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IAF Fighter Jet Shortage: भारतीय वायुसेना को नहीं चाहिए रूसी Su-57E या अमेरिकी F-35 फाइटर जेट! स्वदेशी MRFA और AMCA पर है फोकस

India Defence Upgrade
Defence Minister Rajnath Singh

IAF Fighter Jet Shortage: लड़ाकू विमानों की कमी से जूझ रही भारतीय वायुसेना को अपनी युद्धक क्षमता बनाए रखने के लिए तेज़ी से नए विमान शामिल करने की जरूरत है। हाल ही में, रक्षा मंत्रालय की एक उच्च स्तरीय समिति ने एक रिपोर्ट पेश की है, जिसमें भारतीय वायुसेना की क्षमताओं को बढ़ाने के लिए कई सिफारिशें की गई हैं। यह रिपोर्ट उस समय आई है जब भारतीय वायुसेना प्रमुख, एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने खुलकर इस बात पर चिंता जताई थी कि लड़ाकू विमानों की संख्या तेजी से घट रही है और इसे पूरा करने के लिए हर साल 35-40 नए लड़ाकू विमानों की जरूरत होगी।

IAF Fighter Jet Shortage: Indian Air Force Rejects Russian Su-57E and US F-35, Focuses on Indigenous MRFA and AMCA

रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने हाल ही में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को “सशक्त समिति” (Empowered Committee for Capability Enhancement of IAF) की रिपोर्ट सौंपी। इस रिपोर्ट में भारतीय वायुसेना की जरूरतों की पूरी समीक्षा की गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि वायुसेना की मौजूदा ताकत को बनाए रखना है और भविष्य की जरूरतों को पूरा करना है, तो स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देना जरूरी है। फिलहाल, वायुसेना के पास केवल 30 स्क्वाड्रन हैं, जबकि यह संख्या 42 होनी चाहिए। यह कमी भारतीय वायुसेना की युद्धक क्षमता को प्रभावित कर सकती है, खासकर तब जब भारत चीन और पाकिस्तान जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है।

IAF Fighter Jet Shortage: 2030 तक कई पुराने विमान होंगे रिटायर

भारतीय वायुसेना की बड़ी चुनौती है कि 2030 तक उसे कई पुराने विमानों को सेवा से बाहर करना होगा, जिनमें मिग-21, मिग-29 और मिराज-2000 शामिल हैं। इन विमानों की जगह नए विमानों को शामिल करने के लिए हर साल कम से कम 40 नए विमान चाहिए, लेकिन मौजूदा प्रोडक्शन रफ्तार बेहद कम है। यही वजह है कि वायुसेना और रक्षा मंत्रालय अब निजी क्षेत्र को शामिल करने पर विचार कर रहे हैं। वायुसेना सूत्रों का कहना है कि टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स, लार्सन एंड टुब्रो (L&T), और रिलायंस डिफेंस जैसी कंपनियों को इस प्रोजेक्ट में शामिल किया जा सकता है।

IAF Fighter Jet Shortage: भारतीय वायुसेना नहीं चाहती Su-57E या अमेरिकी F-35

रक्षा मंत्री को सौंपी इस रिपोर्ट में खासतौर पर यह स्पष्ट किया गया है कि भारतीय वायुसेना रूस के Su-57E या अमेरिकी F-35 जैसे विदेशी फाइटर जेट्स को शामिल करने के पक्ष में नहीं है, बल्कि वह पूरी तरह से स्वदेशी पांचवी पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर जेट एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) प्रोग्राम पर फोकस कर रही है। इसके अलावा, MRFA (Multi-Role Fighter Aircraft) प्रोग्राम के तहत 114 फाइटर जेट्स की खरीद को लेकर भी चर्चा चल रही है, ताकि IAF की स्क्वाड्रन क्षमता को बढ़ाया जा सके। हालांकि, यह प्रोग्राम 2018 से ही लटका हुआ है, और अब इसे जल्द से जल्द आगे बढ़ाने की जरूरत महसूस की जा रही है।

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IAF Fighter Jet Shortage: दोनों जेट्स IAF की प्राथमिकताओं में नहीं

हाल के एयरो इंडिया 2025 एयर शो में रूस के Su-57E और अमेरिका के F-35 लड़ाकू विमानों को पेश किया गया, जिससे यह अटकलें लगाई जा रही थीं कि भारत इनमें से किसी एक को प्राथमिकता दे सकता है। लेकिन भारतीय वायुसेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने साफ कर दिया कि यह दोनों जेट्स IAF की प्राथमिकताओं में शामिल नहीं हैं। रूस के Su-57E को ठुकराने की वजह यह है कि यह विमान अभी तक पूरी तरह डेवलप नहीं हुआ है और इसके कई तकनीकी पहलू अभी भी अधूरे हैं। इसकी स्टील्थ तकनीक और अन्य क्षमताएं चीन के J-20 स्टील्थ फाइटर के मुकाबले कमजोर मानी जा रही हैं। इसके अलावा रूस की मौजूदा आर्थिक और सैन्य हालात के चलते इसके प्रोडक्शन और डिलीवरी में देरी हो सकती है। वहीं अमेरिका के F-35 को ठुकराने की वजह यह है कि यह एक नेटवर्क-सेंट्रिक वॉरफेयर जेट है, जिसके ऑपरेशन के लिए अमेरिका की पूरी निगरानी बनी रहेगी। इससे भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता पर असर पड़ सकता है। अमेरिका के कई अलायंस देशों को यह विमान देने के बावजूद, इसके तकनीकी अपग्रेड और सपोर्ट सिस्टम में अमेरिका का कंट्रोल रहता है।

IAF Fighter Jet Shortage: चीन के J-35 स्टील्थ फाइटर को टक्कर देगा AMCA

भारतीय वायुसेना का मानना है कि AMCA भारत के दीर्घकालिक रणनीतिक उद्देश्यों के लिए बेहद जरूरी है। इस प्रोजेक्ट के तहत स्वदेशी स्टील्थ फाइटर जेट डेवलप किया जाएगा, जो चीन और पाकिस्तान की वायुसेनाओं को टक्कर देने में सक्षम होगा। AMCA की जरूरत इसलिए भी बढ़ गई है, क्योंकि चीन ने पहले ही J-20 स्टील्थ फाइटर को तैनात कर दिया है और जल्द ही J-35A को अपनी नौसेना में शामिल करने की तैयारी कर रहा है। इसके अलावा, पाकिस्तान को भी J-35 स्टील्थ फाइटर सौंपने की संभावना जताई जा रही है।

HAL के पास काम का बेहद लोड

भारतीय वायुसेना के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड की उत्पादन दर बेहद धीमी है। वर्तमान में हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड के पास कई महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स हैं, जिनमें तेजस Mk-1A, तेजस Mk-2, HTT-40 ट्रेनर एयरक्राफ्ट और AMCA स्टील्थ फाइटर का डेवलपमेंट शामिल है। HAL की सीमित उत्पादन क्षमता को देखते हुए भारतीय वायुसेना और रक्षा मंत्रालय अब निजी क्षेत्र को इस प्रक्रिया में शामिल करने की योजना बना रहे हैं। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि HAL अकेले इतने बड़े ऑर्डर्स को पूरा नहीं कर सकता, इसलिए प्राइवेट कंपनियों को भी तेजस Mk-2 के उत्पादन में शामिल करने पर विचार किया जा रहा है।

Defence Ministry IAF: भारतीय वायुसेना की कमियों को दूर करने के लिए रक्षा मंत्रालय ने बनाई उच्चस्तरीय समिति

ये प्राइवेट कंपनियां हो सकती हैं शामिल

रक्षा मंत्रालय ने टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स (TASL), लार्सन एंड टुब्रो (L&T) और रिलायंस डिफेंस जैसी कंपनियों को संभावित भागीदार माना है। इन कंपनियों के पास पहले से ही एयरोस्पेस और डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग का अनुभव है और सरकार चाहती है कि वे HAL के साथ मिलकर तेजस Mk-2 और अन्य विमानों का प्रोडक्शन करें। अगर HAL और निजी कंपनियों की साझेदारी सफल होती है, तो भारत अगले 10 वर्षों में एक शक्तिशाली वायुसेना बना सकता है।

तेजस MK-1A के प्रोडक्शन में देरी

तेजस MK-1A कार्यक्रम में देरी की मुख्य वजहों में से एक अमेरिकी कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक (GE) द्वारा F-404 इंजन की आपूर्ति में देरी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस मुद्दे को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सामने उठाया था। भारत सरकार इस समस्या को हल करने के लिए अमेरिका के साथ लगातार संपर्क में है, ताकि इन इंजनों की डिलीवरी में तेजी लाई जा सके।

भारतीय वायुसेना ने पहले ही 48,000 करोड़ रुपये की लागत वाले 83 तेजस MK-1A विमान खरीदने का ऑर्डर दे चुकी है। अब सरकार 97 और तेजस MK-1A विमान खरीदने पर विचार कर रही है, जिसकी अनुमानित लागत 67,000 करोड़ रुपये होगी। साथ ही, तेजस MK-2 पर भी काम तेजी से चल रहा है। यह विमान मिग-29 और मिराज-2000 जैसे पुराने विमानों की जगह लेगा। HAL की उत्पादन दर फिलहाल 16-20 विमान सालाना है, लेकिन इसे बढ़ाने की जरूरत है। निजी कंपनियों की भागीदारी इस लक्ष्य को हासिल करने में मदद कर सकती है।

रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि कम से कम 60 तेजस Mk-1A विमान निजी क्षेत्र द्वारा बनाए जाएं, ताकि HAL अन्य महत्वपूर्ण परियोजनाओं, जैसे कि AMCA (Advanced Medium Combat Aircraft) और TEDBF (Twin Engine Deck Based Fighter) पर फोकस कर सके।

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LCA Tejas Delay: Will Private Companies Now Build Fighter Jets in India? Report Submitted to Rajnath Singh – What’s HAL’s Role?

LCA Tejas Delay: भारतीय वायुसेना (IAF) की युद्धक क्षमताओं को मजबूत करने और स्वदेशीकरण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने “सशक्त समिति” (Empowered Committee for Capability Enhancement of IAF) की रिपोर्ट सोमवार को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को सौंप दी। यह रिपोर्ट वायुसेना की क्षमताओं को बढ़ाने के लिए शार्ट टर्म, मीडियम टर्म एंड लॉन्ग टर्म सिफारिशें पेश की गई हैं। जिससे भारतीय वायुसेना को अत्याधुनिक और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में स्पष्ट रोडमैप तैयार किया जा सके।

LCA Tejas Delay: Will Private Companies Now Build Fighter Jets in India? Report Submitted to Rajnath Singh – What’s HAL’s Role?

LCA Tejas Delay: निजी क्षेत्र की भागीदारी को बताया जरूरी

इस रिपोर्ट का मुख्य फोकस ‘आत्मनिर्भर भारत’ पहल को और तेज करना है, जिसमें रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम (DPSUs) और रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के साथ-साथ निजी क्षेत्र की भागीदारी को भी जरूरी बताया गया है। रक्षा मंत्री ने इस रिपोर्ट की सराहना करते हुए सिफारिशों को समयबद्ध तरीके से लागू करने के निर्देश दिए हैं।

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इस समिति का गठन रक्षा मंत्री के निर्देश पर किया गया था, ताकि भारतीय वायुसेना की सभी ऑपरेशनल जरूरतों की व्यापक समीक्षा की जा सके। रक्षा सचिव की अध्यक्षता वाली इस समिति में वायुसेना के उपप्रमुख, रक्षा उत्पादन सचिव, रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के सचिव, DRDO के अध्यक्ष और DG एक्वीजीशन को सदस्य के रूप में शामिल किया गया था।

LCA Tejas Delay: तेजस MkII प्रोजेक्ट में निजी क्षेत्र की एंट्री?

भारतीय वायुसेना अपने लड़ाकू विमानों के मॉर्डनाइजेशन को लेकर बड़े फैसले ले रही है। जिसके चलते वायुसेना तेजस MkII प्रोग्राम को रफ्तार देने के लिए निजी क्षेत्र की भागीदारी की भी बात कर रही है। इस प्रोजेक्ट के तहत वायुसेना इस लड़ाकू विमान के विकास में लगभग 10,000 करोड़ रुपये की लागत का 30 फीसदी खुद वहन कर रही है।

IAF ने पहले ही 120 तेजस MkII विमानों की खरीद की बात कही है, जो 2034-35 से पुराने मिराज-2000 और MiG-29UPG विमानों को रिप्लेस करेंगे। अब वायुसेना इसके अतिरिक्त 180 और तेजस MkII विमानों की खरीद पर विचार कर रही है, जिससे कुल संख्या 300 हो सकती है। यदि रक्षा मंत्रालय (MoD) निजी क्षेत्र की भागीदारी को मंजूरी देता है, तो यह भारत के रक्षा उत्पादन क्षेत्र के लिए एक बड़ा बदलाव होगा।

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LCA Tejas Delay: प्राइवेट कंपनियां बनाएं 60 तेजस MkII

हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) तेजस MkI और MkIA वेरिएंट का प्रोडक्शन कर रहा है, लेकिन वह सालाना केवल 16-20 विमान ही बना सकता है। ऐसे में, तेजस MkII के लिए HAL के अलावा एक और प्रोडक्शन लाइन की जरूरत महसूस की जा रही है, जिसका जिम्मा किसी निजी कंपनी के पास हो। वायुसेना चाहती है कि निजी कंपनियों को भी इसमें शामिल किया जाए ताकि तेजस MkII की डिलीवरी समय पर हो सके।

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वायुसेना सूत्रों का कहना है कि कम से कम 60 तेजस MkII विमानों का निर्माण निजी कंपनियों द्वारा किया जाएगा। इसके लिए टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड (TASL), लार्सन एंड टुब्रो (L&T) और रिलायंस डिफेंस जैसी कंपनियों को संभावित साझेदार के रूप में देखा जा रहा है। इन कंपनियों के पास आधुनिक प्रोडक्शन फैसिलिटी और कैपिटल इन्वेस्टमेंट की क्षमता है, जिससे तेजस MkII के प्रोडक्शन में तेजी आ सकती है।

क्या निजी कंपनियों की होगी एंट्री?

