China Y-20 Cargo Aircraft: The earthquake of 7.1 magnitude to the Shigats Dingery County of Tibet recently has laid this terrain by folding. At least 126 people died in this earthquake and more than 100 wounded. Earthquake shocks were also felt in parts of Nepal, Bhutan and North India. Where This natural calamity affects not only the life, but also the infrastructure there is a huge loss. China has first used its state-of-the-art Y-20 transport aircraft for relief and rescue operations. This aircraft landed on Shigatsey Dingri Airport, prepared in December 2022.
China Y-20 Cargo Aircraft: Chinese legendary bird is named on Kunpeng.
Y-20 Transport Aircraft is the first indigenously developed heavy transport aircraft of Kunpeng China. It is named as a legendary bird "Kunpeng" in the Folklore of China. It is also known as China’s Air Force ‘Chabi Girl’. This aircraft has the ability to carry loads up to 73 tons. It also has the ability to haul the largest tank ZTZ99 of China. It is designed for operations even in difficult situations. It is used for human relief, military campaign and transportation of equipment. This aircraft consists of four Shenyang WS-20 engines, providing it with long-distance flying and air refueling capacity.
Y-20 was exhibited internationally for the first time in Dubai Air Show in December 2023. This is China’s largest Military Tanksport Aircraft. Many countries in Egypt, Nigeria and the Middle East and North Africa have shown interest in buying it.
U.S. C-17 Globemaster collision from China Y-20 Cargo Aircraft
Y-20 is being considered a big challenge for American C-17 Globemaster. C-17 was launched in 1995 and has proved to be extremely effective for the US Army. While Y-20 is also playing the same role for China. However, the beginners engaged Russian engines in the Y-20 version, and "hot and elevated" were not able to fly from airfields. But the Y-20B version with WS-20 engine has surpassed all these obstacles. While China has also prepared the Based Airborne Early Warning and Control (AEW&C) aircraft on the Y-20 cargo aircraft.
Strategic Importance of Shigatse Dingery Airport
China’s Shigatsu Dingri Airport and Y-20 deployment is strategically important for India. This airport is close to the north-eastern regions of India and is being seen as part of China’s military preparations.
Tibet has five airports, which China uses military and civil. Four of these airports are 60 km from the Indian border. While 15 airports have been upgraded from 2017 to now in Xinjiang, seven of which are military and civil use, including just 240 km away from the Indian border.
शिगात्से डिंगरी एयरपोर्ट का निर्माण अगस्त 2019 में शुरू हुआ और दिसंबर 2022 में इसे तैयार कर लिया गया। यह एयरपोर्ट तिब्बत में चीन के लिए रणनीतिक तौर पर बेहद महत्वपूर्ण है। खास बात यह है कि यह एयरपोर्ट नेपाल की सीमा से मात्र 65 किलोमीटर उत्तर में स्थित है। वहीं डोकलाम से इसकी दूरी मात्र 230 किमी है। इस एयरपोर्ट पर चीन ने एक खास बड़ी अंडरग्राउंड फैसिलिटी बनाई है, जिसमें कम से कम तीन प्रवेश द्वार हैं। यह एय़रपोर्ट 3.3 किमी की लंबाई में फैला है।
Indian Air Force self-reliance: भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने आत्मनिर्भरता की आवश्यकता पर जोर देते हुए चीन के हालिया सैन्य आधुनिकीकरण का उदाहरण दिया। उन्होंने चीन के सिक्स्थ जनरेशन दो स्टील्थ फाइटर जेट्स को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि भारत को अपने रक्षा अनुसंधान और विकास (R&D) और उत्पादन में आत्मनिर्भर बनने के लिए तेज़ी से काम करना चाहिए।
Indian Air Force self-reliance: चीन की सैन्य ताकत में हो रहा इजाफा
वायुसेना प्रमुख ने ‘सुब्रतो मुखर्जी सेमिनार’ में कहा, “आज की दुनिया संघर्ष और प्रतिस्पर्धा से भरी हुई है। हमारे पास पश्चिमी और उत्तरी सीमाओं पर अपनी सुरक्षा संबंधी चिंताएं हैं, जहां चीन और पाकिस्तान ने सैन्यकरण बढ़ा दिया है।” उन्होंने चीन के वायुसेना में हो रहे भारी निवेश का ज़िक्र करते हुए कहा, “हाल ही में चीन के सिक्स्थ जनरेशन दो स्टील्थ फाइटर जेट्स इसका एक उदाहरण है।”
चीन ने हाल ही में चेंगदू में दो नई पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर जेट्स को पहली बार दुनिया के सामने प्रदर्शित किया, जिससे पूरी दुनिया हैरान रह गई। चीन ने 26 दिसंबर को इन दोनों स्टील्थ फाइटर जेट्स की पहली उड़ान का प्रदर्शन किया। ये विमान अपनी एडवांस टेक्नोलॉजी और कम ऊंचाई पर उड़ने की क्षमता रखते हैं। इन टेललेस, स्टील्थ विमानों के वीडियो ने अमेरिका तक को चौंका दिया। जबकि अमेरिका अभी तक अपने छठी पीढ़ी के फाइटर प्रोजेक्ट को अंतिम रूप नहीं दे पाया है, वहीं, चीन पहले ही इस क्षेत्र में आगे निकल चुका है।
वहीं, चीन के पास पहले से ही 5वीं पीढ़ी के फाइटर जेट्स, जैसे चेंगदू J-20, हैं जिन्हें भारत की सीमाओं के पास होटन और शिगात्से जैसे एयरफील्ड्स पर तैनात किया गया है।
भारत के पास नहीं हैं 5वीं पीढ़ी के जेट्स
भारत अभी भी 5वीं पीढ़ी के फाइटर जेट्स के उत्पादन से बहुत दूर है। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली सुरक्षा पर कैबिनेट समिति ने मार्च 2022 में स्विंग-रोल एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) के विकास को मंजूरी दी थी। इसके लिए 15,000 करोड़ रुपये से अधिक की शुरुआती लागत तय की गई है। आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक, AMCA का पहला प्रोटोटाइप अगले चार से पांच वर्षों में तैयार होगा। उत्पादन और शामिल किए जाने की प्रक्रिया 2035 के बाद ही शुरू हो पाएगी।
वायुसेना प्रमुख ने कहा, “पहला विमान 2001 में उड़ा था – यानी 17 साल पहले। फिर, 15 साल बाद 2016 में इसे शामिल किया गया। आज हम 2024 में हैं, लेकिन मेरे पास अभी तक पहले 40 विमान भी नहीं हैं। यही हमारी उत्पादन क्षमता है। हमें इस पर काम करने की सख्त जरूरत है। मैं पूरी तरह से आश्वस्त हूं कि हमें कुछ प्राइवेट कंपनियों को इसमें शामिल करना होगा। अन्यथा, हालात में कोई बदलाव नहीं आएगा।”
बता दें कि भारत को अपने चौथी पीढ़ी के तेजस मार्क-1ए फाइटर्स का उत्पादन करने में भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। इसके पीछे एक बड़ी वजह GE-F404 टर्बोफैन जेट इंजन की आपूर्ति में हो रही देरी है। अमेरिकी कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक द्वारा GE-F404 टर्बोफैन जेट इंजन की आपूर्ति में देरी की वजह से भारत की सुरक्षा संबंधी चिंताएं बढ़ गई हैं। इसकी वजह है कि वायुसेना को चीन और पाकिस्तान के खतरों से निपटने के लिए 42.5 स्क्वाड्रन की जरूरत है, जबकि उसके पास फिलहाल केवल 30 स्क्वाड्रन ही हैं।
वायुसेना प्रमुख ने आरएंडडी में हो रही देरी पर चिंता जताई। उन्होंने कहा, “यदि तकनीक समय पर नहीं पहुंचती है, तो उसका महत्व खत्म हो जाता है। हमें आरएंडडी में शामिल जोखिमों और विफलताओं को स्वीकार करने की प्रवृत्ति विकसित करनी होगी।” उन्होंने यह भी कहा, “आत्मनिर्भरता की कीमत चुकानी पड़ेगी, और हमें इसे स्वीकार करना चाहिए। भले ही इसके लिए ज्यादा खर्च करना पड़े। लेकिन यह हमारे देश को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा।”
रक्षा क्षेत्र में निजी कंपनियों की भागीदारी पर दिया जोर
वायुसेना प्रमुख ने तेजस फाइटर जेट के धीमे उत्पादन पर भी निराशा व्यक्त की। उन्होंने कहा कि देरी के चलते भारतीय वायुसेना को कई ऑपरेशनल चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। IAF प्रमुख ने चीन और पाकिस्तान से बढ़ते खतरों का ज़िक्र करते हुए कहा कि वायुसेना को कम से कम 180 तेजस मार्क-1ए और 108 तेजस मार्क-2 विमानों की ज़रूरत है। AMCA के प्रोडक्शन और तैनाती तक ये विमान भारतीय वायुसेना की ताकत को बनाए रखने में मदद करेंगे।
उन्होंने यह भी कहा कि नई तकनीकों को अपनाने और जोखिम लेने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देने की जरूरत है। “तकनीक में देरी का मतलब है तकनीक से इनकार। R&D में विफलताओं और जोखिम को स्वीकार करने का रवैया विकसित करना होगा।”
वायुसेना प्रमुख ने रक्षा क्षेत्र में निजी कंपनियों की भागीदारी पर भी ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भरता से दीर्घकालिक फायदे होंगे, हालांकि शुरुआती चरणों में इसकी लागत अधिक हो सकती है। उन्होंने निजी और सरकारी क्षेत्रों के बीच तालमेल बढ़ाने पर जोर दिया।
ALH Dhruv Crash: Indian Armed Forces has temporarily stopped on the fleet flight of all its 330 ADVANCE LITE helicopter (ALH) ‘Dhruv’. The armed forces have taken this step after the helicopter arm of the Coast Guard in the Porter, with the death of two pilots and an air crew. A team of Hindustan Aeronautics Limited (HAL) has been sent to the eventual for investigation after Hadsi.
