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Bagram Airbase Explainer: Who is in possession of Bagram – US, China or Taliban? What is running behind the curtains?

Bagram Airbase Explainer: Who Controls Bagram Airbase – US or China? What’s Really Happening in Afghanistan Again?

Bagram Airbase Explainer: The Bagram Airbase of Afghanistan is once again in international headlines. This is the airbase where the U.S. retained its military dominance for twenty years and from where he drived large military campaigns against Taliban and Al-Qaida. But now the question arises whether this airbase has again gone under US control? Or as being said in some reports, is it now in China monitoring? Or taliban is still holding its hold on it?

Bagram Airbase Explainer: Who Controls Bagram Airbase – US or China? What’s Really Happening in Afghanistan Again?

The question stood when some media reports claimed that Taliban has handed over to Bagram Airbase US. According to the report, many C-17 globemaster aircraft of the U.S. Air Force landed there, with military Sajo-Sahman and intelligence officers. Not only that, it also has the news of CIA’s deputy Chief Michael Ellis coming. But Taliban has dismissed all these news and has described it as "Propegenda". Taliban said that he has complete control over the bugram and has no intention to hand it over any foreign strength.

Bagram Airbase Explainer: The Soviet Union Made Bugram Airbase

बगराम एयरबेस का इतिहास काफी पुराना और रोचक है। इसे 1950 के दशक में सोवियत संघ ने बनाया था और 1979 से 1989 तक सोवियत-अफगान युद्ध के दौरान यह उनका प्रमुख सैन्य अड्डा रहा। बाद में, 2001 में अमेरिका के नेतृत्व वाली गठबंधन सेना ने अफगानिस्तान पर हमला किया, जिसके बाद बगराम अमेरिकी सेना का मुख्य केंद्र बन गया। यहां से अल-कायदा और तालिबान के खिलाफ 20 साल तक अभियान चलाया गया। अपने चरम पर, 2012 में यहां 100,000 से अधिक सैनिक और ठेकेदार तैनात थे। इस एयरबेस में दो बड़े रनवे, विशाल हैंगर, एक अस्पताल और एक हिरासत केंद्र भी था, जिसे “ग्वांतानामो बे ऑफ अफगानिस्तान” भी कहा जाता था।

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यह एयरबेस अपनी रणनीतिक स्थिति के कारण बेहद महत्वपूर्ण है। यह अफगानिस्तान की राजधानी काबुल से लगभग 40 मील उत्तर में परवान प्रांत में स्थित है और ईरान, चीन और मध्य एशियाई देशों की सीमाओं के करीब है। खास तौर पर, यह चीन के शिनजियांग क्षेत्र में मौजूद परमाणु सुविधाओं से केवल 400 मील दूर है, जिसके कारण इसकी भू-राजनीतिक अहमियत और भी बढ़ जाती है।

Bagram Airbase Explainer: क्या हुआ था बगराम के साथ?

15 अगस्त 2021 को अमेरिकी सेना ने अफगानिस्तान को अलविदा कह दिया। इस दौरान बगराम एयरबेस को अफगान सेना के हवाले कर दिया गया, लेकिन तालिबान ने जल्द ही देश पर कब्जा कर लिया और यह उनके नियंत्रण में आ गया। उस समय अमेरिकी की काफी आलोचना हुई थी। अमेरिकी सैनिकों ने बिना स्थानीय सहयोगियों को सूचित किए बेस छोड़ दिया, जिसके बाद तालिबान ने इसे अपने कब्जे में ले लिया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, वहां 7 अरब डॉलर से अधिक के सैन्य उपकरण भी छूट गए थे।

अब, लगभग चार साल बाद, इस महीने अप्रैल 2025 में कुछ चौंकाने वाली खबरें सामने आईं। अफगानिस्तान की खामा प्रेस ने 7 अप्रैल, 2025 को रिपोर्ट दी कि अमेरिकी वायुसेना के कई C-17 ग्लोबमास्टर III विमान बगराम पर उतरे हैं। इन विमानों में सैन्य वाहन, उपकरण और वरिष्ठ खुफिया अधिकारी शामिल थे, जिनमें CIA के उप-निदेशक माइकल एलिस का नाम भी लिया गया। इस रिपोर्ट में दावा किया गया कि तालिबान ने यह एयरबेस अमेरिका को हाई-टेक ऑपरेशंस के लिए सौंप दिया है।

हालांकि, तालिबान के प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद ने इन दावों को “प्रोपेगैंडा” करार देते हुए खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान की संप्रभुता पर कोई समझौता नहीं होगा और किसी भी विदेशी सैन्य मौजूदगी की अनुमति नहीं दी जाएगी। तालिबान का कहना है कि बगराम उनके नियंत्रण में है और इसे अमेरिका को सौंपना “असंभव” है।

ट्रंप का दावा: बाइडेन की गलती से चीन का कब्जा?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 8 अप्रैल, 2025 को रिपब्लिकन नेशनल कमेटी में दिए एक भाषण में बाइडन प्रशासन पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि 2021 में अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद बगराम असुरक्षित हो गया था, जिसका फायदा चीन ने उठाया। ट्रंप के मुताबिक, अगर वे सत्ता में होते, तो बगराम पर अमेरिका का नियंत्रण बना रहता, क्योंकि यह न केवल अफगानिस्तान के लिए, बल्कि चीन की परमाणु गतिविधियों की निगरानी के लिए भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने इसे “अमेरिकी इतिहास की सबसे बड़ी आपदा” करार दिया और दावा किया कि अब यह एयरबेस प्रभावी रूप से चीन के नियंत्रण में है।

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हालांकि, ट्रंप के इस दावे का कोई ठोस सबूत नहीं मिला है। न तो अमेरिकी सरकार और न ही तालिबान ने इसकी पुष्टि की है कि बगराम पर चीन का कोई नियंत्रण है। इसके उलट, चीन के विदेश मंत्रालय ने मार्च 2025 में एक बयान में कहा था कि उनकी बगराम में कोई सैन्य महत्वाकांक्षा नहीं है, हालांकि चीन ने अफगान लिथियम और अन्य खनिज संसाधनों में निवेश करना शुरू किया है और तालिबान सरकार से दोस्ताना रिश्ते बना लिए हैं। ऐसे में यह आशंका बढ़ती जा रही है कि कहीं चीन इस एयरबेस का इस्तेमाल किसी प्रकार की निगरानी या सामरिक गतिविधि के लिए तो नहीं कर रहा।

Bagram Airbase Explainer: C-17 विमानों की लैंडिग की क्या है सच्चाई?

हालांकि, मीडिया रिपोर्ट्स और फ्लाइट ट्रैकिंग डेटा कुछ और ही कहानी बयां करते हैं। क़तर से उड़ान भरने वाला एक अमेरिकी C-17 विमान हाल ही में पाकिस्तान के रास्ते बगराम एयरबेस पर उतरा। फ्लाइट ट्रैकिंग डेटा ने भी इसकी पुष्टि की है कि एक C-17 विमान कतर के अल-उदेद बेस से पाकिस्तान के रास्ते बगराम पहुंचा। हालांकि यह कोई सामान्य घटना नहीं है। यदि वाकई ऐसा हुआ है तो यह या तो तालिबान और अमेरिका के बीच किसी गुप्त समझौते का संकेत है, या फिर यह सिर्फ एक अस्थायी खुफिया मिशन हो सकता है।

C-17 ग्लोबमास्टर III विमान सिर्फ एक बड़ा कार्गो प्लेन नहीं है। बल्कि यह अमेरिकी वायुसेना की रीढ़ है। C-17 ग्लोबमास्टर III 170,900 पाउंड तक का भार ले जा सकता है और बिना ईंधन भरे 2,400 समुद्री मील तक उड़ान भर सकता है। यह विमान छोटे और खराब रनवे पर भी उतर सकता है। यह भारी सैन्य सामान, टैंक, ट्रक, ड्रोन और यहां तक कि हेलिकॉप्टर भी ले जाने में सक्षम है। यदि यह विमान वाकई बगराम पहुंचा है, तो सवाल उठता है — इसमें क्या लाया गया?

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इसमें एडवांस निगरानी उपकरण, ड्रोन (जैसे MQ-9 रीपर), और शायद खुफिया मिशन के लिए मोबाइल ऑपरेशन यूनिट्स हो सकते हैं। रीपर ड्रोन को खासतौर पर आतंकवादियों पर निगरानी और हमले के लिए इस्तेमाल किया जाता है और इसकी मौजूदगी अफगानिस्तान में फिर से अमेरिकी गतिविधियों की ओर इशारा कर सकती है।

माइकल एलिस की मौजूदगी के क्या हैं मायने?

सीआईए के डिप्टी डाइरेक्टर माइकल एलिस की अफगानिस्तान में मौजूदगी यदि सच है, तो इसका मतलब है कि कोई बड़ी खुफिया रणनीति पर काम चल रहा है। एलिस की विशेषज्ञता राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद विरोधी कानूनों में है। संभव है कि उनका मिशन तालिबान के साथ किसी खुफिया साझेदारी को फिर से स्थापित करना हो, खासकर ISIS-K जैसे साझा दुश्मनों के खिलाफ।

कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह ISIS-K जैसे आतंकी समूहों पर नजर रखने के लिए हो सकता है, जो इन दिनों अफगानिस्तान में सक्रिय है और हाल ही में मॉस्को में एक हमले के लिए भी जिम्मेदार था। उनका कहना है कि तालिबान के पास सीमित संसाधन हैं, तो हो सकता है कि तालिबान ने उन पर कार्रवाई करने के लिए अमेरिका से मदद मांगी हो। उनका कहना है कि तालिबान के सामने कई चुनौतियां हैं – आर्थिक संकट, अंतरराष्ट्रीय मान्यता न मिलना और ISIS-K जैसे दुश्मन। विश्व बैंक के अनुसार, 2021 के बाद अफगानिस्तान की जीडीपी 30% तक सिकुड़ गई है। ऐसे में, तालिबान को अमेरिकी मदद की जरूरत पड़ सकती है। दूसरी ओर, अमेरिका के लिए बगराम ईरान और चीन की निगरानी के लिए एक महत्वपूर्ण ठिकाना हो सकता है।

पाकिस्तान से भी है तालिबान को चैलेंज

अंरराष्ट्रीय मामलों के जानकार प्रोफेसर रिजवान अहमद कहते हैं कि तालिबान इस वक्त आर्थिक और राजनयिक मोर्चे पर घिरा हुआ है। अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था चरमराई हुई है, विदेशी निवेश और सहायता लगभग ठप है, और दुनिया के ज़्यादातर देश आज भी तालिबान सरकार को मान्यता देने से हिचकिचा रहे हैं। ऐसे में अगर अमेरिका जैसा ताकतवर देश, जो कभी उनका सबसे बड़ा दुश्मन था, अब सहयोग की पहल करता है, तो तालिबान इसे नजरअंदाज नहीं कर सकता।

वह कहते हैं कि पाकिस्तान, जो कभी तालिबान का सबसे मजबूत समर्थक था, उसने साल 2023 से अब तक पाकिस्तान ने 10 लाख से ज्यादा अफगान शरणार्थियों को वापस भेज दिया है। वहीं दूसरी ओर, रूस इस बात पर विचार कर रहा है कि क्या तालिबान को अपनी आतंकी सूची से हटा दिया जाए। यानी तालिबान अब ऐसी स्थिति में है जहां उसे अंतरराष्ट्रीय सहयोग की जरूरत है— भले वह सीमित और अस्थायी ही क्यों न हो।

प्रोफेसर रिजवान अहमद के मुताबिक ऐसे में अगर अमेरिका के साथ किसी सीमित समझौते के तहत बगराम एयरबेस को फिर से किसी रणनीतिक उद्देश्य के लिए इस्तेमाल करने दिया जाता है, तो तालिबान के लिए यह एक सुरक्षा और कूटनीतिक बढ़त का सौदा हो सकता है। इससे उन्हें न सिर्फ क्षेत्रीय ताकतों के दबाव से राहत मिलेगी, बल्कि वैश्विक मान्यता की दिशा में एक छोटा लेकिन मजबूत कदम भी माना जाएगा।

अमेरिका की “ओवर-द-होराइजन” रणनीति

वह कहते हैं कि अमेरिका अब “ओवर-द-होराइजन” रणनीति पर काम कर रहा है — यानी बिना जमीन पर सैनिक उतारे, किसी भी समय सटीक निशाना लगाने की क्षमता। जुलाई 2023 में कतर के एक अमेरिकी बेस से ड्रोन हमला कर सीरिया में अल-कायदा के एक टॉप कमांडर को मार गिराया गया था। जो अमेरिका की “ओवर-द-होराइजन” रणनीति का हिस्सा था। ऐसे में अगर अमेरिका को बगराम जैसे ठिकाने का दोबारा इस्तेमाल करने का मौका मिलता है, तो वह न केवल अपनी सैन्य पहुंच मजबूत करेगा, बल्कि क्षेत्र में अपनी मौजूदगी भी दोबारा स्थापित कर सकता है — वो भी बिना ज़्यादा सैनिक भेजे।

