Home Blog Page 28

Anjadip ASW: उथले समुद्र में दुश्मन पनडुब्बियों की अब खैर नहीं, भारत में बना तीसरा एंटी-सबमरीन जहाज नौसेना को सौंपा

Anjadip ASW Shallow Water Craft

Anjadip ASW Shallow Water Craft: चेन्नई में 22 दिसंबर को नौसेना को तीसरा एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट सौंपा गया। खास बात यह है कि इसे पूरी तरह भारत में, कोलकाता के गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (जीआरएसई) ने डिजाइन और तैयार किया है। जीआरएसई ने इस साल का अपना पांचवां युद्धपोत नौसेना को सौंपा।

‘अंजदीप’ उन आठ शैलो वॉटर वॉरशिप्स में से तीसरा है, जिसे जीआरएसई भारतीय नौसेना के लिए बना रहा है। इसमें 80 फीसदी से ज्यादा कंपोनेंट्स और सिस्टम्स देश में ही बने हैं।

Anjadip ASW: दुश्मन पनडुब्बियों के लिए बड़ी मुश्किल

एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट खासतौर पर उथले समंदर में दुश्मन की पनडुब्बियों को ढूंढकर खत्म करने के लिए डिजाइन किया गया है। आजकल पाकिस्तान और चीन की सबमरीन गतिविधियां तटीय इलाकों में बढ़ रही हैं। ऐसे में ‘अंजदीप’ जैसे जहाज नौसेना के लिए बेहद जरूरी हो गए हैं।

करीब 77 मीटर लंबा ये जहाज वॉटरजेट सिस्टम से चलता है। इसका वजन लगभग 900 टन, और रफ्तार भी 25 नॉट्स तक पहुंच जाती है। जहाज में तीन वॉटर जेट लगे हैं, तो ये उथले पानी में भी बड़ी आसानी से घूम सकता है और दिशा बदल सकता है। यह भारतीय नौसेना का अब तक का सबसे बड़ा वॉटरजेट वॉरशिप है। इसका डिजाइन भी खास है, यह कम शोर करता है, तो दुश्मन की पनडुब्बियों को इसकी मौजूदगी का पता चलना मुश्किल हो जाता है। (Anjadip ASW)

Anjadip ASW: आधुनिक हथियारों और सेंसर से लैस

‘अंजदीप’ में लेटेस्ट एंटी-सबमरीन हथियार लगे हैं, जिनमें हल्के टॉरपीडो, स्वदेशी रॉकेट और खास शैलो वॉटर सोनार सिस्टम शामिल हैं। यह सोनार समंदर के नीचे छिपी पनडुब्बियों को पहचानने में बहुत मदद करता है।

इतना ही नहीं, ये जहाज सिर्फ पनडुब्बी रोधी मिशनों तक सीमित नहीं है। ‘अंजदीप’ कोस्टल सर्विलांस, माइन बिछाने और दूसरे कई सुरक्षा मिशनों में भी काम आता है। असल में, यह एक मल्टी-रोल प्लेटफॉर्म है, जो शांति हो या संकट, दोनों में अपनी उपयोगिता साबित करेगा। जहाज पर कुल 57 लोग तैनात रहते हैं, जिनमें से 7 अफसर हैं। (Anjadip ASW)

सरकार और प्राइवेट कंपनियों का साझा कमाल

इस प्रोजेक्ट की एक खासियत यह भी है कि इसे पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल पर पूरा किया गया है। जीआरएसई ने तमिलनाडु के कट्टुपल्ली के एलएंडटी शिपयार्ड के साथ मिलकर ये जहाज बनाए हैं। इससे साफ है कि अब भारत में सरकारी और निजी कंपनियां मिलकर बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स भी आसानी से संभाल रही हैं।

इन जहाजों को इंडियन रजिस्टर ऑफ शिपिंग के नियमों के हिसाब से डिजाइन और बनाया गया है। यानी क्वालिटी और सेफ्टी को लेकर कोई समझौता नहीं। (Anjadip ASW)

Anjadip ASW Shallow Water Craft

चार एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट डिलीवर

‘अंजदीप’ भारतीय नौसेना की अर्णाला क्लास का तीसरा जहाज है, जिसे जीआरएसई बना रहा है। इस पूरे प्रोजेक्ट में 16 एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट बनाए जा रहे हैं। इनमें अर्णाला क्लास के आठ शिप जीआरएसई बना रहा है और बाकी माहे क्लास के आठ शिप कोचीन शिपयार्ड बना रहा है। अभी तक चार एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट अर्णाला, अंद्रोथ, अंजदीप और माहे डिलीवर हो चुके हैं। इनमें से तीन पूरी तरह नौसेना में शामिल हो चुके हैं। ‘अंजदीप’ के जनवरी 2026 में कमीशंड होने की उम्मीद है। (Anjadip ASW)

अंजदीप से पहले जीआरएसई ने 2025 में चार युद्धपोत सौंपे थे। इनमें एडवांस्ड गाइडेड मिसाइल फ्रिगेट हिमगिरी, सीरीज के पहले दो एंटी-सबमरीन शेलो वाटर क्राफ्ट और एंड्रॉथ, और सर्वे वेसल (लार्ज) इक्षक शामिल हैं। इन चारों को नौसेना में शामिल किया जा चुका है।

जीआरएसई अभी 12 और युद्धपोत बना रहा है, जिसमें दो पी17ए एडवांस्ड स्टील्थ फ्रिगेट, पांच एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट, एक सर्वे वेसल (बड़ा) और चार नेक्स्ट जेनरेशन ऑफशोर पेट्रोल वेसल शामिल हैं।

पुराने ‘अंजदीप’ की याद में रखा नाम

नए ‘अंजदीप’ का नाम पुराने आईएनएस अंजदीप के नाम पर रखा गया है, जो पेट्या क्लास का कोरवेट था और 2003 में रिटायर हुआ था। ये नाम कर्नाटक के करवार तट के पास के अंजदीप द्वीप से लिया गया है। (Anjadip ASW)

Anjadip ASW Shallow Water Craft

आत्मनिर्भरता की ओर एक और कदम

‘अंजदीप’ की डिलीवरी भारतीय नौसेना के लिए एक और अहम माइलस्टोन है। ऐसे प्लेटफॉर्म सिर्फ विदेशी चीज़ों पर निर्भरता कम नहीं करते, बल्कि देश के युवाओं को काम, नई टेक्निकल स्किल्स और डिफेंस इंडस्ट्री को भी आगे बढ़ाते हैं।

आगे भी भारतीय नौसेना कई और स्वदेशी जहाज अपने बेड़े में शामिल करने वाली है। ‘अंजदीप’ जैसे मॉडर्न शैलो वॉटर क्राफ्ट से भारत की तटीय सुरक्षा और पनडुब्बी रोधी ताकत और मजबूत होगी। (Anjadip ASW)

IOL-SAFRAN Deal: भारत में बनेंगे अब आर्टिलरी और मिसाइलों के हाई-प्रिसिजन सिस्टम, मेक-इन-इंडिया को नई रफ्तार

IOL-SAFRAN Deal

IOL-SAFRAN Deal: भारत में रक्षा उपकरणों का घरेलू उत्पादन बढ़ाने और बाहरी देशों पर से निर्भरता घटाने के लिए इंडिया ऑप्टेल लिमिटेड (आईओएल) ने फ्रांस की सफ्रान इलेक्ट्रॉनिक्स एंड डिफेंस के साथ समझौता किया है। इस साझेदारी के तहत, भारत में दो ऐसे हाई-प्रिसिजन डिफेंस सिस्टम तैयार होंगे। भारतीय सेना इनका इस्तेमाल अपनी आर्टिलरी, एयर डिफेंस और मिसाइल प्लेटफॉर्म्स में करेगी।

22 दिसंबर को आईओएल के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर तुषार त्रिपाठी और साफरान के ग्लोबल डिफेंस बिजनेस यूनिट के प्रमुख अलेक्जांद्र जीगलर ने इस पर दस्तखत किए। डिफेंस प्रोडक्शन सेक्रेटरी संजीव कुमार भी मौके पर मौजूद थे। दरअसल, ये जनवरी 2024 में हुए एमओयू का अगला कदम है जिसके तहत अब सिर्फ तकनीक नहीं, बल्कि प्रोडक्शन का ट्रांसफर भी इसमें शामिल है। (IOL-SAFRAN Deal)

IOL-SAFRAN Deal: सिग्मा 30एन डिजिटल रिंग लेजर जायरो इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम

इस साझेदारी के तहत जो दो सिस्टम भारत में बनने जा रहे हैं, वे भारतीय सेना के लिए काफी अहम हैं। पहला है सिग्मा 30एन डिजिटल रिंग लेजर जायरो इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम। यह बेहद सटीक नेविगेशन सिस्टम है। इसे आर्टिलरी गंस, एयर डिफेंस सिस्टम, मिसाइल और रडार में इस्तेमाल किया जाता है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे जीपीएस की जरूरत नहीं पड़ती। यानी अगर जंग के वक्त दुश्मन ने जीपीएस सिग्नल जाम कर दिया, तब भी ये सिस्टम गन या मिसाइल को एकदम सही दिशा और पोजिशन की जानकारी देता है। (IOL-SAFRAN Deal)

सिग्मा 30एन अभी कई देशों की सेनाओं में इस्तेमाल किया जा रहा है और इसकी विश्वसनीयता भी साबित हो चुकी है। भारत में भी पिनाका जैसे सिस्टम्स में इसी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल हो रहा है।

दूसरा सिस्टम है सीएम3-एमआर डायरेक्ट फायरिंग साइट। यह एक मॉडर्न साइटिंग सिस्टम है, जिसमें डे कैमरा, थर्मल इमेजिंग और लेजर रेंज फाइंडर मिलते हैं। इसका इस्तेमाल आर्टिलरी गनों की डायरेक्ट फायरिंग और एंटी-ड्रोन सिस्टम्स में होता है। ड्रोन से बढ़ते खतरे के दौर में यह सिस्टम और भी जरूरी हो जाता है। यह साइट हल्की है, मजबूत है, और झटकों में भी टारगेट को स्टेबल रखती है यानी फायरिंग के वक्त सटीकता बनी रहती है। (IOL-SAFRAN Deal)

इस पूरी डील में आईओएल का रोल काफी बड़ा है। कंपनी भारत में ही इन दोनों सिस्टम्स का निर्माण, फाइनल असेंबली, टेस्टिंग, क्वालिटी कंट्रोल और लाइफ-साइकिल सपोर्ट देखेगी। अब सेना को इन सिस्टम्स के लिए विदेश के भरोसे नहीं बैठना पड़ेगा।

IOL-SAFRAN Deal: डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम होगा और मजबूत 

आईओएल पहले से ही ऑप्टो-इलेक्ट्रॉनिक्स की फील्ड में काम कर रही है। कंपनी नाइट विजन डिवाइस, साइट्स और दूसरे एडवांस इक्विपमेंट्स बनाती है। अब इसमें साफरान की एडवांस टेक्नोलॉजी जुड़ जाएगी और आईओएल की इंडस्ट्रियल ताकत भी, जिससे भारत का डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम और मजबूत होगा। साथ में देश में रोजगार भी बढ़ेगा और भारतीय कंपनियों को हाई-टेक डिफेंस प्रोडक्शन का तजुर्बा भी मिलेगा। (IOL-SAFRAN Deal)

इस समझौते का स्ट्रैटेजिक इम्पोर्टेंस भी है। आज के दौर में फौज के लिए आर्टिलरी और एयर डिफेंस सिस्टम्स में सटीकता और रफ्तार सबसे जरूरी चीजें हैं। सिग्मा 30एन जैसे नेविगेशन सिस्टम और सीएम3-एमआर जैसी फायरिंग साइट्स भारतीय सेना की ताकत को मजबूती, खासतौर पर जब सीमाओं पर तनाव हो और नई-नई टेक्नोलॉजी की डिमांड लगातार बढ़ती जा रही हो। (IOL-SAFRAN Deal)

IAF IACCS modernisation: ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय वायुसेना का बड़ा कदम, डिफेंस शील्ड अब होगा और ज्यादा घातक

IAF IACCS modernisation

IAF IACCS modernisation: भारतीय वायुसेना इन दिनों अपने एयर डिफेंस सिस्टम को मजबूती देने में जुटी है। एयरफोर्स का इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम, मतलब आईएसीसीएस, अब पहले से कहीं ज्यादा आधुनिक और ताकतवर बन रहा है। हाल ही में ऑपरेशन सिंदूर में यही सिस्टम एयरफोर्स का असली “नर्व सेंटर” था, यहीं से हर पाकिस्तान की हर हरकत पर नजर रखी गई, हर पल की अपडेट मिली।

अभी आईएसीसीएस तीसरे फेज के अपग्रेडेशन और मॉडर्नाइजेशन से गुजर रहा है। इस बार फोकस है – लॉन्ग रेंज खतरों का पता लगाना, नेटवर्क सेंट्रिक वॉरफेयर, और बियॉन्ड विजुअल रेंज (बीवीआर) क्षमता को बढ़ाना। अब दुश्मन सिर्फ आंखों के सामने नहीं, बल्कि काफी दूर से भी ट्रैक और इंटरसेप्ट हो सकता है। (IAF IACCS modernisation)

IAF IACCS modernisation: आईएसीसीएस आखिर है क्या और क्यों इतना जरूरी है?

असल में, आईएसीसीएस वायुसेना का ऐसा डिजिटल नेटवर्क है जो रडार, एयर डिफेंस सिस्टम, फाइटर जेट्स, मिसाइल यूनिट्स और कमांड सेंटर, सभी को एक साथ जोड़ देता है। सीधी बात करें तो, ये सिस्टम आसमान में उड़ती हर चीज की पहचान करता है, तय करता है कि वो खतरा है या नहीं, और अगर है, तो उसे कब, कैसे और किस हथियार से रोका जाए। (IAF IACCS modernisation)

इसकी शुरुआत 1995 में हुई थी, जब पश्चिम बंगाल के पुरुलिया में एक विमान से अवैध हथियार गिराए गए थे। उस घटना ने एयरफोर्स को एहसास कराया कि बिना एक मजबूत रियल-टाइम कमांड सिस्टम के, आसमान में हर हलचल पर नजर रख पाना नामुमकिन है। फिर 2000 के आसपास इसे एयरफोर्स की पावर डॉक्ट्रिन में शामिल किया गया, और 2022 में सिस्टम को और अपडेट किया गया। (IAF IACCS modernisation)

क्या बदल रहा है अब तीसरे फेज में?

इस बार कई बड़े बदलाव हो रहे हैं। नए ऑटोमेटेड थ्रेट इवैल्युएशन मॉड्यूल्स जोड़े जा रहे हैं, जो खुद तय करेंगे कि किस खतरे से सबसे पहले निपटना है। मतलब, अगर एक साथ कई मिसाइलें, ड्रोन या फाइटर जेट्स आते हैं, तो सिस्टम खुद तय करेगा किसे पहले रोकना है।

साथ में, स्टैंडऑफ वेपन लॉन्च डिटेक्शन सिस्टम को भी और मजबूत किया जा रहा है। स्टैंडऑफ अटैक मतलब, दुश्मन काफी दूर से मिसाइल या हथियार दागता है ताकि खुद सुरक्षित रहे। अब आईएसीसीएस ऐसे लॉन्च को काफी पहले पहचान लेगा और उसी के मुताबिक जवाब देगा। (IAF IACCS modernisation)

इस अपग्रेड का सबसे बड़ा मकसद है बियॉन्ड विजुअल रेंज इंटरसेप्शन। अब एयरफोर्स सिर्फ उन टारगेट्स पर निर्भर नहीं रहेगी, जो पायलट को दिखाई दे रहे हों। आज के दौर में मिसाइल और ड्रोन इतनी दूर से आते हैं कि आंखों से उन्हें देखना नामुमकिन है। लेकिन आईएसीसीएस की मदद से दुश्मन को काफी पहले ट्रैक किया जा सकता है।

सूत्रों की मानें तो, नए सिस्टम के बाद एयरफोर्स दुश्मन के लॉन्ग रेंज वेक्टर जैसे क्रूज मिसाइल, ड्रोन स्वॉर्म या स्टैंडऑफ हथियार को ज्यादा इफेक्टिव तरीके से काउंटर कर पाएगी।

IAF IACCS modernisation

ऑपरेशन सिंदूर में आईएसीसीएस की ताकत खुलकर सामने आई थी। डिफेंस ही नहीं, बल्कि ऑफेंसिव ऑपरेशन्स में भी सिस्टम ने कमाल दिखाया। अलग-अलग प्लेटफॉर्म्स से आ रही जानकारी एक जगह एकत्र हुई, कमांडर तक तुरंत पहुंची, और फैसले भी उतने ही तेजी से लिए गए। अब ये सिस्टम और स्मार्ट, और तेज हो जाएगा। (IAF IACCS modernisation)

