन मानकों पर खरे नहीं उतरते।

सूत्रों के मुताबिक भारतीय वायुसेना ऐसे फाइटर जेट्स चाहती है, जो चीन और पाकिस्तान की बढ़ती सैन्य क्षमताओं का मुकाबला कर सकें। यदि अमेरिका अपनी शर्तों में ढील देता है और F-35A को उचित शर्तों पर भारत को देने के लिए तैयार होता है, तो भारत इस डील पर विचार कर सकता है। लेकिन F-21 और F-15EX जैसे पुराने डिजाइनों को खरीदने के लिए भारतीय वायुसेना बिल्कुल भी तैयार नहीं है।

ट्रंप की ‘डील-मेकिंग’ रणनीति

राष्ट्रपति ट्रंप की “डील-मेकिंग” रणनीति उनके कार्यकाल की पहचान रही है। इसी कड़ी में उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी से फोन पर बात कर भारत को अधिक अमेरिकी डिफेंस टेक्नोलॉजी देने की बात कही है। एक वरिष्ठ भारतीय अधिकारी के मुताबिक, “भारत को ट्रंप प्रशासन के साथ सावधानीपूर्वक बातचीत करनी होगी। अमेरिकी डिफेंस टेक्नोलॉजी एडवांस जरूर है, लेकिन इसे ‘मेक इन इंडिया’ नीति के तहत विदेशी सहयोग से उचित लागत पर विकसित करना हमारी प्राथमिकता है। भारत पूरी तरह से आयात करने के बजाय सह-विकास और सह-उत्पादन के मॉडल को प्राथमिकता देगा।”

बाइडेन प्रशासन के अंतिम महीनों में भारत और अमेरिका के बीच 3.3 अरब डॉलर का सौदा हुआ था, जिसमें भारत ने 31 आर्म्ड MQ-9B ‘प्रिडेटर’ ड्रोन खरीदे थे। इसके अलावा, ड्रोन निर्माता कंपनी जनरल एटॉमिक्स के साथ 520 मिलियन डॉलर का एक और समझौता हुआ, जिसके तहत भारत में मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल (MRO) फैसिलिटी स्थापित की जा रही है। लेकिन ट्रंप प्रशासन कुछ खास डिफेंस डील्स को लेकर ही उत्सुक है।

अमेरिकी कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के बीच तेजस मार्क-2 लड़ाकू विमान के लिए F414-INS6 एयरो-इंजन के को-प्रोडक्शन पर बातचीत जारी है। इस सौदे में 80 फीसदी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर भी शामिल है और इसकी अनुमानित लागत 1.5 अरब डॉलर होगी।

इसके अलावा, अमेरिका ने भारतीय सेना को लेटेस्ट जनरेशन स्ट्राइकर आर्मर्ड कॉम्बैट व्हीकल्स (ICVs) की जॉइंट मैन्युफैक्चरिंग की पेशकश भी की है। पिछले साल जून में भारत-अमेरिका डिफेन्स इंडस्ट्रियल कोऑपरेशन रोडमैप तैयार किया गया था, जिसके तहत 527 व्हील्ड ICVs की जरूरतों का अनुमान लगाया गया है। बता दें कि अमेरिका ने लद्दाख में ऊंचाई वाले इलाकों में Javelin एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइलों से लैस स्ट्राइकर आर्मर्ड व्हीकल्स का ट्रायल भी कर चुका है।

MH-60R सी हॉक हेलीकॉप्टर और P-8I पेट्रोलिंग एयरक्राफ्ट पर हो सकती है बातचीत

भारत ने फरवरी 2020 में 2.13 अरब डॉलर में 24 MH-60R सी हॉक हेलीकॉप्टर खरीदे थे। अब अमेरिका इस हेलिकॉप्टर के लिए एडिशनल टेक्निकल इक्विपमेंट और सपोर्ट सिस्टम देने के लिए 1.1 अरब डॉलर का सौदा करना चाहता है। इसके अलावा, अमेरिका भारत को छह और P-8I मेरीटाइम पैट्रॉल एयरक्राफ्ट बेचने का इच्छुक है। इससे पहले, भारत ने 12 P-8I विमान 3.2 अरब डॉलर में खरीदे थे। P-8I विमान में अत्याधुनिक हथियार और सेंसर लगे हैं, जो भारतीय नौसेना को समुद्री सीमाओं पर बेहतर निगरानी और सुरक्षा प्रदान करते हैं।

INS Aridhaman: भारत गुपचुप कर रहा इस खास पनडुब्बी का समुद्री ट्रायल! भारतीय नौसेना को जल्द मिलेगी तीसरी न्यूक्लियर बैलिस्टिक मिसाइल सबमरीन

INS Aridhaman: Indian Navy Set to Get Third Nuclear Ballistic Missile Submarine Soon

INS Aridhaman: हिंद महासागर में चीन की बढ़ती मौजूदगी और पाकिस्तान की नौसैनिक ताकत में इज़ाफ़े के बीच भारत अपनी समुद्री ताकत को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठा रहा है। भारतीय नौसेना इस साल अपनी तीसरी परमाणु शक्ति से लैस बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी (SSBN) INS अरिधमान (INS Aridhaman) को अपने बेड़े में शामिल करने जा रही है। यह कदम भारत की समुद्री रणनीति और परमाणु प्रतिरोधक क्षमता (Nuclear Deterrence) को और मज़बूत करेगा।

INS Aridhaman: Indian Navy Set to Get Third Nuclear Ballistic Missile Submarine Soon

INS Aridhaman: तीसरी न्यूक्लियर बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी

INS अरिधमान, भारतीय नौसेना की तीसरी न्यूक्लियर बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी (SSBN) होगी। यह सबमरीन पिछले तीन सालों से समुद्री परीक्षणों (Sea Trials) से गुजर रही थी और अब 2025 में इसे नौसेना में शामिल किए जाने की पूरी संभावना है।

भारत के पास पहले से ही दो INS अरिहंत और INS अरिघात SSBN पनडुब्बियां हैं। INS अरिधमान, इनसे अधिक अत्याधुनिक तकनीक, बड़े आकार और बेहतर मारक क्षमता से लैस होगी। बताया जा रहा है कि यह 7000 टन वजनी SSBN होगी, जो 8 K-4 बैलिस्टिक मिसाइलों को ले जाने में सक्षम होगी। K-4 मिसाइलें लगभग 3,500 किमी तक लक्ष्य को भेद सकती हैं, जिससे यह पनडुब्बी भारत की समुद्री परमाणु प्रतिरोधक रणनीति को और मज़बूत बनाएगी।

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फिलहाल भारत के पास दो INS अरिहंत और INS अरिघात सबमरीन

भारतीय नौसेना वर्तमान में INS अरिहंत (INS Arihant) और INS अरिघात (INS Arighat) को ऑपरेट कर रही है। वहीं, भविष्य में भारत नए और बड़े SSBN प्रोजेक्ट पर भी काम कर रहा है, जिसे S-5 क्लास परमाणु पनडुब्बी कहा जा रहा है। इस नई श्रेणी की पनडुब्बियां 12-16 बैलिस्टिक मिसाइलों को ले जाने में सक्षम होंगी, जिससे भारत की समुद्री परमाणु क्षमता और अधिक मज़बूत हो जाएगी।

चीन के पास 6 SSBN और 6 SSN

भारत का यह फैसला चीन और पाकिस्तान की बढ़ती नौसैनिक ताकत को देखते हुए लिया गया है। चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नेवी (PLA Navy) इस समय 6 SSBN, 6 न्यूक्लियर पावर्ड हमलावर पनडुब्बियां (SSN), और 48 पारंपरिक पनडुब्बियां ऑपरेट कर रही है। अनुमान है कि चीन का पनडुब्बी बेड़ा 2025 तक 65 और 2035 तक 80 पनडुब्बियों तक बढ़ सकता है।

वहीं, पाकिस्तान भी चीन के सहयोग से अपनी नौसैनिक ताकत को बढ़ाने में जुटा है। पाकिस्तान ने चीन से 8 Type-39 युआन क्लास अटैक पनडुब्बियों का ऑर्डर दिया है, जो एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) तकनीक से लैस होंगी। पहली पनडुब्बी को अप्रैल 2024 में ट्रायल के लिए लॉन्च किया गया था। पाकिस्तान का लक्ष्य हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में शक्ति संतुलन बदलना है।

INS Aridhaman: Indian Navy Set to Get Third Nuclear Ballistic Missile Submarine Soon

INS Aridhaman की खूबियां

INS अरिधमान को भारत में स्वदेशी रूप से डिजाइन और डेवलप किया गया है। इसका डिज़ाइन भारतीय नौसेना, डिपार्टमेंट ऑफ एटॉमिक एनर्जी (DAE), और भारत एटॉमिक रिसर्च सेंटर (BARC) द्वारा तैयार किया गया है।
इसमें 83 मेगावॉट (MW) के परमाणु रिएक्टर का इस्तेमाल किया गया है, जिसे पहले की पनडुब्बियों के ऑपरेशनल अनुभव के आधार पर और एडवांस  बनाया गया है। रिएक्टर डिजाइन में कुछ बदलाव किए गए हैं, जिससे इसकी सुरक्षा और रखरखाव में सुधार हुआ है।

INS अरिधमान का मुख्य हथियार K-4 बैलिस्टिक मिसाइलें होंगी, जिनकी 3500 किमी की मारक क्षमता होगी। यह पनडुब्बी कई लेटेस्ट तकनीकों और सेफ्टी फीचर्स से लैस होगी, जिससे भारतीय नौसेना को हिंद महासागर क्षेत्र में रणनीतिक बढ़त मिलेगी।

INS अरिधमान के शामिल होने के साथ ही, भारत अपने परमाणु पनडुब्बी बेड़े के विस्तार पर भी फोकस कर रहा है। फिलहाल, INS अरिहंत और INS अरिघाट के बाद INS अरिधमान तीसरी SSBN होगी।

