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Explainer Dalai Lama Reincarnation: क्या फिर जन्म लेंगे दलाई लामा? तिब्बती सर्वोच्च गुरु के एलान के क्या हैं मायने? क्या उनका पुनर्जन्म बनेगा भारत-चीन टकराव की वजह?

Dalai Lama Reincarnation Row: Spiritual Legacy or Geopolitical Flashpoint?
Pic Source: Dalai Lama X Account

Dalai Lama Reincarnation: अपने 90वें जन्मदिन से चार दिन पहले तिब्बती बौद्ध धर्म के सबसे सम्मानित और प्रभावशाली आध्यात्मिक नेता दलाई लामा ने दो जुलाई को एतिहासिक एलान करते हुए कहा कि उनकी मृत्यु के बाद भी दलाई लामा की संस्था (Institution of the Dalai Lama) चलती रहेगी और उनके पुनर्जन्म (Reincarnation) को केवल गेडन फोडरंग ट्रस्ट (Gaden Phodrang Trust) ही मान्यता देगा। यानी कि केवल उनके द्वारा स्थापित “गदेन फोड्रांग ट्रस्ट” को ही अगला अवतार यानी पुनर्जन्म पहचानने का अधिकार होगा।

उनका ये बयान उस वक्त आया जब पूरी दुनिया उनकी उम्र को लेकर चिंतित थी। 6 जुलाई 2025 को वह 90 साल के हो जाएंगे। ऐसे में यह सवाल बार-बार उठ रहा था कि क्या 14वें दलाई लामा के बाद इस संस्था का अस्तित्व रहेगा या नहीं?

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Dalai Lama Reincarnation: कैसे होता है दलाई लामा का पुनर्जन्म

दलाई लामा तिब्बती बौद्ध धर्म के सबसे प्रमुख धार्मिक नेता होते हैं। “दलाई लामा” का अर्थ होता है “ज्ञान का महासागर”। यह पद एक “पुनर्जन्म परंपरा” (Reincarnation System) पर आधारित है। तिब्बती बौद्ध परंपरा में यह माना जाता है कि जब कोई उच्च आत्मा जैसे दलाई लामा देह त्यागते हैं, तो वे दोबारा जन्म लेते हैं। यह जन्म उसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए होता है, यानी संसार में करुणा, अहिंसा और अध्यात्म का संदेश फैलाना। माना जाता है कि उनकी आत्मा किसी नवजात बालक में जन्म लेती है और वर्षों की खोजबीन के बाद उस बच्चे की पहचान अगली पीढ़ी के दलाई लामा के रूप में की जाती है। दलाई लामा की परंपरा ‘तुल्कु’ प्रणाली पर आधारित है यानि यानी पूर्व जन्म की आत्मा को पहचानना और उसे प्रशिक्षण देकर नया दलाई लामा बनाना। जिसमें किसी बड़े बौद्ध गुरु की मृत्यु के बाद उसका पुनर्जन्म खोजा जाता है।

दलाई लामा की परंपरा 600 साल पुरानी है। पहला दलाई लामा, गेदुन द्रुपा, 1391 में पैदा हुए थे। इसके बाद से यह क्रम चलता आया है। हर दलाई लामा को पिछले दलाई लामा की आत्मा का पुनर्जन्म माना जाता है।

14वें दलाई लामा का जन्म 6 जुलाई 1935 को तिब्बत के टकस्तेर गांव में हुआ था। जब वे सिर्फ दो साल के थे, तिब्बती धर्मगुरुओं ने उन्हें 13वें दलाई लामा थुब्तेन ग्यात्सो का पुनर्जन्म माना। उनकी पहचान के लिए खास संकेतों का इस्तेमाल किया गया। एक वरिष्ठ भिक्षु ने छोटे ल्हामो धोंडुप को 13वें दलाई लामा की वस्तुएं दिखाईं तो उन्होंने पहचान लिया, जिससे यह पक्का हो गया कि वही अगला दलाई लामा हैं। दो साल की उम्र में उन्हें 13वें दलाई लामा का पुनर्जन्म घोषित कर दिया गया और 1940 में ल्हासा के पोटाला पैलेस में उन्हें आधिकारिक रूप से गद्दी सौंपी गई और औपचारिक रूप से तिब्बती लोगों के आध्यात्मिक नेता के रूप में स्थापित किया गया। 1950 के दशक में जब चीन ने तिब्बत पर कब्जा कर लिया, तो 1959 में उन्होंने भारत की ओर पलायन कर लिया। तब से वे हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में निर्वासन में रह रहे हैं, जहां सेंट्रल तिब्बतेन एडमिनिस्ट्रेशन (Central Tibetan Administration) के नाम से तिब्बती सरकार-इन-एक्ज़ाइल काम कर रही है।

Dalai Lama Reincarnation Row: Spiritual Legacy or Geopolitical Flashpoint?
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क्या कहा दलाई लामा ने अपने पुनर्जन्म को लेकर?

तिब्बती आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा ने स्पष्ट रूप से ऐलान किया है कि उनकी मृत्यु के बाद दलाई लामा संस्था (Dalai Lama Institution) जारी रहेगी, और उनके भविष्य के पुनर्जन्म की पहचान केवल Gaden Phodrang Trust द्वारा ही की जाएगी। उन्होंने यह बयान तिब्बत, हिमालयी क्षेत्र, मंगोलिया, रूस और चीन के बौद्ध अनुयायियों की 14 वर्षों से लगातार आ रही अपीलों के जवाब में दिया।

अपने आधिकारिक बयान में दलाई लामा ने कहा, “1969 से मैंने यह कहा है कि दलाई लामा का पुनर्जन्म होना चाहिए या नहीं, यह तिब्बती जनता और बौद्ध परंपरा से जुड़े लोगों का निर्णय होना चाहिए।” उन्होंने यह भी दोहराया कि चीन या किसी भी बाहरी संस्था को इस प्रक्रिया में कोई हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है।

दलाई लामा ने स्पष्ट किया कि 24 सितंबर 2011 में जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार, Gaden Phodrang Trust, जो उनके कार्यालय का हिस्सा है,वही इस प्रक्रिया को धार्मिक परंपराओं के अनुसार पूरा करेगा। इसके लिए बौद्ध धर्मगुरुओं और “वरिष्ठ लामाओं” से सलाह ली जाएगी।

हालांकि दलाई लामा ने इस मुद्दे पर सार्वजनिक चर्चा नहीं की, लेकिन पिछले 14 सालों में उन्हें कई जगहों से पत्र और संदेश मिले। तिब्बत के अंदर और बाहर रहने वाले तिब्बती, तिब्बती निर्वासित संसद के सदस्य, केंद्रीय तिब्बती प्रशासन (सीटीए) के लोग, गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ), हिमालय क्षेत्र, मंगोलिया, रूस के बौद्ध गणराज्य, और एशिया सहित मुख्यभूमि चीन के बौद्धों ने उन्हें पत्र लिखे। इन सभी ने जोर देकर कहा कि दलाई लामा की संस्था को जारी रखना जरूरी है। खास तौर पर, तिब्बत में रहने वाले तिब्बतियों ने भी अलग-अलग माध्यमों से यही अपील की। इन सभी अनुरोधों को ध्यान में रखते हुए, दलाई लामा ने घोषणा की कि दलाई लामा की संस्था आगे भी चलेगी।

खास बात यह है कि उनका यह बयान 21 मई 2025 को धर्मशाला में तैयार किया गया और 2 जुलाई 2025 को आधिकारिक रूप से जारी किया गया।

चीन को लगेगी मिर्ची

दलाई लामा का यह बयान चीन के खिलाफ एक स्पष्ट संदेश है। चीन ने कई बार कहा है कि वह अगले दलाई लामा की नियुक्ति अपने नियंत्रण वाली धार्मिक संस्थाओं के जरिए करेगा। चीन सरकार “Golden Urn System” के तहत पुनर्जन्म प्रक्रिया को नियंत्रित करना चाहती है, जो एक तरह की पर्ची निकालने की प्रक्रिया है, जिसमें बालक का नाम रखा जाता है। लेकिन तिब्बती समुदाय और भारत इस कदम का सख्त विरोध करते हैं। दलाई लामा ने गदेन फोडरंग ट्रस्ट को अपने पुनर्जन्म की मान्यता देने का एकमात्र अधिकार देकर चीन के दावों को नकार दिया है। चीन द्वारा नियुक्त कोई भी दलाई लामा अवैध माना जाएगा। वहीं, इससे भारत की स्थिति को भी मजबूती मिलेगी, क्योंकि तिब्बती निर्वासित सरकार (गवर्नमेंट इन एक्साइल) हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में स्थित है। भारत को असली आध्यात्मिक उत्तराधिकारी की देखभाल करने वाला देश माना जाएगा। हालांकि, अगर चीन भविष्य में अपने तरीके से कोई दलाई लामा घोषित करता है, तो इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तनाव पैदा हो सकता है। उदाहरण के लिए, चीन पहले पंचेन लामा की नियुक्ति में हस्तक्षेप कर चुका है, और ऐसा ही कुछ यहां भी हो सकता है।

चीन ने बताया था दलाई लामा को “अलगाववादी”

चीन की सरकार 14वें दलाई लामा को “विभाजनकारी” (Splittist) और “अलगाववादी” बताती है। तिब्बत में दलाई लामा की तस्वीर रखना भी अपराध माना जाता है। 1989 में नोबेल शांति पुरस्कार पाने के बावजूद उनकी तस्वीरें सार्वजनिक रूप से दिखाने पर पाबंदी है। 2007 में चीन ने एक नया नियम बनाया जिसके तहत बिना सरकारी अनुमति के किसी बौद्ध नेता का पुनर्जन्म मान्य नहीं होगा। यानी चीन चाहता है कि दलाई लामा का उत्तराधिकारी सिर्फ उसकी मर्जी से घोषित हो। मार्च 2025 में, चीन के विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने दलाई लामा को “राजनीतिक निर्वासित” कहा, जिनका तिब्बती लोगों को प्रतिनिधित्व करने का कोई अधिकार नहीं है। इसलिए दलाई लामा की घोषणा चीन के उस एजेंडे को सीधी चुनौती देती है।

दलाई लामा की उम्र अब 90 साल के करीब है। वे जानते हैं कि उनके जाने के बाद क्या होगा, इसलिए वे अपनी शर्तों पर तैयारी कर रहे हैं। गदेन फोडरंग ट्रस्ट और बौद्ध धर्मगुरुओं के जरिए चयन प्रक्रिया को व्यवस्थित करके उन्होंने यह सुनिश्चित किया है कि राजनीतिक शक्तियां इस प्रक्रिया पर कब्जा न कर सकें। दलाई लामा दुनिया भर के बौद्ध समुदायों को एकजुट करने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि वे चीन के दावों को न मानें।

पंचेन लामा की क्या है भूमिका

पंचेन लामा को अमिताभ बुद्ध (बुद्ध के असीम प्रकाश के रूप) का अवतार माना जाता है, जो करुणा और ज्ञान का प्रतीक हैं। दूसरी ओर, दलाई लामा को अवलोकितेश्वर (करुणा के बुद्ध) का अवतार माना जाता है। पंचेन लामा गेलुग स्कूल में दलाई लामा के बाद दूसरा सबसे बड़ा आध्यात्मिक पद है। पंचेन लामाओं ने तिब्बती शासन में सलाहकार की भूमिका निभाई है, खासकर जब दलाई लामा नाबालिग होते थे या निर्वासित जीवन जी रहे होते थे।

वहीं, पारंपरिक रूप से, पंचेन लामा और दलाई लामा एक-दूसरे के पुनर्जन्म की पहचान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, क्योंकि दोनों की उम्र में लगभग 50 साल का अंतर होता है। यह रिश्ता गुरु-शिष्य की तरह होता है, जहां पंचेन लामा दलाई लामा के पुनर्जन्म की खोज में मदद करते हैं। पहले आधिकारिक पंचेन लामा, पंचेन लामा की परंपरा की शुरुआत 17वीं शताब्दी में हुई, जब 5वें दलाई लामा, न्गवांग लोबसांग ग्यत्सो, ने अपने गुरु लोबसांग चोकी ग्याल्त्सेन को पहला आधिकारिक पंचेन लामा घोषित किया। यह 1645 की बात है। लोबसांग चोकी ग्याल्त्सेन ताशिलहुनपो मठ (जो तिब्बत के शिगात्से में स्थित है) के प्रमुख थे। इसके बाद, कई अन्य लामाओं को मरणोपरांत पंचेन लामा की उपाधि दी गई, लेकिन आधिकारिक रूप से यह परंपरा 1645 से शुरू मानी जाती है। 10वें पंचेन लामा 1959 में दलाई लामा के निर्वासन के बाद तिब्बत में रहे, लेकिन बाद में चीन के साथ मतभेद के चलते वे नजरबंद रहे और 1989 में उनकी मृत्यु हो गई।

1995 में, दलाई लामा ने 6 साल के गेदुन चोएक्यी न्यिमा को 11वें पंचेन लामा के रूप में मान्यता दी थी, लेकिन चीन ने उन्हें हिरासत में ले लिया, और उनका पता आज तक अज्ञात है। इसके बाद चीन ने 5 साल के ग्यांचेन नोर्मा को अपना पंचेन लामा घोषित किया। यह चयन “स्वर्ण घड़ा” पद्धति (जो 1793 में किंग राजवंश द्वारा शुरू की गई पद्धति, जिसमें नामों को एक घड़े से निकाला जाता था) के आधार पर किया गया था। ग्यांचें नोर्मा अब 35 साल के हैं और हाल ही में, जून 2025 में, उन्होंने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात की, जहां उन्हें “तिब्बती बौद्ध धर्म के एकीकरण” और चीनीकरण (धर्म को चीनी विचारधारा के अनुरूप ढालना) को बढ़ावा देने के लिए उपयोग कर रहा है।

