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Indus Waters Treaty: The suspension of Sindhu Water Agreement reported by Pakistan ‘Water War’, ‘Afganistani’, would die from Pakistan.

Indus Waters Treaty: Pakistan Cries 'Water War' as India Gains Afghan Leverage
The World Bank vice president (Credit: The World Bank)

Indus Waters Treaty (Indus Waters Treaty – IWT) has given the decision to be suspended from the immediate effect of the Indus Waters Treaty – IWT in Pakistan. India made this decision after the Allan Achargam terror attack, with 26 impeccable tourists were killed. After this, the Government of India made it clear that the treaty will not continue to apply until Pakistan ceases to support terrorism. While the move in Pakistan has stirred up, the Pakistani newspaper ‘The Express Tribune’ reported a great threat to water cooperation between the two countries. The newspaper has warned its serious impacts on Pakistan’s economy, agriculture and society.

Indus Waters Treaty: Pakistan Cries 'Water War' as India Gains Afghan Leverage
The World Bank vice president (Credit: The World Bank)

What is Indus Water Treaty?

सिंधु जल समझौता 19 सितंबर 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुआ था। यह समझौता हिमालय से निकलने वाली सिंधु नदी और इसकी सहायक नदियों रावी, सतलज, ब्यास, झेलम, चिनाब और सिंधु के पानी के बंटवारे को नियंत्रित करता है। 1947 में भारत-पाकिस्तान बंटवारे के बाद पंजाब की एकीकृत सिंचाई प्रणाली टूट गई, जिससे पानी के बंटवारे का विवाद पैदा हुआ। नौ साल की बातचीत के बाद यह समझौता बना, जिसमें पूर्वी नदियों (रावी, सतलज, ब्यास) को भारत को इस्तेमाल करने का अधिकार मिला। जबकि पश्चिमी नदियां (सिंधु, झेलम, चिनाब), इनका लगभग 80% पानी पाकिस्तान को मिलता है। भारत इन पश्चिमी नदियों पर सीमित रूप से “रन-ऑफ-द-रिवर” (यानि जल के बहाव में बिना अवरोध के) पनबिजली परियोजनाएं बना सकता है, लेकिन वह पाकिस्तान के जल प्रवाह को रोक नहीं सकता।

यह समझौता दोनों देशों के बीच तीन युद्धों (1965, 1971, 1999) और कई तनावों के बावजूद 65 साल तक चला। लेकिन पहलगाम हमले के बाद भारत ने इसे निलंबित कर दिया, जिसे पाकिस्तानी अखबार ने “जल सहयोग का अंत” करार दिया।

Indus Waters Treaty: भारत के फैसले पर क्या बोले अखबार

भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “सिंधु जल संधि को तब तक के लिए निलंबित किया जा रहा है, जब तक पाकिस्तान क्रॉस-बॉर्डर आतंकवाद को छोड़ नहीं देता।” भारत के इस फैसले के बाद पाकिस्तान के प्रमुख अखबारों में तीव्र प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं।

द एक्सप्रेस ट्रिब्यून ने लिखा- “भारत ने सिंधु जल समझौते को हथियार बना लिया है और अब यह कदम कूटनीतिक दबाव का जरिया बन गया है।” वहीं, डॉन (DAWN) ने इसे “जल संकट की शुरुआत” बताते हुए लिखा- “अगर भारत ने पश्चिमी नदियों का पानी रोकना शुरू कर दिया, तो पाकिस्तान की कृषि व्यवस्था और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ेगा।”

जबकि जंग अखबार ने चिंता जताई कि “भारत की इस घोषणा के पीछे राजनीतिक मकसद है, जिससे पाकिस्तान को पानी के मामले में अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अलग-थलग किया जा सकता है।”

Indus Waters Treaty: पाकिस्तान के लिए क्यों अहम है यह संधि?

पाकिस्तान की 80% से अधिक सिंचाई व्यवस्था सिंधु रिवर बेसिन (Indus River Basin) पर निर्भर है। सिंधु, झेलम और चिनाब नदियां वहां की कृषि, बिजली उत्पादन और पीने के पानी का मुख्य स्रोत हैं। इस रिवर बेसिन सिस्टम से लगभग 16.8 करोड़ एकड़ फीट पानी मिलता है, जिसमें से भारत को केवल 3.3 करोड़ एकड़ फीट जल मिलता है। भारत अपने हिस्से का लगभग 90% उपयोग करता है, जबकि पाकिस्तान शेष जल पर पूरी तरह निर्भर रहता है।

पाकिस्तान के मंगला और तरबेला जैसे बड़े डैम की जल भंडारण क्षमता भी काफी सीमित है, जो संधि के तहत उपलब्ध जल का केवल 10% ही संग्रह कर पाते हैं। पानी की कमी या मौसमी बदलाव के समय यह क्षमता अपर्याप्त है, जिससे पाकिस्तान और कमजोर हो जाएगा। इस कारण किसी भी जल संकट की स्थिति में पाकिस्तान की स्थिति बेहद नाजुक हो सकती है।

‘द एक्सप्रेस ट्रिब्यून’ ने अपने लेख में इस निलंबन को पाकिस्तान के लिए “विनाशकारी” बताया और इसे दोनों देशों के बीच जल सहयोग के इतिहास में एक अभूतपूर्व घटना करार दिया। अखबार ने लिखा कि सिंधु नदी पाकिस्तान की कृषि, पीने के पानी और आर्थिक स्थिरता की रीढ़ है। पाकिस्तान को मिलने वाला पानी देश के 68% ग्रामीण आजीविका और 23% कृषि जरूरतों को पूरा करता है। निलंबन से पानी की कमी हो सकती है, जिससे फसल उत्पादन, खाद्य सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ेगा।

सीमित भंडारण क्षमता: पाकिस्तान के पास मंगला और तरबेला जैसे डैम हैं, जिनकी कुल भंडारण क्षमता केवल 1.44 करोड़ एकड़-फीट है, जो उसके वार्षिक हक का 10% है। पानी की कमी या मौसमी बदलाव के समय यह क्षमता अपर्याप्त है, जिससे पाकिस्तान और कमजोर हो जाएगा। अखबार ने चेतावनी दी कि पानी की कमी से पंजाब और सिंध प्रांतों में फसलें (गेहूं, चावल, कपास) प्रभावित होंगी। इससे खाद्य आयात बढ़ेगा, जो पहले से ही आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान के लिए मुश्किल होगा।

वहीं, पानी की कमी से जलविद्युत उत्पादन प्रभावित होगा, जिससे 16 घंटे तक बिजली कटौती हो सकती है। वहीं, खासकर आर्थिक रूप से कमजोर क्षेत्रों में पानी और खाद्य संकट से सामाजिक तनाव और विरोध प्रदर्शन बढ़ सकते हैं। पर्यावरण विशेषज्ञों ने नदी के कम पानी से पारिस्थितिकी तंत्र और वन्यजीवों पर असर की आशंका जताई है। अखबार ने लिखा कि यह निलंबन भारत-पाकिस्तान संबंधों में एक नया तनाव पैदा करेगा। पाकिस्तानी ऊर्जा मंत्री अवैस लखारी ने कहा, पाकिस्तान इसे “जल युद्ध” मान रहा है।

Indus Waters Treaty: भारत के पास क्या हैं अधिकार?

हालांकि अखबार का यह भी कहना है कि संधि तोड़ने का तत्काल प्रभाव सीमित होगा, क्योंकि भारत के पास अभी पानी रोकने या मोड़ने के लिए बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचा (जैसे डैम) नहीं है। लेकिन लंबे समय में, भारत किशनगंगा (330 MW) और रातले (850 MW) जैसी परियोजनाओं को बढ़ाकर पानी के प्रवाह को नियंत्रित कर सकता है, जिससे पाकिस्तान की मुश्किलें बढ़ेंगी।

इस संधि के तहत भारत को जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में 13.4 लाख एकड़ भूमि की सिंचाई और 3.6 मिलियन एकड़ फीट जल भंडारण की अनुमति है। लेकिन अभी भारत इस पूरी क्षमता का उपयोग नहीं कर रहा है। यदि भारत अपनी पूरी शक्ति का उपयोग करता है, तो वह पाकिस्तान पर जल के मोर्चे पर रणनीतिक दबाव बना सकता है।

भारत को इन नदियों पर “रन-ऑफ-द-रिवर” परियोजनाएं बनाने की अनुमति है, जिससे वह पनबिजली उत्पादन कर सकता है, लेकिन वह जल प्रवाह में दीर्घकालिक अवरोध नहीं कर सकता। हालांकि, भारत को ये अधिकार तकनीकी रूप से अस्थायी अवरोध (temporary flow control) की इजाजत देते हैं, जो कूटनीतिक टकराव के समय उपयोगी साबित हो सकते हैं।

भारत को क्या करना होगा?

सिंधु नदी का पानी लंबे समय तक रोकने के लिए भारत को दीर्घकालिक कदम उठाने होंगे। इनमें भारत को सिंधु, झेलम, और चिनाब नदियों पर बड़े डैम और जलाशय बनाने होंगे। उदाहरण के लिए, पाकल दुल (1,000 MW) और रातले (850 MW) जैसी परियोजनाओं को तेज करना होगा। जम्मू-कश्मीर और पंजाब में पानी के उपयोग के लिए नहरों और सिंचाई प्रणालियों का विस्तार करना होगा, जैसा कि शाहपुर कंडी बैराज के साथ किया गया। शाहपुर कंडी बैराज ने रावी नदी का पानी रोककर कठुआ और सांबा में 32,000 हेक्टेयर जमीन की सिंचाई शुरू की है।

लेकिन बड़े पैमाने पर पानी रोकने के लिए नए डैम और जलाशय बनाने में समय और धन दोनों को ध्यान रखना होगा। इन परियोजनाओं के लिए भारी निवेश की जरूरत होगी। उदाहरण के लिए, शाहपुर कंडी बैराज को पूरा होने में 45 साल लगे। वहीं, बड़े डैम बनाने से जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में पर्यावरणीय असंतुलन, जैसे बाढ़ या भूस्खलन का खतरा बढ़ सकता है। इसके लिए भारत को पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन (EIA) करना होगा।

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इसके अलावा भारत अफगानिस्तान के साथ मिलकर काबुल नदी पर डैम बनाकर पाकिस्तान पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है, क्योंकि यह नदी भी सिंधु बेसिन का हिस्सा है। काबुल नदी, अफगानिस्तान से बहकर पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा क्षेत्र में प्रवेश करती है और आगे चलकर सिंधु नदी में मिल जाती है। यह नदी भी सिंधु नदी प्रणाली (Indus River Basin) का हिस्सा है, और पाकिस्तान के लिए एक बड़ा जल स्रोत मानी जाती है। भारत और अफगानिस्तान के बीच यदि काबुल नदी पर डैम निर्माण को लेकर कोई समझौता होता है, तो यह पाकिस्तान की छटपटाहट बढ़ जाएगी और उस पर दबाव और बढ़ेगा। भारत पहले भी अफगानिस्तान में सलमा डैम (हरिरुद नदी पर) जैसे परियोजनाओं में सहयोग कर चुका है। 2016 में हेरात में सलमा डैम (अफगान-भारत मैत्री डैम) के बाद अब भारत काबुल नदी की सहायक नदी मैदान पर शहतूत डैम बनाने में मदद कर रहा है।

Pahalgam Terror Attack: The game of "Timeing" is hidden behind the terror attack in the wrestling! How to recover from tablets Zion-Polytics?

Pahalgam Terror Attack A Geopolitical Message in Bullets

Pahalgam Terror Attack: The terror attack in Jammu and Kashmir’s wrestling on April 22, 2025 was not only the most painful violent event of terror history, but also part of a large game of global and regional geopolitics. 28 people were killed in this attack and dozens of injured. It is not only a common panic attack, but also many symbolic messages are hidden behind it, revealing what are the monsubes of the panics, which play the story ahead of the promises of Kashmir. In order to understand the story behind this attack, we have to deeply look at the old strategy of using the global power balance, regional geopolitics, and Pakistan as a weapon of foreign policy.