भारत की पहली SSN 2036 तक

इसके अलावा, भारत की भविष्य में और परमाणु शक्ति से संचालित हमलावर पनडुब्बियां (SSN) बनाने की भी योजना है। हालांकि, पहली SSN 2036 और दूसरी 2038 तक आने की संभावना है। इन पनडुब्बियों में 12 से 16 न्यूक्लियर बैलिस्टिक मिसाइल तैनात की जा सकेंगी, जिससे भारत की सामरिक परमाणु हमले की क्षमता (Strategic Nuclear Strike Capability) और मजबूत होगी।

नए स्कॉर्पीन और P-75I प्रोजेक्ट में तेजी

INS अरिधमान के अलावा, भारत अपनी पनडुब्बी निर्माण क्षमता को और मजबूत करने के लिए नए प्रोजेक्ट्स पर भी काम कर रहा है। भारतीय नौसेना ने 6 स्कॉर्पीन-क्लास पनडुब्बियों को शामिल कर लिया है, और फ्रांस के साथ मिलकर 3 और स्कॉर्पीन पनडुब्बियां बनाने की बातचीत जारी है।

इसके अलावा हाल ही में मझगांव डॉक लिमिटेड (MDL) और जर्मनी की Thyssenkrupp Marine Systems (TKMS) के साथ 6 एडवांस्ड AIP पनडुब्बियां बनाने की मंजूरी मिली है। इन पनडुब्बियों में एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) तकनीक होगी, जिससे वे लगभग 3 हफ्ते तक पानी के नीचे रह सकेंगी।

हालांकि, P-75I प्रोजेक्ट की पहली पनडुब्बी अगले दशक में ही तैयार हो सकेगी, क्योंकि अभी इस प्रोजेक्ट पर तकनीकी और कॉमर्शियल बातचीत चल रही हैं।

भारत की “No First Use” पॉलिसी

भारत अपनी “No First Use” (NFU) न्यूक्लियर पॉलिसी पर चलते हुए “Credible Minimum Deterrence” को बनाए रखना चाहता है। इसका अर्थ यह है कि भारत पहले परमाणु हमला नहीं करेगा, लेकिन दूसरे हमले के लिए तैयार रहेगा। इसके लिए SSBN पनडुब्बियां सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, क्योंकि ये पानी के नीचे लंबे समय तक छिपी रह सकती हैं और किसी भी हमले के बाद जवाबी हमला कर सकती हैं।

INS अरिधमान का नौसेना में शामिल होना भारत के लिए समुद्री शक्ति का एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर होगा। यह चीन और पाकिस्तान की बढ़ती नौसैनिक शक्ति के बीच भारत के परमाणु प्रतिरोध को मज़बूत करेगा।

INS अरिधमान के नौसेना में शामिल होने पर आपकी क्या राय है? हमें कमेंट में बताएं!

Apache AH-64E हेलीकॉप्टर की डिलीवरी में देरी; भारत कर रहा अभी तक इंतजार, मोरक्को को मिल चुके हैं हेलीकॉप्टर!

AH-64E Apache Helicopters
AH-64E Apache Helicopters

Apache AH-64E: भारत ने फरवरी 2020 में अमेरिका से Apache AH-64E लड़ाकू हेलीकॉप्टर की खरीद का ऑर्डर दिया था, इनमें से 22 हेलीकॉप्टर भारतीय वायुसेना को मिल चुके हैं, लेकिन बाकी भारतीय सेना को मिलने वाले छह हेलिकॉप्टरों की डिलीवरी अभी तक नहीं हुई है। वहीं, मोरक्को ने भारत के बाद यानी जून 2020 में अपाचे हेलीकॉप्टर का ऑर्डर दिया था और उसे उनकी डिलीवरी भी मिलनी शुरू हो गई है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर भारत को अभी तक अपाचे हेलीकॉप्टर क्यों नहीं मिले? क्या यह डिलीवरी लाइन में देरी का मामला है या फिर कुछ और वजहें हैं?

Apache AH-64E Delay: India Still Waiting, Morocco Receives First Batch!

सूत्रों के मुताबिक सेना को दिसंबर 2024 में बोइंग से तीन एएच-64ई अपाचे हमलावर हेलीकॉप्टरों के पहले बैच की डिलीवरी होनी थी, लेकिन अभी तक डिलीवरी नहीं हो पाई है। भारतीय सेना की एविएशन कॉर्प्स को अब भी अपने अत्याधुनिक अपाचे AH-64E अटैक हेलीकॉप्टरों का इंतजार है। अमेरिका से छह हेलीकॉप्टरों का यह बेड़ा पहले ही भारत आ जाना चाहिए था, लेकिन अब तक इसकी डिलीवरी नहीं हो सकी है। भारतीय थल सेना को तीन-तीन के बैच में ये हेलीकॉप्टर मिलने थे और योजना के अनुसार मई-जून 2024 तक इनकी पहली खेप आ जानी चाहिए थी। वहीं, भारतीय सेना की पहली अपाचे स्क्वाड्रन अब भी अपने लड़ाकू हेलीकॉप्टरों की प्रतीक्षा कर रही है।

भारत ने अमेरिका के साथ फरवरी 2020 में छह अपाचे हेलीकॉप्टरों की खरीद के लिए 600 मिलियन डॉलर (करीब 5000 करोड़ रुपये) का समझौता किया था। यह सौदा भारतीय सेना की हवाई युद्ध क्षमता को बढ़ाने के लिए किया गया था, जिससे थल सेना के हेलीकॉप्टर बेड़े को और मजबूती मिल सके। लेकिन पहले बैच की डिलीवरी में ही तीन महीने से अधिक की देरी हो चुकी है, जिससे सेना की तैयारियों पर असर पड़ रहा है।

Apache AH-64E: राजस्थान के नागतलाव में पहली अपाचे स्क्वाड्रन की तैनाती

भारतीय सेना के एविएशन कॉर्प्स ने मार्च 2024 में नागतलाव, जोधपुर में अपनी पहली अपाचे स्क्वाड्रन का गठन किया था। यहां के पायलट और ग्राउंड स्टाफ पहले ही ट्रेनिंग ले चुके हैं और ऑपरेशन के लिए तैयार हैं। लेकिन डिलीवरी में हो रही देरी के कारण फ्लाइट ऑपरेशन शुरू नहीं हो सका। सेना के अधिकारियों को भी यह स्पष्ट जानकारी नहीं है कि इन अटैक हेलीकॉप्टरों की डिलीवरी कब पूरी होगी।

Apache AH-64E: डिलीवरी में “प्रोडक्शन लाइन इश्यू”?

अपाचे AH-64E को भारतीय सेना की पश्चिमी सीमाओं पर वार ऑपरेशंस में इस्तेमाल करने के लिए शामिल किया गया है। ये अटैक हेलीकॉप्टर अपनी एक्सीलेंट मोबिलिटी, लीथल वेपन सिस्टम्स और एडवांस्ड टार्गेटिंग टेक्नोलॉजी के लिए जाने जाते हैं। भारतीय सेना के लिए ये बेहद जरूरी हैं क्योंकि ये किसी भी ऑपरेशन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

गौरतलब है कि भारतीय वायुसेना पहले ही अपने 22 अपाचे हेलीकॉप्टरों को ऑपरेशनल कर चुकी है। ये हेलीकॉप्टर 2015 में अमेरिका के साथ हुए एक अलग सौदे के तहत शामिल किए गए थे। हालांकि, भारतीय थल सेना अब भी इन मॉ्र्डन हेलीकॉप्टरों का इंतजार कर रही है, जिससे उसकी युद्ध क्षमता में बड़ा इजाफा हो सके।

सूत्रों के अनुसार, अमेरिकी रक्षा विभाग और बोइंग की ओर से तर्क दिया जा रहा है कि भारत की डिलीवरी में “प्रोडक्शन लाइन इश्यू” की वजह से देरी हो रही है। हालांकि, अमेरिका की ओर से अब तक यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि अपाचे हेलीकॉप्टरों की डिलीवरी कब शुरू होगी और अगली संभावित तारीख क्या होगी। लेकिन सेना को मिलने वाले हेलीकॉप्टरों की डिलीवरी अभी तक रुकी हुई है। इसके विपरीत, मोरक्को को उसके ऑर्डर किए गए अपाचे हेलीकॉप्टर मिलने शुरू हो गए हैं।

वहीं सूत्रों का कहना है कि जब मोरक्को को समय पर डिलीवरी दी जा सकती है, तो भारत के मामले में प्रोडक्शन लाइन में दिक्कत क्यों आ रही है? रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका ने भारत के मुकाबले मोरक्को को प्राथमिकता दी है, क्योंकि अफ्रीका और मध्य पूर्व में अमेरिका की रणनीतिक जरूरतें अलग हैं। मोरक्को अमेरिका का करीबी सैन्य सहयोगी है और उसकी सुरक्षा रणनीति में वॉशिंगटन की सीधी भागीदारी रहती है। इसलिए, भारत के बजाय मोरक्को को पहले अपाचे हेलीकॉप्टर सौंपे जा रहे हैं।

क्या भारत को जानबूझकर इंतजार कराया जा रहा है?

