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Aero India 2025: Commonwealth Fighters in Bengaluru, Steelth Fighters of Russia and the US, India will place on which the stakes will come up to 2028 AMCA

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Aero India 2025: बेंगलुरु के आसमान में इन दिनों एक ऐतिहासिक नजारा देखने को मिल रहा है। बेंगलुरू में चल रहे एरो इंडिया 2025 में पहली बार दो एकदूसरे के धुरविरोधी देश रूस और अमेरिका अपने-अपने स्टील्थ फाइटर जेट्स के साथ आमने-सामने हैं। जहां एक ओर रूस ने अपने Su-57 फिफ्थ जनरेशन फाइटर जेट को पेश किया है, तो वहीं दूसरी तरफ अमेरिका ने अपने F-35 लाइटनिंग II के जरिए पूरी दुनिया को अपनी ताकत दिखा रहा है।

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Aero India 2025: एक ही एयरस्पेस पर F-35 लाइटनिंग II और रूसी Su-57 फेलॉन

अभी तक, अमेरिका और रूस के इन दो स्टील्थ फाइटर्स को एक ही एयर शो में कभी नहीं देखा गया है। पहली बार, अमेरिकी F-35 लाइटनिंग II और रूसी Su-57 फेलॉन स्टील्थ फाइटर्स ने एक ही एयरस्पेस साझा किया है। दोनों देशों के बीच दशकों से चले आ रहे तनाव के चलते यह अभी तक असंभव था। लेकिन एयरो इंडिया 2025 में .यह संभव हुआ और दोनों यहां अपने लेटेस्ट फाइटर जेट्स के साथ यहां आए हुए हैं।

रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों की मार झेल रहा रूस भारत को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए पूरी ताकत झोंक रहा है। पिछले 20 सालों में भारत और रूस के बीच 50 अरब डॉलर के रक्षा सौदे हुए हैं, और इस साझेदारी को और मजबूत करने के मकसद से रूस Aero India में इस बार बड़ी भागीदारी कर रहा है।

Aero India 2025: रूस का भारत को बड़ा ऑफर

इस शो में रूस ने अपने पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट Su-57 के को-प्रोडक्शन का भारत को ऑफर दिया है। Rosoboronexport के निदेशक अलेक्जेंडर मिखेयेव ने कहा, “एशिया-प्रशांत क्षेत्र में भारत रूस का सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार है। पिछले 20 वर्षों में ही हमने भारत के साथ 50 अरब डॉलर के कॉन्ट्रैक्ट किए हैं, और कुल मिलाकर 80 अरब डॉलर के रूसी मिलिट्री प्रोडक्ट्स भारत को सप्लाई किए गए हैं।”

Aero India 2025: American F-35 Steelth Fighter or Russian SU-57 Felon! Who Will Be India’s First Choice? Both are Aero India in 2025

वहीं, अमेरिका भी भारत को अपने F-35 और F-21 जैसे फाइटर जेट्स की पेशकश कर रहा है। हालांकि, अमेरिका इन इन सौदों में कई शर्तें और ऑपरेशनल प्रतिबंध भी जोड़ रहा है, जो भारत को नामंजूर हैं। दूसरी ओर, रूस के साथ लंबे समय से चली आ रही रक्षा साझेदारी और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर जैसे विकल्प भी दे रहा है।

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भारत के पास स्वदेशी AMCA का भी है विकल्प

वहीं भारत के पाास तीसरा विकल्प भी है। भारत अपना पांचवी पीढ़ी का स्वदेशी Advanced Medium Combat Aircraft (AMCA) प्रोजेक्ट पर तेजी से काम कर रहा है। यह पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ फाइटर जेट है, जिसे डीआरडीओ के तहत Aeronautical Development Agency (ADA) बना रहा है। AMCA का फुल-स्केल मॉकअप एरो इंडिया 2025 में पहली बार पेश किया गया है।

AMCA की पहली उड़ान 2028 तक

एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट AMCA प्रोजेक्ट के डायरेक्टर कृष्णा राजेंद्र नीली ने बताया “AMCA का पहला प्रोटोटाइप 2028 तक तैयार हो जाएगा, जबकि 11 साल बाद यानी 2035-36 तक इसकी डिलीवरी शुरू होने की उम्मीद है। अब तक इसका डिज़ाइन और निर्माण 100% स्वदेशी है। इस विमान में GE 414 इंजन का उपयोग किया जाएगा, और भारत पहले ही इन इंजनों के घरेलू उत्पादन के लिए एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर कर चुका है।”

हालांकि, यह समय सीमा भारतीय वायुसेना के लिए एक चुनौती है, क्योंकि चीन पहले ही अपने स्टेल्थ फाइटर्स J-20 और J-31 को तैनात कर चुका है और पाकिस्तान भी जल्द ही इन्हें हासिल करने की कोशिशों में जुटा है।

F-35 और Su-57के मुकाबले AMCA हल्का

खास बात यह है कि F-35 और Su-57 दोनों ही स्टील्थ फाइटर जेट हेवी वेट कटैगरी हैं, यानी कि ये 30 टन वाले पांचवीं जनरेशन एयरक्राफ्ट है। वहीं AMCA की बात करें तो यह मिडियम कैटेगरी का, औऱ यह 25 टन क्लास का फिफ्थ जनरेशन का फाइटर एयरक्राफ्ट है। AMCAमें हथियार अंदर की तरफ होते हैं, जो बाहर से दिखाई नहीं देते। इसलिए यह बाकी एयरक्राफ्ट के मुकाबले लंबा होता है।

लेकिन अब भारतीय वायुसेना के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा है, क्या हमें केवल स्वदेशी AMCA पर भरोसा करना चाहिए, या फिर तात्कालीक उपाय के तौर पर विदेश से स्टील्थ फाइटर्स की खरीद करनी चाहिए। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने संकेत दिया है कि भारत सभी विकल्प खुले रखेगा।

Aero India 2025 में रूस का दबदबा

एरो इंडिया में रूस ने न केवल फाइटर जेट्स बल्कि हेलीकॉप्टर, इंजन और एयर डिफेंस सिस्टम भी पेश किए हैं। 10 से अधिक प्रमुख रूसी रक्षा कंपनियां अपने अत्याधुनिक विमान, हेलिकॉप्टर, इंजन और एयर डिफेंस सिस्टम के साथ इस शो में पधारी हैं। कुल मिलाकर 500 से अधिक रूसी प्रोडक्ट्स इस शो में पेश किए गए हैं।

इसके अलावा रूस ने अपने IL-78MK-90A रिफ्यूलिंग एयरक्राफ्ट को भी प्रदर्शित किया है, जिसे जरूरत के अनुसार ट्रांसपोर्ट, मेडिकल और फायरफाइटिंग वर्जन में बदला जा सकता है। इसके अलावा United Engine Corporation ने अपने Item 177S इंजन को पेश किया है, जो फिफ्थ जनरेशन मल्टीरोल फाइटर्स के लिए डिजाइन किया गया है।

साथ ही, रूस ने अपने एडवांस एयर-लॉन्च मिसाइलों का भी पेश किया है, जो चौथी और पांचवीं पीढ़ी के फाइटर्स के में लगाई जा सकती हैं। इन मिसाइलों में RVV-MD2 और RVV-B (हवाई लक्ष्यों को निशाना बनाने के लिए), Kh-35UE (युद्धपोतों को नष्ट करने के लिए), Kh-38MLE (जमीनी लक्ष्यों पर सटीक हमले के लिए), Kh-58UShKE (एंटी-एयरक्राफ्ट मिसाइल सिस्टम के रडार को नष्ट करने के लिए), और नई पीढ़ी की स्टील्थ क्रूज मिसाइल Kh-69 शामिल हैं।

एयर डिफेंस सेक्टर में रूस की Almaz-Antey Air and Space Defense Corporation ने लंबी, मध्यम और छोटी दूरी की मिसाइलों को पेश किया है, जो बैलिस्टिक मिसाइलों से लेकर छोटे UAVs तक को को निशाना बना सकती हैं।

Explainer: What is India’s new CATS Warrior drone? Aero India 2025 threatened entry, jumping discussion

Explainer: What is India’s New CATS Warrior Drone? Makes a Powerful Debut at Aero India 2025

CATS Warrior: A staggering name is being discussed by CATS Warrior for the last several days in the defence sector of India. This state-of-the-art Steelth Drone Aero India is going to become the centre of attraction for all in 2025. Full-scale demostrator of CATS Warrior in Asia’s largest aerospace show being held between 10 to 14 February at the Yelhanka Air Force Station of Bengaluru will be first introduced to the general public.

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What is CATS Warrior?

Indeed CATS Warrior (Combat Air Teaming System) is a state-of-the-art indigenous steelth drone designed to work closely with Indian Air Force’s fighter jets. This drone is equipped with a steelth technique, allowing the enemy radars to not hold it easily. It is known as "Loyal Wingman", which means it will take part in missions with Air Force’s pilot operated fighter jets, such as reporting, strike mission, electronic attack, etc. The most important thing of this drone is that it will carry out dangerous missions, thereby reducing the risk on airborne pilots.

