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SIPRI Yearbook 2025: दुनिया में फिर शुरू हो सकती है हथियारों की होड़, कई देश बढ़ा रहे हैं न्यूक्लियर हथियारों का जखीरा

SIPRI Yearbook 2025: New Arms Race Looms as Countries Boost Nuclear Arsenals
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SIPRI Yearbook 2025: दुनिया भर में न्यूक्लियर हथियारों की तादाद और उनकी ताकत को बढ़ाने का काम तेजी से चल रहा है। 2024 में नौ न्यूक्लियर हथियारों से लैस देशों अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस, चीन, भारत, पाकिस्तान, नॉर्थ कोरिया और इजरायल ने अपने हथियारों को अपग्रेड करने और नए वर्जन जोड़ने के लिए जोरदार प्रोग्राम शुरू किए। जनवरी 2025 तक, दुनिया में करीब 12,241 न्यूक्लियर वॉरहेड्स हैं, जिनमें से लगभग 9,614 को मिलिट्री स्टॉकपाइल में रखा गया है, जो जरूरत पड़ने पर इस्तेमाल के लिए तैयार हैं। इनमें से 3,912 वॉरहेड्स मिसाइल्स और एयरक्राफ्ट के साथ तैनात हैं, जबकि बाकी सेंट्रल स्टोरेज में सुरक्षित हैं। इन तैनात वॉरहेड्स में से करीब 2,100 को बैलिस्टिक मिसाइल्स पर हाई ऑपरेशनल अलर्ट पर रखा गया है, और ज्यादातर ये रूस और अमेरिका के पास हैं। हाल ही में चीन ने भी शांति के वक्त कुछ वॉरहेड्स मिसाइल्स पर तैनात करना शुरू किया हो सकता है।

सिपरी की ताजा रिपोर्ट (SIPRI Yearbook 2025) के मुताबिक कोल्ड वॉर खत्म होने के बाद से रूस और अमेरिका ने पुराने वॉरहेड्स को धीरे-धीरे खत्म किया, जिससे न्यूक्लियर हथियारों की वैश्विक तादाद में हर साल कमी आती रही। लेकिन अब यह ट्रेंड बदलने की कगार पर है। पुराने हथियारों को खत्म करने की रफ्तार धीमी पड़ रही है, जबकि नए हथियारों को तैनात करने का काम तेज हो गया है। यह बदलाव दुनिया के लिए एक नई चुनौती बन सकता है।

SIPRI Yearbook 2025: रूस और अमेरिका का दबदबा

सिपरी के वेपंस ऑफ मास डिस्ट्रक्शन प्रोग्राम में एसोसिएट सीनियर फेलो और फेडरेशन ऑफ अमेरिकन साइंटिस्ट्स (FAS) में न्यूक्लियर इन्फॉर्मेशन प्रोजेक्ट के डायरेक्टर हंस एम. क्रिस्टेंसेन कहते हैं, “दुनिया में न्यूक्लियर हथियारों की संख्या में कमी का दौर, जो कोल्ड वॉर के खत्म होने के बाद से चला आ रहा था, अब खत्म होने की कगार पर है।” उनका कहना है, इसके बजाय, हम एक स्पष्ट ट्रेंड देख रहे हैं, जिसमें न्यूक्लियर आर्सेनल बढ़ रहा है, न्यूक्लियर रेटोरिक तेज हो रहा है और आर्म्स कंट्रोल समझौतों को छोड़ दिया जा रहा है।

रिपोर्ट के मुताबिक, रूस और अमेरिका के पास दुनिया के करीब 90 फीसदी न्यूक्लियर हथियार हैं। 2024 में इन दोनों देशों के मिलिट्री स्टॉकपाइल में खास बदलाव नहीं हुआ, लेकिन दोनों ने अपने हथियारों को मॉडर्नाइज करने के बड़े प्रोग्राम शुरू किए हैं। अगर इनके बीच कोई नया समझौता नहीं होता, तो 2010 का न्यू स्टार्ट ट्रीटी, जो फरवरी 2026 में खत्म हो रही है, उसके बाद इनके स्ट्रैटेजिक मिसाइल्स पर तैनात वॉरहेड्स की संख्या बढ़ सकती है। अमेरिका का मॉडर्नाइजेशन प्रोग्राम भले ही चल रहा हो, लेकिन 2024 में प्लानिंग और फंडिंग की दिक्कतों ने इसे धीमा कर दिया। नई नॉन-स्ट्रैटेजिक न्यूक्लियर वॉरहेड्स को जोड़ने से भी इस प्रोग्राम पर दबाव बढ़ा है।

