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Taliban-India Relations: Will Afghanistan reopen the Indian Embassy? How to try or force a relationship with talisman?

Taliban-India Relations: Diplomatic Reset or Strategic Compulsion?
India’s foreign secretary Vikram Misri meets acting afghan foreign minister Mawlawi Amir Khan Muttaqi in Dubai, marking the first public meeting between a Top Indian officials Taliban Representative

Taliban-India Relations: On 8th January 2025 in Dubai of the UAE (UAE) when Foreign Secretary Vikram Egyptians met the acting Foreign Minister Maulvy Rich Khan Mutki of the Government of Taliban, it began to take a while between Afghanistan and India. While the two sides discussed the important issues such as trade, humanitarian assistance and regional stability during this meeting. But the story behind it that is coming to the fore, is that both countries are in preparation to re-restore their diplomatic relations.

Taliban-India Relations: Diplomatic Reset or Strategic Compulsion?
India’s foreign secretary Vikram Misri meets acting afghan foreign minister Mawlawi Amir Khan Muttaqi in Dubai, marking the first public meeting between a Top Indian officials Taliban Representative

Taliban-India Relations: India Can Send Soon Afghanistan Diplomatic and Officer

According to the sources, India’s diplomatic relations in Afghanistan are increasingly working on a plan to re-restore. According to the sources, India can soon send the "Dirjans diplomat and officer" Afghanistan to resume the Indian Embassy and Consulate there. Under this scheme, Taliban has guaranteed the security of these officers. In addition, the process of entrusting the Afghan Embassy in New Delhi is also deemed to be almost fixed.

Taliban-India relations: The idea of running on these names

विदेश मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि मिस्री और मुत्ताकी की बैठक के दौरान तालिबान ने नई दिल्ली में अपने दो संभावित राजनयिकों की एक लिस्ट भारत को सौंपी थी, जिसमें नजीब शहीन का नाम सबसे ऊपर है। नजीब शहीन, तालिबान के कतर स्थित प्रवक्ता सुहैल शहीन के बेटे हैं, जो तालिबान की कूटनीतिक पहल का एक प्रमुख चेहरा हैं। सुहैल शहीन, जो धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलते और लिखते हैं, 1990 के दशक में काबुल टाइम्स के संपादक भी रह चुके हैं। वहीं, 30 वर्षीय राजनयिक नजीब शहीन के अलावा अफगान विदेश मंत्रालय में कार्यरत शौकत अहमदजई का नाम भी इस पद के लिए विचार किया जा रहा है।

सूत्रों के अनुसार, भारत सरकार इस प्रतिनिधि को औपचारिक रूप से राजनयिक मान्यता नहीं देगी लेकिन वह भारत में तालिबान सरकार के शीर्ष प्रतिनिधि के रूप में कार्य करेगा। इस नियुक्ति के बावजूद, तालिबान को अपने झंडे को दूतावास, आधिकारिक कार्यक्रमों या वाहनों पर लगाने की अनुमति नहीं होगी।

Taliban-India Relations: अंतिम चरण में है प्रक्रिया

विदेश मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि नई दिल्ली में अफगान दूतावास को तालिबान के कंट्रोल में सौंपे जाने की प्रक्रिया भी लगभग अंतिम चरण में है। तालिबान सरकार और भारतीय अधिकारियों के बीच इस मुद्दे को लेकर कई दौर की बातचीत हो चुकी है। 24 नवंबर 2023 को, नई दिल्ली स्थित अफगान दूतावास ने स्थायी रूप से अपना कामकाज बंद करने का एलान किया था। अपने बयान में दूतावास ने कहा था, “अफगान गणराज्य के राजनयिकों ने इस मिशन को पूरी तरह से भारतीय सरकार के हवाले कर दिया है। अब यह पूरी तरह से भारतीय सरकार पर निर्भर करता है कि वह इस मिशन के भविष्य को कैसे तय करती है।”

इकरामुद्दीन कामिल को बनाया था कार्यवाहक काउंसल

हालांकि मिस्री औऱ मुत्ताकी की बैठक से पहले ही भारत ने मुंबई स्थित अफगानिस्तान के वाणिज्य दूतावास में एक नए महावाणिज्य दूत की नियुक्ति को मंजूरी दी थी। सूत्रों ने बताया कि पिछले साल नवंबर में, तालिबान ने मुंबई स्थित अफगान वाणिज्य दूतावास में भारत में रह रहे एक अफगान नागरिक, इकरामुद्दीन कामिल को कार्यवाहक काउंसल नियुक्त किया था। यह भारत में तालिबान सरकार की तरफ से की गई पहली आधिकारिक नियुक्ति थी। कामिल ने इस्लामाबाद की इस्लामिक यूनिवर्सिटी में कानून की पढ़ाई की थी, इसके बाद उन्होंने नई दिल्ली स्थित साउथ एशियन यूनिवर्सिटी से शिक्षा प्राप्त की, जिसे दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) के तहत स्थापित किया गया था।

Taliban-India Relations: Diplomatic Reset or Strategic Compulsion?
India’s foreign secretary Vikram Misri meets acting afghan foreign minister Mawlawi Amir Khan Muttaqi in Dubai, marking the first public meeting between a Top Indian officials Taliban Representative

Taliban-India Relations: अभी तक नहीं आया कोई आधिकारिक बयान

सूत्रों का कहना है कि अफगान दूतावास को तालिबान के कंट्रोल में सौंपे जाने को लेकर भारत सरकार और तालिबान की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। अगर भारत तालिबान की तरफ से प्रस्तावित किसी नाम पर मुहर लगाता है, तो यह संकेत हो सकता है कि भारत धीरे-धीरे तालिबान सरकार के साथ अपने संबंध सामान्य करने की ओर बढ़ रहा है। वहीं, भारतीय अधिकारी तालिबान द्वारा नामित किसी भी राजनयिक को मंजूरी देने को लेकर सतर्कता बरत रहे हैं। सूत्रों का कहना है कि भारत के लिए एक संभावित विकल्प यह हो सकता है कि वह पहले काबुल में अपना दूतावास को फिर से खोलने की पेशकश करे और उसके बाद ही तालिबान की इस मांग पर विचार करे।

बता दें कि भारत ने अगस्त 2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद काबुल में अपना दूतावास बंद कर दिया था और तब से उसने अपनी मौजूदगी को ‘टेक्निकल टीम’ तक सीमित रखा है। हालांकि, पिछले तीन सालों में भारत लगातार तालिबान के प्रतिनिधियों से मुलाकात करता रहा है। नवंबर 2024 में, पाकिस्तान-ईरान और अफगानिस्तान मामलों के संयुक्त सचिव जेपी सिंह ने काबुल का दौरा किया था और वहां तालिबान के रक्षा मंत्री मौलवी मोहम्मद याकूब मुजाहिद से मुलाकात की थी।

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तालिबान से सीधी नजदीकी नहीं दिखाना चाहता भारत

भारत अभी तक तालिबान को मान्यता देने से झिझक रहा है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय अब भी तालिबान सरकार को लेकर आशंकित है। अमेरिका, यूरोप और कई अन्य देशों ने अभी तक तालिबान सरकार को मान्यता नहीं दी है। इसकी प्रमुख वजहें तालिबान द्वारा महिलाओं के अधिकारों पर लगाए गए प्रतिबंध और लोकतांत्रिक सरकार न होने को लेकर अंतरराष्ट्रीय चिंताएं हैं। जिसके चलते भारत अब तक आधिकारिक रूप से तालिबान सरकार को मान्यता देने से बचता रहा है। लेकिन अफगानिस्तान में दूतावास को फिर से खोलने की योजना भारत की बदलती विदेश नीति की ओर इशारा कर रही है। भारत के लिए यह समझौता एक कूटनीतिक संतुलन साधने जैसा है। वह तालिबान से सीधी नजदीकी नहीं दिखाना चाहता, लेकिन क्षेत्रीय राजनीति में अपनी स्थिति बनाए रखने के लिए उसे अफगानिस्तान में अपनी उपस्थिति दर्ज करानी होगी।

तालिबान से दोबारा संपर्क क्यों बढ़ा रहा है भारत?

अब सवाल यह उठता है कि भारत तालिबान से दोबारा संपर्क क्यों बढ़ा रहा है। इसकी प्रमुख वजह क्षेत्रीय राजनीति है। रूस और मध्य एशियाई देशों की बदलती रणनीति भी भारत के इस फैसले को प्रभावित कर रही है। रूस अब अफगानिस्तान के साथ व्यापारिक और सैन्य सहयोग बढ़ा रहा है। ईरान भी तालिबान सरकार के साथ अपने संबंध सुधारने की दिशा में कदम बढ़ा चुका है। इसके अलावा पिछले साल, चीन ने तालिबान सरकार को आधिकारिक रूप से राजनयिक मान्यता दी थी, जिससे वह ऐसा करने वाला पहला देश बन गया था। वहीं, अफगानिस्तान में चीन और पाकिस्तान का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। चीन पहले ही अफगानिस्तान में खनिज संपत्तियों और इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट में निवेश कर रहा है। पाकिस्तान की तालिबान सरकार के साथ मजबूत कूटनीतिक और व्यापारिक संबंध बने हुए हैं। तालिबान सरकार अब वाखान कॉरिडोर के जरिए चीन से जुड़ने के लिए एक सड़क बनाने की योजना बना रही है। यह सड़क चीन को सीधे मध्य एशिया और मध्य पूर्व तक पहुंच प्रदान करेगी, जिससे बीजिंग इस खनिज संपन्न क्षेत्र में अपना आर्थिक प्रभाव बढ़ा सकेगा। इसके अलावा, चीनी कंपनियां तालिबान शासन के बाद भी अफगानिस्तान में खनन और बुनियादी ढांचे के विकास में निवेश कर रही हैं।

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तालिबान से संपर्क बनाए रखे भारत!