Let’s say that the ALH helicopter was on its training flight before this accident took place on Sunday. When flying at a height of 200 feet during about 90 minutes of training, the helicopter fell to the ground, and fired in it. Immediately after the accident, helicopter’s flight data recorder (FDR) and cockpit voice recorder (CVR) were recovered. These devices are sent to check the causes of accident.
ALH Dhruv Crash: HAL and Coast Guard checks
This is the second major accident with ALH helicopters over the last four months. Hindustan Aeronautics Limited (HAL) and Indian Coast Guard have started a separate investigation by Hadse. Experts believe that the design behind these events may be, manufacturing and maintenance related issues. A senior military officer said, "These accidents should have an in-depth investigation of design, qualty control, and cases associated with pilot training. ""
वहीं एचएएल सूत्रों का कहना है कि एएलएच ने अपने आप को साबित किया है। उन्होंने एएलएच का बचाव करते हुए कहा है कि यह विभिन्न उपयोगिता भूमिकाओं में अच्छा प्रदर्शन कर चुका है। वहीं इन हेलिकॉप्टरों की दुर्घटनाओं की दर अंतरराष्ट्रीय मानकों से कम है। उनके अनुसार, प्रति एक लाख उड़ान घंटों में दुर्घटनाओं की संख्या अंतरराष्ट्रीय मानकों से कम है।
ALH Dhruv Crash: एएलएच हेलिकॉप्टर भारतीय सशस्त्र बलों की रीढ़
देश में निर्मित डबल इंजन वाले 5.5 टन वजनी एएलएच हेलिकॉप्टर भारतीय सशस्त्र बलों की रीढ़ माने जाते हैं। ये हेलिकॉप्टर विभिन्न उपयोगी भूमिकाओं में तैनात हैं, इनका इस्तेमाल बचाव कार्य, निगरानी और लॉजिस्टिक सपोर्ट में किया जाता है। खास बात यह है कि 2002 में शामिल किए जाने के बाद से, इसने लगभग 4 लाख उड़ान घंटे पूरे किए हैं। लेकिन हाल में हुए के हादसों ने उनकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। रविवार को हुई दुर्घटना के बाद विशेषज्ञों ने कहा कि स्वतंत्र और व्यापक जांच के लिए बाहरी विशेषज्ञों को भी शामिल करना चाहिए।
2023 में भी बेड़े को किया था ग्राउंड
यह पहली बार नहीं है जब ALH ध्रुव किसी बड़े हादसे का शिकार हुआ है। 2022 में अरुणाचल प्रदेश में ALH के आर्मर्ड वर्जन ‘रुद्र’ की दुर्घटना में पांच जवानों ने अपनी जान गंवाई थी। इसके बाद 2023 में चार अलग-अलग हादसे हुए, जिनमें नौसेना, सेना और तटरक्षक बल के ALH हेलिकॉप्टर शामिल थे।
इन लगातार घटनाओं के चलते सशस्त्र बलों ने 250 से अधिक ALH ध्रुव और इसके आर्मर्ड वर्जन ALH रुद्र के पूरे बेड़े को विस्तृत तकनीकी जांच के लिए अस्थाई रूप से ग्राउंडेड कर दिया था। जांच में हेलिकॉप्टर के “कलेक्टिव कंट्रोल” जैसे महत्वपूर्ण हिस्सों में समस्याएं पाई गई थीं। इसके बावजूद, दुर्घटनाएं जारी रहीं।
वहीं, सशस्त्र बल अभी भी लगातार एएलएच हेलिकॉप्टरों के नए वैरिएंट्स की लगातार खरीद कर रहे हैं। पिछले साल मार्च में, सेना के लिए 25 एएलएच मार्क-III और तटरक्षक बल के लिए 9 हेलिकॉप्टरों के निर्माण के लिए एचएएल के साथ 8,073 करोड़ रुपये के अनुबंध पर हस्ताक्षर किए गए। इसके अलावा, तटरक्षक बल के लिए 6 नए हेलिकॉप्टरों को मंजूरी दी गई है।
तीन दशकों में 200 से अधिक हेलिकॉप्टर हादसे
भारतीय रक्षा मंत्रालय (MoD) द्वारा संसद में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, पिछले 20 वर्षों में 22 एडवांस्ड लाइट हेलिकॉप्टर (ALH) दुर्घटनाग्रस्त हुए हैं। इन हादसों के अलावा, कई हेलिकॉप्टरों को आपातकालीन लैंडिंग करनी पड़ी है। 2017 से 2021 के बीच, ALH से जुड़ी छह प्रमुख दुर्घटनाओं की रिपोर्ट दी गई थी।
भारतीय सेना को इन हेलिकॉप्टर हादसों के कारण भारी नुकसान झेलना पड़ा है। पिछले तीन दशकों के आंकड़ों पर नजर डालें तो 200 से अधिक हेलिकॉप्टर दुर्घटनाओं में कुल 297 लोगों की जान चली गई है।
पांच टन वजनी इस डबल इंजन मल्टीरोल हेलीकॉप्टर की शुरुआत 1979 में भारतीय वायुसेना के एक कार्यक्रम के तहत हुई थी। 1984 में एचएएल को इसे विकसित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई, जिसमें जर्मनी की मेसर्सचिट-बी-ल्को-ब्लोहम को तकनीकी सलाहकार के रूप में शामिल किया गया। हालांकि, यह साझेदारी 1995 में समाप्त हो गई।
पहला प्रोटोटाइप 1992 में उड़ाया गया, लेकिन परियोजना को पूरा करने में कई देरी हुई। अंततः, लगभग 55% स्वदेशी सामग्री के साथ, ALH ध्रुव को 2002 में भारतीय सशस्त्र बलों में शामिल किया गया। इसका सशस्त्र संस्करण, एमके-IV रुद्र, 2013 में सेना का हिस्सा बना।
ALH ध्रुव के चार प्रमुख संस्करण
Mk-I और Mk-II: पारंपरिक कॉकपिट के साथ ये शुरुआती संस्करण भारतीय सशस्त्र बलों की बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करते हैं।
Mk-III: आधुनिक ग्लास कॉकपिट के साथ आता है और तटरक्षक बल में इसका उपयोग खोज और बचाव मिशनों के लिए किया जाता है।
Mk-IV रुद्र: यह इसका सशस्त्र संस्करण है, जो उन्नत हथियार प्रणालियों और सटीक हमले की क्षमताओं से लैस है।
मल्टीरोल हेलीकॉप्टर की जरूरत क्यों है?
