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Army Air Defence: ड्रोन अटैक से निपटने के लिए ‘स्मार्ट’ बन रही भारतीय सेना, ‘सॉफ्ट किल’ और ‘हार्ड किल’ सिस्टम से ढेर होंगे दुश्मन के Drone

Army Air Defence: Indian Army Gears Up to Counter Drone Attacks with 'Soft Kill' and 'Hard Kill' Systems
Lt Gen Sumer Ivan D’Cunha, Director General Army Air Defence Corps

Army Air Defence: रूस-यूक्रेन जंग में जिस तरह से ड्रोन का इस्तेमाल हुआ है, उससे भारतीय सेना ने बड़ाा सबक लिया है। भारतीय सेना अब मॉडर्न वॉरफेयर में ड्रोन की चुनौतियों से निपटने के लिए अपने एयर डिफेंस सिस्टम को और मजबूत करने की तैयारी कर रही है। ड्रोन हमलों के बढ़ते खतरे को देखते हुए सेना के आर्मी एयर डिफेंस खास रणनीति तैयार की है, जिसका मकसद दुश्मन के ड्रोन और हवाई हमलों को रोकना, उन्हें पहचानना और जरूरत पड़ने पर उन्हें नष्ट करना शामिल है।

Army Air Defence: Indian Army Gears Up to Counter Drone Attacks with 'Soft Kill' and 'Hard Kill' Systems
Lt Gen Sumer Ivan D’Cunha, Director General Army Air Defence Corps

भारतीय सेना की आर्मी एयर डिफेंस कॉर्प्स (AAD) के बारे में यह बताना जरूरी है कि यह पहले टेरिटोरियल आर्मी का हिस्सा थी, लेकिन 10 जनवरी 1994 को इसे आर्टिलरी से अलग कर एक स्वतंत्र इकाई बनाया गया। इसका मुख्य उद्देश्य किसी भी हवाई खतरे से समय रहते निपटना है, ताकि वह हमले में तब्दील न हो सके।

सेना का एयर डिफेंस सिस्टम देश के महत्वपूर्ण इलाकों और संवेदनशील ठिकानों की सुरक्षा करता है। यह सुरक्षा कई लेयर्स में काम करने वाले सिस्टम के जरिए दी जाती है, जिससे किसी भी खतरे का पहले ही पता लगाया जा सके और उसे खत्म किया जा सके।

Army Air Defence:  ड्रोन हमलों का खतरा बढ़ा

आर्मी एयर डिफेंस कॉर्प्स के महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल सुमेर इवान डी’कुन्हा ने बताया कि हाल के कुछ सालों में ड्रोन से हुए हमले दुनिया भर चिंता का विषय बन गए हैं। 2019 में सऊदी अरब की ऑयल कंपनी अरामको पर हमला, 2020 में ईरानी जनरल कासिम सुलेमानी की ड्रोन हमले में मौत, 2021 में पठानकोट एयरबेस पर हमला और रूस-यूक्रेन युद्ध में ड्रोन के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल ने यह साफ कर दिया है कि भविष्य की जंग में ड्रोन एक अहम हथियार होंगे।

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Army Air Defence:  नैनो ड्रोन भी होंगे ट्रैक

भारतीय सेना ने इस खतरे को समझते हुए अपने एयर डिफेंस सिस्टम को अपग्रेड करने का फैसला किया है, ताकि किसी भी संभावित हमले को समय रहते रोका जा सके। भारतीय सेना छोटे और कम ऊंचाई पर उड़ने वाले ड्रोन का पता लगाने के लिए लो-लेवल लाइटवेट रडार (LLLR) को शामिल कर रही है। यह रडार छोटे से छोटे यानी नैनो ड्रोन को भी पहचान सकता है।

इसके अलावा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद से अपने और दुश्मन के ड्रोन की पहचान करने की क्षमता भी डेवलप की जा रही है। महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल डी’कुन्हा के मुताबिक सेना के ‘आकाशतीर’ कमांड और रिपोर्टिंग सिस्टम को भी अपग्रेड किया जा रहा है, जिससे दुश्मन के ड्रोन को ट्रैक कर उसे समय रहते खत्म किया जा सके। उन्होंने बताया कि इलेक्ट्रॉनिक IFF (Identify Friend or Foe) और AI बेस्ड प्रोफाइलिंग के जरिए किसी भी संदिग्ध ड्रोन को व्हाइट लिस्ट किया जा सकता है।

L-70 को रिप्लेस करेंगी स्मार्ट सक्सेसर गन

लेफ्टिनेंट जनरल सुमेर इवान डी’कुन्हा के मुताबिक सेना ने द्वितीय विश्व युद्ध के जमाने की पुरानी L-70 और ZU-23mm एंटी-एयरक्राफ्ट गन को नई स्वदेशी स्मार्ट सक्सेसर गनों से रिप्लेस करने का फैसला किया है। अब इनकी जगह स्मार्ट गोला-बारूद वाली नई तोपें तैनात की जाएंगी। इस प्रोजेक्ट के तहत 220 गनों के लिए पहले ही RFP (रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल) जारी कर दिया गया है। इसका अपग्रेडेड वर्जन स्मार्ट एम्यूनिशन के साथ जुलाई 2025 में ट्रायल के लिए तैयार होगा और 2026 के मई-जून तक कॉन्ट्रैक्ट पूरा होने की संभावना है। फिलहाल सेना बाहर से गन खरीदने के मूड में नहीं है।

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लेफ्टिनेंट जनरल डी’कुन्हा के अनुसार, स्मार्ट गोला-बारूद की खासियत यह होगी कि हर गोला पूर्व-निर्धारित प्रोग्रामिंग के तहत फायर किया जा सकेगा। स्मार्ट एम्युनिशन का सबसे बड़ा फायदा यह है कि 17 पारंपरिक राउंड के मुकाबले केवल एक स्मार्ट राउंड ही दुश्मन के ड्रोन को गिरा देगा। इसमें 17 हाई एक्सप्लोसिव राउंड की ताकत केवल एक स्मार्ट राउंड में मिल जाती है। इससे दुश्मन के ड्रोन को गिराने की संभावना बढ़ जाती है और लॉजिस्टिक्स की लागत कम हो जाती है। इसके अलावा, 23 एमएम की तोपों के लिए भी फ्रेगमेंटेड एम्युनिशन तैयार किया जा रहा है, जिससे वे और प्रभावी बन सकें।

VSHORADS: छोटे एयर डिफेंस सिस्टम की जरूरत

DRDO ने VSHORADS (वेरी शॉर्ट रेंज एयर डिफेंस सिस्टम) का कुछ ट्रायल्स पूरे कर लिए हैं, लेकिन इसे फाइनल होने में अभी कुछ समय लगेगा। सेना को इस सिस्टम की ज्यादा संख्या में जरूरत है, लेकिन वर्तमान में इसका प्रोडक्शन जरूरत के मुताबिक नहीं हो पा रहा है। इस कमी को पूरा करने के लिए जल्द ही भारतीय उद्योगों को आरएफआई जारी किया जाएगा, ताकि घरेलू रक्षा क्षेत्र को भी बढ़ावा मिल सके।

GM (SP) गन और मिसाइल का डेडली कॉम्बिनेशन

GM (SP) सिस्टम में फ्रैगमेंटेशन एम्यूनिशन वाली गन और 8-10 किमी तक मार करने वाली मिसाइल शामिल होगी। सेना के पास पहले से ही कई रूसी एयर डिफेंस सिस्टम मौजूद हैं, जिन्हें बनाए रखा जाएगा। हालांकि, नए गन सिस्टम के लिए अगले कुछ महीनों में RFP जारी होने की संभावना है। इसके लिए सेना की मैकेनाइज़्ड फॉर्मेशन (टैंक और बख्तरबंद वाहनों की टुकड़ियां) के लिए बड़ी संख्या में सिस्टम की जरूरत होगी। हालांकि, भारतीय रक्षा उद्योग ने कहा है कि इस परियोजना को पूरा करने में 7-8 साल लग सकते हैं। सेना इसे कम समय में पूरा करने की कोशिश कर रही है ताकि क्षमता की कमी को जल्द से जल्द दूर किया जा सके।

क्या है ‘सॉफ्ट किल’ और ‘हार्ड किल’?

ड्रोन हमलों को रोकने के लिए सेना ने पहले ही L-70 गन को “ज़ेन एंटी-ड्रोन एयर डिफेंस सिस्टम” (ZADS) के साथ जोड़ा है। इसे ‘सॉफ्ट किल’ सिस्टम कहा जाता है। इस सिस्टम में रेडियो फ्रिक्वेंसी के जरिए 10 मीटर से 10 किमी तक ड्रोन को ट्रैक करने और उसे जाम करने की क्षमता है, जिससे दुश्मन की ओर से आने वाले छोटे ड्रोन खतरों को नाकाम किया जा सकता है। हालांकि, अगर ड्रोन जाम होने के बावजूद आगे बढ़ता है, तो ‘हार्ड किल’ यानी L-70 की अपग्रेडेड गन उसे तुरंत मार गिरा सकती है।

उन्होंने बताया कि भारतीय सेना ने भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) और DRDO के बनाए इंटीग्रेटेड ड्रोन डिटेक्शन और इंटरडिक्शन सिस्टम (IDD&IS) को भी शामिल किया है। यह सिस्टम हाई-पावर लेजर और माइक्रोवेव हथियारों का इस्तेमाल करता है, जिससे दुश्मन के ड्रोन को हवा में ही नष्ट किया जा सकता है।

ड्रोन हमलों से निपटेंगी मिसाइलें

इसके अलावा भारतीय सेना ड्रोन हमलों से निपटने के लिए कई नई मिसाइलें भी शामिल कर रही हैं। लेफ्टिनेंट जनरल डी’कुन्हा के मुताबिक, QRSAM (Quick Reaction Surface-to-Air Missile) सिस्टम को जल्द ही सेना में शामिल किया जाएगा। यह मिसाइल 30 किलोमीटर तक के दुश्मन ड्रोन या एयरक्राफ्ट को मार गिराएगी। यह DRDO का बेहद सफल प्रोजेक्ट माना जा रहा है और सेना इस पर काफी भरोसा जता रही है। अगले चार से पांच महीनों में इसका कॉन्ट्रैक्ट फाइनल हो सकता है।

साथ ही, AKASH मिसाइल सिस्टम की दो रेजीमेंट पहले ही सेना में शामिल की जा चुकी हैं, और इनका हाई एल्टीट्यूड इलाकों में ट्रायल भी किया जा रहा है। इसके अलावा MRSAM (Medium Range Surface-to-Air Missile) को भी सेना में तैनात कर दिया गया है और इसकी टेस्ट फायरिंग जल्द शुरू होगी।

Army Air Defence: ड्रोन किल सिस्टम

भारतीय सेना अब ‘ड्रोन किल सिस्टम’ विकसित कर रही है, जिसमें ड्रोन के खिलाफ ड्रोन टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जाएगा। यानी कि इस प्रणाली में “ड्रोन ऑन ड्रोन” या “रॉकेट ऑन ड्रोन” टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल होगा। इसके अलावा, रॉकेट बेस्ड काउंटर-ड्रोन सिस्टम और सेना ट्रैक-माउंटेड (वाहनों पर तैनात) काउंटर-ड्रोन सिस्टम पर भी काम कर रही है, जिसमें 64 रॉकेट तैनात होंगे, जो दुश्मन के ड्रोन को पल भर में गिरा देंगे।