हालांकि तिब्बती निर्वासित समुदाय और दलाई लामा चीन के चयन को मान्यता नहीं दी है, लेकिन चीन का दावा है कि पंचेन लामा की नियुक्ति में उसका ऐतिहासिक अधिकार है। दलाई लामा ने कहा है कि जो लोग धर्म में विश्वास नहीं करते, वे लामा के पुनर्जन्म में दखल क्यों दें? उन्होंने अपनी किताब “वॉइस फॉर द वॉयसलेस” में तिब्बतियों से अपील की कि वे चीन की तरफ से चुने गए किसी उम्मीदवार को न मानें।

करमापा ने दी ‘दूसरे बुद्ध’ की उपाधि

दलाई लामा के 90वें जन्मदिन से पहले, तिब्बती बौद्ध धर्म की कर्मा काग्यु परंपरा के प्रमुख 17वें करमापा ओग्येन त्रिनले दोरजे ने भी एक भावुक पत्र जारी करते हुए दलाई लामा को ‘दूसरे बुद्ध’ की उपाधि दी। साथ ही, चीन द्वारा उनके पुनर्जन्म को नियंत्रित करने की कोशिशों को सख्ती से नकारा है।

Dalai Lama Reincarnation Row: Spiritual Legacy or Geopolitical Flashpoint?
Karmapa Ogyen Trinley Dorje With Dalai Lama

करमापा ओग्येन त्रिनले दोरजे ने दलाई लामा को “सभी तिब्बती परंपराओं के लिए शरण और रक्षक” बताया और तिब्बत पर चीन के हिंसक कब्जे की निंदा की। उनका यह समर्थन इसलिए भी अहम है क्योंकि करमापा ओग्येन त्रिनले दोरजे का जन्म तिब्बत में हुआ था और उन्हें चीन और दलाई लामा दोनों ने ही मान्यता दी थी।

पत्र में करमापा ओग्येन त्रिनले दोरजे ने लिखा है कि जब तिब्बत की जनता अकेली थी और उनके पास कोई सहारा नहीं था, तब दलाई लामा “पूर्वजों के संदेशवाहक बनकर” आए। उन्होंने कहा कि दलाई लामा ने “बुद्ध के ज्ञान को धरती और आकाश के बीच जीवित रखा” और हिमालय से लेकर दुनियाभर में फैलाया।

करमापा ने चीन को “आक्रामक हमलावर” कहा, जिन्होंने तिब्बत की “बर्फ को खून से लाल कर दिया।” उन्होंने दलाई लामा से पुनर्जन्म की अपील करते हुए कहा, “आप तब तक जीवित रहें, जब तक यह पृथ्वी और मेरु पर्वत टिके रहें।” यह बयान चीन के उस दावे पर सीधी चोट है, जिसमें वह कहता है कि अगला दलाई लामा उसकी निगरानी में चुना जाएगा। 2019 में भी करमापा ने चीन द्वारा तिब्बती परंपरा में हस्तक्षेप के खिलाफ चेतावनी दी थी। कई तिब्बती अनुयायियों की यह भी इच्छा है कि करमापा भारत लौटें, जिससे तिब्बती बौद्ध परंपरा को भारत में और बल मिलेगा और चीन को एक स्पष्ट संदेश जाएगा।

बता दें कि करमापा लामा तिब्बती बौद्ध धर्म के काग्यु स्कूल, विशेष रूप से कर्मा काग्यु शाखा, के सर्वोच्च आध्यात्मिक नेता हैं। वे पुनर्जन्म की एक प्राचीन परंपरा का हिस्सा हैं, जो लगभग 900 साल से चली आ रही है। करमापा को “बुद्ध की सभी गतिविधियों का अवतार” माना जाता है। 17वें करमापा की मान्यता को लेकर विवाद है। दलाई लामा ने उग्येन त्रिनले दोरजे को 17वें करमापा के रूप में मान्यता दी है, जो वर्तमान में अमेरिका में रहते हैं। पिछले साल जब दलाई लामा अमेरिकी इलाज के लिए गए थे, तो ज्यूरिख में दोनों की मुलाकात भी हुई थी। वहीं, दूसरे दावेदार, थाए दोरजे भी हैं, लेकिन शादी करने के बाद उनकी दावेदारी पर सवाल उठने लगे हैं।

क्या है अमेरिका का रुख?

अमेरिका ने तिब्बती मानवाधिकारों की रक्षा के लिए लगातार समर्थन जताया है। 2024 में, अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने रिजॉल्व तिब्बत अधिनियम (Resolve Tibet Act) कानून पर हस्ताक्षर किए, जिसमें चीन से तिब्बत को अधिक स्वायत्तता देने की मांग की गई। अमेरिकी सांसदों ने यह भी स्पष्ट किया है कि वे चीन के अगले दलाई लामा के चयन में हस्तक्षेप का विरोध करते हैं। वहीं 2020 में अमेरिकी कांग्रेस के बनाए तिब्बती नीति और सहायता अधिनियम (Tibetan Policy and Support Act – TPSA) में यह स्पष्ट किया गया है कि दलाई लामा के पुनर्जन्म (रीइनकार्नेशन) और उनके उत्तराधिकारी के चयन का निर्णय केवल तिब्बती बौद्ध नेताओं और तिब्बती लोगों के पास विशेष अधिकार है, न कि चीनी सरकार के पास। यह कानून चीन के किसी भी हस्तक्षेप को अस्वीकार करता है और चीनी अधिकारी अगर इस प्रक्रिया में दखल देते हैं, तो उन पर यों पर प्रतिबंध लगाने की चेतावनी देता है। इसके अतिरिक्त, इस अधिनियम में ल्हासा में एक अमेरिकी वाणिज्य दूतावास स्थापित करने का प्रावधान है और तिब्बत में मानवाधिकारों की स्थिति पर नजर रखने की बात कही गई है।

अगले दलाई लामा कहां पैदा होंगे?

मार्च 2025 में प्रकाशित अपनी किताब Voice for the Voiceless में दलाई लामा ने कहा, उनका उत्तराधिकारी चीन के बाहर पैदा होगा। वे 1959 से भारत में निर्वासित जीवन जी रहे हैं, और यह संकेत देता है कि अगला दलाई लामा भी किसी स्वतंत्र देश में पैदा हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि वे अपने उत्तराधिकारी की पहचान से जुड़े सभी नियम और प्रक्रिया लिखित रूप में छोड़ देंगे, ताकि आगे कोई भ्रम न हो। धर्मशाला में सोमवार को उन्होंने कहा कि उत्तराधिकार के लिए एक स्ट्रक्चर होगा, लेकिन इसकी विस्तृत जानकारी नहीं दी।

Explainer: क्या खत्म हो गया SAARC? पाकिस्तान, बांग्लादेश और चीन बना रहे हैं नया संगठन, जानें भारत पर क्या होगा असर?

New South Asia Bloc: China, Pakistan, Bangladesh Plans SAARC Alternative Explained
AI Image

New South Asia Bloc: 19 जून को चीन के कुनमिंग में एक खास बैठक हुई, जिसमें चीन, पाकिस्ताान और बांग्लादेश शामिल हुए। इस बैठक को लेकर कयास लगाए जाने लगे कि तीनों देश मिल कर कोई खिचड़ी पका रहे हैं। लेकिन अब साफ हुआ है कि पाकिस्तान और चीन मिलकर दक्षिण एशिया में एक नया क्षेत्रीय संगठन बनाने की योजना बना रहे हैं। यह कदम दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (SAARC) की कमजोरी और उसकी निष्क्रियता को देखते हुए उठाया जा रहा है। SAARC में भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल, भूटान, मालदीव और अफगानिस्तान शामिल हैं, जो पिछले कुछ सालों से ठंडे बस्ते में पड़ा हुआ है।

इस बैठक में बांग्लादेश के शामिल होने लेकर भी सवाल उठ खड़े हुए। क्योंकि वहां फिलहाल अभी कार्यकारी सरकार है। हालांकि बांग्लादेश ने इस त्रिपक्षीय बैठक को लेकर साफ किया कि यह कोई राजनीतिक गठबंधन या नया संगठन बनाने की कोशिश नहीं थी। बांग्लादेश के विदेश मामलों के सलाहकार एम. तौहीद हुसैन ने कहा कि कुनमिंग, चीन में 19 जून 2025 को हुई बैठक केवल आधिकारिक स्तर की थी और इसमें किसी भी तरह के गठबंधन का कोई तत्व शामिल नहीं था। उन्होंने कहा था, “हम किसी गठबंधन का गठन नहीं कर रहे हैं।” बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने इस बात पर जोर दिया कि बैठक का मकसद आर्थिक सहयोग और क्षेत्रीय संपर्क बढ़ाना था, न कि किसी तीसरे पक्ष के खिलाफ कोई मोर्चा बनाना।

New South Asia Bloc: क्या है खबर का आधार?

लेकिन सच किसी से छिपता नहीं है और सामने आ ही जाता है। यह जानकारी सबसे पहले पाकिस्तान के अखबार “एक्सप्रेस ट्रिब्यून” में छपी। अखबार ने बताया कि पाकिस्तान और चीन के बीच एक नई क्षेत्रीय व्यवस्था बनाने की बात चल रही है। इस योजना को लेकर कूटनीतिक स्रोतों ने दावा किया कि दोनों देश इसे SAARC का विकल्प मान रहे हैं। खबर के मुताबिक, हाल ही में चीन, पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच एक त्रिपक्षीय बैठक कुनमिंग (चीन) में हुई। इस बैठक में नई क्षेत्रीय साझेदारी की रूपरेखा पर चर्चा हुई। हालांकि, अभी तक इसकी आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।

SAARC क्यों ठप हो गया?

SAARC की शुरुआत 1985 में हुई थी और इसमें भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका, भूटान, मालदीव और अफगानिस्तान जैसे देश शामिल हैं। सार्क का मकसद था कि क्षेत्र में व्यापार, आपसी संपर्क और राजनीतिक बातचीत बढ़े। लेकिन 2016 के बाद से SAARC की गतिविधियां लगभग ठप हो गई हैं। आखिरी SAARC सम्मेलन 2014 में काठमांडू (नेपाल) में हुआ था। 2016 में प्रस्तावित सम्मेलन को भारत ने उरी आतंकी हमले (Uri Terror Attack) के बाद बहिष्कार कर दिया था, जिसमें सेना के 19 जवान शहीद हुए थे। इसके बाद बांग्लादेश, भूटान और अफगानिस्तान ने भी सम्मेलन में शामिल होने से इनकार कर दिया था। तभी से यह संगठन निष्क्रिय है।

‘कुनमिंग त्रिपक्षीय’ बैठक में पड़ी नींव!

रिपोर्ट्स के अनुसार, जून 2025 में चीन के कुनमिंग शहर में पाकिस्तान, चीन और बांग्लादेश के अधिकारियों के बीच एक ‘त्रिपक्षीय बैठक’ (Trilateral Meeting) हुई। इसमें क्षेत्रीय संपर्क (Connectivity), व्यापार और राजनीतिक समन्वय जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई। इसे एक ट्रायल बलून (Trial Balloon) यानी एक प्रयोग के तौर पर देखा जा रहा है, जिससे यह आंका जा सके कि छोटे देशों में इस तरह के समूह के प्रति कितनी रुचि है।

कैसा होगा नया संगठन?

अखबार के मुताबिक, इस नए संगठन में कई दक्षिण एशियाई और मध्य एशियाई देशों को शामिल करने की योजना है। इसमें श्रीलंका, मालदीव, अफगानिस्तान और बांग्लादेश जैसे देश शामिल हो सकते हैं। भारत को भी इसमें शामिल करने की बात कही जा रही है। दूसरी ओर, पाकिस्तानी अधिकारियों का कहना है कि यह संगठन SAARC की तरह पुराने ढांचे से हटकर होगा। इसका मकसद क्षेत्र में व्यापार, संपर्क और राजनीतिक सहयोग को बढ़ाना होगा।

चीन की दिलचस्पी क्यों?

हालांकि चीन SAARC का सदस्य नहीं है, लेकिन पिछले कुछ सालों में उसने बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के जरिए दक्षिण एशिया में अपना प्रभाव काफी बढ़ाया है। BRI एक ऐसा प्रोजेक्ट है, जिसमें चीन दुनियाभर में सड़क, रेल और बंदरगाह बनाकर अपने व्यापार को बढ़ाना चाहता है। पाकिस्तान के साथ उसका CPEC (China-Pakistan Economic Corridor) प्रोजेक्ट पहले से चल रहा है। अब वह बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका और मालदीव जैसे देशों में भी निवेश कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि चीन इस क्षेत्र में एक नया मंच बनाकर SAARC की जगह लेना चाहता है, ताकि वह अपनी आर्थिक और राजनीतिक पकड़ को मजबूत कर सके।

क्या भारत होगा इस नए समूह से बाहर?

पाकिस्तान और चीन दोनों के साथ ही भारत के संबंध में तनाव से गुजर रहे हैं। ऐसे में भारत के इस नए समूह का हिस्सा बनने की संभावना बेहद कम है। पाकिस्तान और चीन के बीच हुई बातचीत में यह बात सामने आई है कि SAARC को अनिश्चितकाल के लिए ‘सस्पेंड’ मान लिया गया है और अब समय है कि एक नया क्षेत्रीय मंच तैयार किया जाए।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की मौजूदगी के बिना ऐसा कोई भी संगठन टिकाऊ (sustainable) नहीं होगा, क्योंकि भारत दक्षिण एशिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और सैन्य शक्ति है। हालांकि भारत इस नए प्रस्ताव पर चुप्पी साधे हुए है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि भारत इसे लेकर सतर्क रहेगा। भारत को डर है कि अगर यह संगठन चीन के प्रभाव में चला गया, तो यह उसके हितों के खिलाफ हो सकता है। भारत पहले से ही चीन के BRI प्रोजेक्ट का विरोध करता आया है, क्योंकि उसका मानना है कि इससे उसकी संप्रभुता पर असर पड़ सकता है। दूसरी ओर, अगर भारत को इस संगठन में शामिल होने का निमंत्रण मिलता है, तो वह अपनी शर्तों पर ही इसमें हिस्सा लेगा।

बांग्लादेश का रुख क्या है?

