China Y-20 Cargo Aircraft: हाल ही में तिब्बत के शिगात्से डिंगरी काउंटी में आए 7.1 मैग्नीट्यूड के भूकंप ने इस इलाके को तहसनहस करके रख दिया है। इस भूकंप में कम से कम 126 लोगों की मौत हो गई और 100 से अधिक घायल हो गए। भूकंप के झटके नेपाल, भूटान और उत्तरी भारत के कुछ हिस्सों में भी महसूस किए गए। वहीं इस प्राकृतिक आपदा से न केवल जनजीवन प्रभावित हुआ, बल्कि वहां के इंफ्रास्ट्रक्चर को भी भारी नुकसान हुआ है। राहत और बचाव कार्यों के लिए चीन ने पहली बार अपने अत्याधुनिक Y-20 ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट का इस्तेमाल किया है। इस एयरक्राफ्ट ने शिगात्से डिंगरी एयरपोर्ट पर लैंडिंग की, जो कि दिसंबर 2022 में तैयार हुआ था।
China Y-20 Cargo Aircraft: चीनी पौराणिक पक्षी कुनपेंग पर रखा गया है इसका नाम
Y-20 ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट यानी कुनपेंग चीन का पहला स्वदेशी रूप से विकसित भारी परिवहन विमान है। इसका नाम चीन की लोककथाओं में एक पौराणिक पक्षी “कुनपेंग” के नाम पर रखा गया है। इसे चीन की वायुसेना ‘चबी गर्ल’ के नाम से भी पुकारती है। यह विमान 73 टन तक भार ले जाने की क्षमता रखता है। यह चीन के सबसे बड़े टैंक ZTZ99 को भी ढोने की क्षमता रखता है। इसे मुश्किल हालात में भी ऑपरेशंस के लिए डिजाइन किया गया है। इसे मानवीय राहत, सैन्य अभियान और उपकरणों के ट्रांसपोर्ट के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इस विमान में चार शेनयांग WS-20 इंजन लगे हैं, जो इसे लंबी दूरी तक उड़ान भरने और हवा में ही हवाई ईंधन भरने की क्षमता प्रदान करते हैं।
Y-20 को दिसंबर 2023 में दुबई एयर शो में पहली बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शित किया गया था। यह चीन का सबसे बड़ा मिलिट्री टांसपोर्ट एयरक्राफ्ट है। इजिप्ट, नाइजीरिया और मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका के कई देशों ने इसे खरीदने में रुचि दिखाई है।
China Y-20 Cargo Aircraft से अमेरिकी C-17 ग्लोबमास्टर को टक्कर
Y-20 को अमेरिकी C-17 ग्लोबमास्टर के लिए बड़ी चुनौती माना जा रहा है। C-17 1995 में लॉन्च हुआ था और अमेरिकी सेना के लिए बेहद कारगर साबित हुआ है। वहीं, Y-20 भी चीन के लिए ऐसी ही भूमिका निभा रहा है। हालांकि, शुरुआती Y-20 वर्जन में रूसी इंजन लगे थे, और “गर्म और ऊंचे” हवाई क्षेत्रों से उड़ान भरने में सक्षम नहीं थे। लेकिन WS-20 इंजन के साथ Y-20B वर्जन ने इन सभी बाधाओं को पार कर लिया है। वहीं चीन ने Y-20 कार्गो विमान पर बेस्ड एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल (AEW&C) विमान भी तैयार कर लिया है।
शिगात्से डिंगरी एयरपोर्ट का रणनीतिक महत्व
चीन का शिगात्से डिंगरी एयरपोर्ट और Y-20 की तैनाती भारत के लिए रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। यह हवाईअड्डा भारत के उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों के करीब है और इसे चीन की सैन्य तैयारियों के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है।
तिब्बत में पांच एयरपोर्ट हैं, जिनका चीन मिलिट्री और सिविल के तौर पर इस्तेमाल करता है। वहीं इनमें से चार एयरपोर्ट भारतीय सीमा से महज 60 किमी की दूरी पर हैं। जबकि शिनजियांग में 2017 से अब तक 15 हवाई अड्डों को अपग्रेड किया गया है, जिनमें से सात मिलिट्री और सिविल उपयोग वाले हैं, जिनमें भारतीय सीमा से सिर्फ 240 किमी दूर स्थित होतान भी शामिल है।
शिगात्से डिंगरी एयरपोर्ट का निर्माण अगस्त 2019 में शुरू हुआ और दिसंबर 2022 में इसे तैयार कर लिया गया। यह एयरपोर्ट तिब्बत में चीन के लिए रणनीतिक तौर पर बेहद महत्वपूर्ण है। खास बात यह है कि यह एयरपोर्ट नेपाल की सीमा से मात्र 65 किलोमीटर उत्तर में स्थित है। वहीं डोकलाम से इसकी दूरी मात्र 230 किमी है। इस एयरपोर्ट पर चीन ने एक खास बड़ी अंडरग्राउंड फैसिलिटी बनाई है, जिसमें कम से कम तीन प्रवेश द्वार हैं। यह एय़रपोर्ट 3.3 किमी की लंबाई में फैला है।
Indian Air Force self-reliance: भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने आत्मनिर्भरता की आवश्यकता पर जोर देते हुए चीन के हालिया सैन्य आधुनिकीकरण का उदाहरण दिया। उन्होंने चीन के सिक्स्थ जनरेशन दो स्टील्थ फाइटर जेट्स को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि भारत को अपने रक्षा अनुसंधान और विकास (R&D) और उत्पादन में आत्मनिर्भर बनने के लिए तेज़ी से काम करना चाहिए।
Indian Air Force self-reliance: चीन की सैन्य ताकत में हो रहा इजाफा
वायुसेना प्रमुख ने ‘सुब्रतो मुखर्जी सेमिनार’ में कहा, “आज की दुनिया संघर्ष और प्रतिस्पर्धा से भरी हुई है। हमारे पास पश्चिमी और उत्तरी सीमाओं पर अपनी सुरक्षा संबंधी चिंताएं हैं, जहां चीन और पाकिस्तान ने सैन्यकरण बढ़ा दिया है।” उन्होंने चीन के वायुसेना में हो रहे भारी निवेश का ज़िक्र करते हुए कहा, “हाल ही में चीन के सिक्स्थ जनरेशन दो स्टील्थ फाइटर जेट्स इसका एक उदाहरण है।”
चीन ने हाल ही में चेंगदू में दो नई पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर जेट्स को पहली बार दुनिया के सामने प्रदर्शित किया, जिससे पूरी दुनिया हैरान रह गई। चीन ने 26 दिसंबर को इन दोनों स्टील्थ फाइटर जेट्स की पहली उड़ान का प्रदर्शन किया। ये विमान अपनी एडवांस टेक्नोलॉजी और कम ऊंचाई पर उड़ने की क्षमता रखते हैं। इन टेललेस, स्टील्थ विमानों के वीडियो ने अमेरिका तक को चौंका दिया। जबकि अमेरिका अभी तक अपने छठी पीढ़ी के फाइटर प्रोजेक्ट को अंतिम रूप नहीं दे पाया है, वहीं, चीन पहले ही इस क्षेत्र में आगे निकल चुका है।
वहीं, चीन के पास पहले से ही 5वीं पीढ़ी के फाइटर जेट्स, जैसे चेंगदू J-20, हैं जिन्हें भारत की सीमाओं के पास होटन और शिगात्से जैसे एयरफील्ड्स पर तैनात किया गया है।
भारत के पास नहीं हैं 5वीं पीढ़ी के जेट्स
भारत अभी भी 5वीं पीढ़ी के फाइटर जेट्स के उत्पादन से बहुत दूर है। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली सुरक्षा पर कैबिनेट समिति ने मार्च 2022 में स्विंग-रोल एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) के विकास को मंजूरी दी थी। इसके लिए 15,000 करोड़ रुपये से अधिक की शुरुआती लागत तय की गई है। आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक, AMCA का पहला प्रोटोटाइप अगले चार से पांच वर्षों में तैयार होगा। उत्पादन और शामिल किए जाने की प्रक्रिया 2035 के बाद ही शुरू हो पाएगी।
वायुसेना प्रमुख ने कहा, “पहला विमान 2001 में उड़ा था – यानी 17 साल पहले। फिर, 15 साल बाद 2016 में इसे शामिल किया गया। आज हम 2024 में हैं, लेकिन मेरे पास अभी तक पहले 40 विमान भी नहीं हैं। यही हमारी उत्पादन क्षमता है। हमें इस पर काम करने की सख्त जरूरत है। मैं पूरी तरह से आश्वस्त हूं कि हमें कुछ प्राइवेट कंपनियों को इसमें शामिल करना होगा। अन्यथा, हालात में कोई बदलाव नहीं आएगा।”
बता दें कि भारत को अपने चौथी पीढ़ी के तेजस मार्क-1ए फाइटर्स का उत्पादन करने में भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। इसके पीछे एक बड़ी वजह GE-F404 टर्बोफैन जेट इंजन की आपूर्ति में हो रही देरी है। अमेरिकी कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक द्वारा GE-F404 टर्बोफैन जेट इंजन की आपूर्ति में देरी की वजह से भारत की सुरक्षा संबंधी चिंताएं बढ़ गई हैं। इसकी वजह है कि वायुसेना को चीन और पाकिस्तान के खतरों से निपटने के लिए 42.5 स्क्वाड्रन की जरूरत है, जबकि उसके पास फिलहाल केवल 30 स्क्वाड्रन ही हैं।