‘मेक इन इंडिया’ पर फोकस

लेफ्टिनेंट जनरल डी’कुन्हा जोक देकर कहते हैं कि भारतीय सेना अब स्वदेशी टेक्नोलॉजी को बढ़ावा देने पर जोर दे रही है। इसके तहत देश की निजी कंपनियों और स्टार्टअप्स के साथ मिलकर नई एयर डिफेंस टेक्नोलॉजी को डेवलप किया जा रहा है। इससे न केवल आत्मनिर्भरता बढ़ेगी, बल्कि महंगे विदेशी हथियारों पर निर्भरता भी कम होगी।

वह कहते हैं कि सेना के सामने सबसे बड़ी चुनौती हजारों ड्रोन को सीमित हवाई क्षेत्र में ट्रैक और नष्ट करना है। खासकर तब, जब दुश्मन देश ड्रोन वॉरफेयर में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। वह कहते हैं कि ड्रोन हमलों को रोकने के लिए भारतीय वायुसेना (IAF) के साथ तालमेल बेहद जरूरी है, क्योंकि देश के एयर डिफेंस की प्राथमिक जिम्मेदारी वायुसेना की है। सेना और वायुसेना मिलकर एयर डिफेंस से जुड़ीं नई रणनीतियां बना रही हैं, ताकि फ्यूचर वॉरफेयर में किसी भी हवाई खतरे से प्रभावी तरीके से निपटा जा सके।

Delhi-Dhaka Tensions: पीएम मोदी को बांग्लादेश की ‘कमान’ देते ही दिखने लगा असर! यूनुस पर दहाड़ीं शेख हसीना, दिया अल्टीमेटम

Delhi-Dhaka Tensions Rise: Trump Backs Modi, Hasina Slams Yunus with Ultimatum

Delhi-Dhaka Tensions: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयान ने बता दिया है कि एशिया में भारत की भूमिका अभी भी उसके लिए काफी अहम है। वाशिंगटन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में ट्रंप ने कहा था, “बांग्लादेश का मामला मैं प्रधानमंत्री मोदी पर छोड़ रहा हूं।” वहीं ट्रप के इस बयान के दो दिन बाद ही बांग्लादेश की अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना ने बांग्लादेश की कार्यवाहक सरकार के मुखिया मोहम्मद यूनुस पर जोरदार हमला बोला। हमला भी ऐसा बोला कि उन्होंने युनूस सरकार को आतंकवादियों की सरकार बता डाला।

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Delhi-Dhaka Tensions: पीएम मोदी को दी कमान!

पीएम मोदी की अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से पांच साल बाद हुई मुलाकात कई मायनों में अहम है। दोनों की संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में संयुक्त प्रेस वार्ता के दौरान एक रिपोर्टर ने ट्रंप से पूछा कि कुछ जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट्स का कहना है कि भारत के पड़ोसी बांग्लादेश में हुए सत्ता परिवर्तन के पीछे अमेरिका के डीप स्टेट (Deep State) का हाथ था। रिपोर्टर ने पूछा कि क्या पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडन की सरकार ने बांग्लादेश में सत्ता पलट में कोई भूमिका निभाई थी और मुहम्मद यूनुस को मुख्य सलाहकार नियुक्त किया था?

इस सवाल के जवाब में राष्ट्रपति ट्रंप ने जो कहा वह वाकई चौंकाने वाला था। ट्रंप ने अमेरिकी डीप स्टेट की किसी भी भूमिका से साफ इनकार करते हुए कहा, “यह कुछ ऐसा है जिस पर प्रधानमंत्री मोदी लंबे समय से काम कर रहे हैं। ईमानदारी से कहूं तो मैं इस बारे में पढ़ता रहा हूं। मैं बांग्लादेश को प्रधानमंत्री मोदी पर छोड़ता हूं।”

हालांकि, राष्ट्रपति ट्रंप ने सीधे तौर पर यह स्पष्ट नहीं किया कि अमेरिका भविष्य में बांग्लादेश की राजनीतिक स्थिति में कोई भूमिका निभाएगा या नहीं। लेकिन उनके बयान से यह संकेत जरूर मिला कि अब अमेरिका इस मामले में दखल देने के मूड में नहीं है। वहीं, अमेरिका के इस रुख से बांग्लादेश की अंतरिम सरकार, कट्टरपंथी इस्लामी गुटों और पाकिस्तान की रणनीति पर असर पड़ सकता है। ट्रंप के इस बयान को भारत के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अमेरिका का यह स्पष्ट संकेत है कि वह अब बांग्लादेश के मामलों में सीधा हस्तक्षेप नहीं करेगा और भारत को अपनी पूर्वी सीमा पर खुद फैसला लेने की पूरी छूट होगी।

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सूत्रों के मुताबिक, मोदी और ट्रंप ने बांग्लादेश में हाल ही में हुए राजनीतिक बदलाव को लेकर विस्तार से चर्चा की थी। मोदी ने ट्रंप को बताया कि कैसे शेख हसीना की सरकार के पतन के बाद कट्टरपंथी ताकतें बांग्लादेश में बढ़ रही हैं और पाकिस्तान वहां अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।

Delhi-Dhaka Tensions: पाकिस्तान और बांग्लादेश पर बढ़ा दबाव

मेरठ कॉलेज में डिफेंस स्टडीज और इंटरनेशनल रिलेशंस के प्रोफेसर डॉ. मोहम्मद रिजवान कहते हैं कि अमेरिका लंबे समय से यह मानता आया है कि दक्षिण एशिया में भारत की भूमिका सबसे अहम है। पूरे क्षेत्र में अगर कोई स्थिर और जिम्मेदार लोकतंत्र है, तो वह भारत ही है। इसके विपरीत, भारत के पड़ोस में अलोकतांत्रिक व्यवस्थाएं, सत्तावादी शासन और अस्थिरता देखने को मिलती है। ऐसे में जब डोनाल्ड ट्रंप ने बांग्लादेश के मामलों को भारत के हवाले करने की बात कही, तो यह न सिर्फ ढाका के लिए बल्कि इस्लामाबाद के लिए भी एक बड़ा झटका था। जो बाइडेन के कार्यकाल में यह आशंका जताई जा रही थी कि अमेरिकी डीप स्टेट, पाकिस्तान के गुप्त नेटवर्क के जरिए बांग्लादेश में अस्थिरता फैला रहा था।

बाइडेन प्रशासन के दौरान बांग्लादेश में हुए हिंसक प्रदर्शनों, मुजीबुर्रहमान की मूर्तियों के अपमान और हिंदू अल्पसंख्यकों पर हमलों को लेकर कई रिपोर्टें सामने आई थीं। मानवाधिकार संगठनों के मुताबिक, अब तक 1500 से अधिक हिंदुओं की हत्या की जा चुकी है, और यह सिलसिला अभी भी जारी है।

प्रोफेसर रिजवान के मुतााबिक, ट्रंप का यह बयान बांग्लादेश और पाकिस्तान दोनों के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि अमेरिका अब इस क्षेत्र में भारत को नेतृत्व की भूमिका देना चाहता है। इससे भारत को दक्षिण एशिया में अपनी स्थिति और मजबूत करने का अवसर मिलेगा और वह इस क्षेत्र में जारी उथल-पुथल को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाएगा। ट्रंप के इस बयान के बाद भारत के पास अब दक्षिण एशिया की राजनीति को अपने पक्ष में मोड़ने का एक सुनहरा मौका है। अमेरिका का समर्थन मिलने के बाद भारत को बांग्लादेश, पाकिस्तान और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपनी नीतियों को और आक्रामक बनाने का अवसर मिल सकता है।

शेख हसीना का कड़ा पलटवार: “मैं आतंकियों की सरकार को उखाड़ फेंकूंगी!”

ट्रंप के बयान के दो दिन बाद ही बांग्लादेश की अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना ने अपने समर्थकों वर्चुअली संबोधित करते हुए मोहम्मद यूनुस सरकार पर बड़ा हमला बोला। उन्होंने कहा, “बांग्लादेश वापस जाना मेरी प्राथमिकता है, और मैं सुनिश्चित करूंगी कि आतंकियों की सरकार को उखाड़ फेंका जाए।”

उन्होंने कहा, “यूनुस ने सत्ता में आते ही सभी जांच समितियों को भंग कर दिया और आतंकियों को खुली छूट दे दी। अब निर्दोष लोगों की हत्याएं हो रही हैं, और बांग्लादेश बर्बादी की ओर बढ़ रहा है। लेकिन हम इसे बर्दाश्त नहीं करेंगे – हम इस आतंकवादी सरकार को उखाड़ फेंकेंगे। इंशाअल्लाह!”

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शेख हसीना ने यह भी कहा कि वह हर उस परिवार के साथ खड़ी हैं, जिन्होंने इस राजनीतिक उथल-पुथल में अपनों को खोया है। उन्होंने कहा, “मैं यह सुनिश्चित करूंगी कि सभी हत्यारे कानून का सामना करें। मैं वापस आऊंगी, और यही कारण है कि शायद अल्लाह ने मुझे अब तक जिंदा रखा है।” हसीना ने यह भी दावा किया कि पिछले साल जुलाई-अगस्त में हुए छात्र विरोध प्रदर्शनों के दौरान मारे गए लोगों की मौत पुलिस की गोली से नहीं हुई थी। उन्होंने जोर देकर कहा, “अगर उन शवों का अब भी पोस्टमार्टम किया जाए, तो सच सामने आ जाएगा।”

अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि यूनुस सरकार आतंकवादियों और बाहरी ताकतों के इशारों पर काम कर रही है और उनका एक ही उद्देश्य है – बांग्लादेश को अस्थिर करना और भारत के खिलाफ एक नया मोर्चा खोलना। “अगर आज बांग्लादेश में मोदी सरकार की भूमिका बढ़ रही है, तो यह इसलिए है क्योंकि यूनुस और उनके समर्थकों ने देश को पाकिस्तान के करीब ले जाने की कोशिश की।” शेख हसीना ने साफ कहा कि वह जल्द बांग्लादेश लौटेंगी और अपने समर्थकों के साथ मिलकर लोकतंत्र की वापसी के लिए संघर्ष करेंगी।

ट्रंप के इस बयान का एक और बड़ा असर यह हुआ कि बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) और अवामी लीग को एक नई ताकत मिली है। बीएनपी लंबे समय से यह मांग कर रही थी कि बांग्लादेश में जल्द से जल्द संसदीय चुनाव कराए जाएं। लेकिन मोहम्मद यूनुस और उनकी सरकार चुनावों को टालने के लिए विभिन्न बहाने बना रहे हैं। यूनुस सरकार का कहना है कि पहले न्यायपालिका, पुलिस और प्रशासन में सुधार होने चाहिए, फिर चुनाव कराए जाएंगे।

अमेरिका ने 29 मिलियन डॉलर की फंडिंग रोकी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा से लौटे के ठीक बाद ही ट्रंप प्रशासन ने एक चौंकाने वाला फैसला किया। ट्रंप ने बांग्लादेश के लिए दी जाने वाली 29 मिलियन डॉलर की फंडिंग को भी रोक दिया। यह फंडिंग अब तक USAID (United States Agency for International Development) और UK के DFID (Department for International Development) के जरिए बांग्लादेश को दी जा रही थी। माना जाता है कि यह फंड यूनुस सरकार और कुछ इस्लामी कट्टरपंथी संगठनों को आर्थिक मदद देने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा था। इसी वजह से भारत ने अमेरिका से मांग की थी कि इस फंडिंग को रोक दिया जाए। ट्रंप प्रशासन ने इस मांग को स्वीकार करते हुए यूनुस सरकार को बड़ा झटका दिया है। साथ ही, ट्रंप ने यह साफ कर दिया है कि उनका बांग्लादेश में कोई इंट्रेस्ट नहीं है और साथ ही मदद देने का भी कोई इरादा नहीं है। अमेरिका के इस कदम के बाद अब यह सवाल उठ रहा है कि यूनुस सरकार का अस्तित्व कितने दिनों तक बना रहेगा?