वहीं बगराम एयरबेस अफगानिस्तान के केंद्र में है, ईरान की सीमा से महज 600 मील की दूरी पर, और चीन के उइगर इलाके (शिंजियांग) से भी पास है, जहां उसके न्यूक्लियर और मिलिट्री प्रोग्राम चल रहे हैं। यानि, अमेरिका को यहां से नज़र रखने और जरूरत पड़ने पर एक्शन ले सकता है।

वह कहते हैं कि डोनाल्ड ट्रंप ने अपने 2024 के चुनावी कैंपेन में बार-बार कहा कि बगराम को छोड़ना एक “ऐतिहासिक गलती” थी और यह चीन के मिसाइल बेस से बस एक घंटे की दूरी पर है। अब, ये दावा भले ही ज़रा बढ़ा-चढ़ाकर हो, लेकिन ट्रंप की बात में रणनीतिक सचाई जरूर है— बगराम की लोकेशन अमेरिका के लिए एक बड़ी ताकत बन सकती है।

‘डील विद द डेविल’ जैसा

प्रोफेसर रिजवान अहमद आगे कहते हैं कि और अगर वाकई ऐसा कुछ हो रहा है, तो ये एक ‘डील विद द डेविल’ जैसा ही है — तालिबान, जो कभी अमेरिका का दुश्मन था, अब शायद उसी के साथ कोई मौन समझौता कर रहा है। और अमेरिका, जिसने तालिबान के खिलाफ दो दशक तक लड़ाई लड़ी, अब उसी के भरोसे इस क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है।

बगराम एयरबेस, जो कभी अमेरिकी शक्ति का प्रतीक था, अब शायद फिर से वैश्विक शतरंज की बिसात पर एक ‘क्वीन’ की तरह लौट रहा है। लेकिन इस बार चालें कहीं ज़्यादा खामोश, तेज और रणनीतिक हैं। इस पूरे घटनाक्रम में एक बात तो तय है कि अगर बगराम में अमेरिका वाकई फिर से सक्रिय हो रहा है, तो इसका असर सिर्फ अफगानिस्तान तक सीमित नहीं रहेगा। ये पूरे मध्य एशिया, ईरान, चीन और रूस की सुरक्षा और कूटनीतिक रणनीतियों को प्रभावित कर सकता है।

26 Rafale Marine Deal: INS Vikrant will get new strength, India sanctioned the largest 63,000 crore Rafale Marine Jet Deal

26 Rafale Marine Deals: India Approves ₹63,000 Cr Contracts to Boost INS Vikrant’s Combat Power

26 Rafale Marine Deal: Cabinet Committee on Security (CCS) approved the purchase of 26 Rafale Marinefighter jets for the Indian Navy on Tuesday. It is the largest fighter jet deal so far, priced more than Rs 63,000 crore. The deal will be under the Government-to-Government agreement (G2G) with France.

26 Rafale Marine Deals: India Approves ₹63,000 Cr Contracts to Boost INS Vikrant’s Combat Power

26 Rafale Marine Deal: What does this deal include?

Under this deal, the Navy will get 22 single-seaters and 4 twin-seater Rafale Marine Jets. Not just the plane, but also the deal includes Fleet Maintenance, Logistic Support, Staff Training, and offset terms that promote production in India. France will also invest in India. While this deal is not just a military deal but also a big step towards strengthening India’s indigenous defence production policy.

26 Rafale Marine Deal: When will the delivery of these jets begin?

The delivery of jets will begin after five years after the deal is signed. When these aircraft will join the Indian Navy, they will be directly deployed on INS Vikrant, India’s first indigenous aircraft vessel. At the moment the MiG-29K fighter jets from INS Vikrant are operating, but the arrival of Raphael Marine will increase the strength of this aircraft carrier and more.

The Indian Air Force is already operating 36 Rafael Jets, which are deployed on strategic airbases such as Ambala and Hasimara. But for the Navy that Rafael Marine Jets are coming, they are a little different. These are specially designed to work in the sea. Meaning, these specializes in flying from the smallest place of the ship.

BD-BD Aerial Refueling System

Another merit of this deal is the "BD-BD" aerial refueling system. A rafale jet through this technique can fuel the second rafale plane once it blows in the air. About 10 Raphael aircraft will be equipped with this system, which will improve the flexibility and preparations of the air force. This will make it easier for long missions to go.

The defence formulas say that this deal also includes equipments and software upgrades used on the ground, which will further improve the existing Rafale Fleet of the Air Force. While the Navy has to install some special equipment and systems on its aircraft vessel, these 4.5 generation Rafale Marine Jets can operate with full capacity. Now Mig-29K jets fly from INS Vikramaditya, and they will remain in their place. But the arrival of Raphael will give the navy a new strength, which will further strengthen the grip of India in the sea.

Focus on Indigenous TEDBF

While the Indian Navy does not want to rely on foreign technology now. The Defence Research and Development Organisation (DRDO) is devoting the indigenous fighter aircraft of the first fifth generation of the country, which will later be replaced in the Naval version. This aircraft will be the twin-engine deck-based fighter (TEDBF), which will be the nominal form of advanced Medium Combat Aircraft (AMCA) being created for Indian Air Force. AMCA is preparing the Aeronautical Development Agency (ADA).

In this direction, the Ministry of Defence wishes that in the coming years, the Navy also enjoys the strength of the indigenous fighter jets. Rafael Marine Jets will become part of the navy in the next five-seven years, and maybe TEDBF will be on the way to prepare. These dual strategies will strengthen India in both the sea and the sky. These indigenous jets can become a permanent solution for aircraft carriers such as INS Vikrant and the INS Giant coming into the future.

As far as this deal is concerned with France, it’s not just a business deal but also an extension of strategic partnerships. The defence cooperation between India and France is constantly deepening, Raphael is a major example of it. India has not only adopted modern technology through Raphael, but has also given new height to its defence diplomacy.

It is important to include Rafael Marine Jets in the Navy, as the importance of maritime security has now increased more than ever before. Considering China’s growing activation and global strategic changes in the Indo-Pacific region, it is essential for India to maintain regional balance by making its novice state-of-the-art.

In Rafael Marine Jets which are apricot, such as Advance Radar Systems, Long Distance Missiles, Latest Avionics and Multi-Roll Capability, they will enable the Indian Navy to combat any challenge.

UAE Akash Missile Explainer: Why is UAE’s ‘Akash’ missile system despite Patriot, Pantesir and THAAD?

Explainer: Why UAE Is Interested in India Akash Missile Having THAAD, Patriot and Pantsir Systems
Explainer: Why UAE Is Interested in India Akash Missile Having THAAD, Patriot and Pantsir Systems

UAE (UAE) offers indigenous sky air defense missile systems (Akash Missile). The offering was made at the representative-level meeting between Crown Prince of Dubai and UAE Deputy PM Sheikh Hamdan bin Mohammed bin Rashid Al Maktoum, who came to visit India’s Defence Minister Rajnath Singh and India. Also both countries are now being hand-held in areas like military practice, training exchange, cooperation in the defence industry, joint projects, research and technology transfer. Earlier, Prime Minister Modi has also been offering French President Emmanuel Macron to sell indigenous sky air defence missile systems during the visit to Paris and Marseille on 10-12 February 2025.

UAE Akash Missile Explainer: Why UAE Is Interested in India Akash Missile Despite Having THAAD, Patriot, and Pantsir Systems

India has developed the ‘Akash’ defence system (Akash Missile) in the mandate. It has been created by Defence Research and Development Organisation (DRDO) and is more than 96% indigenous. This system is capable of intercepting enemy fighter aircraft, helicopters, drones and subsonic cruise missiles for a distance of 25 kilometres. It not only provides protection during the war, but also helps to prevent any accidental danger from time to time. The system has been fully developed in India, which is a solid step towards ‘Solar India’.

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यह पेशकश उस व्यापक रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत भारत अब ‘आकाश’, ‘पिनाका’ मल्टी-लॉन्च रॉकेट सिस्टम और ‘ब्रह्मोस’ सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल जैसे आधुनिक हथियारों को मित्र देशों को निर्यात करने में जुटा है। फिलीपींस को पहले ही ब्रह्मोस की तटीय बैटरियां निर्यात की जा चुकी हैं, और आर्मेनिया भारत से आकाश, पिनाका और 155 मिमी आर्टिलरी गन खरीदने वाला पहला विदेशी खरीदार देश बन चुका है। अब यूएई के साथ ये डील भारत के रक्षा निर्यात को जबरदस्त बूस्ट मिलेगा।

UAE Akash Missile Explainer: अभी यूएई के पास कौन-कौन से हैं सिस्टम?

फिलहाल संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के पास कई तरह के आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम है। यूएई के पास थाड (THAAD – Terminal High Altitude Area Defense) है। यूएई दुनिया का पहला देश है (अमेरिका के बाद) जिसके पास ये सिस्टम है। इसे अमेरिका से खरीदा गया और 2016 में तैनात किया गया था। इसकी रेंज 200 किलोमीटर तक है और ये लंबी दूरी के खतरों से निपटने में माहिर है। जनवरी 2022 में, यूएई ने इसका इस्तेमाल यमन के हूती विद्रोहियों की ओर से दागी गई मिसाइलों को रोकने के लिए किया था, जो इसका पहला जंगी इस्तेमाल था। अभी यूएई के पास दो THAAD बैटरी हैं, और 2022 में अमेरिका ने 96 और मिसाइलों के साथ दो अतिरिक्त कंट्रोल स्टेशन देने की मंजूरी दी थी।

इसके अलावा यूएई के पास अमेरिकी पैट्रियट PAC-3 और GEM-T सिस्टम ङी है, जो मध्यम और छोटी दूरी की मिसाइलों, ड्रोन्स और हवाई हमलों से बचाता है। पैट्रियट का PAC-3 वेरिएंट बैलिस्टिक मिसाइलों को आखिरी चरण में रोकता है, जबकि GEM-T पुराने मॉडल का अपग्रेड है, जो हवाई जहाजों और क्रूज मिसाइलों के खिलाफ बेहतर काम करता है। यह सिस्टम अबू धाबी जैसे बड़े शहरों और अल-धफरा एयर बेस जैसे अहम ठिकानों की रक्षा करता है।

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इसके अलावा यूएई के पास रूसी पैंटसिर-एस1 (Pantsir-S1) सिस्टम भी है, जिसे यूएई ने 2000 में ऑर्डर किया था। 50 यूनिट्स की डिलीवरी 2009-2013 में पूरी हुई थी। पैंटसिर छोटी और मध्यम दूरी (20 किमी तक) के खतरों जैसे ड्रोन, हेलिकॉप्टर, और कम ऊंचाई पर उड़ने वाली मिसाइलों को रोकता है। इसमें मिसाइलों के साथ-साथ ऑटोमैटिक तोपें भी हैं, जो इसे “पॉइंट डिफेंस” के लिए शानदार बनाती हैं। यूएई इसका इस्तेमाल खास जगहों, जैसे तेल संयंत्रों और सैन्य ठिकानों की सुरक्षा के लिए करता है।

साथ ही यूएई के पास MIM-23 हॉक पुराना अमेरिकी सिस्टम भी है, जो कम और मध्यम ऊंचाई पर उड़ने वाले हवाई जहाजों और मिसाइलों को निशाना बनाता है। हालांकि ये अब पुराना हो चुका है, फिर भी यूएई के पास इसकी कुछ यूनिट्स हैं, जो बाकी सिस्टम्स के साथ मिलकर रक्षा को मजबूत करती हैं। यूएई इनका इस्तेमाल सपोर्टिंग रोल में करता है।

इसके अलावा उसके पास मध्यम दूरी का चेओंगुंग II (KM-SAM) सिस्टम भी है, जिसे यूएई ने 2022 में दक्षिण कोरिया से खरीदा था, जिसकी कीमत 3.5 बिलियन डॉलर थी। हालांकि ये अभी डिलीवरी के लिए तैयार हो रहा है। चेओंगुंग 40 किमी तक की रेंज में हवाई जहाज, क्रूज मिसाइलें और बैलिस्टिक मिसाइलों को रोक सकता है। यह रूस के S-400 जैसा है, और कम ऊंचाई के खतरों से निपटने में खास है। इसे यूएई के सुरक्षा में “लोअर-टियर” गैप को भरने के लिए लिया गया है, जहां THAAD और पैट्रियट कम प्रभावी हो सकते हैं।

वहीं, 2022 में हूती हमलों के बाद, यूएई ने इजराइल से स्पाइडर सिस्टम भी खरीदा था। ये मध्यम दूरी का सिस्टम है, जो ड्रोन, क्रूज मिसाइलों और हवाई जहाजों को निशाना बनाता है। इसकी रेंज 15-20 किमी है और ये मोबाइल है, यानी इसे आसानी से कहीं भी ले जाया जा सकता है। ये खासकर ड्रोन हमलों से बचाव के लिए लिया गया। अब्राहम समझौते के बाद इजराइल और यूएई के रिश्ते बेहतर हुए हैं, जिसके चलते ये डील हुई थी।

UAE Akash Missile Explainer: क्यों चाहिए यूएई को आकाश मिसाइल सिस्टम?