यदि रक्षा मंत्रालय (MoD) इस योजना को मंजूरी देता है, तो कुल 300 तेजस MkII विमानों की खरीद पर 75,000-90,000 हजार करोड़ (250-300 करोड़ रुपये प्रति विमान) खर्च हो सकते हैं। वायुसेना ने इस प्रस्ताव को आगे बढ़ाने के लिए रक्षा मंत्रालय से हरी झंडी मांगी है, जिससे HAL और निजी कंपनियां मिलकर एक हाइब्रिड प्रोडक्शन मॉडल पर काम कर सकें। इस नए ढांचे में HAL डिजाइन, प्रोटोटाइप और शुरुआती प्रोडक्शन पर फोकस करेगा। जबकि निजी कंपनियां बड़े पैमाने पर उत्पादन, निर्यात और सप्लाई चेन को बेहतर बनाने का काम करेंगी।

डेवलपमेंट फेज में है तेजस MkII

तेजस MkII प्रोजेक्ट अभी भी डेवलपमेंट फेज में है। इसके अभी इंजन इंटीग्रेशन, एवियोनिक्स टेस्टिंग और सर्टिफिकेशन का काम चल रहा है। तेजस MkII की पहली उड़ान 2026 में होने की उम्मीद है, लेकिन अगर किसी वजह से देरी होती है, तो 2034-35 तक इसकी डिलीवरी भी प्रभावित हो सकती है। वहीं इस फैसले से HAL का बोझ कम होगा। जबकि HAL अन्य महत्वपूर्ण परियोजनाओं, जैसे AMCA (Advanced Medium Combat Aircraft) और TEDBF (Twin Engine Deck Based Fighter) पर फोकस कर सकेगा।

Ukraine Nuclear Weapons: अगर आज यूक्रेन के पास होते परमाणु हथियार, तो ना ही ट्रंप जेलेंस्की की बेज्जती करते और ना ही रूस की हमले की हिम्मत होती?

Ukraine Nuclear Weapons: Would Russia Dare to Attack and Trump Humiliate Zelensky if Kyiv Had Nukes?

Ukraine Nuclear Weapons: यूक्रेन कभी दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा परमाणु शक्ति संपन्न देश था। लेकिन 1994 में एक ऐतिहासिक समझौते के तहत उसने अपने सारे परमाणु हथियार छोड़ दिए। बदले में अमेरिका, ब्रिटेन और रूस ने उसकी संप्रभुता और सुरक्षा की गारंटी दी। लेकिन क्या हुआ? रूस ने 2014 में क्राइमिया पर कब्जा कर लिया और 2022 में पूरे यूक्रेन पर आक्रमण कर दिया। और अब, जब यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की की वाशिंगटन में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से अपमानजनक गरमागरम बहस हुई है, तो यह सवाल उठता है कि अगर यूक्रेन के पास आज परमाणु हथियार होते, तो क्या उसे यह अपमान सहना पड़ता? यह सवाल भी उठ रहा है कि यूक्रेन भी उत्तर कोरिया की तरह एक ‘परमाणु सुरक्षा कवच’ का लाभ उठाकर अपनी संप्रभुता की रक्षा कर सकता था, क्योंकि अमेरिका और पश्चिमी देशों की गारंटी खोखली साबित हो रही है।

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Ukraine Nuclear Weapons: यूक्रेन के पास कितना बड़ा था परमाणु भंडार?

सोवियत संघ के विघटन के बाद यूक्रेन को सोवियत सैन्य संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा मिला, जिसमें लगभग 5,000 परमाणु हथियार भी शामिल थे। इन हथियारों में इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलें (ICBM) और स्ट्रैटेजिक बॉम्बर फाइटर जेट शामिल थे। इनमें कई लंबी दूरी की मिसाइलें भी शामिल थीं, जो 10 हजार किमी तक थर्मोन्यूक्लियर वॉरहेड ले जाने में सक्षम थीं। यानी तकनीकी रूप से, यूक्रेन अमेरिका, रूस और चीन के बाद दुनिया का चौथा सबसे बड़ा परमाणु शक्ति संपन्न देश बन सकता था।

लेकिन इस ताकत का पूरा कंट्रोल पूरी तरह उसके हाथ में नहीं था। इन मिसाइलों को लॉन्च करने के लिए आवश्यक कोड और कमांड सिस्टम रूस के पास थे। यानी, यूक्रेन के पास परमाणु हथियार तो थे, लेकिन उनका उपयोग करने की स्वतंत्रता नहीं थी।

इस स्थिति में अमेरिका और पश्चिमी देशों ने यूक्रेन पर परमाणु हथियार छोड़ने का दबाव बनाया। बदले में 1994 में “बुडापेस्ट मेमोरेंडम” पर हस्ताक्षर हुए। इस समझौते में रूस, अमेरिका और ब्रिटेन ने यूक्रेन को सुरक्षा की गारंटी दी। लेकिन यह गारंटी कितनी खोखली साबित हुई, यह आज पूरी दुनिया देख रही है।

जब 1991 में सोवियत संघ का विघटन हुआ, तो यूक्रेन के पास दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा परमाणु शस्त्रागार था। इस शस्त्रागार में शामिल थे:

  • 5,000 से अधिक परमाणु हथियार
  • 1,900 सामरिक परमाणु हथियार (जिनका इस्तेमाल युद्ध में किया जा सकता था)
  • 176 अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलें (ICBM)
  • 44 स्ट्रैटेजिक बॉम्बर फाइटर, जो अमेरिका और रूस तक मार करने की क्षमता रखते थे।

Ukraine Nuclear Weapons: क्या था बुडापेस्ट मेमोरेंडम?

बुडापेस्ट मेमोरेंडम (Budapest Memorandum) 1994 में अमेरिका, रूस, ब्रिटेन और यूक्रेन के बीच हुआ एक सुरक्षा समझौता था, जिसके तहत यूक्रेन ने अपने सभी परमाणु हथियार छोड़ने का फैसला किया। बदले में, इन महाशक्तियों ने यूक्रेन की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा करने की गारंटी दी। लेकिन 2014 में रूस द्वारा क्राइमिया पर कब्जा और 2022 में यूक्रेन पर हमले के बाद यह संधि पूरी तरह से निष्क्रिय हो गई।

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5 दिसंबर 1994 को हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट में यह समझौता हुआ, जिसे बुडापेस्ट मेमोरेंडम ऑन सिक्योरिटी एश्योरेंस (Budapest Memorandum on Security Assurances) कहा जाता है। यह समझौता मुख्य रूप से तीन पूर्व सोवियत देशों—यूक्रेन, कजाकिस्तान और बेलारूस के साथ किया गया था।

इस समझौते के तहत यूक्रेन ने अपने सभी परमाणु हथियार रूस को सौंप दिए। वहीं, रूस, अमेरिका और ब्रिटेन ने यूक्रेन की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता बनाए रखने की गारंटी दी। तीनों देशों ने यह भी वादा किया कि वे यूक्रेन के खिलाफ कभी भी सैन्य बल का उपयोग नहीं करेंगे। वहीं, अगर यूक्रेन पर कोई हमला होता है, तो ये तीनों देश तुरंत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में इसे उठाएंगे और कार्रवाई करेंगे। साथ ही, यूक्रेन को यह आश्वासन दिया गया कि उसकी अंतरराष्ट्रीय सीमाओं का सम्मान किया जाएगा।

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इस समझौते के तहत रूस ने यूक्रेन की सीमाओं की रक्षा करने का वादा किया था। लेकिन 2014 में रूस ने क्राइमिया पर कब्जा कर लिया और 2022 में उसने पूरे यूक्रेन पर हमला कर दिया। 2014 में, जब रूस ने अचानक क्राइमिया पर कब्जा कर लिया, जिससे यह संधि पूरी तरह से बेकार साबित हो गई। यूक्रेन ने जब सुरक्षा की मांग की, तो अमेरिका और ब्रिटेन ने सैन्य सहायता देने से मना कर दिया। रूस ने खुद ही इस समझौते को “Null and Void” (अमान्य) घोषित कर दिया। वहीं ऐसा ही कुछ 2022 में भी हुआ, जब यूक्रेन ने पश्चिमी देशों से मदद की उम्मीद की थी, लेकिन नाटो (NATO) ने सीधे सैन्य हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। अमेरिका और यूरोप ने सिर्फ हथियार और आर्थिक मदद दी, लेकिन सीधे जंग में शामिल नहीं हुए।

क्या वाकई यूक्रेन को परमाणु हथियार रखने चाहिए थे?

कई अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यूक्रेन ने अपने परमाणु हथियार रखे होते, तो रूस उस पर हमला करने की हिम्मत नहीं करता। 1993 में अमेरिकी प्रोफेसर जॉन मीरशाइमर ने भविष्यवाणी की थी कि अगर यूक्रेन ने परमाणु हथियार छोड़ दिए, तो रूस एक दिन उस पर कब्जा करने की कोशिश करेगा। उनकी यह भविष्यवाणी 2014 और 2022 में सच साबित हुई।

वहीं, अगर यूक्रेन ने अपने परमाणु हथियार रखे होते, तो रूस पर यह खतरा बना रहता कि अगर उसने हमला किया, तो उसे परमाणु प्रतिक्रिया झेलनी पड़ सकती है। यही वजह है कि रूस ने कभी नाटो के किसी देश पर हमला नहीं किया, क्योंकि नाटो परमाणु हथियारों से लैस है। जबकि उत्तर कोरिया भी अपनी सुरक्षा के लिए परमाणु हथियारों का इस्तेमाल करता है। अगर यूक्रेन के पास भी परमाणु हथियार होते, तो शायद वह भी इसी नीति का पालन करता।

वहीं, यूक्रेन ने परमाणु हथियार छोड़ने के बदले पश्चिमी देशों की सुरक्षा पर भरोसा किया था। लेकिन जब 2014 में रूस ने क्राइमिया पर कब्जा किया, तब अमेरिका और ब्रिटेन ने सिर्फ बयानबाजी की, कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। इससे यह स्पष्ट हो गया कि यूक्रेन ने एक बड़ी गलती कर दी थी। अमेरिकी कूटनीतिज्ञ स्टीवन पीफर ने इसे एक “सामूहिक विफलता” कहा, क्योंकि पश्चिमी देश यूक्रेन की सुरक्षा की गारंटी देने में नाकाम रहे। वहीं, 2022 में जब रूस ने यूक्रेन पर पूर्ण पैमाने पर हमला किया, तब भी नाटो (NATO) ने सीधे सैन्य हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। इससे साफ पता चलता है कि अंतरराष्ट्रीय संधियां केवल कागजी होती हैं, जिन पर बड़े देश जब चाहें, पैर रख सकते हैं।

परमाणु हथियार और न्यूक्लियर डिटरेंस: मिलती है सुरक्षा की गारंटी?

भले ही आज ये समय में परमाणु हथियार को इस्तेमाल बेहद मुश्किल है। लेकिन ये हथियार चलाने से ज्यादा डराने के काम आते हैं। परमाणु हथियार (Nuclear Weapons) आधुनिक युद्ध और वैश्विक शक्ति संतुलन का सबसे बड़ा आधार बन चुके हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जब अमेरिका ने हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराए, तब दुनिया ने पहली बार इसकी विनाशकारी ताकत देखी। इसके बाद से ही कई देशों ने इसे डिटरेंस (निवारक) हथियार के रूप में अपनाया, ताकि वे किसी भी दुश्मन देश के आक्रमण से बच सकें।

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न्यूक्लियर डिटरेंस (Nuclear Deterrence) का मतलब है कि अगर एक देश के पास परमाणु हथियार हैं, तो दूसरा देश उस पर हमला करने से पहले सौ बार सोचेगा। यह एक तरह की मनोवैज्ञानिक रणनीति है, जो यह संकेत देती है कि हमला करने वाले देश को भी भारी नुकसान झेलना पड़ेगा। यह रणनीति अमेरिका और रूस जैसी महाशक्तियों ने अपनाई और इसे “Mutually Assured Destruction (MAD)” कहा जाने लगा।

उदाहरण के तौर पर कोल़्ड वॉर के दौरान अमेरिका और सोवियत संघ दोनों देशों के पास इतने परमाणु हथियार थे कि अगर एक देश हमला करता, तो दूसरा भी जवाबी हमला कर सकता था। इससे कोई भी देश पहला कदम उठाने से डरता था। भारत-पाकिस्तान दोनों देशों के पास परमाणु हथियार होने के कारण दोनों में सीधा युद्ध नहीं हुआ। यहां तक कि कारगिल युद्ध में भी पाकिस्तान ने परमाणु धमकी दी थी, लेकिन डिटरेंस के चलते भारत पर बड़ा हमला नहीं हुआ। वहीं, उत्तर कोरिया की बात करें, तो अमेरिका और उसके सहयोगी उत्तर कोरिया पर हमला करने से बचते हैं, क्योंकि उसके पास परमाणु हथियार हैं।

Ukraine Nuclear Weapons: क्या न्यूक्लियर डिटरेंस हमेशा काम करता है?

