Pinaka Rocket Systems: केंद्र सरकार की कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) ने भारतीय सेना की मारक क्षमता को बढ़ाने के लिए 10,000 करोड़ रुपये के स्वदेशी पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम की खरीद को मंजूरी दे दी है। यह फैसला भारत की रक्षा रणनीति को मजबूत करने और आत्मनिर्भर भारत अभियान को बढ़ावा देने के लिए किया गया है। इस फैसले के बाद भारतीय सेना की तोपखाने (आर्टिलरी) क्षमता में जबरदस्त बढ़ोतरी होगी। रक्षा मंत्रालय (MoD) के सूत्रों के अनुसार, इस वित्तीय वर्ष के अंत यानी मार्च 2025 से पहले दो बड़े कॉन्ट्रैक्ट्स पर दस्तखत किए जाने की संभावना है।
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सरकारी मंजूरी के बाद, दो प्रमुख कॉन्ट्रैक्ट्स पर काम किया जाएगा। पहला कॉन्ट्रैक्ट लगभग 6,050 करोड़ रुपये का होगा, जिसे नागपुर स्थित निजी क्षेत्र की कंपनी सोलर ग्रुप को सौंपा जाएगा। दूसरा कॉन्ट्रैक्ट लगभग 4,000 करोड़ रुपये का होगा, जो सरकारी रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र की इकाई म्यूनिशन्स इंडिया लिमिटेड (MIL) को दिया जाएगा। ये दोनों कंपनियां पिनाका के लिए दो प्रकार के गोला-बारूद एरिया डिनायल म्यूनिशन (ADM) और पिनाका MKI की रेज बढ़ाने को लेकर काम करेंगी।
भारतीय सेना की तोपखाना रेजिमेंट (Regiment of Artillery) के पास 10 पिनाका रेजिमेंट हैं। इनमें से चार रेजिमेंट पहले ही सेवा में आ चुकी हैं, जिनमें से कुछ को चीन सीमा के ऊंचाई वाले इलाकों में तैनात किया गया है। इसके अलावा, छह और पिनाका रेजिमेंट्स को सेना में शामिल करने की प्रक्रिया चल रही है। इनकी तैनाती से भारतीय सेना की मारक क्षमता और उसकी युद्धक्षमता में वृद्धि होगी।
Pinaka Rocket Systems की खूबियां
पिनाका को दुनिया के सबसे एडवांस मल्टी-लॉन्च रॉकेट सिस्टम में से एक माना जाता है। यह उच्च-विस्फोटक (High-Explosive) प्री-फ्रैगमेंटेड गोला-बारूद को 45 किलोमीटर की दूरी तक निशाना बनाने में सक्षम है। वहीं, एरिया डिनायल म्यूनिशन (ADM) प्रणाली 37 किलोमीटर की दूरी तक अपने टारगेट क्षेत्र को प्रभावी रूप से नष्ट कर सकती है। यह सिस्टम युद्ध क्षेत्र में दुश्मन सैनिकों और टैंकों को निष्क्रिय करने के लिए अत्यधिक कारगर मानी जाती है।
Power Unleashed! 🚀
Meet the Pinaka Missile Launcher – India’s indigenous, multi-barrel rocket launcher system designed to dominate the battlefield. Developed by DRDO, Pinaka delivers precision strikes with a range of up to 75 km, making it a formidable weapon in modern warfare.… pic.twitter.com/B52iehKZjT
— Raksha Samachar *रक्षा समाचार*🇮🇳 (@RakshaSamachar) January 22, 2025
रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने पिनाका के एक्सटेंडेड रेंज वेरिएंट डेवलप किए हैं, जो 75 किलोमीटर की दूरी तक मार कर सकते हैं। भविष्य में इसकी मारक क्षमता को 120 किलोमीटर और फिर 300 किलोमीटर तक बढ़ाने की योजना है।
Pinaka Rocket Systems को खरीद रहे कई देश
भारत न केवल अपनी सेना के लिए पिनाका सिस्टम को डेवलप कर रहा है, बल्कि इसे अन्य मित्र देशों को निर्यात करने की दिशा में भी प्रयास कर रहा है। ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल और आकाश वायु रक्षा प्रणाली की तरह, पिनाका भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी पहचान बना रहा है। अर्मेनिया पहले ही पिनाका और आकाश डिफेंस सिस्टम खरीद चुका है, जबकि कई आसियान (ASEAN), अफ्रीकी और यूरोपीय देश भी इसे खरीदने में रुचि दिखा रहे हैं।
इसके अलावा भारतीय सेना की तोपखाना रेजिमेंट (Regiment of Artillery) जल्द ही एक और बड़े सौदे पर हस्ताक्षर करने की तैयारी कर रही है। यह सौदा 8,500 करोड़ रुपये का होगा और इसके तहत 307 एडवांस टोन्ड आर्टिलरी गन सिस्टम (ATAGS) खरीदे जाएंगे, जिनकी मारक क्षमता 48 किलोमीटर तक होगी।
भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने कहा था कि पिनाका दुनिया के बेहतरीन रॉकेट सिस्टम में से एक है। इसकी रेजिमेंट को ऊंचाई वाले इलाकों में भी तैनात किया गया है और यह हमारी युद्ध क्षमता को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। उन्होंने आगे कहा था कि जैसे ही हमें लंबी दूरी की मारक क्षमता वाले वर्जन मिलेंगे, हम अन्य लंबी दूरी के हथियारों के विकल्पों को छोड़कर पूरी तरह पिनाका सिस्टम पर फोकस कर सकते हैं।
सरकार की योजना पिनाका रॉकेट सिस्टम के और अधिक एडवांस वर्जन डेवलप करने की है। DRDO इस सिस्टम की क्षमता को बढ़ाने के लिए कई ट्रायल कर रहा है। आने वाले वर्षों में, भारतीय सेना के पास 300 किलोमीटर तक मारक क्षमता वाला स्वदेशी रॉकेट सिस्टम होगा, जो देश के डिफेंस सिस्टम को और मजबूत करेगा।
Indian Army: भारतीय सेना में सेवा करने का सपना बहुत से युवाओं का होता है, लेकिन कुछ ही लोग अपने सपनों को साकार कर पाते हैं। मेजर राधिका सेन ऐसी ही एक शख्सियत हैं, जिन्होंने एक शानदार करियर विकल्प को छोड़कर देश की सेवा को प्राथमिकता दी। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) बॉम्बे से बायोटेक्नोलॉजी में मास्टर डिग्री हासिल करने के बावजूद उन्होंने कॉर्पोरेट दुनिया की ऊंचाइयों को छोड़कर भारतीय सेना की वर्दी पहनने का फैसला किया। गणतंत्र दिवस परेड के दौरान रक्षा समाचार डॉट कॉम ने मेजर राधिका से मुलाकात भी की थी।
Major Radhika Sen
हिमाचल प्रदेश की रहने वाली भारतीय सेना की मेजर राधिका सेन को हाल ही में संयुक्त राष्ट्र (United Nations) के प्रतिष्ठित ‘मिलिट्री जेंडर एडवोकेट ऑफ द ईयर’ (United Nations Gender Advocate Award) पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।
Indian Army: आईआईटी बॉम्बे से ली बायोटेक्नोलॉजी में मास्टर डिग्री
मेजर राधिका सेन का जन्म 1993 में हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले के सुंदरनगर में हुआ था। वह बचपन से ही पढ़ाई में अव्वल रहीं और हमेशा नई ऊंचाइयों को छूने का सपना देखा। उनकी प्रारंभिक शिक्षा सेंट मैरी स्कूल, सुंदरनगर में हुई, जिसके बाद उन्होंने माउंट कार्मेल स्कूल, चंडीगढ़ से आगे की पढ़ाई की। विज्ञान में रुचि रखने वाली राधिका ने बायोटेक्नोलॉजी में मास्टर डिग्री प्राप्त करने के लिए आईआईटी बॉम्बे में दाखिला लिया।
राधिका के माता-पिता भी शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े रहे। उनके पिता ओंकार सेन, एनआईटी हमीरपुर में कार्यरत थे, जबकि उनकी माता निर्मला सेन चौहार घाटी के कथोग स्कूल में प्रधानाचार्य थीं। माता-पिता के आदर्शों और मेहनत की प्रेरणा से उन्होंने अपने लक्ष्य को पूरा किया।
आईआईटी बॉम्बे से उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद, राधिका के पास कॉर्पोरेट जगत में एक शानदार करियर बनाने के कई अवसर थे, लेकिन उन्होंने देशसेवा का मार्ग चुना। भारतीय सेना में शामिल होने की उनकी इच्छा बचपन से ही थी, जिसे उन्होंने हकीकत में बदल दिया।
Indian Army: 2016 में भारतीय सेना में बनीं लेफ्टिनेंट
राधिका ने 2015 में चेन्नई स्थित ऑफिसर्स ट्रेनिंग एकेडमी (OTA) में प्रशिक्षण लिया और सफलतापूर्वक इसे पूरा करने के बाद 2016 में भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट के पद पर नियुक्त हुईं। अपनी सेवा के दौरान, उन्होंने जम्मू-कश्मीर, लद्दाख और सिक्किम जैसे विभिन्न क्षेत्रों में तैनाती के दौरान महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं।
राधिका ने भारतीय सेना में आठ साल पहले अपनी सेवाएं शुरू कीं और अपने समर्पण व कड़ी मेहनत से न केवल देश का गौरव बढ़ाया बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान बनाई। उन्होंने विभिन्न सैन्य अभियानों में भाग लिया और कठिन परिस्थितियों में भी अपने कर्तव्यों का निष्ठा से पालन किया।
संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन में योगदान
मेजर राधिका सेन के इन उल्लेखनीय योगदानों के लिए, उन्हें मई 2024 में संयुक्त राष्ट्र के ‘मिलिट्री जेंडर एडवोकेट ऑफ द ईयर’ (United Nations Gender Advocate Award) पुरस्कार से सम्मानित किया गया। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने उन्हें “सच्ची नेता और रोल मॉडल” के रूप में प्रशंसा की। यह पुरस्कार महिलाओं की समानता और शांति रक्षा अभियानों में उनके अतुलनीय योगदान के लिए दिया जाता है। राधिका इस पुरस्कार को प्राप्त करने वाली दूसरी भारतीय शांति सैनिक हैं; उनसे पहले मेजर सुमन गवानी को 2019 में यह सम्मान मिला था।
मार्च 2023 में, मेजर राधिका सेन को डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कॉन्गो (DRC) में संयुक्त राष्ट्र संगठन स्थिरीकरण मिशन (MONUSCO) के तहत तैनात किया गया था। यहां उन्होंने भारतीय रैपिड डिप्लॉयमेंट बटालियन की एंगेजमेंट प्लाटून कमांडर के रूप में सेवा की।
🌍 Nandighosh in UN Missions: Powering Peace!