इस बड़े अपग्रेड के बाद भारत एशिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल हो जाएगा, जिनके पास एआई-एनेबल्ड, मल्टी-डोमेन ऑपरेशंस की ताकत है। चीन, साउथ कोरिया और जापान के बाद भारत ने भी इस फील्ड में जबरदस्त छलांग लगाई है।

सीधे शब्दों में कहें तो, आईएसीसीएस का नया रूप वायुसेना की डिफेंस शील्ड को पहले से कहीं ज्यादा मजबूत बना देगा। बदलती चुनौतियों और लंबी दूरी से आने वाले हमलों के हिसाब से, ये अपग्रेडेशन वायुसेना के लिए बेहद जरूरी है। (IAF IACCS modernisation)

ये फाइटर जेट हैं आईएसीसीएस से कनेक्टेड

आईएसीसीएस यानि इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम इंडियन एयर फोर्स का पूरा ऑटोमेटेड ब्रेन है। लगभग सभी फाइटर जेट्स इस सिस्टम से कनेक्टेड हैं। एसयू-30 एमकेआई पूरी तरह इस सिस्टम से लिंक है। सुपर-30 अपग्रेड के बाद इसकी कनेक्टिविटी और बेहतर हो गई है, जिससे रियल-टाइम डेटा शेयर करना और टारगेट करना काफी आसान हो जाता है। (IAF IACCS modernisation)

एलसीए तेजस एमके-1 औऱ एमके-1ए पूरी तरह इंटीग्रेटेड है। इसे क्रॉस-प्लैटफॉर्म टेस्ट जैसे अस्त्र मिसाइल फायरिंग में भी इस्तेमाल किया जा चुका है। वहीं राफेल भी आईएसीसीएस से जुड़ा है। सॉफ्टवेयर डिफाइंड रेडियो (एसडीआर) के जरिए ये अब नेटवर्क-सेंट्रिक वॉरफेयर का पूरा हिस्सा बन चुका है। मिग-29 यूपीजी में भी अपग्रेड के बाद एसडीआर के जरिए कनेक्टिविटी हो गई है। मिराज-2000 भी इसी तरह आईएसीसीएस के साथ इंटीग्रेटेड है। जैगुआर फाइटर जेट भी, डैरिन-3 अपग्रेड के बाद, इस नेटवर्क का हिस्सा बन चुका है। (IAF IACCS modernisation)

अब अवाक्स और एयर डिफेंस सिस्टम की बात करें तो फाल्कन और नेत्रा जैसे अवाक्स और एईडब्ल्यू एंड सी विमान इस पूरे सिस्टम के कोर हैं। ये आसमान में रहकर दूर-दूर तक नजर रखते हैं और लगातार रियल-टाइम डेटा भेजते रहते हैं। वहीं, जमीन पर तैनात एयर डिफेंस हथियार जैसे एस-400, आकाश, एमआरएसएएम, स्पाइडर और पेचोरा सभी आईएसीसीएस से जुड़े हैं। इनसे जरूरत पड़ने पर ऑटोनॉमस फायरिंग भी कर सकते हैं। (IAF IACCS modernisation)

वहीं, अब ये सिस्टम सिर्फ एयर फोर्स तक सीमित नहीं रहा है। आर्मी का आकाशतीर और नेवी का त्रिगुण सिस्टम भी धीरे-धीरे इसमें शामिल हो रहे हैं। कुछ सिविल रडार्स को भी इसमें जोड़ा गया है, ताकि आसमान में होने वाली किसी भी हलचल का पहले ही पता लगाया जा सके। (IAF IACCS modernisation)

Indian Army 9mm Pistol RFI: भारतीय सेना खरीदेगी एक लाख नई देसी पिस्टल, इस खास एम्बिडेक्स्ट्रस कंट्रोल्स फीचर से होंगी लैस

Indian Army 9mm Pistol RFI

Indian Army 9mm Pistol RFI: सेना अपने हथियारों को लगातार अपडेट कर रही है, और अब पुराने जमाने की पिस्टल्स की जगह देश में बनी नई पिस्टल्स आएंगी। रक्षा मंत्रालय ने इसके लिए रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन (आरएफआई) जारी की है। अभी तक सेना के पास ईशापुर फैक्ट्री में बनी 9 एमएम सेमी-ऑटोमैटिक पिस्टल्स हैं, जो कई सालों से इस्तेमाल हो रही हैं। लेकिन अब सेना को नए, तेज, और ज्यादा भरोसेमंद हथियार चाहिए।

नई पिस्टल्स खासतौर पर क्लोज कॉम्बैट के लिए होंगी। इन्हें पैदल सेना, सपोर्ट यूनिट्स और बाकी फॉर्मेशंस में इस्तेमाल किया जाएगा, जहां हल्की, मजबूत और भरोसेमंद पिस्टल्स की जरूरत पड़ती है। (Indian Army 9mm Pistol RFI)

Indian Army 9mm Pistol RFI: नाइट साइट्स और मॉडर्न टारगेटिंग का हो फीचर

रक्षा मंत्रालय ने आरएफआई में कहा है कि ये पिस्टल्स मैदान, रेगिस्तान और ऊंचे पहाड़ हर जगह बिना किसी दिक्कत के चलें। 18,000 फीट की ऊंचाई पर भी हथियार उतना ही असरदार रहना चाहिए। मौसम चाहे लद्दाख की हड्डियां गला देने वाली ठंड हो या राजस्थान की भीषण गर्मी, पिस्टल हर हाल में साथ निभाए।

सेना चाहती है कि नई पिस्टल्स में नाइट साइट्स और मॉडर्न टारगेटिंग के ऑप्शन भी हों, ताकि जवान अंधेरे में भी सही निशाना लगा सकें। साथ ही, डिजाइन ऐसा हो कि आगे चलकर अपग्रेड या नए फीचर्स जोड़े जा सकें। सेना का फोकस पिस्टल के मॉड्यूलर डिजाइन पर भी है। (Indian Army 9mm Pistol RFI)

वहं, सेना की एक बड़ी एक और जरूरत ये भी है कि ये पिस्टल्स एम्बिडेक्स्ट्रस कंट्रोल्स फीचर के साथ लैस हों। मतलब दाएं या बाएं, किसी भी हाथ से आसानी से चलाया जा सके। इसके अलावा एक्सेसरी रेल भी चाहिए, ताकि लेजर, टॉर्च जैसे गैजेट्स लगाए जा सकें। इसके अलावा जरूरत पड़े तो इनमें सप्रेसर भी लगाने की सुविधा हो, जिससे ऑपरेशन के वक्त आवाज कम हो जाए।

इस बार खरीद का पूरा मौका सिर्फ भारतीय कंपनियों को मिलेगा। मंत्रालय चाहता है कि इनका निर्माण देश में ही हो। अगर किसी खास तकनीक की जरूरत लगे, तो टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के जरिए भी काम यहीं होगा। (Indian Army 9mm Pistol RFI)

Indian Army 9mm Pistol RFI: मिडियम डिफेंस मैन्युफैक्चरर्स को बड़ा मौका

इस फैसले से भारत के छोटे-मोटे और मिडियम डिफेंस मैन्युफैक्चरर्स को बड़ा मौका मिलेगा। डीआरडीओ और सेना पहले से ही 9 एमएम पिस्टल्स के स्वदेशी डिजाइन पर काम कर चुके हैं, कुछ मॉडल्स में थ्रीडी प्रिंटेड पार्ट्स भी लगे हैं। ये हथियार खासकर आतंकवाद और काउंटर-इंसर्जेंसी ऑपरेशन के लिए बनाए गए हैं।

अब सेना इन पिस्टल्स को बड़े पैमाने पर अपनाने जा रही है। इसका मतलब है विदेशी हथियारों पर निर्भरता कम, और अपनी इंडस्ट्री को सीधा फायदा मिलेगा। (Indian Army 9mm Pistol RFI)

CAG Report 2025: डिफेंस सेक्टर में इंडिजिनाइजेशन की रफ्तार धीमी, 30 फीसदी सप्लाई ऑर्डर रद्द, सेना की इमरजेंसी खरीद पर उठे सवाल