रूस का मॉडर्नाइजेशन प्रोग्राम भी चुनौतियों से जूझ रहा है। 2024 में नए सरमात इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) के टेस्ट में नाकामी और अन्य सिस्टम्स के अपग्रेड में देरी हुई। अमेरिका का अनुमान था कि रूस अपने नॉन-स्ट्रैटेजिक वॉरहेड्स की संख्या बढ़ाएगा, लेकिन ऐसा अभी तक नहीं हुआ। फिर भी, आने वाले सालों में दोनों देशों की तैनाती बढ़ने की संभावना है। रूस अपनी पुरानी स्ट्रैटेजिक फोर्स को मॉडर्नाइज कर हर मिसाइल पर ज्यादा वॉरहेड्स तैनात कर सकता है, जबकि अमेरिका मौजूद लॉन्चरों पर ज्यादा वॉरहेड्स जोड़ सकता है और खाली साइलो को फिर से सक्रिय कर सकता है।

चीन का तेजी से बढ़ता जखीरा

चीन का न्यूक्लियर आर्सेनल सबसे तेजी से बढ़ रहा है। SIPRI के मुताबिक, चीन के पास अब कम से कम 600 वॉरहेड्स हैं, और 2023 से हर साल करीब 100 नए वॉरहेड्स जोड़े जा रहे हैं। जनवरी 2025 तक, चीन ने देश के उत्तरी रेगिस्तानी इलाकों और पूर्वी पहाड़ी क्षेत्रों में करीब 350 नए ICBM साइलो बनाए हैं या बनाने का काम पूरा कर लिया है। अगर चीन अपनी फोर्स को इसी तरह बढ़ाता है, तो दस साल में इसके पास 1500 वॉरहेड्स हो सकते हैं, जो रूस और अमेरिका के मौजूदा स्टॉकपाइल का करीब एक-तिहाई होगा।

ब्रिटेन, फ्रांस और अन्य देश भी नहीं हैं पीछे

ब्रिटेन ने 2024 में अपने न्यूक्लियर वॉरहेड्स की संख्या नहीं बढ़ाई, लेकिन 2023 की इंटीग्रेटेड रिव्यू रिफ्रेश में वॉरहेड्स की सीमा बढ़ाने की योजना को मंजूरी दी गई थी। जुलाई 2024 में चुनी गई लेबर सरकार ने चार नए न्यूक्लियर-पावर्ड बैलिस्टिक मिसाइल सबमरीन (SSBNs) बनाने और लगातार समुद्र में न्यूक्लियर डिटरेंस बनाए रखने का वादा किया। हालांकि, अब उसे ऑपरेशनल और फाइनेंशियल चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

फ्रांस ने 2024 में तीसरी जेनरेशन के SSBN और नए एयर-लॉन्च्ड क्रूज मिसाइल को डेवलप करने का काम जारी रखा। मौजूद सिस्टम्स को रिफर्बिश और अपग्रेड करने का भी प्रयास हुआ, जिसमें एक बेहतर बैलिस्टिक मिसाइल और नया वॉरहेड मॉडिफिकेशन शामिल है।

भारत-पाकिस्तान ने बढ़ाया न्यूक्लियर आर्सेनल

2024 में भारत ने अपने न्यूक्लियर आर्सेनल को थोड़ा और बढ़ाया है, और नए तरह के न्यूक्लियर डिलीवरी सिस्टम विकसित करने का काम जारी रखा है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के नए ‘कैनिस्टराइज्ड’ मिसाइल्स, जो वॉरहेड्स के साथ ट्रांसपोर्ट किए जा सकते हैं, शांति के वक्त भी न्यूक्लियर वॉरहेड्स ले जाने में सक्षम हो सकते हैं। जब ये मिसाइल्स पूरी तरह से ऑपरेशनल हो जाएंगे, तो हर मिसाइल पर कई वॉरहेड्स ले जाने की क्षमता भी हो सकती है।

