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मिलिट्री ड्रोन बनाने के लिए कड़े होंगे नियम, चीनी पार्ट्स पर लगेगा पूरा ब्रेक, नया सिक्योरिटी फ्रेमवर्क तैयार

Chinese Parts in Military Drones

Chinese Parts in Military Drones: सेना के लिए बनाए जाने वाले मिलिट्री ड्रोनों में चीनी पार्ट्स के इस्तेमाल को लेकर गंभीर रक्षा मंत्रालय के स्तर पर ऐसा सिक्योर्ड मिलिट्री ड्रोन फ्रेमवर्क तैयार किया गया है, जिसका मकसद भारतीय ड्रोन सिस्टम्स में किसी भी तरह के चीनी मूल के अवैध या अनकंट्रोल्ड कंपोनेंट्स के इस्तेमाल को पूरी तरह रोकना है। यह फ्रेमवर्क अब अंतिम मंजूरी की प्रक्रिया में है और जल्द ही ड्रोन इंडस्ट्री के लिए एक बाइंडिंग डॉक्यूमेंट के तौर पर लागू किया जा सकता है।

यह फ्रेमवर्क भारतीय सेना के आर्मी डिजाइन ब्यूरो (एडीबी) ने तैयार किया है। इसकी जरूरत तब महसूस हुई, जब पिछले कुछ सालों में सामने आया कि कई घरेलू कंपनियां अपने ड्रोन को “मेक इन इंडिया” बताकर बेच रही थीं, लेकिन उनके अंदर इस्तेमाल होने वाला सॉफ्टवेयर, कोड और हार्डवेयर चीनी मूल के थे। यह मामला सीधे तौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ है, क्योंकि ऐसे कंपोनेंट्स में बैकडोर या रिमोट एक्सेस का खतरा रहता है। (Chinese Parts in Military Drones)

Chinese Parts in Military Drones: किस स्टेज पर है मंजूरी प्रक्रिया

सूत्रों के मुताबिक, इस फ्रेमवर्क को डायरेक्टर जनरल (एक्विजिशन) की मंजूरी मिल चुकी है। अब फाइल डिफेंस सेक्रेटरी आरके सिंह के पास है। डिफेंस सेक्रेटरी को इस मुद्दे पर पहले भी प्रेजेंटेशन दिया जा चुका है। उनकी मंजूरी के बाद यह फाइल रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के पास जाएगी, जहां से अंतिम हरी झंडी मिलने की उम्मीद है।

एक बार रक्षा मंत्री की मंजूरी मिलते ही यह फ्रेमवर्क पब्लिक कर दिया जाएगा और सभी ड्रोन मैन्युफैक्चरर्स को इसका पालन करना होगा। यानी जो कंपनी भारतीय सेना, नौसेना या वायु सेना को ड्रोन सप्लाई करना चाहती है, उसे इस नए सिक्योरिटी फ्रेमवर्क के सभी नियम पूरे करने होंगे। (Chinese Parts in Military Drones)

क्यों जरूरी हो गया नया ड्रोन फ्रेमवर्क

पिछले कुछ सालों में ड्रोन युद्ध का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। आज ड्रोन सिर्फ निगरानी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे सर्विलांस, टारगेटिंग, लॉइटरिंग म्यूनिशन, अटैक और लॉजिस्टिक्स जैसे अहम रोल निभा रहे हैं। ऐसे में अगर ड्रोन सिस्टम अनसेफ हुआ, तो वह दुश्मन के लिए हथियार बन सकता है।

2020 में गलवान झड़प के दौरान यह सामने आया था कि कई भारतीय ड्रोन हैक हो गए थे और उनकी फीड दुश्मन तक पहुंचने का खतरा बना था। इसके बाद पश्चिमी और उत्तरी सीमाओं पर भी ड्रोन हैकिंग की घटनाओं की रिपोर्ट आईं। यही वजह है कि ड्रोन आर्किटेक्चर को मजबूत करने की जरूरत और ज्यादा महसूस हुई।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी यह बात साफ हो गई कि ड्रोन सिक्योरिटी सिर्फ टेक्नोलॉजी का मुद्दा नहीं, बल्कि सीधे-सीधे ऑपरेशनल सर्वाइवल से जुड़ा विषय है। (Chinese Parts in Military Drones)

क्या है इस नए फ्रेमवर्क में

यह नया फ्रेमवर्क अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्य ओडब्ल्यूएएसपी 4.0 (ओपन वेब एप्लिकेशन सिक्योरिटी प्रोजेक्ट) स्टैंडर्ड पर आधारित है, लेकिन इसे भारतीय जरूरतों के हिसाब से और ज्यादा सख्त बनाया गया है। इसका मतलब यह है कि अब ड्रोन सिर्फ उड़ने और काम करने भर से पास नहीं होगा, बल्कि उसकी साइबर और हार्डवेयर सिक्योरिटी की भी गहराई से जांच होगी।

फ्रेमवर्क के तहत ड्रोन सिस्टम को 30 से ज्यादा अलग-अलग टेस्ट्स से गुजरना होगा। ये टेस्ट्स सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त लैब्स जैसे एसटीक्यूसी आईटी सर्विसेज, ईटीडीसी बेंगलुरु और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय से जुड़ी अन्य संस्थाओं में किए जाएंगे। (Chinese Parts in Military Drones)

किन चीजों की होगी जांच

नए फ्रेमवर्क के तहत ड्रोन के हर महत्वपूर्ण हिस्से की जांच की जाएगी। इसमें सबसे पहले सॉफ्टवेयर और कोड लेवल पर टेस्ट होंगे, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि ड्रोन किसी अनधिकृत सर्वर या इकाई को डेटा न भेज रहा हो।

इसके अलावा ड्रोन के ऑटोपायलट मॉड्यूल, चिप, सिम्युलेटर, फील्ड प्रोग्रामर, पावर इंटरफेस और ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन की भी गहनता से जांच होगी। खास बात यह है कि ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन के लिए इस्तेमाल होने वाले विंडोज वर्कस्टेशन और स्मार्टफोन तक को टेस्टिंग के दायरे में लाया गया है।

ड्रोन में इस्तेमाल होने वाला अपडेट सिस्टम भी जांच के दायरे में होगा। यानी अब यह देखा जाएगा कि ड्रोन में सॉफ्टवेयर अपडेट कैसे होता है, क्या अपडेट सुरक्षित है और कहीं ऐसा तो नहीं कि किसी डाउनग्रेड अटैक के जरिए सिस्टम को कमजोर किया जा सके। (Chinese Parts in Military Drones)

हार्डवेयर पर भी सख्त नजर

अब तक ड्रोन सुरक्षा चर्चा ज्यादातर सॉफ्टवेयर तक सीमित रहती थी, लेकिन नया फ्रेमवर्क हार्डवेयर को भी उतनी ही अहमियत देता है। हर ड्रोन के बिल ऑफ मटीरियल की जांच होगी। इसका मतलब यह कि कौन-सा पार्ट कहां से आया है, किस देश में बना है और उसकी सप्लाई चेन क्या है, यह सब साफ-साफ बताना होगा।

सूत्रों ने बताया कि कई मामले ऐसे भी सामने आए थे, जिनमें देखा गया था ड्रोन में इस्तेमाल होने वाले पार्ट्स चीन से खरीदे गए, लेकिन कई रूट्स और कई देशों से होकर इन कंपनियों के पास पहुंचे। अब इसकी भी गहनता से जांच होगी और पार्ट्स पर लगी बारीक से बारीक मार्किंग को भी ध्यान से जांचा जाएगा।

सरकार का साफ संदेश है कि इनिमिकल देशों, खासकर चीन से जुड़े कंपोनेंट्स के लिए जीरो टॉलरेंस नीति होगी। अगर किसी ड्रोन में ऐसे कंपोनेंट्स पाए गए, तो उसे सेना में शामिल होने की अनुमति नहीं मिलेगी। (Chinese Parts in Military Drones)

खरीद प्रक्रिया के हर स्टेज में लागू होगा नियम

इस फ्रेमवर्क की सबसे अहम बात यह है कि यह सिर्फ फाइनल डिलीवरी तक सीमित नहीं रहेगा। यह आरएफआई (रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन) से लेकर आरएफपी (रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल) और फिर कॉन्ट्रैक्ट के बाद की पूरी प्रक्रिया पर लागू होगा।

यानी ड्रोन कंपनी को शुरुआत से ही यह साबित करना होगा कि उसका सिस्टम सुरक्षित है। बाद में अगर किसी स्टेज पर गड़बड़ी पाई जाती है, तो कॉन्ट्रैक्ट पर भी असर पड़ सकता है।

हालांकि इस फ्रेमवर्क से ड्रोन इंडस्ट्री में शुरुआती दौर में थोड़ी परेशानी जरूर हो सकती है, क्योंकि अब कंपनियों को ज्यादा टेस्टिंग और डॉक्यूमेंटेशन करना होगा। लेकिन लंबे समय में इसका फायदा उन्हीं कंपनियों को मिलेगा, जो असल में स्वदेशी और सुरक्षित टेक्नोलॉजी पर काम कर रही हैं।

इससे फर्जी “मेक इन इंडिया” के दावे अपने आप बाहर हो जाएंगे और भारतीय ड्रोन इंडस्ट्री की साख मजबूत होगी। साथ ही यह भारत को भविष्य में ड्रोन एक्सपोर्ट के लिए भी ज्यादा भरोसेमंद बनाएगा। (Chinese Parts in Military Drones)

राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए क्यों अहम है यह कदम

आज की जंग सिर्फ बॉर्डर पर नहीं लड़ी जाती। साइबर स्पेस, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और ड्रोन वारफेयर अब उतने ही अहम हो चुके हैं। ऐसे में अगर ड्रोन सिस्टम सुरक्षित नहीं होगा, तो वह दुश्मन के लिए भारत की कमजोरी बन सकता है।

यह नया फ्रेमवर्क इस खतरे को काफी हद तक कम कर देगा। इससे यह सुनिश्चित होगा कि भारतीय सैनिक जिस ड्रोन पर भरोसा कर रहे हैं, वह सिर्फ उड़ने में नहीं, बल्कि डेटा और कंट्रोल के मामले में भी पूरी तरह सुरक्षित है।

वहीं, डिफेंस सेक्रेटरी और रक्षा मंत्री की मंजूरी के बाद यह फ्रेमवर्क आधिकारिक रूप से लागू हो जाएगा। इसके बाद ड्रोन इंडस्ट्री को नए नियमों के मुताबिक खुद को ढालना होगा। कुल मिलाकर, यह फ्रेमवर्क भारत की ड्रोन स्ट्रैटेजी में एक टर्निंग पॉइंट माना जा रहा है। यह कदम भारत को सिर्फ ड्रोन यूजर नहीं, बल्कि सिक्योर और भरोसेमंद ड्रोन पावर बनाने की दिशा में आगे ले जाएगा। (Chinese Parts in Military Drones)

सुखोई-57 स्टील्थ फाइटर पर अभी नहीं हुआ कोई फैसला, HAL को है रूसी रिपोर्ट का इंतजार

Su-57 fighter jet India
Su-57 Stealth Fighter

Su-57 fighter jet India: भारतीय वायु सेना के लिए पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर जेट सु-57 को लेकर कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड यानी एचएएल अभी रूसी टीम की उस रिपोर्ट का इंतजार कर रही है, जिसमें यह बताया जाएगा कि अगर भारत में सु-57 स्टील्थ फाइटर जेट का निर्माण किया जाता है, तो उस पर कुल कितना खर्च आएगा।

सरकारी सूत्रों के मुताबिक, यह रिपोर्ट जनवरी में ही मिलने की उम्मीद है। इसी रिपोर्ट के आधार पर आगे का रास्ता तय होगा। रिपोर्ट में सिर्फ विमान की कीमत ही नहीं, बल्कि उससे जुड़े कई अहम पहलुओं का आकलन किया जाएगा। इसमें एडवांस टेक्नोलॉजी, मैनपावर, इंफ्रास्ट्रक्चर और सप्लाई चेन विकसित करने की लागत भी शामिल होगी। (Su-57 fighter jet India)