What is Aero India 2025?

The first flight of CATS Warrior is to be until the end of this year. But before this, it has been introduced in the Full-Scale demostrator Aero India 2025. This drone has been fully built in indigenous technology under the ‘Soul Bharat’ mission of India. Its design and capacity is similar to the latest drones such as American Boeing MQ-28 Ghost Bat and China’s Feihong FH-97. HAL’s PTAE-W turbojet engine has been used, which has already shown its potential in India’s target drone ‘target’. Recently HAL had completed the successful engine ground run of CATS Warrior.

Explainer: What is India’s New CATS Warrior Drone? Makes a Powerful Debut at Aero India 2025

Now the taxi trial of CATS Warrior will be started at the next stage, with ground handling, control systems, and system integrations will be examined. After the success of these trials, it is expected to meet the green flag for the first flight of this drone.

CATS Warrior is not only a drone, but it is a major part of the Combat Air Teaming System (CATS) program of HAL. Under this program, a cruise missile, Close Combat missile, Swarm drone and a Psyodo Satellite network is also being developed, which will work in the network with AMCA fighter jets coming in the fastness and future.

Why Essential CATS Warrior for Indian Air Force?

Indian Air Force has a fighter plane squadron reduction. Only 31 squadrons are activated at the moment compared to 42 squadrons. Air Forces in such a need new methods to increase their strength. Indigenous Combat Aircraft production like Tejas Mk1A, as well as unmanned Combat Aircraft such as CATS Warrior can play an important role in fulfilling this reduction in the future.

Aero India 2025: American F-35 Steelth Fighter or Russian SU-57 Felon! Who Will Be India’s First Choice? Both are Aero India in 2025

This drone can play roles like strike missions to depth, inactivating and monitoring enemy air security. This drone with built-in Smart Anti-Airfield Weapons (SAAWs) will also attack the enemy bases. In addition, this drone will play the role of real-time Battlefield Awareness during the war.

CATS Warrior की पहली उड़ान इस साल के अंत तक होनी है। अमेरिका, चीन और रूस पहले से ही अपने-अपने AI-अनेबल्ड UCAVs पर काम कर रहे हैं, जिनमें Boeing MQ-28 Ghost Bat और चीन का Feihong FH-97 प्रमुख हैं। इस ड्रोन के साथ-साथ HAL और अन्य प्राइवेट कंपनियां जैसे NewSpace Research and Technologies (NRT) भी AI-ऑपरेटेड ड्रोन्स पर काम कर रही हैं। NRT का Abhimanyu नामक ड्रोन भी जल्द ही पेश किया जाएगा।

LCA Tejas Engine: April to IAF meet 5 Tejas Mk-1A fighter jet and 4 trainer aircraft? GE promises F-404 Engine Supply

LCA Tejas Engine: GE Promises F-404 Engine Supply, IAF to Get Jets by April?

LCA Tejas Engine: भारत के स्वदेशी लड़ाकू विमान तेजस (Tejas) के लिए अच्छी खबर है। लगभग दो साल से जीई की तरफ से इंजन सप्लाई में हो रही देरी के चलते भारतीय सेनाओं को तेजस की डिलीवरी नहीं हो रही थी। लेकिन अब अमेरिकी कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक (GE) ने तेजस लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (LCA) के लिए F-404 इंजन की सप्लाई फिर से शुरू करने का वादा किया है।

LCA Tejas Engine: GE Promises F-404 Engine Supply, IAF to Get Jets by April?

LCA Tejas Engine: वायुसेना में स्क्वाड्रन की कमी

भारतीय वायुसेना इन दिनों स्क्वाड्रन की कमी से जूझ रही है। वायुसेना के पास फिलहाल 31 एक्टिव स्क्वाड्रन हैं, जबकि 42 स्क्वाड्रन की जरूरत है। जिसके चलते वायुसेना पर नए लड़ाकू विमानों की कमी को पूरा करने का जबरदस्त दबाव है। तेजस की प्रोडक्शन में तेजी आने से भारतीय सेना को थोड़ी राहत मिल सकती है।

जीई का वादा- इस साल मार्च से पहला इंजन

जनरल इलेक्ट्रिक ने एकबार फिर से तेजस Mk-1 के लिए F-404 इंजन की सप्लाई जल्द शुरू करने का वादा किया है। अब कंपनी ने कहा है कि वह इस साल मार्च से इंजन डिलीवरी करना शुरू कर देगी। रिपोर्ट्स के मुताबिक, GE 26 इंजनों की आपूर्ति में पीछे है, लेकिन उन्होंने पहला इंजन समय पर भेजने का वादा किया है और इसके बाद उत्पादन में तेजी लाई जाएगी। जीई को तेजस के लिए एक साल में 26 इंजन सप्लाई करने हैं और पहला इंजन वह मार्च तक भेज देगी। हालांकि कंपनी की तरफ से कोई तारीख तय नहीं हुई है।

Aero India 2025: The promise from Army Chief will complete the Air Force Head, both Coursemates will first fly together in LCA Tejas

हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के लिए दो साल चुनौती भरे रहे हैं। लेकिन अब नए डिलीवरी शेड्यूल के साथ, HAL को उम्मीद है कि इंजन के आते ही तेजस के उत्पादन में तेजी लाई जा सकेगी। एचएएल सूत्रों का कहना है कि पहले की तरह ही वे सिर्फ इंतजार कर सकते हैं। अब देखते हैं कि जीई इस बार भी अपना वादा पूरा करती है या फिर से कोई नई डेडलाइन जारी करती है।

LCA Tejas Engine: नासिक में नई असेंबली लाइन लगाने की तैयारी

HAL के पास बेंगलुरु में दो और नासिक में एक प्रोडक्शन लाइन है। नासिक फैसिलिटी से मार्च तक पहला तेजस विमान डिलीवर किया जाएगा और GE के इंजनों के आने के बाद प्रोडक्शन में बढ़ोतरी होने की उम्मीद है। नए डिलीवरी शिड्यूल के मुताबिक HAL की मार्च या अप्रैल तक पांच तेजस Mk-1A फाइटर जेट और चार ट्रेनर एयरक्राफ्ट तैयार करने की योजना है। अगर इंजन समय पर आते हैं, तो असेंबली कुछ ही दिनों में पूरी हो सकती है।

वहीं, एचएएल कंपनी नासिक में चौथी असेंबली लाइन स्थापित करने की तैयारी कर रही है। HAL की बेंगलुरु में दो असेंबली लाइन्स की सालाना उत्पादन क्षमता आठ लड़ाकू विमानों की है। इसके अलावा नासिक में भी एक असेंबली लाइन है, जो सालाना आठ तेजस विमान बना सकती है। हालांकि, नासिक में नई असेंबली लाइन बनाने की योजना तभी पूरी हो सकेगी जब GE इंजन की नियमित आपूर्ति शुरू करेगा। नई असेंबली लाइन को तैयार करने में लगभग 1.5 साल का समय लगने की संभावना है।

वायुसेना को 180 तेजस Mk-1A और 108 तेजस Mk-2 विमानों की जरूरत

रक्षा मंत्रालय ने 2021 में HAL के साथ 83 तेजस Mk-1A विमानों की सप्लाई के लिए 45,696 करोड़ रुपये का बड़ा सौदा किया था। इसमें 73 फाइटर जेट और 10 ट्रेनर विमान शामिल हैं। इन विमानों के लिए GE को 99 F-404 इंजन की सप्लाई करनी थी। अब तक HAL ने 40 तेजस LCA विमानों में से 38 की डिलीवरी भारतीय वायुसेना को कर दी है। वहीं, भारतीय वायुसेना को कम से कम 180 तेजस Mk-1A और 108 तेजस Mk-2 विमानों की जरूरत है।

LCA Tejas Engine: तेजस Mk-1A में एडवांस AESA रडार

तेजस Mk-1A में एडवांस AESA रडार लगाया गया है, जो दुश्मन के विमानों और मिसाइलों को दूर से ट्रेक कर सकता है। इस रडार के जरिए विमान कई टारगेट्स पर एक साथ हमला कर सकता है और दुश्मन की जामिंग टेक्नोलॉजी से भी बच सकता है। इसके अलावा, तेजस Mk-1A में एडवांस कंप्यूटर सिस्टम, बेहतर कॉकपिट डिस्प्ले और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम लगाए गए हैं। तेजस में अस्त्रा और डर्बी जैसी एयर-टू-एयर मिसाइलें भी लगाई जा सकती हैं।

वहीं, तेजस का सबसे एडवांस वर्जन तेजस Mk-2 है, जो अभी डेवलपमेंट फेज में है। Mk-2 का साइज बड़ा होगा और यह ज्यादा ताकतवर इंजन के साथ आएगा, जिससे यह ज्यादा ईंधन और हथियार ले जा सकेगा। इसमें और भी एडवांस रडार और वेपन सिस्टम्स लगे होंगे। जिससे भारत की मल्टी-रोल फाइटर (बहु-भूमिका वाले लड़ाकू विमान) की जरूरतें पूरी होंगी।

Indian Army Helicopter Fleet: The Old Helicopter Fleet will replace the Fleet Indian Army, incorporating 250 new Chopper, these are the Cops in Race

Indian Army Helicopter Fleet Upgrade: 250 New Choppers to Replace Aging Fleet

Indian Army Helicopter Fleet: The Indian Army plans to strengthen its Aviation Sector by taking a big step towards mordenization. Under this scheme, the Army is soon going to include around 250 new helicopters for surveillance and towhi campaigns. The move is being taken to replace the old helicopter Fleet of the army, which will greatly improve the operational capability of the army.