उधर, पाकिस्तान ने भी 2024 में नए डिलीवरी सिस्टम डेवलप करने और फिसाइल मटीरियल इकट्ठा करने का काम जारी रखा, जिससे संकेत मिलता है कि आने वाले दशक में उसका न्यूक्लियर आर्सेनल बढ़ सकता है।

SIPRI के वेपन्स ऑफ मास डिस्ट्रक्शन प्रोग्राम में एसोसिएट सीनियर रिसर्चर और FAS में न्यूक्लियर इन्फॉर्मेशन प्रोजेक्ट के एसोसिएट डायरेक्टर मैट कोरडा ने कहा, “ऑपरेशन सिंदूर के दौरान न्यूक्लियर से जुड़े सैन्य ढांचे पर हमले और गलत सूचनाओं का मेल एक सामान्य टकराव को भी न्यूक्लियर संकट में बदल सकता था। यह उन देशों के लिए एक सख्त चेतावनी है जो न्यूक्लियर हथियारों पर अपनी निर्भरता बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।”

नॉर्थ कोरिया और इजरायल की तैयारी

नॉर्थ कोरिया अपने मिलिट्री न्यूक्लियर प्रोग्राम को अपनी नेशनल सिक्योरिटी का अहम हिस्सा मानता है। SIPRI के अनुसार, उसके पास अब करीब 50 वॉरहेड्स हैं, और पर्याप्त फिसाइल मटीरियल से 40 और वॉरहेड्स बनाए जा सकते हैं। जुलाई 2024 में साउथ कोरिया ने चेतावनी दी कि नॉर्थ कोरिया ‘टैक्टिकल न्यूक्लियर वॉपन’ डेवलप करने के आखिरी चरण में है। नवंबर 2024 में किम जोंग उन ने अपने देश के न्यूक्लियर प्रोग्राम को ‘असीमित तरीके से’ आगे बढ़ाने का ऐलान किया।

इजरायल, जो सार्वजनिक रूप से न्यूक्लियर हथियारों को स्वीकार नहीं करता, अपने आर्सेनल को मॉडर्नाइज कर रहा है। 2024 में उसने एक मिसाइल प्रोपल्शन सिस्टम का टेस्ट किया, जो उसके जेरिको फैमिली के न्यूक्लियर-कैपेबल बैलिस्टिक मिसाइल्स से जुड़ा हो सकता है। साथ ही, डिमोना में अपने प्लूटोनियम प्रोडक्शन रिएक्टर साइट को अपग्रेड करने का काम भी चल रहा है।

SIPRI Yearbook 2025: New Arms Race Looms as Countries Boost Nuclear Arsenals
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आर्म्स कंट्रोल पर संकट

SIPRI डायरेक्टर डैन स्मिथ ने अपनी 2025 की रिपोर्ट में न्यूक्लियर आर्म्स कंट्रोल पर संकट की चेतावनी दी है। रूस और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय न्यूक्लियर कंट्रोल कई सालों से संकट में है और अब लगभग खत्म हो चुका है। न्यू स्टार्ट, जो रूस और अमेरिका की स्ट्रैटेजिक न्यूक्लियर फोर्स को सीमित करता है, फरवरी 2026 तक प्रभावी है, लेकिन इसके नवीनीकरण या बदलाव की कोई बातचीत नहीं हो रही। अमेरिकी प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में और अब फिर दोहराया कि किसी भी नए समझौते में चीन के न्यूक्लियर आर्सेनल पर भी सीमा होनी चाहिए, जो बातचीत को और मुश्किल बना देगा।

स्मिथ ने नए हथियारों की रेस के जोखिमों पर भी चेतावनी दी। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), साइबर कैपेबिलिटीज, स्पेस एसेट्स, मिसाइल डिफेंस और क्वांटम टेक्नोलॉजी जैसे नए तकनीकों का तेजी से विकास न्यूक्लियर कैपेबिलिटीज, डिटरेंस और डिफेंस को बदल रहा है, जिससे अस्थिरता बढ़ सकती है। मिसाइल डिफेंस और समुद्र में क्वांटम टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल से देशों के न्यूक्लियर आर्सेनल की भेद्यता प्रभावित हो सकती है। साथ ही, AI और अन्य तकनीकों से संकट में फैसले तेज होने से गलतफहमी, गलत कम्युनिकेशन या तकनीकी गलती से न्यूक्लियर संघर्ष का खतरा बढ़ गया है।