Su-57 fighter jet India: सु-57 क्या है और भारत के लिए क्यों अहम है

सु-57 रूस का पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ फाइटर जेट है। इसे सुखोई डिजाइन ब्यूरो ने तैयार किया है। यह विमान स्टील्थ डिजाइन, सुपरक्रूज क्षमता, एडवांस एवियोनिक्स और मॉडर्न हथियारों से लैस माना जाता है। इसका एक्सपोर्ट वर्जन सु-57ई है, जिसे भारत को ऑफर किया गया है।

भारतीय वायु सेना इस समय फाइटर स्क्वाड्रनों की कमी से जूझ रही है। जरूरत करीब 42 स्क्वाड्रन की है, जबकि मौजूदा संख्या 31 ही है। दूसरी तरफ भारत का अपना स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी का फाइटर जेट एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एएमसीए) अभी डेवलपमेंट फेज में है और इसके अगले दशक में ही शामिल होने की उम्मीद है। यानी करीब 8 से 10 साल का एक बड़ा गैप है, जिसे भरना वायु सेना के लिए चुनौती बना हुआ है। (Su-57 fighter jet India)

रूसी टीम की रिपोर्ट का इंतजार

सूत्रों के मुताबिक, सुखोई डिजाइन ब्यूरो समेत रूस की कई रक्षा एजेंसियों की एक टीम ने कुछ महीने पहले एचएएल फैसिलिटीज की स्टडी की थी। शुरुआती रिपोर्ट में बताया गया कि भारत में सु-57 के निर्माण के लिए एचएएल के पास पहले से ही करीब 50 फीसदी इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद है।

यह इसलिए संभव हो पाया है, क्योंकि एचएएल पिछले कई दशकों से सु-30एमकेआई फाइटर जेट का निर्माण कर रही है। दिसंबर 2000 में भारत और रूस के बीच सु-30एमकेआई के लाइसेंस प्रोडक्शन का समझौता हुआ था। इसके बाद से एचएएल इस विमान के निर्माण, रखरखाव और अपग्रेड कर रहा है। (Su-57 fighter jet India)

एचएएल की क्या हैं मौजूदा क्षमताएं

एचएएल की नासिक डिवीजन में सु-30एमकेआई की फाइनल असेंबली लाइन मौजूद है। ओडिशा के कोरापुट में एएल-31एफपी टर्बोफैन इंजन का लाइसेंस प्रोडक्शन और ओवरहॉल होता है। वहीं केरल के कासरगोड स्थित स्ट्रैटेजिक इलेक्ट्रॉनिक्स फैक्ट्री में एवियोनिक्स से जुड़े कई अहम इक्विपमेंट्स बनाए जाते हैं।

इसी वजह से रूसी टीम का मानना है कि अगर सु-57 का निर्माण भारत में होता है, तो एचएएल को बिल्कुल जीरो से शुरुआत नहीं करनी पड़ेगी। हालांकि पांचवीं पीढ़ी का विमान होने के कारण इसमें कई नई टेक्नोलॉजी, खास मटीरियल और स्किल्ड मैनपावर की जरूरत होगी, जिसकी लागत काफी ज्यादा हो सकती है। (Su-57 fighter jet India)

सरकार का रुख अभी साफ नहीं

इस पूरे मामले में सरकार ने अभी तक कोई अंतिम फैसला नहीं लिया है। रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि यह तय नहीं किया गया है कि एएमसीए के आने से पहले भारत किसी विदेशी पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट को खरीदेगा या नहीं।

हाल ही में एक कार्यक्रम के दौरान चीफ ऑफ इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ एयर मार्शल अशुतोष दीक्षित ने कहा था कि भारत के पास अपने पांचवीं पीढ़ी के विमान के आने तक करीब 8 से 10 साल का गैप है। इस गैप को कैसे भरा जाए, इस पर अलग-अलग विकल्पों पर विचार किया जा रहा है। उन्होंने साफ किया कि अभी किसी एक प्लेटफॉर्म का नाम लेना जल्दबाजी होगी। (Su-57 fighter jet India)

सु-57 वर्सेस एफ-35

अगर भारत विदेशी पांचवीं पीढ़ी का फाइटर जेट लेने का फैसला करता है, तो फिलहाल दो बड़े विकल्प सामने हैं। पहला रूसी सु-57ई और दूसरा अमेरिकी एफ-35 स्टील्थ फाइटर जेट। दोनों विमानों को एयरो इंडिया 2025 में बेंगलुरु में दिखाया गया था।

सु-57 की सबसे बड़ी खासियत इसकी कम कीमत है। जानकारों के मुताबिक, इसकी प्रति यूनिट लागत अमेरिकी एफ-35 से काफी कम है। इसके अलावा रूस टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और लोकल प्रोडक्शन के लिए भी तैयार है।

दूसरी ओर एफ-35 एक प्रवून प्लेटफॉर्म है, जिसे कई देश इस्तेमाल कर रहे हैं। लेकिन अमेरिका आमतौर पर सोर्स कोड और कोर टेक्नोलॉजी ट्रांसफर करने में हिचकिचाता है, जो भारत के लिए चिंता की बाात है। (Su-57 fighter jet India)

रूस का AMCA को लेकर ऑफर

अक्टूबर 2025 में रूस के भारत में राजदूत डेनिस अलीपोव ने संकेत दिया था कि मॉस्को, भारत के एएमसीए प्रोग्राम को सपोर्ट करने के लिए तैयार है। इसके तहत सु-57 के लोकल प्रोडक्शन और टेक्नोलॉजी शेयरिंग की बात सामने आई थी।

हालांकि दिसंबर 2025 में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा के दौरान इस मुद्दे पर क्या बातचीत हुई, इस पर कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है। (Su-57 fighter jet India)

पहले भी दोनों साथ रहे हैं FGFA पर साथ

यह पहली बार नहीं है जब भारत और रूस पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट पर साथ आए हों। इससे पहले एफजीएफए प्रोग्राम यानी फिफ्थ जनरेशन फाइटर एयरक्राफ्ट के तहत दोनों देशों ने मिलकर काम करने की कोशिश की थी। लेकिन लागत, टेक्नोलॉजी शेयरिंग और समयसीमा जैसे मुद्दों के चलते 2018 में भारत उस प्रोजेक्ट से बाहर हो गया था।

इसी अनुभव की वजह से इस बार सरकार बेहद सतर्क नजर आ रही है। कोई भी फैसला लेने से पहले लागत, ऑपरेशनल जरूरत और स्वदेशी कार्यक्रम पर असर जैसे सभी पहलुओं को तौला जा रहा है।

फिलहाल सबकी नजर रूसी टीम की आने वाली रिपोर्ट पर टिकी है। यह रिपोर्ट साफ करेगी कि सु-57 का भारत में निर्माण करना आर्थिक और तकनीकी रूप से कितना व्यावहारिक है। इसके बाद ही सरकार और वायु सेना कोई ठोस फैसला ले पाएंगे। (Su-57 fighter jet India)

रक्षा मंत्री बोले- भारत ने गोला-बारूद में हासिल की आत्मनिर्भरता, आर्मेनिया रवाना किए गाइडेड पिनाका रॉकेट्स

Aatmanirbhar Defence Manufacturing
Raksha Mantri Rajnath Singh today Inaugurated the Medium Caliber Ammunition Manufacturing Facility at the Solar Defence & Aerospace Limited in Nagpur, Maharashtra. The facility is a fully automated plant manufacturing 30mm ammunition which is extensively used by the Indian Army and the Indian Navy.

Aatmanirbhar Defence Manufacturing: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का कहना है कि देश को गोला-बारूद यानी एम्युनिशन के मामले में पूरी तरह आत्मनिर्भर बनाना अब सिर्फ एक लक्ष्य नहीं, बल्कि रणनीतिक जरूरत बन चुका है। उन्होंने कहा कि हमारा उद्देश्य है कि जल्द ही डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग में प्राइवेट कंपनियों की हिस्सेदारी 50 फीसदी से ज्यादा हो। इस मौके पर रक्षा मंत्री ने न सिर्फ देश में गोला-बारूद निर्माण को लेकर सरकार की सोच साफ की, बल्कि यह भी दोहराया कि भारत को आने वाले समय में इस क्षेत्र का ग्लोबल प्रोडक्शन हब बनाया जाएगा।

महाराष्ट्र के नागपुर में सोलार डिफेंस एंड एयरोस्पेस लिमिटेड की मीडियम कैलिबर एम्युनिशन मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी का उद्घाटन करने पहुंचे रक्षा मंत्री ने अपने संबोधन में उन दिनों को याद किया जब भारत को गोला-बारूद की कमी का सामना करना पड़ा था और इससे देश की सैन्य तैयारियों पर असर पड़ा था। उन्होंने कहा कि उन्हीं अनुभवों से यह समझ बनी कि अगर देश को सुरक्षित रखना है, तो हथियार और गोला-बारूद के लिए दूसरों पर निर्भर नहीं रहा जा सकता। इसी सोच से आत्मनिर्भर भारत की नींव पड़ी और आज उसका असर जमीन पर साफ दिख रहा है। (Aatmanirbhar Defence Manufacturing)

Aatmanirbhar Defence Manufacturing: पूरी तरह ऑटोमेटेड फैक्ट्री का उद्घाटन

नागपुर में जिस मीडियम कैलिबर एम्युनिशन फैसिलिटी का उद्घाटन हुआ, वह पूरी तरह से ऑटोमेटेड प्लांट है। इस यूनिट में 30 एमएम एम्युनिशन का निर्माण किया जाएगा, जिसका इस्तेमाल भारतीय सेना और भारतीय नौसेना बड़े पैमाने पर करती हैं। यह एम्युनिशन खास तौर पर एयर डिफेंस सिस्टम, नेवल गन्स और कुछ आर्मर्ड प्लेटफॉर्म्स में काम आता है।

रक्षा मंत्री ने फैक्ट्री का निरीक्षण करते हुए कहा कि इस तरह की आधुनिक यूनिट्स यह दिखाती हैं कि भारत अब सिर्फ लाइसेंस पर निर्माण करने वाला देश नहीं रहा, बल्कि क्वालिटी और भरोसेमंद डिफेंस प्रोडक्ट्स खुद बनाने की क्षमता हासिल कर चुका है। उन्होंने इसे निजी क्षेत्र की तकनीकी क्षमता और सरकार की नीति के सही तालमेल का उदाहरण बताया। (Aatmanirbhar Defence Manufacturing)

Aatmanirbhar Defence Manufacturing
Raksha Mantri also visited the Pinaka Rocket manufacturing facility and flagged-off the first tranche of Guided Pinaka rockets to Armenia, marking a big boost to India’s defence exports.