जिसके चलते भारत को डर है कि अगर वह अफगानिस्तान में निष्क्रिय रहा, तो उसका प्रभाव क्षेत्रीय राजनीति में कम हो सकता है। ऐसे में भारत के लिए यह जरूरी हो गया है कि वह अफगानिस्तान में अपनी भूमिका को फिर से मजबूत करे। भारत हमेशा से अफगानिस्तान में स्थिरता और विकास को प्राथमिकता देता रहा है, अब इस समझौते के ज़रिए वहां अपने प्रभाव को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। अफगानिस्तान मामलों के जानकार अज़ीज़ रफीई के अनुसार, “भारत के पास तालिबान से जुड़ने के अलावा कोई और व्यावहारिक विकल्प नहीं बचा है। भारत को कूटनीतिक रूप से तालिबान से संपर्क बनाए रखना चाहिए, अन्यथा यह क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में पिछड़ सकता है।”

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भारत ने जम कर की है अफगानिस्तान की मदद

ऐसा नहीं है कि भारत ने तालिबान के साथ संबंध बना कर नहीं रखे हैं। बल्कि पिछले कुछ सालों से भारत की अफगानिस्तान नीति मानवीय सहायता और अफगान जनता के कल्याण पर फोकस रही है। भारत ने अफगानिस्तान में लंबे समय तक अपनी मजबूत उपस्थिति बनाए रखी थी, विशेष रूप से 2001 से 2021 के बीच। इस दौरान भारत ने अफगानिस्तान में अरबों डॉलर का निवेश किया, जिसमें सड़कों, स्कूलों, बांधों और संसद भवन का निर्माण शामिल था। लेकिन तालिबान के दोबारा सत्ता में आने के बाद यह सब बदल गया। 2021 के बाद से, भारत ने 50,000 मीट्रिक टन गेहूं, 300 टन दवाइयां और 27 टन भूकंप राहत सामग्री भेजी है। इसके अलावा, भारत ने अफगानिस्तान को कोविड-19 वैक्सीन और अन्य चिकित्सा मदद भी प्रदान की है।

भारत की अफगान नीति में दूरदृष्टि और स्पष्टता की कमी

रिटायर्ड सेना अधिकारी और रक्षा विश्लेषक ब्रिगेडियर वी महालिंगम कहते हैं, यह कहना गलत नहीं होगा कि भारत की अफगान नीति में दूरदृष्टि और स्पष्टता की कमी है। 2021 में जब तालिबान ने अफगानिस्तान पर कब्जा किया, तो भारत ने उसके साथ अपने राजनयिक संबंध समाप्त कर लिए थे। क्या आज उस फैसले निर्णय के पीछे का तर्क बदल गया है? तालिबान का वही कट्टरपंथी शासन, जो महिलाओं के अधिकारों को कुचल रहा है, धार्मिक अल्पसंख्यकों को हाशिए पर धकेल रहा है और एक समावेशी सरकार बनाने से इनकार कर रहा है, क्या अब यह किसी भी तरह से भारत के लिए स्वीकार्य हो गया है?

वह आगे कहते हैं, भारत चीन को रोकने के लिए नई दिल्ली में तालिबान के एक राजदूत स्तर के प्रतिनिधि को मान्यता देने की योजना बना रहा है। लेकिन क्या मात्र एक राजनयिक की नियुक्ति से चीन के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला किया जा सकता है? क्या यह रणनीतिक रूप से तार्किक कदम है? चीन अफगानिस्तान में पहले से ही बड़े स्तर पर निवेश कर रहा है, बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के तहत उसने अफगानिस्तान को अपने आर्थिक मॉडल में शामिल कर लिया है और पाकिस्तान के साथ मिलकर अपनी पकड़ को और मजबूत कर रहा है। क्या भारत को लगता है कि सिर्फ तालिबान के एक प्रतिनिधि को नई दिल्ली में स्वीकार करके चीन के प्रभाव को कम किया जा सकता है?

भारत का असली हित तालिबान सरकार में नहीं, बल्कि अफगान जनता में है

वह कहते हैं, सवाल यह उठता है कि अगर भारत तालिबान को आधिकारिक राजनयिक दर्जा नहीं दे रहा है, तो फिर इस आधे-अधूरे कूटनीतिक समझौते का क्या उद्देश्य है? ब्रिगेडियर वी महालिंगम के मुताबिक उन्हें यह कूटनीति के नाम पर एक गंभीर खेल जैसा प्रतीत हो रहा है। वह कहते हैं कि आज चीन दुनिया की एक प्रमुख आर्थिक और सैन्य शक्ति है। वह वैश्विक व्यापार और विनिर्माण का एक प्रमुख केंद्र बन चुका है। अमेरिका समेत पूरी दुनिया इस तथ्य को स्वीकार कर चुकी है कि चीन एक मल्टीपोलर वर्ल्ड में एक अहम भूमिका निभाने जा रहा है। ऐसे में भारत को अपनी चीन नीति को व्यावहारिक बनाना होगा। हमें चीन को लेकर किसी भ्रम में नहीं रहना चाहिए। भारत के राष्ट्रीय हित सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण हैं। लेकिन भारत को अपनी अफगान नीति को चीन के साथ जोड़ने की गलती नहीं करनी चाहिए। अफगानिस्तान में तालिबान सरकार अपनी कट्टरपंथी नीतियों के कारण लंबे समय तक नहीं टिकी रह सकती। तालिबान का शासन एक खास विचारधारा पर आधारित है, जो सिर्फ सुन्नी, हनफ़ी और देवबंदी समुदायों को तरजीह देता है, जबकि दूसरों को हाशिए पर रखता है। भारत के लिए असली हित तालिबान सरकार में नहीं, बल्कि अफगान जनता में है।

‘जिहाद’ छेड़ने वालों को जगह देना, संकट को न्योता देने जैसा

ब्रिगेडियर महालिंगम के मुताबिक नई दिल्ली में ऐसे लोगों को जगह देना, जो आतंकवादी संगठनों से जुड़े हो सकते हैं और जिनका दीर्घकालिक लक्ष्य दुनिया भर में शरिया कानून लागू करने के लिए ‘जिहाद’ छेड़ना है, अपने ही देश में संकट को न्योता देना है। इतिहास गवाह है कि तालिबान अपनी नीतियों और लक्ष्यों में कभी बदलाव नहीं करता। क्या उन्होंने कभी अपने कट्टरपंथी विचारों को बदला है? क्या उन्होंने कभी आतंकी संगठनों को समर्थन देना बंद किया है? क्या उन्होंने महिलाओं को स्वतंत्रता दी है? उत्तर हमेशा ‘नहीं’ ही रहेगा।

प्रॉक्सी युद्ध लड़ने की गलती नहीं करे भारत

ब्रिगेडियर महालिंगम आगे कहते हैं, भारत को कभी भी आतंकवादी समूहों का उपयोग करके प्रॉक्सी युद्ध लड़ने की गलती नहीं करनी चाहिए। अमेरिका इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। अफगानिस्तान में अमेरिका ने चरमपंथी गुटों को हथियार और समर्थन दिया, लेकिन बाद में वही गुट अमेरिका के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बन गए। अमेरिका की आंतरिक और बाहरी राजनीति, उसकी अर्थव्यवस्था, और उसकी सुरक्षा चुनौतियां आज इसी रणनीति के नतीजे हैं। भारत को इस रास्ते पर नहीं चलना चाहिए। भारत को अपनी अफगान नीति को स्पष्ट, व्यावहारिक और दीर्घकालिक दृष्टि से तय करना चाहिए। तालिबान को राजनीतिक वैधता देने की कोई भी गलती हमारे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर परिणाम ला सकती है। भारत को तालिबान के साथ जुड़ने के बजाय, अफगान जनता के हितों को प्राथमिकता देनी चाहिए और अपने कूटनीतिक कदम बहुत सोच-समझकर उठाने चाहिए।

China Radar: China imposed Powerful Radar, up to 5,000 kms range to monitor India’s missile program

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China Radar: China has recently established a new radar station in its Yunnan province near Myanmar. The new ‘Large Phased Array Radar’ (LPAR) system will monitor India’s ballistic missile program. China will help track the trials of ballistic missiles with the help of this radar. The range of this radar is being conveyed for about 5,000 kms. With the help of this radar China can make its reach not only to the Indian Ocean Territory (IOR) but also many parts of India.

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China Radar: How does it work radar and why is it for India?

This Large Phased Array Radar located in Yunnan Province is an important part of China’s Ballistic Missile Early Warning System. It can monitor missile testing activities from the eastern coast of India. This radar can be directly monitored from the eastern coast of India to the Gulf of Bengal and the large part of South Asia. The information of missiles such as Fire-5 and K-4 left from Dr. APJ Abdul Kalam Island, India’s major missile testing centre, such as Odisha-based Dr. APJ Abdul Kalam Island, can reach China through this radar. China’s panty will be seen on India’s missile testing programmes. Let India test the Intercontinental Ballistic Missiles (ICBM) like its Fire-5 and K-4 from Dr. APJ Abdul Kalam Island.

China Radar: Why is Radar Location Important in Yunnan?

The geographical location of this radar is also considered quite important. Located near the border of Yunnan province, Myanmar. The place falls in the south-west terrain of China and from here direct monitoring of China is possible to the Indian Ocean. In addition, China’s radar can also monitor the naval movement of India. India’s nuclear-enabled ballistic missile submarines (SSBNs) is also deployed in this area. China can use this radar technology to raise the speed, range and other essential data of Indian missiles, making it more advanced to its own missile defense system.

Army Air Defense: Indian army, becoming smart to deal with drone attack, will be stacked with soft kill and hard kill systems. Drone of the enemy

What are the merits of LPAR

Constant tension is made on LAC between China and India. In recent years, China’s military (PLA) has made itself quite advanced. These have an important role in monitoring systems like LPAR. However, there has been a LPAR monitoring system in China Korla (Shijiang). With the help of which China monitors the northern regions of India. Now deploying a new radar in Yunnan will keep China’s eyes south.

Indian defence experts believe that India’s national security can lead to serious threats by this step of China. India is continuously pushing its missile program. India has already successfully tested Fire-5 Intercontinental Ballistic Missile (ICBM). The range of this missile is more than 5,000 kilometers. In addition, India’s Hypersonic Missile Program is also moving rapidly.

LPAR Radar’s USP is that it has thousands of small antennas, which can direct the beam electronically. This system is able to track very rapid missile launch and other aerial activity. It is like the US ‘PAVE PAWS’ system, which can monitor up to 5,600 kms.

Defence experts say that India needs to further strengthen its Ballistic Missile Defence (BMD) system by smearing the existing threat. India has already been working on the Missile Interceptor System (Prithvi Air Defence – PAD and Advanced Air Defence – AAD), which can hit the missiles killing up to 5,000 kilometres. In addition, India also has to advance its cyber security as China also specializes in digital spying. Considering which it is extremely important to keep Indian Missile Program and Defence Communication System safe and encrypted. According to defence experts, India also needs to be extremely robust to monitor the Satellite-Based Monitoring System to monitor China, to monitor every face of China.

Army Air Defence: The Indian Army, ‘Soft Kill’ and ‘Hard Kill’ system will be stacked with the ‘Soft Kill’ system to tackle the drone attack.