वायुसेना प्रमुख ने आरएंडडी में हो रही देरी पर चिंता जताई। उन्होंने कहा, “यदि तकनीक समय पर नहीं पहुंचती है, तो उसका महत्व खत्म हो जाता है। हमें आरएंडडी में शामिल जोखिमों और विफलताओं को स्वीकार करने की प्रवृत्ति विकसित करनी होगी।” उन्होंने यह भी कहा, “आत्मनिर्भरता की कीमत चुकानी पड़ेगी, और हमें इसे स्वीकार करना चाहिए। भले ही इसके लिए ज्यादा खर्च करना पड़े। लेकिन यह हमारे देश को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा।”
रक्षा क्षेत्र में निजी कंपनियों की भागीदारी पर दिया जोर
वायुसेना प्रमुख ने तेजस फाइटर जेट के धीमे उत्पादन पर भी निराशा व्यक्त की। उन्होंने कहा कि देरी के चलते भारतीय वायुसेना को कई ऑपरेशनल चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। IAF प्रमुख ने चीन और पाकिस्तान से बढ़ते खतरों का ज़िक्र करते हुए कहा कि वायुसेना को कम से कम 180 तेजस मार्क-1ए और 108 तेजस मार्क-2 विमानों की ज़रूरत है। AMCA के प्रोडक्शन और तैनाती तक ये विमान भारतीय वायुसेना की ताकत को बनाए रखने में मदद करेंगे।
उन्होंने यह भी कहा कि नई तकनीकों को अपनाने और जोखिम लेने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देने की जरूरत है। “तकनीक में देरी का मतलब है तकनीक से इनकार। R&D में विफलताओं और जोखिम को स्वीकार करने का रवैया विकसित करना होगा।”
वायुसेना प्रमुख ने रक्षा क्षेत्र में निजी कंपनियों की भागीदारी पर भी ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भरता से दीर्घकालिक फायदे होंगे, हालांकि शुरुआती चरणों में इसकी लागत अधिक हो सकती है। उन्होंने निजी और सरकारी क्षेत्रों के बीच तालमेल बढ़ाने पर जोर दिया।
ALH Dhruv Crash: इंडियन आर्म्ड फोर्सेस ने अपने सभी 330 एडवांस लइट हेलीकॉप्टर (ALH) ‘ध्रुव’ के बेड़े की उड़ान पर अस्थायी तौर पर रोक लगा दी है। सशस्त्र बलों ने यह कदम पोरबंदर में तटरक्षक बल के हेलिकॉप्टर हादसे के बाद उठाया है, जिसमें दो पायलट और एक एयरक्रू गोताखोर की मौत हो गई। हादसे के बाद हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) की एक टीम जांच के लिए घटनास्थल पर भेजी गई है।
बता दें कि रविवार को हुए इस हादसे से पहले एएलएच हेलिकॉप्टर अपनी ट्रेनिंग उड़ान पर था। लगभग 90 मिनट की ट्रेनिंग के दौरान 200 फीट की ऊंचाई पर उड़ते समय, हेलिकॉप्टर नाक के बल जमीन पर गिर गया और उसमें आग लग गई। हादसे के तुरंत बाद, हेलिकॉप्टर के फ्लाइट डेटा रिकॉर्डर (FDR) और कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डर (CVR) बरामद कर लिए गए। इन उपकरणों को दुर्घटना के कारणों की जांच के लिए भेजा गया है।
ALH Dhruv Crash: एचएएल और कोस्ट गार्ड ने शुरू की जांच
पिछले चार महीनों में एएलएच हेलिकॉप्टरों के साथ यह दूसरी बड़ी दुर्घटना है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) और भारतीय तटरक्षक बल ने हादसे की अलग-अलग जांच शुरू कर दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन घटनाओं के पीछे डिजाइन, मैन्युफैक्चरिंग और मेंटेनेंस से जुड़ी दिक्कतें हो सकती हैं। एक वरिष्ठ सैन्य अधिकारी ने कहा, “इन दुर्घटनाओं में डिजाइन, क्वॉलिटी कंट्रोल, और पायलटों की ट्रेनिंग से जुड़े मामलों की गहराई से जांच होनी चाहिए।”
वहीं एचएएल सूत्रों का कहना है कि एएलएच ने अपने आप को साबित किया है। उन्होंने एएलएच का बचाव करते हुए कहा है कि यह विभिन्न उपयोगिता भूमिकाओं में अच्छा प्रदर्शन कर चुका है। वहीं इन हेलिकॉप्टरों की दुर्घटनाओं की दर अंतरराष्ट्रीय मानकों से कम है। उनके अनुसार, प्रति एक लाख उड़ान घंटों में दुर्घटनाओं की संख्या अंतरराष्ट्रीय मानकों से कम है।
ALH Dhruv Crash: एएलएच हेलिकॉप्टर भारतीय सशस्त्र बलों की रीढ़
देश में निर्मित डबल इंजन वाले 5.5 टन वजनी एएलएच हेलिकॉप्टर भारतीय सशस्त्र बलों की रीढ़ माने जाते हैं। ये हेलिकॉप्टर विभिन्न उपयोगी भूमिकाओं में तैनात हैं, इनका इस्तेमाल बचाव कार्य, निगरानी और लॉजिस्टिक सपोर्ट में किया जाता है। खास बात यह है कि 2002 में शामिल किए जाने के बाद से, इसने लगभग 4 लाख उड़ान घंटे पूरे किए हैं। लेकिन हाल में हुए के हादसों ने उनकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। रविवार को हुई दुर्घटना के बाद विशेषज्ञों ने कहा कि स्वतंत्र और व्यापक जांच के लिए बाहरी विशेषज्ञों को भी शामिल करना चाहिए।
2023 में भी बेड़े को किया था ग्राउंड
यह पहली बार नहीं है जब ALH ध्रुव किसी बड़े हादसे का शिकार हुआ है। 2022 में अरुणाचल प्रदेश में ALH के आर्मर्ड वर्जन ‘रुद्र’ की दुर्घटना में पांच जवानों ने अपनी जान गंवाई थी। इसके बाद 2023 में चार अलग-अलग हादसे हुए, जिनमें नौसेना, सेना और तटरक्षक बल के ALH हेलिकॉप्टर शामिल थे।
इन लगातार घटनाओं के चलते सशस्त्र बलों ने 250 से अधिक ALH ध्रुव और इसके आर्मर्ड वर्जन ALH रुद्र के पूरे बेड़े को विस्तृत तकनीकी जांच के लिए अस्थाई रूप से ग्राउंडेड कर दिया था। जांच में हेलिकॉप्टर के “कलेक्टिव कंट्रोल” जैसे महत्वपूर्ण हिस्सों में समस्याएं पाई गई थीं। इसके बावजूद, दुर्घटनाएं जारी रहीं।
वहीं, सशस्त्र बल अभी भी लगातार एएलएच हेलिकॉप्टरों के नए वैरिएंट्स की लगातार खरीद कर रहे हैं। पिछले साल मार्च में, सेना के लिए 25 एएलएच मार्क-III और तटरक्षक बल के लिए 9 हेलिकॉप्टरों के निर्माण के लिए एचएएल के साथ 8,073 करोड़ रुपये के अनुबंध पर हस्ताक्षर किए गए। इसके अलावा, तटरक्षक बल के लिए 6 नए हेलिकॉप्टरों को मंजूरी दी गई है।
तीन दशकों में 200 से अधिक हेलिकॉप्टर हादसे
भारतीय रक्षा मंत्रालय (MoD) द्वारा संसद में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, पिछले 20 वर्षों में 22 एडवांस्ड लाइट हेलिकॉप्टर (ALH) दुर्घटनाग्रस्त हुए हैं। इन हादसों के अलावा, कई हेलिकॉप्टरों को आपातकालीन लैंडिंग करनी पड़ी है। 2017 से 2021 के बीच, ALH से जुड़ी छह प्रमुख दुर्घटनाओं की रिपोर्ट दी गई थी।
भारतीय सेना को इन हेलिकॉप्टर हादसों के कारण भारी नुकसान झेलना पड़ा है। पिछले तीन दशकों के आंकड़ों पर नजर डालें तो 200 से अधिक हेलिकॉप्टर दुर्घटनाओं में कुल 297 लोगों की जान चली गई है।
पांच टन वजनी इस डबल इंजन मल्टीरोल हेलीकॉप्टर की शुरुआत 1979 में भारतीय वायुसेना के एक कार्यक्रम के तहत हुई थी। 1984 में एचएएल को इसे विकसित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई, जिसमें जर्मनी की मेसर्सचिट-बी-ल्को-ब्लोहम को तकनीकी सलाहकार के रूप में शामिल किया गया। हालांकि, यह साझेदारी 1995 में समाप्त हो गई।
पहला प्रोटोटाइप 1992 में उड़ाया गया, लेकिन परियोजना को पूरा करने में कई देरी हुई। अंततः, लगभग 55% स्वदेशी सामग्री के साथ, ALH ध्रुव को 2002 में भारतीय सशस्त्र बलों में शामिल किया गया। इसका सशस्त्र संस्करण, एमके-IV रुद्र, 2013 में सेना का हिस्सा बना।
ALH ध्रुव के चार प्रमुख संस्करण
Mk-I और Mk-II: पारंपरिक कॉकपिट के साथ ये शुरुआती संस्करण भारतीय सशस्त्र बलों की बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करते हैं।
Mk-III: आधुनिक ग्लास कॉकपिट के साथ आता है और तटरक्षक बल में इसका उपयोग खोज और बचाव मिशनों के लिए किया जाता है।
Mk-IV रुद्र: यह इसका सशस्त्र संस्करण है, जो उन्नत हथियार प्रणालियों और सटीक हमले की क्षमताओं से लैस है।
मल्टीरोल हेलीकॉप्टर की जरूरत क्यों है?
