26 Rafale Marine Deal: कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) ने मंगलवार को भारतीय नौसेना के लिए 26 राफेल मरीन फाइटर जेट्स की खरीद को मंजूरी दे दी। ये अब तक की सबसे बड़ी फाइटर जेट डील है, जिसकी कीमत 63,000 करोड़ रुपये से ज्यादा है। ये सौदा फ्रांस के साथ सरकार-से-सरकार समझौते (G2G) के तहत होगा।
26 Rafale Marine Deal: इस डील में क्या-क्या शामिल है?
इस सौदे के तहत नौसेना को 22 सिंगल-सीटर और 4 ट्विन-सीटर राफेल मरीन जेट्स मिलेंगे। सिर्फ विमान ही नहीं, बल्कि इस डील में फ्लीट मेंटेनेंस, लॉजिस्टिकल सपोर्ट, स्टाफ की ट्रेनिंग और भारत में प्रोडक्शन को बढ़ावा देने वाली ऑफसेट शर्तें भी शामिल हैं। यानी फ्रांस भारत में कुछ निवेश भी करेगा। वहीं, यानी यह डील सिर्फ एक सैन्य सौदा नहीं, बल्कि भारत की स्वदेशी रक्षा उत्पादन नीति को भी मजबूती देने की दिशा में एक बड़ा कदम भी है।
26 Rafale Marine Deal: इन जेट्स की डिलीवरी कब शुरू होगी?
सौदा साइन होने के करीब पांच साल बाद जेट्स की डिलीवरी शुरू होगी। जब ये विमान भारतीय नौसेना में शामिल होंगे, तब इन्हें सीधे भारत के पहले स्वदेशी विमानवाहक पोत INS विक्रांत पर तैनात किया जाएगा। फिलहाल INS विक्रांत से MiG-29K लड़ाकू विमान ऑपरेट हो रहे हैं, लेकिन राफेल मरीन के आने से इस एयरक्राफ्ट कैरियर की ताकत और अधिक बढ़ जाएगी।
गौरतलब है कि भारतीय वायुसेना पहले से ही 36 राफेल जेट्स ऑपरेट कर रही है, जो अंबाला और हासीमारा जैसे रणनीतिक एयरबेस पर तैनात हैं। लेकिन नौसेना के लिए जो राफेल मरीन जेट्स आ रहे हैं, वो थोड़े अलग हैं। इन्हें समुद्र में काम करने के लिए खास तौर पर तैयार किया गया है। मतलब, ये जहाज की छोटी जगह से उड़ान भरने-उतरने में माहिर हैं।
बडी-बडी एरियल रीफ्यूलिंग सिस्टम
इस डील का एक और खूबी है “बडी-बडी” एरियल रीफ्यूलिंग सिस्टम। इस तकनीक के जरिए एक राफेल जेट हवा में उड़ते हुए ही दूसरे राफेल विमान को ईंधन भर सकता है। लगभग 10 राफेल विमान इस सिस्टम से लैस होंगे, जो वायुसेना की फ्लेक्सिबिलिटी और तैयारियों को बेहतर बनाएगा। इससे लंबे मिशन पर जाने में आसानी होगी।
रक्षा सूत्रों का कहना है कि इस डील में जमीन पर इस्तेमाल होने वाले इक्विपमेंट्स और सॉफ़्टवेयर अपग्रेड्स को भी शामिल किया गया है, जिससे वायुसेना के मौजूदा राफेल फ्लीट को और बेहतर बनाया जा सकेगा। वहीं नौसेना को अपने विमानवाहक पोतों पर कुछ विशेष उपकरण और सिस्टम इंस्टॉल करने होंगे, ताकि ये 4.5 जेनरेशन के राफेल मरीन जेट्स पूरी क्षमता के साथ संचालन कर सकें। अभी मिग-29K जेट्स INS विक्रमादित्य से उड़ते हैं, और वो अपनी जगह पर बने रहेंगे। लेकिन राफेल के आने से नौसेना को एक नई ताकत मिलेगी, जो समुद्र में भारत की पकड़ को और मजबूत करेगी।
स्वदेशी TEDBF पर फोकस
वहीं, भारतीय नौसेना अब सिर्फ विदेशी टेक्नोलॉजी पर निर्भर नहीं रहना चाहती है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) देश का पहला पांचवीं पीढ़ी का स्वदेशी लड़ाकू विमान डेवलप कर रहा है, जिसे बाद में नेवल वर्जन में बदला जाएगा। यह विमान ट्विन-इंजन डेक-बेस्ड फाइटर (TEDBF) होगा, जो भारतीय वायुसेना के लिए बनाए जा रहे एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) का नौसैनिक रूप होगा। AMCA को एरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (ADA) तैयार कर रही है।
इस दिशा में काम तेजी से चल रहा है और रक्षा मंत्रालय चाहता है कि आने वाले सालों में नौसेना भी स्वदेशी फाइटर जेट्स के सहारे अपनी ताकत में इजाफा करे। राफेल मरीन जेट्स अगले पांच-सात सालों में नौसेना का हिस्सा बन जाएंगे, और तब तक शायद TEDBF भी तैयार होने की राह पर होगा। ये दोहरी रणनीति भारत को समुद्र और आसमान दोनों में मजबूत बनाएगी। आईएनएस विक्रांत और भविष्य में आने वाले आईएनएस विशाल जैसे एयरक्राफ्ट कैरियर्स के लिए ये स्वदेशी जेट्स एक स्थायी समाधान बन सकते हैं।
जहां तक फ्रांस के साथ इस डील की बात है, यह सिर्फ एक व्यावसायिक सौदा नहीं बल्कि रणनीतिक साझेदारी का विस्तार भी है। भारत और फ्रांस के बीच रक्षा सहयोग लगातार गहरा हो रहा है, राफेल इसका एक प्रमुख उदाहरण है। भारत ने राफेल के माध्यम से न सिर्फ आधुनिक तकनीक को अपनाया है, बल्कि इसके जरिए अपनी रक्षा कूटनीति को भी नई ऊंचाई दी है।
राफेल मरीन जेट्स को नौसेना में शामिल करना इसलिए भी अहम है, क्योंकि समुद्री सुरक्षा का महत्व अब पहले से कहीं ज्यादा बढ़ चुका है। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन की बढ़ती सक्रियता और वैश्विक रणनीतिक बदलावों को देखते हुए, भारत के लिए यह जरूरी है कि वह अपनी नौसैनिक ताक़त को अत्याधुनिक बनाकर क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखे।
राफेल मरीन जेट्स में जो खूबिया हैं, जैसे एडवांस रडार सिस्टम, लंबी दूरी की मिसाइलें, लेटेस्ट एवियोनिक्स और मल्टी-रोल कैपेबिलिटी, वे भारतीय नौसेना को किसी भी चुनौती का मुकाबला करने में सक्षम बनाएंगी।
Explainer: Why UAE Is Interested in India Akash Missile Despite Having THAAD, Patriot, and Pantsir Systems
UAE Akash Missile Explainer: भारत ने संयुक्त अरब अमीरात (UAE) को स्वदेशी आकाश एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम (Akash Missile) देने का ऑफर दिया है। यह पेशकश भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और भारत यात्रा पर आए दुबई के क्राउन प्रिंस और UAE के डिप्टी पीएम शेख हमदान बिन मोहम्मद बिन राशिद अल मकतूम के बीच प्रतिनिधि-स्तरीय बैठक में की गई। इसके अलावा दोनों देश अब सैन्य अभ्यास, ट्रेनिंग एक्सचेंज, रक्षा उद्योग में सहयोग, संयुक्त प्रोजेक्ट्स, रिसर्च और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर जैसे क्षेत्रों में भी हाथ मिलाने जा रहे हैं। इससे पहले प्रधानमंत्री मोदी भी 10-12 फरवरी 2025 को पेरिस और मार्सिले की यात्रा के दौरान फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों को स्वदेशी आकाश एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम बेचने का ऑफर दे चुके हैं।
भारत ने ‘आकाश’ डिफेंस सिस्टम (Akash Missile) को स्वदेश में ही विकसित किया है। इसे डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (DRDO) ने बनाया है और ये 96% से ज्यादा स्वदेशी है। यह सिस्टम दुश्मन के लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर, ड्रोन और सबसोनिक क्रूज़ मिसाइलों को 25 किलोमीटर की दूरी तक इंटरसेप्ट कर उन्हें नष्ट करने में सक्षम है। यह न केवल युद्ध के दौरान सुरक्षा प्रदान करती है, बल्कि किसी भी आकस्मिक खतरे को समय रहते रोकने में भी मददगार है। इस प्रणाली को पूरी तरह से भारत में ही विकसित किया गया है, जो ‘आत्मनिर्भर भारत’ की दिशा में एक ठोस कदम है।
यह पेशकश उस व्यापक रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत भारत अब ‘आकाश’, ‘पिनाका’ मल्टी-लॉन्च रॉकेट सिस्टम और ‘ब्रह्मोस’ सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल जैसे आधुनिक हथियारों को मित्र देशों को निर्यात करने में जुटा है। फिलीपींस को पहले ही ब्रह्मोस की तटीय बैटरियां निर्यात की जा चुकी हैं, और आर्मेनिया भारत से आकाश, पिनाका और 155 मिमी आर्टिलरी गन खरीदने वाला पहला विदेशी खरीदार देश बन चुका है। अब यूएई के साथ ये डील भारत के रक्षा निर्यात को जबरदस्त बूस्ट मिलेगा।
UAE Akash Missile Explainer: अभी यूएई के पास कौन-कौन से हैं सिस्टम?