Army Air Defence: Indian Army Gears Up to Counter Drone Attacks with 'Soft Kill' and 'Hard Kill' Systems
Director General Army Air Defence Corps

Army Air Defence: Indian Army has taken a big lesson from the way the drone has been used in Russia-Ukraine Jung. The Indian Army is now preparing to further strengthen its air defense system to tackle the challenges of drones in Modern Warfare. The Army’s Army Air Defense special strategy is designed, given the increasing threat of drone attacks, which include preventing enemy drones and air attacks, identifying them and destroying them when needed.

Army Air Defence: Indian Army Gears Up to Counter Drone Attacks with 'Soft Kill' and 'Hard Kill' Systems
Director General Army Air Defence Corps

It is important to tell about the Army Air Defense Corps (AAD) of the Indian Army that it was the first part of the Territorial Army, but on 10 January 1994 it was created an independent unit separated from Artillery. The main objective of this is to deal with any air hazard from time to time, so as not to translate into attack.

The Air Defense System of the Army protects important areas of the country and sensitive bases. This protection is provided through multiple layers working system, which can detect and eliminate any danger already.

Army Air Defense: Increased Risk of Drone Attacks

The Director General of the Army Air Defense Corps Lt. General Sumer Ivan D’Kunha reported that the attack from the drones has become a concern around the world over a few years. The attack of Saudi Arabia’s oil company Aramco in 2019, death in the drone attack of the Iranian General Casim Sulemani in 2020, attacking the Pathankot Airbase in 2021 and the massive use of drones in the Russia-Ukraine War has cleared that drones will be an Ahmad weapon in future rust.

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Army Air Defense: Nano drones will also be tracked

The Indian Army has decided to upgrade its air defense system by understanding this threat, so as to prevent any potential attack in time. The Indian Army is incorporating Low-Level Lightweight Radar (LLLR) to detect flying drones at small and low altitudes. This radar can also identify small i.e. nano drones.

Also, the ability to identify drones of their and enemies with the help of Artificial Intelligence (AI) is also being paved. According to the Director General Lieutenant General D’Kunha, the Army’s ‘Akashtier’ command and the reporting system is also being upgraded, which allows the enemy drones to be tracked and eliminated from time to time. He reported that any suspected drone can be whitelisted through electronic IFF (Identify Friend or Foe) and AI based profiling.

Replace L-70 Smart Successor Gun

According to the Lieutenant General Sumer Ivan D’Kunha, the Army has decided to replace the old L-70 and ZU-23mm anti-aircraft guns with new indigenous smart sensor guns. Now, the new cannons with smart ammunition will be deployed. RFP has already been released for 220 guns under this project. The upgraded version will be ready for the trial in July 2025 with Smart Emission and the contract is likely to be completed by May-June 2026. At the moment the army is not in the mood to buy the gun from the outside.

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लेफ्टिनेंट जनरल डी’कुन्हा के अनुसार, स्मार्ट गोला-बारूद की खासियत यह होगी कि हर गोला पूर्व-निर्धारित प्रोग्रामिंग के तहत फायर किया जा सकेगा। स्मार्ट एम्युनिशन का सबसे बड़ा फायदा यह है कि 17 पारंपरिक राउंड के मुकाबले केवल एक स्मार्ट राउंड ही दुश्मन के ड्रोन को गिरा देगा। इसमें 17 हाई एक्सप्लोसिव राउंड की ताकत केवल एक स्मार्ट राउंड में मिल जाती है। इससे दुश्मन के ड्रोन को गिराने की संभावना बढ़ जाती है और लॉजिस्टिक्स की लागत कम हो जाती है। इसके अलावा, 23 एमएम की तोपों के लिए भी फ्रेगमेंटेड एम्युनिशन तैयार किया जा रहा है, जिससे वे और प्रभावी बन सकें।

VSHORADS: छोटे एयर डिफेंस सिस्टम की जरूरत

DRDO ने VSHORADS (वेरी शॉर्ट रेंज एयर डिफेंस सिस्टम) का कुछ ट्रायल्स पूरे कर लिए हैं, लेकिन इसे फाइनल होने में अभी कुछ समय लगेगा। सेना को इस सिस्टम की ज्यादा संख्या में जरूरत है, लेकिन वर्तमान में इसका प्रोडक्शन जरूरत के मुताबिक नहीं हो पा रहा है। इस कमी को पूरा करने के लिए जल्द ही भारतीय उद्योगों को आरएफआई जारी किया जाएगा, ताकि घरेलू रक्षा क्षेत्र को भी बढ़ावा मिल सके।

GM (SP) गन और मिसाइल का डेडली कॉम्बिनेशन

GM (SP) सिस्टम में फ्रैगमेंटेशन एम्यूनिशन वाली गन और 8-10 किमी तक मार करने वाली मिसाइल शामिल होगी। सेना के पास पहले से ही कई रूसी एयर डिफेंस सिस्टम मौजूद हैं, जिन्हें बनाए रखा जाएगा। हालांकि, नए गन सिस्टम के लिए अगले कुछ महीनों में RFP जारी होने की संभावना है। इसके लिए सेना की मैकेनाइज़्ड फॉर्मेशन (टैंक और बख्तरबंद वाहनों की टुकड़ियां) के लिए बड़ी संख्या में सिस्टम की जरूरत होगी। हालांकि, भारतीय रक्षा उद्योग ने कहा है कि इस परियोजना को पूरा करने में 7-8 साल लग सकते हैं। सेना इसे कम समय में पूरा करने की कोशिश कर रही है ताकि क्षमता की कमी को जल्द से जल्द दूर किया जा सके।

क्या है ‘सॉफ्ट किल’ और ‘हार्ड किल’?

ड्रोन हमलों को रोकने के लिए सेना ने पहले ही L-70 गन को “ज़ेन एंटी-ड्रोन एयर डिफेंस सिस्टम” (ZADS) के साथ जोड़ा है। इसे ‘सॉफ्ट किल’ सिस्टम कहा जाता है। इस सिस्टम में रेडियो फ्रिक्वेंसी के जरिए 10 मीटर से 10 किमी तक ड्रोन को ट्रैक करने और उसे जाम करने की क्षमता है, जिससे दुश्मन की ओर से आने वाले छोटे ड्रोन खतरों को नाकाम किया जा सकता है। हालांकि, अगर ड्रोन जाम होने के बावजूद आगे बढ़ता है, तो ‘हार्ड किल’ यानी L-70 की अपग्रेडेड गन उसे तुरंत मार गिरा सकती है।

उन्होंने बताया कि भारतीय सेना ने भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) और DRDO के बनाए इंटीग्रेटेड ड्रोन डिटेक्शन और इंटरडिक्शन सिस्टम (IDD&IS) को भी शामिल किया है। यह सिस्टम हाई-पावर लेजर और माइक्रोवेव हथियारों का इस्तेमाल करता है, जिससे दुश्मन के ड्रोन को हवा में ही नष्ट किया जा सकता है।

ड्रोन हमलों से निपटेंगी मिसाइलें

इसके अलावा भारतीय सेना ड्रोन हमलों से निपटने के लिए कई नई मिसाइलें भी शामिल कर रही हैं। लेफ्टिनेंट जनरल डी’कुन्हा के मुताबिक, QRSAM (Quick Reaction Surface-to-Air Missile) सिस्टम को जल्द ही सेना में शामिल किया जाएगा। यह मिसाइल 30 किलोमीटर तक के दुश्मन ड्रोन या एयरक्राफ्ट को मार गिराएगी। यह DRDO का बेहद सफल प्रोजेक्ट माना जा रहा है और सेना इस पर काफी भरोसा जता रही है। अगले चार से पांच महीनों में इसका कॉन्ट्रैक्ट फाइनल हो सकता है।

साथ ही, AKASH मिसाइल सिस्टम की दो रेजीमेंट पहले ही सेना में शामिल की जा चुकी हैं, और इनका हाई एल्टीट्यूड इलाकों में ट्रायल भी किया जा रहा है। इसके अलावा MRSAM (Medium Range Surface-to-Air Missile) को भी सेना में तैनात कर दिया गया है और इसकी टेस्ट फायरिंग जल्द शुरू होगी।

Army Air Defence: ड्रोन किल सिस्टम

भारतीय सेना अब ‘ड्रोन किल सिस्टम’ विकसित कर रही है, जिसमें ड्रोन के खिलाफ ड्रोन टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जाएगा। यानी कि इस प्रणाली में “ड्रोन ऑन ड्रोन” या “रॉकेट ऑन ड्रोन” टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल होगा। इसके अलावा, रॉकेट बेस्ड काउंटर-ड्रोन सिस्टम और सेना ट्रैक-माउंटेड (वाहनों पर तैनात) काउंटर-ड्रोन सिस्टम पर भी काम कर रही है, जिसमें 64 रॉकेट तैनात होंगे, जो दुश्मन के ड्रोन को पल भर में गिरा देंगे।

‘मेक इन इंडिया’ पर फोकस

लेफ्टिनेंट जनरल डी’कुन्हा जोक देकर कहते हैं कि भारतीय सेना अब स्वदेशी टेक्नोलॉजी को बढ़ावा देने पर जोर दे रही है। इसके तहत देश की निजी कंपनियों और स्टार्टअप्स के साथ मिलकर नई एयर डिफेंस टेक्नोलॉजी को डेवलप किया जा रहा है। इससे न केवल आत्मनिर्भरता बढ़ेगी, बल्कि महंगे विदेशी हथियारों पर निर्भरता भी कम होगी।

वह कहते हैं कि सेना के सामने सबसे बड़ी चुनौती हजारों ड्रोन को सीमित हवाई क्षेत्र में ट्रैक और नष्ट करना है। खासकर तब, जब दुश्मन देश ड्रोन वॉरफेयर में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। वह कहते हैं कि ड्रोन हमलों को रोकने के लिए भारतीय वायुसेना (IAF) के साथ तालमेल बेहद जरूरी है, क्योंकि देश के एयर डिफेंस की प्राथमिक जिम्मेदारी वायुसेना की है। सेना और वायुसेना मिलकर एयर डिफेंस से जुड़ीं नई रणनीतियां बना रही हैं, ताकि फ्यूचर वॉरफेयर में किसी भी हवाई खतरे से प्रभावी तरीके से निपटा जा सके।

Delhi-Dhaka Tensions: PM Modi was seen as ‘Kaman’ of Bangladesh! On Unus Dahrain Sheikh Hasina, given the Ultimate

Delhi-Dhaka Tensions Rise: Trump Backs Modi, Hasina Slams Yunus with Ultimatum

Delhi-Dhaka Tensions: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयान ने बता दिया है कि एशिया में भारत की भूमिका अभी भी उसके लिए काफी अहम है। वाशिंगटन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में ट्रंप ने कहा था, “बांग्लादेश का मामला मैं प्रधानमंत्री मोदी पर छोड़ रहा हूं।” वहीं ट्रप के इस बयान के दो दिन बाद ही बांग्लादेश की अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना ने बांग्लादेश की कार्यवाहक सरकार के मुखिया मोहम्मद यूनुस पर जोरदार हमला बोला। हमला भी ऐसा बोला कि उन्होंने युनूस सरकार को आतंकवादियों की सरकार बता डाला।

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Delhi-Dhaka Tensions: पीएम मोदी को दी कमान!