पिनाका रॉकेट्स की पहली खेप आर्मेनिया रवाना

अपने इस दौरे के दौरान रक्षा मंत्री ने आर्मेनिया के लिए रवाना होने वाले गाइडेड पिनाका रॉकेट्स की पहली खेप को खुद हरी झंडी दिखाकर इन रॉकेट्स को फ्लैग ऑफ किया। यह कदम भारत के डिफेंस एक्सपोर्ट की दिशा में एक बड़ा माइलस्टोन माना जा रहा है।

पिनाका मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम पहले ही भारतीय सेना की ताकत बन चुका है। अब इसके गाइडेड वर्जन का निर्यात यह दिखाता है कि भारत की डिफेंस इंडस्ट्री अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी अपनी जगह बना रही है। रक्षा मंत्री ने कहा कि भारत अब सिर्फ हथियार आयात करने वाला देश नहीं है, बल्कि तेजी से निर्यातक बन रहा है। (Aatmanirbhar Defence Manufacturing)

निजी क्षेत्र की भूमिका पर जोर

राजनाथ सिंह ने अपने भाषण में बार-बार निजी क्षेत्र की भूमिका का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि सरकार का लक्ष्य है कि आने वाले समय में डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग में निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी 50 फीसदी या उससे ज्यादा हो। उनके मुताबिक, मौजूदा हालात में रक्षा निर्माण और रिसर्च एंड डेवलपमेंट में निजी कंपनियों की भागीदारी बढ़ाना समय की जरूरत है।

उन्होंने कहा कि निजी कंपनियों ने यह साबित कर दिया है कि वे जटिल टेक्नोलॉजी, बड़े पैमाने का प्रोडक्शन और समय पर डिलीवरी करने में सक्षम हैं। सरकार की कोशिश है कि उन्हें ज्यादा मौके दिए जाएं, ज्यादा जिम्मेदारी सौंपी जाए और नई टेक्नोलॉजी तक उनकी पहुंच आसान बनाई जाए। (Aatmanirbhar Defence Manufacturing)

ऑपरेशन सिंदूर और स्वदेशी हथियारों की भूमिका

रक्षा मंत्री ने ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र करते हुए कहा कि यह ऑपरेशन इस बात का बड़ा उदाहरण है कि आत्मनिर्भरता कितनी जरूरी है। उन्होंने बताया कि इस ऑपरेशन के दौरान निजी क्षेत्र द्वारा बनाए गए कई सिस्टम्स का इस्तेमाल हुआ, जिसने उनकी विश्वसनीयता और क्षमता को साबित किया।

उन्होंने खास तौर पर नागास्त्र ड्रोन का उल्लेख किया, जिसे सोलार ग्रुप ने बनाया है। रक्षा मंत्री ने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान नागास्त्र ड्रोन ने सटीकता के साथ आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया। इससे यह साफ हो गया कि भारतीय निजी कंपनियां अब ऐसे हथियार बना रही हैं जो युद्ध जैसी परिस्थितियों में भी भरोसेमंद साबित हो सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि नागास्त्र के और ज्यादा एडवांस्ड वर्जन पर काम चल रहा है, जो भविष्य में देश की सुरक्षा को और मजबूत करेंगे। (Aatmanirbhar Defence Manufacturing)

काउंटर ड्रोन सिस्टम और नई तकनीक

रक्षा मंत्री ने सोलार कंपनी के बनाए भार्गवास्त्र काउंटर ड्रोन सिस्टम के सफल परीक्षण का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि यह सिस्टम निजी क्षेत्र की तकनीकी क्षमता का शानदार उदाहरण है। आज के दौर में ड्रोन वारफेयर तेजी से बढ़ रहा है और ऐसे में काउंटर ड्रोन टेक्नोलॉजी की अहमियत कई गुना बढ़ गई है।

उनका कहना था कि आधुनिक युद्ध सिर्फ सीमा तक सीमित नहीं रहे हैं। अब ऊर्जा, व्यापार, सप्लाई चेन, टेक्नोलॉजी और सूचना भी संघर्ष के नए क्षेत्र बन चुके हैं। ऐसे में देश को हर स्तर पर तैयार रहना होगा और इसके लिए मजबूत डिफेंस इंडस्ट्रियल बेस जरूरी है।

राजनाथ सिंह ने अपने संबोधन में डिफेंस प्रोडक्शन और एक्सपोर्ट से जुड़े आंकड़े भी साझा किए। उन्होंने बताया कि साल 2014 में जहां भारत का डोमेस्टिक डिफेंस प्रोडक्शन करीब 46,425 करोड़ रुपये था, वहीं आज यह बढ़कर लगभग 1.51 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। इसमें से 33,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का योगदान निजी क्षेत्र का है।

इसी तरह, डिफेंस एक्सपोर्ट जो दस साल पहले 1,000 करोड़ रुपये से भी कम था, अब बढ़कर 24,000 करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। रक्षा मंत्री ने कहा कि यह बदलाव सिर्फ नीतियों का नतीजा नहीं है, बल्कि निजी और सार्वजनिक क्षेत्र की साझेदारी का परिणाम है। (Aatmanirbhar Defence Manufacturing)

पब्लिक और प्राइवेट सेक्टर का अनोखा तालमेल

रक्षा मंत्री ने कहा कि भारत के पास डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग में पब्लिक और प्राइवेट सेक्टर का जो मिश्रण है, वह देश की सबसे बड़ी ताकत है। एक तरफ अनुभवी और मजबूत सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां हैं, तो दूसरी तरफ तेजी से उभरती और इनोवेशन से भरपूर निजी कंपनियां हैं।

उन्होंने कहा कि अब जरूरत इस बात की है कि इस तालमेल को और गहरा किया जाए। दोनों सेक्टर एक-दूसरे की ताकत को समझें, एक-दूसरे की कमी को पूरा करें और देशहित में साथ आगे बढ़ें। सरकार की नीति यही है कि निजी कंपनियों को नई टेक्नोलॉजी, नए मौके और बड़ी जिम्मेदारियां दी जाएं, ताकि वे सार्वजनिक क्षेत्र के साथ कदम से कदम मिलाकर चल सकें। (Aatmanirbhar Defence Manufacturing)

वायु सेना में शामिल हुए गरुड़ कमांडोज, 72 हफ्तों की ट्रेनिंग के बाद मैरून बेरेट्स बने स्पेशल फोर्स ऑपरेटर्स

IAF Garud Special Forces
IAF Garud Special Forces

IAF Garud Special Forces: भारतीय वायु सेना ने 17 जनवरी को अपनी सबसे एलीट यूनिट गरुड़ स्पेशल फोर्सेस के एक नए बैच को आधिकारिक तौर पर सर्विस में शामिल किया। इस मौके पर मैरून बेरेट सेरेमोनियल परेड का आयोजन उत्तर प्रदेश स्थित एयर फोर्स स्टेशन चांदीनगर में मौजूद गरुड़ रेजिमेंटल ट्रेनिंग सेंटर (जीआरटीसी) में किया गया। सर्विस में शामिल में जवान बेहद कठिन और लंबी ट्रेनिंग पूरी करके गरुड़ कमांडो बने हैं।

इस सेरेमनी की समीक्षा असिस्टेंट चीफ ऑफ एयर स्टाफ ऑपरेशंस (एयर डिफेंस) ने मुख्य अतिथि के रूप में की। उन्होंने नए गरुड़ कमांडोज को बधाई दी और कहा कि तेजी से बदलते सुरक्षा हालात में स्पेशल फोर्सेस की भूमिका पहले से कहीं ज्यादा अहम हो गई है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कठिन प्रशिक्षण ही किसी भी कमांडो को असली ऑपरेशनल हालात के लिए तैयार करता है। (IAF Garud Special Forces)

IAF Garud Special Forces: मैरून बेरेट पहनना आसान नहीं

परेड के दौरान सफल ट्रेनीज को मैरून बेरेट, गरुड़ प्रोफिशिएंसी बैज और स्पेशल फोर्सेस टैब्स प्रदान किए गए। यह सम्मान हर किसी को नहीं मिलता। मैरून बेरेट सैन्य दुनिया में एलीट एयरबोर्न और स्पेशल फोर्स ऑपरेटर्स की पहचान मानी जाती है। इसे पाने के लिए जवानों को न सिर्फ शारीरिक बल्कि मानसिक रूप से भी खुद को साबित करना पड़ता है।

इस अवसर पर उन जवानों को ट्रॉफियां भी दी गईं, जिन्होंने ट्रेनिंग के दौरान असाधारण प्रदर्शन किया। वायु सेना ने इसे गरुड़ों के लिए गर्व और उपलब्धि का क्षण बताया और कहा कि यह बेहद कठिन ट्रेनिंग के समापन का प्रतीक है, जो इन जवानों को “यंग स्पेशल फोर्सेस ऑपरेटर्स” में बदल देता है। (IAF Garud Special Forces)

लाइव डेमो में दिखी गरुड़ों की ऑपरेशनल क्षमता

परेड के दौरान गरुड़ कमांडोज ने अपनी क्षमताओं का लाइव प्रदर्शन भी किया। इसमें कॉम्बैट फायरिंग, होस्टेज रेस्क्यू, फायरिंग ड्रिल, असॉल्ट एक्सप्लोसिव्स, ऑब्स्टैकल क्रॉसिंग, वॉल क्लाइंबिंग, स्लिथरिंग, रैपेलिंग और मिलिट्री मार्शल आर्ट्स जैसे स्किल्स शामिल थे। इन डेमो से साफ दिखा कि गरुड़ कमांडोज किसी भी मुश्किल हालात में मिशन को अंजाम देने के लिए पूरी तरह तैयार रहते हैं। (IAF Garud Special Forces)

गरुड़ फोर्स क्या है और क्यों खास है

गरुड़ स्पेशल फोर्स भारतीय वायु सेना की एलीट यूनिट है, जिसकी स्थापना वर्ष 2004 में की गई थी। यह यूनिट वायु सेना की जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाई गई है। गरुड़ कमांडोज का मुख्य काम एयर फोर्स के अहम ठिकानों, रडार सिस्टम, मिसाइल यूनिट्स और एयरबेस की सुरक्षा करना है।

इसके अलावा गरुड़ कमांडोज की बड़ी जिम्मेदारी कॉम्बैट सर्च एंड रेस्क्यू (सीएसएआर) होती है। यानी दुश्मन क्षेत्र में गिरे वायु सेना के पायलटों को सुरक्षित वापस लाना। यह काम बेहद जोखिम भरा होता है और इसके लिए उच्च स्तर की ट्रेनिंग जरूरी होती है।

गरुड़ कमांडोज दुश्मन इलाके में अस्थायी एयरबेस तैयार करने, एयर ट्रैफिक कंट्रोल संभालने, काउंटर टेररिज्म, एंटी हाइजैकिंग, स्पेशल रेकॉनिसेंस और डायरेक्ट एक्शन जैसे मिशनों में भी माहिर होते हैं। जरूरत पड़ने पर ये दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम को निष्क्रिय करने और एयरस्ट्राइक के लिए टारगेट को लेजर से गाइड करने का काम भी करते हैं। (IAF Garud Special Forces)

ऑपरेशन सिंदूर में अहम भूमिका

हाल ही में मई 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान गरुड़ कमांडोज की भूमिका को बेहद अहम रही थी। इस ऑपरेशन के दौरान गरुड़ कमांडोज ने कई हाई रिस्क मिशनों में हिस्सा लिया, जिनमें ड्रोन न्यूट्रलाइजेशन और स्पेशल सपोर्ट ऑपरेशंस शामिल थे।

वायु सेना के मुताबिक, नए शामिल हुए गरुड़ ऑपरेटर्स इस तरह के मिशनों में वायु सेना की क्षमता को और मजबूत करेंगे और आने वाले समय में नई तरह की स्पेशल जिम्मेदारियां संभालने के लिए तैयार रहेंगे। (IAF Garud Special Forces)

गरुड़ बनने की ट्रेनिंग हैं सबसे कठिन

गरुड़ कमांडो बनने की ट्रेनिंग भारतीय स्पेशल फोर्सेस में सबसे कठिन और लंबी मानी जाती है। इसकी अवधि लगभग 72 सप्ताह, यानी लगभग डेढ़ साल होती है। शुरुआत बेसिक एयरमैन ट्रेनिंग से होती है, इसके बाद तीन महीने का प्रोबेशन पीरियड होता है, जहां ड्रॉपआउट रेट काफी ज्यादा रहता है।

ट्रेनिंग के दौरान जवानों को पैरा जंप, जंगल सर्वाइवल, हाई एल्टीट्यूड ऑपरेशन, बर्फीले इलाकों में सर्वाइवल, एडवांस वेपन हैंडलिंग और क्लोज क्वार्टर बैटल की ट्रेनिंग दी जाती है। कई बार इन्हें आर्मी की यूनिट्स, नेशनल सिक्योरिटी गार्ड और अन्य स्पेशल फोर्सेस के साथ अटैच किया जाता है, ताकि रियल ऑपरेशनल अनुभव मिल सके। (IAF Garud Special Forces)