नए देशों में न्यूक्लियर हथियारों की दिलचस्पी

ईस्ट एशिया, यूरोप और मिडल ईस्ट में न्यूक्लियर स्टेटस और स्ट्रैटेजी पर चर्चा हो रही है। इससे संकेत मिलता है कि और देश अपने न्यूक्लियर हथियार डेवलप कर सकते हैं। इसके अलावा, न्यूक्लियर-शेयरिंग अरेंजमेंट्स पर भी ध्यान बढ़ा है। 2024 में रूस और बेलारूस ने दावा दोहराया कि रूस ने बेलारूसी जमीन पर न्यूक्लियर हथियार तैनात किए हैं। कई यूरोपीय NATO सदस्यों ने अमेरिकी न्यूक्लियर हथियार अपने यहां रखने की इच्छा जताई, और फ्रांस के प्रेसिडेंट इमैनुएल मैक्रों ने ‘यूरोपीय पहलू’ में फ्रांसीसी न्यूक्लियर पावर की बात की।

SIPRI की रिपोर्ट में खुलासा, 2023 में दुनियाभर में बिके 52 लाख करोड़ रुपये के हथियार, 4.2 फीसदी की हुई बढ़ोतरी

मैट कोरडा ने कहा, “यह याद रखना बहुत जरूरी है कि न्यूक्लियर हथियार सुरक्षा की गारंटी नहीं देते। हाल ही में भारत और पाकिस्तान में हुई हिंसक घटनाओं ने साफ दिखाया कि न्यूक्लियर हथियार संघर्ष को रोकने में असफल रहते हैं। इनके साथ बढ़ोतरी और भयानक गलतफहमियों का जोखिम भी जुड़ा है, खासकर जब गलत सूचनाएं फैल रही हों, और ये देश की आबादी को सुरक्षित करने के बजाय असुरक्षित बना सकते हैं।”

5 years of Galwan Clash: गलवान हिंसा के पांच साल बाद भारत के लिए क्या हैं 5 सबसे बड़े सबक? दो फ्रंट वॉर के लिए रहना होगा तैयार!

5 Years of Galwan Clash: 5 Key Lessons India Must Not Forget
Pic Source: Indian Army

5 years of Galwan Clash: 15-16 जून 2020 को पूर्वी लद्दाख में एलएसी से सटी गलवान घाटी में भारत और चीन के बीच हुई हिंसक झड़प को आज पांच साल पूरे हो गए हैं। पूर्वी लद्दाख के गलवान में दोनों देशों की सेनाओं के बीच हुई हिंसक झड़प में कर्नल संतोष बाबू समेत 20 भारतीय सैनिकों ने अपनी जान गंवाई, जबकि चीनी सेना के 40 से भी अधिक जवान मारे गए। हालांकि आधिकारिक तौर पर चीन ने इसकी संख्या नहीं बताई। लेकिन गलवान में हुए खूनी संघर्ष ने देश की सुरक्षा नीति, सामरिक दृष्टिकोण और पड़ोसी देशों को लेकर सोच को बदलने को मजबूर कर दिया।

5 years of Galwan Clash: क्या हुआ था गलवान में?

पूर्वी लद्दाख में गलवान घाटी एक ऐसी जगह है, जहां भारत और चीन की सीमा (लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल या LAC) को लेकर हमेशा विवाद रहा है। भारत और चीन के बीच सीमा पर तनातनी कोई नई बात नहीं है। 2013 के बाद से ही ऐसी घटनाएं लगातार बढ़ी हैं। 2020 की शुरुआत में, चीनी सैनिकों ने इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ाई और निर्माण कार्य शुरू किए। एलएसी से सटे इलाकों में ये निर्माण कार्य भारत के लिए चिंता का कारण बने। दोनों देशों के बीच कई दौर की बातचीत हुई, लेकिन 15 जून की रात बातचीत के दौरान झड़प हो गई। लेकिन गलवान में हुई इस झड़प में लाठी-डंडों और पत्थरों का इस्तेमाल हुआ, क्योंकि दोनों पक्षों के पास हथियारों का इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं थी। फिर भी, इस हिंसा में कई सैनिक घायल हुए और 20 भारतीय जवान शहीद हो गए। एलएसी पर पहली बार 45 सालों में सीमा पर सैनिकों की मौत हुई। 1996 और 2005 के समझौतों के तहत, दोनों देशों ने इस बात पर सहमति जताई थी कि सीमा पर हथियारों का उपयोग नहीं होगा, लेकिन गलवान में चीनी सैनिकों ने लोहे की छड़ों, कील लगे डंडों और कांटेदार तारों से हमला किया।