Indian Army Helicopter Fleet Upgrade: 250 New Choppers to Replace Aging Fleet

Indian Army Helicopter Fleet: Chetak and Cheet will also change

"Our Helicopter Fleet has now been outdated," a senior officer of the Army told it. Helicopters like Chetak and Cheetah, who have been in the service of the Army for the past several decades have now been old. These helicopters were built in the 1960s and joined the Army in the 1970s. However, these can also be trusted today. But in today’s time, it lacks latest avionics, safety features and operational flexibility.

He said that indigenous production is being emphasised under the ‘Make in India’ policy of the Government. "The main helicopters proposed for the Army include the Light Utility Helicopter (LUH) of Hindustan Aeronautics Limited (HAL), Russia’s Kamov-226T, and Airbus H125.

Indian Army Helicopter Fleet: Single Engine Large Problem

Another major problem of these old helicopters according to the formulas is their single-engine configuration, which increases the rounding risk of operation. In addition, their payload capacity is also limited, there is a huge problem, which leads to difficulty carrying soldiers and military sajosaman. There are no spare parts for these helicopters which have problems in their maintenance.

ALH Dhruv Grounded: The impact on the border supply from the ground of the pole helicopter, the army commanded the handled by civil helicopters!

Indian Army Helicopter Fleet: लाइट यूटिलिटी हेलिकॉप्टर (LUH) प्रमुख दावेदार

मेक इन इंडिया पहल के तहत हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) का लाइट यूटिलिटी हेलिकॉप्टर (LUH) प्रमुख दावेदार माना जा रहा है। यह हेलिकॉप्टर हाई एस्टीट्यूड इलाकों में बेहतरीन प्रदर्शन करता है और चेतक और चीता हेलिकॉप्टरों की जगह लेने की तैयारी में है।

इसके अलावा, रूस के कामोव-226T और एयरबस का H125 भी इस रेस है। कामोव-226T एक डबल इंजन वाला हेलिकॉप्टर है, जो अपनी सेफ्टी और मॉड्यूलर डिज़ाइन के लिए जाना जाता है। हालांकि, रूस-यूक्रेन युद्ध और अन्य जियोपॉलिटिकल परिस्थितियों के चलते इस हेलिकॉप्टर की खरीद में देरी हुई है। दूसरी तरफ, एयरबस का H125 दुनियाभर में अपनी हाई एल्टीट्यूड कैपेबिलिटी और एडवांस एवियोनिक्स के लिए जाना जाता है।

सेना के एविएशन कोर की चुनौतियां

भारतीय सेना का एविएशन कोर, भले ही सेना की सबसे लेटेस्ट ब्रांचों में से एक है, लेकिन मॉर्डन वारफेयर में इसका रोल बेहद अहम है। यह ब्रांच वॉर मिशन, निगरानी, लॉजिस्टिक्स, घायल सैनिकों की निकासी और मानवीय मदद में सबसे आगे रहती है।

भारतीय सेना दुनिया के कुछ सबसे दुर्गम इलाकों में काम करती है, जहां हेलिकॉप्टरों से कनेक्टिविटी संभव है। लद्दाख, सियाचिन ग्लेशियर, उत्तर सिक्किम, और अरुणाचल प्रदेश जैसे हाई एल्टीट्यूड इलाकों में माइन जीरो डिग्री टेंपरेचर, खराब मौसम और पतली हवा में हेलिकॉप्टर ऑपरेट करना बेहद मुश्किल होता है। इन्हीं चुनौतियों को देखते हुए, भारतीय सेना ने अपनी हेलिकॉप्टर फ्लीट को अपग्रेड करने की व्यापक योजना शुरू की है।

सेना की एविएशन कोर होगी मजबूत

जुलाई 2023 में रक्षा मंत्रालय ने 20 टोही और निगरानी हेलिकॉप्टरों को किराए पर लेने के लिए एक आरएफआई (Request for Information) जारी किया था, जो पांच सालों के लिए ग्राउंड सपोर्ट एक्विपमेंट्स के साथ आएंगे। फिलहाल, भारतीय सेना की एविएशन कोर लेह, मिसामारी और जोधपुर में तीन ब्रिगेड तैनात हैं, जिनके पास लगभग 190 चीता, चेतक और चीताल हेलिकॉप्टर, 145 ALH (एडवांस्ड लाइट हेलिकॉप्टर) और 75 रुद्र (ALH-WSI) हेलिकॉप्टर हैं। इसके अलावा, 25 ALH Mk-III हेलिकॉप्टरों के लिए भी ऑर्डर दिए गए हैं।

सेना के एक अधिकारी ने कहा, “हम न केवल पुराने हेलिकॉप्टरों को बदलने पर फोकस कर रहे हैं, बल्कि यह भी सुनिश्चित कर रहे हैं कि नए हेलिकॉप्टर मॉर्डन वारफेयर की सभी जरूरतों को पूरा करें। यह कदम भारतीय सेना को वैश्विक स्तर पर और मजबूत बनाएगा।”

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ALH Dhruv Grounded: Army Turns to Civil Helicopters to Maintain Border Supplies!

ALH Dhruv Grounded: The Indian Army Advance Light Combat Helicopter is the ground bearing of ALH pole is now visible on the operational preparations of the Indian Army. The military is now helping civil aviation companies to deliver necessary goods and logistics in the border areas. An official statement issued on Wednesday stated that the Army’s ‘Sunya Command’ has started the supply to the Forward Post in the Garhwal and Kumanit areas of Himachal Pradesh and Uttarakhand through civil helicopters contracted with the Thumbhi Aviation Private Limited.

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Ground is ‘Work Horse’

Indigenous Advanced Light Helicopter (ALH) ‘Druv’, called ‘Work Horse’ of India, has been grounded by technological imperfections and was completely stopped on its flights. The decision was taken after the accident took place in the Porter on January 5, last month. During the training flight of ALH Mark-III Helicopter of the Indian Coast Guard, three personnel were killed. There are about 330 ALH helicopters present across the country, and all have been grounded. Even on the Army Day and Republic Day celebrated on September 15, the pole and its other variants did not fly.

ALH Dhruv Grounded: Contracting with Thumbie Aviation

The Army has launched civil helicopter services by contracting with Thubi Aviation Private Limited, whose operation started from Thursday. Thumbie Aviation Bell uses 412 choppers, commonly used for passenger transport, VIP flights and medical emergency services. As per the authorities, the number of these choppers will be decided based on the needs of the Army.

ALH Dhruv Grounded: हाई एल्टीट्यूड इलाकों में परफॉरमेंस शानदार

भारतीय सेना ध्रुव हेलीकॉप्टरों का इस्तेमाल हाई एल्टीट्यूड इलाकों में रसद, सैनिक साजोसामान और इमरजेंसी सेवाओं में करती है। हाई एल्टीट्यूड इलाकों में इनकी परफॉरमेंस शानदार है। लेकिन हाल के कुछ सालों में बार-बार तकनीकी खामियों और दुर्घटनाओं के चलते इनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे हैं। इसी के चलते अब सेना ने सीमावर्ती इलाकों में रसद आपूर्ति और इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट के लिए प्राइवेट एविएशन कंपनियों का रुख किया है।

थंबी एविएशन के हेलीकॉप्टरों की मदद से सेना सीमावर्ती इलाकों में तैनात जवानों को खाद्य सामग्री, दवाइयां और अन्य जरूरी सामान पहुंचाने के साथ-साथ सीमा पर चल रहे इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए निर्माण सामग्री भी समय पर भेज सकेगी।

ALH Dhruv Crash: Shock to HAL-IAF, LCH tempt can also be at risk! ALH pole helicopter defects

ALH Dhruv Grounded: 2024 में 40,000 घंटे उड़ान

भारत-चीन सीमा पर 3,488 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के आसपास कई इलाके ऐसे हैं जो अभी भी सड़क मार्ग से जुड़े नहीं हैं। ऐसे इलाकों में रसद पहुंचाने के लिए वायुसेना और सेना के हेलीकॉप्टर ही एकमात्र विकल्प होते हैं। लेकिन ध्रुव हेलीकॉप्टरों के ग्राउंड होने के कारण यह चुनौती और भी बढ़ गई थी। ALH हेलीकॉप्टर भारतीय सेना और वायुसेना के लिए एक वर्कहॉर्स की तरह काम करते हैं। अकेले 2024 में भारतीय सेना में ALH हेलीकॉप्टरों ने 5,000 फीट से अधिक ऊंचाई वाले इलाकों में 40,000 घंटे से अधिक की उड़ान भरी थी।