ALH ध्रुव को बहु-भूमिकाओं के लिए डिजाइन किया गया है। यह ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों में सैनिकों और उपकरणों की सप्लाई करने के साथ-साथ युद्ध और आपदा राहत अभियानों में भी उपयोगी है। यह हेलीकॉप्टर भारतीय सशस्त्र बलों के लिए बेहद अहम है क्योंकि यह दुर्गम और कठिन क्षेत्रों में पहुंचने की क्षमता रखता है।
हादसों की वजहें
हाल ही में पोरबंदर में हुए हादसे के पीछे तकनीकी खराबी मुख्य वजह मानी जा रही है। इससे पहले भी कई दुर्घटनाओं में ALH ध्रुव के डिजाइन और निर्माण में खामियां सामने आई हैं। इनमें सबसे प्रमुख हैं बूस्टर कंट्रोल रॉड और कलेक्टिव जैसे महत्वपूर्ण कंपोनेंट्स की समस्याएं। ये हेलीकॉप्टर की स्थिरता बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी हैं। इन हिस्सों में खामी आने से हेलीकॉप्टर उड़ान के दौरान अस्थिर हो सकता है।
इसके अलावा, टेल रोटर वाइब्रेशन वॉर्निंग सिस्टम की विफलता भी हालिया दुर्घटनाओं का कारण रही है। यह सिस्टम पायलट को हेलीकॉप्टर में किसी संभावित समस्या के संकेत देता है, लेकिन इसके सही से काम न करने पर पायलट समय रहते आवश्यक कदम नहीं उठा पाते।
ध्रुव हेलीकॉप्टर का उपयोग ऊंचाई वाले और दुर्गम क्षेत्रों में सबसे ज्यादा होता है। सियाचिन ग्लेशियर और लद्दाख जैसे इलाकों में इसका व्यापक उपयोग किया जाता है, जहां तापमान -40°C तक गिर सकता है। इन कठिन परिस्थितियों में मशीनों पर अधिक दबाव पड़ता है।
इन क्षेत्रों में हेलीकॉप्टरों को अत्यधिक दक्षता और स्थिरता की जरूरत होती है। हालांकि, ध्रुव जैसे हेलीकॉप्टर सामान्य परिस्थितियों में बेहतरीन प्रदर्शन करते हैं, लेकिन इन चुनौतीपूर्ण इलाकों में इन्हें कठिनाई का सामना करना पड़ता है।
ALH ध्रुव जैसे उन्नत हेलीकॉप्टर को उड़ाने के लिए व्यापक प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। लेकिन कई मामलों में पायलटों को पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं मिलता। इससे आपातकालीन परिस्थितियों में पायलट सही निर्णय नहीं ले पाते।
विशेषज्ञों का कहना है कि पायलटों को बेहतर प्रशिक्षण और अनुभव प्रदान कर दुर्घटनाओं की संभावना को कम किया जा सकता है।
डिजाइन में सुधार और नए वेरिएंट्स का सुझाव
एयर वाइस मार्शल मनमोहन बहादुर (सेवानिवृत्त) का कहना है, “हम अपने पायलटों और जवानों को खो रहे हैं। अब समय आ गया है कि हम जांच करें कि ALH जैसे उन्नत हेलीकॉप्टर क्यों दुर्घटनाग्रस्त हो रहे हैं।”
मेजर जनरल संदीपन हांडा (सेवानिवृत्त) के अनुसार, “ऐसे हेलीकॉप्टर का डिजाइन करना चुनौतीपूर्ण है, जो -40°C की ठंड में ऊंचाई वाले इलाकों में काम कर सके और +50°C की गर्मी में भी। एक ही वेरिएंट के बजाय, ऊंचाई और मैदान के लिए अलग-अलग वेरिएंट पर विचार करना अधिक व्यावहारिक होगा।”
वहीं, लेह स्थित 14 कोर के रसद विभाग के प्रमुख रहे मेजर जनरल ए.पी. सिंह (सेवानिवृत्त) का कहना है कि सेना को चीता और चेतक जैसे हल्के हेलीकॉप्टरों के एक आधुनिक बेड़े की जरूरत है। हालांकि, चीता हेलीकॉप्टर की पेलोड क्षमता सीमित है।
उन्होंने कहा, “हमारे अधिकतर हेलीपैड छोटे हैं, जो 5 टन से अधिक वजन वाले हेलीकॉप्टरों को संभालने में सक्षम नहीं हैं। हमें ऐसे हेलीकॉप्टर की जरूरत है, जो छोटे हेलीपैड पर उतर सके और ज्यादा पेलोड ले जा सके।”
Armed Forces Pension: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को फटकार लगाते हुए कहा कि सशस्त्र बलों के कर्मियों और उनके परिवारों को बेवजह के कानूनी झंझटों में न फंसाया जाए। अदालत ने विशेष रूप से पेंशन से जुड़े विवादों को लेकर सरकार द्वारा बार-बार अदालतों में अपील करने की आलोचना भी की।
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अभय एस. ओका और जस्टिस उज्ज्वल भुयान की बेंच ने इस मामले पर केंद्र से नीति-निर्माण की आवश्यकता पर बल दिया। अदालत ने कहा, “जो लोग देश की सेवा करते हैं, उन्हें बार-बार अदालतों में घसीटना सही नहीं है। पहले से ही बहुत कम लोग सशस्त्र बलों में नौकरी करने के इच्छुक हैं। ऐसे में इन लोगों को कानूनी लड़ाइयों में क्यों फंसाया जाए?”
Armed Forces Pension: देश सेवा करने वालों को न घसीटा जाए कानूनी पचड़ों में
अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने केंद्र सरकार की अपील का बचाव करते हुए कहा कि कई मामलों में विकलांगता पेंशन के दावों को चुनौती दी जाती है, क्योंकि वे सर्विस से संबंधित नहीं होते। हालांकि, अदालत ने इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा, “यह अधिकारी कितने वर्षों तक सेवा में रहे? जो लोग देश की सेवा करते हैं, उन्हें ऐसी लड़ाइयों में क्यों घसीटा जाए? यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।”
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की अपील को खारिज करते हुए कहा कि यह मामला न केवल देरी से पेश किया गया, बल्कि इसका कोई ठोस आधार भी नहीं था। यह मामला एक पूर्व भारतीय वायुसेना अधिकारी से जुड़ा था, जो 30 वर्षों की सेवा के बाद टाइप 2 डायबिटीज़ और प्राइमरी हाइपरटेंशन से पीड़ित थे।
रिलीज़ मेडिकल बोर्ड (आरएमबी) ने शुरू में इन स्थितियों को सेवा से संबंधित नहीं माना था। हालांकि, सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (एएफटी) ने 2023 में दिए गए अपने फैसले में कहा कि वायुसेना की कठोर ट्रेनिंग और उससे जुड़ा तनाव इन बीमारियों का कारण हो सकता है।
एएफटी ने अधिकारी को विकलांगता पेंशन के “राउंडिंग ऑफ” का लाभ देते हुए उनकी पेंशन प्रतिशत को 50 फीसदी तक बढ़ाने का आदेश दिया था। इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया और सरकार की अपील को खारिज कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा, “सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (एएफटी) की स्थापना का उद्देश्य क्या था, अगर हर मामले को सुप्रीम कोर्ट तक लाना ही है? ये लोग आपके अपने लोग हैं। उन्होंने देश की सेवा की है।” अदालत ने सरकार को याद दिलाया कि एएफटी का गठन सशस्त्र बलों से संबंधित मामलों के तेजी से निपटारे के लिए किया गया था।
हालांकि यह मामला कोई नया नहीं है। दिसंबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने एक सैनिक की विधवा को परिवार पेंशन देने से इनकार करने के लिए सरकार और भारतीय सेना पर 50,000 रुपये का जुर्माना ठोका था। इस मामले में जवान की पत्नी को सालों तक न्याय के लिए संघर्ष करना पड़ा।
अदालत ने तत्कालीन सरकार के रवैये को “कठोर” और “संवेदनहीन” करार दिया था। अदालत ने कहा था कि सरकार को अपने आंतरिक तंत्र को मजबूत करना चाहिए, ताकि पेंशन विवादों से संबंधित अनावश्यक अपीलों को रोका जा सके।
3,000 से अधिक मामले अदालतों में
जानकारी के अनुसार, सशस्त्र बलों के मृत्यु और विकलांगता लाभ से जुड़े मामलों पर रक्षा मंत्रालय की लगभग 3,000 अपीलें विभिन्न उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। अदालत ने इस समस्या की गंभीरता पर ध्यान देते हुए कहा, “हर मामले को अदालत तक लाने का कोई औचित्य नहीं है। सरकार को ऐसी अपीलों को रोकने के लिए ठोस नीति बनानी चाहिए।”
अदालत ने स्पष्ट किया कि पेंशन और विकलांगता लाभ से संबंधित मामलों में सरकार का दृष्टिकोण मानवीय होना चाहिए। इन मामलों में अनावश्यक कानूनी लड़ाइयों से न केवल प्रभावित व्यक्ति, बल्कि उनके परिवारों को भी मानसिक और आर्थिक नुकसान होता है।
क्या है पेंशन विवाद के पीछे वजह?