CAG Report 2025

CAG Report 2025: भारतीय सेना की इमरजेंसी खरीद को लेकर सीएजी ने जो रिपोर्ट पेश की है, उसमें कई चौंकाने वाली बातें सामने आईं हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, सेना की इमरजेंसी खरीद प्रक्रिया में जितने भी कॉन्ट्रैक्ट्स की जांच की गई, उनमें से ज्यादातर वक्त पर पूरे ही नहीं हुए। सीएजी ने बताया, करीब 72 फीसदी मामलों में सप्लायर्स डेडलाइन तक ऑर्डर की डिलीवरी तक नहीं कर सके। (CAG Report 2025)

ये रिपोर्ट दिसंबर 2025 में संसद में रखी गई थी, जिसमें मार्च 2023 तक के डिफेंस सर्विसेज (आर्मी) से जुड़े समझौतों का ऑडिट हुआ था। इसमें डिफेंस मिनिस्ट्री, आर्मी, मिलिट्री इंजीनियर सर्विसेज, बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइजेशन और डीआरडीओ जैसी एजेंसियों से जुड़े कई मामलों की जांच भी शामिल है।

CAG Report 2025: 72 फीसदी मामलों में ऑर्डर की डिलीवरी है नहीं

गलवान घाटी में चीन के साथ तनाव बढ़ने के बाद, जुलाई 2020 में सेना को कुछ चीजों की तुरंत जरूरत पड़ी। उस वक्त डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल ने इमरजेंसी खरीद की इजाजत दी, ताकि हथियार, उपकरण, गोला-बारूद और जरूरी सिस्टम्स जल्दी खरीदे जा सके। फास्ट ट्रैक प्रोसीजर के तहत कई नियमों में छूट मिली और आर्मी हेडक्वार्टर्स को ज्यादा अधिकार दिए गए, ताकि खरीद में देरी न हो। इसका मकसद था कि सिस्टम्स जल्द से जल्द फौजियों तक पहुंच जाए। (CAG Report 2025)

लेकिन, सीएजी रिपोर्ट बताती है, हकीकत में ऐसा हो नहीं पाया। जिन कॉन्ट्रैक्ट्स की ऑडिट हुई, उनमें से 72 फीसदी मामलों में ऑर्डर वक्त पर डिलीवर नहीं हुआ। जबकि नियम यही थे कि खरीद एक साल के अंदर या टेंडर में जितना वक्त तय किया गया है, उसी में पूरी हो जानी चाहिए। सीएजी ने यह भी नोट किया कि कई बार सेना ने नियमों से बाहर जाकर बदलाव किए, और बाद में उन्हें जैसे-तैसे नियमों में फिट करने की कोशिश की। रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐसे मामलों में मंजूरी सिर्फ आर्मी हेडक्वार्टर्स लेवल पर ही मिलनी चाहिए थी। (CAG Report 2025)

ऑपरेशन सिंदूर के बाद इमरजेंसी खरीद के लिए रक्षा मंत्रालय ने मौजूदा वित्त वर्ष में इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट-6 के तहत करीब 40 हजार करोड़ रुपये रखे थे, ताकि सेना की कमियों को दूर किया जा सके और गोला-बारूद, स्पेयर पार्ट्स वगैरह का स्टॉक बढ़ाया जा सके। इससे पहले इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट-5 में काउंटर इंसर्जेंसी जरूरतों के लिए और इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट-1 से इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट-4 तक की खरीद गलवान के बाद की गई थी। बावजूद इसके, सीएजी ने पाया कि कई प्रोजेक्ट्स पूरे नहीं हो पाए या बहुत देर से पूरे हुए। (CAG Report 2025)

रद्द करने पड़े 30 फीसदी प्रोजेक्ट्स

अब बात करते हैं स्वदेशीकरण की। सीएजी ने ये भी बताया कि देश में बन रहे हथियार और स्पेयर पार्ट्स की जो सप्लाई ऑर्डर दी गई थी, उनमें से लगभग 30 फीसदी प्रोजेक्ट्स बीच में ही रद्द करने पड़े। ये प्रोजेक्ट्स आर्मी के डायरेक्टरेट ऑफ इंडिजिनाइजेशन (डीओआई) के तहत चल रहे थे। बीते पांच साल में इस पर करीब 24.32 करोड़ रुपये खर्च हुए, फिर भी कई सप्लायर्स तय क्वालिटी या टेक्निकल स्टैंडर्ड्स पर सामान नहीं बना पाए। (CAG Report 2025)

डीओआई की स्थापना जनवरी 2010 में इसी मकसद से हुई थी कि जरूरी स्पेयर पार्ट्स देश में ही बनें। लेकिन रिपोर्ट में साफ कहा गया है, इंडिजिनाइजेशन की पूरी प्रक्रिया कई स्तरों पर सुस्त और कमजोर रही। जिन पार्ट्स के लिए ऑर्डर दिए गए, उनमें से लगभग 30 फीसदी ऑर्डर बीच में ही रद्द कर दिए गए। वजह, कई कंपनियों को दिलचस्पी ही नहीं थी, कुछ तकनीकी तौर पर सामान नहीं बना सकीं, और कई बार तो जरूरी कच्चा माल ही नहीं मिला।

सीएजी ने इसे लेकर डीओआई को भी कटघरे में खड़ा किया है। बोला गया, शुरू से ही सप्लायर्स से बेहतर कम्युनिकेशन होना चाहिए था। उन्हें साफ-साफ बताना चाहिए था कि इंडिजिनाइजेशन के लिए क्या-क्या चाहिए। ऊपर से, डीओआई और जुड़ी एजेंसियों में स्टाफ की कमी की वजह से कंपनियों की जांच और ट्रायल सैंपल वगैरह में भी देरी होती रही।

रिपोर्ट में ये भी सामने आया कि जिन स्पेयर पार्ट्स को देश में बनाना कामयाब रहा, उनमें से सिर्फ 43 फीसदी को ही आर्मी के स्टॉक रिकॉर्ड में अपडेट किया गया। बाकी 57 फीसदी मामलों में प्रोक्योरमेंट एजेंसियों को पता ही नहीं था कि ये पार्ट्स अब भारत में बन रहे हैं। कई डिपो तो उन्हीं कंपनियों से खरीद ही नहीं कर रहे थे, जिन्होंने इन पार्ट्स को स्वदेश में ही तैयार कर लिया है।

सीएजी ने सिफारिश की है कि रक्षा मंत्रालय को डीओआई की कार्यशैली की दोबारा समीक्षा करनी चाहिए और इसे मजबूत बनाना होगा, ताकि स्वदेशी स्पेयर पार्ट्स की खरीद में कोई देरी या दिक्कत न आए।

आखिर में, रिपोर्ट के मुताबिक स्वदेशीकरण से जुड़े ऑर्डर रद्द होने की बड़ी वजह सप्लायर्स का ढीला-ढाला रवैया रहा। कहीं दिलचस्पी नहीं दिखाई, कहीं टेक्निकल दिक्कतें आईं, तो कहीं कच्चा माल ही नहीं मिला। इन सब वजहों से इंडिजिनाइजेशन के अलग-अलग स्टेप्स में देरी हुई, और आखिरकार सेना को जिन स्पेयर पार्ट्स की देश में बनने की आस थी, वो पूरी नहीं हो पाई।

सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में साफ-साफ कहा है कि रक्षा मंत्रालय और सेना को बजट, खरीद, ट्रेनिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर की कमियों पर अब और ज्यादा ध्यान देना चाहिए। उन्होंने कहा है कि मानव संसाधन, ट्रेनिंग और फाइनेंस मैनेजमेंट में सुधार जरूरी है, वरना आगे फिर देरी होगी।  (CAG Report 2025)

CAG Report: 10 हजार करोड़ रुपये खर्च, फिर भी सेना को एनसीसी और सैनिक स्कूलों से नहीं मिल रहे अफसर? कैग रिपोर्ट ने खोली पोल

CAG Report

CAG Report: नेशनल कैडेट कोर (NCC) और सैनिक स्कूलों को हमेशा से भारतीय सेना के लिए अफसर तैयार करने की नर्सरी कहा गया है। लेकिन अब इन दोनों की असलियत पर सवाल उठ रहे हैं। हाल ही में संसद में पेश हुई कैग (CAG) की रिपोर्ट ने साफ कर दिया कि जितनी उम्मीद थी, उतने अफसर इन संस्थानों से सेना को नहीं मिल रहे हैं।

CAG Report: आंकड़े चौंकाने वाले हैं

कैग कहता है, एनसीसी और सैनिक स्कूलों में छात्रों की भीड़ है, फिर भी इनसे सेना के लिए अफसर बनने वालों की संख्या काफी कम है। मार्च 2023 तक रिपोर्ट में यही तस्वीर सामने आई कि उम्मीदवार आते तो हैं, लेकिन उनमें से बहुत कम का चयन हो पाता है।