ALH ध्रुव को बहु-भूमिकाओं के लिए डिजाइन किया गया है। यह ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों में सैनिकों और उपकरणों की सप्लाई करने के साथ-साथ युद्ध और आपदा राहत अभियानों में भी उपयोगी है। यह हेलीकॉप्टर भारतीय सशस्त्र बलों के लिए बेहद अहम है क्योंकि यह दुर्गम और कठिन क्षेत्रों में पहुंचने की क्षमता रखता है।
हादसों की वजहें
हाल ही में पोरबंदर में हुए हादसे के पीछे तकनीकी खराबी मुख्य वजह मानी जा रही है। इससे पहले भी कई दुर्घटनाओं में ALH ध्रुव के डिजाइन और निर्माण में खामियां सामने आई हैं। इनमें सबसे प्रमुख हैं बूस्टर कंट्रोल रॉड और कलेक्टिव जैसे महत्वपूर्ण कंपोनेंट्स की समस्याएं। ये हेलीकॉप्टर की स्थिरता बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी हैं। इन हिस्सों में खामी आने से हेलीकॉप्टर उड़ान के दौरान अस्थिर हो सकता है।
इसके अलावा, टेल रोटर वाइब्रेशन वॉर्निंग सिस्टम की विफलता भी हालिया दुर्घटनाओं का कारण रही है। यह सिस्टम पायलट को हेलीकॉप्टर में किसी संभावित समस्या के संकेत देता है, लेकिन इसके सही से काम न करने पर पायलट समय रहते आवश्यक कदम नहीं उठा पाते।
ध्रुव हेलीकॉप्टर का उपयोग ऊंचाई वाले और दुर्गम क्षेत्रों में सबसे ज्यादा होता है। सियाचिन ग्लेशियर और लद्दाख जैसे इलाकों में इसका व्यापक उपयोग किया जाता है, जहां तापमान -40°C तक गिर सकता है। इन कठिन परिस्थितियों में मशीनों पर अधिक दबाव पड़ता है।
इन क्षेत्रों में हेलीकॉप्टरों को अत्यधिक दक्षता और स्थिरता की जरूरत होती है। हालांकि, ध्रुव जैसे हेलीकॉप्टर सामान्य परिस्थितियों में बेहतरीन प्रदर्शन करते हैं, लेकिन इन चुनौतीपूर्ण इलाकों में इन्हें कठिनाई का सामना करना पड़ता है।
ALH ध्रुव जैसे उन्नत हेलीकॉप्टर को उड़ाने के लिए व्यापक प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। लेकिन कई मामलों में पायलटों को पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं मिलता। इससे आपातकालीन परिस्थितियों में पायलट सही निर्णय नहीं ले पाते।
विशेषज्ञों का कहना है कि पायलटों को बेहतर प्रशिक्षण और अनुभव प्रदान कर दुर्घटनाओं की संभावना को कम किया जा सकता है।
डिजाइन में सुधार और नए वेरिएंट्स का सुझाव
एयर वाइस मार्शल मनमोहन बहादुर (सेवानिवृत्त) का कहना है, “हम अपने पायलटों और जवानों को खो रहे हैं। अब समय आ गया है कि हम जांच करें कि ALH जैसे उन्नत हेलीकॉप्टर क्यों दुर्घटनाग्रस्त हो रहे हैं।”
मेजर जनरल संदीपन हांडा (सेवानिवृत्त) के अनुसार, “ऐसे हेलीकॉप्टर का डिजाइन करना चुनौतीपूर्ण है, जो -40°C की ठंड में ऊंचाई वाले इलाकों में काम कर सके और +50°C की गर्मी में भी। एक ही वेरिएंट के बजाय, ऊंचाई और मैदान के लिए अलग-अलग वेरिएंट पर विचार करना अधिक व्यावहारिक होगा।”
वहीं, लेह स्थित 14 कोर के रसद विभाग के प्रमुख रहे मेजर जनरल ए.पी. सिंह (सेवानिवृत्त) का कहना है कि सेना को चीता और चेतक जैसे हल्के हेलीकॉप्टरों के एक आधुनिक बेड़े की जरूरत है। हालांकि, चीता हेलीकॉप्टर की पेलोड क्षमता सीमित है।
उन्होंने कहा, “हमारे अधिकतर हेलीपैड छोटे हैं, जो 5 टन से अधिक वजन वाले हेलीकॉप्टरों को संभालने में सक्षम नहीं हैं। हमें ऐसे हेलीकॉप्टर की जरूरत है, जो छोटे हेलीपैड पर उतर सके और ज्यादा पेलोड ले जा सके।”
Armed Forces Pension: The Supreme Court said that the personnel of the armed forces and their families should not be trapped in the legal hassles of Bewajah. The court also criticized the appeal of the government repeatedly in courts on disputes involving pension in particular.
The bench of Justice Abhay S. Oka and Justice Bright Bhuyan of the Supreme Court emphasized the need for policy-making from the center on this matter. The court said, "The people who serve the country are not corrected to sniff in courts repeatedly. Already very few people are willing to work in armed forces. Why do these people get stuck in legal battles? ""
Armed Forces Pension: Don’t Destroy The Country Service Persons In Legal Disciplines
Attorney General R. Venkatramani defending the appeal of the Central Government said that in many cases the claims of disability pension are challenged, as they do not belong to the Service. "How many years did this officer stay in service for the years," however, the court said to take a stroll on it? Why do people who serve the country get rid of such battles? It is extremely unfortunate. ""
The Supreme Court dismissed the appeal of the Central Government, saying that the case was not only delayed, but also had no solid base. The case was linked to a former Indian Air Force officer who suffered from Type 2 Diabetes and Primary Hypertension after 30 years of service.
The release medical board (RMB) had initially not considered these conditions related to service. However, the Armed Forces Tribunal (AFT) said in its decision given in 2023 that the harsh training of the aerodynamics and the stress associated with it may cause these diseases.
AFT had ordered the officer to increase their pension percentage to 50 per cent, giving the benefit of the "Rounding of" of the Disability Pension. This decision was corrected by the Supreme Court and rejected the appeal of the Government.
The Supreme Court said during the hearing, "What was the purpose of the establishment of the Armor Forces Tribunal (AFT), if every case has to be brought to the Supreme Court? These are your people. He has served the country. "The court reminded the government that AFT was formed for rapid settlement of cases related to the armed forces.
Though this case is no new. In December 2022, the Supreme Court had a fine of Rs 50,000 on the Government and Indian Army to refuse family pension to the widow of a soldier. In this case, the wife of the young man had to struggle for justice for years.
The court had tied the then government’s attitude "hard" and "sensitive." The court said that the government should strengthen its internal mechanism, to prevent unnecessary appeals related to pension disputes.
Over 3,000 case courts
According to information, about 3,000 appeals of the Ministry of Defence on matters associated with the death and disability benefit of the Armed Forces are pending in various High Courts and Supreme Courts. "There is no justification to bring every matter to the court," the court said, taking into account the severity of this problem. The Government must make a solid policy to prevent such appeals. ""
The court clarified that the Government’s approach should be human in matters relating to pension and disability benefit. Unnecessary legal battles in these cases are not only affected persons, but also mental and economic damage to their families.
What is the reason behind the pension dispute?
In many cases it has been observed that the government refuses to benefit troops and their families by citing technical issues. The court criticized this attitude and said that the pension and disability benefit is the right of the soldiers, and no privileges.
