Pinaka MBRL: भारतीय सेना ने अपनी रणनीतिक ताकत को और मजबूत करने के लिए एक बड़ा कदम उठाने की तैयारी की है। सेना ने महंगी सामरिक मिसाइलों (टैक्टिकल मिसाइल्स) की खरीद को फिलहाल रोककर स्वदेशी पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर (MBRL) सिस्टम को अपनाने का फैसला किया है। यह कदम भारत की स्वदेशी रक्षा तकनीक को बढ़ावा देने के साथ-साथ सेना की फायरपावर को मजबूती देने के लिए उठाया गया है।
डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (DRDO) द्वारा विकसित पिनाका गाइडेड रॉकेट सिस्टम (Pinaka MBRL) को दुनिया के सबसे बेहतरीन सिस्टमों में से एक माना जाता है। इसकी खूबियों और प्रभावी क्षमताओं के कारण कई देश इसे अपने डिफेंस सिस्टम में शामिल करने की इच्छा जता रहे हैं।
भारतीय सेना ने एलान किया है कि पिनाका सिस्टम को इस साल के अंत तक तैनात किया जाएगा। इस कदम से सेना की तोपखाने (आर्टिलरी) की क्षमता में काफी सुधार होगा। पिनाका का एडवांस वर्जन न केवल अधिक दूरी तक हमला करने में सक्षम है, बल्कि इसकी सटीकता और घातकता भी इसे खास बनाती है।
Power Unleashed! 🚀
Meet the Pinaka Missile Launcher – India’s indigenous, multi-barrel rocket launcher system designed to dominate the battlefield. Developed by DRDO, Pinaka delivers precision strikes with a range of up to 75 km, making it a formidable weapon in modern warfare.… pic.twitter.com/B52iehKZjT
— Raksha Samachar *रक्षा समाचार*🇮🇳 (@RakshaSamachar) January 22, 2025
सूत्रों के मुताबिक DRDO को पिनाका सीरीज (Pinaka MBRL) को एक्सपेंड करने और इसके दो नए संस्करण डेवलप करने को कहा गया है। भारतीय सेना ने दो लंबी रेंज के पिनाका MBRL की मंजूरी दी है। इन दोनों संस्करणों को एडवांस गाइडेंस सिस्टम से लैस किया जाएगा। ये संस्करण 120 किलोमीटर और 300 किलोमीटर की दूरी तक मार करने में सक्षम होंगे। पुणे स्थित डीआरडीओ की लैब, आर्मामेंट रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टेब्लिशमेंट (ARDE), इन रॉकेटों को डिजाइन कर रही है। एक बार जब ये संस्करण तैयार हो जाएंगे, तो म्यूनिशन्स इंडिया लिमिटेड (MIL) इन्हें डीआरडीओ की टेक्नोलॉजी ट्रांसफर प्रक्रिया के तहत निर्माण करेगी।
सूत्रों का कहना है कि 300 किलोमीटर की रेंज वाला संस्करण सेना के लिए विशेष रूप से उपयोगी साबित हो सकता है। इसका बड़ा आकार न केवल भारी पेलोड ले जाने में सक्षम होगा, बल्कि यह मौजूदा लॉन्च प्लेटफॉर्म्स के साथ भी पूरी तरह अनुकूल रहेगा। यह संस्करण दुश्मन के इलाके में गहराई तक हमला करने और उनके सैन्य ढांचे को नष्ट करने में मददगार साबित होगा।
Pinaka MBRL: पिनाका सिस्टम की खूबियां
गाइडेड पिनाका अब आधुनिक नेविगेशन, नियंत्रण और गाइडेंस तकनीकों से लैस है, जो इसे उच्च सटीकता प्रदान करती है।
पहले जहां पिनाका की रेंज 40 किलोमीटर तक सीमित थी, वहीं अब इसके एडवांस संस्करण 120 से 300 किलोमीटर तक मार करने में सक्षम हैं।
यह सिस्टम एक बार में कई रॉकेट दाग सकता है, जो इसे दुश्मन के ठिकानों को तेजी से नष्ट करने में सक्षम बनाता है।
पिनाका को DRDO के मार्गदर्शन में भारतीय रक्षा कंपनियों द्वारा निर्मित किया जा रहा है, जो भारत की आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देता है।
आधुनिक युद्ध में सटीकता और कम नुकसान सुनिश्चित करना प्राथमिकता है, और पिनाका इस आवश्यकता को पूरा करता है।
पिनाका सिस्टम ने तीन अलग-अलग चरणों में ट्रायल्स को सफलतापूर्वक पास किया है। इन ट्रायल्स में इसकी रेंज, सटीकता, और फायरिंग दर का गहन निरीक्षण किया गया। इन गाइडेड रॉकेट्स को धीरे-धीरे पुराने, अनगाइडेड वेरिएंट्स की जगह लेने के लिए तैयार किया जा रहा है।
पिनाका बनाम टेक्टिकल मिसाइलें
पिनाका की तुलना में सामरिक मिसाइलें काफी महंगी होती हैं। भारतीय सेना के अनुसार, पिनाका जैसे सस्ते और प्रभावी विकल्प न केवल लागत को कम करते हैं, बल्कि उनकी फायरिंग गति और व्यापक कवरेज के कारण सामरिक बढ़त भी देते हैं। भारतीय सेना के इस निर्णय से टैक्टिकल मिसाइलों पर निर्भरता कम होगी, जो महंगे और आयातित होते हैं। इसके बदले पिनाका जैसे स्वदेशी समाधान न केवल लागत प्रभावी होंगे, बल्कि आत्मनिर्भर भारत के उद्देश्य को भी मजबूत करेंगे।
Gurpatwant Pannun: अमेरिका के 47वें राष्ट्रपति के रूप में डोनाल्ड ट्रंप के शपथ ग्रहण समारोह के दौरान एक अप्रत्याशित घटना ने भारत के राजनयिक और सुरक्षा तंत्र में हलचल मचा दी। इस हाई-प्रोफाइल आयोजन में खालिस्तानी आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू को देखा गया। समारोह में पन्नू ने “खालिस्तान जिंदाबाद” के नारे लगाए, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। यह वही पन्नू है जिसे भारत में आतंकवादी घोषित किया गया है और जिसकी गतिविधियां भारत की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा मानी जाती हैं। हाल ही में पन्नू ने महाकुंभ में बम ब्लास्ट की धमकी भी दी थी।
Gurpatwant Pannun: ‘लिबर्टी बॉल’ का इनवाइट
खालिस्तानी संगठन सिख फॉर जस्टिस (SFJ) के जनरल काउंसल गुरपतवंत सिंह पन्नू ने दावा किया कि उसे ट्रंप के एक गुट से आमंत्रण मिला था। हालांकि, सूत्रों के मुताबिक, पन्नू ने किसी संपर्क के माध्यम से टिकट खरीदा और इस समारोह में प्रवेश किया। यह कार्यक्रम वॉशिंगटन डीसी के कैपिटल हॉल और उसके बाद आयोजित ‘लिबर्टी बॉल’ में हुआ।
पन्नू का दावा और वीडियो का सच
20 जनवरी को ट्रंप ने 47वें अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली। इस ऐतिहासिक मौके पर पन्नू को समारोह स्थल के अंदर “खालिस्तान जिंदाबाद” के नारे लगाते हुए देखा गया। एक वीडियो में वह भीड़ के बीच अपना मोबाइल कैमरा ऑन कर नारे लगाते हुए नजर आ रहा है।
खालिस्तानी गुरपतवंत सिंह पन्नून को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ‘लिबर्टी बॉल’ में शामिल होने का निमंत्रण!
— Raksha Samachar *रक्षा समाचार*🇮🇳 (@RakshaSamachar) January 23, 2025
हालांकि, रिपोर्ट्स के अनुसार, पन्नू को इस कार्यक्रम के लिए आधिकारिक तौर पर आमंत्रित नहीं किया गया था। वह समारोह में मौजूद भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर और अन्य गणमान्य व्यक्तियों से काफी दूर खड़ा था।
सूत्रों का कहना है कि गुरपतवंत सिंह पन्नू अमेरिका और कनाडा की दोहरी नागरिकता रखता है, और भारत में खालिस्तान आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है। उसने कई बार भारत विरोधी बयान दिए हैं और हिंसा भड़काने की कोशिश की है। पन्नू का उद्देश्य खुद को अमेरिकी प्रशासन के करीब दिखाकर वह अपनी उपयोगिता साबित करना चाहता है।
कांग्रेस ने जताई आपत्ति
वीडियो के वायरल होने के बाद भारतीय सोशल मीडिया यूजर्स ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने सवाल उठाया कि कैसे एक आतंकी, जिसने भारतीय राजनयिकों और एयर इंडिया की फ्लाइट्स पर बम धमाके की धमकी दी थी, उसे इस तरह के हाई-प्रोफाइल कार्यक्रम में शामिल होने की अनुमति दी गई।
हालांकि न ही अमेरिकी विदेश विभाग और न ही भारतीय विदेश मंत्रालय की तरफ से इस पर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है।
कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने वीडियो साझा करते हुए भारत सरकार से इस मामले पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराने की मांग की। उन्होंने सवाल उठाया, “क्या भारत सरकार सिर्फ मूकदर्शक बनी रहेगी? क्या यह उचित है कि एक ऐसे व्यक्ति को अमेरिका में जगह दी जाए जो भारत की अखंडता के खिलाफ काम कर रहा है?”