रक्षा मामलों के जानकारों का कहना है कि भारत और अमेरिका के बीच पिछले कुछ वर्षों में रक्षा साझेदारी मजबूत हुई है, लेकिन इस तरह की घटनाएं संकेत देती हैं कि भारत अब भी अमेरिका के शीर्ष प्राथमिकता वाले डिफेंस कस्टमर्स में शामिल नहीं हुआ है। भारत ने हाल के सालों में अमेरिका से कई रक्षा उपकरण खरीदे हैं, जिनमें P-8I समुद्री गश्ती विमान, C-17 ग्लोबमास्टर, C-130J सुपर हरक्यूलिस और MQ-9B प्रीडेटर ड्रोन शामिल हैं। लेकिन जब डिलीवरी की बात आती है, तो अमेरिका की ओर से “प्रोडक्शन लाइन में दिक्कत”, “नियम-कानून की प्रक्रिया” और “लॉजिस्टिक्स समस्या” जैसे कारण बताए जाते हैं, जो संदेह पैदा करते हैं कि क्या भारत को जानबूझकर इंतजार कराया जा रहा है।

अमेरिका से जवाब मांगे भारत

रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि भारत को इस मुद्दे पर अमेरिका से स्पष्ट जवाब मांगना चाहिए। अमेरिकी सरकार को यह बताना चाहिए कि डिलीवरी में और कितनी देरी होगी और इसे तेज करने के लिए क्या उपाय किए जा सकते हैं। यदि अमेरिका अपने “रणनीतिक साझेदार” भारत को प्राथमिकता नहीं देता है, तो यह भविष्य में दोनों देशों के रक्षा संबंधों पर असर डाल सकता है।

चीन-पाकिस्तान बढ़ा रहे ताकत

उनका कहना है कि इस देरी का सीधा असर भारतीय सेना की ऑपरेशनल क्षमताओं पर पड़ेगा। चीन और पाकिस्तान हवाई युद्धक क्षमताओं में लगातार अपनी सैन्य ताकत को बढ़ा रहे हैं। चीन ने हाल ही में अपने Z-10 अटैक हेलीकॉप्टरों को अपग्रेड किया है और पाकिस्तान को भी नई तकनीक से लैस लड़ाकू हेलीकॉप्टर उपलब्ध कराए हैं। ऐसे में, भारत को जल्द से जल्द अपने अपाचे हेलीकॉप्टरों की जरूरत है ताकि वह अपनी हवाई आक्रमण और टैंक रोधी युद्धक क्षमताओं को मजबूत कर सके।

Apache AH-64E Delay: India Still Waiting, Morocco Receives First Batch!
Royal Moroccan Air Force Apache

मोरक्को को 36 AH-64E अपाचे हेलीकॉप्टर?

मोरक्को को AH-64E अपाचे हेलीकॉप्टरों की खरीद के लिए 36 यूनिट्स तक की मंजूरी दी गई थी, जिसमें 24 हेलीकॉप्टर पक्के ऑर्डर के तौर पर और 12 अतिरिक्त विकल्प के रूप में शामिल थे। इस सौदे में 12 लॉन्गबो रडार का भी प्रावधान था, जिससे हेलीकॉप्टरों की टार्गेटिंग और युद्ध क्षमताएं और अधिक प्रभावी हो जाती हैं।

मोरक्को को अमेरिकी कंपनी बोइंग से मिले इस सैन्य पैकेज में प्रिसीजन-गाइडेड वेपन सिस्टम भी शामिल हैं। इसमें 1,000 से अधिक AGM-114 हेलफायर मिसाइलें, 600 APKWS लेजर-निर्देशित रॉकेट, 50 से अधिक FIM-92 स्टिंगर मिसाइलें और 5,216 हाइड्रा 70 अनगाइडेड रॉकेट दिए गए हैं, जो अपाचे की मारक क्षमता को और बढ़ाते हैं।

इसके अलावा, इस सौदे में 30 मिमी गोला-बारूद के 93,000 राउंड, विभिन्न सहायक प्रणालियां और लॉजिस्टिक्स सेवाएं भी शामिल हैं। कुल पैकेज की अनुमानित लागत $4.25 बिलियन आंकी गई थी। इन अपाचे के आगमन के साथ, मोरक्को मिस्र के बाद AH-64 ऑपरेट करने वाला दूसरा अफ्रीकी देश बन गया है। हालांकि, इस महाद्वीप में एडवांस AH-64E वर्जन को तैनात करने वाला मोरक्को पहला देश है, जिसे “गार्जियन” के रूप में भी जाना जाता है।

Apache Helicopters: जल्द खत्म होगा इंतजार! भारतीय सेना को दिसंबर 2024 में मिलेगा पहला AH-64E अपाचे हेलीकॉप्टर बैच

वहीं, भारत को अपाचे हेलीकॉप्टरों की डिलीवरी में देरी के चलते भारतीय सेना को रणनीतिक स्तर पर कई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान और चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियों के मद्देनजर सेना के लिए ये हेलीकॉप्टर बेहद अहम हैं। यह स्पष्ट नहीं है कि भारत को ये हेलीकॉप्टर कब तक मिलेंगे, लेकिन इस देरी ने भारतीय सेना की युद्ध क्षमताओं को प्रभावित किया है।

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस डील में और देरी होती है, तो भारतीय सेना को अपने मौजूदा संसाधनों पर ही निर्भर रहना होगा। इससे जमीनी अभियानों में हवाई समर्थन देने की क्षमता सीमित हो सकती है।

क्या भारत को अन्य विकल्प तलाशने होंगे?

यदि अपाचे हेलीकॉप्टरों की डिलीवरी में और देरी होती है, तो भारतीय रक्षा मंत्रालय को अन्य विकल्पों पर भी विचार करना पड़ सकता है। भारत पहले से ही लाइट कॉम्बैट हेलीकॉप्टर (LCH) प्रोजेक्ट पर जोर दे रहा है, जिसे HAL ने डेवलप किया है। इसके अलावा, अन्य देशों के साथ भी सामरिक समझौतों पर विचार किया जा सकता है।

भारतीय सेना को अपनी पहली अपाचे स्क्वाड्रन को ऑपरेट करने के लिए अभी और इंतजार करना होगा। अमेरिका की ओर से कोई स्पष्ट डिलीवरी टाइमलाइन नहीं दी गई है, जिससे भारतीय सैन्य रणनीति को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। अब यह देखना होगा कि क्या अमेरिका जल्द से जल्द इन हेलीकॉप्टरों की डिलीवरी कर पाता है, या भारतीय सेना को अपने मौजूदा संसाधनों के साथ ही काम चलाना पड़ेगा।

भारत को अपाचे हेलीकॉप्टर की जरूरत क्यों?

भारत के लिए अपाचे AH-64E एक महत्वपूर्ण लड़ाकू हेलीकॉप्टर है, जिसे दुनिया का सबसे आधुनिक और घातक अटैक हेलीकॉप्टर माना जाता है। भारतीय सेना और वायुसेना दोनों के लिए यह हेलीकॉप्टर रणनीतिक रूप से बेहद अहम है, खासकर चीन और पाकिस्तान के साथ सीमा पर बढ़ते तनाव को देखते हुए।

अपाचे AH-64E हेलीकॉप्टर की खासियतें:

  • हेलफायर मिसाइल से लैस यह हेलीकॉप्टर दुश्मन के टैंकों और बख्तरबंद वाहनों को नष्ट करने में सक्षम है।
  • इसमें लॉन्गबो रडार लगा है, जिससे यह दिन और रात दोनों में सटीक हमले कर सकता है।
  • एडवांस एवियोनिक्स और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम, इसे किसी भी युद्धक्षेत्र में इस्तेमाल के लिए आदर्श बनाते हैं।

MQ-9B SeaGuardian: भारतीय नौसेना को मिला नया अमेरिकी ड्रोन, सी गार्डियन के क्रैश होने के बाद General Atomics ने दी रिप्लेसमेंट

Indian Navy Receives New MQ-9B SeaGuardian Drone After Crash Replacement by General Atomics

MQ-9B SeaGuardian: भारतीय नौसेना को अमेरिकी रक्षा कंपनी General Atomics ने MQ-9B SeaGuardian ड्रोन का नया वर्जन सौंप दिया है। यह ड्रोन सितंबर 2023 में बंगाल की खाड़ी में दुर्घटनाग्रस्त हुए MQ-9B के बदले में मिला है। भारतीय नौसेना ने इस एडवांस ड्रोन को लीज एग्रीमेंट के तहत शामिल किया था, जो प्रमुख रूप से हिंद महासागर क्षेत्र में इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉनिसेंस (ISR) मिशनों में तैनात किया जाता है।

Indian Navy Receives New MQ-9B SeaGuardian Drone After Crash Replacement by General AtomicsMQ-9B SeaGuardian: ड्रोन क्रैश की वजह

पिछले साल सितंबर में हुए हादसे की वजह पावर फेलियर बताई गई थी, जिसके कारण हाई-एल्टीट्यूड, लॉन्ग-एंड्योरेंस ड्रोन पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया था। इसके बाद, जनरल एटॉमिक्स ने नए ड्रोन की सप्लाई की, जो अब इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉनिसेंस (ISR) ऑपरेशन के लिए भारतीय नौसेना में शामिल हो चुका है। इस ड्रोन को तमिलनाडु के नेवल एयर स्टेशन राजाली में तैनात किया गया है, जहां से यह भारतीय महासागर क्षेत्र (IOR) में चीन की बढ़ती गतिविधियों पर नजर रखेगा।

नौसेना ने 2020 में General Atomics से दो MQ-9B SeaGuardian ड्रोन लीज पर लिए थे, जिन्हें INS राजाली, तमिलनाडु स्थित नौसेना एयरबेस से ऑपरेट किया जाता है। ये रिमोटली पायलटेड एयरक्राफ्ट ड्रोन्स भारतीय नौसेना के लिए बेहद अहम साबित हो रहे हैं और अब तक 18,000 घंटे से अधिक उड़ान समय पूरा कर चुके हैं।

MQ-9B SeaGuardian: भारत को मिलेंगे 31 एडवांस्ड ड्रोन

पिछले साल भारत ने अमेरिका के साथ एक $3.5 बिलियन ((28,900 करोड़ रुपये) का सौदा किया है, जिसके तहत उसे 31 MQ-9B Sea/SkyGuardian ड्रोन मिलेंगे। जिसमें नौसेना को 15, सेना को 8 और वायुसेना को 8 ड्रोन मिलेंगे। इनकी डिलीवरी 2029 से शुरू होने की संभावना है। ये ड्रोन्स हाई एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस (HALE) UAVs हैं, जो हेलफायर मिसाइल और GBU-39B बमों जैसे सटीक-मारक हथियारों से लैस होंगे। इनकी तैनाती से भारत की समुद्री सुरक्षा और दुश्मनों की गतिविधियों पर निगरानी करने की क्षमता में इजाफा होगा।