न्यूक्लियर डिटरेंस की रणनीति हमेशा सफल नहीं होती। अगर एक देश को लगे कि वह जल्द ही हमला नहीं करेगा तो उसकी परमाणु क्षमता नष्ट कर दी जाएगी, तो वह पहले हमला कर सकता है। इसे “First Strike Doctrine” कहा जाता है। वहीं, अगर कोई देश परमाणु हमले के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं है, तो उसके पास कोई सुरक्षा नहीं होती।

भारत ने 1974 में अपना पहला परमाणु परीक्षण (Smiling Buddha) किया और 1998 में पूरी तरह से परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र बन गया। लेकिन भारत की नीति “No First Use” (NFU) यानी पहले हमला नहीं करने की है। इसका मतलब यह है कि भारत परमाणु हथियार तभी इस्तेमाल करेगा जब उस पर पहले हमला होगा। जबकि लेकिन पाकिस्तान की नीति इससे अलग है। पाकिस्तान पहले परमाणु हमला करने की धमकी देता है। उसकी रणनीति “Tactical Nuclear Weapons” यानी छोटे परमाणु हथियारों पर निर्भर करती है।

ट्रंप-जेलेंस्की विवाद और यूरोप की परमाणु नीति पर क्या होगा असर

हाल ही में वाशिंगटन में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और यूक्रेनी राष्ट्रपति जेलेंस्की के बीच तीखी बहस हुई। इस बहस ने यूरोप को सोचने पर मजबूर कर दिया कि अगर अमेरिका यूक्रेन से मुंह मोड़ लेता है, तो क्या यूरोप को अपनी रक्षा के लिए परमाणु विकल्प तलाशने की जरूरत है?

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने इस मुद्दे पर एक नई बहस छेड़ दी है। उन्होंने कहा कि यूरोप को अपनी स्वतंत्र रक्षा नीति अपनानी चाहिए और अगर जरूरत पड़े तो यूरोपीय परमाणु शक्ति डेवलप करने पर भी विचार किया जाना चाहिए। फ्रांस और ब्रिटेन के पास पहले से ही परमाणु हथियार हैं, लेकिन जर्मनी जैसे देश भी अब इस बहस में शामिल हो रहे हैं।

मैक्रों ने साफ कहा है कि अगर अमेरिका ने रूस के साथ कोई समझौता किया और यूरोप को बातचीत से बाहर रखा, तो यह नाटो गठबंधन के लिए बड़ा झटका होगा। इससे यह संकेत मिलता है कि यूरोपीय देश अब अमेरिका पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय अपनी रक्षा रणनीति पर फिर से विचार कर सकते हैं।

हालांकि, इस पर भी विवाद है। फ्रांस की विपक्षी नेता मरीन ले पेन ने स्पष्ट कहा कि फ्रांस की परमाणु सुरक्षा “केवल फ्रांस के लिए है” और इसे किसी अन्य देश के साथ साझा नहीं किया जाना चाहिए। फ्रांस के रक्षा मंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नू ने भी कहा कि फ्रांस की परमाणु नीति पूरी तरह से राष्ट्रपति के नियंत्रण में रहेगी।

Ukraine Nuclear Weapons: यूक्रेन में परमाणु हथियारों की फंडिंग शुरू

यूक्रेन के लोगों में इस मुद्दे पर कितनी नाराजगी है, यह हाल ही में सामने आई एक दिलचस्प घटना से साफ होता है। यूक्रेन के एक बैंक “मोनोबैंक” के सह-संस्थापक सेरही होरोखोवस्की ने मज़ाक में एक क्राउडफंडिंग पेज बनाया, जिसमें लिखा था कि वह “यूक्रेन के लिए परमाणु हथियार बनाने के लिए फंड इकट्ठा कर रहे हैं।”

उन्होंने सोचा था कि यह सिर्फ एक मज़ाक रहेगा, लेकिन सिर्फ कुछ घंटों में इस अभियान में लाखों डॉलर जमा हो गए। यह दिखाता है कि यूक्रेन के लोग अब खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं और वे यह मानते हैं कि उनके पास परमाणु हथियार होने चाहिए।

बाद में उन्होंने इस पैसे को ड्रोन और मानवीय मदद के लिए इस्तेमाल करने का फैसला किया, लेकिन इस घटना ने एक गहरी सच्चाई उजागर कर दी कि यूक्रेन के लोग अब सिर्फ पश्चिमी देशों की गारंटी पर भरोसा नहीं कर सकते।

क्या यूक्रेन फिर से परमाणु शक्ति बनने की सोच सकता है?

यूक्रेन ने अब तक कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है कि वह फिर से परमाणु हथियार बनाना चाहता है। लेकिन जिस तरह से रूस उसकी संप्रभुता को बार-बार चुनौती दे रहा है, और जिस तरह से अमेरिका की नीतियां अनिश्चित होती जा रही हैं, उसे देखते हुए यह चर्चा शुरू हो चुकी है कि क्या यूक्रेन को अपने परमाणु कार्यक्रम पर दोबारा विचार करना चाहिए?

अब सवाल यह उठता है कि अगर यूक्रेन फिर से परमाणु हथियार बनाने की दिशा में बढ़ता है, तो क्या पश्चिमी देश उसका समर्थन करेंगे, या फिर उस पर प्रतिबंध लगाएंगे?

यह सवाल न केवल यूक्रेन के लिए, बल्कि पूरी दुनिया के लिए महत्वपूर्ण है। अगर भविष्य में छोटे देश यह महसूस करते हैं कि सुरक्षा संधियां केवल कागजों पर होती हैं, और बड़े देश जब चाहें, उन्हें तोड़ सकते हैं, तो शायद कई अन्य देश भी अपने परमाणु कार्यक्रम शुरू करने के बारे में सोचने लगेंगे।

हालांकि यूक्रेन ने 1994 में अपने परमाणु हथियार छोड़कर एक ऐतिहासिक मिसाल पेश की थी। लेकिन रूस की आक्रामकता ने यह दिखा दिया कि सिर्फ अंतरराष्ट्रीय समझौतों पर भरोसा करना खतरनाक हो सकता है। आज, जब यूक्रेन की संप्रभुता खतरे में है और पश्चिमी देशों की गारंटी खोखली साबित हो रही है, तब यह सवाल उठना लाज़मी है क्या यूक्रेन को अपने परमाणु हथियार छोड़ने का फैसला करना चाहिए था? और अगर आज उसके पास ये हथियार होते, तो क्या रूस हमला करने की हिम्मत करता?

Ukraine-US Minerals Deal: क्या जेलेन्स्की के जरिए चीन को साध रहे हैं ट्रंप? दुर्लभ खनिज भंडार हासिल करने के पीछे यह है खेल

Ukraine-US Minerals Deal: Race for Rare Earth Reserves, Is Trump Countering China Through Zelenskyy

Ukraine-US Minerals Deal: यूक्रेन और अमेरिका के बीच दुर्लभ खनिजों और ऊर्जा संसाधनों के इस्तेमाल को लेकर संभावित समझौता फिलहाल टल गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेन्स्की के बीच वॉशिंगटन में हुई तीखी बहस के बाद दोनों देशों के बीच इस समझौते को लेकर जारी बातचीत टल गई है। ट्रंप ने यूक्रेन को दी गई अमेरिकी सैन्य मदद को लेकर जेलेन्स्की की कृतज्ञता पर सवाल उठाए, जिसके बाद जेलेन्स्की समय से पहले बैठक छोड़कर निकल गए।

Ukraine-US Minerals Deal: Race for Rare Earth Reserves, Is Trump Countering China Through Zelenskyy

इस समझौते के तहत अमेरिका को यूक्रेन के खनिज संसाधनों तक पहुंच मिलने वाली थी। हालांकि, ट्रंप ने यह स्पष्ट किया था कि यह सौदा अमेरिकी टैक्सपेयर्स को यूक्रेन को दी गई सैन्य सहायता की भरपाई करने में मदद करेगा। दोनों देशों ने समझौते की प्रारंभिक शर्तों पर सहमति जता दी थी, लेकिन वॉशिंगटन में हुए विवाद के बाद इस पर अंतिम हस्ताक्षर नहीं हो सके।

Ukraine-US Minerals Deal: यूक्रेन में मिलते हैं ये रेयर अर्थ एलिमेंट्स

समझौते के मसौदे के मुताबिक अमेरिका को यूक्रेन के विशाल दुर्लभ खनिज (रेयर अर्थ मेटल्स) और ऊर्जा संसाधनों तक पहुंच मिलती, जिससे यूक्रेन को आर्थिक पुनर्निर्माण में मदद मिलती। यूक्रेन यूरोप में सबसे अधिक दुर्लभ खनिज (Rare Earth Elements – REE) भंडार वाले देशों में से एक है। इसकी धरती में 22 ऐसे खनिज मौजूद हैं, जिन्हें यूरोपीय संघ ने रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना है। इनमें लिथियम, टाइटेनियम, ग्रेफाइट, ज़िरकोनियम जैसे खनिज शामिल हैं, जिनका इस्तेमाल इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा, अंतरिक्ष और नवीकरणीय ऊर्जा में किया जाता है।

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2022 तक यूक्रेन के दुर्लभ खनिज वैश्विक आपूर्ति का लगभग 5 फीसदी थे। खासतौर पर लिथियम, जो इलेक्ट्रिक वाहनों और बैटरी निर्माण में आवश्यक है, उसके 5,00,000 टन अज्ञात भंडार यूक्रेन में मौजूद हैं, जो इसे यूरोप के सबसे बड़े लिथियम उत्पादकों में शामिल कर सकता है। इसके अलावा यूक्रेन दुनिया के टाइटेनियम उत्पादन का 7 फीसदी हिस्सा रखता है, जिसका इस्तेमाल डिफेंस और एयरोस्पेस इंडस्ट्री में किया जाता है।

रूस के कब्जे वाले इलाकों में 40 फीसदी मेटल रिसोर्सेज

रूस ने 2022 में यूक्रेन पर आक्रमण किया, अब तक देश के लगभग 20 फीसदी इलाके पर कब्जा कर चुका है, जिसमें खनिज संपदा से भरपूर लुहान्स्क, दोनेत्स्क, ज़ापोरिज़्ज़िया, डोनबास और खार्किव क्षेत्र शामिल हैं। इन इलाकों में यूक्रेन के 40 फीसदी मेटल रिसोर्सेज स्थित हैं, जो अब रूसी नियंत्रण में हैं। डोनबास में स्थित “शेवचेंको लिथियम फील्ड” को यूक्रेन का सबसे बड़ा लिथियम भंडार माना जाता है।

यूक्रेन सरकार का मानना है कि युद्ध के चलते न केवल आर्थिक नुकसान हुआ है, बल्कि हाई-टेक एंड डिफेंस सेक्टर को होने वाली ग्लोबल सप्लाई चेन भी प्रभावित हुई है।

Ukraine-US Minerals Deal: समझौते की प्रमुख शर्तें

ट्रंप प्रशासन ने एक रिकंस्ट्रक्शन इन्वेस्टमेंट फंड (Reconstruction Investment Fund) बनाने का प्रस्ताव दिया था, जिसमें यूक्रेन अपने खनिज संसाधनों से उत्पन्न राजस्व का 50 फीसदी योगदान करेगा। इसका उपयोग युद्ध से प्रभावित यूक्रेन के पुनर्निर्माण और बुनियादी ढांचे के विकास में किया जाएगा। हालांकि, बाकी 50 फीसदी का नियंत्रण किसके पास रहेगा और अमेरिका इसमें कितना प्रभाव डालेगा, यह अब भी स्पष्ट नहीं है।

राष्ट्रपति ट्रंप का दावा है कि अमेरिका को यूक्रेनी खनिज संसाधनों से $500 बिलियन (43.605 लाख करोड़ रुपये) की संभावित आय का अधिकार मिलना चाहिए, ताकि युद्ध के दौरान दिए गए अमेरिकी सैन्य और वित्तीय सहायता की भरपाई हो सके। हालांकि, इस दावे पर ज़ेलेंस्की ने विरोध जताया है।

यूक्रेन को अब तक अमेरिका से कितनी सहायता मिली?

अमेरिका और यूक्रेन के बीच सहायता राशि को लेकर विवाद जारी है। ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिका ने यूक्रेन को 350 बिलियन डॉलर (30,615 अरब रुपये) से अधिक की मदद दी है, जबकि यूक्रेन का कहना है कि वास्तविक सहायता इससे कहीं कम है।

कील इंस्टीट्यूट फॉर द वर्ल्ड इकोनॉमी के अनुसार, अमेरिका ने यूक्रेन को अब तक 118 बिलियन डॉलर की सहायता प्रदान की है, जबकि अमेरिकी रक्षा विभाग के अनुसार यह आंकड़ा 183 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है। जिसमें यूक्रेन की सैन्य आपूर्ति को फिर से शुरू करने की लागत भी शामिल है।

Ukraine-US Minerals Deal: 20,000 खनिज खदानें

युद्ध से पहले, यूक्रेन में कुल 20,000 खनिज खदानें थीं, जिनमें से 8,700 खनिज भंडारों की पुष्टि हो चुकी हैं। देश में मौजूद 120 महत्वपूर्ण खनिजों में से 117 खनिज पाए जाते हैं, जिससे यह खनिज संपदा के मामले में विश्व के शीर्ष देशों में शामिल होता है।

रूस के कब्जे में यूक्रेन का वह हिस्सा है जहां अधिकांश दुर्लभ खनिज मौजूद हैं। इन क्षेत्रों में मौजूद टाइटेनियम, निकेल, कोयला, लौह अयस्क और यूरेनियम भंडार पर रूस का नियंत्रण है, जिससे वह ग्लोबल मिनरल सप्लाई पर खासा असर डाल सकता है। कहा जाता है कि रूस का लुहान्स्क और दोनेत्स्क पर कब्जा करने की एक प्रमुख वजह वहां मौजूद दुर्लभ खनिज और धातु संसाधन भी है।

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यूक्रेन सरकार के अनुसार, इन खनिज संसाधनों की अनुमानित कीमत ट्रिलियन डॉलर से अधिक है, लेकिन युद्ध के चलते यूक्रेन इनका पूरी तरह दोहन नहीं कर पा रहा है।

  • लुहान्स्क और दोनेत्स्क: लिथियम, कोयला और दुर्लभ धातुओं के बड़े भंडार
  • ज़ापोरिज़िया और निप्रोपेत्रोवस्क: लौह अयस्क, मैंगनीज और टाइटेनियम
  • खार्किव और पोल्टावा: गैस और तेल के महत्वपूर्ण भंडार