2023 में अमेरिका ने भारत सरकार पर पन्नू पर हत्या की साजिश का आरोप लगाया था। अमेरिका ने दावा किया था कि यह साजिश न्यूयॉर्क में रची गई थी, जिसमें भाड़े के शूटर का उपयोग किया जाना था। इस घटना ने भारत-अमेरिका के बीच राजनयिक संबंधों में विवाद को और बढ़ा दिया था।
वहीं, भारत ने इस पर कहा था कि वह अमेरिका और अन्य देशों के साथ सहयोग कर रहा है ताकि खालिस्तानी आतंकवाद को रोका जा सके। भारतीय जांच एजेंसियों ने पन्नू के खिलाफ कई वारंट जारी किए हैं और उसकी संपत्तियां भी जब्त कर ली गई हैं। भारत ने हमेशा स्पष्ट किया है कि खालिस्तानी गतिविधियों को किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। वहीं, यह घटना एब भारत-अमेरिका संबंधों में एक नई चुनौती के रूप में देखी जा रही है।
गुरपतवंत सिंह पन्नू भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के लिए लंबे समय से सिरदर्द बना हुआ है। वह “सिख्स फॉर जस्टिस” (SFJ) नामक संगठन का नेतृत्व करता है, जो खालिस्तान के गठन के लिए अभियान चलाता है। जुलाई 2020 में, भारत सरकार ने पन्नू को गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (UAPA) के तहत आतंकवादी घोषित किया था।
पन्नू ने कई बार भारत के राजनयिकों और संस्थानों को धमकी दी है। उसने एयर इंडिया की उड़ानों को निशाना बनाने और सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने की धमकियां दी हैं। इसके बावजूद, वह अमेरिका और कनाडा जैसे देशों में स्वतंत्र रूप से घूमता है, जहां उसे इन देशों की नागरिकता प्राप्त है।
Illegal Indian Migrants: भारत सरकार ने डंकी रूट से अमेरिका गए अवैध प्रवासियों को वापस लाने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की प्रशासन के साथ सहयोग करने की योजना बनाई है। यह कदम नई दिल्ली द्वारा ट्रंप प्रशासन के साथ संबंधों को बनाए रखने और संभावित व्यापार युद्ध से बचने की रणनीति का हिस्सा है।
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, दोनों देशों ने लगभग 18,000 भारतीय नागरिकों की पहचान की है, जो अवैध रूप से अमेरिका में रह रहे हैं और जिन्हें भारत वापस भेजा जाएगा। हालांकि, यह संख्या और भी अधिक हो सकती है, क्योंकि अवैध भारतीय प्रवासियों की सही संख्या का अनुमान जुटाना कठिन है।
ट्रंप प्रशासन से तालमेल बैठाने की कोशिश
अमेरिका में अवैध प्रवासियों के खिलाफ कार्रवाई ट्रंप के चुनावी वादों का हिस्सा रही है। ट्रंप ने अपने आदेश में साफ किया कि अमेरिका में अवैध रूप से घुसने वाले प्रवासियों को वापस उनके देश भेजा जाएगा। उनकी घोषणा ने भारतीय समुदाय में खलबली मचा द हैी, क्योंकि अमेरिका में अवैध रूप से रहने वाले करीब 7.5 लाख भारतीय प्रवासियों का भविष्य अंधकारमय नजर आ रहा है। अपने शपथ लेने के कुछ घंटों बाद ही, ट्रंप ने कदम उठाते हुए नागरिकता कानून और बॉर्डर सिक्योरिटी पर सख्त फैसले लिए। इस बीच, भारत ने भी यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया है कि ट्रंप प्रशासन खासकर छात्र वीजा और एच-1बी वीजा जैसे प्रोग्राम के लिए भारतीयों के लीगल माइग्रेशन के रास्ते खुले रखे।
एच-1बी वीजा के मामले में भारतीय नागरिकों की संख्या सबसे अधिक है। 2023 में जारी किए गए कुल 3,86,000 वीजा में से लगभग तीन-चौथाई भारतीय नागरिकों को दिए गए।
Illegal Indian Migrants: अवैध प्रवासियों के मामले में तीसरे नंबर पर है भारत
अमेरिका में अवैध भारतीय प्रवासियों की संख्या की बात करें, तो भारत तीसरे नंबर पर है। 2024 में अमेरिकी बॉर्डर पेट्रोलिंग अधिकारियों द्वारा पकड़े गए अवैध भारतीय प्रवासियों की संख्या कुल का केवल 3 फीसदी थी। हालांकि, हाल के वर्षों में यह आंकड़ा उत्तरी अमेरिकी सीमा पर धीरे-धीरे बढ़ रहा है। डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी के एक रिपोर्ट के अनुसार, 2022 तक अमेरिका में लगभग 2,20,000 अवैध भारतीय प्रवासी रह रहे थे।
अवैध प्रवासी रचते हैं भारत के खिलाफ साजिश
भारत सरकार ने अवैध प्रवासियों की वापसी के लिए अमेरिका के साथ सहयोग को एक अवसर के रूप में देखा है। यह कदम केवल अवैध प्रवासन को रोकने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे भारत के विदेश में अलगाववादी आंदोलनों, जैसे खालिस्तान आंदोलन, को कमजोर करने के उद्देश्य से भी देखा जा रहा है। खालिस्तान आंदोलन के कुछ समर्थक अमेरिका और कनाडा में रह रहे हैं, जिनमें से कई को अवैध प्रवासी माना जाता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप के बीच दोस्ताना संबंधों के बावजूद, भारत अमेरिका से किसी भी अप्रत्याशित कदम को लेकर सतर्क है। ट्रंप ने बार-बार भारत की इंपोर्ट ड्यूटी की आलोचना की है और अमेरिकी व्यापार पर इसके असर का हवाला देते हुए जवाबी शुल्क लगाने की धमकी दी है।
उत्तरी अमेरिका में अवैध भारतीय प्रवासी
यह बात भी सामने आई है कि उत्तरी अमेरिका की सीमा पर भारतीय प्रवासियों का दबाव बढ़ा है। अमेरिकी सीमा गश्ती आंकड़ों के अनुसार, उत्तरी सीमा पर पकड़े गए अवैध भारतीय प्रवासियों की संख्या अन्य किसी भी देश से अधिक है।
इसकी वजह 2023 में अल सल्वाडोर द्वारा भारतीय नागरिकों के लिए वीजा-फ्री ट्रैवल को खत्म करना और कनाडा के लिए भारतीय नागरिकों के ट्रैवल करने में आसानी शामिल हो सकती है।
वहीं, अगर भारत अवैध प्रवासियों की वापसी का कदम उठाता है, तो यहां देश के भीतर भी विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव डाल सकते हैं। अवैध प्रवासियों की वापसी से भारत में रोजगार संकट बढ़ सकता है, क्योंकि पहले से ही देश में नौकरियों की कमी है।
अमेरिका ने 519 भारतीय अवैध प्रवासियों को किया वापस
तृणमूल कांग्रेस की सांसद माला रॉय के सवाल के जवाब में विदेश राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने 7 दिसंबर 2024 को लोकसभा में जानकारी दी कि अमेरिका ने 2023-24 के बीच 519 अवैध भारतीय प्रवासियों को कमर्शियल और चार्टर्ड फ्लाइट्स के जरिए भारत वापस भेजा।