Pahalgam Terror Attack A Geopolitical Message in Bullets

Pahalgam Terror Attack: Pakistan’s panic love and army chief’s "timeing"

An inflammatory speech was given by the Pakistani Army Chief General Asif Munier, a week before the wrestling attack. In this speech he referring to the two-nation principle (Two Nation Theory) and conferred the Kashmir "Jugular Wayne" (Life Line) of Pakistan. This mahaj was not just a speech, but it was a clear message for terrorist organisations that Pakistan has been giving manure-water for a long time. Lashkar-e-Thaiba’s masked The Resistance Front (TRF) who took responsibility of the attack immediately understood this message.

The official response to Pakistan was even shocking. Instead of condemning the attack, Islamabad tried to tell it "resistance against the government of local people". He once again tried to wrap the panic into a sheet of activeism to revolution and violence. But this claim of Pakistan fell further weakened, when the information came out that three of the four attackers were foreign, i.e. Pakistani. The speech of General Asif Munier and the attack after that, it is not a mere coincidence.

Pahalgam Terror Attack: Growing Upcoming Saudi Arabia and India

When the attack was attacked, Prime Minister Narendra Modi’s visit to Saudi Arabia. The strategic, economic and security partnership between India and Saudi Arabia has been rapidly strengthened over the past few years. It was not coming to Pakistan. Because Pakistan is still dependent on the moral and financial support of Gulf countries in every matter today.

The attack took place exactly at the same time when Modi was talking to Ahmad with Saudi leadership. The attack was trying to instigate India’s diplomatic initiative and embarrass India in front of Saudi Arabia. Pakistan tried to convey the Saudi Arabia that he still has the power to create instability in South Asia. Also, Saudi Arabia tried to deliver an indirect message that "What can be the outcome of friendship with India." " But Pakistan forgot that his economy is in crisis, his international credentials have fallen, and he is at the resurrection of the Gulf countries.

Pahalgam Terror Attack: US-India friendship

When it was attacked, US Vice President JD Vance was on India’s visit. While this journey was to further strengthen India-US relations in the field of business and defence. In the past few years, this partnership has been consistently deeper among the two countries, which has not been a fake eye to Pakistan and China.

This attack was also a message for the US. Pakistan tried to tell the U.S. through the attack that "K is still a sensitive issue, and as close as the U.S., the more volatility will increase. "He wanted the Kashmir issue to rise again and create tension in India-US relations. But this time, Pakistan’s strategy was reversed. U.S. President Donald Trump relied Prime Minister Modi’s full support, and the White House confirmed that both leaders will soon talk on the phone.

Pahalgam Terror Attack: ‘polity-e-error’ failed

The attack is evidence that Pakistan still continues the terrorism as a weapon to its foreign policy. But this strategy is now outdated. Pakistan probably has to understand that terrorism is no longer the case of only one "non-state actors". Today’s world sees it as a "Rogue Statecraft" i.e. failed nation policy. Pakistan is only further weakening its diplomatic credibility by observing or supporting attacks such as Wakegam.

Today, the entire world has been adopting the policy of zero tolerance towards terrorism. Countries such as India, which have long suffered terrorism, are now ready to deal with this danger. India has not only strengthened its military and intelligence capabilities, but has also emerged as a strong voice against terrorism on the global platform.

Pahalgam terror attack: What will happen before April 30 act on terror? Are surgical strikes ready for the new commander of the Norden command?

Meaning of the attack of the wrestler

In the wrestling attack, not only the impeccable citizens were targeted, but also an important tourist destination in India and the way to the Amarnath Yatra. The terrors took this place to think about, so that religious feelings are smeared through this attack, injuries to tourism and air communal tension within the country.

Military Innovations: Boot, Gun and Brain! Indian army personnel are making themselves the next-generation weapons, no longer just fight, innovations also do

Military Innovations: Indian Soldiers Develop Next-Gen Indigenous Weapons

Military Innovations: Indian forces are no longer dependent on foreign imports for Latest Defense Technology. He is now stepping towards self-sufficiency. For this, the army himself is also engaged in Innovation. The military personnel and officers are now preparing such technology in addition to running guns, which can lead India in future wars. These include a robot named ‘Explodor’, ‘Fire’ detonation system and a number of drones. These Indigenous Inventions are designed for the next generation war to the Indian Army. Their created systems are so advanced that they can prove gamechanger for the army in the future.

Military Innovations: Indian Soldiers Develop Next-Gen Indigenous Weapons

Military Innovations: Low Dependence on Foreign Weapons

The way of war has changed today in the world. Now is to accumulate drones, cyber technology and smart weapons. The Indian Army is also understanding this change and using the talent of its youth. The Army’s ‘Army Design Bureau’ and the other units have created such equipments that are more effective in lower expenses. Not only is the strength of the army, but also our dependence on foreign weapons is being reduced.

The most important thing of these weapons is that they are making their army personnel and officers. These people understand the difficulties of the battlefield well, so their created equipments are very useful. "Our young men are not just fighting the enemy, but also making techniques that are protecting us from relying on foreign companies. ""

Military Innovations: एक्सप्लोडर: बारूदी सुरंगों का दुश्मन

मेजर राजप्रसाद ने ‘एक्सप्लोडर’ नाम का एक खास रोबोट बनाया है। यह एक मानवरहित जमीन वाहन (यूजीवी) है, जो बारूदी सुरंगों और इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइसेज (आईईडी) को ढूंढकर नष्ट कर सकता है। इसे रिमोट से चलाया जाता है, जिससे जवानों को मैनुअली बारूदी सुरंगों को डिफ्यूज नहीं करना पड़ता और जान जाने का जोखिम कम होता है। इस रोबोट का कई बार परीक्षण हो चुका है। इसके सफल परीक्षणों के बाद अब इसे बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए तैयार किया गया है और आने वाले महीनों में सैकड़ों यूनिट्स को सेना में शामिल किया जाएगा।

Military Innovations: अग्निअस्त्र: दूर से कर सकेंगे ब्लास्ट

इसे भी मेजर राजप्रसाद ने बनाया है। ‘अग्निअस्त्र’ (Agniastra) एक पोर्टेबल रिमोट डिटोनेशन सिस्टम है, जिसकी रेंज 2.5 किलोमीटर तक है। यह वायर और वायरलेस दोनों मोड में काम करता है और एक साथ कई टारगेट को सेलेक्ट कर के उन्हें फायर कर सकता है। यह सिस्टम दुश्मन के ठिकानों को खत्म करने और सुरंगों को निष्क्रिय करने में बहुत मददगार है। अग्निअस्त्र IEDs को दूर से निष्क्रिय कर सकता है और सेना को ऑपरेशनल बढ़त दिला सकता है।

Military Innovations: Indian Soldiers Develop Next-Gen Indigenous Weapons
रक्षा मंत्री और सेना प्रमुख को एक्सप्लोडर के बारे में समझाते मेजर राजप्रसाद आरएस

Military Innovations: विद्युत रक्षक: जनरेटर की निगरानी अब ऑटोमेटिक

‘विद्युत रक्षक’ भी मेजर राजप्रसाद ने बनाया है। यह एक स्मार्ट सिस्टम है, जो सेना के जेनरेटरों की देखभाल करता है। यह इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) तकनीक पर काम करता है और जेनरेटर की खराबी को पहले ही बता देता है। यह सिस्टम सभी मौजूदा जनरेटरों को रियल-टाइम में मॉनिटर करता है। फॉल्ट्स की भविष्यवाणी करता है और मैनुअल ऑपरेशंस को ऑटोमेट करता है। इससे मैनपावर की बचत होती है और ऑपरेशनल एफिशिएंसी बढ़ती है। इसे सेना की ‘टेक्नोलॉजी अब्सॉर्प्शन ईयर’ योजना के तहत शुरू किया गया था।

मल्टीपर्पज ऑक्टोकॉप्टर: आसमान में सेना की ताकत

हवलदार वरिंदर सिंह ने एक खास ड्रोन बनाया है, जिसे ‘मल्टीपर्पज ऑक्टोकॉप्टर’ कहते हैं। यह ड्रोन कई काम कर सकता है, जैसे निगरानी करना, दूर-दराज के इलाकों में सामान पहुंचाना और दुश्मन पर हवाई हमला करना। इसमें राइफल और ग्रेनेड जैसे हथियार लगाए जा सकते हैं। खासकर पहाड़ी इलाकों में यह ड्रोन बहुत उपयोगी है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने हवलदार सिंह को उनकी इस उपलब्धि के लिए विशिष्ट सेवा पदक से नवाजा है।

Military Innovations: ‘फर्स्ट पर्सन व्यू’ FPV ड्रोन: टैंक का काल

भारतीय सेना की Fleur-De-Lis ब्रिगेड और टर्मिनल बैलिस्टिक्स रिसर्च लेबोरेट्री (TBRL) ने मिलकर FPV ड्रोन को एंटी-टैंक कामिकाज़े ड्रोन के रूप में डिजाइन किया है। यह ड्रोन टैंक-रोधी हथियारों से लैस है और ‘कामिकेज़’ की तरह काम करता है, यानी यह दुश्मन पर हमला करके खुद नष्ट हो जाता है। अगस्त 2024 में शुरू हुआ यह प्रोजेक्ट आज भारत का पहला इन-हाउस कामिकाजे ड्रोन बन गया है। इस प्रोजेक्ट ने मार्च 2025 तक 100 से ज्यादा ड्रोन तैयार किए। मेजर सेफास चेतन और डॉ. राघवेंद्र ने इसे बनाया है। यह कम लागत वाला, लेकिन बेहद प्रभावी एयर स्ट्राइक सिस्टम है।

Military Innovations: बाज UAS: रॉकेट लॉन्च करने वाला ड्रोन

कर्नल विकास चतुर्वेदी के नेतृत्व में विकसित किया गया ‘बाज़’ एक मानव रहित एयर सिस्टम है, जो रॉकेट लॉन्चर से फायर करने में सक्षम है। यह छोटे हथियार और विस्फोटक भी ले जा सकता है और इसकी रेंज 10 किलोमीटर तथा फ्लाइट ड्यूरेशन 45 मिनट है। यानी यह ड्रोन 10 किलोमीटर तक उड़ सकता है और 45 मिनट तक हवा में रह सकता है। यह कई मिलिट्री ऑपरेशंस के लिए बेहद कारगर है। यह टैंक नष्ट कर सकता है और दुश्मन के बंकर भी तोड़ सकता है।

Military Innovations: Indian Soldiers Develop Next-Gen Indigenous Weapons
सेना प्रमुख के साथ मेजर राजप्रसाद आरएस

वायरलेस इलेक्ट्रॉनिक डिटोनेशन सिस्टम (WEDC)

मेजर राजप्रसाद ने ‘वायरलेस इलेक्ट्रॉनिक डेटोनेशन सिस्टम’ (डब्ल्यूईडीसी) बनाया है। WEDC एक ऐसा वायरलेस सिस्टम है जो विस्फोटकों को इलेक्ट्रॉनिक तरीके से डिटोनेट करता है। यह सिस्टम विस्फोटकों को रिमोट से कंट्रोल करता है। यह सिस्टम ऑपरेशनों में सुरक्षा और दक्षता दोनों को बेहतर बनाता है, क्योंकि इससे सैनिकों को खतरे में नहीं जाने की जरूरत नहीं पड़ती। इसे सेना में शामिल कर लिया गया है।

ये सारे इक्विपमेंट्स दिखाते हैं कि भारतीय सेना अब रक्षा के क्षेत्र में कितनी आगे बढ़ रही है। पहले हम हथियारों के लिए विदेशी कंपनियों पर निर्भर थे, जिससे पैसा भी ज्यादा खर्च होता था और सप्लाई में देरी का भी चांस रहता था। लेकिन अब सेना के जवान खुद हथियार बना रहे हैं, जो युद्ध के मैदान की जरूरतों को पूरा कर रहे हैं।

ये नए हथियार भारत को सामरिक रूप से और मजबूत बना रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ये तकनीकें हमें नए तरह के युद्धों, जैसे हाइब्रिड और ग्रे-जोन युद्धों में बढ़त दिला सकती हैं। ये सस्ते और खास जरूरतों के हिसाब से बनाए गए हैं, जैसे पहाड़ी इलाकों में या आतंकवाद विरोधी अभियानों में।

वहीं, इन स्वदेशी हथियारों से न केवल सेना की ताकत बढ़ रही है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को भी फायदा हो रहा है। इनके उत्पादन से छोटी-बड़ी कंपनियों को काम मिल रहा है, जिससे नौकरियां पैदा हो रही हैं। साथ ही, भारत अब अपने हथियार विदेशों को भी बेच रहा है, जिससे हमारी वैश्विक पहचान बढ़ रही है।

Xploder UGV: All units of the Indian Army will get this indigenous robot! Terrorists have to have the danger bell!