बांग्लादेश ने फिलहाल किसी भी नए समूह में शामिल होने से इनकार किया है। अंतरिम सरकार के विदेश सलाहकार एम. तौहीद हुसैन ने स्पष्ट कहा कि कुनमिंग में जो बैठक हुई थी, वह कोई राजनीतिक गठबंधन नहीं था और न ही उसमें किसी प्रकार के ‘एलायंस’ की औपचारिक घोषणा हुई थी। उन्होंने यह भी कहा कि भारत के साथ बांग्लादेश के संबंध ‘रीअडजस्टमेंट’ की स्थिति में हैं और चीन-पाकिस्तान के साथ कोई नई व्यवस्था बनाने का फिलहाल कोई संकेत नहीं है।

श्रीलंका, नेपाल और अन्य देशों का क्या होगा?

नए ब्लॉक में श्रीलंका, नेपाल, मालदीव और अफगानिस्तान जैसे देशों को शामिल करने की योजना बताई जा रही है। लेकिन इन देशों की अपनी-अपनी आंतरिक समस्याएं हैं और वे खुलकर चीन या पाकिस्तान के पक्ष में खड़े नहीं हो सकते। अफगानिस्तान की स्थिति भी अनिश्चित है, क्योंकि वहां की सरकार में बदलाव के बाद उसका रुख साफ नहीं है। फिर भी, अगर चीन आर्थिक मदद देता है, तो अफगानिस्तान भी इसमें रुचि दिखा सकता है। यह अब देखना दिलचस्प होगा कि नेपाल, श्रीलंका, मालदीव जैसे देश इस नए प्रस्तावित समूह पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं। ये सभी देश SAARC के सदस्य हैं, लेकिन भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव के कारण इनकी भूमिका सीमित हो गई थी। अगर चीन और पाकिस्तान मिलकर कोई नया समूह बनाते हैं, तो इन देशों की भागीदारी तय करेगी कि यह पहल कितनी सफल होगी।

क्या SCO से जुड़ेगा नया ब्लॉक?

अनुमान \लगाया जा रहा है कि प्रस्तावित संगठन को शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के दायरे में लाया जा सकता है, जिसमें भारत और पाकिस्तान दोनों सदस्य हैं। अगर ऐसा होता है, तो यह जियोपॉलिटिकल संतुलन को और मुश्किल बना सकता है। SCO में भारत, पाकिस्तान, चीन और मध्य एशियाई देश शामिल हैं। यह दक्षिण एशिया व मध्य एशिया के देशों के लिए एक बड़ा मंच है। SCO की अगली शिखर बैठक 15-16 अक्टूबर 2025 को इस्लामाबाद में होने वाली है, और कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इस दौरान इस नए ब्लॉक के बारे में कोई घोषणा हो सकती है।

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भारत के लिए क्यों है चिंता की बात

भारत के लिए इस मामले में चिंता की कई वजहें हो सकती हैं। अगर चीन, पाकिस्तान और बांग्लादेश मिलकर नया संगठन बनाते हैं, तो इससे चीन का दक्षिण एशिया में प्रभाव बढ़ सकता है। भारत का मानना है कि यह संगठन चीन के “बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव” (BRI) को आगे बढ़ाने का जरिया बन सकता है, जिसका हिस्सा होने से भारत पहले ही इनकार कर चुका है। इसके अलावा भारत और पाकिस्तान के बीच पहले से ही रिश्ते तनावपूर्ण हैं। अगर नया संगठन बनता है और पाकिस्तान इसमें प्रमुख भूमिका निभाता है, तो भारत के लिए इसमें शामिल होना मुश्किल होगा। इसके अलावा, श्रीलंका, मालदीव जैसे छोटे देश पहले से ही चीन के आर्थिक प्रोजेक्ट्स पर निर्भर हैं, और अगर ये देश नए संगठन में शामिल होते हैं, तो भारत के लिए हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी स्थिति बनाए रखना मुश्किल हो सकता है। साथ ही, SAARC में भारत की अहम भूमिका है, लेकिन उसकी निष्क्रियता के कारण यह कमजोर पड़ा है, और अगर नया संगठन SAARC की जगह लेता है और भारत को इससे बाहर रखा जाता है, तो क्षेत्रीय नेतृत्व में भारत की स्थिति प्रभावित हो सकती है।

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INS Tamal Commissioned: India's Most Advanced Stealth Frigate Joins Indian Navy
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INS Tamal Commissioned: 1 जुलाई 2025 को भारतीय नौसेना ने अपनी सबसे आधुनिक स्टील्थ मल्टी-रोल फ्रिगेट, INS तमाल, को रूस के कालिनिनग्राद में कमीशन किया। यह समारोह दोपहर 2:00 बजे से 4:00 बजे तक भारतीय समय के अनुसार आयोजित हुआ। समारोह की अध्यक्षता वाइस एडमिरल संजय जे. सिंह, फ्लैग ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ, वेस्टर्न नेवल कमांड ने की, जिसमें भारत और रूस के कई वरिष्ठ सरकारी और रक्षा अधिकारी शामिल थे। INS तमाल (INS Tamal), क्रिवाक क्लास (Krivak Class) फ्रिगेट्स की श्रृंखला में आठवां जहाज है, जिसे पिछले दो दशकों में रूस से शामिल किया गया है। यह तुशील क्लास (Tushil Class) का दूसरा युद्धपोत है, जो पहले के तलवार और तैग क्लास युद्धपोतों से कहीं ज्यादा आधुनिक और घातक है। इस पूरी श्रृंखला में कुल 10 ऐसे युद्धपोत होंगे, जिनमें कई तकनीकी समानताएं होंगी – जैसे कि हथियार प्रणाली, सेंसर्स और संचार उपकरण – जिससे नौसेना की संचालन क्षमता और भी मजबूत होगी।

यह 2016 में भारत-रूस अंतर-सरकारी समझौते (IGA) के तहत निर्मित चार फ्रिगेट्स में से एक है, जिसमें दो जहाज रूस से आयात किए गए और दो गोवा शिपयार्ड लिमिटेड (GSL) में बनाए जा रहे हैं। INS तमाल हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में भारतीय नौसेना की स्ट्रैटेजिक और ऑपरेशन कैपेबिलिटी को मजबूत करेगा। इसे खासतौर पर पाकिस्तानी समुद्री सीमा और कराची पोर्ट की निगरानी के लिए तैनात किया जा सकता है।

INS Tamal Commissioned: रूस में बना है INS तमाल

आईएनएस तमाल का निर्माण रूस के यांतार शिपयार्ड (Yantar Shipyard), कालिनिनग्राद में हुआ है। इसके निर्माण की देखरेख भारतीय नौसेना की एक विशेषज्ञ टीम ने की, जो मास्को स्थित भारतीय दूतावास के तहत तैनात वॉरशिप ओवरसाइट टीम (Warship Overseeing Team) का हिस्सा थी। भारत सरकार के “आत्मनिर्भर भारत” और “मेक इन इंडिया” मिशन के तहत यह अंतिम युद्धपोत है, जिसे भारत ने किसी विदेशी स्रोत से हासिल किया है। यह खास बात है कि INS Tamal में लगभग 26 फीसदी स्वदेशी तकनीक का उपयोग हुआ है।

इस फ्रिगेट में लंबी दूरी तक मार करने वाली ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल प्रणाली लगी है, जो समुद्र और ज़मीन दोनों लक्ष्यों को भेद सकती है। इसके अलावा, इसमें वर्टिकल लॉन्च Shtil-1 सरफेस-टू-एयर मिसाइल (Surface-to-Air Missile), उन्नत 100 मिमी तोप, आधुनिक EO/IR सिस्टम, 30 मिमी क्लोज-इन वेपन सिस्टम (CIWS), टॉरपीडो ट्यूब और रॉकेट लॉन्चर (जैसे RBU-6000), एंटी-सबमरीन रॉकेट्स और कई अत्याधुनिक रडार व नियंत्रण प्रणाली लगाई गई हैं।

INS Tamal की एक और बड़ी विशेषता यह है कि इसमें एयर अर्ली वॉर्निंग और मल्टी-रोल हेलिकॉप्टरों को ऑपरेट करने की क्षमता है। इसमें एक विशेष “क्विक लॉन्च सिस्टम” भी है, जो हेलीकॉप्टर को आपात स्थिति में 5 मिनट से भी कम समय में उड़ान भरने की सुविधा देता है। इसके अतिरिक्त यह जहाज नेटवर्क सेंट्रिक वॉरफेयर (Network Centric Warfare) प्रणाली और एडवंस इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम से भी लैस है। इसकी गति 30 नॉट (लगभग 55 किमी/घंटा) से अधिक है, और यह लंबे समय तक समुद्र में टिक सकता है।

चालक दल में 250 से अधिक नौसैनिक

INS तमाल के चालक दल में 250 से अधिक नौसैनिक हैं, जिन्होंने सेंट पीटर्सबर्ग और कालिनिनग्राद की कठोर सर्दियों में कठोर प्रशिक्षण लिया। पिछले तीन महीनों में इस युद्धपोत ने कई समुद्री परीक्षण सफलतापूर्वक पूरे किए हैं, जिनमें हथियारों, रडार और अन्य प्रणालियों की टेस्टिंग शामिल थी।

इस जहाज का निर्माण भारतीय विशेषज्ञों की एक टीम द्वारा बारीकी से देखा गया, जो कालिनिनग्राद में वॉरशिप ओवरसीइंग टीम के तहत तैनात थी। यह टीम मॉस्को में भारतीय दूतावास के तहत काम कर रही थी। नौसेना मुख्यालय में, इस परियोजना को डायरेक्टरेट ऑफ शिप प्रोडक्शन के तहत कंट्रोलर ऑफ वॉरशिप प्रोडक्शन एंड एक्विजिशन ने ऑपरेट किया।

INS Tamal Commissioned: India's Most Advanced Stealth Frigate Joins Indian Navy

इंद्र की तलवार के नाम पर रखा नाम तमाल

INS तमाल का नाम भारतीय पौराणिक कथाओं में इंद्र, देवताओं के राजा, द्वारा युद्ध में इस्तेमाल की गई पौराणिक तलवार से प्रेरित है। इसका शुभंकर (Mascot) भारतीय पौराणिक चरित्र जाम्बवन्त (जाम्बवंत) और रूस के राष्ट्रीय पशु यूरेशियन ब्राउन बीयर के मेल से तैयार किया गया है। इस कारण जहाज के चालक दल को गर्व से ‘द ग्रेट बेयर’ कहा जाता है। तमाल भारत-रूस सहयोग और दोस्ती का प्रतीक है, जो समय की कसौटी पर खरा उतरा है।

INS Tamal का आदर्श वाक्य है – “सर्वदा सर्वत्र विजय” (Sarvada Sarvatra Vijaya), जो भारतीय नौसेना की युद्धक्षमता और हर मिशन में जीत सुनिश्चित करने की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। यह भारतीय नौसेना के मिशन – ‘कॉम्बैट रेडी, क्रेडिबल, कोहेसिव एंड फ्यूचर रेडी फोर्स सेफगार्डिंग नेशनल मैरीटाइम इंटरेस्ट्स – एनटाइम, एनव्हेयर’ (Combat Ready, Credible, Cohesive and Future Ready Force Safeguarding National Maritime Interests – Anytime, Anywhere) का भी प्रतीक है।

INS Tamal के कमीशन होते ही यह भारतीय नौसेना के ‘स्वॉर्ड आर्म’ – पश्चिमी बेड़े (Western Fleet) – में शामिल हो जाएगा। यह न केवल भारतीय नौसेना की बढ़ती क्षमताओं का प्रतीक होगा, बल्कि भारत-रूस की दशकों पुरानी साझेदारी की मिसाल भी पेश करेगा।

भारत में बने 33 से अधिक सिस्टम्स का इस्तेमाल

125 मीटर लंबा और 3900 टन वजनी INS तमाल एक घातक युद्धपोत है। Tamal के डिज़ाइन को रूस के Severnoye Design Bureau और भारतीय नौसेना के विशेषज्ञों ने मिलकर तैयार किया है। इसमें भारत में बने 33 से अधिक सिस्टम्स का इस्तेमाल हो रहा है। इसमें ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइल, HUMSA NG Mk II सोनार सिस्टम, लेटेस्ट सरफेस सर्विलांस रडार, अत्याधुनिक एंटी-सबमरीन वेपन कॉम्प्लेक्स, नेविगेशन और डाटा लिंक सिस्टम जैसी खूबियां हैं। इस निर्माण में शामिल प्रमुख भारतीय कंपनियों में ब्रह्मोस एयरोस्पेस, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL), केल्ट्रॉन, नोवा इंटीग्रेटेड सिस्टम्स (TATA), एल्कोम मरीन, जॉनसन कंट्रोल्स इंडिया जैसी कंपनियां शामिल थीं।

गुप्त स्टील्थ डिजाइन की खूबी

INS तमाल की स्टील्थ (गोपनीय) तकनीक केवल इसके एंटी रडार स्ट्रक्चर तक सीमित नहीं है। इस जहाज में एक खास “सिग्नेचर प्रबंधन प्रणाली” (Signature Management System) लगाई गई है, जो इसके इंफ्रारेड (गर्मी से निकलने वाले) और एकॉस्टिक (ध्वनि से संबंधित) सिग्नेचर को बहुत कम कर देती है। इसका मतलब है कि यह जहाज दुश्मन के थर्मल सेंसर और सोनार (समुद्र में ध्वनि तरंगों से खोज करने वाली तकनीक) की पकड़ में नहीं आता।