कई मामलों में यह देखा गया है कि सरकार तकनीकी मुद्दों का हवाला देकर सैनिकों और उनके परिवारों को लाभ देने से इनकार करती है। अदालत ने इस रवैये की कड़ी आलोचना की और कहा कि पेंशन और विकलांगता लाभ सैनिकों का अधिकार है, न कि कोई विशेषाधिकार।
Armed Forces Tribunals: आर्म्ड फोर्सेज से रिटायर कर्मियों और उनके परिवारों के लिए न्यायिक प्रक्रिया को आसान बनाने के उद्देश्य से, सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को सशस्त्र बल न्यायाधिकरणों Armed Forces Tribunal (एएफटी) की अधिक रीजनल बेंच बनाने की बात कही है। न्यायालय ने सुझाव दिया कि सर्किट बेंचों के माध्यम से स्थानीय स्तर पर न्याय उपलब्ध कराया जा सकता है, ताकि आर्म्ड फोर्स के सदस्यों और उनके परिवारों को लंबी यात्रा और भारी खर्च से बचाया जा सके।
चंडीगढ़ में Armed Forces Tribunal की केवल एक बेंच
जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एन.के. सिंह की बेंच ने चंडीगढ़ के बारे में कहा कि यह क्षेत्र सशस्त्र बलों में योगदान के लिए जाना जाता है। यहां आर्म्ड फोर्स ट्रिब्यूनल की केवल एक बेंच होने के कारण, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और जम्मू-कश्मीर के मामलों को निपटाने में दिक्कत होती है।
Armed Forces Tribunals: श्रीनगर, जम्मू, शिमला और धर्मशाला में बनाएं बेंच
बेंच ने सुझाव दिया कि सर्किट बेंचों को श्रीनगर, जम्मू, शिमला और धर्मशाला जैसे स्थानों पर स्थापित किया जा सकता है, जहां बुनियादी सुविधाएं पहले से उपलब्ध हैं। सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया कि हिमाचल के मामले शिमला और धर्मशाला में सुने जा सकते हैं। जबकि जम्मू और श्रीनगर में भी सर्किट बेंच स्थापित की जा सकती हैं। इससे न केवल मुकदमेबाजी की लागत कम होगी, बल्कि सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों और उनके परिवारों को लंबी दूरी तय करने की आवश्यकता भी नहीं पड़ेगी।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, “यदि रीजनल बेंच स्थापित की जाए और स्थानीय बार को इसमें शामिल किया जाए, तो न्यायिक प्रक्रिया को तेज़ और किफायती बनाया जा सकता है।”
मद्रास बार एसोसिएशन की याचिका पर सुनवाई के दौरान, वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने बताया कि एएफटी में अभी भी कई पद रिक्त हैं। उन्होंने कहा, “चंडीगढ़ में केवल एक बेंच है और एक सदस्य का तबादला हो चुका है, लेकिन उनके स्थान पर किसी की नियुक्ति नहीं हुई है। केंद्र सरकार ने कई बार नियुक्तियों का आश्वासन दिया है, लेकिन प्रगति न के बराबर है।”
भारत के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने अदालत को बताया कि एएफटी के अध्यक्ष आंतरिक प्रशासनिक मुद्दों से अवगत हैं और चयन प्रक्रिया पूरे साल चलती रहती है। हालांकि, उन्होंने रिक्त पदों को समय पर भरने की प्राथमिकता पर जोर दिया।
एडवांस सिलेक्शन प्रोसेस पर विचार करे सरकार
बेंच ने सुझाव दिया कि भविष्य में ऐसी स्थितियों से बचने के लिए एडवांस सिलेक्शन प्रोसेस पर विचार किया जाना चाहिए। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, “किसी सदस्य के पद छोड़ने की तारीख की पहले से जानकारी होती है। अगर समय पर नियुक्तियां हो जाएं तो न्याय प्रक्रिया में देरी से बचा जा सकता है।”
सुप्रीम कोर्ट ने सर्किट बेंच के माध्यम से आर्म्ड फोर्स के सदस्यों को जस्टिस मिलने में आसानी होगी। हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में शिमला और धर्मशाला में सर्किट बेंच स्थापित की जा सकती हैं। इस पहल से सैनिकों और पूर्व सैनिकों को चंडीगढ़ तक यात्रा करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से सभी आर्म्ड फोर्स ट्रिब्यूनल में रिक्तियों की स्थिति और चयन प्रक्रिया की जानकारी देने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि सशस्त्र बलों के न्याय से जुड़े मामलों को त्वरित और प्रभावी बनाने के लिए यह बेहद जरूरी है।
Explainer ALH Dhurv Crash: गुजरात के पोरबंदर में भारतीय तटरक्षक बल का एडवांस्ड लाइट हेलीकॉप्टर (ALH) ध्रुव क्रैश होने से दो पायलट और एक अन्य क्रू मेंबर की मौत हो गई। यह दुर्घटना उस वक्त हुई जब नियमित ट्रेनिंग के दौरान हेलीकॉप्टर में तकनीकी खराबी आ गई। यह पहली बार नहीं है जब HAL (हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड) का बनाया यह हेलीकॉप्टर हादसे का शिकार हुआ है।
पिछले कुछ वर्षों में ALH ध्रुव और इसके दूसरे वर्जन के कई हादसे हुए हैं। इन दुर्घटनाओं ने एएलएच के सुरक्षा मानकों और डिजाइन खामियों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ALH ध्रुव का इस्तेमाल भारतीय सशस्त्र बल खोज और बचाव अभियान, रेकी, ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सामान और हथियार पहुंचाने जैसे कार्यों के लिए इस्तेमाल करते हैं।
Explainer ALH Dhurv Crash: तीन दशक में 200 से अधिक हेलिकॉप्टर हादसे
केंद्रीय रक्षा मंत्रालय (MoD) द्वारा संसद को दिए गए आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक पिछले 20 सालों में, 22 ALH दुर्घटनाग्रस्त हो चुके हैं और कई को आपातकालीन लैंडिंग करनी पड़ी। MoD के आंकड़ों के अनुसार, 2017 और 2021 के बीच ALH से जुड़ी छह दुर्घटनाओं की सूचना दी गई। कुल मिलाकर, भारतीय सेना को इन हेलीकॉप्टर हादसों से बड़ा नुकसान हुआ है। पिछले तीन दशकों में, 200 से अधिक हेलिकॉप्टर दुर्घटनाओं में 297 लोगों की जान चली गई है। पिछले पांच वर्षों में, भारतीय सेना ने देश के पहले चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत सहित 40 कर्मियों को हेलिकॉप्टर दुर्घटनाओं में खो दिया है।
2023 में पूरे बेड़े को कर दिया था ग्राउंड
गुजरात के पोरबंदर में हाल ही में हुए हादसे में भारतीय तटरक्षक बल का एक ALH ध्रुव हेलीकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जिसमें दो पायलट और एक क्रू मेंबर की मौत हो गई। शुरुआती रिपोर्टों के अनुसार, उड़ान के दौरान तकनीकी खराबी के कारण यह हादसा हुआ। हालांकि यह पहली बार नहीं है जब ALH ध्रुव किसी दुर्घटना का शिकार हुआ है। 2022 में अरुणाचल प्रदेश में एक एएलएच का आर्मर्ड वर्जन ‘रूद्र’ दुर्घटनाग्रस्त हुआ था, जिसमें पांच जवान मारे गए थे। इसके बाद 2023 में तीन अलग-अलग हादसे हुए, जिनमें नौसेना, सेना और तटरक्षक बल के ALH शामिल थे। इन घटनाओं के बाद 250 से अधिक ALH ध्रुव और इसके आर्मर्ड वर्जन ALH रुद्र के पूरे बेड़े को विस्तृत जांच के लिए अस्थाई तौर पर ग्राउंडेड कर दिया गया।
ALH ध्रुव: क्या है इसकी खासियत?
ALH ध्रुव का निर्माण हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) ने किया है। ध्रुव एक मल्टीरोल हेलीकॉप्टर है, जिसे भारतीय सशस्त्र बलों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए डिजाइन किया गया है। इसका उपयोग सैनिकों और रसद की आपूर्ति, चिकित्सा निकासी, और राहत कार्यों के लिए किया जाता है। पांच टन वजनी डबल इंजन मल्टीरोल हेलीकॉप्टर का कार्यक्रम भारतीय वायुसेना द्वारा 1979 में शुरू किया गया था। एचएएल को 1984 में इसे डेवलप करने के लिए कहा गया था, और जर्मनी के मेसर्सचिट-बी-ल्को-ब्लोहम को एडवइजर बनाया गयाा। लेकिन यह व्यवस्था 1995 तक समाप्त हो गई। पहले प्रोटोटाइप ने 1992 में उड़ान भरी। हालांकि, इस परियोजना में कई देरी हुई। अंत में, लगभग 55 फीसदी स्वदेशी सामग्री के साथ, एएलएच ध्रुव को 2002 में सशस्त्र बलों में शामिल किया गया; इसके सशस्त्र संस्करण एमके-IV रुद्र को 2013 में शामिल किया गया था। इसके चार वैरिएंट हैं। जिनमें Mk-I और Mk-II पारंपरिक कॉकपिट के साथ आते हैं। जबकि Mk-III और Mk-IV इसका मिलिट्री वर्जन रूद्र है, जो आधुनिक ग्लास कॉकपिट और विपन सिस्टम के साथ आता है।
हालांकि, इनकी खूबियों के बावजूद, ALH ध्रुव बार-बार हादसों का शिकार हो रहा है, जिससे इसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं।
Explainer ALH Dhurv Crash: हादसों की मुख्य वजहें
हाल ही में पोरबंदर में हुए हेलीकॉप्टर क्रेश में जो शुरुआती वजह सामने आई है उसमें तकनीकी गड़बड़ी को बताया गया है। इससे पहले भी हुए हादसों में ध्रुव हेलीकॉप्टर के डिजाइन और निर्माण में कई तकनीकी खामियां सामने आई हैं। इनमें सबसे प्रमुख है ‘बूस्टर कंट्रोल रॉड’ और ‘कलेक्टिव’ जैसे महत्वपूर्ण कंपोनेंट्स में खामियां पाई गई हैं। ये हिस्से हेलीकॉप्टर की स्थिरता को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं। यदि इनमें कोई समस्या हो, तो उड़ान के दौरान हेलीकॉप्टर अस्थिर हो सकता है।
इसके अलावा, हालिया हादसों में ‘टेल रोटर वाइब्रेशन वॉर्निंग सिस्टम’ के सही तरीके से काम न करने की शिकायतें भी सामने आई हैं। यह सिस्टम हेलीकॉप्टर के पायलट को किसी भी संभावित समस्या के संकेत देता है। लेकिन, इसकी विफलता के कारण कई बार पायलट समय रहते आवश्यक कदम नहीं उठा पाते।