सेना का लक्ष्य है कि अगले कुछ सालों में भारत रक्षा उद्योग में पूरी तरह से आत्मनिर्भर बन जाए। इसके लिए रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ), निजी कंपनियां और स्टार्टअप्स के साथ मिलकर काम किया जा रहा है। सेना ने कई स्टार्टअप्स के साथ ड्रोन और साइबर तकनीक पर प्रोजेक्ट शुरू किए हैं।

Explained: China tested Non-Nuclear Hydrogen Bomb! Learn how to work and why is it for India?

China Tests Non-Nuclear Hydrogen Bomb: What It Means for Future Warfare, Explained

Non-Nuclear Hydrogen Bomb: Beijing has once again shocked the world. China has recently successfully tested a "non-nuclear hydrogen bomb" which is different from traditional nuclear weapons. This bomb does not have radiation, but its warmth and catastrophe capacity is far more than a traditional explosive. This step is picked up in such times, when the US is increasing military help to Taiwan and trying to show China its strength in the South China Sea. Magnesium hydride has been used in this bomb, which is completely different from traditional nuclear bombs. So it is also called Green Nuclear Bomb.

China Tests Non-Nuclear Hydrogen Bomb: What It Means for Future Warfare, Explained

Non-Nuclear Hydrogen Bomb: What is this new weapon?

This bomb is not atom, but its strength cannot be taken lightly. This bomb weighs just 2 kilograms and has been built by the 705 Research Institute of China State Shipbuilding Corporation (CSSC). This institute is famous for weapons used under water. This bomb uses magnesium hydride, which is very effective in storing hydrogen gas. This is Solid State Hydrogen Storage Material, which can store more hydrogen than traditional gas tanks.

जब इस बम को सक्रिय किया जाता है, तो मैग्नीशियम हाइड्राइड तेजी से गर्म होकर हाइड्रोजन गैस छोड़ता है। यह गैस हवा के संपर्क में आते ही 1,000 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा गर्मी वाला आग का गोला बनाती है, जो दो सेकंड से ज्यादा समय तक जलता रहता है। यह समय सामान्य टीएनटी (एक विस्फोटक) के धमाके से 15 गुना ज्यादा है। इसकी गर्मी इतनी तेज है कि यह एल्यूमीनियम जैसी धातुओं को भी पिघला सकती है। साथ ही, इस बम की ताकत को कंट्रोल किया जा सकता है, जिससे यह बड़े इलाके में एकसमान नुकसान पहुंचा सकता है।

Non-Nuclear Hydrogen Bomb: कैसे हुआ बम का परीक्षण?

इस परीक्षण की जानकारी चीन की एक जर्नल Journal of Projectiles, Rockets, Missiles and Guidance में प्रकाशित हुई है। इसके अनुसार, इस बम की ताकत को जांचने के लिए कई प्रयोग किए गए। इनमें इसकी ऊर्जा को एक खास दिशा में भेजने की क्षमता को परखा गया। इसमें बताया गया कि 2 मीटर की दूरी पर बम से 428.43 किलोपास्कल का ओवरप्रेशर दर्ज किया गया, यह टीएनटी के धमाके से 40 प्रतिशत कम था, लेकिन इसकी गर्मी टीएनटी से कहीं ज्यादा थी।

पहले धमाके में मैग्नीशियम हाइड्राइड का पाउडर छोटे-छोटे टुकड़ों में टूट जाता है। ये टुकड़े गर्म होने पर हाइड्रोजन गैस छोड़ते हैं, जो हवा में मिलकर दूसरा और ज्यादा गर्म आग का गोला बनाता है। यह गर्मी और गैस का चक्र बार-बार चलता रहता है, जिससे यह बम सामान्य विस्फोटकों से ज्यादा खतरनाक बन जाता है। इसकी गर्मी आसपास की हर धातु और इन्फ्रास्ट्रक्चर को पिघला सकती है।

इस साल शानक्सी प्रांत में मैग्नीशियम हाइड्राइड का एक बड़ा उत्पादन कारखाना शुरू हुआ, जो हर साल 150 टन सामग्री बना सकता है। पहले यह मटेरियल सिर्फ प्रयोगशालाओं में थोड़ी मात्रा में बनती थी।

Non-Nuclear Hydrogen Bomb: क्या इसका सैन्य इस्तेमाल हो सकता है?

यह हाइड्रोजन बम सिर्फ एक धमाका नहीं करता। यह कई सेकंड तक जलने वाला आग का गोला बनाता है, जो बड़े इलाके को तबाह कर सकता है। PLA (चीन की सेना) इसका उपयोग दुश्मन की टुकड़ियों को खुले मैदान में जलाने, संचार केंद्रों को नष्ट करने, या सीमित क्षेत्रों में टारगेटेड स्ट्राइक के लिए कर सकती है।

चीन की सेना (पीएलए) इस बम का इस्तेमाल कई तरह से कर सकती है। मान लीजिए दुश्मन की कोई सप्लाई लाइन है, यह बम उस पूरे रास्ते को भस्म कर सकता है, वो भी बिना बड़े क्षेत्र में विनाश फैलाए। यही नहीं, यह बम पुलों, फ्यूल डिपो या बंकर जैसी संवेदनशील जगहों पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की तरह भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

क्लीन एनर्जी की तरफ बढ़ी पीएलए?

चीन अपने रक्षा बजट में 7.2% की बढ़ोतरी के साथ 249 बिलियन डॉलर खर्च कर रहा है, और यह रकम आधुनिक और पर्यावरण के अनुकूल सैन्य तकनीकों के डेवलपमेंट में लगाई जा रही है। PLA पहले से ही सोलर, विंड और हाइड्रोजन एनर्जी जैसी क्लीन एनर्जी को अपने नौसेना और ग्राउंड ऑपरेशंस में इस्तेमाल कर रहा है। उदाहरण के लिए, Type 055 Renhai-Class में इंटीग्रेटेड इलेक्ट्रिक प्रोपल्शन (आईईपी) सिस्टम लगा है, जो उसकी रफ्तार और क्षमता को और बढ़ा देता है। वहीं, LandSpace का बनाया Zhuque-2 नाम का रॉकेट दुनिया का पहला ऐसा रॉकेट है, जो लिक्विड मिथेन और ऑक्सीजन से चलकर ऑर्बिट तक पहुंचा।

क्यों है चिंता की बात?

चीन ने यह कदम अमेरिका और ताइवान के बढ़ते रिश्तों के बीच उठाया है। PLA ने हाल ही में ताइवान के चारों ओर बड़ी सैन्य ड्रिल की थी। अमेरिका ने इसे “इंटिमिडेशन” कहा और ताइवान के साथ अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। ऐसे में यह हाइड्रोजन बम परीक्षण चीन के शक्ति प्रदर्शन का संकेत माना जा रहा है।

इस बम की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह परमाणु बम जैसा असर छोड़ता है, लेकिन परमाणु हथियारों के नियमों के दायरे में नहीं आता। इसका मतलब है कि चीन युद्ध के समय इसे बिना ‘न्यूक्लियर वारफेयर’ घोषित किए भी इस्तेमाल कर सकता है।

China helping Houthis: U.S. allegation-Huty Rebellion with the help of China U.S. warships scared!

भारत जैसे देश के लिए यह चिंता का विषय इसलिए है क्योंकि चीन पहले से ही LAC (भारत-चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा) पर तनाव बनाए हुए है। अगर इस तरह की हथियार प्रणाली सीमावर्ती क्षेत्रों में तैनात होती है, तो बड़ी चुनौती मिल सकती है।

What is Indian Navy’s Deep Ocean Watch Project? The underwater spying of Chinese submarines in the Indian Ocean!

Indian Navy Deep Ocean Watch to track Chinese Submarines

Deep Ocean Watch: Indian Navy is preparing for further strengthening its strategic position in the Indian Ocean Region (IOR). The Indian Navy is going to create a state-of-the-art underwater surveillance network in this area. Naval has named this project as ‘Dep Ocean Watch’. Under this project, maritime activities in the Gulf of Indian Ocean Territory i.e. the Bay of Bengal, Nubbe Degree Eastern Ridge, Andaman and Nicobar Islands will be monitored. The move has been specifically raised in view of China’s growing military presence in the region and the security of India’s strategic marine routes.

Indian Navy Deep Ocean Watch to track Chinese Submarines

What is Deep Ocean Watch?

Under the ‘Deep Ocean Watch’ project, the Indian Navy will develop an Integrated Surveillance Mechanism, with the latest detection system will be used. It will include a special type of towed sonar system (Towed Array Sonars), which will be operated from India’s P-8I Poseidon Marine Towhi Aircraft and the Destroyer Warships of Kolkata-class. These sonar systems will identify the objects below the sea by sending the sound waves with extremely low frequency.

This network will include sensors like ‘Magnetic Anomaly Detector’ (Magnetic Anomaly Detector – MAD) Active Low-frequency Sonar System and Superconducting Quantum Interference Device (Squid). The magnetic anomli detector recognizes the changes that come into the magnetic field of the earth, when a large metal object (such as submarine) is present in the sea. The system will be able to monitor the activities ranging from the sea surface to the depth of the sea. While the squid sensors will detect weak electromagnetic signals from the bottom of the sea.

A senior officer of the Navy pointed out that the network will cover more than 5,000 kilometres of area, including from the Gulf of Bengal to the Southern Indian Ocean and the Ninety Degree Eastern Ridge. Under this, an underwater sonar system is planned to be established on the ninety-degree eastern ridge. This system will help to track the activities of submarines passing between the volcanic mountain ranges present under the sea.

The Strategic Importance of Deep Ocean Watch

The Indian Ocean region comprises more than 40 countries, a major centre of world marine trade. Malacca Straight, a major marine choke point in the region, carries about 60 percent of the world trade. The growing activities of China’s People’s Liberation Army Navy (PLAN) have been a concern for India. The Naval Priority is to monitor and protect India’s marine activities in the region.

This monitoring network can prove extremely important to India, especially when China’s military is building naval bases in its neighbouring countries. As an example, places like Ream Nauseonic Adda, located in Cambodia and Koco Island of Myanmar are developing under China’s own marine strategy. These terrains are located a few hundred kilometres from the Andaman-Nikobar Islands of India.

The ‘Dep Ocean Watch’ project is being considered to be part of India’s maritime dominance strategy in this area. This network will not only monitor the submarine activities of China, but also help prevent maritime robbery and illegal activities in the area. In addition, it will provide India a platform for regional and international cooperation. The navy pointed out that data from this network will be integrated with the Maritime Domain Awareness (MDA) frameworks and Information Fusion Centre-IOR (IFC-IOR).

Where to Look for Deep Ocean Watch Network?

The navy pointed out that some areas of the project have been identified specifically. It also has the Ninety East Ridge, spreading from the Gulf of Bengal to the Southern Indian Ocean. In the Andaman and Nicobar Islands, it will be imposed where the tri-service command of India exists and which controls the way of Malacca Jaldmumatri (Malka Straight). Also the Gulf of Bengal, where the fear of Chinese activities remains constant.

Naval says, the effectiveness of this system will be tested in the Bay of Bengal, where marine traffic and submarine activities are the highest. In addition, the Navy plans to incorporate Artificial Intelligence (AI) and Machine Learning (ML) technologies in the future to further strengthen this network. This technology will help this network to automatically analyze dubious activities and reduce false signals.

Countries Welcomed

Responses to the regional and global level after the Allan of this project are started. The neighbouring countries like Maldives and Sri Lanka have welcomed the move of India, as it will promote maritime security in the region. However, some analysts believe that it can further increase India-China tension in the project area. China has not yet made any official comment on this project, but being assumed that he will see this step as a challenge for his marine strategy.

Scorpene Submarines: The Indian Navy’s strength to rise in the sea will meet the three and Scorpene submarines, sanctioned to the deal of Rs 36,000 crore

In addition, India has planned to promote regional cooperation under this project. The navy pointed out that he is considering sharing information received from this network with quad countries (India, America, Japan and Australia). This step will boost a Combined Strategy for Marine Safety in the area.