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भारत के खिलाफ फंडिंग का इस्तेमाल

भारत ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि वह बांग्लादेश की अंतरिम सरकार को मान्यता नहीं देगा और केवल एक लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार के साथ ही बातचीत करेगा। इसके विपरीत, पाकिस्तान और तुर्किये यूनुस सरकार का खुलकर समर्थन कर रहे हैं। पाकिस्तान इस स्थिति का फायदा उठाकर बांग्लादेश में कट्टरपंथी संगठनों को मजबूत करने और भारत के पूर्वोत्तर में अशांति फैलाने की कोशिश कर रहा है। सूत्रों के अनुसार, यूनुस सरकार पाकिस्तान के साथ मिलकर भारत विरोधी समूहों को आर्थिक और सैन्य मदद देने की योजना बना रही थी। लेकिन अब जब अमेरिका ने खुद को पीछे कर लिया है और भारत को ‘फ्री हैंड’ दे दिया है, तो यूनुस सरकार की मुश्किलें बढ़ गई हैं।

F-35 fighter: भारत क्यों खरीदे F-35? अमेरिका को फूटी आंख नहीं सुहाता S-400, नहीं लगा सकेगा ब्रह्मोस! क्या आएंगे केवल 2 स्क्वाड्रन?

F-35 Fighter: Will India Buy It? US Concerned Over S-400, No BrahMos, Only 2 Squadrons?

F-35 fighter: अमेरिकी फाइटर जेट F-35 की खरीद को लेकर तरह-तरह की कयासबाजियां शुरू हो गई हैं। हाल ही में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात के दौरान संकेत दिया था कि भारत को F-35 स्टील्थ फाइटर जेट्स देने की योजना बनाई जा रही है। इस खबर के बाद कयास लगाए जा रहे हैं कि भारत इस सौदे को अंजाम देने के लिए उसी रास्ते पर चल सकता है जिस तरह उसने फ्रांस से राफेल फाइटर जेट्स खरीदे थे।

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हालांकि, भारत सरकार ने साफ किया है कि अभी तक कोई औपचारिक प्रस्ताव नहीं मिला है, लेकिन अमेरिका के साथ बातचीत जल्द शुरू हो सकती है। रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “यह कोई आधिकारिक प्रस्ताव नहीं है। ट्रंप ने सिर्फ यह संकेत दिया है कि अमेरिका इसे संभव बनाने के लिए रोडमैप तैयार कर सकता है। जब हमें औपचारिक प्रस्ताव मिलेगा, तब हम इस पर विचार करेंगे।”

F-35 fighter: क्या भारत सीमित संख्या में F-35 खरीदेगा?

सूत्रों के मुताबिक, भारत सीमित संख्या में F-35 फाइटर जेट्स खरीद सकता है। ठीक वैसे ही जैसे राफेल सौदे में केवल 36 विमान खरीदे गए थे। इसकी वजह यह है कि F-35 की कीमत बहुत ज्यादा है और इसका मेंटेनेंस भी बेहद महंगा है। इसलिए, भारत पूरे बेड़े को अपग्रेड करने के बजाय इसके दो स्क्वॉड्रन बना सकता है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह सौदा होता है, तो यह सरकार-से-सरकार (G2G) डील के तहत होगा, जिससे कीमत और डिलीवरी की गारंटी मिलेगी।

F-35 fighter: अमेरिका की बड़ी चिंता S-400 एयर डिफेंस सिस्टम

अमेरिका ने पहले भारत को F-35 बेचने में दिलचस्पी नहीं दिखाई थी, क्योंकि भारत ने रूस से S-400 एयर डिफेंस सिस्टम खरीदा था। अमेरिकी पेंटागन को चिंता है कि S-400 और F-35 को एक साथ ऑपरेट करना मुश्किल होगा, क्योंकि S-400 को इस तरह डिजाइन किया गया है कि वह अमेरिकी स्टील्थ विमानों की मूवमेंट को पकड़ सके। सूत्रों के मुताबिक, यदि भारत इस डील को आगे बढ़ाता है, तो अमेरिका भारत से यह सुनिश्चित करने के लिए कड़ी शर्तें रख सकता है कि रूसी सैन्य विशेषज्ञों को F-35 तक पहुंच न मिले।

F-35 Stealth Fighter Jets: आसान नहीं है भारतीय वायुसेना में अमेरिकी फाइटर जेट्स शामिल करने की डगर! पहले इन चुनौतियों से पाना होगा पार?

अमेरिकी रक्षा विभाग का मानना है कि अगर कोई देश S-400 और F-35 को एक साथ ऑपरेट करता है, तो रूसी रडार सिस्टम अमेरिकी स्टील्थ टेक्नोलॉजी को ट्रैक करने के लिए अपडेट हो सकते हैं। क्योंकि दुनिया में अभी तक किसी भी देश ने S-400 और F-35 दोनों को एक साथ नहीं चलाया है। इससे पहले तुर्किए को भी अमेरिका ने F-35 फाइटर जेट देने से इनकार कर दिया था, क्योंकि उसने भी रूस से S-400 मिसाइलें खरीदीं थीं। वहीं अगर अमेरिका भारत को शर्तों में ढील देता है, तो तुर्किए के लिए F-35 की खरीद के रास्ते खुल सकते हैं। माना जा रहा है कि दोनों सिस्टम्स को अलग रखने के लिए अमेरिका कुछ कड़े मॉनिटरिंग प्रोटोकॉल्स जारी कर सकता है।

F-35 fighter: क्या टेंपरेरी सॉल्यूशन है F-35?

भारत अपनी वायुसेना के बेड़े को अपग्रेड करना चाहता है। भारत का AMCA (Advanced Multirole Combat Aircraft) प्रोग्राम 2036 से पहले तैयार नहीं होगा, और इसमें और देरी भी हो सकती है। इसलिए, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि F-35 को एक टेंपरेरी सॉल्यूशन के तौर पर देखा जा सकता है, जब तक कि भारत का AMCA पूरी तरह तैयार नहीं हो जाता। हाल ही में भारत ने फ्रांस से राफेल मरीन एयरक्राफ्ट खरीदे थे, ताकि स्वदेशी ट्विन इंजन डेक बेस्ड फाइटर्स (TEDBF) के डेवलप होने तक नौसेना की जरूरतें पूरी हो सकें। उसी तरह, F-35 को भी टेंपरेरी सॉल्यूशन माना जा रहा है।

वायुसेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, “F-35 बहुत महंगे विमान हैं। न सिर्फ खरीदना, बल्कि इनका रखरखाव और ऑपरेशन भी बेहद खर्चीला है। ऐसे में भारत एक या दो स्क्वाड्रन (36 विमान) तक सीमित रह सकता है।”

क्या F-35 पर ब्रह्मोस मिसाइल लगने देगा अमेरिका?

F-35 एक हाई-टेक स्टील्थ फाइटर जेट है, और अमेरिका इसे केवल उन्हीं देशों को बेचता है जो उसके पार्टनर या नॉटो देश होते हैं। अगर भारत को यह फाइटर जेट मिलते हैं, तो अमेरिका यह सुनिश्चित करेगा कि भारत इसे किसी तीसरे देश (जैसे रूस) को नहीं दिखाएगा या इस पर कोई अतिरिक्त मॉडिफिकेशन नहीं करेगा। यहां कि भारत इसमें अपनी जरूरतों के हिसाब से मिसाइलें भी नहीं लगा सकेगा, जैसे कि सुखोई पर लगाई हैं।

सूत्रों का कहना है कि F-35 फाइटर जेट पर ब्रह्मोस मिसाइल लगाना आसान नहीं होगा। F-35 अमेरिकी तकनीक से बना है और इसमें किसी भी बाहरी हथियार को जोड़ने के लिए अमेरिकी सरकार और लॉकहीड मार्टिन की मंजूरी चाहिए। अब तक अमेरिका ने किसी भी गैर-नाटो या गैर-अमेरिकी मिसाइल को F-35 पर लगाने की अनुमति नहीं दी है।

ब्रह्मोस मिसाइल का आकार और वजन भी समस्या खड़ी कर सकता है। F-35 की स्टील्थ क्षमता बनाए रखने के लिए उसके हथियार इंटरनल बे में रखे जाते हैं, लेकिन ब्रह्मोस इसमें फिट नहीं होती। इसे बाहरी रूप से माउंट किया जा सकता है, लेकिन इससे F-35 का स्टील्थ खत्म हो जाएगा और रडार उसे ट्रेक कर लेंगे। इसके अलावा, अमेरिका के पास पहले से कई विकल्प मौजूद हैं। F-35 के लिए AGM-158 JASSM (स्टील्थ क्रूज मिसाइल), AGM-88 HARM (एंटी-रेडिएशन मिसाइल) और LRASM (एंटी-शिप मिसाइल, जो ब्रह्मोस जैसी ही भूमिका निभाती है) जैसी मिसाइलें हैं। इनका इस्तेमाल अमेरिकी सेना करती है और अगर अगर भारत F-35 लेता है, तो अमेरिका चाहेगा कि भारत इन्हीं मिसाइलों का इस्तेमाल करे। यहां तक कि अगली पीढ़ी की ब्रह्मोस-एनजी भी AMRAAM या JASSM से है।

ब्रह्मोस को पहले से ही Su-30MKI जैसे लड़ाकू विमानों पर तैनात किया जा रहा है और भविष्य में इसे राफेल और स्वदेशी AMCA जैसे विमानों के साथ भी जोड़ा जा सकता है। अगर भारत F-35 खरीदता है, तो वह कुछ हद तक हथियारों को कस्टमाइज़ करने पर बातचीत कर सकता है, लेकिन ब्रह्मोस के इंटीग्रेशन की संभावना कम है।

Minister Piyush Goel with Mr. Michael Williamson, President at Lockheed Martin International
Minister Piyush Goel with Mr. Michael Williamson, President at Lockheed Martin International

क्या ‘मेक इन इंडिया’ होगा F-35?