CAG Report: पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत की हालत खराब

सीएजी की रिपोर्ट के मुताबिक खासकर पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत में स्थिति और भी खराब है। रिपोर्ट में साफ बताया गया कि इन इलाकों से सेना को अपेक्षा के मुकाबले काफी कम अधिकारी मिल पा रहे हैं। सीएजी ने इस पर भी चिंता जताई है और सिफारिश की है कि यहां व्यवस्था और संसाधनों में तुरंत सुधार होना चाहिए। (CAG Report)

10 हजार करोड़ रुपये खर्च, फिर भी नतीजा ढाक के तीन पात

सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में इन सस्थानों को मिलने वाली फंडिंग को लेकर भी चिंता जताई है। सीएजी का कहना है कि पिछले पांच साल में एनसीसी और सैनिक स्कूलों पर पूरे 10,043.66 करोड़ रुपये खर्च हुए। फिर भी, नतीजे कुछ खास नहीं निकले। रिपोर्ट कहती है कि इतना पैसा बहाने के बाद भी ट्रेनिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर और सिलेक्शन सवालों के घेरे में है। (CAG Report)

राज्यों ने बजट देने में भी ढिलाई की

रिपोर्ट में राज्य सरकारों की भूमिका पर भी सवाल उठे हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि कई राज्यों ने के लिए तय बजट के मुताबिक फंड ही नहीं दिया। नतीजा ये हुआ कि पश्चिम बंगाल और सिक्किम में 43 फीसदी से ज्यादा एनसीसी कैंप रद्द करने पड़े। वहीं, पश्चिम बंगाल, सिक्किम और उत्तर प्रदेश में एनसीसी अधिकारियों और कैडेट्स को मानदेय और भत्ते भी समय पर नहीं मिले। (CAG Report)

CAG Report: स्कॉलरशिप भी छात्रों को नहीं मिली

सीएजी रिपोर्ट में बताया गया है कि सैनिक स्कूलों की हालत भी बहुत अच्छी नहीं है। कई राज्यों ने रेगुलर फंडिंग नहीं की, जिससे स्कूलों के इंफ्रास्ट्रक्चर, स्टाफ की पेंशन और रिटायरमेंट बेनिफिट्स पर असर पड़ा। स्कॉलरशिप की रकम भी हर राज्य में अलग-अलग है, और यहां तक कि कुछ राज्यों ने तो अपने बच्चों को दूसरे राज्यों में पढ़ने पर स्कॉलरशिप तक नहीं दी। (CAG Report)

ट्रेनिंग की जगह और सुविधाएं भी कम

यहां तक कि ट्रेनिंग और रहने की सुविधाएं भी काफी कम हैं। 21 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में एनसीसी के लिए स्थायी ट्रेनिंग एरिया ही नहीं है। इसकी वजह से फायरिंग ट्रेनिंग भी प्रभावित हुई। सैनिक स्कूलों में 11 जगहों पर या तो छात्रों के हॉस्टल हैं या फिर जर्जर हालत में हैं। 14 स्कूलों में स्टाफ क्वार्टर कम हैं और 7 स्कूलों में स्टाफ का रहना मुश्किल है। (CAG Report)

सेना में अफसर बनने का रास्ता तो एनसीसी और सैनिक स्कूलों से ही जाता है, चाहे वो स्पेशल एंट्री स्कीम हो या एनडीए। लेकिन, कमजोर इंफ्रास्ट्रक्चर, फंड की कमी और ट्रेनिंग की दिक्कतों के चलते फौज में जाने का छात्रों का सपना टूट रहा है। ये रिपोर्ट ऐसे वक्त आई है जब सेना को लगातार युवा और ट्रेंड अफसरों की जरूरत है। (CAG Report)

क्या है एनसीसी स्पेशल एंट्री स्कीम

एनसीसी कैडेट्स के लिए भारतीय सेना में सीधी भर्ती का रास्ता है एनसीसी स्पेशल एंट्री स्कीम। इसमें बिना लिखित परीक्षा के भी अफसर बना जा सकता है, बस कुछ शर्तें पूरी करनी होती हैं। उम्मीदवार का ग्रेजुएट होना जरूरी है, कम से कम 50% अंक होने चाहिए। एनसीसी की सीनियर डिवीजन या सीनियर विंग में दो से तीन साल की सेवा जरूरी है, और ‘सी’ सर्टिफिकेट में कम से कम ‘बी’ ग्रेड चाहिए। उम्र 19 से 25 साल के बीच हो और उम्मीदवार अविवाहित हो, ये भी जरूरी है। (CAG Report)

Bangladesh unrest: बांग्लादेश में हिंसा के बीच दोनों देशों के सेना प्रमुखों की सीधी बातचीत, मिलिट्री डिप्लोमेसी बनी उम्मीद

Bangladesh unrest

Bangladesh unrest: बांग्लादेश में जारी राजनीतिक उथल-पुथल और हिंसक घटनाओं के बीच बांग्लादेश के सेना प्रमुख जनरल वाकर-उज-जमान ने भारतीय सेना प्रमुख को भरोसा दिलाया है कि बांग्लादेश में मौजूद भारत से जुड़े सभी ठिकाने, संस्थान और राजनयिक प्रतिष्ठान पूरी तरह सुरक्षित हैं। यह बातचीत उस समय हुई है, जब पूरे बांग्लादेश में भारत विरोधी हिंसक प्रदर्शन जारी हैं।

सूत्रों के अनुसार, भारत और बांग्लादेश के सेना प्रमुख लगातार सीधे संपर्क में हैं और जमीनी हालात पर नजर रखे हुए हैं। दोनों देशों की सेनाओं के बीच यह संवाद इस बात का संकेत है कि हालात चाहे जितने तनावपूर्ण हों, सुरक्षा और स्थिरता को लेकर मिलिट्री स्तर पर समन्वय लगातार बना हुआ है।

Bangladesh unrest: हादी की मौत के बाद भड़की हिंसा

बांग्लादेश में हालिया हिंसा की शुरुआत छात्र नेता और कट्टरपंथी विचारों के लिए जाने जाने वाले शरिफ उस्मान हादी की मौत के बाद हुई। हादी को एक सप्ताह पहले ढाका में नकाबपोश हमलावरों ने गोली मारी थी। गंभीर रूप से घायल हादी को इलाज के लिए सिंगापुर ले जाया गया, जहां 19 दिसंबर को उसकी मौत हो गई।

हादी की मौत की खबर फैलते ही बांग्लादेश के कई शहरों में गुस्सा भड़क उठा। खुद को उसके समर्थक बताने वाले संगठन सड़कों पर उतर आए। देखते ही देखते प्रदर्शन हिंसक हो गए। कई जगह आगजनी, तोड़फोड़ और सरकारी व गैर-सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने की कई घटनाएं सामने आईं। (Bangladesh unrest)

हिंसा के दौरान बांग्लादेश के दो बड़े मीडिया संस्थानों के दफ्तरों पर हमले किए गए। प्रदर्शनकारियों ने इन मीडिया संस्थानों पर आरोप लगाया कि वे भारत समर्थक हैं। इसके अलावा ढाका में वामपंथी सांस्कृतिक संगठन उदिची शिल्पगोष्ठी के दफ्तर में भी तोड़फोड़ की गई।

इन घटनाओं ने बांग्लादेश में अभिव्यक्ति की आजादी और मीडिया की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। खुद बांग्लादेश के कई वरिष्ठ पत्रकारों ने इसे स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए “अंधकारमय दौर” बताया है।

इन हालात का असर भारत-बांग्लादेश रिश्तों पर भी साफ दिख रहा है। अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के पतन के बाद से ही दोनों देशों के संबंध तनावपूर्ण दौर से गुजर रहे हैं। भारत लगातार बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों, खासकर हिंदू समुदाय पर हो रहे हमलों को लेकर चिंता जताता रहा है। (Bangladesh unrest)

Bangladesh unrest: बांग्लादेश के उच्चायुक्त को किया तलब

हालिया हिंसा के बीच भारत ने नई दिल्ली में बांग्लादेश के उच्चायुक्त को तलब कर औपचारिक विरोध दर्ज कराया। भारत ने साफ कहा कि ढाका स्थित भारतीय उच्चायोग और अन्य सहायक मिशनों की सुरक्षा बांग्लादेश सरकार की जिम्मेदारी है।