The Nadighosh Deployed in UN missions, it ensures mobility, and strength in securing global peace.
🇮🇳 A true testament to India’s commitment to international security and innovation!#Nandighosh#UNPeacekeeping#IndianArmy… pic.twitter.com/ZHcTT6hC8I
— Raksha Samachar *रक्षा समाचार*🇮🇳 (@RakshaSamachar) January 22, 2025
कई युद्धग्रस्त इलाकों में जहां सुरक्षा के हालात नाजुक थे, वहां मेजर राधिका न केवल अपनी टीम का सफलतापूर्वक नेतृत्व दिया, बल्कि महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कई प्रभावी कदम भी उठाए। उन्होंने वहां लैंगिक समानता को बढ़ावा देने के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए और स्थानीय महिलाओं को सशक्त बनाने के प्रयास किए।
उन्होंने कम्युनिटी अलर्ट नेटवर्क की स्थापना की, जिससे स्थानीय लोग अपनी सुरक्षा और मानवीय चिंताओं को साझा कर सकें। साथ ही, उन्होंने बच्चों के लिए अंग्रेजी कक्षाओं और वयस्कों के लिए स्वास्थ्य, लिंग और व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन किया, जिससे महिलाओं को अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने के लिए प्रेरित किया।
मेजर राधिका सेन की कहानी उन सभी युवाओं के लिए प्रेरणादायक है, जो अपने सपनों को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उन्होंने यह साबित किया कि अगर इच्छाशक्ति मजबूत हो तो किसी भी चुनौती को पार किया जा सकता है।
उनकी सफलता न केवल उनकी मेहनत का परिणाम है, बल्कि यह इस बात का भी प्रमाण है कि भारतीय महिलाएं किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं हैं। वह भारत की उन बेटियों में से हैं, जिन्होंने अपने कर्मों से यह दिखा दिया कि महिलाओं को अब केवल सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता।
India-China Border: भारत और चीन के बीच कई दौर की सैन्य और कूटनीतिक बातचीत के बावजूद, चीन लगातार वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर अपने सैन्य ढांचे को मजबूत कर रहा है। पिछले साल अक्टूबर में देपसांग और डेमचोक से सैनिकों के हटने के बावजूद, पूर्वी लद्दाख से अरुणाचल प्रदेश तक चीन अपनी गतिविधियों को तेजी से बढ़ा रहा है।
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सैन्य सूत्रों के मुताबिक पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) कई जगहों पर मिलिट्री कैंप्स और सड़क निर्माण में लगी हुई है। खासतौर पर अरुणाचल प्रदेश के तवांग सेक्टर के यांग्त्से क्षेत्र में चीन रणनीतिक बढ़त हासिल करने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार कर रहा है। यहां भारत को रणनीतिक बढ़त हासिल है, लेकिन चीन नई सड़कों और सैन्य सुविधाओं के जरिए अपनी स्थिति को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।
India-China Border: सर्दियों में भी सड़क बनाने में जुटा चीन
सैटेलाइट विश्लेषक @NatureDesai के अनुसार, चीन सर्दियों के मौसम में भी यांग्त्से क्षेत्र में दो नई सड़कों का निर्माण कर रहा है। इनमें से एक सड़क लैम्पुग से टांगवु की ओर बनाई जा रही है। PLA ने न केवल नए सैन्य कैंप बनाए हैं, बल्कि तवांग सेक्टर में टांगवू गांव से एलएसी तक एक पक्की सड़क का निर्माण भी किया है। इसके अलावा, इलाके में कुछ कच्चे रास्तों को भी अपग्रेड किया गया है, जिससे चीन जरूरत पड़ने पर बड़ी संख्या में सैनिकों को जल्दी तैनात कर सके। चीन यांग्त्से क्षेत्र में भारतीय सेना की टैक्टिकल एज को खत्म करने के लिए तेजी से निर्माण कार्य में जुटा हुआ है। सेटेलाइट तस्वीरों से भी खुलासा हुआ है कि चीन ने पिछले कुछ महीनों में इस क्षेत्र में दो नई सड़कें बनाई हैं, जिससे उसके सैनिकों को बेहतर लॉजिस्टिक्स सपोर्ट मिलेगा।
Photo: Naturedesai
India-China Border: पीएलए का फोकस तवांग, नाकू ला पर
रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, पीएलए का फोकस तवांग, नाकू ला (उत्तर सिक्किम) और अरुणाचल प्रदेश के अन्य संवेदनशील इलाकों में आखिरी बिंदु तक कनेक्टिविटी को मजबूत करने पर है। ये इलाके पहले से ही भारत-चीन के बीच विवाद का केंद्र रहे हैं।
रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि चीन लगातार यांग्त्से क्षेत्र में नई सड़कें और पुल बना रहा है, जिससे उसके सैनिकों को ऊंचाई वाले इलाकों में बेहतर पहुंच मिल रही है। इससे भारतीय सेना की पेट्रोलिंग और चौकसी प्रभावित हो सकती है। अरुणाचल प्रदेश के यांग्त्से, असफिला और सुबनसिरी नदी घाटी इलाकों में चीन की गतिविधियां बढ़ रही हैं। इन इलाकों में भारतीय सेना का नियंत्रण दशकों से रहा है, लेकिन चीन बार-बार इस क्षेत्र पर अपना दावा जताता रहा है।
उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और लद्दाख में भी सैन्य मौजूदगी बढ़ा रहा चीन
चीन केवल अरुणाचल प्रदेश में ही नहीं, बल्कि उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और लद्दाख के क्षेत्रों में भी अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा रहा है। नई सड़कों, पुलों, हेलिपैड और आर्टिलरी के निर्माण की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। पूर्वी लद्दाख में देपसांग और डेमचोक क्षेत्रों में चीन की सैन्य गतिविधियां भारत के लिए चिंता का विषय बनी हुई हैं। पिछले साल अक्टूबर में दोनों देशों के बीच इन स्थानों से सैनिकों को पीछे हटाने पर सहमति बनी थी, लेकिन इसके बावजूद चीन की नई तैयारियों के चलते सीमा पर तनाव कम नहीं हुआ है।
1. पश्चिमी सेक्टर (लद्दाख) में एलएसी के पास चीन ने कई नए सैन्य शिविर और लॉजिस्टिक सपोर्ट बेस बनाए हैं। सीमा पर तोपखाने और मिसाइल सिस्टम की तैनाती बढ़ा दी गई है। वहीं, पैंगोंग झील क्षेत्र में चीनी सैनिकों की उपस्थिति बनी हुई है।
2. मध्य सेक्टर (उत्तराखंड-हिमाचल) की बात करें, तो बाराहोटी क्षेत्र में चीन की गतिविधियां बढ़ी हैं। यहां नई सड़कें बनाई गई हैं, जिससे सैनिकों की आवाजाही तेज हो गई है।
3. पूर्वी सेक्टर (सिक्किम-अरुणाचल) के तवांग सेक्टर में चीन लगातार सड़क निर्माण और सैन्य तैनाती बढ़ा रहा है। यांग्त्से और असफिला जैसे संवेदनशील इलाकों में PLA की नई संरचनाएं देखी गई हैं। चीन की नई सड़कों और ब्रिज निर्माण से भारतीय पोस्ट्स और सैन्य ठिकानों की निगरानी करना आसान हो जाएगा।
भारतीय सेना के अधिकारियों के अनुसार, चीन और भारत दोनों ही अपनी उत्तरी सीमाओं पर समझौतों और प्रोटोकॉल के तहत इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलप कर रहे हैं। हालांकि, चीन द्वारा किसी भी प्रकार के समझौतों के उल्लंघन की स्थिति में भारत उचित स्तर पर इसका विरोध भी दर्ज करा रहा है।
सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने हाल ही में एक प्रेस वार्ता में कहा था कि भारत ने किसी भी संवेदनशील क्षेत्र में चीनी सेना को “पेट्रोलिंग राइट्स” नहीं दिए हैं। उन्होंने स्पष्ट किया था कि सभी कॉर्प्स कमांडरों को यह अधिकार दिया गया है कि वे छोटी-मोटी बॉर्डर पेट्रोलिंग और चरागाहों से जुड़ी समस्याओं को शुरुआती स्तर पर ही सुलझा सकें, ताकि वे बाद में गंभीर विवाद का रूप न लें।
चीन नहीं चाहता डी-एस्केलेशन और डी-इंडक्शन