फिलहाल संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के पास कई तरह के आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम है। यूएई के पास थाड (THAAD – Terminal High Altitude Area Defense) है। यूएई दुनिया का पहला देश है (अमेरिका के बाद) जिसके पास ये सिस्टम है। इसे अमेरिका से खरीदा गया और 2016 में तैनात किया गया था। इसकी रेंज 200 किलोमीटर तक है और ये लंबी दूरी के खतरों से निपटने में माहिर है। जनवरी 2022 में, यूएई ने इसका इस्तेमाल यमन के हूती विद्रोहियों की ओर से दागी गई मिसाइलों को रोकने के लिए किया था, जो इसका पहला जंगी इस्तेमाल था। अभी यूएई के पास दो THAAD बैटरी हैं, और 2022 में अमेरिका ने 96 और मिसाइलों के साथ दो अतिरिक्त कंट्रोल स्टेशन देने की मंजूरी दी थी।
इसके अलावा यूएई के पास अमेरिकी पैट्रियट PAC-3 और GEM-T सिस्टम ङी है, जो मध्यम और छोटी दूरी की मिसाइलों, ड्रोन्स और हवाई हमलों से बचाता है। पैट्रियट का PAC-3 वेरिएंट बैलिस्टिक मिसाइलों को आखिरी चरण में रोकता है, जबकि GEM-T पुराने मॉडल का अपग्रेड है, जो हवाई जहाजों और क्रूज मिसाइलों के खिलाफ बेहतर काम करता है। यह सिस्टम अबू धाबी जैसे बड़े शहरों और अल-धफरा एयर बेस जैसे अहम ठिकानों की रक्षा करता है।
इसके अलावा यूएई के पास रूसी पैंटसिर-एस1 (Pantsir-S1) सिस्टम भी है, जिसे यूएई ने 2000 में ऑर्डर किया था। 50 यूनिट्स की डिलीवरी 2009-2013 में पूरी हुई थी। पैंटसिर छोटी और मध्यम दूरी (20 किमी तक) के खतरों जैसे ड्रोन, हेलिकॉप्टर, और कम ऊंचाई पर उड़ने वाली मिसाइलों को रोकता है। इसमें मिसाइलों के साथ-साथ ऑटोमैटिक तोपें भी हैं, जो इसे “पॉइंट डिफेंस” के लिए शानदार बनाती हैं। यूएई इसका इस्तेमाल खास जगहों, जैसे तेल संयंत्रों और सैन्य ठिकानों की सुरक्षा के लिए करता है।
साथ ही यूएई के पास MIM-23 हॉक पुराना अमेरिकी सिस्टम भी है, जो कम और मध्यम ऊंचाई पर उड़ने वाले हवाई जहाजों और मिसाइलों को निशाना बनाता है। हालांकि ये अब पुराना हो चुका है, फिर भी यूएई के पास इसकी कुछ यूनिट्स हैं, जो बाकी सिस्टम्स के साथ मिलकर रक्षा को मजबूत करती हैं। यूएई इनका इस्तेमाल सपोर्टिंग रोल में करता है।
इसके अलावा उसके पास मध्यम दूरी का चेओंगुंग II (KM-SAM) सिस्टम भी है, जिसे यूएई ने 2022 में दक्षिण कोरिया से खरीदा था, जिसकी कीमत 3.5 बिलियन डॉलर थी। हालांकि ये अभी डिलीवरी के लिए तैयार हो रहा है। चेओंगुंग 40 किमी तक की रेंज में हवाई जहाज, क्रूज मिसाइलें और बैलिस्टिक मिसाइलों को रोक सकता है। यह रूस के S-400 जैसा है, और कम ऊंचाई के खतरों से निपटने में खास है। इसे यूएई के सुरक्षा में “लोअर-टियर” गैप को भरने के लिए लिया गया है, जहां THAAD और पैट्रियट कम प्रभावी हो सकते हैं।
वहीं, 2022 में हूती हमलों के बाद, यूएई ने इजराइल से स्पाइडर सिस्टम भी खरीदा था। ये मध्यम दूरी का सिस्टम है, जो ड्रोन, क्रूज मिसाइलों और हवाई जहाजों को निशाना बनाता है। इसकी रेंज 15-20 किमी है और ये मोबाइल है, यानी इसे आसानी से कहीं भी ले जाया जा सकता है। ये खासकर ड्रोन हमलों से बचाव के लिए लिया गया। अब्राहम समझौते के बाद इजराइल और यूएई के रिश्ते बेहतर हुए हैं, जिसके चलते ये डील हुई थी।
दरअसल यूएई खाड़ी क्षेत्र में एक अहम देश है, जिसके पास ढेर सारा तेल, गैस और पैसा है। लेकिन इसके साथ ही इसके दुश्मन भी कम नहीं हैं। पिछले कुछ सालों में यमन के हूती विद्रोहियों ने यूएई पर कई बार ड्रोन और मिसाइल हमले किए हैं। जनवरी 2022 में हूती मिसाइलों ने अबू धाबी को निशाना बनाया था, जिसमें तीन लोग मारे गए थे। इसके अलावा, ईरान की बढ़ती ताकत खासकर उसकी बैलिस्टिक मिसाइलें और ड्रोन भी यूएई के लिए चिंता का सबब है। ये खतरे छोटे-मोटे नहीं हैं, और यूएई को हर तरह के हवाई हमले से निपटने के लिए तैयार रहना पड़ता है।
वहीं, थाड और पैट्रियट जैसे सिस्टम लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों को रोक सकते हैं। लेकिन हूती जैसे समूह जो सस्ते ड्रोन और छोटी रेंज की मिसाइलों का इस्तेमाल करते हैं, उनके खिलाफ इन बड़े सिस्टम का इस्तेमाल महंगा पड़ता है। एक थाड मिसाइल की कीमत करीब 1-2 मिलियन डॉलर होती है, जबकि हूती का ड्रोन या मिसाइल उससे कई गुना सस्ता। ऐसे में यूएई को एक ऐसा सिस्टम चाहिए, जो किफायती हो और छोटे-मध्यम दूरी के खतरों से भी निपट सके। जिसमें आकाश सिस्टम फिट बैठता है।
वहीं, आकाश (Akash Missile) की एक मिसाइल की कीमत 5 लाख डॉलर से भी कम है, जो पैट्रियट या थाड की तुलना में बहुत सस्ती है। खासकर ड्रोन जैसे सस्ते खतरों से निपटने के लिए यह यूएई के लिए ये किफायती ऑप्शन है। आकाश की रेंज भी 25-30 किमी तक है और ये छोटी और मध्यम दूरी के खतरों जैसे ड्रोन, हेलिकॉप्टर, और क्रूज मिसाइलों पर सटीक निशाना साध सकता है। वहीं हूती हमलावर ज्यादातर ऐसे ही हथियार इस्तेमाल करते हैं।
इसके अलावा आकाश को ट्रक या ट्रैक वाले वाहनों पर आसानी से ले जाया जा सकता है। यूएई जैसे देश में, जहां तेल संयंत्र और शहर काफी दूर-दूर हैं, वहां आसानी से पहुंचाया जा सकता है। यूएई का रेगिस्तानी मौसम मुश्किल होता है, लेकिन आकाश हर हाल में काम करता है, जो इसे भरोसेमंद बनाता है।
इसके अलावा यूएई के पास THAAD और पैट्रियट जैसे सिस्टम लंबी दूरी और ऊंचाई के लिए हैं, जबकि पैंटसिर और स्पाइडर छोटी दूरी के लिए। लेकिन मध्यम दूरी (20-40 किमी) में एक गैप है। दक्षिण कोरिया का चेओंगुंग II (KM-SAM) इस गैप को भरने के लिए लिया गया है, जिसकी डिलीवरी में देरी है। लेकिन तब तक यूएई को एक तुरंत उपलब्ध सिस्टम चाहिए, और आकाश इस जरूरत को पूरा कर सकता है। साथ ही, आकाश की कीमत भी KM-SAM से कम है।
यूएई ज्यादातर अपने डिफेंस प्रोडक्ट्स अमेरिका, फ्रांस या यूरोपीय देशों से खरीदता रहा है। लेकिन 2022 के हूती हमलों के बाद उसे लगा कि अमेरिका का सपोर्ट उतना तेज नहीं था। बदले भू राजनीतिक समीकरणों के चलते अब यूएई चाहता है कि उसकी रक्षा आपूर्ति एक ही स्रोत पर निर्भर न रहे। वहीं, भारत और यूएई के बीच मजबूत होते रणनीतिक संबंधों को देखते हुए, यूएई को भरोसा है कि भारत से मिलने वाली टेक्नोलॉजी पर किसी तरह का राजनीतिक दबाव या शर्त नहीं होगी, जैसा कि अक्सर अमेरिकी डिफेंस प्रोडक्ट्स खरीदने पर होता है।
दूसरी ओर, यूएई भी अब तेल आधारित अर्थव्यवस्था से आगे बढ़कर खुद को एक आधुनिक, तकनीकी रूप से सक्षम और रणनीतिक रूप से मजबूत राष्ट्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में काम कर रहा है। ऐसे में भारत जैसे देश के साथ रक्षा, तकनीक और उत्पादन के क्षेत्र में साझेदारी उसे नए अवसर प्रदान कर सकती है।
आकाश मिसाइल सिस्टम में किन देशों की है दिलचस्पी?
आकाश मिसाइल सिस्टम (Akash Missile) को लेकर कई देशों ने रूचि दिखाई है। इनमें आर्मेनिया पहला देश है जिसने आकाश सिस्टम को खरीदा। नवंबर 2024 तक एक बैटरी (चार लॉन्चर) की डिलीवरी हो चुकी है। करीब 6,000 करोड़ रुपये का ये सौदा भारत के रक्षा निर्यात में मील का पत्थर है।
फिलीपींस की नौसेना इसे अपने तटीय रक्षा सिस्टम में शामिल करने की योजना बना रही है। 2025 में 200 मिलियन डॉलर का ऑर्डर संभावित है। दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत का करीबी दोस्त वियतनाम भी इसे खरीदने की सोच रहा है। ये क्षेत्र में चीन के खिलाफ संतुलन बनाने में मदद कर सकता है।
इसके अलावा दिसंबर 2023 की रिपोर्ट्स के मुताबिक, दक्षिण अमेरिका का ब्राजील और अफ्रीका का मिस्र भी इस सिस्टम में रुचि दिखा रहे हैं। साथ ही, बेलारूस, मलेशिया, थाईलैंड और सूडान जैसे देशों ने भी अलग-अलग मौकों पर आकाश सिस्टम को लेकर बात की है। सूडान में 2022 के एक मिलिट्री प्रदर्शनी में इसे देखा भी गया था।
आकाश सिस्टम की खूबियां
आकाश मिसाइल सिस्टम 18 किलोमीटर की ऊंचाई तक 25 से 30 किलोमीटर की दूरी तक हवा में आने वाले खतरों को नष्ट कर सकता है। ये सिस्टम एक बार में चार टारगेट को निशाना बना सकता है। दिसंबर 2023 में हुए “अस्त्रशक्ति” अभ्यास में भारत ने दिखाया था कि एक ही फायरिंग यूनिट से चार टारगेट को ढेर किया जा सकता है। ये दुनिया में अपनी तरह का पहला प्रदर्शन था।
चाहे बारिश हो, धूप हो या कोहरा, आकाश एयर डिफेंस सिस्टम हर मौसम में काम करता है। इसका रडार और मिसाइल सिस्टम हर मौसम में सटीक रहता है।
ये सिस्टम चलते-फिरते प्लेटफॉर्म पर काम करता है। सेना के लिए टी-72 टैंक चेसिस पर और वायुसेना के लिए ट्रक और ट्रेलर पर इसे लगाया जाता है। इससे इसे जल्दी कहीं भी ले जाया जा सकता है।
इसमें इलेक्ट्रॉनिक काउंटर-काउंटर मेजर्स (ECCM) हैं, यानी दुश्मन अगर रडार को जाम करने की कोशिश करे, तो भी ये काम करता रहेगा।
आकाश की कीमत दूसरे देशों के सिस्टम से 8-10 गुना कम है। मिसाल के तौर पर, अमेरिका का पैट्रियट सिस्टम इससे कहीं महंगा है, लेकिन आकाश की सटीकता और मोबिलिटी इसे खास बनाती है।
इसमें रॉकेट-रामजेट सिस्टम है, जो मिसाइल को टारगेट तक पूरी स्पीड से ले जाता है। जो ये इसे रूस के SA-6 जैसा बनाता है।
इसका “राजेंद्र” रडार सिस्टम 60 किलोमीटर तक ट्रैक कर सकता है और एक साथ 64 टारगेट को देख सकता है। ये 8 मिसाइलों को गाइड कर सकता है, वो भी चार अलग-अलग टारगेट की ओर।
पहली मिसाइल से टारगेट को हिट होने की संभावना 88% है, और दूसरी मिसाइल के साथ ये 99% तक पहुंच जाती है। यानी ये लगभग अचूक है।
भारत ने बनाया एडवांस आकाश-एनजी सिस्टम
भारत ने इसका आकाश-एनजी (नेक्स्ट जेनरेशन) सिस्टम भी तैयार कर लिया है। आकाश-एनजी की शुरुआत 2010 के दशक में हुई, जब DRDO ने फैसला किया कि पुराने आकाश को और बेहतर करने की जरूरत है। इसे बनाने में भारत डायनामिक्स लिमिटेड (BDL) और टाटा पावर जैसे प्राइवेट सेक्टर की कंपनियों ने भी सहयोग किया है। इसका पहला टेस्ट जुलाई 2021 में ओडिशा के चांदीपुर टेस्ट रेंज में हुआ था, जिसमें इसने एक ड्रोन पर सटीक निशाना साधा। इसके बाद जनवरी 2024 में एक और कामयाब टेस्ट हुआ, जिसमें इसने हाई-स्पीड टारगेट को ढेर कर दिया।
आकाश-एनजी (नेक्स्ट जेनरेशन) 70-80 किलोमीटर तक मार कर सकता है। यानी दुश्मन को सीमा के पास आने से पहले ही रोक देगा। इसकी ऊंचाई सीमा भी 20-25 किलोमीटर तक है, जो इसे ऊंचाई पर उड़ने वाले टारगेट के खिलाफ कारगर बनाती है। वहीं पुराने आकाश की तुलना में ये हल्का है। इसका वजन करीब 300 किलोग्राम है, जबकि पुराने सिस्टम का वजन 700 किलो है। ये 2.5 मैक की स्पीड (ध्वनि से ढाई गुना तेज) तक जा सकता है।