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इस एडवांस सिस्टम के तकनीकी पहलुओं को गोपनीय रखा गया है, लेकिन इतना साफ है कि यह तकनीक INS तमाल को समुद्र में लगभग अदृश्य बना देती है। इससे यह दुश्मन की नज़रों से बचकर, चुपचाप और प्रभावी तरीके से अपना मिशन पूरा कर सकता है।

Asim Munir threatens India: अमेरिका की शह पर पाकिस्तान के सेना प्रमुख ने फिर उगला जहर, भारत पर लगाया आतंकी हमले का आरोप, खुद को बताया “नेट रीजनल स्टैबिलाइजर”

Asim Munir Threatens India Again, Calls Pak 'Net Regional Stabiliser'

Asim Munir threatens India: पाकिस्तान की सेना एक बार फिर भारत के खिलाफ जहर उगलने पर उतर आई है। पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ लंच क्या कर लिया कि लगता है जैसे उन्हें अमेरिकी की शह मिल गई है। पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर ने एक बार फिर भारत के खिलाफ तीखा बयान दिया है। कराची स्थित पाकिस्तान नौसेना अकादमी (Pakistan Naval Academy) में आयोजित एक कार्यक्रम में पाक सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर ने न केवल भारत को दो बार ‘बिना किसी उकसावे के हमला करने’ का आरोप लगाया, बल्कि कश्मीर मुद्दे को लेकर भड़काऊ बयान देते हुए भारत को ‘निर्णायक जवाब’ की चेतावनी भी दे डाली। साथ ही, मुनीर ने यह भी आरोप लगाया कि जब पाकिस्तान आतंकवाद को खत्म करने के करीब है, तब भारत जानबूझकर क्षेत्र में तनाव पैदा कर रहा है।

Asim Munir threatens India: “नेट रीजनल स्टैबिलाइजर” कहकर खुद की तारीफ

जनरल असीम मुनीर ने अपने भाषण में पाकिस्तान को इस क्षेत्र का “नेट रीजनल स्टैबिलाइज़र” यानी क्षेत्रीय स्थिरता कायम रखने वाला (Net Regional Stabiliser) बताया और दावा किया कि भारत की कथित ‘आक्रामकता’ के बावजूद पाकिस्तान ने संयम और परिपक्वता दिखाई है। उन्होंने कहा, “भारत ने रणनीतिक दूरदर्शिता की कमी दिखाई है और बिना किसी कारण के पाकिस्तान पर हमला किया है। इसके बावजूद, हमने संयम बरता और शांति के लिए प्रतिबद्धता जताई।”

यह बयान ऐसे समय में आया है जब भारत और पाकिस्तान के बीच संबंध पहले ही संवेदनशील मोड़ पर हैं। खासतौर पर 22 अप्रैल 2025 के पहलगाम आतंकवादी हमले के बाद, जिसमें पाक समर्थित आतंकियों ने निर्दोष पर्यटकों को मौत के घाट उतार दिया था, भारत ने जवाबी कार्रवाई करते हुए ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों पर निशाना साधा था।

फिर छेड़ा कश्मीर राग

मुनीर ने अपने भाषण में कश्मीर को लेकर एक बार फिर विवादास्पद बयान दिया। उन्होंने कहा, “हमें अपने कश्मीरी भाइयों की कुर्बानियों को याद रखना चाहिए, जो भारत के अवैध कब्जे के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों के तहत कश्मीर के “न्यायपूर्ण समाधान” के लिए आवाज उठाता रहेगा।

यह पहली बार नहीं है जब मुनीर ने कश्मीर को लेकर भड़काऊ बयान दिए हैं। कुछ दिन पहले ही, उन्होंने विदेश में रहने वाले पाकिस्तानी समुदाय को संबोधित करते हुए कश्मीर को पाकिस्तान की “गले की नस” (जगुलर वेन) बताया था। उन्होंने कहा था, “कश्मीर हमारी गले की नस है, और रहेगी। हम इसे कभी नहीं भूलेंगे।” इस बयान के कुछ ही दिनों बाद, कश्मीर के खूबसूरत पहलगाम इलाके में पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों ने दो दर्जन से अधिक पुरुष पर्यटकों की हत्या कर दी थी। इस हमले के जवाब में भारत ने सिंधु जल संधि को निलंबित कर दिया, जिसे पाकिस्तान के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। इसके बाद भारत ने “ऑपरेशन सिंदूर” शुरू किया, जिसमें पाकिस्तान के भीतर आतंकी ठिकानों को निशाना बनाकर नष्ट किया गया।

वजीरिस्तान हमले का आरोप मढ़ा भारत पर

मुनीर ने अपने ताजा बयान में वजीरिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा में हुए एक आतंकी हमले का भी जिक्र किया, जिसमें 16 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए थे। उन्होंने इस हमले के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराया। हालांकि, भारत ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। प्रवक्ता ने यह भी कहा कि भारत शांति और स्थिरता के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन अपनी संप्रभुता और सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं करेगा। वहीं, भारतीय सूत्रों का कहना है कि यह हमला पाकिस्तानी सेना की एक “झूठी साजिश” (फॉल्स फ्लैग ऑपरेशन) हो सकता है, जिसमें अपनी ही सेना के सैनिकों को मारकर पाकिस्तान पीड़ित होने का दावा कर रहा है। इस तरह के “झूठे हमले” (फॉल्स फ्लैग ऑपरेशंस) का इतिहास पाकिस्तान में पहले भी देखा गया है।

दिल्ली के सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज के विश्लेषक राकेश शर्मा कहते हैं, “वजीरिस्तान में तहरीक-ए-तलबान पाकिस्तान (TTP) के हमले बढ़ रहे हैं। पाकिस्तान की सेना को इनसे निपटने में मुश्किल हो रही है। भारत पर इल्जाम लगाकर वे अपनी नाकामी को छिपाने की कोशिश कर रहे हैं।” TTP ने हाल के सालों में कई सैन्य चौकियों पर हमले किए हैं, जिसने पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा की कमजोरियां जगजाहिर हुई हैं।

लंदन स्थित सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज के विश्लेषक अमना खान ने कहा, “यह एक संभावित फॉल्स फ्लैग ऑपरेशन हो सकता है। खैबर पख्तूनख्वा में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के खिलाफ पाकिस्तान सेना की लड़ाई में उसे बार-बार असफलताएं मिली हैं। हाल के सालों में TTP ने सैन्य चौकियों पर हमलों को तेज किया है। वजीरिस्तान में हुए हमले को भारत पर दोष मढ़कर सेना अपनी कमजोरियों को छिपाने की कोशिश कर रही है।”

पाकिस्तान का आतंक पर ‘डबल गेम’

पाकिस्तान लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर खुद को आतंक के खिलाफ लड़ने वाला देश बताता रहा है, लेकिन हकीकत में वही आतंक को समर्थन देता रहा है। चाहे वह कश्मीर घाटी में आतंकवाद हो या अफगान सीमा पर चरमपंथ, पाकिस्तान की सेना और उसकी खुफिया एजेंसी ISI पर लगातार आतंकियों को संरक्षण देने के आरोप लगते रहे हैं।

मुनीर का ताज़ा बयान इस ‘डबल गेम’ की पुष्टि करता है। उन्होंने अपने भाषण में आतंकवाद के खिलाफ पाकिस्तान की “करीबी सफलता” का दावा किया, लेकिन साथ ही कश्मीर को लेकर उग्र भाषा का इस्तेमाल किया, जो यह बताता है कि पाकिस्तान अभी भी आतंक को अभी भी बढ़ावा दे रहे हैं।

क्या है मुनीर की रणनीति?

असीम मुनीर के बयानों को पाकिस्तान की आंतरिक और बाहरी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था इस समय भारी संकट से गुजर रही है। मुद्रास्फीति (इन्फ्लेशन) और बेरोजगारी ने जनता का असंतोष बढ़ा दिया है। ऐसे में, भारत के खिलाफ भड़काऊ बयान देकर मुनीर जनता का ध्यान आंतरिक मामलों से हटाना चाहते हैं।

भारतीय रक्षा विशेषज्ञों और थिंक टैंक ने असीम मुनीर के बयान को ‘भड़काऊ और गैर-जिम्मेदाराना’ बताया है। रक्षा विश्लेषक ब्रिगेडियर (रिटायर्ड) अरविंद नारंग के मुताबिक, “पाकिस्तान अपनी आंतरिक अस्थिरता और अंतरराष्ट्रीय अलगाव से ध्यान भटकाने के लिए बार-बार भारत के खिलाफ जहर उगलता है। लेकिन अब भारत की नीति स्पष्ट है, आतंक के हर रूप को निर्णायक तौर से कुचलना।”

कश्मीर मुद्दे को जिंदा रखना चाहता है पाक

जनरल मुनीर मे अपने भाषण में कश्मीर में आतंकवाद को समर्थन देने की बात दोहराई। यह पाकिस्तान की लंबे समय से चली आ रही प्रॉक्सी युद्ध की नीति का हिस्सा है। रक्षा विश्लेषक और दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. रमेश ठाकुर के अनुसार, “पाकिस्तान का यह रुख कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जीवित रखने और भारत पर दबाव बनाने की कोशिश है। यह विशेष रूप से तब महत्वपूर्ण हो जाता है जब भारत ने अनुच्छेद 370 को हटाने के बाद कश्मीर को सुरक्षा मुद्दा घोषित कर दिया है।”

Pakistan TTK Conspiracy: जम्मू-कश्मीर में इस आतंकी संगठन के जरिए हमले की योजना बना रहा पाकिस्तान, ऑपरेशन सिंदूर के बाद भी टला नहीं है खतरा!

उन्होंने कहा, भारत पर हमले का आरोप लगाकर और कश्मीर में “नैतिक और कूटनीतिक समर्थन” की बात करके, पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र और इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) जैसे मंचों पर सहानुभूति हासिल करने की कोशिश कर रहा है। हालांकि, उन्होंने इस तरह के दावों को खारिज करते हुए इसे “पाकिस्तान का पुराना प्रचार” करार दिया।

Sukhoi 30MKI Upgrade: भारत के सुखोई जेट्स को मिलेगा मॉडर्न अपग्रेड, 2027 तक मिलेंगे बाकी S-400 एयर डिफेंस सिस्टम

Sukhoi 30MKI Upgrade: India’s Jets to Get Modern Boost, S-400 Deliveries by 2027
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Sukhoi 30MKI Upgrade: भारत अपने सुखोई-30 एमकेआई (Su-30 MKI Upgrade) फाइटर जेट्स की पूरी फ्लीट को बड़े पैमाने पर अपग्रेड करने की तैयारी में है। इस अपग्रेड में मॉडर्न एवियोनिक्स, लेटेस्ट रडार और 78 फीसदी स्वदेशी कंटेंट शामिल होगा। इस अपग्रेड पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और रूस के रक्षा मंत्री आंद्रे बेलोउसॉव (Andrey Belousov) के बीच शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की बैठक के दौरान अहम चर्चा हुई। यह बैठक चीन के चिंगदाओ शहर में SCO डिफेंस मिनिस्टर्स मीटिंग के मौके पर हुई, जहां दोनों नेताओं ने इंडो-रशियन डिफेंस कोऑपरेशन, क्रॉस-बॉर्डर टेररिज़्म और भू-राजनीतिक हालातों पर गहन चर्चा की।

Sukhoi 30MKI Upgrade: वायुसेना के पास 260 सुखोई-30

भारतीय वायुसेना (Indian Air Force) के पास इस समय करीब 260 सुखोई-30 एमकेआई जेट्स हैं, जो देश की वायुसेना की रीढ़ हैं। इन जेट्स ने हाल ही में 10 मई को ऑपरेशन सिंदूर (में अहम भूमिका निभाई थी, जिसमें ब्रह्मोस मिसाइल के एयर-लॉन्च वर्जन का इस्तेमाल कर पाकिस्तान के कई एयर बेसों पर सटीक हमला किया गया था। इसके बाद यह साफ हो गया कि भारत को अब अपने एयरप्लेटफॉर्म्स को अपग्रेड करना होगा, ताकि वे भविष्य के युद्धों में नेटवर्क-सेंट्रिक वॉरफेयर और इलेक्ट्रॉनिक डॉमिनेशन के लिए पूरी तरह सक्षम हो सकें। (Su-30 MKI Upgrade)

राजनाथ-बेलौसोव की मुलाकात: क्या रही चर्चा?

रक्षा मंत्रालय ने शुक्रवार सुबह एक बयान में बताया कि दोनों मंत्रियों ने वैश्विक भू-राजनीतिक स्थिति (geopolitical situations), सीमा पार आतंकवाद (cross-border terrorism) और भारत-रूस रक्षा सहयोग (Indo-Russian defence cooperation) जैसे कई मुद्दों पर विस्तार से बात की। यह मुलाकात ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत की रक्षा जरूरतों को बढ़ाने और रक्षा उत्पादन को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

मंत्रालय ने बताया, “चर्चा में एयर डिफेंस सिस्टम, एयर-टू-एयर मिसाइल्स, मॉडर्न टेक्नोलॉजी, और हवाई प्लेटफॉर्म्स के अपग्रेड जैसे महत्वपूर्ण बिंदु शामिल थे। इसके अलावा, एस-400 सिस्टम की सप्लाई, सुखोई-30 एमकेआई के अपग्रेड और जरूरी सैन्य हार्डवेयर की जल्द खरीद पर भी बात हुई।”

Sukhoi 30MKI Upgrade में क्या होगा खास?