पिछले साल भी हुआ था करार

इससे पहले पिछले साल अक्टूबर में भारतीय सेना ने पहली बार बॉर्डर इलाकों आवश्यक सप्लाई के लिए निजी सिविल एविएशन कंपनियों के साथ करार किया था। यह कदम खासतौर पर उन फॉरवर्ड पोस्ट के लिए उठाया गया था, जो सर्दियों के दौरान भारी बर्फबारी के कारण अन्य हिस्सों से कट जाती हैं। इसके तहत सेना ने अपने एविएशन रिसोर्सेज की जगह सिविलियन हेलिकॉप्टरों के इस्तेमाल का फैसला किया था, जिससे न केवल लागत में कमी आएगी, बल्कि सैन्य हेलिकॉप्टरों को युद्ध और इमरजेंसी सेवाओं के लिए सुरक्षित रखा जा सकेगा।

इस करार के तहत जम्मू क्षेत्र की 16 रिमोट चौकियों को पूरे साल और कश्मीर और लद्दाख की 28 चौकियों को 150 दिनों तक सिविल हेलिकॉप्टरों के जरिये सप्लाई दी जाएगी। इस पहल के तहत हेलिकॉप्टर ऑपरेशन के लिए लद्दाख में सात, कश्मीर में दो और जम्मू क्षेत्र में एक माउंटिंग बेस बनाए गए हैं, जो कुल 44 चौकियों को कवर करेंगे। इन बेसों का डेवलपमेंट बॉर्डर एरिया डेवलपमेंट प्रोग्राम और पीएम गति शक्ति योजना के तहत किया गया है, ताकि सीमावर्ती इलाकों में एक इंटीग्रेटेड लॉजिस्टिक्स नेटवर्क तैयार किया जा सके।

Chinese Spyware: Intrusion plot in Indian drones! The threat of spying and hacking from Chinese spares, the army cancelled 400 drone deals

Indian Army Drone Warrior
Indian Army Drone Warrior

Chinese Spyware: The Ministry of Defence has taken a link to the use of Chinese parts in drones being built on behalf of the private companies of the country for the Indian Army. Ministry of Defence has cancelled three large deals of 400 logistics drones. The move has been taken into account the country’s cyber security and military privacy. Sources say that the threat of events such as hacking and data leaks were increased in drones due to sugar spares. Even earlier in June last year, the Ministry of Defence had cancelled a large order of logistics drones.

Indian Army Cancels 400 Drone Deals Over Chinese Spyware Concerns

Chinese Spyware: The total price of drones 230 crore

According to the sources of the Ministry of Defence, these deals included 200 medium-altitude, 100 heavy-weight and 100 light-weight logistics drones. The total price of these drones was more than Rs 230 crore. These drones were mainly deployed at 3,488 kilometres long line of aquatic control (LAC) on India-China border. The deployment of these drones was highly considered among the military tensions released from 2020 in East Ladakh with China.

"Some Indian companies were using electronic parts made in China in drones being built for the military," according to an officer of the Ministry of Defence. which is a great threat to cybersecurity. The information on our Military may be leaked. The enemy can hack or jam these drones through such parts. ""

PoK went into a drone

इससे पहले अगस्त 2024 में जम्मू-कश्मीर के राजौरी सेक्टर में एलओसी के पास तैनात एक इन्फैंट्री यूनिट का एक ड्रोन अचानक कंट्रोल से बाहर हो गया था और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में चला गया। इस घटना की जांच में पता चला कि ड्रोन में तकनीकी गड़बड़ी थी। सूत्रों का कहना है कि इसके पीछे चीनी पर्ट्स के इस्तेमाल की बात कही गई थी। इस घटना की जांच के बाद ड्रोन निर्माता कंपनी को भी तलब किया गया था।

चीनी पार्ट्स या सॉफ्टवेयर कोड न हो

रक्षा मंत्रालय ने अब ड्रोन्स की खरीद फरोख्त में सख्त नियम लागू करने का फैसला किया है। इन मानकों के तहत ड्रोन निर्माताओं को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके प्रोडक्ट्स में 50 फीसदी से अधिक सामग्री स्वदेशी हो। ड्रोन बनाने वाली कंपनियों को अब यह साबित करना होगा कि उनके ड्रोन्स में किसी भी प्रकार के चीनी पार्ट्स या सॉफ्टवेयर कोड का इस्तेमाल नहीं किया गया है। इसके अलावा, इंडिपेंडेंट टेक्निकल चेक एंड वेरिफिकेशन सिस्टम भी लागू किया जाएगा, ताकि किसी भी तरह की सुरक्षा चूक को रोका जा सके।

साथ ही, रक्षा मंत्रालय ने देश के प्रमुख उद्योग निकायों फिक्की, सीआईआई और एसोचैम को भी निर्देश दिया है कि वे अपने मैंबर्स कंपनियों को ड्रोन मैन्युफैक्चरिंग में चीनी पार्ट्स के इस्तेमाल से बचने के लिए जागरूकता अभियान चलाएं।

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भारत सरकार ने 2020 में गलवान हिंसा के बाद से चीन के साथ सीमा विवाद के चलते कई मिलिट्री इक्विपमेंट्स और टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाए थे। इसके बावजूद देश की कई ड्रोन बनाने वाली कंपनियां लागत कम रखने के लिए चीनी पार्ट्स का इस्तेमाल कर रही थीं, जिससे साइबर सुरक्षा में सेंध लगाने का खतरा बढ़ गया था।

Chinese Spyware: जून 2024 में एक कंपनी का रद्द किया था ऑर्डर

इससे पहले पिछले साल जून में रक्षा मंत्रालय (MoD) ने लॉजिस्टिक्स ड्रोनों के एक बड़े ऑर्डर को रोक दिया था। आर्मी डिजाइन ब्यूरो (ADB) के अतिरिक्त महानिदेशक मेजर जनरल सीएस मान ने रक्षा समाचार को बताया था कि यह बड़ा खतरा है। सरकार पहले ही मिलिट्री सिस्टम्स में चीनी कंपोनेंट्स की घुसपैठ को रोकने के लिए कदम उठा चुकी है। भारतीय सेना ने चेन्नई की धक्षा अनमैन्ड सिस्टम्स प्राइवेट लिमिटेड के 200 लॉजिस्टिक ड्रोन की खरीद पर रोक लगाई थी। कंपनी पर अपने ड्रोन में चीनी उपकरणों के इस्तेमाल का आरोप था। धक्षा कोरामंडल इंटरनेशनल की सहायक कंपनी है। रक्षा मंत्रालय (MoD) ने 25 जून को CII, FICCI और ASSOCHAM को पत्र लिखकर धक्षा और दो अन्य कंपनियों से रक्षा उपकरण खरीद में सतर्कता बरतने की सलाह दी थी। हालांकि धक्षा कंपनी के प्रवक्ता ने आरोपों को “असत्य और निराधार” बताते हुए कहा था, “हम अपने डिफेंस ड्रोन में किसी भी चीनी पुर्जों का इस्तेमाल नहीं करते।”

ड्रोन्स में चीनी पुर्जों के खतरे

रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, चीनी पुर्जों के इस्तेमाल से सबसे बड़ा खतरा डेटा लीक और मिलिट्री ऑपरेशंस की जानकारी लीक होने का है। चीनी इलेक्ट्रॉनिक्स में ‘बैकडोर’ प्रोग्रामिंग हो सकती है, जो सिक्योरिटी सिस्टम को बाइपास कर संवेदनशील जानकारी दुश्मनों तक पहुंचा सकती है। कम्यूनिकेशन मॉड्यूल, कैमरा सिस्टम और कंट्रोल सिस्टम में छुपे ये कोड ड्रोन के ऑपरेशन में दिक्कत पैदा कर सकते हैं या दुश्मन के नियंत्रण वाले इलाके में ले जा सकते हैं।

DGMI ने 2010 और 2015 में जारी किए थे निर्देश

रक्षा मंत्रालय के एक इंटरनल नोट के मुताबिक, डायरेक्टर जनरल मिलिट्री इंटेलिजेंस (DGMI) ने 2010 और 2015 में निर्देश जारी कर सेंसिटिव सिक्योरिटी डिवाइसेज में चीनी पार्ट्स के इस्तेमाल पर रोक लगाने के निर्देश दिया था।
बावजूद इसके, ड्रोन मैन्युफैक्चरिंग में इस निर्देश का पूरी तरह पालन नहीं किया गया। 2017 में चीन में लागू एक कानून के तहत वहां की सभी टेक कंपनियों को सरकारी एजेंसियों के साथ डेटा शेयर करना जरूरी है, जिससे चीनी टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल के जोखिम और भी बढ़ जाते हैं। सेना का कहना है कि ड्रोन में लगे सेंसर और फ्लाइट कंट्रोलर रियल-टाइम डेटा और लोकेशन को उन देशों के सर्वर पर शेयर कर सकते हैं।

भारत का ड्रोन बाजार अगले दशक में 40 अरब डॉलर (लगभग 3.36 लाख करोड़ रुपये) तक पहुंचने की संभावना है। सरकार उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना और ड्रोन रेगुलेशन 2021 जैसे सुधारों के जरिए स्थानीय स्तर पर ड्रोन मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा दे रही है। भारतीय सेना भी अगले कुछ सालों में 2,500 से अधिक मिलिट्री ड्रोन खरीदने की योजना बना रही है, जिन पर लगभग 3,000 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे।

Chabahar Port: The Trump’s Doubling! The US shocked India on the Chabahar Port, the Trump exempted over; what will happen Bearing?