अमेरिका के साथ इस डील में एक और दिलचस्प पहलू यह है कि क्या इसे ‘मेक इन इंडिया’ पहल के तहत भारत में ही बनाया जा सकता है। हालांकि अभी तक का इतिहास रहा है कि अमेरिका इसे खुद बना कर ही एक्सपोर्ट कर रहा है। लेकिन जॉइंट प्रोडक्शन की चर्चाओं को बल तब मिला जब हाल ही में केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने लॉकहीड मार्टिन इंटरनेशनल के अध्यक्ष माइकल विलियमसन के साथ बैठक की और भारत में रक्षा और एयरोस्पेस सेक्टर में निवेश और एयरक्राफ्ट मैन्युफैक्चरिंग के अवसरों पर चर्चा की। हालांकि लॉकहीड मार्टिन ने टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड (TASL) के साथ मिलकर भारतीय वायुसेना के C-130J ‘सुपर हरक्यूलिस’ विमानों के लिए देश में पहली मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल (MRO) सुविधा स्थापित करने का एलान किया है। इसके अतिरिक्त, लॉकहीड मार्टिन और टाटा ने भारतीय वायुसेना के मीडियम ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट (MTA) जरूरतों के लिए C-130J विमानों की लोकल मैन्युफैक्चरिंग और असेंबली की भी पेशकश की है। बता दें कि गुजरात में, टाटा और एयरबस ने वडोदरा में C-295 विमानों के जॉइंट प्रोडक्शन के लिए एक संयंत्र स्थापित किया है, जो भारतीय वायुसेना की ट्रांसपोर्ट जरूरतों को पूरा करेगा। इसलिए ऐसी संभावना बेहद कम है कि F-35 को लॉकहीड मार्टिन भारत में बनाएगी।

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Explainer: Russia-Ukraine Peace Talks in Saudi Arabia – Why It Matters?

Russia-Ukraine Peace Talks: अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में एलान किया है कि वह रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ यूक्रेन युद्ध समाप्त करने के लिए बातचीत करेंगे। हालांकि, इस घोषणा के साथ ही कई सवाल खड़े हो गए हैं, खासकर यह कि ट्रंप ने इस वार्ता के लिए सऊदी अरब को ही क्यों चुना है?

Explainer: Russia-Ukraine Peace Talks in Saudi Arabia – Why It Matters?

ट्रंप ने इस संभावित वार्ता की कोई निश्चित तारीख नहीं बताई, लेकिन उन्होंने कहा कि यह बैठक निकट भविष्य में हो सकती है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की और सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान भी इसमें शामिल हो सकते हैं। सऊदी अरब ने इस पहल का स्वागत किया है और कहा है कि वह रूस-यूक्रेन के बीच शांति वार्ता में मध्यस्थ की भूमिका निभाने के लिए तैयार है।

ट्रंप ने इस वार्ता के लिए पुतिन और जेलेंस्की से फोन पर बातचीत की थी। इसके बाद उन्होंने रूस और अमेरिका के प्रतिनिधियों को बातचीत शुरू करने के लिए कहा। उनकी इस पहल को लेकर सऊदी अरब ने भी बयान जारी कर कहा कि वे इस वार्ता को सफल बनाने में सहयोग करेंगे।

Russia-Ukraine Peace Talks: सऊदी अरब को क्यों चुना गया?

सऊदी अरब को इस वार्ता का स्थल चुनने के पीछे कई कारण हैं। पहला कारण यह है कि यह एक तटस्थ देश है। यूरोप के कई देश यूक्रेन युद्ध में सीधे शामिल हैं, इसलिए वहां वार्ता कराना मुश्किल था। इसी वजह से सऊदी अरब को एक तटस्थ और सुरक्षित स्थान माना गया, जहां रूस और यूक्रेन दोनों पक्ष बिना किसी पूर्वाग्रह के बातचीत कर सकते हैं।

दूसरा बड़ा कारण यह है कि सऊदी अरब और रूस के बीच मजबूत कूटनीतिक और आर्थिक संबंध हैं। 2023 में जब पुतिन ने रियाद का दौरा किया था, तब मोहम्मद बिन सलमान ने उन्हें विशेष मेहमान के रूप में आमंत्रित किया था। इसके अलावा, रूस के खिलाफ इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट (ICC) ने अरेस्ट वारंट जारी किया है, लेकिन सऊदी अरब इस कोर्ट का सदस्य नहीं है, जिसका मतलब है कि पुतिन वहां बिना किसी कानूनी डर के आ सकते हैं।

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Russia-Ukraine Peace Talks: मध्यस्थ की भूमिका में सऊदी अरब

सऊदी अरब ने अतीत में भी कई अंतरराष्ट्रीय मामलों में मध्यस्थ की भूमिका निभाई है। उदाहरण के तौर पर, रूस में कैद अमेरिकी नागरिकों की रिहाई में सऊदी अरब की बड़ी भूमिका रही है। हाल ही में रूस ने अमेरिकी टीचर मार्क फोगल को रिहा किया, जिसमें सऊदी अरब का बड़ा योगदान था।

सऊदी अरब ने कई बार पुतिन और जेलेंस्की को शांति समझौते की संभावना तलाशने के लिए न्योता दिया है। उन्होंने 2023 में जेद्दा में एक अंतरराष्ट्रीय सभा आयोजित की थी, जिसमें कई देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए थे।

इस पूरे घटनाक्रम में सऊदी अरब अपनी छवि को और मजबूत कर सकता है। गल्फ मामलों के विशेषज्ञ अब्दुल्ला बाबुद मानते हैं कि सऊदी अरब मध्यस्थ की भूमिका निभाने के साथ-साथ अपने कूटनीतिक संबंधों को भी और गहरा करना चाहता है।

Russia-Ukraine Peace Talks: तेल भी एक महत्वपूर्ण फैक्टर

सऊदी अरब को इस वार्ता के लिए चुनने के पीछे तेल भी एक बड़ा कारक है। अमेरिका, रूस और सऊदी अरब दुनिया के तीन सबसे बड़े तेल उत्पादक देश हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार प्रभावित हुआ है और तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव आया है।

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विशेषज्ञों का मानना है कि इस वार्ता के दौरान तेल की कीमतों को स्थिर रखने पर भी चर्चा हो सकती है। 2024 के अंत में, रूस और सऊदी अरब ने ओपेक प्लस के तहत तेल उत्पादन को सीमित करने का फैसला किया था, ताकि वैश्विक बाजार को स्थिर किया जा सके।

अमेरिका को भी अपने ऊर्जा सेक्टर के लिए सऊदी अरब के साथ मजबूत रिश्ते बनाने की जरूरत है। ट्रंप की प्राथमिकता क्लीन एनर्जी से ज्यादा जीवाश्म ईंधन पर केंद्रित रही है, इसलिए सऊदी अरब उनके लिए एक महत्वपूर्ण साझेदार हो सकता है।

ट्रंप का सऊदी अरब से रणनीतिक जुड़ाव

डोनाल्ड ट्रंप जब 2017 में अमेरिकी राष्ट्रपति बने, तब उनकी पहली विदेश यात्रा सऊदी अरब की थी। इस यात्रा से सऊदी अरब को अंतरराष्ट्रीय मंच पर नई पहचान मिली थी।

ट्रंप ने संकेत दिया है कि अगर वह फिर से राष्ट्रपति बनते हैं, तो उनकी पहली विदेश यात्रा एक बार फिर सऊदी अरब हो सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर सऊदी अरब 500 अरब डॉलर के अमेरिकी उत्पाद खरीदता है, तो वे वहां जाने को तैयार हैं।

सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने भी संकेत दिया है कि वह अगले चार वर्षों में अमेरिका में करीब 500 अरब डॉलर का निवेश करने की योजना बना रहे हैं। ट्रंप ने इसे एक कदम आगे बढ़ाते हुए कहा कि वे चाहते हैं कि यह निवेश 1,000 अरब डॉलर तक पहुंचे।

अमेरिका-सऊदी संबंध और अन्य कूटनीतिक एजेंडे

सऊदी अरब और अमेरिका के बीच संबंध हमेशा आर्थिक और सैन्य रणनीति पर आधारित रहे हैं। बाइडन प्रशासन ने जहां सऊदी अरब के साथ संबंधों को संतुलित किया, वहीं ट्रंप इसे और मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप, सऊदी अरब, अमेरिका और इज़राइल के बीच एक मजबूत गठबंधन बनाना चाहते हैं। इससे मध्य पूर्व में अमेरिका का प्रभाव बढ़ेगा और चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित किया जा सकेगा।

हालांकि, सऊदी अरब को लेकर अमेरिका की नीति हमेशा विवादित रही है। सऊदी अरब का मानवाधिकार रिकॉर्ड खराब रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में इसने धार्मिक पुलिस को हटाने, महिलाओं को गाड़ी चलाने की अनुमति देने जैसे सुधार किए हैं, जिससे उसकी छवि में सुधार आया है।

क्या यह वार्ता सफल होगी?

रूस-यूक्रेन युद्ध अब तक के सबसे लंबे और जटिल युद्धों में से एक बन चुका है। ट्रंप की यह पहल युद्ध को समाप्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकती है, लेकिन यह देखना बाकी है कि क्या पुतिन और जेलेंस्की इस वार्ता को गंभीरता से लेते हैं।

सऊदी अरब की इस वार्ता में भूमिका को लेकर भी अलग-अलग विचार हैं। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि यह एक मजबूत शांति वार्ता हो सकती है, जबकि कुछ का कहना है कि सऊदी अरब इस वार्ता से अपने राजनीतिक और आर्थिक हितों को साधने की कोशिश कर रहा है।

फिलहाल, सारी निगाहें इस संभावित वार्ता पर टिकी हैं और आने वाले दिनों में इसका क्या नतीजा निकलता है, यह देखने वाली बात होगी।

F-35 Stealth Fighter Jets: आसान नहीं है भारतीय वायुसेना में अमेरिकी फाइटर जेट्स शामिल करने की डगर! पहले इन चुनौतियों से पाना होगा पार?

F-35 Stealth Fighter Jets: Challenges Ahead for Indian Air Force Before Induction!