सुखोई-30 एमकेआई भारत की वायुसेना का रीढ़ माना जाता है। इस अपग्रेड प्रोग्राम के तहत इन जेट्स को कई मॉडर्न फीचर्स से लैस किया जाएगा। रूस ने चार महीने पहले, फरवरी में, अपने लेटेस्ट स्टील्थ फाइटर जेट सुखोई-57 (Sukhoi-57) में इस्तेमाल होने वाला इंजन (AL-41) सुखोई-30 एमकेआई के लिए ऑफर किया था। अभी तक Sukhoi-30MKI में AL-31F इंजन लगा है, जो कम थ्रस्ट देता है। AL-41 इंजन ज्यादा फ्यूल एफिशिएंट, कम मेंटेनेंस वाला और ज्यादा पावरफुल है। रूस का प्रस्ताव है कि पुराने इंजन को AL-41 से रिप्लेस किया जाए, जो जेट की परफॉर्मेंस को कई गुना बेहतर करेगा। अगर यह बदलाव होता है, तो भारतीय सुखोई विमानों की फाइटिंग क्षमता और सुपरसोनिक परफॉर्मेंस काफी बेहतर हो जाएगी।

इससे पहले सुखोई-57 की परफॉर्मेंस को भारत ने फरवरी में बेंगलुरु में आयोजित एयरो इंडिया (Aero India) शो में देखा था, जहां इस जेट ने अपनी क्षमताओं का शानदार प्रदर्शन किया। इसने भारत के रक्षा विशेषज्ञों का ध्यान खींचा और अपग्रेड प्रोग्राम में इसकी टेक्नोलॉजी को शामिल करने की चर्चा तेज हुई। हालांकि भारत अभी तक AMCA प्रोजेक्ट के तहत अपने स्वदेशी फिफ्थ जनरेशन फाइटर पर काम कर रहा है, लेकिन Sukhoi-30 के अपग्रेड में Sukhoi-57 की तकनीक को शामिल करने का विचार रणनीतिक रूप से अहम है।

इस अपग्रेड में भारतीय वैज्ञानिकों और इंजीनियर्स की भी बड़ी भूमिका होगी। डीआरडीओ (DRDO) के बनाए उत्तम एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड ऐरे (Uttam AESA) रडार को इन जेट्स में लगाया जाएगा। यह रडार दुश्मन के टारगेट को डिटेक्ट करने और ट्रैक करने की क्षमता को कई गुना बढ़ा देगा। इसके अलावा, जेट्स में फुल डिजिटल ग्लास कॉकपिट (glass cockpit) होगा, जिसमें बड़े टचस्क्रीन डिस्प्ले होंगे। ये पायलट को बेहतर सिचुएशनल अवेयरनेस (situational awareness) देंगे। साथ ही, एक नया मिशन कंप्यूटर भी लगाया जाएगा, जो अपग्रेडेड एवियोनिक्स के लिए जरूरी प्रोसेसिंग पावर को हैंडल करेगा।

स्वदेशीकरण पर जोर

इस अपग्रेड प्रोजेक्ट में भारत का फोकस 78 प्रतिशत स्वदेशी कंटेंट पर है। इसका मतलब है कि जेट्स में इस्तेमाल होने वाले ज्यादातर पार्ट्स भारत में ही बनाए जाएंगे। इससे न सिर्फ विदेशी सप्लायर्स पर निर्भरता कम होगी, बल्कि भारतीय मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को भी बूस्ट मिलेगा। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL), जो भारत में सुखोई-30 एमकेआई का लाइसेंस के तहत प्रोडक्शन करता है, इस अपग्रेड प्रोजेक्ट के लिए वर्क-शेयर कॉन्ट्रैक्ट साइन करने जा रहा है। HAL के इंजीनियर्स और टेक्नीशियन्स इस प्रोजेक्ट में अहम भूमिका निभाएंगे। एचएएल अब रूस के साथ वर्क-शेयर एग्रीमेंट पर साइन करेगा, जिसमें भारत में बने उपकरणों को रूसी तकनीक के साथ इंटीग्रेट किया जाएगा।

इसके अलावा भारत और रूस के रक्षा मंत्रियों की बैठक में दोनों देशों के बीच क्रिटिकल मिलिट्री हार्डवेयर की सप्लाई और सहयोग को लेकर भी सहमति बनी है। इस समझौते के तहत कई अत्याधुनिक रक्षा उपकरण भारत को मिलेंगे, जो देश की सैन्य शक्ति को और मजबूती देंगे। रक्षा मंत्रालय की तरफ से जारी बयान में स्पष्ट किया गया कि S-400 एयर डिफेंस सिस्टम की डिलीवरी प्रक्रिया को तेजी से आगे बढ़ाया जाएगा। इसके अलावा, एयर-टू-एयर मिसाइलों की सप्लाई पर भी रूस ने सहमति जताई है, जो भारतीय वायुसेना की ताकत को कई गुना बढ़ाएंगी।

बाकी बचे S-400 की डिलीवरी जल्द

रूस ने भारत को भरोसा दिलाया है कि 2027 तक बचे हुए एस-400 (S-400) ट्रायम्फ सर्फेस-टू-एयर मिसाइल सिस्टम्स की डिलीवरी पूरी हो जाएगी। 2018 में 40,000 करोड़ रुपये के कॉन्ट्रैक्ट के तहत भारत ने पांच एस-400 स्क्वॉड्रन खरीदने का फैसला किया था। अब तक दो स्क्वॉड्रन डिलीवर हो चुके हैं, और बाकी तीन 2027 तक मिलने की उम्मीद है। हर स्क्वॉड्रन में दो मिसाइल बैटरी होती हैं, जो 120 से 380 किलोमीटर की रेंज में दुश्मन के जेट्स, मिसाइल्स और ड्रोन्स को नष्ट कर सकती हैं।

एस-400 सिस्टम भारत की वायुसेना के लिए गेमचेंजर साबित हो रहा है, खासकर सीमा पर बढ़ते खतरे को देखते हुए। हाल ही में पांचवें स्क्वॉड्रन की डिलीवरी की प्रगति पर भी बात हुई। पीएम मोदी ने पिछले साल इस सिस्टम का जायजा लिया था, जो भारत की रक्षा तैयारियों को मजबूत कर रहा है। यह सौदा स्वदेशी डीआरडीओ प्रोजेक्ट के साथ भी मेल खाता है, जो 350 किलोमीटर रेंज की मिसाइलें विकसित कर रहा है।

SCO Summit: चीन से बातचीत में राजनाथ सिंह ने सुनाई खरी-खरी, कहा- “सीमा विवाद का स्थायी हल जरूरी”, सुझाया ये चार-सूत्रीय प्लान

भारत-रूस के मजबूत रिश्ते

रूसी रक्षा मंत्री बेलौसोव ने राजनाथ सिंह के साथ मुलाकात में भारत और रूस के बीच लंबे समय से चले आ रहे मजबूत रिश्तों की बात की। उन्होंने कहा कि ये रिश्ते समय की कसौटी पर खरे उतरे हैं। उन्होंने 22 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले की निंदा की और भारत के साथ एकजुटता जताई। इस हमले को उन्होंने “कायरतापूर्ण और भयानक” करार दिया।

SCO Summit: चीन से बातचीत में राजनाथ सिंह ने सुनाई खरी-खरी, कहा- “सीमा विवाद का स्थायी हल जरूरी”, सुझाया ये चार-सूत्रीय प्लान

SCO Summit: Rajnath Tells China – Permanent Border Solution Needed, Offers 4-Point Plan
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SCO Summit: भारतीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और चीन के रक्षा मंत्री एडमिरल डोंग जुन के बीच शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के रक्षा मंत्रियों की बैठक के दौरान एक अहम बातचीत हुई। इस मुलाकात में भारत ने स्पष्ट तौर पर कहा कि भारत-चीन सीमा पर सीमा निर्धारण को लेकर अब कोई अस्थायी समाधान नहीं चलेगा। उन्होंने सीमा निर्धारण के लिए एक ठोस और स्थायी समाधान की जरूरत पर जोर दिया। दोनों देशों के बीच लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) पर तनाव कम करने और सैनिकों की वापसी (de-escalation) के लिए एक रोडमैप तैयार करने की बात भी कही।

रक्षा मंत्रालय के अनुसार, दोनों मंत्रियों ने भारत-चीन सीमा पर शांति और स्थिरता बनाए रखने की जरूरत पर गहन चर्चा की। राजनाथ सिंह ने एलएसी पर जटिल मुद्दों को सुलझाने की आवश्यकता पर बल दिया और कहा कि दोनों देशों को एक रोडमैप तैयार करना चाहिए, जो स्थायी समाधान और तनाव कम करने की दिशा में काम करे। उन्होंने अप्रैल 2020 में पूर्वी लद्दाख में एलएसी पर शुरू हुए सैन्य गतिरोध का जिक्र करते हुए कहा कि 2020 के बाद पैदा हुए विश्वास की कमी को दूर करने के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत है।

बता दें कि यह मीटिंग उस समय हुई है जब भारत और चीन के बीच मई 2020 से पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सैन्य तनाव बना हुआ है। हालांकि 2024 में कुछ स्तर पर डी-एस्क्लेशन पर बातचीत हुई थी, औऱ जिसके बाद तनाव में कमी आई थी। लेकिन अब भी कई संवेदनशील क्षेत्रों में सैनिकों की भारी तैनाती है।

SCO Summit: क्या है भारत का चार-सूत्रीय प्लान?

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भारत-चीन सीमा तनाव को कम करने और द्विपक्षीय रिश्तों को मजबूत करने के लिए एक चार सूत्रीय योजना भी पेश की। इस योजना का उद्देश्य एलएसी पर शांति स्थापित करना और लंबे समय से चले आ रहे विवादों का स्थायी समाधान निकालना है।

2024 डिसएंगेजमेंट प्लान का पालन: 2024 के डिसएंगेजमेंट प्लान को पूरी तरह लागू करना। यह समझौता पूर्वी लद्दाख में डेपसांग और डेमचोक जैसे क्षेत्रों में सैन्य वापसी को सुनिश्चित करता है। दोनों देशों को इस प्लान का सख्ती से पालन करना होगा ताकि तनाव कम हो और विश्वास बहाली हो।

तनाव कम करने के निरंतर प्रयास: एलएसी पर सैन्य तनाव को कम करने के लिए लगातार प्रयास। इसमें सैनिकों की तैनाती को कम करना, गश्ती गतिविधियों में समन्वय और संवाद को बढ़ाना शामिल है ताकि टकराव की स्थिति न बने।

सीमा निर्धारण और परिसीमन में तेजी: सीमा निर्धारण और परिसीमन (demarcation and delimitation) में तेजी लाना। लंबे समय से लंबित सीमा विवाद को सुलझाने के लिए ठोस कदम उठाने और समयबद्ध तरीके से प्रक्रिया को पूरा करने की जरूरत है।

विशेष प्रतिनिधि स्तर की बातचीत: मौजूदा तंत्र के जरिए मतभेदों को प्रबंधित करने और रिश्तों को बेहतर करने के लिए नई प्रक्रियाएं विकसित करना। यह तंत्र आपसी संवाद को बढ़ावा देगा और जटिल मुद्दों का समाधान निकालने में मदद करेगा। यह योजना भारत-चीन संबंधों में स्थिरता और विश्वास बहाली की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

इसके अलावा, राजनाथ सिंह ने पाकिस्तान प्रायोजित सीमा पार आतंकवाद का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि हाल ही में शुरू किया गया भारत का ऑपरेशन सिंदूर आतंकवाद के खिलाफ भारत की सैद्धांतिक स्थिति को दर्शाता है। 22 अप्रैल, 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले का जिक्र करते हुए, जिसमें 26 लोग मारे गए थे, राजनाथ सिंह ने इसकी कड़ी निंदा की और कहा कि भारत आतंकवादी नेटवर्क को खत्म करने के लिए प्रतिबद्ध है।

कैलाश मानसरोवर यात्रा पर जताई खुशी

मुलाकात के दौरान राजनाथ सिंह ने कैलाश मानसरोवर यात्रा के लगभग छह साल बाद फिर से शुरू होने पर खुशी जताई। उन्होंने इसे दोनों देशों के बीच सकारात्मक कदम बताया। रक्षा मंत्री ने अपने चीनी समकक्ष को बिहार की मधुबनी पेंटिंग भेंट की, जो मिथिला क्षेत्र की पारंपरिक कला है और अपनी रंगीन रेखाओं और पैटर्न के लिए जानी जाती है।

SCO दस्तावेज पर भारत का रुख

बैठक से पहले, राजनाथ सिंह ने SCO दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया था, क्योंकि इसमें आतंकवाद के मुद्दे को कमजोर किया गया था और पहलगाम हमले का जिक्र नहीं था। सूत्रों के अनुसार, चीन, जो SCO की अध्यक्षता कर रहा है, और उसका करीबी सहयोगी पाकिस्तान, इस दस्तावेज में आतंकवाद के मुद्दे को हल्का करने की कोशिश कर रहे थे। इसके बजाय, दस्तावेज में बलूचिस्तान में हुए हमलों और जाफर एक्सप्रेस हाईजैकिंग का उल्लेख किया गया था, जिसे भारत के खिलाफ एक राजनीतिक संदेश के तौर पर देखा गया। भारत ने इस पर सख्त रुख अपनाते हुए दस्तावेज पर दस्तखत करने से इनकार कर दिया। जिसके बाद एससीओ का साझा बयान जारी नहीं हो सका।

सकारात्मक दिशा में बढ़ते रिश्ते

राजनाथ सिंह ने ट्वीट कर कहा, “चिंगदाओ में एससीओ रक्षा मंत्रियों की बैठक के दौरान चीन के रक्षा मंत्री एडमिरल डोंग जुन के साथ बातचीत की। हमने द्विपक्षीय रिश्तों से जुड़े मुद्दों पर रचनात्मक और दूरदर्शी विचारों का आदान-प्रदान किया। कैलाश मानसरोवर यात्रा के छह साल बाद फिर से शुरू होने पर खुशी जताई। दोनों पक्षों की जिम्मेदारी है कि इस सकारात्मक गति को बनाए रखा जाए और द्विपक्षीय रिश्तों में नई जटिलताएं न जोड़ी जाएं।”

चीन की ओर से जारी बयान में कहा गया कि भारत बीजिंग के साथ किसी भी टकराव की तलाश में नहीं है और आपसी विश्वास और संवाद को बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। हालांकि, भारत की ओर से इस मुलाकात पर अभी कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है।

2024 में हुए डिसएंगेजमेंट समझौते के बाद पहली बैठक

यह मुलाकात भारत और चीन के बीच 2024 में हुए डिसएंगेजमेंट समझौते के बाद पहली उच्च-स्तरीय बैठक थी। मई 2020 में शुरू हुए पूर्वी लद्दाख में सैन्य गतिरोध के बाद दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ गया था। पिछले साल अक्टूबर में रूस में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात के बाद दोनों देशों के बीच राजनयिक रिश्तों में सुधार देखा गया है। पीएम मोदी ने तब कहा था, “भारत-चीन रिश्ता न केवल हमारे लोगों के लिए बल्कि वैश्विक शांति, स्थिरता और प्रगति के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है।”

हाल ही में डेपसांग और डेमचोक में डिसएंगेजमेंट समझौता होने के बाद दोनों पक्षों ने सीमा पर शांति बनाए रखने की प्रतिबद्धता जताई है। इस मुलाकात को दोनों देशों के बीच नए सिरे से शुरू हुए राजनयिक रिश्तों को और मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।

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रक्षा मंत्रालय के बयान के अनुसार, दोनों मंत्रियों ने डिसएंगेजमेंट, तनाव कम करने, सीमा प्रबंधन और अंततः सीमा निर्धारण से जुड़े मुद्दों पर प्रगति के लिए विभिन्न स्तरों पर परामर्श जारी रखने पर सहमति जताई। राजनाथ सिंह ने इस बात पर जोर दिया कि दोनों देशों को अच्छे पड़ोसी जैसे हालात बनाने चाहिए, ताकि आपसी लाभ के साथ-साथ एशिया और विश्व में स्थिरता के लिए सहयोग किया जा सके।

INS Arnala Commissioning: पाकिस्तानी पनडुब्बियों का ऐसे ‘शिकार’ करेगा INS अर्णाला, जानिए भारतीय नेवी के लिए क्यों है ये खास?