4 मई को जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ में हुए एएलएच. हादसे में टेल रोटर वाइब्रेशन वॉर्निंग सिस्टम ने पायलट को सचेत नहीं किया था। नौसेना का एएलएच., जो 8 मार्च को अरब सागर में गिरा था, माना जाता है कि बूस्टर कंट्रोल रॉड में तकनीकी खराबी के कारण ऐसा हुआ था।
रखरखाव की कमी
हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) द्वारा निर्मित ध्रुव हेलीकॉप्टरों के रखरखाव को लेकर भी गंभीर चिंताएं हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, पुराने पुर्जों का उपयोग और खराब गुणवत्ता वाले स्पेयर पार्ट्स दुर्घटनाओं का मुख्य कारण बनते हैं।
सेना और अन्य बलों ने HAL पर बार-बार हेलीकॉप्टरों के नियमित रखरखाव में कोताही बरतने का आरोप लगाया है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर रखरखाव के मानकों का सही तरीके से पालन किया जाए, तो इन हादसों को रोका जा सकता है।
कठिन भौगोलिक परिस्थितियां
भारत के ऊंचाई वाले और दुर्गम क्षेत्रों में ध्रुव हेलीकॉप्टर का व्यापक उपयोग होता है। विशेष रूप से, सियाचिन ग्लेशियर और लद्दाख जैसे इलाकों में, जहां अत्यधिक ठंड और कम ऑक्सीजन के कारण मशीनों पर अधिक दबाव पड़ता है।
इन कठिन परिस्थितियों में हेलीकॉप्टरों को अधिक दक्षता और स्थिरता की जरूरत होती है। हालांकि, ध्रुव जैसी मशीनें, जो सामान्य परिस्थितियों में बेहतरीन प्रदर्शन करती हैं, इन चुनौतीपूर्ण इलाकों में अक्सर दबाव का सामना नहीं कर पातीं।
पायलट प्रशिक्षण की कमी
ALH जैसे एडवांस हेलीकॉप्टर को ऑपरेट करने के लिए विशेष और व्यापक प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। लेकिन, कई मामलों में पायलटों को पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं मिलता। इससे आपात स्थितियों में सही निर्णय लेने की उनकी क्षमता प्रभावित होती है।
मैदान और पहाड़ के लिए बनाएं अलग-अलग वैरिएंट
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर पायलटों को उचित प्रशिक्षण और अनुभव प्रदान किया जाए, तो दुर्घटनाओं की संभावना को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
एयर वाइस मार्शल मनमोहन बहादुर (सेवानिवृत्त) कहते हैं, “हम अपने लोगों को खो रहे हैं। अब समय आ गया है कि हम जांच करें कि भारत के सबसे उन्नत हेलीकॉप्टर माने जाने वाले एएलएच क्यों दुर्घटनाग्रस्त हो रहे हैं।”
वहीं, आर्मी एविएशन के पूर्व अतिरिक्त महानिदेशक और अनुभवी हेलीकॉप्टर पायलट मेजर जनरल संदीपन हांडा (सेवानिवृत्त) का कहना है, “ऐसे हेलीकॉप्टर को डिजाइन करना बेहद चुनौतीपूर्ण है, जो एक तरफ -40 डिग्री सेल्सियस की कड़क ठंड में ऊंचाई वाले इलाकों में काम कर सके और दूसरी तरफ +50 डिग्री सेल्सियस की तपती गर्मी वाले रेगिस्तानी इलाकों में भी। हर तरह की परिस्थितियों के लिए एक ही प्रकार का हेलीकॉप्टर बनाने की बजाय, दो अलग-अलग वैरिएंट पर विचार करना अधिक समझदारी होगी, एक ऊंचाई वाले इलाकों के लिए और दूसरा मैदानी इलाकों के लिए।”
लेह स्थित 14 कोर के रसद विभाग के प्रमुख रहे मेजर जनरल ए.पी. सिंह (सेवानिवृत्त) का कहना है, “सेना को चीता और चेतक जैसे हल्के हेलीकॉप्टरों के एक आधुनिक बेड़े की जरूरत है, लेकिन उनकी रफ्तार में सुधार होना चाहिए।” हालांकि, चीता हेलीकॉप्टर बहुत अधिक ऊंचाई पर केवल 20 किलोग्राम का पेलोड ले जा सकता है। इसका मतलब है कि सेना को सिर्फ 20 किलोग्राम सामान ले जाने के लिए प्रति उड़ान 60,000 रुपये का खर्च करना पड़ता है।
मेजर जनरल सिंह आगे कहते हैं, “हमारे अधिकांश हेलीपैड छोटे हैं, जो 5 टन से अधिक वजन वाले बड़े हेलीकॉप्टरों को नहीं संभाल सकते। ऐसे में हमें ऐसे हेलीकॉप्टर की जरूरत है, जो छोटे हेलीपैड पर उतरने में सक्षम हो और साथ ही ज्यादा पेलोड ले जा सके।”
ALH के निर्यात पर पड़ सकता है असर
हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) ने ALH को भारतीय सशस्त्र बलों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए डिजाइन किया था। यह हेलीकॉप्टर ‘मेक इन इंडिया’ अभियान का एक प्रमुख उदाहरण है। HAL का दावा है कि हर दुर्घटना के बाद व्यापक जांच और सुधार किए जाते हैं।
भारत ALH ध्रुव का निर्यात बढ़ाने की योजना बना रहा है। फिलीपींस जैसे देशों के साथ बातचीत चल रही है, लेकिन इक्वाडोर का अनुभव इस परियोजना के लिए एक सबक है। इक्वाडोर ने 2009-2012 के बीच सात ALH खरीदे थे, लेकिन चार दुर्घटनाओं के बाद उसने 2015 में कॉन्ट्रैक्ट खत्म कर दिया। अगर भारत को इस हेलीकॉप्टर को अंतरराष्ट्रीय बाजार में सफल बनाना है, तो सुरक्षा और गुणवत्ता में सुधार करना बेहद जरूरी है।
Explainer Indian Army Promotion Policy: भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट जनरल रैंक के अधिकारियों की प्रमोशन प्रक्रिया में बड़ा बदलाव होने जा रहा है। नई प्रमोशन नीति के तहत भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट जनरल बनने के लिए अब केवल वरिष्ठता ही नहीं, बल्कि ग्रेडिंग भी अहम होगी। 31 मार्च 2025 से लागू होने वाली इस नई नीति के तहत लेफ्टिनेंट जनरल रैंक के अधिकारियों को उनके प्रदर्शन के आधार पर 1 से 9 तक की स्केल में मापा जाएगा। इससे सेना में मेरिट-आधारित चयन प्रक्रिया को बढ़ावा मिलेगा। यह प्रणाली सेना के शीर्ष अधिकारियों की जिम्मेदारियों को अधिक पारदर्शी और प्रभावी बनाने के लिए तैयार की गई है। इससे पहले यह नीति भारतीय वायुसेना और नौसेना में पहले से ही लागू है।
Credit: Indian Army
Explainer Indian Army Promotion Policy: क्या है नई प्रणाली में खास?
भारतीय सेना इस समय बदलाव के दौर से गुजर रही है। भारतीय सेना में मॉर्डेनाइजेशन के साथ स्ट्रक्चर में जरूरी बदलाव भी किए जा रहे हैं। सेना की प्रमोशन पॉलिसी में लगातार बदलाव देखे जा रहे हैं। वहीं अब नया बदलाव सेना में वरिष्ठ अधिकारियों के प्रमोशन लेकर हुआ है।
अब तक भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट जनरल रैंक तक प्रमोशन वरिष्ठता के आधार पर होता था। लेकिन नई प्रणाली में प्रदर्शन को प्राथमिकता दी जाएगी। अधिकारियों को उनकी वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (एसीआर) में 1 से 9 के स्केल पर ग्रेडिंग दी जाएगी। इस ग्रेडिंग का सीधा असर उनकी प्रमोशन और भविष्य की जिम्मेदारियों पर पड़ेगा। भारतीय वायुसेना और नौसेना में पहले से ही यह प्रणाली लागू है और अब सेना ने इसे अपनाने का फैसला किया है।
सेना में 90 लेफ्टिनेंट जनरल, 300 मेजर जनरल और 1,200 ब्रिगेडियर
सूत्रों का कहना है कि इस बदलाव का उद्देश्य है सेना के शीर्ष अधिकारियों की नियुक्ति में पारदर्शिता और योग्यता को प्राथमिकता देना। यह नई पॉलिसी थियेटर कमांड्स और ट्राई-सर्विस (सेना, नौसेना, और वायुसेना) के वरिष्ठ पदों पर अधिकारियों की नियुक्ति में मदद करेगी।
लेफ्टिनेंट जनरल रैंक भारतीय सेना में थ्री-स्टार रैंक का पद होता है। भारतीय सेना के 11 लाख जवानों में लगभग 90 लेफ्टिनेंट जनरल, 300 मेजर जनरल और 1,200 ब्रिगेडियर हैं। लेफ्टिनेंट जनरल बनने के बाद अधिकारी को कोर कमांडर या आर्मी कमांडर जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिलती हैं। अब नई प्रणाली के तहत यह सुनिश्चित किया जाएगा कि केवल योग्य और बेहतर प्रदर्शन करने वाले अधिकारी ही इन पदों पर पहुंचें। क्योंकि अभी तक इन पदों पर सीनियरिटी के आधार पर ही पहुंच पाते थे।
थिएटर कमांड पर है फोकस
भारतीय सेना में थिएटर कमांड्स की योजना के मद्देनजर यह नई प्रणाली लागू की जा रही है। यह कमांड्स भारत की तीन प्रमुख सीमाओं- चीन, पाकिस्तान और हिंद महासागर क्षेत्र पर केंद्रित होंगी। चीन-विशेष थिएटर कमांड लखनऊ में, पाकिस्तान-विशेष थिएटर कमांड जयपुर में और समुद्री थिएटर कमांड तिरुवनंतपुरम में बनाया जाएगा। उम्मीद जताई जा रही है कि इस साल के मध्य तक थिएटर कमांड्स बनाने का काम पूरा हो जाएगा। इन थिएटर कमांड्स का उद्देश्य भारतीय सेना को एकीकृत और अधिक प्रभावी युद्धक क्षमता प्रदान करना है।
नई प्रमोशन नीति से सेना में पारदर्शिता और दक्षता बढ़ने की उम्मीद है। अब तक वरिष्ठता के आधार पर अधिकारियों को जिम्मेदारियां दी जाती थीं। लेकिन नई प्रणाली में ग्रेडिंग के जरिए यह सुनिश्चित किया जाएगा कि सही अधिकारी को सही पद पर नियुक्त किया जाए। इससे न केवल सेना की कार्यकुशलता में सुधार होगा, बल्कि भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए सेना को बेहतर तरीके से तैयार किया जा सकेगा।
हालांकि सेना के इस कदम को सुधारवादी बताया जा रहा है, लेकिन इसने विवाद भी खड़े कर दिए हैं। वर्तमान में, लेफ्टिनेंट जनरल रैंक तक प्रमोशन के लिए वरिष्ठता का आधार जन्मतिथि और नियुक्ति की तिथि होती है। लेकिन नई पॉलिसी में मेरिट को प्राथमिकता देने से संभावित राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ सकता है।
नई नीति के लागू होने के साथ ही विवाद भी शुरू हो गए हैं। नई प्रणाली में प्रदर्शन को प्राथमिकता देने से प्रतिस्पर्धा और दबाव बढ़ सकता है। कुछ अधिकारियों को यह भी डर है कि ग्रेडिंग प्रणाली में भेदभाव या पक्षपात हो सकता है।