पिछले साल अक्टूबर में जब देपसांग और डेमचोक में चीन ने सैनिकों को पीछे हटाने पर सहमति जताई थी, तब उम्मीद जताई गई थी कि आगे भी तनाव कम होगा। लेकिन अब तक चीन ने पूरी तरह डी-एस्केलेशन (तनाव कम करने) और डी-इंडक्शन (सैनिकों की वापसी) पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया है। इसके विपरीत, चीन ने एलएसी पर अपनी उपस्थिति और मजबूत कर ली है।
हालांकि भारत ने भी चीन की इन गतिविधियों के जवाब में अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। हाल ही में भारतीय सेना ने पूर्वोत्तर और लद्दाख क्षेत्रों में अपने इंफ्रास्ट्रक्चर को डेवलप करने के लिए कई नए प्रोजेक्ट शुरू किए हैं। आधुनिक हथियारों और सर्विलांस सिस्टम से लैस एडवांस पोस्ट बनाई जा रही हैं। इसके अलावा, भारतीय वायुसेना भी एलएसी पर लगातार गश्त कर रही है ताकि किसी भी अप्रत्याशित गतिविधि पर नजर रखी जा सके। सेना और वायुसेना के कॉर्डिनेशन से स्ट्रैटेजिक तौर पर महत्वपूर्ण इलाकों में निगरानी बढ़ाई गई है।
Aero India 2025: एरो इंडिया 2025 में अमेरिकी वायुसेना (USAF) के एफ-35 और एफ-16 लड़ाकू विमानों की डेमो फ्लाइट नहीं होगी। यह चौंकाने वाला एलान आधिकारिक तौर पर अमेरिकी वायुसेना की वेबसाइट पर किया गया है। यह शो 10 फरवरी से 14 फरवरी 2025 के बीच बेंगलुरु के येलाहांका एयर बेस में आयोजित होने वाला है। वहीं इस फैसले से एशिया के सबसे बड़े एयरोस्पेस शो में आने वाली कंपनियों और एविएशन लवर्स को निराशा हो सकती है। क्योंकि कई एविएशन प्रेमी और रक्षा विशेषज्ञ दूर-दूर से एफ-35 और एफ-16 जैसे अत्याधुनिक लड़ाकू विमानों की उड़ानें देखने के लिए एय़र शो में पहुंचते हैं।
एक्सपर्ट्स और एविएशन लवर्स को निराशा
एरो इंडिया एशिया के सबसे बड़े एयरोस्पेस आयोजनों में से एक है, जो हर साल दुनियाभर से रक्षा विशेषज्ञों, एविएशन इंड्स्ट्री के एक्सपर्ट्स और एविएशन लवर्स को आकर्षित करता है। इस शो का उद्देश्य न केवल मिलिट्री और सिविल एविएशन टेक्नोलॉजी का प्रदर्शन करना है, बल्कि डिफेंस सेक्टर में अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देना भी है।
हालांकि, अमेरिकी वायुसेना यानी U.S. Air Force (USAF) ने एफ-35 और एफ-16 की डेमो फ्लाइट करने की वजह का खुलासा नहीं किया है। वहीं, विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला संभवतः टेक्निकल औऱ डिप्लोमेटिक वजहों या फिर लॉजिस्टिक चुनौतियों के चलते लिया गया होगा। वहीं अगर ये विमान एरो शो में आते तो इसे डिफेंस कोऑपरेशन और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को भी बढ़ावा मिलता। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे एय़र शो में अमेरिकी वायुसेना के विमानों की मौजूदगी से लोगों में दिलचस्पी बढ़ती है।
सूत्रों का कहना है कि अमेरिकी विमानों की गैरमौजूदगी एय़र शो (Aero India 2025) में जरूर खलेगी, लेकिन एरो इंडिया 2025 में अन्य रोमांचक हवाई प्रदर्शन और तकनीकी प्रदर्शन दर्शकों को आकर्षित करने में कोई कमीं नहीं छोड़ेंगे। उनका कहना है कि अमेरिकी विमानों की अनुपस्थिति से शो की प्रासंगिकता पर कोई असर नहीं पड़ेगा। भारतीय वायुसेना के विमानों की तकनीकी क्षमता और प्रदर्शन इस शो का मुख्य आकर्षण रहेगा। आयोजक अब इस कमी को पूरा करने के लिए अन्य डोमेस्टिक या इंटरनेशनल पर्फॉर्मन्सेस जोड़ने की कोशिश की जा सकती है।
वहीं, अमेरिकी विमानों की गैरमौजूदगी के बीच, भारत को अपनी स्वदेशी तकनीकों और रक्षा उपकरणों को प्रदर्शित करने का एक बड़ा मौका मिल सकता है। यह आयोजन ‘मेक इन इंडिया’ पहल को बढ़ावा देने और डोमेस्टिक एविएशन इंडस्ट्री को वैश्विक मंच पर मजबूत करने का अवसर प्रदान करेगा।
एरो इंडिया अब तक न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया की डिफेंस और एविएशन इंडस्ट्री के लिए एक प्रमुख आकर्षण का केंद्र रहा है। हर दो साल पर आयोजित होने वाला यह शो दुनियाभर से सरकारों, उद्योग जगत और तकनीकी विशेषज्ञों को एक साथ लाता है। इस बार भी, आयोजन स्थल पर अत्याधुनिक विमानों की प्रदर्शनी, ड्रोन शो, और लाइव हवाई प्रदर्शन दर्शकों के लिए रोमांचक अनुभव होंगे।
Su-57 Felon बन सकता है एरो इंडिया शो का हिस्सा
भारत में अमेरिकी दूतावास में रक्षा अताशे रियर एडमिरल माइकल एल. बेकर का कहना है कि नई दिल्ली एफ-35 पर निर्णय लेने के “बहुत शुरुआती चरण” में है। लेकिन कहानी कुछ और है। सूत्रों ने बताया कि इसकी असल वजह है रूस का Su-57 Felon, जो इस बार एरो इंडिया शो (Aero India 2025) का हिस्सा हो सकता है। रूसी राष्ट्रपति फरवरी में भारत पर होंगे और वे Su-57 स्टेल्थ फाइटर भारत को देने की पेशकश कर सकते हैं। Su-57 भारत में आएगा। इससे पहले नवंबर 2024 में, इसने चीन में झुहाई एयर शो में भाग लिया था, जो किसी विदेशी देश में इसका पहला एयर शो था।
रूस को उम्मीद है कि उसका अत्याधुनिक Su-57 लड़ाकू विमान, अमेरिकी F-35 और चीनी J-20 माइटी ड्रैगन का जवाब है, और भारतीय वायुसेना की स्टील्थ विमान की जरूरत पूरी कर सकता है। वहीं, एरो इंडिया शो में एफ-35, एफ-16 के साथ Su-57 लड़ाकू विमान की मौजूदगी से दोनों में क्लैश हो सकता है। हो सकता है कि इसी वजह से अमेरिका ने एफ-35, एफ-16 को न भेजने का फैसला लिया हो।
पांचवी पीढ़ी का Su-57 फाइटर जेट का प्रोडक्शन काफी सीमित रहा है। 2010 में इसकी पहली उड़ान के बाद से 14 साल हो चुके हैं, और 40 से भी कम विमान अभी तक डिलीवर किए गए हैं। यह मुख्य रूप से डिजाइन और डेवलपमेंट में देरी और पश्चिमी प्रतिबंधों के चलते इसके उत्पादन पर असर पड़ा है। वहीं रूस-युक्रेन वार के चलते इसका उत्पादन 2019 तक भी शुरू भी नहीं हो पाया था।
ISI in Bangladesh: भारत और बांग्लादेश के बीच बढ़ते तनाव के बीच ऐसी खबरें आ रही हैं कि हाल ही में पाकिस्तानी सैन्य अधिकारियों ने बांग्लादेश के सीमावर्ती इलाकों का दौरा किया था। ये अधिकारी भारत के “चिकन नेक” क्षेत्र के पास देखे गए थे, जो पूर्वोत्तर भारत को शेष देश से जोड़ता है। वहीं, इस दौरे के बाद भारत सर्तक हो गया है। खुफिया सूत्रों का कहना है कि खासकर ऐसे समय में जब बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच सैन्य और खुफिया सहयोग की खबरें सामने आ रही हैं, ऐसे में पाकिस्तानी खुफिया अधिकारियों का वहां जाना किसी बड़ी साजिश की तरफ इशारा करता है।
ISI in Bangladesh: एमिरात की फ्लाइट से ढाका पहुंचे थे आईएसआई चीफ
21 जनवरी 2025 को पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के चीफ लेफ्टिनेंट जनरल असीम मलिक ने ढाका का दौरा किया था। वे ढाका के रैडिसन ब्लू होटल में रुके थे। जहां उनके साथ पाकिस्तान के दो वरिष्ठ अधिकारी भी थे—इनमें मेजर जनरल शाहिद अमीर अफसर, डीजी ए; और मेजर जनरल आलम अमीर अवान, डीजी एसएंडए। ये अधिकारी एमिरात की फ्लाइट (EK-586) से आए थे और चुपचाप होटल की तीसरी मंजिल पर रुके थे। वहीं, पाकिस्तान के खुफिया अफसरों की अगुवानी बांग्लादेश सेना के क्वार्टर मास्टर जनरल लेफ्टिनेंट जनरल मोहम्मद फैज-उर-रहमान ने की थी। पाकिस्तानी ISI के अधिकारियों ने बांग्लादेश की खुफिया एजेंसी DGFI के प्रमुख मेजर जनरल जाहांगीर आलम से भी मुलाकात की थी। रहमान को कट्टरपंथी इस्लामी विचारधारा का समर्थक माना जाता है।