India Defence Export Strategy: India will now give the second countries to buy the weapons cheaper debt, Russia’s old customers focus

India Defence Export Strategy: The government is now adopting a big strategy on the lines of the US and Russia to promote defence exports under the ‘Make in India’ policy. India is now building missiles, helicopters and warships and is now looking for a foreign market to promote defence exports. For this, India has resorted to cheap loans and Strategic Diplomacy, which aims to attract the traditional customers of Russia towards themselves.

India Defence Export Strategy EXIM Bank to Fund Arms Deals in Brazil, Armenia

The Export-Import Bank of India (EXIM Bank) will now provide cheap and long-term cheap loans to countries that do not find traditional bank loans due to political instability or credit risk. The government’s strategy is aimed at selling weapons to countries that have been dependent for Russian weapons for decades.

The government had made a big decision last year under its corresponding strategy, that he would increase the number of Defence Atashes (Definance Attach) in foreign missions. India has decided that he will deploy more than 20 new Defence Atashe foreign embassies by March 2026. These officers will not only market India’s weapons, but also evaluate the defence needs of the respective countries to connect them to Indian companies. According to sources, India is now focusing on Africa, Latin America and Southeast Asia countries such as Algeria, Morocco, Gina, Tanzania, Argentina, Ethiopia and Cambodia.

India Defence Export Strategy: Russia-Ukraine War Makes Turning Point

Global Weps Supply Chain has been affected since the attack on Russia’s Ukraine in 2022. The world’s largest weapon supplier has changed its priorities now, the country US and Russia. Western countries sent arms to Ukraine from their warehouses, while Russia’s defense factory became engaged in fulfilling its internal demand. Meanwhile, countries like India emerged as new options. It took effect that many countries in Asia, Africa and South America are now looking for new options. India recognized this opportunity and prepared its Defence Export Strategy in such a way that it can now become not just cheaper but trustworthy options.

India Defence Export Strategy: India’s Growing Defence Production

India produced arms worth $14.8 billion in 2023-24 financial year, which is 62 per cent higher than 2020. According to government statistics, India has raised its arms exports from $230 million to $2.3 billion in the last decade, although it is still behind the target of $3.5 billion. The Modi government has aimed to double arms exports by 2029 to $6 billion.

India’s biggest strength is its low cost potential. For example, India can make 155 mm artillery shells at a price of 300 to 400 dollars per shell, while the price in European countries is more than 3,000 dollars. Similarly, the price of the Indian hobbyist is about 3 million dollars, which is half of the price of the European model.

Russia-U.S. giving arms to buy debt

अभी तक रूस और अमेरिका जैसे प्रमुख हथियार निर्यातक देश ही हथियार खरीदने के लिए कर्ज या वित्तीय मदद देने में अग्रणी रहे हैं। अपने रणनीतिक हितों को बढ़ावा देने के लिए हथियार सौदों के साथ फाइनेंसिंग या क्रेडिट गारंटी की पेशकश करते रहे हैं। रूस, अपनी सरकारी हथियार निर्यात एजेंसी रोसोबोरोनएक्सपोर्ट के जरिए कई देशों को हथियारों के साथ-साथ सस्ते ऋण देता रहा है। विशेष रूप से अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के देश, जो सोवियत काल से रूसी हथियारों पर निर्भर थे, इन वित्तीय सुविधाओं का लाभ उठाते रहे हैं। यहां तक कि रूस ने भारत, वियतनाम और अल्जीरिया जैसे देशों को हथियार सौदों के लिए क्रेडिट लाइन दी है।

वहीं, अमेरिका अपने फॉरेन मिलिट्री फाइनेंसिंग (FMF) कार्यक्रम के तहत सहयोगी देशों को हथियार खरीद के लिए लोन देता रहा है। इजरायल, मिस्र, जॉर्डन और नाटो सहयोगियों जैसे देशों के लिए यह लोन बेहद आम हैं। अमेरिका की इस रणनीति से न केवल हथियारों की बिक्री बढ़ती है, बल्कि इसका ज्योपॉलिटिकल असर भी पड़ता है और उसे मजबूत मिलती है।

वहीं हाल के सालों में चीन ने भी अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया में हथियार बिक्री के साथ सस्ते ऋण की पेशकश शुरू की है, खासकर उन देशों को जो बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव का हिस्सा हैं। वहीं, फ्रांस और तुर्की भी अपने हथियार सौदों में क्रेडिट गारंटी या फाइनेंस की पेशकश करते हैं, विशेष रूप से उन ग्राहकों को जो उनके रणनीतिक हितों से जुड़े हैं। इसके अलावा इजरायल ने भी कुछ मामलों में हथियार सौदों के लिए लोन दिए हैं, हालांकि इसका दायरा रूस और अमेरिका के मुकाबले बेहद सीमित है।

India Defence Export Strategy EXIM Bank to Fund Arms Deals in Brazil, Armenia

India Defence Export Strategy: निजी कंपनियों की भागीदारी भी बढ़ी

सरकारी कंपनियों के साथ-साथ अब भारत की निजी रक्षा कंपनियां भी इस अभियान में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। अदाणी डिफेंस, SMPP जैसी कंपनियां अब बड़े पैमाने पर 155 मिमी तोप गोला और अन्य सैन्य उपकरण बना रही हैं। SMPP के सीईओ के अनुसार, “अब ग्लोबल लेवल पर भारत से गोला-बारूद की भारी मांग हो रही है, और हमने इसके लिए नया प्लांट भी तैयार किया है।

अर्मेनिया बना भारत की इस रणनीति का पहला उदाहरण

भारत की नई रणनीति का पहला बड़ा उदाहरण अर्मेनिया है, जहां हाल ही में पहली बार भारत ने डिफेंस अताशे को तैनात किया गया। अर्मेनिया पहले रूस से हथियार लेता था, लेकिन अब भारत की ओर रुख कर रहा है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) के अनुसार, 2022 से 2024 के बीच अर्मेनिया के कुल हथियार आयात में भारत की हिस्सेदारी 43% रही है।

बड़े हथियारों की बिक्री पर फोकस

पश्चिमी देशों की तुलना में भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी कम लागत और उत्पादन क्षमता है। अभी भारत मुख्यतया छोटे हथियार, गोला-बारूद और डिफेंस इक्विपमेंट्स ही निर्यात करता है, लेकिन अब सरकार चाहती है कि हेलिकॉप्टर, रडार, मिसाइल और युद्धपोत जैसे हाई-एंड सिस्टम्स का भी बड़ा हिस्सा हो। लंदन के इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज के रिसर्चर विराज सोलंकी ने कहा, “जब तक भारत अपने स्वदेशी उपकरणों का अधिक बार उपयोग नहीं करता और उनकी प्रभावशीलता का प्रदर्शन नहीं करता, तब तक संभावित खरीदारों को समझाना मुश्किल होगा।”

इसके बावजूद, भारत अपनी मिसाइल प्रणालियों जैसे आकाश और युद्धपोतों के निर्यात को बढ़ाने के लिए उत्साहित है। भारत की रणनीति में दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया के देश प्रमुख लक्ष्य हैं। ब्राज़ील में हाल ही में EXIM बैंक का ऑफिस खोला गया है। भारत ने ब्राज़ील को ‘आकाश’ मिसाइल सिस्टम और युद्धपोत बेचने की बातचीत शुरू कर दी है। इसके अलावा, भारत की भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) ने भी साओ पाउलो में एक मार्केटिंग ऑफिस खोला है। EXIM बैंक को इस रणनीति का केंद्र बनाया गया है, जो अब अपने कॉमर्शियल पोर्टफोलियो से ऐसे सौदों को सपोर्ट करेगा। यह पोर्टफोलियो 2023-24 में $18.32 बिलियन तक पहुंच चुका है।

भारतीय नौसेना के रिटायर्ड कमांडर और KPMG डिफेंस के एडवाइजर गौतम नंदा का कहना है, “भारत ने न तो अपनी उत्पादन क्षमता घटाई, न ही उसे कभी युद्ध की संभावना से इनकार किया। आज भारत के पास वो अनुभव और उत्पादन लाइनें हैं जो पश्चिमी देशों ने पोस्ट-कोल्ड वॉर में बंद कर दी थीं।”

Pantsir air defence-gun system: India is coming to this special air defense system, India Dianamix Ltd and Rosoboronexport of Russia

हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत को हाई-एंड सिस्टम्स बेचने के लिए खुद उन हथियारों का इस्तेमाल करके उनका ट्रैक रिकॉर्ड दिखाना होगा। IISS के विशेषज्ञ विराज सोलंकी के अनुसार, “जब तक भारत अपने बनाए गए आधुनिक हथियारों का पर्याप्त प्रदर्शन नहीं करेगा, तब तक खरीदारों का पूरी तरह भरोसा नहीं मिलेगा।”

Explainer: Star Wars Weapons Near India Now! The Laser-DEW will devastate from the moment to the drone of the enemy

Explained: What is India’s Laser-DEW System that Destroys Drones in Seconds?

Laser-DEW: If you’ve seen the Star Wars movies, the films will also remember the glowing LightSiber and the laser tablets in space, which eliminated the enemies in the moment? The laser weapons that appear in Science fiction films have now become reality, and it has been amazing by India! Now India has also joined the categories with Star Wars arms. The Defence Research and Development Organization (DRDO) has successfully tested its MK-Two (A) laser-guide energy velocity (DEW). This weapon can turn the drone, missile and small projectile into jokes like JD Knight.

Explained: What is India’s Laser-DEW System that Destroys Drones in Seconds?

India tested its 30-kW laser-based weapon for the first time on Sunday. This weapon destroyed drones, missiles, swarm drones and sensors in jokes. With this success, India has joined the Fahrist of countries like the US, Russia, China, UK and Israel, in the race of weapons such as Star Wars.

Laser-DEW: 3.5km away targeted drone

On April 13, it was tested in the National Open Air Range (NOAR) in Kurnool, Andhra Pradesh. It was not a simple test, but assume that the galaxy of Star Wars has a sine of rust! DRDO’s team showed how powerful their laser-DEW mark-II(A) arms are. It targeted the flying drone at a distance of 3.5 kilometres, destroyed the flock of seven drones and "blind" the drone and ground-mounted surveillance cameras and sensors.

Laser-DEW: कैसे काम करता है यह हथियार?

अब आपके मन में सवाल उठ रहा होगा कि ये लेजर हथियार आखिर करता क्या है? हम सभी ने बचपन में टॉर्च की रोशनी देखी है, जो अंधेरे में एक जगह को रोशन कर देती है। लेकिन इस हथियार की रोशनी इतनी तेज और गर्म होती है कि यह ड्रोन या मिसाइल को पल में जला सकती है। जब रडार या इसके अपने सेंसर किसी टारगेट को पकड़ते हैं, तो यह हथियार उस पर लेजर की शक्तिशाली किरण छोड़ता है। यह किरणें टारगेट को ब्लाइंड कर देती हैं या उसे इतना नुकसान पहुंचाती हैं कि वह काम करना बंद कर देता है। और सबसे मजेदार बात? इसे बार-बार इस्तेमाल किया जा सकता है, बिना किसी महंगे रॉकेट या गोली की जरूरत के। हमारे वैज्ञानिकों का कहना है कि इस हथियार को चलाने की लागत इतनी कम है कि इसे दो-तीन लीटर पेट्रोल जितने खर्च में इस्तेमाल किया जा सकता है।

Laser-DEW: पूरी तरह से स्वदेशी हथियार

इस हथियार को डीआरडीओ के सेंटर फॉर हाई एनर्जी सिस्टम्स एंड साइंसेज (चेस), हैदराबाद ने बनाया है। इसमें कई दूसरी डीआरडीओ लैब्स, भारतीय उद्योगों और शिक्षण संस्थानों का भी योगदान रहा है। यह पूरी तरह स्वदेशी हथियार है। डीआरडीओ के चेयरमैन डॉ. समीर वी. कामत ने कहा, “यह तो बस शुरुआत है। हम लेजर के अलावा माइक्रोवेव और इलेक्ट्रोमैग्नेटिक पल्स जैसे हथियारों पर भी काम कर रहे हैं। ये तकनीकें हमें स्टार वार्स जैसी ताकत देंगी।”

क्यों है यह हथियार खास?