दरअसल यूएई खाड़ी क्षेत्र में एक अहम देश है, जिसके पास ढेर सारा तेल, गैस और पैसा है। लेकिन इसके साथ ही इसके दुश्मन भी कम नहीं हैं। पिछले कुछ सालों में यमन के हूती विद्रोहियों ने यूएई पर कई बार ड्रोन और मिसाइल हमले किए हैं। जनवरी 2022 में हूती मिसाइलों ने अबू धाबी को निशाना बनाया था, जिसमें तीन लोग मारे गए थे। इसके अलावा, ईरान की बढ़ती ताकत खासकर उसकी बैलिस्टिक मिसाइलें और ड्रोन भी यूएई के लिए चिंता का सबब है। ये खतरे छोटे-मोटे नहीं हैं, और यूएई को हर तरह के हवाई हमले से निपटने के लिए तैयार रहना पड़ता है।

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वहीं, थाड और पैट्रियट जैसे सिस्टम लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों को रोक सकते हैं। लेकिन हूती जैसे समूह जो सस्ते ड्रोन और छोटी रेंज की मिसाइलों का इस्तेमाल करते हैं, उनके खिलाफ इन बड़े सिस्टम का इस्तेमाल महंगा पड़ता है। एक थाड मिसाइल की कीमत करीब 1-2 मिलियन डॉलर होती है, जबकि हूती का ड्रोन या मिसाइल उससे कई गुना सस्ता। ऐसे में यूएई को एक ऐसा सिस्टम चाहिए, जो किफायती हो और छोटे-मध्यम दूरी के खतरों से भी निपट सके। जिसमें आकाश सिस्टम फिट बैठता है।

वहीं, आकाश (Akash Missile) की एक मिसाइल की कीमत 5 लाख डॉलर से भी कम है, जो पैट्रियट या थाड की तुलना में बहुत सस्ती है। खासकर ड्रोन जैसे सस्ते खतरों से निपटने के लिए यह यूएई के लिए ये किफायती ऑप्शन है। आकाश की रेंज भी 25-30 किमी तक है और ये छोटी और मध्यम दूरी के खतरों जैसे ड्रोन, हेलिकॉप्टर, और क्रूज मिसाइलों पर सटीक निशाना साध सकता है। वहीं हूती हमलावर ज्यादातर ऐसे ही हथियार इस्तेमाल करते हैं।

इसके अलावा आकाश को ट्रक या ट्रैक वाले वाहनों पर आसानी से ले जाया जा सकता है। यूएई जैसे देश में, जहां तेल संयंत्र और शहर काफी दूर-दूर हैं, वहां आसानी से पहुंचाया जा सकता है। यूएई का रेगिस्तानी मौसम मुश्किल होता है, लेकिन आकाश हर हाल में काम करता है, जो इसे भरोसेमंद बनाता है।

इसके अलावा यूएई के पास THAAD और पैट्रियट जैसे सिस्टम लंबी दूरी और ऊंचाई के लिए हैं, जबकि पैंटसिर और स्पाइडर छोटी दूरी के लिए। लेकिन मध्यम दूरी (20-40 किमी) में एक गैप है। दक्षिण कोरिया का चेओंगुंग II (KM-SAM) इस गैप को भरने के लिए लिया गया है, जिसकी डिलीवरी में देरी है। लेकिन तब तक यूएई को एक तुरंत उपलब्ध सिस्टम चाहिए, और आकाश इस जरूरत को पूरा कर सकता है। साथ ही, आकाश की कीमत भी KM-SAM से कम है।

यूएई ज्यादातर अपने डिफेंस प्रोडक्ट्स अमेरिका, फ्रांस या यूरोपीय देशों से खरीदता रहा है। लेकिन 2022 के हूती हमलों के बाद उसे लगा कि अमेरिका का सपोर्ट उतना तेज नहीं था। बदले भू राजनीतिक समीकरणों के चलते अब यूएई चाहता है कि उसकी रक्षा आपूर्ति एक ही स्रोत पर निर्भर न रहे। वहीं, भारत और यूएई के बीच मजबूत होते रणनीतिक संबंधों को देखते हुए, यूएई को भरोसा है कि भारत से मिलने वाली टेक्नोलॉजी पर किसी तरह का राजनीतिक दबाव या शर्त नहीं होगी, जैसा कि अक्सर अमेरिकी डिफेंस प्रोडक्ट्स खरीदने पर होता है।

दूसरी ओर, यूएई भी अब तेल आधारित अर्थव्यवस्था से आगे बढ़कर खुद को एक आधुनिक, तकनीकी रूप से सक्षम और रणनीतिक रूप से मजबूत राष्ट्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में काम कर रहा है। ऐसे में भारत जैसे देश के साथ रक्षा, तकनीक और उत्पादन के क्षेत्र में साझेदारी उसे नए अवसर प्रदान कर सकती है।

आकाश मिसाइल सिस्टम में किन देशों की है दिलचस्पी?

आकाश मिसाइल सिस्टम (Akash Missile) को लेकर कई देशों ने रूचि दिखाई है। इनमें आर्मेनिया पहला देश है जिसने आकाश सिस्टम को खरीदा। नवंबर 2024 तक एक बैटरी (चार लॉन्चर) की डिलीवरी हो चुकी है। करीब 6,000 करोड़ रुपये का ये सौदा भारत के रक्षा निर्यात में मील का पत्थर है।

फिलीपींस की नौसेना इसे अपने तटीय रक्षा सिस्टम में शामिल करने की योजना बना रही है। 2025 में 200 मिलियन डॉलर का ऑर्डर संभावित है। दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत का करीबी दोस्त वियतनाम भी इसे खरीदने की सोच रहा है। ये क्षेत्र में चीन के खिलाफ संतुलन बनाने में मदद कर सकता है।

इसके अलावा दिसंबर 2023 की रिपोर्ट्स के मुताबिक, दक्षिण अमेरिका का ब्राजील और अफ्रीका का मिस्र भी इस सिस्टम में रुचि दिखा रहे हैं। साथ ही, बेलारूस, मलेशिया, थाईलैंड और सूडान जैसे देशों ने भी अलग-अलग मौकों पर आकाश सिस्टम को लेकर बात की है। सूडान में 2022 के एक मिलिट्री प्रदर्शनी में इसे देखा भी गया था।

आकाश सिस्टम की खूबियां

आकाश मिसाइल सिस्टम 18 किलोमीटर की ऊंचाई तक 25 से 30 किलोमीटर की दूरी तक हवा में आने वाले खतरों को नष्ट कर सकता है। ये सिस्टम एक बार में चार टारगेट को निशाना बना सकता है। दिसंबर 2023 में हुए “अस्त्रशक्ति” अभ्यास में भारत ने दिखाया था कि एक ही फायरिंग यूनिट से चार टारगेट को ढेर किया जा सकता है। ये दुनिया में अपनी तरह का पहला प्रदर्शन था।

चाहे बारिश हो, धूप हो या कोहरा, आकाश एयर डिफेंस सिस्टम हर मौसम में काम करता है। इसका रडार और मिसाइल सिस्टम हर मौसम में सटीक रहता है।

ये सिस्टम चलते-फिरते प्लेटफॉर्म पर काम करता है। सेना के लिए टी-72 टैंक चेसिस पर और वायुसेना के लिए ट्रक और ट्रेलर पर इसे लगाया जाता है। इससे इसे जल्दी कहीं भी ले जाया जा सकता है।

इसमें इलेक्ट्रॉनिक काउंटर-काउंटर मेजर्स (ECCM) हैं, यानी दुश्मन अगर रडार को जाम करने की कोशिश करे, तो भी ये काम करता रहेगा।

आकाश की कीमत दूसरे देशों के सिस्टम से 8-10 गुना कम है। मिसाल के तौर पर, अमेरिका का पैट्रियट सिस्टम इससे कहीं महंगा है, लेकिन आकाश की सटीकता और मोबिलिटी इसे खास बनाती है।

इसमें रॉकेट-रामजेट सिस्टम है, जो मिसाइल को टारगेट तक पूरी स्पीड से ले जाता है। जो ये इसे रूस के SA-6 जैसा बनाता है।

इसका “राजेंद्र” रडार सिस्टम 60 किलोमीटर तक ट्रैक कर सकता है और एक साथ 64 टारगेट को देख सकता है। ये 8 मिसाइलों को गाइड कर सकता है, वो भी चार अलग-अलग टारगेट की ओर।

पहली मिसाइल से टारगेट को हिट होने की संभावना 88% है, और दूसरी मिसाइल के साथ ये 99% तक पहुंच जाती है। यानी ये लगभग अचूक है।

भारत ने बनाया एडवांस आकाश-एनजी सिस्टम

भारत ने इसका आकाश-एनजी (नेक्स्ट जेनरेशन) सिस्टम भी तैयार कर लिया है। आकाश-एनजी की शुरुआत 2010 के दशक में हुई, जब DRDO ने फैसला किया कि पुराने आकाश को और बेहतर करने की जरूरत है। इसे बनाने में भारत डायनामिक्स लिमिटेड (BDL) और टाटा पावर जैसे प्राइवेट सेक्टर की कंपनियों ने भी सहयोग किया है। इसका पहला टेस्ट जुलाई 2021 में ओडिशा के चांदीपुर टेस्ट रेंज में हुआ था, जिसमें इसने एक ड्रोन पर सटीक निशाना साधा। इसके बाद जनवरी 2024 में एक और कामयाब टेस्ट हुआ, जिसमें इसने हाई-स्पीड टारगेट को ढेर कर दिया।

आकाश-एनजी (नेक्स्ट जेनरेशन) 70-80 किलोमीटर तक मार कर सकता है। यानी दुश्मन को सीमा के पास आने से पहले ही रोक देगा। इसकी ऊंचाई सीमा भी 20-25 किलोमीटर तक है, जो इसे ऊंचाई पर उड़ने वाले टारगेट के खिलाफ कारगर बनाती है। वहीं पुराने आकाश की तुलना में ये हल्का है। इसका वजन करीब 300 किलोग्राम है, जबकि पुराने सिस्टम का वजन 700 किलो है। ये 2.5 मैक की स्पीड (ध्वनि से ढाई गुना तेज) तक जा सकता है।

इसमें एक एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड ऐरे (AESA) मल्टी-फंक्शन रडार लगा है। ये रडार 100 किलोमीटर से ज्यादा दूर तक टारगेट को देख सकता है और एक साथ कई निशानों को ट्रैक कर सकता है। ये पुराने “राजेंद्र” रडार से कहीं एडवांस है।

आकाश-एनजी सिस्टम एक बार में कई दुश्मनों पर निशाना साध सकता है। इसका “सीकर” (मिसाइल का गाइडेंस सिस्टम) इतना सटीक है कि तेजी से बदलते टारगेट को भी मात दे सकता है। इसके अलावा बारिश, कोहरा या रात का अंधेरा आकाश-एनजी हर मौसम में काम करता है। इसका ऑल-वेदर सिस्टम इसे भरोसेमंद बनाता है।

डीआरडीओ की योजना है कि 2026 तक आकाश-एनजी को भारतीय वायुसेना में शामिल कर लिया जाए।

Rafale Assembly Line India: Will Now Be Made In India Rafale Fighter Jets! 26 May Be In April For Rafale M Deal from France, Teno expects more orders from India!

Rafale Assembly Line India: Will Rafale Jets Be Made in India? Deal for 26 Rafale-M Expected in April!

Rafale Assembly Line India: Defence cooperation between India and France is constantly strengthened. A new and significant deal between the two countries has been fixed with Raphael fighter jets. According to reports, the deal of 26 Rafael M (Rafale-M) fighter jets for the Navy of India will be about 7.6 billion US dollars. In addition, France’s company Teno Aviation (Dassault Aviation) plans to open Raphael’s Final Assembly Line in India. The move will strengthen India’s ‘Make in India’ campaign and produce Rafael aircraft in the future can be possible in India.

Rafale Assembly Line India: Will Rafale Jets Be Made in India? Deal for 26 Rafale-M Expected in April!

Rafale Assembly Line India: What said CEO of Teno Aviation

According to L’Usine Nouvelle’s report, France’s defence company Teno Aviation is considering launching the final assembly line of Rafael Fighter Jets in India. Its motive is to fulfill large orders that are found in the future and increase production efficiency. "India is preparing large orders, and we are definitely considering opening a final assembly line in India to handle this new workload. "Review of Actual Teno is to purchase 114 fighter jets under Multi-Rollfighter Aircraft (MRFA) programme for Indian Air Force (IAF). Tens are expected to get these big orders.

The teno Rafael fighter jet is in the process of increasing production, with three aircraft being extended every month from two planes. The goal of the company is to reach four aircraft every month, and there is also plans to become five aircraft every month, considering future orders.