दुनिया में दुर्लभ खनिजों के सबसे बड़े भंडार

अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) के अनुसार, 2025 तक निम्नलिखित देशों के पास सबसे बड़े दुर्लभ खनिज भंडार हैं:

  • चीन – 44 मिलियन मीट्रिक टन (ग्लोबल सप्लाई का 70% कंट्रोल)
  • ब्राजील – 21 मिलियन मीट्रिक टन
  • भारत – 6.9 मिलियन मीट्रिक टन
  • ऑस्ट्रेलिया – 5.7 मिलियन मीट्रिक टन
  • रूस – 3.8 मिलियन मीट्रिक टन
  • वियतनाम – 3.5 मिलियन मीट्रिक टन
  • अमेरिका – 1.9 मिलियन मीट्रिक टन
  • ग्रीनलैंड – 1.5 मिलियन मीट्रिक टन
  • तंजानिया – 890,000 मीट्रिक टन
  • दक्षिण अफ्रीका – 860,000 मीट्रिक टन
  • कनाडा – 830,000 मीट्रिक टन

चीन और रूस के दुर्लभ खनिज बाजार पर कंट्रोल चाहता है अमेरिका

यदि अमेरिका और यूक्रेन के बीच समझौता होता है, तो यह ग्लोबल मिनरल सप्लाई और अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर डाल सकता है। वहीं, अगर यूक्रेन अपने खनिज संसाधनों का सही तरीके से दोहन कर पाया, तो वह यूरोप की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक बन सकता है। लेकिन युद्ध के हालात और रूस के कब्जे के चलते इसमें अभी लंबा वक्त लग सकता है। अमेरिका और यूक्रेन के बीच प्रस्तावित समझौता सफल होता है, तो इससे यूक्रेन को आर्थिक पुनर्निर्माण में मदद मिलेगी।

हालांकि, इस समझौते को लेकर यूक्रेन में भी मिश्रित प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यूक्रेन को अपने संसाधनों पर पूरी संप्रभुता बनाए रखनी चाहिए और इसे बाहरी दबाव में नहीं बेचना चाहिए।

दूसरी ओर, अमेरिका इस डील को अपनी भू-राजनीतिक रणनीति का हिस्सा मान रहा है, जिससे वह चीन और रूस के दुर्लभ खनिज बाजार पर कंट्रोल हासिल कर सके। हालांकि अगले कुछ महीनों में यह स्पष्ट हो जाएगा कि क्या अमेरिका और यूक्रेन के बीच इस समझौता असलियत में तब्दील होता है, या फिर यह भू-राजनीतिक विवादों का एक और शिकार बन जाएगा। लेकिन यह निश्चित है कि यूक्रेन के खनिज संसाधन न केवल इसके आर्थिक भविष्य के लिए बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन के लिए भी महत्वपूर्ण बने रहेंगे।

Lt Col Habib Zahir: बेनकाब हुआ पाकिस्तान का झूठ, 2017 में जिस कर्नल के नेपाल से किडनैप का भारत पर लगाया था आरोप, क्वेटा में मारी गोली

Lt Col Habib Zahir: Pakistan's Lie Exposed! Officer Allegedly Kidnapped by India in 2017 Shot Dead in Quetta
Lt Col Habib Zahir

Lt Col Habib Zahir: पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI के एजेंट लेफ्टिनेंट कर्नल (रिटायर्ड) हबीब जहीर का मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है। पाकिस्तानी सेना के सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी लेफ्टिनेंट कर्नल हबीब जहीर को क्वेटा में अज्ञात हमलावरों ने गोली मार दी। हबीब 2017 में नेपाल से रहस्यमय तरीके से लापता हो गए थे। पाकिस्तान ने 2017 में उनके नेपाल से गायब होने के लिए भारत की खुफिया एजेंसी RAW को जिम्मेदार ठहराया था, लेकिन अब 8 साल बाद क्वेटा में उनकी हत्या ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या पाकिस्तान ने अपने ही झूठ को छुपाने के लिए हबीब जहीर को मार डाला? या फिर यह पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI के “क्लीनअप ऑपरेशन” का हिस्सा था?

Lt Col Habib Zahir: Pakistan's Lie Exposed! Officer Allegedly Kidnapped by India in 2017 Shot Dead in Quetta
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Lt Col Habib Zahir: 2017 में नेपाल से लापता, अब क्वेटा में हत्या

रिपोर्ट्स के अनुसार, यह हमला क्वेटा की जेल रोड पर हुआ, जहां मोटरसाइकिल सवार हमलावरों ने उन्हें निशाना बनाया। इस घटना ने पाकिस्तान के पुराने दावों को एक बार फिर संदेह के घेरे में ला दिया है, जिसमें उसने भारत पर कर्नल हबीब के अपहरण का आरोप लगाया था। 6 अप्रैल 2017 को पाकिस्तानी सेना के पूर्व अधिकारी कर्नल हबीब जहीर नेपाल के लुंबिनी क्षेत्र में अचानक लापता हो गए थे। पाकिस्तान सरकार ने उस समय भारत की खुफिया एजेंसी RAW पर आरोप लगाया था कि उसने उन्हें अगवा कर लिया। पाकिस्तानी के पूर्व विदेशी मामलों के सलाहकार सरताज अज़ीज़ उस दौरान ने बयान जारी कर कहा था कि एक जांच रिपोर्ट के अनुसार तीन भारतीय नागरिकों ने कर्नल हबीब का अपहरण किया और यह का अपहरण भारतीय एजेंसियों की साजिश हो सकता है।

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क्या पाकिस्तान ने खुद गढ़ी थी अपहरण की कहानी?

हालांकि, इस दावे के समर्थन में पाकिस्तान कोई ठोस सबूत नहीं दे सका। उस समय पाकिस्तान ने दावा किया था कि हबीब जहीर एक फर्जी नौकरी के झांसे में नेपाल गए थे। LinkedIn और UN की जॉब साइट पर अपना बायोडाटा डालने के बाद, उन्हें मार्क थॉम्पसन नामक व्यक्ति का ईमेल/कॉल आया, जिसने नेपाल में वाइस प्रेसिडेंट पद के लिए इंटरव्यू के लिए बुलाया गया था। हबीब को ओमान एयरलाइंस का टिकट भेजा गया और वे पाकिस्तान से होकर काठमांडू पहुंचे। काठमांडू एयरपोर्ट पर उतरने के बाद वह बुद्धा एयर से लुंबिनी पहुंचे, जो भारत की सीमा से केवल 5 किलोमीटर दूर है। वहीं से उनका मोबाइल अचानक बंद हो गया और वे रहस्यमय तरीके से गायब हो गए। उनकी आखिरी मोबाइल लोकेशन भारत-नेपाल सीमा से 5 किलोमीटर दूर दर्ज की गई थी।

Lt Col Habib Zahir: कैसे बेनकाब हुआ पाकिस्तान का झूठ?

लेफ्टिनेंट कर्नल (सेवानिवृत्त) हबीब ज़हूर (जिन्हें मोहम्मद हबीब ज़हिर भी कहा जाता है) के 6 अप्रैल 2017 को नेपाल में गायब होने के बाद, पाकिस्तान ने भारत पर उनके अपहरण का आरोप लगाया और कहा कि RAW ने उन्हें पकड़ लिया है। इस दावे को मजबूत करने के लिए पाकिस्तान ने कहा कि कर्नल हबीब को भारत लाकर कुलभूषण जाधव की रिहाई के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।

लेकिन जब नेपाल पुलिस और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने इस मामले की जांच शुरू की, तो पता चला कि जिस वेबसाइट से उन्हें नौकरी का ऑफर मिला था, वह नेपाल में बनी थी और बाद में डिलीट कर दी गई। साथ ही, मार्क थॉम्पसन नाम का व्यक्ति और जिस ब्रिटिश मोबाइल नंबर से हबीब को संपर्क किया गया था, वह इंटरनेट प्रोटोकॉल नंबर था। यह पूरी स्क्रिप्ट किसी हॉलीवुड फिल्म की तरह तैयार की गई थी। यहां तक कि हबीब के परिवार ने संयुक्त राष्ट्र (UN) वर्किंग ग्रुप ऑन एनफोर्स्ड इनवॉलंटरी डिसअपीयरेंस (Enforced Involuntary Disappearances) से संपर्क किया था और इस मामले की जांच की मांग की, लेकिन कोई सफलता नहीं मिली।

सूत्रों का कहना है कि लेफ्टिनेंट कर्नल हबीब ज़हूर शुरू से ISI के लिए काम करते थे। हबीब ने 2014 में सेना से रिटायरमेंट के बाद कुछ समय ISI के अंडरकवर एजेंट के रूप में काम किया था। हबीब एक खास मिशन पर नेपाल गए थे। उन्होंने विदेश यात्रा के लिए ISI से अनापत्ति प्रमाणपत्र (NOC) भी लिया था, जो 31 मार्च 2017 को ISI के लेफ़्टिनेंट कर्नल आतिफ़ अनवर डार के हस्ताक्षर से जारी हुआ। लेकिन जब नेपाल में हबीब से संपर्क टूट गया, तो ISI ने उनसे पल्ला झाड़ लिया। ताकि वह पकड़े जाने की सूरत में जिम्मेदारी से इनकार कर सके।

Lt Col Habib Zahir: Pakistan's Lie Exposed! Officer Allegedly Kidnapped by India in 2017 Shot Dead in Quetta
Lt Col Habib Zahir: Pakistan’s Lie Exposed! Officer Allegedly Kidnapped by India in 2017 Shot Dead in Quetta

क्वेटा में हत्या के पीछे ISI का हाथ?

अब जब कर्नल हबीब को पाकिस्तान के ही प्रांत क्वेटा में गोली मार दी गई है, तो सवाल यह उठता है कि क्या पाकिस्तान सरकार इस मामले की जांच करेगी? या फिर यह मामला भी पाकिस्तान की सेना और ISI के आंतरिक सत्ता संघर्ष का हिस्सा है?

रक्षा विशेषज्ञ और रिटायर्ड कर्नल संदीप प्रभाकर सवाल करते हैं, अगर कर्नल हबीब जिंदा थे, तो उन्होंने 8 साल तक पाकिस्तान को क्यों नहीं बताया? उनका मानना है कि यह मामला खुद पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI की ही साजिश हो सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, ISI उन ऑपरेटिव्स को ठिकाने लगाती है, जो अब उसके लिए खतरा बन जाते हैं। 2021 से, कई पूर्व पाकिस्तानी खुफिया अधिकारी और सेना से जुड़े लोग संदिग्ध परिस्थितियों में मारे गए हैं। हो सकता है कि कर्नल हबीब भी इस “क्लीनअप ऑपरेशन” का शिकार बने हों।

उन्होंने खुलासा करते हुए कहा कि 2010 में दो पूर्व ISI अधिकारी कर्नल इमाम (सुल्तान आमिर) और स्क्वाड्रन लीडर खालिद ख़्वाजा पाकिस्तान के कबायली इलाके से लापता हो गए थे और बाद में उनकी हत्या कर दी गई। वे कभी तालिबान के करीबी रहे थे और एक डॉक्यूमेंट्री बनाने गए थे, जब “अनजान लोगों” ने उनका अपहरण कर लिया। इस अपहरण के लिए शक की सुई तालिबान के साथ-साथ ISI पर भी गई थी​। वहीं, हाल ही में, 2024 में पूर्व ISI प्रमुख फ़ैज़ हमीद की गिरफ़्तारी ने दिखाया कि सेना और आईएसआई कैसे अपने लोगों पर भी शिकंजा कस सकती है। फैज को मिलिट्री रूल्स तोड़ने के मामले में हिरासत में लिया गया​ था।

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क्या पाकिस्तान अपनी ही खुफिया के खिलाफ जांच करेगा?

उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में सेना और खुफिया एजेंसी ISI के बीच कई मामलों में टकराव की खबरें आती रहती हैं। कई बार यह आरोप भी लगते रहे हैं कि ISI अपने पुराने एजेंट्स को ठिकाने लगा देती है, जो सरकार और सेना के लिए राजनीतिक रूप से खतरनाक साबित हो सकते हैं। वह कहते हैं कि क्वेटा में हुई कर्नल हबीब की हत्या इसी पैटर्न का हिस्सा लगती है। अगर इस हत्या के पीछे ISI का हाथ है, तो यह पाकिस्तान के लिए बड़ी बदनामी हो सकती है। कर्नल प्रभाकर के मुताबिक क्या पाकिस्तान इस हत्या की जांच करेगा? अगर वह जांच करता है तो क्या वह अपनी ही एजेंसी के खिलाफ जांच करने की हिमाकत दिखाएगा। क्योंकि अगर यह साबित होता है कि कर्नल हबीब पाकिस्तान में ही मौजूद थे और ISI ने ही उन्हें खत्म किया, तो पाकिस्तान सरकार की साख पर और दाग लग जाएगा। वह कहते हैं कि यह मामला पाकिस्तान के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है। क्योंकि अगर पाकिस्तान इस हत्या की निष्पक्ष जांच करता है, तो इसके तार ISI और सेना से जुड़ सकते हैं। अगर वह इस मामले को दबाने की कोशिश करता है, तो इसका मतलब होगा कि ISI अपने ही ऑपरेटिव्स को खत्म कर रही है और सरकार इससे अनजान नहीं है।

वहीं, यह घटना पाकिस्तान के लिए बेहद शर्मनाक साबित हो सकती है। अगर यह वही कर्नल हबीब हैं, जिन्हें पाकिस्तान ने भारत द्वारा अपहरण किया हुआ बताया था, तो यह साबित करता है कि पाकिस्तान ने अपने ही अधिकारी की कहानी को भारत के खिलाफ प्रोपेगेंडा के रूप में इस्तेमाल किया था।

LUH Vs H125M Helicopter: क्या भारतीय सेना की पसंद बनेगा HAL का लाइट यूटिलिटी हेलीकॉप्टर, या फ्रांस का H125M मार ले जाएगा बाजी? क्या होगा मेक इन इंडिया का?