Drishti-10 Drone: पोरबंदर के पास समुद्र में दुर्घटनाग्रस्त हुआ अडानी डिफेंस का बनाया ये खास ड्रोन, मेक इन इंडिया पर उठ रहे सवाल

Drishti-10 Drone Crashes Near Porbandar, Raises Questions on 'Make in India'

स्वदेशी Drishti 10 Starliner ड्रोन भी जल्द नौसेना को मिलेगा

इसके अलावा Adani Defence & Aerospace के बनाए Drishti 10 Starliner ड्रोन भी जल्द ही भारतीय नौसेना में शामिल होने वाला है। इस ड्रोन को इजरायली रक्षा कंपनी Elbit Systems के सहयोग से भारत में डेवलप किया गया है। Drishti 10 Starliner ड्रोन 70 फीसदी स्वदेशी तकनीक से बना है। सेना को यह ड्रोन पहले डिलीवर किया जाना था, लेकिन जनवरी 2025 में गुजरात के पोरबंदर तट पर हुए परीक्षण के दौरान यह दुर्घटनाग्रस्त हो गया। यह मध्यम ऊंचाई, लंबी अवधि (Medium Altitude, Long Endurance – MALE) श्रेणी का ड्रोन है, जो 36 घंटे तक उड़ान भर सकता है और 450 किलोग्राम तक भार उठा सकता है।

INS विक्रमादित्य के स्थान पर नया स्वदेशी विमानवाहक पोत

भारतीय नौसेना की ताकत बढ़ाने के लिए INS विक्रमादित्य के रिप्लेसमेंट के तौर पर एक नया स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर (IAC-2) बनाने की योजना भी बनाई जा रही है। वर्तमान में नौसेना INS विक्रमादित्य और INS विक्रांत को ऑपरेट कर रही है। INS विक्रमादित्य को रूस से खरीदा गया था, जबकि INS विक्रांत को कोचीन शिपयार्ड में 20,000 करोड़ रुपये की लागत से तैयार किया गया था। अब नौसेना अपने तीसरे विमानवाहक पोत IAC-2 के निर्माण की योजना बना रही है, जिससे भारत की समुद्री सुरक्षा और मजबूत होगी।

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राफेल एम फाइटर जेट और नई पनडुब्बियों का सौदा जल्द

भारतीय नौसेना की युद्ध क्षमता को और अधिक धारदार बनाने के लिए फ्रांस के साथ एक बड़ी डील जल्द ही फाइनल होने वाली है। इस डील के तहत INS विक्रांत के लिए 26 नए राफेल-M लड़ाकू विमान और 3 अतिरिक्त स्कॉर्पीन पनडुब्बियां खरीदी जाएंगी। इस सौदे की अनुमानित लागत 50,000 करोड़ रुपये बताई जा रही है। राफेल-M ट्विन-इंजन डेक-बेस्ड फाइटर जेट हैं, जो मेरीटाइम वारफेयर ऑपरेशन्स के लिए विशेष रूप से डिज़ाइन किए गए हैं। हालांकि, ये जेट भारतीय नौसेना की अंतरिम जरूरतों को पूरा करेंगे, जब तक कि स्वदेशी ट्विन-इंजन डेक बेस्ड फाइटर (TEDBF) डेवलप नहीं हो जाता। इसका पहला प्रोटोटाइप 2026 तक उड़ान भरेगा और 2031 तक नौसेना में शामिल हो सकता है।

नई पनडुब्बियों के निर्माण में जर्मनी का साथ

इसके अलावा, भारत 3 नई स्कॉर्पीन-क्लास पनडुब्बियां भी शामिल करने जा रहा है, जिन्हें मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDL), मुंबई में बनाया जाएगा। इन पनडुब्बियों के आने से भारतीय नौसेना की अंडरवाटर कॉम्बैट कैपेबिलिटीज में बढ़ोतरी होगी। साथ ही, भारत ने 70,000 करोड़ रुपय़े की P-75I परियोजना शुरू की है, जिसके तहत 6 नई अत्याधुनिक पनडुब्बियां बनाई जाएंगी। इसके लिए MDL और जर्मन कंपनी thyssenkrupp Marine Systems (tkMS) को प्रमुख दावेदार माना जा रहा है।

लंबे समय तक पानी के अंदर रह सकेंगी पनडुब्बियां

ये HDW Class 214 पनडुब्बियों का मॉडर्न वर्जन होंगी, इन पनडुब्बियों में एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) सिस्टम होगा, जिससे वे लंबे समय तक पानी के अंदर रह सकेंगी और दुश्मन के रडार से बचने में मदद मिलेगी। AIP सिस्टम पनडुब्बी की पानी के अंदर रहने की क्षमता को बढ़ाता है और इसे दुश्मन के रडार से बचने में मदद करता है। इससे भारतीय नौसेना की पनडुब्बी युद्ध क्षमता चीन और पाकिस्तान की चुनौतियों का बेहतर तरीके से सामना करने में सक्षम होगी।

भारत ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी समुद्री रक्षा क्षमताओं को जबरदस्त तरीके से मजबूत किया है। MQ-9B SeaGuardian और Drishti 10 Starliner जैसे एडवांस ड्रोन्स से भारतीय नौसेना की निगरानी क्षमताएं कई गुना बढ़ जाएंगी। वहीं, INS विक्रांत, राफेल-M, स्कॉर्पीन पनडुब्बियां और P-75I परियोजना भारतीय नौसेना को आने वाले दशकों में समुद्री क्षेत्र में और अधिक शक्तिशाली बनाएंगे। इन सभी परियोजनाओं से भारतीय नौसेना हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में अपनी प्रभुत्वशाली स्थिति को और मजबूत करेगी और चीन तथा पाकिस्तान जैसी चुनौतियों का बेहतर तरीके से सामना कर सकेगी।

Indian Army drones: भारतीय सेना में शामिल होंगे घातक ड्रोन! चीन-पाकिस्तान की हर हरकत पर रहेगी पैनी नजर

Indian Army Drones: Lethal UAVs to Boost Surveillance on China-Pakistan Borders!
MQ-9 Reaper

Indian Army drones: भारतीय सेना अब मॉडर्न वारफेयर सिस्टम में एक बड़ा बदलाव करने जा रही है। सेना ने भारी-भरकम ड्रोन (Heavy-Duty Drones) को अपने बेड़े में शामिल करने की योजना बनाई है, जो न केवल इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकोनिसेंस (ISR) मिशनों के लिए इस्तेमाल होंगे, बल्कि दुश्मन के ठिकानों पर सटीक हमले (Precision Strikes) करने में भी अहम भूमिका निभाएंगे।

Indian Army Drones: Lethal UAVs to Boost Surveillance on China-Pakistan Borders!
MQ-9 Reaper

रूस-यूक्रेन और अर्मेनिया-अजरबैजान युद्ध ने यह साफ कर दिया है कि युद्ध का भविष्य अनमैंड टेक्नोलॉजी की ओर बढ़ रहा है। इसी को देखते हुए भारतीय सेना भी अपनी सैन्य क्षमताओं को अपग्रेड कर रही है और एडवांस ड्रोन सिस्टम को शामिल करने की दिशा में कदम बढ़ा रही है।

Indian Army drones: भारतीय सेना को चाहिए लंबी दूरी तक मार करने वाले ड्रोन

सूत्रों के अनुसार, सेना ऐसे मानव रहित हवाई वाहनों (UAV) और रिमोटली-पायलटेड एयरक्राफ्ट (RPA) सिस्टम की तलाश में है, जो 1,000 किलोमीटर से अधिक की रेंज तक काम कर सकें, 30,000 फीट की ऊंचाई तक उड़ान भर सकें, जिससे दुश्मन के रडार पर पकड़ में आने से बचा जा सके और 24 घंटे से अधिक समय तक लगातार ऑपरेशन को अंजाम दे सकें।

Indian Army drones: चीन और पाकिस्तान के पास कितने ड्रोन?

चीन के पास फिलहाल 2,000 से अधिक अत्याधुनिक ड्रोन हैं, जिनमें Cai Hong-4, CH-5, CH-7, Wing Loong-II और स्टील्थी Hongdu GJ-11 ‘Sharp Sword’ शामिल हैं। चीन न केवल इनका इस्तेमाल कर रहा है, बल्कि वह दुनिया का सबसे बड़ा मिलिट्री ड्रोन एक्सपोर्टर भी है।

पाकिस्तान को भी चीन ने CH-4 और Wing Loong-II जैसे खतरनाक ड्रोन की आपूर्ति की है। इसके अलावा, पाकिस्तान के पास तुर्की निर्मित Bayraktar TB2 और Akinci ड्रोन भी हैं, जिससे उसकी निगरानी और हमले की क्षमता बढ़ गई है। पाकिस्तान के पास 150-200 ड्रोन होने का अनुमान है, जो भारत के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकते हैं।

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इसके विपरीत, भारतीय सेना के पास अभी केवल 50 इजरायली मूल के Heron Mark-I, Mark-II और Searcher-II मध्यम ऊंचाई वाले, लंबी दूरी तक काम करने वाले (MALE) ड्रोन हैं। चीन के साथ चल रहे सैन्य गतिरोध को देखते हुए, भारतीय सेना ने हाल ही में चार नए सैटेलाइट-एनेबल्ड Heron Mark-II ड्रोन शामिल किए हैं, जो वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर निगरानी के लिए शामिल किए गए हैं।

Indian Army drones: भारतीय सेना में ड्रोन के मौजूदा इस्तेमाल

सेना का एविएशन कॉर्प्स इन फाइटर-साइज UAVs का उपयोग निगरानी और टारगेट पर हमले के लिए करता है, जबकि इन्फैंट्री बटालियन छोटी दूरी के ड्रोन्स का उपयोग टैक्टिकल रेकनाइसेन्स, लॉजिस्टिक्स और अन्य कार्यों के लिए करती है।