अमेरिका के कस्टम और बॉर्डर प्रोटेक्शन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, 2023-24 के बीच हर घंटे करीब 10 भारतीयों ने अवैध तरीके से अमेरिका में प्रवेश करने का प्रयास किया। इस दौरान, 90,000 से अधिक भारतीयों को सीमा पर गिरफ्तार किया गया, जिनमें से 50 फीसदी गुजरात से थे।
आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि 2020 से 2022 के बीच करीब 1 लाख भारतीयों ने अवैध रूप से अमेरिका जाने की कोशिश की। इनमें से अधिकांश ने ‘डंकी रूट’ का इस्तेमाल किया, जो दक्षिण अमेरिका से अमेरिका तक का खतरनाक मार्ग है। इस मार्ग पर शाहरुख खान की फिल्म “डंकी” भी बनी है, जिसने इस समस्या को चर्चा में लाया।
इन अवैध प्रवासियों में से कई अपनी जमीन बेचकर और कर्ज लेकर बेहतर जीवन की तलाश में अमेरिका जाते हैं। हालांकि, ऐसे कदम न केवल खतरनाक हैं बल्कि भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को भी नुकसान पहुंचाते हैं।
अमेरिका जानेके लिए डंकी रूट
अमेरिका में अवैध रूप से घुसने वाले भारतीयों के लिए ‘डंकी रूट’ एक प्रमुख रास्ता बन गया है। इस रूट के जरिए लोग भारत से दक्षिण अमेरिका के देशों, जैसे मेक्सिको या पनामा, तक पहुंचते हैं और वहां से जंगलों और खतरनाक बॉर्डर्स को पार करते हुए अमेरिका में प्रवेश करने की कोशिश करते हैं।
हाल ही में हरियाणा और गुजरात के कई परिवारों ने अपने बच्चों को इस रास्ते से अमेरिका भेजा, लेकिन यह यात्रा खतरों से भरी है। कई लोगों ने इस दौरान अपनी जान गंवाई।
अवैध रूप से अमेरिका जाने वाले भारतीय कई बार मानव तस्करी का शिकार हो जाते हैं। एजेंट लाखों रुपये लेकर उन्हें खतरनाक रास्तों से अमेरिका भेजने का वादा करते हैं। गुजरात और पंजाब से ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जहां लोगों को जंगलों, समुद्र और बर्फीले इलाकों के जरिए अमेरिका पहुंचाया गया।
2023 में, मेहसाणा जिले के एक परिवार की कनाडा-अमेरिका बॉर्डर पार करते समय मौत हो गई। वे भी डंकी रूट का सहारा ले रहे थे।
भारत में रोजगार की कमी: पलायन का मुख्य कारण
अमेरिका जाने वाले अधिकांश भारतीय युवाओं का कहना है कि भारत में बेरोजगारी और आर्थिक समस्याओं के कारण उन्हें इस तरह के खतरनाक कदम उठाने पड़े। हरियाणा के एक युवा ने बताया कि उसने अपनी जमीन बेचकर और 50 लाख रुपये कर्ज लेकर अमेरिका जाने का जोखिम उठाया। वह अमेरिका में ट्रक चला रहा है और हर महीने 2.5 लाख रुपये कमा रहा है।
भारत में छोटी फैक्ट्री या बिजनेस शुरू करने को लेकर उसने कहा, “भारत में बिजनेस सफल होना मुश्किल है। यहां महंगाई और बेरोजगारी ने जीवन कठिन बना दिया है।”
नागरिकता कानून में बदलाव
डोनाल्ड ट्रंप ने जन्म के आधार पर मिलने वाली अमेरिकी नागरिकता पर प्रतिबंध लगाने का आदेश जारी किया है। अमेरिका में 150 साल से यह कानून लागू है कि अगर कोई बच्चा अमेरिकी जमीन पर पैदा होता है, तो वह स्वतः रूप से अमेरिका का नागरिक बन जाता है। इसके लिए यह मायने नहीं रखता कि उसके माता-पिता कौन हैं, कहां से आए हैं, या उनकी नागरिकता का क्या दर्जा है। इस नीति का उद्देश्य ‘बर्थ टूरिज्म’ को रोकना है, जहां लोग सिर्फ अपने बच्चों को अमेरिकी नागरिकता दिलाने के लिए वहां जाते हैं।
1868 के संविधान संशोधन के तहत यह प्रावधान किया गया था कि जो भी अमेरिका में जन्म लेता है, या अपनी मूल नागरिकता छोड़कर अमेरिका की नागरिकता के लिए आवेदन करता है, उसे अमेरिकी नागरिक माना जाएगा। इस कानून के चलते पिछले डेढ़ सौ वर्षों में करोड़ों लोगों को अमेरिका की नागरिकता मिली है।
प्रोटेक्टिंग द मीनिंग एंड वैल्यू ऑफ अमेरिकन सिटीजनशिप कानून यह भी सुनिश्चित करता है कि अगर माता-पिता के पास सही दस्तावेज नहीं हैं, लेकिन बच्चा अमेरिका में जन्म लेता है, तो उसे समान अधिकार और सुरक्षा प्राप्त होगी। हालांकि, ट्रंप के इस नए आदेश ने इस प्रावधान में बदलाव की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
अब इस आदेश के तहत जन्म के आधार पर नागरिकता पाने की परंपरा पर विराम लगाने की योजना बनाई जा रही है, जो लंबे समय से अमेरिका में विवाद का विषय रही है।
क्या भारत वापस भेजेगा अवैध बंग्लादेशी?
भारत में नागरिकता को लेकर कितनी बहसें हुईं, यह याद करना जरूरी है। धर्म के आधार पर नागरिकता देने का कानून जब पास हुआ, तब देश में व्यापक हिंसा हुई थी। इस कानून को लागू कराने के दौरान जो उथल-पुथल मची, वह आज भी लोगों के जेहन में है। लेकिन, हैरानी की बात यह है कि इस कानून के पास होने के पांच साल बाद जाकर इसके नियम बनाए गए।
अवैध घुसपैठियों का पता लगाने के लिए असम में सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च किए गए। राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) को लागू किया गया, लेकिन उससे कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया। और अंत में, एनआरसी को औपचारिक रूप से स्वीकार भी नहीं किया गया। यह एक विडंबना है कि जब भारत में अवैध प्रवासियों को रोकने की कोशिशें इस तरह अधूरी रहीं, तब नियति ने ऐसा मोड़ लिया कि आज अमेरिका में अवैध प्रवासियों का तीसरा सबसे बड़ा समूह भारतीयों का बन चुका है।
Indian Air Force: भारतीय वायुसेना के पूर्व ग्रुप कैप्टन अजय अहलावत ने हाल ही में दिए एक इंटरव्यू में चेतावनी दी है कि आने वाले तीन से चार दशकों तक भारत चीन को नहीं हरा सकता है। उन्होंने वायुसेना के कम होते स्क्वाड्रन क्षमता और लड़ाकू विमानों की सप्लाई में देरी पर भी चिंता जाहिर की। उन्होंने कहा कि भारतीय वायुसेना की स्क्वाड्रन स्ट्रेंथ का कम होना देश की सुरक्षा के लिए गंभीर चिंता का विषय है। अहलावत जोर दिया कि भारत को एक व्यापक राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति (National Security Strategy) बनाने की जरूरत है, ताकि भारत की रक्षा नीतियों और आर्म्ड फोर्सेस के बीच सामंजस्य बनाया जा सके।
Former Indian Air Force (IAF) Group Captain Ajay Ahlawat
Indian Air Force: आजादी के बाद से अब तक का सबसे कम स्क्वाड्रन