पीएम मोदी की अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से पांच साल बाद हुई मुलाकात कई मायनों में अहम है। दोनों की संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में संयुक्त प्रेस वार्ता के दौरान एक रिपोर्टर ने ट्रंप से पूछा कि कुछ जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट्स का कहना है कि भारत के पड़ोसी बांग्लादेश में हुए सत्ता परिवर्तन के पीछे अमेरिका के डीप स्टेट (Deep State) का हाथ था। रिपोर्टर ने पूछा कि क्या पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडन की सरकार ने बांग्लादेश में सत्ता पलट में कोई भूमिका निभाई थी और मुहम्मद यूनुस को मुख्य सलाहकार नियुक्त किया था?

इस सवाल के जवाब में राष्ट्रपति ट्रंप ने जो कहा वह वाकई चौंकाने वाला था। ट्रंप ने अमेरिकी डीप स्टेट की किसी भी भूमिका से साफ इनकार करते हुए कहा, “यह कुछ ऐसा है जिस पर प्रधानमंत्री मोदी लंबे समय से काम कर रहे हैं। ईमानदारी से कहूं तो मैं इस बारे में पढ़ता रहा हूं। मैं बांग्लादेश को प्रधानमंत्री मोदी पर छोड़ता हूं।”

हालांकि, राष्ट्रपति ट्रंप ने सीधे तौर पर यह स्पष्ट नहीं किया कि अमेरिका भविष्य में बांग्लादेश की राजनीतिक स्थिति में कोई भूमिका निभाएगा या नहीं। लेकिन उनके बयान से यह संकेत जरूर मिला कि अब अमेरिका इस मामले में दखल देने के मूड में नहीं है। वहीं, अमेरिका के इस रुख से बांग्लादेश की अंतरिम सरकार, कट्टरपंथी इस्लामी गुटों और पाकिस्तान की रणनीति पर असर पड़ सकता है। ट्रंप के इस बयान को भारत के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अमेरिका का यह स्पष्ट संकेत है कि वह अब बांग्लादेश के मामलों में सीधा हस्तक्षेप नहीं करेगा और भारत को अपनी पूर्वी सीमा पर खुद फैसला लेने की पूरी छूट होगी।

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सूत्रों के मुताबिक, मोदी और ट्रंप ने बांग्लादेश में हाल ही में हुए राजनीतिक बदलाव को लेकर विस्तार से चर्चा की थी। मोदी ने ट्रंप को बताया कि कैसे शेख हसीना की सरकार के पतन के बाद कट्टरपंथी ताकतें बांग्लादेश में बढ़ रही हैं और पाकिस्तान वहां अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।

Delhi-Dhaka Tensions: पाकिस्तान और बांग्लादेश पर बढ़ा दबाव

मेरठ कॉलेज में डिफेंस स्टडीज और इंटरनेशनल रिलेशंस के प्रोफेसर डॉ. मोहम्मद रिजवान कहते हैं कि अमेरिका लंबे समय से यह मानता आया है कि दक्षिण एशिया में भारत की भूमिका सबसे अहम है। पूरे क्षेत्र में अगर कोई स्थिर और जिम्मेदार लोकतंत्र है, तो वह भारत ही है। इसके विपरीत, भारत के पड़ोस में अलोकतांत्रिक व्यवस्थाएं, सत्तावादी शासन और अस्थिरता देखने को मिलती है। ऐसे में जब डोनाल्ड ट्रंप ने बांग्लादेश के मामलों को भारत के हवाले करने की बात कही, तो यह न सिर्फ ढाका के लिए बल्कि इस्लामाबाद के लिए भी एक बड़ा झटका था। जो बाइडेन के कार्यकाल में यह आशंका जताई जा रही थी कि अमेरिकी डीप स्टेट, पाकिस्तान के गुप्त नेटवर्क के जरिए बांग्लादेश में अस्थिरता फैला रहा था।

बाइडेन प्रशासन के दौरान बांग्लादेश में हुए हिंसक प्रदर्शनों, मुजीबुर्रहमान की मूर्तियों के अपमान और हिंदू अल्पसंख्यकों पर हमलों को लेकर कई रिपोर्टें सामने आई थीं। मानवाधिकार संगठनों के मुताबिक, अब तक 1500 से अधिक हिंदुओं की हत्या की जा चुकी है, और यह सिलसिला अभी भी जारी है।

प्रोफेसर रिजवान के मुतााबिक, ट्रंप का यह बयान बांग्लादेश और पाकिस्तान दोनों के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि अमेरिका अब इस क्षेत्र में भारत को नेतृत्व की भूमिका देना चाहता है। इससे भारत को दक्षिण एशिया में अपनी स्थिति और मजबूत करने का अवसर मिलेगा और वह इस क्षेत्र में जारी उथल-पुथल को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाएगा। ट्रंप के इस बयान के बाद भारत के पास अब दक्षिण एशिया की राजनीति को अपने पक्ष में मोड़ने का एक सुनहरा मौका है। अमेरिका का समर्थन मिलने के बाद भारत को बांग्लादेश, पाकिस्तान और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपनी नीतियों को और आक्रामक बनाने का अवसर मिल सकता है।

शेख हसीना का कड़ा पलटवार: “मैं आतंकियों की सरकार को उखाड़ फेंकूंगी!”

ट्रंप के बयान के दो दिन बाद ही बांग्लादेश की अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना ने अपने समर्थकों वर्चुअली संबोधित करते हुए मोहम्मद यूनुस सरकार पर बड़ा हमला बोला। उन्होंने कहा, “बांग्लादेश वापस जाना मेरी प्राथमिकता है, और मैं सुनिश्चित करूंगी कि आतंकियों की सरकार को उखाड़ फेंका जाए।”

उन्होंने कहा, “यूनुस ने सत्ता में आते ही सभी जांच समितियों को भंग कर दिया और आतंकियों को खुली छूट दे दी। अब निर्दोष लोगों की हत्याएं हो रही हैं, और बांग्लादेश बर्बादी की ओर बढ़ रहा है। लेकिन हम इसे बर्दाश्त नहीं करेंगे – हम इस आतंकवादी सरकार को उखाड़ फेंकेंगे। इंशाअल्लाह!”

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शेख हसीना ने यह भी कहा कि वह हर उस परिवार के साथ खड़ी हैं, जिन्होंने इस राजनीतिक उथल-पुथल में अपनों को खोया है। उन्होंने कहा, “मैं यह सुनिश्चित करूंगी कि सभी हत्यारे कानून का सामना करें। मैं वापस आऊंगी, और यही कारण है कि शायद अल्लाह ने मुझे अब तक जिंदा रखा है।” हसीना ने यह भी दावा किया कि पिछले साल जुलाई-अगस्त में हुए छात्र विरोध प्रदर्शनों के दौरान मारे गए लोगों की मौत पुलिस की गोली से नहीं हुई थी। उन्होंने जोर देकर कहा, “अगर उन शवों का अब भी पोस्टमार्टम किया जाए, तो सच सामने आ जाएगा।”

अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि यूनुस सरकार आतंकवादियों और बाहरी ताकतों के इशारों पर काम कर रही है और उनका एक ही उद्देश्य है – बांग्लादेश को अस्थिर करना और भारत के खिलाफ एक नया मोर्चा खोलना। “अगर आज बांग्लादेश में मोदी सरकार की भूमिका बढ़ रही है, तो यह इसलिए है क्योंकि यूनुस और उनके समर्थकों ने देश को पाकिस्तान के करीब ले जाने की कोशिश की।” शेख हसीना ने साफ कहा कि वह जल्द बांग्लादेश लौटेंगी और अपने समर्थकों के साथ मिलकर लोकतंत्र की वापसी के लिए संघर्ष करेंगी।

ट्रंप के इस बयान का एक और बड़ा असर यह हुआ कि बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) और अवामी लीग को एक नई ताकत मिली है। बीएनपी लंबे समय से यह मांग कर रही थी कि बांग्लादेश में जल्द से जल्द संसदीय चुनाव कराए जाएं। लेकिन मोहम्मद यूनुस और उनकी सरकार चुनावों को टालने के लिए विभिन्न बहाने बना रहे हैं। यूनुस सरकार का कहना है कि पहले न्यायपालिका, पुलिस और प्रशासन में सुधार होने चाहिए, फिर चुनाव कराए जाएंगे।

अमेरिका ने 29 मिलियन डॉलर की फंडिंग रोकी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा से लौटे के ठीक बाद ही ट्रंप प्रशासन ने एक चौंकाने वाला फैसला किया। ट्रंप ने बांग्लादेश के लिए दी जाने वाली 29 मिलियन डॉलर की फंडिंग को भी रोक दिया। यह फंडिंग अब तक USAID (United States Agency for International Development) और UK के DFID (Department for International Development) के जरिए बांग्लादेश को दी जा रही थी। माना जाता है कि यह फंड यूनुस सरकार और कुछ इस्लामी कट्टरपंथी संगठनों को आर्थिक मदद देने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा था। इसी वजह से भारत ने अमेरिका से मांग की थी कि इस फंडिंग को रोक दिया जाए। ट्रंप प्रशासन ने इस मांग को स्वीकार करते हुए यूनुस सरकार को बड़ा झटका दिया है। साथ ही, ट्रंप ने यह साफ कर दिया है कि उनका बांग्लादेश में कोई इंट्रेस्ट नहीं है और साथ ही मदद देने का भी कोई इरादा नहीं है। अमेरिका के इस कदम के बाद अब यह सवाल उठ रहा है कि यूनुस सरकार का अस्तित्व कितने दिनों तक बना रहेगा?