INS Arnala Commissioning: India’s New Submarine Hunter Joins the Indian Navy
Image Source: HQ-IDS

INS Arnala Commissioning: भारतीय नौसेना बुधवार को विशाखापट्टनम डॉकयार्ड में अपने पहले एंटी-सबमरीन वारफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट (ASW-SWC) INS अर्णाला (पनडुब्बी रोधी) को कमीशन करने जा रही है। यह ऐतिहासिक कदम पूर्वी नौसेना कमान के तहत उठाया जा रहा है। INS अर्णाला देश का पहला ऐसा युद्धपोत है, जो खास तौर पर तटीय इलाकों में दुश्मन की पनडुब्बियों को मार गिराने के लिए बनाया गया है। INS अर्णाला को बुधवार 18 जून को पूर्वी नौसेना कमान के अधीन विशाखापट्टनम के नौसैनिक डॉकयार्ड में नौसेना में शामिल किया जाएगा। इस अवसर पर भारत के चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद रहेंगे।

INS Arnala Commissioning: क्यों खास है INS अर्णाला?

नौसेना सूत्रों के मुताबिक, जहां बड़े वारफेयर यूनिट्स जैसे फ्रिगेट्स (Frigates) और डिस्ट्रॉयर (Destroyers) आमतौर पर एंटी-सबमरीन वारफेयर (ASW) क्षमता से लैस होते हैं, लेकिन उनका प्रमुख काम दुश्मन की वायु और सतह से होने वाले हमलों को नष्ट करना होता है। इसके मुकाबले INS अर्णाला जैसे जहाज खास तौर पर डिफेंसिव ऑपरेशंस के लिए बनाए गए हैं। यानी तटीय क्षेत्रों यानी उथले पानी में दुश्मन की पनडुब्बियों को पहचानना, ट्रैक करना और नष्ट करना। इससे बड़े वारफेयर शिप्स को रणनीतिक मिशंस पर ध्यान देने का मौका मिलता है।

INS अर्णाला को ऐसे खतरों से निपटने के लिए डिजाइन किया गया है, जो उथले पानी (50-60 मीटर गहराई) में दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगा सकता है। ये पनडुब्बियां टॉरपीडो फायर करने के लिए ऐसी जगहों पर आती हैं। अर्णाला इनका दूर से ही पता लगा सकता है और स्टैंड-ऑफ रेंज से हमला कर सकता है। इससे बड़े युद्धपोतों को खतरा कम होता है।

आकार और ताकत में सबसे आगे

INS अर्णाला 77 मीटर लंबा और 1,490 टन से ज्यादा वजन वाला युद्धपोत है। यह भारतीय नौसेना का सबसे बड़ा ऐसा जहाज है, जो डीजल इंजन और वॉटरजेट प्रोपल्शन सिस्टम से चलता है। यह सिस्टम इसे उथले पानी में तेज रफ्तार और बेहतर मैन्यूवरेबिलिटी देता है। नौसेना के मुताबिक, यह जहाज न सिर्फ पनडुब्बियों का पता लगाने और उनसे मुकाबला करने में माहिर है, बल्कि सर्च और रेस्क्यू ऑपरेशन्स, लो-इंटेंसिटी मैरीटाइम ऑपरेशन्स (LIMO), और माइन-लेइंग जैसे काम भी कर सकता है। माइन-लेइंग की क्षमता इस क्लास के जहाजों में बहुत कम देखने को मिलती है।

हाई-टेक सोनार सिस्टम से लैस

INS अर्णाला में भारत की सीएफएफ फ्लूइड कंट्रोल लिमिटेड और जर्मन कंपनी थायसेनक्रुप की सब्सिडियरी एटलस इलेक्ट्रॉनिक ने मिलकर बनाया वेरिएबल-डेप्थ सोनार सिस्टम (Variable-Depth Sonar System) लगाया गया है। यह सोनार सिस्टम Active और Passive दोनों मोड में काम करता है और शत्रु की पनडुब्बियों को उस रेंज से पहले ही डिटेक्ट कर सकता है, जहां से वे हमला कर सकती हैं। इसका मतलब यह है कि भारतीय नौसेना पहले ही उन्हें ट्रैक कर नष्ट करने में सक्षम होगी।

इसके अलावा, जहाज में 80% से ज्यादा स्वदेशी उपकरण और सिस्टम्स लगे हैं। भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL), लार्सन एंड टुब्रो (L&T), महिंद्रा डिफेंस, और MEIL जैसी भारतीय कंपनियों ने इसके लिए एडवांस्ड सिस्टम्स बनाए हैं। यह आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक बड़ा कदम है।

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पाकिस्तान की रणनीति को मात

नौसेना के सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान के पास सीमित संख्या में आधुनिक सतह युद्धपोत हैं और उनके पास खास एंटी सबमरीन वारफेयर प्लेटफॉर्म्स की भी भारी कमी है। ऐसे में पाकिस्तान अपनी नौसैनिक रणनीति में पनडुब्बियों पर ज्यादा निर्भर रहता है। वहीं, INS अर्णाला का रणनीतिक महत्व खासतौर पर पाकिस्तान के खिलाफ है। INS अर्णाला जैसे जहाजों की तैनाती से भारत के तटीय क्षेत्रों की सुरक्षा और मजबूत हो जाएगी और दूसरी तरफ बड़े जहाजों को अधिक स्वतंत्रता मिलेगी कि वे आक्रामक या मिशन-बेस्ड कार्यों में जुट सकें।

बनाए जाएंगे 16 जहाज

INS अर्णाला को गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE) ने लार्सन एंड टुब्रो के साथ पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप में डिजाइन और बनाया है। यह पहला भारतीय युद्धपोत है, जिसे शिपबिल्डर ने डिजाइन भी किया और बनाया भी। पहले नौसेना डिजाइन देती थी और शिपयार्ड उसे बनाते थे। यह बदलाव भारतीय शिपबिल्डिंग इंडस्ट्री की बढ़ती क्षमता को दिखाता है।

ASW-SWC क्लास के पहले आठ जहाज GRSE बना रहा है, जबकि बाकी आठ को कोचिन शिपयार्ड लिमिटेड (CSL) डिजाइन और डेवलप करेगा। इस क्लास के जहाज पुराने को नौसेना के पुराने अभय-क्लास (Abhay-Class) जहाजों की जगह लेंगे। अभय-क्लास जहाज सोवियत पाउक-क्लास कॉर्वेट्स का कस्टमाइज्ड वर्जन हैं, जो तटीय ASW ऑपरेशंस के लिए इस्तेमाल होते हैं। INS अर्णाला अपने पुराने जहाजों की तुलना में बड़ा, ज्यादा टिकाऊ, और एडवांस्ड कॉम्बैट सिस्टम्स से लैस है।

तटीय सुरक्षा के लिए खास रणनीति

भारतीय नौसेना भविष्य में सभी 16 ASW-SWC जहाजों को देश के 16 प्रमुख बंदरगाहों के पास तैनात करने की योजना बना रही है। इससे तटीय क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए एक मजबूत एंटी सबमरीन शील्ड तैयार किया जाएगा। INS अर्णाला इस रेंज का पहला जहाज है और दूसरा जहाज इसी साल के अंत तक कमीशन किया जा सकता है।

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कमीशनिंग समारोह

INS अर्णाला के कमीशनिंग समारोह की अध्यक्षता चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान करेंगे। इस मौके पर वरिष्ठ नौसेना अधिकारी, शिपबिल्डिंग इंडस्ट्री के प्रतिनिधि, और अन्य गणमान्य लोग मौजूद रहेंगे। यह समारोह भारतीय नौसेना के लिए एक गर्व का पल होगा, क्योंकि यह न केवल एक जहाज का कमीशन है, बल्कि स्वदेशी तकनीक और डिजाइन की जीत भी है।

Explainer: क्या हैं Luneberg lens, F-35B स्टील्थ जेट में इनका इस्तेमाल क्यों, और क्या है भारत में इमरजेंसी लैंडिंग का पूरा माजरा? जानें

Explainer: What Are Luneberg lens, Why Are They Used in F-35B Stealth Jets, and What’s the Story Behind the Emergency Landing in India?
Photo Source: IAF

Luneberg lens: 14 जून 2025 की रात, जब अरब सागर के ऊपर आसमान में तेज हवाएं चल रही थीं, तब एक ब्रिटिश F-35B स्टील्थ फाइटर जेट को केरल के तिरुवनंतपुरम में इमरजेंसी लैंडिंग करनी पड़ी। यह जेट यूके की रॉयल नेवी के HMS प्रिंस ऑफ वेल्स कैरियर से उड़ा था, जो अपने स्ट्राइक ग्रुप के साथ इंडो-पैसिफिक मिशन पर था। हालांकि यह आम इमरजेंसी लैंडिंग थी, लेकिन घटना के बाद एक टेक्निकल डिबेट भी छिड़ गई। सोशल मीडिया पर यूजर्स “ल्यूनबर्ग लेंस” की बात करने लगे। आखिर ल्यूनबर्ग लेंस क्या हैं? F-35B जैसे स्टील्थ जेट में इनका यूज क्यों होता है? और भारतीय वायुसेना (IAF) की इस जेट को डिटेक्ट करने की बात इतनी चर्चा में क्यों है? आइए, आसान भाषा में समझते हैं।

Luneberg lens: क्या है ये टेक्नोलॉजी?

ल्यूनबर्ग लेंस (Luneberg lens) का नाम सुनकर लग सकता है कि जैसे यह कोई साइंस फिक्शन गैजेट है, लेकिन असल में ये एक साधारण सा रडार रिफ्लेक्टर है, जो रडार सिग्नल्स को बढ़ाकर वापस भेजता है। इसे 1944 में जर्मन साइंटिस्ट रुडोल्फ कार्ल ल्यूनबर्ग ने डिजाइन किया था। खासकर एयर डिफेंस सिस्टम की ट्रेनिंग के लिए इसका इस्तेमाल 1950-60 के दशक से हो रहा है।

यह लेंस गोलाकार होता है और इसके एक तरफ मेटल कोटिंग होती है। जब रडार की किरणें इस पर पड़ती हैं, तो ये उन्हें फोकस करके कई गुना ज्यादा ताकत के साथ रिफ्लेक्ट करता है। मिसाल के तौर पर, 44 सेंटीमीटर का एक ल्यूनबर्ग लेंस X-बैंड रडार पर 100 वर्ग मीटर तक का रडार क्रॉस-सेक्शन (RCS) बना सकता है। यानी, एक छोटा सा ड्रोन भी रडार पर B-52 जैसे बड़े बॉम्बर जेट जितना बड़ा दिख सकता है।

F-35B स्टील्थ जेट में क्या है ल्यूनबर्ग लेंस का रोल?

F-35B एक स्टील्थ फाइटर जेट है, जिसका मतलब है कि ये रडार से बचने के लिए डिजाइन किया गया है। इसका रडार क्रॉस-सेक्शन (RCS) बहुत छोटा होता है, जिससे दुश्मन के रडार इसे आसानी से पकड़ नहीं पाते। लेकिन शांति के समय पीस टाइम या दोस्त देशों के एयरस्पेस में उड़ते वक्त स्टील्थ जेट्स को रडार पर दिखना जरूरी होता है। ऐसा इसलिए, क्योंकि अगर ये रडार पर न दिखें, तो एयर ट्रैफिक कंट्रोल (ATC) या फ्रेंडली एयर डिफेंस सिस्टम के लिए प्रॉब्लम हो सकती है। यहीं पर ल्यूनबर्ग लेंस काम आता है।

F-35B के पेट (बेली) पर एक छोटा सा गोल उभार होता है, जिसमें ल्यूनबर्ग लेंस फिट किया जाता है। ये लेंस रडार सिग्नल्स को बढ़ाकर रिफ्लेक्ट करता है, जिससे जेट रडार पर साफ दिखता है। ये खास तौर पर ट्रेनिंग, जॉइंट एक्सरसाइज, या इमरजेंसी सिचुएशन में यूज होता है। इस लेंस को ग्राउंड क्रू आसानी से हटा या लगा सकता है, लेकिन फ्लाइट के दौरान पायलट इसे कंट्रोल नहीं कर सकता।

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14 जून की इमरजेंसी लैंडिंग के दौरान क्या हुआ?