Rafale Marine Jets: Why Indian Navy in Tensions on Rafale-M? INS Vikrant and INS Vikramaditya can be operated on these issues!

Rafale Assembly Line India: Teno Make 230 Rafael

दसॉ एविएशन को उम्मीद है कि उसे भारत से और ऑर्डर मिल सकते हैं। 2023 में 13 राफेल विमानों की डिलीवरी हुई, जो 2024 में बढ़कर 21 हो गई और 2025 के लिए लक्ष्य 25 है। दसॉ की ऑर्डर बुक में 230 राफेल शामिल हैं, जिसमें 164 एक्सपोर्ट के लिए और 56 फ्रेंच एयर एंड स्पेस फोर्स के लिए हैं। 2024 में, कंपनी ने 8.3 अरब यूरो (705.5 अरब भारतीय रुपये) के मिलिट्री कॉन्ट्रैक्ट मिले थे, जो कि 2023 में 6.5 अरब यूरो (552.5 अरब भारतीय रुपये) थे। इन कॉन्ट्रैक्ट में सर्बिया से 12 विमान और इंडोनेशिया से 18 विमान के ऑर्डर शामिल हैं। दसॉ के मिलिट्री एयरक्राफ्ट का कुल बैकलॉग, जिसमें राफेल और फाल्कन जेट शामिल हैं, 43.2 अरब यूरो (3672 अरब भारतीय रुपये) तक पहुंच गया है, जो 2023 में 38.5 अरब यूरो (3272.5 अरब भारतीय रुपये) था।

Rafale Assembly Line India: भारत के लिए क्यों अहम है यह डील

भारत ने 2016 में 36 राफेल विमान खरीदने का सौदा किया था, जिसकी डिलीवरी 2022 तक पूरी हो गई। अब भारतीय नौसेना को पुराने हो चुके मिग-29के (MiG-29K) लड़ाकू विमानों को बदलने के लिए नए और अत्याधुनिक राफेल एम (Rafale Marine) की जरूरत है। भारतीय नौसेना के MRCBF (Multi-Role Carrier-Borne Fighters) प्रोग्राम के तहत राफेल एम विमान भारत के दो प्रमुख एयरक्राफ्ट कैरियर—आईएनएस विक्रांत (INS Vikrant) और आईएनएस विक्रमादित्य (INS Vikramaditya) पर तैनात किए जाएंगे।

भारतीय नौसेना वर्तमान में मिग-29के लड़ाकू विमानों का इस्तेमाल कर रही है, लेकिन पिछले कुछ सालों में इन विमानों के साथ कई तकनीकी समस्याएं सामने आई हैं। इनमें से कई विमान तकनीकी खराबियों और स्पेयर पार्ट्स की कमी के कारण लंबे समय तक ग्राउंडेड रहे हैं। इसके विपरीत, राफेल एम एक आधुनिक, मल्टीरोल लड़ाकू विमान है, जिसे कई देशों की नौसेनाएं पहले से ही इस्तेमाल कर रही हैं।

राफेल एम को खासतौर पर समुद्री अभियानों के लिए डिजाइन किया गया है। यह विमान कैटापल्ट असिस्टेड टेक-ऑफ और अरेस्टेड लैंडिंग की क्षमता रखता है, जिससे इसे एयरक्राफ्ट कैरियर पर ऑपरेशन में आसानी होती है। इसके अलावा, इसमें मजबूत लैंडिंग गियर और एयरफ्रेम होते हैं।

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भारत ने राफेल लड़ाकू विमानों में अस्त्रा Mk1 मिसाइल को भी इंटीग्रेट किया है। इसके अलावा भारतीय वायुसेना ने हाई एल्टीट्यूड इलाकों में भी राफेल से उड़ान भरी है। ट्रायल के दौरान, राफेल ने 16.7 किलोमीटर की ऊंचाई पर मौजूद सिमुलेटेड टोही गुब्बारों को सफलतापूर्वक इंटरसेप्ट किया है।

इन खास फीचर्स से लैस है राफेल

4.5 पीढ़ी वाला मल्टीरोल फाइटरजेट राफेल एक अत्याधुनिक M88 टर्बोफैन ट्विन-इंजन, कनार्ड डेल्टा विंग, मल्टी-रोल फाइटर जेट है, जिसे दसॉ एविएशन खासतौर पर एयर सुपीरियरिटी, डीप स्ट्राइक, टोही (रिकॉनेनेसेंस) और परमाणु हमलों जैसी क्षमताओं के लिए डिजाइन किया गया है। राफेल आधुनिकतम थेल्स RBE2 AESA रडार और SPECTRA इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सूट से लैस है, जो इसे दुश्मन आसानी से पकड़ नहीं पाता है। इसके अलावा, राफेल इज़रायली हेलमेट-माउंटेड डिस्प्ले सिस्टम, मेटियोर गाइडेड मिसाइलों और MICA एयर-टू-एयर मिसाइल, SCALP क्रूज मिसाइल (500 किलोमीटर दूर से निशाना) और Exocet एंटी-शिप मिसाइल जैसे अत्याधुनिक हथियारों से लैस है। साथ ही उनमें 10 घंटे की डेटा स्टोरेज क्षमता वाला फ्लाइट डेटा रिकॉर्डर, इन्फ्रारेड टार्गेट एक्विजिशन और ट्रैकिंग सिस्टम (जो रात या खराब मौसम में भी दुश्मन के लक्ष्यों का पता लगा सकता है), कोल्ड वेदर इंजन स्टार्टर (जो ठंडे मौसम में भी विमान के इंजन को सुचारू रूप से शुरू करता है) जैसे खास फीचर्स से भी लैस है।

राफेल की मैक्सिमम स्पीड 1.8 मैक, और कॉम्बैट रेंज 1,850 किलोमीटर है, और यह मैक 1.4 पर बिना आफ्टरबर्नर के लगातार सुपरक्रूज़ कर सकता है।

कब हो सकता है राफेल एम का सौदा

राफेल एम सौदे की आधिकारिक घोषणा अप्रैल 2025 में फ्रांस के रक्षा मंत्री की भारत यात्रा के दौरान होने की उम्मीद है। 7.6 बिलियन डॉलर (6.32 लाख करोड़ रुपये) के इस सौदे में 22 राफेल एम लड़ाकू विमान और टू सीटर 4 ट्रेनर वेरिएंट शामिल होंगे, जिनका इस्तेमाल वायुसेना और नौसेना के पायलटों को ट्रेनिंग देने के लिए किया जाएगा। इसके अलावा, भारत और फ्रांस संयुक्त रूप से एडवांस एवियोनिक्स और मिसाइल सिस्टम पर भी काम कर सकते हैं। यह विमान भारतीय नौसेना के मौजूदा MiG-29K बेड़े को बदलने के लिए खरीदे जा रहे हैं, जो INAS 300 व्हाइट टाइगर्स और INAS 303 ब्लैक पैंथर्स स्क्वाड्रन के तहत ऑपरेट होते हैं। वहीं नए राफेल एम फाइटर जेट्स की डिलीवरी 2029 से शुरू होगी। वहीं भारत में दसॉ एविएशन मेक इन इंडिया पॉलिसी के तहत राफेल असेंबली लाइन लगाएगी, इस नीति के तहत भारत में खरीदे गए 60% हथियारों की लोकल मैन्युफैक्चरिंग की जानी जरूरी है।

चीन और पाकिस्तान हैं चुनौती

राफेल M की तैनाती भारत के लिए बेहद स्ट्रैटेजिक एडवांटेज साबित होगी। खासकर जब चीन और पाकिस्तान अपनी सैन्य ताकत बढ़ाने में जुटे हैं। चीन ने तीन एयरक्राफ्ट कैरियर तैनात कर लिए हैं और 2035 तक पांच कैरियर बनाने की योजना बना रहा है। इन कैरियर्स पर J-15 फाइटर जेट्स तैनात हैं, लेकिन उनकी तकनीक राफेल के मुकाबले पुरानी मानी जाती है। वहीं, चीन का Fujian कैरियर (EMALS सिस्टम के साथ) भारतीय नौसेना के लिए नई चुनौती बन सकता है।

वहीं पाकिस्तान की बात करें, तो पाकिस्तान ने चीन से JF-17 थंडर और कुछ J-10C फाइटर्स खरीदे हैं। हालांकि, पाकिस्तान के पास कोई एयरक्राफ्ट कैरियर नहीं है, जिससे वह भारतीय नौसेना के सामने काफी कमजोर है। वहीं, राफेल की Meteor मिसाइल क्षमता पाकिस्तान के किसी भी फाइटर जेट से काफी बेहतर है।

Syria clashes: Why are minority sia, alavy and Christians in Syria scared? Why Mocke Kohram after the collapse of the Government of Asad? Read Explainer

Syria Clashes: Why Are Shia, Alawite, and Christians Targeted After Assad's Fall? Explained

Syria clashes: Syria is once again undergoing violence and instability. The instability released in the country has now taken a dangerous turn since the collapse of the rule of Bashar Al-Assad. The reports of violent conflicts between government-backed forces and unaided supporter rebels have appeared in coastal areas such as Addictia and Tartus. The center of this conflict was the terrain of the Alavi community that is considered to be the faithful of the Adhyay regime, against which the attacks have now been accelerated by the new ruling factions. The question of the future of Syria has stood after this bloody violence.

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Syria clashes: Syria’s power change: why the root of the crisis made?

The rule of Bashar Al-Assad, who had been in power for decades in Syria, had ended a few months ago. This power change enables different responses around the world. Some people considered it a step towards democracy, while some warned that it could lead to volatility and violence in the region. After the collapse of the rude regime, groups such as Hayat Tharir al-Sham (HTS) occupied power. However, after power change, the violence does not go round.

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Why do coastal areas of addiction struggles in Macia-Tartus?

सीरिया का लताकिया-टार्टस क्षेत्र भूमध्य सागर के किनारे स्थित है। लताकिया और टार्टूस सीरिया के प्रमुख तटीय शहर हैं, जहां अलावी समुदाय की संख्या अधिक है। यहां असद परिवार का गृहनगर अल-कर्दाहा भी स्थित है। जब बशर अल-असद का शासन गिरा, तो आशंका जताई गई थी कि अलावी समुदाय के खिलाफ बदले की कार्रवाई हो सकती है। यही कारण है कि असद समर्थकों ने अपने प्रभावशाली इलाकों से संघर्ष की शुरुआत की। बनियास शहर में तो सीरिया की सबसे बड़ा ऑयल रिफाइनरी भी है, जहां पर भी आतंकवादी गुटों ने हमला करने की कोशिश की, लेकिन सुरक्षाबलों ने इसे विफल कर दिया। लेकिन सत्ता परिवर्तन के बाद इन इलाकों में असद समर्थकों और नई सरकार के समर्थकों के बीच टकराव शुरू हो गया। इसकी शुरुआत 6 मार्च को हुई, जब, सरकारी बलों और असद समर्थक गुटों के बीच झड़पें शुरू हुईं। इस संघर्ष में अब तक सैकड़ों लोगों की जान जा चुकी है, जिनमें बड़ी संख्या में आम नागरिक भी शामिल हैं।

कैसे हुई संघर्ष की शुरुआत?

6 मार्च को, सीरियाई सरकारी बलों ने लताकिया, बनियास, टार्टूस और जबलेह जैसे तटीय शहरों में सैन्य अभियान शुरू किया। इसका उद्देश्य उन “रेजिम रेमनेंट्स” यानी असद शासन के वफादारों के खिलाफ कार्रवाई करना था, जिन्होंने नए सत्ता-व्यवस्था को मानने से इनकार कर दिया था। इन इलाकों में पूर्व राष्ट्रपति बशर अल-असद के समर्थक और उनके शासन से जुड़े सैन्य गुट सक्रिय बताए जा रहे हैं। 6 मार्च को असद समर्थक विद्रोही गुटों ने लताकिया के पास सुरक्षा बलों पर घात लगाकर हमला किया। इस हमले में कम से कम 16 सुरक्षाकर्मी और रक्षा मंत्रालय के अधिकारी मारे गए। बताया जा रहा है कि ये हमला अचानक नहीं था, बल्कि पहले से ही इसकी योजना बनाई गई थी। इस हमले के बाद संघर्ष तेज हो गया और अन्य तटीय शहरों में भी हिंसा फैल गई।

सरकारी मीडिया के अनुसार, यह हमला पहला नहीं था, बल्कि पिछले तीन महीनों में ऐसे कई हमले हो चुके हैं। इस घटना के बाद सीरिया की अंतरिम सरकार ने कड़े कदम उठाते हुए सैन्य ऑपरेशन शुरू किया। लेकिन इस बीच, लताकिया और आसपास के इलाकों में हत्या, अपहरण, लूट और उत्पीड़न की घटनाओं में तेजी आई है। रिपोर्टों के मुताबिक, नागरिकों को खुलेआम मारा जा रहा है, जिससे स्थानीय आबादी में भय का माहौल बना हुआ है और हजारों लोगों को विस्थापित होना पड़ा।

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सीरियन ऑब्जर्वेटरी फॉर ह्यूमन राइट्स (SOHR) की रिपोर्ट के अनुसार, इस संघर्ष में अब तक लगभग 1,311 लोग मारे जा चुके हैं, जिनमें से 830 आम नागरिक, 230 सुरक्षा कर्मी और 250 सशस्त्र लड़ाके शामिल हैं। हालांकि, इन आंकड़ों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो पाई है, लेकिन घटनास्थल से मिल रही जानकारियां इसकी गंभीरता की पुष्टि करती हैं।

Syria clashes: अलावी समुदाय क्यों बना निशाना?