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भारत के खिलाफ फंडिंग का इस्तेमाल

भारत ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि वह बांग्लादेश की अंतरिम सरकार को मान्यता नहीं देगा और केवल एक लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार के साथ ही बातचीत करेगा। इसके विपरीत, पाकिस्तान और तुर्किये यूनुस सरकार का खुलकर समर्थन कर रहे हैं। पाकिस्तान इस स्थिति का फायदा उठाकर बांग्लादेश में कट्टरपंथी संगठनों को मजबूत करने और भारत के पूर्वोत्तर में अशांति फैलाने की कोशिश कर रहा है। सूत्रों के अनुसार, यूनुस सरकार पाकिस्तान के साथ मिलकर भारत विरोधी समूहों को आर्थिक और सैन्य मदद देने की योजना बना रही थी। लेकिन अब जब अमेरिका ने खुद को पीछे कर लिया है और भारत को ‘फ्री हैंड’ दे दिया है, तो यूनुस सरकार की मुश्किलें बढ़ गई हैं।

F-35 fighter: Why buy India F-35? U.S. is not able to remove the eye from Suhata S-400, but it will not apply Brahmaos! What will come only 2 squadrons?

F-35 Fighter: Will India Buy It? US Concerned Over S-400, No BrahMos, Only 2 Squadrons?

F-35 fighter: American fighter jets have begun to buy F-35 on the way-to-face keys. Recently US President Donald Trump had indicated during the Prime Minister Narendra Modi meeting that India is planning to give F-35 steel fighter jets. Following this news, India can go on the same way to carry out this deal as it bought Rafael Fighter Jets from France.

F-35 Fighter: Will India Buy It? US Concerned Over S-400, No BrahMos, Only 2 Squadrons?

However, the Government of India has cleaned that there have been no formal proposal yet, but interaction with the US may begin as soon as possible. "It is no official offer," said Defence Secretary Rajesh Kumar Singh reacting to it. The Trump has just indicated that the U.S. can prepare the roadmap to make it possible. We will consider this when we receive a formal proposal. ""

F-35 fighter: Will India buy a limited number of F-35?

According to the formulas, India can buy a limited number of F-35 fighter jets. Just as only 36 aircraft were purchased in the Rafale deal. This is because the F-35 price is very high and its maintenance is also extremely expensive. Therefore, India can create two squadrons instead of upgrading the entire fleet. Defence experts believe that if this is a deal, it will be under the government-to-government (G2G) deal, which will guarantee price and delivery.

F-35 fighter: America’s big concern S-400 air defense system

The U.S. had not been interested in selling F-35 to India first, as India had purchased the S-400 Air Defense System from Russia. American Pentagon is concerned that it would be difficult to operate S-400 and F-35 together, as S-400 has been designed in such a way that it could hold the movement of American steelth aircraft. According to the sources, if India advances this deal, the U.S. may have strict terms to ensure that Russian military experts do not have access to F-35.

F-35 Stealth Fighter Jets: Not easy to include American fighter jets in the Indian Air Force! Will the first cross these challenges?

The U.S. Department of Defense believes that if a country operates S-400 and F-35 together, the Russian radar systems may be updated to track U.S. steelth technology. Because none of the countries in the world have run both S-400 and F-35 together. Earlier, Turki had also refused to give F-35 fighter jets, as he also purchased S-400 missiles from Russia. While the U.S. provides India in terms, F-35 for Turks can open the way to purchase F-35. The US may issue some stringent monitoring protocols to keep both systems different.

F-35 fighter: Is Temperary Solution F-35?

India wants to upgrade its Air Force fleet. The AMCA (Advanced Multirole Combat Aircraft) program of India will not be prepared before 2036, and may also delay. Therefore, some experts believe that F-35 can be seen as a temperary solution, unless India’s AMCA is fully prepared. Recently India bought Rafael Marine Aircraft from France, so that the Naval needs are met until the indigenous Twin Engine Deck Beased Fighters (TEDBF). In the same way, F-35 is also being considered as the Temperary Solution.

वायुसेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, “F-35 बहुत महंगे विमान हैं। न सिर्फ खरीदना, बल्कि इनका रखरखाव और ऑपरेशन भी बेहद खर्चीला है। ऐसे में भारत एक या दो स्क्वाड्रन (36 विमान) तक सीमित रह सकता है।”

क्या F-35 पर ब्रह्मोस मिसाइल लगने देगा अमेरिका?

F-35 एक हाई-टेक स्टील्थ फाइटर जेट है, और अमेरिका इसे केवल उन्हीं देशों को बेचता है जो उसके पार्टनर या नॉटो देश होते हैं। अगर भारत को यह फाइटर जेट मिलते हैं, तो अमेरिका यह सुनिश्चित करेगा कि भारत इसे किसी तीसरे देश (जैसे रूस) को नहीं दिखाएगा या इस पर कोई अतिरिक्त मॉडिफिकेशन नहीं करेगा। यहां कि भारत इसमें अपनी जरूरतों के हिसाब से मिसाइलें भी नहीं लगा सकेगा, जैसे कि सुखोई पर लगाई हैं।

सूत्रों का कहना है कि F-35 फाइटर जेट पर ब्रह्मोस मिसाइल लगाना आसान नहीं होगा। F-35 अमेरिकी तकनीक से बना है और इसमें किसी भी बाहरी हथियार को जोड़ने के लिए अमेरिकी सरकार और लॉकहीड मार्टिन की मंजूरी चाहिए। अब तक अमेरिका ने किसी भी गैर-नाटो या गैर-अमेरिकी मिसाइल को F-35 पर लगाने की अनुमति नहीं दी है।

ब्रह्मोस मिसाइल का आकार और वजन भी समस्या खड़ी कर सकता है। F-35 की स्टील्थ क्षमता बनाए रखने के लिए उसके हथियार इंटरनल बे में रखे जाते हैं, लेकिन ब्रह्मोस इसमें फिट नहीं होती। इसे बाहरी रूप से माउंट किया जा सकता है, लेकिन इससे F-35 का स्टील्थ खत्म हो जाएगा और रडार उसे ट्रेक कर लेंगे। इसके अलावा, अमेरिका के पास पहले से कई विकल्प मौजूद हैं। F-35 के लिए AGM-158 JASSM (स्टील्थ क्रूज मिसाइल), AGM-88 HARM (एंटी-रेडिएशन मिसाइल) और LRASM (एंटी-शिप मिसाइल, जो ब्रह्मोस जैसी ही भूमिका निभाती है) जैसी मिसाइलें हैं। इनका इस्तेमाल अमेरिकी सेना करती है और अगर अगर भारत F-35 लेता है, तो अमेरिका चाहेगा कि भारत इन्हीं मिसाइलों का इस्तेमाल करे। यहां तक कि अगली पीढ़ी की ब्रह्मोस-एनजी भी AMRAAM या JASSM से है।

ब्रह्मोस को पहले से ही Su-30MKI जैसे लड़ाकू विमानों पर तैनात किया जा रहा है और भविष्य में इसे राफेल और स्वदेशी AMCA जैसे विमानों के साथ भी जोड़ा जा सकता है। अगर भारत F-35 खरीदता है, तो वह कुछ हद तक हथियारों को कस्टमाइज़ करने पर बातचीत कर सकता है, लेकिन ब्रह्मोस के इंटीग्रेशन की संभावना कम है।

Minister Piyush Goel with Mr. Michael Williamson, President at Lockheed Martin International
Minister Piyush Goel with Mr. Michael Williamson, President at Lockheed Martin International

क्या ‘मेक इन इंडिया’ होगा F-35?

अमेरिका के साथ इस डील में एक और दिलचस्प पहलू यह है कि क्या इसे ‘मेक इन इंडिया’ पहल के तहत भारत में ही बनाया जा सकता है। हालांकि अभी तक का इतिहास रहा है कि अमेरिका इसे खुद बना कर ही एक्सपोर्ट कर रहा है। लेकिन जॉइंट प्रोडक्शन की चर्चाओं को बल तब मिला जब हाल ही में केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने लॉकहीड मार्टिन इंटरनेशनल के अध्यक्ष माइकल विलियमसन के साथ बैठक की और भारत में रक्षा और एयरोस्पेस सेक्टर में निवेश और एयरक्राफ्ट मैन्युफैक्चरिंग के अवसरों पर चर्चा की। हालांकि लॉकहीड मार्टिन ने टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड (TASL) के साथ मिलकर भारतीय वायुसेना के C-130J ‘सुपर हरक्यूलिस’ विमानों के लिए देश में पहली मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल (MRO) सुविधा स्थापित करने का एलान किया है। इसके अतिरिक्त, लॉकहीड मार्टिन और टाटा ने भारतीय वायुसेना के मीडियम ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट (MTA) जरूरतों के लिए C-130J विमानों की लोकल मैन्युफैक्चरिंग और असेंबली की भी पेशकश की है। बता दें कि गुजरात में, टाटा और एयरबस ने वडोदरा में C-295 विमानों के जॉइंट प्रोडक्शन के लिए एक संयंत्र स्थापित किया है, जो भारतीय वायुसेना की ट्रांसपोर्ट जरूरतों को पूरा करेगा। इसलिए ऐसी संभावना बेहद कम है कि F-35 को लॉकहीड मार्टिन भारत में बनाएगी।

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Explainer: Russia-Ukraine Peace Talks in Saudi Arabia – Why It Matters?

Russia-Ukraine Peace Talks: Former US President Donald Trump has recently allaned that he would interact with Russia’s President Vladimir Putin to end Ukraine war. However, many questions have stood with this announcement, especially why Trump has chosen Saudi Arabia for this talk?

Explainer: Russia-Ukraine Peace Talks in Saudi Arabia – Why It Matters?

Trump did not tell a certain date of this possible talk, but he said that this meeting may be in the near future. He also indicated that the President of Ukraine Volodymir Gellensky and Crown Prince Mohammed bin Salman of Saudi Arabia may also include. Saudi Arabia has welcomed this initiative and said he is willing to play the role of the arbitrator in peace talks between Russia-Ukraine.

The Trump had negotiated the phone from Putin and Gellensky for this talk. He then asked representatives of Russia and America to start a conversation. Saudi Arabia also issued statements regarding the initiative that they will collaborate in making this negotiation successful.

Russia-Ukraine Peace Talks: Why was Saudi Arabia elected?

Saudi Arabia has several reasons behind choosing the site of this talk. The first reason is that it is a neutral country. Many countries in Europe include directly in the Ukraine war, so it was difficult to negotiate there. That is why Saudi Arabia was considered a neutral and safe place, where both sides of Russia and Ukraine can negotiate without any bias.

The second major reason is that there are strong diplomatic and economic relations between Saudi Arabia and Russia. In 2023 when Putin visited Riyadh, Mohammed bin Salman invited him as a special guest. In addition, the International Criminal Court (ICC) against Russia has released the arrest warrant, but Saudi Arabia is not a member of this court, which means that Putin can come there without any legal fear.