Armed Forces Tribunals: आर्म्ड फोर्सेज से रिटायर कर्मियों और उनके परिवारों के लिए न्यायिक प्रक्रिया को आसान बनाने के उद्देश्य से, सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को सशस्त्र बल न्यायाधिकरणों Armed Forces Tribunal (एएफटी) की अधिक रीजनल बेंच बनाने की बात कही है। न्यायालय ने सुझाव दिया कि सर्किट बेंचों के माध्यम से स्थानीय स्तर पर न्याय उपलब्ध कराया जा सकता है, ताकि आर्म्ड फोर्स के सदस्यों और उनके परिवारों को लंबी यात्रा और भारी खर्च से बचाया जा सके।
चंडीगढ़ में Armed Forces Tribunal की केवल एक बेंच
जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एन.के. सिंह की बेंच ने चंडीगढ़ के बारे में कहा कि यह क्षेत्र सशस्त्र बलों में योगदान के लिए जाना जाता है। यहां आर्म्ड फोर्स ट्रिब्यूनल की केवल एक बेंच होने के कारण, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और जम्मू-कश्मीर के मामलों को निपटाने में दिक्कत होती है।
Armed Forces Tribunals: श्रीनगर, जम्मू, शिमला और धर्मशाला में बनाएं बेंच
बेंच ने सुझाव दिया कि सर्किट बेंचों को श्रीनगर, जम्मू, शिमला और धर्मशाला जैसे स्थानों पर स्थापित किया जा सकता है, जहां बुनियादी सुविधाएं पहले से उपलब्ध हैं। सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया कि हिमाचल के मामले शिमला और धर्मशाला में सुने जा सकते हैं। जबकि जम्मू और श्रीनगर में भी सर्किट बेंच स्थापित की जा सकती हैं। इससे न केवल मुकदमेबाजी की लागत कम होगी, बल्कि सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों और उनके परिवारों को लंबी दूरी तय करने की आवश्यकता भी नहीं पड़ेगी।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, “यदि रीजनल बेंच स्थापित की जाए और स्थानीय बार को इसमें शामिल किया जाए, तो न्यायिक प्रक्रिया को तेज़ और किफायती बनाया जा सकता है।”
मद्रास बार एसोसिएशन की याचिका पर सुनवाई के दौरान, वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने बताया कि एएफटी में अभी भी कई पद रिक्त हैं। उन्होंने कहा, “चंडीगढ़ में केवल एक बेंच है और एक सदस्य का तबादला हो चुका है, लेकिन उनके स्थान पर किसी की नियुक्ति नहीं हुई है। केंद्र सरकार ने कई बार नियुक्तियों का आश्वासन दिया है, लेकिन प्रगति न के बराबर है।”
भारत के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने अदालत को बताया कि एएफटी के अध्यक्ष आंतरिक प्रशासनिक मुद्दों से अवगत हैं और चयन प्रक्रिया पूरे साल चलती रहती है। हालांकि, उन्होंने रिक्त पदों को समय पर भरने की प्राथमिकता पर जोर दिया।
एडवांस सिलेक्शन प्रोसेस पर विचार करे सरकार
बेंच ने सुझाव दिया कि भविष्य में ऐसी स्थितियों से बचने के लिए एडवांस सिलेक्शन प्रोसेस पर विचार किया जाना चाहिए। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, “किसी सदस्य के पद छोड़ने की तारीख की पहले से जानकारी होती है। अगर समय पर नियुक्तियां हो जाएं तो न्याय प्रक्रिया में देरी से बचा जा सकता है।”
सुप्रीम कोर्ट ने सर्किट बेंच के माध्यम से आर्म्ड फोर्स के सदस्यों को जस्टिस मिलने में आसानी होगी। हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में शिमला और धर्मशाला में सर्किट बेंच स्थापित की जा सकती हैं। इस पहल से सैनिकों और पूर्व सैनिकों को चंडीगढ़ तक यात्रा करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से सभी आर्म्ड फोर्स ट्रिब्यूनल में रिक्तियों की स्थिति और चयन प्रक्रिया की जानकारी देने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि सशस्त्र बलों के न्याय से जुड़े मामलों को त्वरित और प्रभावी बनाने के लिए यह बेहद जरूरी है।
Explainer ALH Dhurv Crash: गुजरात के पोरबंदर में भारतीय तटरक्षक बल का एडवांस्ड लाइट हेलीकॉप्टर (ALH) ध्रुव क्रैश होने से दो पायलट और एक अन्य क्रू मेंबर की मौत हो गई। यह दुर्घटना उस वक्त हुई जब नियमित ट्रेनिंग के दौरान हेलीकॉप्टर में तकनीकी खराबी आ गई। यह पहली बार नहीं है जब HAL (हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड) का बनाया यह हेलीकॉप्टर हादसे का शिकार हुआ है।
पिछले कुछ वर्षों में ALH ध्रुव और इसके दूसरे वर्जन के कई हादसे हुए हैं। इन दुर्घटनाओं ने एएलएच के सुरक्षा मानकों और डिजाइन खामियों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ALH ध्रुव का इस्तेमाल भारतीय सशस्त्र बल खोज और बचाव अभियान, रेकी, ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सामान और हथियार पहुंचाने जैसे कार्यों के लिए इस्तेमाल करते हैं।
Explainer ALH Dhurv Crash: तीन दशक में 200 से अधिक हेलिकॉप्टर हादसे
केंद्रीय रक्षा मंत्रालय (MoD) द्वारा संसद को दिए गए आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक पिछले 20 सालों में, 22 ALH दुर्घटनाग्रस्त हो चुके हैं और कई को आपातकालीन लैंडिंग करनी पड़ी। MoD के आंकड़ों के अनुसार, 2017 और 2021 के बीच ALH से जुड़ी छह दुर्घटनाओं की सूचना दी गई। कुल मिलाकर, भारतीय सेना को इन हेलीकॉप्टर हादसों से बड़ा नुकसान हुआ है। पिछले तीन दशकों में, 200 से अधिक हेलिकॉप्टर दुर्घटनाओं में 297 लोगों की जान चली गई है। पिछले पांच वर्षों में, भारतीय सेना ने देश के पहले चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत सहित 40 कर्मियों को हेलिकॉप्टर दुर्घटनाओं में खो दिया है।
2023 में पूरे बेड़े को कर दिया था ग्राउंड
गुजरात के पोरबंदर में हाल ही में हुए हादसे में भारतीय तटरक्षक बल का एक ALH ध्रुव हेलीकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जिसमें दो पायलट और एक क्रू मेंबर की मौत हो गई। शुरुआती रिपोर्टों के अनुसार, उड़ान के दौरान तकनीकी खराबी के कारण यह हादसा हुआ। हालांकि यह पहली बार नहीं है जब ALH ध्रुव किसी दुर्घटना का शिकार हुआ है। 2022 में अरुणाचल प्रदेश में एक एएलएच का आर्मर्ड वर्जन ‘रूद्र’ दुर्घटनाग्रस्त हुआ था, जिसमें पांच जवान मारे गए थे। इसके बाद 2023 में तीन अलग-अलग हादसे हुए, जिनमें नौसेना, सेना और तटरक्षक बल के ALH शामिल थे। इन घटनाओं के बाद 250 से अधिक ALH ध्रुव और इसके आर्मर्ड वर्जन ALH रुद्र के पूरे बेड़े को विस्तृत जांच के लिए अस्थाई तौर पर ग्राउंडेड कर दिया गया।
ALH ध्रुव: क्या है इसकी खासियत?
ALH ध्रुव का निर्माण हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) ने किया है। ध्रुव एक मल्टीरोल हेलीकॉप्टर है, जिसे भारतीय सशस्त्र बलों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए डिजाइन किया गया है। इसका उपयोग सैनिकों और रसद की आपूर्ति, चिकित्सा निकासी, और राहत कार्यों के लिए किया जाता है। पांच टन वजनी डबल इंजन मल्टीरोल हेलीकॉप्टर का कार्यक्रम भारतीय वायुसेना द्वारा 1979 में शुरू किया गया था। एचएएल को 1984 में इसे डेवलप करने के लिए कहा गया था, और जर्मनी के मेसर्सचिट-बी-ल्को-ब्लोहम को एडवइजर बनाया गयाा। लेकिन यह व्यवस्था 1995 तक समाप्त हो गई। पहले प्रोटोटाइप ने 1992 में उड़ान भरी। हालांकि, इस परियोजना में कई देरी हुई। अंत में, लगभग 55 फीसदी स्वदेशी सामग्री के साथ, एएलएच ध्रुव को 2002 में सशस्त्र बलों में शामिल किया गया; इसके सशस्त्र संस्करण एमके-IV रुद्र को 2013 में शामिल किया गया था। इसके चार वैरिएंट हैं। जिनमें Mk-I और Mk-II पारंपरिक कॉकपिट के साथ आते हैं। जबकि Mk-III और Mk-IV इसका मिलिट्री वर्जन रूद्र है, जो आधुनिक ग्लास कॉकपिट और विपन सिस्टम के साथ आता है।
हालांकि, इनकी खूबियों के बावजूद, ALH ध्रुव बार-बार हादसों का शिकार हो रहा है, जिससे इसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं।
Explainer ALH Dhurv Crash: हादसों की मुख्य वजहें
हाल ही में पोरबंदर में हुए हेलीकॉप्टर क्रेश में जो शुरुआती वजह सामने आई है उसमें तकनीकी गड़बड़ी को बताया गया है। इससे पहले भी हुए हादसों में ध्रुव हेलीकॉप्टर के डिजाइन और निर्माण में कई तकनीकी खामियां सामने आई हैं। इनमें सबसे प्रमुख है ‘बूस्टर कंट्रोल रॉड’ और ‘कलेक्टिव’ जैसे महत्वपूर्ण कंपोनेंट्स में खामियां पाई गई हैं। ये हिस्से हेलीकॉप्टर की स्थिरता को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं। यदि इनमें कोई समस्या हो, तो उड़ान के दौरान हेलीकॉप्टर अस्थिर हो सकता है।
इसके अलावा, हालिया हादसों में ‘टेल रोटर वाइब्रेशन वॉर्निंग सिस्टम’ के सही तरीके से काम न करने की शिकायतें भी सामने आई हैं। यह सिस्टम हेलीकॉप्टर के पायलट को किसी भी संभावित समस्या के संकेत देता है। लेकिन, इसकी विफलता के कारण कई बार पायलट समय रहते आवश्यक कदम नहीं उठा पाते।