इसके जवाब में बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने भी ढाका में भारतीय राजदूत को बुलाकर भारत में रह रहीं पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के बयानों पर आपत्ति जताई। भारत ने स्पष्ट किया कि वह अपनी जमीन का इस्तेमाल किसी पड़ोसी देश के खिलाफ गतिविधियों के लिए नहीं होने देता। (Bangladesh unrest)

सेना प्रमुखों की बातचीत क्यों है अहम

ऐसे तनावपूर्ण माहौल में दोनों देशों के सेना प्रमुखों के बीच सीधी बातचीत को बेहद अहम माना जा रहा है। सुरक्षा सूत्रों के मुताबिक, बांग्लादेश के सेना प्रमुख ने भारत को भरोसा दिलाया है कि हिंसा के बावजूद भारतीय मिशनों, कर्मचारियों और परिसंपत्तियों की सुरक्षा में कोई कमी नहीं आने दी जाएगी।

बांग्लादेशी सेना ने यह भरोसा उस समय जताया है, जब कुछ इलाकों में भारतीय उच्चायोग और सहायक उच्चायोगों के आसपास प्रदर्शन हुए थे। एहतियातन भारत ने कुछ समय के लिए बांग्लादेश में वीजा आवेदन केंद्र भी बंद कर दिए थे। (Bangladesh unrest)

फरवरी में चुनाव को लेकर बढ़ती चिंता

बांग्लादेश में अगले साल 12 फरवरी को आम चुनाव प्रस्तावित हैं। लेकिन मौजूदा हालात ने इन चुनावों को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है। शरिफ उस्मान हादी की हत्या के बाद भड़की हिंसा से कानून-व्यवस्था कमजोर हुई है।

ढाका की सड़कों पर लगातार प्रदर्शन, मीडिया पर हमले और राजनीतिक दलों के बीच बढ़ती तल्खी से यह सवाल उठने लगा है कि क्या चुनाव तय समय पर हो पाएंगे। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी समेत कई दलों ने आशंका जताई है कि मौजूदा हालात चुनाव प्रक्रिया को पटरी से उतार सकते हैं। (Bangladesh unrest)

भारत की नजरें क्यों टिकी हैं बांग्लादेश पर

भारत की पूर्वी सीमा बांग्लादेश से सटी हुई है और वहां की अस्थिरता का असर सीधे पूर्वोत्तर राज्यों और पश्चिम बंगाल पर पड़ सकता है। भारतीय सुरक्षा एजेंसियां इस बात को लेकर भी सतर्क हैं कि बांग्लादेश में बढ़ती अराजकता का फायदा कट्टरपंथी और बाहरी ताकतें उठा सकती हैं। हाल के महीनों में भारत में कई बार यह आशंका जताई गई है कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई बांग्लादेश में माहौल बिगाड़ने की कोशिश कर रही है, ताकि भारत पर पूर्वी मोर्चे से दबाव बनाया जा सके। (Bangladesh unrest)

अंतरिम सरकार पर बढ़ता दबाव

बांग्लादेश की अंतरिम सरकार, जिसकी अगुवाई नोबेल पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस कर रहे हैं, फिलहाल भारी दबाव में है। एक तरफ उसे चुनाव की तैयारी करनी है, तो दूसरी ओर सड़कों पर उतर आए कट्टरपंथी संगठनों से निपटना भी है। सूत्रों का कहना है कि सरकार या तो हालात पर पूरी तरह काबू नहीं कर पा रही है या फिर जानबूझकर नरमी बरत रही है। वहीं सरकार का दावा है कि वह स्थिति को संभालने के लिए जरूरी कदम उठा रही है और हादी की हत्या की निष्पक्ष जांच कराई जाएगी। (Bangladesh unrest)

भारत चाहता है शांति और स्थिरता

भारत ने अब तक आधिकारिक तौर पर यही रुख अपनाया है कि वह बांग्लादेश में शांति, स्थिरता और लोकतांत्रिक प्रक्रिया का समर्थन करता है। भारत का कहना है कि बांग्लादेश के आंतरिक मामलों में दखल देना उसका उद्देश्य नहीं है, लेकिन वहां रहने वाले भारतीयों और भारतीय संस्थानों की सुरक्षा उसकी प्राथमिकता है।

सेना प्रमुखों के बीच हुई बातचीत को इसी कड़ी में देखा जा रहा है। यह संदेश भी दिया गया है कि दोनों देशों के की मिलिट्री डिप्लोमेसी हालात बिगड़ने नहीं देगी और किसी भी आपात स्थिति में यह संबंध बने रहेंगे। (Bangladesh unrest)

Defence Ministry bribery case: डिफेंस डील में घूस का मामला, सीबीआई ने लेफ्टिनेंट कर्नल को किया गिरफ्तार

Defence Ministry bribery case

Defence Ministry bribery case: सीबीआई ने रक्षा मंत्रालय के डिपार्टमेंट ऑफ डिफेंस प्रोडक्शन से जुड़े एक बड़े रिश्वतखोरी मामले का खुलासा किया है। इस मामले में लेफ्टिनेंट कर्नल दीपक कुमार शर्मा को गिरफ्तार किया है। उनके साथ एक अन्य व्यक्ति विनोद कुमार को भी हिरासत में लिया गया है। यह गिरफ्तारी 20 दिसंबर को की गई, जबकि इस मामले में एफआईआर 19 दिसंबर को दर्ज की गई थी।

सीबीआई के अनुसार, लेफ्टिनेंट कर्नल दीपक कुमार शर्मा डिफेंस प्रोडक्शन डिपार्टमेंट में डिप्टी प्लानिंग ऑफिसर (इंटरनेशनल कोऑपरेशन एंड एक्सपोर्ट्स) के पद पर तैनात थे। जांच एजेंसी का आरोप है कि वे लंबे समय से भ्रष्ट और अवैध गतिविधियों में शामिल थे। आरोप है कि उन्होंने डिफेंस प्रोडक्ट बनाने और उनके निर्यात से जुड़ी निजी कंपनियों के साथ मिलकर साजिश रची और बदले में उन्हें अनुचित लाभ पहुंचाया। इसके एवज में उन्होंने कंपनियों से रिश्वत भी ली।

एफआईआर में यह भी उल्लेख है कि इस मामले में लेफ्टिनेंट कर्नल की पत्नी कर्नल काजल बाली का नाम भी सामने आया है, जो राजस्थान के श्रीगंगानगर में 16 इन्फैंट्री डिवीजन ऑर्डनेंस यूनिट की कमांडिंग ऑफिसर हैं। इसके अलावा दुबई स्थित एक कंपनी और उससे जुड़े कुछ लोगों की भूमिका की भी जांच की जा रही है।

सीबीआई का कहना है कि इस कंपनी के भारत में कामकाज की जिम्मेदारी बेंगलुरु में रहने वाले राजीव यादव और रवजीत सिंह संभाल रहे थे। ये दोनों लगातार लेफ्टिनेंट कर्नल शर्मा के संपर्क में थे और सरकारी विभागों से अपने पक्ष में फैसले कराने की कोशिश कर रहे थे। जांच में सामने आया है कि 18 दिसंबर को विनोद कुमार ने इसी कंपनी के कहने पर लेफ्टिनेंट कर्नल शर्मा को तीन लाख रुपये की रिश्वत दी थी।

गिरफ्तारी के बाद सीबीआई ने दिल्ली, श्रीगंगानगर, बेंगलुरु और जम्मू सहित कई जगहों पर छापेमारी की। दिल्ली स्थित आवास से तीन लाख रुपये की रिश्वत में मिली रकम बरामद की गई, जबकि श्रीगंगानगर स्थित घर से करीब बारह लाख रुपये से ज्यादा की नकदी और अन्य आपत्तिजनक सामग्री जब्त की गई। इसके अलावा नई दिल्ली में उनके दफ्तर की तलाशी भी जारी है।

गिरफ्तार दोनों आरोपियों को अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें 23 दिसंबर तक पुलिस हिरासत में भेज दिया गया है। सीबीआई ने साफ किया है कि मामले की जांच अभी जारी है और आगे और भी खुलासे हो सकते हैं।

Indian Army New Bases: बांग्लादेश सीमा पर बढ़ा खतरा, मिजोरम में नया मिलिट्री बेस बना रही भारतीय सेना! दो और लोकेशंस शॉर्ट लिस्ट

Indian Army New Bases
Lt Gen RC Tiwari visited the Company Operating Base of Assam Rifles and BSF under Spear Corps at Parva, Mizoram