ISI in Bangladesh: बांग्लादेश सेना प्रमुख के खिलाफ विद्रोह की तैयारी
सूत्रों का कहना है कि लेफ्टिनेंट जनरल मोहम्मद फैज-उर-रहमान, वही शख्स हैं, जो मौजूदा बांग्लादेश आर्मी चीफ जनरल वकार-उज-जमां को हटाने की योजना बना रहे हैं। और उसमें उन्हें पाकिस्तान की आईएसआई का मजबूत समर्थन मिल रहा है। वकार-उज-जमां को भारत के साथ सहयोगी नीति अपनाने वाला नेता माना जाता है। वहीं, पिछले हफ्ते पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के चीफ असीम मलिक के ढाका दौरे ने इस साजिश को और हवा दी। कहा जा रहा है कि इस मुलाकात का उद्देश्य बांग्लादेशी सेना को भारत विरोधी नीतियों की ओर मोड़ना और खुफिया नेटवर्क को मजबूत करना था। सूत्रों ने बताया कि अब वकार-उज-जमां की स्थिति कमजोर होती जा रही है। रहमान ने सेना के भीतर कट्टरपंथी धड़ा मजबूत कर लिया है और डीजीएफआई (बांग्लादेश की खुफिया एजेंसी) का समर्थन हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं। भले ही रहमान के पास कोई ट्रूप्स कमांड नहीं है, लेकिन वे डीजीएफआई का समर्थन पाने की पूरी कोशिशों में जुटे हुए हैं।
भारत के “चिकन नेक” इलाके का दौरा किया आईएसआई चीफ ने
पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के चीफ लेफ्टिनेंट जनरल असीम मलिक और बांग्लादेश सेना के क्वार्टर मास्टर जनरल लेफ्टिनेंट जनरल मोहम्मद फैज-उर-रहमान से मुलाकात के दौरान बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच खुफिया नेटवर्क को मजबूत करने और सामरिक सहयोग बढ़ाने पर चर्चा हुई। आईएसआई के अधिकारियों ने बांग्लादेश की सीमा से सटे भारत के “चिकन नेक” इलाके का दौरा भी किया। यह इलाका भारत के लिए सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पूर्वोत्तर को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ता है।
सूत्रों के मुताबिक, आईएसआई के अधिकारियों ने बांग्लादेश के रंगपुर जिले का दौरा किया, जो भारत के चिकन नेक क्षेत्र से महज 130 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इसके अलावा, पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल को चटगांव हिल ट्रैक्ट्स जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में भी ले जाया गया। यह इलाका रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है और भारत-बांग्लादेश सीमा पर बढ़ते तनाव के बीच इस दौरे के बाद भारत पूरी तरह से सचेत हो गया है।ॉ
आठ पूर्वोत्तर राज्यों का संपर्क है चिकन नेक से
वहीं, चिकन नेक की बात करें, तो इस क्षेत्र से भारत के आठ पूर्वोत्तर राज्यों का संपर्क शेष देश से जुड़ा हुआ है। पूर्वोत्तर भारत के आठ राज्यों में से चार – असम, त्रिपुरा, मिजोरम और मेघालय – बांग्लादेश के साथ सीमा साझा करते हैं। इन राज्यों के भारत के बाकी हिस्सों से जुड़ने का एकमात्र मार्ग सिलिगुड़ी कॉरिडोर या “चिकन नेक” है, जो महज 22 किलोमीटर चौड़ा है। पाकिस्तानी अधिकारियों का सीमावर्ती इलाकों का दौरा करना, और वह भी ऐसे समय में जब भारत और बांग्लादेश के संबंध तनावपूर्ण हैं, भारत की सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा बन सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की ISI लंबे समय से भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में अशांति फैलाने की कोशिश कर रही है। इस क्षेत्र में सक्रिय उग्रवादी संगठनों को पाकिस्तान के समर्थन के सबूत पहले भी मिल चुके हैं। अब, बांग्लादेश के माध्यम से भारत को घेरने की रणनीति पर काम किया जा रहा है। यह इलाका रणनीतिक दृष्टि से इतना महत्वपूर्ण है कि यहां पर किसी भी प्रकार की अस्थिरता या अवैध गतिविधि भारत के लिए बड़ी समस्या बन सकती है। बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच बढ़ती नजदीकी के कारण इस क्षेत्र में आतंकवाद और तस्करी जैसी गतिविधियां बढ़ने की आशंका है।
आईएसआई चीफ के साथ दिखा जसीमुद्दीन रहमानी
सूत्रों ने बताया कि बांग्लादेश के रंगपुर डिवीजन में स्थानीय निवासियों ने आतंकी संगठन अंसार-उल-बांग्ला टीम (जो अल कायदा से जुड़ा हुआ है) के नेता जसीमुद्दीन रहमानी को पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई और बांग्लादेशी सेना के अधिकारियों के साथ देखा है। जसीमुद्दीन रहमानी, जो कई आतंकवादी गतिविधियों के लिए कुख्यात है, पहले से ही बांग्लादेशी और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर रहा है। रंगपुर डिवीजन भारत की उत्तर-पूर्व सीमा के करीब है।
पाकिस्तान के साथ गलबहियां कर रहा है बांग्लादेश
बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच हाल के वर्षों में रिश्तों में नया मोड़ आया है। 2024 में शेख हसीना सरकार के हटने के बाद से, बांग्लादेश में कट्टरपंथी ताकतों का प्रभाव बढ़ा है। वर्तमान अंतरिम सरकार, जिसमें मोहम्मद यूनुस प्रमुख भूमिका में हैं, भारत के प्रति सख्त और पाकिस्तान के प्रति नरम रुख अपना रही है। हाल ही में, बांग्लादेश ने पाकिस्तान के साथ वीजा नियमों में ढील दी थी और दोनों देशों के बीच पहली बार कार्गो शिप का संचालन शुरू हुआ। इसके अलावा, बांग्लादेशी सेना के जवान अब पाकिस्तानी सेना से ट्रेनिग लेंगे, और बांग्लादेश “अमन 2025” नौसैनिक अभ्यास में भी भाग लेगा। यह एक्सरसाइज कराची में आयोजित किया जाएगा। इसके अलावा बांग्लादेश के वायुसेना पायलट अब चीन और पाकिस्तान द्वारा विकसित लड़ाकू विमान JF-17 की ट्रेनिंग ले रहे हैं।
उल्फा चीफ परेश बुरुआ से मिले आईएसआई अफसर
सूत्रों ने बताया कि आईएसआई चीफ ने उल्फा चीफ परेश बुरुआ से भी मुलाकात की थी। शेख हसीना ने भारत और बांग्लादेश के बीच सुरक्षा और व्यापार के क्षेत्र में अहम समझौते किए थे। उनके कार्यकाल में बांग्लादेश ने भारत विरोधी गतिविधियों पर लगाम लगाई थी। 2009 से 2015 के बीच बांग्लादेश ने भारत के पूर्वोत्तर में सक्रिय आतंकवादी संगठनों जैसे उल्फा (ULFA) के कई नेताओं को भारत के सुपुर्द किया था। उल्फा को भारत के खिलाफ साजिश रचने के लिए पाकिस्तान और बांग्लादेश दोनों का समर्थन मिलता रहा है। उल्फा नेता परेश बरुआ ने कई बार पाकिस्तान और अफगानिस्तान में आतंकवादी प्रशिक्षण शिविरों में हिस्सा लिया है।
एक रिटायर्ड बांग्लादेशी जनरल ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, “बांग्लादेशी और पाकिस्तानी सैन्य अधिकारियों की यात्राएं वाकई चौंकाने वाली हैं। यह संकेत देती हैं कि किसी सैन्य-सुरक्षा उद्देश्य को बहुत कम समय में पूरा करने की कोशिश की जा रही है। हालांकि, यह कहना मुश्किल है कि इन लगातार बैठकों और बांग्लादेश में इनके संभावित उद्देश्यों पर भारत की प्रतिक्रिया आने वाले हफ्तों और महीनों में क्या होगी।”
बांग्लादेश ने 2009 से 2015 के बीच भारत को ULFA नेताओं को सौंपा
सूत्रों ने बताया कि 2009 से 2015 के बीच, बांग्लादेश ने यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (ULFA) के आधा दर्जन से अधिक वरिष्ठ नेताओं को भारत को सौंपा। इन नेताओं में संगठन के महासचिव अनूप चेतिया, अध्यक्ष अरबिंद राजखोवा, विदेश सचिव सशधर चौधरी, वित्त सचिव चित्रबान हजारिका और सैन्य अभियानों के उप प्रमुख राजू बरुआ शामिल थे।