सत्ता परिवर्तन के बाद अलावी समुदाय को निशाना बनाए जाने की खबरें सामने आई हैं। असद शासन में अलावी समुदाय को शासन का प्रमुख समर्थक माना जाता था। लेकिन अब, जब नई सरकार सत्ता में है, तो विद्रोही गुटों ने अलावी समुदाय के खिलाफ हिंसा तेज कर दी है।

लताकिया और टार्टूस जैसे शहरों में रहने वाले अलावी लोगों के घरों पर हमले हुए, कई लोगों को अगवा कर लिया गया और महिलाओं के साथ भी अत्याचार की खबरें सामने आई हैं। इसके अलावा, कुछ रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि अलावी समुदाय के लोगों को उनके धर्म के आधार पर प्रताड़ित किया गया है।

Syria clashes: कौन लड़ रहा है किसके खिलाफ?

सरकारी सुरक्षा बलों ने असद शासन के वफादार माने जाने वाले पुराने सैन्य अधिकारियों के नेतृत्व में बने सशस्त्र गुटों से मोर्चा लिया है। इन गुटों को “मिलिट्री काउंसिल फॉर द लिबरेशन ऑफ सीरिया” के नाम से जाना जा रहा है।

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इस गुट का नेतृत्व असद की रिपब्लिकन गार्ड में शामिल रहे मेजर मुकदाद फतेहा और ब्रिगेडियर जनरल गियाथ सुलेमान डल्ला कर रहे हैं। इनका दावा है कि असद शासन के पतन के बाद अलावी समुदाय को निशाना बनाया जा रहा है। फतेहा ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो संदेश जारी कर “हयात तहरीर अल-शाम” (HTS) के खिलाफ ‘सीरिया के स्वतंत्रता संघर्ष’ की बात कही थी। इसके अलावा, ब्रिगेडियर जनरल गियाथ सुलैमान डल्ला ने भी अल्पसंख्यक समुदायों की रक्षा और ‘सीरिया की मुक्ति के लिए सैन्य परिषद’ के गठन की घोषणा की थी।

Syria clashes: नागरिकों की हालत बेहद खराब

तटीय इलाकों में रह रहे नागरिक भय के साए में जी रहे हैं। लताकिया के एक निवासी ने सोशल मीडिया पर लिखा, “हम बाहर नहीं निकलते, खिड़कियां तक नहीं खोलते। यहां कोई सुरक्षा नहीं है, अलावी समुदाय के लिए तो बिल्कुल नहीं।” इन इलाकों से खबरें आ रही हैं कि अलावी नागरिकों को उनके घरों से खींचकर फांसी पर चढ़ाया जा रहा है। महिलाओं को अस्पतालों से घसीट कर ले जाया जा रहा है और उनका सामूहिक नरसंहार किया जा रहा है। कई चश्मदीदों के अनुसार, बंदूकधारियों ने लोगों को उनके घरों से बाहर निकाला और सार्वजनिक रूप से उनका सिर कलम कर दिया।

इस हिंसा के चलते हजारों लोगों को घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, अलावी समुदाय के लोग डर के कारण शहरों से भाग रहे हैं, क्योंकि उन्हें निशाना बनाया जा रहा है। कुछ लोगों ने बताया कि उनके पड़ोसियों को जबरन घर से निकालकर अगवा किया गया। वहीं, कई लोगों को डर है कि हिंसा का अगला शिकार वे न बन जाएं।

अल्पसंख्यकों की स्थिति

सीरिया में अलावी, शिया और ईसाई समुदायों की स्थिति बेहद चिंताजनक है। अल जज़ीरा की एक रिपोर्ट के अनुसार, आतंकवादी संगठन अलावी समुदाय के बच्चों को सुन्नी बनाने की साजिश कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी कई वीडियो सामने आए हैं, जिनमें इन समुदायों के खिलाफ हिंसा और हत्या को बढ़ावा देने वाले बयान देखे जा सकते हैं।

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सीरियाई सरकार की प्रतिक्रिया

सीरिया के अस्थायी राष्ट्रपति अहमद अल-शराआ ने इस संकट से निपटने के लिए दो समितियों का गठन किया है। पहली समिति मार्च 6 के हमलों की जांच करेगी, जबकि दूसरी समिति ‘सुप्रीम कमेटी फॉर सिविल पीस’ प्रभावित क्षेत्रों में नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का प्रयास करेगी। राष्ट्रपति अल-शराआ ने हाल ही में एक मस्जिद में संबोधन के दौरान कहा कि देश को एकजुट रखने और शांति बहाल करने के लिए सरकार पूरी कोशिश कर रही है। उन्होंने हिंसा में शामिल दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का आश्वासन भी दिया।

अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भूमिका

सीरिया में बढ़ती हिंसा पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर बनी हुई है। संयुक्त राष्ट्र ने सीरिया में हो रही हिंसा की निंदा की है और सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील की है। इसके अलावा, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने भी सीरिया में जारी हिंसा पर चर्चा के लिए आपातकालीन बैठक बुलाई है। यूरोपीय संघ (EU), अमेरिका और रूस ने इस मुद्दे पर चिंता जताई है और सीरिया सरकार से हिंसा रोकने की अपील की है।

हालात हो सकते हैं बेकाबू

सत्ता परिवर्तन के बाद अलावी और शिया समुदायों के खिलाफ हो रही हिंसा को लेकर चिंता बढ़ गई है। अभी भी असद समर्थक गुट तटीय इलाकों में संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन उनके पास हथियारों की कमी है। जानकारों का मानना है कि अगर यही स्थिति रही, तो ईरान, इराक और हिजबुल्लाह जैसे गुट इन अल्पसंख्यकों को समर्थन देना शुरू कर सकते हैं।

इसके अलावा, ऐसी भी खबरें हैं कि कई अलावी नागरिक रूस के तारतूस में स्थित नौसैनिक अड्डे पर शरण लिए हुए हैं। अगर रूस या ईरान इन गुटों को हथियार और समर्थन देने लगते हैं, तो संघर्ष और तेज हो सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्थिति को नियंत्रित नहीं किया गया तो यह हिंसा गृहयुद्ध का रूप ले सकती है। साथ ही, इससे पूरे मध्य पूर्व में अस्थिरता बढ़ सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि सीरिया में शांति बहाली के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय को सख्त कदम उठाने होंगे। अमेरिका और रूस को एक साथ मिलकर संघर्षरत पक्षों पर दबाव बनाना चाहिए ताकि वे नागरिकों पर हमले बंद करें। इसके अलावा, मानवाधिकार संगठनों को भी इस संकट में सक्रिय भूमिका निभानी होगी, ताकि हिंसा के शिकार लोगों को राहत पहुंचाई जा सके।

Pakistan Nuclear Test: Pakistan feared India’s claims on POK? What is the preparation of nuclear test? Big disclosure occurred in Satellite Image!

Pakistan Nuclear Test: Triggered by India's POK Claims, Is Pakistan Planning a Nuclear Test?

Pakistan Nuclear Test: Pakistan’s nuclear test site has been exposed to Chagai. Chagai has recently seen new activities. Pakistan is preparing to do something big that is being judged. According to experts, a tunnel is dug in the Chagai terrain, after which is being assessed whether Pakistan is preparing for nuclear testing? While the knowledge suggests that Pakistan can take big steps such as nuclear testing as a warning, considering the way India is being claimed.

Pakistan Nuclear Test: Triggered by India's POK Claims, Is Pakistan Planning a Nuclear Test?

Pakistan Nuclear Test: New Tunnel created for Nuclear Test!

According to the satellite image Expert Retired Colonel Vinayak Bhatt, he has found information from the satellite image that a new tunnel is excavated in the Chagai terrain, whose size is being reported about 8 m x 8 m. This tunnel is located near the already existing test sites, since the speculation is being imposed that Pakistan is preparing for ‘hot test’.

However, these activities have not been officially confirmed. But through satellite and local resources, these information have been revealed.

Atomic Policy of Pakistan

पाकिस्तान की परमाणु नीति हमेशा से भारत के साथ शक्ति संतुलन पर केंद्रित रही है। नई सुरंग निर्माण की खबरें ऐसे समय में आई हैं जब दोनों देशों के बीच तनावपूर्ण संबंध हैं। मेरठ कॉलेज में अंतरराष्ट्रीय मामलों और डिफेंस स्टडीज के प्रोफेसर डॉ. मोहम्मद रिजवान का मानना है कि पाकिस्तान की यह गतिविधि भारत पर दबाव बनाने और बातचीत के लिए मजबूर करने की रणनीति का हिस्सा हो सकती है। हालांकि, भारत ने हमेशा से परमाणु ब्लैकमेल के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है।

प्रोफेसर रिजवान के मुताबिक भारत को अपनी सुरक्षा नीति में सतर्कता बरतते हुए, अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के साथ मिलकर पाकिस्तान पर दबाव बनाना चाहिए, ताकि वह इस प्रकार की उकसाने वाली गतिविधियों से बाज आए। इसके अलावा, भारत को अपनी रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने पर भी ध्यान केंद्रित करना चाहिए ताकि किसी भी संभावित खतरे का मुकाबला किया जा सके।

Pakistan Nuclear Test: अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की प्रतिक्रिया

वहीं, पाकिस्तान की इन गतिविधियों पर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की नजर है। यदि पाकिस्तान वास्तव में नए परमाणु परीक्षण की योजना बना रहा है, तो यह परमाणु अप्रसार संधि (NPT) और व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (CTBT) के उद्देश्यों के खिलाफ होगा। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को इस मामले में सक्रिय भूमिका निभाते हुए, पाकिस्तान पर दबाव बनाना चाहिए ताकि क्षेत्रीय और वैश्विक शांति सुनिश्चित की जा सके।

Pakistan Nuclear Test: क्या पीओके पर भारत के दावे से चिढ़ा पाकिस्तान?

जानकारों का मानना है कि पाकिस्तान अपनी रणनीति में परमाणु परीक्षण का सहारा लेकर भारत पर दबाव बनाने की कोशिश कर सकता है। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) को लेकर भारत की ओर से किए जा रहे मजबूत दावों और हालिया बयानों को देखते हुए, पाकिस्तान परमाणु परीक्षण जैसी उकसाऊ कार्रवाई कर सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम भारत को चेतावनी देने के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान आकर्षित करने की रणनीति हो सकती है।

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विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि पाकिस्तान की ओर से परमाणु परीक्षण जैसी कोशिश क्षेत्रीय शांति को खतरे में डाल सकती है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इस पर गंभीरता से नजर रखनी चाहिए।

विदेश मंत्री और रक्षा मंत्री ने कही थी ये बात

बता दें कि लंदन के चैथम हाउस थिंक टैंक में जयशंकर ने कहा था कि कश्मीर से जुड़े बहुत से मुद्दों का हल निकाल लिया गया है। अनुच्छेद 370 को हटाना उनमें से एक है। ​एस. जयशंकर ने पीओके को लेकर कहा कि पीओके को खाली करवाने के बाद कश्मीर का मसला हल हो जाएगा।

वहीं उसके बाद भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था, “मुझे नहीं लगता कि पाकिस्तान हमें पीओके लौटाएगा। मुझे विश्वास है कि पीओके के लोग खुद ही भारत में विलय की मांग करेंगे। भारत की तेज आर्थिक प्रगति और बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा को देखकर पीओके के लोगों को एहसास हो रहा है कि उनका असली विकास भारत का हिस्सा बनने में ही है। पाकिस्तान को इसे स्वीकार करना ही पड़ेगा।”

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पाकिस्तान के राजनीतिक विश्लेषक और विशेषज्ञ इसे भारत की ओर से ‘पीओके पर हमले की धमकी’ के तौर पर देख रहे हैं। वहीं, कुछ का मानना है कि यह बयान केवल एक राजनीतिक बयानबाजी है, जिसका उद्देश्य आंतरिक राजनीति को साधना हो सकता है। पाकिस्तान मामलों के जानकारों का मानना है कि भारत की तरफ से पीओके को लेकर आए दिन दिए जा रहे बयानों से पाकिस्तान में चिंता बढ़ गई है। पाकिस्तान अपनी सैन्य शक्ति का प्रदर्शन करने और भारत को रोकने के लिए परमाणु परीक्षण जैसे बड़े कदम भी उठा सकता है।