LUH vs H125M Helicopter: Will HAL’s Light Utility Helicopter Be India’s Choice or Will France’s H125M Steal the Deal? What About Make in India?

LUH Vs H125M Helicopter: भारतीय सेना के हेलीकॉप्टर बेड़े में शामिल मौजूदा दशकों पुराने चेतक और चीता हेलीकॉप्टर काफी पुराने पड़ चुके हैं। सेना अपने एविएशन बेड़े को आधुनिक बनाने की कोशिशों में जुटी हुई है। एविएशन बेड़े को अपग्रेड करने की योजना के तहत भारतीय सेना को निगरानी और टोही मिशनों को अंजाम देने के लिए तकरीबन 400 नए हेलिकॉप्टरों की जरूरत है। ताकि भारतीय सेना के ऑपरेशन कैपेबिलिटी में सुधार किया जा सके। इसके लिए भारतीय सेना के सामने दो बड़े दावेदार हैं, पहला हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड का बनाया लाइट यूटिलिटी हेलीकॉप्टर (LUH) और दूसरा फ्रांसीसी एयरोस्पेस कंपनी एयरबस का बनाया H125M हेलीकॉप्टर। 28 फरवरी को इसी के सिलसिले में आर्मी हेडक्वॉर्टर में एक अहम बैठक होने वाली है, जिसमें बेहतर विकल्प पर अंतिम मुहर लगाई जा सकती है। बता दें कि सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी इन दिनों फ्रांस के दौरे पर हैं, जहां वे एयरबस के अधिकारियों से भी मिले हैं।

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LUH Vs H125M Helicopter: फ्रांस यात्रा पर हैं जनरल उपेंद्र द्विवेदी

सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी 24 से 27 फरवरी तक फ्रांस यात्रा पर हैं। यह यात्रा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पहले आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की समिट में हिस्सा लेने 10-12 फरवरी 2025 को फ्रांस गए थे। जहां वे फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों से भी मिले थे। इस दौरान फ्रांस को पिनाका हथियार बेचने और 36 मरीन राफेल के अलावा 3 स्कॉर्पीन पनडुब्बियों की खरीद को लेकर बातचीत हुई। हालांकि उस दौरान एयरबस H125M हेलीकॉप्टर डील को लेकर तो कोई बातचीत नहीं हुई, लेकिन संभावना जताई जा रही है कि एयरबस H125M हेलीकॉप्टर सेना के लिए बड़े विकल्प के तौर पर उभर सकता है।

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LUH Vs H125M: कौन होगा सेना की पहली पसंद?

हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के बनाए LUH को भारतीय सेना के लिए उपयुक्त माना जा रहा है, लेकिन कुछ हालिया हादसों ने इस प्रोजेक्ट के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। जनवरी 2025 में गुजरात में एक एडवांस्ड लाइट हेलीकॉप्टर (ALH) ध्रुव की दुर्घटना के बाद HAL के हेलीकॉप्टरों की सुरक्षा पर सवाल उठ गए। इस घटना के बाद 300 से अधिक ALH हेलीकॉप्टरों को अस्थायी रूप से ग्राउंड कर दिया गया था। LUH को सेना की जरूरतों के मुताबिक डिज़ाइन किया गया है और यह खास तौर पर से हाई एल्टीट्यूड इलाकों जैसे लद्दाख और सियाचिन में ऑपरेशन के लिए उपयुक्त माना जा रहा है।

वहीं, पिछले दिनो बेंगलुरु में आयोजित एयरो इंडिया 2025 में, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के LUH को डेमो फ्लाइट में तो शामिल किया गया, लेकिन चौंकाने वाली बात यह रही कि सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी और उत्तरी कमान प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल एम.वी. सुचिंद्र कुमार को सिंगल-इंजन हेलिकॉप्टर में सुरक्षा चिंताओं के चलते डेमो फ्लाइट में न उड़ने की सलाह दी गई थी। जबकि दूसरी तरफ, भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने LUH में उड़ान भरकर स्वदेशी हेलीकॉप्टर में अपना भरोसा जताया। उन्होंने फ्लाइट के एक्सपीरियंस और हेलीकॉप्टर की परफॉरमेंस पर भी संतोष व्यक्त किया।

LUH Vs H125M Helicopter: एयरो इंडिया में दोनों हुए शामिल

हालांकि हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के लिए चैलेंज बढ़ते जा रहे हैं। एयरो इंडिया 2024 के दौरान एयरफोर्स स्टेशन, येलहंका में सेना प्रमुख जनरल उपेन्द्र द्विवेदी ने जहां लाइट यूटिलिटी हेलीकॉप्टर (LUH) की क्षमताओं का जायजा लिया था, तो वे एयरबस H125 के पवेलियन में भी गए थे, जहां उन्होंने इस टोही हेलीकॉप्टर में काफी दिलचस्पी दिखाई थी। उस दौरान भारतीय सेना के आधिकारिक ट्विटर हेंडल ADGPI ने भी इस दौरे को लेकर ट्वीट किया था। जिसमें लिखा था, “एयरोइंडिया 2025: स्वदेशी विमानन क्षमताओं को मजबूत करना। जनरल उपेंद्र द्विवेदी सीओएएस को एयरो इंडिया 2025 के अपने दौरे के दौरान आज एयरफोर्स स्टेशन, येलहंका में लाइट यूटिलिटी हेलीकॉप्टर (LUH) और H125 टोही श्रेणी के हेलीकॉप्टरों के बारे में जानकारी दी गई। LUH एक अत्याधुनिक स्वदेशी बहु-भूमिका वाला हेलीकॉप्टर है जिसे हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) ने भारत की रोटरी-विंग क्षमताओं को बढ़ाने के लिए विकसित किया है। H125, टाटा और एयरबस के बीच एक संयुक्त उद्यम है जो एक टोही श्रेणी का हेलीकॉप्टर है जो आत्मनिर्भरभारत के दृष्टिकोण के अनुरूप है, जो रक्षा में भारत की आत्मनिर्भरता को मजबूत करता है।”

जनरल उपेंद्र द्विवेदी गए एयरबस फैसिलिटी

वहीं इसी महीने अपने फ्रांस दौरे के दौरान सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने फ्रांस स्थित एयरबस फैसिलिटी का भी दौरा किया, जहां उन्हें H125M हेलिकॉप्टर के बारे में जानकारी दी गई। H125M वही हेलिकॉप्टर है जिसे पहले Eurocopter AS550C3 Fennec के रूप में जाना जाता था, और यह भारतीय सेना के रैकी एंव सर्विलांस हेलिकॉप्टर (RSH) प्रोग्राम में एक प्रमुख दावेदार है। भारतीय सेना के आधिकारिक ट्विटर हेंडल ADGPI के ट्वीट में लिखा गया, “जनरल उपेंद्र द्विवेदी, सीओएएस ने मार्सिले में एयरबस फैसिलिटी का दौरा किया, जहां उन्हें अत्याधुनिक विमानन प्रौद्योगिकी, रक्षा प्रणालियों और एयरोस्पेस इंजीनियरिंग के बारे में जानकारी दी गई, जिसमें एयरबस ने अग्रणी भूमिका निभाई है। यह यात्रा ऑपरेशनल कैपेबिलिटीज को बढ़ाने और रक्षा तैयारियों को मजबूत करने के लिए ग्लोबल एयरोस्पेस इनोवेशंस का लाभ उठाने के लिए भारतीय सेना की प्रतिबद्धता को रेखांकित करती है, विशेष रूप से रोटरी विंग विमानन में।”

सेना के इस बयान से चौंके रक्षा विशेषज्ञ

सेना के इस बयान से कई रक्षा विशेषज्ञ चौंक गए। क्योंकि यह बयान ऐसे समय में आया जब LUH अपने फाइनल टेस्टिंग फेज में था। रक्षा मामलों के जानकार आदित्य कृष्ण मेनन कहते हैं, “भारतीय सेना और वायुसेना के लिए हल्के यूटिलिटी हेलीकॉप्टर (LUH) प्रोजेक्ट अब निर्णायक मोड़ पर है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के लिए जरूरी है कि वह LUH में मौजूद सभी खामियों को जल्द से जल्द दूर करे और एक स्पष्ट, व्यावहारिक समयसीमा तय करे ताकि भारतीय सेना और वायुसेना को इसकी तैनाती में कोई संदेह न रहे। सेना और वायुसेना को इस समय केवल अल्पकालिक समाधान के रूप में चार्टर्ड हेलीकॉप्टर सेवाओं या लीज पर लिए गए हेलीकॉप्टरों की जरूरत हो सकती है, लेकिन दीर्घकालिक रूप से विदेशी हेलीकॉप्टरों की खरीद एक सही रणनीति नहीं होगी। भारतीय डिफेंस पॉलिसी का फोकस “आत्मनिर्भर भारत” पर है, और LUH इस लक्ष्य की ओर एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।”

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HAL के सामने हैं कई चुनौतियां, विदेशी कंपनियों से कैसे करेगी मुकाबला

हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी विश्वसनीयता साबित करने की है। ALH ध्रुव हादसों के बाद सुरक्षा मानकों को लेकर सेना का भरोसा जीतना जरूरी है। LUH के ट्रायल में कुछ कंपनियों ने हल्के वाइब्रेशन (कंपन) की शिकायत की थी। HAL ने दावा किया है कि LUH में हल्के वाइब्रेशन जैसी छोटी-मोटी तकनीकी समस्याओं को हल कर लिया गया है और जल्द ही यह हेलीकॉप्टर ट्रायल्स में पास होकर सेना में शामिल होने के लिए तैयार हो सकता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या सेना और सरकार इसके बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए जल्द मंजूरी देगी या नहीं?

अगर LUH को सेना में जल्दी स्वीकृति नहीं मिलती है, तो इससे सेना के पुराने चेतक और चीता हेलीकॉप्टरों को बदलने की प्रक्रिया में देरी होगी। ये हेलीकॉप्टर पहले ही तकनीकी रूप से पुराने हो चुके हैं, इनके लिए स्पेयर पार्ट्स मिलना मुश्किल हो रहा है और इनकी उड़ान सुरक्षा को लेकर भी चिंता बनी हुई है।

टाटा के साथ मिल कर हेलीकॉप्टर बनाएगी एयरबस

इस बीच, विदेशी कंपनियां भी भारतीय सेना के हल्के हेलीकॉप्टरों की इस दौड़ में शामिल हो चुकी हैं। फ्रांसीसी एयरोस्पेस कंपनी एयरबस ने ने टाटा ग्रुप के साथ मिलकर भारत में H125 हेलीकॉप्टर के लिए फाइनल असेंबली लाइन (FAL) तैयार का एलान किया है। टाटा समूह की सहायक कंपनी टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड (टीएएसएल) एयरबस हेलीकॉप्टर्स के साथ मिलकर यह फैसिलिटी बना रही है। एफएएल भारत के लिए अपनी सिविल रेंज से एयरबस के सबसे अधिक बिकने वाले एच125 हेलीकॉप्टर का उत्पादन करेगा तथा कुछ पड़ोसी देशों को निर्यात करेगा। एच125 एक हल्का सिविल हेलीकॉप्टर है जो छह लोगों को ले जा सकता है।

रूसी हेलीकॉप्टर कामोव Ka-226T की वापसी?

एक अन्य महत्वपूर्ण घटनाक्रम में, रूस का कामोव Ka-226T हेलीकॉप्टर भारतीय सेना की सूची में दोबारा शामिल हो सकता है। 2015 में इस हेलीकॉप्टर को 200 यूनिट्स के लिए चुना गया था, लेकिन भारत-रूस जॉइंट प्रोडक्शन स्कीम पर सहमति नहीं बन पाई और यह प्रोजेक्ट ठंडे बस्ते में चला गया। हालांकि, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की हालिया मास्को यात्रा के बाद इस प्रोजेक्ट को फिर से शुरू करने की संभावनाएं जताई जा रही हैं।

भारतीय सेना को करीब 400 हल्के हेलीकॉप्टरों की जरूरत है, जिनमें से 187 LUH के लिए आरक्षित किए गए हैं, जबकि बाकी 200 हेलीकॉप्टर विदेशी सप्लायर्स के लिए ओपन टेंडर के तहत खरीदे जाएंगे। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या सेना Ka-226T को फिर से प्राथमिकता देती है या LUH को भारतीय सेना में जगह मिलती है।

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सेना की नई रणनीति: चार्टर्ड हेलीकॉप्टर सेवाओं पर जोर

LUH और अन्य विदेशी हेलीकॉप्टरों की देरी के चलते सेना को अपने ऑपरेशनल गैप को भरने के लिए वैकल्पिक रास्ते तलाशने पड़ रहे हैं। सेना की नॉर्दन कमान ने कुछ इलाकों में चार्टर्ड हेलीकॉप्टर सेवाएं शुरू कर दी हैं। यह फैसला सेना के भविष्य की प्रोक्योरमेंट पॉलिसीज को प्रभावित कर सकता है, क्योंकि इससे सरकार और सेना को फौरी तौर पर हेलीकॉप्टरों की कमी को पूरा करने में मदद मिल रही है।

सेना के लिए हेलीकॉप्टरों का महत्व

भारतीय सेना के हेलीकॉप्टर बेड़े का मॉर्डनाइजेशन केवल एक सामान्य प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह एक रणनीतिक जरूरत भी है। लद्दाख, सियाचिन, अरुणाचल प्रदेश और उत्तर सिक्किम जैसे ऊंचाई वाले इलाकों में सैन्य अभियानों के लिए हल्के हेलीकॉप्टरों चाहिए। वर्तमान में सेना के पास तीन प्रमुख एयर ब्रिगेड हैं— लेह, मिसामारी और जोधपुर। सेना के पास इस समय लगभग 190 चेतक, चीता और चीतल हेलीकॉप्टर, 145 ALH ध्रुव और 75 रुद्र (ALH-WSI) हेलीकॉप्टर हैं। लेकिन इनमें से अधिकांश पुराने हो चुके हैं और सेना को अत्याधुनिक, बेहतर परफॉरमेंस वाले हेलीकॉप्टरों की जरूरत है।

इसके अलावा, हेलीकॉप्टर आतंकवाद विरोधी अभियानों में भी अहम भूमिका निभाते हैं। विशेष रूप से जम्मू-कश्मीर और उत्तर-पूर्व के इलाकों में आतंकवाद रोधी अभियानों में हेलीकॉप्टर बेहद कारगर साबित होते हैं। इसके अलावा, आपदा राहत अभियानों, सैनिकों की तैनाती और चिकित्सा निकासी (Casualty Evacuation – CASEVAC) में भी इनका इस्तेमाल होता है।

क्या LUH बनेगा भारतीय सेना की पहली पसंद?

हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के लिए यह समय बेहद अहम है। सेना फरवरी के अंत में एक हाई लेवल मीटिंग करने जा रही है, जिसमें यह तय किया जाएगा कि LUH को कब तक और कितनी संख्या में सर्विस में शामिल किया जाएगा। यदि हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड सेना के वरिष्ठ अधिकारियों को संतुष्ट करने में सफल होता है, तो यह परियोजना पूरी तरह से भारतीय बन सकती है और देश की आत्मनिर्भरता नीति को और मजबूती मिलेगी।

LUH क्यों है भारत के लिए अहम?

विशेषज्ञों के मुताबिक, LUH का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसे विशेष रूप से भारतीय सेना की जरूरतों के हिसाब से डिजाइन किया गया है। यह हेलीकॉप्टर 6,000 मीटर से अधिक ऊंचाई पर भी प्रभावी तरीके से काम कर सकता है, जो लद्दाख, सियाचिन और अरुणाचल प्रदेश जैसे इलाकों के लिए जरूरी है। इसके अलावा, इसका हल्का फ्रेम और शक्तिशाली शक्ति-1यू इंजन दुर्गम इलाकों में आसानी से उड़ान भर सकता है। लेकिन अगर अंतरराष्ट्रीय निर्माताओं का प्रभाव बढ़ता गया और HAL ने ट्रायल्स जल्द पूरा नहीं किए, तो सेना H125 जैसे विदेशी विकल्पों की ओर बढ़ सकती है। वहीं, विदेशी हेलीकॉप्टरों की खरीद से भारत का आत्मनिर्भरता अभियान कमजोर हो सकता है। विदेशी हेलीकॉप्टरों की मेंटेनेंस, स्पेयर पार्ट्स और अपग्रेड्स पूरी तरह से बाहरी सप्लायर्स पर निर्भर रहते हैं, जबकि LUH के साथ ऐसी समस्या नहीं होगी।

AMCA Mk2 के लिए बड़ी खबर! GE और GTRE मिलकर बनाएंगे भारत का सुपरफाइटर इंजन, चीन-पाकिस्तान के छूटेंगे पसीने

Indian AMCA Fighter Jet: Adani Defence and MTAR Technologies join hands to bid for Rs 15,000 crore AMCA project amid intense competition

AMCA Mk2: एयरो इंडिया 2025 में अमेरिका की GE एयरोस्पेस ने भारत के गैस टर्बाइन रिसर्च एस्टैब्लिशमेंट (GTRE) के साथ साझेदारी की इच्छा जाहिर की है। इस साझेदारी का उद्देश्य भारत के एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) Mk2 के लिए एक अधिक पावरफुल इंजन डेवलप करना है। GE पहले ही AMCA Mk1 के लिए F414-GE-INS6 इंजन की सप्लाई कर रही है, लेकिन Mk2 के लिए इससे भी ज्यादा पावरफुल इंजन की जरूरत होगी।

Big Boost for AMCA Mk2! GE & GTRE to Develop India’s Superfighter Engine, A Gamechanger for Defence
AMCA Representative Image

GE का मौजूदा F414 इंजन देता है 98 kN का थ्रस्ट

GE ने पहले ही भारत को F414-GE-INS6 इंजन की सप्लाई के लिए एक समझौता किया है। यह इंजन 98 किलो न्यूटन (kN) का थ्रस्ट जेनरेट कर सकता है और इसे खासतौर पर AMCA Mk1 के लिए डिज़ाइन किया गया है। यह इंजन पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान की कई जरूरतों जैसे स्टील्थ टेक्नोलॉजी, सुपरसोनिक क्रूज क्षमता (बिना आफ्टरबर्नर के) और एडवांस इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम को पूरा करता है।

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GE पहले ही भारतीय वायुसेना के लिए तेजस Mk2 के लिए 99 F414 इंजन की सप्लाई कर रही है, जिसका सौदा 2023 में 716 मिलियन डॉलर में हुआ था। इस सौदे के तहत 80 फीसदी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के साथ जॉइंट मैन्युफैक्चरिंग शामिल है।

AMCA Mk2 के लिए क्यों जरूरी है नया इंजन?

GE एयरोस्पेस के एक अधिकारी के मुताबिक, यह इंजन शुरुआती 40 AMCA Mk1 फाइटर्स के लिए पूरी तरह उपयुक्त है। हालांकि, GE ने यह भी स्वीकार किया कि AMCA Mk2 और आगे के वर्जन को अधिक दमदार इंजन की जरूरत होगी। GE एयरोस्पेस अब GTRE के साथ मिलकर एक नया इंजन बनाने की योजना बना रहा है, जो AMCA Mk2 की जरूरतों को पूरा करेगा।

AMCA Mk2 में ऐसे फीचर्स होंगे, जो इसे पांचवीं पीढ़ी से आगे का फाइटर जेट बनाने में मदद करेंगे। GE के अधिकारियों का कहना है कि नए इंजन में मौजूदा इंजन की तुलना में अधिक थ्रस्ट होगा और यह तकनीकी रूप से अधिक एडवांस होगा।

नए इंजन में 110 kN से ज्यादा थ्रस्ट

GE और GTRE के बीच संभावित साझेदारी से AMCA Mk2 के लिए एक पूरी तरह से नया कोर डिजाइन किया जाएगा। यह नया इंजन 110 kN से अधिक का थ्रस्ट पैदा कर सकेगा। बल्कि इसमें नई टेक्नोलॉजी भी शामिल होगी, जिससे इसकी कार्यक्षमता और भी बेहतर होगी। GE के अनुसार, यह नया इंजन AMCA Mk2 की जरूरतों को पूरा करने के लिए डिज़ाइन किया जाएगा, जबकि इसे मौजूदा एयरक्राफ्ट डिज़ाइन में कम से कम बदलाव के साथ फिट किया जाएगा। इस रणनीति का उद्देश्य डेवलपमेंट कॉस्ट को कंट्रोल करना और समय-सीमा को बनाए रखना है।

HAL HLFT-42: भारतीय वायुसेना का यह नया सुपरफाइटर न केवल पायलट्स को देगा ट्रेनिंग, बल्कि जरूरत पड़ने पर दुश्मन पर बरसाएगा बम!

GE अधिकारी ने यह भी स्पष्ट किया कि इस संभावित इंजन के मूल डिजाइन (core design) को पूरी तरह नया रूप दिया जाएगा, जिससे यह भविष्य में भी अपग्रेड हो सके। इसका मतलब यह है कि इस इंजन का इस्तेमाल न केवल AMCA Mk2 में, बल्कि आने वाले फाइटर जेट्स के लिए भी किया जा सकता है।

उठा बौद्धिक संपदा (IP) का मुद्दा

GE और GTRE के बीच इस साझेदारी को लेकर बौद्धिक संपदा (Intellectual Property-IP) का सवाल भी उठ रहा है। GE के अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि अगर यह नया इंजन डेवलप होता है, तो इसके IP अधिकार साझा किए जाएंगे। इसका मतलब यह होगा कि दोनों पक्षों के टेक्निकल कंट्रिब्यूशंस को मान्यता दी जाएगी और GE या GTRE में से कोई भी इसे पूरी तरह से कंट्रोल नहीं करेगा।

2028 तक आएगा AMCA Mk1!

AMCA Mk1 को भारत का सबसे उन्नत स्वदेशी लड़ाकू विमान माना जा रहा है। इसे 2028 तक पेश किए जाने की संभावना है और इसका बड़े पैमाने पर उत्पादन 2030 के दशक के मध्य तक शुरू हो सकता है। यह भारत के मेक इन इंडिया रक्षा कार्यक्रम के तहत एक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट है, और अगर GE-GTRE साझेदारी सफल होती है, तो भारत की स्वदेशी रक्षा उत्पादन क्षमता को बहुत बड़ा बढ़ावा मिलेगा।

HAL HLFT-42: भारतीय वायुसेना का यह नया सुपरफाइटर न केवल पायलट्स को देगा ट्रेनिंग, बल्कि जरूरत पड़ने पर दुश्मन पर बरसाएगा बम!

HAL HLFT-42: IAF Next-Gen Fighter Trainer with Combat-Ready Capabilities!

HAL HLFT-42: हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) अपने Hindustan Lead-in Fighter Trainer (HLFT-42) के डिजाइन में महत्वपूर्ण बदलाव कर रहा है। यह बदलाव भारतीय वायुसेना (IAF) के सुझावों और जरूरतों के आधार पर किए जा रहे हैं, जिससे यह विमान केवल एक ट्रेनर नहीं बल्कि एक मल्टीरोल फाइटर जेट की भूमिका भी निभा सकता है।

HAL HLFT-42: IAF Next-Gen Fighter Trainer with Combat-Ready Capabilities!

HAL HLFT-42: सिर्फ ट्रेनर नहीं, अब जंग में भी कारगर

HAL ने Aero India 2023 में पहली बार HLFT-42 का मॉडल पेश किया था, जिसे वायुसेना के लिए एक एडवांस सुपरसोनिक ट्रेनर के रूप में डिजाइन किया गया था। हालांकि, Aero India 2025 में इस विमान की गैरमौजूदगी ने कई सवाल खड़े किए। अब HAL अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि इस दौरान IAF की जरूरतों के अनुसार डिजाइन में बड़े बदलाव किए जा रहे थे।

भारतीय वायुसेना की मांग के अनुसार, HLFT-42 को अब एक हल्के लड़ाकू विमान (Light Combat Aircraft) और अनमेंड एरियल सिस्टम्स (UAS) के लिए एक कमांड सेंटर के रूप में भी डेवलप किया जा रहा है। HAL ने विमान के एरोडायनामिक्स, स्ट्रक्चरल स्ट्रेंग्थेनिंग, एवियोनिक्स और वेपन सिस्टम में सुधार करने पर फोकस किया है। इसके लिए विंड टनल टेस्टिंग और सिमुलेशन किए जा रहे हैं ताकि विमान ट्रेनिंग और युद्ध दोनों हालात में बेहतरीन प्रदर्शन कर सके।

IAF की ट्रेनिंग में HAL HLFT-42 की भूमिका

भारतीय वायुसेना पायलट ट्रेनिंग सिस्टम को आधुनिक बनाने की प्रक्रिया में है। HJT-16 किरण विमानों की जगह अब Intermediate Jet Trainer (IJT-36 “Yashas”) को लाने की योजना बनाई गई है, जो स्टेज- II ट्रेनिंग के लिए होगा। जबकि स्टेज-III ट्रेनिंग के लिए फिलहाल Hawk-132 Advanced Jet Trainer (AJT) का उपयोग किया जा रहा है, लेकिन इसे HLFT-42 से बदलने की योजना बन रही है।

HLFT-42 को Hawk-132 से ज्यादा एडवांस सिस्टम के साथ डेवलप किया जा रहा है। इसमें सेंसर, रडार और एडवांस कॉम्बैट सिस्टम शामिल होंगे, जिससे यह विमान भविष्य के लड़ाकू विमानों के लिए पायलटों को बेहतर तरीके से तैयार कर सके।

HAL HLFT-42: IAF Next-Gen Fighter Trainer with Combat-Ready Capabilities!

HLFT-42: जंग में भी हो सकता है तैनात

भारतीय वायुसेना HLFT-42 को केवल एक ट्रेनर तौर पर ही नहीं, बल्कि युद्धक भूमिका में भी देख रही है। HAL ने इसे डुअल-रोल एयरक्राफ्ट के रूप में डिजाइन किया है, जो शांतिपूर्ण समय में ट्रेनिंग जेट और युद्धकाल में लड़ाकू विमान के रूप में काम कर सके। इस तरह, HLFT-42 भारतीय वायुसेना के लिए काफी उपयोगी साबित हो सकता है।

इस विमान को ASRAAM (Advanced Short Range Air-to-Air Missile) और ASTRA जैसी लंबी दूरी की मिसाइलों से लैस करने की योजना है। इससे यह न केवल एक ट्रेनिंग प्लेटफॉर्म रहेगा, बल्कि जरूरत पड़ने पर अग्रिम मोर्चे पर लड़ने में सक्षम होगा।

CATS Warrior: क्या HLFT-42 बनेगा मानव-रहित विमानों का ‘मदरशिप’?