4 मई को जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ में हुए एएलएच. हादसे में टेल रोटर वाइब्रेशन वॉर्निंग सिस्टम ने पायलट को सचेत नहीं किया था। नौसेना का एएलएच., जो 8 मार्च को अरब सागर में गिरा था, माना जाता है कि बूस्टर कंट्रोल रॉड में तकनीकी खराबी के कारण ऐसा हुआ था।
रखरखाव की कमी
हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) द्वारा निर्मित ध्रुव हेलीकॉप्टरों के रखरखाव को लेकर भी गंभीर चिंताएं हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, पुराने पुर्जों का उपयोग और खराब गुणवत्ता वाले स्पेयर पार्ट्स दुर्घटनाओं का मुख्य कारण बनते हैं।
सेना और अन्य बलों ने HAL पर बार-बार हेलीकॉप्टरों के नियमित रखरखाव में कोताही बरतने का आरोप लगाया है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर रखरखाव के मानकों का सही तरीके से पालन किया जाए, तो इन हादसों को रोका जा सकता है।
कठिन भौगोलिक परिस्थितियां
भारत के ऊंचाई वाले और दुर्गम क्षेत्रों में ध्रुव हेलीकॉप्टर का व्यापक उपयोग होता है। विशेष रूप से, सियाचिन ग्लेशियर और लद्दाख जैसे इलाकों में, जहां अत्यधिक ठंड और कम ऑक्सीजन के कारण मशीनों पर अधिक दबाव पड़ता है।
इन कठिन परिस्थितियों में हेलीकॉप्टरों को अधिक दक्षता और स्थिरता की जरूरत होती है। हालांकि, ध्रुव जैसी मशीनें, जो सामान्य परिस्थितियों में बेहतरीन प्रदर्शन करती हैं, इन चुनौतीपूर्ण इलाकों में अक्सर दबाव का सामना नहीं कर पातीं।
पायलट प्रशिक्षण की कमी
ALH जैसे एडवांस हेलीकॉप्टर को ऑपरेट करने के लिए विशेष और व्यापक प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। लेकिन, कई मामलों में पायलटों को पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं मिलता। इससे आपात स्थितियों में सही निर्णय लेने की उनकी क्षमता प्रभावित होती है।
मैदान और पहाड़ के लिए बनाएं अलग-अलग वैरिएंट
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर पायलटों को उचित प्रशिक्षण और अनुभव प्रदान किया जाए, तो दुर्घटनाओं की संभावना को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
एयर वाइस मार्शल मनमोहन बहादुर (सेवानिवृत्त) कहते हैं, “हम अपने लोगों को खो रहे हैं। अब समय आ गया है कि हम जांच करें कि भारत के सबसे उन्नत हेलीकॉप्टर माने जाने वाले एएलएच क्यों दुर्घटनाग्रस्त हो रहे हैं।”
वहीं, आर्मी एविएशन के पूर्व अतिरिक्त महानिदेशक और अनुभवी हेलीकॉप्टर पायलट मेजर जनरल संदीपन हांडा (सेवानिवृत्त) का कहना है, “ऐसे हेलीकॉप्टर को डिजाइन करना बेहद चुनौतीपूर्ण है, जो एक तरफ -40 डिग्री सेल्सियस की कड़क ठंड में ऊंचाई वाले इलाकों में काम कर सके और दूसरी तरफ +50 डिग्री सेल्सियस की तपती गर्मी वाले रेगिस्तानी इलाकों में भी। हर तरह की परिस्थितियों के लिए एक ही प्रकार का हेलीकॉप्टर बनाने की बजाय, दो अलग-अलग वैरिएंट पर विचार करना अधिक समझदारी होगी, एक ऊंचाई वाले इलाकों के लिए और दूसरा मैदानी इलाकों के लिए।”
लेह स्थित 14 कोर के रसद विभाग के प्रमुख रहे मेजर जनरल ए.पी. सिंह (सेवानिवृत्त) का कहना है, “सेना को चीता और चेतक जैसे हल्के हेलीकॉप्टरों के एक आधुनिक बेड़े की जरूरत है, लेकिन उनकी रफ्तार में सुधार होना चाहिए।” हालांकि, चीता हेलीकॉप्टर बहुत अधिक ऊंचाई पर केवल 20 किलोग्राम का पेलोड ले जा सकता है। इसका मतलब है कि सेना को सिर्फ 20 किलोग्राम सामान ले जाने के लिए प्रति उड़ान 60,000 रुपये का खर्च करना पड़ता है।
मेजर जनरल सिंह आगे कहते हैं, “हमारे अधिकांश हेलीपैड छोटे हैं, जो 5 टन से अधिक वजन वाले बड़े हेलीकॉप्टरों को नहीं संभाल सकते। ऐसे में हमें ऐसे हेलीकॉप्टर की जरूरत है, जो छोटे हेलीपैड पर उतरने में सक्षम हो और साथ ही ज्यादा पेलोड ले जा सके।”
ALH के निर्यात पर पड़ सकता है असर
हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) ने ALH को भारतीय सशस्त्र बलों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए डिजाइन किया था। यह हेलीकॉप्टर ‘मेक इन इंडिया’ अभियान का एक प्रमुख उदाहरण है। HAL का दावा है कि हर दुर्घटना के बाद व्यापक जांच और सुधार किए जाते हैं।
भारत ALH ध्रुव का निर्यात बढ़ाने की योजना बना रहा है। फिलीपींस जैसे देशों के साथ बातचीत चल रही है, लेकिन इक्वाडोर का अनुभव इस परियोजना के लिए एक सबक है। इक्वाडोर ने 2009-2012 के बीच सात ALH खरीदे थे, लेकिन चार दुर्घटनाओं के बाद उसने 2015 में कॉन्ट्रैक्ट खत्म कर दिया। अगर भारत को इस हेलीकॉप्टर को अंतरराष्ट्रीय बाजार में सफल बनाना है, तो सुरक्षा और गुणवत्ता में सुधार करना बेहद जरूरी है।
Explainer Indian Army Promotion Policy: The promotion process of the officers of the Lt. General Rank in the Indian Army is going to be major changes. Under the new Promotion Policy, there will be no only seniority to become the Lt Gen in the Indian Army but also grading. Under this new policy implemented from 31st March 2025, the officers of the Lt. General Rank will be measured in a scale from 1 to 9 based on their performance. This will boost the merit-based selection process in the Army. This system is designed to make the responsibilities of the top officers of the Army more transparent and effective. Earlier this policy is already applicable in Indian Air Force and Navy.
Indian Army
Explainer Indian Army Promotion Policy: What is New System Special?
The Indian Army is undergoing this time shift. The necessary changes in the structure are also being made with a mordenization in the Indian Army. Frequent changes are being observed in the promotion policy of the Army. The new shift is now about the promotion of senior officers in the Army.
So far, the promotional seniority was based on the Lt Gen Rank in the Indian Army. But the performance will be preferred in the new system. The officers will be given grading on a scale of 1 to 9 in their annual confidential report (ACR). The direct impact of this grading will be on their promotion and future responsibilities. This system is already applied in the Indian Air Force and Navy and now the Army has decided to adopt it.
90 Lieutenant General in the Army, 300 Major General and 1,200 Brigadier
Sources say that this change is aimed at prioritizing transparency and competency in the appointment of the top officers of the Army. This new policy will help the appointment of officers in senior positions of the Theatre Commands and Tri-Services (Arena, Naval, and Air Force).
The Lieutenant General Rank is the rank of Three-Star Rank in the Indian Army. The 11 lakh seals of the Indian Army are about 90 Lieutenant General, 300 Major General and 1,200 Brigadier. After becoming a Lieutenant General, the officer gets significant responsibilities like Core Commander or Army Commander. Now under the new system, it will be ensured that only qualified and superior performance officials will reach these posts. Because they had access to these positions on the basis of seniority.
The theater command is focus on
This new system is being implemented in the wake of the scheme of theater commands in the Indian Army. This commands will focus on the three major borders of India- China, Pakistan and the Indian Ocean region. In China-Special Theatre Command Lucknow, Pakistan-Special Theatre Command will be built in Jaipur and in the Marine Theatre Command Thiruvananthapuram. Hopefully, the work of creating theater commands will be completed by the middle of this year. These theatre commands are aimed at integrating the Indian Army and providing more effective combat capacity.
The new promotion policy is expected to increase transparency and efficiency in the army. Responsibilities were given to officers based on seniority so far. But through grading in the new system, it will be ensured that the right officer is appointed to the right position. This will not only improve the efficiency of the Army, but also better prepare the Army to deal with future challenges.