पाकिस्तानी पत्रकार आरजू काजमी ने जब इस मुद्दे पर पाकिस्तान के राजनीतिक विश्लेषक कमर चीमा से चर्चा की तो उन्होंने सवाल किया कि क्या भारत की सरकार ने पाकिस्तान को स्पष्ट संदेश दे दिया है कि पीओके पर भारत अब निर्णायक कार्रवाई कर सकता है? उन्होंने कहा, “मुझे नहीं लगता कि भारत की आधिकारिक नीति इस तरह की है कि पाकिस्तान से बातचीत में पीओके को छोड़ने की मांग सीधे रखी जाएगी। जयशंकर का बयान गंभीर नहीं लगता। भाजपा ने हमेशा से पीओके को चुनावी मुद्दा बनाकर पेश किया है, लेकिन कभी इसे अपने घोषणापत्र में प्रमुखता से शामिल नहीं किया।”

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चीमा ने आगे कहा, “इस बयान के जरिए भाजपा ने एक बार फिर मजबूत सरकार का संदेश देने की कोशिश की है। भाजपा का उद्देश्य जनता के बीच यह संदेश देना है कि केंद्र सरकार पीओके पर भी निर्णायक कदम उठाने की स्थिति में है।”

क्या भारत वाकई पीओके पर पर हमला करेगा? इस सवाल पर कमर चीमा ने कहा, “कश्मीर का इलाका भौगोलिक रूप से काफी कठिन है। पहाड़, नदियां और दुर्गम इलाके युद्ध को और मुश्किल बनाते हैं। पाकिस्तान भी एक सैन्य शक्ति है, ऐसे में भारत सीधे युद्ध का विकल्प नहीं चुनेगा। हालांकि, भारत ने बार-बार कहा है कि पीओके भारत का अभिन्न हिस्सा है।”

चीमा ने आगे कहा, “पाकिस्तान ने भी कई बार पीओके को लेकर बड़े-बड़े दावे किए हैं, लेकिन इन दावों का परिणाम कभी सामने नहीं आया। ऐसे में मुझे नहीं लगता कि भारत इस दिशा में कोई बड़ा सैन्य कदम उठाएगा। जयशंकर का बयान एक राजनीतिक प्रतिक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए।”

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क्या है चागाई परीक्षण स्थल?

चागाई-1 पाकिस्तान का पहला सार्वजनिक परमाणु परीक्षण था, जो 28 मई 1998 को चागाई परीक्षण स्थल पर किया गया था। पाकिस्तान परमाणु ऊर्जा आयोग ने उस दिन पांच भूमिगत परमाणु परीक्षण किए थे। इन परीक्षणों के बाद पाकिस्तान ने खुद को एक परमाणु शक्ति के रूप में स्थापित किया, जिससे दक्षिण एशिया में सामरिक संतुलन में महत्वपूर्ण परिवर्तन आया।

वहीं, चागाई क्षेत्र में नई सुरंग निर्माण की खबरें पाकिस्तान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं की ओर इशारा कर रही हैं। यह गतिविधियां न केवल क्षेत्रीय स्थिरता के लिए चुनौती हैं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी चिंता का विषय हैं। ऐसे में, अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को सतर्क रहकर इन गतिविधियों पर निगरानी रखनी होगी और संबंधित पक्षों के साथ मिलकर स्थायी समाधान की दिशा में प्रयास करने होंगे।

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Nepal Politics: Yogi Adityanath Posters Spark Raj Monarchy Debate, Army Chief's Statement Raises Tensions

Nepal Politics: A recent event in Nepal has declined, which has also stirred up in the ASEAN of Nepal as well as India. The rally was held at the reception of former King Gyanendra Shah at the Tribhuvan International Airport of Kathmandu, the capital of Nepal on Sunday. But the biggest thing was that the poster of Uttar Pradesh Chief Minister Yogi Adityanath was placed in this rally and the slogan of the ‘Hindu Heart Emperor’. This poster was imposed by the nationalist party ‘National Existing Party’ (RPP) and other Hindu pro organizations for the reception of former Raja Gyanendra Shah.

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Rallies are being withdrawn in many parts of Nepal and demanding Nepal to declare the Hindu nation again. It was important that the posters of Uttar Pradesh Chief Minister Yogi Adityanath were also seen in these rallys. Posters and banners of Yogi Adityanath were seen during a bike rally held at Tribhuvan International Airport in Kathmandu. This rally was organized by the National Existing Party (RPP), with the grand reception of former King Gyanendra Shah. Yogi Adityanath in posters was described as "Hindu Heart Emperor". This title is given to the leaders of Hinduism ideology.

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Yogi Adityanath was also released from the slogan of ‘Hindu Heart Emperor’. Yogi has a historical relationship with Nepal. Actually, Yogi Adityanath has historically been concerned with the royal family of Nepal. Yogi Adityanath has a religious relationship with the royal family of Nepal, whose Gorakhnath is the end of the monastery. Gorakhnath Math is a special significance in Nepal and is considered part of the cultural history of Nepal. The rule of Shah Descent in Nepal was from the 16th century to 2008, when the Republic was established by ending the monarch.

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Nepal Politics: Increasing Demand for the Return of Rajshahi in Nepal

There are several rallyes about the return of Rajshahi in Nepal these days. The National Existing Party (RPP) recently organized a bike rally in Kathmandu, which took part of the heavy crowd. In the rally, as the ‘Narainahari al-Gar, Hamro king Audai Chhan’, which means – "Align Narayanaharity, our kings are coming. ""

Narayanahithi is the same Rajmahal in which the kings of Nepal were inhabited, but after the Republic was applied in 2008 it was replaced in the museum. Now, when the demand for the monarchy is rising again, the Narayanahit Rajmahal once again comes into discussion.

Former King Gyanendra’s supporters believe that the current political system has been corrupted and the return of the monarch to save the country is essential. However, Gyanendra has not yet given publicly any political statement, but his presence and reception have made this issue politically significant.

Nepal Politics: Yogi Adityanath Posters Spark Raj Monarchy Debate, Army Chief's Statement Raises Tensions
Nepal Army Chief

Increased Beneficiary by the statement of the Nepalese Army chief

नेपाल के सेना प्रमुख ने हाल ही में एक बयान दिया। उन्होंने कहा कि “नेपाल सेना, जनता की सेना है और अंततः जनता की इच्छाओं का पालन करेगी।” यह बयान नेपाल के मौजूदा राजनीतिक हालात को देखते हुए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। नेपाल में लोगों का एक बड़ा वर्ग मौजूदा सरकार से नाराज है और बदलाव की मांग कर रहा है। राजशाही समर्थक इस नाराजगी को अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश कर रहे हैं।

नेपाल में हाल ही में हुए कार्यक्रमों में भीड़ की उपस्थिति ने यह संकेत दिया है कि पूर्व राजा ज्ञानेंद्र के प्रति सहानुभूति बढ़ रही है। नेपाल के ग्रामीण इलाकों और कुछ शहरों में भी लोगों ने राजशाही के समर्थन में रैलियां निकाली हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि एक बड़ा वर्ग मौजूदा व्यवस्था से असंतुष्ट है।

Nepal Politics: क्यों हो रही राजशाही की वापसी की मांग?

नेपाल की मौजूदा राजनीतिक स्थिति को देखते हुए, भ्रष्टाचार, महंगाई और सत्ताधारी दलों के प्रति जनता का गुस्सा चरम पर है। लोग मौजूदा व्यवस्था से थक चुके हैं और राजतंत्र की वापसी को एक विकल्प के रूप में देख रहे हैं। पूर्व राजा ज्ञानेंद्र के स्वागत में 4 लाख से अधिक लोग सड़कों पर उतरे, जिसमें ‘राजा आओ, देश बचाओ’ जैसे नारे लगे।

राजशाही की वापसी की मांग करने वाली राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी (आरपीपी) के वरिष्ठ नेता रविंद्र मिश्रा ने कहा, “नेपाल में वर्तमान व्यवस्था से लोगों का मोहभंग हो गया है। जनता अब एक स्थिर और निष्पक्ष शासन चाहती है।” उन्होंने यह भी कहा कि नेपाल में भारत विरोधी भावना भी बढ़ी है, जिसका समाधान केवल सांस्कृतिक और ऐतिहासिक जड़ों को मजबूत करके ही किया जा सकता है।

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क्या हैं राजशाही की संभावनाएं?

हालांकि नेपाल में राजशाही की वापसी के आसार फिलहाल कम ही नजर आते हैं। नेपाल के वरिष्ठ पत्रकार चंद्रकिशोर का मानना है कि मौजूदा असंतोष के बावजूद नेपाल में राजशाही की वापसी संभव नहीं है। उनका कहना है कि जनता मौजूदा व्यवस्था से नाराज जरूर है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वे फिर से राजशाही की स्थापना चाहते हैं।

नेपाल के एक अन्य पत्रकार उमेश चौहान का भी यही मानना है कि राजशाही की वापसी का समर्थन करने वाले लोग सीमित संख्या में हैं। उन्होंने कहा कि लोग मौजूदा सरकार से जरूर नाराज हैं, लेकिन यह नाराजगी इतनी मजबूत नहीं है कि राजशाही की वापसी का आधार बन सके।

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भारत-नेपाल संबंधों पर क्या पड़ेगा असर

नेपाल में हो रहे इन सियासी बदलावों का असर भारत-नेपाल संबंधों पर भी पड़ सकता है। नेपाल हमेशा से भारत की विदेश नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। भारत के उत्तर प्रदेश में गोरखनाथ मठ का नेपाल के राजघराने से ऐतिहासिक संबंध रहा है। ऐसे में योगी आदित्यनाथ के पोस्टरों का नेपाल में दिखना, भारत-नेपाल संबंधों की दिशा में एक नया संकेत दे सकता है।

नेपाल में भारत विरोधी भावना को लेकर भी चिंता जताई जा रही है। आरपीपी के नेताओं का मानना है कि मौजूदा कम्युनिस्ट सरकार भारत विरोधी एजेंडे को बढ़ावा दे रही है। ऐसे में राजशाही समर्थक दल नेपाल को फिर से हिंदू राष्ट्र बनाने के पक्षधर हैं, ताकि भारत-नेपाल संबंधों को और मजबूत किया जा सके।

मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) जीडी बक्शी कहते हैं, “नेपाल के पूर्व राजा ने हाल ही में देश का दौरा किया था और काठमांडू लौटने पर उनका स्वागत 4 लाख से अधिक नेपाली नागरिकों ने भव्य तरीके से किया। बीते महीने नेपाल के कई शहरों और कस्बों में राजा के समर्थन में दर्जनों मोटरसाइकिल रैलियां आयोजित की गईं। 2007 में, जब मैंने नेपाल में एनडीसी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया था, तब से मैं कहता आ रहा हूं कि भारत ने नेपाल में माओवादियों को सत्ता में लाकर और दुनिया के एकमात्र हिंदू साम्राज्य को समाप्त करके एक गंभीर रणनीतिक भूल की है।”

वह आगे कहते हैं, आज नेपाल के लोग माओवादियों की भ्रष्ट और विफल नीतियों से तंग आ चुके हैं। वे किसी भी रूप में राजा की वापसी की कामना कर रहे हैं—चाहे वह संवैधानिक सम्राट के रूप में हो, सांस्कृतिक प्रमुख के रूप में या फिर किसी राजनीतिक दल के संरक्षक के रूप में। राजा नेपाली जनता के लिए भगवान विष्णु के प्रतीक हैं और नेपाल में फिर से एक हिंदू राज्य की स्थापना का महत्वपूर्ण आधार बन सकते हैं।

वहीं रैली में योगी आदित्यनाथ के पोस्टर दिखने पर मेजर जनरल बख्शी का कहना है, “नेपाल में हो रही रैलियों में योगी आदित्यनाथ के पोस्टर दिखाई देना इस बात का संकेत है कि नेपाल की जनता हिंदू पहचान को फिर से मजबूत करने की इच्छा रखती है। जनता की इच्छा सर्वोपरि है, क्योंकि लोगों की आवाज ही भगवान की आवाज होती है।”

पहले हिंदू राष्ट्र था नेपाल

नेपाल का राजतंत्र समाप्त होने से पहले दुनिया का एकमात्र हिंदू राष्ट्र था। 2008 में गणतंत्र बनने के बाद इसे धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित कर दिया गया। लेकिन अब एक वर्ग फिर से नेपाल को हिंदू राष्ट्र बनाने की मांग कर रहा है। भारत में भी इस विचारधारा को समर्थन मिला है। 2006 में बीजेपी के तत्कालीन अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कहा था कि “नेपाल की मौलिक पहचान हिंदू राष्ट्र की है और इसे खत्म नहीं किया जाना चाहिए।” यही वजह है कि नेपाल में योगी आदित्यनाथ के पोस्टर लगने को सांस्कृतिक और राजनीतिक दोनों ही नजरिए से देखा जा रहा है।

क्या नेपाल फिर से हिंदू राष्ट्र बनेगा?