HAL इस विमान को सिर्फ एक ट्रेनर या हल्के लड़ाकू विमान तक सीमित नहीं रखना चाहता। HLFT-42 को ‘Combat Air Teaming System (CATS) Warrior’ का मॉथरशिप बनाने की योजना पर भी काम चल रहा है।

Explainer: क्या है भारत का नया CATS Warrior ड्रोन? एरो इंडिया 2025 में हुई धमाकेदार एंट्री, जमकर हो रही चर्चा

CATS Warrior एक लॉयल विंगमैन (Loyal Wingman) मानव रहित लड़ाकू हवाई वाहन (UCAV) है, जिसे HAL और NewSpace Research & Technologies मिलकर डेवलप कर रहे हैं। यह ड्रोन मानवरहित होते हुए भी मैंड विमानों के साथ मिलकर लड़ाई लड़ने की क्षमता रखता है। पहले, Tejas Mk1A को CATS Warrior का मॉथरशिप बनाने की योजना थी, लेकिन अब HLFT-42 को इस भूमिका के लिए एक बेहतर विकल्प माना जा रहा है।

यह कॉन्सेप्ट Manned-Unmanned Teaming (MUM-T) के बढ़ते वैश्विक ट्रेंड के अनुरूप है, जिसमें मानव चालित और मानव रहित विमानों को बेहतर युद्धक तालमेल और मिशन दक्षता के लिए एकीकृत किया जाता है। HAL अब HLFT-42 के संचार प्रणालियों, सेंसर सूट और सॉफ्टवेयर को अपडेट कर रहा है ताकि यह CATS Warrior के साथ आसानी से काम कर सके और आवश्यकतानुसार अपनी भूमिका बदल सके।

HAL HLFT-42: IAF Next-Gen Fighter Trainer with Combat-Ready Capabilities!

इंजन चुनना बड़ी चुनौती, कब होगी तैनाती?

हालांकि HLFT-42 के कई तकनीकी सुधार किए जा रहे हैं, लेकिन एक बड़ा सवाल अभी भी बना हुआ है – इसका इंजन कौन सा होगा?

इस विमान के लिए GE F414 या स्वदेशी Kaveri इंजन पर विचार किया जा रहा है। चुना गया इंजन HLFT-42 को सुपरसोनिक प्रदर्शन और लड़ाकू अभियानों के लिए जरूरी पावर प्रदान करने में सक्षम होना चाहिए।

विशेषज्ञों का मानना है कि इंजन विकास में देरी इस विमान की ऑपरेशनल तैनाती को 2030 के शुरुआती वर्षों तक टाल सकती है। भारत के कई एयरोस्पेस प्रोजेक्ट्स में इंजन एक प्रमुख चुनौती रहा है, और HLFT-42 भी इससे अछूता नहीं है।

HAL और IAF के लिए बड़ा मौका

HLFT-42 का नया डिज़ाइन और उसका एडवांस वर्जन भारतीय वायुसेना को न केवल एक बेहतर ट्रेनिंग प्लेटफॉर्म देगा, बल्कि जरूरत पड़ने पर एक हल्के लड़ाकू विमान के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकेगा।

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इसके अलावा, CATS Warrior जैसी भविष्य की क्षमताओं को जोड़कर HAL इसे भारत की डिफेंस इंडस्ट्री के लिए एक बड़ी छलांग बना सकता है। अगर यह विमान अपने तय समय पर सफलतापूर्वक विकसित होता है, तो यह भारतीय वायुसेना के लिए न केवल एक किफायती समाधान होगा, बल्कि भारत के एयरोस्पेस क्षेत्र को नई ऊंचाइयों पर ले जाने में मदद करेगा।

क्या HLFT-42 बनेगा भारत का अगला बड़ा डिफेंस एक्सपोर्ट प्रोजेक्ट

यदि HLFT-42 अपने ट्रेनिंग और लड़ाकू दोनों रूपों में सफल रहता है, तो इसे विदेशी बाजारों में भी बेचा जा सकता है। कई देशों को ऐसे कम लागत, बहुउद्देश्यीय ट्रेनिंग और हल्के लड़ाकू विमानों की जरूरत है, और HLFT-42 इस कैटेगरी में फिट बैठ सकता है।

HAL के पास इस प्रोजेक्ट को वैश्विक बाजार में ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा निर्यात के तहत आगे ले जाने का बड़ा अवसर है। लेकिन यह सब इस पर निर्भर करेगा कि इसे समय पर कैसे विकसित किया जाता है और भारतीय वायुसेना इसे कितना अपनाती है।

अब सबकी नजरें HAL और भारतीय वायुसेना पर हैं कि HLFT-42 को कब अंतिम रूप दिया जाएगा और इसकी पहली उड़ान कब होगी। अगले कुछ सालों में इस विमान की सफलता यह तय करेगी कि यह सिर्फ एक ट्रेनर विमान रहेगा या भारत की वायुशक्ति का एक अहम हिस्सा बनेगा।

Taliban-India Relations: क्या अफगानिस्तान में फिर से खुलेगा भारतीय दूतावास? तालिबान संग रिश्ते सुधारने की कूटनीतिक कोशिश या मजबूरी?

Taliban-India Relations: Diplomatic Reset or Strategic Compulsion?
India's foreign secretary Vikram Misri meets acting Afghan foreign minister Mawlawi Amir Khan Muttaqi in Dubai, marking the first public meeting between a top Indian official and a Taliban representative

Taliban-India Relations: 8 जनवरी 2025 को संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के दुबई में जब विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने तालिबान सरकार के कार्यवाहक विदेश मंत्री मौलवी अमीर खान मुत्ताकी से मुलाकात हुई थी, तभी लगने लगा था कि अफगानिस्तान और भारत के बीच कुछ चल रहा है। हालांकि इस मुलाकात के दौरान दोनों पक्षों ने व्यापार, मानवीय सहायता और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा की। लेकिन इसके पीछे की कहानी जो सामने आ रही है, वह यह है कि दोनों देश अपने कूटनीतिक संबंधों को फिर से बहाल करने की तैयारी में हैं।

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Taliban-India Relations: भारत जल्द अफगानिस्तान भेज सकता है राजनयिक और अधिकारी

सूत्रों के मुताबिक अफगानिस्तान में भारत के राजनयिक संबंधों को फिर से बहाल करने की योजना पर तेजी से काम हो रहा है। सूत्रों के अनुसार, भारत जल्द ही “दर्जनों राजनयिक और अधिकारी” अफगानिस्तान भेज सकता है ताकि वहां भारतीय दूतावास और वाणिज्य दूतावास को फिर से पूरी तरह से शुरू किया जा सके। इस योजना के तहत, तालिबान ने इन अधिकारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की गारंटी दी है। इसके अलावा, नई दिल्ली में अफगान दूतावास को तालिबान के कंट्रोल में सौंपने की प्रक्रिया भी लगभग तय मानी जा रही है।

Taliban-India Relations: इन नामों पर चल रहा है विचार

विदेश मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि मिस्री और मुत्ताकी की बैठक के दौरान तालिबान ने नई दिल्ली में अपने दो संभावित राजनयिकों की एक लिस्ट भारत को सौंपी थी, जिसमें नजीब शहीन का नाम सबसे ऊपर है। नजीब शहीन, तालिबान के कतर स्थित प्रवक्ता सुहैल शहीन के बेटे हैं, जो तालिबान की कूटनीतिक पहल का एक प्रमुख चेहरा हैं। सुहैल शहीन, जो धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलते और लिखते हैं, 1990 के दशक में काबुल टाइम्स के संपादक भी रह चुके हैं। वहीं, 30 वर्षीय राजनयिक नजीब शहीन के अलावा अफगान विदेश मंत्रालय में कार्यरत शौकत अहमदजई का नाम भी इस पद के लिए विचार किया जा रहा है।

सूत्रों के अनुसार, भारत सरकार इस प्रतिनिधि को औपचारिक रूप से राजनयिक मान्यता नहीं देगी लेकिन वह भारत में तालिबान सरकार के शीर्ष प्रतिनिधि के रूप में कार्य करेगा। इस नियुक्ति के बावजूद, तालिबान को अपने झंडे को दूतावास, आधिकारिक कार्यक्रमों या वाहनों पर लगाने की अनुमति नहीं होगी।

Taliban-India Relations: अंतिम चरण में है प्रक्रिया

विदेश मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि नई दिल्ली में अफगान दूतावास को तालिबान के कंट्रोल में सौंपे जाने की प्रक्रिया भी लगभग अंतिम चरण में है। तालिबान सरकार और भारतीय अधिकारियों के बीच इस मुद्दे को लेकर कई दौर की बातचीत हो चुकी है। 24 नवंबर 2023 को, नई दिल्ली स्थित अफगान दूतावास ने स्थायी रूप से अपना कामकाज बंद करने का एलान किया था। अपने बयान में दूतावास ने कहा था, “अफगान गणराज्य के राजनयिकों ने इस मिशन को पूरी तरह से भारतीय सरकार के हवाले कर दिया है। अब यह पूरी तरह से भारतीय सरकार पर निर्भर करता है कि वह इस मिशन के भविष्य को कैसे तय करती है।”

इकरामुद्दीन कामिल को बनाया था कार्यवाहक काउंसल

हालांकि मिस्री औऱ मुत्ताकी की बैठक से पहले ही भारत ने मुंबई स्थित अफगानिस्तान के वाणिज्य दूतावास में एक नए महावाणिज्य दूत की नियुक्ति को मंजूरी दी थी। सूत्रों ने बताया कि पिछले साल नवंबर में, तालिबान ने मुंबई स्थित अफगान वाणिज्य दूतावास में भारत में रह रहे एक अफगान नागरिक, इकरामुद्दीन कामिल को कार्यवाहक काउंसल नियुक्त किया था। यह भारत में तालिबान सरकार की तरफ से की गई पहली आधिकारिक नियुक्ति थी। कामिल ने इस्लामाबाद की इस्लामिक यूनिवर्सिटी में कानून की पढ़ाई की थी, इसके बाद उन्होंने नई दिल्ली स्थित साउथ एशियन यूनिवर्सिटी से शिक्षा प्राप्त की, जिसे दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) के तहत स्थापित किया गया था।

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Taliban-India Relations: अभी तक नहीं आया कोई आधिकारिक बयान

सूत्रों का कहना है कि अफगान दूतावास को तालिबान के कंट्रोल में सौंपे जाने को लेकर भारत सरकार और तालिबान की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। अगर भारत तालिबान की तरफ से प्रस्तावित किसी नाम पर मुहर लगाता है, तो यह संकेत हो सकता है कि भारत धीरे-धीरे तालिबान सरकार के साथ अपने संबंध सामान्य करने की ओर बढ़ रहा है। वहीं, भारतीय अधिकारी तालिबान द्वारा नामित किसी भी राजनयिक को मंजूरी देने को लेकर सतर्कता बरत रहे हैं। सूत्रों का कहना है कि भारत के लिए एक संभावित विकल्प यह हो सकता है कि वह पहले काबुल में अपना दूतावास को फिर से खोलने की पेशकश करे और उसके बाद ही तालिबान की इस मांग पर विचार करे।

बता दें कि भारत ने अगस्त 2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद काबुल में अपना दूतावास बंद कर दिया था और तब से उसने अपनी मौजूदगी को ‘टेक्निकल टीम’ तक सीमित रखा है। हालांकि, पिछले तीन सालों में भारत लगातार तालिबान के प्रतिनिधियों से मुलाकात करता रहा है। नवंबर 2024 में, पाकिस्तान-ईरान और अफगानिस्तान मामलों के संयुक्त सचिव जेपी सिंह ने काबुल का दौरा किया था और वहां तालिबान के रक्षा मंत्री मौलवी मोहम्मद याकूब मुजाहिद से मुलाकात की थी।

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तालिबान से सीधी नजदीकी नहीं दिखाना चाहता भारत

भारत अभी तक तालिबान को मान्यता देने से झिझक रहा है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय अब भी तालिबान सरकार को लेकर आशंकित है। अमेरिका, यूरोप और कई अन्य देशों ने अभी तक तालिबान सरकार को मान्यता नहीं दी है। इसकी प्रमुख वजहें तालिबान द्वारा महिलाओं के अधिकारों पर लगाए गए प्रतिबंध और लोकतांत्रिक सरकार न होने को लेकर अंतरराष्ट्रीय चिंताएं हैं। जिसके चलते भारत अब तक आधिकारिक रूप से तालिबान सरकार को मान्यता देने से बचता रहा है। लेकिन अफगानिस्तान में दूतावास को फिर से खोलने की योजना भारत की बदलती विदेश नीति की ओर इशारा कर रही है। भारत के लिए यह समझौता एक कूटनीतिक संतुलन साधने जैसा है। वह तालिबान से सीधी नजदीकी नहीं दिखाना चाहता, लेकिन क्षेत्रीय राजनीति में अपनी स्थिति बनाए रखने के लिए उसे अफगानिस्तान में अपनी उपस्थिति दर्ज करानी होगी।

तालिबान से दोबारा संपर्क क्यों बढ़ा रहा है भारत?

अब सवाल यह उठता है कि भारत तालिबान से दोबारा संपर्क क्यों बढ़ा रहा है। इसकी प्रमुख वजह क्षेत्रीय राजनीति है। रूस और मध्य एशियाई देशों की बदलती रणनीति भी भारत के इस फैसले को प्रभावित कर रही है। रूस अब अफगानिस्तान के साथ व्यापारिक और सैन्य सहयोग बढ़ा रहा है। ईरान भी तालिबान सरकार के साथ अपने संबंध सुधारने की दिशा में कदम बढ़ा चुका है। इसके अलावा पिछले साल, चीन ने तालिबान सरकार को आधिकारिक रूप से राजनयिक मान्यता दी थी, जिससे वह ऐसा करने वाला पहला देश बन गया था। वहीं, अफगानिस्तान में चीन और पाकिस्तान का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। चीन पहले ही अफगानिस्तान में खनिज संपत्तियों और इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट में निवेश कर रहा है। पाकिस्तान की तालिबान सरकार के साथ मजबूत कूटनीतिक और व्यापारिक संबंध बने हुए हैं। तालिबान सरकार अब वाखान कॉरिडोर के जरिए चीन से जुड़ने के लिए एक सड़क बनाने की योजना बना रही है। यह सड़क चीन को सीधे मध्य एशिया और मध्य पूर्व तक पहुंच प्रदान करेगी, जिससे बीजिंग इस खनिज संपन्न क्षेत्र में अपना आर्थिक प्रभाव बढ़ा सकेगा। इसके अलावा, चीनी कंपनियां तालिबान शासन के बाद भी अफगानिस्तान में खनन और बुनियादी ढांचे के विकास में निवेश कर रही हैं।

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तालिबान से संपर्क बनाए रखे भारत!