कई अधिकारियों ने इस पॉलिसी पर चिंता जताई है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “थ्री-स्टार जनरल बनने के लिए पहले ही कई स्तरों पर मेरिट के आधार पर प्रमोशन मिलता है। इस नई प्रणाली से गैरजरूरी हस्तक्षेप की संभावना बढ़ जाएगी।”
रिटायर्ड मेजर जनरल राजू चौहान का कहना है कि नई नीति से अधिकारियों के प्रदर्शन को सम्मान मिलेगा। हालांकि, इससे संभावित पक्षपात और विवाद का खतरा भी है।
वहीं, पूर्व रक्षा विशेषज्ञ मन अमन सिंह छिन्ना का मानना है कि सेना को ब्रिगेडियर से लेकर लेफ्टिनेंट जनरल तक प्रो-राटा सिस्टम को खत्म कर देना चाहिए और पूरी तरह से मेरिट-आधारित चयन करना चाहिए।
जबकि रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल केजेएस ढिल्लों उसके पक्ष में हैं, उनके अनुसार, “यह नीति उन अधिकारियों का सम्मान करेगी जो वर्तमान में अपनी रैंक पर उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रहे हैं। पहले प्रमोशन की प्रक्रिया किसी की जन्म तिथि या 38 साल पहले की अकादमी की रैंकिंग पर निर्भर करती थी।”
सेना में लेफ्टिनेंट जनरल बनने के बाद अधिकारी को आर्मी कमांडर या वाइस चीफ बनने के लिए वरिष्ठता और रेसिड्यूल सर्विस के आधार पर चुना जाता है। लेकिन ग्रेडिंग प्रणाली यह सुनिश्चित करेगी कि सही व्यक्ति को जिम्मेदारी मिले।
सैनिक कमांडर और वाइस चीफ पर लागू नहीं होगी यह नीति
सेना के उप-प्रमुख और सात कमांडर-इन-चीफ (C-in-C) इस नई नीति के दायरे में नहीं आएंगे। इन पदों पर नियुक्ति अभी भी वरिष्ठता के आधार पर होगी। लेफ्टिनेंट जनरल के पद पर पहुंचने के बाद, अधिकारी को कोर कमांडर बनाने के लिए उनकी ग्रेडिंग और प्रदर्शन देखा जाएगा। आर्मी कमांडर का पद भी लेफ्टिनेंट जनरल को मिलता है। ग्रेडिंग प्रणाली से यह तय किया जाएगा कि कौन-से अधिकारी आर्मी कमांडर बनने के योग्य हैं।
ग्रेडिंग प्रणाली और थिएटर कमांड्स की योजना सेना को आधुनिक और प्रभावी बनाने की दिशा में उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम है। हालांकि, इस नीति की सफलता इसके निष्पक्ष और कुशल कार्यान्वयन पर निर्भर करेगी। नई प्रणाली का उद्देश्य सेना को पारदर्शिता, योग्यता और आधुनिकता की ओर ले जाना है, जो इसे भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार करेगी।
हालांकि, इस प्रणाली को लागू करने में कई चुनौतियां भी हैं। ग्रेडिंग प्रणाली में भेदभाव की संभावना को नकारा नहीं जा सकता। अधिकारियों पर प्रदर्शन करने का अतिरिक्त दबाव भी होगा। इसके अलावा, राजनीतिक हस्तक्षेप और पक्षपात की संभावनाएं भी मौजूद हैं।
Starlink misuse in India: स्टारलिंक सैटेलाइट इंटरनेट डिवाइस (Starlink satellite internet device) को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है। पिछले दिनों मणिपुर से सुरक्षा एजेसियों ने स्टारलिंक डिवाइस को मणिपुर के आतंकी समूहों से बरामद किया था। इस डिवाइस को एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स (SpaceX) बनाती है। यह डिवाइस पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) नामक आतंकी समूह के ठिकाने से बरामद हुई थी। सुरक्षा बलों ने 13 दिसंबर को सेना, असम राइफल्स और मणिपुर पुलिस के संयुक्त अभियान के दौरान इसे जब्त किया था। डिवाइस पर RPF/PLA लिखा हुआ था, जो इस आतंकी संगठन की पहचान है। स्टारलिंक डिवाइस उस वक्त चर्चा में आई थी, जब रूस-यूक्रेन युद्ध में इसके इस्तेमाल की खबरें आई थीं।
Starlink misuse in India: उग्रवादी समूह कर रहे हैं स्टारलिंक का इस्तेमाल
वहीं गार्जियन अखबार ने खुलासा किया है कि मणिपुर में जारी हिंसा के दौरान उग्रवादी समूहों ने इंटरनेट शटडाउन के बावजूद स्टारलिंक डिवाइस का इस्तेमाल किया था। हालांकि स्टारलिंक को भारत में अभी तक लाइसेंस नहीं मिला है और इसके ऑपरेशन शुरू करने की अनुमति नहीं दी गई है। लेकिन म्यांमार में स्टारलिंक की सर्विस जारी है। मणिपुर की सीमा म्यांमार से सटी हुई हैं, जिससे यह संभावना जताई जा रही है कि इन डिवाइसों को तस्करी के जरिए मणिपुर लाया गया।
Acting on specific intelligence, troops of #IndianArmy and #AssamRifles formations under #SpearCorps carried out joint search operations in the hill and valley regions in the districts of Churachandpur, Chandel, Imphal East and Kagpokpi in #Manipur, in close coordination with… pic.twitter.com/kxy7ec5YAE
सूत्रों के अनुसार, यह डिवाइस म्यांमार सीमा पर सक्रिय आतंकी समूहों द्वारा इस्तेमाल की जा रही है। स्टारलिंक के उपयोग से आतंकियों को सीमावर्ती इलाकों में इंटरनेट तक आसान पहुंच मिल रही है, जिससे उनकी गतिविधियों को अंजाम देना और भी आसान हो गया है।
Starlink misuse in India: एलन मस्क ने किया था इनकार
पिछले साल दिसंबर में जब असम राइफल्स ने मणिपुर के उग्रवादी समूहों से स्टारलिंक के डिश और राउटर को जब्त किया था, उस वक्त एलन मस्क ने X (पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट जारी करके कहा था कि “स्टारलिंक भारत में बंद है और इसका उपयोग नहीं हो सकता।” हालांकि, सुरक्षा बलों द्वारा डिवाइस जब्त किए जाने और आतंकियों द्वारा इसके इस्तेमाल की पुष्टि के बाद मस्क का यह दावा सवालों के घेरे में है।
This is false. Starlink satellite beams are turned off over India.
सूत्रों ने बताया कि स्टारलिंक डिवाइस म्यांमार के जरिए भारत में तस्करी कर लाई जाती है। इन डिवाइसों का उपयोग मणिपुर के सीमावर्ती इलाकों में किया जा रहा है, जहां इंटरनेट सेवाएं सरकार द्वारा निलंबित रहती हैं।
सूत्रों ने बताया कि मणिपुर के सभी उग्रवादी आदिवासी समूह- मैतयी, नागा और कुकी- सभी स्टारलिंक डिवाइस का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिन्हें मुख्य रूप से म्यांमार और सीमावर्ती क्षेत्रों से कंट्रोल किया जाता है। सूत्रों का कहना है कि “म्यांमार स्थित विद्रोही समूह और तस्कर अपने कामों के लिए इस डिवाइस का उपयोग करते हैं क्योंकि स्टारलिंक पर डाटा की कोई लिमिट नहीं है।”
एक सूत्र ने कहा, “हां, यह सच है कि स्टारलिंक का इस्तेमाल दिल्ली, मुंबई या कहीं भी अंदरूनी इलाकों में नहीं किया जा सकता है, क्योंकि भारत को कंपनी ने खुद ही जियोटैग किया हुआ है, लेकिन यह म्यांमार के सीमावर्ती इलाकों में सक्रिय है।”
Starlink misuse in India: ड्रग तस्करी में हो रहा है इस्तेमाल
हालांकि यह पहली बार नहीं है जब स्टालिंक डिवाइस पकड़ी गई हो। इससे पहले भी भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने पिछले साल नवंबर में स्टारलिंक डिवाइस बरामद की थी। नवंबर के अंत में अंडमान और निकोबार पुलिस ने म्यांमार की एक नाव में 6,000 किलोग्राम से अधिक मेथामफेटामाइन के अलावा एक स्टारलिंक मिनी इंटरनेट डिवाइस जब्त की थी यह डिवाइस तस्करों द्वारा नेविगेशन और वाई-फाई हॉटस्पॉट बनाने के लिए उपयोग की जा रही थी। अंडमान के डीजीपी हरगोबिंदर सिंह धालीवाल ने पुष्टि की कि तस्करों ने सैटेलाइट फोन का इस्तेमाल कर इंटरनेट हॉटस्पॉट बनाए थे, जो उनकी गतिविधियों को आसान बना रहे थे।
सरकार ने मांगी थी जानकारी, कंपनी ने किया था इनकार
सूत्रों ने बताया कि वहीं, जब भारत सरकार ने स्टारलिंक से जब इन उपकरणों के मूल खरीदारों की जानकारी मांगी, लेकिन कंपनी ने डेटा गोपनीयता कानूनों का हवाला देते हुए सहयोग करने से इनकार कर दिया। सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “तस्करी के मामले में जब्त इन उपकरणों के मालिकों की जानकारी मांगी गई थी, लेकिन स्टारलिंक ने सहयोग से मना कर दिया।”
स्टारलिंक डिवाइस का उपयोग गैरकानूनी गतिविधियों, जैसे तस्करी और आतंकवाद में होने से भारत में सुरक्षा एजेंसियां सतर्क हो गई हैं। सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक स्टारलिंक अपने सुरक्षा उपायों और डेटा प्रबंधन पर संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं देती, तब तक उसे भारत में ऑपरेंशंस शुरू करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
भारत सरकार ने डॉट (DoT) और MHA से स्टारलिंक की तकनीकी और सुरक्षा प्रोटोकॉल की जांच के निर्देश दिए हैं। वरिष्ठ अधिकारियों ने संकेत दिया है कि कंपनी से सुरक्षा उपायों पर जानकारियां मांगी जा रही हैं, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि इस तकनीक का दुरुपयोग न हो।
एलोन मस्क लंबे समय से स्टारलिंक को भारत जैसे विशाल बाजार में लाने की कोशिश कर रहे हैं। नवंबर 2024 में, भारत सरकार ने पुष्टि की थी कि स्टारलिंक आवश्यक सुरक्षा अनुमतियां प्राप्त करने की प्रक्रिया में है। हालांकि, भारत में सैटेलाइट इंटरनेट जैसी सेवाओं पर सख्त नियंत्रण है। विशेषज्ञों का मानना है कि स्टारलिंक का उपयोग इंटरनेट शटडाउन को दरकिनार करने के लिए किया जा सकता है, जो भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक गंभीर खतरा है।
स्टारलिंक: क्या है इसकी खूबियां?