नेपाल में मौजूदा असंतोष का मुख्य कारण भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और सुस्त आर्थिक विकास है। जनता को लगता है कि मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था उनकी समस्याओं का समाधान नहीं कर पा रही है। हालांकि, जानकारों का मानना है कि इसका समाधान राजशाही में नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने में है।

नेपाल की वर्तमान राजनीतिक परिस्थिति को देखते हुए, राजतंत्र की वापसी और हिंदू राष्ट्र की स्थापना आसान नहीं है। हालांकि, जनता का बढ़ता असंतोष, राजनीतिक अस्थिरता और धार्मिक भावना इस विचार को समर्थन दे रही है। लेकिन क्या यह आंदोलन राजनीतिक सफलता में बदल पाएगा, यह देखना बाकी है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि यह मुद्दा राजनीतिक रूप से संवेदनशील है और इसका असर भारत-नेपाल संबंधों पर भी पड़ सकता है। साथ ही, चीन की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है, क्योंकि नेपाल की मौजूदा सरकार चीन के साथ मजबूत संबंध रखती है।

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Taliban Internal Rift: अफगानिस्तान की तालिबान सरकार में अंदरूनी कलह तेजी से बढ़ती जा रही है। तालिबान सरकार के आंतरिक मंत्री सिराजुद्दीन हक्कानी के 40 दिनों से लापता रहने की खबरें सामने आ रही हैं। सिराजुद्दीन हक्कानी 22 जनवरी को संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के लिए रवाना हुए थे और अब तक अफगानिस्तान नहीं लौटे हैं। उनकी गैरमौजूदगी के चलते इस्लामी शासन के भीतर गहरे मतभेदों की खबरें तेज हो गई हैं।

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Taliban Internal Rift: स्तानिकजई भी दुबई में

सूत्रों के मुताबिक, हक्कानी और तालिबान सुप्रीम लीडर हैबतुल्लाह अखुंदजादा के बीच कुछ ठीक नहीं चल रहा है। 20 जनवरी को तालिबान के उप-विदेश मंत्री अब्बास स्तानिकजई ने सार्वजनिक तौर पर अखुंदजादा की नीतियों की आलोचना की थी, जिससे अंदरूनी विवाद खुलकर सामने आ गया था। जिसके बाद हैबतुल्लाह अखुंदजादा ने स्तानिकजई की गिरफ्तारी के आदेश जारी कर दिए, जिसके बाद उन्हें दुबई भागना पड़ा।

Taliban Internal Rift: तालिबान में दो धड़े – कंधार गुट बनाम हक्कानी नेटवर्क

सूत्रों के मुताबिक, सिराजुद्दीन हक्कानी की यह गैरमौजूदगी केवल एक विदेश यात्रा तक सीमित नहीं है, बल्कि तालिबान के भीतर उभरते गंभीर सत्ता संघर्ष का संकेत साफ नजर आ रहे हैं। सूत्रों का कहना है कि कंधार गुट और हक्कानी नेटवर्क के बीच तनाव इन दिनों चरम पर है। तालिबान के सर्वोच्च नेता हैबतुल्ला अखुंदजादा की अगुवाई वाला कंधार गुट पाकिस्तान के प्रभाव के खिलाफ है, जबकि हक्कानी नेटवर्क को पाकिस्तान का करीबी सहयोगी माना जाता है। वहीं, स्तानिकजई का यह बयान ऐसे समय आया, जब हक्कानी पाकिस्तान समर्थित समूह के प्रमुख चेहरे माने जाते हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि सिराजुद्दीन हक्कानी की विदेश यात्रा भी पाकिस्तान के समर्थन से हुई थी, जिससे कंधार गुट नाराज है।

Taliban Internal Rift: कंधार से काबुल पहुंचे भारी संख्या में लड़ाके

तालिबान की अंदरूनी फूट तब और गहरी हो गई, जब अखुंदजादा ने काबुल के कई महत्वपूर्ण इलाकों पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए अपने वफादार लड़ाकों को तैनात कर दिया। इनमें बाला हिसार किला और काबुल इंटरनेशनल एयरपोर्ट जैसे प्रमुख इलाके शामिल हैं, जो पहले हक्कानी नेटवर्क के निगरानी में थे।

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सूत्रों के अनुसार, बीते एक सप्ताह में कंधार से बड़ी संख्या में तालिबानी लड़ाके काबुल पहुंचे हैं। इन लड़ाकों ने एयरपोर्ट और वहां के सुरक्षा चेकप्वाइंट्स पर तैनात हक्कानी नेटवर्क के लड़ाकों को हटा दिय। एक एयरपोर्ट कर्मचारी ने बताया कि काबुल में अब चारों तरफ हथियारों से लैस तालिबानी लड़ाके ही नजर आ रहे हैं। कंधार से आए लड़ाकों ने सुरक्षा चौकियों का कंट्रोल अपने हाथ में ले लिया है और अब शहर के विभिन्न हिस्सों में गश्त कर रहे हैं।

Taliban Internal Rift: हक्कानी को भगाने के पीछे पाकिस्तान का हाथ?

हक्कानी नेटवर्क के पाकिस्तान से गहरे संबंध हैं और कयास लगाए जा रहे हैं कि पाकिस्तान इस पूरे घटनाक्रम में अहम भूमिका निभा रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, सिराजुद्दीन हक्कानी की UAE और सऊदी अरब की यात्रा पाकिस्तान की सहमति से हुई थी, लेकिन इससे तालिबान के कंधार गुट में नाराजगी बढ़ गई।

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर हक्कानी लंबे समय तक अफगानिस्तान से बाहर रहते हैं, तो इससे तालिबान के भीतर सत्ता संतुलन पूरी तरह से बदल सकता है। अखुंदजादा के वफादार लड़ाकों की काबुल में तैनाती यह संकेत देती है कि कंधार गुट अब तालिबान सरकार पर पूरी तरह नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश कर रहा है।

तालिबान का भविष्य अधऱ में?

सूत्रों ने बताया कि कंधार गुट के लड़ाकों के काबुल में आने के बाद अब शहर में तनाव बढ़ गया है। बाला हिसार किला और हवाई अड्डे पर सुरक्षा बढ़ा दी गई है। कहा जा रहा है कि तालिबान के गुटों के बीच संघर्ष और तेज हो सकता है। कंधार और काबुल के सूत्रों का कहना है कि अखुंदजादा ने यह रणनीति हक्कानी नेटवर्क की ताकत को सीमित करने के लिए बनाई है। पहले, हक्कानी नेटवर्क का इन इलाकों में प्रभाव था, लेकिन अब यह कंधार गुट के हाथों में जाता दिख रहा है।

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वहीं, तालिबान के अंदर बढ़ती गुटबाजी उसके शासन के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनती जा रही है। अफगानिस्तान पहले से ही आर्थिक संकट और पाकिस्तान के बढ़ते दखल से जूझ रहा है, ऐसे में तालिबान के दो बड़े गुटों के बीच सत्ता की लड़ाई देश में और अस्थिरता को जन्म दे सकती है। यह देखना दिलचस्प होगा कि सिराजुद्दीन हक्कानी अफगानिस्तान लौटते हैं या नहीं, और अगर लौटते हैं तो क्या तालिबान के भीतर यह विवाद और गहराएगा?

Ukraine Military Aid: What are the Trump’s decision to prevent military help to Ukraine? Will Russia continue to fight? Read Explainer

Ukraine Military Aid: Will Kyiv Survive Without US Support? Trump's Decision Explained

Ukraine Military Aid: U.S. President Donald Trump has decided to stop the military aid granted to Ukraine, thereby increasing tension in relations between the U.S. and Ukraine. The Trump administration says that any kind of military will not be helped from the US until Ukraine is ready for peace negotiations. This decision came in such a time when Ukraine was constantly seeking to increase military support against Russia.

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Ukraine Military Aid: Ukraine has been the largest defense associate USA

America has been the largest military associate of Ukraine since Russia’s invasion in February 2022. As of now, the US had committed to providing military assistance of $86 billion to Ukraine, from which $46 billion the President’s Special Rights Scheme (PDA), $33 billion were given under the Ukraine Security Support Initiative (USAI) and $7 billion foren military funding (FMF). These pauses are used for the purchase of missiles, tanks, choppers, defense systems and other military equipment. But now the decision to prevent this assistance is being considered a major change in the US’s foreign policy.

Ukraine Military Aid: Why US Military Aid Prevented by Ukraine?

The main reasons behind this decision of the Trump administration are being considered the recent comments of Jelensky. Gelensky recently said that the end of the Ukrain war is far away. "Reacting this, Trump wrote on his social media platform Truth Social that Jelensky wants to eliminate the war only if the US will continue to support them. The Trump then announced to stop the military help to be given to Ukraine.

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व्हाइट हाउस के एक अधिकारी के अनुसार, यह रोक तब तक जारी रहेगी जब तक कि यूक्रेन यह साबित नहीं कर देता कि वह रूस के साथ शांति वार्ता के लिए प्रतिबद्ध है।

इससे पहले 28 फरवरी को व्हाइट हाउस में हुई एक बैठक में ट्रंप, उपराष्ट्रपति जेडी वांस और विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने जेलेंस्की पर अमेरिकी मदद के लिए पर्याप्त आभार न जताने का आरोप लगाया था। ट्रंप प्रशासन का कहना है कि अमेरिका अब यूक्रेन की नीति में बदलाव देखना चाहता है और चाहता है कि कीव जल्द से जल्द रूस के साथ शांति वार्ता करे।

Ukraine Military Aid: यूक्रेन पर क्या होगा असर?

यूक्रेन को रूस से मिल रही लगातार चुनौती के बीच अमेरिकी सैन्य मदद पर रोक लगना उसके लिए एक बड़ा झटका साबित हो सकता है। लेकिन इस सैन्य सहायता में से ज्यादातर रकम अब तक खर्च नहीं हुई थी। Center for Strategic and International Studies (CSIS) के अनुसार, अब तक केवल 20.2 अरब डॉलर की मदद ही यूक्रेन तक पहुंची थी। बाकी 34.2 अरब डॉलर की मदद को लेकर अमेरिकी सरकार ने अनुबंध किए थे, लेकिन वह अभी तक लागू नहीं हुए थे। अब ट्रंप के फैसले के बाद इन अनुबंधों पर भी संकट मंडरा रहा है।

यूक्रेन के प्रधानमंत्री डेनिस शमिहाल के अनुसार, यूक्रेन के पास अब भी सैन्य उत्पादन की क्षमता है, लेकिन वह अपनी कुल आवश्यकताओं का केवल 40% ही खुद से बना सकता है। बाकी 30% अमेरिका और 30% यूरोप से आता है। अमेरिकी मदद के बिना, यूक्रेन के लिए रूस के बढ़ते हमलों को रोक पाना मुश्किल हो सकता है। सैन्य विशेषज्ञों का कहना है कि बिना अमेरिकी सहायता के यूक्रेन केवल 2 से 4 महीने तक रूस के खिलाफ मजबूती से खड़ा रह सकता है। इसके बाद रूस को आगे बढ़ने का मौका मिल सकता है।

सैन्य विशेषज्ञ मार्क कैंसियन के अनुसार, अगर अमेरिका से मिलिट्री सप्लाई नहीं होती है, तो यूक्रेनी सेना दो से चार महीनों में कमजोर पड़ सकती है। उन्होंने चेतावनी दी कि अमेरिका की सैन्य सहायता बंद होने से रूस को युद्ध में निर्णायक बढ़त मिल सकती है।

Ukraine Military Aid: क्या यूरोप भर सकता है अमेरिका की जगह?

यूरोप अब तक यूक्रेन को अमेरिका के बराबर ही सैन्य मदद देता आया है। लेकिन अगर अमेरिका की मदद पूरी तरह से बंद हो जाती है तो यूरोपीय देशों को अपने सैन्य खर्च में भारी इजाफा करना होगा। ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस जैसे देश पहले ही सुरक्षा गारंटी देने की बात कर रहे हैं। हाल ही में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने 1.6 अरब पाउंड (2 अरब डॉलर) की सहायता की घोषणा की, जिसमें यूक्रेन को 5,000 एयर डिफेंस मिसाइलें मिलेंगी।

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यूरोपीय देश अब रूसी सेंट्रल बैंक की जब्त संपत्तियों से यूक्रेन को मदद देने पर विचार कर रहे हैं। अमेरिका और यूरोप ने रूस के 300 अरब डॉलर की संपत्ति जब्त कर रखी है, जिसे यूक्रेन को देने की मांग तेज हो रही है। पोलैंड, एस्टोनिया, लिथुआनिया और लातविया जैसे देश इस कदम का समर्थन कर रहे हैं। हालांकि, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों इस प्रस्ताव का विरोध कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रणाली पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

Ukraine Military Aid: क्या ट्रंप के फैसले से अमेरिका की राजनीति बदलेगी?