अन्य स्पेशल फोर्सेस से अलग भूमिका

भारतीय सेना की पैरा स्पेशल फोर्सेस, नौसेना की मार्कोस और वायु सेना की गरुड़ फोर्स तीनों की भूमिका अलग-अलग है। जहां पैरा एसएफ जमीन पर डीप स्ट्राइक और स्ट्रैटेजिक मिशन करती है, वहीं मार्कोस समुद्री और अंडरवॉटर ऑपरेशंस में माहिर होती है। गरुड़ कमांडोज का फोकस एयरबेस सुरक्षा, एयर सपोर्टेड स्पेशल ऑपरेशंस और वायु सेना से जुड़े हाई वैल्यू टारगेट्स पर होता है। (IAF Garud Special Forces)

वायु सेना की ताकत में नया इजाफा

वायु सेना का कहना है कि गरुड़ स्पेशल फोर्सेस के इस नए बैच के शामिल होने से उसकी स्पेशल ऑपरेशंस क्षमता और मजबूत हुई है। मौजूदा सुरक्षा हालात, बॉर्डर टेंशन और बदलते युद्ध के तरीकों को देखते हुए गरुड़ कमांडोज आने वाले समय में वायु सेना की सबसे अहम ताकत बने रहेंगे। (IAF Garud Special Forces)

डिफेंस सेक्टर में निवेश का सुनहरा दौर, 2026 में ये टॉप शेयर दिखा रहे हैं सबसे ज्यादा दम

Defence sector stocks 2026

Defence sector stocks 2026: भारत का डिफेंस सेक्टर इस समय एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। कुछ साल पहले तक यह सेक्टर सिर्फ सरकारी नीतियों और सीमित सरकारी कंपनियों तक सिमटा हुआ माना जाता था, लेकिन अब तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। जनवरी 2026 तक आते-आते डिफेंस सेक्टर न सिर्फ प्रोडक्शन के मामले में रिकॉर्ड बना चुका है, बल्कि निवेशकों के लिए भी सबसे ज्यादा चर्चा में रहने वाला सेक्टर बन गया है।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, भारत का डिफेंस प्रोडक्शन अब 1.5 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा पहुंच चुका है। वहीं डिफेंस एक्सपोर्ट भी तेजी से बढ़ रहा है। सरकार का लक्ष्य है कि 2030 तक डिफेंस एक्सपोर्ट को 50,000 करोड़ रुपये तक ले जाया जाए। इस पूरी ग्रोथ के पीछे “मेक इन इंडिया” और “आत्मनिर्भर भारत” जैसी नीतियों की बड़ी भूमिका है। (Defence sector stocks 2026)

Top Defence Stocks 2026: क्यों बढ़ रहा है डिफेंस सेक्टर में भरोसा

पिछले कुछ सालों में भारत की सुरक्षा जरूरतें बदली हैं। सीमाओं पर तनाव, समुद्री सुरक्षा, एयर डिफेंस और नई टेक्नोलॉजी की जरूरत ने सरकार को मजबूर किया कि वह विदेशी खरीद पर निर्भरता कम करे। इसका सीधा फायदा भारतीय कंपनियों को मिला। आज भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना अपनी जरूरतों का बड़ा हिस्सा देसी कंपनियों से खरीद रही हैं।

बजट 2025 में सरकार ने डिफेंस के लिए 6.8 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का आवंटन किया था। बाजार के जानकारों का मानना है कि बजट 2026 में यह आंकड़ा और बढ़ सकता है। यही वजह है कि निवेशक अब डिफेंस सेक्टर को लॉन्ग टर्म ग्रोथ स्टोरी के तौर पर देख रहे हैं। (Defence sector stocks 2026)

Top Defence Stocks 2026: एचएएल है सबसे मजबूत सरकारी खिलाड़ी

हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड इस सेक्टर की सबसे बड़ी और भरोसेमंद कंपनी मानी जाती है। यह कंपनी फाइटर एयरक्राफ्ट, हेलीकॉप्टर और इंजन निर्माण में भारत की रीढ़ है। तेजस फाइटर जेट, सुखोई अपग्रेड और कई हेलीकॉप्टर प्रोजेक्ट्स एचएएल के पास हैं।

एचएएल की सबसे बड़ी ताकत उसका जबरदस्त ऑर्डर बुक है, जो 2.3 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा बताया जा रहा है। इसका मतलब है कि आने वाले कई सालों तक कंपनी के पास काम की कमी नहीं है। यही वजह है कि बाजार इसे एक स्टेबल और लॉन्ग टर्म ग्रोथ शेयर मानता है। (Defence sector stocks 2026)

भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड है डिफेंस इलेक्ट्रॉनिक्स का किंग

भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड, यानी बीईएल आज डिफेंस इलेक्ट्रॉनिक्स में सबसे आगे है। रडार सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर, कम्युनिकेशन सिस्टम और ड्रोन टेक्नोलॉजी में बीईएल की मजबूत पकड़ है। सेना के लगभग हर बड़े प्लेटफॉर्म में किसी न किसी रूप में बीईएल का सिस्टम लगा होता है।

बीईएल की ऑर्डर बुक करीब 74,000 करोड़ रुपये से ज्यादा की बताई जा रही है। खास बात यह है कि बीईएल की एक्जीक्यूशन क्षमता काफी मजबूत मानी जाती है। यही कारण है कि कई ब्रोकरेज हाउस इसे “एक्जीक्यूशन स्टार” कह रहे हैं। एक्सपोर्ट के मोर्चे पर भी बीईएल धीरे-धीरे अपनी मौजूदगी बढ़ा रहा है। (Defence sector stocks 2026)

भारत डायनामिक्स लिमिटेड: मिसाइल कारोबार का मजबूत नाम

भारत डायनामिक्स लिमिटेड, यानी बीडीएल मिसाइल निर्माण में एक बड़ा नाम है। आकाश, अस्त्र और अन्य मिसाइल सिस्टम्स के निर्माण में बीडीएल की अहम भूमिका है। आज के ज्योपॉलिटिकल माहौल में मिसाइल सिस्टम्स की मांग लगातार बनी रहने वाली है।

बीडीएल की ऑर्डर बुक 23,000 करोड़ रुपये से ज्यादा बताई जाती है। हालांकि, जानकार यह भी कहते हैं कि बीडीएल की ग्रोथ काफी हद तक समय पर डिलीवरी और एक्जीक्यूशन पर निर्भर करती है। इसके बावजूद यह शेयर हाई ग्रोथ कैटेगरी में गिना जाता है। (Defence sector stocks 2026)

मझगांव डॉक और डीआरएसई: नौसेना की बैक बोन

भारतीय नौसेना के विस्तार का सीधा फायदा शिपबिल्डिंग कंपनियों को मिल रहा है। मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड पनडुब्बी, डिस्ट्रॉयर और बड़े वॉरशिप बनाने में माहिर है। इसका ऑर्डर बुक करीब 27,000 करोड़ रुपये का बताया जा रहा है।

वहीं गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स, यानी जीआरएसई, कोरवेट और पेट्रोल वेसल बनाने में आगे है। जीआरएसई की पहचान तेज एक्जीक्यूशन मानी जाती है। मिड-कैप निवेशकों के लिए यह शेयर खासा आकर्षक बना हुआ है। (Defence sector stocks 2026)

प्राइवेट डिफेंस कंपनियों में कहां है ज्यादा रिस्क और रिवॉर्ड

सरकारी कंपनियों के अलावा प्राइवेट डिफेंस कंपनियां भी तेजी से उभर रही हैं। सोलर इंडस्ट्रीज अम्युनिशन और एक्सप्लोसिव्स में बड़ा नाम बन चुकी है। डेटा पैटर्न्स एवियोनिक्स और रडार इलेक्ट्रॉनिक्स में खास पकड़ रखती है।

पारस डिफेंस और एमटीएआर टेक्नोलॉजीज जैसे शेयरों में उतार-चढ़ाव ज्यादा रहता है, लेकिन जानकारों के मुताबिक इनमें दो से तीन गुना रिटर्न की संभावना भी ज्यादा होती है। जेन टेक्नोलॉजीज सिमुलेटर और ड्रोन सिस्टम्स में काम कर रही है, जो भविष्य की जरूरत मानी जा रही है। (Defence sector stocks 2026)

क्या है एक्जीक्यूशन अल्फा?

नुवामा इंस्टिट्यूशनल इक्विटीज की जनवरी 2026 में आई लेटेस्ट डिफेंस सेक्टर रिपोर्ट कहती है कि डिफेंस सेक्टर अब एक नए दौर में प्रवेश कर चुका है। पहले जिस तरह सिर्फ ऑर्डर मिलने पर शेयर तेजी से भागते थे, वह दौर अब खत्म हो रहा है। अब असली कमाई और ग्रोथ उसी कंपनी को मिलेगी, जो समय पर डिलीवरी कर पाएगी और ऑर्डर को सही तरीके से एक्जीक्यूट करके मुनाफे में बदल पाएगी। नुवामा ने इस नए दौर को “एक्जीक्यूशन अल्फा” नाम दिया है। (Defence sector stocks 2026)

ट्रांजिशन फेज में है डिफेंस सेक्टर

रिपोर्ट के मुताबिक डिफेंस सेक्टर इस समय ट्रांजिशन फेज में है। पिछले तीन सालों में भारत सरकार ने करीब 9 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के डिफेंस प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी है। इससे ऑर्डर बुक तो भर गई, लेकिन अब अगली चुनौती इन ऑर्डर्स को जमीन पर उतारने की है। इसी वजह से अब सभी डिफेंस शेयर एक साथ नहीं चलेंगे। जो कंपनियां समय पर डिलीवरी करेंगी, लागत को कंट्रोल में रखेंगी और प्रॉफिट दिखा पाएंगी, वही बाजार से बेहतर रिटर्न देंगी। (Defence sector stocks 2026)

छोटी कंपनियों को होगा फायदा

नुवामा का मानना है कि आने वाले समय में डिफेंस इलेक्ट्रॉनिक्स और सब-सिस्टम बनाने वाली कंपनियां ज्यादा फायदेमंद साबित हो सकती हैं। इसकी वजह यह है कि इन कंपनियों का एक्जीक्यूशन साइकल छोटा होता है, यानी ऑर्डर मिलने से डिलीवरी तक का समय कम लगता है। इसके अलावा इनका लोकल कंटेंट ज्यादा होता है, मार्जिन बेहतर रहता है और वर्किंग कैपिटल मैनेजमेंट भी ज्यादा अनुशासित होता है। इसके उलट बड़े इंटीग्रेटर्स, जैसे एयरक्राफ्ट या मिसाइल बनाने वाली कंपनियों में प्रोजेक्ट साइकल लंबे होते हैं, जिससे रिस्क भी ज्यादा रहता है। (Defence sector stocks 2026)

कुछ कंपनियों को बताया “एक्जीक्यूशन स्टार”

इसी सोच के आधार पर नुवामा ने कुछ कंपनियों को “एक्जीक्यूशन स्टार” बताया है। इसमें सबसे ऊपर नाम है भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बीईएल) का। नुवामा का कहना है कि बीईएल की सबसे बड़ी ताकत उसकी मजबूत एक्जीक्यूशन क्षमता है। कंपनी का लोकलाइजेशन लेवल ऊंचा है और वर्किंग कैपिटल भी अच्छी तरह मैनेज किया जा रहा है। करीब 74,000 करोड़ रुपये से ज्यादा की ऑर्डर बुक के साथ नुवामा को उम्मीद है कि बीईएल आने वाले समय में मिड-टू-हाई टीन ग्रोथ दिखा सकता है। यही वजह है कि नुवामा इसे अपनी पसंदीदा कंपनी मानता है। (Defence sector stocks 2026)