हालांकि, वायुसेना और नौसेना के पास भी अपने UAV बेड़े हैं, लेकिन सभी तीन सेनाओं के लिए कम से कम 150 नए MALE ड्रोन की जरूरत है। इसी के चलते भारतीय सेना अब स्वदेशी विकास और निजी क्षेत्र की भागीदारी के तहत अधिक संख्या में MALE ड्रोन खरीदने की योजना बना रही है।

स्वदेशी ड्रोन बनाने पर जोर

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने Rustom सीरीज के UAVs डेवलप किए हैं, जिसमें Tapas-BH-201 ड्रोन भी शामिल है। हालांकि, यह पूरी तरह से मिलिट्री जरूरतों को पूरा नहीं कर सका। अब इसकी क्षमताओं को बेहतर बनाने के लिए काम चल रहा है।

DRDO द्वारा विकसित Archer-NG (नेक्स्ट जनरेशन) ड्रोन का पहला ट्रायल जल्द ही होने की उम्मीद है। यह एक आर्म्ड MALE ड्रोन होगा, जो 30,000 फीट की अधिकतम ऊंचाई तक उड़ान भर सकता है और 300 किलोग्राम के हथियारों का वजन उठा सकता है। इसमें एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइलें और स्मार्ट एंटी-एयरफील्ड वेपन (SAAW) जैसे हथियार लगाए जा सकते हैं। वहीं, इसकी रेंज 1,000 किलोमीटर की होगी।

HALE ड्रोन: MQ-9B प्रीडेटर्स की होगी भारतीय सेना में एंट्री

ज्यादा क्षमता वाले हाई-एल्टीट्यूड, लॉन्ग एंड्योरेंस (HALE) ड्रोन के क्षेत्र में भारतीय सेना को अमेरिकी MQ-9B प्रीडेटर्स मिलेंगे। पिछले साल अक्टूबर 2024 में भारत ने अमेरिका के साथ 32,350 करोड़ रुपये के इस सौदे पर हस्ताक्षर किए थे। इन ड्रोन की डिलीवरी 2029 में शुरू होगी। ये ड्रोन Hellfire मिसाइल, GBU-39B प्रिसिजन-गाइडेड ग्लाइड बम और दूसरे एडवांस हथियारों से लैस होंगे।

सीमा पर सुरक्षा के लिए ड्रोन होंगे गेम-चेंजर

भारतीय सेना को चीन और पाकिस्तान दोनों के साथ सक्रिय सीमाओं की सुरक्षा के लिए एडवांस MALE ड्रोन की जरूरत है। ड्रोन की तैनाती से सीमाओं की रियल टाइम निगरानी में आसानी होगी और दुश्मन की किसी भी गतिविधि को तुरंत ट्रैक किया जा सकेगा।

इसके अलावा, ड्रोन से सीमा पार आतंकवादी गतिविधियों की निगरानी और आतंकी ठिकानों पर हमले करने में भी मदद मिलेगी। ये अनमैंड एरियल व्हीकल (UAV) न केवल सैनिकों को खतरे से बचाते हैं, बल्कि यह लंबे समय तक ऑपरेशन को अंजाम देने और सटीक हमले करने में भी सक्षम हैं।

निजी कंपनियों के साथ सेना की साझेदारी

भारतीय सेना अब निजी कंपनियों और विदेशी साझेदारों के साथ मिलकर नई ड्रोन तकनीक विकसित करने पर जोर दे रही है। इसके तहत Make in India अभियान के तहत स्वदेशी रूप से विकसित किए गए MALE और HALE ड्रोन को प्राथमिकता दी जा रही है। सरकार निजी कंपनियों को प्रोत्साहित करने के लिए टैक्स छूट और प्रोत्साहन पैकेज देगी। ड्रोन प्रोडक्शन के लिए “पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP)” मॉडल को बढ़ावा दिया जाएगा। साथ ही, डिफेंस स्टार्टअप्स को सपोर्ट देकर अत्याधुनिक ड्रोन डेवलप करने पर जोर दिया जाएगा।

UK New Spying Laws: ब्रिटेन के नए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून में चीनी जासूसों को छूट, रूस और ईरान पर रहेगा कड़ा पहरा, पढ़ें भारत पर क्या होगा असर?

UK Spying Laws: China Gets Exemption, Strict Rules for Russia & Iran – Impact on India?
File Photo: President Xi Jinping met with UK Prime Minister Keir Starmer

UK New Spying Laws: ब्रिटेन की सरकार अपने नए जासूसी कानून में चीन को सख्त प्रतिबंधों से छूट देने जा रही है। इस फैसले से संसद में विवाद खड़ा हो गया है, क्योंकि विपक्षी सांसद और राष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञ इसे देश की सुरक्षा के लिए खतरा बता रहे हैं। ब्रिटिश सरकार की योजना के अनुसार, रूस और ईरान जैसे देशों पर कड़े प्रतिबंध लागू किए जाएंगे, लेकिन चीनी जासूसों को इस सूची से बाहर रखा जाएगा।

UK Spying Laws: China Gets Exemption, Strict Rules for Russia & Iran – Impact on India?
File Photo: President Xi Jinping met with UK Prime Minister Keir Starmer.

UK New Spying Laws: क्या है FIRS और क्यों है यह महत्वपूर्ण?

ब्रिटेन की सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने के लिए Foreign Influence Registration Scheme (FIRS) की योजना बनाई है, जिसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी विदेशी ताकत ब्रिटेन की राजनीति, सुरक्षा या अर्थव्यवस्था को प्रभावित न कर सके। यह योजना दो स्तरों पर लागू की जाएगी। इनमें पहला है, राजनीतिक प्रभाव (Political Influence Tier)। यह विदेशी लॉबिंग को कंट्रोल करेगा और विदेश से जुड़े लोगों को ब्रिटेन के सांसदों, सरकारी अधिकारियों और चुनावी उम्मीदवारों से संवाद करने से पहले खुद को रजिस्टर्ड कराना होगा। वहीं दूसरा स्तर यानी एन्हांस्ड (Enhanced Tier), यह उन देशों पर लागू होगा, जो ब्रिटेन के लिए सीधा सुरक्षा खतरा हैं। इसमें रूस और ईरान को शामिल किया जाएगा, लेकिन चीन को फिलहाल इस सूची में नहीं रखा गया है।

हालांकि, सरकार का कहना है कि यह फैसला स्थायी नहीं है और भविष्य में चीन को भी इस सूची में जोड़ा जा सकता है।

UK New Spying Laws: चीन को क्यों दी गई छूट?

ब्रिटिश सरकार के इस फैसले के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं। चीन के साथ ब्रिटेन की आर्थिक साझेदारी को देखते हुए यह फैसला लिया गया है। हाल ही में ब्रिटेन की वित्त मंत्री रेचेल रीव्स (Rachel Reeves) ने चीन का दौरा किया था, जहां उन्होंने निवेश और व्यापार को बढ़ावा देने की बात कही थी। इसके अलावा, ब्रिटेन की विदेश मंत्री कैथरीन वेस्ट (Catherine West) ने कहा था कि ब्रिटेन को अपने आर्थिक हितों और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखना होगा। जानकारों का कहना है कि ब्रिटेन के लिए चीन एक महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदार है। ब्रिटेन की कंपनियां चीन के बड़े बाजार पर निर्भर हैं, और सरकार नहीं चाहती कि इस कानून से उनके व्यापारिक हितों को नुकसान पहुंचे। वहीं, ब्रिटेन के चीन के साथ संबंध जटिल हैं, और ब्रिटेन नहीं चाहता कि वह अचानक कूटनीतिक संकट में फंस जाए। हालांकि सरकार का कहना है कि चीन को अभी छूट दी जा रही है, लेकिन भविष्य में इसे हटाया भी जा सकता है।

UK New Spying Laws: सुरक्षा एजेंसियों ने भी जताई चिंता

ब्रिटिश सुरक्षा एजेंसी MI5 के प्रमुख केन मैककॉलम (Ken McCallum) ने 2022 में ही आगाह किया था कि चीन, रूस और ईरान ब्रिटेन के लोकतंत्र, राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक हितों के लिए सबसे बड़े खतरे हैं। उन्होंने कहा था कि रूस और चीन जैसे देश ब्रिटेन की राष्ट्रीय सुरक्षा को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं, इसलिए ब्रिटेन को आधुनिक दौर के खतरों से निपटने के लिए नए, सख्त और प्रभावी कानूनों की जरूरत है। उन्होंने कहा कि ब्रिटेन रणनीतिक रूप से उन देशों के निशाने पर है, जो हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं और राष्ट्रीय सुरक्षा को कमजोर करना चाहते हैं। इस नई योजना के जरिए विदेशी प्रभाव को नियंत्रित किया जाएगा और जासूसी गतिविधियों पर नजर रखी जाएगी।

सरकार के इस फैसले पर क्यों मचा विवाद?

सरकार के इस रुख से विपक्ष और कई सांसद नाराज हैं। लेबर पार्टी के सांसदों ने कहा है कि ब्रिटेन को चीन को लेकर नरम रुख नहीं अपनाना चाहिए। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि चीन की जासूसी गतिविधियां, साइबर हमले और ब्रिटेन की राजनीति में हस्तक्षेप के मामले बढ़ रहे हैं, ऐसे में चीन को सख्त निगरानी सूची में शामिल करना जरूरी है।

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ब्रिटेन की संसद में इस फैसले को लेकर भारी विरोध हो रहा है। लेबर पार्टी के सांसद और सुरक्षा मामलों के जानकारों का कहना है कि चीन लगातार ब्रिटिश राजनीति और संस्थानों में घुसपैठ कर रहा है। कई मामलों में यह भी सामने आया है कि चीनी कंपनियां ब्रिटेन की सरकारी गोपनीय सूचनाओं तक पहुंचने की कोशिश कर रही हैं।

ब्रिटेन की कंजर्वेटिव पार्टी के वरिष्ठ सांसद और पूर्व मंत्री नील ओ’ब्रायन ने कहा कि मुझे भरोसा नहीं हो पा रहा है। बीजिंग हमारे सांसदों की जासूसी कर रहा है, और फिर भी सरकार उनके खिलाफ कार्रवाई करने से पीछे हट रही है।

वहीं, लेबर पार्टी की सांसद सारा चैंपियन ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा, यह पागलपन है! मुझे खुद अपने संसदीय कंप्यूटर में चीनी स्पाइवेयर मिला था, और अब सरकार चीन को इस कानून से छूट दे रही है?