F-35 Stealth Fighter Jets: पिछले हफ्ते बेंगलुरु काफी चर्चा में रहा। यहां के येलाहंका एयर फोर्स स्टेशन में एयरो इंडिया शो का आयोजन हुआ। खास इस मायने में रहा कि पहली बार दुनिया के दो धुरविरोधी शक्तिशाली देशों अमेरिका और रूस के पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट F-35 और SU-57 एक ही एयर स्ट्रिप पर थे। दोनों के बीच 10 मीटर का भी अंतर नहीं था। इन दोनों का एक ही प्लेटफॉर्म पर मौजूदा होना ही पूरी दुनिया का ध्यान अपनी तरफ खींचने के लिए काफी था। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई। उस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वाशिंगटन डीसी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ खड़े होकर एलान किया कि अमेरिका भारत को “कई अरब डॉलर” की सैन्य बिक्री बढ़ाएगा और “अंततः” भारत को F-35 स्टेल्थ फाइटर जेट देने का रास्ता तैयार कर रहा है।

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F-35 Stealth Fighter Jets: लॉकहीड मार्टिन ने जारी किया ये बयान

इस घोषणा के बाद भारत में इस बात पर चर्चा शुरू हो गई कि क्या भारतीय वायुसेना (IAF) को इस एडवांस फाइटर जेट की जरूरत है। भारत पहले से ही अपने पुराने लड़ाकू विमानों को बदलने और नए विमान बनाने की कोशिशों में जुटा है। हालांकि, इस एलान के बाद विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने कहा कि सैन्य खरीद की एक प्रक्रिया होती है और अभी तक इसे लेकर कोई औपचारिक कदम नहीं उठाया गया है। हालाकि अमेरिकी राष्ट्रपति के एलान के कुछ देर बाद ही F-35 फाइटर जेट बनाने वाली एयरोस्पेस कंपनी लॉकहीड मार्टिन (Lockheed Martin) ने एक महत्वपूर्ण बयान जारी किया, जिसमें कंपनी ने कहा कि वह पिछले तीन दशकों से भारत की रक्षा और एयरोस्पेस प्रणाली को मजबूत करने में एक विश्वसनीय और रणनीतिक भागीदार रही है।

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लॉकहीड मार्टिन ने अपने बयान में कहा, “हमने C-130J ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट, S-92 हेलीकॉप्टर कैबिन और फाइटर विंग्स जैसे उत्पादन कार्यक्रमों के माध्यम से अपनी प्रतिबद्धता को साबित किया है। ये सभी कार्यक्रम वैश्विक सप्लाई चेन का हिस्सा हैं और भारतीय रक्षा क्षेत्र को मजबूती प्रदान कर रहे हैं।” कंपनी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयान पर भी प्रतिक्रिया दी, जिसमें उन्होंने भारत को F-35 स्टील्थ फाइटर जेट्स देने की मंशा जाहिर की थी। लॉकहीड मार्टिन ने कहा कि “हम इस घोषणा से उत्साहित हैं और दोनों देशों की सरकारों के साथ मिलकर रणनीतिक खरीद प्रक्रियाओं पर काम करने के लिए तैयार हैं।”

कंपनी ने यह भी स्पष्ट किया कि वह भारत के साथ न केवल फाइटर जेट्स, बल्कि जेवलिन मिसाइल सिस्टम और हेलीकॉप्टर्स जैसे अन्य डिफेंस प्रोडक्ट्स पर भी सहयोग बढ़ाने की इच्छुक है। उन्होंने कहा, “हम भारतीय सशस्त्र बलों को 21वीं सदी की सुरक्षा तकनीकों और आधुनिक क्षमताओं से लैस करने के लिए प्रतिबद्ध हैं, ताकि वे अपनी वर्तमान और भविष्य की चुनौतियों से प्रभावी ढंग से निपट सकें।”

F-35 क्यों है खास?

F-35 जॉइंट स्ट्राइक फाइटर जेट है औऱ दुनिया के सबसे एडवांस लड़ाकू विमानों में से एक है। इसे स्टील्थ टेक्नोलॉजी से बनाया गया है, जिससे यह दुश्मन के रडार में पकड़ में नहीं आता। यह तीन अलग-अलग वेरिएंट में आता है, F-35A, जो सामान्य टेकऑफ और लैंडिंग के लिए बनाया गया है; F-35B, जिसे कम जगह में उड़ान भरने और वर्टिकल लैंडिंग करने के लिए डिजाइन किया गया है; और F-35C, जो एयरक्राफ्ट कैरियर से ऑपरेट करने के लिए तैयार किया गया है।

अमेरिका इस विमान को कई देशों को निर्यात भी कर रहा है। अब तक 10 देशों ने इसे अपनी वायुसेना में शामिल कर लिया है और अमेरिका खुद 2,470 से ज्यादा F-35 खरीदने की योजना बना रहा है।

F-35 Stealth Fighter Jets: क्या भारत को F-35 की जरूरत है?

भारतीय वायुसेना फिलहाल अपने लड़ाकू बेड़े को मजबूत करने की कोशिश कर रही है। कई पुराने विमान रिटायर होने वाले हैं, और ऐसे में नए फाइटर जेट्स की जरूरत महसूस की जा रही है। भारतीय वायुसेना की स्क्वाड्रन क्षमता भी लगातार घट रही है। मौजूदा समय में वायुसेना के पास बचे हैं कुल 32 स्क्वाड्रन, जबकि जरूरत है 42 की। यह आंकड़े भी लगभग आठ साल पुराने हैं। हालांकि 36 राफेल आने बाद दो स्क्वाड्रनों की संख्यया तो बढ़ी, लेकिन जैसे-जैसे पुराने विमान रिटायर होते जाएंगे, इनमें लगातार कमी आती रहेगी, क्योंकि अगले कुछ सालों में मिग-21, मिग-27, जगुआर औऱ मिराज को भी चरणबद्ध तरीके से रिटायर किया जाना है।

लेकिन सवाल यह है कि क्या F-35 इस काम के लिए सबसे सही विकल्प होगा? भारत पहले से ही रूस, फ्रांस और इजरायल की तकनीकों का इस्तेमाल कर रहा है। ऐसे में, अमेरिकी F-35 को भारत के मौजूदा सिस्टम से जोड़ना आसान नहीं होगा। इंडियन डिफेन्स स्ट्रक्चर में यह एक बड़ी चुनौती हो सकती है।

F-35 Stealth Fighter Jets: चुनौतियां क्या हैं?

अगर अमेरिका भारत को F-35 ऑफर कर रहा है, तो इसका मतलब यह है कि अमेरिका को अब भारत के रूसी S-400 मिसाइल सिस्टम से ज्यादा परेशानी नहीं है।  पहले यह माना जा रहा था कि S-400 की खरीद के कारण अमेरिका भारत को F-35 नहीं देगा, लेकिन ट्रंप के बयान के बाद यह साफ हो गया कि अब अमेरिका इस शर्त को दरकिनार कर सकता है।

कीमत और मेंटेनेंस भी बड़ा सवाल 

F-35 दुनिया के सबसे महंगे फाइटर जेट्स में से एक है। अमेरिकी सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, यह प्रोजेक्ट एक दशक की देरी से चल रहा है और इसकी लागत 209 बिलियन डॉलर (17 लाख करोड़ रुपये) ज्यादा हो चुकी है। भारत को यह देखना होगा कि क्या यह सौदा उसके बजट के अनुकूल रहेगा?

भारतीया वायुसेना की पसंद ट्विन-सीटर फाइटर जेट्स 

एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि F-35 सिंगल-सीटर जेट है, जबकि भारतीय वायुसेना ज्यादातर ट्विन-सीटर फाइटर जेट्स को प्राथमिकता देती आई है। पहले, भारत ने रूस के साथ मिलकर पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान (FGFA) बनाने की योजना बनाई थी, लेकिन जब यह सामने आया कि यह विमान सिंगल-सीट कॉन्फ़िगरेशन में है, तो भारत ने यह प्रोजेक्ट छोड़ दिया। ऐसे में अगर भारत F-35 खरीदता है, तो यह देखना होगा कि यह हमारे पायलट्स के लिए कितना उपयुक्त रहेगा और इसकी लागत कितनी होगी।

भारत के स्वदेशी प्रोजेक्ट्स का क्या होगा?

हालांकि अभी तक भारत ने इस सौदे को लेकर कोई आधिकारिक बातचीत शुरू नहीं की है। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या भारत F-35 को अपने बेड़े में शामिल करने का विचार करेगा या अपने स्वदेशी प्रोजेक्ट्स AMCA को ही प्राथमिकता देगा। वहीं, अगर भारत F-35 खरीदता है, तो इससे हमारे अपने फाइटर जेट प्रोजेक्ट्स पर क्या असर पड़ेगा? क्योंकि अगर भारत F-35 खरीदता है, तो इससे देश के स्वदेशी फाइटर जेट बनाने के प्रोजेक्ट्स प्रभावित हो सकते हैं। भारत डिफेंस सेक्टर में आत्मनिर्भरता बढ़ाने की कोशिश कर रहा है और ‘मेक इन इंडिया’ पहल के तहत ज्यादा से ज्यादा सैन्य उपकरणों का निर्माण देश में करने पर जोर दे रहा है। ऐसे में, अगर भारत F-35 खरीदता है, तो इससे डोमेस्टिक डिफेंस इंडस्ट्री को नुकसान हो सकता है और भारत को लंबे समय तक अमेरिकी डिफेंस सिस्टम पर निर्भर रहना पड़ सकता है।

भारत के अपने फाइटर जेट प्रोजेक्ट्स

भारत का हल्का लड़ाकू विमान (LCA)-Mk1A प्रोजेक्ट अभी भी पूरा नहीं हुआ है। इस विमान में अमेरिकी General Electric (GE) का F404 इंजन लगाया गया है, लेकिन इंजन की डिलीवरी में दो साल की देरी हो चुकी है। हालांकि, एयरो इंडिया शो में अधिकारियों ने कहा कि GE ने अब अपनी सप्लाई चेन की समस्या सुलझा ली है और मार्च से डिलीवरी शुरू हो जाएगी।

इसके अलावा, LCA-Mk2 का पहला प्रोटोटाइप इस साल के अंत तक तैयार होने की उम्मीद है और इसका पहली उड़ान परीक्षण 2026 में किया जाएगा। इसके बाद भारत का अपना फाइटर जेट प्रोजेक्ट, एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA), 2034-35 तक भारतीय वायुसेना में शामिल करने की योजना है।

इसके अलावा, भारत 114 मल्टी-रोल फाइटर एयरक्राफ्ट (MRFA) खरीदने की योजना बना रहा है, जिसमें एक विदेशी लड़ाकू विमान को लाइसेंस के तहत भारत में बनाया जाएगा।

एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “अभी इस पर कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन जो भी फैसला लिया जाए, भारत को अपने स्वदेशी प्रोजेक्ट्स को प्राथमिकता देनी चाहिए।”

Sukhoi-30MKI: जल्द ही भारत के सुखोई-30 के आगे ढेर होगा चीन का लेटेस्ट J-35 फाइटर जेट! रूस ने दिया सुखोई-57 का इंजन लगाने का ऑफर

Sukhoi-30MKI Upgrade: Russia Offers Su-57 Engine, Set to Outclass China’s J-35 Fighter Jet!

Sukhoi-30MKI: बेंगलुरु में चल रहे एरो इंडिया 2025 के बीच रूस की तरफ से भारत को तगड़ा ऑफर मिला है। रूस ने भारतीय वायुसेना के बैकबोन कहे जाने वाले लड़ाकू विमान सुखोई-30MKI के अपग्रेड को लेकर जबरदस्त ऑफर दिया है। रूस ने अपने लेटेस्ट स्टील्थ फाइटर सुखोई-57 में इस्तेमाल हो रहे एडवांस AL-41 इंजन को भारतीय सुखोई विमानों के लिए पेश किया है। ये इंजन मौजूदा AL-31 इंजन से ज्यादा ताकतवर और बेहतर है, जिसके बाद भारतीय वायुसेना की ताकत में बड़ा इजाफा होगा।

Sukhoi-30MKI Upgrade: Russia Offers Su-57 Engine, Set to Outclass China’s J-35 Fighter Jet!