डीसीएक्स सिस्टम्स की ग्रोथ तेज

इसके अलावा डीसीएक्स सिस्टम्स को भी रिपोर्ट में खास जगह दी गई है। नुवामा के मुताबिक डीसीएक्स की ग्रोथ तेज है और कंपनी एक्जीक्यूशन के मामले में लगातार अच्छा प्रदर्शन कर रही है। वहीं सोलर इंडस्ट्रीज इंडिया लिमिटेड को अम्युनिशन और एक्सप्लोसिव्स सेगमेंट में लीडर बताया गया है। बेहतर मार्जिन, मजबूत लोकलाइजेशन और लगातार डिमांड इसे एक मजबूत दावेदार बनाती है। (Defence sector stocks 2026)

इन शेयरों के लिए यह है टारगेट

अन्य कंपनियों पर भी नुवामा ने अपनी राय रखी है। रिपोर्ट के मुताबिक बीईएल के लिए करीब 520 रुपये का टारगेट रखा गया है, जबकि सोलर इंडस्ट्रीज के लिए यह टारगेट करीब 18,000 रुपये बताया गया है। डेटा पैटर्न्स को भी एक अच्छी एक्जीक्यूशन वाली कंपनी माना गया है, जिसका टारगेट करीब 3,570 रुपये बताया गया है। भारत डायनामिक्स लिमिटेड (बीडीएल) के लिए नुवामा ने 2,020 रुपये का टारगेट दिया है। वहीं हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) के लिए 5,800 रुपये का टारगेट तो रखा गया है, लेकिन लंबे एक्जीक्यूशन साइकल की वजह से इसे उतनी प्राथमिकता नहीं दी गई है। जेन टेक्नोलॉजीज को फिलहाल होल्ड की कैटेगरी में रखा गया है, जिसका टारगेट करीब 1,400 रुपये बताया गया है। (Defence sector stocks 2026)

25 से 40 फीसदी सालाना कमाई की ग्रोथ

कुल मिलाकर नुवामा का ओवरऑल नजरिया यह है कि डिफेंस सेक्टर में वैल्यूएशन अब थोड़ी ठंडी हुई है, जिससे चुनिंदा शेयरों में एंट्री का मौका बन रहा है। हालांकि सप्लाई चेन से जुड़े जोखिमों पर नजर रखना जरूरी होगा। इसके बावजूद इंडिजेनाइजेशन, डिफेंस एक्सपोर्ट में बढ़ोतरी और सरकार के लगातार कैपेक्स खर्च की वजह से लॉन्ग टर्म ग्रोथ की तस्वीर मजबूत बनी हुई है। नुवामा का मानना है कि खासकर प्राइवेट डिफेंस कंपनियों में आने वाले सालों में 25 से 40 फीसदी सालाना कमाई की ग्रोथ देखने को मिल सकती है, जो कई सरकारी कंपनियों से ज्यादा हो सकती है। (Defence sector stocks 2026)

2026 में सेक्टर का ट्रेंड क्या कहता है

मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि अब डिफेंस सेक्टर “ऑर्डर मिलने” के दौर से निकलकर “ऑर्डर पूरा करने” के दौर में प्रवेश कर चुका है। यानी अब वही कंपनियां आगे निकलेंगी जो समय पर डिलीवरी कर पाएंगी और मुनाफे को संभाल पाएंगी।

जनवरी 2026 में यह सेक्टर थोड़ी कंसोलिडेशन की स्थिति में दिख रहा है, लेकिन बजट 2026 और डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल की बैठकों से इसमें नई तेजी आने की उम्मीद जताई जा रही है। (Defence sector stocks 2026)

निवेशकों के लिए क्या समझना जरूरी है

डिफेंस सेक्टर में लॉन्ग टर्म ग्रोथ की संभावना मजबूत मानी जा रही है, लेकिन हर शेयर एक जैसा नहीं है। बड़ी सरकारी कंपनियां ज्यादा सुरक्षित मानी जाती हैं, जबकि मिड और स्मॉल कैप कंपनियों में जोखिम के साथ ज्यादा रिटर्न की संभावना रहती है।

यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव हमेशा बना रहता है। इसलिए किसी भी निवेश से पहले पूरी जानकारी जुटाना और जोखिम को समझना बेहद जरूरी है। (Defence sector stocks 2026)

डिस्क्लेमर: यह खबर सार्वजनिक जानकारियों और बाजार विश्लेषण पर आधारित है। इसे निवेश सलाह न माना जाए। निवेश से पहले स्वयं रिसर्च करें या वित्तीय सलाहकार से सलाह लें।

भारतीय नौसेना को मिली बड़ी तकनीकी कामयाबी, अब बिना चालक समुद्र में पेट्रोलिंग करेगी इंटरसेप्टर बोट

BEL A2NCS software

BEL A2NCS software: भारतीय नौसेना और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड यानी बीईएल ने मिलकर समुद्री सुरक्षा के क्षेत्र में एक बड़ी तकनीकी उपलब्धि हासिल की है। दोनों ने एडवांस्ड ऑटोनॉमस नेविगेशन एंड कंट्रोल सॉफ्टवेयर (A2NCS) विकसित किया है। यह पूरी तरह स्वदेशी सॉफ्टवेयर है, जिसे बिना चालक चलने वाली सतही नौकाओं यानी अनमैन्ड सरफेस वेसल्स (USV) के लिए तैयार किया गया है। इस सॉफ्टवेयर की मदद से नौसेना की फास्ट इंटरसेप्टर बोट अब समुद्र में पूरी तरह ऑटोनॉमस, यानी बिना किसी इंसानी मौजूदगी के काम कर सकती है।

BEL A2NCS software: फास्ट इंटरसेप्टर बोट के लिए किया तैयार

यह सॉफ्टवेयर बीईएल और भारतीय नौसेना की संस्था डब्ल्यूईएसईई (WESEE – वेपन्स एंड इलेक्ट्रॉनिक्स सिस्टम्स इंजीनियरिंग एस्टैब्लिशमेंट) के सहयोग से तैयार किया गया है। इसका मकसद यह है कि समुद्र में खतरनाक और जोखिम भरे मिशनों के दौरान नौसैनिकों की जान को खतरे में डाले बिना ऑपरेशन पूरे किए जा सकें। (BEL A2NCS software)

A2NCS को खास तौर पर नौसेना की फास्ट इंटरसेप्टर बोट (FIB) के लिए डिजाइन किया गया है। जब इस बोट में यह सॉफ्टवेयर लगाया जाता है, तो इसे ऑटोनॉमस फास्ट इंटरसेप्टर बोट (A-FIB) कहा जाता है। यह बोट तेज रफ्तार से चलने वाली हल्की नौका है, जिसका इस्तेमाल निगरानी, सुरक्षा और विशेष अभियानों के लिए किया जाता है।

इस सॉफ्टवेयर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह समुद्र में चल रही भीड़भाड़ के बीच भी सुरक्षित तरीके से रास्ता तय कर सकता है। इसके लिए A2NCS कई तरह के सेंसर का इस्तेमाल करता है। इसमें रडार, एआईएस (AIS – ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम), ईओ/आईआर (EO/IR – इलेक्ट्रो ऑप्टिकल और इन्फ्रारेड कैमरे), आईएनएस (इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम), जीपीएस और इलेक्ट्रॉनिक नेविगेशन चार्ट्स शामिल हैं। इन सभी सेंसर से मिलने वाली जानकारी को सॉफ्टवेयर एक साथ प्रोसेस करता है और बोट को सुरक्षित दिशा में आगे बढ़ाता है। (BEL A2NCS software)

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का भी इस्तेमाल

A2NCS में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का भी इस्तेमाल किया गया है। इसकी मदद से यह सॉफ्टवेयर समुद्र में मौजूद दूसरी नौकाओं, जहाजों या किसी भी तरह की बाधा को पहचान सकता है और उनसे टकराने से बच सकता है। इसे ऑब्स्टकल अवॉइडेंस कहा जाता है। यानी सामने खतरा दिखते ही सिस्टम खुद फैसला लेता है और रास्ता बदल देता है। (BEL A2NCS software)

BEL A2NCS software

कैसे काम करेगा सॉफ्टवेयर 

यह सॉफ्टवेयर अलग-अलग तरीकों से काम कर सकता है। पहला तरीका है रिमोट कंट्रोल मोड, जिसमें किसी कंट्रोल स्टेशन से बोट को दूर बैठे ऑपरेटर चलाता है। दूसरा तरीका है ऑटोनॉमस वेपॉइंट नेविगेशन, जिसमें पहले से तय किए गए रास्ते या पॉइंट्स के आधार पर बोट अपने आप चलती है। तीसरा और सबसे अहम तरीका है फुली सॉफ्टवेयर ड्रिवन ऑटोनॉमी, जिसमें बोट बिना किसी इंसानी दखल के पूरी तरह खुद फैसले लेकर मिशन पूरा करती है। (BEL A2NCS software)

A2NCS ने एक और बड़ी उपलब्धि हासिल की है। इस सॉफ्टवेयर को इंडियन रजिस्टर ऑफ शिपिंग (IRClass) से सर्टिफिकेशन मिला है। यह सर्टिफिकेशन किसी भी समुद्री सिस्टम की क्वालिटी, सेफ्टी और भरोसेमंद होने का प्रमाण होता है। A2NCS ऐसा पहला पूरी तरह भारतीय सॉफ्टवेयर है, जिसे अनमैन्ड सरफेस वेसल के लिए यह मान्यता मिली है।

IRClass सर्टिफिकेशन से पहले इस सॉफ्टवेयर का समुद्र में कड़े ट्रायल्स किए गए। इन ट्रायल्स के दौरान यह देखा गया कि सिस्टम कोलरेग (इंटरनेशनल रूल्स फॉर प्रिवेंटिंग कोलिजन एट सी) के नियमों का पालन करता है या नहीं। इसके अलावा साइबर सुरक्षा यानी साइबर रेजिलिएंस, और किसी खराबी की स्थिति में सुरक्षित तरीके से काम रोकने की क्षमता यानी फेल-सेफ ऑपरेशन को भी परखा गया। (BEL A2NCS software)

खतरनाक माइंस का लगेगा पता 

A2NCS से लैस A-FIB को भारतीय नौसेना पहले ही कई अभियानों में इस्तेमाल कर चुकी है। इसे माइन काउंटर मेजर (MCM) मिशनों में तैनात किया गया है, जहां समुद्र में बिछी खतरनाक माइंस का पता लगाना और उन्हें निष्क्रिय करना होता है। इसके अलावा, इसे अलग-अलग कॉम्बैट एक्सरसाइज में भी आजमाया गया है, जहां इसने अपनी क्षमता साबित की है। (BEL A2NCS software)

इस पूरी परियोजना को आत्मनिर्भर भारत पहल का मजबूत उदाहरण माना जा रहा है। पहले ऐसी तकनीक के लिए भारत को विदेशी कंपनियों पर निर्भर रहना पड़ता था, लेकिन अब भारतीय नौसेना के पास अपना स्वदेशी और भरोसेमंद ऑटोनॉमस सिस्टम है। इससे न केवल देश की सुरक्षा मजबूत होगी, बल्कि भविष्य में इस तकनीक के निर्यात के रास्ते भी खुल सकते हैं। (BEL A2NCS software)

सिंगापुर पहुंचा भारतीय नौसेना का फर्स्ट ट्रेनिंग स्क्वाड्रन, ASEAN सहयोग को मिली नई रफ्तार

Indian Navy First Training Squadron Singapore

Indian Navy First Training Squadron Singapore: भारतीय नौसेना का फर्स्ट ट्रेनिंग स्क्वाड्रन (1TS) 15 जनवरी को सिंगापुर के चांगी नेवल बेस पहुंच गया। यह स्क्वाड्रन दक्षिण-पूर्व भारतीय महासागर क्षेत्र यानी साउथ ईस्ट इंडियन ओशन रीजन में चल रहे अपने ट्रेनिंग अभियान के तहत सिंगापुर आया है। इस दौरे को खास इसलिए माना जा रहा है क्योंकि वर्ष 2026 को आसियान-भारत समुद्री सहयोग वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है।