हालांकि सेना के इस कदम को सुधारवादी बताया जा रहा है, लेकिन इसने विवाद भी खड़े कर दिए हैं। वर्तमान में, लेफ्टिनेंट जनरल रैंक तक प्रमोशन के लिए वरिष्ठता का आधार जन्मतिथि और नियुक्ति की तिथि होती है। लेकिन नई पॉलिसी में मेरिट को प्राथमिकता देने से संभावित राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ सकता है।
नई नीति के लागू होने के साथ ही विवाद भी शुरू हो गए हैं। नई प्रणाली में प्रदर्शन को प्राथमिकता देने से प्रतिस्पर्धा और दबाव बढ़ सकता है। कुछ अधिकारियों को यह भी डर है कि ग्रेडिंग प्रणाली में भेदभाव या पक्षपात हो सकता है।
कई अधिकारियों ने इस पॉलिसी पर चिंता जताई है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “थ्री-स्टार जनरल बनने के लिए पहले ही कई स्तरों पर मेरिट के आधार पर प्रमोशन मिलता है। इस नई प्रणाली से गैरजरूरी हस्तक्षेप की संभावना बढ़ जाएगी।”
रिटायर्ड मेजर जनरल राजू चौहान का कहना है कि नई नीति से अधिकारियों के प्रदर्शन को सम्मान मिलेगा। हालांकि, इससे संभावित पक्षपात और विवाद का खतरा भी है।
वहीं, पूर्व रक्षा विशेषज्ञ मन अमन सिंह छिन्ना का मानना है कि सेना को ब्रिगेडियर से लेकर लेफ्टिनेंट जनरल तक प्रो-राटा सिस्टम को खत्म कर देना चाहिए और पूरी तरह से मेरिट-आधारित चयन करना चाहिए।
जबकि रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल केजेएस ढिल्लों उसके पक्ष में हैं, उनके अनुसार, “यह नीति उन अधिकारियों का सम्मान करेगी जो वर्तमान में अपनी रैंक पर उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रहे हैं। पहले प्रमोशन की प्रक्रिया किसी की जन्म तिथि या 38 साल पहले की अकादमी की रैंकिंग पर निर्भर करती थी।”
सेना में लेफ्टिनेंट जनरल बनने के बाद अधिकारी को आर्मी कमांडर या वाइस चीफ बनने के लिए वरिष्ठता और रेसिड्यूल सर्विस के आधार पर चुना जाता है। लेकिन ग्रेडिंग प्रणाली यह सुनिश्चित करेगी कि सही व्यक्ति को जिम्मेदारी मिले।
सैनिक कमांडर और वाइस चीफ पर लागू नहीं होगी यह नीति
सेना के उप-प्रमुख और सात कमांडर-इन-चीफ (C-in-C) इस नई नीति के दायरे में नहीं आएंगे। इन पदों पर नियुक्ति अभी भी वरिष्ठता के आधार पर होगी। लेफ्टिनेंट जनरल के पद पर पहुंचने के बाद, अधिकारी को कोर कमांडर बनाने के लिए उनकी ग्रेडिंग और प्रदर्शन देखा जाएगा। आर्मी कमांडर का पद भी लेफ्टिनेंट जनरल को मिलता है। ग्रेडिंग प्रणाली से यह तय किया जाएगा कि कौन-से अधिकारी आर्मी कमांडर बनने के योग्य हैं।
ग्रेडिंग प्रणाली और थिएटर कमांड्स की योजना सेना को आधुनिक और प्रभावी बनाने की दिशा में उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम है। हालांकि, इस नीति की सफलता इसके निष्पक्ष और कुशल कार्यान्वयन पर निर्भर करेगी। नई प्रणाली का उद्देश्य सेना को पारदर्शिता, योग्यता और आधुनिकता की ओर ले जाना है, जो इसे भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार करेगी।
हालांकि, इस प्रणाली को लागू करने में कई चुनौतियां भी हैं। ग्रेडिंग प्रणाली में भेदभाव की संभावना को नकारा नहीं जा सकता। अधिकारियों पर प्रदर्शन करने का अतिरिक्त दबाव भी होगा। इसके अलावा, राजनीतिक हस्तक्षेप और पक्षपात की संभावनाएं भी मौजूद हैं।
Starlink misuse in India: Starlink Satellite is a big disclosure on the Internet device. The security agencies from Manipur last days had recovered the Starlink device from the panic groups of Manipur. This device makes Elon Musk’s company SpaceX (SpaceX). The device was recovered from the base of the terror group called People’s Liberation Army (PLA). The security forces seized it during the joint campaign of the Army, Assam Rifles and Manipur Police on December 13. RPF/PLA was written on the device, which is the identity of this terror organization. The Starlink device was discussed at the time when the news of its use in the Russian-Ukraine war came.
Starlink misuse in India: extremist groups are Starlink Use
While the Guardian newspaper has revealed that the extremist groups during the violence released in Manipur used the Starlink device despite the internet shutdown. Although Starlink has not yet been licensed in India and has not been allowed to start its operation. But Starlink’s service continues in Myanmar. Manipur borders have been established from Myanmar, making it possible that these devices were brought to Manipur through trafficking.
What is the difference between the people? IndianArmy and #AssamRifles Undergraduate #SpearCorps chanderel, chanderel, chanderel, chanderel, chanderel, chanderel, chanderel, chanderel, chanderel, chanderel, chanderel, chanderel, chanderel, chanderel, chanderel, chanderel, chanderel, chants, chanderel, chanderal, chants, chanderal, chanderal, chants, chanderal, chanderal, chants ManipurIn close coordination with... pic.twitter.com/kxy7ec5YAE
सूत्रों के अनुसार, यह डिवाइस म्यांमार सीमा पर सक्रिय आतंकी समूहों द्वारा इस्तेमाल की जा रही है। स्टारलिंक के उपयोग से आतंकियों को सीमावर्ती इलाकों में इंटरनेट तक आसान पहुंच मिल रही है, जिससे उनकी गतिविधियों को अंजाम देना और भी आसान हो गया है।
Starlink misuse in India: एलन मस्क ने किया था इनकार
पिछले साल दिसंबर में जब असम राइफल्स ने मणिपुर के उग्रवादी समूहों से स्टारलिंक के डिश और राउटर को जब्त किया था, उस वक्त एलन मस्क ने X (पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट जारी करके कहा था कि “स्टारलिंक भारत में बंद है और इसका उपयोग नहीं हो सकता।” हालांकि, सुरक्षा बलों द्वारा डिवाइस जब्त किए जाने और आतंकियों द्वारा इसके इस्तेमाल की पुष्टि के बाद मस्क का यह दावा सवालों के घेरे में है।
This is false. Starlink satellite beams are turned off over India.
सूत्रों ने बताया कि स्टारलिंक डिवाइस म्यांमार के जरिए भारत में तस्करी कर लाई जाती है। इन डिवाइसों का उपयोग मणिपुर के सीमावर्ती इलाकों में किया जा रहा है, जहां इंटरनेट सेवाएं सरकार द्वारा निलंबित रहती हैं।
सूत्रों ने बताया कि मणिपुर के सभी उग्रवादी आदिवासी समूह- मैतयी, नागा और कुकी- सभी स्टारलिंक डिवाइस का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिन्हें मुख्य रूप से म्यांमार और सीमावर्ती क्षेत्रों से कंट्रोल किया जाता है। सूत्रों का कहना है कि “म्यांमार स्थित विद्रोही समूह और तस्कर अपने कामों के लिए इस डिवाइस का उपयोग करते हैं क्योंकि स्टारलिंक पर डाटा की कोई लिमिट नहीं है।”
एक सूत्र ने कहा, “हां, यह सच है कि स्टारलिंक का इस्तेमाल दिल्ली, मुंबई या कहीं भी अंदरूनी इलाकों में नहीं किया जा सकता है, क्योंकि भारत को कंपनी ने खुद ही जियोटैग किया हुआ है, लेकिन यह म्यांमार के सीमावर्ती इलाकों में सक्रिय है।”
Starlink misuse in India: ड्रग तस्करी में हो रहा है इस्तेमाल
हालांकि यह पहली बार नहीं है जब स्टालिंक डिवाइस पकड़ी गई हो। इससे पहले भी भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने पिछले साल नवंबर में स्टारलिंक डिवाइस बरामद की थी। नवंबर के अंत में अंडमान और निकोबार पुलिस ने म्यांमार की एक नाव में 6,000 किलोग्राम से अधिक मेथामफेटामाइन के अलावा एक स्टारलिंक मिनी इंटरनेट डिवाइस जब्त की थी यह डिवाइस तस्करों द्वारा नेविगेशन और वाई-फाई हॉटस्पॉट बनाने के लिए उपयोग की जा रही थी। अंडमान के डीजीपी हरगोबिंदर सिंह धालीवाल ने पुष्टि की कि तस्करों ने सैटेलाइट फोन का इस्तेमाल कर इंटरनेट हॉटस्पॉट बनाए थे, जो उनकी गतिविधियों को आसान बना रहे थे।
सरकार ने मांगी थी जानकारी, कंपनी ने किया था इनकार
सूत्रों ने बताया कि वहीं, जब भारत सरकार ने स्टारलिंक से जब इन उपकरणों के मूल खरीदारों की जानकारी मांगी, लेकिन कंपनी ने डेटा गोपनीयता कानूनों का हवाला देते हुए सहयोग करने से इनकार कर दिया। सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “तस्करी के मामले में जब्त इन उपकरणों के मालिकों की जानकारी मांगी गई थी, लेकिन स्टारलिंक ने सहयोग से मना कर दिया।”
स्टारलिंक डिवाइस का उपयोग गैरकानूनी गतिविधियों, जैसे तस्करी और आतंकवाद में होने से भारत में सुरक्षा एजेंसियां सतर्क हो गई हैं। सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक स्टारलिंक अपने सुरक्षा उपायों और डेटा प्रबंधन पर संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं देती, तब तक उसे भारत में ऑपरेंशंस शुरू करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
भारत सरकार ने डॉट (DoT) और MHA से स्टारलिंक की तकनीकी और सुरक्षा प्रोटोकॉल की जांच के निर्देश दिए हैं। वरिष्ठ अधिकारियों ने संकेत दिया है कि कंपनी से सुरक्षा उपायों पर जानकारियां मांगी जा रही हैं, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि इस तकनीक का दुरुपयोग न हो।
एलोन मस्क लंबे समय से स्टारलिंक को भारत जैसे विशाल बाजार में लाने की कोशिश कर रहे हैं। नवंबर 2024 में, भारत सरकार ने पुष्टि की थी कि स्टारलिंक आवश्यक सुरक्षा अनुमतियां प्राप्त करने की प्रक्रिया में है। हालांकि, भारत में सैटेलाइट इंटरनेट जैसी सेवाओं पर सख्त नियंत्रण है। विशेषज्ञों का मानना है कि स्टारलिंक का उपयोग इंटरनेट शटडाउन को दरकिनार करने के लिए किया जा सकता है, जो भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक गंभीर खतरा है।
स्टारलिंक: क्या है इसकी खूबियां?