पूर्व गृह मंत्री प्रीति पटेल ने कहा, यह एक बेहद गैर-जिम्मेदाराना और खतरनाक फैसला है। चीन लगातार हमारी सुरक्षा और हितों को नुकसान पहुंचा रहा है।

रूस और ईरान पर सख्त कार्रवाई, लेकिन चीन पर नरमी क्यों?

ब्रिटेन सरकार ने FIRS के तहत रूस और ईरान को खतरनाक देशों की सूची में रखा है, लेकिन चीन को बाहर रखा गया है। सवाल यह उठ रहा है कि अगर रूस और ईरान ब्रिटेन के लिए खतरा हैं, तो चीन क्यों नहीं? कुछ सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि ब्रिटेन अमेरिका से अलग रुख अपनाकर चीन के साथ व्यापारिक संबंध बनाए रखना चाहता है। हालांकि, यह फैसला ब्रिटेन और अमेरिका के बीच रिश्तों में तनाव भी पैदा कर सकता है, क्योंकि अमेरिकी सरकार चीन के खिलाफ सख्त कदम उठा रही है।

चीन की सुपर एंबेसी पर बढ़ी चिंता

ब्रिटेन में पहले ही चीन की बढ़ती गतिविधियों को लेकर चिंता जताई जा रही है। हाल ही में, चीनी व्यवसायी यांग तेंगबो के खिलाफ जासूसी के आरोप लगे थे, जिसके कथित संबंध प्रिंस एंड्रयू से भी बताए जा रहे हैं। इसके अलावा, चीन लंदन में एक सुपर एम्बेसी बनाने की योजना बना रहा है, जिसे लेकर ब्रिटिश खुफिया एजेंसियां सतर्क हो गई हैं। लंदन के बीच में बनाए जा रहे इस बड़े चीनी दूतावास को ब्रिटेन की खुफिया एजेंसियां एक सुरक्षा खतरा मान रही हैं। यह इलाका ब्रिटेन की संवेदनशील कम्यूनिकेशन सिस्टम के काफी करीब है, जिससे जासूसी की आशंका और बढ़ जाती है।

ब्रिटेन के कुछ मंत्री एंजेला रेयनेर (Angela Rayner) और यवेट कूपर (Yvette Cooper) इस प्रोजेक्ट के समर्थन में हैं, जबकि कई सांसदों और सुरक्षा अधिकारियों ने इसे रोकने की मांग की है।

भारत पर क्या पड़ेगा असर?

ब्रिटेन का यह फैसला भारत के लिए चिंता का विषय बन सकता है। भारत पहले से ही चीन की आक्रामक नीतियों और सीमा विवाद से निपटने की कोशिश कर रहा है। ब्रिटेन ने अगर चीन पर सख्ती नहीं दिखाई, तो इससे चीन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक तरह से अप्रत्यक्ष समर्थन मिल सकता है।

वहीं, भारत अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान के साथ क्वाड (Quad) के तहत इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने की कोशिश कर रहा है। यदि ब्रिटेन चीन के प्रति नरम रवैया अपनाता है, तो इससे क्वाड देशों के साथ ब्रिटेन के सहयोग पर असर पड़ सकता है और भारत को चीन के खिलाफ अपनी रणनीति को और मजबूत करना पड़ सकता है।
ब्रिटेन भी इंडो-पैसिफिक में अपनी भूमिका बढ़ा रहा है, तो वहीं, चीन भी लगातार इंडो-पैसिफिक में अपनी नौसेना और सैन्य ताकत बढ़ा रहा है। अगर ब्रिटेन चीन के खिलाफ ठोस कार्रवाई नहीं करता, तो इससे चीन को इस क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करने का मौका मिल सकता है।

डाटा चोरी होने का डर

ब्रिटेन ने चीन पर साइबर सुरक्षा और आर्थिक जासूसी के मामलों में नरमी दिखाई है। लेकिन चीन पर कई देशों ने साइबर जासूसी और डेटा चोरी के आरोप लगाए हैं। अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और भारत कई बार चीन के साइबर हमलों से प्रभावित हुए हैं। यह फैसला भारतीय टेक्नोलॉजी कंपनियों के लिए घातक हो सकता है। भारतीय आईटी और स्टार्टअप सेक्टर ब्रिटेन के साथ मिलकर काम करता है, लेकिन अगर ब्रिटेन ने चीन को प्राथमिकता दी, तो भारतीय कंपनियों के लिए व्यापार करना मुश्किल हो सकता है।

क्या करेगा अमेरिका?

वहीं, अमेरिका की बात करें, तो वह लंबे समय से चीन के खिलाफ सख्त नीति अपनाए हुए है और वह चाहता है कि उसके सहयोगी देश भी इसी दिशा में कदम उठाएं। हुआवेई पर बैन, चीनी कंपनियों पर प्रतिबंध और दक्षिण चीन सागर में सैन्य मौजूदगी बढ़ाकर अमेरिका ने चीन को कड़ा संदेश दिया है।

यदि ब्रिटेन चीन को सख्त निगरानी सूची में नहीं रखता, तो इससे अमेरिका और ब्रिटेन के संबंधों में तनाव बढ़ सकता है। अमेरिका पहले ही चीन के खिलाफ सख्त आर्थिक और सुरक्षा प्रतिबंध लागू कर चुका है। ऐसे में ब्रिटेन का यह फैसला अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों के लिए चिंता का विषय बन सकता है।

ब्रिटेन यूरोप का एक प्रमुख देश है, और उसकी नीतियों का असर यूरोपीय संघ (EU) के अन्य देशों पर भी पड़ता है। यदि ब्रिटेन चीन के प्रति नरम रहता है, तो यह संभव है कि अन्य यूरोपीय देश भी इसी राह पर चलें। इससे चीन को यूरोप में अधिक व्यापारिक और राजनीतिक लाभ मिल सकता है, जिससे पश्चिमी देशों की सुरक्षा और व्यापार नीति प्रभावित हो सकती है।

Aero India 2025: एयरो इंडिया शो में दिल लूट लेने वाले करतब नहीं दिखाएगा यह हेलीकॉप्टर! मायूस होंगे दर्शक, यह है वजह

Aero India 2025: Sarang Team's Participation in Jeopardy as Dhruv Helicopters Remain Grounded

Aero India 2025: बेंगलुरु में 10 से 14 फरवरी 2025 तक होने वाले Aero India 2025 में इस बार भारतीय वायुसेना (IAF) की प्रमुख एरोबेटिक डिस्प्ले सारंग टीम के शामिल होने को लेकर संदेह बना हुआ है। इसकी मुख्य वजह है HAL ध्रुव (ALH Dhruv) हेलिकॉप्टरों का ग्राउंडेड होना, जिसके चलते टीम को अब तक इवेंट में भाग लेने की मंजूरी नहीं मिली है।

Aero India 2025: Sarang Team's Participation in Jeopardy as Dhruv Helicopters Remain Grounded

भारतीय वायुसेना की सारंग एरोबेटिक डिस्प्ले टीम अपने शानदार हवाई करतबों के लिए जानी जाती है। यह टीम नियमित रूप से एयरो इंडिया शो का हिस्सा बनती आई है और दुनिया भर के दर्शकों को अपने करतबों से रिझाती रही है। लेकिन इस बार, Aero India 2025 में सारंग की गैरमौजूदगी से दर्शक मायूस हो सकते हैं।

सारंग और सूर्यकिरण दोनों टीमों ने हमेशा Aero India जैसे अंतरराष्ट्रीय इवेंट्स में भारत की हवाई ताकत का प्रदर्शन किया है। हालांकि, इस बार सूर्यकिरण टीम के शामिल होने को लेकर हरी झंडी मिल चुकी है, लेकिन सारंग टीम को अभी तक ग्रीन सिग्नल नहीं मिला है।

Aero India 2025 में सारंग के शामिल होने पर संदेह क्यों?