इस स्क्वाड्रन में भारतीय नौसेना के चार अहम जहाज शामिल हैं। इनमें आईएनएस तिर, आईएनएस शार्दुल, आईएनएस सुजाता और भारतीय तटरक्षक बल का जहाज आईसीजीएस सारथी शामिल है। ये सभी जहाज ट्रेनिंग और ऑपरेशनल अनुभव के लिए लंबी दूरी की तैनाती पर हैं। (Indian Navy First Training Squadron Singapore)

Indian Navy First Training Squadron Singapore: ट्रेनिंग स्क्वाड्रन का क्या है मकसद

फर्स्ट ट्रेनिंग स्क्वाड्रन का मुख्य उद्देश्य नौसेना के ट्रेनी अधिकारियों और जवानों को समुद्र में वास्तविक परिस्थितियों का अनुभव कराना होता है। इस तरह की तैनाती से उन्हें नेविगेशन, सीमैनशिप, लॉजिस्टिक्स, समुद्री सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय नौसेनाओं के साथ तालमेल का व्यावहारिक ज्ञान मिलता है। सिंगापुर जैसे महत्वपूर्ण समुद्री देश में यह दौरा ट्रेनिंग के साथ-साथ डिप्लोमेसी का भी अहम हिस्सा है। (Indian Navy First Training Squadron Singapore)

Indian Navy First Training Squadron Singapore

भारत-सिंगापुर नौसेनाओं के बीच प्रोफेशनल बातचीत

सिंगापुर पहुंचने के बाद भारतीय नौसेना और रिपब्लिक ऑफ सिंगापुर नेवी के बीच कई तरह की प्रोफेशनल शुरू हुईं। दोनों नौसेनाओं के अधिकारियों और ट्रेनीज के बीच प्रोफेशनल इंटरैक्शन, हार्बर एक्टिविटीज और ट्रेनिंग एक्सचेंज आयोजित किए जा रहे हैं। इनका मकसद समुद्री क्षमताओं को बेहतर बनाना और आपसी समझ को और मजबूत करना है।

इसके अलावा दोनों नौसेनाओं के ट्रेनीज के लिए जॉइंट योगा सेशन और स्पोर्ट्स फिक्सचर्स भी रखे गए हैं, ताकि आपसी मेल-जोल बढ़े और अनौपचारिक स्तर पर भी संबंध मजबूत हों। (Indian Navy First Training Squadron Singapore)

सांस्कृतिक और जनसंपर्क कार्यक्रम

इस दौरे का एक अहम हिस्सा सांस्कृतिक गतिविधियां भी हैं। भारतीय नौसेना का नेवल बैंड सिंगापुर के प्रमुख सार्वजनिक स्थानों पर प्रस्तुति देगा। इससे भारतीय संस्कृति और संगीत से सिंगापुर के लोगों को रूबरू होने का मौका मिलेगा।

स्क्वाड्रन के जहाजों को आम लोगों और खास तौर पर स्कूल के बच्चों के लिए खोलने की भी योजना है। इससे बच्चों को नौसेना के जहाजों को करीब से देखने और समुद्री सुरक्षा के महत्व को समझने का अवसर मिलेगा।

Indian Navy First Training Squadron Singapore

सिंगापुर में भारत के उच्चायुक्त डॉ. शिलपक अंबुले ने फर्स्ट ट्रेनिंग स्क्वाड्रन के ट्रेनीज से बातचीत की। उन्होंने जवानों का हौसला बढ़ाया और इस प्रशिक्षण तैनाती के महत्व पर बात की।

इसके अलावा स्क्वाड्रन के सीनियर ऑफिसर और जहाजों के कमांडिंग ऑफिसर्स ने सिंगापुर नौसेना के मैरीटाइम ट्रेनिंग एंड डॉक्ट्रिन कमांड के कमांडर से मुलाकात की। दोनों पक्षों के बीच ट्रेनिंग, ऑपरेशंस और समुद्री सुरक्षा से जुड़े अनुभव साझा किए गए। (Indian Navy First Training Squadron Singapore)

Indian Navy First Training Squadron Singapore

इंफॉर्मेशन फ्यूजन सेंटर का दौरा

भारतीय नौसेना की एक टीम ने सिंगापुर के इंफॉर्मेशन फ्यूजन सेंटर का भी दौरा किया। यह सेंटर समुद्री सुरक्षा से जुड़ी जानकारी साझा करने के लिए जाना जाता है। यहां अलग-अलग देशों के इंटरनेशनल लायजन ऑफिसर्स तैनात रहते हैं। इस दौरे के दौरान समुद्री खतरों, सूचना साझा करने और क्षेत्रीय सहयोग पर चर्चा हुई। (Indian Navy First Training Squadron Singapore)

Indian Navy First Training Squadron Singapore

दूसरे दिन आरएसएन म्यूजियम का दौरा

दौरे के दूसरे दिन भारतीय नौसेना के जवानों ने सिंगापुर नौसेना के साथ सामुदायिक कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। आरएसएन म्यूजियम का दौरा किया गया, जहां सिंगापुर की नौसैनिक विरासत को समझने का मौका मिला। इसके अलावा फ्रेंडली स्पोर्ट्स मैच और सामाजिक सेवा से जुड़ा एक आउटरीच प्रोग्राम भी आयोजित किया गया, जिसमें एक ओल्ड एज और नर्सिंग होम का दौरा शामिल था। (Indian Navy First Training Squadron Singapore)

भारत की एक्ट ईस्ट नीति से जुड़ा संदेश

भारतीय नौसेना का यह दौरा भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी को जमीनी मजबूती देता है। साथ ही यह इंडियन ओशन नेवल सिम्पोजियम (IONS) में भारत की लीडरशिप और क्षेत्रीय समुद्री सुरक्षा के प्रति प्रतिबद्धता को भी दिखाता है।

यह तैनाती भारत के महासागर विजन के अनुरूप है, जिसमें क्षेत्रीय सुरक्षा, सहयोग और साझा विकास पर जोर दिया गया है। सिंगापुर जैसे भरोसेमंद साझेदार के साथ यह अभ्यास समुद्री सहयोग को नई दिशा देता है। (Indian Navy First Training Squadron Singapore)

पड़ोसी धर्म निभाता भारत: श्रीलंका में भारतीय सेना ने बनाया तीसरा बेली ब्रिज, कैंडी-नुवारा एलिया फिर जुड़े

Indian Army Constructs Third Bailey Bridge in Sri Lanka Under Operation Sagar Bandhu
Indian Army Constructs Third Bailey Bridge in Sri Lanka Under Operation Sagar Bandhu

Operation Sagar Bandhu: श्रीलंका में आए भीषण चक्रवात दित्वाह के बाद जनजीवन को फिर से पटरी पर लाने के लिए भारतीय सेना ने एक बार फिर मानवीय सहयोग की मजबूत मिसाल पेश की है। भारतीय सेना के इंजीनियरों ने श्रीलंका के सेंट्रल प्रोविंस में बी-492 हाईवे पर 120 फीट लंबा तीसरा बेली ब्रिज सफलतापूर्वक तैयार कर दिया है। यह पुल केएम-15 पर बनाया गया है, जो कैंडी और नुवारा एलिया जिलों को आपस में जोड़ता है।

चक्रवात दित्वाह के चलते यह इलाका पिछले एक महीने से ज्यादा समय तक सड़क संपर्क से कट गया था। पुल टूटने से स्थानीय लोगों को अस्पताल, स्कूल, बाजार और जरूरी सेवाओं तक पहुंचने में भारी परेशानी हो रही थी। अब इस नए बेली ब्रिज के बनने से इलाके की जीवनरेखा दोबारा बहाल हो गई है। (Operation Sagar Bandhu)

Operation Sagar Bandhu: चक्रवात के बाद टूटा संपर्क, अब फिर जुड़ा रास्ता

नवंबर 2025 में आए चक्रवात दित्वाह ने श्रीलंका के कई हिस्सों में भारी तबाही मचाई थी। खासतौर पर पहाड़ी और मध्यवर्ती इलाकों में सड़कों और पुलों को गंभीर नुकसान पहुंचा था। बी-492 हाईवे पर मौजूद पुराना पुल पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया था, जिससे कैंडी और नुवारा एलिया के बीच यातायात पूरी तरह बंद हो गया था।

इस स्थिति को देखते हुए भारत ने तुरंत राहत और पुनर्निर्माण के लिए आगे कदम बढ़ाया। भारतीय सेना के इंजीनियर टास्क फोर्स को श्रीलंका भेजा गया, जिसने बेहद कम समय में हालात का जायजा लेकर बेली ब्रिज बनाने का काम शुरू किया। (Operation Sagar Bandhu)

ऑपरेशन सागर बंधु के तहत तेजी से काम

यह पुल भारत के मानवीय मिशन ऑपरेशन सागर बंधु का हिस्सा है। इस ऑपरेशन के तहत भारत ने श्रीलंका को आपदा राहत और पुनर्वास में हरसंभव मदद दी है। भारतीय सेना ने अपने आधुनिक इंजीनियरिंग संसाधनों और अनुभवी जवानों की मदद से बेहद कठिन परिस्थितियों में भी काम को अंजाम दिया।

पहाड़ी इलाका होने के कारण भारी मशीनरी पहुंचाना आसान नहीं था, लेकिन इसके बावजूद सेना के इंजीनियरों ने चरणबद्ध तरीके से बेली ब्रिज के हिस्सों को जोड़कर समय पर पुल तैयार कर दिया। (Operation Sagar Bandhu)

पहले भी बना चुकी है दो अहम बेली ब्रिज

यह तीसरा बेली ब्रिज है, जिसे भारतीय सेना ने श्रीलंका में चक्रवात के बाद तैयार किया है। इससे पहले जाफना क्षेत्र में एक अहम बेली ब्रिज बनाया गया था, जिससे उत्तरी प्रांत में सड़क संपर्क बहाल हुआ। इसके बाद कैंडी क्षेत्र में दूसरा बेली ब्रिज तैयार किया गया, जिसने वहां की आवाजाही को आसान बनाया।

इन तीनों पुलों के बन जाने से प्रभावित इलाकों में राहत सामग्री पहुंचाने, मरीजों को अस्पताल ले जाने और सामान्य यातायात शुरू करने में बड़ी मदद मिली है।

वहीं, नए पुल के शुरू होते ही स्थानीय लोगों ने राहत की सांस ली है। किसान अब अपने उत्पाद बाजार तक पहुंचा पा रहे हैं, छात्र स्कूल-कॉलेज जा पा रहे हैं और जरूरी सेवाओं की सप्लाई सामान्य हो गई है। लंबे समय से बंद रास्ता खुलने से पर्यटन से जुड़े लोग भी दोबारा काम शुरू कर पाए हैं, क्योंकि नुवारा एलिया जैसे इलाकों में पर्यटन आजीविका का बड़ा साधन है। (Operation Sagar Bandhu)

भारत-श्रीलंका दोस्ती की मजबूत मिसाल

यह पूरा प्रयास भारत की नेबरहुड फर्स्ट पॉलिसी और वसुधैव कुटुंबकम का हिस्सा है। भारत ने न केवल अपने पड़ोसी देश की मुश्किल घड़ी में मदद की, बल्कि जमीन पर उतरकर ठोस काम करके भरोसे को और मजबूत किया है।

भारतीय सेना की इस भूमिका की श्रीलंका सरकार और स्थानीय प्रशासन ने भी सराहना की है। दोनों देशों के बीच लंबे समय से चली आ रही दोस्ती और सहयोग को इस मानवीय प्रयास से और मजबूती मिली है। (Operation Sagar Bandhu)

इंजीनियर टास्क फोर्स की अहम भूमिका

भारतीय सेना की इंजीनियर टास्क फोर्स ने श्रीलंकाई सेना और रोड डेवलपमेंट अथॉरिटी के साथ मिलकर यह काम पूरा किया। सीमित समय, कठिन मौसम और दुर्गम इलाके के बावजूद टीम ने पेशेवर तरीके से काम करते हुए पुल को समय पर तैयार किया। (Operation Sagar Bandhu)

क्या नाग चिन्ह वाले भैरव कमांडोज ले रहे हैं पैरा स्पेशल फोर्सेस की जगह? जानिए दोनों में असली फर्क

Bhairav Battalion vs Para SF

Bhairav Battalion vs Para SF: इस साल जयपुर में हुई आर्मी डे पर कई नए हथियारों के साथ भैरव लाइट कमांडो बटालियन के जवान भी कदमताल करते दिखे। परेड में राजपूताना राइफल्स और सिख लाइट इन्फैंट्री से जुड़े इन विशेष कंटिंजेंट्स ने पहली बार परेड में हिस्सा लिया। वहीं गणतंत्र दिवस परेड में भी ये लोगों का ध्यान आकर्षित करेंगे। उनकी वर्दी, चाल और सबसे ज्यादा चर्चा में रहा उनका इनसिग्निया, जिसमें नाग वासुकी और कमांडो डैगर बना हुआ है। यहीं से लोगों के मन में सवाल उठने लगे कि क्या ये नई यूनिट पैरा स्पेशल फोर्सेस जैसी है? क्या भैरव बटालियन पैरा एसएफ की जगह ले रही है या दोनों की भूमिका अलग है?