DRDO के मुताबिक, ये तकनीक ‘बीम किल’ पर आधारित है, यानि किसी भी लक्ष्य को भेदने के लिए कोई रॉकेट या मिसाइल नहीं, बल्कि प्रकाश की रफ्तार से चलने वाली लेज़र बीम का इस्तेमाल किया जाता है। पारंपरिक मिसाइलों और हथियारों को चलाने में लाखों रुपये खर्च होते हैं। लेकिन इस हथियार का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह बेहद सस्ता पड़ता है, जितना खर्च दो लीटर पेट्रोल का है, उतने में दुश्मन का एक ड्रोन खत्म किया जा सकता है। यानी एक तरफ दुश्मन के पास कम लागत वाले ड्रोन हैं, और दूसरी तरफ भारत के पास उसे हराने के लिए कम खर्च वाली लेजर टेक्नोलॉजी।

इस तकनीक की खास बात यह है कि इसमें पारंपरिक मिसाइल या गोला-बारूद की तरह विस्फोट नहीं होता, न ही भारी खर्च होता है। इसमें सिर्फ ऊर्जा का उपयोग होता है और वह भी इतनी तेज़ कि एक बार टारगेट पर पड़ते ही उसका काम तमाम हो जाता है। आजकल सस्ते ड्रोन हमले एक बड़ा खतरा बन गए हैं। ऐसे में यह हथियार उनसे निपटने का सबसे सस्ता और प्रभावी तरीका है। साथ ही, यह आसपास के इलाकों को नुकसान पहुंचाए बिना सटीक निशाना लगाता है, जिससे जानमाल की हिफाजत होती है।

डीआरडीओ के सेंटर फॉर हाई एनर्जी सिस्टम्स एंड साइंसेज (चेस) के वैज्ञानिक डॉ. बी.के. दास ने बताया कि यह तकनीक भविष्य की है। आजकल दुनिया में युद्ध का तरीका बदल रहा है। पहले जहां बड़े-बड़े टैंक और मिसाइलों की बात होती थी, अब छोटे-छोटे ड्रोन और उनके झुंड दुश्मनों के लिए सिरदर्द बन रहे हैं। ऐसे में यह लेजर हथियार हमारे लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है। यह न सिर्फ सस्ता है, बल्कि इसे गाड़ियों पर लादकर कहीं भी ले जाया जा सकता है। यानी चाहे बॉर्डर हो या कोई और जगह, ये हथियार हमारी सेना के साथ तैयार रहेगा।

इसका बड़ा साइज है बड़ी चुनौती

हमारे वैज्ञानिकों के सामने अभी बड़ी चुनौती इसका बड़ा साइज है। अभी ये हथियार इतना बड़ा है कि इसे आसानी से हवाई जहाज या युद्धपोतों पर नहीं लगाया जा सकता। इसे और छोटा करने की कोशिशें की जा रही हैं, ताकि ये हर तरह की जंग में काम आ सके। इसके अलावा, डीआरडीओ अब और भी ताकतवर लेजर हथियार बनाने की योजना बना रहा है, जो 50 से 100 किलोवाट की ताकत के हों। साथ ही, वे एक और नई तकनीक पर काम कर रहे हैं, जिसे हाई-एनर्जी माइक्रोवेव कहते हैं।

भारतीय सेना के पास 23 ऐसे सिस्टम

फिलहाल भारतीय सेना के पास 2 किलोवॉट और 10 किलोवॉट क्षमता वाले करीब 23 ऐसे सिस्टम हैं, जिनकी मारक दूरी 1-2 किलोमीटर तक है। लेकिन अब जो नया Mk-II(A) सिस्टम तैयार हुआ है, वह इससे कहीं ज्यादा शक्तिशाली है। आने वाले 1 से डेढ़ साल में इसका यूजर ट्रायल शुरू किया जा सकता है, और DRDO इस तकनीक को भारतीय कंपनियों को सौंपने की प्रक्रिया में है ताकि इसका उत्पादन बड़े पैमाने पर हो सके।

तेज बारिश या धुंध में नहीं कर सकते काम

इस तरह के लेजर हथियारों में कुछ देश हमसे काफी आगे हैं। मिसाल के तौर पर, दुनिया के कुछ ही देशों के पास यह तकनीक है — जैसे अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और इज़राइल। अमेरिका ने 60 किलोवॉट क्षमता वाली ‘Helios’ नामक लेज़र प्रणाली को अपनी युद्धपोतों पर तैनात किया है, जिसे 120 किलोवॉट तक बढ़ाया जा सकता है। वहीं इज़राइल भी अपनी ‘Iron Beam’ प्रणाली को अंतिम रूप दे रहा है, जिसकी रेंज 10 किलोमीटर है।

अब आप सोच रहे होंगे कि ये लेजर हथियार इतने कमाल के हैं, तो इन्हें अभी तक हर जगह क्यों नहीं इस्तेमाल किया जा रहा? इसका जवाब है कि अभी इनमें कुछ कमियां भी हैं। मिसाल के तौर पर, ये हथियार पारंपरिक हथियारों जितनी दूरी तक मार नहीं कर सकते। साथ ही, अगर मौसम खराब हो जैसे तेज बारिश या धुंध, तो इनका असर कम हो सकता है। लेकिन हमारे वैज्ञानिक इन कमियों को दूर करने में जुटे हैं। DRDO का कहना है कि जैसे-जैसे तकनीकी प्रगति होगी, वैसे-वैसे इन चुनौतियों को भी दूर कर लिया जाएगा। नई तकनीक जैसे बीम स्टीयरिंग और अडैप्टिव ऑप्टिक्स इस दिशा में मदद करेंगी।

नए एयरो इंजन पर काम कर रहा है DRDO

डीआरडीओ सिर्फ इस हथियार तक सीमित नहीं है। डॉ. कामत ने भारत के पहले पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ विमान, एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एएमसीए) के बारे में भी बताया। इस विमान को तैयार होने में 10-15 साल लग सकते हैं। यह प्रोजेक्ट 2024 में शुरू हुआ है और 2035 तक इसके तैयार होने की उम्मीद है। इसके अलावा, डीआरडीओ एक नए एयरो इंजन प्रोग्राम पर काम कर रहा है, जो छठी पीढ़ी की तकनीक पर आधारित होगा। इसके लिए भारत किसी विदेशी कंपनी के साथ साझेदारी की योजना बना रहा है।

VSHORADS: This new air defense system of DRDO will make the targets flying at low altitudes as soon as the eyelid is blinked, these are merits

इसके अलावा DRDO के चेयरमैन डॉ. समीर वी. कामत ने यह भी बतााया, “कई प्रोजेक्ट अब मैच्योरिटी की ओर बढ़ रहे हैं। अगले छह महीने से एक साल के भीतर VSHORAD, MPATGM, LCA Mark II जैसे कई सिस्टम्स का इंडक्शन शुरू हो जाएगा। LCA Mark II की पहली उड़ान भी इस अवधि में होने की उम्मीद है।”

उनके मुताबिक, DRDO की कई बड़ी तकनीकों और प्रणालियों को जल्द भारतीय सेना के इस्तेमाल के लिए तैनात किया जाएगा, जिससे देश की आत्मनिर्भर रक्षा क्षमता को नई मजबूती मिलेगी।

41 Years of Operation Meghdoot: If the UPA government retreats from the siachin in 2006, today happens at the door of Ladakh China-Pakistan!

41 years of Operation meghdoot: what if upa quit siachen in 2006

41 Years of Operation Meghdoot: 41 साल पहले, 13 अप्रैल 1984 को भारत ने ऑपरेशन मेघदूत (Operation Meghdoot) के तहत दुनिया के सबसे ऊंचे और ठंडे युद्धक्षेत्र सियाचिन ग्लेशियर (Siachen Glacier) पर कब्जा किया था। 2006 में यूपीए सरकार के कार्यकाल के दौरान सियाचिन से भारतीय सेना को पीछे हटाने की बातें सामने आई थीं (Indian Army Withdrawal Proposal 2006)। उस समय भारत और पाकिस्तान के बीच शांति वार्ता चल रही थी, और सियाचिन को डी-मिलिटराइज करने का प्रस्ताव (Demilitarisation Proposal Siachen) चर्चा में था। हालांकि, यह कदम नहीं उठाया गया। आज, जब सियाचिन के आसपास चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियां (China’s Military Activities Near Siachen) भारत के लिए एक नई चुनौती बन गई हैं, यह सवाल फिर से उठ रहा है कि अगर 2006 में भारत सियाचिन से पीछे हट जाता, तो आज की स्थिति क्या होती? क्या यह कदम सही होता, या भारत के लिए एक रणनीतिक भूल (Strategic Mistake India) साबित होता? विशेषज्ञों का मानना है कि यह क्षेत्र अब केवल भारत-पाकिस्तान के बीच की लड़ाई का मैदान नहीं रहा, बल्कि चीन की रणनीतिक चालों ने इसे एक त्रिकोणीय संघर्ष का केंद्र (India China Pakistan Military Triangle) बना दिया है।

41 years of Operation meghdoot: what if upa quit siachen in 2006

41 Years of Operation Meghdoot: सियाचिन का इतिहास

सियाचिन ग्लेशियर, जो हिमालय की कराकोरम पर्वत श्रृंखला में 76 किलोमीटर लंबाई में फैला हुआ है, अपनी कठिन जलवायु और ऊंचाई के कारण हमेशा से एक चुनौतीपूर्ण क्षेत्र रहा है। यह ग्लेशियर 20,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है, जहां तापमान शून्य से 50 डिग्री सेल्सियस नीचे तक चला जाता है। इसके बावजूद, भारत और पाकिस्तान ने इस क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी बनाए रखी है। हालांकि पाकिस्तान सियाचिन ग्लेशियर पर नहीं है, बल्कि वह साल्टोरो रिज से नीचे है। साल्टोरो रिज सियाचिन ग्लेशियर के पश्चिम में एक प्राकृतिक अवरोधक की तरह है, जो भारत को पाकिस्तान और चीन से अलग करती है। यह रिज करीब 110 किलोमीटर तक फैली हुई है और इसकी सबसे ऊंची चोटी बिलाफोंड ला (17,880 फीट) है। यह रिज लद्दाख के डेपसांग मैदानों और शक्सगाम घाटी के बीच एक रणनीतिक ढाल की तरह काम करती है। शक्सगाम घाटी, जिसे 1963 में पाकिस्तान ने अवैध रूप से चीन को सौंप दिया था, अब चीन इस क्षेत्र में सड़कें और सैन्य ढांचा बना रहा है।

सियाचिन का भू-राजनीतिक संदर्भ

1949 के कराची समझौते और 1972 के शिमला समझौते के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) तय की गई थी। लेकिन सियाचिन के इलाके पर कोई फैसला नहीं हुआ, क्योंकि यह इलाका नो मेंस लैंड था। 1949 के कराची समझौते के बाद, भारत और पाकिस्तान के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) को NJ 9842 तक परिभाषित किया गया था। लेकिन NJ 9842 से आगे, सियाचिन ग्लेशियर तक का इलाका अस्पष्ट था। इस समझौते में कहा गया था कि एलएसी NJ 9842 से “उत्तर की ओर ग्लेशियरों की ओर” जाएगी, लेकिन इसे स्पष्ट रूप से चिह्नित नहीं किया गया। 80 के दशक में पाकिस्तान ने यहां पर सैन्य गतिविधियां शुरू कीं। पाकिस्तान ने सियाचिन को अपने नक्शों में दिखाना शुरू कर दिया और विदेशी पर्वतारोहियों को इस क्षेत्र में जाने की अनुमति दी। 1980 तक, यह साफ हो गया कि पाकिस्तान सियाचिन पर कब्जा करने की योजना बना रहा है। उसने इस क्षेत्र में गश्त बढ़ा दी और जापानी पर्वतारोहियों को सियाचिन के रास्ते में मदद करने के लिए अपनी सेना को तैनात किया। यह भारत के लिए खतरे की घंटी थी।

Operation Zafran: बालाकोट एयरस्ट्राइक के बाद भारत ने शुरू किया था ये टॉप-सीक्रेट मिलिट्री ऑपरेशन, पाकिस्तान को कर दिया था नजरबंद

कैसे शुरू हुआ ऑपरेशन मेघदूत?