14 जून 2025 को HMS प्रिंस ऑफ वेल्स कैरियर से उड़ा F-35B जेट अरब सागर के ऊपर मिशन पर था। लेकिन खराब मौसम और कम फ्यूल की वजह से पायलट कैरियर पर लैंड नहीं कर सका। ऐसे में उसने डायवर्जन रिक्वेस्ट किया और तिरुवनंतपुरम में लैंडिंग की। भारतीय वायुसेना ने इसे रूटीन प्रोसीजर बताया और कहा कि IAF ने फ्लाइट सेफ्टी के लिए जेट को फुल सपोर्ट दिया। IAF के रडार ने जेट को डिटेक्ट किया, क्लासिफाइड किया, और लैंडिंग के लिए गाइड किया।

17 जून को यूके रॉयल नेवी की टेक्निकल टीम हेलिकॉप्टर से तिरुवनंतपुरम पहुंची। ये टीम जेट के सभी पैरामीटर्स चेक कर रही है ताकि इसे वापस कैरियर पर भेजा जा सके। HMS प्रिंस ऑफ वेल्स अपने स्ट्राइक ग्रुप के साथ इंडो-पैसिफिक में 8 महीने के मिशन पर है, जिसमें F-35B जेट्स, ड्रोन, हेलिकॉप्टर, और न्यूक्लियर अटैक सबमरीन शामिल हैं।

ल्यूनबर्ग लेंस पर शुरू हुई डिबेट?

F-35B की लैंडिंग के बाद सोशल मीडिया और डिफेंस सर्कल्स में “ल्यूनबर्ग आर्ग्यूमेंट” (Luneberg argument) की चर्चा शुरू हुई। कुछ लोगों का कहना है कि IAF का इस जेट को डिटेक्ट करना कोई बड़ी बात नहीं, क्योंकि जेट पर ल्यूनबर्ग लेंस (Luneberg lens) लगा था। इस लेंस की वजह से जेट का रडार क्रॉस-सेक्शन यानी RCS बढ़ गया होगा, जिससे रडार को इसे पकड़ने में आसानी हुई। उनका तर्क है कि ये रूटीन प्रोसीजर था, न कि IAF के Integrated Air Command and Control System (IACCS) रडार की कोई खास काबिलियत।

दूसरी तरफ, कुछ लोग IAF की तारीफ कर रहे हैं। उनका कहना है कि भले ही ल्यूनबर्ग लेंस (Luneberg lens) लगा हो, लेकिन IAF के एयर डिफेंस सिस्टम ने जेट को तुरंत डिटेक्ट, क्लासिफाइड, और सेफ लैंडिंग कराई, जो सिस्टम की रेडीनेस दिखाता है। कुछ एक्सपर्ट्स का ये भी कहना है कि अगर लेंस नहीं होता, तब भी IAF के VHF रडार शायद जेट को पकड़ लेते, क्योंकि ऐसे रडार स्टील्थ जेट्स के खिलाफ इफेक्टिव माने जाते हैं।

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हालांकि, IAF ने इस बात की पुष्टि नहीं की कि जेट पर ल्यूनबर्ग लेंस (Luneberg lens) था या नहीं। इसलिए, दोनों ही पक्षों के दावे अभी अनुमानों पर आधारित हैं। कुछ सोशल मीडिया पोस्ट्स में ये भी दावा किया गया कि जेट इंडियन नेवी और रॉयल नेवी की जॉइंट एक्सरसाइज का हिस्सा था, और लेंस जानबूझकर लगाया गया था। लेकिन इसकी कोई ऑफिशियल कन्फर्मेशन नहीं है।

ल्यूनबर्ग लेंस का दूसरा यूज: डिसेप्शन टैक्टिक्स

ल्यूनबर्ग लेंस (Luneberg lens) का इस्तेमाल केवल सेफ्टी के लिए नहीं होता। युद्ध के समय इसका इस्तेमाल दुश्मन को धोखा देने के लिए भी होता है। मिसाल के तौर पर, रूस अपने लॉन्ग-रेंज ड्रोन्स में ल्यूनबर्ग लेंस यूज करता है। इससे छोटा सा ड्रोन रडार पर बड़ा टारगेट दिखता है, जिससे दुश्मन का ध्यान भटकता है और असली अटैक ड्रोन्स टारगेट तक पहुंच जाते हैं। यूक्रेन भी इस टैक्टिक का इस्तेमाल करता है। उनके ADM-160 MALD ड्रोन्स में ल्यूनबर्ग लेंस लगे होते हैं, जो दुश्मन के मिसाइल्स को अपनी तरफ खींचते हैं, ताकि असली क्रूज मिसाइल्स सेफ रहें।

F-35B जैसे जेट्स में भी ट्रेनिंग के दौरान ल्यूनबर्ग लेंस (Luneberg lens) यूज करके RCS को वैरी किया जाता है। इससे पायलट्स और ग्राउंड क्रू को ये समझने में मदद मिलती है कि अलग-अलग सिचुएशन में रडार जेट को कैसे डिटेक्ट करता है। ये डिसेप्शन टैक्टिक्स का भी हिस्सा है, ताकि दुश्मन को कन्फ्यूज किया जा सके।

भारतीय वायुसेना ने की मदद

वहीं भारतीय वायुसेना ने न सिर्फ जेट की सेफ लैंडिंग कराई, बल्कि यूके की टेक्निकल टीम को फुल सपोर्ट भी दिया। HMS प्रिंस ऑफ वेल्स का इंडो-पैसिफिक मिशन भी भारत के लिए अहम है, क्योंकि दोनों देश इस रीजन में चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करना चाहते हैं।

कुछ डिफेंस एनालिस्ट्स का मानना है कि ये इमरजेंसी लैंडिंग एक तरह से जॉइंट ऑपरेशनल कैपेबिलिटी को टेस्ट करने का मौका भी था। IAF का IACCS (इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम) इस मौके पर एक्टिव रहा, जिसने जेट को ट्रैक और गाइड किया। ये सिस्टम भारत की एयर डिफेंस का रीढ़ है और ऑपरेशन सिंदूर के बाद एख बार फिर इसने अपनी इफिशिएंसी साबित की है।

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Luneberg lens: सेफ्टी या स्टील्थ का कॉम्प्रोमाइज?

ल्यूनबर्ग लेंस (Luneberg lens) का इस्तेमाल स्टील्थ जेट्स के लिए दोधारी तलवार की तरह होता है। एक तरफ, ये खासकर पीसटाइम में सेफ्टी के लिए जरूरी है, तो दूसरी तरफ, कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर युद्ध के समय गलती से लेंस हटाना भूल जाए, तो जेट का स्टील्थ फायदा कम हो सकता है। हालांकि, F-35B जैसे एडवांस जेट्स में ऐसे रिस्क को मिनिमाइज करने के लिए सख्त प्रोसीजर्स होते हैं।

Quantum Entanglement: DRDO-IIT दिल्ली ने रचा इतिहास! 1 किमी दूर तक भेजा हैक-प्रूफ कम्युनिकेशन, जानें फ्यूचर वॉरफेयर में कैसे मिलेगी मदद?

Quantum Entanglement: DRDO-IIT Delhi’s 1km Hack-Proof Communication Explained
Photo By DRDO

Quantum Entanglement: भारत ने एक ऐसा कारनामा कर दिखाया है जो ना सिर्फ देश के रक्षा क्षेत्र में बल्कि पूरे वैश्विक तकनीकी जगत में एक ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है। डीआरडीओ (DRDO) और IIT दिल्ली की साझेदारी में एक बेहद अहम प्रयोग सफलतापूर्वक पूरा किया गया है। क्वांटम एंटैंगलमेंट (Quantum Entanglement) यानी क्वांटम पर आधारित फ्री-स्पेस क्वांटम सिक्योर कम्युनिकेशन। यह तकनीक सामान्य भाषा में समझें तो ऐसा सुरक्षित सिक्योर कम्युनिकेशन है जिसे कोई हैक नहीं कर सकता। यानी यह भविष्य की ‘Unbreakable Communication’ यानी हैकप्रूफ कम्यूनिकेशन टेक्नोलॉजी की तरफ एक बड़ा कदम है। इस एक्सपेरीमेंट में क्वांटम एंटैंगलमेंट का इस्तेमाल करके 1 किमी से ज्यादा की दूरी पर फ्री-स्पेस क्वांटम सिक्योर कम्युनिकेशन को सफलतापूर्वक डेमो करके दिखाया गया।

क्या है यह Quantum Entanglement तकनीक?

डीआरडीओ और IIT दिल्ली ने क्वांटम एंटैंगलमेंट (Quantum Entanglement) का उपयोग करते हुए एक किलोमीटर से ज़्यादा दूरी तक बिना किसी फाइबर या तार के, पूरी तरह से सुरक्षित संचार प्रणाली का सफल परीक्षण किया है। इसे ‘Free-Space Quantum Secure Communication’ कहा जाता है।

इस प्रयोग में वैज्ञानिकों ने क्वांटम एंटैंगलमेंट की मदद से एक खास तरह का सिक्योर कम्युनिकेशन बनाया। इसमें दो फोटोन (प्रकाश के कण) को आपस में जोड़ा गया, जो एक-दूसरे से दूर होने के बावजूद एक साथ व्यवहार करते हैं। यानी कि जब इन दोनों में से किसी एक में कोई बदलाव होता है, तो दूसरे में भी वही बदलाव तुरंत आ जाता है, भले ही वे कितनी भी दूर क्यों न हों। यही ‘Quantum Entanglement’ की ताकत है।

इस तकनीक से डेटा को इतने सुरक्षित तरीके से भेजा जा सकता है कि कोई भी इसे चुरा या तोड़ नहीं सकता। प्रयोग के दौरान करीब 240 बिट्स प्रति सेकंड की सिक्योर की रेट (Secure Key Rate) हासिल की गई, और क्वांटम बिट एरर रेट (Quantum Bit Error Rate) 7 फीसदी से कम रहा। यानी यह सिस्टम बहुत सटीक और भरोसेमंद है।

कहां और कैसे हुआ यह डेमो?

यह डेमो IIT दिल्ली के कैंपस में हुआ। प्रोफेसर भास्कर कंसारी की रिसर्च टीम ने इसे अंजाम दिया, जिन्होंने डीआरडीओ के डायरेक्टोरेट ऑफ फ्यूचरिस्टिक टेक्नोलॉजी मैनेजमेंट (DFTM) के सपोर्ट से यह प्रोजेक्ट शुरू किया था। इस मौके पर डीआरडीओ के डीजी, डायरेक्टर SAG, डायरेक्टर DFTM, IIT दिल्ली के डीन (R&D), और डीए-कोई (DIA-CoE) के डायरेक्टर समेत कई कई अहम लोग मौजूद थे।

डेमो के दौरान एक फ्री-स्पेस ऑप्टिकल लिंक (optical beam path) के जरिए एक किलोमीटर की दूरी तय कर सुरक्षित ‘Quantum Key Distribution’ (QKD) संभव बनाया गया।

यह कैसे काम करता है?

क्वांटम एंटैंगलमेंट (Quantum Entanglement) विज्ञान का हिस्सा है। इसमें दो या ज्यादा कणों को इस तरह जोड़ा जाता है कि अगर एक कण में बदलाव होता है, तो दूसरा कण तुरंत उस बदलाव को महसूस करता है, चाहे वे कितनी भी दूर क्यों न हों। इस प्रॉपर्टी का इस्तेमाल करके वैज्ञानिकों ने एक ऐसी Key बनाई, जो डेटा को सुरक्षित रखती है। अगर कोई इस Key को चुराने की कोशिश करेगा, तो क्वांटम सिस्टम खुद बता देगा कि कोई गड़बड़ हो रही है। यह पारंपरिक तरीकों से कहीं बेहतर है, जहां डिवाइस खराब होने पर सिक्योरिटी कमजोर पड़ सकती है और हैकिंग का खतरा बढ़ जाता है। पारंपरिक सिस्टम में अगर कोई बीच में सिग्नल को इंटरसेप्ट करता है तो आसानी से डेटा चुराया जा सकता है। लेकिन क्वांटम सिस्टम में जैसे ही कोई अनधिकृत व्यक्ति सिग्नल को छूने की कोशिश करता है, पूरे सिस्टम की स्थिति (quantum state) बदल जाती है और वह पकड़ में आ जाता है। इसलिए इसे अनहैकेबल कम्यूनिकेशन कहा जाता है।

इससे क्या होगा फायदा?