इसमें एक एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड ऐरे (AESA) मल्टी-फंक्शन रडार लगा है। ये रडार 100 किलोमीटर से ज्यादा दूर तक टारगेट को देख सकता है और एक साथ कई निशानों को ट्रैक कर सकता है। ये पुराने “राजेंद्र” रडार से कहीं एडवांस है।
आकाश-एनजी सिस्टम एक बार में कई दुश्मनों पर निशाना साध सकता है। इसका “सीकर” (मिसाइल का गाइडेंस सिस्टम) इतना सटीक है कि तेजी से बदलते टारगेट को भी मात दे सकता है। इसके अलावा बारिश, कोहरा या रात का अंधेरा आकाश-एनजी हर मौसम में काम करता है। इसका ऑल-वेदर सिस्टम इसे भरोसेमंद बनाता है।
डीआरडीओ की योजना है कि 2026 तक आकाश-एनजी को भारतीय वायुसेना में शामिल कर लिया जाए।
Rafale Assembly Line India: भारत और फ्रांस के बीच रक्षा सहयोग लगातार मजबूत होता जा रहा है। राफेल लड़ाकू विमानों को लेकर दोनों देशों के बीच एक नई और महत्वपूर्ण डील लगभग तय हो चुकी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत की नौसेना के लिए 26 राफेल एम (Rafale-M) लड़ाकू विमानों की डील करीब 7.6 बिलियन अमेरिकी डॉलर की होगी। इसके अलावा, फ्रांस की कंपनी दसॉ एविएशन (Dassault Aviation) भारत में ही राफेल की फाइनल असेंबली लाइन (Final Assembly Line) खोलने की योजना बना रही है। इस कदम से भारत के ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को मजबूती मिलेगी और भविष्य में राफेल विमानों का उत्पादन भारत में ही संभव हो सकता है।
Rafale Assembly Line India: क्या कहा दसॉ एविएशन के सीईओ ने
L’Usine Nouvelle की रिपोर्ट के मुताबिक, फ्रांस की रक्षा कंपनी दसॉ एविएशन भारत में राफेल फाइटर जेट्स की फाइनल असेंबली लाइन शुरू करने पर विचार कर रही है। इसका मकसद भविष्य में मिलने वाले बड़े ऑर्डर्स को पूरा करना और उत्पादन क्षमता को बढ़ाना है। दसॉ एविएशन के सीईओ एरिक ट्रैपियर ने कहा, “भारत बड़े ऑर्डर्स की तैयारी कर रहा है, और हम निश्चित रूप से भारत में एक फाइनल असेंबली लाइन खोलने पर विचार कर रहे हैं ताकि इस नए वर्कलोड को संभाल सकें।” दरअसल दसॉ की नजर भारतीय वायुसेना (IAF) के लिए मल्टी-रोल फाइटर एयरक्राफ्ट (MRFA) प्रोग्राम के तहत 114 फाइटर जेट्स की खरीद की जानी है। दसॉ को उम्मीद है कि उसे ये बड़ा ऑर्डर मिल सकता है।
दसॉ राफेल फाइटर जेट का प्रोडक्शन बढ़ाने की प्रक्रिया में है, जिसमें हर महीने दो विमानों से बढ़ाकर तीन विमान किया जा रहा है। कंपनी का लक्ष्य हर महीने चार विमान तक पहुंचना है, और भविष्य के ऑर्डरों को देखते हुए हर महीने पांच विमान बनने की भी योजना है।
Rafale Assembly Line India: दसॉ को बनाने हैं 230 राफेल
दसॉ एविएशन को उम्मीद है कि उसे भारत से और ऑर्डर मिल सकते हैं। 2023 में 13 राफेल विमानों की डिलीवरी हुई, जो 2024 में बढ़कर 21 हो गई और 2025 के लिए लक्ष्य 25 है। दसॉ की ऑर्डर बुक में 230 राफेल शामिल हैं, जिसमें 164 एक्सपोर्ट के लिए और 56 फ्रेंच एयर एंड स्पेस फोर्स के लिए हैं। 2024 में, कंपनी ने 8.3 अरब यूरो (705.5 अरब भारतीय रुपये) के मिलिट्री कॉन्ट्रैक्ट मिले थे, जो कि 2023 में 6.5 अरब यूरो (552.5 अरब भारतीय रुपये) थे। इन कॉन्ट्रैक्ट में सर्बिया से 12 विमान और इंडोनेशिया से 18 विमान के ऑर्डर शामिल हैं। दसॉ के मिलिट्री एयरक्राफ्ट का कुल बैकलॉग, जिसमें राफेल और फाल्कन जेट शामिल हैं, 43.2 अरब यूरो (3672 अरब भारतीय रुपये) तक पहुंच गया है, जो 2023 में 38.5 अरब यूरो (3272.5 अरब भारतीय रुपये) था।
Rafale Assembly Line India: भारत के लिए क्यों अहम है यह डील
भारत ने 2016 में 36 राफेल विमान खरीदने का सौदा किया था, जिसकी डिलीवरी 2022 तक पूरी हो गई। अब भारतीय नौसेना को पुराने हो चुके मिग-29के (MiG-29K) लड़ाकू विमानों को बदलने के लिए नए और अत्याधुनिक राफेल एम (Rafale Marine) की जरूरत है। भारतीय नौसेना के MRCBF (Multi-Role Carrier-Borne Fighters) प्रोग्राम के तहत राफेल एम विमान भारत के दो प्रमुख एयरक्राफ्ट कैरियर—आईएनएस विक्रांत (INS Vikrant) और आईएनएस विक्रमादित्य (INS Vikramaditya) पर तैनात किए जाएंगे।
भारतीय नौसेना वर्तमान में मिग-29के लड़ाकू विमानों का इस्तेमाल कर रही है, लेकिन पिछले कुछ सालों में इन विमानों के साथ कई तकनीकी समस्याएं सामने आई हैं। इनमें से कई विमान तकनीकी खराबियों और स्पेयर पार्ट्स की कमी के कारण लंबे समय तक ग्राउंडेड रहे हैं। इसके विपरीत, राफेल एम एक आधुनिक, मल्टीरोल लड़ाकू विमान है, जिसे कई देशों की नौसेनाएं पहले से ही इस्तेमाल कर रही हैं।
राफेल एम को खासतौर पर समुद्री अभियानों के लिए डिजाइन किया गया है। यह विमान कैटापल्ट असिस्टेड टेक-ऑफ और अरेस्टेड लैंडिंग की क्षमता रखता है, जिससे इसे एयरक्राफ्ट कैरियर पर ऑपरेशन में आसानी होती है। इसके अलावा, इसमें मजबूत लैंडिंग गियर और एयरफ्रेम होते हैं।
भारत ने राफेल लड़ाकू विमानों में अस्त्रा Mk1 मिसाइल को भी इंटीग्रेट किया है। इसके अलावा भारतीय वायुसेना ने हाई एल्टीट्यूड इलाकों में भी राफेल से उड़ान भरी है। ट्रायल के दौरान, राफेल ने 16.7 किलोमीटर की ऊंचाई पर मौजूद सिमुलेटेड टोही गुब्बारों को सफलतापूर्वक इंटरसेप्ट किया है।
इन खास फीचर्स से लैस है राफेल
4.5 पीढ़ी वाला मल्टीरोल फाइटरजेट राफेल एक अत्याधुनिक M88 टर्बोफैन ट्विन-इंजन, कनार्ड डेल्टा विंग, मल्टी-रोल फाइटर जेट है, जिसे दसॉ एविएशन खासतौर पर एयर सुपीरियरिटी, डीप स्ट्राइक, टोही (रिकॉनेनेसेंस) और परमाणु हमलों जैसी क्षमताओं के लिए डिजाइन किया गया है। राफेल आधुनिकतम थेल्स RBE2 AESA रडार और SPECTRA इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सूट से लैस है, जो इसे दुश्मन आसानी से पकड़ नहीं पाता है। इसके अलावा, राफेल इज़रायली हेलमेट-माउंटेड डिस्प्ले सिस्टम, मेटियोर गाइडेड मिसाइलों और MICA एयर-टू-एयर मिसाइल, SCALP क्रूज मिसाइल (500 किलोमीटर दूर से निशाना) और Exocet एंटी-शिप मिसाइल जैसे अत्याधुनिक हथियारों से लैस है। साथ ही उनमें 10 घंटे की डेटा स्टोरेज क्षमता वाला फ्लाइट डेटा रिकॉर्डर, इन्फ्रारेड टार्गेट एक्विजिशन और ट्रैकिंग सिस्टम (जो रात या खराब मौसम में भी दुश्मन के लक्ष्यों का पता लगा सकता है), कोल्ड वेदर इंजन स्टार्टर (जो ठंडे मौसम में भी विमान के इंजन को सुचारू रूप से शुरू करता है) जैसे खास फीचर्स से भी लैस है।
राफेल की मैक्सिमम स्पीड 1.8 मैक, और कॉम्बैट रेंज 1,850 किलोमीटर है, और यह मैक 1.4 पर बिना आफ्टरबर्नर के लगातार सुपरक्रूज़ कर सकता है।
कब हो सकता है राफेल एम का सौदा
राफेल एम सौदे की आधिकारिक घोषणा अप्रैल 2025 में फ्रांस के रक्षा मंत्री की भारत यात्रा के दौरान होने की उम्मीद है। 7.6 बिलियन डॉलर (6.32 लाख करोड़ रुपये) के इस सौदे में 22 राफेल एम लड़ाकू विमान और टू सीटर 4 ट्रेनर वेरिएंट शामिल होंगे, जिनका इस्तेमाल वायुसेना और नौसेना के पायलटों को ट्रेनिंग देने के लिए किया जाएगा। इसके अलावा, भारत और फ्रांस संयुक्त रूप से एडवांस एवियोनिक्स और मिसाइल सिस्टम पर भी काम कर सकते हैं। यह विमान भारतीय नौसेना के मौजूदा MiG-29K बेड़े को बदलने के लिए खरीदे जा रहे हैं, जो INAS 300 व्हाइट टाइगर्स और INAS 303 ब्लैक पैंथर्स स्क्वाड्रन के तहत ऑपरेट होते हैं। वहीं नए राफेल एम फाइटर जेट्स की डिलीवरी 2029 से शुरू होगी। वहीं भारत में दसॉ एविएशन मेक इन इंडिया पॉलिसी के तहत राफेल असेंबली लाइन लगाएगी, इस नीति के तहत भारत में खरीदे गए 60% हथियारों की लोकल मैन्युफैक्चरिंग की जानी जरूरी है।
चीन और पाकिस्तान हैं चुनौती
राफेल M की तैनाती भारत के लिए बेहद स्ट्रैटेजिक एडवांटेज साबित होगी। खासकर जब चीन और पाकिस्तान अपनी सैन्य ताकत बढ़ाने में जुटे हैं। चीन ने तीन एयरक्राफ्ट कैरियर तैनात कर लिए हैं और 2035 तक पांच कैरियर बनाने की योजना बना रहा है। इन कैरियर्स पर J-15 फाइटर जेट्स तैनात हैं, लेकिन उनकी तकनीक राफेल के मुकाबले पुरानी मानी जाती है। वहीं, चीन का Fujian कैरियर (EMALS सिस्टम के साथ) भारतीय नौसेना के लिए नई चुनौती बन सकता है।
वहीं पाकिस्तान की बात करें, तो पाकिस्तान ने चीन से JF-17 थंडर और कुछ J-10C फाइटर्स खरीदे हैं। हालांकि, पाकिस्तान के पास कोई एयरक्राफ्ट कैरियर नहीं है, जिससे वह भारतीय नौसेना के सामने काफी कमजोर है। वहीं, राफेल की Meteor मिसाइल क्षमता पाकिस्तान के किसी भी फाइटर जेट से काफी बेहतर है।
Syria clashes: सीरिया एक बार फिर से हिंसा और अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है। बशर अल-असद के शासन के पतन के बाद से देश में जारी अस्थिरता ने अब एक खतरनाक मोड़ ले लिया है। हाल ही में लताकिया और टार्टूस जैसे तटीय क्षेत्रों में सरकार समर्थित सेनाओं और असद समर्थक विद्रोही गुटों के बीच हिंसक संघर्ष की खबरें सामने आई हैं। इस संघर्ष का केंद्र असद शासन के वफादार माने जाने वाले अलावी समुदाय के इलाके रहे, जिनके खिलाफ अब नए सत्ताधारी गुटों द्वारा हमले तेज हो गए हैं। इस खूनी हिंसा के बाद सीरिया के भविष्य को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं।
Syria clashes: सीरिया का सत्ता परिवर्तन: क्यों बना संकट की जड़?
सीरिया में दशकों से सत्ता में रहे बशर अल-असद का शासन कुछ महीनों पहले समाप्त हो गया था। इस सत्ता परिवर्तन को लेकर दुनियाभर में अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कुछ लोगों ने इसे लोकतंत्र की ओर एक कदम माना, जबकि कुछ ने चेतावनी दी थी कि इससे क्षेत्र में अस्थिरता और हिंसा बढ़ सकती है। असद शासन के पतन के बाद, हैयात तहरीर अल-शाम (HTS) जैसे समूहों ने सत्ता पर कब्जा जमाया। हालांकि, सत्ता परिवर्तन के बाद भी हिंसा का दौर नहीं थमा।
तटीय इलाकों लताकिया-टार्टूस में क्यों छिड़ा संघर्ष?
सीरिया का लताकिया-टार्टस क्षेत्र भूमध्य सागर के किनारे स्थित है। लताकिया और टार्टूस सीरिया के प्रमुख तटीय शहर हैं, जहां अलावी समुदाय की संख्या अधिक है। यहां असद परिवार का गृहनगर अल-कर्दाहा भी स्थित है। जब बशर अल-असद का शासन गिरा, तो आशंका जताई गई थी कि अलावी समुदाय के खिलाफ बदले की कार्रवाई हो सकती है। यही कारण है कि असद समर्थकों ने अपने प्रभावशाली इलाकों से संघर्ष की शुरुआत की। बनियास शहर में तो सीरिया की सबसे बड़ा ऑयल रिफाइनरी भी है, जहां पर भी आतंकवादी गुटों ने हमला करने की कोशिश की, लेकिन सुरक्षाबलों ने इसे विफल कर दिया। लेकिन सत्ता परिवर्तन के बाद इन इलाकों में असद समर्थकों और नई सरकार के समर्थकों के बीच टकराव शुरू हो गया। इसकी शुरुआत 6 मार्च को हुई, जब, सरकारी बलों और असद समर्थक गुटों के बीच झड़पें शुरू हुईं। इस संघर्ष में अब तक सैकड़ों लोगों की जान जा चुकी है, जिनमें बड़ी संख्या में आम नागरिक भी शामिल हैं।
कैसे हुई संघर्ष की शुरुआत?