सूत्रों के अनुसार, भारतीय वायुसेना के लिए Aero India 2025 में सारंग टीम की भागीदारी को लेकर कोई आधिकारिक सूचना नहीं आई है। वायुसेना के एक अधिकारी ने कहा, “जब तक सुरक्षा जांच पूरी नहीं होती और अंतिम रिपोर्ट नहीं आती, तब तक ALH ध्रुव हेलिकॉप्टरों को उड़ाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। हालांकि, अगर आखिरी पलों में हमें मंजूरी मिलती है, तो सारंग टीम Aero India 2025 में भाग लेने के लिए तैयार है।”

ध्रुव हेलिकॉप्टरों के ग्राउंडेड होने की वजह

भारतीय वायुसेना और Hindustan Aeronautics Limited (HAL) ने हाल ही में ALH ध्रुव हेलिकॉप्टरों को सुरक्षा वजहों से अस्थायी तौर पर ग्राउंडेड कर दिया था। इसका प्रमुख कारण गुजरात के पोरबंदर में 5 जनवरी 2025 को भारतीय तटरक्षक बल (Coast Guard) का एक ALH ध्रुव MK III हेलिकॉप्टर क्रैश होना है, जिसमें तीन क्रू मेंबर्स की जान चली गई थी। इस हादसे के बाद, HAL ने सुरक्षा की दृष्टि से सभी 330 ध्रुव हेलिकॉप्टरों की गहन जांच करने का फैसला लिया और अस्थायी रूप से इनकी उड़ान पर रोक लगा दी।

Aero India 2025: पहली बार भारत के आसमान में गरजेगा रूस का फिफ्थ-जनरेशन फाइटर जेट Su-57, अमेरिकी F-35 भी रहेगा स्टेटिक डिस्प्ले में

आर्मी डे परेड और गणतंत्र दिवस परेड में भी नहीं उड़ा था ध्रुव

इस बार की गणतंत्र दिवस परेड में हल्के लड़ाकू विमान LCA तेजस और एडवांस लाइट हेलीकॉप्टर (ALH) ध्रुव और रुद्र इस परेड का हिस्सा नहीं बने थे। LCA तेजस को शामिल न करने का फैसला भारतीय वायुसेना की मौजूदा नीति के तहत लिया गया था, जिसके अनुसार सिंगल-इंजन जेट्स को गणतंत्र दिवस परेड में उड़ान भरने की अनुमति नहीं दी गई थी। जबकि, ALH ध्रुव और रुद्र हेलीकॉप्टरों का पूरा बेड़ा हाल ही में हुई दुर्घटनाओं के बाद सुरक्षा जांच के कारण ग्राउंड किया गया था। इसी वजह से ये हेलीकॉप्टर 15 दिसंबर को आयोजित सेना दिवस परेड में भी शामिल नहीं हो पाए थे।

ध्रुव हेलिकॉप्टरों से जुड़े हालिया हादसे

ALH ध्रुव हेलिकॉप्टरों की सुरक्षा को लेकर पहले भी कई सवाल उठ चुके हैं। पिछले कुछ महीनों में इनसे जुड़ी कई घटनाएं सामने आई हैं:

  • अक्टूबर 2024 – बिहार में बाढ़ राहत अभियान के दौरान ALH ध्रुव हेलिकॉप्टर का इंजन फेल हुआ और उसे इमरजेंसी लैंडिंग करनी पड़ी।
  • सितंबर 2024 – भारतीय तटरक्षक बल का ALH ध्रुव MK III हेलिकॉप्टर अरब सागर में गिर गया, जिसमें दो अधिकारियों की मौत हो गई।
  • जनवरी 2025 – पोरबंदर हादसे में तीन क्रू मेंबर्स की जान चली गई, जिसके बाद सभी ध्रुव हेलिकॉप्टरों को ग्राउंडेड कर दिया गया।

इन घटनाओं के चलते HAL ने एक उच्च-स्तरीय जांच कमेटी का गठन किया है, जिसका नेतृत्व भारतीय वायुसेना के पूर्व एयर मार्शल विभास पांडे कर रहे हैं। यह कमेटी हेलिकॉप्टरों की सुरक्षा समीक्षा और मेंटेनेंस सुधारों पर सुझाव देगी।

Aero India 2025: सारंग की गैरमौजूदगी क्यों महत्वपूर्ण है?

सारंग टीम के हवाई करतब हमेशा से एयर शो की जान रहे हैं। 2003 में बनी यह टीम 2004 में Asian Aerospace Show, सिंगापुर में अपने अंतरराष्ट्रीय डेब्यू के बाद से 1,200 से अधिक एयर शो में प्रदर्शन कर चुकी है। टीम का पांच-हेलिकॉप्टर फॉर्मेशन, खासतौर पर इसके मोर-थीम वाली पेंट स्कीम, इसे अन्य एरोबेटिक टीमों से अलग बनाती है।

HAL ध्रुव: भारतीय सेनाओं का वर्क हॉर्स

HAL ध्रुव को भारत में डेवलप किया गया है और यह एक ऑल-वेदर, मल्टी-मिशन हेलिकॉप्टर है। इसके हिंगलेस, कठोर रोटर डिजाइन इसे अत्यधिक मेन्युवरेबल बनाते हैं। यह हेलिकॉप्टर भारतीय सेना, वायुसेना, नौसेना और तटरक्षक बल में अत्यधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके कई वर्जन भी हैं, जिनका इस्तेमाल युद्ध, राहत अभियान, मेडिकल इवैक्युएशन, समुद्री निगरानी और खोज एवं बचाव अभियानों में किया जाता है।

भारतीय सेना प्रमख जनरल उपेंद्र द्विवेदी भी ध्रुव की तारीफ करते हैं। पुणे में आयोजित 77वें सेना दिवस परेड के दौरान ALH ध्रुव हेलीकॉप्टर को लेकर कहा था, “ध्रुव हेलीकॉप्टर ने 2023-24 में 40,000 घंटे से अधिक की उड़ान भरी है, और इस दौरान केवल एक बार तकनीकी गड़बड़ी हुई। यह हेलीकॉप्टर 15,000 फीट से अधिक की ऊंचाई वाले कठिन इलाकों में सफलतापूर्वक कार्य कर रहा है। हमें इस प्लेटफॉर्म पर 100% भरोसा है।”

क्या Aero India 2025 में उड़ान भर पाएंगे ध्रुव हेलिकॉप्टर?

अभी तक की स्थिति को देखते हुए, यह कहना मुश्किल है कि HAL ध्रुव हेलिकॉप्टरों को Aero India 2025 में उड़ान भरने की अनुमति मिलेगी या नहीं। हालांकि, भारतीय वायुसेना और HAL इस कोशिश में हैं कि सुरक्षा समीक्षा जल्द पूरी हो और हेलिकॉप्टरों को हरी झंडी मिल जाए।

अगर अंतिम क्षणों में ध्रुव हेलिकॉप्टरों को मंजूरी मिलती है, तो सारंग टीम को शायद सीमित प्रदर्शन का मौका मिल सकता है। लेकिन अगर यह हेलिकॉप्टर उड़ान नहीं भरते, तो यह पहली बार होगा जब Aero India में सारंग टीम गैरमौजूद रहेगी।

Pakistan-Bangladesh Nexus: बड़ा खुलासा! बांग्लादेश में 1971 से पहले के हालात बनाना चाहती है पाकिस्तान की ISI, सिलिगुड़ी कॉरिडोर पर नजर

ISI’s New Conspiracy to Revive Pre-1971 Influence, Eyes on Siliguri Corridor!

Pakistan-Bangladesh Nexus: पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) बांग्लादेश के जरिए भारत के लिए एक नई चुनौती खड़ी करने की योजना बना रही है। खुफिया सूत्रों के मुताबिक ISI बांग्लादेश में अपनी पुरानी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है। बांग्लादेश के कुछ रणनीतिक इलाकों में ISI अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की योजना बना रही है। हाल ही में ISI प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल असीम मलिक ने ढाका का दौरा किया था, जहां उन्होंने बांग्लादेशी सेना के कट्टरपंथी धड़े के साथ गुप्त बैठकें कीं।

ISI’s New Conspiracy to Revive Pre-1971 Influence, Eyes on Siliguri Corridor!

सूत्रों के अनुसार, ISI प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल असीम मलिक की ढाका यात्रा के दौरान पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच खुफिया सहयोग बढ़ाने और भारत विरोधी रणनीतियों पर चर्चा की। इस दौरान बांग्लादेश के कॉक्‍स बाजार, उखिया, टेकनाफ, मौलवीबाजार, हबीगंज और शेरपुर जैसे इलाकों में ISI की मौजूदगी को लेकर बातचीत हुई।

Pakistan-Bangladesh Nexus: बांग्लादेश में 1971 से पहले की जड़ें तलाश रही ISI

ISI ने रंगपुर, उखिया, टेकनाफ, मौलवीबाजार और हबीगंज जैसे इलाकों में अपनी गतिविधियां बढ़ा दी हैं, जहां पहले 1971 से पहले पाकिस्तानी सेना की मौजूदगी थी। अब, पाकिस्तान की कोशिश है कि इन इलाकों में अपने खुफिया नेटवर्क को फिर से खड़ा किया जाए। 1971 में बांग्लादेश के गठन से पहले, ये इलाके पूर्वी पाकिस्तान का हिस्सा थे और यहां पाकिस्तानी सेना की गहरी पकड़ थी। उस समय पाकिस्तानी सेना ने नागालैंड और मिजोरम जैसे भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में उग्रवादी गुटों को समर्थन दिया था। अब, ISI फिर से इन इलाकों में अपनी पकड़ बनाकर भारत के खिलाफ साजिशें रच रही है।

सूत्रों का कहना है कि ISI की इस चाल के पीछे बांग्लादेश के कट्टरपंथी इस्लामिक समूहों और सेना के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों का समर्थन भी प्राप्त है।बांग्लादेश सेना के क्वार्टर मास्टर जनरल लेफ्टिनेंट जनरल मोहम्मद फैज-उर-रहमान, जो कि कट्टरपंथी विचारधारा के समर्थक माने जाते हैं, ISI के संपर्क में हैं। इसके अलावा, बांग्लादेश सेना की 24 डिवीजन के जनरल ऑफिसर कमांडिंग मेजर जनरल मीर मुश्फिक रहमान भी इस गुप्त योजना में शामिल बताए जा रहे हैं।

Pakistan-Bangladesh Nexus: सिलिगुड़ी कॉरिडोर या “चिकन नेक” पर ISI की नजर

ISI प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल असीम मलिक अरब अमीरात उड़ान (EK-586) से 21 जनवरी 2025 को ढाका पहुंचे थे। वे रैडिसन ब्लू होटल के तीसरी मंजिल पर ठहरे थे। उनके साथ पाकिस्तान के दो वरिष्ठ सैन्य अफसर मेजर जनरल शाहिद अमीर अफसर (डीजी ए) और मेजर जनरल आलम अमीर अवान (डीजी एसएंडए) भी मौजूद थे। इस दौरान लेफ्टिनेंट जनरल फैज-उर-रहमान ने ISI अधिकारियों की मुलाकात बांग्लादेश की खुफिया एजेंसी DGFI के प्रमुख मेजर जनरल जाहांगीर आलम से कराई थी। सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान भारत के सिलिगुड़ी कॉरिडोर या “चिकन नेक” इलाके में अपनी पकड़ बनाना चाहता है, ताकि वहां अस्थिरता फैलाई जा सके।