स्टारलिंक की वेबसाइट के अनुसार, “वह दुनिया का पहला और सबसे बड़ा उपग्रह समूह” है, जो LEO उपग्रहों का उपयोग करके ब्रॉडबैंड इंटरनेट प्रदान करता है। यह सेवा स्ट्रीमिंग, ऑनलाइन गेमिंग, वीडियो कॉल जैसे उच्च-बैंडविड्थ कार्यों को सुचारू रूप से सपोर्ट करने में सक्षम है। अधिकांश पारंपरिक उपग्रह इंटरनेट सेवाएं 35,786 किमी की ऊंचाई पर स्थित भूस्थिर उपग्रहों पर निर्भर करती हैं। इसके कारण उपयोगकर्ता और उपग्रह के बीच डेटा के राउंड-ट्रिप समय (विलंबता) में काफी देरी होती है। यह विलंबता 600 मिलीसेकंड या उससे अधिक हो सकती है, जिससे ऑनलाइन गेमिंग, वीडियो कॉल जैसी गतिविधियों के लिए यह सिस्टम उपयुक्त नहीं बन पाता।
वहीं स्टारलिंक ने इस समस्या को हल करते हुए विलंबता को घटाकर केवल 25 मिलीसेकंड तक कर दिया है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि इसके उपग्रह पृथ्वी के बेहद करीब, सिर्फ 550 किमी की ऊंचाई पर परिक्रमा करते हैं। इस तरह यह पूरी दुनिया को कवर करता है।
जून 2024 में सिएरा लियोन, अफ्रीका में सेवाएं शुरू होने के बाद, स्टारलिंक अब 100 देशों में सक्रिय हो चुकी है। कंपनी भारत में भी अपनी सेवाएं शुरू करने के लिए लाइसेंस प्रक्रिया में है। भारत में स्टारलिंक को भारती एंटरप्राइजेज के स्वामित्व वाली यूटेलसैट वनवेब, रिलायंस इंडस्ट्रीज के जियोस्पेसफाइबर, और अमेज़न के कुइपर सिस्टम्स जैसे कंपनियों से मुकाबला करना होगा। वहीं, स्टारलिंक की योजना है कि 42,000 उपग्रहों का एक विशाल तारामंडल (Megaconstellation) बनाना है। इसके मुकाबले, यूटेलसैट वनवेब के नेटवर्क में 1,200 किमी की LEO कक्षा में लगभग 630 उपग्रह शामिल हैं।
Pakistan Army Exercise: पाकिस्तान की सेना ने हाल ही में पंजाब प्रांत में भारतीय सीमा के करीब इंटरनेशनल बॉर्डर के पास बड़े पैमाने पर सैन्य अभ्यास कर रही है। इस अभ्यास में हमलावर हेलिकॉप्टर, हेवी लिफ्ट हेलिकॉप्टर, टैंक, बख्तरबंद गाड़ियां और हॉवित्ज़र तोपों जैसे बड़े हथियारों का इस्तेमाल किया जा रहा है। यह अभ्यास दिसंबर 2024 के पहले सप्ताह में शुरू हुआ और फिलहाल जारी है।
Pakistan Army Exercise: गांव की तंग गलियों में फंसी हॉवित्ज़र तोपें
स्थानीय लोगों के अनुसार, अभ्यास के दौरान भारी सैन्य टुकड़ियों को पंजाब प्रांत के गांवों से गुजरते हुए देखा गया। शाम के समय की कुछ झलकियां भी सोशल मीडिया पर सामने आई हैं, जहां पाकिस्तानी सेना की हॉवित्ज़र तोपों को गांव की तंग गलियों में फंसे हुए देखा गया।
Pakistan Army Exercise: पाकिस्तान के पास पुरानी एटीजीएम
रक्षा विशेषज्ञ और रिटायर्ड कर्नल रोहित वत्स बताते हैं कि कोबरा अटैक हेलीकॉप्टरों के इस्तेमाल में एक खास रणनीति देखी जाती है। दोनों पक्षों के गनशिप अपनी उपस्थिति को छुपाने के लिए कम ऊंचाई पर उड़ान भरते हैं और लक्ष्य को निशाना बनाने तथा एंटी-टैंक मिसाइल फायर करने के लिए ऊंचाई पर उठते हैं।
हालांकि, इसमें बड़ा फर्क मिसाइल तकनीक का है। पाकिस्तानी गनशिप दूसरी पीढ़ी की वायर-गाइडेड एटीजीएम (एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल) का उपयोग करते हैं, जबकि भारतीय गनशिप तीसरी पीढ़ी की फायर-एंड-फॉरगेट मिसाइलें दागते हैं।
इसका मतलब है कि पाकिस्तानी गनशिप को मिसाइल दागने के बाद अपनी स्थिति बनाए रखनी पड़ती है ताकि ऑपरेटर मिसाइल को लक्ष्य तक गाइड कर सके। वहीं, भारतीय गनशिप मिसाइल फायर करने के बाद तुरंत अपनी जगह बदल सकते हैं या नई फायरिंग पोजीशन पर जा सकते हैं, क्योंकि भारतीय मिसाइलें खुद-ब-खुद अपने लक्ष्य को खोजने और नष्ट करने में सक्षम होती हैं।
इस दौरान, पाकिस्तानी गनशिप, मिसाइल को गाइड करने के लिए अपनी स्थिति बनाए रखते हुए, बेहद असुरक्षित हो जाते हैं और इन्हें दुश्मन के हमले का खतरा रहता है।
आतंकवाद के गढ़ मुजफ्फराबाद में विशेष ट्रेनिंग
पाकिस्तान ने इससे पहले अगस्त 2024 में नियंत्रण रेखा (एलओसी) और अंतरराष्ट्रीय सीमा (आईबी) पर हाई अलर्ट जारी किया था। खुफिया सूत्रों के अनुसार, हाल ही में पाकिस्तान ने मुजफ्फराबाद में एक बड़ी क्विक रिस्पॉन्स ट्रेनिंग का अभ्यास किया था। इस इलाके को आतंकवादियों का गढ़ माना जाता है। इस ट्रेनिंग में पाकिस्तानी सेना के स्पेशल सर्विस ग्रुप (एसएसजी) के कमांडो भी शामिल थे।
क्विक रिस्पॉन्स टीम (क्यूआरटी) का यह अभ्यास किसी हमले की स्थिति में सेना की तैयारियों को परखने के लिए आयोजित किया गया था। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि किसी भी आपात स्थिति में सेना कितनी तेजी से जवाब दे सकती है।
मुजफ्फराबाद में आयोजित इस अभ्यास को खुफिया एजेंसियां चिंताजनक मान रही हैं। रिपोर्ट के अनुसार, इस क्षेत्र में आतंकवादियों के कई कैंप सक्रिय हैं। अभ्यास के दौरान पाक सेना की वे सभी यूनिट शामिल थीं, जो एलओसी के पास तैनात हैं।
खास बात यह है कि एसएसजी कमांडो, जो आतंकवादियों को ट्रेनिंग देने और भारत में घुसपैठ में मदद करने के लिए कुख्यात हैं, भी इस अभ्यास का हिस्सा थे।
एलओसी पर पाकिस्तानी गतिविधियां तेज!