6 मार्च को, सीरियाई सरकारी बलों ने लताकिया, बनियास, टार्टूस और जबलेह जैसे तटीय शहरों में सैन्य अभियान शुरू किया। इसका उद्देश्य उन “रेजिम रेमनेंट्स” यानी असद शासन के वफादारों के खिलाफ कार्रवाई करना था, जिन्होंने नए सत्ता-व्यवस्था को मानने से इनकार कर दिया था। इन इलाकों में पूर्व राष्ट्रपति बशर अल-असद के समर्थक और उनके शासन से जुड़े सैन्य गुट सक्रिय बताए जा रहे हैं। 6 मार्च को असद समर्थक विद्रोही गुटों ने लताकिया के पास सुरक्षा बलों पर घात लगाकर हमला किया। इस हमले में कम से कम 16 सुरक्षाकर्मी और रक्षा मंत्रालय के अधिकारी मारे गए। बताया जा रहा है कि ये हमला अचानक नहीं था, बल्कि पहले से ही इसकी योजना बनाई गई थी। इस हमले के बाद संघर्ष तेज हो गया और अन्य तटीय शहरों में भी हिंसा फैल गई।
सरकारी मीडिया के अनुसार, यह हमला पहला नहीं था, बल्कि पिछले तीन महीनों में ऐसे कई हमले हो चुके हैं। इस घटना के बाद सीरिया की अंतरिम सरकार ने कड़े कदम उठाते हुए सैन्य ऑपरेशन शुरू किया। लेकिन इस बीच, लताकिया और आसपास के इलाकों में हत्या, अपहरण, लूट और उत्पीड़न की घटनाओं में तेजी आई है। रिपोर्टों के मुताबिक, नागरिकों को खुलेआम मारा जा रहा है, जिससे स्थानीय आबादी में भय का माहौल बना हुआ है और हजारों लोगों को विस्थापित होना पड़ा।
सीरियन ऑब्जर्वेटरी फॉर ह्यूमन राइट्स (SOHR) की रिपोर्ट के अनुसार, इस संघर्ष में अब तक लगभग 1,311 लोग मारे जा चुके हैं, जिनमें से 830 आम नागरिक, 230 सुरक्षा कर्मी और 250 सशस्त्र लड़ाके शामिल हैं। हालांकि, इन आंकड़ों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो पाई है, लेकिन घटनास्थल से मिल रही जानकारियां इसकी गंभीरता की पुष्टि करती हैं।
Syria clashes: अलावी समुदाय क्यों बना निशाना?
सत्ता परिवर्तन के बाद अलावी समुदाय को निशाना बनाए जाने की खबरें सामने आई हैं। असद शासन में अलावी समुदाय को शासन का प्रमुख समर्थक माना जाता था। लेकिन अब, जब नई सरकार सत्ता में है, तो विद्रोही गुटों ने अलावी समुदाय के खिलाफ हिंसा तेज कर दी है।
लताकिया और टार्टूस जैसे शहरों में रहने वाले अलावी लोगों के घरों पर हमले हुए, कई लोगों को अगवा कर लिया गया और महिलाओं के साथ भी अत्याचार की खबरें सामने आई हैं। इसके अलावा, कुछ रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि अलावी समुदाय के लोगों को उनके धर्म के आधार पर प्रताड़ित किया गया है।
Syria clashes: कौन लड़ रहा है किसके खिलाफ?
सरकारी सुरक्षा बलों ने असद शासन के वफादार माने जाने वाले पुराने सैन्य अधिकारियों के नेतृत्व में बने सशस्त्र गुटों से मोर्चा लिया है। इन गुटों को “मिलिट्री काउंसिल फॉर द लिबरेशन ऑफ सीरिया” के नाम से जाना जा रहा है।
इस गुट का नेतृत्व असद की रिपब्लिकन गार्ड में शामिल रहे मेजर मुकदाद फतेहा और ब्रिगेडियर जनरल गियाथ सुलेमान डल्ला कर रहे हैं। इनका दावा है कि असद शासन के पतन के बाद अलावी समुदाय को निशाना बनाया जा रहा है। फतेहा ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो संदेश जारी कर “हयात तहरीर अल-शाम” (HTS) के खिलाफ ‘सीरिया के स्वतंत्रता संघर्ष’ की बात कही थी। इसके अलावा, ब्रिगेडियर जनरल गियाथ सुलैमान डल्ला ने भी अल्पसंख्यक समुदायों की रक्षा और ‘सीरिया की मुक्ति के लिए सैन्य परिषद’ के गठन की घोषणा की थी।
Syria clashes: नागरिकों की हालत बेहद खराब
तटीय इलाकों में रह रहे नागरिक भय के साए में जी रहे हैं। लताकिया के एक निवासी ने सोशल मीडिया पर लिखा, “हम बाहर नहीं निकलते, खिड़कियां तक नहीं खोलते। यहां कोई सुरक्षा नहीं है, अलावी समुदाय के लिए तो बिल्कुल नहीं।” इन इलाकों से खबरें आ रही हैं कि अलावी नागरिकों को उनके घरों से खींचकर फांसी पर चढ़ाया जा रहा है। महिलाओं को अस्पतालों से घसीट कर ले जाया जा रहा है और उनका सामूहिक नरसंहार किया जा रहा है। कई चश्मदीदों के अनुसार, बंदूकधारियों ने लोगों को उनके घरों से बाहर निकाला और सार्वजनिक रूप से उनका सिर कलम कर दिया।
इस हिंसा के चलते हजारों लोगों को घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, अलावी समुदाय के लोग डर के कारण शहरों से भाग रहे हैं, क्योंकि उन्हें निशाना बनाया जा रहा है। कुछ लोगों ने बताया कि उनके पड़ोसियों को जबरन घर से निकालकर अगवा किया गया। वहीं, कई लोगों को डर है कि हिंसा का अगला शिकार वे न बन जाएं।
अल्पसंख्यकों की स्थिति
सीरिया में अलावी, शिया और ईसाई समुदायों की स्थिति बेहद चिंताजनक है। अल जज़ीरा की एक रिपोर्ट के अनुसार, आतंकवादी संगठन अलावी समुदाय के बच्चों को सुन्नी बनाने की साजिश कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी कई वीडियो सामने आए हैं, जिनमें इन समुदायों के खिलाफ हिंसा और हत्या को बढ़ावा देने वाले बयान देखे जा सकते हैं।
सीरियाई सरकार की प्रतिक्रिया
सीरिया के अस्थायी राष्ट्रपति अहमद अल-शराआ ने इस संकट से निपटने के लिए दो समितियों का गठन किया है। पहली समिति मार्च 6 के हमलों की जांच करेगी, जबकि दूसरी समिति ‘सुप्रीम कमेटी फॉर सिविल पीस’ प्रभावित क्षेत्रों में नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का प्रयास करेगी। राष्ट्रपति अल-शराआ ने हाल ही में एक मस्जिद में संबोधन के दौरान कहा कि देश को एकजुट रखने और शांति बहाल करने के लिए सरकार पूरी कोशिश कर रही है। उन्होंने हिंसा में शामिल दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का आश्वासन भी दिया।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भूमिका
सीरिया में बढ़ती हिंसा पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर बनी हुई है। संयुक्त राष्ट्र ने सीरिया में हो रही हिंसा की निंदा की है और सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील की है। इसके अलावा, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने भी सीरिया में जारी हिंसा पर चर्चा के लिए आपातकालीन बैठक बुलाई है। यूरोपीय संघ (EU), अमेरिका और रूस ने इस मुद्दे पर चिंता जताई है और सीरिया सरकार से हिंसा रोकने की अपील की है।
हालात हो सकते हैं बेकाबू
सत्ता परिवर्तन के बाद अलावी और शिया समुदायों के खिलाफ हो रही हिंसा को लेकर चिंता बढ़ गई है। अभी भी असद समर्थक गुट तटीय इलाकों में संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन उनके पास हथियारों की कमी है। जानकारों का मानना है कि अगर यही स्थिति रही, तो ईरान, इराक और हिजबुल्लाह जैसे गुट इन अल्पसंख्यकों को समर्थन देना शुरू कर सकते हैं।
इसके अलावा, ऐसी भी खबरें हैं कि कई अलावी नागरिक रूस के तारतूस में स्थित नौसैनिक अड्डे पर शरण लिए हुए हैं। अगर रूस या ईरान इन गुटों को हथियार और समर्थन देने लगते हैं, तो संघर्ष और तेज हो सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्थिति को नियंत्रित नहीं किया गया तो यह हिंसा गृहयुद्ध का रूप ले सकती है। साथ ही, इससे पूरे मध्य पूर्व में अस्थिरता बढ़ सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सीरिया में शांति बहाली के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय को सख्त कदम उठाने होंगे। अमेरिका और रूस को एक साथ मिलकर संघर्षरत पक्षों पर दबाव बनाना चाहिए ताकि वे नागरिकों पर हमले बंद करें। इसके अलावा, मानवाधिकार संगठनों को भी इस संकट में सक्रिय भूमिका निभानी होगी, ताकि हिंसा के शिकार लोगों को राहत पहुंचाई जा सके।
Pakistan Nuclear Test: पाकिस्तान के परमाणु परीक्षण स्थल चागाई को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है। चगाई के पास हाल ही में नई गतिविधियां देखी गई हैं। अंदाजा लगाया जा रहा है कि पाकिस्तान कुछ बड़ा करने की तैयारी कर रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, चागाई इलाके में एक सुरंग खोदी गई है, जिसके बाद अंदाजा लगाया जा रहा है कि क्या पाकिस्तान परमाणु परीक्षण की तैयारी कर रहा है? वहीं जानकारों का कहना है कि पाक अधिकृत कश्मीर को लेकर जिस तरह से भारत की तरफ से दावे किए जा रहे हैं, उसे देखते हुए पाकिस्तान चेतावनी के तौर पर परमाणु परीक्षण जैसे बड़ा कदम उठा सकता है।
Pakistan Nuclear Test: परमाणु परीक्षण के लिए बनाई नई सुरंग!
सैटेलाइज इमेज एक्सपर्ट रिटायर्ड कर्नल विनायक भट्ट के मुताबिक, उन्हें सैटेलाइट इमेज से जानकारी मिली है कि चागाई इलाके में एक नई सुरंग की खुदाई की गई है, जिसका आकार लगभग 8 मीटर x 8 मीटर बताया जा रहा है। यह सुरंग पहले से मौजूद परीक्षण स्थलों के नजदीक स्थित है, जिसके बाद से यह अटकलें लगाई जा रही हैं कि पाकिस्तान ‘हॉट टेस्ट’ की तैयारी कर रहा है।
हालांकि, इन गतिविधियों की आधिकारिक तौर पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन सैटेलाइट और लोकल सोर्सेज के माध्यम से ये जानकारी सामने आई है।
— 卫纳夜格.巴特 Col Vinayak Bhat (Retd) @Raj47 (@rajfortyseven) March 9, 2025
पाकिस्तान की परमाणु नीति
पाकिस्तान की परमाणु नीति हमेशा से भारत के साथ शक्ति संतुलन पर केंद्रित रही है। नई सुरंग निर्माण की खबरें ऐसे समय में आई हैं जब दोनों देशों के बीच तनावपूर्ण संबंध हैं। मेरठ कॉलेज में अंतरराष्ट्रीय मामलों और डिफेंस स्टडीज के प्रोफेसर डॉ. मोहम्मद रिजवान का मानना है कि पाकिस्तान की यह गतिविधि भारत पर दबाव बनाने और बातचीत के लिए मजबूर करने की रणनीति का हिस्सा हो सकती है। हालांकि, भारत ने हमेशा से परमाणु ब्लैकमेल के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है।
प्रोफेसर रिजवान के मुताबिक भारत को अपनी सुरक्षा नीति में सतर्कता बरतते हुए, अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के साथ मिलकर पाकिस्तान पर दबाव बनाना चाहिए, ताकि वह इस प्रकार की उकसाने वाली गतिविधियों से बाज आए। इसके अलावा, भारत को अपनी रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने पर भी ध्यान केंद्रित करना चाहिए ताकि किसी भी संभावित खतरे का मुकाबला किया जा सके।
Pakistan Nuclear Test: अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की प्रतिक्रिया
वहीं, पाकिस्तान की इन गतिविधियों पर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की नजर है। यदि पाकिस्तान वास्तव में नए परमाणु परीक्षण की योजना बना रहा है, तो यह परमाणु अप्रसार संधि (NPT) और व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (CTBT) के उद्देश्यों के खिलाफ होगा। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को इस मामले में सक्रिय भूमिका निभाते हुए, पाकिस्तान पर दबाव बनाना चाहिए ताकि क्षेत्रीय और वैश्विक शांति सुनिश्चित की जा सके।
Pakistan Nuclear Test: क्या पीओके पर भारत के दावे से चिढ़ा पाकिस्तान?