ISI in Bangladesh: बांग्लादेश आर्मी चीफ को हटाकर ULFA के जरिए चिकन नेक पर कब्जा करना चाहती है ISI, रंगपुर में रची ये बड़ी साजिश

ISI अधिकारियों ने बांग्लादेश के रंगपुर जिले का दौरा किया था, जो चिकन नेक से महज 130 किलोमीटर दूर स्थित है। इसके अलावा, पाकिस्तानी अधिकारी चटगांव हिल ट्रैक्ट्स जैसे संवेदनशील इलाकों में भी गए थे।

Pakistan-Bangladesh Nexus: ULFA को फिर से सक्रिय करने की साजिश

ISI ने असम के उग्रवादी संगठन ULFA (United Liberation Front of Assam) के साथ भी संपर्क साधा है। ULFA के नेता परेश बरुआ पहले भी पाकिस्तान और चीन से समर्थन लेते रहे हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, ISI ने बांग्लादेश के जरिए ULFA को दोबारा सक्रिय करने का प्लान बनाया है ताकि भारत के पूर्वोत्तर में अस्थिरता पैदा की जा सके। बता दें कि 2009 से 2015 के बीच बांग्लादेश की शेख हसीना सरकार ने ULFA के कई शीर्ष नेताओं को भारत को सौंपा था।

बांग्लादेशी सेना प्रमुख को हटाने की तैयारी

सूत्रों के मुताबिक, लेफ्टिनेंट जनरल फैज-उर-रहमान को पाकिस्तान का समर्थन हासिल है और उसी के सहयोग से वह बांग्लादेश के वर्तमान सेना प्रमुख जनरल वकार-उज-जमां को हटाने की साजिश रच रहे हैं। जनरल जमां को भारत के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों का समर्थक माना जाता है। बताते हैं कि बांग्लादेश सेना के 24 डिवीजन के जनरल ऑफिसर कमांडिंग मेजर जनरल मीर मुशफिक रहमान भी लेफ्टिनेंट जनरल फैज के साथ शामिल हैं औऱ दोनों ने ISI और बांग्लादेश की कट्टरपंथी लॉबी के साथ मिल कर सेना के भीतर एक धड़ा खड़ा कर लिया है, जो जनरल जमां को हटाने के लिए तैयार है। अगर यह योजना सफल होती है, तो बांग्लादेश की सेना में भारत विरोधी ताकतों का प्रभाव और बढ़ सकता है।

Aero India 2025: पहली बार भारत के आसमान में गरजेगा रूस का फिफ्थ-जनरेशन फाइटर जेट Su-57, अमेरिकी F-35 भी रहेगा स्टेटिक डिस्प्ले में

Aero India 2025: Russia’s Su-57 to Soar Over India for the First Time, US F-35 on Static Display
SU-57

Aero India 2025: बेंगलुरु में होने वाले एयरो इंडिया 2025 में रूस और अमेरिका के सबसे आधुनिक लड़ाकू विमानों का जलवा देखने को मिलेगा। रूस का Su-57 फिफ्थ-जनरेशन फाइटर जेट पहली बार भारत में प्रदर्शित किया जाएगा, जबकि अमेरिका के F-35 को स्टेटिक डिस्प्ले में रखा जाएगा।

Aero India 2025: Russia’s Su-57 to Soar Over India for the First Time, US F-35 on Static Display
SU-57

भारतीय वायुसेना (IAF) के सूत्रों ने बताया कि अमेरिकी लड़ाकू विमान शायद आसमान में उड़ान नहीं भरेंगे, लेकिन रूस का Su-57 अपने एरोबैटिक करतबों से दर्शकों को रोमांचित करेगा। यह शो 10 से 14 फरवरी 2025 तक आयोजित होगा और इसमें दुनिया भर की प्रमुख डिफेंस कंपनियां हिस्सा लेंगी। इस कार्यक्रम के पहले तीन दिन बिजनेस डेज़ होंगे, जबकि अंतिम दो दिन आम जनता के लिए खुले रहेंगे।

रूसी Su-57: पहली बार भारत में प्रदर्शन

रूसी एयरोस्पेस कंपनी सुखोई (Sukhoi) के बनाए Su-57 फाइटर जेट पहली बार भारत में सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया जाएगा। यह विमान पहले ही रूसी वायुसेना में शामिल किया जा चुका है और नवंबर 2024 में इसे एयरशो चाइना (Zhuhai) में भी प्रदर्शित किया गया था। यह विमान रूस की लेटेस्ट स्टील्थ टेक्नोलॉजी से लैस है और पहले ही रूसी वायुसेना में शामिल हो चुका है।

सूत्रों के अनुसार, Su-57 इस शो में हवाई करतब दिखाएगा, जिससे दर्शकों को इसकी सुपरक्रूज़, सुपर-मेन्युवरिबिलिटी और अन्य क्षमताओं का प्रदर्शन देखने को मिलेगा।

इस लड़ाकू विमान को पहली बार भारत में दिखाने की टाइमिंग खास है, क्योंकि इस साल रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के भारत दौरे की भी संभावना है। गौरतलब है कि 2007 में भारत और रूस ने मिलकर Su-57 का को-डेवलपमेंट प्रोग्राम शुरू किया था, लेकिन 2018 में भारत ने इस प्रोजेक्ट से अपना हाथ खींच लिया था।

Aero India 2025: Russia’s Su-57 to Soar Over India for the First Time, US F-35 on Static Display
US F-35

अमेरिकी F-35 और F-16 भी होंगे शामिल

पिछले साल Aero India 2023 में अमेरिका ने पहली बार F-35 स्टील्थ फाइटर जेट को केवल डिस्प्ले के लिए रखा था। हालांकि, इस बार यह विमान सिर्फ स्टेटिक डिस्प्ले में रहेगा और उड़ान नहीं भरेगा।

इसके अलावा, अमेरिका की ओर से B-1 लॉन्ग रेंज बॉम्बर और F-16 फाइटर्स भी इस शो में हिस्सा लेंगे। B-1 बॉम्बर ने पिछले एयरो इंडिया शो में फ्लाई-पास्ट किया था, और इस बार भी इसके प्रदर्शन की उम्मीद की जा रही है।

इसके अलावा, अमेरिकी बोइंग (Boeing) कंपनी का KC-135 Stratotanker (एक रीफ्यूलिंग एयरक्राफ्ट) और ब्राजील की एम्ब्रायर (Embraer) कंपनी का C-390 ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट भी इस शो का हिस्सा होंगे।

Aero India 2025: Russia’s Su-57 to Soar Over India for the First Time, US F-35 on Static Display

Su-57 बनाम F-35: कौन है ज्यादा ताकतवर?

फिफ्थ-जनरेशन फाइटर जेट्स को आधुनिक सुपर-सोनिक गति, स्टील्थ तकनीक, सुपर-मेन्युवरिबिलिटी और हाई-सिचुएशनल अवेयरनेस जैसी विशेषताओं के लिए जाना जाता है।

Su-57:

  • ट्विन-इंजन स्टील्थ फाइटर
  • हाइपर-सोनिक मिसाइल लॉन्च करने की क्षमता
  • सुपरक्रूज़ और सुपर-मेन्युवरिबिलिटी से लैस
  • रडार से बचने की क्षमता
Aero India 2025: भारत के सबसे बड़े एरो शो में हिस्सा नहीं लेंगे अमेरिकी वायुसेना के F-35 और F-16 फाइटर जेट, ये है बड़ी वजह

F-35:

  • सिंगल-इंजन स्टील्थ फाइटर
  • नेटवर्क-सेंट्रिक वारफेयर के लिए डिज़ाइन किया गया
  • इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर क्षमताओं से लैस
  • वर्टिकल टेकऑफ और लैंडिंग (F-35B)

भारत भी अब अपनी फिफ्थ-जनरेशन फाइटर जेट बनाने की तैयारी में जुट गया है। डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (DRDO) “एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA)” नामक स्वदेशी फाइटर जेट पर काम कर रहा है।

मार्च 2024 में कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) ने इस प्रोजेक्ट को हरी झंडी दे दी थी। वर्तमान में भारतीय वायुसेना के पास 31 फाइटर स्क्वाड्रन हैं, जबकि इसे 42 स्क्वाड्रन की जरूरत है। ऐसे में AMCA का निर्माण भारत की सैन्य क्षमताओं को मजबूत करेगा।

Aero India हर दो साल में आयोजित होने वाला भारत का सबसे बड़ा एयरोस्पेस और डिफेंस शो है। इसमें दुनिया भर की डिफेंस कंपनियां, MSMEs और स्टार्टअप्स अपनी नई तकनीकों और डिफेंस प्रोडक्ट्स को प्रदर्शित करते हैं। वहीं, एयरो इंडिया 2025 ऐसे समय में हो रहा है, जब भारतीय वायुसेना (IAF) गंभीर संकट से गुजर रही है। फाइटर जेट्स की नई खरीद में देरी और स्वदेशी फिफ्थ-जेनरेशन फाइटर जेट AMCA का विकास अभी कम से कम 10 साल दूर है।

IAF के पास वर्तमान में 31 स्क्वाड्रन हैं, जबकि उसे 42 स्क्वाड्रन की आवश्यकता है। आने वाले वर्षों में MiG-21 बाइसन की अंतिम दो स्क्वाड्रन भी सेवा से बाहर हो जाएंगी, जिससे वायुसेना की ताकत और कमजोर हो सकती है।

यह शो भारत को अपनी स्वदेशी रक्षा क्षमताओं को दुनिया के सामने प्रस्तुत करने और डिफेंस एक्सपोर्ट को बढ़ाने का बेहतरीन मौका देता है। इससे “मेक इन इंडिया” और “आत्मनिर्भर भारत” अभियान को भी मजबूती मिलेगी।