इस घटना के बाद दोनों देशों की सेनाओं ने उस इलाके में अपने सैनिक और हथियारों की तैनाती बढ़ा दी। गलवान के बाद LAC पर गश्त और निगरानी बढ़ाई गई, और दोनों देशों के बीच कई बार बैठकें हुईं ताकि हालात पर काबू रखा जा सके।

चीन का यह व्यवहार अचानक नहीं था। 1959 में तिब्बत को हथियाने के बाद से चीन धीरे-धीरे इस क्षेत्र में रणनीतिक रूप से अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है। 1980 के दशक से वह LAC के आसपास सड़कें, हवाई पट्टियां और निर्माण कर रहा है। साथ ही वह डेमोग्राफिक स्ट्रक्चर भी बदल रहा है और तिब्बत में हान चीनी आबादी बसाकर स्थानीय पहचान को कमजोर कर रहा है।

चीन की मंशा साफ है कि भारत को सीमाओं पर उलझाकर, अपनी रणनीतिक स्थिति मजबूत करना। गलवान से पहले डोकलाम (2017) और उससे पहले 2013 में देपसांग और चुमार में भी ऐसी ही घटनाएं हुईं थीं। लेकिन गलवान एक चेतावनी थी, एक ऐसा अलार्म जिसने भारत को झकझोर कर रख दिया।

पहला सबक: सीमा पर सतर्कता जरूरी

गलवान की घटना ने भारत को सिखाया कि सीमा पर सतर्कता कभी कम नहीं होनी चाहिए। 2020 से पहले, कई लोग मानते थे कि भारत और चीन के बीच छोटी-मोटी सीमा विवाद तो होते रहते हैं, लेकिन बड़ी लड़ाई की संभावना कम है। लेकिन गलवान ने दिखाया कि चीनी सेना अचानक से अपनी पोजीशन मजबूत कर सकती है। इसलिए, भारतीय सेना ने LAC पर अपनी तैनाती बढ़ाई और नई टेक्नोलॉजी जैसे ड्रोन और सैटेलाइट का इस्तेमाल शुरू किया ताकि दुश्मन की हरकतों पर नजर रखी जा सके।

इसके अलावा, स्थानीय लोगों और चरवाहों से मिली जानकारी भी अहम साबित हुई थी। 1999 के कारगिल युद्ध की तरह, गलवान में भी शुरुआती अलर्ट चरवाहों ने ही दिया था। इसका मतलब है कि सीमा क्षेत्र में रहने वाले लोगों के साथ तालमेल बनाना जरूरी है ताकि समय रहते खतरे का पता चल सके।

दूसरा सबक: सैनिकों की ट्रेनिंग और तैयारी

गलवान में हुई झड़प से पता चला कि सैनिकों को सिर्फ हथियार चलाने की ट्रेनिंग नहीं, बल्कि हाथ से हाथ की लड़ाई (हैंड-टू-हैंड कॉम्बैट) की भी तैयारी करनी होगी। उस रात सैनिकों ने बिना गोली चलाए डंडों और पत्थरों से अपनी रक्षा की। इसके बाद भारतीय सेना ने अपनी ट्रेनिंग में बदलाव किए। अब सैनिकों को ऊंचाई वाले इलाकों में लड़ने और ठंड में बचे रहने की खास ट्रेनिंग दी जाती है। साथ ही, उन्हें ऐसी स्थिति से निपटने के लिए नई टैक्टिक्स भी सिखाई जा रही हैं, जहां हथियारों का इस्तेमाल सीमित हो। सेना ने हाई-ऑल्टीट्यूड ट्रेनिंग सेंटर भी शुरू किए, जहां सैनिकों को ऊंचाई वाले इलाकों में लड़ने की प्रैक्टिस कराई जाती है। इसके अलावा, सेना ने अपने कम्युनिकेशन सिस्टम को अपग्रेड किया ताकि दुश्मन की हरकतों की तुरंत जानकारी मिल सके।