2023 में जब ULFA और भारत सरकार के बीच शांति समझौता हुआ, तो विद्रोही नेताओं ने स्वीकार किया कि बांग्लादेश की ‘प्रो-इंडिया’ अवामी लीग सरकार द्वारा भारतीय उग्रवादी समूहों पर कड़ी कार्रवाई ने उन्हें 2011 में सरकार के साथ शांति वार्ता में शामिल होने के लिए मजबूर किया।
ISI और अफगान मुजाहिदीन के साथ ULFA के संबंध
साउथ एशिया टेररिज्म पोर्टल (SATP) के अनुसार, ULFA के विद्रोहियों ने पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) और अफगान मुजाहिदीन के साथ संबंध बनाए थे। अनुमान है कि लगभग 200 ULFA कार्यकर्ताओं ने पाकिस्तान और अफगानिस्तान में प्रशिक्षण लिया था। गिरफ्तार कार्यकर्ताओं से पूछताछ और जब्त दस्तावेजों से यह खुलासा हुआ कि बांग्लादेश की डिफेंस फोर्सेस इंटेलिजेंस (DFI) ने सिलहट जिले में ULFA कैडरों को प्रशिक्षण दिया था।
करगिल युद्ध के दौरान पाकिस्तान का समर्थन भी किया था ULFA ने
ISI ने ULFA नेताओं, विशेष रूप से परेश बरुआ, को कई पासपोर्ट प्राप्त करने में मदद की। इसके अलावा, कई ULFA कैडरों को पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सीमा के पास विभिन्न प्रशिक्षण केंद्रों में हथियार चलाने की ट्रेनिंग दी गई। इसमें रॉकेट लॉन्चर्स, विस्फोटक और असॉल्ट हथियारों के इस्तेमाल का प्रशिक्षण शामिल था। यहां तक कि ULFA के शीर्ष नेतृत्व ने पाकिस्तान के उच्चायोग की मदद से कराची की यात्रा की, जहां उन्हें ISI संचालित आतंकवादी प्रशिक्षण केंद्रों में ले जाया गया। बता दें कि ULFA ने 1999 के करगिल युद्ध के दौरान पाकिस्तान का समर्थन भी किया था।
बांग्लादेश द्वारा ULFA के खिलाफ उठाए गए कदमों ने पूर्वोत्तर भारत में सुरक्षा को मजबूत किया और विद्रोही नेताओं को शांति वार्ता के लिए मजबूर किया। बांग्लादेश की अवामी लीग सरकार की यह नीति भारत-बांग्लादेश संबंधों के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हुई थी।
चीन से गतिविधियां चला सकता है परेश बरुआ
वहीं, बांग्लादेश में मौजूदा राजनीतिक हालात परेश बरुआ के नेतृत्व वाले ULFA (यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम) गुट के लिए एक नया सहारा बन सकते हैं। यह गुट शांति वार्ता का विरोध करता रहा है और भारत-म्यांमार सीमा के जंगलों में सक्रिय है। कुछ रिपोर्टों के अनुसार, परेश बरुआ अब चीन में रहकर अपनी गतिविधियां चला सकता है। 2004 के चटगांव हथियार बरामदगी मामले में बांग्लादेश की एक हाईकोर्ट बेंच ने परेश बरुआ की फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया है। यह घटना भारत के पड़ोस में सबसे बड़ी अवैध हथियारों की जब्ती में से एक थी। चटगांव बंदरगाह पर पकड़े गए 10 ट्रक अवैध हथियारों और गोला-बारूद में शामिल थे: इनमें 4,930 फायर आर्म्स, 27,020 ग्रेनेड, 840 रॉकेट लॉन्चर, 300 रॉकेट, 2,000 ग्रेनेड लॉन्चिंग ट्यूब, 6,392 मैगजीन और 11 लाख से ज्यादा गोलियां शामिल थीं। इन हथियारों को चीन से तस्करी कर भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में सक्रिय उग्रवादी समूहों को पहुंचाने की योजना थी।
मणिपुर में हिंसा बढ़ने की आशंका
सूत्रों का कहना है कि उल्फा का आईएसआई से मिलना बड़ी कहानी बयां कर रहा है। आशंका जताई जा रही है कि मणिपुर में विद्रोही गतिविधियों में फिर से तेजी आ सकती है। म्यांमार के गृहयुद्ध प्रभावित इलाकों में सुरक्षित ठिकानों के खत्म होने के चलते 2023 में मणिपुर के मैतेई-प्रभुत्व वाले यूनाइटेड नेशनल लिबरेशन फ्रंट (UNLF) ने सरकार के साथ संघर्ष विराम समझौता किया था। सैकड़ों विद्रोही आत्मसमर्पण कर चुके थे। वहीं, UNLF के वार्ता-विरोधी गुट और असंतुष्ट सदस्य अब बांग्लादेश में नया ठिकाना तलाश सकते हैं। यह स्थिति भारत के लिए गंभीर चिंता का विषय बन सकती हैं।
Indo-Bangladesh border: बांग्लादेश ने भारत-बांग्लादेश सीमा के पास रह रहे नागरिकों को हथियारों की ट्रेनिंग देना शुरू कर दिया है। सूत्रों के मुताबिक बांग्लादेश ने सीमा से सटे क्षेत्रों में रहने वाले नागरिकों को हथियार चलाने की ट्रेनिंग देना शुरू कर दिया है, जिससे सीमा पर तैनात सुरक्षा बलों के लिए खतरा पैदा हो गया है। वहीं, बांग्लादेश के इस कदम के बाद सुरक्षा विशेषज्ञों ने गैर-घातक संधि (Non-Lethal Treaty) की समीक्षा की मांग उठाई है। विशेषज्ञों का कहना है कि सीमा सुरक्षा बल (BSF) को अधिक स्वतंत्रता देकर सीमा पर बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।
Indo-Bangladesh border: बड़े टकराव की तैयारी
सूत्रों के अनुसार, बांग्लादेश ने सीमा पर रहने वाले नागरिकों को छोटे हथियारों के इस्तेमाल की ट्रेनिंग देना शुरू कर दिया है। यह आशंका जताई जा रही है कि इन नागरिकों को सीमा पर टकराव या भारत के सीमा बलों के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सकता है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम सीमा क्षेत्र में बांग्लादेश का दबदबा स्थापित करने और बांग्लादेश की तरफ से चलाई जा रहीं अवैध गतिविधियों जैसे तस्करी पर भारतीय जवानों की कार्रवाई को रोकने के लिए उठाया गया हो सकता है।
BSF को जवाबी कार्रवाई में हो सकती है दिक्कत
सूत्रों के मुताबिक भारत-बांग्लादेश सीमा बेहद संवेदनशील है और यहां तस्करी, मानव तस्करी और अन्य गैर-कानूनी गतिविधियों बेहद आम हैं। वहीं, नागरिकों को हथियार चलाने की ट्रेनिंग देने से बड़ी समस्या पैदा हो सकती है। क्योंकि दोनों देशों के बीच पहले से एक गैर-घातक संधि (Non-Lethal Treaty) लागू है, जिसके तहत सीमा पर हथियारों का इस्तेमाल कम करने, सीमा पर शांति बनाए रखने और वहां रहने वाले लोगों की जानमाल की हानि न हो, इसलिए लागू की गई थी। हालांकि, बांग्लादेश के इस कथित कदम के बाद सुरक्षा विश्लेषकों का मानना है कि इस संधि से BSF को आगे जवाबी कार्रवाई करने में दिक्कत हो सकती है, जिससे बीएसएफ कर्मियों और नागरिकों की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।
Indo-Bangladesh border: BSF को मिलें ज्यादा अधिकार
सुरक्षा विशेषज्ञों और पूर्व सैन्य अधिकारी अब गैर-घातक संधि की समीक्षा की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि मौजूदा हालात में BSF को अधिक अधिकार मिलने चाहिए। यदि बांग्लादेश हथियारबंद नागरिकों को सीमा के पास तैनात कर रहा है, तो भारतीय सुरक्षा बलों को प्रभावी तरीके से जवाब देने के लिए पर्याप्त संसाधन और अधिकार मिलने चाहिए।
बता दें कि पिछले साल अगस्त में शेख हसीना सरकार के सत्ता से बाहर होने के बाद बांग्लादेश में राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी है। अंतरिम सरकार द्वारा लगातार भारत विरोधी बयान दिए जा रहे हैं, जिससे दोनों देशों के रिश्तों में खटास बढ़ी है।
बांग्लादेशी सैनिक बना रहे बंकर
इससे पहले पश्चिम बंगाल के मालदा जिले के सुखदेवपुर गांव के पास भारत-बांग्लादेश सीमा पर तनाव बढ़ने की खबरें सामने आईं थीं। भारतीय किसानों ने बांग्लादेश पर आरोप लगाया है कि उसने सीमा पर बंकर बनाया है, जिसमें बांग्लादेशी सैनिक हथियारों के साथ तैनात हैं।
सुखदेवपुर के किसानों का दावा है कि बांग्लादेशी सैनिक न केवल सीमा पर बंकर बना रहे हैं, बल्कि भारतीय जमीन पर घुसपैठ करने वालों को प्रोत्साहित कर रहे हैं। किसानों ने आरोप लगाया कि बांग्लादेशी सैनिक सीमा पर बाड़ लगाने के काम में भी बाधा डालते हैं और भारतीय किसानों को गोली मारने की धमकी देते हैं।