जानकारों का मानना है कि पाकिस्तान अपनी रणनीति में परमाणु परीक्षण का सहारा लेकर भारत पर दबाव बनाने की कोशिश कर सकता है। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) को लेकर भारत की ओर से किए जा रहे मजबूत दावों और हालिया बयानों को देखते हुए, पाकिस्तान परमाणु परीक्षण जैसी उकसाऊ कार्रवाई कर सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम भारत को चेतावनी देने के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान आकर्षित करने की रणनीति हो सकती है।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि पाकिस्तान की ओर से परमाणु परीक्षण जैसी कोशिश क्षेत्रीय शांति को खतरे में डाल सकती है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इस पर गंभीरता से नजर रखनी चाहिए।
विदेश मंत्री और रक्षा मंत्री ने कही थी ये बात
बता दें कि लंदन के चैथम हाउस थिंक टैंक में जयशंकर ने कहा था कि कश्मीर से जुड़े बहुत से मुद्दों का हल निकाल लिया गया है। अनुच्छेद 370 को हटाना उनमें से एक है। एस. जयशंकर ने पीओके को लेकर कहा कि पीओके को खाली करवाने के बाद कश्मीर का मसला हल हो जाएगा।
वहीं उसके बाद भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था, “मुझे नहीं लगता कि पाकिस्तान हमें पीओके लौटाएगा। मुझे विश्वास है कि पीओके के लोग खुद ही भारत में विलय की मांग करेंगे। भारत की तेज आर्थिक प्रगति और बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा को देखकर पीओके के लोगों को एहसास हो रहा है कि उनका असली विकास भारत का हिस्सा बनने में ही है। पाकिस्तान को इसे स्वीकार करना ही पड़ेगा।”
Pakistan Nuclear Test: पाकिस्तान में पीओके को लेकर मचा बवाल
पाकिस्तान के राजनीतिक विश्लेषक और विशेषज्ञ इसे भारत की ओर से ‘पीओके पर हमले की धमकी’ के तौर पर देख रहे हैं। वहीं, कुछ का मानना है कि यह बयान केवल एक राजनीतिक बयानबाजी है, जिसका उद्देश्य आंतरिक राजनीति को साधना हो सकता है। पाकिस्तान मामलों के जानकारों का मानना है कि भारत की तरफ से पीओके को लेकर आए दिन दिए जा रहे बयानों से पाकिस्तान में चिंता बढ़ गई है। पाकिस्तान अपनी सैन्य शक्ति का प्रदर्शन करने और भारत को रोकने के लिए परमाणु परीक्षण जैसे बड़े कदम भी उठा सकता है।
पाकिस्तानी पत्रकार आरजू काजमी ने जब इस मुद्दे पर पाकिस्तान के राजनीतिक विश्लेषक कमर चीमा से चर्चा की तो उन्होंने सवाल किया कि क्या भारत की सरकार ने पाकिस्तान को स्पष्ट संदेश दे दिया है कि पीओके पर भारत अब निर्णायक कार्रवाई कर सकता है? उन्होंने कहा, “मुझे नहीं लगता कि भारत की आधिकारिक नीति इस तरह की है कि पाकिस्तान से बातचीत में पीओके को छोड़ने की मांग सीधे रखी जाएगी। जयशंकर का बयान गंभीर नहीं लगता। भाजपा ने हमेशा से पीओके को चुनावी मुद्दा बनाकर पेश किया है, लेकिन कभी इसे अपने घोषणापत्र में प्रमुखता से शामिल नहीं किया।”
चीमा ने आगे कहा, “इस बयान के जरिए भाजपा ने एक बार फिर मजबूत सरकार का संदेश देने की कोशिश की है। भाजपा का उद्देश्य जनता के बीच यह संदेश देना है कि केंद्र सरकार पीओके पर भी निर्णायक कदम उठाने की स्थिति में है।”
क्या भारत वाकई पीओके पर पर हमला करेगा? इस सवाल पर कमर चीमा ने कहा, “कश्मीर का इलाका भौगोलिक रूप से काफी कठिन है। पहाड़, नदियां और दुर्गम इलाके युद्ध को और मुश्किल बनाते हैं। पाकिस्तान भी एक सैन्य शक्ति है, ऐसे में भारत सीधे युद्ध का विकल्प नहीं चुनेगा। हालांकि, भारत ने बार-बार कहा है कि पीओके भारत का अभिन्न हिस्सा है।”
चीमा ने आगे कहा, “पाकिस्तान ने भी कई बार पीओके को लेकर बड़े-बड़े दावे किए हैं, लेकिन इन दावों का परिणाम कभी सामने नहीं आया। ऐसे में मुझे नहीं लगता कि भारत इस दिशा में कोई बड़ा सैन्य कदम उठाएगा। जयशंकर का बयान एक राजनीतिक प्रतिक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए।”
चागाई-1 पाकिस्तान का पहला सार्वजनिक परमाणु परीक्षण था, जो 28 मई 1998 को चागाई परीक्षण स्थल पर किया गया था। पाकिस्तान परमाणु ऊर्जा आयोग ने उस दिन पांच भूमिगत परमाणु परीक्षण किए थे। इन परीक्षणों के बाद पाकिस्तान ने खुद को एक परमाणु शक्ति के रूप में स्थापित किया, जिससे दक्षिण एशिया में सामरिक संतुलन में महत्वपूर्ण परिवर्तन आया।
वहीं, चागाई क्षेत्र में नई सुरंग निर्माण की खबरें पाकिस्तान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं की ओर इशारा कर रही हैं। यह गतिविधियां न केवल क्षेत्रीय स्थिरता के लिए चुनौती हैं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी चिंता का विषय हैं। ऐसे में, अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को सतर्क रहकर इन गतिविधियों पर निगरानी रखनी होगी और संबंधित पक्षों के साथ मिलकर स्थायी समाधान की दिशा में प्रयास करने होंगे।
Nepal Politics: हाल ही में नेपाल में एक ऐसी घटना घटी है, जिसने नेपाल के साथ-साथ भारत की सियासत में भी हलचल मचा दी है। रविवार को नेपाल की राजधानी काठमांडू के त्रिभुवन इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह के स्वागत में रैली आयोजित हुई। लेकिन सबसे बड़ी बात यह रही कि इस रैली में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पोस्टर लगाए गए और ‘हिंदू हृदय सम्राट’ के नारे भी लगे। यह पोस्टर राष्ट्रवादी पार्टी ‘राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी’ (RPP) और अन्य हिंदू समर्थक संगठनों द्वारा पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह के स्वागत के लिए लगाए गए थे।
नेपाल के कई हिस्सों में राजशाही की वापसी और नेपाल को फिर से हिंदू राष्ट्र घोषित करने की मांग को लेकर रैलियां निकाली जा रही हैं। खास बात यह रही कि इन रैलियों में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पोस्टर भी नजर आए। काठमांडू में त्रिभुवन अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर आयोजित एक बाइक रैली के दौरान योगी आदित्यनाथ के पोस्टर और बैनर देखे गए। यह रैली राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी (आरपीपी) ने आयोजित की थी, जिसमें पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह का भव्य स्वागत किया गया। पोस्टर्स में योगी आदित्यनाथ को “हिंदू हृदय सम्राट” बताया गया था। यह उपाधि हिंदुत्व विचारधारा से जुड़े नेताओं को दी जाती है।
Nepal Politics: योगी आदित्यनाथ का नेपाल कनेक्शन
‘हिंदू हृदय सम्राट’ के नारों से सजी इन रैलियों में योगी आदित्यनाथ का जिक्र भी हुआ। योगी का नेपाल के साथ ऐतिहासिक रिश्ता है। दरअसल, योगी आदित्यनाथ का नेपाल के शाही परिवार से ऐतिहासिक संबंध रहा है। योगी आदित्यनाथ जिस गोरखनाथ मठ के महंत हैं, उसका नेपाल के शाही परिवार से एक धार्मिक रिश्ता रहा है। नेपाल में गोरखनाथ मठ का खास महत्व है और इसे नेपाल के सांस्कृतिक इतिहास का हिस्सा माना जाता है। नेपाल में शाह वंश का शासन 16वीं सदी से लेकर 2008 तक था, जब राजतंत्र को समाप्त कर गणतंत्र की स्थापना की गई थी।
Nepal Politics: नेपाल में राजशाही की वापसी की बढ़ती मांग
नेपाल में इन दिनों राजशाही की वापसी को लेकर कई रैलियां हो रही हैं। राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी (आरपीपी) ने हाल ही में काठमांडू में एक बाइक रैली का आयोजन किया, जिसमें भारी भीड़ ने हिस्सा लिया। रैली में ‘नारायणहिती खाली गर, हाम्रो राजा आउंदै छन्’ जैसे नारे लगे, जिसका अर्थ है – “नारायणहिटी खाली करो, हमारे राजा आ रहे हैं।”
नारायणहिती वही राजमहल है, जिसमें नेपाल के राजा निवास करते थे, लेकिन 2008 में गणतंत्र लागू होने के बाद इसे संग्रहालय में बदल दिया गया था। अब जब राजशाही की मांग फिर उठ रही है, तो नारायणहिती राजमहल एक बार फिर से चर्चा में आ गया है।
पूर्व राजा ज्ञानेंद्र के समर्थकों का मानना है कि वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था भ्रष्ट हो चुकी है और देश को बचाने के लिए राजशाही की वापसी जरूरी है। हालांकि, ज्ञानेंद्र ने अभी तक सार्वजनिक रूप से कोई राजनीतिक बयान नहीं दिया है, लेकिन उनकी उपस्थिति और स्वागत ने इस मुद्दे को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बना दिया है।
Nepal Army Chief
नेपाली सेना प्रमुख के बयान से बढ़ी बैचेनी
नेपाल के सेना प्रमुख ने हाल ही में एक बयान दिया। उन्होंने कहा कि “नेपाल सेना, जनता की सेना है और अंततः जनता की इच्छाओं का पालन करेगी।” यह बयान नेपाल के मौजूदा राजनीतिक हालात को देखते हुए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। नेपाल में लोगों का एक बड़ा वर्ग मौजूदा सरकार से नाराज है और बदलाव की मांग कर रहा है। राजशाही समर्थक इस नाराजगी को अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश कर रहे हैं।
नेपाल में हाल ही में हुए कार्यक्रमों में भीड़ की उपस्थिति ने यह संकेत दिया है कि पूर्व राजा ज्ञानेंद्र के प्रति सहानुभूति बढ़ रही है। नेपाल के ग्रामीण इलाकों और कुछ शहरों में भी लोगों ने राजशाही के समर्थन में रैलियां निकाली हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि एक बड़ा वर्ग मौजूदा व्यवस्था से असंतुष्ट है।
Nepal Politics: क्यों हो रही राजशाही की वापसी की मांग?
नेपाल की मौजूदा राजनीतिक स्थिति को देखते हुए, भ्रष्टाचार, महंगाई और सत्ताधारी दलों के प्रति जनता का गुस्सा चरम पर है। लोग मौजूदा व्यवस्था से थक चुके हैं और राजतंत्र की वापसी को एक विकल्प के रूप में देख रहे हैं। पूर्व राजा ज्ञानेंद्र के स्वागत में 4 लाख से अधिक लोग सड़कों पर उतरे, जिसमें ‘राजा आओ, देश बचाओ’ जैसे नारे लगे।
राजशाही की वापसी की मांग करने वाली राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी (आरपीपी) के वरिष्ठ नेता रविंद्र मिश्रा ने कहा, “नेपाल में वर्तमान व्यवस्था से लोगों का मोहभंग हो गया है। जनता अब एक स्थिर और निष्पक्ष शासन चाहती है।” उन्होंने यह भी कहा कि नेपाल में भारत विरोधी भावना भी बढ़ी है, जिसका समाधान केवल सांस्कृतिक और ऐतिहासिक जड़ों को मजबूत करके ही किया जा सकता है।
हालांकि नेपाल में राजशाही की वापसी के आसार फिलहाल कम ही नजर आते हैं। नेपाल के वरिष्ठ पत्रकार चंद्रकिशोर का मानना है कि मौजूदा असंतोष के बावजूद नेपाल में राजशाही की वापसी संभव नहीं है। उनका कहना है कि जनता मौजूदा व्यवस्था से नाराज जरूर है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वे फिर से राजशाही की स्थापना चाहते हैं।
नेपाल के एक अन्य पत्रकार उमेश चौहान का भी यही मानना है कि राजशाही की वापसी का समर्थन करने वाले लोग सीमित संख्या में हैं। उन्होंने कहा कि लोग मौजूदा सरकार से जरूर नाराज हैं, लेकिन यह नाराजगी इतनी मजबूत नहीं है कि राजशाही की वापसी का आधार बन सके।
भारत-नेपाल संबंधों पर क्या पड़ेगा असर
नेपाल में हो रहे इन सियासी बदलावों का असर भारत-नेपाल संबंधों पर भी पड़ सकता है। नेपाल हमेशा से भारत की विदेश नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। भारत के उत्तर प्रदेश में गोरखनाथ मठ का नेपाल के राजघराने से ऐतिहासिक संबंध रहा है। ऐसे में योगी आदित्यनाथ के पोस्टरों का नेपाल में दिखना, भारत-नेपाल संबंधों की दिशा में एक नया संकेत दे सकता है।
नेपाल में भारत विरोधी भावना को लेकर भी चिंता जताई जा रही है। आरपीपी के नेताओं का मानना है कि मौजूदा कम्युनिस्ट सरकार भारत विरोधी एजेंडे को बढ़ावा दे रही है। ऐसे में राजशाही समर्थक दल नेपाल को फिर से हिंदू राष्ट्र बनाने के पक्षधर हैं, ताकि भारत-नेपाल संबंधों को और मजबूत किया जा सके।
मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) जीडी बक्शी कहते हैं, “नेपाल के पूर्व राजा ने हाल ही में देश का दौरा किया था और काठमांडू लौटने पर उनका स्वागत 4 लाख से अधिक नेपाली नागरिकों ने भव्य तरीके से किया। बीते महीने नेपाल के कई शहरों और कस्बों में राजा के समर्थन में दर्जनों मोटरसाइकिल रैलियां आयोजित की गईं। 2007 में, जब मैंने नेपाल में एनडीसी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया था, तब से मैं कहता आ रहा हूं कि भारत ने नेपाल में माओवादियों को सत्ता में लाकर और दुनिया के एकमात्र हिंदू साम्राज्य को समाप्त करके एक गंभीर रणनीतिक भूल की है।”
वह आगे कहते हैं, आज नेपाल के लोग माओवादियों की भ्रष्ट और विफल नीतियों से तंग आ चुके हैं। वे किसी भी रूप में राजा की वापसी की कामना कर रहे हैं—चाहे वह संवैधानिक सम्राट के रूप में हो, सांस्कृतिक प्रमुख के रूप में या फिर किसी राजनीतिक दल के संरक्षक के रूप में। राजा नेपाली जनता के लिए भगवान विष्णु के प्रतीक हैं और नेपाल में फिर से एक हिंदू राज्य की स्थापना का महत्वपूर्ण आधार बन सकते हैं।
वहीं रैली में योगी आदित्यनाथ के पोस्टर दिखने पर मेजर जनरल बख्शी का कहना है, “नेपाल में हो रही रैलियों में योगी आदित्यनाथ के पोस्टर दिखाई देना इस बात का संकेत है कि नेपाल की जनता हिंदू पहचान को फिर से मजबूत करने की इच्छा रखती है। जनता की इच्छा सर्वोपरि है, क्योंकि लोगों की आवाज ही भगवान की आवाज होती है।”
पहले हिंदू राष्ट्र था नेपाल
नेपाल का राजतंत्र समाप्त होने से पहले दुनिया का एकमात्र हिंदू राष्ट्र था। 2008 में गणतंत्र बनने के बाद इसे धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित कर दिया गया। लेकिन अब एक वर्ग फिर से नेपाल को हिंदू राष्ट्र बनाने की मांग कर रहा है। भारत में भी इस विचारधारा को समर्थन मिला है। 2006 में बीजेपी के तत्कालीन अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कहा था कि “नेपाल की मौलिक पहचान हिंदू राष्ट्र की है और इसे खत्म नहीं किया जाना चाहिए।” यही वजह है कि नेपाल में योगी आदित्यनाथ के पोस्टर लगने को सांस्कृतिक और राजनीतिक दोनों ही नजरिए से देखा जा रहा है।
क्या नेपाल फिर से हिंदू राष्ट्र बनेगा?