1983 तक, भारतीय खुफिया एजेंसियों ने सियाचिन में पाकिस्तान की गतिविधियों पर नजर रखना शुरू कर दिया था। रॉ (रिसर्च एंड एनालिसिस विंग) और भारतीय सेना की खुफिया इकाइयों ने पाया कि पाकिस्तान ने इस क्षेत्र में सैन्य चौकियां बनाने की योजना बनाई है। यह भी पता चला कि पाकिस्तान ने यूके और जर्मनी से सियाचिन के लिए विशेष पर्वतारोहण और सैन्य उपकरण खरीदे थे। पाकिस्तान की योजना थी कि वह सियाचिन के साल्टोरो रिज पर कब्जा कर ले, जो इस क्षेत्र का सबसे ऊंचा और रणनीतिक हिस्सा है।

इसके जवाब में, भारतीय सेना ने ऑपरेशन मेघदूत की योजना बनाई। इस ऑपरेशन का नेतृत्व लेफ्टिनेंट जनरल प्रेम नाथ हून ने किया, जो उस समय 15 कोर के कमांडर थे। योजना यह थी कि भारत पाकिस्तान से पहले सियाचिन में अपनी स्थिति मजबूत कर ले और साल्टोरो रिज पर कब्जा कर ले। इस ऑपरेशन में चौथी बटालियन ऑफ कुमाऊं रेजिमेंट और लद्दाख स्काउट्स को मुख्य भूमिका दी गई। इसके अलावा, भारतीय वायु सेना (IAF) ने भी इस ऑपरेशन में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बड़ा फैसला लेते हुए ऑपरेशन मेघदूत शुरू करके सियाचिन पर नियंत्रण हासिल कर लिया। ऑपरेशन मेघदूत की शुरुआत 13 अप्रैल 1983 को हुई, हालांकि इसकी तैयारी कई महीनों से चल रही थी। भारतीय सेना ने सबसे पहले सियाचिन के मुख्य दर्रों बिलाफोंड ला और सिया ला पर कब्जा करने की योजना बनाई। लेकिन इस ऑपरेशन को अंजाम देना आसान नहीं था। सियाचिन में तापमान शून्य से 50 डिग्री सेल्सियस तक नीचे चला जाता है, और ऑक्सीजन की कमी के कारण सैनिकों को ऊंचाई से संबंधित बीमारियों का सामना करना पड़ता है।

भारतीय वायु सेना ने चीता और मिग-29 हेलीकॉप्टरों का इस्तेमाल करके सैनिकों और जरूरी सामान को सियाचिन तक पहुंचाया। सैनिकों को विशेष रूप से ट्रेनिंग दी गई ताकि वे इस कठिन इलाके में लड़ सकें। 13 अप्रैल 1983 को, भारतीय सेना ने बिलाफोंड ला पर कब्जा कर लिया और वहां तिरंगा फहराया। इसके बाद, सिया ला और अन्य महत्वपूर्ण चोटियों पर भी भारत ने अपनी स्थिति मजबूत कर ली।

1984 में ऑपरेशन मेघदूत के बाद से भारत ने सियाचिन में अपनी सैन्य उपस्थिति बनाए रखी है। लेकिन इसकी कीमत भी भारी रही है। ठंड, हिमस्खलन और ऊंचाई से संबंधित बीमारियों के कारण हर साल कई सैनिक अपनी जान गंवा देते हैं। 2006 में, यूपीए सरकार ने सियाचिन को डी-मिलिटराइज करने की संभावना पर विचार किया था, ताकि दोनों देशों के सैनिकों की जान बचाई जा सके और भारत-पाकिस्तान के बीच विश्वास बहाली हो सके।

2006 में पीछे हटने का प्रस्ताव

2006 में, भारत और पाकिस्तान के बीच शांति वार्ता के दौरान सियाचिन से सैन्य वापसी का विचार सामने आया था। उस समय यूपीए सरकार में तत्कालीन रक्षा मंत्री प्रणब मुखर्जी और पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के बीच इस मुद्दे पर बातचीत हुई थी। प्रस्ताव था कि दोनों देश सियाचिन से अपनी सेनाओं को हटाएं और इसे एक डी-मिलिटराइज्ड जोन घोषित करें। लेकिन कई रक्षा विशेषज्ञों और सेना के अधिकारियों ने इसका कड़ा विरोध किया। उनकी दलील थी कि सियाचिन से पीछे हटने का मतलब होगा इस रणनीतिक क्षेत्र को पाकिस्तान और अप्रत्यक्ष रूप से चीन के लिए खोल देना।

भारत के पूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल जेजे सिंह का कहना है कि 1984 में जब पाकिस्तान ने सियाचिन पर कब्जे की योजना बनाई, तो भारतीय सेना ने उससे पहले ही ऑपरेशन मेघदूत के तहत इस रणनीतिक ग्लेशियर पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। उन्होंने कहा, “हमने श्योक नदी के पास की ऊंची चोटियों को अपने कब्जे में लेकर पाकिस्तान की योजना को पूरी तरह नाकाम किया।” उनके मुताबिक, यह एक ऐसा रणनीतिक क्षेत्र है जो भारत को पाकिस्तान और चीन के बीच की कड़ी को तोड़ने का सामरिक लाभ देता है।

जनरल सिंह ने पुष्टि की कि 2006 में भारत और पाकिस्तान के बीच इस मुद्दे पर बातचीत चल रही थी, लेकिन भारतीय सेना ने सख्त विरोध जताया। “मैंने उस समय NSA एमके नारायणन को स्पष्ट कहा था कि जब तक पाकिस्तान नक्शे पर हमारी स्थिति को औपचारिक रूप से मान्यता नहीं देता, हम पीछे नहीं हट सकते।”

उन्होंने यह भी कहा कि अगर सेना ने दृढ़ रुख न अपनाया होता, तो राजनीतिक दबाव के आगे घुटने टेकना पड़ता। उन्होंने कहा, “मैंने खुद इस इलाके में खून बहाया है, मैं जानता हूं कि सियाचिन हमारे लिए कितना महत्वपूर्ण है। यह कोई बर्फीला बंजर इलाका नहीं, बल्कि भारत की सामरिक शक्ति का प्रतीक है।”

वहीं, रक्षा विशेषज्ञ और रिटायर्ड मेजर जनरल विवेक अस्थाना कहते हैं, “2006 में सियाचिन से पीछे हटना एक बड़ी रणनीतिक भूल होती। सियाचिन भारत के लिए एक रक्षात्मक ढाल की तरह है। अगर हम उस समय पीछे हट जाते, तो आज चीन और पाकिस्तान की साझेदारी को देखते हुए हमारी स्थिति बहुत कमजोर हो जाती। सल्टोरो रिज पर हमारा नियंत्रण ही हमें इस क्षेत्र में बढ़त देता है।”

चीन की बढ़ती दखलअंदाजी

2025 में सियाचिन के आसपास की स्थिति पहले के मुकाबले ज्यादा से कहीं ज्यादा जटिल हो गई है। चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) ने सियाचिन के पास शक्सगाम घाटी और डेपसांग मैदानों में अपनी सैन्य गतिविधियां बढ़ा दी हैं। 2020 में गलवान घाटी में भारत और चीन के बीच हुए हिंसक संघर्ष के बाद से भारत अब चीन को लेकर सचेत है। चीन ने कराकोरम राजमार्ग के जरिए इस इलाके में अपनी पहुंच बढ़ाई है, जो चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) का हिस्सा है। यह राजमार्ग पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) से होकर गुजरता है, जिसे भारत अपनी संप्रभुता का हिस्सा मानता है। भारत ने हमेशा से सीपीईसी का विरोध किया है। लेकिन अब, सियाचिन के पास चीन की सड़क और बुनियादी ढांचे के निर्माण ने भारत की चिंताएं और बढ़ा दी हैं।

भारत के सामने क्या है चुनौती?

सियाचिन में भारत की स्थिति मजबूत है। सियाचिन के पूर्वी हिस्से में लद्दाख के डेपसांग मैदानों में भारतीय सेना और चीन की पीएलए दोनों आमने सामने हैं। डेपसांग में डीबीओ (दौलत बेग ओल्डी) सड़क, जो भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, इस पर चीन की नजर है। इसके अलावा, सियाचिन के पश्चिम में पीओके में पाकिस्तान की सेना और चीन की सैन्य सहायता ने भारत के लिए खतरे को और बढ़ा दिया है।

भारत ने सियाचिन में अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए हैं। भारतीय सेना ने सल्टोरो रिज पर अपनी चौकियां स्थापित की हैं और वहां टैंक, तोपें और अन्य हथियार तैनात किए हैं। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि सियाचिन में सैन्य उपस्थिति बनाए रखना बेहद महंगा और जोखिम भरा है। ठंड, हिमस्खलन और ऊंचाई से संबंधित बीमारियों के कारण हर साल कई सैनिक अपनी जान गंवा देते हैं। ऐसे में, भारत को अपनी रणनीति में बदलाव करने की जरूरत है।

पाकिस्तान को हो जाता ये फायदा

वहीं, 2006 में अगर भारत सियाचिन से पीछे हट जाता, तो सबसे पहला और तात्कालिक लाभ पाकिस्तान को होता। सियाचिन पर भारत का नियंत्रण 1984 से ही पाकिस्तान के लिए एक चुनौती रहा है। साल्टोरो रिज पर भारत की पकड़ ने पाकिस्तान को इस क्षेत्र में अपनी स्थिति मजबूत करने से रोक रखा है। भारत की वापसी के बाद, पाकिस्तान तुरंत साल्टोरो रिज पर कब्जा कर लेता, जिससे उसे सियाचिन ग्लेशियर का ज्यादातर हिस्सा अपने नियंत्रण में लेने का मौका मिल जाता, जो पाकिस्तान के लिए यह एक बड़ी रणनीतिक जीत होती।

रक्षा विशेषज्ञ लेफ्टिनेंट कर्नल (रिटायर्ड) अनुपम कुमार कहते हैं, “सियाचिन से भारत की वापसी पाकिस्तान के लिए एक सुनहरा मौका होती। वे साल्टोरो रिज पर कब्जा कर लेते और सियाचिन को अपने नियंत्रण में ले लेते। इससे उनकी स्थिति मजबूत होती और भारत के लिए एक नया सैन्य खतरा पैदा होता।”

पाकिस्तान इस क्षेत्र का इस्तेमाल भारत के खिलाफ घुसपैठ और आतंकी गतिविधियों को बढ़ाने के लिए भी कर सकता था। सियाचिन के पास से गुजरने वाली वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर उसकी पकड़ मजबूत हो जाती, जिससे भारत के लिए इस क्षेत्र में निगरानी और रक्षा करना मुश्किल हो जाता।

क्या लद्दाख पर हो जाता चीन का कब्जा?

सियाचिन से भारत की वापसी का सबसे बड़ा लाभ चीन को होता। सियाचिन के पश्चिम में शक्सगाम घाटी में चीन को अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ाने का मौका मिल जाता। साल्टोरो रिज पर पाकिस्तान का कब्जा अप्रत्यक्ष रूप से चीन के लिए फायदेमंद होता, क्योंकि पाकिस्तान और चीन की सैन्य साझेदारी पहले से ही मजबूत है।

2024 में सैटेलाइट इमेज से पता चला कि चीन ने हाइवे G219 से एक सड़क बनाई है, जो सियाचिन ग्लेशियर के उत्तरी हिस्से से महज 50 किलोमीटर दूर तक जाती है। अगर भारत सियाचिन से हट जाता, तो चीन इस सड़क को और आगे बढ़ाकर सियाचिन तक अपनी पहुंच बना लेता। इससे चीन को लद्दाख और दौलत बेग ओल्डी (डीबीओ) सड़क तक सीधा रास्ता मिल जाता, जो भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है।

सैन्य विशेषज्ञ प्रोफेसर मोहम्मद रिजवान कहते हैं, “सियाचिन से भारत की वापसी चीन के लिए एक रणनीतिक जीत होती। वे सियाचिन के जरिए लद्दाख में अपनी सैन्य पकड़ मजबूत कर लेते। इससे भारत की पूरी उत्तरी सीमा खतरे में पड़ जाती।” चीन इस क्षेत्र का इस्तेमाल भारत को घेरने के लिए भी कर सकता था। सियाचिन के पास कराकोरम राजमार्ग, जो चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) का हिस्सा है, पहले से ही चीन की सैन्य और आर्थिक रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। सियाचिन पर नियंत्रण के बाद, चीन इस राजमार्ग को और प्रभावी ढंग से इस्तेमाल कर सकता था, जिससे भारत के लिए एक नया सैन्य खतरा पैदा होता।

वह कहते हैं, “सियाचिन से पीछे हटना भारत के लिए आत्मघाती कदम होता। चीन और पाकिस्तान की साझेदारी को देखते हुए, सियाचिन हमारी रक्षा की पहली पंक्ति है। अगर हम 2006 में पीछे हट जाते, तो आज चीन कराकोरम पास से लद्दाख तक अपनी सैन्य चौकियां बना चुका होता। यह भारत की संप्रभुता के लिए एक बड़ा झटका होता।” उनका कहना है कि सियाचिन में भारत की सैन्य उपस्थिति भले ही महंगी हो, लेकिन यह हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी है। 2006 में पीछे हटने का फैसला हमें आज एक ऐसी स्थिति में ला सकता था, जहां हमारी रक्षा की पहली पंक्ति ही टूट जाती।

Tahawwur Rana Extradition: What is the wife of Tehiveur Rana in the 26/11 case of Samaj Rana? ‘Major Ekbal’ also opens Raj

Tahawwur Rana Extradition: What’s the Role of His Wife Samraz Rana in the 26/11 Case? who is Major Iqbal?