भारत और बांग्लादेश के बीच 4096 किलोमीटर की सीमा है, जिसमें पश्चिम बंगाल का बड़ा हिस्सा शामिल है। हाल ही में बांग्लादेश ने इस बात पर आपत्ति जताई कि भारत सीमा पर बाड़ या कटीले तार लगा रहा है।
बांग्लादेशी सीमा रक्षक (BGB) द्वारा भारतीय किसानों को धमकाने और बाड़ लगाने के काम को रोकने की कोशिशों ने दोनों देशों के बीच तनाव को और बढ़ा दिया है।
गैर-घातक हथियारों का इस्तेमाल
इस बीच, बांग्लादेश सरकार ने अपने सीमा रक्षकों को साउंड ग्रेनेड और आंसू गैस जैसे गैर-घातक हथियार देने का फैसला किया है। बांग्लादेश के गृह मंत्रालय के सलाहकार लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) जहांगीर आलम चौधरी ने एक प्रेस ब्रीफिंग में इस फैसले की पुष्टि की।
चौधरी ने कहा, “हमने बांग्लादेश सीमा रक्षक बल (BGB) के लिए साउंड ग्रेनेड और आंसू गैस के गोले खरीदने की मंजूरी दे दी है।” उन्होंने यह भी कहा कि भारत को इस कदम पर नकारात्मक प्रतिक्रिया देने की जरूरत नहीं है, क्योंकि भारत पहले से ही अपनी सीमा पर इसी तरह के गैर-घातक हथियारों का इस्तेमाल करता है।
हाल ही में बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने भारत के उच्चायुक्त प्रणय वर्मा को सीमा विवाद पर तलब किया। बांग्लादेश ने आरोप लगाया कि भारत पांच स्थानों पर सीमा पर बाड़ लगाने की कोशिश कर रहा है, जो एक द्विपक्षीय समझौते का उल्लंघन है। इसके जवाब में, भारत के विदेश मंत्रालय ने भी बांग्लादेश के उप उच्चायुक्त नुरल इस्लाम को तलब किया और सीमा पर बढ़ते तनाव पर चर्चा की।
BSF का ‘ऑप्स अलर्ट’ अभियान शुरू
वहीं, भारत ने 76वें गणतंत्र दिवस समारोह को देखते हुए बांग्लादेश सीमा पर चौकसी बढ़ा दी है और सीमा सुरक्षा बल (BSF) ने 10 दिन का ‘ऑप्स अलर्ट’ अभियान शुरू किया है। यह अभियान 22 जनवरी से 31 जनवरी, 2025 तक चलेगा। BSF ने जानकारी दी है कि यह अभियान भारत-बांग्लादेश सीमा के सभी फील्ड फॉर्मेशनों में चलाया जा रहा है। संवेदनशील इलाकों, विशेष रूप से नदी किनारे और बिना बाड़ वाले क्षेत्रों में गश्त और निगरानी बढ़ा दी गई है। इस ऑपरेशन का मुख्य उद्देश्य सीमा की सुरक्षा को पुख्ता करना और किसी भी संभावित चुनौती का सामना करने के लिए तत्पर रहना है।
India-France Deal: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फरवरी में फ्रांस की यात्रा पर जा सकते हैं, जहां वे फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों द्वारा आयोजित आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एक्शन समिट में भाग लेंगे। इस यात्रा के दौरान, भारत और फ्रांस के बीच दो बड़े रक्षा समझौतों को अंतिम रूप दिए जाने की उम्मीद है। ये समझौते राफेल-M लड़ाकू विमानों और स्कॉर्पीन पनडुब्बियों की खरीद को लेकर हैं।
Source @macaskeel
सूत्रों के अनुसार, इन रक्षा सौदों की कुल लागत 10 अरब डॉलर (83,000 करोड़ रुपये) से अधिक होगी। इनमें भारतीय नौसेना के विमानवाहक पोतों के लिए 26 राफेल-M लड़ाकू विमानों की खरीद और तीन अतिरिक्त स्कॉर्पीन पनडुब्बियों का निर्माण शामिल है। अगले हफ्ते कैबिनेट सुरक्षा समिति (CCS) इन समझौतों की अपनी मंजूरी दे सकती है।
India-France Deal: 10-11 फरवरी को पेरिस में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस समिट
फ्रांसीसी राष्ट्रपति कार्यालय ने पहले ही पुष्टि कर दी है कि प्रधानमंत्री मोदी को 10-11 फरवरी को आयोजित होने वाले आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस समिट के लिए आमंत्रित किया गया है। यह समिट वैश्विक AI क्षेत्र को सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय लाभ प्रदान करने के लिए ठोस कदम उठाने पर केंद्रित होगी। इस दौरान दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय वार्ता भी होगी। उम्मीद की जा रही है कि इन दौरान इन रक्षा सौदों पर अंतिम मुहर लगाई जा सकती है।
भारतीय नौसेना को चाहिए राफेल-M जैसे फाइटर जेट
भारतीय नौसेना को राफेल-M जैसे अत्याधुनिक लड़ाकू विमानों की सख्त जरूरत है। ये विमान नौसेना के दो विमान वाहक पोतों आईएनएस विक्रमादित्य और आईएनएस विक्रांत पर तैनात किए जाएंगे। इस डील में 22 सिंगल-सीटर और 4 ट्विन-सीटर ट्रेनर राफेल-M जेट्स शामिल होंगे।
पनडुब्बियों की बात करें, तो तीन अतिरिक्त स्कॉर्पीन पनडुब्बियां भारतीय नौसेना के बेड़े को मजबूत करेंगी। मौजूदा स्कॉर्पीन पनडुब्बियों का निर्माण मुंबई के मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड और फ्रांस की नेवल ग्रुप के सहयोग से हो रहा है। पहले हुए अनुबंध में शामिल छह स्कॉर्पीन पनडुब्बियों में से पांच पहले ही नौसेना में शामिल हो चुकी हैं। वहीं, छठी पनडुब्बी, आईएनएस वागशीर को इसी महीने 15 जनवरी को भारतीय नौसेना में शामिल किया गया था।
इन सौदों के अलावा, भारत रक्षा उपकरणों के स्वदेशीकरण की दिशा में भी तेजी से आगे बढ़ रहा है। हाल ही में, रक्षा मंत्रालय ने दो स्कॉर्पीन पनडुब्बियों के लिए 2,867 करोड़ रुपये के कॉन्ट्रैक्ट्स पर हस्ताक्षर किए, जिनमें एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन मॉड्यूल और भारी टॉरपीडो जैसे स्वदेशी उपकरण शामिल हैं।
राफेल-M और स्कॉर्पीन पनडुब्बियों का सौदा भारत की समुद्री क्षमताओं को मजबूत करने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। यह न केवल भारतीय नौसेना को और सक्षम बनाएगा, बल्कि भारत-फ्रांस रक्षा साझेदारी को भी नई दिशा देगा। इन सौदों से भारतीय नौसेना अपने मिशनों को प्रभावी ढंग से अंजाम देने में सक्षम होगी और बढ़ते भू-राजनीतिक तनावों के बीच देश की समुद्री सीमाओं की रक्षा करेगी।
इससे पहले पिछले साल दो दिसंबर को नेवी डे के मौके नौसेना प्रमुख एडमिरल एडमिरल दिनेश के. त्रिपाठी ने अपने सालाना प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि दोनों डील अंतिम चरण में हैं और अगले महीने तक पूरी हो सकती हैं। उन्होंने बताया, “यह केवल औपचारिकताओं को पूरा करने का मामला है। हमें उम्मीद है कि स्कॉर्पीन पनडुब्बी और राफेल-M डील पर जल्द ही दस्तखत हो जाएंगे।
उन्होंने कहा राफेल-M डील के बारे में कहा था कि यह CCS की मंजूरी से एक कदम दूर है। मंजूरी मिलते ही समझौता साइन कर लिया जाएगा, और क्योंकि यह सरकार-से-सरकार का सौदा है, इसे तेजी से लागू किया जाएगा। राफेल-M डील में 22 सिंगल-सीटर लड़ाकू विमान और चार ट्विन-सीटर ट्रेनर शामिल हैं। यह सौदा नौसेना की तत्कालिक जरूरतों को पूरा करने के लिए है, जब तक कि स्वदेशी ट्विन-इंजन डेक आधारित फाइटर तैयार नहीं हो जाता।
नौसेना के पास दो विमानवाहक पोत
भारतीय नौसेना वर्तमान में दो विमानवाहक पोत संचालित करती है आईएनएस विक्रमादित्य और आईएनएस विक्रांत। इन पर राफेल-M जैसे आधुनिक लड़ाकू विमानों की तैनाती बेहद जरूरी है। साथ ही, aging fleet और प्रोजेक्ट-75I के तहत छह एडवांस पनडुब्बियों की देरी को देखते हुए, तीन अतिरिक्त स्कॉर्पीन पनडुब्बियां नौसेना की युद्ध क्षमता को बढ़ाने में मदद करेंगी।
चीप, पाकिस्तान पर कही थी ये बात