भारतीय वायुसेना के पास इस वक्त 272 सुखोई-30MKI जेट्स हैं, जो किसी भी एक विमान मॉडल के मुकाबले सबसे बड़ा बेड़ा है। इन विमानों को अपग्रेड करने के लिए भारत रूस के साथ बातचीत कर रहा है। इस नए इंजन से भारत के फाइटर जेट्स की ताकत और परफॉर्मेंस में बड़ा बदलाव आ सकता है।

Sukhoi-30MKI: क्या खास है इस नए इंजन में?

अभी सुखोई-30MKI फाइटर जेट्स में AL-31 इंजन इस्तेमाल हो रहा है। लेकिन रूस का नया AL-41 इंजन ज्यादा पावरफुल है और यह सुखोई-57 जैसे एडवांस्ड स्टील्थ फाइटर में भी इस्तेमाल होता है। नए इंजन से सुखोई-30 की स्पीड, रेंज और फ्यूल एफिशिएंसी में जबरदस्त सुधार हो सकता है।

एयरो इंडिया 2025 के दौरान रूसी विमान निर्माता यूनाइटेड एयरक्राफ्ट कॉरपोरेशन के सीईओ वादिम बाडेखा ने इस ऑफर का एलान किया। उन्होंने कहा, “हम भारत को सुखोई-30 के अपग्रेड के हिस्से के रूप में यह नया इंजन ऑफर कर रहे हैं। AL-41 इंजन लगने के बाद सुखोई-30MKI की परफॉरमेंस बेहतर हो जाएगी, जिससे यह विमान नई पीढ़ी के लड़ाकू विमानों को भी टक्कर देगा।

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वहीं, भारत में सुखोई-30MKI को बनाने वाली कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL)का कहना है कि इस अपग्रेड के लिए डील जल्द साइन हो सकती है।

वहीं, सुखोई-30MKI का यह अपग्रेड केवल इंजन तक सीमित नहीं रहेगा। अपग्रेडेड विमानों में भारतत में बने एवियोनिक्स, रडार और मिशन कंप्यूटर लगाए जाएंगे। DRDO के बनाए उत्तम एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड अरे (AESA) रडार से विमान की पहचान और ट्रैकिंग में भी सुधार होगा।

इसके अलावा, विमान का कॉकपिट पूरी तरह डिजिटल होगा, जिसमें बड़े टचस्क्रीन डिस्प्ले पायलट को बेहतर कंट्रोल और विजिबिलिटी देंगे। नए मिशन कंप्यूटर भी जोड़े जाएंगे ताकि नई टेक्नोलॉजी को हैंडल किया जा सके।

भारत की योजना है अपग्रेडेड सुखोई-30MKI में 78 फीसदी स्वदेशी पार्ट्स इस्तेमाल किए जाएं। इससे मेक इन इंडिया को बढ़ावा मिलेगा और विदेशी तकनीक पर निर्भरता कम होगी।

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रूस का दूसरा बड़ा ऑफर: भारत में सुखोई-57E का निर्माण

एयरो इंडिया 2025 के दौरान रूस ने भारत को एक और बड़ा ऑफर दिया है। रूस ने भारत को सुखोई-57E (एक्सपोर्ट वर्जन) की लोकल मैन्युफैक्चरिंग का प्रस्ताव दिया है। अगर यह डील फाइनल होती है, तो 2025 से हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) में सुखोई-57E का निर्माण शुरू हो सकता है।

रोसोबोरोनएक्सपोर्ट के एक प्रवक्ता ने बताया कि रूस भारत में पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट का उत्पादन करने के लिए पूरी तकनीकी मदद देने को तैयार है। उन्होंने कहा, “अगर सब कुछ योजना के अनुसार चलता है, तो हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) में सुखोई-57E का उत्पादन 2025 तक शुरू हो सकता है।”

साथ ही, रूस ने भारत के एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) प्रोजेक्ट में भी सहयोग की पेशकश की है। इसमें इंजन टेक्नोलॉजी, AESA रडार, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एडवांस्ड सॉफ्टवेयर शामिल हैं। यह भारत के AMCA फाइटर जेट प्रोजेक्ट को बड़ा बूस्ट मिल सकता है।

सूत्रों का कहना है कि रूस का यह ऑफर भारत के लिए बड़ा मौका है। इससे भारत को क्रिटिकल टेक्नोलॉजी में आत्मनिर्भर बनने में मदद मिलेगी। रूस के अधिकारियों ने कहा कि इस तरह के सहयोग से भारत को भविष्य में किसी भी इंटरनेशनल प्रतिबंध या सप्लाई चेन में दिक्कतों का सामना नहीं करना पड़ेगा।

Sukhoi-30MKI: भारत का सबसे बड़ा रक्षा सहयोगी है रूस

भारत और रूस के रिश्ते दशकों पुराने हैं। रूस लंबे समय से भारत का सबसे बड़ा रक्षा सहयोगी रहा है। 2000 से 2020 के बीच भारत के कुल हथियार आयात का 66.5 फीसदी रूस से आया है। आज भी भारतीय सेना के हथियारों में रूस का असर साफ दिखा जा सकता है।

हालांकि, अब भारत मेक इन इंडिया के तहत अपनी डिफेंस प्रोडक्शन को घरेलू स्तर पर बढ़ा रहा है। रूस के इस सहयोग से भारत को न केवल तकनीकी रूप से मजबूती मिलेगी, बल्कि घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को भी बड़ा फायदा मिलेगा।

वर्तमान में भारतीय वायुसेना को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। भारतीय वायुसेना के फाइटर स्क्वाड्रन की संख्या 42 से घटकर 31 रह गई है, जो एक गंभीर चिंता का विषय है। एयर चीफ मार्शल एपी सिंह भी कई बार LCA Mk1 फाइटर जेट्स की डिलीवरी में देरी को लेकर चिंता जता चुके हैं। वहीं, रूस के इस प्रस्ताव से भारतीय वायुसेना को अपने मौजूदा बेड़े को अपग्रेड करने का बड़ा मौका मिल सकता है।

LCA Tejas Mk1A को लेकर IAF प्रमुख ने सुनाई फिर खरी-खरी, HAL से क्यों नाखुश है वायुसेना? आप भी सुनें

Tejas Mk1A Order: Indian Air Force Halts New Procurement Amid Delivery Delays and Production Challenges

LCA Tejas Mk1A: भारतीय वायुसेना (IAF) के प्रमुख एयर चीफ मार्शल (ACM) अमर प्रीत सिंह ने हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के प्रति अपनी नाराज़गी खुलकर जताई है। बेंगलुरु में एरो इंडिया शो के दौरान उन्होंने HAL के चेयरमैन डी.के. सुनील से सीधे सवाल करते हुए तेजस Mk1A जेट्स की देरी पर नाराजगी जाहिर की। वायुसेना प्रमुख ने जिस तरह से खुल कर अपनी नाराजगी जाहिर की है, उनके शब्द शायद हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के अधिकारियों की नींद उड़ाने के लिए काफी होंगे।

IAF Chief Slams HAL Over LCA Tejas Mk1A Delays – Why Is the Air Force Unhappy?

LCA Tejas Mk1A: बोले- मुझे HAL पर कोई भरोसा नहीं

हाल ही में एरो इंडिया में एक कार्यक्रम के दौरान, एयर चीफ मार्शल सिंह ने HAL के चेयरमैन डीके सुनील के सामने अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए उन्होंने कहा, “मैं आपको केवल यह बता सकता हूं कि हमारी जरूरतें और चिंताएं क्या हैं। आपको हमारी चिंताओं को दूर करना होगा और हमें भरोसा दिलाना होगा। फिलहाल, मुझे HAL पर कोई भरोसा नहीं है, और यह बहुत ही गलत है।”

उन्होंने यह बातें उस वक्त कहीं, जब एयर चीफ मार्शल सिंह HJT-36 यशस के कॉकपिट में बैठे ब्रीफिंग ले रहे थे। यह पूरी बातचीत एक वीडियो में कैद हो गई, जिसे डिफेंस न्यूज़ पोर्टल ने अपने यूट्यूब चैनल पर साझा किया है। इस छह मिनट के वीडियो में ACM सिंह के चेहरे पर नाराजगी साफ झलक रही थी।

IAF Chief Slams HAL Over LCA Tejas Mk1A Delays – Why Is the Air Force Unhappy?

LCA Tejas Mk1A: फरवरी तक 11 तेजस Mk1A जेट्स देने का किया था वादा

एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने कहा कि उन्हें फरवरी तक 11 तेजस Mk1A जेट्स तैयार होने का वादा किया गया था, लेकिन “एक भी विमान तैयार नहीं है।” उन्होंने यह भी कहा कि HAL का काम करने का तरीका मिशन मोड में नहीं है, जो इस प्रोजेक्ट में देरी की सबसे बड़ी वजह है।

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सबसे गंभीर बात यह रही कि वायुसेना प्रमुख ने आरोप लगाया कि Aero India 2025 शो में पेश किए गए तेजस Mk1A जेट्स वास्तव में Mk1A नहीं हैं। “आपने जो विमान उड़ाया और उसे Mk1A कहा, वह Mk1A नहीं है। केवल सॉफ्टवेयर बदलने या लुक्स में बदलाव करने से यह Mk1A नहीं बन जाता। जब हथियार और क्षमताएं बढ़ेंगी, तभी इसे Mk1A कहा जा सकता है।”

वायुसेना प्रमुख की यह नाराजगी ऐसे समय पर सामने आई है, जब एक दिन पहले ही रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने HAL के तेजस Mk1A जेट्स के उत्पादन संयंत्र का दौरा किया था। उसके ठीक बाद Aero India शो में चार Mk1A जेट्स ने पहली बार सार्वजनिक उड़ान भी भरी थी।

वायुसेना प्रमुख बोले- जादू की छड़ी की जरूरत है

जब HAL की लीडरशिप एंड टेस्टिंग टीम ने आईएएफ चीफ सिंह की बातों को “ध्यानपूर्वक नोट करने” और सुधार करने का भरोसा दिया, तो उन्होंने जवाब दिया, “अगर मैं गलत साबित हुआ तो मैं सबसे खुश व्यक्ति होऊंगा। मुझे लगता है कि केवल कुछ लोग ही मेहनत कर रहे हैं, या फिर सभी बिना बड़ी तस्वीर को देखे अपने-अपने क्षेत्रों में काम कर रहे हैं। कुछ बदलना होगा, कोई बड़ा बदलाव। यह सब ठीक करने के लिए किसी जादू की छड़ी की जरूरत है। अब समय आ गया है।”

मीडिया कवरेज पर भी जताई नाराज़गी

अपने पिछले बयानों की मीडिया में निगेटिव कवरेज को लेकर आईएएफ चीफ ने कहा, “मुझे यह मजाक लगता है कि जब मैं कुछ कहता हूं तो मीडिया केवल नकारात्मक हिस्से को ही उठाता है। मैं केवल एक मुद्दा उठाने की कोशिश कर रहा हूं। मैं किसी पर उंगली नहीं उठा सकता, क्योंकि तीन उंगलियां मेरी ओर भी इशारा कर रही होती हैं।”

IAF Chief Slams HAL Over LCA Tejas Mk1A Delays – Why Is the Air Force Unhappy?