तीसरा सबक: डिप्लोमेसी और सैन्य शक्ति का संतुलन

गलवान के बाद भारत ने समझा कि डिप्लोमेसी (राजनयिक बातचीत) और सैन्य ताकत का संतुलन जरूरी है। झड़प के बाद भारत ने चीन के साथ बातचीत शुरू की, लेकिन साथ ही अपनी सेना और हथियारों को मजबूत किया। भारत ने अपने बॉर्डर इन्फ्रास्ट्रक्चर (सीमा ढांचा) को बेहतर किया, जैसे सड़कें, पुल और हेलीपैड बनाए गए, ताकि सैनिकों को जल्दी मदद पहुंचाई जा सके। साथ ही, भारत ने रूस, अमेरिका और फ्रांस जैसे देशों से हथियार और टेक्नोलॉजी खरीदी, और अपनी सैन्य क्षमता में इजाफा किया। गलवान हिंसा ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चीन की आक्रामकता को सामने लाने में मदद की। अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और यूरोपियन यूनियन ने भारत का समर्थन किया। इसके बाद क्वाड (QUAD) समूह की भूमिका भी मजबूत हुई। भारत ने सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर अपनी स्थिति को स्पष्ट किया, हम शांति चाहते हैं, लेकिन कमजोरी नहीं दिखाएंगे।

चौथा सबक: जनता का समर्थन और जागरूकता

गलवान घटना पूरे देश को झकझोरने वाली थी। लोगों ने शहीदों को श्रद्धांजलि दी और सेना के लिए समर्थन जताया। सोशल मीडिया पर गलवान में सैनिकों की बहादुरी की कहानियां ट्रेंड हुईं, और लोग सैनिकों की बहादुरी की कहानियां शेयर करने लगे। यह घटना ने देशवासियों को यह सिखाया कि सीमा पर क्या हो रहा है, इसकी जानकारी रखना जरूरी है। स्कूलों और कॉलेजों में अब बच्चों को सीमा सुरक्षा और सैनिकों के बलिदान के बारे में बताया जाता है ताकि वे देश के प्रति जिम्मेदारी समझें।

पांचवां सबक: स्वदेशी हथियारों पर जोर

गलवान ने भारत को यह एहसास दिलाया कि विदेशी हथियारों पर निर्भरता कम करनी होगी। इसके बाद भारत ने अपनी डिफेंस इंडस्ट्री को मजबूत करने का फैसला लिया। अब ‘मेक इन इंडिया’ प्रोग्राम के तहत राइफल्स, ड्रोन और बुलेटप्रूफ जैकेट्स जैसे हथियार बनाए जा रहे हैं। इससे न सिर्फ सेना की ताकत बढ़ेगी, बल्कि देश की इकोनॉमी को भी फायदा होगा।

गलवान के बाद भारत ने LAC पर इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण तेज हुआ। सड़कों और पुलों को अपग्रेड किया गया, बॉर्डर पोस्ट्स को मजबूत किया गया और फॉरवर्ड बेस को एक्टिव किया गया। अब भारत सिर्फ प्रतिक्रिया नहीं देता, बल्कि रणनीतिक तैयारी भी करता है।

इसके साथ ही सरकार ने सेना को निर्णय लेने की अधिक स्वतंत्रता दी। भारतीय जवान अब उत्तरी लद्दाख की बर्फीली चोटियों पर लंबे समय तक तैनात रह सकते हैं। रणनीतिक दृष्टिकोण से यह बदलाव अहम था।