ग्रुप कैप्टन अहलावत ने वायुसेना की मौजूदा स्थिति को ‘खतरनाक रूप से कमजोर’ बताया। उन्होंने कहा कि भारत की वायुसेना के पास आजादी के बाद से अब तक का सबसे कम स्क्वाड्रन हैं। “हमारे पास कुल 17 स्क्वाड्रन की योजना है, जिसमें LCA (लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट) के तीन स्क्वाड्रन, LCA Mk 1A के चार स्क्वाड्रन, Mk 2 के चार स्क्वाड्रन और AMCA (एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट) के छह स्क्वाड्रन शामिल हैं। लेकिन हकीकत यह है कि इनमें से सिर्फ तीन स्क्वाड्रन फिलहाल तैयार हैं। Mk-2 अभी कागज पर है, और AMCA की पहली ट्रायल उड़ान 2028 तक होने की उम्मीद है।”
अहलावत की यह टिप्पणी उस समय आई है जब वायुसेना में स्क्वाड्रन की संख्या बेहद कम है। आजादी के बाद से यह अब तक का सबसे निचला स्तर है। वर्तमान में वायुसेना के पास केवल 30 स्क्वाड्रन हैं, जबकि यह संख्या 42 होनी चाहिए।
चीन से मुकाबले की चुनौती
“हमारा चीन के साथ विवाद सांस्कृतिक नहीं है, यह सीमा विवाद है। दोनों देशों के पास अपनी-अपनी अलग धारणाएं हैं।अगर दोनों पक्ष किसी बीच के मार्ग पर सहमत हो सकें, तो इससे समस्या का समाधान हो सकता है। इसे बातचीत और समझौतों के जरिए ही हल करना होगा। डोकलाम संकट के बाद हमने अपनी ओर से समाधान की इच्छा जताई थी।”
अहलावत ने कहा कि चीन लगातार अपनी सैन्य ताकत बढ़ा रहा है। उन्होंने बताया कि चीन ने 2000 के दशक में एक स्पष्ट सैन्य रणनीति अपनाई और 2035 तक अमेरिका जैसी ताकत बनने का लक्ष्य तय किया। “चीन ने 2035 तक अमेरिका जितना मजबूत बनने का लक्ष्य रखा और फिर उन्होंने अपनी सेना का पुनर्गठन शुरू किया। वे तीन अतिरिक्त क्षेत्रों – अंतरिक्ष, साइबर और इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम में भी काम कर रहे हैं। वहीं, हम अभी भी पारंपरिक जल-थल-नभ यानी सेना, नौसेना और वायुसेना के ढांचे में ही फंसे हुए हैं।”
उन्होंने बताया कि चीन की रॉकेट फोर्स इतनी मजबूत है कि यह दुश्मन के एयरफील्ड को निष्क्रिय कर सकती है। “चीन की रॉकेट फोर्स सबसे पहले एयरफील्ड्स को निशाना बनाएगी। वे अंतरिक्ष में कुछ ऐसे ऑर्बिटल पोजिशन पर काम कर रहे हैं, जो पहाड़ों में ऊंचाई पर कब्जा करने के बराबर है।”
लड़ाकू विमान और ‘तेजस’ की डिलीवरी में देरी
भारतीय वायुसेना को लड़ाकू विमानों की कमी का सामना करना पड़ रहा है। ‘तेजस’ प्रोजेक्ट, जिसे पुराने मिग-21 विमानों को बदलने के लिए डिजाइन किया गया था, अपनी मैन्युफैक्चरिंग और सप्लाई में देरी से जूझ रही है। वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने हाल ही में तेजस के उत्पादन में हो रही देरी पर चिंता जाहिर की थी। उन्होंने कहा था कि 2009-2010 में 40 तेजस विमानों का ऑर्डर दिया गया था, लेकिन अभी तक ये डिलीवर नहीं किए गए हैं।
अहलावत ने इस देरी के लिए बाहरी और आंतरिक दोनों कारणों को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा, “1984 में तेजस प्रोजेक्ट की नींव रखी गई थी। 2001 में इसका पहला ट्रायल हुआ, और इसे वायुसेना में शामिल करने में 15 साल और लग गए। इसके बाद 2016 तक भी वायुसेना को एक भी स्क्वाड्रन नहीं मिला। देरी की बड़ी वजह 1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंध थे। वहीं, अब यह देरी GE इंजनों से जुड़ी समस्याओं के कारण हो रही है।”
आयात किया जाए या स्वदेश में बनाया जाए
अहलावत ने सुझाव दिया कि वायुसेना की ताकत बनाए रखने के लिए आयात को लेकर कुछ लोग सवाल खड़े कर सकते हैं, लेकिन यह उपयुक्त समाधान है। उन्होंने कहा, “सरकार जब सेना को युद्ध के लिए भेजती है, तो उम्मीद करती है कि वह युद्ध जीते। अगर घरेलू उद्योग समय पर विमानों की आपूर्ति नहीं कर सकते, तो हमें उन इक्विपमेंट्स की जरूरत है, जो युद्ध के दौरान इस्तेमाल हो सकें। हमें आज एक तैनात करने योग्य वायुसेना चाहिए।”
उन्होंने उदाहरण दिया कि करगिल युद्ध में बोफोर्स गन और मिराज 2000 जैसे आयातित हथियारों ने भारत को जीत दिलाने में बड़ी भूमिका निभाई थी। उन्होंने कहा कि भारत को वर्तमान में राफेल विमानों की संख्या बढ़ाने पर विचार करना चाहिए। “राफेल हमारे पास पहले से मौजूद हैं। हमारे पास इनकी मैंटेनेंस की सुविधा, प्रशिक्षित क्रू और बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर भी तैयार है। ऐसे में राफेल संख्या बढ़ाना एक तात्कालीक समाधान हो सकता है।”
राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति बनाने की जरूरत
अहलावत ने जोर दिया कि भारत को अपनी रक्षा रणनीति को व्यापक रूप से पुनर्गठित करने की आवश्यकता है। “हमें एक राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति की आवश्यकता है, जो सभी सशस्त्र बलों को राष्ट्रीय सुरक्षा उद्देश्य की दिशा में काम करने के लिए प्रेरित करे। यह रणनीति यह तय करेगी कि चीन हमारे लिए क्या है – एक दोस्त, एक प्रतिस्पर्धी, या एक सैन्य दुश्मन।”
उन्होंने कहा कि भारत को रक्षा क्षेत्र में अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ नए विमान और तकनीक के विकास पर भी निवेश करना चाहिए। हालांकि, मौजूदा हालात में भारत को आयात पर निर्भर रहना होगा ताकि वायुसेना की ताकत बनी रहे और राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे में न पड़े।
Explainer Sambhav smartphones: भारतीय सेना ने अपने अधिकारियों को सिक्योर कम्यूनिकेशन के लिए करीब 30,000 ‘संभव’ स्मार्टफोन (‘Sambhav’ smartphones) उपलब्ध कराए हैं। इन स्मार्टफोन्स का उपयोग विशेष ऐप्स के साथ संवेदनशील जानकारी साझा करने के लिए किया जाता है। रिपोर्ट के अनुसार, इन फोन्स का इस्तेमाल अक्टूबर 2024 में चीन के साथ हुई बातचीत के दौरान भी किया गया। सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने अपनी सालाना प्रेस कॉन्फ्रेंस में इन फोन्स के इस्तेमाल का खुलासा किया था।
‘संभव’, का मतलब है Secure Army Mobile Bharat Version। यह एक पूरी तरह से स्वदेशी ‘एंड-टू-एंड सिक्योर मोबाइल इकोसिस्टम’ है। यह स्मार्टफोन 5G तकनीक पर आधारित है और पूरी तरह एन्क्रिप्टेड है, जिससे किसी भी संवेदनशील जानकारी को सुरक्षित रूप से साझा किया जा सकता है। यह प्रोजेक्ट 2023 में शुरू किया गया था और अब इसे सेना के ऑपरेशंस का अहम हिस्सा बना दिया गया है।
कैसे काम करता है ‘Sambhav’ smartphone?