असलियत यह है कि पैरा एसएफ और भैरव बटालियन दोनों अलग-अलग जरूरतों के लिए बनाई गई यूनिट्स हैं। दोनों की ट्रेनिंग, काम करने का तरीका और ऑपरेशनल रोल अलग है। इसे समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा और देखना होगा कि भारतीय सेना ने यह बदलाव क्यों किए। (Bhairav Battalion vs Para SF)

Bhairav Battalion vs Para SF: भारतीय सेना की सबसे पुरानी और खतरनाक स्पेशल यूनिट

पैरा स्पेशल फोर्सेस, जिन्हें आमतौर पर पैरा एसएफ कहा जाता है, भारतीय सेना की सबसे अनुभवी और घातक यूनिट मानी जाती है। इसकी जड़ें दूसरे विश्व युद्ध तक जाती हैं। आजादी के बाद इसे पैराशूट रेजिमेंट के तहत संगठित किया गया।

पैरा एसएफ का मुख्य काम होता है दुश्मन की जमीन में घुसकर डीप स्ट्राइक, क्रॉस बॉर्डर रेड, काउंटर टेररिज्म, सर्जिकल स्ट्राइक, होस्टेज रेस्क्यू और स्पेशल रिकॉनिसेंस जैसे मिशन करना। ये वही यूनिट है जिसने म्यांमार में उग्रवादी ठिकानों पर कार्रवाई की, एलओसी के पार सर्जिकल स्ट्राइक की और कई गुप्त ऑपरेशन अंजाम दिए।

पैरा एसएफ के बारे में कहा जाता है कि उन्हें मौत से मुंह मोड़ना नहीं, बल्कि उसका सामना करना सिखाया जाता है। पैरा एसएफ के जवान खुद को “फैंटम” या “घोस्ट ऑपरेटर्स” कहते हैं क्योंकि वो बिना ट्रेस के आते-जाते हैं। उन्हें शत्रुजीत यानी “शत्रुओं का विजेता” भी कहा जाता है, जो दर्शाता है कि दुश्मन को हर हाल में जीतना है।

पैरा एसएफ की पहचान उसकी मैरून बेरेट और बलिदान बैज से होती है, जो हर किसी को नहीं मिलती। (Bhairav Battalion vs Para SF)

पैरा एसएफ की ट्रेनिंग: सबसे मुश्किल चयन प्रक्रिया

पैरा एसएफ में जाना आसान नहीं होता। सेना के किसी भी हिस्से से जवान इसके लिए वॉलंटियर कर सकता है, लेकिन असली चुनौती इसके बाद शुरू होती है। सबसे पहले होता है प्रोबेशन पीरियड, जो करीब 90 दिन का होता है। इसमें जवानों को बेहद कठिन फिजिकल और मेंटल टेस्ट से गुजरना पड़ता है। नींद की कमी, कम खाना, लंबी दौड़, भारी वजन के साथ मार्च, पहाड़, जंगल और रेगिस्तान सब कुछ झेलना पड़ता है। इस दौरान 80 से 85 फीसदी जवान हिम्मत हार कर बाहर हो जाते हैं।

जो जवान इस चरण को पार करता है, उसे आगे जंगल वॉरफेयर, माउंटेन वॉरफेयर, डेजर्ट ऑपरेशंस, कॉम्बैट फ्री फॉल, डाइविंग, हेलिबोर्न ऑपरेशन जैसी एडवांस ट्रेनिंग दी जाती है। पूरी ट्रेनिंग को पूरा होने में 9 से 12 महीने तक लगते हैं। (Bhairav Battalion vs Para SF)

भैरव बटालियन: आधुनिक युद्ध के लिए नई सोच

अब बात करते हैं भैरव लाइट कमांडो बटालियन की। यह करीब 250 सैनिकों की टीम है। यह यूनिट 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के बाद शुरू हुई भारतीय सेना की ट्रांसफॉर्मेशन योजना का हिस्सा है। पिछले कुछ सालों में हुए युद्धों, खासकर रूस-यूक्रेन युद्ध और ड्रोन वारफेयर से सेना ने सीखा कि हर काम के लिए स्पेशल फोर्स भेजना जरूरी नहीं।

कुख सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने कहा है कि ये घातक प्लाटून और पैरा कमांडोज के बीच एक गैप था, जिसे भरना जरूरी था। जिसके बाद भैरव कमांडोज अस्तित्व में आए।

भारतीय सेना को सीमा पर ऐसे यूनिट्स चाहिए थे जो बहुत तेज हों, टेक्नोलॉजी से लैस हों, कम समय में हमला कर सकें, साथ ही ड्रोन और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और हाइब्रिड थ्रेट से भी निपट सकें। इसी जरूरत को देखते भैरव बटालियन का जन्म हुआ। (Bhairav Battalion vs Para SF)

भैरव नाम और नाग वासुकी का महत्व

भैरव भगवान शिव का ही एक रूप है, जो निर्भीकता और अजेयता का प्रतीक माना जाता है। भगवान शिव के गले में हमेशा नाग वासुकी रहता है। यही वजह है कि भैरव बटालियन के इनसिग्निया में नाग वासुकी और कमांडो डैगर को शामिल किया गया है। इस यूनिट का मोटो है- “अदृश्य और अदम्य”, यानी जो दिखे नहीं और जिसे रोका न जा सके।

भैरव बटालियन का स्ट्रक्चर

भैरव बटालियन पैरा एसएफ से साइज में छोटी होती है। एक बटालियन में करीब 200 से 250 जवान, 7 से 8 अधिकारी होते हैं। इनका मकसद है लीन और मोबाइल यूनिट बनाना, जो जल्दी मूव कर सके। इनकी तैनाती ज्यादातर एलएसी, एलओसी और संवेदनशील बॉर्डर सेक्टरों में की जा रही है।

भैरव बटालियन के लिए जवानों का चयन बेहद सोच-समझकर किया जाता है। सेना की अलग-अलग शाखाओं जैसे इन्फैंट्री, आर्टिलरी, एयर डिफेंस और सिग्नल्स से हैंडपिक्ड जवान चुने जाते हैं। चयन के दौरान फिजिकल फिटनेस के साथ-साथ मानसिक मजबूती पर भी खास ध्यान दिया जाता है। ऐसे जवानों को प्राथमिकता दी जाती है जिन्होंने पहले घाटक प्लाटून, कमांडो कोर्स, माउंटेन वॉरफेयर या जंगल वॉरफेयर जैसी कठिन ट्रेनिंग में अच्छा प्रदर्शन किया हो। (Bhairav Battalion vs Para SF)

“सन्स ऑफ द सॉइल” कॉन्सेप्ट

भैरव बटालियन की एक खास बात है लोकल रिक्रूटमेंट। इसे सेना ने “सन्स ऑफ द सॉइल” पॉलिसी कहा है। जैसे राजस्थान सेक्टर में तैनात यूनिट में रेगिस्तान से परिचित जवान, और नॉर्थ ईस्ट में वहां के इलाके को समझने वाले सैनिक। खास बात ये है कि इसे अलग-अलग इलाक़े की ज़रूरतों के लिए कई तरह से तैयार किया गया है। रेगिस्तानी इलाके के लिये अलग भैरव बटालियन है तो जम्मू कश्मीर के लिये अलग और लद्दाख जैसे एरिया के लिये अलग। इससे जवानों को मौसम, जमीन और स्थानीय हालात समझने में फायदा मिलता है। ताकि स्थानीय इलाके से जुड़े जवानों को उसी क्षेत्र में तैनात किया जा सके।

भैरव बटालियन मॉडर्न वॉरफेयर में मल्टी डोमेन ऑपरेंशन करना वाली फोर्स है। जिसे पांच महीने पहले ही तैयार किया गया है। (Bhairav Battalion vs Para SF)

भैरव बटालियन की ट्रेनिंग: स्पीड और टेक्नोलॉजी पर फोकस

भैरव लाइट कमांडो बटालियन की ट्रेनिंग भारतीय सेना की अब तक की सबसे आधुनिक और तेजी से तैयार की जाने वाली स्पेशलाइज्ड ट्रेनिंग मानी जा रही है। इस यूनिट की ट्रेनिंग को इस तरह डिजाइन किया गया है कि जवान बहुत कम समय में पूरी तरह ऑपरेशनल बन जाएं। आमतौर पर इसकी ट्रेनिंग तीन से चार महीने में पूरी कराई जाती है। शुरुआती दो से तीन महीने जवानों को इन्फैंट्री स्कूल महू, हाई एल्टीट्यूड वॉरफेयर स्कूल और काउंटर इंसर्जेंसी एंड जंगल वॉरफेयर स्कूल जैसे संस्थानों में रखा जाता है, जहां उन्हें बेसिक स्पेशलाइज्ड ट्रेनिंग दी जाती है। इसके बाद करीब एक महीने के लिए इन जवानों को पैरा स्पेशल फोर्सेस यूनिट्स के साथ अटैच किया जाता है, ताकि उन्हें रियल ऑपरेशनल माहौल में काम करने का अनुभव मिल सके। (Bhairav Battalion vs Para SF)

इनकी ट्रेनिंग का फोकस

ऑपरेशनल ट्रेनिंग के दौरान भैरव बटालियन को क्रॉस बॉर्डर रेड, क्विक हिट एंड रन ऑपरेशन, काउंटर टेररिज्म और रैपिड इंसर्शन जैसे मिशनों के लिए तैयार किया जाता है। हेलिकॉप्टर के जरिए तेजी से उतारना, जमीन या पानी के रास्ते घुसपैठ करना और सीमित समय में मिशन पूरा कर वापस लौटना इस यूनिट की खास पहचान है। इन सभी क्षमताओं को एक्सरसाइज अखंड प्रहार जैसी सैन्य कवायदों में परखा भी जा चुका है, जहां रियल टाइम ऑपरेशनल वैलिडेशन किया गया। (Bhairav Battalion vs Para SF)

शेर, ड्रैगुनोव जैसे हथियारों से लैस

फिजिकल और मेंटल ट्रेनिंग के स्तर पर भैरव कमांडोज को बेहद कठिन परिस्थितियों में तैयार किया जाता है। इन्हें ऊंचे पहाड़ी इलाकों, रेगिस्तानी क्षेत्रों, घने जंगलों और रात के अंधेरे में ऑपरेशन करने की ट्रेनिंग दी जाती है। स्मोक कवर के बीच मूवमेंट, स्टेल्थ तरीके से आगे बढ़ना और अचानक हमला करना इनकी ट्रेनिंग का अहम हिस्सा है। जवानों को आधुनिक हथियारों जैसे क्लोज कॉम्बेट के लिये एके-203 राइफल, 1500 मीटर तक मार करने वाले ड्रैगुनोव स्नाइपर, लंबी दूरी तक दुश्मन के बड़े हथियारों को बर्बाकरने द वाले रॉकेट लांचर कार्ल गुस्ताफ रीकॉइललेस गन, एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल और मॉर्टार सिस्टम के इस्तेमाल में भी पारंगत बनाया जाता है। (Bhairav Battalion vs Para SF)