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पाकिस्तान और चीन की साजिशें

पहले गलवान और अब ऑपरेशन सिंदूर ने साबित किया कि चीन और पाकिस्तान की मिलीभगत गहरी होती जा रही है। गिलगित-बाल्टिस्तान में पाकिस्तान ने चीन को सैन्य सहूलियतें दी हैं, और चीनी सेना कई पाकिस्तानी सेना के अधिकारियों को ट्रेनिंग भी मुहैया करवा रही है। ऐसे में भारत के लिए दो फ्रंट वाला खतरा और गंभीर हो जाता है। गलवान के बाद भारत ने पश्चिमी मोर्चे यानी पाकिस्तान सीमा पर भी फोकस किया। अब भारत एक साथ दोनों मोर्चों पूर्वी लद्दाख और जम्मू-कश्मीर पर रणनीतिक तौर पर काम कर रहा है।

QRSAM Explained: ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत को मिलने जा रही है नई एयर डिफेंस शील्ड, पाकिस्तान और चीन के सिस्टम से क्यों है बेहतर?

QRSAM Explained: India’s New Air Defence Shield After Operation Sindoor

QRSAM Explained: ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ ड्रोन, क्रूज मिसाइल और लड़ाकू विमानों से हमले की कोशिश की थी। पाकिस्तान की ओर से हुए मिसाइल, ड्रोन और एयरक्राफ्ट हमलों के बाद भारत को यह एहसास हुआ कि मौजूदा एयर डिफेंस सिस्टम कारगर तो है, लेकिन इसमें अब भी कुछ खामियां हैं। जिसके बाद QRSAM यानी क्विक रिएक्शन सरफेस टू एयर मिसाइल सिस्टम को खरीदने का फैसला लिया गया। यह सिस्टम मॉडर्न वारफेयर की चुनौतियों से निपटने के लिए एडवांस सिस्टम से लैस है। यह सिस्टम ड्रोन, कम ऊंचाई पर उड़ने वाली मिसाइलों और अचानक हुए हवाई हमलों से तुरंत निपट सकता है। QRSAM की लागत करीब 30,000 करोड़ रुपये होगी और रक्षा मंत्रालय जून में प्रस्तावित रक्षा अधिग्रहण परिषद यानी डीएसी की बैठक में इस सौदे की मंजूरी दे सकता है। जल्द ही खरीदने की मंजूरी देने वाला है।

क्यों जरूरी है QRSAM?

ऑपरेशन सिंदूर ने दिखाया कि आज के युद्ध में खतरे अचानक और बहुत तेजी से आते हैं। पारंपरिक एयर डिफेंस सिस्टम किसी जगह पर स्थायी तौर पर तैनात होते हैं, ऐसे तेजी से बदलते हालात में हमेशा प्रभावी नहीं होते। वहीं QRSAM को इस तरह से डिजाइन किया गया है कि यह चलते-चलते भी लक्ष्य को पहचान सकता है और उसे निशाना बना सकता है। इसे मोबाइल डिप्लॉयमेंट के लिए बनाया गया है, यानी सेना जहां रुकेगी, वहीं से इसे तैनात किया जा सकता है।

QRSAM की ताकत क्या है?

यह सिस्टम लगभग 30 किलोमीटर की रेंज में आने वाले किसी भी हवाई खतरे को पहचान कर उसे निशाना बना सकता है। चाहे वह फाइटर जेट हो, अटैक हेलिकॉप्टर, ड्रोन, या फिर क्रूज मिसाइल। इसकी रडार यूनिट्स और मिसाइल दोनों भारत में बनी हैं। यह सिस्टम पूरी तरह ‘ट्रैक-व्हील-शूट’ क्षमता रखता है यानी चलते वाहन से लक्ष्य की पहचान और उसे मार गिराना संभव है। यह 6×6 हाई मोबिलिटी व्हीकल्स पर तैनात किया जाता है, जिससे इसे युद्ध के मैदान में तेजी से ले जाया जा सकता है। चाहे रेगिस्तानी इलाका हो, पहाड़ी क्षेत्र हो या मैदानी क्षेत्र, QRSAM हर तरह के इलाके में प्रभावी ढंग से काम करता है।

इसमें मल्टीफंक्शन फायर कंट्रोल रडार (MFCR) लगा है, जो एक साथ कई टारगेट्स को ट्रैक कर सकता है। इसके अलावा इसका बैटरी सर्विलांस रडार (BSR) 360 डिग्री कवरेज और 120 किमी तक की डिटेक्शन कैपेबिलिटी देता है। इसमें इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल ट्रैकिंग सिस्टम (EOTS) लगा है, जो खराब मौसम या रडार जैमिंग की स्थिति में भी टारगेट को ट्रैक कर सकता है।