Chabahar Port: Trump Drops Waiver, Shocking India!

Chabahar Port: Earlier US President Trump sent Amritsar via an American Military Aircraft C-17 Globemaster to 104 Indian citizens. There is now another blow to India. U.S. President Donald Trump has ordered to cancel the exemption on sanctions involving Iran’s Chabahar Port. The move has been taken at a time when India had compromised 10 years with Iran for the development of Chabahar Port, ensuring direct access to Afghanistan and Central Asia.

Chabahar Port: Trump Drops Waiver, Shocking India!

Chabahar Port: First discounted, then withdrawn

The U.S. had earlier exempted the Modernization of Chabahar Port from sanctions, as this port was an important way for India to provide humanitarian help to Afghanistan. In November 2018, President Trump had exempted India for the development of Chabahar Port, which led India to direct access to Afghanistan by bypassing Pakistan.

What is National Security in Memorandum?

However, the ‘Presidency National Security Memorandum’ released on the side of the White House has been alleged to take several steps against Iran. "Foreign Minister Marco Rubio is directed to modify or eliminate all such restriction exemptions, which provide Iran with any kind of economic or financial relief, including exemption related to Iran’s Chabahar Port Project. ""

Why is it for India?

पिछले साल मई में भारत और ईरान के बीच एक 10 वर्षीय समझौता हुआ था, जिसका उद्देश्य चाबहार पोर्ट को एक क्षेत्रीय कनेक्टिविटी हब के रूप में डेवलप करना था। इस पोर्ट के जरिए भारत को अफगानिस्तान, मध्य एशिया और यूरेशिया तक सीधी पहुंच मिलती। यह परियोजना न केवल व्यापारिक दृष्टि से बल्कि रणनीतिक लिहाज से भी भारत के लिए अत्यंत जरूरी थी।

इस परियोजना के तहत भारत पोर्ट के विकास के लिए करीब 120 मिलियन डॉलर का निवेश करने वाला था। इसके अलावा, भारत ने ईरान को चाबहार पोर्ट के बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर को डेवलप करने के लिए 250 मिलियन डॉलर का क्रेडिट भी ऑफर किया था। भारत पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड (IPGL) और ईरान के पोर्ट्स एंड मैरीटाइम ऑर्गनाइजेशन (PMO) के बीच हुए समझौते के मुताबिक IPGL अगले 10 सालों तक इस पोर्ट को विकसित और संचालित करने वाला था। इसके बाद दोनों देशों के बीच सहयोग को और आगे बढ़ाने की योजना थी।

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भारत के लिए Chabahar Port क्यों है अहम?

ईरान के तटीय शहर चाबहार में स्थित यह पोर्ट भारत के रणनीतिक और आर्थिक हितों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। भारत और ईरान के बीच चाबहार पोर्ट के डेवलपमेंट को लेकर 2003 में सहमति बनी थी, लेकिन इस परियोजना ने असल रफ्तार 2016 में पकड़ी, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरान का दौरा किया। 15 सालों में यह किसी भारतीय प्रधानमंत्री का पहला ईरानी दौरा था, और इसी दौरान चाबहार पोर्ट के डेवलपमेंट के समझौते को मंज़ूरी मिली।

2019 में पहली बार चाबहार पोर्ट के जरिए पाकिस्तान को साइडलाइन करके अफगानिस्तान से माल भारत लाया गया। यह पोर्ट इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) का हिस्सा है, जो भारत, ईरान, अफगानिस्तान, रूस, और यूरोप के बीच 7,200 किलोमीटर लंबा ट्रांसपोर्ट नेटवर्क है। इससे भारत की मध्य एशिया और यूरोप तक पहुंच आसान हो जाती है, जो न केवल आर्थिक तौर पर बल्कि कूटनीतिक तौर से भी फायदेमंद है।

हालांकि 2020 में कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया था कि ईरान ने भारत को एक रेलवे प्रोजेक्ट से अलग कर दिया है, जिससे दोनों देशों के रिश्तों में तनाव आया। लेकिन अब दोनों देशों के बीच फिर से चाबहार पर अहम समझौता हुआ है, जिसे रिश्तों में सुधार के संकेत के तौर पर देखा गया।

चाबहार पोर्ट का पाकिस्तान और चीन के ग्वादर पोर्ट के मुकाबले भारत के लिए रणनीतिक तौर पर बेहद अहम है। ग्वादर पोर्ट चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) का हिस्सा है, भारत के लिए चिंता का विषय रहा है। ऐसे में चाबहार पोर्ट न केवल भारत के लिए व्यापार का एक वैकल्पिक मार्ग है, बल्कि यह चीन की अरब सागर में बढ़ती मौजूदगी को संतुलित करने का एक साधन भी है।

तालिबान की अफगानिस्तान में वापसी के बाद भारत का मध्य एशिया से संपर्क सीमित हो गया था। ऐसे में चाबहार पोर्ट भारत को काबुल तक अपनी पहुंच बनाए रखने और मध्य एशियाई देशों के साथ व्यापारिक संबंध मजबूत करने का मौका देता है। इस पोर्ट के माध्यम से भारत अफगानिस्तान को मानवीय मदद भी पहुंचा सकता है, जिससे उसकी इस क्षेत्र में पकड़ भी बनी रहती है।

चाबहार को INSTC से जोड़ने की तैयारी

चाबहार पोर्ट को इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) से भी जोड़ा जाएगा, जिससे भारत, ईरान, अफगानिस्तान, रूस और यूरोप के बीच 7,200 किलोमीटर लंबा परिवहन नेटवर्क तैयार होगा। इससे भारत को मध्य एशिया और यूरोप के साथ व्यापारिक कनेक्टिविटी बढ़ाने में मदद मिलेगी और पाकिस्तान को दरकिनार कर सीधा व्यापार मार्ग मिलेगा। साथ ही, यह पोर्ट अरब सागर में चीन की मौजूदगी को चुनौती देने के लिए भारत के लिए एक अहम रणनीतिक साधन भी साबित होगा।

ट्रंप के फैसले का क्या पड़ेगा असर

अमेरिका के इस फैसले से भारत की कई योजनाओं पर असर पड़ सकता है। चाबहार बंदरगाह के दो पोर्ट हैं- शाहिद बेहेस्ती और शाहिद कलंतरी। चाबहार पोर्ट के जरिए भारत, चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) को टक्कर देने की रणनीति पर काम कर रहा था। यह पोर्ट भारत को चीन-पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट के विकल्प के तौर पर अपनी पकड़ मजबूत करने का मौका देता है। इसके अलावा भारत और ईरान के बीच चाबहार पोर्ट के जरिए मजबूत होते संबंधों को भी इस फैसले से झटका लग सकता है। ईरान, भारत के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार रहा है, खासकर ऊर्जा क्षेत्र में।

इसके अलावा, भारत अफगानिस्तान में निर्माण परियोजनाओं, दवाइयों और खाद्य आपूर्ति के लिए चाबहार पोर्ट का इस्तेमाल करता रहा है। चाबहार पोर्ट का इस्तेमाल भारत के लिए एक सस्ता और सुरक्षित विकल्प था। अब अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के बाद भारत को वैकल्पिक मार्गों की तलाश करनी पड़ सकती है, जिससे लागत और समय दोनों बढ़ सकते हैं। साथ ही, अमेरिका के इस कदम के बाद भारत को अपने निवेश और पोर्ट ऑपरेशन के लिए नए विकल्प तलाशने पड़ सकते हैं, या फिर अमेरिकी दबाव के तहत इन योजनाओं को सीमित करना पड़ सकता है।

तालिबान से हुई थी बैठक

8 जनवरी 2025 को दुबई में भारत और तालिबान के बीच चाबहार पोर्ट को लेकर एक महत्वपूर्ण बैठक हुई थी। भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री और अफगानिस्तान के कार्यवाहक विदेश मंत्री मौलवी आमीर खान मुत्ताकी के बीच हुई इस हाई-लेवल मीटिंग में चाबहार पोर्ट के जरिए व्यापार बढ़ाने पर चर्चा हुई। इस बैठक के बाद चीन और पाकिस्तान की चिंताएं बढ़ गईं, क्योंकि चाबहार पोर्ट ग्वादर पोर्ट के लिए एक बड़ा रणनीतिक विकल्प है, जिसे चीन और पाकिस्तान मिलकर विकसित कर रहे हैं।

बैठक के बाद भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जयसवाल ने सोशल मीडिया पर बताया था कि दोनों पक्षों ने अफगानिस्तान को दी जा रही मानवीय सहायता, द्विपक्षीय मुद्दों और सुरक्षा स्थिति पर चर्चा की। चाबहार पोर्ट के माध्यम से व्यापार को बढ़ावा देने पर सहमति व्यक्त की। अब तक भारत चाबहार के जरिए अफगानिस्तान को 25 लाख टन गेहूं और 2 हजार टन दालें भेज चुका है।

Illegal Indian Migrants: Indian citizens returned from the US to the raids! Will PM Modi still say ‘My Dear Friends Tramp’?