एडमिरल त्रिपाठी ने पाकिस्तानी नौसेना को लेकर कहा था, “हम जानते हैं कि पाकिस्तान 50 जहाजों वाली नौसेना बनाने की कोशिश कर रहा है। उनकी आर्थिक स्थिति को देखते हुए यह आश्चर्यजनक है कि वे इस विस्तार के लिए फंड कहां से ला रहे हैं। वहीं, एडमिरल ने भारतीय महासागरीय क्षेत्र (Indian Ocean Region) में चीन की गतिविधियों पर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि नौसेना ने पिछले 12 महीनों में पीएलए नेवी (PLA Navy) के जहाजों और अनुसंधान पोतों की गतिविधियों पर कड़ी नजर रखी है। उन्होंने कहा, “महासागर सभी के लिए खुले हैं, जब तक वे हमारी सुरक्षा को प्रभावित नहीं करते।”
एडमिरल त्रिपाठी ने यह भी बताया था कि भारतीय शिपयार्डों में फिलहाल 62 जहाज और एक पनडुब्बी निर्माणाधीन हैं। इसके अलावा, 31 नए जहाजों और पनडुब्बियों के निर्माण के लिए मंजूरी मिल चुकी है। इनमें से सभी को भारत में ही बनाया जाएगा। उन्होंने कहा, “2025 में हर महीने एक नया जहाज नौसेना में शामिल किया जाएगा।”
Robotic Mules: पुणे में सेना दिवस परेड के दौरान जब भारतीय सेना ने अपने नए रोबोटिक म्यूल्स यानी खच्चरों को पहली बार आम जनता के सामने पेश किया, तो नजारा देखने लायक था। दशकों तक भारतीय सेना के पहाड़ी इलाकों और दुर्गम रास्तों पर रसद पहुंचाने वाले खच्चरों ने अपना फर्ज निभाया। लेकिन अब भारतीय सेना ने लेटेस्ट टेक्नोलॉजी को अपनाते हुए अपनी ऐतिहासिक ‘म्यूल कॉर्प्स’ को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से लैस रोबोटिक खच्चरों से बदलने का फैसला किया है।
Robotic Mules: खच्चरों ने हर चुनौती में दिया साथ
भारतीय सेना के लिए खच्चरों का योगदान असाधारण रहा है। बर्फीली ऊंचाइयों से लेकर घने जंगलों तक, खच्चरों ने अपनी पीठ पर राशन, गोला-बारूद, और दवाइयों का भार उठाया। चाहे वह कारगिल का युद्ध हो या सियाचिन की ठंडी बर्फीली हवाएं, खच्चरों ने हर चुनौती में सैनिकों का साथ दिया।
करीब दो शताब्दियों तक खच्चर भारतीय सेना के अहम सहयोगी रहे हैं। उन्होंने हिमालय की ऊंचाईयों से लेकर बर्मा के घने जंगलों और कठिन युद्धक्षेत्रों तक, रसद और हथियारों की आपूर्ति सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज भी लगभग 4,000 खच्चरों की ताकत वाली म्यूल कॉर्प्स सेना की लॉजिस्टिक जरूरतों का अहम हिस्सा है।
सेना के एक पूर्व अधिकारी, कर्नल विक्रम सिंह, ने याद करते हुए कहा, “जब रास्ते बर्फ से ढके होते थे, तब खच्चरों की मदद के बिना सामान पहुंचाना असंभव था। ये जानवर हमारे साथी थे, जो कभी थकते नहीं थे। उनकी मेहनत और निष्ठा ने हमें कई बार युद्ध में जीत दिलाई।”
एडवाांस नेविगेशन सिस्टम से लैस हैं Robotic Mules
वहीं, अब सेना ने खच्चरों की जगह ‘मल्टी-यूटिलिटी लेग्ड इक्विपमेंट’ (MULE) नामक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से लैस रोबोट को अपनाया है। 51 किलो वजनी ये रोबोट एडवाांस नेविगेशन सिस्टम से लैस हैं, जो दुर्गम इलाकों में भी आसानी से काम कर सकते हैं। इन्हें राशन, दवाइयां, गोला-बारूद, और अन्य सामग्रियों को सैनिकों तक पहुंचाने के लिए डिजाइन किया गया है।
ये रोबोटिक म्यूल आम खच्चरों की तुलना में अधिक एफिशिएंसी एंड स्टेबिलिटी प्रदान करते हैं। इनकी ऑटोनोमी एंड एक्यूरेसी दुर्गम इलाकों में रसद आपूर्ति को सुरक्षित और प्रभावी बनाती है। जहां पारंपरिक खच्चर की रफ्तार औऱ क्षमता सीमित होती है, वहीं ये रोबोटिक इक्विपमेंट्स अधिक भार उठाने और तेजी से काम करने में सक्षम हैं।
जब खच्चर बन जाते थे दोस्त
लेकिन सेना के इस बदलाव कई पूर्व सैन्य अधिकारी भी भावुक हैं। सियाचिन में तैनात रहे हवलदार मोहन सिंह ने कहा, “खच्चर केवल सामान ढोने वाले जानवर नहीं थे। वे हमारी टीम का हिस्सा थे। जब रास्ता मुश्किल होता था और मौसम खराब होता था, तो वे हमारी आखिरी उम्मीद बनते थे।”
उनका कहना था कि खच्चरों के साथ बिताए गए पल कभी भुलाए नहीं जा सकते। जब एक सैनिक खच्चर के साथ ऊंचाई पर चढ़ता था, तो दोनों के बीच एक अनकहा दोस्ताना संबंध बन जाता था।
रोबोटिक खच्चरों की एंट्री ने सेना में एक नई शुरुआत की है, लेकिन यह बदलाव परंपराओं के अंत का भी संकेत है। खच्चरों से जुड़ी कहानियां और उनकी वीरता अब इतिहास का हिस्सा बन जाएंगी। उनके साहस और निष्ठा की कहानियां पीढ़ियों तक सैनिकों की प्रेरणा रही हैं।
क्या भावनात्मक जुड़ाव दे पाएंगे रोबोट?
हालांकि, यह सवाल भी उठता है कि क्या रोबोट वही भावनात्मक जुड़ाव दे पाएंगे जो खच्चर देते थे? सैनिकों के लिए खच्चर केवल काम करने वाले साथी नहीं थे, बल्कि वे कठिन समय में उनके मानसिक सहारे के तौर पर भी काम करते थे।
जैसे-जैसे तकनीक आगे बढ़ रही है, युद्ध के मैदान में जानवरों की भूमिका कम होती जा रही है। रोबोटिक खच्चरों का इस्तेमाल न केवल रसद पहुंचाने में किया जाएगा, बल्कि भविष्य में यह निगरानी और अन्य सामरिक उद्देश्यों में भी सहायक हो सकते हैं।
Pralay Ballistic Missile: गणतंत्र दिवस 2025 की रिहर्सल परेड के अभ्यास के दौरान एक ऐसा नजारा देखने को मिला, जिसने भारत की आत्मनिर्भरता की दिशा में मजबूत कदमों की झलक पेश की। दशकों से भारतीय सेना चेक गणराज्य में बने टैट्रा ट्रांसपोर्टर इरेक्टर लॉन्चर्स (Tatra Transporter Erector Launchers) पर निर्भर रही है, लेकिन अब इनकी जगह स्वदेशी विकल्प ले रहे हैं। रिहर्सल परेड के दौरान अशोक लीलैंड के 12×12 हेवी-ड्यूटी व्हीकल पर “प्रलय” टैक्टिकल बैलिस्टिक मिसाइल को ले जाते देखा गया।
टैट्रा ट्रकों की भारतीय सेना में अहम भूमिका रही है। ये वाहन अपनी मजबूती और दुर्गम इलाकों में बेहतर प्रदर्शन के लिए जाने जाते हैं। हिमालय जैसे कठिन पहाड़ी इलाकों से लेकर राजस्थान के रेगिस्तान तक, टैट्रा ट्रकों ने हमेशा अपनी उपयोगिता साबित की है। इनका इस्तेमाल पिनाका, ब्रह्मोस और पृथ्वी जैसी मिसाइलों को ले जाने और तैनात करने के लिए भी किया जाता है। लेकिन “आत्मनिर्भर भारत” अभियान के तहत, भारत अब विदेशी उपकरणों पर निर्भरता को कम करने और स्वदेशी विकल्पों को प्राथमिकता देने की कोशिशों में जुटा है।
Pralay Ballistic Missile: अशोक लीलैंड ले रहा जगह
“आत्मनिर्भर भारत” पहल में अशोक लीलैंड ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। कंपनी ने भारतीय सेना के लिए 12×12 कॉन्फिगरेशन वाला हेवी-ड्यूटी व्हीकल तैयार किया है, जो न केवल तकनीकी दृष्टि से एडवांस है बल्कि पूरी तरह से भारत में निर्मित है। इस वाहन की झलक गणतंत्र दिवस परेड के अभ्यास के दौरान देखने को मिली, जहां यह “प्रलय” मिसाइल को ले जाते हुए यह ट्र्क नजर आया। वहीं, प्रलय जैसी मिसाइल को स्वदेशी व्हीकल पर ले जाकर भारत ने यह साबित किया है कि अब वह भारी वाहनों के निर्माण में भी वैश्विक मानकों को पूरा करने में सक्षम है।
टैट्रा से स्वदेशी वाहनों तक का सफर
सूत्रों का कहना है कि भारतीय सेना ने अपने BEML-TATRA 12×12 हाई-मोबिलिटी स्पेशल मिलिट्री वाहनों (HMSMV) को स्वदेशी रूप से विकसित नए वाहनों से बदलने की योजना बनाई है। यह बदलाव 2026 के अंत तक पूरा होने की उम्मीद है।