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Russia-Ukraine Peace Talks: Saudi Arabia in the role of the arbitrator

Saudi Arabia has played the role of the arbitrator in many international cases even in the past. As for example, Saudi Arabia has been a huge role in the release of US citizens imprisoned in Russia. Recently Russia released the American Teacher Mark Fogle, which had a huge contribution of Saudi Arabia.

Saudi Arabia has several times given Putin and Jailensky the neoplasm to seek the possibility of peace agreement. He held an international gathering in Jedda in 2023, including representatives from many countries.

Saudi Arabia can further strengthen its image in this whole event. Experts of Gulf Affairs Abdullah Babud believe that Saudi Arabia wants to play the role of the arbitrator as well as further deepen their diplomatic relations.

Russia-Ukraine Peace Talks: Oil also an important factor

The oil is also a major factor behind choosing for this negotiation to Saudi Arabia. America, Russia and Saudi Arabia are the three largest oil producer countries in the world. The global energy market has been affected due to the Russia-Ukraine war and has undergone heavy fluctuations in oil prices.

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विशेषज्ञों का मानना है कि इस वार्ता के दौरान तेल की कीमतों को स्थिर रखने पर भी चर्चा हो सकती है। 2024 के अंत में, रूस और सऊदी अरब ने ओपेक प्लस के तहत तेल उत्पादन को सीमित करने का फैसला किया था, ताकि वैश्विक बाजार को स्थिर किया जा सके।

अमेरिका को भी अपने ऊर्जा सेक्टर के लिए सऊदी अरब के साथ मजबूत रिश्ते बनाने की जरूरत है। ट्रंप की प्राथमिकता क्लीन एनर्जी से ज्यादा जीवाश्म ईंधन पर केंद्रित रही है, इसलिए सऊदी अरब उनके लिए एक महत्वपूर्ण साझेदार हो सकता है।

ट्रंप का सऊदी अरब से रणनीतिक जुड़ाव

डोनाल्ड ट्रंप जब 2017 में अमेरिकी राष्ट्रपति बने, तब उनकी पहली विदेश यात्रा सऊदी अरब की थी। इस यात्रा से सऊदी अरब को अंतरराष्ट्रीय मंच पर नई पहचान मिली थी।

ट्रंप ने संकेत दिया है कि अगर वह फिर से राष्ट्रपति बनते हैं, तो उनकी पहली विदेश यात्रा एक बार फिर सऊदी अरब हो सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर सऊदी अरब 500 अरब डॉलर के अमेरिकी उत्पाद खरीदता है, तो वे वहां जाने को तैयार हैं।

सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने भी संकेत दिया है कि वह अगले चार वर्षों में अमेरिका में करीब 500 अरब डॉलर का निवेश करने की योजना बना रहे हैं। ट्रंप ने इसे एक कदम आगे बढ़ाते हुए कहा कि वे चाहते हैं कि यह निवेश 1,000 अरब डॉलर तक पहुंचे।

अमेरिका-सऊदी संबंध और अन्य कूटनीतिक एजेंडे

सऊदी अरब और अमेरिका के बीच संबंध हमेशा आर्थिक और सैन्य रणनीति पर आधारित रहे हैं। बाइडन प्रशासन ने जहां सऊदी अरब के साथ संबंधों को संतुलित किया, वहीं ट्रंप इसे और मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप, सऊदी अरब, अमेरिका और इज़राइल के बीच एक मजबूत गठबंधन बनाना चाहते हैं। इससे मध्य पूर्व में अमेरिका का प्रभाव बढ़ेगा और चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित किया जा सकेगा।

हालांकि, सऊदी अरब को लेकर अमेरिका की नीति हमेशा विवादित रही है। सऊदी अरब का मानवाधिकार रिकॉर्ड खराब रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में इसने धार्मिक पुलिस को हटाने, महिलाओं को गाड़ी चलाने की अनुमति देने जैसे सुधार किए हैं, जिससे उसकी छवि में सुधार आया है।

क्या यह वार्ता सफल होगी?

रूस-यूक्रेन युद्ध अब तक के सबसे लंबे और जटिल युद्धों में से एक बन चुका है। ट्रंप की यह पहल युद्ध को समाप्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकती है, लेकिन यह देखना बाकी है कि क्या पुतिन और जेलेंस्की इस वार्ता को गंभीरता से लेते हैं।

सऊदी अरब की इस वार्ता में भूमिका को लेकर भी अलग-अलग विचार हैं। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि यह एक मजबूत शांति वार्ता हो सकती है, जबकि कुछ का कहना है कि सऊदी अरब इस वार्ता से अपने राजनीतिक और आर्थिक हितों को साधने की कोशिश कर रहा है।

फिलहाल, सारी निगाहें इस संभावित वार्ता पर टिकी हैं और आने वाले दिनों में इसका क्या नतीजा निकलता है, यह देखने वाली बात होगी।

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F-35 Stealth Fighter Jets: Challenges Ahead for Indian Air Force Before Induction!

F-35 Stealth Fighter Jets: पिछले हफ्ते बेंगलुरु काफी चर्चा में रहा। यहां के येलाहंका एयर फोर्स स्टेशन में एयरो इंडिया शो का आयोजन हुआ। खास इस मायने में रहा कि पहली बार दुनिया के दो धुरविरोधी शक्तिशाली देशों अमेरिका और रूस के पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट F-35 और SU-57 एक ही एयर स्ट्रिप पर थे। दोनों के बीच 10 मीटर का भी अंतर नहीं था। इन दोनों का एक ही प्लेटफॉर्म पर मौजूदा होना ही पूरी दुनिया का ध्यान अपनी तरफ खींचने के लिए काफी था। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई। उस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वाशिंगटन डीसी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ खड़े होकर एलान किया कि अमेरिका भारत को “कई अरब डॉलर” की सैन्य बिक्री बढ़ाएगा और “अंततः” भारत को F-35 स्टेल्थ फाइटर जेट देने का रास्ता तैयार कर रहा है।

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F-35 Stealth Fighter Jets: लॉकहीड मार्टिन ने जारी किया ये बयान

इस घोषणा के बाद भारत में इस बात पर चर्चा शुरू हो गई कि क्या भारतीय वायुसेना (IAF) को इस एडवांस फाइटर जेट की जरूरत है। भारत पहले से ही अपने पुराने लड़ाकू विमानों को बदलने और नए विमान बनाने की कोशिशों में जुटा है। हालांकि, इस एलान के बाद विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने कहा कि सैन्य खरीद की एक प्रक्रिया होती है और अभी तक इसे लेकर कोई औपचारिक कदम नहीं उठाया गया है। हालाकि अमेरिकी राष्ट्रपति के एलान के कुछ देर बाद ही F-35 फाइटर जेट बनाने वाली एयरोस्पेस कंपनी लॉकहीड मार्टिन (Lockheed Martin) ने एक महत्वपूर्ण बयान जारी किया, जिसमें कंपनी ने कहा कि वह पिछले तीन दशकों से भारत की रक्षा और एयरोस्पेस प्रणाली को मजबूत करने में एक विश्वसनीय और रणनीतिक भागीदार रही है।

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लॉकहीड मार्टिन ने अपने बयान में कहा, “हमने C-130J ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट, S-92 हेलीकॉप्टर कैबिन और फाइटर विंग्स जैसे उत्पादन कार्यक्रमों के माध्यम से अपनी प्रतिबद्धता को साबित किया है। ये सभी कार्यक्रम वैश्विक सप्लाई चेन का हिस्सा हैं और भारतीय रक्षा क्षेत्र को मजबूती प्रदान कर रहे हैं।” कंपनी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयान पर भी प्रतिक्रिया दी, जिसमें उन्होंने भारत को F-35 स्टील्थ फाइटर जेट्स देने की मंशा जाहिर की थी। लॉकहीड मार्टिन ने कहा कि “हम इस घोषणा से उत्साहित हैं और दोनों देशों की सरकारों के साथ मिलकर रणनीतिक खरीद प्रक्रियाओं पर काम करने के लिए तैयार हैं।”

कंपनी ने यह भी स्पष्ट किया कि वह भारत के साथ न केवल फाइटर जेट्स, बल्कि जेवलिन मिसाइल सिस्टम और हेलीकॉप्टर्स जैसे अन्य डिफेंस प्रोडक्ट्स पर भी सहयोग बढ़ाने की इच्छुक है। उन्होंने कहा, “हम भारतीय सशस्त्र बलों को 21वीं सदी की सुरक्षा तकनीकों और आधुनिक क्षमताओं से लैस करने के लिए प्रतिबद्ध हैं, ताकि वे अपनी वर्तमान और भविष्य की चुनौतियों से प्रभावी ढंग से निपट सकें।”

F-35 क्यों है खास?

F-35 जॉइंट स्ट्राइक फाइटर जेट है औऱ दुनिया के सबसे एडवांस लड़ाकू विमानों में से एक है। इसे स्टील्थ टेक्नोलॉजी से बनाया गया है, जिससे यह दुश्मन के रडार में पकड़ में नहीं आता। यह तीन अलग-अलग वेरिएंट में आता है, F-35A, जो सामान्य टेकऑफ और लैंडिंग के लिए बनाया गया है; F-35B, जिसे कम जगह में उड़ान भरने और वर्टिकल लैंडिंग करने के लिए डिजाइन किया गया है; और F-35C, जो एयरक्राफ्ट कैरियर से ऑपरेट करने के लिए तैयार किया गया है।

अमेरिका इस विमान को कई देशों को निर्यात भी कर रहा है। अब तक 10 देशों ने इसे अपनी वायुसेना में शामिल कर लिया है और अमेरिका खुद 2,470 से ज्यादा F-35 खरीदने की योजना बना रहा है।

F-35 Stealth Fighter Jets: क्या भारत को F-35 की जरूरत है?

भारतीय वायुसेना फिलहाल अपने लड़ाकू बेड़े को मजबूत करने की कोशिश कर रही है। कई पुराने विमान रिटायर होने वाले हैं, और ऐसे में नए फाइटर जेट्स की जरूरत महसूस की जा रही है। भारतीय वायुसेना की स्क्वाड्रन क्षमता भी लगातार घट रही है। मौजूदा समय में वायुसेना के पास बचे हैं कुल 32 स्क्वाड्रन, जबकि जरूरत है 42 की। यह आंकड़े भी लगभग आठ साल पुराने हैं। हालांकि 36 राफेल आने बाद दो स्क्वाड्रनों की संख्यया तो बढ़ी, लेकिन जैसे-जैसे पुराने विमान रिटायर होते जाएंगे, इनमें लगातार कमी आती रहेगी, क्योंकि अगले कुछ सालों में मिग-21, मिग-27, जगुआर औऱ मिराज को भी चरणबद्ध तरीके से रिटायर किया जाना है।

लेकिन सवाल यह है कि क्या F-35 इस काम के लिए सबसे सही विकल्प होगा? भारत पहले से ही रूस, फ्रांस और इजरायल की तकनीकों का इस्तेमाल कर रहा है। ऐसे में, अमेरिकी F-35 को भारत के मौजूदा सिस्टम से जोड़ना आसान नहीं होगा। इंडियन डिफेन्स स्ट्रक्चर में यह एक बड़ी चुनौती हो सकती है।

F-35 Stealth Fighter Jets: चुनौतियां क्या हैं?