Indian Illegal Migrants: Indians Deported in Shackles from the US! Will PM Modi Still Call Trump 'My Dear Friend'?

Illegal Indian Migrants: अमेरिका से 104 भारतीय नागरिकों को जबरन एक अमेरिकी मिलिट्री एयरक्राफ्ट सी-17 ग्लोबमास्टर के जरिए हाल ही में अमृतसर भेजा गया। अमेरिका के इस तरह वापस भेजे जाने को लेकर सोशल मीडिया पर नई बहस छिड़ गई है कि जिस तरह से अमेरिका ने इन्हें वापस भेजा है क्या यह अमेरिका का रवैया सही है। ये नागरिक अवैध प्रवासी थे, जो अच्छे जीवन और बेहतर रोजगार की तलाश में डंकी रूट से अमेरिका में घुसे थे। इन्हें अमेरिकी सेना के विमान में हथकड़ियां और पैरों में बेड़ियां डालकर भारत भेजा गया। यह घटना तब घटी जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 13-14 फरवरी को अमेरिकी दौरे पर जा रहे हैं, जहां उनकी मुलाकात राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से होने वाली है। सवाल यह उठता है कि क्या ट्रंप अब भी भारत के ‘फ्रेंड’ हैं?

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इस घटना के फोटो और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गए हैं। सोशल मीडिया पर लोग भारत सरकार की चुप्पी पर हैरान हैं। सबसे पहला सवाल तो यही है कि क्या अमेरिका ने अपने सैन्य विमान में भारतीय नागरिकों को अपराधियों की तरह भेजकर भारत का अपमान किया है? और अगर ऐसा है, तो भारत सरकार ने इसका विरोध क्यों नहीं किया? कोलंबिया और मेक्सिको जैसे देशों ने जब अमेरिकी सेना के विमानों में उनके नागरिकों को हथकड़ियों में भेजा गया, तो उन्होंने विरोध जताया और अपने नागरिकों को सम्मान के साथ वापस लाने के लिए अपने विमान भेजे। लेकिन भारत ने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया।

Illegal Indian Migrants: कैसे हुआ यह सब?

सूत्रों के अनुसार, इन भारतीयों को अमेरिका में अवैध रूप से प्रवेश करने और रहने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। अमेरिका की इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट (ICE) एजेंसी ने इन्हें डिपोर्ट करने का फैसला कियाया। हालांकि, जिस तरीके से यह डिपोर्टेशन किया गया, उसने ह्यूमन राइट्स एंड डिप्लोमेटिक एटिकेट्स पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

Illegal Indian Migrants: अमेरिका ने वापस भेजे 104 अवैध भारतीय प्रवासी, अमृतसर में लैंड करेगा यूएस का C-17 मिलिट्री प्लेन!

हाथों में हथकड़ी, पैरों में बेड़ियां और कमर में जंजीरें बांधकर इन लोगों को अमेरिका के सैन्य विमान में बैठाया गया। यह वही तरीका है, जिसे आमतौर पर खतरनाक अपराधियों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इन अवैध भारतीयों में 25 महिलाएं और 12 नाबालिग बच्चे भी शामिल थे।

Illegal Indian Migrants: अमृतसर एयरपोर्ट पर गुप्त तरीके से लैंडिंग

इस सैन्य विमान की लैंडिंग के समय मीडिया को एयरपोर्ट तक पहुंचने की अनुमति नहीं दी गई। किसी भी पत्रकार या फोटोग्राफर को विमान की तस्वीरें लेने या प्रवासियों से बातचीत करने की इजाजत नहीं दी गई। हालांकि, कुछ स्थानीय लोगों ने विमान के उतरने का वीडियो बना लिया, जो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।

सरकार की ओर से इस मामले पर कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया गया, जिससे यह सवाल उठता है कि आखिर सरकार ने इस शर्मनाक स्थिति पर प्रतिक्रिया क्यों नहीं दी?

Illegal Indian Migrants: कोलंबिया और मेक्सिको का रुख

जहां कोलंबिया और मेक्सिको जैसे देशों ने अमेरिका के इस कदम का विरोध किया, वहीं भारत ने इस मामले में चुप्पी साध ली। कोलंबिया के राष्ट्रपति गुस्ताव पेट्रो ने अमेरिकी सैन्य विमान को अपने देश में उतरने की अनुमति नहीं दी थी। उन्होंने अपने नागरिकों को वापस लाने के लिए खुद का विमान भेजा और यह सुनिश्चित किया कि उन्हें सम्मानजनक तरीके से वापस लाया जाए।

कोलंबिया के राष्ट्रपति ने कहा, “प्रवासियों को हथकड़ी पहनाना और अपराधियों जैसा व्यवहार करना उनकी गरिमा का अपमान है।”

इसके विपरीत, भारत सरकार ने न केवल अमेरिकी सैन्य विमान को अपने एयरपोर्ट पर उतरने दिया, बल्कि इस मुद्दे पर कोई विरोध भी दर्ज नहीं कराया। इस पर सवाल उठ रहे हैं कि भारत ने अपने नागरिकों की गरिमा की रक्षा के लिए कोई कदम क्यों नहीं उठाया?

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भारतीयों को क्यों नहीं मिला सम्मानजनक वापसी का अधिकार?

इस घटना के बाद सवाल उठता है कि क्या भारत सरकार को अपने नागरिकों के सम्मान की परवाह नहीं है? क्या भारत की विदेश नीति में इतनी मजबूती नहीं है कि वह अपने नागरिकों के लिए आवाज उठा सके? वहीं, विदेश मंत्रालय की ओर से जारी एक संक्षिप्त बयान में कहा गया कि, “भारत अवैध प्रवास के खिलाफ है और अमेरिका के साथ इस मुद्दे पर सहयोग जारी रखेगा।” हालांकि, मंत्रालय ने हथकड़ी और बेड़ियों में लाए गए भारतीय नागरिकों के बारे में कोई टिप्पणी नहीं की। यह भी स्पष्ट नहीं किया गया कि क्या भारत ने अमेरिका से इस अमानवीय व्यवहार पर स्पष्टीकरण मांगा है या नहीं।

लेकिन सवाल यह है कि इस सहयोग का मतलब क्या है? क्या इसका मतलब यह है कि भारत अपने नागरिकों के साथ हो रहे अपमानजनक व्यवहार को भी नजरअंदाज कर देगा?

Illegal Indian Migrants: भारत को करना चाहिए था विरोध

अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने भी इस मुद्दे पर अपनी राय दी है। अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार ब्रह्मा चेलानी कहते हैं, मेक्सिको और कोलंबिया ने हथकड़ी लगे प्रवासियों को ले जाने वाली अमेरिकी सैन्य उड़ानों को रोक दिया। जबकि कोलंबिया ने निर्वासितों को “अमानवीय व्यवहार” के बिना लाने के लिए अपना खुद का विमान भेजा। लेकिन भारत ने न केवल हथकड़ी लगे निर्वासितों के साथ एक अमेरिकी जहाज को लैंड करने दिया, बल्कि यह भी दावा किया कि अवैध प्रवास का मुकाबला करने में “भारत और अमेरिका के बीच सहयोग मजबूत और प्रभावी है”। उनका कहना है कि जब अमेरिकी विमान भारतीयों को ला रहा था, तो भारत को इस बात पर जोर देना चाहिए था कि निर्वासितों के साथ मानवीय व्यवहार किया जाए, न कि उनके हाथों और पैरों को अपराधियों की तरह बेड़ियों से बांधा जाए।

What does Indian law say about Illegal Indian Immigrants?

क्या मोदी सरकार ने जानबूझकर चुप्पी साधी?

इस घटना के समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रयागराज में गंगा स्नान कर रहे थे। कई लोगों का मानना है कि यह समय जानबूझकर चुना गया, ताकि मीडिया का ध्यान कहीं और लगा रहे और इस मुद्दे पर ज्यादा हंगामा न हो।

सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे पर सरकार की चुप्पी की आलोचना हो रही है। कई यूजर्स ने सवाल उठाया है कि अगर यह घटना किसी अन्य सरकार के कार्यकाल में हुई होती, तो क्या मोदी सरकार और समर्थक इतने चुप रहते?

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क्या बदल रहे हैं भारत-अमेरिका संबंध?

