📍जैसलमेर | 25 Sep, 2026, 8:20 PM
Indian Army Anti-Drone Shield: सीमावर्ती इलाकों में भारतीय सेना अब अपने महत्वपूर्ण सैन्य भवनों को ड्रोन खतरों से बचाने के लिए विशेष सुरक्षा कवच लगाने जा रही है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पश्चिमी सीमा पर बड़ी संख्या में ड्रोन गतिविधियां सामने आने के बाद सेना ने महत्वपूर्ण इमारतों की सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत करने का फैसला किया है। जिसके तहत मौजूदा इमारतों के ऊपर एंटी-ड्रोन स्क्रीन लगाई जाएगी। जिसकी शुरुआत जैसलमेर मिलिट्री स्टेशन से की जा रही है।
सदर्न कमांड के तहत भारतीय सेना की 53 इंजीनियर रेजिमेंट इस प्रोजेक्ट को संभालेगी। करीब 6.34 करोड़ रुपये की इस प्रोजेक्ट के तहत सैन्य परिसरों की छतों को ऐसे मजबूत सुरक्षा ढांचे से कवर किया जाएगा, जो किसी भी संदिग्ध ड्रोन को भवन तक पहुंचने से पहले रोक सके।
Indian Army Anti-Drone Shield: ऑपरेशन सिंदूर के बाद बदला सुरक्षा का नजरिया
7 मई 2025 को भारत ने पहलगाम आतंकी हमले के बाद ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया था। इस अभियान के दौरान भारतीय सेनाओं ने पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया था। इसके बाद पाकिस्तान की तरफ से ड्रोन और अन्य हवाई माध्यमों का उपयोग करने की कोशिशें सामने आईं।
राजस्थान के जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर और श्रीगंगानगर जैसे सीमावर्ती क्षेत्रों में कई संदिग्ध ड्रोन गतिविधियों की रिपोर्ट मिली थी। बीएसएफ राजस्थान फ्रंटियर के सूत्रों के मुताबिक ऑपरेशन सिंदूर के दौरान राजस्थान के चार जिलों में कुल 413 ड्रोन हमलों या घुसपैठ की कोशिशों को भारतीय सुरक्षा बलों ने विफल किया था।
इन घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया कि खतरा केवल सीमा चौकियों या सैन्य ठिकानों तक सीमित नहीं है। अब ड्रोन सीधे भवनों, कमांड सेंटरों, स्टोरेज क्षेत्रों और प्रशासनिक परिसरों तक पहुंचने की क्षमता रखते हैं। (Indian Army Anti-Drone Shield)
तीन लेयर की एंटी-ड्रोन स्क्रीन?
सेना जिस सिक्योरिटी सिस्टम को बनाने जा रही है, वह कोई रडार या इलेक्ट्रॉनिक जैमर नहीं है। यह एक मजबूत फिजिकल सिक्योरिटी इंफ्रास्ट्रक्चर है, जिसे इमारतों के ऊपर बनाया जाएगा।
इस स्ट्रक्चर में स्टील के खंभे, बीम और मजबूत फ्रेम लगाए जाएंगे। इनके ऊपर तीन अलग-अलग परतों वाली स्टील जाली बिछाई जाएगी। पहली लेयर इंटरवोवन स्टील मेश होगी, जबकि दूसरी और तीसरी परत कॉर्कस्क्रू स्टील नेट की होगी।
इन तीनों परतों के बीच उचित दूरी रखी जाएगी ताकि यदि कोई ड्रोन पहली जाली से टकराकर आगे बढ़ने की कोशिश करे तो दूसरी और तीसरी लेयर उसे रोक सकें। सैन्य भाषा में इसे “स्टेज्ड इंटरसेप्शन” कहा जाता है।
इसका उद्देश्य ड्रोन को भवन की छत तक पहुंचने से पहले ही निष्क्रिय करना है। (Indian Army Anti-Drone Shield)
रेगिस्तानी इलाके को ध्यान में रखकर तैयार होगा डिजाइन
जैसलमेर का इलाका अत्यधिक गर्मी, तेज हवाओं और धूल भरी आंधियों के लिए जाना जाता है। इसी वजह से एंटी-ड्रोन स्क्रीन का डिजाइन सामान्य स्ट्रक्चर्स से अलग होगा। पूरे स्ट्रक्चर को उच्च तापमान, तेज हवा और रेत के दबाव को सहने लायक बनाया जाएगा। स्टील पर विशेष एंटी-कोरोजन कोटिंग की जाएगी ताकि जंग न लगे।
इसके अलावा बाहरी हिस्से को ऐसे रंग और फिनिश दी जाएगी, जिससे यह आसपास के रेगिस्तानी वातावरण में आसानी से घुल-मिल जाए। इससे स्ट्रक्चर दूर से कम दिखाई देगी और सैन्य परिसरों की पहचान सीमित रहेगी। (Indian Army Anti-Drone Shield)
ड्रोन क्यों बन गए हैं बड़ी चुनौती?