यह तकनीक कई तरीकों से फायदेमंद है। सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह डेटा पूरी तरह से सुरक्षित रहता है। इसका इस्तेमाल डिफेंस, फाइनेंस, और टेलीकम्युनिकेशन जैसे अहम सेक्टर्स में हो सकता है, जहां डेटा लीक का बड़ा खतरा होता है। इसके अलावा, जंग के दौरान यह नेशनल सिक्योरिटी के लिए भी बहुत उपयोगी ।

दूसरा फायदा यह है कि इसमें ऑप्टिकल फाइबर बिछाने की जरूरत नहीं पड़ती। आमतौर पर सिक्योर कम्युनिकेशन के लिए जमीन के नीचे फाइबर केबल्स डाली जाती हैं, जो महंगी और मुश्किल होती हैं। वहीं, पहाड़ी या घनी आबादी वाले इलाकों में फाइबर केबल बिछाने में कई दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। लेकिन फ्री-स्पेस QKD (Quantum Key Distribution) से यह दिक्कत खत्म हो सकती है। Free-Space QKD में हवा के जरिए (laser-based optical path) सिग्नल भेजे जा सकते हैं, जो सस्ता और आसान है। यह बिल्कुल उसी तरह है जैसे लेज़र बीम दो टावरों के बीच भेजी जा रही हो।

2022 में मिली थी बड़ी सफलता

यह पहली बार नहीं है जब भारत ने क्वांटम टेक्नोलॉजी में सफलता हासिल की हो। 2022 में डीआरडीओ ने विन्ध्याचल और प्रयागराज के बीच पहला इंटरसिटी क्वांटम कम्युनिकेशन लिंक बनाया था। इसमें कमर्शियल ग्रेड अंडरग्राउंड डार्क ऑप्टिकल फाइबर का इस्तेमाल हुआ था, और प्रोफेसर भास्कर की टीम ने इसमें अहम भूमिका निभाई। फिर 2024 में, उनकी टीम ने 100 किमी लंबे टेलीकॉम ग्रेड ऑप्टिकल फाइबर पर क्वांटम कीज को सफलतापूर्वक भेजा। ये दोनों प्रोजेक्ट्स डीआरडीओ के सपोर्ट से हुए थे।

अब यह नया प्रयोग फ्री-स्पेस में हुआ, जो एक बड़ी छलांग है। यह तकनीक क्वांटम साइबर सिक्योरिटी, क्वांटम नेटवर्क्स, और फ्यूचर क्वांटम इंटरनेट के विकास का रास्ता खोलेगी।

यह सफलता डीआरडीओ-इंडस्ट्री-अकादमिया सेंटर ऑफ एक्सीलेंस (DIA-CoE) की बदौलत संभव हुई है। यह डीआरडीओ की एक खास पहल है, जिसमें 15 सेंटर ऑफ एक्सीलेंस बनाए गए हैं। ये सेंटर IITs, IISc, और यूनिवर्सिटीज में हैं, जहां कटिंग-एज डिफेंस टेक्नोलॉजीज पर काम हो रहा है। इन सेंटर्स की मदद से भारत नई-नई तकनीकों को डेवलप कर रहा है, जो देश की सुरक्षा को मजबूती देंगे।

रक्षा मंत्री ने दी बधाई

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस उपलब्धि पर डीआरडीओ और IIT दिल्ली को बधाई दी। उन्होंने कहा कि भारत अब क्वांटम युग में कदम रख चुका है, जहां खासकर फ्यूचर वॉरफेयर में सिक्योर कम्युनिकेशन एक गेम चेंजर साबित होगा। उन्होंने कहा कि यह तकनीक भारत को दुश्मनों से लड़ने में नई ताकत देगी।

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इस एक्सपेरीमेंट की सफलता में डीआरडीओ के सेक्रेटरी और चेयरमैन डॉ. समीर वी. कामत, और IIT दिल्ली के डायरेक्टर प्रोफेसर रंगन बनर्जी ने भी टीम को शाबाशी दी। उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि भारत के साइंस और टेक्नोलॉजी के लिए एक मील का पत्थर है। टीम ने दिन-रात मेहनत करके इस तकनीक को हकीकत में बदला, और यह उनकी कड़ी मेहनत का नतीजा है।

PM Modi Cyprus Visit: साइप्रस से तुर्की को करारा कूटनीतिक संदेश, जहां एक भारतीय जनरल ने 50 साल पहले बचाया था एक देश

PM Modi in Cyprus: A Strong Diplomatic Message to Turkey from the Land an Indian General Once Saved
Image: PM Office

PM Modi Cyprus Visit: 16 जून को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीन देशों की अपनी विदेश यात्रा की शुरुआत साइप्रस (Cyprus) से की। यह वही देश है जो 1974 में तुर्की (Turkiye) के हमले का शिकार हुआ था। वहीं, 20 साल बाद कोई भारतीय प्रधानमंत्री साइप्रस पहुंचा है। वहीं, पीएम मोदी की इस यात्रा को सिर्फ द्विपक्षीय संबंधों की मजबूती ही नहीं बल्कि, एक अहम भू-राजनीतिक (Geopolitical) संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। खासतौर पर तुर्की के लिए जिसने हाल ही में पाकिस्तान का खुलकर साथ दिया था।

साइप्रस यात्रा के दौरान पीएम मोदी को साइप्रस का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान ‘ग्रैंड क्रॉस ऑफ द ऑर्डर ऑफ मकारियोस III’ (Grand Cross of the Order of Makarios III) से नवाजा गया। यह सम्मान उस देश के पहले राष्ट्रपति आर्कबिशप मकारियोस के नाम पर दिया जाता है। इस दौरान उन्होंने साइप्रस के प्रेसिडेंट निकोस क्रिस्टोडौलिड्स से मुलाकात की और लिमासोल में बिजनेस लीडर्स को संबोधित किया।

PM Modi Cyprus Visit: साइप्रस यात्रा का रणनीतिक महत्व

पीएम मोदी की इस यात्रा के पीछे कई रणनीतिक संदेश छिपे हैं। भारत ने तुर्की द्वारा ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान पाकिस्तान को ड्रोन, हथियार और मैनपावर देने को गंभीरता से लिया है। जवाब में भारत ने कई तुर्की कंपनियों को देश छोड़ने के लिए कहा और अब पीएम मोदी की साइप्रस यात्रा को उसी पृष्ठभूमि में देखा जा रहा है।

साइप्रस की भौगोलिक स्थिति इसे भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाती है। यह मेडिटेरेनियन सागर में स्थित है और यूरोप से मिडिल ईस्ट तक कनेक्टिविटी का केंद्र है। साइप्रस ने हमेशा भारत के साथ खड़ा रहा है, खासकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर। इसके अलावा, साइप्रस में भारतीय शांति सेना के योगदान को भी याद किया जाता है, जो 1964 से वहां तैनात है।

मोदी साइप्रस की राजधानी निकोसिया में हैं, जो यूएन-कंट्रोल्ड बफर जोन के पास स्थित है। यह शहर पूर्व में तुर्की कब्जे वाले क्षेत्र, तुर्किश रिपब्लिक ऑफ नॉर्दर्न साइप्रस (TRNC) से भी सटा हुआ है। 20 साल में किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली साइप्रस विजिट है।

भारत का संदेश: यह युद्ध का युग नहीं है

सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में साइप्रस ने हमेशा भारत का साथ दिया है। पीएम मोदी ने अपनी इस यात्रा के दौरान कहा, “हम साइप्रस के लगातार समर्थन के लिए आभारी हैं। मोदी ने साइप्रस को भारत का “विश्वसनीय साझेदार” बताया और कहा कि भारत क्रॉस-बॉर्डर टेररिज्म, ड्रग्स तस्करी और हथियारों की गैरकानूनी सप्लाई रोकने के लिए रीयल-टाइम इन्फॉर्मेशन एक्सचेंज मैकेनिज्म बनाएगा।”

PM Modi in Cyprus: A Strong Diplomatic Message to Turkey from the Land an Indian General Once Saved
Image: PM Office

पीएम मोदी ने साइप्रस से दुनिया को शांति का संदेश दिया। उन्होंने कहा, “हम पश्चिमी एशिया और यूरोप में जारी संघर्षों पर चिंता जताते हैं। हमारा मानना है कि यह युद्ध का दौर नहीं है।” यह बयान वैश्विक तनाव के बीच शांति और सहयोग पर जोर देता है। साइप्रस के साथ भारत के रिश्ते पर्यटन और अर्थव्यवस्था में भी मजबूत हो रहे हैं। मोदी ने साइप्रस को एक मशहूर टूरिस्ट डेस्टिनेशन बताया और भारत के डेस्टिनेशन डेवलपमेंट पर फोकस की बात कही।

इसके अलावा, इस साल भारत-साइप्रस-ग्रीस साझेदारी की शुरुआत हुई, और इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर (IMEC) को शांति और समृद्धि का रास्ता माना जा रहा है। साइप्रस ने भारत के यूएन सिक्योरिटी काउंसिल में स्थायी सदस्यता के लिए भी समर्थन दिया है, जिसकी पीएम मोदी ने तारीफ की।

जियोस्ट्रैटेजिस्ट ब्रह्मा चेल्लानी कहते हैं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का गैस से भरपूर साइप्रस का दौरा तुर्की के लिए एक खास संदेश हो सकता है। तुर्की शायद इसे भारत के अपने क्षेत्रीय दुश्मनों ग्रीस, आर्मेनिया और मिस्र के साथ रिश्ते और गहरे करने का इशारा मानेगा। वह कहते हैं कि साइप्रस अगले साल यूरोपीय काउंसिल की बागडोर संभालेगा। यह भारत-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर (IMEC) का एक अहम हिस्सा है, जो व्यापार और शांति को बढ़ावा दे सकता है। भारत का साइप्रस के साथ जुड़ाव इस देश को ऊर्जा के क्षेत्र में मजबूत करेगा। साथ ही, इससे भारत मेडिटेरेनियन सागर में अपनी मौजूदगी बढ़ा सकेगा और तुर्की के विस्तारवाद का विरोध करने वाले देशों के गठबंधन को ताकत देगा।

तुर्की को अप्रत्यक्ष संदेश

भारत और तुर्की के संबंध हाल के वर्षों में तनावपूर्ण हुए हैं। तुर्की ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान पाकिस्तान को ड्रोन, हथियारों की सप्लाई की थी। इसके जवाब में भारत ने कई तुर्की कंपनियों को देश छोड़ने को कहा है। तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोआन ने संयुक्त राष्ट्र में बार-बार कश्मीर मुद्दा उठाया, और पाकिस्तान का खुला समर्थन किया। इसके जवाब में भारत ने न सिर्फ तुर्की कंपनियों पर कार्रवाई की बल्कि सॉफ्ट टूरिज्म बायकॉट भी शुरू किया।

वहीं, सरकार ने सुरक्षा कारणों से तुर्की की कंपनी सेलेबी को एयरपोर्ट ग्राउंड सर्विसेज देने की मंज़ूरी भी रद्द कर दी। अब मोदी की साइप्रस यात्रा और उसे एक टूरिज्म हब के तौर पर भारत द्वारा पहचान देना, सीधा मैसेज है कि हम तुर्की के विकल्प तलाश रहे हैं।

पुराने हैं भारत और साइप्रस के संबंध

तुर्की और साइप्रस के बीच रिश्ते अच्छे नहीं हैं। 1974 में तुर्की ने साइप्रस पर हमला किया था और वहां के उत्तरी हिस्से पर कब्जा कर लिया, जिसे तुर्की नॉर्दर्न साइप्रस कहता है। लेकिन यूरोपियन यूनियन और संयुक्त राष्ट्र इसे साइप्रस का हिस्सा मानते हैं, जो तुर्की के कब्जे में है।

हालांकि भारत और साइप्रस के बीच यह संबंध सिर्फ आज के नहीं हैं। 1964 में यूनाइटेड नेशन्स पीसकीपिंग फोर्स (UNFICYP) के गठन के बाद, पहले कमांडर बने थे भारत के लेफ्टिनेंट जनरल पीएस ग्यानी। फिर आए जनरल केएस थिमय्या, जो ड्यूटी के दौरान साइप्रस में ही शहीद हुए। उनके सम्मान में वहां एक सड़क का नाम उनके नाम पर रखा गया है। दिसंबर 2024 में यूएन ने निकोसिया में उनकी याद में एक कार्यक्रम भी आयोजित किया था। 1974 के तुर्की हमले के दौरान लेफ्टिनेंट जनरल दीवान प्रेमचंद ने वहां तैनात यूएन फोर्स की कमान संभाली और साइप्रस में सीजफायर लाइन को टूटने नहीं दिया।

2022 में साइप्रस के विदेश मंत्रालय ने इन तीनों भारतीय जनरलों को “कन्फ्लिक्ट के दौरान जान बचाने में अहम भूमिका निभाने वाले” बताया। यह सम्मान केवल इतिहास नहीं, बल्कि आज के मजबूत संबंधों की नींव भी है।

भारत-साइप्रस के बीच कई एमओयू साइन

पीएम मोदी की इस यात्रा के दौरान भारत और साइप्रस के बीच कई एमओयू (सहमति पत्र) साइन हुए। नेशनल पेमेंट्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया और साइप्रस के यूरोबैंक के बीच यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) सर्विस शुरू करने का समझौता हुआ, जो साइप्रस में डिजिटल पेमेंट को आसान करेगा। इसके अलावा, NSE इंटरनेशनल एक्सचेंज गिफ्ट सिटी और साइप्रस स्टॉक एक्सचेंज के बीच क्रॉस-बॉर्डर फ्लो को बढ़ावा देने का करार हुआ।

पीएम मोदी ने लिमासोल में बिजनेस राउंडटेबल में हिस्सा लिया, जहां उन्होंने साइप्रस को भारत का भरोसेमंद पार्टनर बताया। उन्होंने कहा कि 23 साल बाद किसी भारतीय पीएम का साइप्रस दौरा भारत-साइप्रस आर्थिक रिश्तों की अहमियत को दर्शाता है। पर्यटन में भी सहयोग बढ़ेगा, क्योंकि भारत साइप्रस जैसे डेस्टिनेशंस के विकास पर काम कर रहा है।

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जी7 सम्मेलन में हिस्सा लेने कनाडा जाएंगे पीएम मोदी

साइप्रस के बाद पीएम मोदी कनानास्किस, कनाडा जाएंगे, जहां वे कनाडाई पीएम मार्क कार्नी के निमंत्रण पर जी7 सम्मेलन में हिस्सा लेंगे। यह उनकी छठवीं लगातार जी7 भागीदारी होगी। सम्मेलन में ऊर्जा सुरक्षा, टेक्नोलॉजी और इनोवेशन, खासकर AI-ऊर्जा संबंध और क्वांटम मुद्दों पर चर्चा होगी। इसके बाद वे क्रोएशिया की यात्रा करेंगे, जहां वे प्रेसिडेंट जोरन मिलानोविक और पीएम एंड्रेज प्लेनकोविक से मुलाकात करेंगे।