पाकिस्तान की बॉर्डर एक्शन टीम (BAT), जिसमें एसएसजी कमांडो और आतंकवादी शामिल होते हैं, एलओसी पर सक्रिय देखी गई है। खुफिया सूत्रों का कहना है कि पाकिस्तान को भारत की ओर से संभावित सर्जिकल स्ट्राइक या किसी और जवाबी कार्रवाई का डर सता रहा है।
पिछले कुछ महीनों में जम्मू-कश्मीर में यात्रियों से भरी बस पर हमले और अन्य आतंकवादी घटनाओं के बाद पाकिस्तान ने एलओसी और अंतरराष्ट्रीय सीमा पर अलर्ट जारी किया है।
खुफिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान ने पीओके में अपनी 10वीं कोर, जिसकी जिम्मेदारी पूरे पीओके की सुरक्षा है, में सैनिकों की संख्या बढ़ाई है। इसके अलावा, बहावलपुर स्थित 31वीं कोर को भी अलर्ट पर रखा गया है।
बहावलपुर वही इलाका है जहां आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद का मुख्यालय स्थित है। हाल ही में पाक सेना ने अपनी आर्टिलरी रेजिमेंट की तैनाती को भी नए सिरे से व्यवस्थित किया है ताकि तनाव की स्थिति में तेजी से प्रतिक्रिया दी जा सके।
पाकिस्तान और चीन की नई योजनाएं भी खुफिया एजेंसियों की नजरों में हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि सीमा पर बढ़ती गतिविधियों के पीछे दोनों देशों की गहरी रणनीतिक साजिश हो सकती है।
भारतीय सेना और खुफिया एजेंसियां सीमा पर पाकिस्तान की इन गतिविधियों पर कड़ी नजर रख रही हैं। स्थिति लगातार बदल रही है, और भारत के लिए यह आवश्यक हो गया है कि वह अपनी सैन्य तैयारियों को मजबूत बनाए और पड़ोसी देशों की चालों का सटीक जवाब दे।
Aksai Chin: भारत ने शुक्रवार को चीन के कब्जा किए गए भारतीय क्षेत्र अक्साई चिन के हिस्सों को शामिल करते हुए बनाए गए नए काउंटी यानी जिलों पर कड़ी आपत्ति जताई है। विदेश मंत्रालय (MEA) के प्रवक्ता रंधीर जायसवाल ने कहा, “हमने कूटनीतिक माध्यमों से चीन के साथ गंभीर विरोध दर्ज कराया है।” चीन ने यह कदम उस समय उठाया है जब दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संबंधों की बहाली को लेकर बातचीत चल रही है। हाल ही में भारत और चीन के विशेष प्रतिनिधि लगभग पांच साल बाद सीमा विवाद पर वार्ता के लिए बीजिंग में मिले थे। इस वार्ता के ठीक 10 दिन बाद चीन ने यह विवादास्पद फैसला लिया।
Aksai Chin: भारत का सख्त रुख
विदेश मंत्रालय (MEA) के प्रवक्ता रंधीर जायसवाल ने स्पष्ट किया कि भारत ने इस क्षेत्र में चीन के अवैध कब्जे को कभी स्वीकार नहीं किया है। विदेश मंत्रालय ने इस मुद्दे पर कड़ा बयान जारी करते हुए कहा कि नए काउंटी का निर्माण न तो इस क्षेत्र पर भारत की संप्रभुता के प्रति लंबे समय से कायम उसकी स्थिति को प्रभावित करेगा, न ही चीन के अवैध और जबरदस्ती किए गए कब्जे को वैधता प्रदान करेगा।
Aksai Chin: चीन ने बनाए दो नए काउंटी
हाल ही में, चीन ने शिंजियांग उइगर स्वायत्त क्षेत्र में दो नए काउंटी – हेआन काउंटी और हेकांग काउंटी – बनाने का एलान किया है। उत्तर-पश्चिमी चीन के होटन प्रांत के प्रशासन के तहत इन दोनों नए काउंटी को रखा गया है। हेआन काउंटी की प्रशासनिक सीट होंगलिउ टाउनशिप में बनाई गई है, जबकि हेकांग काउंटी की सीट ज़ेयिडुला टाउनशिप में स्थित है। हेआन काउंटी लगभग 38,000 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र को कवर करता है, जिसमें भारत का अक्साई चिन का एक बड़ा हिस्सा भी शामिल है। यह वही क्षेत्र है जिसे भारत अपनी संप्रभुता का हिस्सा मानता है और चीन पर इस पर अवैध कब्जे का आरोप लगाता है। इन जिलों के अधिकांश क्षेत्र भारत के केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख में आते हैं।
वहीं, चीन ने यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब भारत और चीन के विशेष प्रतिनिधि लगभग पांच साल बाद सीमा विवाद पर वार्ता के लिए बीजिंग में मिले थे। इस वार्ता के ठीक 10 दिन बाद चीन ने यह विवादास्पद फैसला लिया।
चीन द्वारा अक्साई चिन के क्षेत्रों को अपने नक्शे में दिखाने का यह नया प्रयास भारत की संप्रभुता के लिए एक गंभीर चुनौती के रूप में देखा जा रहा है। अक्साई चिन 1950 के दशक से चीन के अवैध कब्जे में है, लेकिन भारत इसे अपना क्षेत्र मानता है।
अक्साई चिन भारत और चीन के बीच लंबे समय से विवाद की वजह बना हुआ है। 1962 में दोनों देशों के बीच हुए युद्ध में इस क्षेत्र पर बड़े पैमाने पर संघर्ष हुआ था। अक्साई चिन लद्दाख के उत्तर-पूर्वी हिस्से में स्थित है और रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र है।
1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान, चीन ने अक्साई चिन के 38,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर अवैध कब्जा कर लिया। इसके बाद 1963 में, पाकिस्तान ने साक्सगाम घाटी के 5,180 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को चीन को सौंप दिया, जिससे यह विवाद और जटिल हो गया।
चीन की आक्रामक नीतियां यहीं खत्म नहीं होतीं। वह अरुणाचल प्रदेश के 90,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर भी दावा करता है और इसे “दक्षिण तिब्बत” का हिस्सा बताने की कोशिश करता है। इसके अतिरिक्त, चीन हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के लगभग 2,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर भी अपना अधिकार जताता है।
Depsang: नया विवादास्पद बिंदु
हाल के वर्षों में, देपसांग का क्षेत्र, जो अक्साई चिन से महज 40 किमी पश्चिम में स्थित है, एक नया विवादास्पद बिंदु बन गया है। इस क्षेत्र में चीन के आक्रामक कदमों ने दोनों देशों के बीच तनाव को और बढ़ा दिया है।
भारत की प्रतिक्रिया
भारत ने चीन के इस कदम को क्षेत्रीय स्थिरता और सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बताया है। MEA ने कहा, “भारत अपनी क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है और इस तरह की हरकतों से भारतीय क्षेत्र पर दावा करने के प्रयासों को किसी भी सूरत में मान्यता नहीं दी जा सकती।”
क्या है अक्साई चिन की रणनीतिक महत्ता?
अक्साई चिन क्षेत्र हिमालय के ऊंचे इलाकों में स्थित है और यह भारत और चीन के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। यहां के प्राकृतिक संसाधन और भौगोलिक स्थिति इसे एशिया के भू-राजनीतिक परिदृश्य में अहम बनाते हैं।
अक्साई चिन, जो भारत के लद्दाख क्षेत्र का हिस्सा है, चीन के लिए एक सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र है। यह इलाका चीन के जी-219 हाईवे से जुड़ा हुआ है, जो झिंजियांग और तिब्बत को आपस में जोड़ता है। यह हाईवे चीन के सैन्य और आर्थिक संचालन के लिए एक महत्वपूर्ण लाइफलाइन है।
चीन ने होंगलिउ टाउनशिप को हेआन काउंटी का प्रशासनिक मुख्यालय घोषित किया है, जो भारतीय सीमा रेखा से मात्र 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। होंगलिउ, जिसे स्थानीय स्तर पर “दाहोंगल्युतन” के नाम से भी जाना जाता है, पहले एक साधारण सैन्य बैरक और ट्रक-स्टॉप था। 2017 के बाद से चीन ने इस क्षेत्र में तेजी से विकास कार्य शुरू किए हैं।
होंगलिउ का रणनीतिक महत्व इसके खनिज संसाधनों, विशेष रूप से लिथियम के खनन, के कारण बढ़ गया है। यह खनिज भविष्य की प्रौद्योगिकी, विशेष रूप से बैटरी उत्पादन में उपयोगी है, जिससे चीन की इस क्षेत्र पर पकड़ और मजबूत होती जा रही है।
Aksai Chin: चीन का प्रशासनिक विस्तार
चीन ने हाल ही में हेआन और हेकांग काउंटी की स्थापना की है, जिससे अक्साई चिन क्षेत्र में उसकी प्रशासनिक उपस्थिति और सुदृढ़ हुई है। हेआन काउंटी में होंगलिउ टाउनशिप को मुख्यालय के रूप में स्थापित करना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि चीन इस इलाके में अपनी पकड़ को और मजबूत करना चाहता है।
इस प्रशासनिक बदलाव के साथ, चीन ने अक्साई चिन क्षेत्र में नई वित्तीय और प्रशासनिक गतिविधियों का विस्तार शुरू किया है। यह कदम न केवल क्षेत्रीय नियंत्रण को मजबूत करता है, बल्कि चीन के रणनीतिक लक्ष्यों की दिशा में भी बढ़ता है।
चीन का क्या है उद्देश्य
चीन ने अक्साई चिन में दो नए काउंटी, हेआन और हेकांग, बनाकर अपने इरादों को स्पष्ट कर दिया है। इन काउंटी की स्थापना के जरिए चीन न केवल अपने क्षेत्रीय दावों को मजबूत कर रहा है, बल्कि इस क्षेत्र में आर्थिक और सामरिक गतिविधियों को बढ़ावा देने का प्रयास भी कर रहा है। यह कदम अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपने दावे को वैध दिखाने और सीमा पर अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा है।
चीन की यह रणनीति भारत की सीमा पर तनाव बढ़ाने के साथ-साथ क्षेत्रीय स्थिरता के लिए गंभीर चुनौती पेश कर सकती है।
अक्साई चिन में लिथियम का भंडार
होंगलिउ टाउनशिप, जिसे अब हेआन काउंटी का प्रशासनिक मुख्यालय बनाया गया है, यह इलाका लिथियम खनन के लिए प्रसिद्ध है। लिथियम का इस्तेमाल बैटरी निर्माण और तकनीकी उपकरणों में होता है, वर्तमान में वैश्विक बाजार में अत्यधिक मांग में है। चीन का यह कदम यह दर्शाता है कि वह अक्साई चिन को केवल सामरिक संपत्ति नहीं, बल्कि आर्थिक संसाधन के रूप में भी देख रहा है।
लिथियम जैसे खनिजों की मौजूदगी ने इस क्षेत्र के महत्व को और बढ़ा दिया है। वैश्विक तकनीकी दौड़ में चीन इस संपदा का उपयोग अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए कर सकता है। यह विकास भारत के लिए भी एक चेतावनी है कि क्षेत्रीय संसाधनों पर चीन की पकड़ न केवल आर्थिक बल्कि सैन्य दृष्टि से भी खतरनाक हो सकती है।
चीन की ये रणनीतिक गतिविधियां भारत के लिए एक स्पष्ट संदेश हैं कि उसे अपनी क्षेत्रीय अखंडता और सामरिक योजनाओं को लेकर सतर्क रहना होगा।
चीन की रणनीति और भारत के लिए चुनौती
चीन ने अक्साई चिन में अपने कदमों से यह संदेश दिया है कि वह इस क्षेत्र पर अपने कब्जे को वैधता प्रदान करना चाहता है। होंगलिउ जैसे संवेदनशील स्थान को काउंटी मुख्यालय बनाकर, चीन ने इसे न केवल प्रशासनिक केंद्र बनाया है, बल्कि इसे एक रणनीतिक हब के रूप में विकसित करने का प्रयास किया है।
यह कदम न केवल भारत के लिए सामरिक चुनौती प्रस्तुत करता है, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता और सुरक्षा के लिए भी खतरा पैदा करता है। अक्साई चिन के प्रति चीन का यह रवैया भारत के साथ सीमा विवाद को और जटिल बना सकता है।
चीन की मंशा पर सवाल
चीन के इस कदम को उसकी विस्तारवादी नीति का हिस्सा माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि नए काउंटी का निर्माण भारत पर दबाव बनाने और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपने दावों को वैधता देने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है।
भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अपनी क्षेत्रीय अखंडता पर किसी भी प्रकार का समझौता नहीं करेगा। अब देखना होगा कि इस मुद्दे पर दोनों देशों के बीच तनाव को कैसे सुलझाया जाता है।
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