BEML-TATRA 12×12 वाहन सेना की लॉजिस्टिक बेड़े का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। टैट्रा ट्रकों का उपयोग भारतीय सेना में दशकों से हो रहा है। चाहे वह हिमालय की बर्फीली चोटियां हों या राजस्थान के रेतीले रास्ते, टैट्रा ट्रक हमेशा सेना की प्राथमिकता रहे हैं। ये विशेष वाहन भारी वजन को चुनौतीपूर्ण इलाकों में ले जाने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं। इनकी 42 टन की पेलोड क्षमता और 13 मीटर लंबा प्लेटफॉर्म उन्हें बड़े और भारी सैन्य उपकरणों को ले जाने के लिए उपयुक्त बनाता है। स्वचालित ट्रांसमिशन और उत्कृष्ट ऑफ-रोड क्षमताओं के कारण ये वाहन कठिन परिस्थितियों में भी कुशलता से काम करते हैं।
नए स्वदेशी वाहनों को BEML-TATRA 12×12 के प्रदर्शन मानकों के बराबर या उससे बेहतर होना होगा। इनमें 42 टन की पेलोड क्षमता, लंबा प्लेटफॉर्म, ऑफ-रोड गतिशीलता और एडवांस ऑटौमिटक ट्रांसमिशन जैसी खूबियों को शामिल करना होगा।
यह पहल सरकार के “मेक इन इंडिया” अभियान के तहत की जा रही है, जिसका उद्देश्य देश में रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देना और आयात पर निर्भरता को कम करना है। स्वदेशी हाई-मोबिलिटी वाहनों को शामिल करके भारतीय सेना न केवल अपनी लॉजिस्टिक क्षमताओं को मजबूत करेगी, बल्कि देश की रक्षा निर्माण क्षमता को भी प्रोत्साहित करेगी।
Pralay Ballistic Missile की विशेषताएं
प्रलय एक टैक्टिकल क्वासी-बैलिस्टिक सतह से सतह पर मार करने वाली मिसाइल है, जिसकी रेंज 150 से 500 किलोमीटर है। प्रलय मिसाइल 350 से 700 किलोग्राम तक का पेलोड ले जाने में सक्षम है और इसे सॉलिड-फ्यूल रॉकेट मोटर से पावर मिलती है। इसका गाइडेंस सिस्टम इसे 10 मीटर से कम सर्कुलर एरर प्रॉबेबल (CEP) प्रदान करता है। इसमें हाई-एक्सप्लोसिव फ्रैगमेंटेशन, पेनिट्रेशन-कम-ब्लास्ट (PCB), और रनवे डिनायल सबम्यूनिशन (RDPS) जैसे वॉरहेड ऑप्शन हैं।
इंटीग्रेटेड रॉकेट फोर्स का हिस्सा है प्रलय
चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देशों ने अपनी सीमाओं पर मिसाइल सिस्टम को उन्नत किया है। पाकिस्तान ने चीनी HQ-9 सरफेस-टू-एयर मिसाइल सिस्टम और चीन ने समान सिस्टम तैनात किए हैं। इसके जवाब में, भारत ने प्रलय मिसाइलों की तैनाती को मंजूरी दी है।
भारतीय वायुसेना ने 2022 में 120 प्रलय मिसाइलों का ऑर्डर दिया था, जबकि 2023 में भारतीय सेना ने 250 और मिसाइलें मंगवाईं। इन मिसाइलों का उद्देश्य चीन और पाकिस्तान के साथ लगने वाली सीमाओं पर भारत की रक्षा क्षमताओं को मजबूत करना है। प्रलय को इंटीग्रेटेड रॉकेट फोर्स (IRF) का हिस्सा बनाया गया है, जिसमें ब्रह्मोस, निर्भय और पिनाका जैसे सिस्टम भी शामिल हैं।
प्रलय में कई देशों की दिलचस्पी
प्रलय मिसाइल की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मांग बढ़ रही है। भारत के रक्षा मंत्रालय ने इस मिसाइल के निर्यात को मंजूरी दी है। खबरों के मुताबिक, आर्मेनिया के साथ इसके निर्यात पर बातचीत चल रही है। अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार, निर्यात वेरिएंट की रेंज को 300 किलोमीटर और पेलोड को 500 किलोग्राम तक सीमित किया जाएगा।
Pinaka MBRL: भारतीय सेना ने अपनी रणनीतिक ताकत को और मजबूत करने के लिए एक बड़ा कदम उठाने की तैयारी की है। सेना ने महंगी सामरिक मिसाइलों (टैक्टिकल मिसाइल्स) की खरीद को फिलहाल रोककर स्वदेशी पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर (MBRL) सिस्टम को अपनाने का फैसला किया है। यह कदम भारत की स्वदेशी रक्षा तकनीक को बढ़ावा देने के साथ-साथ सेना की फायरपावर को मजबूती देने के लिए उठाया गया है।
डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (DRDO) द्वारा विकसित पिनाका गाइडेड रॉकेट सिस्टम (Pinaka MBRL) को दुनिया के सबसे बेहतरीन सिस्टमों में से एक माना जाता है। इसकी खूबियों और प्रभावी क्षमताओं के कारण कई देश इसे अपने डिफेंस सिस्टम में शामिल करने की इच्छा जता रहे हैं।
भारतीय सेना ने एलान किया है कि पिनाका सिस्टम को इस साल के अंत तक तैनात किया जाएगा। इस कदम से सेना की तोपखाने (आर्टिलरी) की क्षमता में काफी सुधार होगा। पिनाका का एडवांस वर्जन न केवल अधिक दूरी तक हमला करने में सक्षम है, बल्कि इसकी सटीकता और घातकता भी इसे खास बनाती है।
Power Unleashed! 🚀
Meet the Pinaka Missile Launcher – India’s indigenous, multi-barrel rocket launcher system designed to dominate the battlefield. Developed by DRDO, Pinaka delivers precision strikes with a range of up to 75 km, making it a formidable weapon in modern warfare.… pic.twitter.com/B52iehKZjT
— Raksha Samachar *रक्षा समाचार*🇮🇳 (@RakshaSamachar) January 22, 2025
सूत्रों के मुताबिक DRDO को पिनाका सीरीज (Pinaka MBRL) को एक्सपेंड करने और इसके दो नए संस्करण डेवलप करने को कहा गया है। भारतीय सेना ने दो लंबी रेंज के पिनाका MBRL की मंजूरी दी है। इन दोनों संस्करणों को एडवांस गाइडेंस सिस्टम से लैस किया जाएगा। ये संस्करण 120 किलोमीटर और 300 किलोमीटर की दूरी तक मार करने में सक्षम होंगे। पुणे स्थित डीआरडीओ की लैब, आर्मामेंट रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टेब्लिशमेंट (ARDE), इन रॉकेटों को डिजाइन कर रही है। एक बार जब ये संस्करण तैयार हो जाएंगे, तो म्यूनिशन्स इंडिया लिमिटेड (MIL) इन्हें डीआरडीओ की टेक्नोलॉजी ट्रांसफर प्रक्रिया के तहत निर्माण करेगी।
सूत्रों का कहना है कि 300 किलोमीटर की रेंज वाला संस्करण सेना के लिए विशेष रूप से उपयोगी साबित हो सकता है। इसका बड़ा आकार न केवल भारी पेलोड ले जाने में सक्षम होगा, बल्कि यह मौजूदा लॉन्च प्लेटफॉर्म्स के साथ भी पूरी तरह अनुकूल रहेगा। यह संस्करण दुश्मन के इलाके में गहराई तक हमला करने और उनके सैन्य ढांचे को नष्ट करने में मददगार साबित होगा।
Pinaka MBRL: पिनाका सिस्टम की खूबियां
गाइडेड पिनाका अब आधुनिक नेविगेशन, नियंत्रण और गाइडेंस तकनीकों से लैस है, जो इसे उच्च सटीकता प्रदान करती है।
पहले जहां पिनाका की रेंज 40 किलोमीटर तक सीमित थी, वहीं अब इसके एडवांस संस्करण 120 से 300 किलोमीटर तक मार करने में सक्षम हैं।
यह सिस्टम एक बार में कई रॉकेट दाग सकता है, जो इसे दुश्मन के ठिकानों को तेजी से नष्ट करने में सक्षम बनाता है।
पिनाका को DRDO के मार्गदर्शन में भारतीय रक्षा कंपनियों द्वारा निर्मित किया जा रहा है, जो भारत की आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देता है।
आधुनिक युद्ध में सटीकता और कम नुकसान सुनिश्चित करना प्राथमिकता है, और पिनाका इस आवश्यकता को पूरा करता है।
पिनाका सिस्टम ने तीन अलग-अलग चरणों में ट्रायल्स को सफलतापूर्वक पास किया है। इन ट्रायल्स में इसकी रेंज, सटीकता, और फायरिंग दर का गहन निरीक्षण किया गया। इन गाइडेड रॉकेट्स को धीरे-धीरे पुराने, अनगाइडेड वेरिएंट्स की जगह लेने के लिए तैयार किया जा रहा है।
पिनाका बनाम टेक्टिकल मिसाइलें
पिनाका की तुलना में सामरिक मिसाइलें काफी महंगी होती हैं। भारतीय सेना के अनुसार, पिनाका जैसे सस्ते और प्रभावी विकल्प न केवल लागत को कम करते हैं, बल्कि उनकी फायरिंग गति और व्यापक कवरेज के कारण सामरिक बढ़त भी देते हैं। भारतीय सेना के इस निर्णय से टैक्टिकल मिसाइलों पर निर्भरता कम होगी, जो महंगे और आयातित होते हैं। इसके बदले पिनाका जैसे स्वदेशी समाधान न केवल लागत प्रभावी होंगे, बल्कि आत्मनिर्भर भारत के उद्देश्य को भी मजबूत करेंगे।
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