जिसके चलते भारत को डर है कि अगर वह अफगानिस्तान में निष्क्रिय रहा, तो उसका प्रभाव क्षेत्रीय राजनीति में कम हो सकता है। ऐसे में भारत के लिए यह जरूरी हो गया है कि वह अफगानिस्तान में अपनी भूमिका को फिर से मजबूत करे। भारत हमेशा से अफगानिस्तान में स्थिरता और विकास को प्राथमिकता देता रहा है, अब इस समझौते के ज़रिए वहां अपने प्रभाव को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। अफगानिस्तान मामलों के जानकार अज़ीज़ रफीई के अनुसार, “भारत के पास तालिबान से जुड़ने के अलावा कोई और व्यावहारिक विकल्प नहीं बचा है। भारत को कूटनीतिक रूप से तालिबान से संपर्क बनाए रखना चाहिए, अन्यथा यह क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में पिछड़ सकता है।”

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भारत ने जम कर की है अफगानिस्तान की मदद

ऐसा नहीं है कि भारत ने तालिबान के साथ संबंध बना कर नहीं रखे हैं। बल्कि पिछले कुछ सालों से भारत की अफगानिस्तान नीति मानवीय सहायता और अफगान जनता के कल्याण पर फोकस रही है। भारत ने अफगानिस्तान में लंबे समय तक अपनी मजबूत उपस्थिति बनाए रखी थी, विशेष रूप से 2001 से 2021 के बीच। इस दौरान भारत ने अफगानिस्तान में अरबों डॉलर का निवेश किया, जिसमें सड़कों, स्कूलों, बांधों और संसद भवन का निर्माण शामिल था। लेकिन तालिबान के दोबारा सत्ता में आने के बाद यह सब बदल गया। 2021 के बाद से, भारत ने 50,000 मीट्रिक टन गेहूं, 300 टन दवाइयां और 27 टन भूकंप राहत सामग्री भेजी है। इसके अलावा, भारत ने अफगानिस्तान को कोविड-19 वैक्सीन और अन्य चिकित्सा मदद भी प्रदान की है।

भारत की अफगान नीति में दूरदृष्टि और स्पष्टता की कमी

रिटायर्ड सेना अधिकारी और रक्षा विश्लेषक ब्रिगेडियर वी महालिंगम कहते हैं, यह कहना गलत नहीं होगा कि भारत की अफगान नीति में दूरदृष्टि और स्पष्टता की कमी है। 2021 में जब तालिबान ने अफगानिस्तान पर कब्जा किया, तो भारत ने उसके साथ अपने राजनयिक संबंध समाप्त कर लिए थे। क्या आज उस फैसले निर्णय के पीछे का तर्क बदल गया है? तालिबान का वही कट्टरपंथी शासन, जो महिलाओं के अधिकारों को कुचल रहा है, धार्मिक अल्पसंख्यकों को हाशिए पर धकेल रहा है और एक समावेशी सरकार बनाने से इनकार कर रहा है, क्या अब यह किसी भी तरह से भारत के लिए स्वीकार्य हो गया है?

वह आगे कहते हैं, भारत चीन को रोकने के लिए नई दिल्ली में तालिबान के एक राजदूत स्तर के प्रतिनिधि को मान्यता देने की योजना बना रहा है। लेकिन क्या मात्र एक राजनयिक की नियुक्ति से चीन के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला किया जा सकता है? क्या यह रणनीतिक रूप से तार्किक कदम है? चीन अफगानिस्तान में पहले से ही बड़े स्तर पर निवेश कर रहा है, बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के तहत उसने अफगानिस्तान को अपने आर्थिक मॉडल में शामिल कर लिया है और पाकिस्तान के साथ मिलकर अपनी पकड़ को और मजबूत कर रहा है। क्या भारत को लगता है कि सिर्फ तालिबान के एक प्रतिनिधि को नई दिल्ली में स्वीकार करके चीन के प्रभाव को कम किया जा सकता है?

भारत का असली हित तालिबान सरकार में नहीं, बल्कि अफगान जनता में है

वह कहते हैं, सवाल यह उठता है कि अगर भारत तालिबान को आधिकारिक राजनयिक दर्जा नहीं दे रहा है, तो फिर इस आधे-अधूरे कूटनीतिक समझौते का क्या उद्देश्य है? ब्रिगेडियर वी महालिंगम के मुताबिक उन्हें यह कूटनीति के नाम पर एक गंभीर खेल जैसा प्रतीत हो रहा है। वह कहते हैं कि आज चीन दुनिया की एक प्रमुख आर्थिक और सैन्य शक्ति है। वह वैश्विक व्यापार और विनिर्माण का एक प्रमुख केंद्र बन चुका है। अमेरिका समेत पूरी दुनिया इस तथ्य को स्वीकार कर चुकी है कि चीन एक मल्टीपोलर वर्ल्ड में एक अहम भूमिका निभाने जा रहा है। ऐसे में भारत को अपनी चीन नीति को व्यावहारिक बनाना होगा। हमें चीन को लेकर किसी भ्रम में नहीं रहना चाहिए। भारत के राष्ट्रीय हित सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण हैं। लेकिन भारत को अपनी अफगान नीति को चीन के साथ जोड़ने की गलती नहीं करनी चाहिए। अफगानिस्तान में तालिबान सरकार अपनी कट्टरपंथी नीतियों के कारण लंबे समय तक नहीं टिकी रह सकती। तालिबान का शासन एक खास विचारधारा पर आधारित है, जो सिर्फ सुन्नी, हनफ़ी और देवबंदी समुदायों को तरजीह देता है, जबकि दूसरों को हाशिए पर रखता है। भारत के लिए असली हित तालिबान सरकार में नहीं, बल्कि अफगान जनता में है।

‘जिहाद’ छेड़ने वालों को जगह देना, संकट को न्योता देने जैसा

ब्रिगेडियर महालिंगम के मुताबिक नई दिल्ली में ऐसे लोगों को जगह देना, जो आतंकवादी संगठनों से जुड़े हो सकते हैं और जिनका दीर्घकालिक लक्ष्य दुनिया भर में शरिया कानून लागू करने के लिए ‘जिहाद’ छेड़ना है, अपने ही देश में संकट को न्योता देना है। इतिहास गवाह है कि तालिबान अपनी नीतियों और लक्ष्यों में कभी बदलाव नहीं करता। क्या उन्होंने कभी अपने कट्टरपंथी विचारों को बदला है? क्या उन्होंने कभी आतंकी संगठनों को समर्थन देना बंद किया है? क्या उन्होंने महिलाओं को स्वतंत्रता दी है? उत्तर हमेशा ‘नहीं’ ही रहेगा।

प्रॉक्सी युद्ध लड़ने की गलती नहीं करे भारत

ब्रिगेडियर महालिंगम आगे कहते हैं, भारत को कभी भी आतंकवादी समूहों का उपयोग करके प्रॉक्सी युद्ध लड़ने की गलती नहीं करनी चाहिए। अमेरिका इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। अफगानिस्तान में अमेरिका ने चरमपंथी गुटों को हथियार और समर्थन दिया, लेकिन बाद में वही गुट अमेरिका के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बन गए। अमेरिका की आंतरिक और बाहरी राजनीति, उसकी अर्थव्यवस्था, और उसकी सुरक्षा चुनौतियां आज इसी रणनीति के नतीजे हैं। भारत को इस रास्ते पर नहीं चलना चाहिए। भारत को अपनी अफगान नीति को स्पष्ट, व्यावहारिक और दीर्घकालिक दृष्टि से तय करना चाहिए। तालिबान को राजनीतिक वैधता देने की कोई भी गलती हमारे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर परिणाम ला सकती है। भारत को तालिबान के साथ जुड़ने के बजाय, अफगान जनता के हितों को प्राथमिकता देनी चाहिए और अपने कूटनीतिक कदम बहुत सोच-समझकर उठाने चाहिए।

China Radar: भारत के मिसाइल कार्यक्रम पर नजर रखने के लिए चीन ने लगाया पावरफुल रडार, 5,000 किलोमीटर तक है रेंज

China Radar: Powerful Surveillance System to Track India's Missile Program with 5,000 km Range

China Radar: चीन ने हाल ही में म्यांमार के नजदीक अपने युन्नान प्रांत में एक नया रडार स्टेशन स्थापित किया है। चीन ने यह नया ‘लार्ज फेज्ड अर्रे रडार’ (LPAR) सिस्टम भारत के बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम पर नजर रखेगा। चीन इस रडार की मदद से बैलिस्टिक मिसाइलों की ट्रायल्स को ट्रैक करने में मदद करेगा। इस रडार की रेंज लगभग 5,000 किलोमीटर तक बताई जा रही है। इस रडार की मदद से चीन न केवल भारतीय महासागर क्षेत्र (IOR) बल्कि भारत के कई हिस्सों तक अपनी पहुंच बना सकता है।

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China Radar: कैसे काम करता है यह रडार और भारत के लिए क्यों है चिंता की बात?

युन्नान प्रांत में स्थित यह लार्ज फेज़्ड एरे रडार चीन की बैलिस्टिक मिसाइल अर्ली वॉर्निंग सिस्टम का एक अहम हिस्सा है। यह भारत के पूर्वी तट से होने वाली मिसाइल परीक्षण गतिविधियों पर नजर रख सकता है। इस रडार के जरिए भारत के पूर्वी तट से लेकर बंगाल की खाड़ी और दक्षिण एशिया के बड़े हिस्से तक सीधी निगरानी हो सकती है। भारत के प्रमुख मिसाइल परीक्षण केंद्र जैसे कि ओडिशा स्थित डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप से छोड़ी जाने वाली अग्नि-5 और के-4 जैसी मिसाइलों की जानकारी इस रडार के माध्यम से चीन तक पहुंच सकती है। जिसका मतलब है कि भारत की मिसाइल परीक्षण कार्यक्रमों पर चीन की पैनी नजर रहेगी। बता दें कि भारत अपने अग्नि-5 और K-4 जैसी इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलों (ICBM) के परीक्षण डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप से करता है।

China Radar: युन्नान में रडार की लोकेशन क्यों है महत्वपूर्ण?

इस रडार की भौगोलिक स्थिति भी काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। युन्नान प्रांत, म्यांमार की सीमा के पास स्थित है। यह जगह चीन के दक्षिण-पश्चिमी इलाके में आती है और यहां से भारतीय महासागर तक चीन की सीधी निगरानी संभव हो जाती है। इसके अलावा चीन का यह रडार भारत के नौसैनिक मूवमेंट पर भी नजर रख सकता है। इस इलाके में ही भारत की परमाणु-सक्षम बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियों (SSBNs) की तैनाती भी है। चीन इस रडार टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल भारतीय मिसाइलों की रफ्तार, रेंज और अन्य जरूरी आंकड़ों को जुटाने के लिए कर सकता है, जिससे वह अपनी खुद के मिसाइल डिफेंस सिस्टम को और अधिक एडवांस बना सकता है।

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LPAR की क्या हैं खूबियां

चीन और भारत के बीच एलएसी पर लगातार तनाव बना हुआ है। हाल के कुछ सालों में चीन की सेना (PLA) ने खुद को काफी एडवांस किया है। इनमें LPAR जैसे मॉनिटरिंग सिस्टम्स की अहम भूमिका है। हालांकि इससे पहले भी चीन कोरला (शिंजियांग) में एक LPAR मॉनिटरिंग सिस्टम्स लगा चुका है। जिसकी मदद से चीन भारत के उत्तरी इलाकों पर नजर रखता है। अब युन्नान में नया रडार तैनात करने से चीन की नजर दक्षिण तक भी रहेगी।

भारतीय रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि चीन के इस कदम से भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा को गंभीर खतरा पैदा हो सकता है। भारत लगातार अपने मिसाइल प्रोग्राम को आगे बढ़ा रहा है। भारत पहले ही अग्नि-5 इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) का सफल परीक्षण कर चुका है। इस मिसाइल की रेंज 5,000 किलोमीटर से ज्यादा है। इसके अलावा, भारत का हाइपरसोनिक मिसाइल कार्यक्रम भी तेजी से आगे बढ़ रहा है।

LPAR रडार की खासियत यह है कि इसमें हजारों छोटे एंटीना होते हैं, जो इलेक्ट्रॉनिक रूप से बीम को डायरेक्ट निर्देशित कर सकते हैं। यह सिस्टम बहुत ही तेजी से मिसाइल लॉन्च और अन्य एरियल एक्टिविटी को ट्रैक करने में सक्षम होती है। यह अमेरिकी ‘PAVE PAWS’ सिस्टम जैसी है, जो 5,600 किलोमीटर तक निगरानी कर सकता है।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा खतरे को भांपते हुए भारत को अपनी बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस (BMD) सिस्टम को और मजबूत करने की जरूरत है। भारत पहले से ही मिसाइल इंटरसेप्टर सिस्टम (Prithvi Air Defence – PAD और Advanced Air Defence – AAD) पर काम कर रहा है, जो 5,000 किलोमीटर तक मार करने वाली मिसाइलों को बीच में ही मार गिरा सकता है। इसके अलावा, भारत को अपनी साइबर सिक्योरिटी को भी एडवांस करना होगा क्योंकि चीन डिजिटल जासूसी में भी माहिर है। जिसे देखते हुए भारतीय मिसाइल प्रोग्राम और डिफेंस कम्यूनिकेशन सिस्टम को सुरक्षित और एन्क्रिप्टेड रखना बेहद जरूरी है। रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक भारत को भी चीन पर नजर रखने के लिए सैटेलाइट-बेस्ड मॉनिटरिंग सिस्टम सिस्टम को भी बेहद मजबूत करने की जरूरत है, ताकि चीन की हर हरकत पर नजर रखी जा सके।