पिछले कुछ सालों में दुनिया भर के युद्धों ने दिखाया है कि छोटे ड्रोन भी बड़े नुकसान पहुंचा सकते हैं। कम कीमत वाले क्वाडकॉप्टर ड्रोन अब हाई-रिजोल्यूशन कैमरों, जीपीएस सिस्टम और विस्फोटक ले जाने की क्षमता के साथ उपलब्ध हैं। इनका उपयोग निगरानी, खुफिया जानकारी जुटाने, हथियार पहुंचाने और हमले करने तक में किया जा रहा है।
रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया के संघर्ष और दक्षिण एशिया की सुरक्षा चुनौतियों ने यह साबित किया है कि छोटे ड्रोन अब आधुनिक युद्ध का अहम हिस्सा बन चुके हैं।
भारतीय सुरक्षा एजेंसियां भी पिछले कुछ सालों में सीमा पार से आने वाले ड्रोन, हथियारों की तस्करी और निगरानी गतिविधियों के कई मामलों का सामना कर चुकी हैं। (Indian Army Anti-Drone Shield)
पश्चिमी सीमा पर लगातार मिल रहे ड्रोन
रक्षा मंत्रालय और सुरक्षा एजेंसियों के सार्वजनिक आंकड़ों के अनुसार 2025 के दौरान पश्चिमी सीमा पर 863 ड्रोन घुसपैठ की घटनाएं दर्ज की गईं। इनमें से ज्यादातर पंजाब-राजस्थान अंतरराष्ट्रीय सीमा पर थीं।
इनमें से 237 ड्रोन को बरामद या निष्क्रिय किया गया। कई मामलों में ड्रोन का उपयोग नशीले पदार्थ, हथियार और अन्य सामग्री पहुंचाने के लिए किया गया था।
राजस्थान सीमा क्षेत्र में भी कई संदिग्ध ड्रोन बरामद हुए। अगस्त 2025 में जैसलमेर के पास एक चीनी निर्मित ड्रोन मिलने की खबरें सामने आई थीं। (Indian Army Anti-Drone Shield)
निर्माण से पहले होगी तकनीकी जांच
प्रोजेक्ट के तहत केवल जाली लगाना ही नहीं बल्कि पूरा इंजीनियरिंग डिजाइन तैयार करना भी कॉन्ट्रैक्टर की जिम्मेदारी होगी। मिट्टी की जांच, स्ट्रक्चरल डिजाइन, मैटेरियल की सप्लाई, फ्रेम निर्माण, जाल स्थापना और अंतिम परीक्षण का काम एक ही एजेंसी करेगी।
सेना ने यह भी तय किया है कि डिजाइन को किसी आईआईटी या एनआईटी जैसे प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थान से सत्यापित कराया जाएगा ताकि स्ट्रक्चर की मजबूती सुनिश्चित की जा सके। (Indian Army Anti-Drone Shield)
Author
हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।