ट्रंप के इस फैसले की अमेरिका में डेमोक्रेट नेताओं ने कड़ी आलोचना की है। पेंसिल्वेनिया से डेमोक्रेटिक कांग्रेस सदस्य ब्रेंडन बॉयल ने इसे ‘खतरनाक’ और ‘राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सीधा खतरा’ बताया है। वहीं, डेमोक्रेटिक सांसद डैन गोल्डमैन ने ट्रंप के इस कदम को यूक्रेनी राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की के खिलाफ एक और ब्लैकमेलिंग प्रयास बताया।

ट्रंप पहले भी NATO और यूरोपीय सहयोगियों से अमेरिका के ज्यादा योगदान पर सवाल उठाते रहे हैं। उन्होंने पहले भी संकेत दिए थे कि अमेरिका को अब वैश्विक सुरक्षा मुद्दों में अपनी भूमिका कम करनी चाहिए। लेकिन उनके इस कदम से अमेरिका के पारंपरिक सहयोगी नाराज हो सकते हैं और रूस को इससे सीधा फायदा हो सकता है।

क्या यूक्रेन लड़ाई जारी रख सकता है?

सैन्य विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका की मदद के बिना यूक्रेन की लड़ाई लंबे समय तक जारी रह पाना मुश्किल होगा। हालांकि, जेलेंस्की को अभी भी उम्मीद है। उन्होंने कहा कि अमेरिका और यूक्रेन के संबंध सिर्फ मदद तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह एक रणनीतिक साझेदारी है। लेकिन हकीकत यह है कि बिना अमेरिकी मदद के यूक्रेन को अपने सैन्य संसाधनों पर निर्भर रहना पड़ेगा और रूस के खिलाफ उसकी स्थिति कमजोर हो सकती है।

वहीं, यूक्रेन के पास युद्ध जारी रखने के कुछ सीमित विकल्प हैं। पहला, वे यूरोपीय देशों से ज्यादा मदद की मांग कर सकते हैं। जिसके तहत जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे देश अपनी सैन्य आपूर्ति बढ़ा सकते हैं, लेकिन इससे तुरंत कोई राहत नहीं मिलेगी। दूसरा विकल्प है कि यूक्रेन अपने सैन्य उत्पादन को बढ़ा सकता है। यूक्रेन ने हाल ही में ड्रोन और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम का बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू किया है, लेकिन इसी रफ्तार काफी धीमी है। वहीं, तीसरा विकल्प शांति वार्ता का है। रूस पहले ही शांति वार्ता का संकेत दे चुका है, लेकिन यूक्रेन को डर है कि इससे उसे अधिक क्षेत्रीय नुकसान हो सकता है।

वहीं, ट्रंप प्रशासन के इस फैसले से वैश्विक सुरक्षा संतुलन बदल सकता है। अगर यूरोप अमेरिका की कमी पूरी नहीं कर पाता, तो रूस के लिए यूक्रेन में अपनी पकड़ मजबूत करना आसान हो जाएगा। आने वाले हफ्तों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या ट्रंप अपने फैसले पर कायम रहते हैं या फिर अमेरिकी कांग्रेस और अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते इसमें बदलाव करते हैं।

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US NATO Exit: What If America Quits NATO and UN? Global Impact Explained!

US NATO Exit: Discussions exiting NATO (NATO) and the United Nations (UN) in the US have once again accelerated. Tesla and SpaceX CEO Elon Musk, playing the role of the Head of Department of Government Efficiency in the Administration of President Donald Trump, has supported US NATO exit. Musk wrote on social media platforms X (First Twitter) supporting a post on the issue, "I agree" i.e. "I agree." ""

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This statement of Musk has stirred up in political circles. Some of the Republicans leaders in the Trump administration are already seeking NATO to leave it by stating "the heritage of the South War". The major name in this is Senator Mike Lee, who has tied NATO to the U.S. "Great Deal". While Trump had also criticized NATO during his first term and pressured the European countries to increase defence costs.

US NATO Exit: Why is the discussion of leaving the US NATO?

NATO (North Atlantic Treaty Organization) is a Military Alliance, which mainly ensures the safety of Europe and North America countries. The U.S. is the largest member of this organization and gives its major economic and military contributions. However, some of the Republicans leaders and Trump administration officials consider it unnecessary burden for the US.

"NATO is a great deal for Europe, but an expensive agreement for the US," Senator Mike Lee said. "He believes that the U.S. should pay more attention to their safety policy and be free from the responsibilities of NATO.

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एलन मस्क की टिप्पणी ऐसे समय में आई है, जब यूक्रेन युद्ध के चलते नाटो की भूमिका लगातार बढ़ रही है। अमेरिका अब तक यूक्रेन को भारी सैन्य मदद दे चुका है, लेकिन कुछ रिपब्लिकन नेताओं का मानना है कि यह अमेरिकी करदाताओं के लिए बोझ बनता जा रहा है।

US NATO Exit: क्या अमेरिका वास्तव में नाटो से बाहर निकल सकता है?

हालांकि, अमेरिका के लिए नाटो छोड़ना आसान नहीं होगा। 2023 में, अमेरिकी सीनेट ने एक कानून पारित किया, जिसमें यह तय किया गया कि नाटो से बाहर निकलने का निर्णय केवल राष्ट्रपति अकेले नहीं ले सकते। इसके लिए कांग्रेस की मंजूरी या सीनेट में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी।

कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रंप यदि दोबारा राष्ट्रपति बनते हैं, तो वह कानूनी रूप से नाटो से बाहर न निकलकर इसकी भूमिका को कमजोर कर सकते हैं। इसका मतलब यह होगा कि अमेरिका सैन्य गठबंधन में बना रहेगा, लेकिन वह अपनी भागीदारी को सीमित कर सकता है।

US NATO Exit: नाटो से बाहर निकलना यूरोप के लिए बड़ा झटका

यूक्रेन युद्ध के बीच NATO अमेरिका की मदद से रूस के खिलाफ एकजुट बना हुआ है। लेकिन अगर अमेरिका इस सैन्य गठबंधन से बाहर निकलता है, तो यह वैश्विक सुरक्षा को लेकर एक बड़ा झटका होगा। NATO यूरोपीय देशों के लिए सुरक्षा कवच की तरह काम करता है, खासकर रूस के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए। कई यूरोपीय नेता पहले ही ट्रंप प्रशासन की इस नीति को लेकर चिंता जता चुके हैं।

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विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका के NATO छोड़ने से यूरोप में सैन्य संतुलन बिगड़ सकता है और रूस को यूक्रेन या अन्य पूर्वी यूरोपीय देशों में और आक्रामक कदम उठाने का मौका मिल सकता है। NATO में अमेरिका की अहम भूमिका रही है, लेकिन अगर वह हटता है तो यूरोपीय देशों को अपनी रक्षा नीति में भारी बदलाव करना पड़ेगा।

US NATO Exit: क्या अमेरिका संयुक्त राष्ट्र से भी हट सकता है?

नाटो के अलावा, अमेरिका के संयुक्त राष्ट्र (UN) से बाहर निकलने की चर्चा भी हो रही है। कुछ रिपब्लिकन नेता UN को “तानाशाहों का मंच” करार देते हुए इससे अलग होने की मांग कर चुके हैं। अमेरिकी सीनेटर थॉमस मैसी ने हाल ही में कहा था कि “संयुक्त राष्ट्र अब अमेरिका और उसके सहयोगियों पर हमले करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।”

संयुक्त राष्ट्र से बाहर निकलने का मतलब यह होगा कि अमेरिका वैश्विक राजनीति में अपनी पकड़ खो सकता है। अगर अमेरिका UN से बाहर निकलता है, तो इसका सीधा असर ग्लोबल डिप्लोमेसी पर पड़ेगा। अमेरिका UN को सबसे ज्यादा फंड देने वाले देशों में शामिल है और इसका सबसे ज्यादा प्रभाव सुरक्षा परिषद (Security Council) में रहता है। UN से बाहर निकलने का मतलब यह होगा कि अमेरिका अपनी वैश्विक भूमिका को कम कर रहा है, जिससे चीन और रूस को अधिक ताकत मिल सकती है। वहीं इससे संगठन की फंडिंग पर गहरा असर पड़ेगा।

अगर अमेरिका नाटो और संयुक्त राष्ट्र से बाहर निकलता है तो क्या होगा?

अगर अमेरिका नाटो से बाहर निकलता है, तो इसका सबसे ज्यादा प्रभाव यूरोप पर पड़ेगा। यूरोपीय देशों को अपनी सुरक्षा के लिए अतिरिक्त खर्च करना पड़ेगा और रूस जैसी ताकतों के खिलाफ उनका बचाव कमजोर हो सकता है।

इसके अलावा, इस फैसले से पूरी दुनिया में अमेरिका की स्थिति भी कमजोर होगी। अगर अमेरिका संयुक्त राष्ट्र से भी बाहर निकलता है, तो इसका सीधा फायदा चीन और रूस को मिलेगा। कई विशेषज्ञों का मानना है कि इससे संयुक्त राष्ट्र के भीतर चीन की भूमिका बढ़ जाएगी और वैश्विक राजनीति में अमेरिका का प्रभाव कम हो जाएगा।

विशेषज्ञ जेम्स गोल्डगियर के अनुसार, “अगर अमेरिका नाटो से बाहर निकलता है, तो इसका कोई दूसरा विकल्प नहीं होगा। यह एक बड़ी वैश्विक अस्थिरता पैदा करेगा।”

US NATO Exit: क्या NATO और UN छोड़ पाएगा अमेरिका?

हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका के लिए NATO और UN छोड़ना इतना आसान नहीं होगा। खासकर UN के मामले में, क्योंकि UN चार्टर में यह साफ लिखा है कि कोई भी सदस्य देश स्वेच्छा से बाहर नहीं निकल सकता जब तक कोई और पक्ष इसका उल्लंघन नहीं करता। इतिहास में सिर्फ एक बार इंडोनेशिया ने 1965-66 में UN छोड़ा था, लेकिन बाद में वह बिना किसी विशेष प्रक्रिया के वापस आ गया। अगर अमेरिका NATO छोड़ने का फैसला करता है, तो इससे यूरोप में सैन्य शक्ति का संतुलन बिगड़ जाएगा। अमेरिका की यह नीति ‘अमेरिका फर्स्ट’ का हिस्सा तो हो सकती है, लेकिन यह उसे वैश्विक मामलों से अलग-थलग कर सकती है।

डोनाल्ड ट्रंप की नाटो और UN पर क्या राय है?

ट्रंप पहले से ही नाटो की आलोचना करते रहे हैं। उन्होंने 2019 में कहा था कि “मुझे नाटो से कोई मतलब नहीं है।” उनके अनुसार, यूरोपीय देशों को अपनी सुरक्षा पर अधिक खर्च करना चाहिए और अमेरिका को इन देशों की रक्षा करने के लिए अपने संसाधन बर्बाद नहीं करने चाहिए।

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2020 में, ट्रंप ने यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन से कहा था कि “अगर यूरोप पर हमला होता है, तो अमेरिका आपकी मदद के लिए नहीं आएगा।” उन्होंने यह भी कहा था कि “नाटो अब खत्म हो चुका है और अमेरिका इसे छोड़ने वाला है।”

हालांकि, उनके दोबारा राष्ट्रपति बनने के बावजूद, अमेरिका का नाटो और संयुक्त राष्ट्र से बाहर निकलना कानूनी और राजनीतिक रूप से जटिल होगा।

US NATO Exit: क्या अमेरिका वास्तव में अलग हो सकता है?

अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति है और यदि वह नाटो या संयुक्त राष्ट्र से बाहर निकलता है, तो इससे वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था पर गहरा प्रभाव पड़ेगा। हालांकि, यह इतना आसान नहीं होगा। अमेरिका में कई राजनीतिक और कानूनी बाधाएं हैं, जो इसे रोक सकती हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप और उनके समर्थक भले ही नाटो और संयुक्त राष्ट्र से बाहर निकलने की धमकी दें, लेकिन वास्तव में ऐसा करना मुश्किल होगा।

ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन के विशेषज्ञ स्कॉट एंडरसन के अनुसार, “कांग्रेस के पास राष्ट्रपति के फैसले को अदालत में चुनौती देने का अधिकार है। अगर ट्रंप नाटो से बाहर निकलने का फैसला करते हैं, तो उन्हें कांग्रेस के साथ लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी होगी।”

अमेरिकी जनता की राय क्या है?

अमेरिका में कई सर्वेक्षणों में पाया गया है कि अधिकांश अमेरिकी नागरिक नाटो और संयुक्त राष्ट्र में बने रहने का समर्थन करते हैं। पिछले साल किए गए एक सर्वेक्षण में पाया गया कि 68 फीसदी अमेरिकी नागरिक नाटो में अमेरिका की भागीदारी को आवश्यक मानते हैं।

संयुक्त राष्ट्र के मामले में भी, अधिकांश अमेरिकी मानते हैं कि अमेरिका को वैश्विक मंचों पर अपनी स्थिति बनाए रखनी चाहिए।