Tahawwur Rana Extradition: 26/11 Mumbai attack accused Tehwur Hussein Rana has been repatriated from the US. A name has come again in discussion with Tehiver Rana is Samraj Rana Akttar. The Canadian citizens of Samraj Pakistani origin are the wife of Tehvur Hussain Rana. Samraj has been a doctor in the medical core of the Pakistan Army at a time. But now they have been identified as the spouse of an accused, which is accused of plotting one of India’s largest terrorist events. Tehiver Rana will be the third person to sue in India in 26/11 case. Earlier Ajmal Kasab and Abu Jindaal had sued India. Ajmal Kasab was hanging in the Jerusalem prison of Pune in 2012.

Tahawwur Rana Extradition: What’s the Role of His Wife Samraz Rana in the 26/11 Case? who is Major Iqbal?

Samraj is basically a pakistan living and some of his family live in the air of Uttar Pradesh today. It was revealed that Rana and Samraj had visited India in November 2008 a few days before the Mumbai attacks, which later became part of the NIA’s investigation involving the 26/11 Mumbai attack.

Tahawwur Rana Extradition: Pakistani army was doctor at Samraj

More information about the exact date of birth and family background of Samraj Rana Akhter, born in the Punjab province of Pakistan is not public. According to some sources, their family was medium-class, where education was given special emphasis. Samraj completed medical studies and then he joined the Pakistani Army Medical Corps. During this time, he met Tehwavur Hussain Rana, who was himself employed as a doctor in the medical core of the Pakistan Army. Both marriages took place in the 1980s and at the end of the 1990s, Tuluvwar and Samraj left the army job and went to Canada with Samraj. The formulas say that Thuvvr Lashkar A was exposed to Taiba.

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After leaving the army, Tuluvr Rana started the Business of First World Immigration Services in Canada and then America’s Chicago. Samraj also went along with him. During this time, three children had two daughters and one son. The company of Thuwor worked in many countries, including America and India. This company later caused concern for investigating agencies, as the terror network links behind this business were revealed. Rana had submitted its "Immigrant Law Center" business proposal letter for visa in India and property tax documents received from Cook County of America as Adrece Proof.

Tahawwur Rana Extradition: Between 3 to 21 November India came both

2008 में 26 नवंबर से कुछ ही दिन पहले, 13 से 21 नवंबर के बीच समराज और तहव्वुर राणा ने भारत की यात्रा की थी। वीज़ा दस्तावेज़ों के अनुसार, समराज को 5 साल का टूरिस्ट वीज़ा और तहव्वुर राणा को 1 साल का बिज़नेस वीज़ा तत्कालीन भारत सरकार की तरफ से जारी किया गया था। सरकारी दस्तावेज़ों के मुताबिक, तहव्वुर राणा को 3 मार्च 2006 को पासपोर्ट नंबर JV533373 जारी किया गया था, जो 3 मार्च 2011 तक वैध था। उन्हें 31 अक्टूबर 2008 को भारत की ओर से एक साल का बिज़नेस वीज़ा (नंबर AF232384) जारी किया गया था। जबकि पत्नी समराज राणा अख्तर को 9 अगस्त 2007 को पासपोर्ट नंबर WB694622 जारी किया गया, जो 8 अगस्त 2012 तक वैध था। समराज को 31 अक्टूबर 2008 को पांच साल की अवधि के लिए टूरिस्ट वीज़ा (नंबर AF232383) जारी किया गया था।

Tahawwur Rana Extradition: शोक सभा में शामिल होने की टाइमिंग पर उठे सवाल

खुफिया एजेंसियों के मुताबिक यात्रा के दौरान उन्होंने दिल्ली, आगरा, अहमदाबाद, कोच्चि और मुंबई जैसे शहरों का दौरा किया था। इस दौरान वह कोच्चि के एक ताज होटल में भी ठहरा था और ताजमहल भी गया था। एजेसियों का कहना है कि इस यात्रा के दौरान राणा ने अपने मित्र डेविड कोलमैन हेडली को भारत में लॉजिस्टिक और कवर सपोर्ट मुहैया कराया था। हालांकि समराज राणा अख्तर के खिलाफ कोई ठोस सबूत सामने नहीं आया है, लेकिन देश की जांच एजेंसियां एक बार फिर साजिश में समराज के शामिल होने की जांच कर सकती हैं। हालांकि तहुव्वर का दावा था कि वह समराज की नानी की मृत्यु के बाद शोक सभा में शामिल होने के लिए वह भारत आया था। एजेंसी सूत्रों का कहना है कि यात्रा की टाइमिंग आज भी जांच एजेंसियों के लिए संदिग्ध बनी हुई है। लेकिन क्या यह सिर्फ एक संयोग था या राणा ने अपनी गतिविधियों को छुपाने के लिए इस यात्रा को एक पारिवारिक दौरे का रूप दिया था?

एनआईए के अनुसार, राणा ने न हेडली को न केवल आर्थिक और लॉजिस्टिक मदद दी बल्कि अपने इमिग्रेशन बिजनेस “First World International” का इस्तेमाल आतंकियों के लिए कवर तैयार करने के लिए किया। इसी कंपनी के जरिए हेडली ने भारत के लिए मल्टीपल एंट्री बिज़नेस वीज़ा प्राप्त किया था और मुंबई में ऑफिस खोलने का नाटक रचा था। राणा ने हेडली के वीज़ा को 2007 में 10 साल के लिए बढ़वाने में भी मदद की थी। इन सभी घटनाओं से यह जाहिर होता है कि तहव्वुर राणा इन हमलों का मास्टरमाइंड था।

Tahawwur Rana Extradition: कौन था ‘मेजर इकबाल’

एनआईए ने अपनी चार्जशीट में आईएसआई के एजेंट मेजर इकबाल को एक सह-साजिशकर्ता के तौर पर नामित किया है। तहव्वुर राणा ने स्वीकार किया था कि वह पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के मिड-लेवल अफसर ‘मेजर इकबाल’ के संपर्क में था। गौरतलब है कि ‘मेजर इकबाल’ पर लश्कर-ए-तैयबा के जरिए से मुंबई हमलों की फंडिंग और कोऑर्डिनेशन का आरोप है। हेडली ने अपनी गवाही में बताया था कि मेजर इकबाल ने उसे करीब 25,000 अमेरिकी डॉलर दिए थे, ताकि वह मुंबई में एक इमिग्रेशन ऑफिस चलाने का ढोंग कर सके। यह ऑफिस सिर्फ एक कवर था, जिससे हेडली बिना शक के भारत में आ-जा सके और हमले की तैयारी कर सके। मेजर इकबाल ने हेडली को जीपीएस डिवाइस का इस्तेमाल करके मुंबई के ठिकानों की वीडियो रिकॉर्डिंग करने का भी हुक्म दिया था। ये सारी रिकॉर्डिंग पहले मेजर इकबाल को दिखाई जाती थीं, फिर हेडली उन्हें अपने साथ ले जाता था।

खास बात है कि मेजर इकबाल ने शुरू में यह तय किया था कि हेडली को पाकिस्तान से कोई कॉल नहीं आएगी, ताकि शक न हो। मेजर इकबाल ने राणा से भी फोन पर बात की थी, खासकर तब जब हेडली से सीधा संपर्क नहीं हो पाया। मसलन, जुलाई 2008 में मेजर इकबाल ने हेडली को कॉल करने की कोशिश की, लेकिन नाकाम रहा। फिर उसने राणा को फोन किया और हेडली तक अपने निर्देश पहुंचाए। राणा ने हेडली को यह भी कहा था कि वह भारत में अपने किराए का समझौता बढ़ाए, ताकि साजिश का काम चलता रहे। हालांकि मेजर इकबाल आज तक फरार है, और उसकी असली शक्ल-सूरत या ठिकाना किसी को नहीं पता। राणा अब भारत में है, और जांच एजेंसियां उससे मेजर इकबाल के बारे में और जानकारी निकालने की कोशिश करेंगी। शायद इससे पता चले कि मेजर इकबाल कौन था और उसका नेटवर्क कितना बड़ा था।

Bagram Airbase Explainer: Who is in possession of Bagram – US, China or Taliban? What is running behind the curtains?

Bagram Airbase Explainer: Who Controls Bagram Airbase – US or China? What’s Really Happening in Afghanistan Again?

Bagram Airbase Explainer: The Bagram Airbase of Afghanistan is once again in international headlines. This is the airbase where the U.S. retained its military dominance for twenty years and from where he drived large military campaigns against Taliban and Al-Qaida. But now the question arises whether this airbase has again gone under US control? Or as being said in some reports, is it now in China monitoring? Or taliban is still holding its hold on it?

Bagram Airbase Explainer: Who Controls Bagram Airbase – US or China? What’s Really Happening in Afghanistan Again?

The question stood when some media reports claimed that Taliban has handed over to Bagram Airbase US. According to the report, many C-17 globemaster aircraft of the U.S. Air Force landed there, with military Sajo-Sahman and intelligence officers. Not only that, it also has the news of CIA’s deputy Chief Michael Ellis coming. But Taliban has dismissed all these news and has described it as "Propegenda". Taliban said that he has complete control over the bugram and has no intention to hand it over any foreign strength.

Bagram Airbase Explainer: The Soviet Union Made Bugram Airbase

बगराम एयरबेस का इतिहास काफी पुराना और रोचक है। इसे 1950 के दशक में सोवियत संघ ने बनाया था और 1979 से 1989 तक सोवियत-अफगान युद्ध के दौरान यह उनका प्रमुख सैन्य अड्डा रहा। बाद में, 2001 में अमेरिका के नेतृत्व वाली गठबंधन सेना ने अफगानिस्तान पर हमला किया, जिसके बाद बगराम अमेरिकी सेना का मुख्य केंद्र बन गया। यहां से अल-कायदा और तालिबान के खिलाफ 20 साल तक अभियान चलाया गया। अपने चरम पर, 2012 में यहां 100,000 से अधिक सैनिक और ठेकेदार तैनात थे। इस एयरबेस में दो बड़े रनवे, विशाल हैंगर, एक अस्पताल और एक हिरासत केंद्र भी था, जिसे “ग्वांतानामो बे ऑफ अफगानिस्तान” भी कहा जाता था।

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यह एयरबेस अपनी रणनीतिक स्थिति के कारण बेहद महत्वपूर्ण है। यह अफगानिस्तान की राजधानी काबुल से लगभग 40 मील उत्तर में परवान प्रांत में स्थित है और ईरान, चीन और मध्य एशियाई देशों की सीमाओं के करीब है। खास तौर पर, यह चीन के शिनजियांग क्षेत्र में मौजूद परमाणु सुविधाओं से केवल 400 मील दूर है, जिसके कारण इसकी भू-राजनीतिक अहमियत और भी बढ़ जाती है।

Bagram Airbase Explainer: क्या हुआ था बगराम के साथ?