Indian Army New Bases: बांग्लादेश की सीमा से सटे इलाकों में बदलते हालात और घुसपैठ के बढ़ते खतरे को देखते हुए भारतीय सेना ने बड़ी तैयारियां शुरू कर दी हैं। बीते कुछ महीनों में सेना ने पश्चिम बंगाल, बिहार और असम में तीन नए सैन्य ठिकाने बनाए हैं। वहीं अब मिजोरम में चौथा मिलिट्री बेस बनाने की तैयारी चल रही है। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है, जब बांग्लादेश में राजनीतिक अस्थिरता, हिंसा और कट्टरपंथी गतिविधियों की खबरें लगातार सामने आ रही हैं।

सेना के सूत्रों के अनुसार, आने वाले सालों में भारत-बांग्लादेश-म्यांमार सीमा से सटे इलाकों में सिक्योरिटी स्ट्रक्चर को पूरी तरह नया रूप दिया जाएगा। सेना की इस रणनीति का मकसद केवल घुसपैठ रोकना नहीं है, बल्कि किसी भी तरह की अस्थिरता या बाहरी खतरे से निपटने की पहले ही तैयारी रखना है।

Indian Army New Bases: मिजोरम में क्यों जरूरी है नया मिलिट्री बेस

भारतीय सेना ने मिजोरम में दो जगहों परवा और सिलसुरी को नए मिलिट्री बेस के लिए शॉर्टलिस्ट किया गया है। ये दोनों इलाके बेहद संवेदनशील माने जाते हैं, क्योंकि यहां भारत, बांग्लादेश और म्यांमार की सीमाएं एक-दूसरे के बेहद सटी हुई हैं।

यह इलाका लंबे समय से तस्करी, अवैध घुसपैठ और उग्रवादी गतिविधियों के लिहाज से चुनौतीपूर्ण रहा है। हाल के सालों में यहां ड्रग्स, हथियार और नकली सामान की तस्करी की घटनाएं भी सामने आती रही हैं। सेना का मानना है कि अगर इस इलाके में स्थायी और मजबूत मिलिट्री स्ट्रक्चर खड़ा किया जाता है, तो सुरक्षा एजेंसियों को कार्रवाई करने में आसानी होगी।

अगले पांच सालों में ये है बड़ा प्लान

सेना की तैयारी केवल एक बेस बनाने तक ही सीमित नहीं है। बल्कि अगले पांच सालों में इस इलाके में बड़े पैमाने पर सिक्योरिटी इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलप किया जाएगा। इसमें दर्जनों आधुनिक बंकर, आर्टिफिशियल एम्बैंकमेंट्स, ब्लास्ट-प्रूफ शेल्टर और भूमिगत हथियार भंडार बनाए जाएंगे।

सूत्रों के मुताबिक, करीब 45 सेट ऐसे स्ट्रक्चर तैयार किए जाएंगे, ताकि जवानों को हर मौसम और हर स्थिति में सुरक्षित ठहरने और ऑपरेशन चलाने की सुविधा मिल सके। इन ठिकानों को इस तरह डिजाइन किया जाएगा कि किसी भी आपात स्थिति में तुरंत जवाबी कार्रवाई की जा सके।

पहले से एक्टिव तीन नए ठिकाने

मिजोरम से पहले भारतीय सेना पश्चिम बंगाल, बिहार और असम में तीन नए ऑपरेशनल बेस पहले ही बना चुकी है। इन इलाकों को खासतौर पर इसलिए चुना गया, क्योंकि यहां से बांग्लादेश की सीमा बेहद करीब है और अतीत में यहां से अवैध गतिविधियों की खबरें आती रही हैं।

इन ठिकानों का मकसद सीमावर्ती इलाकों में स्थायी मौजूदगी बढ़ाना और स्थानीय सुरक्षा बलों के साथ बेहतर तालमेल बनाना है। सेना के अधिकारियों का कहना है कि अब सुरक्षा केवल पेट्रोलिंग तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि रियल-टाइम निगरानी और तुरंत कार्रवाई पर जोर होगा।

परवा में कमांडर का दौरा

इसी रणनीति के तहत हाल ही में भारतीय सेना की पूर्वी कमान के आर्मी कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल आरसी तिवारी ने मिजोरम के परवा इलाके का दौरा किया। उनके साथ कई वरिष्ठ सैन्य अफसर भी मौजूद थे।

इस दौरे के दौरान उन्होंने स्पीयर कॉर्प्स के तहत आने वाले असम राइफल्स और बीएसएफ के कंपनी ऑपरेटिंग बेस का निरीक्षण किया। उन्होंने भारत-बांग्लादेश सीमा पर मौजूदा सुरक्षा हालात की समीक्षा की और जवानों से सीधे बातचीत भी की।

लेफ्टिनेंट जनरल तिवारी ने जवानों की दृढ़ता, धैर्य और उच्च स्तर की ऑपरेशनल तैयारी की खुले तौर पर सराहना की। उन्होंने कहा कि सीमावर्ती इलाकों में तैनात जवान बेहद कठिन परिस्थितियों में काम करते हैं और देश की सुरक्षा में उनकी भूमिका सबसे अहम होती है।

लेफ्टिनेंट जनरल तिवारी ने अपने दौरे के दौरान राज्य प्रशासन और स्थानीय एजेंसियों की भूमिका की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि सेना और सिविल प्रशासन के बीच तालमेल से ही ऐसे बड़े प्रोजेक्ट समय पर पूरे हो पाते हैं।

उन्होंने जवानों को भरोसा दिलाया कि सेना उनकी सुरक्षा, सुविधाओं और संसाधनों को प्राथमिकता दे रही है, ताकि वे पूरी क्षमता के साथ देश की सीमाओं की रक्षा कर सकें।

त्रिपुरा के बेलोनिया का दौरा

इससे पहले लेफ्टिनेंट जनरल आरसी तिवारी ने वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों के साथ दक्षिण त्रिपुरा के बेलोनिया में स्थित सीमा चौकी का दौरा किया था। इस दौरान उन्होंने भारत–बांग्लादेश सीमा पर मौजूदा सुरक्षा स्थिति की समीक्षा की। आर्मी कमांडर ने फारवर्ड इलाकों में तैनात जवानों से बातचीत की और जमीनी हालात की जानकारी ली। उन्होंने भारतीय सेना, असम राइफल्स और बीएसएफ के जवानों की सराहना करते हुए कहा कि सभी बल पूरी तरह सतर्क हैं और उनकी ऑपरेशनल तैयारी उच्च स्तर की है।

असम में नया सैन्य स्टेशन

पूर्वी कमान के तहत असम में भी बड़े स्तर पर सैन्य ढांचा तैयार किया जा रहा है। नवंबर 2025 में लेफ्टिनेंट जनरल तिवारी ने धुबरी में नए लाचित बरफूकन मिलिट्री स्टेशन की आधारशिला रखी थी।

यह स्टेशन ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे स्थित है और इसका रणनीतिक महत्व काफी ज्यादा है। धुबरी न केवल बांग्लादेश की सीमा के करीब है, बल्कि भूटान से भी यह काफी नजदीक है। यह स्टेशन लॉजिस्टिक्स, ट्रेनिंग और प्रशासनिक जरूरतों का बड़ा केंद्र बनेगा।

सेना के अनुसार, यह नया स्टेशन पूर्वोत्तर भारत में मिलिट्री ऑपरेशन को और ज्यादा मजबूत करेगा और जरूरत पड़ने पर तेजी से बलों की तैनाती भी की जा सकेगी।

सेना के इन सभी कदमों के पीछे एक बड़ा वजह सिलीगुड़ी कॉरिडोर भी है, जिसे आमतौर पर “चिकन नेक” कहा जाता है। यह केवल 22 किलोमीटर चौड़ा इलाका है, जो भारत के मुख्य भूभाग को उसके आठ पूर्वोत्तर राज्यों से जोड़ता है।

अगर इस कॉरिडोर के आसपास किसी भी तरह की अस्थिरता पैदा होती है, तो पूरे पूर्वोत्तर भारत की कनेक्टिविटी और सुरक्षा पर असर पड़ सकता है। यही वजह है कि सेना अब इस पूरे क्षेत्र में अपनी मौजूदगी और मजबूत कर रही है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत की यह रणनीति केवल प्रतिक्रिया भर नहीं है, बल्कि एक लंबी अवधि की तैयारी का हिस्सा है। बांग्लादेश में राजनीतिक उथल-पुथल, सीमापार तस्करी और कट्टरपंथी नेटवर्क की सक्रियता को देखते हुए भारत किसी भी तरह का जोखिम नहीं लेना चाहता।