भारतीय सेना के ‘संभव’ स्मार्टफोन्स का डिजाइन इस तरह से किया गया है कि यह आधुनिक तकनीक के साथ सुरक्षा को प्राथमिकता देता है। इन फोन्स में M-Sigma जैसे विशेष ऐप्स प्रीलोडेड होते हैं, जो WhatsApp जैसे पॉपुलर मैसेजिंग प्लेटफॉर्म्स का सुरक्षित विकल्प हैं। M-Sigma का उपयोग संदेश, दस्तावेज़, फोटो और वीडियो को सुरक्षित तरीके से साझा करने के लिए किया जाता है।
इन फोन्स की खासियत यह है कि सभी जरूरी कॉन्टैक्ट नंबर पहले से ही इनमें सेव होते हैं। इससे अधिकारियों को नंबर मैन्युअली सेव करने की जरूरत नहीं पड़ती। इन फोन्स को भारतीय सेना ने प्रमुख शैक्षिक संस्थानों और इंडस्ट्री विशेषज्ञों के सहयोग से डेवलप किया है।
सिक्योरिटी और कनेक्टिविटी पर खास जोर
संभव स्मार्टफोन्स के इस्तेमाल के बाद न केवल भारतीय सेना का कम्यूनिकेशन नेटवर्क तेज हुआ है, बल्कि पहले से ज्यादा सुरक्षित भी हुआ है। सैन्यू सूत्रों का कहना है कि इसके बाद जानकारी लीक होने की घटनाओं पर भी लगाम लगाई है। पहले सेना के कई अधिकारी WhatsApp जैसे एप्स का उपयोग करते थे, जिससे जानकारी के लीक होने की घटनाएं सामने आईं। लेकिन अब, इन नए स्मार्टफोन्स के जरिए ऐसी समस्याओं को पूरी तरह रोका जा सकता है।
सेना ने यह भी सुनिश्चित किया है कि ये स्मार्टफोन्स देश के प्रमुख मोबाइल नेटवर्क, जैसे जिओ और एयरटेल, के साथ पूरी तरह से काम करें। यह डिवाइस ऐसे क्षेत्रों में भी काम करने में सक्षम हैं, जहां नेटवर्क कनेक्टिविटी चुनौतीपूर्ण होती है।
LAC पर चीन से बातचीत में ‘संभव’ की अहम भूमिका
पिछले साल अक्टूबर में चीन के साथ हुई उच्च-स्तरीय बातचीत के दौरान भारतीय सेना ने ‘संभव’ स्मार्टफोन का इस्तेमाल किया। सेना प्रमुख ने कहा कि इस तकनीक ने सिक्योर कम्यूनिकेशन सुनिश्चित किया और संवेदनशील जानकारी को लीक होने से बचाया। यह कदम खासकर उस समय महत्वपूर्ण हो जाता है, जब सेना को सीमावर्ती क्षेत्रों में तैनाती के दौरान आधुनिक तकनीक और सुरक्षा दोनों की जरूरत होती है।
संभव स्मार्टफोन की खूबियां
संभव स्मार्टफोन 5G टेक्नोलॉजी पर आधारित है, जिससे तेज़ और भरोसेमंद कनेक्टिविटी मिलती है।
यह फुल एन्क्रिप्शन डिवाइस है, जो पूरी तरह से एन्क्रिप्टेड है, जिससे जानकारी सुरक्षित रहती है।
मोबाइल नेटवर्क्स में ईव्सड्रॉपिंग (जानकारी चोरी) का खतरा रहता है। लेकिन ‘संभव’ की एन्क्रिप्टेड तकनीक इसे पूरी तरह सुरक्षित बनाती है।
यह स्मार्ट नेटवर्क एग्नॉस्टिक है, यानी कि यह डिवाइस किसी भी नेटवर्क पर आसानी से काम कर सकती है।
वहीं इस फोन में इंस्टेंट कनेक्टिविटी का फीचर है, जिससे यह चलते-फिरते भी सुरक्षित और सुपर फास्ट कम्यूनिकेशन मिलता है।
भारतीय सेना को मिले संभव स्मार्टफोन ने न केवल संचार को पूरी तरह सुरक्षित बनाया है, वहीं दूसरी ओर यह मॉर्डन वायरफेयर की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हो रहा है। एक अधिकारी ने कहा, “मोबाइल नेटवर्क के जरिए जानकारी चोरी होने का खतरा हमेशा बना रहता है। संभव स्मार्टफोन के जरिए इस चुनौती को प्रभावी तरीके से हल किया गया है।”
ALH Dhruv: भारतीय सेना, नौसेना, वायुसेना और तटरक्षक बल के लिए अहम भूमिका निभाने वाले एडवांस लाइट कॉम्बैट हेलिकॉप्टर (ALH) ध्रुव की 330 हेलिकॉप्टरों वाला फ्लीट पिछले 15 दिनों से ग्राउंडेड है। वहीं, ध्रुव के ग्राउंड होने फैसले से आर्म्ड फोर्सेस की ऑपरेशनल क्षमताओं पर भी गहरा असर पड़ा है। देश के रक्षा सचिव आरके सिंह ने इसे ‘आर्म्ड फोर्सेस के लिए एक बड़ा झटका’ करार दिया है।
Defence Secretary Rajesh Kumar Singh
सोमवार को मीडिया को संबोधित करते हुए रक्षा सचिव ने बताया कि 15 दिनों से जारी सुरक्षा जांच के कारण ध्रुव हेलिकॉप्टर इस साल गणतंत्र दिवस परेड में शामिल नहीं हो पाएगा। यह फैसला 5 जनवरी को गुजरात के पोरबंदर हवाई अड्डे पर तटरक्षक बल के एक ध्रुव एमके III हेलिकॉप्टर के दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद लिया गया, जिसमें तीन कर्मियों की मौत हो गई थी। इस बार एएलएच बेड़ा गणतंत्र दिवस परेड के फ्लाईपास्ट का हिस्सा बनने वाला था।
आरके सिंह ने कहा, “ध्रुव हेलिकॉप्टर बेड़े की ग्राउंडिंग से ऑपरेशन्स में कुछ दिक्कतें आई हैं। हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) फिलहाल उसकी सुरक्षा जांच में जुटा है। उन्होंने कहा कि हमें उम्मीद है कि जल्द ही इस समस्या का समाधान हो जाएगा। हालांकि, यह तय है कि यह बेड़ा गणतंत्र दिवस परेड तक संचालन में वापस नहीं आएगा।”
साथ ही, रक्षा सचिव ने यह भी बताया कि इस बार परेड में 39 विमान हिस्सा लेंगे और 12 फॉर्मेशंस बनाई जाएंगे। उन्होंने बताया कि कुल 77,000 लोग इस बार रिपब्लिक डे की परेड को देखेंगे, जिनमें 32,000 लोग टिकट खरीद चुके हैं।
वहीं, ध्रुव हेलिकॉप्टर (ALH Dhruv) के ग्राउंड होने आर्म्ड फोर्सेज की चुनौतियां बढ़ गई हैं। सेना, नौसेना, वायुसेना और तटरक्षक बल इस हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल बड़े स्तर पर अपने ऑपरेशंस के लिए करते रहे हैं। लेकिन इसके ग्राउंड होने के बाद उन्हें दूसरे हेलिकॉप्टरों पर निर्भर होना पड़ रहा है।
सेना के एक अधिकारी ने इसे “गंभीर स्थिति” बताते हुए कहा कि ध्रुव हेलिकॉप्टर की गैरमौजूदगी ने लॉजिस्टिक्स, सैनिकों की आवाजाही और नियमित अभियानों को सीधे तौर पर प्रभावित किया है। उन्होंने कहा, “हमने अन्य हेलिकॉप्टरों का सहारा लिया है, लेकिन ध्रुव हेलिकॉप्टर के न होने से ऑपरेशनल एफिशिएंसी पर सीधा असर पड़ रहा है।”
वहीं, नौसेना और तटरक्षक बल भी ध्रुव री ग्राउंडिंग से प्रभावित हुए हैं। समुद्री खोज और बचाव अभियानों तथा गश्ती संचालन में रुकावट आई है। ध्रुव हेलिकॉप्टर का उपयोग निगरानी से लेकर मानवीय सहायता तक, कई तरह के मिशनों के लिए किया जाता है।
हालांकि यह पहली बार नहीं है जब ध्रुव हेलिकॉप्टर बेड़े को इस तरह से ग्राउंड करना पड़ा हो। 2023 में भी नौसेना के एक दुर्घटना के बाद बेड़े को अस्थायी रूप से ग्राउंड किया गया था। तब दिक्कतों का समाधान करने के बाद हेलिकॉप्टरों को फिर से ऑपरेशन में लाया गया था।
हालांकि, इस बार सुरक्षा जांच अभी पूरी नहीं हुई है और HAL ने अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि यह प्रक्रिया कब तक पूरी होगी। इस बार की ग्राउंडिंग ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ध्रुव जैसे महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म की मेंटेनेंस प्रोटोकॉल को और मजबूत करने और सुरक्षा जांच के लिए समय सीमा तय करने की आवश्यकता है।
सेना के के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “हमारे लिए यह सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है कि हमारी क्षमता और ऑपरेशन किसी भी तकनीकी कमी के चलते प्रभावित न हो। इससे सीख लेकर हमें अपने प्रोटोकॉल और प्रणालियों को बेहतर बनाने की दिशा में काम करना होगा।”
Republic Day 2025 पर नहीं दिखेंगे LCA और ALH Dhruv
इस साल गणतंत्र दिवस परेड में भारतीय वायुसेना के स्वदेशी लड़ाकू विमान LCA तेजस और एडवांस लाइट हेलीकॉप्टर (ALH) ध्रुव और रुद्र शामिल नहीं होंगे। तेजस को परेड में शामिल न करने का निर्णय भारतीय वायुसेना की नई नीति के तहत लिया गया है, जिसमें सिंगल-इंजन जेट्स को परेड के फ्लाईपास्ट से दूर रखने का प्रावधान है।