अगर अमेरिका भारत को F-35 ऑफर कर रहा है, तो इसका मतलब यह है कि अमेरिका को अब भारत के रूसी S-400 मिसाइल सिस्टम से ज्यादा परेशानी नहीं है। पहले यह माना जा रहा था कि S-400 की खरीद के कारण अमेरिका भारत को F-35 नहीं देगा, लेकिन ट्रंप के बयान के बाद यह साफ हो गया कि अब अमेरिका इस शर्त को दरकिनार कर सकता है।

कीमत और मेंटेनेंस भी बड़ा सवाल

F-35 दुनिया के सबसे महंगे फाइटर जेट्स में से एक है। अमेरिकी सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, यह प्रोजेक्ट एक दशक की देरी से चल रहा है और इसकी लागत 209 बिलियन डॉलर (17 लाख करोड़ रुपये) ज्यादा हो चुकी है। भारत को यह देखना होगा कि क्या यह सौदा उसके बजट के अनुकूल रहेगा?

भारतीया वायुसेना की पसंद ट्विन-सीटर फाइटर जेट्स

एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि F-35 सिंगल-सीटर जेट है, जबकि भारतीय वायुसेना ज्यादातर ट्विन-सीटर फाइटर जेट्स को प्राथमिकता देती आई है। पहले, भारत ने रूस के साथ मिलकर पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान (FGFA) बनाने की योजना बनाई थी, लेकिन जब यह सामने आया कि यह विमान सिंगल-सीट कॉन्फ़िगरेशन में है, तो भारत ने यह प्रोजेक्ट छोड़ दिया। ऐसे में अगर भारत F-35 खरीदता है, तो यह देखना होगा कि यह हमारे पायलट्स के लिए कितना उपयुक्त रहेगा और इसकी लागत कितनी होगी।

भारत के स्वदेशी प्रोजेक्ट्स का क्या होगा?

हालांकि अभी तक भारत ने इस सौदे को लेकर कोई आधिकारिक बातचीत शुरू नहीं की है। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या भारत F-35 को अपने बेड़े में शामिल करने का विचार करेगा या अपने स्वदेशी प्रोजेक्ट्स AMCA को ही प्राथमिकता देगा। वहीं, अगर भारत F-35 खरीदता है, तो इससे हमारे अपने फाइटर जेट प्रोजेक्ट्स पर क्या असर पड़ेगा? क्योंकि अगर भारत F-35 खरीदता है, तो इससे देश के स्वदेशी फाइटर जेट बनाने के प्रोजेक्ट्स प्रभावित हो सकते हैं। भारत डिफेंस सेक्टर में आत्मनिर्भरता बढ़ाने की कोशिश कर रहा है और ‘मेक इन इंडिया’ पहल के तहत ज्यादा से ज्यादा सैन्य उपकरणों का निर्माण देश में करने पर जोर दे रहा है। ऐसे में, अगर भारत F-35 खरीदता है, तो इससे डोमेस्टिक डिफेंस इंडस्ट्री को नुकसान हो सकता है और भारत को लंबे समय तक अमेरिकी डिफेंस सिस्टम पर निर्भर रहना पड़ सकता है।

भारत के अपने फाइटर जेट प्रोजेक्ट्स

भारत का हल्का लड़ाकू विमान (LCA)-Mk1A प्रोजेक्ट अभी भी पूरा नहीं हुआ है। इस विमान में अमेरिकी General Electric (GE) का F404 इंजन लगाया गया है, लेकिन इंजन की डिलीवरी में दो साल की देरी हो चुकी है। हालांकि, एयरो इंडिया शो में अधिकारियों ने कहा कि GE ने अब अपनी सप्लाई चेन की समस्या सुलझा ली है और मार्च से डिलीवरी शुरू हो जाएगी।

इसके अलावा, LCA-Mk2 का पहला प्रोटोटाइप इस साल के अंत तक तैयार होने की उम्मीद है और इसका पहली उड़ान परीक्षण 2026 में किया जाएगा। इसके बाद भारत का अपना फाइटर जेट प्रोजेक्ट, एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA), 2034-35 तक भारतीय वायुसेना में शामिल करने की योजना है।

इसके अलावा, भारत 114 मल्टी-रोल फाइटर एयरक्राफ्ट (MRFA) खरीदने की योजना बना रहा है, जिसमें एक विदेशी लड़ाकू विमान को लाइसेंस के तहत भारत में बनाया जाएगा।

एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “अभी इस पर कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन जो भी फैसला लिया जाए, भारत को अपने स्वदेशी प्रोजेक्ट्स को प्राथमिकता देनी चाहिए।”

Sukhoi-30MKI: Soon India’s Sukhoi-30 will stack ahead of China’s latest J-35 fighter jet! Russia offers to put the engine of Sukhoi-57

Sukhoi-30MKI Upgrade: Russia Offers Su-57 Engine, Set to Outclass China’s J-35 Fighter Jet!

Sukhoi-30MKI: India has received a tiger offer from Russia’s side between Aero India 2025 running in Bengaluru. Russia has given tremendous offers regarding the upgrade of the fighter aircraft Sukhoi-30MKI called the backbone of the Indian Air Force. Russia has introduced the Advance AL-41 engine used in its latest steel fatter Sukhoi-57 for Indian Sukhoi aircraft. The engine is more powerful and better than the existing AL-31 engine, after which the strength of Indian Air Force will be enlarged.

Sukhoi-30MKI Upgrade: Russia Offers Su-57 Engine, Set to Outclass China’s J-35 Fighter Jet!

The Indian Air Force has 272 Sukhoi-30MKI Jets, which is the largest fleet against any single aircraft model. India is interacting with Russia to upgrade these planes. This new engine can make a major change in India’s power and performance.

Sukhoi-30MKI: What is special in this new engine?

The AL-31 engine is being used in Sukhoi-30MKI fighter jets right now. But Russia’s new AL-41 engine is more powerful and is also used in advanced steel fatter like Sukhoi-57. The speed, range and fuel efficiency of the Sukhoi-30 from the new engine can be tremendously improved.

During the Aero India 2025, the CEO of the Russian Aircraft Producer United Aircraft Corporation, Dadim Badekha announced this offer. "We are offering this new engine as part of India’s upgrade to Sukhoi-30. After the AL-41 engine is found, the performance of the Sukhoi-30MKI will be better, allowing the aircraft to collide with new generation fighter jets.

Su-57 Fighter Jet: Russia’s largest offer to India! Fifth-Generation Su-57 joint production offering, the promise of cooperation in the AMCA project

While, the company that created Sukhoi-30MKI in India, Hindustan Aeronautics Limited (HAL) states that the deal may sign up soon for this upgrade.

While this upgrade of Sukhoi-30MKI will not be limited to the engine only. Avionics, radars and mission computers made in India will be installed in upgraded aircraft. The best active electronically scanned Array (AESA) of DRDO will also improve aircraft identification and tracking from the radar.

In addition, the cockpit of the plane will be completely digital, in which large touchscreen displays will give the pilot better control and visibility. New mission computers will also be added so that new technology can be handled.

India plans to use 78 per cent indigenous parts in upgraded Sukhoi-30MKI. This will boost Make in India and reduce dependence on foreign technology.

Sukhoi-30MKI Upgrade: Russia Offers Su-57 Engine, Set to Outclass China’s J-35 Fighter Jet!

Russia’s second big offer: building Sukhoi-57E in India

During the Aero India 2025, Russia has given another great offer to India. Russia has proposed Local Manufacturing of Sukhoi-57E (Export version) to India. If it is a Deal Final, then the creation of Sukhoi-57E from 2025 to Hindustan Aeronautics Limited (HAL).

A spokesperson from Rosoboronexport reported that Russia is willing to give full technical help to produce Fighter Jets of the fifth generation in India. "If everything runs according to the scheme, the production of Sukhoi-57E in Hindustan Aeronautics Limited (HAL) may begin by 2025. ""

Also, Russia has also offered cooperation in India’s Advanced Medium Combat Aircraft (AMCA) project. It includes Engine Technology, AESA Radar, Artificial Intelligence and Advanced Software. The AMCA fighter jet project of India can get bigger boost.

सूत्रों का कहना है कि रूस का यह ऑफर भारत के लिए बड़ा मौका है। इससे भारत को क्रिटिकल टेक्नोलॉजी में आत्मनिर्भर बनने में मदद मिलेगी। रूस के अधिकारियों ने कहा कि इस तरह के सहयोग से भारत को भविष्य में किसी भी इंटरनेशनल प्रतिबंध या सप्लाई चेन में दिक्कतों का सामना नहीं करना पड़ेगा।

Sukhoi-30MKI: भारत का सबसे बड़ा रक्षा सहयोगी है russia

भारत और रूस के रिश्ते दशकों पुराने हैं। रूस लंबे समय से भारत का सबसे बड़ा रक्षा सहयोगी रहा है। 2000 से 2020 के बीच भारत के कुल हथियार आयात का 66.5 फीसदी रूस से आया है। आज भी भारतीय सेना के हथियारों में रूस का असर साफ दिखा जा सकता है।

हालांकि, अब भारत मेक इन इंडिया के तहत अपनी डिफेंस प्रोडक्शन को घरेलू स्तर पर बढ़ा रहा है। रूस के इस सहयोग से भारत को न केवल तकनीकी रूप से मजबूती मिलेगी, बल्कि घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को भी बड़ा फायदा मिलेगा।

वर्तमान में भारतीय वायुसेना को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। भारतीय वायुसेना के फाइटर स्क्वाड्रन की संख्या 42 से घटकर 31 रह गई है, जो एक गंभीर चिंता का विषय है। एयर चीफ मार्शल एपी सिंह भी कई बार LCA Mk1 फाइटर जेट्स की डिलीवरी में देरी को लेकर चिंता जता चुके हैं। वहीं, रूस के इस प्रस्ताव से भारतीय वायुसेना को अपने मौजूदा बेड़े को अपग्रेड करने का बड़ा मौका मिल सकता है।

Why do IAF majors have heard from LCA Tejas Mk1A then buy HAL from air? Listen to you

Tejas Mk1A Order: Indian Air Force Halts New Procurement Amid Delivery Delays and Production Challenges

LCA Tejas Mk1A: भारतीय वायुसेना (IAF) के प्रमुख एयर चीफ मार्शल (ACM) अमर प्रीत सिंह ने हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के प्रति अपनी नाराज़गी खुलकर जताई है। बेंगलुरु में एरो इंडिया शो के दौरान उन्होंने HAL के चेयरमैन डी.के. सुनील से सीधे सवाल करते हुए तेजस Mk1A जेट्स की देरी पर नाराजगी जाहिर की। वायुसेना प्रमुख ने जिस तरह से खुल कर अपनी नाराजगी जाहिर की है, उनके शब्द शायद हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के अधिकारियों की नींद उड़ाने के लिए काफी होंगे।

IAF Chief Slams HAL Over LCA Tejas Mk1A Delays – Why Is the Air Force Unhappy?