नई मिलिट्री कैंटोनमेंट्स, बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और सीमावर्ती बलों के साथ तालमेल, ये सभी संकेत देते हैं कि भारत अब सीमा सुरक्षा को लेकर और ज्यादा सक्रिय और सतर्क रुख अपना रहा है।

INS Sindhughosh Decommissioned: 40 साल बाद हुई नौसेना के ‘ब्लैक होल’ की विदाई, भारत को मिली थी अंडरवॉटर स्ट्राइक पावर

INS Sindhughosh Decommissioned

INS Sindhughosh Decommissioned: भारतीय नौसेना के इतिहास का एक अहम अध्याय शुक्रवार को समाप्त हो गया। भारतीय नौसेना में ‘ब्लैक होल’ के नाम से मशहूर आईएनएस सिंधुघोष (S55) को औपचारिक रूप से सेवा से मुक्त कर दिया गया। मुंबई के नेवल डॉकयार्ड में सूर्यास्त के समय हुई इस परंपरागत सेरेमनी के साथ ही 40 साल तक समुद्र की गहराइयों में देश की सुरक्षा करने वाली इस पनडुब्बी ने अंतिम सलामी ली। यह वही पनडुब्बी थी, जिसने 1986 से लेकर 2025 तक भारतीय समुद्री सीमाओं की चुपचाप, लेकिन बेहद मजबूत तरीके से सुरक्षा की।

INS Sindhughosh Decommissioned: सिंधुघोष क्लास की लीड सबमरीन

आईएनएस सिंधुघोष उस दौर की पनडुब्बी है, जब भारत ने अंडरवॉटर वॉरफेयर में अपनी पहचान बनानी शुरू की। इसे भारतीय नौसेना की सिंधुघोष क्लास की लीड सबमरीन माना जाता है, जो रूसी किलो-क्लास डिजाइन पर बेस्ड थी। चार दशक की सेवा के दौरान इस पनडुब्बी ने कई अहम मिशन, लंबी पेट्रोलिंग, हथियार परीक्षण और कई अंतरराष्ट्रीय नौसैनिक अभ्यासों में हिस्सा लिया।

19 दिसंबर की शाम जैसे ही सूरज ढलने लगा, नौसेना की पुरानी परंपरा के अनुसार नेवल डॉकयार्ड में डीकमीशनिंग पेनेंट को नीचे उतारा गया। यह वही क्षण होता है, जब किसी युद्धपोत या पनडुब्बी को आधिकारिक रूप से ‘पे-ऑफ’ किया जाता है। इस मौके पर पश्चिमी नौसेना कमान के शीर्ष अधिकारी, पूर्व नौसैनिक अधिकारी, वेटरंस और सिंधुघोष पर सेवा कर चुके कई पुराने क्रू मेंबर्स मौजूद थे।

सेरेमनी के दौरान अधिकारियों ने पनडुब्बी के संग बिताए अहम पलों को याद किया। इन लोगों ने कभी इसी पनडुब्बी के अंदर महीनों तक समुद्र की गहराइयों में ड्यूटी की थी। उनके लिए यह सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि अपने जीवन के एक हिस्से को विदा करने जैसा था।

INS Sindhughosh Decommissioned: 1986 से शुरू हुआ सफर

आईएनएस सिंधुघोष को 30 अप्रैल 1986 को तत्कालीन सोवियत यूनियन के रीगा शिपयार्ड में भारतीय नौसेना में शामिल किया गया था। उस समय भारत अपनी पुरानी फॉक्सट्रॉट क्लास पनडुब्बियों को बदलने की तैयारी कर रहा था और सिंधुघोष क्लास इस दिशा में बड़ी पहल थी। यह पनडुब्बियां डीजल-इलेक्ट्रिक थीं, यानी सतह पर डीजल इंजन और पानी के नीचे बैटरियों से चलती थी।

करीब 72 मीटर लंबी यह पनडुब्बी सतह पर लगभग 2300 टन और पानी के नीचे करीब 3000 टन वजनी थी। यह 300 मीटर तक गहराई में गोता लगा सकती थी और लगभग 45 दिनों तक समुद्र में ऑपरेट कर सकती थी। इसमें करीब 53 नौसैनिकों का दल इस पर तैनात रहता था।

आईएनएस सिंधुघोष को कहते थे ‘ब्लैक होल’

सिंधुघोष क्लास को दुनिया की सबसे शांत पनडुब्बियों में गिना जाता है। नाटो देशों ने इन्हें ‘ब्लैक होल’ तक कहा, क्योंकि इनका नॉइज सिग्नेचर बेहद कम होता है। दुश्मन के सोनार के लिए इन्हें पकड़ना आसान नहीं होता। यही वजह थी कि भारतीय नौसेना के लिए यह पनडुब्बियां अंडरवॉटर स्ट्राइक और सर्विलांस का मजबूत हथियार बनी रहीं।

आईएनएस सिंधुघोष ने कई बार लंबी गश्त के दौरान अपनी स्टेल्थ क्षमता साबित की। बिना शोर किए दुश्मन के इलाके के पास जाकर निगरानी करना और जरूरत पड़ने पर हमले की तैयारी रखना, इसका मुख्य रोल था।

पहली बार क्रूज मिसाइल से लैस

आईएनएस सिंधुघोष की सबसे बड़ी खासियतों में से एक यह थी कि यह भारतीय नौसेना की पहली पनडुब्बी बनी, जिसे क्लब-एस क्रूज मिसाइल सिस्टम से लैस किया गया। 2003–04 के मिड-लाइफ रिफिट के दौरान इस पनडुब्बी में यह क्षमता जोड़ी गई। इसके बाद यह न केवल दुश्मन के जहाजों, बल्कि जमीन पर मौजूद टारगेट्स को भी सटीकता से निशाना बना सकती थी।

इस अपग्रेड के बाद सिंधुघोष की स्ट्राइक रेंज और मारक क्षमता में बड़ा इजाफा हुआ। बाद के सालों में क्लब मिसाइलों की टेस्ट फायरिंग और अभ्यासों में भी इस पनडुब्बी की अहम भूमिका रही।

चार दशकों की सेवा में आईएनएस सिंधुघोष ने कई ऑपरेशनल डिप्लॉयमेंट्स पूरे किए। इसने हिंद महासागर क्षेत्र में भारतीय नौसेना की मौजूदगी को मजबूत किया। मल्टीनेशनल एक्सरसाइज में हिस्सा लेकर इसने दूसरी नौसेनाओं के साथ इंटरऑपरेबिलिटी भी दिखाई।

हालांकि आईएनएस सिंधुघोष 2008 में एक मर्चेंट शिप से भी टकरा गई थी, लगभग एक महीने तक सेवा से बाहर रहने के बाद यह फिर वापस लौट आई। 2013 में पास ही खड़ी आईएनएस सिंधुरक्षक में हुए विस्फोट से इसे मामूली नुकसान पहुंचा था, लेकिन यह दोबारा ऑपरेशनल हो गई।

खरीदी थीं 10 सिंधुघोष क्लास पनडुब्बियां

भारत ने कुल 10 सिंधुघोष क्लास पनडुब्बियां खरीदी थीं। ये सभी 1986 से 2000 के बीच नौसेना में शामिल हुईं। पिछले कुछ वर्षों में उम्र पूरी कर चुकी कुछ पनडुब्बियों को धीरे-धीरे सेवा से हटाया जा रहा है। आईएनएस सिंधुध्वज (S56) को 2022 में और आईएनएस सिंधुरक्षक (S63) को पहले ही डीकमीशन किया जा चुका है। अब आईएनएस सिंधुघोष के जाने के बाद इस क्लास की केवल सात पनडुब्बियां ही ऑपरेशनल हैं।

इन पनडुब्बियों ने दशकों तक भारतीय नौसेना की अंडरवॉटर ताकत की रीढ़ का काम किया। इन्हीं के दम पर भारत ने समुद्र के नीचे चुपचाप निगरानी और स्ट्राइक की क्षमता विकसित की।

भारतीय नौसेना का फोकस अब नई पीढ़ी की पनडुब्बियों पर है, जिनमें ज्यादा स्टेल्थ, ज्यादा एंड्योरेंस और आधुनिक हथियार सिस्टम होंगे। स्कॉर्पीन क्लास पनडुब्बियां, आने वाला प्रोजेक्ट-75 (आई) और परमाणु पनडुब्बियां इसी दिशा में कदम हैं।