ड्रोन वारफेयर: भैरव की सबसे बड़ी ताकत

भैरव कमांडोज की ट्रेनिंग का सबसे बड़ा फोकस ड्रोन वॉरफेयर पर है। इसीलिए इसे पूरी तरह से ड्रोन-इंटीग्रेटेड यूनिट बनाया गया है। यहां हर जवान को ड्रोन उड़ाने की ट्रेनिंग दी जाती है। सेना पहले ही 1 लाख से ज्यादा ड्रोन ऑपरेटर्स तैयार कर चुकी है।

सेना का नया सिद्धांत यह है कि ड्रोन किसी एक स्पेशलिस्ट तक सीमित न रहें, बल्कि हर सैनिक उन्हें इस्तेमाल कर सके। सर्विलांस ड्रोन, एफपीवी ड्रोन, लॉइटरिंग म्यूनिशन और ड्रोन स्वार्म जैसी तकनीकों को ट्रेनिंग का हिस्सा बनाया गया है। जवानों को यह सिखाया जाता है कि कैसे ड्रोन के जरिए दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखी जाए, टारगेट की पहचान की जाए और जरूरत पड़ने पर तुरंत स्ट्राइक की जाए।

जवानों को न केवल सर्विलांस बल्कि काउंटर ड्रोन ऑपरेशन की भी ट्रेनिंग दी जाती है। इसमें इलेक्ट्रॉनिक जामिंग, ड्रोन को निष्क्रिय करना और दुश्मन के यूएएस सिस्टम को बेअसर करना शामिल है। इसके अलावा ड्रोन से मिले इनपुट को सीधे ग्राउंड ऑपरेशन से जोड़ने की ट्रेनिंग दी जाती है, ताकि टारगेट मिलने के बाद कार्रवाई में देरी न हो। (Bhairav Battalion vs Para SF)

पैरा एसएफ और भैरव बटालियन में असली फर्क

पैरा एसएफ जहां स्ट्रैटेजिक और डीप ऑपरेशन करती है, वहीं भैरव बटालियन टैक्टिकल और ऑपरेशनल लेवल पर काम करती है। पैरा स्पेशल फोर्सेस और भैरव बटालियन के बीच यही सबसे बड़ा अंतर है। पैरा एसएफ जहां रणनीतिक स्तर के, अंदर तक जाकर किए जाने वाले ऑपरेशंस के लिए जानी जाती है, वहीं भैरव बटालियन को टैक्टिकल और ऑपरेशनल लेवल पर तेजी से जवाब देने के लिए खड़ा किया गया है। भैरव कमांडोज का मकसद है सीमा पर उभरते खतरे को तुरंत दबाना, ताकि हालात बड़े टकराव में न बदलें और पैरा एसएफ जैसी यूनिट्स को बड़े और संवेदनशील मिशनों के लिए फ्री रखा जा सके।

कुल मिला कर पैरा एसएफ को तभी भेजा जाता है जब मिशन बहुत बड़ा और संवेदनशील हो। वहीं, भैरव बटालियन का काम है सीमा पर तुरंत जवाब, जिससे हालात बिगड़ने से पहले काबू में आ जाएं। (Bhairav Battalion vs Para SF)

Bhairav Battalion vs Para SF: क्यों जरूरी थी भैरव बटालियन?

पिछले कुछ सालों में देखा गया कि हर छोटी घुसपैठ या रेड के लिए पैरा एसएफ भेजना सही नहीं। इससे उनकी स्ट्रैटेजिक क्षमता पर असर पड़ता है।

भैरव बटालियन इस गैप को भरती है। ये यूनिट्स “फाइट टुनाइट” कॉन्सेप्ट पर काम करती हैं, यानी आदेश मिला और तुरंत कार्रवाई। जहां स्पीड, सरप्राइज, टेक्नोलॉजी और स्थानीय समझ को एक साथ जोड़कर दुश्मन पर बढ़त हासिल की जा सकती है।

2026 तक करीब 15 से ज्यादा भैरव बटालियन ऑपरेशनल हो चुकी हैं। कुल मिलाकर 23 से 25 बटालियन बनाने की योजना है। ये यूनिट्स रुद्र ब्रिगेड जैसे नए स्ट्रक्चर का हिस्सा होंगी, जहां इन्फैंट्री, ड्रोन और सपोर्ट यूनिट्स एक साथ काम करेंगी। भैरव की क्षमता देखते हुए इसे फिलहाल उत्तरी और पश्चिमी सीमा पर तैनात कर दिया गया है। (Bhairav Battalion vs Para SF)

राफेल डील पर बड़ा फैसला; डिफेंस प्रोक्योरमेंट बोर्ड ने दी 114 जेट्स की खरीद को हरी झंडी

Rafale ITAR impact on India

114 Rafale fighter jets: रक्षा मंत्रालय के डिफेंस प्रोक्योरमेंट बोर्ड ने फ्रांस की कंपनी डसॉल्ट एविएशन से 114 राफेल फाइटर जेट खरीदने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। इस बोर्ड की अध्यक्षता रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने की। यह मंजूरी मिलने के बाद अब यह प्रस्ताव रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता वाली डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल के पास जाएगा। इसके बाद अंतिम फैसला कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी लेगी, जिसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करते हैं।

सूत्रों के अनुसार, भारत और फ्रांस के बीच इस सौदे को फरवरी में अंतिम रूप दिया जा सकता है। इसी दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के बीच बैठक प्रस्तावित है, जिसमें इस डील पर मुहर लग सकती है। (114 Rafale fighter jets)

114 Rafale fighter jets: भारतीय वायुसेना की जरूरतों से जुड़ा है 114 राफेल का फैसला

भारतीय वायुसेना लंबे समय से अपने स्क्वॉड्रन की संख्या बढ़ाने की मांग कर रही है। मौजूदा समय में कई पुराने लड़ाकू विमान धीरे-धीरे सेवा से बाहर हो रहे हैं, जिससे वायुसेना की ताकत पर असर पड़ा है। इसी को ध्यान में रखते हुए सितंबर 2025 में वायुसेना ने रक्षा मंत्रालय को औपचारिक प्रस्ताव भेजकर 114 नए राफेल लड़ाकू विमान खरीदने की मांग की थी।

राफेल को चुनने के पीछे कई व्यावहारिक वजहें बताई जा रही हैं। भारतीय वायुसेना पहले से ही 36 राफेल जेट ऑपरेट कर रही है, जबकि भारतीय नौसेना ने भी 26 मरीन वेरिएंट राफेल विमानों का ऑर्डर दिया है। एक ही प्लेटफॉर्म की संख्या बढ़ने से ट्रेनिंग, मेंटेनेंस और स्पेयर पार्ट्स की लागत कम होगी। (114 Rafale fighter jets)

अंबाला एयरबेस में पहले से मौजूद है राफेल इंफ्रास्ट्रक्चर

भारतीय वायुसेना के अंबाला एयरबेस पर राफेल के लिए फ्लाइट ट्रेनिंग और मेंटेनेंस, रिपेयर एंड ओवरहॉल (एमआरओ) की सुविधा पहले से चालू है। वायुसेना के पास जरूरी स्पेस, टूलिंग, स्पेयर पार्ट्स और ट्रेंड मैनपावर मौजूद है। इसी वजह से वायुसेना तुरंत दो स्क्वॉड्रन, यानी करीब 36 से 38 राफेल विमानों को शामिल करने की स्थिति में है। (114 Rafale fighter jets)

‘मेक इन इंडिया’ के तहत होगी खरीद

इस बार राफेल की खरीद सिर्फ सीधे आयात तक सीमित नहीं रहेगी। यह सौदा मेक इन इंडिया योजना के तहत किया जाएगा। इसके तहत दसॉ एविएशन किसी भारतीय कंपनी के साथ साझेदारी करेगी और भारत में ही विमानों का निर्माण किया जाएगा।

हाल ही में दसॉ एविएशन ने अपनी भारतीय जॉइंट वेंचर कंपनी दसॉ रिलायंस एयरोस्पेस लिमिटेड (डीआरएएल) में अपनी हिस्सेदारी 49 फीसदी से बढ़ाकर 51 फीसदी कर ली है। इसके बाद यह कंपनी फ्रांसीसी कंपनी की मेजॉरिटी ओनड सब्सिडियरी बन गई है। इस जॉइंट वेंचर में अनिल अंबानी की रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर भी साझेदार है। (114 Rafale fighter jets)

भारतीय हथियारों से लैस होंगे सभी 114 राफेल

इस सौदे की एक अहम शर्त यह है कि सभी 114 राफेल विमानों में भारतीय हथियार, मिसाइल और एम्युनिशन लगाए जाएंगे। इसके साथ ही दसॉ एविएशन को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि राफेल जेट्स भारतीय रडार और सेंसर सिस्टम से डिजिटल रूप से जुड़े हों।

इसके लिए सुरक्षित डेटा लिंक सिस्टम उपलब्ध कराया जाएगा, जिससे लड़ाकू विमान जमीन पर मौजूद कंट्रोल सिस्टम को रियल टाइम इमेजरी और जानकारी भेज सकें। इससे वायुसेना की ऑपरेशनल क्षमता और हालात पर तुरंत प्रतिक्रिया देने की ताकत बढ़ेगी। (114 Rafale fighter jets)

टेक्नोलॉजी ट्रांसफर भी होगा सौदे का हिस्सा

सरकारी सूत्रों के मुताबिक, इस डील में ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी (टीओटी) भी शामिल होगा। इसके तहत राफेल के एयरफ्रेम यानी ढांचे के निर्माण की तकनीक भारत को दी जाएगी। इसके अलावा इंजन बनाने वाली कंपनी साफरान और एवियोनिक्स सिस्टम बनाने वाली कंपनी थेल्स भी इस टेक्नोलॉजी ट्रांसफर प्रक्रिया का हिस्सा होंगी।

जब एयरफ्रेम, इंजन और एवियोनिक्स से जुड़ी टेक्नोलॉजी भारत को मिल जाएगी, तो राफेल में स्वदेशी कंटेंट की हिस्सेदारी करीब 55 से 60 फीसदी तक पहुंच सकती है। इससे देश के डिफेंस इंडस्ट्रियल बेस को बड़ा फायदा मिलेगा। (114 Rafale fighter jets)

एएमसीए और तेजस मार्क-2 पर कोई असर नहीं

रक्षा सूत्रों ने साफ किया है कि 114 राफेल की खरीद से भारत की स्वदेशी फाइटर जेट योजनाओं पर कोई असर नहीं पड़ेगा। एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एएमसीए) और लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट तेजस मार्क-2 दोनों की योजना, बजट और टाइमलाइन अलग से तय की गई है।

एएमसीए भारत का फिफ्थ जेनरेशन स्टेल्थ फाइटर प्रोजेक्ट है, जबकि तेजस मार्क-2 मौजूदा तेजस मार्क-1ए का एडवांस्ड वर्जन होगा। रक्षा मंत्रालय पहले ही हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को 180 तेजस मार्क-1ए विमानों का ऑर्डर दे चुका है। (114 Rafale fighter jets)

114 राफेल विमानों की खरीद भारतीय वायुसेना की उस बहुस्तरीय रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत पुराने विमानों की जगह नए और आधुनिक फाइटर जेट शामिल किए जा रहे हैं। एक तरफ स्वदेशी प्लेटफॉर्म विकसित किए जा रहे हैं, तो दूसरी तरफ तुरंत जरूरतों को पूरा करने के लिए आधुनिक विदेशी विमानों को भी शामिल किया जा रहा है।

डिफेंस प्रोक्योरमेंट बोर्ड की मंजूरी के बाद अब यह सौदा तेजी से आगे बढ़ने की उम्मीद है और आने वाले दिनों में रक्षा मंत्री और कैबिनेट स्तर पर इस पर फैसला लिया जाएगा। (114 Rafale fighter jets)