LCA Tejas Mk1A: बोले- मुझे HAL पर कोई भरोसा नहीं

हाल ही में एरो इंडिया में एक कार्यक्रम के दौरान, एयर चीफ मार्शल सिंह ने HAL के चेयरमैन डीके सुनील के सामने अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए उन्होंने कहा, “मैं आपको केवल यह बता सकता हूं कि हमारी जरूरतें और चिंताएं क्या हैं। आपको हमारी चिंताओं को दूर करना होगा और हमें भरोसा दिलाना होगा। फिलहाल, मुझे HAL पर कोई भरोसा नहीं है, और यह बहुत ही गलत है।”

उन्होंने यह बातें उस वक्त कहीं, जब एयर चीफ मार्शल सिंह HJT-36 यशस के कॉकपिट में बैठे ब्रीफिंग ले रहे थे। यह पूरी बातचीत एक वीडियो में कैद हो गई, जिसे डिफेंस न्यूज़ पोर्टल ने अपने यूट्यूब चैनल पर साझा किया है। इस छह मिनट के वीडियो में ACM सिंह के चेहरे पर नाराजगी साफ झलक रही थी।

IAF Chief Slams HAL Over LCA Tejas Mk1A Delays – Why Is the Air Force Unhappy?

LCA Tejas Mk1A: फरवरी तक 11 तेजस Mk1A जेट्स देने का किया था वादा

एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने कहा कि उन्हें फरवरी तक 11 तेजस Mk1A जेट्स तैयार होने का वादा किया गया था, लेकिन “एक भी विमान तैयार नहीं है।” उन्होंने यह भी कहा कि HAL का काम करने का तरीका मिशन मोड में नहीं है, जो इस प्रोजेक्ट में देरी की सबसे बड़ी वजह है।

Aero India 2025: LCA Mk2 is more fatal than the old Tejas, the prototype will come to the end of this year, the first flight will be filled in 2026

सबसे गंभीर बात यह रही कि वायुसेना प्रमुख ने आरोप लगाया कि Aero India 2025 शो में पेश किए गए तेजस Mk1A जेट्स वास्तव में Mk1A नहीं हैं। “आपने जो विमान उड़ाया और उसे Mk1A कहा, वह Mk1A नहीं है। केवल सॉफ्टवेयर बदलने या लुक्स में बदलाव करने से यह Mk1A नहीं बन जाता। जब हथियार और क्षमताएं बढ़ेंगी, तभी इसे Mk1A कहा जा सकता है।”

वायुसेना प्रमुख की यह नाराजगी ऐसे समय पर सामने आई है, जब एक दिन पहले ही रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने HAL के तेजस Mk1A जेट्स के उत्पादन संयंत्र का दौरा किया था। उसके ठीक बाद Aero India शो में चार Mk1A जेट्स ने पहली बार सार्वजनिक उड़ान भी भरी थी।

वायुसेना प्रमुख बोले- जादू की छड़ी की जरूरत है

जब HAL की लीडरशिप एंड टेस्टिंग टीम ने आईएएफ चीफ सिंह की बातों को “ध्यानपूर्वक नोट करने” और सुधार करने का भरोसा दिया, तो उन्होंने जवाब दिया, “अगर मैं गलत साबित हुआ तो मैं सबसे खुश व्यक्ति होऊंगा। मुझे लगता है कि केवल कुछ लोग ही मेहनत कर रहे हैं, या फिर सभी बिना बड़ी तस्वीर को देखे अपने-अपने क्षेत्रों में काम कर रहे हैं। कुछ बदलना होगा, कोई बड़ा बदलाव। यह सब ठीक करने के लिए किसी जादू की छड़ी की जरूरत है। अब समय आ गया है।”

मीडिया कवरेज पर भी जताई नाराज़गी

अपने पिछले बयानों की मीडिया में निगेटिव कवरेज को लेकर आईएएफ चीफ ने कहा, “मुझे यह मजाक लगता है कि जब मैं कुछ कहता हूं तो मीडिया केवल नकारात्मक हिस्से को ही उठाता है। मैं केवल एक मुद्दा उठाने की कोशिश कर रहा हूं। मैं किसी पर उंगली नहीं उठा सकता, क्योंकि तीन उंगलियां मेरी ओर भी इशारा कर रही होती हैं।”

IAF Chief Slams HAL Over LCA Tejas Mk1A Delays – Why Is the Air Force Unhappy?

पहले भी कई बार एचएएल पर उठा चुके हैं सवाल

हालांकि यह पहली बार नहीं जब वायुसेना प्रमुख एपी सिंह ने तेजस की डिलीवरी को लेकर सवाल उठाए हों। वे इससे पहले ही कई बार एचएएल को कठघरे में खड़ा कर चुके हैं। पिछले महीने 9 जनवरी को भी 21वें सुब्रतो मुखर्जी सेमिनार में ‘वायुक्षेत्र में आत्मनिर्भरता’ पर बोलते हुए उन्होंने तेजस लड़ाकू विमानों के अधिग्रहण में हो रही देरी पर गहरी नाराजगी जाहिर की थी। उन्होंने कहा था जहां एक ओर चीन छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमानों का परीक्षण कर रहा है, वहीं भारत अभी भी स्वदेशी तेजस विमानों के अधिग्रहण का इंतजार कर रहा है। एयर चीफ मार्शल सिंह ने स्पष्ट किया था कि रक्षा क्षेत्र में समय का पालन बेहद जरूरी है, क्योंकि तकनीक समय के साथ अप्रासंगिक हो जाती है।

उन्होंने कहा था कि तेजस परियोजना की शुरुआत 1984 में हुई थी और 17 साल बाद इसका पहला विमान उड़ान भर सका। 2016 में तेजस को वायुसेना में शामिल करने की प्रक्रिया शुरू हुई, लेकिन 2025 तक भी पहले 40 विमानों की डिलीवरी पूरी नहीं हो सकी है। उन्होंने इसे देश की उत्पादन क्षमता की कमजोरी बताया था।

एयर चीफ मार्शल सिंह ने सुझाव दिया था कि रक्षा क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने की आवश्यकता है, ताकि कंपनियों को यह एहसास हो कि ऑर्डर छिन भी सकते हैं। सिंह ने अनुसंधान और विकास (R&D) में निवेश बढ़ाने की जरूरत पर भी बल देते हुए कहा था फिलहाल रक्षा बजट का केवल 5% अनुसंधान पर खर्च किया जा रहा है, जबकि इसे 15% तक बढ़ाया जाना चाहिए। उन्होंने चेताया कि अगर तकनीक समय पर विकसित नहीं हुई, तो उसका कोई फायदा नहीं होगा।

Archer-NG UAV: India’s Indigenous Armed Drone ‘Archer-NG’ can fly quickly, continuously for 34 hours Flight

© 2019 Sort Firstie Next Month. All rights reserved.

Archer-NG UAV: Midium Altitude Long Endurance Drone has brought good news about Archer NG. The unmanned aerial vehicle (UAV) armature NG created not only for surveillance but also for strike missions, made in the Volunteer. While this will soon be included in the fleet of Indian Army. Information about the capabilities and future plans of this latest drone during Aero India 2025.

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Archer-NG UAV Features

It comes in the UAV Medium Altitude Long Endurance (MALE) category, whose main function is Intelligence, Surveillance and Reconstance (ISR). However, it is not limited to surveillance only; Archar NG Strike Mission can also be executed. It is capable of carrying arms up to UAV 300 kg.

This drone is designed in single engine twin boom configuration, giving it a light and fine performance in weight. This UAV can have a wide range of payloads, including electro-optic sensors, radar payloads and Sichuan Awareness Equipments. It is able to carry out the mission in any season, both at day and night.

Archer-NG UAV: Ready for Network-Central War

Archer NG is designed for modern network-centric warfare. It can work under the Man-United Teaming (MUM-T), in which the mission is executed together with human powered fighters. Additionally, it is also effective in the UAV Deep Penetration mission, allowing it to attack accurately by visiting the enemy terrain.

Archer-NG UAV: How much is its range

The flight of Archer NG is shocking. Its range can be more than 1,000 kilometres, provided satellite communication (Satcom) coverage is available. Its operational height is up to 30,000 feet and is able to fly continuously for 34 hours. Normally it fly with an electro-optic payload for 24 hours.

Earcher NG is in advance phase of its development. Its taxi trial (trial to run on the ground) has already begun, and the first flight trial is soon expected to begin next month. Presently, the sanction of certification is being awaited. At the same time, the full-fledged version of the arms will be prepared in the next three years.

More Advances than tapas or RUSTOM-II

Earcher NG is being considered to be more advanced than India’s existing UAVs, such as tapas or RUSTOM-II, as it has the ability to carry weapons. While Hermes 900 UAV’s collision worldwide is UAV. However, UAVs such as MQ-9 Reaper come in the High Altitude Long Endurance (HALE) category, which are different from Earchar NG.

Diesel engines are used in Earchar NG, while gas turbine engines are installed in UAVs of other high categories. This is a cheaper option because of this.

Aero India 2025: Commonwealth Fighters in Bengaluru, Steelth Fighters of Russia and the US, India will place on which the stakes will come up to 2028 AMCA

Indian Army and Air Force have been active participation in the development of Achar NG. They are constantly suggesting according to the needs and also taking part in trials. The forces say that this drone is extremely effective for real-time surveillance, logistic support, and precise attacks.

After the retired of old fighter jets such as Mig-21 and Jaguar, the army needs platforms that can be deplloyed faster in lower costs. Arch-NG meets all these needs.

India has now joined the list of countries after creating a powerful UAV like Archer-NG, which can do its armed drone’s projection and deployment themselves.