📍नई दिल्ली/चंडीगढ़ | 22 Aug, 2026, 1:12 PM
Thermal Infrared Camouflage System: आधुनिक युद्ध में सिर्फ हथियारों की ताकत ही मायने नहीं रखती, बल्कि दुश्मन की नजरों से बचना भी उतना ही जरूरी होता है। खासकर ऐसे समय में जब थर्मल कैमरे, हीट-सीकिंग मिसाइलें और कामिकाजे ड्रोन किसी भी सैन्य व्हीकल को उसकी गर्मी यानी हीट सिग्नेचर के आधार पर पहचान सकते हैं। इसी चुनौती से निपटने के लिए भारत के वैज्ञानिकों ने एक नई स्वदेशी तकनीक विकसित की है।
चंडीगढ़ स्थित सेंट्रल साइंटिफिक इंस्ट्रूमेंट्स ऑर्गेनाइजेशन (सीएसआईओ) ने एक विशेष थर्मल इंफ्रारेड कैमोफ्लाज सिस्टम (टीआईसीएस) तैयार किया है। यह सिस्टम टैंकों और अन्य आर्मर्ड मिलिट्री व्हीकल्स के थर्मल सिग्नेचर को कम करता है और उन्हें आसपास के वातावरण में घुलने-मिलने में मदद करता है।
Thermal Infrared Camouflage System: क्या होता है थर्मल सिग्नेचर?
किसी भी व्हीकल, टैंक या मिलिट्री प्लेटफॉर्म का इंजन चलते समय गर्मी पैदा करता है। इसके अलावा मोटर, इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम और व्हीकल के अंदर मौजूद चालक दल भी हीट पैदा करते हैं। यही गर्मी थर्मल सिग्नेचर कहलाती है।
आज के युद्धक्षेत्र में दुश्मन के पास ऐसे थर्मल इमेजर और सेंसर मौजूद हैं जो अंधेरे, धुंध या खराब मौसम में भी इस गर्मी को पकड़ सकते हैं। कई आधुनिक एंटी-टैंक मिसाइलें और ड्रोन भी टारगेट की पहचान उसके थर्मल सिग्नेचर के आधार पर करते हैं। (Thermal Infrared Camouflage System)
कैसे काम करता है नया टीआईसीएस सिस्टम?
सीएसआईओ द्वारा विकसित टीआईसीएस एक विशेष फाइबर आधारित और मल्टी-लेयर शील्ड है। इसे ऐसे विशेष फैब्रिक और एब्जॉर्बेंट मैटेरियल से बनाया गया है, जो व्हीकल से निकलने वाली गर्मी को कम या बदल सकता है।
वैज्ञानिकों के अनुसार यह सिस्टम व्हीकल की वास्तविक थर्मल पहचान को छिपा देता है। जब कोई दुश्मन थर्मल इमेजर से व्हीकल को देखता है तो उसे असली टारगेट स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देता। कई बार व्हीकल का थर्मल पैटर्न आसपास के वातावरण जैसा दिखाई देने लगता है।
इस तकनीक का उद्देश्य व्हीकल को केवल छिपाना नहीं बल्कि उसे आसपास की मिट्टी, चट्टानों, वनस्पति और भूभाग के तापमान के साथ मिलाना भी है। (Thermal Infrared Camouflage System)
रेगिस्तान से पहाड़ तक हर इलाके में उपयोगी
भारतीय सेना के टैंक और बख्तरबंद व्हीकल देश के अलग-अलग इलाकों में तैनात हैं। इनमें राजस्थान का रेगिस्तान, पंजाब और जम्मू-कश्मीर के मैदानी क्षेत्र तथा लद्दाख जैसे ऊंचाई वाले बर्फीले इलाके शामिल हैं।
इन सभी क्षेत्रों में तापमान और पर्यावरण की स्थिति अलग होती है। टीआईसीएस को इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह विभिन्न प्रकार के भूभाग, मिट्टी और वनस्पति वाले क्षेत्रों में भी प्रभावी रूप से काम कर सके।
सिस्टम में विजुअल कैमोफ्लाज पैटर्न भी शामिल किए गए हैं, जिससे व्हीकल केवल थर्मल कैमरों से ही नहीं बल्कि सामान्य निगरानी के दौरान भी कम दिखाई दे। (Thermal Infrared Camouflage System)
बिना बैटरी के करता है काम
टीआईसीएस की एक बड़ी खासियत यह है कि यह पूरी तरह पैसिव सिस्टम है। इसका मतलब है कि इसे चलाने के लिए किसी बाहरी बिजली, बैटरी या अतिरिक्त पावर सोर्स की जरूरत नहीं होती।
युद्धक्षेत्र में जहां हर अतिरिक्त उपकरण लॉजिस्टिक चुनौती बढ़ा सकता है, वहां ऐसा सिस्टम काफी उपयोगी माना जाता है। कम वजन होने के कारण इसे तेजी से लगाया और हटाया भी जा सकता है।
इसके अलावा इसका डिजाइन मॉड्यूलर रखा गया है। यदि किसी हिस्से को नुकसान पहुंचता है तो उसे मैदान में ही आसानी से बदला या मरम्मत किया जा सकता है। (Thermal Infrared Camouflage System)
भारतीय सेना के लिए क्यों है अहम?
भारतीय सेना के पास करीब 3,900 मेन बैटल टैंक, लगभग 3,000 इन्फैंट्री कॉम्बैट व्हीकल और बड़ी संख्या में ट्रैक्ड तथा व्हील्ड आर्मर्ड व्हीकल मौजूद हैं।
ये सभी व्हीकल युद्ध के दौरान दुश्मन के प्रमुख टारगेट होते हैं। आधुनिक युद्ध में एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइलें, हीट-सीकिंग हथियार और कामिकाजे ड्रोन तेजी से इस्तेमाल हो रहे हैं। ऐसे में व्हीकलों की पहचान छिपाना उनकी सुरक्षा बढ़ाने का महत्वपूर्ण तरीका माना जाता है। (Thermal Infrared Camouflage System)
सेना के साथ किए गए व्यापक परीक्षण
इस तकनीक को विकसित करने के बाद सीएसआईओ ने भारतीय सेना के साथ मिलकर इसके कई फील्ड ट्रायल किए। अलग-अलग मौसम, भूभाग और ऑपरेशनल हालात में टैंकों तथा थर्मल सेंसर की मदद से सिस्टम का परीक्षण किया गया।
इन परीक्षणों का उद्देश्य यह देखना था कि टीआईसीएस वास्तविक सैन्य परिस्थितियों में कितना प्रभावी है और यह व्हीकल की थर्मल पहचान को किस हद तक कम कर सकता है।
सूत्रों के अनुसार परीक्षणों के दौरान विभिन्न प्रकार के थर्मल सेंसर और निगरानी उपकरणों का उपयोग किया गया ताकि सिस्टम की क्षमता का आकलन किया जा सके। (Thermal Infrared Camouflage System)
अब शुरू होगी उत्पादन की प्रक्रिया
टीआईसीएस के सफल विकास और परीक्षण के बाद सीएसआईओ अब ऐसे औद्योगिक साझेदारों की तलाश कर रहा है जिनके पास इस तकनीक का बड़े पैमाने पर उत्पादन करने की क्षमता हो।
टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के माध्यम से भारतीय उद्योग इस सिस्टम का निर्माण कर सकेगा, जिससे भारतीय सेनाओं की जरूरत को पूरा किया जा सकेगा। यह पहल रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी तकनीक और डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग को भी मजबूती देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। (Thermal Infrared Camouflage System)
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