स्टारलिंक की वेबसाइट के अनुसार, “वह दुनिया का पहला और सबसे बड़ा उपग्रह समूह” है, जो LEO उपग्रहों का उपयोग करके ब्रॉडबैंड इंटरनेट प्रदान करता है। यह सेवा स्ट्रीमिंग, ऑनलाइन गेमिंग, वीडियो कॉल जैसे उच्च-बैंडविड्थ कार्यों को सुचारू रूप से सपोर्ट करने में सक्षम है। अधिकांश पारंपरिक उपग्रह इंटरनेट सेवाएं 35,786 किमी की ऊंचाई पर स्थित भूस्थिर उपग्रहों पर निर्भर करती हैं। इसके कारण उपयोगकर्ता और उपग्रह के बीच डेटा के राउंड-ट्रिप समय (विलंबता) में काफी देरी होती है। यह विलंबता 600 मिलीसेकंड या उससे अधिक हो सकती है, जिससे ऑनलाइन गेमिंग, वीडियो कॉल जैसी गतिविधियों के लिए यह सिस्टम उपयुक्त नहीं बन पाता।
वहीं स्टारलिंक ने इस समस्या को हल करते हुए विलंबता को घटाकर केवल 25 मिलीसेकंड तक कर दिया है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि इसके उपग्रह पृथ्वी के बेहद करीब, सिर्फ 550 किमी की ऊंचाई पर परिक्रमा करते हैं। इस तरह यह पूरी दुनिया को कवर करता है।
जून 2024 में सिएरा लियोन, अफ्रीका में सेवाएं शुरू होने के बाद, स्टारलिंक अब 100 देशों में सक्रिय हो चुकी है। कंपनी भारत में भी अपनी सेवाएं शुरू करने के लिए लाइसेंस प्रक्रिया में है। भारत में स्टारलिंक को भारती एंटरप्राइजेज के स्वामित्व वाली यूटेलसैट वनवेब, रिलायंस इंडस्ट्रीज के जियोस्पेसफाइबर, और अमेज़न के कुइपर सिस्टम्स जैसे कंपनियों से मुकाबला करना होगा। वहीं, स्टारलिंक की योजना है कि 42,000 उपग्रहों का एक विशाल तारामंडल (Megaconstellation) बनाना है। इसके मुकाबले, यूटेलसैट वनवेब के नेटवर्क में 1,200 किमी की LEO कक्षा में लगभग 630 उपग्रह शामिल हैं।
Pakistan Army Exercise: Pakistan’s military has been doing massive military exercises near the International Border, close to the Indian border in the recent Punjab province. This exercise is being used large weapons such as attacker helicopters, heavy lift helicopters, tanks, armored carts and howitzer cannons. This exercise began in the first week of December 2024 and continues at the moment.
Pakistan Army Exercise: Hawaitzer Cannon in Village Tight Gals
According to the locals, heavy military detachments during practice were seen passing through the villages of the Punjab province. Some of the glimpses of the evenings have also appeared on social media, where the Pakistani army’s Hawaitzer Cannons were seen in the tight streets of the village.
Pakistan Army Exercise: Old ATGM near Pakistan
Defence experts and Retired Colonel Rohit Vats suggest that a special strategy is seen in the use of Cobra Attack helicopters. Gunships of both sides fly at low altitudes to hide their presence and rise at altitude to target and fire anti-tank missiles.
However, it has a big difference of missile technology. Pakistani gunships use second-generation wire-guide ATGM (anti-tank guided missiles), while Indian gunships stain third-generation fire-and-forget missiles.
इसका मतलब है कि पाकिस्तानी गनशिप को मिसाइल दागने के बाद अपनी स्थिति बनाए रखनी पड़ती है ताकि ऑपरेटर मिसाइल को लक्ष्य तक गाइड कर सके। वहीं, भारतीय गनशिप मिसाइल फायर करने के बाद तुरंत अपनी जगह बदल सकते हैं या नई फायरिंग पोजीशन पर जा सकते हैं, क्योंकि भारतीय मिसाइलें खुद-ब-खुद अपने लक्ष्य को खोजने और नष्ट करने में सक्षम होती हैं।
इस दौरान, पाकिस्तानी गनशिप, मिसाइल को गाइड करने के लिए अपनी स्थिति बनाए रखते हुए, बेहद असुरक्षित हो जाते हैं और इन्हें दुश्मन के हमले का खतरा रहता है।
आतंकवाद के गढ़ मुजफ्फराबाद में विशेष ट्रेनिंग
पाकिस्तान ने इससे पहले अगस्त 2024 में नियंत्रण रेखा (एलओसी) और अंतरराष्ट्रीय सीमा (आईबी) पर हाई अलर्ट जारी किया था। खुफिया सूत्रों के अनुसार, हाल ही में पाकिस्तान ने मुजफ्फराबाद में एक बड़ी क्विक रिस्पॉन्स ट्रेनिंग का अभ्यास किया था। इस इलाके को आतंकवादियों का गढ़ माना जाता है। इस ट्रेनिंग में पाकिस्तानी सेना के स्पेशल सर्विस ग्रुप (एसएसजी) के कमांडो भी शामिल थे।
क्विक रिस्पॉन्स टीम (क्यूआरटी) का यह अभ्यास किसी हमले की स्थिति में सेना की तैयारियों को परखने के लिए आयोजित किया गया था। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि किसी भी आपात स्थिति में सेना कितनी तेजी से जवाब दे सकती है।
मुजफ्फराबाद में आयोजित इस अभ्यास को खुफिया एजेंसियां चिंताजनक मान रही हैं। रिपोर्ट के अनुसार, इस क्षेत्र में आतंकवादियों के कई कैंप सक्रिय हैं। अभ्यास के दौरान पाक सेना की वे सभी यूनिट शामिल थीं, जो एलओसी के पास तैनात हैं।
खास बात यह है कि एसएसजी कमांडो, जो आतंकवादियों को ट्रेनिंग देने और भारत में घुसपैठ में मदद करने के लिए कुख्यात हैं, भी इस अभ्यास का हिस्सा थे।
एलओसी पर पाकिस्तानी गतिविधियां तेज!
पाकिस्तान की बॉर्डर एक्शन टीम (BAT), जिसमें एसएसजी कमांडो और आतंकवादी शामिल होते हैं, एलओसी पर सक्रिय देखी गई है। खुफिया सूत्रों का कहना है कि पाकिस्तान को भारत की ओर से संभावित सर्जिकल स्ट्राइक या किसी और जवाबी कार्रवाई का डर सता रहा है।
पिछले कुछ महीनों में जम्मू-कश्मीर में यात्रियों से भरी बस पर हमले और अन्य आतंकवादी घटनाओं के बाद पाकिस्तान ने एलओसी और अंतरराष्ट्रीय सीमा पर अलर्ट जारी किया है।
खुफिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान ने पीओके में अपनी 10वीं कोर, जिसकी जिम्मेदारी पूरे पीओके की सुरक्षा है, में सैनिकों की संख्या बढ़ाई है। इसके अलावा, बहावलपुर स्थित 31वीं कोर को भी अलर्ट पर रखा गया है।
बहावलपुर वही इलाका है जहां आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद का मुख्यालय स्थित है। हाल ही में पाक सेना ने अपनी आर्टिलरी रेजिमेंट की तैनाती को भी नए सिरे से व्यवस्थित किया है ताकि तनाव की स्थिति में तेजी से प्रतिक्रिया दी जा सके।
पाकिस्तान और चीन की नई योजनाएं भी खुफिया एजेंसियों की नजरों में हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि सीमा पर बढ़ती गतिविधियों के पीछे दोनों देशों की गहरी रणनीतिक साजिश हो सकती है।
भारतीय सेना और खुफिया एजेंसियां सीमा पर पाकिस्तान की इन गतिविधियों पर कड़ी नजर रख रही हैं। स्थिति लगातार बदल रही है, और भारत के लिए यह आवश्यक हो गया है कि वह अपनी सैन्य तैयारियों को मजबूत बनाए और पड़ोसी देशों की चालों का सटीक जवाब दे।
Aksai Chin: India has taken a link objection to the new county i.e. districts created by incorporating parts of the Indian region of Aksai China captured on Friday. "We have recorded serious protests with China through diplomatic means," said Radhir Jaiswal, spokesperson of the Ministry of External Affairs (MEA). " China has taken this step at the time when the conversation is on the restoration of diplomatic relations between the two countries. Recently India and China’s special representatives were met in Beijing for negotiations on the border dispute after about five years. China made this controversial decision just 10 days after this negotiation.