इसके साथ ही, एडवांस लाइट हेलीकॉप्टर (ALH) का पूरा बेड़ा हाल ही में हुई दुर्घटनाओं के बाद फ्लाइट सेफ्टी जांच के कारण ग्राउंड कर दिया गया है। गौरतलब है कि ALH ध्रुव और रुद्र ने इसी महीने 15 जनवरी को आयोजित सेना दिवस परेड में भी हिस्सा नहीं लिया था। परेड में इनकी जगह चीता और चेतक हेलीकॉप्टरों ने हिस्सा लिया था।
सेना प्रमुख ने कही थी ये बात
जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने पुणे में आयोजित 77वें सेना दिवस परेड के दौरान ALH ध्रुव हेलीकॉप्टर को लेकर कहा था, “ध्रुव हेलीकॉप्टर ने 2023-24 में 40,000 घंटे से अधिक की उड़ान भरी है, और इस दौरान केवल एक बार तकनीकी गड़बड़ी हुई। यह हेलीकॉप्टर 15,000 फीट से अधिक की ऊंचाई वाले कठिन इलाकों में सफलतापूर्वक कार्य कर रहा है। हमें इस प्लेटफॉर्म पर 100% भरोसा है।”
Tashi Namgyal: 15 जनवरी 2025 को भारतीय सेना ने 77वें सेना दिवस के अवसर पर ताशी नामग्याल को श्रद्धांजलि अर्पित की। लद्दाख के आर्यन घाटी के गार्कोन गांव के निवासी ताशी नामग्याल ने 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान दुश्मन की घुसपैठ की जानकारी देकर भारतीय सेना को एक निर्णायक बढ़त दिलाई थी। सेना ने इस वीर नायक की स्मृति को अमर बनाने के लिए बियामाह वॉर मेमोरियल पर एक स्मृति पट्टिका स्थापित की। रक्षा समाचार.कॉम ने उनके निधन की खबर सबसे पहले छापी थी। साथ ही, इस साल सेना दिवस के मौके पर सेना प्रमुख उपेंद्र द्विवेदी से एक स्मारक बनवाने की अपील की थी, तो उन्होंने भरोसा दिलाया था कि जल्द ही इस पर कार्रवाई होगी।
17 दिसंबर 2024 को, ताशी नामग्याल का निधन उनके पैतृक गांव गार्कोन में हो गया। उनके परिवार में उनकी पत्नी, एक बेटी और दो बेटे हैं। भारतीय सेना ने उनके परिवार को हरसंभव समर्थन देने का वादा किया है और इसे उनकी देशभक्ति के प्रति श्रद्धांजलि के रूप में देखा जा रहा है।
1999 के मई महीने में ताशी नामग्याल ने अपने गांव के आसपास चरते हुए अपने याक को खोजते समय जुबेर रिज पर कुछ लोगों को देखा, जो काले पठानी सूट में बंकर बना रहे थे। अपनी गहरी समझ और सतर्कता के चलते उन्होंने हालात की गंभीरता को पहचाना और तुरंत भारतीय सेना को इस घुसपैठ की जानकारी दी। उनकी इस जानकारी ने सेना को तेजी से जवाबी कार्रवाई करने में मदद की, जिसने अंततः कारगिल विजय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
कारगिल युद्ध के बाद भी, ताशी नामग्याल अपने गांव और समुदाय के लिए प्रेरणा बने रहे। उन्होंने अक्सर भारतीय सेना के कार्यों और कारगिल युद्ध की कहानियां सुनाकर लोगों को प्रेरित किया। वे 2024 में कारगिल विजय दिवस की 25वीं वर्षगांठ समारोह में भी शामिल हुए थे।
Tashi Namgyal: सेना ने दी श्रद्धांजलि
सेना दिवस के मौके पर भारतीय सेना ने बियामाह वॉर मेमोरियल पर ताशी नामग्याल की स्मृति में एक पट्टिका स्थापित की। इस समारोह में उनके परिवार, स्थानीय नागरिकों और सैन्य अधिकारियों ने भाग लिया। यह न केवल उनके साहस को सम्मानित करने का अवसर था, बल्कि उनके योगदान को देश के सामने लाने का भी एक प्रयास था।
Homage to Late Shri Tashi Namgyal the “First Informant of Kargil War”
On the occasion of 77th Army Day, Forever in Ops Division organised a homage ceremony in honour of Late Shri Tashi Namgyal the “First Informant of Enemy Intrusion during Kargil War” at Biamah, Ladakh.
इसके अलावा, भारतीय सेना ने उनके पैतृक गांव गारकोन में उनकी एक प्रतिमा स्थापित करने की योजना बनाई है। यह प्रतिमा उनके बलिदान और देशभक्ति की स्थायी यादगार होगी, जो आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करेगी।
भारतीय सेना ने इस अवसर पर कहा, “ताशी नामग्याल की निष्ठा और देशभक्ति का सम्मान करना हमारा कर्तव्य है। उनका योगदान हमें यह याद दिलाता है कि देश की सुरक्षा के लिए प्रत्येक नागरिक की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है।”
कैसे बने Tashi Namgyal कारगिल युद्ध के नायक?
2024 में करगिल युद्ध की 25वीं वर्षगांठ पर ताशी नामग्याल से मुलाकात के दौरान उन्होंने अपनी खिन्नता जाहिर की। उनका कहना था कि सरकार ने उनके योगदान को न तो सराहा और न ही उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार के लिए कोई कदम उठाया। उन्होंने बताया, “हमने देश के लिए बहुत कुछ किया, लेकिन हमें आज भी गुमनामी का जीवन जीना पड़ रहा है। हमारी गरीबी का किसी ने ध्यान नहीं दिया।”
ताशी नामग्याल ने बताया था कि मई 1999 में, जब उनकी उम्र 35 साल थी, वे अपने याक ढूंढने गरखुन नाला की ओर गए। वहां उन्होंने बर्फ पर कुछ अजीब निशान देखे। यह असामान्य था, क्योंकि वह क्षेत्र आमतौर पर निर्जन रहता था। उन्होंने अपने भाई मोरुप त्सेरिंग के साथ दूरबीन से देखा तो कुछ लोग काले पठानी कपड़ों में बंकर बनाते हुए दिखाई दिए।
यह संदिग्ध गतिविधि देखकर वे तुरंत निकटतम सेना चौकी पर गए और वहां तैनात बारा साहब को इसकी सूचना दी। शुरुआती संदेह के बावजूद, सेना ने उनकी बात को गंभीरता से लिया। एक दिन बाद, सेना के अधिकारी उनके साथ इलाके में गए।
सेना को घुसपैठ का सबूत कैसे मिला?
जब सेना ताशी और उनके भाई के साथ 5 किलोमीटर दूर गरखुन नाला पहुंची, तो उन्होंने घुसपैठियों को अपनी आंखों से देखा। इसके बाद ताशी ने सेना को इलाके के दुर्गम रास्तों की सटीक जानकारी दी और यह भी बताया कि घुसपैठिए कहां-कहां बंकर बना रहे हैं।
उन्होंने दाह नाले का भी रास्ता दिखाया, जहां घुसपैठियों ने भारी मात्रा में गोला-बारूद और हथियार जमा कर रखे थे। उनकी सतर्कता और मार्गदर्शन के कारण सेना ने न केवल दुश्मन की गतिविधियों का खुलासा किया, बल्कि समय रहते रणनीतिक कदम उठाने में सक्षम हुई।
करगिल युद्ध में बने पोर्टर
युद्ध के दौरान, ताशी ने भारतीय सेना के लिए कुली यानी पोर्टर के तौर पर भी काम किया। उन्होंने रसद और हथियार पहुंचाने में मदद की। उनकी बहादुरी ने भारतीय सेना को न केवल रणनीतिक बढ़त दी, बल्कि दुश्मन की साजिशों को विफल करने में भी मदद की।
अपने इतने बड़े योगदान के बावजूद, ताशी नामग्याल ने हमेशा सादगी से जीवन बिताया। वे भेड़ और याक चराने के साथ-साथ अन्य छोटे-मोटे काम करके अपनी आजीविका चलाते रहे। उनके कपड़े और हाथों पर मिट्टी के निशान उनकी कठिनाइयों की कहानी बयां करते थे। ताशी ने कभी अपने योगदान को लेकर बड़ा दावा नहीं किया। उनके लिए देशभक्ति ही सबसे बड़ी पहचान थी।
Explainer Bhargavastra: भारत ने हाल ही में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। महाभारत के प्रसिद्ध दिव्यास्त्रों से प्रेरणा लेते हुए भारत ने अत्याधुनिक काउंटर-ड्रोन सिस्टम विकसित किया है, जिसे भार्गवास्त्र नाम दिया गया है। भार्गवास्त्र का नाम महर्षि परशुराम द्वारा उपयोग किए गए शक्तिशाली दिव्यास्त्र से लिया गया है। महाभारत में वर्णित दिव्यास्त्रों में से एक, भार्गवास्त्र, अपनी अद्वितीय शक्ति और विनाशकारी क्षमताओं के लिए प्रसिद्ध है। यह नया भार्गवास्त्र न केवल देश के डिफेंस सिस्टम को मजबूत करेगा, बल्कि फ्यूचर वारफेयर में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
भार्गवास्त्र को सोलर ग्रुप और इकोनॉमिक एक्सप्लोसिव्स लिमिटेड (EEL) ने मिल कर डेवलप किया है। यह एक माइक्रो-मिसाइल आधारित काउंटर-ड्रोन सिस्टम है, जिसे दुश्मन के ड्रोन्स और स्वार्म ड्रोन्स (झुंड में उड़ने वाले ड्रोन्स) को पहचानने और नष्ट करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। हाल के युद्धों में स्वार्म ड्रोन्स बड़े खतरे के रूप में उभरे हैं।
Explainer Bhargavastra: कैसा है भार्गवास्त्र?