पहले भी कई बार एचएएल पर उठा चुके हैं सवाल

हालांकि यह पहली बार नहीं जब वायुसेना प्रमुख एपी सिंह ने तेजस की डिलीवरी को लेकर सवाल उठाए हों। वे इससे पहले ही कई बार एचएएल को कठघरे में खड़ा कर चुके हैं। पिछले महीने 9 जनवरी को भी 21वें सुब्रतो मुखर्जी सेमिनार में ‘वायुक्षेत्र में आत्मनिर्भरता’ पर बोलते हुए उन्होंने तेजस लड़ाकू विमानों के अधिग्रहण में हो रही देरी पर गहरी नाराजगी जाहिर की थी। उन्होंने कहा था जहां एक ओर चीन छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमानों का परीक्षण कर रहा है, वहीं भारत अभी भी स्वदेशी तेजस विमानों के अधिग्रहण का इंतजार कर रहा है। एयर चीफ मार्शल सिंह ने स्पष्ट किया था कि रक्षा क्षेत्र में समय का पालन बेहद जरूरी है, क्योंकि तकनीक समय के साथ अप्रासंगिक हो जाती है।

उन्होंने कहा था कि तेजस परियोजना की शुरुआत 1984 में हुई थी और 17 साल बाद इसका पहला विमान उड़ान भर सका। 2016 में तेजस को वायुसेना में शामिल करने की प्रक्रिया शुरू हुई, लेकिन 2025 तक भी पहले 40 विमानों की डिलीवरी पूरी नहीं हो सकी है। उन्होंने इसे देश की उत्पादन क्षमता की कमजोरी बताया था।

एयर चीफ मार्शल सिंह ने सुझाव दिया था कि रक्षा क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने की आवश्यकता है, ताकि कंपनियों को यह एहसास हो कि ऑर्डर छिन भी सकते हैं। सिंह ने अनुसंधान और विकास (R&D) में निवेश बढ़ाने की जरूरत पर भी बल देते हुए कहा था फिलहाल रक्षा बजट का केवल 5% अनुसंधान पर खर्च किया जा रहा है, जबकि इसे 15% तक बढ़ाया जाना चाहिए। उन्होंने चेताया कि अगर तकनीक समय पर विकसित नहीं हुई, तो उसका कोई फायदा नहीं होगा।

Archer-NG UAV: भारत का स्वदेशी आर्म्ड ड्रोन ‘आर्चर-NG’ जल्द उड़ान भरने को तैयार, 34 घंटे तक लगातार भर सकता है उड़ान

Archer-NG UAV: India Indigenous Armed Drone Ready for Takeoff, First Sortie Next Month!

Archer-NG UAV: मीडियम एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस ड्रोन अर्चर एनजी (Archer NG) को लेकर अच्छी खबर सामने आई है। स्वदेश में ही बने अनमैंड एरियल व्हीकल (UAV) अर्चर एनजी को न केवल सर्विलांस बल्कि स्ट्राइक मिशनों के लिए तैयार किया गया है। वहीं, इसे जल्द ही भारतीय सेना के बेड़े में शामिल किया जाएगा। एरो इंडिया 2025 के दौरान इस लेटेस्ट ड्रोन की क्षमताओं और भविष्य की योजनाओं के बारे में जानकारी दी गई।

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Archer-NG UAV के फीचर्स 

यह UAV मीडियम एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस (MALE) श्रेणी में आता है, जिसका मुख्य कार्य इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉनसेंस (ISR) है। हालांकि, यह केवल निगरानी तक सीमित नहीं है; अर्चर एनजी स्ट्राइक मिशन भी अंजाम दे सकता है। यह UAV 300 किलोग्राम तक हथियार ले जाने में सक्षम है।

यह ड्रोन सिंगल इंजन ट्विन बूम कॉन्फ़िगरेशन में तैयार किया गया है, जिससे यह वजन में हल्का और बढ़िया परफॉरमेंस भी देता है। इस UAV में कई तरह के पेलोड्स लगाए जा सकते हैं, जिनमें इलेक्ट्रो-ऑप्टिक सेंसर, रडार पेलोड और सिचुएशनल अवेयरनेस इक्विपमेंट्स शामिल हैं। यह दिन और रात दोनों समय, किसी भी मौसम में मिशन को अंजाम देने में सक्षम है।

Archer-NG UAV: नेटवर्क-सेंट्रिक युद्ध के लिए तैयार

अर्चर एनजी को आधुनिक नेटवर्क-सेंट्रिक वारफेयर के लिए डिज़ाइन किया गया है। यह मैन-यून्मैन्ड टीमिंग (MUM-T) के तहत काम कर सकता है, जिसमें मानव संचालित लड़ाकू विमानों के साथ मिलकर मिशन को अंजाम दिया जाता है। इसके अतिरिक्त, यह UAV डीप पेनेट्रेशन (Deep Penetration) मिशन में भी कारगर है, जिससे यह दुश्मन के इलाके में जाकर सटीक हमले कर सकता है।

Archer-NG UAV: कितनी है इसकी रेंज

अर्चर एनजी की उड़ान चौंकाने वाली है। इसकी रेंज 1,000 किलोमीटर से अधिक हो सकती है, बशर्ते सेटेलाइट कम्युनिकेशन (Satcom) कवरेज उपलब्ध हो। इसकी ऑपरेशनल ऊंचाई 30,000 फीट तक है और यह 34 घंटे तक लगातार उड़ान भरने में सक्षम है। सामान्यत: यह 24 घंटे तक इलेक्ट्रो-ऑप्टिक पेलोड के साथ उड़ान भरता है।

अर्चर एनजी अपने डेवलपमेंट के एडवांस फेज में है। इसके टैक्सी ट्रायल (जमीन पर दौड़ने के ट्रायल) पहले ही शुरू हो चुके हैं, और पहला फ्लाइट ट्रायल जल्द ही अगले महीने तक शुरू होने की उम्मीद है। वर्तमान में, सर्टिफिकेशन की मंजरी मिलने का इंतजार किया जा रहा है। वहीं, इसका पूर्ण रूप से हथियार ढोने वाले वर्जन अगले तीन सालों में बन कर तैयार हो जाएगा।

तपस या RUSTOM-II से ज्यादा एडवांस

अर्चर एनजी को भारत के मौजूदा UAVs, जैसे कि तपस या RUSTOM-II से ज्यादा एडवांस माना जा रहा है, क्योंकि इसमें हथियार ले जाने की क्षमता है। जबकि दुनियाभर में मशहूर Hermes 900 UAV की टक्कर का यूएवी है। हालांकि, MQ-9 Reaper जैसे UAVs High Altitude Long Endurance (HALE) श्रेणी में आते हैं, जो अर्चर एनजी से अलग हैं।

अर्चर एनजी में डीजल इंजन का इस्तेमाल किया जाता है, जबकि अन्य हाई कैटेगरी के UAVs में गैस टर्बाइन इंजन लगाए जाते हैं। इस वजह से यह एक सस्ता विकल्प है।

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भारतीय सेना और वायुसेना अर्चर एनजी के डेवलपमेंट में सक्रिय भागीदारी रही है। वे लगातार जरूरतों के अनुसार सुझाव दे रही हैं और ट्रायल्स में भी हिस्सा ले रही हैं। सेना के सूत्रों को कहना है कि यह ड्रोन रियल-टाइम सर्विलांस, लॉजिस्टिक सपोर्ट और सटीक हमलों के लिए बेहद कारगर है।

मिग-21 और जगुआर जैसे पुराने लड़ाकू विमानों के रिटायर होने के बाद सेना को ऐसे प्लेटफार्मों की जरूरत है, जिन्हें कम लागत में तेजी से डिप्लॉय किया जा सके। आर्चर-NG इन सभी जरूरतों  को पूरा करता है।

आर्चर-NG जैसे ताकतवर यूएवी बनाने के बाद भारत अब उन देशों की सूची में शामिल हो गया है, जो अपने आर्म्ड ड्रोन का प्रोजक्शन और डिप्लॉयमेंट खुद कर सकते हैं।

Aero India 2025: पुराने तेजस से कहीं ज्यादा घातक है LCA Mk2, इस साल के आखिर तक आएगा प्रोटोटाइप, 2026 में भरेगा पहली उड़ान

Tejas Mk1A delivery delay

Aero India 2025: डीआरडीओ यानी Defence Research and Development Organisation (DRDO) ने एलान किया है कि Light Combat Aircraft (LCA) Mk2 का प्रोटोटाइप 2025 के अंत तक पेश किया जाएगा। इसके बाद, 2026 की पहली तिमाही में इस लड़ाकू विमान की पहली उड़ान होगी। यह जानकारी Aeronautical Development Agency (ADA) के महानिदेशक जितेंद्र जे. जाधव ने दी।

Aero India 2025: LCA Mk2 Prototype to Debut by Year-End, First Flight in 2026 – More Lethal Than Original Tejas!

 

Aero India 2025: भारतीय वायुसेना के लिए महत्वपूर्ण साबित होगा LCA Mk2

जाधव ने बातचीत में बताया, “हम इस साल के अंत तक LCA Mk2 का पहला प्रोटोटाइप पेश करेंगे और 2026 की पहली तिमाही में इसकी पहली उड़ान होगी।” उन्होंने आगे कहा, “LCA Mk2 का प्रदर्शन बेहद अच्छा है और हमें पूरा भरोसा है कि इसका ऑपरेशन 2028-29 से शुरू हो जाएगा।” यानि कि वायुसेना में इसका इंडक्शन 2028-29 तक शुरू हो जाएगा।

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जाधव ने यह भी स्पष्ट किया कि LCA Mk2 में सभी सिस्टम स्वदेशी होंगे, जो इसे भारतीय वायुसेना के लिए एक ताकतवर और घातक प्लेटफॉर्म बनाएंगी। यह विमान न केवल भारत की रक्षा क्षमताओं को बढ़ाएगा, बल्कि आत्मनिर्भर भारत के तहत स्वदेशी रक्षा उत्पादन को भी मजबूत करेगा।

Aero India 2025: LCA Mk2 Prototype to Debut by Year-End, First Flight in 2026 – More Lethal Than Original Tejas!

Aero India 2025: AMCA और LCA Mk2

जाधव ने आगे बताया कि Advanced Medium Combat Aircraft (AMCA) और LCA Mk2 के बीच काफी समानताएं हैं। इनमें सबसे खास एवियोनिक्स और सेंसर सिस्टम हैं। बता दें कि AMCA की पहली प्रोटोटाइप उड़ान 2026-27 तक पेश होने की उम्मीद है, और इसी प्रक्रिया में LCA Mk2 के कई सिस्टम अपग्रेड किए जा रहे हैं।

LCA Mk2 न केवल वायुसेना के बेड़े में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा, बल्कि वायुसेना के मॉडर्नाइजेशन प्लान्स का भी अहम हिस्सा है। वर्तमान में वायुसेना के कई फाइटर स्क्वाड्रन रिटायर होने के कगार पर हैं, और LCA Mk2 इनकी जगह लेगा।

Aero India 2025: पुराने विमानों की जगह लेगा LCA Mk2

वायुसेना की मौजूदा योजना के अनुसार, LCA Mk2 पुराने रूसी मूल के MiG-21 (Bison), MiG-26 और Jaguar फाइटर जेट्स को रिप्लेस करेगा। योजना के मुताबिक अनुसार, 2025 से शुरू होकर 2032 तक Jaguar फाइटर जेट्स के छह स्क्वाड्रन कई चरणों में सेवा से बाहर किए जाएंगे। इसके बाद अगले दशक के अंत तक Mirage 2000 और MiG-29 के तीन-तीन स्क्वाड्रन को भी रिटायर किया जाएगा।

यह अनुमान लगाया गया है कि 2035 तक लगभग 15 फाइटर स्क्वाड्रन सेवा से बाहर हो जाएंगे। ऐसे में LCA Mk2 भारतीय वायुसेना के स्क्वाड्रन गैप को भरने में मदद करेगा और देश की हवाई रक्षा क्षमताओं को मजबूत बनाएगा।

Aero India 2025: LCA Mk2 Prototype to Debut by Year-End, First Flight in 2026 – More Lethal Than Original Tejas!