नेपाल में मौजूदा असंतोष का मुख्य कारण भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और सुस्त आर्थिक विकास है। जनता को लगता है कि मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था उनकी समस्याओं का समाधान नहीं कर पा रही है। हालांकि, जानकारों का मानना है कि इसका समाधान राजशाही में नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने में है।
नेपाल की वर्तमान राजनीतिक परिस्थिति को देखते हुए, राजतंत्र की वापसी और हिंदू राष्ट्र की स्थापना आसान नहीं है। हालांकि, जनता का बढ़ता असंतोष, राजनीतिक अस्थिरता और धार्मिक भावना इस विचार को समर्थन दे रही है। लेकिन क्या यह आंदोलन राजनीतिक सफलता में बदल पाएगा, यह देखना बाकी है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यह मुद्दा राजनीतिक रूप से संवेदनशील है और इसका असर भारत-नेपाल संबंधों पर भी पड़ सकता है। साथ ही, चीन की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है, क्योंकि नेपाल की मौजूदा सरकार चीन के साथ मजबूत संबंध रखती है।
Taliban Internal Rift: अफगानिस्तान की तालिबान सरकार में अंदरूनी कलह तेजी से बढ़ती जा रही है। तालिबान सरकार के आंतरिक मंत्री सिराजुद्दीन हक्कानी के 40 दिनों से लापता रहने की खबरें सामने आ रही हैं। सिराजुद्दीन हक्कानी 22 जनवरी को संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के लिए रवाना हुए थे और अब तक अफगानिस्तान नहीं लौटे हैं। उनकी गैरमौजूदगी के चलते इस्लामी शासन के भीतर गहरे मतभेदों की खबरें तेज हो गई हैं।
Taliban Internal Rift: स्तानिकजई भी दुबई में
सूत्रों के मुताबिक, हक्कानी और तालिबान सुप्रीम लीडर हैबतुल्लाह अखुंदजादा के बीच कुछ ठीक नहीं चल रहा है। 20 जनवरी को तालिबान के उप-विदेश मंत्री अब्बास स्तानिकजई ने सार्वजनिक तौर पर अखुंदजादा की नीतियों की आलोचना की थी, जिससे अंदरूनी विवाद खुलकर सामने आ गया था। जिसके बाद हैबतुल्लाह अखुंदजादा ने स्तानिकजई की गिरफ्तारी के आदेश जारी कर दिए, जिसके बाद उन्हें दुबई भागना पड़ा।
Taliban Internal Rift: तालिबान में दो धड़े – कंधार गुट बनाम हक्कानी नेटवर्क
सूत्रों के मुताबिक, सिराजुद्दीन हक्कानी की यह गैरमौजूदगी केवल एक विदेश यात्रा तक सीमित नहीं है, बल्कि तालिबान के भीतर उभरते गंभीर सत्ता संघर्ष का संकेत साफ नजर आ रहे हैं। सूत्रों का कहना है कि कंधार गुट और हक्कानी नेटवर्क के बीच तनाव इन दिनों चरम पर है। तालिबान के सर्वोच्च नेता हैबतुल्ला अखुंदजादा की अगुवाई वाला कंधार गुट पाकिस्तान के प्रभाव के खिलाफ है, जबकि हक्कानी नेटवर्क को पाकिस्तान का करीबी सहयोगी माना जाता है। वहीं, स्तानिकजई का यह बयान ऐसे समय आया, जब हक्कानी पाकिस्तान समर्थित समूह के प्रमुख चेहरे माने जाते हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि सिराजुद्दीन हक्कानी की विदेश यात्रा भी पाकिस्तान के समर्थन से हुई थी, जिससे कंधार गुट नाराज है।
Taliban Internal Rift: कंधार से काबुल पहुंचे भारी संख्या में लड़ाके
तालिबान की अंदरूनी फूट तब और गहरी हो गई, जब अखुंदजादा ने काबुल के कई महत्वपूर्ण इलाकों पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए अपने वफादार लड़ाकों को तैनात कर दिया। इनमें बाला हिसार किला और काबुल इंटरनेशनल एयरपोर्ट जैसे प्रमुख इलाके शामिल हैं, जो पहले हक्कानी नेटवर्क के निगरानी में थे।
सूत्रों के अनुसार, बीते एक सप्ताह में कंधार से बड़ी संख्या में तालिबानी लड़ाके काबुल पहुंचे हैं। इन लड़ाकों ने एयरपोर्ट और वहां के सुरक्षा चेकप्वाइंट्स पर तैनात हक्कानी नेटवर्क के लड़ाकों को हटा दिय। एक एयरपोर्ट कर्मचारी ने बताया कि काबुल में अब चारों तरफ हथियारों से लैस तालिबानी लड़ाके ही नजर आ रहे हैं। कंधार से आए लड़ाकों ने सुरक्षा चौकियों का कंट्रोल अपने हाथ में ले लिया है और अब शहर के विभिन्न हिस्सों में गश्त कर रहे हैं।
Taliban Internal Rift: हक्कानी को भगाने के पीछे पाकिस्तान का हाथ?
हक्कानी नेटवर्क के पाकिस्तान से गहरे संबंध हैं और कयास लगाए जा रहे हैं कि पाकिस्तान इस पूरे घटनाक्रम में अहम भूमिका निभा रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, सिराजुद्दीन हक्कानी की UAE और सऊदी अरब की यात्रा पाकिस्तान की सहमति से हुई थी, लेकिन इससे तालिबान के कंधार गुट में नाराजगी बढ़ गई।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर हक्कानी लंबे समय तक अफगानिस्तान से बाहर रहते हैं, तो इससे तालिबान के भीतर सत्ता संतुलन पूरी तरह से बदल सकता है। अखुंदजादा के वफादार लड़ाकों की काबुल में तैनाती यह संकेत देती है कि कंधार गुट अब तालिबान सरकार पर पूरी तरह नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश कर रहा है।
तालिबान का भविष्य अधऱ में?
सूत्रों ने बताया कि कंधार गुट के लड़ाकों के काबुल में आने के बाद अब शहर में तनाव बढ़ गया है। बाला हिसार किला और हवाई अड्डे पर सुरक्षा बढ़ा दी गई है। कहा जा रहा है कि तालिबान के गुटों के बीच संघर्ष और तेज हो सकता है। कंधार और काबुल के सूत्रों का कहना है कि अखुंदजादा ने यह रणनीति हक्कानी नेटवर्क की ताकत को सीमित करने के लिए बनाई है। पहले, हक्कानी नेटवर्क का इन इलाकों में प्रभाव था, लेकिन अब यह कंधार गुट के हाथों में जाता दिख रहा है।
वहीं, तालिबान के अंदर बढ़ती गुटबाजी उसके शासन के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनती जा रही है। अफगानिस्तान पहले से ही आर्थिक संकट और पाकिस्तान के बढ़ते दखल से जूझ रहा है, ऐसे में तालिबान के दो बड़े गुटों के बीच सत्ता की लड़ाई देश में और अस्थिरता को जन्म दे सकती है। यह देखना दिलचस्प होगा कि सिराजुद्दीन हक्कानी अफगानिस्तान लौटते हैं या नहीं, और अगर लौटते हैं तो क्या तालिबान के भीतर यह विवाद और गहराएगा?
Ukraine Military Aid: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यूक्रेन को दी जाने वाली सैन्य सहायता पर रोक लगाने का फैसला लिया है, जिससे अमेरिका और यूक्रेन के बीच संबंधों में तनाव बढ़ता जा रहा है। ट्रंप प्रशासन का कहना है कि जब तक यूक्रेन शांति वार्ता के लिए तैयार नहीं होता, तब तक अमेरिका से किसी भी प्रकार की सैन्य मदद नहीं दी जाएगी। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब यूक्रेन लगातार रूस के खिलाफ सैन्य समर्थन बढ़ाने की मांग कर रहा था।
Ukraine Military Aid: यूक्रेन का सबसे बड़ा रक्षा सहयोगी रहा है अमेरिका
फरवरी 2022 में रूस के आक्रमण के बाद से अमेरिका यूक्रेन का सबसे बड़ा सैन्य सहयोगी रहा है। अब तक अमेरिका ने यूक्रेन को 86 अरब डॉलर की सैन्य सहायता प्रदान करने की प्रतिबद्धता जताई थी, जिसमें से 46 अरब डॉलर राष्ट्रपति की विशेष अधिकार योजना (PDA), 33 अरब डॉलर यूक्रेन सुरक्षा सहायता पहल (USAI) और 7 अरब डॉलर फॉरेन मिलिट्री फंडिंग (FMF) के तहत दिए जाने थे। इन पैसों का उपयोग मिसाइल, टैंक, हेलिकॉप्टर, रक्षा प्रणाली और अन्य सैन्य उपकरणों की खरीद के लिए किया जाता रहा है। लेकिन अब इस सहायता को रोकने का निर्णय अमेरिका की विदेश नीति में बड़ा बदलाव माना जा रहा है।
Ukraine Military Aid: यूक्रेन को क्यों रोकी गई अमेरिकी सैन्य सहायता?
ट्रंप प्रशासन के इस फैसले के पीछे मुख्य वजह जेलेंस्की की हालिया टिप्पणियां मानी जा रही हैं। जेलेंस्की ने हाल ही में कहा था कि “यूक्रेन युद्ध का अंत अभी बहुत दूर है।” इस पर प्रतिक्रिया देते हुए ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर लिखा कि जेलेंस्की युद्ध को तभी खत्म करना चाहते हैं, जब तक अमेरिका उन्हें समर्थन देता रहेगा। इसके बाद ट्रंप ने यूक्रेन को दी जाने वाली सैन्य मदद पर रोक लगाने की घोषणा की।
व्हाइट हाउस के एक अधिकारी के अनुसार, यह रोक तब तक जारी रहेगी जब तक कि यूक्रेन यह साबित नहीं कर देता कि वह रूस के साथ शांति वार्ता के लिए प्रतिबद्ध है।
इससे पहले 28 फरवरी को व्हाइट हाउस में हुई एक बैठक में ट्रंप, उपराष्ट्रपति जेडी वांस और विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने जेलेंस्की पर अमेरिकी मदद के लिए पर्याप्त आभार न जताने का आरोप लगाया था। ट्रंप प्रशासन का कहना है कि अमेरिका अब यूक्रेन की नीति में बदलाव देखना चाहता है और चाहता है कि कीव जल्द से जल्द रूस के साथ शांति वार्ता करे।
Ukraine Military Aid: यूक्रेन पर क्या होगा असर?