भार्गवास्त्र एक मल्टी-लेयर काउंटर-ड्रोन सिस्टम है, जो माइक्रो-मिसाइल तकनीक पर बेस्ड है। यह सिस्टम दुश्मन के छोटे और स्वार्म ड्रोन्स को पहचानने और नष्ट करने में सक्षम है। इसकी खासियत यह है कि यह 6 किलोमीटर की दूरी तक ड्रोन का पता लगा सकता है और 64 माइक्रो-मिसाइलों को एक साथ फायर करने की क्षमता रखता है। इसकी सॉफ्ट-किल तकनीक ड्रोन के नेविगेशन और कम्यूनिकेशन सिस्टम को जाम कर देती है, जबकि हार्ड-किल सिस्टम ड्रोन को पूरी तरह से बरबाद कर देता है।
#WATCH | Solar Group successfully test fires guided micro-missiles as part of the ‘Bhargavastra’ counter-drone system. The counter-drone system based on Micro Missile has been developed to tackle the growing threats from loitering munitions and weaponized drones: Solar Group… pic.twitter.com/lhbC77aKiq
यह सिस्टम 5,000 मीटर तक की ऊंचाई पर भी तैनात किया जा सकता है, जिससे यह दुर्गम इलाकों में भी ऑपरेशन को अंजाम दे सकता है। यह मोबाइल प्लेटफॉर्म पर आधारित है, जिससे इसे आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह सिस्टम भारत के लिए एक बड़े रणनीतिक सुरक्षा उपाय के रूप में उभरेगा।
Explainer Bhargavastra: कैसे काम करता है भार्गवास्त्र?
भार्गवास्त्र को दुश्मन के ड्रोन और अन्य हवाई खतरों को पहचानने और नष्ट करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। यह पूरी तरह से ऑटोमैटिक सिस्टम है, यानी कि इसे किसी मनुष्य द्वारा कंट्रोल नहीं किया जाता है। जब कोई ड्रोन इसकी रडार सीमा में आता है, तो यह तुरंत उसे पहचान लेता है। इसके बाद, यह तय करता है कि हार्ड-किल या सॉफ्ट-किल तकनीक का उपयोग करना है।
इसकी C4I कमांड और कंट्रोल प्रणाली रडार के माध्यम से 10 किलोमीटर तक बड़े UAVs और 6 किलोमीटर तक छोटे ड्रोन्स का पता लगा सकती है। इसके EO/IR सिस्टम (इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इंफ्रारेड) कम रडार क्रॉस सेक्शन वाले लक्ष्यों को भी ट्रैक करने में सक्षम हैं। यह प्रणाली खासतौर पर स्वार्म ड्रोन का सामना करने के लिए तैयार की गई है, जो सामान्य जामिंग तकनीकों से बच सकते हैं। भार्गवास्त्र का मोबाइल लॉन्च प्लेटफॉर्म एक समय में 16 मिसाइलों को कैरी कर सकता है, जिससे ऑपरेशनल फ्लेक्सिबिलिटी में बढ़ोतरी होती है।
भार्गवास्त्र का नाम महाभारत के महर्षि परशुराम के भार्गवास्त्र से लिया गया है। यह नाम इसके उद्देश्य को दर्शाता है, शांति और सुरक्षा सुनिश्चित करना। इस आधुनिक प्रणाली ने 12 और 13 जनवरी, 2025 को अपने पहले ट्रायल्स में शानदार प्रदर्शन किया। गंजम, ओडिशा के गोपालपुर सीवर्ड फायरिंग रेंज में इसे ट्रायल के लिए तैनात किया गया था। पहले परीक्षण में, 2,500 मीटर दूर और 400 मीटर की ऊंचाई पर एक इलेक्ट्रॉनिक टारगेट पर मिसाइल ने सटीक निशाना लगाया। दूसरे परीक्षण में, एक चलते हुए इलेक्ट्रॉनिक UAV मिमिक को सफलतापूर्वक नष्ट किया।
क्या यह भारत का आयरन डोम है?
भार्गवास्त्र को कई विशेषज्ञ भारत का आयरन डोम बता ररहे हैं। आयरन डोम इजरायल का प्रसिद्ध रक्षा प्रणाली है, जो मिसाइल और ड्रोन हमलों को रोकने में सक्षम है। भार्गवास्त्र भी इसी प्रकार की सुरक्षा प्रदान करता है और इसे स्वदेशी तकनीक का उपयोग करके बनाया गया है।
आधुनिक युद्ध में भार्गवास्त्र है जरूरी
आधुनिक युद्धक्षेत्र में ड्रोन का उपयोग तेजी से बढ़ा है। हाल के वर्षों में अजरबैजान-आर्मेनिया और यूक्रेन-रूस जैसे युद्धों में ड्रोन तकनीक ने निर्णायक भूमिका निभाई है। स्वार्म ड्रोन का उपयोग करते हुए दुश्मन बड़ी संख्या में हमले कर सकते हैं, जिन्हें रोकने के लिए पारंपरिक डिफेंस सिस्टम काफी नहीं हैं। हर साल 100,000 से ज़्यादा ड्रोन तैनात किए जाते हैं, जिनका मुकाबला अक्सर महंगी सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलों से किया जाता है।भार्गवस्त्र दुश्मन के यूएवी को बेअसर करने के लिए एक किफायती और प्रभावी विकल्प प्रदान करता है।
भार्गवास्त्र इस चुनौती का समाधान प्रदान करता है। यह तकनीक दुश्मन के ड्रोन्स को कम लागत और उच्च दक्षता के साथ नष्ट कर सकती है। इसकी मोबाइल और स्वचालित क्षमताएं इसे किसी भी युद्धक्षेत्र के लिए उपयुक्त बनाती हैं। क्योंकि ड्रोन्स का बढ़ता इस्तेमाल भविष्य के युद्धक्षेत्र की वास्तविकता है। ऐसे में भार्गवास्त्र जैसे सिस्टम भारत की सुरक्षा को न केवल मजबूत बनाएंगे, बल्कि यह भारतीय सेनाओं को आधुनिक युद्ध के लिए तैयार करेंगे।
Republic Day 2025: 26 जनवरी 2025 को भारत अपना 76वां गणतंत्र दिवस (Republic Day 2025) मनाने जा रहा है। हर साल की तरह इस बार भी राजपथ, जिसे अब कर्तव्य पथ कहा जाता है, पर भव्य परेड का आयोजन होगा। परेड में भारतीय सेना, वायुसेना और नौसेना की ताकत और संस्कृति की झलक दिखाई जाएगी। हालांकि, इस बार कुछ महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं, जो चर्चा का विषय बने हुए हैं।
इस साल की परेड में भारतीय वायुसेना और तीनों सेनाओं के कुल 40 विमान हिस्सा लेंगे। इनमें 22 फाइटर जेट्स, 11 ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट और 7 हेलीकॉप्टर्स शामिल होंगे। इसके अलावा, भारतीय तटरक्षक बल के तीन डोर्नियर एयरक्राफ्ट भी हिस्सा लेंगे, जो “रक्षक” फॉर्मेशन का प्रदर्शन करेंगे। यह फ्लाईपास्ट देश की ताकत और तकनीकी क्षमता को दिखाता है, जिसे हर साल लाखों लोग टीवी और सोशल मीडिया पर देखते हैं।
Republic Day 2025: क्या दिखेगा, क्या नहीं
इस बार की परेड में भारत के स्वदेशी लड़ाकू विमान LCA तेजस और एडवांस लाइट हेलीकॉप्टर (ALH) ध्रुव और रुद्र नजर नहीं आएंगे। तेजस को शामिल न करने का फैसला भारतीय वायुसेना की नीतियों के तहत लिया गया है, जिसमें सिंगल-इंजन जेट्स को गणतंत्र दिवस की परेड में उड़ान भरने से रोका गया है। इसके साथ ही, एडवांस्ड लाइट हेलीकॉप्टर (ALH) का पूरा बेड़ा हालिया दुर्घटनाओं के बाद फ्लाइट सेफ्टी जांच के लिए ग्राउंड किया गया है। एएलएच ध्रुव और रूद्र ने 15 दिसंबर को हुई सेना दिवस परेड में भी हिस्सा नहीं लिया था।
Republic Day 2025: भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना की कोई अलग झांकी नहीं