LCA Mk2 के एडवांस फीचर्स

जहां पुरानी पीढ़ी के LCA Mk1 में सात हार्ड पॉइंट्स थे, वहीं Mk2 में 11 हार्ड पॉइंट्स होंगे, जिसके बाद यह 6.5 टन तक हथियार भी ले जा सकेगा। वहीं, इसके मुकाबले Mk1 केवल 3.5 टन हथियार ले सकता था। इसके अलावा, Mk2 में फ्यूल कैपेसिटी भी बढ़ाई गई है।

जाधव ने बताया, “Mk1 में 2,450 किलोग्राम (लीटर) इंटरनल फ्यूल ले जाने की क्षमता थी, जबकि Mk2 में 3,320 किलोग्राम ईंधन स्टोरेज होगा। साथ ही, यह बाहरी टैंक में 4,700 किलोग्राम ईंधन भी ले सकता है।” इस अतिरिक्त ईंधन क्षमता के चलते इसकी रेंज 3,000 किलोमीटर तक बढ़ाई जा सकेगी, जिससे यह लंबे समय तक किसी भी मिशन को अंजाम दे सकेगा।

LCA Mk2 का पहला प्रोटोटाइप 2023 में पेश किया जाना था, लेकिन कुछ वजहों से इसकी डेडलाइन बढ़ा दी गई। अब यह विमान 2025 के अंत तक पेश किया जाएगा और 2026 की शुरुआत में इसकी पहली उड़ान भरेगा।

हालांकि इस देरी का असर वायुसेना के मॉर्डनाइजेशन प्लान पर भी पड़ा है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह फाइटर जेट भारतीय वायुसेना के लिए गेम-चेंजर साबित होगा। LCA Mk2 न केवल टेक्नीकली एडवांस है, बल्कि यह वायुसेना की बदलती जरूरतों के अनुरूप भी होगा। क्योंकि भारतीय वायुसेना लंबे समय से अपने पुराने फाइटर जेट्स को बदलने की योजना पर काम कर रही है। MiG-21 और Jaguar जैसे विमान पुराने हो चुके हैं। ऐसे में LCA Mk2 वायुसेना के बेड़े में एक नई जान फूंकेगा।

Aero India 2025: बेंगलुरु के आसमान में आमने-सामने रूस और अमेरिका के स्टील्थ फाइटर्स, भारत किस पर लगाएगा दांव, 2028 तक आएगा AMCA

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Aero India 2025: बेंगलुरु के आसमान में इन दिनों एक ऐतिहासिक नजारा देखने को मिल रहा है। बेंगलुरू में चल रहे एरो इंडिया 2025 में पहली बार दो एकदूसरे के धुरविरोधी देश रूस और अमेरिका अपने-अपने स्टील्थ फाइटर जेट्स के साथ आमने-सामने हैं। जहां एक ओर रूस ने अपने Su-57 फिफ्थ जनरेशन फाइटर जेट को पेश किया है, तो वहीं दूसरी तरफ अमेरिका ने अपने F-35 लाइटनिंग II के जरिए पूरी दुनिया को अपनी ताकत दिखा रहा है।

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Aero India 2025: एक ही एयरस्पेस पर F-35 लाइटनिंग II और रूसी Su-57 फेलॉन

अभी तक, अमेरिका और रूस के इन दो स्टील्थ फाइटर्स को एक ही एयर शो में कभी नहीं देखा गया है। पहली बार, अमेरिकी F-35 लाइटनिंग II और रूसी Su-57 फेलॉन स्टील्थ फाइटर्स ने एक ही एयरस्पेस साझा किया है। दोनों देशों के बीच दशकों से चले आ रहे तनाव के चलते यह अभी तक असंभव था। लेकिन एयरो इंडिया 2025 में .यह संभव हुआ और दोनों यहां अपने लेटेस्ट फाइटर जेट्स के साथ यहां आए हुए हैं।

रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों की मार झेल रहा रूस भारत को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए पूरी ताकत झोंक रहा है। पिछले 20 सालों में भारत और रूस के बीच 50 अरब डॉलर के रक्षा सौदे हुए हैं, और इस साझेदारी को और मजबूत करने के मकसद से रूस Aero India में इस बार बड़ी भागीदारी कर रहा है।

Aero India 2025: रूस का भारत को बड़ा ऑफर

इस शो में रूस ने अपने पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट Su-57 के को-प्रोडक्शन का भारत को ऑफर दिया है। Rosoboronexport के निदेशक अलेक्जेंडर मिखेयेव ने कहा, “एशिया-प्रशांत क्षेत्र में भारत रूस का सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार है। पिछले 20 वर्षों में ही हमने भारत के साथ 50 अरब डॉलर के कॉन्ट्रैक्ट किए हैं, और कुल मिलाकर 80 अरब डॉलर के रूसी मिलिट्री प्रोडक्ट्स भारत को सप्लाई किए गए हैं।”

Aero India 2025: अमेरिकी F-35 स्टील्थ फाइटर या रूसी SU-57 फेलॉन! कौन होगा भारत की पहली पसंद? दोनों हैं एयरो इंडिया 2025 में

वहीं, अमेरिका भी भारत को अपने F-35 और F-21 जैसे फाइटर जेट्स की पेशकश कर रहा है। हालांकि, अमेरिका इन इन सौदों में कई शर्तें और ऑपरेशनल प्रतिबंध भी जोड़ रहा है, जो भारत को नामंजूर हैं। दूसरी ओर, रूस के साथ लंबे समय से चली आ रही रक्षा साझेदारी और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर जैसे विकल्प भी दे रहा है।

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भारत के पास स्वदेशी AMCA का भी है विकल्प

वहीं भारत के पाास तीसरा विकल्प भी है। भारत अपना पांचवी पीढ़ी का स्वदेशी Advanced Medium Combat Aircraft (AMCA) प्रोजेक्ट पर तेजी से काम कर रहा है। यह पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ फाइटर जेट है, जिसे डीआरडीओ के तहत Aeronautical Development Agency (ADA) बना रहा है। AMCA का फुल-स्केल मॉकअप एरो इंडिया 2025 में पहली बार पेश किया गया है।

AMCA की पहली उड़ान 2028 तक

एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट AMCA प्रोजेक्ट के डायरेक्टर कृष्णा राजेंद्र नीली ने बताया “AMCA का पहला प्रोटोटाइप 2028 तक तैयार हो जाएगा, जबकि 11 साल बाद यानी 2035-36 तक इसकी डिलीवरी शुरू होने की उम्मीद है। अब तक इसका डिज़ाइन और निर्माण 100% स्वदेशी है। इस विमान में GE 414 इंजन का उपयोग किया जाएगा, और भारत पहले ही इन इंजनों के घरेलू उत्पादन के लिए एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर कर चुका है।”

हालांकि, यह समय सीमा भारतीय वायुसेना के लिए एक चुनौती है, क्योंकि चीन पहले ही अपने स्टेल्थ फाइटर्स J-20 और J-31 को तैनात कर चुका है और पाकिस्तान भी जल्द ही इन्हें हासिल करने की कोशिशों में जुटा है।

F-35 और Su-57के मुकाबले AMCA हल्का

खास बात यह है कि F-35 और Su-57 दोनों ही स्टील्थ फाइटर जेट हेवी वेट कटैगरी हैं, यानी कि ये 30 टन वाले पांचवीं जनरेशन एयरक्राफ्ट है। वहीं AMCA की बात करें तो यह मिडियम कैटेगरी का, औऱ यह 25 टन क्लास का फिफ्थ जनरेशन का फाइटर एयरक्राफ्ट है। AMCAमें हथियार अंदर की तरफ होते हैं, जो बाहर से दिखाई नहीं देते। इसलिए यह बाकी एयरक्राफ्ट के मुकाबले लंबा होता है।

लेकिन अब भारतीय वायुसेना के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा है, क्या हमें केवल स्वदेशी AMCA पर भरोसा करना चाहिए, या फिर तात्कालीक उपाय के तौर पर विदेश से स्टील्थ फाइटर्स की खरीद करनी चाहिए। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने संकेत दिया है कि भारत सभी विकल्प खुले रखेगा।

Aero India 2025 में रूस का दबदबा

एरो इंडिया में रूस ने न केवल फाइटर जेट्स बल्कि हेलीकॉप्टर, इंजन और एयर डिफेंस सिस्टम भी पेश किए हैं। 10 से अधिक प्रमुख रूसी रक्षा कंपनियां अपने अत्याधुनिक विमान, हेलिकॉप्टर, इंजन और एयर डिफेंस सिस्टम के साथ इस शो में पधारी हैं। कुल मिलाकर 500 से अधिक रूसी प्रोडक्ट्स इस शो में पेश किए गए हैं।

इसके अलावा रूस ने अपने IL-78MK-90A रिफ्यूलिंग एयरक्राफ्ट को भी प्रदर्शित किया है, जिसे जरूरत के अनुसार ट्रांसपोर्ट, मेडिकल और फायरफाइटिंग वर्जन में बदला जा सकता है। इसके अलावा United Engine Corporation ने अपने Item 177S इंजन को पेश किया है, जो फिफ्थ जनरेशन मल्टीरोल फाइटर्स के लिए डिजाइन किया गया है।

साथ ही, रूस ने अपने एडवांस एयर-लॉन्च मिसाइलों का भी पेश किया है, जो चौथी और पांचवीं पीढ़ी के फाइटर्स के में लगाई जा सकती हैं। इन मिसाइलों में RVV-MD2 और RVV-B (हवाई लक्ष्यों को निशाना बनाने के लिए), Kh-35UE (युद्धपोतों को नष्ट करने के लिए), Kh-38MLE (जमीनी लक्ष्यों पर सटीक हमले के लिए), Kh-58UShKE (एंटी-एयरक्राफ्ट मिसाइल सिस्टम के रडार को नष्ट करने के लिए), और नई पीढ़ी की स्टील्थ क्रूज मिसाइल Kh-69 शामिल हैं।

एयर डिफेंस सेक्टर में रूस की Almaz-Antey Air and Space Defense Corporation ने लंबी, मध्यम और छोटी दूरी की मिसाइलों को पेश किया है, जो बैलिस्टिक मिसाइलों से लेकर छोटे UAVs तक को को निशाना बना सकती हैं।