15 अगस्त 2021 को अमेरिकी सेना ने अफगानिस्तान को अलविदा कह दिया। इस दौरान बगराम एयरबेस को अफगान सेना के हवाले कर दिया गया, लेकिन तालिबान ने जल्द ही देश पर कब्जा कर लिया और यह उनके नियंत्रण में आ गया। उस समय अमेरिकी की काफी आलोचना हुई थी। अमेरिकी सैनिकों ने बिना स्थानीय सहयोगियों को सूचित किए बेस छोड़ दिया, जिसके बाद तालिबान ने इसे अपने कब्जे में ले लिया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, वहां 7 अरब डॉलर से अधिक के सैन्य उपकरण भी छूट गए थे।

अब, लगभग चार साल बाद, इस महीने अप्रैल 2025 में कुछ चौंकाने वाली खबरें सामने आईं। अफगानिस्तान की खामा प्रेस ने 7 अप्रैल, 2025 को रिपोर्ट दी कि अमेरिकी वायुसेना के कई C-17 ग्लोबमास्टर III विमान बगराम पर उतरे हैं। इन विमानों में सैन्य वाहन, उपकरण और वरिष्ठ खुफिया अधिकारी शामिल थे, जिनमें CIA के उप-निदेशक माइकल एलिस का नाम भी लिया गया। इस रिपोर्ट में दावा किया गया कि तालिबान ने यह एयरबेस अमेरिका को हाई-टेक ऑपरेशंस के लिए सौंप दिया है।

हालांकि, तालिबान के प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद ने इन दावों को “प्रोपेगैंडा” करार देते हुए खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान की संप्रभुता पर कोई समझौता नहीं होगा और किसी भी विदेशी सैन्य मौजूदगी की अनुमति नहीं दी जाएगी। तालिबान का कहना है कि बगराम उनके नियंत्रण में है और इसे अमेरिका को सौंपना “असंभव” है।

ट्रंप का दावा: बाइडेन की गलती से चीन का कब्जा?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 8 अप्रैल, 2025 को रिपब्लिकन नेशनल कमेटी में दिए एक भाषण में बाइडन प्रशासन पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि 2021 में अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद बगराम असुरक्षित हो गया था, जिसका फायदा चीन ने उठाया। ट्रंप के मुताबिक, अगर वे सत्ता में होते, तो बगराम पर अमेरिका का नियंत्रण बना रहता, क्योंकि यह न केवल अफगानिस्तान के लिए, बल्कि चीन की परमाणु गतिविधियों की निगरानी के लिए भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने इसे “अमेरिकी इतिहास की सबसे बड़ी आपदा” करार दिया और दावा किया कि अब यह एयरबेस प्रभावी रूप से चीन के नियंत्रण में है।

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हालांकि, ट्रंप के इस दावे का कोई ठोस सबूत नहीं मिला है। न तो अमेरिकी सरकार और न ही तालिबान ने इसकी पुष्टि की है कि बगराम पर चीन का कोई नियंत्रण है। इसके उलट, चीन के विदेश मंत्रालय ने मार्च 2025 में एक बयान में कहा था कि उनकी बगराम में कोई सैन्य महत्वाकांक्षा नहीं है, हालांकि चीन ने अफगान लिथियम और अन्य खनिज संसाधनों में निवेश करना शुरू किया है और तालिबान सरकार से दोस्ताना रिश्ते बना लिए हैं। ऐसे में यह आशंका बढ़ती जा रही है कि कहीं चीन इस एयरबेस का इस्तेमाल किसी प्रकार की निगरानी या सामरिक गतिविधि के लिए तो नहीं कर रहा।

Bagram Airbase Explainer: C-17 विमानों की लैंडिग की क्या है सच्चाई?

हालांकि, मीडिया रिपोर्ट्स और फ्लाइट ट्रैकिंग डेटा कुछ और ही कहानी बयां करते हैं। क़तर से उड़ान भरने वाला एक अमेरिकी C-17 विमान हाल ही में पाकिस्तान के रास्ते बगराम एयरबेस पर उतरा। फ्लाइट ट्रैकिंग डेटा ने भी इसकी पुष्टि की है कि एक C-17 विमान कतर के अल-उदेद बेस से पाकिस्तान के रास्ते बगराम पहुंचा। हालांकि यह कोई सामान्य घटना नहीं है। यदि वाकई ऐसा हुआ है तो यह या तो तालिबान और अमेरिका के बीच किसी गुप्त समझौते का संकेत है, या फिर यह सिर्फ एक अस्थायी खुफिया मिशन हो सकता है।

C-17 ग्लोबमास्टर III विमान सिर्फ एक बड़ा कार्गो प्लेन नहीं है। बल्कि यह अमेरिकी वायुसेना की रीढ़ है। C-17 ग्लोबमास्टर III 170,900 पाउंड तक का भार ले जा सकता है और बिना ईंधन भरे 2,400 समुद्री मील तक उड़ान भर सकता है। यह विमान छोटे और खराब रनवे पर भी उतर सकता है। यह भारी सैन्य सामान, टैंक, ट्रक, ड्रोन और यहां तक कि हेलिकॉप्टर भी ले जाने में सक्षम है। यदि यह विमान वाकई बगराम पहुंचा है, तो सवाल उठता है — इसमें क्या लाया गया?

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इसमें एडवांस निगरानी उपकरण, ड्रोन (जैसे MQ-9 रीपर), और शायद खुफिया मिशन के लिए मोबाइल ऑपरेशन यूनिट्स हो सकते हैं। रीपर ड्रोन को खासतौर पर आतंकवादियों पर निगरानी और हमले के लिए इस्तेमाल किया जाता है और इसकी मौजूदगी अफगानिस्तान में फिर से अमेरिकी गतिविधियों की ओर इशारा कर सकती है।

माइकल एलिस की मौजूदगी के क्या हैं मायने?

सीआईए के डिप्टी डाइरेक्टर माइकल एलिस की अफगानिस्तान में मौजूदगी यदि सच है, तो इसका मतलब है कि कोई बड़ी खुफिया रणनीति पर काम चल रहा है। एलिस की विशेषज्ञता राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद विरोधी कानूनों में है। संभव है कि उनका मिशन तालिबान के साथ किसी खुफिया साझेदारी को फिर से स्थापित करना हो, खासकर ISIS-K जैसे साझा दुश्मनों के खिलाफ।

कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह ISIS-K जैसे आतंकी समूहों पर नजर रखने के लिए हो सकता है, जो इन दिनों अफगानिस्तान में सक्रिय है और हाल ही में मॉस्को में एक हमले के लिए भी जिम्मेदार था। उनका कहना है कि तालिबान के पास सीमित संसाधन हैं, तो हो सकता है कि तालिबान ने उन पर कार्रवाई करने के लिए अमेरिका से मदद मांगी हो। उनका कहना है कि तालिबान के सामने कई चुनौतियां हैं – आर्थिक संकट, अंतरराष्ट्रीय मान्यता न मिलना और ISIS-K जैसे दुश्मन। विश्व बैंक के अनुसार, 2021 के बाद अफगानिस्तान की जीडीपी 30% तक सिकुड़ गई है। ऐसे में, तालिबान को अमेरिकी मदद की जरूरत पड़ सकती है। दूसरी ओर, अमेरिका के लिए बगराम ईरान और चीन की निगरानी के लिए एक महत्वपूर्ण ठिकाना हो सकता है।

पाकिस्तान से भी है तालिबान को चैलेंज

अंरराष्ट्रीय मामलों के जानकार प्रोफेसर रिजवान अहमद कहते हैं कि तालिबान इस वक्त आर्थिक और राजनयिक मोर्चे पर घिरा हुआ है। अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था चरमराई हुई है, विदेशी निवेश और सहायता लगभग ठप है, और दुनिया के ज़्यादातर देश आज भी तालिबान सरकार को मान्यता देने से हिचकिचा रहे हैं। ऐसे में अगर अमेरिका जैसा ताकतवर देश, जो कभी उनका सबसे बड़ा दुश्मन था, अब सहयोग की पहल करता है, तो तालिबान इसे नजरअंदाज नहीं कर सकता।

वह कहते हैं कि पाकिस्तान, जो कभी तालिबान का सबसे मजबूत समर्थक था, उसने साल 2023 से अब तक पाकिस्तान ने 10 लाख से ज्यादा अफगान शरणार्थियों को वापस भेज दिया है। वहीं दूसरी ओर, रूस इस बात पर विचार कर रहा है कि क्या तालिबान को अपनी आतंकी सूची से हटा दिया जाए। यानी तालिबान अब ऐसी स्थिति में है जहां उसे अंतरराष्ट्रीय सहयोग की जरूरत है— भले वह सीमित और अस्थायी ही क्यों न हो।

प्रोफेसर रिजवान अहमद के मुताबिक ऐसे में अगर अमेरिका के साथ किसी सीमित समझौते के तहत बगराम एयरबेस को फिर से किसी रणनीतिक उद्देश्य के लिए इस्तेमाल करने दिया जाता है, तो तालिबान के लिए यह एक सुरक्षा और कूटनीतिक बढ़त का सौदा हो सकता है। इससे उन्हें न सिर्फ क्षेत्रीय ताकतों के दबाव से राहत मिलेगी, बल्कि वैश्विक मान्यता की दिशा में एक छोटा लेकिन मजबूत कदम भी माना जाएगा।

अमेरिका की “ओवर-द-होराइजन” रणनीति

वह कहते हैं कि अमेरिका अब “ओवर-द-होराइजन” रणनीति पर काम कर रहा है — यानी बिना जमीन पर सैनिक उतारे, किसी भी समय सटीक निशाना लगाने की क्षमता। जुलाई 2023 में कतर के एक अमेरिकी बेस से ड्रोन हमला कर सीरिया में अल-कायदा के एक टॉप कमांडर को मार गिराया गया था। जो अमेरिका की “ओवर-द-होराइजन” रणनीति का हिस्सा था। ऐसे में अगर अमेरिका को बगराम जैसे ठिकाने का दोबारा इस्तेमाल करने का मौका मिलता है, तो वह न केवल अपनी सैन्य पहुंच मजबूत करेगा, बल्कि क्षेत्र में अपनी मौजूदगी भी दोबारा स्थापित कर सकता है — वो भी बिना ज़्यादा सैनिक भेजे।

वहीं बगराम एयरबेस अफगानिस्तान के केंद्र में है, ईरान की सीमा से महज 600 मील की दूरी पर, और चीन के उइगर इलाके (शिंजियांग) से भी पास है, जहां उसके न्यूक्लियर और मिलिट्री प्रोग्राम चल रहे हैं। यानि, अमेरिका को यहां से नज़र रखने और जरूरत पड़ने पर एक्शन ले सकता है।

वह कहते हैं कि डोनाल्ड ट्रंप ने अपने 2024 के चुनावी कैंपेन में बार-बार कहा कि बगराम को छोड़ना एक “ऐतिहासिक गलती” थी और यह चीन के मिसाइल बेस से बस एक घंटे की दूरी पर है। अब, ये दावा भले ही ज़रा बढ़ा-चढ़ाकर हो, लेकिन ट्रंप की बात में रणनीतिक सचाई जरूर है— बगराम की लोकेशन अमेरिका के लिए एक बड़ी ताकत बन सकती है।

‘डील विद द डेविल’ जैसा

प्रोफेसर रिजवान अहमद आगे कहते हैं कि और अगर वाकई ऐसा कुछ हो रहा है, तो ये एक ‘डील विद द डेविल’ जैसा ही है — तालिबान, जो कभी अमेरिका का दुश्मन था, अब शायद उसी के साथ कोई मौन समझौता कर रहा है। और अमेरिका, जिसने तालिबान के खिलाफ दो दशक तक लड़ाई लड़ी, अब उसी के भरोसे इस क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है।

बगराम एयरबेस, जो कभी अमेरिकी शक्ति का प्रतीक था, अब शायद फिर से वैश्विक शतरंज की बिसात पर एक ‘क्वीन’ की तरह लौट रहा है। लेकिन इस बार चालें कहीं ज़्यादा खामोश, तेज और रणनीतिक हैं। इस पूरे घटनाक्रम में एक बात तो तय है कि अगर बगराम में अमेरिका वाकई फिर से सक्रिय हो रहा है, तो इसका असर सिर्फ अफगानिस्तान तक सीमित नहीं रहेगा। ये पूरे मध्य एशिया, ईरान, चीन और रूस की सुरक्षा और कूटनीतिक रणनीतियों को प्रभावित कर सकता है।