Aksai Chin: India’s strict stance
The spokesperson of the Ministry of External Affairs, Randier Jaiswal clarified that India has never accepted the illegal occupation of China in the region. The Ministry of External Affairs issued a strict statement on the issue that the construction of the new county will not affect its position for a long time towards the sovereignty of India on this area, nor will the legality of the illegal and forced occupation of China.
Aksai Chin: China Made Two New County
Recently, China has allaned to create two new county – Hean County and Hekang County – in Xinjiang Uigher Autonomous Region. Both of these new county have been placed under the administration of Hotan Province of North-Western China. The administrative seat of the Hean County is built in the Hongliu Township, while the seat of Hekong County is located in Zayidula Township. Hean County covers an area of about 38,000 square kilometres, including a large part of India’s Aksai Chin. This is the area that India considers part of its sovereignty and accused China of illegal possession. Most areas of these districts come in Ladakh, Union Territories of India.
While China has taken this step at a time when India and China’s special representatives were met in Beijing for negotiations on border disputes nearly five years later. China made this controversial decision just 10 days after this negotiation.
This new attempt to show the areas of the Aksai Chin by China in its map is being seen as a serious challenge for the sovereignty of India. Aksai Chin is in the illegal occupation of China since the 1950s, but India considers it its territory.
Aksai Chin is a long dispute between India and China. The war between the two countries in 1962 had a massive conflict on the region. Aksai Chin is located in the north-eastern part of Ladakh and is strategically extremely important area.
During the 1962’s India-China war, China captured illegal at the 38,000 square kilometres area of the Aksai Chin. In 1963, Pakistan entrusted the 5,180 square kilometres of Saxgam Valley to China, making it controversy and complex.
China’s aggressive policies don’t end here. He also claims on the 90,000 square kilometres of Arunachal Pradesh and tries to tell it part of the "South Tibet". Additionally, China also raises its right on about 2,000 square kilometres of Himachal Pradesh and Uttarakhand.
Depsang: new controversial point
In recent years, the area of Depusang, which is located in the west of Mahj 40 km from Aksai Chin, has become a new controversial point. China’s aggressive steps in the region have further enhanced tension between the two countries.
India’s Response
India has reported a serious threat to regional stability and safety in China. "India is fully committed to protecting its regional integrity and efforts to claim on the Indian territory cannot be recognized in any respect," said MEA. ""
What is the strategic significance of Aksai Chin?
Aksai Chin area is located in the highlands of the Himalayas and is strategically important for India and China. Here’s natural resources and geographic conditions make it important in Asia’s geopolitical landscape.
Aksai Chin, a strategically significant area for China, which is part of India’s Ladakh region. It is connected to China’s G-219 highway, which connects Xinjiang and Tibet to mutually. This highway is an important lifeline for China’s military and economic operation.
चीन ने होंगलिउ टाउनशिप को हेआन काउंटी का प्रशासनिक मुख्यालय घोषित किया है, जो भारतीय सीमा रेखा से मात्र 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। होंगलिउ, जिसे स्थानीय स्तर पर “दाहोंगल्युतन” के नाम से भी जाना जाता है, पहले एक साधारण सैन्य बैरक और ट्रक-स्टॉप था। 2017 के बाद से चीन ने इस क्षेत्र में तेजी से विकास कार्य शुरू किए हैं।
होंगलिउ का रणनीतिक महत्व इसके खनिज संसाधनों, विशेष रूप से लिथियम के खनन, के कारण बढ़ गया है। यह खनिज भविष्य की प्रौद्योगिकी, विशेष रूप से बैटरी उत्पादन में उपयोगी है, जिससे चीन की इस क्षेत्र पर पकड़ और मजबूत होती जा रही है।
Aksai Chin: चीन का प्रशासनिक विस्तार
चीन ने हाल ही में हेआन और हेकांग काउंटी की स्थापना की है, जिससे अक्साई चिन क्षेत्र में उसकी प्रशासनिक उपस्थिति और सुदृढ़ हुई है। हेआन काउंटी में होंगलिउ टाउनशिप को मुख्यालय के रूप में स्थापित करना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि चीन इस इलाके में अपनी पकड़ को और मजबूत करना चाहता है।
इस प्रशासनिक बदलाव के साथ, चीन ने अक्साई चिन क्षेत्र में नई वित्तीय और प्रशासनिक गतिविधियों का विस्तार शुरू किया है। यह कदम न केवल क्षेत्रीय नियंत्रण को मजबूत करता है, बल्कि चीन के रणनीतिक लक्ष्यों की दिशा में भी बढ़ता है।
What is China Purpose
चीन ने अक्साई चिन में दो नए काउंटी, हेआन और हेकांग, बनाकर अपने इरादों को स्पष्ट कर दिया है। इन काउंटी की स्थापना के जरिए चीन न केवल अपने क्षेत्रीय दावों को मजबूत कर रहा है, बल्कि इस क्षेत्र में आर्थिक और सामरिक गतिविधियों को बढ़ावा देने का प्रयास भी कर रहा है। यह कदम अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपने दावे को वैध दिखाने और सीमा पर अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा है।
चीन की यह रणनीति भारत की सीमा पर तनाव बढ़ाने के साथ-साथ क्षेत्रीय स्थिरता के लिए गंभीर चुनौती पेश कर सकती है।
अक्साई चिन में लिथियम का भंडार
होंगलिउ टाउनशिप, जिसे अब हेआन काउंटी का प्रशासनिक मुख्यालय बनाया गया है, यह इलाका लिथियम खनन के लिए प्रसिद्ध है। लिथियम का इस्तेमाल बैटरी निर्माण और तकनीकी उपकरणों में होता है, वर्तमान में वैश्विक बाजार में अत्यधिक मांग में है। चीन का यह कदम यह दर्शाता है कि वह अक्साई चिन को केवल सामरिक संपत्ति नहीं, बल्कि आर्थिक संसाधन के रूप में भी देख रहा है।
लिथियम जैसे खनिजों की मौजूदगी ने इस क्षेत्र के महत्व को और बढ़ा दिया है। वैश्विक तकनीकी दौड़ में चीन इस संपदा का उपयोग अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए कर सकता है। यह विकास भारत के लिए भी एक चेतावनी है कि क्षेत्रीय संसाधनों पर चीन की पकड़ न केवल आर्थिक बल्कि सैन्य दृष्टि से भी खतरनाक हो सकती है।
चीन की ये रणनीतिक गतिविधियां भारत के लिए एक स्पष्ट संदेश हैं कि उसे अपनी क्षेत्रीय अखंडता और सामरिक योजनाओं को लेकर सतर्क रहना होगा।
चीन की रणनीति और भारत के लिए चुनौती
चीन ने अक्साई चिन में अपने कदमों से यह संदेश दिया है कि वह इस क्षेत्र पर अपने कब्जे को वैधता प्रदान करना चाहता है। होंगलिउ जैसे संवेदनशील स्थान को काउंटी मुख्यालय बनाकर, चीन ने इसे न केवल प्रशासनिक केंद्र बनाया है, बल्कि इसे एक रणनीतिक हब के रूप में विकसित करने का प्रयास किया है।
यह कदम न केवल भारत के लिए सामरिक चुनौती प्रस्तुत करता है, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता और सुरक्षा के लिए भी खतरा पैदा करता है। अक्साई चिन के प्रति चीन का यह रवैया भारत के साथ सीमा विवाद को और जटिल बना सकता है।
चीन की मंशा पर सवाल
चीन के इस कदम को उसकी विस्तारवादी नीति का हिस्सा माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि नए काउंटी का निर्माण भारत पर दबाव बनाने और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपने दावों को वैधता देने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है।
भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अपनी क्षेत्रीय अखंडता पर किसी भी प्रकार का समझौता नहीं करेगा। अब देखना होगा कि इस मुद्दे पर दोनों देशों के बीच तनाव को कैसे सुलझाया जाता है।
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