इस बार भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना की कोई अलग झांकी नहीं होगी। इसके बजाय, एक त्रि-सेवा झांकी (Tri-Service Tableau) प्रस्तुत की जाएगी, जिसमें तीनों सेनाओं के संयुक्त शक्ति और समन्वय को दर्शाया जाएगा। इससे पहले हर साल तीनों सेनाओं की अलग-अलग झांकियां परेड का हिस्सा होती थीं, जो उनके स्पेशल ऑपरेशंस और तकनीकी क्षमताओं की झलक देती थीं।
हालांकि, परेड में अलग-अलग सेनाओं की झांकियां न होने से कुछ लोगों को कमी महसूस हो सकती है। पिछले सालों में, इन झांकियों ने भारतीय सेना, वायुसेना और नौसेना के विशेष अभियानों और उपलब्धियों को दर्शाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
भारतीय वायुसेना ने इस बार गणतंत्र दिवस परेड में अपनी नीति में बदलाव करते हुए सिंगल इंजन वाले विमानों को फ्लाईपास्ट से अलग रखने का फैसला किया है। तेजस जैसे अत्याधुनिक विमान की अनुपस्थिति का कारण भी यही है। ALH हेलीकॉप्टरों की अनुपस्थिति उनके हालिया सुरक्षा निरीक्षण और ग्राउंडिंग के कारण है, जो उनकी तकनीकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए किया गया है।
Republic Day 2025: कर्तव्य पथ पर हवाई ताकत का प्रदर्शन
इस बार परेड में कुल 40 विमानों का फ्लाईपास्ट किया जाएगा। इनमें फाइटर जेट्स, ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट और हेलीकॉप्टर्स शामिल हैं। राजपथ के ऊपर आसमान में भारतीय वायुसेना के लड़ाकू विमान जैसे राफेल, सुखोई-30MKI और जगुआर जैसे विमान अपनी ताकत का प्रदर्शन करेंगे। यह फ्लाईपास्ट भारतीय वायुसेना की ताकत और क्षमता को प्रदर्शित करेगा।
फ्लाईपास्ट में इस बार भारतीय तटरक्षक बल के तीन डोर्नियर विमान भी हिस्सा लेंगे। ये विमान “रक्षक” फॉर्मेशन में उड़ान भरेंगे, जो समुद्री सुरक्षा में तटरक्षक बल की भूमिका को दर्शाएंगे।
Drishti-10 Drone: गुजरात के पोरबंदर के पास सोमवार को एक इजरायली मूल का भारी-भरकम मिलिट्री ड्रोन ‘दृष्टि-10’ (Drishti-10 Drone) ट्रायल के दौरान समुद्र में दुर्घटनाग्रस्त हो गया। यह ड्रोन भारत में अडानी डिफेंस एंड एयरोस्पेस द्वारा इजरायली कंपनी एल्बिट सिस्टम्स के लाइसेंस के तहत तैयार किया गया था। सूत्रों ने बताया कि ड्रोन को पोरबंदर नेवल एयर एन्क्लेव से ऑपरेट किया जा रहा था। यह ड्रोन ट्रायल के अंतिम चरण में था और इसे अभी भारतीय नौसेना को सौंपा जाना बाकी था। हादसे के बाद ड्रोन को समुद्र से निकाल लिया गया है, और तकनीकी विशेषज्ञ दुर्घटना के कारणों की जांच कर रहे हैं।
सूत्रों का कहना है कि चूंकि ड्रोन नौसेना को अभी तक आधिकारिक रूप से सौंपा नहीं गया था, इसलिए इस दुर्घटना से नौसेना पर कोई फाइनेंशियल घाटा नहीं हुआ है।
क्या है Drishti-10 Drone की खूबी
दृष्टि-10 ड्रोन इजरायली हर्मीस 900 स्टारलाइनर पर आधारित है और इसे भारतीय सशस्त्र बलों के लिए विशेष रूप से डिज़ाइन किया गया है। यह ड्रोन लंबी दूरी की खुफिया जानकारी, निगरानी, और लक्ष्यों की पहचान जैसे महत्वपूर्ण मिशनों के लिए तैयार किया गया है। दृष्टि-10 की सबसे बड़ी खासियत इसकी लंबी उड़ान क्षमता है। यह ड्रोन 36 घंटे तक लगातार उड़ान भर सकता है, जिससे यह सीमा पर लंबे समय तक निगरानी और गश्त कर सकता है। इसके अलावा, यह 30,000 फीट की ऊंचाई तक उड़ सकता है, जिसके चलते यह ज्यादा ऊंचाई वाले इलाकों में भी बखूबी काम करता है।
इस ड्रोन की पेलोड क्षमता 450 किलोग्राम तक है, और इस पर हथियार और उपकरण लादे जा सकते हैं। यह सैटकॉम तकनीक से लैस है, ताकि दूरदराज वाले इलाकों में भी यह काम कर सकता है। इसमें इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इंफ्रारेड सेंसर लगे हैं, जिससे यह दिन और रात दोनों समय प्रभावी ढंग से काम कर सकता है।
2023 में, भारतीय सेना और नौसेना ने आपातकालीन खरीद प्रावधानों के तहत ऐसे दो-दो ड्रोन का ऑर्डर दिया था। इनमें से पहला ड्रोन जनवरी 2023 में नौसेना को सौंपा गया था, जबकि दूसरा ड्रोन जून में सेना को डिलीवर किया गया।
सोमवार को दुर्घटनाग्रस्त हुआ ड्रोन नौसेना को दिया जाना था।
भारतीय सेनाओं को वर्तमान में लगभग 150 नए मध्यम ऊंचाई और लंबी उड़ान क्षमता वाले ड्रोन (MALE) की आवश्यकता है। ये ड्रोन इजरायली सर्चर और हेरोन मार्क-1 और मार्क-2 जैसे ड्रोन की जगह लेंगे, जो लंबे समय से भारतीय सेनाओं द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे हैं।
अमेरिकी MQ-9B प्रीडेटर की खरीद
भारत ने अक्टूबर 2024 में अमेरिका के साथ 31 एडवांस MQ-9B प्रीडेटर ड्रोन की खरीद के लिए 32,350 करोड़ रुपये के एक ऐतिहासिक अनुबंध पर हस्ताक्षर किए थे। इस समझौते को भारतीय सेनाओं की क्षमताओं को मजबूत करने और आधुनिक तकनीक से लैस करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा था।
समझौते के तहत, भारतीय नौसेना को 15 MQ-9B सी गार्जियन ड्रोन मिलेंगे, जो समुद्री निगरानी और सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। इसके अलावा, भारतीय सेना और वायुसेना को 8-8 स्काई गार्जियन ड्रोन सौंपे जाएंगे। ये ड्रोन एडवांस सेंसर, हेलफायर मिसाइल, और GBU-39B प्रिसिजन गाइडेड ग्लाइड बम जैसे अत्याधुनिक हथियारों से लैस होंगे।
MQ-9B प्रीडेटर ड्रोन को ज्यादा ऊंचाई और लंबी दूरी की उड़ान के लिए डिज़ाइन किया गया है। यह 30 घंटे से अधिक समय तक संचालन करने और खतरों का सटीकता से पता लगाने में सक्षम है। इस समझौते से भारत की समुद्री और हवाई सुरक्षा को नई मजबूती मिलेगी और देश की सैन्य शक्ति को एक नई दिशा मिलेगी।
सी गार्डियन ड्रोन हो चुका है दुर्घटनाग्रस्त
हाालंकि ऐसा नहीं है कि केवल दृष्टि-10 के साथ ही दुर्घटनाग्रस्त हुआ है। इससे पहले पिछले साल चेन्नई के पास बंगाल की खाड़ी में एक सी गार्डियन ड्रोन दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। यह ड्रोन अमेरिकी कंपनी जनरल एटॉमिक्स से भारतीय नौसेना ने लीज पर लिया था और अरक्कोणम स्थित नौसेना के वायु स्टेशन आईएनएस राजाली से ऑपरेट हो रहा था। 2020 में, नौसेना ने एक साल की अवधि के लिए दो MQ-9B सी गार्डियन ड्रोन लीज पर लिए थे।
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