यह घटना ऐसे समय पर हुई है जब प्रधानमंत्री मोदी अमेरिका दौरे पर जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटना भारत-अमेरिका संबंधों में संभावित तनाव का संकेत हो सकती है।

डोनाल्ड ट्रंप के फिर से राष्ट्रपति बनने के बाद भारत-अमेरिका संबंधों में बदलाव आ सकता है। ट्रंप के कार्यकाल में भारत को अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी में प्राथमिकता दी गई थी, लेकिन अब ऐसा लगता है कि अमेरिका का रुख बदल रहा है।

विदेश और रक्षा मामलों के एक दूसरे जानकार प्रवीण साहनी कहते हैं, अमेरिका ने जिस तरह से 100 से अधिक भारतीय अवैध प्रवासियों, जिनमें महिलाएं और नाबालिग भी शामिल थे, को हथकड़ी और बेड़ियों में जकड़कर सैन्य विमान के जरिए भारत वापस भेजा। यह सिर्फ अवैध प्रवासियों को वापस भेजने का मामला नहीं है, बल्कि इससे पता चलता है कि भारत-अमेरिका संबंधों में एक गंभीर दरार पैदा हो गई है। इस पूरे घटनाक्रम के पीछे कई राजनीतिक और कूटनीतिक कारण छिपे हुए हैं।

वह कहते हैं, यह घटना बताती है कि ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में अमेरिका अपनी ताकत को बढ़ाने पर जोर देगा और भारत को ज्यादा प्राथमिकता नहीं दी जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि चीन के खिलाफ हिंद महासागर क्षेत्र में अमेरिका के सहयोगी के रूप में भारत की भूमिका अब अमेरिका की प्राथमिकता नहीं होगी। वह आगे कहते हैं कि मोदी 2024 में अमेरपिका दौरे पर आए थे, लेकिन उन्होंने ट्रंप की चुनावी रैली में हिस्सा नहीं लिया। जबकि ट्रंप ने रैली में एलान किया था कि उनके मित्र मोदी आएंगे। साहनी के मुताबिक, ट्रंप व्यक्तिगत अपमान को गंभीरता से लेते हैं।

वह आगे कहते हैं कि ट्रंप जानते हैं कि मोदी विश्व नेता के रूप में अपनी छवि को पेश करने में मदद के लिए अमेरिका के समर्थन पर बहुत अधिक निर्भर हैं। प्रवीण के मुताबिक यह बेहद दुख की बात है कि ट्रंप के इतना करने के बावजूद मोदी ‘व्यक्तिगत संबंध’ की खातिर ट्रंप से मिलने के लिए अमेरिका जाएंगे। वह कहते हैं कि ट्रंप ने जिस तरह से देश का अपमान किया है, कोई भी स्वाभिमानी देश ट्रंप के नखरे और अपमान को सहन नहीं करेगा।

सरकार की चुप्पी और मीडिया का रवैया

इस घटना पर भारत सरकार की चुप्पी और मीडिया की चुप्पी भी सवालों के घेरे में है। जब ऑपरेशन गंगा के तहत यूक्रेन से भारतीय छात्रों को लाया गया था, तब मीडिया ने इसे बड़े जोर-शोर से दिखाया था। लेकिन इस बार जब भारतीय नागरिकों को बेड़ियों में जकड़कर लाया गया, तो मीडिया ने इसे नजरअंदाज कर दिया। क्या यह सरकार की नाकामी को छिपाने की कोशिश थी?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गुजरात से भी कई नागरिक इस विमान में थे। सवाल यह है कि जब गुजरात को विकास का मॉडल बताया जाता है, तो वहां के लोग क्यों अवैध तरीके से अमेरिका जाने की कोशिश कर रहे हैं? क्या यह विकास के दावों पर सवाल नहीं उठाता?

अवैध प्रवासियों के बढ़ते मामले और भारत की चुनौती

यह पहली बार नहीं है जब भारतीय नागरिकों को अवैध प्रवास के आरोप में गिरफ्तार कर वापस भेजा गया है। पिछले कुछ वर्षों में अवैध रूप से अमेरिका और कनाडा जाने की घटनाओं में वृद्धि हुई है।

कनाडा में भी हजारों भारतीय छात्रों के लापता होने की खबरें आई हैं, जिन पर अवैध प्रवास का शक जताया गया है। गुजरात और पंजाब के युवा विशेष रूप से अमेरिका और कनाडा में बसने के लिए अवैध रास्ते अपनाते हैं।

Explainer: Why wouldn’t the third aircraft carrier make despite China’s big challenge? Know More About Government Decisions

Why does India Won’t Build a Second Aircraft Carrier grow?
INS Vikramaditya

Indian Navy Aircraft Carrier: The scheme of operating the three aircraft carrier of the Indian Navy has been dismissed by the Government. Instead, the navy is now preparing to delve its second indigenous aircraft carrier (IAC) as a replacement for INS Vikramaditya. According to reports, the government is not supporting the scheme that the Navy has three aircraft carriers simultaneously. The Indian Navy said that if three aircraft carriers remain available, two of them can always remain active while staying in the dock for a repair or upgrade.

Why does India Won’t Build a Second Aircraft Carrier grow?
INS Vikramaditya

Indian Navy Aircraft Carrier: Changing Strategy and China’s Growing Marine Strength

The decision came in such a time when the reports stated that China is advancing its nuclear-powered aircraft carrier program. China’s fourth aircraft carrier can operate from Nuclear Energy, which can increase its naval strength and more.

The Indian Navy had made the first three aircraft carrier strategy, but now the scheme is changing. Earlier, many navy chiefs spoke of having three aircraft carriers, including former navy chief Admiral Green Kumar.

हालांकि, सरकार का नजरिया इससे अलग रहा है। 2020 से ही सरकार का झुकाव पनडुब्बियों (Submarines) को प्राथमिकता देने की ओर है। पूर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल बिपिन रावत ने भी तीन एयरक्राफ्ट कैरियर की जरूरत पर संदेह जताया था और इन्हें “सिटिंग डक” (आसानी से निशाना बनने वाले) कहकर इनकी उपयोगिता पर सवाल उठाए थे। सरकार को लगता है कि एयरक्राफ्ट कैरियर की तुलना में पनडुब्बियां समुद्री युद्ध में ज्यादा प्रभावी भूमिका निभा सकती हैं, खासकर ऐसे समय में जब चीन एंटी-शिप बैलिस्टिक मिसाइल (ASBM) विकसित कर रहा है, जो बड़े जहाजों को निशाना बनाने में सक्षम हैं।

Indian Navy Aircraft Carrier: INS विक्रमादित्य का भविष्य

पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल हरी कुमार ने INS विक्रांत जैसे दूसरे एयरक्राफ्ट कैरियर के निर्माण का प्रस्ताव दिया था। लेकिन उनके पहले के नौसेना प्रमुखों ने सुझाव दिया था कि नया एयरक्राफ्ट कैरियर बड़ा और अधिक क्षमता वाला होना चाहिए, ताकि ज्यादा फाइटर जेट पार्क हो सकें। उनके अनुसार, CATOBAR (Catapult Assisted Take-Off Barrier Arrested Recovery) टेक्नोलॉजी से लैस एयरक्राफ्ट कैरियर कारगर साबित हो सकता है और युद्ध में अधिक प्रभावी भूमिका निभा सकता है।

Rafale Marine Jets: Why Indian Navy in Tensions on Rafale-M? INS Vikrant and INS Vikramaditya can be operated on these issues!

नौसेना के सूत्रों के मुताबिक, INS विक्रमादित्य, जो रूसी मूल का एक एयरक्राफ्ट कैरियर है, अगले 10-12 वर्षों में रिटायर हो सकता है। ऐसे में नौसेना का मानना है कि नए स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर को INS विक्रमादित्य के रिप्लेसमेंट के तौर पर देखा जाना चाहिए, न कि एक अतिरिक्त एयरक्राफ्ट कैरियर के तौर पर। चूंकि एक नए नए स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर (IAC-2) को बनाने में कम से कम 10-12 साल लगते हैं, इसलिए नौसेना INS विक्रमादित्य के रिप्लेसमेंट की तैयारियां अभी से करना चाहती है।

राजनाथ सिंह ने कही थी ये बात

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने मई 2024 में यह एलान किया था कि भारत जल्द ही अपने तीसरे एयरक्राफ्ट कैरियर का निर्माण शुरू करेगा, जो INS विक्रमादित्य की जगह लेगा। हालांकि, INS विक्रांत की तरह 45,000 टन का यह विमानवाहक पोत कोचीन शिपयार्ड में निर्मित किया जाएगा और इसमें पारंपरिक इंजन (Conventional Propulsion) होगा।

Indian Navy Aircraft Carrier: भारत के पास दो एयरक्राफ्ट कैरियर

भारत फिलहाल दो एयरक्राफ्ट कैरियर ऑपरेट कर रहा है। इनमें पहला INS विक्रमादित्य है, जो 2014 में भारतीय नौसेना में शामिल हुआ। यह रूस से खरीदा गया था और इसमें स्की-जंप टेकऑफ सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता है। जबकि INS विक्रांत 2022 में भारत में बना पहला स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर है। इसे कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड ने बनाया है और यह भी स्की-जंप टेक्नोलॉजी पर आधारित है।

MQ-9B SeaGuardian: Indian Navy got the new American drone, General Atomics after C Guardian crashes

दोनों विमानवाहक पोत करीब 25-30 फिक्स्ड-विंग लड़ाकू विमानों और 10 हेलीकॉप्टरों को ऑपरेट कर सकते हैं। अगर तीसरा विमानवाहक पोत भी इसी साइज का होता है, तो इसकी क्षमता भी समान होगी।

मनोहर पर्रिकर की ये थी प्लानिंग

पूर्व रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर के कार्यकाल में भारत के दूसरे स्वदेशी विमानवाहक पोत (IAC-2) को 65,000 टन वजन और CATOBAR तकनीक के साथ डिजाइन करने की योजना थी। इस एय़रक्राफ्ट कैरियर को न्यूक्लियर एनर्जी से संचालित करने पर विचार किया गया था। साथ ही, योजना थी कि इस पर 54 फाइटर जेट्स पार्क किए जा सकें। इसके अलावा भविष्य में जरुरत पड़ने पर एय़रक्राफ्ट कैरियर को इलेक्ट्रोमैग्नेटिक कैटापल्ट लॉन्च सिस्टम (EMALS) जैसी अत्याधुनिक तकनीक से लैस किया जा सके।

भारत की तीन एयरक्राफ्ट कैरियर की नीति क्यों बदली?