यूक्रेन को रूस से मिल रही लगातार चुनौती के बीच अमेरिकी सैन्य मदद पर रोक लगना उसके लिए एक बड़ा झटका साबित हो सकता है। लेकिन इस सैन्य सहायता में से ज्यादातर रकम अब तक खर्च नहीं हुई थी। Center for Strategic and International Studies (CSIS) के अनुसार, अब तक केवल 20.2 अरब डॉलर की मदद ही यूक्रेन तक पहुंची थी। बाकी 34.2 अरब डॉलर की मदद को लेकर अमेरिकी सरकार ने अनुबंध किए थे, लेकिन वह अभी तक लागू नहीं हुए थे। अब ट्रंप के फैसले के बाद इन अनुबंधों पर भी संकट मंडरा रहा है।
यूक्रेन के प्रधानमंत्री डेनिस शमिहाल के अनुसार, यूक्रेन के पास अब भी सैन्य उत्पादन की क्षमता है, लेकिन वह अपनी कुल आवश्यकताओं का केवल 40% ही खुद से बना सकता है। बाकी 30% अमेरिका और 30% यूरोप से आता है। अमेरिकी मदद के बिना, यूक्रेन के लिए रूस के बढ़ते हमलों को रोक पाना मुश्किल हो सकता है। सैन्य विशेषज्ञों का कहना है कि बिना अमेरिकी सहायता के यूक्रेन केवल 2 से 4 महीने तक रूस के खिलाफ मजबूती से खड़ा रह सकता है। इसके बाद रूस को आगे बढ़ने का मौका मिल सकता है।
सैन्य विशेषज्ञ मार्क कैंसियन के अनुसार, अगर अमेरिका से मिलिट्री सप्लाई नहीं होती है, तो यूक्रेनी सेना दो से चार महीनों में कमजोर पड़ सकती है। उन्होंने चेतावनी दी कि अमेरिका की सैन्य सहायता बंद होने से रूस को युद्ध में निर्णायक बढ़त मिल सकती है।
Ukraine Military Aid: क्या यूरोप भर सकता है अमेरिका की जगह?
यूरोप अब तक यूक्रेन को अमेरिका के बराबर ही सैन्य मदद देता आया है। लेकिन अगर अमेरिका की मदद पूरी तरह से बंद हो जाती है तो यूरोपीय देशों को अपने सैन्य खर्च में भारी इजाफा करना होगा। ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस जैसे देश पहले ही सुरक्षा गारंटी देने की बात कर रहे हैं। हाल ही में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने 1.6 अरब पाउंड (2 अरब डॉलर) की सहायता की घोषणा की, जिसमें यूक्रेन को 5,000 एयर डिफेंस मिसाइलें मिलेंगी।
यूरोपीय देश अब रूसी सेंट्रल बैंक की जब्त संपत्तियों से यूक्रेन को मदद देने पर विचार कर रहे हैं। अमेरिका और यूरोप ने रूस के 300 अरब डॉलर की संपत्ति जब्त कर रखी है, जिसे यूक्रेन को देने की मांग तेज हो रही है। पोलैंड, एस्टोनिया, लिथुआनिया और लातविया जैसे देश इस कदम का समर्थन कर रहे हैं। हालांकि, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों इस प्रस्ताव का विरोध कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रणाली पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
Ukraine Military Aid: क्या ट्रंप के फैसले से अमेरिका की राजनीति बदलेगी?
ट्रंप के इस फैसले की अमेरिका में डेमोक्रेट नेताओं ने कड़ी आलोचना की है। पेंसिल्वेनिया से डेमोक्रेटिक कांग्रेस सदस्य ब्रेंडन बॉयल ने इसे ‘खतरनाक’ और ‘राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सीधा खतरा’ बताया है। वहीं, डेमोक्रेटिक सांसद डैन गोल्डमैन ने ट्रंप के इस कदम को यूक्रेनी राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की के खिलाफ एक और ब्लैकमेलिंग प्रयास बताया।
ट्रंप पहले भी NATO और यूरोपीय सहयोगियों से अमेरिका के ज्यादा योगदान पर सवाल उठाते रहे हैं। उन्होंने पहले भी संकेत दिए थे कि अमेरिका को अब वैश्विक सुरक्षा मुद्दों में अपनी भूमिका कम करनी चाहिए। लेकिन उनके इस कदम से अमेरिका के पारंपरिक सहयोगी नाराज हो सकते हैं और रूस को इससे सीधा फायदा हो सकता है।
क्या यूक्रेन लड़ाई जारी रख सकता है?
सैन्य विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका की मदद के बिना यूक्रेन की लड़ाई लंबे समय तक जारी रह पाना मुश्किल होगा। हालांकि, जेलेंस्की को अभी भी उम्मीद है। उन्होंने कहा कि अमेरिका और यूक्रेन के संबंध सिर्फ मदद तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह एक रणनीतिक साझेदारी है। लेकिन हकीकत यह है कि बिना अमेरिकी मदद के यूक्रेन को अपने सैन्य संसाधनों पर निर्भर रहना पड़ेगा और रूस के खिलाफ उसकी स्थिति कमजोर हो सकती है।
वहीं, यूक्रेन के पास युद्ध जारी रखने के कुछ सीमित विकल्प हैं। पहला, वे यूरोपीय देशों से ज्यादा मदद की मांग कर सकते हैं। जिसके तहत जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे देश अपनी सैन्य आपूर्ति बढ़ा सकते हैं, लेकिन इससे तुरंत कोई राहत नहीं मिलेगी। दूसरा विकल्प है कि यूक्रेन अपने सैन्य उत्पादन को बढ़ा सकता है। यूक्रेन ने हाल ही में ड्रोन और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम का बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू किया है, लेकिन इसी रफ्तार काफी धीमी है। वहीं, तीसरा विकल्प शांति वार्ता का है। रूस पहले ही शांति वार्ता का संकेत दे चुका है, लेकिन यूक्रेन को डर है कि इससे उसे अधिक क्षेत्रीय नुकसान हो सकता है।
वहीं, ट्रंप प्रशासन के इस फैसले से वैश्विक सुरक्षा संतुलन बदल सकता है। अगर यूरोप अमेरिका की कमी पूरी नहीं कर पाता, तो रूस के लिए यूक्रेन में अपनी पकड़ मजबूत करना आसान हो जाएगा। आने वाले हफ्तों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या ट्रंप अपने फैसले पर कायम रहते हैं या फिर अमेरिकी कांग्रेस और अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते इसमें बदलाव करते हैं।
US NATO Exit: अमेरिका में नाटो (NATO) और संयुक्त राष्ट्र (UN) से बाहर निकलने की चर्चाएं एक बार फिर तेज हो गई हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन में डिपार्टमेंट ऑफ गवर्नमेंट एफिशिएंसी’ के प्रमुख की भूमिका निभा रहे टेस्ला और स्पेसएक्स के सीईओ एलन मस्क ने अमेरिका के नाटो से बाहर निकलने का समर्थन किया है। मस्क ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पहले ट्विटर) पर इस मुद्दे पर एक पोस्ट का समर्थन करते हुए लिखा, “I agree” यानी “मैं सहमत हूं।”
मस्क के इस बयान ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। ट्रंप प्रशासन में भी कुछ रिपब्लिकन नेता पहले से ही नाटो को “शीत युद्ध की विरासत” बताते हुए इसे छोड़ने की मांग कर रहे हैं। इनमें प्रमुख नाम सीनेटर माइक ली का है, जिन्होंने नाटो को अमेरिका के लिए “घाटे का सौदा” करार दिया है। वहीं, ट्रंप ने भी अपने पहले कार्यकाल के दौरान नाटो की आलोचना की थी और यूरोपीय देशों पर रक्षा खर्च बढ़ाने का दबाव डाला था।
US NATO Exit: अमेरिका के नाटो छोड़ने की चर्चा क्यों हो रही है?
नाटो (North Atlantic Treaty Organization) एक मिलिट्री अलायन्स है, जो मुख्य रूप से यूरोप और उत्तरी अमेरिका के देशों की सुरक्षा सुनिश्चित करता है। अमेरिका इस संगठन का सबसे बड़ा सदस्य है और इसका प्रमुख आर्थिक और सैन्य योगदान देता है। हालांकि, कुछ रिपब्लिकन नेता और ट्रंप प्रशासन के कुछ अधिकारी इसे अमेरिका के लिए अनावश्यक बोझ मानते हैं।
सीनेटर माइक ली ने कहा कि “नाटो यूरोप के लिए एक बेहतरीन सौदा है, लेकिन अमेरिका के लिए एक महंगा समझौता।” उनका मानना है कि अमेरिका को अपनी सुरक्षा नीति पर अधिक ध्यान देना चाहिए और नाटो की जिम्मेदारियों से मुक्त होना चाहिए।
एलन मस्क की टिप्पणी ऐसे समय में आई है, जब यूक्रेन युद्ध के चलते नाटो की भूमिका लगातार बढ़ रही है। अमेरिका अब तक यूक्रेन को भारी सैन्य मदद दे चुका है, लेकिन कुछ रिपब्लिकन नेताओं का मानना है कि यह अमेरिकी करदाताओं के लिए बोझ बनता जा रहा है।
US NATO Exit: क्या अमेरिका वास्तव में नाटो से बाहर निकल सकता है?
हालांकि, अमेरिका के लिए नाटो छोड़ना आसान नहीं होगा। 2023 में, अमेरिकी सीनेट ने एक कानून पारित किया, जिसमें यह तय किया गया कि नाटो से बाहर निकलने का निर्णय केवल राष्ट्रपति अकेले नहीं ले सकते। इसके लिए कांग्रेस की मंजूरी या सीनेट में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी।
कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रंप यदि दोबारा राष्ट्रपति बनते हैं, तो वह कानूनी रूप से नाटो से बाहर न निकलकर इसकी भूमिका को कमजोर कर सकते हैं। इसका मतलब यह होगा कि अमेरिका सैन्य गठबंधन में बना रहेगा, लेकिन वह अपनी भागीदारी को सीमित कर सकता है।
US NATO Exit: नाटो से बाहर निकलना यूरोप के लिए बड़ा झटका
यूक्रेन युद्ध के बीच NATO अमेरिका की मदद से रूस के खिलाफ एकजुट बना हुआ है। लेकिन अगर अमेरिका इस सैन्य गठबंधन से बाहर निकलता है, तो यह वैश्विक सुरक्षा को लेकर एक बड़ा झटका होगा। NATO यूरोपीय देशों के लिए सुरक्षा कवच की तरह काम करता है, खासकर रूस के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए। कई यूरोपीय नेता पहले ही ट्रंप प्रशासन की इस नीति को लेकर चिंता जता चुके हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका के NATO छोड़ने से यूरोप में सैन्य संतुलन बिगड़ सकता है और रूस को यूक्रेन या अन्य पूर्वी यूरोपीय देशों में और आक्रामक कदम उठाने का मौका मिल सकता है। NATO में अमेरिका की अहम भूमिका रही है, लेकिन अगर वह हटता है तो यूरोपीय देशों को अपनी रक्षा नीति में भारी बदलाव करना पड़ेगा।
US NATO Exit: क्या अमेरिका संयुक्त राष्ट्र से भी हट सकता है?
नाटो के अलावा, अमेरिका के संयुक्त राष्ट्र (UN) से बाहर निकलने की चर्चा भी हो रही है। कुछ रिपब्लिकन नेता UN को “तानाशाहों का मंच” करार देते हुए इससे अलग होने की मांग कर चुके हैं। अमेरिकी सीनेटर थॉमस मैसी ने हाल ही में कहा था कि “संयुक्त राष्ट्र अब अमेरिका और उसके सहयोगियों पर हमले करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।”
संयुक्त राष्ट्र से बाहर निकलने का मतलब यह होगा कि अमेरिका वैश्विक राजनीति में अपनी पकड़ खो सकता है। अगर अमेरिका UN से बाहर निकलता है, तो इसका सीधा असर ग्लोबल डिप्लोमेसी पर पड़ेगा। अमेरिका UN को सबसे ज्यादा फंड देने वाले देशों में शामिल है और इसका सबसे ज्यादा प्रभाव सुरक्षा परिषद (Security Council) में रहता है। UN से बाहर निकलने का मतलब यह होगा कि अमेरिका अपनी वैश्विक भूमिका को कम कर रहा है, जिससे चीन और रूस को अधिक ताकत मिल सकती है। वहीं इससे संगठन की फंडिंग पर गहरा असर पड़ेगा।
अगर अमेरिका नाटो और संयुक्त राष्ट्र से बाहर निकलता है तो क्या होगा?
अगर अमेरिका नाटो से बाहर निकलता है, तो इसका सबसे ज्यादा प्रभाव यूरोप पर पड़ेगा। यूरोपीय देशों को अपनी सुरक्षा के लिए अतिरिक्त खर्च करना पड़ेगा और रूस जैसी ताकतों के खिलाफ उनका बचाव कमजोर हो सकता है।
इसके अलावा, इस फैसले से पूरी दुनिया में अमेरिका की स्थिति भी कमजोर होगी। अगर अमेरिका संयुक्त राष्ट्र से भी बाहर निकलता है, तो इसका सीधा फायदा चीन और रूस को मिलेगा। कई विशेषज्ञों का मानना है कि इससे संयुक्त राष्ट्र के भीतर चीन की भूमिका बढ़ जाएगी और वैश्विक राजनीति में अमेरिका का प्रभाव कम हो जाएगा।
विशेषज्ञ जेम्स गोल्डगियर के अनुसार, “अगर अमेरिका नाटो से बाहर निकलता है, तो इसका कोई दूसरा विकल्प नहीं होगा। यह एक बड़ी वैश्विक अस्थिरता पैदा करेगा।”
US NATO Exit: क्या NATO और UN छोड़ पाएगा अमेरिका?
हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका के लिए NATO और UN छोड़ना इतना आसान नहीं होगा। खासकर UN के मामले में, क्योंकि UN चार्टर में यह साफ लिखा है कि कोई भी सदस्य देश स्वेच्छा से बाहर नहीं निकल सकता जब तक कोई और पक्ष इसका उल्लंघन नहीं करता। इतिहास में सिर्फ एक बार इंडोनेशिया ने 1965-66 में UN छोड़ा था, लेकिन बाद में वह बिना किसी विशेष प्रक्रिया के वापस आ गया। अगर अमेरिका NATO छोड़ने का फैसला करता है, तो इससे यूरोप में सैन्य शक्ति का संतुलन बिगड़ जाएगा। अमेरिका की यह नीति ‘अमेरिका फर्स्ट’ का हिस्सा तो हो सकती है, लेकिन यह उसे वैश्विक मामलों से अलग-थलग कर सकती है।
डोनाल्ड ट्रंप की नाटो और UN पर क्या राय है?
ट्रंप पहले से ही नाटो की आलोचना करते रहे हैं। उन्होंने 2019 में कहा था कि “मुझे नाटो से कोई मतलब नहीं है।” उनके अनुसार, यूरोपीय देशों को अपनी सुरक्षा पर अधिक खर्च करना चाहिए और अमेरिका को इन देशों की रक्षा करने के लिए अपने संसाधन बर्बाद नहीं करने चाहिए।
2020 में, ट्रंप ने यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन से कहा था कि “अगर यूरोप पर हमला होता है, तो अमेरिका आपकी मदद के लिए नहीं आएगा।” उन्होंने यह भी कहा था कि “नाटो अब खत्म हो चुका है और अमेरिका इसे छोड़ने वाला है।”
हालांकि, उनके दोबारा राष्ट्रपति बनने के बावजूद, अमेरिका का नाटो और संयुक्त राष्ट्र से बाहर निकलना कानूनी और राजनीतिक रूप से जटिल होगा।
US NATO Exit: क्या अमेरिका वास्तव में अलग हो सकता है?
अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति है और यदि वह नाटो या संयुक्त राष्ट्र से बाहर निकलता है, तो इससे वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था पर गहरा प्रभाव पड़ेगा। हालांकि, यह इतना आसान नहीं होगा। अमेरिका में कई राजनीतिक और कानूनी बाधाएं हैं, जो इसे रोक सकती हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप और उनके समर्थक भले ही नाटो और संयुक्त राष्ट्र से बाहर निकलने की धमकी दें, लेकिन वास्तव में ऐसा करना मुश्किल होगा।
ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन के विशेषज्ञ स्कॉट एंडरसन के अनुसार, “कांग्रेस के पास राष्ट्रपति के फैसले को अदालत में चुनौती देने का अधिकार है। अगर ट्रंप नाटो से बाहर निकलने का फैसला करते हैं, तो उन्हें कांग्रेस के साथ लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी होगी।”
अमेरिकी जनता की राय क्या है?
अमेरिका में कई सर्वेक्षणों में पाया गया है कि अधिकांश अमेरिकी नागरिक नाटो और संयुक्त राष्ट्र में बने रहने का समर्थन करते हैं। पिछले साल किए गए एक सर्वेक्षण में पाया गया कि 68 फीसदी अमेरिकी नागरिक नाटो में अमेरिका की भागीदारी को आवश्यक मानते हैं।
संयुक्त राष्ट्र के मामले में भी, अधिकांश अमेरिकी मानते हैं कि अमेरिका को वैश्विक मंचों पर अपनी स्थिति बनाए रखनी चाहिए।
IAF Fighter Jet Shortage: लड़ाकू विमानों की कमी से जूझ रही भारतीय वायुसेना को अपनी युद्धक क्षमता बनाए रखने के लिए तेज़ी से नए विमान शामिल करने की जरूरत है। हाल ही में, रक्षा मंत्रालय की एक उच्च स्तरीय समिति ने एक रिपोर्ट पेश की है, जिसमें भारतीय वायुसेना की क्षमताओं को बढ़ाने के लिए कई सिफारिशें की गई हैं। यह रिपोर्ट उस समय आई है जब भारतीय वायुसेना प्रमुख, एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने खुलकर इस बात पर चिंता जताई थी कि लड़ाकू विमानों की संख्या तेजी से घट रही है और इसे पूरा करने के लिए हर साल 35-40 नए लड़ाकू विमानों की जरूरत होगी।
रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने हाल ही में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को “सशक्त समिति” (Empowered Committee for Capability Enhancement of IAF) की रिपोर्ट सौंपी। इस रिपोर्ट में भारतीय वायुसेना की जरूरतों की पूरी समीक्षा की गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि वायुसेना की मौजूदा ताकत को बनाए रखना है और भविष्य की जरूरतों को पूरा करना है, तो स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देना जरूरी है। फिलहाल, वायुसेना के पास केवल 30 स्क्वाड्रन हैं, जबकि यह संख्या 42 होनी चाहिए। यह कमी भारतीय वायुसेना की युद्धक क्षमता को प्रभावित कर सकती है, खासकर तब जब भारत चीन और पाकिस्तान जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है।
IAF Fighter Jet Shortage: 2030 तक कई पुराने विमान होंगे रिटायर
भारतीय वायुसेना की बड़ी चुनौती है कि 2030 तक उसे कई पुराने विमानों को सेवा से बाहर करना होगा, जिनमें मिग-21, मिग-29 और मिराज-2000 शामिल हैं। इन विमानों की जगह नए विमानों को शामिल करने के लिए हर साल कम से कम 40 नए विमान चाहिए, लेकिन मौजूदा प्रोडक्शन रफ्तार बेहद कम है। यही वजह है कि वायुसेना और रक्षा मंत्रालय अब निजी क्षेत्र को शामिल करने पर विचार कर रहे हैं। वायुसेना सूत्रों का कहना है कि टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स, लार्सन एंड टुब्रो (L&T), और रिलायंस डिफेंस जैसी कंपनियों को इस प्रोजेक्ट में शामिल किया जा सकता है।
IAF Fighter Jet Shortage: भारतीय वायुसेना नहीं चाहती Su-57E या अमेरिकी F-35
रक्षा मंत्री को सौंपी इस रिपोर्ट में खासतौर पर यह स्पष्ट किया गया है कि भारतीय वायुसेना रूस के Su-57E या अमेरिकी F-35 जैसे विदेशी फाइटर जेट्स को शामिल करने के पक्ष में नहीं है, बल्कि वह पूरी तरह से स्वदेशी पांचवी पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर जेट एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) प्रोग्राम पर फोकस कर रही है। इसके अलावा, MRFA (Multi-Role Fighter Aircraft) प्रोग्राम के तहत 114 फाइटर जेट्स की खरीद को लेकर भी चर्चा चल रही है, ताकि IAF की स्क्वाड्रन क्षमता को बढ़ाया जा सके। हालांकि, यह प्रोग्राम 2018 से ही लटका हुआ है, और अब इसे जल्द से जल्द आगे बढ़ाने की जरूरत महसूस की जा रही है।
IAF Fighter Jet Shortage: दोनों जेट्स IAF की प्राथमिकताओं में नहीं
हाल के एयरो इंडिया 2025 एयर शो में रूस के Su-57E और अमेरिका के F-35 लड़ाकू विमानों को पेश किया गया, जिससे यह अटकलें लगाई जा रही थीं कि भारत इनमें से किसी एक को प्राथमिकता दे सकता है। लेकिन भारतीय वायुसेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने साफ कर दिया कि यह दोनों जेट्स IAF की प्राथमिकताओं में शामिल नहीं हैं। रूस के Su-57E को ठुकराने की वजह यह है कि यह विमान अभी तक पूरी तरह डेवलप नहीं हुआ है और इसके कई तकनीकी पहलू अभी भी अधूरे हैं। इसकी स्टील्थ तकनीक और अन्य क्षमताएं चीन के J-20 स्टील्थ फाइटर के मुकाबले कमजोर मानी जा रही हैं। इसके अलावा रूस की मौजूदा आर्थिक और सैन्य हालात के चलते इसके प्रोडक्शन और डिलीवरी में देरी हो सकती है। वहीं अमेरिका के F-35 को ठुकराने की वजह यह है कि यह एक नेटवर्क-सेंट्रिक वॉरफेयर जेट है, जिसके ऑपरेशन के लिए अमेरिका की पूरी निगरानी बनी रहेगी। इससे भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता पर असर पड़ सकता है। अमेरिका के कई अलायंस देशों को यह विमान देने के बावजूद, इसके तकनीकी अपग्रेड और सपोर्ट सिस्टम में अमेरिका का कंट्रोल रहता है।
IAF Fighter Jet Shortage: चीन के J-35 स्टील्थ फाइटर को टक्कर देगा AMCA
भारतीय वायुसेना का मानना है कि AMCA भारत के दीर्घकालिक रणनीतिक उद्देश्यों के लिए बेहद जरूरी है। इस प्रोजेक्ट के तहत स्वदेशी स्टील्थ फाइटर जेट डेवलप किया जाएगा, जो चीन और पाकिस्तान की वायुसेनाओं को टक्कर देने में सक्षम होगा। AMCA की जरूरत इसलिए भी बढ़ गई है, क्योंकि चीन ने पहले ही J-20 स्टील्थ फाइटर को तैनात कर दिया है और जल्द ही J-35A को अपनी नौसेना में शामिल करने की तैयारी कर रहा है। इसके अलावा, पाकिस्तान को भी J-35 स्टील्थ फाइटर सौंपने की संभावना जताई जा रही है।
HAL के पास काम का बेहद लोड
भारतीय वायुसेना के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड की उत्पादन दर बेहद धीमी है। वर्तमान में हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड के पास कई महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स हैं, जिनमें तेजस Mk-1A, तेजस Mk-2, HTT-40 ट्रेनर एयरक्राफ्ट और AMCA स्टील्थ फाइटर का डेवलपमेंट शामिल है। HAL की सीमित उत्पादन क्षमता को देखते हुए भारतीय वायुसेना और रक्षा मंत्रालय अब निजी क्षेत्र को इस प्रक्रिया में शामिल करने की योजना बना रहे हैं। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि HAL अकेले इतने बड़े ऑर्डर्स को पूरा नहीं कर सकता, इसलिए प्राइवेट कंपनियों को भी तेजस Mk-2 के उत्पादन में शामिल करने पर विचार किया जा रहा है।
रक्षा मंत्रालय ने टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स (TASL), लार्सन एंड टुब्रो (L&T) और रिलायंस डिफेंस जैसी कंपनियों को संभावित भागीदार माना है। इन कंपनियों के पास पहले से ही एयरोस्पेस और डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग का अनुभव है और सरकार चाहती है कि वे HAL के साथ मिलकर तेजस Mk-2 और अन्य विमानों का प्रोडक्शन करें। अगर HAL और निजी कंपनियों की साझेदारी सफल होती है, तो भारत अगले 10 वर्षों में एक शक्तिशाली वायुसेना बना सकता है।
तेजस MK-1A के प्रोडक्शन में देरी
तेजस MK-1A कार्यक्रम में देरी की मुख्य वजहों में से एक अमेरिकी कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक (GE) द्वारा F-404 इंजन की आपूर्ति में देरी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस मुद्दे को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सामने उठाया था। भारत सरकार इस समस्या को हल करने के लिए अमेरिका के साथ लगातार संपर्क में है, ताकि इन इंजनों की डिलीवरी में तेजी लाई जा सके।
भारतीय वायुसेना ने पहले ही 48,000 करोड़ रुपये की लागत वाले 83 तेजस MK-1A विमान खरीदने का ऑर्डर दे चुकी है। अब सरकार 97 और तेजस MK-1A विमान खरीदने पर विचार कर रही है, जिसकी अनुमानित लागत 67,000 करोड़ रुपये होगी। साथ ही, तेजस MK-2 पर भी काम तेजी से चल रहा है। यह विमान मिग-29 और मिराज-2000 जैसे पुराने विमानों की जगह लेगा। HAL की उत्पादन दर फिलहाल 16-20 विमान सालाना है, लेकिन इसे बढ़ाने की जरूरत है। निजी कंपनियों की भागीदारी इस लक्ष्य को हासिल करने में मदद कर सकती है।
रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि कम से कम 60 तेजस Mk-1A विमान निजी क्षेत्र द्वारा बनाए जाएं, ताकि HAL अन्य महत्वपूर्ण परियोजनाओं, जैसे कि AMCA (Advanced Medium Combat Aircraft) और TEDBF (Twin Engine Deck Based Fighter) पर फोकस कर सके।
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