भारत सरकार ने नौसेना को स्पष्ट कर दिया है कि अब एय़रक्राफ्ट कैरियर के बजाय पनडुब्बियों को प्राथमिकता दी जाएगी। इसकी जो प्रमुख वजहें बताई गई हैं, उनके अनुसार एक एय़रक्राफ्ट कैरियर न केवल अपने आप में बहुत महंगा होता है, बल्कि उसके साथ काम करने वाले कैरीयर बैटल ग्रुप (CBG) और लड़ाकू विमानों की लागत भी बहुत अधिक होती है।

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इसके अलावा चीन ने लंबी दूरी की एंटी-शिप बैलिस्टिक मिसाइलें (ASBM) विकसित की हैं, जो विशेष रूप से अमेरिकी विमानवाहक पोतों को निशाना बनाने के लिए डिज़ाइन की गई हैं। अमेरिका के विमानवाहक पोत ज्यादा बड़े और सुरक्षित हैं, फिर भी वे खतरे में हैं। ऐसे में भारत के छोटे और कम प्रोटेक्टेड एय़रक्राफ्ट कैरियर के लिए यह एक गंभीर चुनौती हो सकती है।

सरकार ने 30 वर्षीय सबमरीन कंस्ट्रक्शन प्लान को संशोधित किया है। पहले इसमें 24 पारंपरिक पनडुब्बियों को शामिल किया जाना था, लेकिन अब इसे घटाकर 18 डीजल-इलेक्ट्रिक और 6 परमाणु ऊर्जा संचालित हमलावर पनडुब्बियों (SSN) तक सीमित कर दिया गया है। साथ ही, भारत परमाणु बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी (SSBN) प्रोग्राम को भी आगे बढ़ा रहा है।

चीन का न्यूक्लियर एयरक्राफ्ट कैरियर प्रोजेक्ट

नवंबर 2024 में खबरें आई थीं कि चीन अपने परमाणु-संचालित विमानवाहक पोत कार्यक्रम पर तेज़ी से काम कर रहा है। दक्षिण चीन मॉर्निंग पोस्ट (SCMP) के अनुसार, चीन एक प्रोटोटाइप न्यूक्लियर रिएक्टर विकसित कर रहा है, जिसे भविष्य में अपने एयरक्राफ्ट कैरियर्स में इस्तेमाल किया जा सकता है।

परमाणु-संचालित विमानवाहक पोतों की खासियत यह होती है कि वे लंबे समय तक समुद्र में तैनात रह सकते हैं और उन्हें बार-बार ईंधन भरने की जरूरत नहीं होती। इससे उनकी ऑपरेशनल रेंज भी बढ़ जाती है और वे ज्यादा हथियार और ईंधन ले जा सकते हैं। चीन 2035 तक छह एयरक्राफ्ट कैरियर्स को ऑपरेट करने की योजना बना रहा है।

चीन ने हाल ही में अपना तीसरा विमानवाहक पोत फ़ुजियान (Fujian) लॉन्च किया है, जो इलेक्ट्रोमैग्नेटिक कैटापल्ट सिस्टम (EMALS) से लैस है। यह तकनीक अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर्स में उपयोग होती है, जिससे ज्यादा भारी और बड़े विमान कम रनवे पर उड़ान भर सकते हैं। फ़ुजियान का उत्तराधिकारी टाइप 004 (Type 004) कहा जा रहा है, जो परमाणु-संचालित हो सकता है।

इस खबर पर आपकी क्या राय है? क्या भारत को तीन विमानवाहक पोतों की योजना पर दोबारा विचार करना चाहिए? हमें अपने विचार कमेंट बॉक्स में साझा करें।

AFT On OROP: Ethical Decide of the Armed Forces Tribunal! The Military Officers who take pre-machure retirement also met One Renk One Pension

AFT On OROP: Premature Retirees to Get One Rank One Pension Benefits

AFT On OROP: Armed Forces Tribunal (Armed Forces Tribunal – AFT) has dismissed the policy of the Central Government with the refusal to benefit the ‘One Rank One Pension’ (OROP) scheme to the military officers taking pre-machure retirement (PMR). The tribunal described it a violation of Article 14 and 16 of the Constitution, which guarantees the right of equality and equal opportunity in public employment.

AFT On OROP: Premature Retirees to Get One Rank One Pension Benefits
File Photo

AFT On OROP: Military Officers filed petition

This main bench of the Armed Forces Tribunal included Justice Rajendra Menon and Rear Admiral (Retd) slow wig. The bench ruled on January 31. In this case, many officials from Talsena, Naval and Air Force had filed petitions, who had challenged to be deprived of OROP based on pre-machure retirement.

Prior to the decision of the Armed Forces Tribunal, the officers taking pre-machure retirement were divided into three categories. These were the officers in Categorie A who had taken retirement before July 1, 2014, which was given the benefit of OROP. In Categorie B, he was the officer who took retirement between 1st July 2014 to 7th November 2015. While categorie C had included officers who had taken retirement after 7th November 2015, which were not given the benefit of OROP.

At the same time, the Armed Forces Tribunal ruled in favor of the officers of the Categorie C, which was deprived of the benefit of OROP from the government’s policy.

AFT On OROP: Everything Before 1973 Got OROP

Before 1973, all military personnel were given the same pension based on the same service term and the same rank, which was called ‘One Rank One Pension’ (OROP). But, the Third Pay Commission (3rd Pay Commission) closed it. Subsequently, an inequality occurred in the pension based on the date of retirement, thereby increasing resentment in former troops.

OROP Update: Big updates on One Rank, One Pension Scheme, Army Headquarters paid additional pension and pension deductions

From 1987 to 2000, the OROP was discussed in the 5th and 6th Pay Commission, but there was no concrete action on it. In 2004, the government spoke of implementing it, but denied in 2008, after which the former troops across the country performed massive protests. In 2009 War Waiters returned their medals.

The Government has to set up a 10-member "Koshyari Committee" on the basis of these protests, which recommended to apply OROP in its report in 2011.

Controversy Starting From Cutoff Date

The government made an Alan to implement OROP in 2014 and spoke of applying it from the financial year of 2014-15. But a controversial cutoff date was laid in the policy issued in November 2015, with the provision of the officers taking pre-machure retirement after July 1, 2014 not to benefit OROP.

The government’s decision was opposed, as the judicial commission, constituted in 2015, had no comments on the officials taking pre-machure retirement, outside the OROP.

Armed Forces Tribunals: Be the Supreme Court Bolla- Srinagar, Jammu, Shimla and Dharamshala, the bench of AFT, not to do for the profession on dates long journey

AFT told the cutoff date unconstitutional

The Armed Forces Tribunal said in his decision that it is non-legal to base a cutoff date to give OROP benefits. "It is unconstitutional to differentiate based on the cutoff date in a similar group," said the bench in judgment. It violates the right of equality under Article 14 and 16. The Tribunal also said that the State Government has to adhere to the equality under the Constitution and should not discriminate by making the base on any date. According to the Armed Forces Tribunal, all pre-machure retirement officers under OROP should get the same benefits and the decision of the government is similar to ‘classification n class’, which is against the spirit of the Constitution.

Government has to take a new decision on OROP

The Armed Forces Tribunal directed the government by dismissing the policy of 2015 that the Pre-Matchure Retirement Officers should also benefit the OROP as other authorities. After this decision of the bench, the government now has the option to issue either new guidelines or then appeal to the Supreme Court.

The wave of joy in former soldiers

After the decision of the Armed Forces Tribunal there is a wave of joy in former troops. "This decision is the victory of our struggle," said a former military officer. Those who are retired after 2015 must have similar behaviors even with them. "Therefore, some experts say that the government should now apply it completely transparently by removing all the discrepancies of OROP.

At the same time, after this historical decision of the Armed Forces Tribunal, it has now become the responsibility of the government to include all pre-machure retirement officers under OROP. However, the government may challenge this decision in the Supreme Court, but it would be difficult to overturn this decision based on the Constitution and judicial examples. After this decision, it has also increased the chances that the government can now review OROP and make a permanent policy to give equal pension to all soldiers in the future.