ऑपरेशन सिंदूर से मिला सबक

भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान देखा कि पाकिस्तान ड्रोन जैसी सस्ते लेकिन खतरनाक टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर सकता है। वहीं चीन पहले से ही अपने एयर डिफेंस को लगातार अपग्रेड कर रहा है। ऐसे में सीमावर्ती इलाकों जैसे राजस्थान, पंजाब, लद्दाख और अरुणाचल में QRSAM जैसी तुरंत जवाब देने वाले सिस्टम की तैनाती जरूरी हो गई है।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान, एक सीमित स्केल पर QRSAM की तैनाती हुई थी, और इसने पाकिस्तान द्वारा भेजे गए कुछ ड्रोनों को मार गिराया था। इसके बाद से इसे सेना में शामिल करने का फैसला लिया गया।

सरकार ने संकेत दिया है कि पहली फेज में सेना को तीन QRSAM रेजिमेंट दी जाएंगी। प्रत्येक रेजिमेंट में छह लॉन्चर होंगे और हर लॉन्चर पर छह मिसाइलें होंगी। इस प्रकार एक रेजिमेंट में 36 मिसाइलें होंगी। यह सिस्टम DRDO ने बनाया है और पूरी तरह स्वदेश में ही बनाया गया है। QRSAM की मिसाइलों का निर्माण भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (BDL) द्वारा किया जाएगा और रडार व फायर कंट्रोल सिस्टम्स BEL बनाएगा।

सरकार के Make in India मिशन के तहत QRSAM को 90% से अधिक स्वदेशी कंपोनेंट्स के साथ डेवलप किया गया है। DRDO की अगुवाई में इस पर काम हुआ और इसके निर्माण में BEL, BDL और अन्य भारतीय रक्षा कंपनियों को शामिल किया गया। 2024 तक इसे 99% स्वदेशी बनाने का लक्ष्य है।

पुराने रूसी सिस्टम होंगे रिप्लेस

भारतीय सेना अभी भी एयर डिफेंस के लिए पुराने रूसी सिस्टम जैसे शिल्का, स्ट्रेला-10M, ओसा-AK, पिचौरा और तंगुष्का पर निर्भर है। इनमें से कई सिस्टम 70-80 के दशक में खरीदे गए थे और अब तकनीकी रूप से पुराने हो चुके हैं। उदाहरण के लिए, शिल्का एक ट्रैक गन सिस्टम है जो एक मिनट में 8000 राउंड फायर कर सकता है, लेकिन यह क्रूज मिसाइल या ड्रोन के खिलाफ ज्यादा असरदार नहीं है।

स्ट्रेला-10M जैसे सिस्टम सिर्फ 5 किमी तक असरदार होते हैं और उन्हें बार-बार रीलोड करना पड़ता है। वहीं तंगुष्का जैसे सिस्टम में मिसाइल की रेंज केवल 8 किलोमीटर है। OSA-AK में भी कई सीमाएं हैं, जो अब आधुनिक हवाई खतरों के सामने बहुत कारगर नहीं है।

QRSAM इन सभी की जगह लेने जा रहा है क्योंकि यह न केवल रेंज में बेहतर है बल्कि अधिक मोबाइल, तेज और ऑल-वेदर ऑपरेशनल भी है। QRSAM की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे चलते-चलते तैनात किया जा सकता है। यानी सेना की टुकड़ी जहां रुकेगी, वहीं से यह सिस्टम टारगेट को खोज भी सकता है और हमला भी कर सकता है। यह दुर्गम और सीमावर्ती इलाकों में बेहतर काम कर सकता है, जहां पारंपरिक एयर डिफेंस सिस्टम को सेटअप करना मुश्किल होता है।

ट्रायल्स में किया साबित

2020 से 2023 के बीच QRSAM के कई ट्रायल्स हुए, जिसमें 2019, 2020 और 2022 में चांदीपुर, ओडिशा के इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज में हुए परीक्षण शामिल हैं। इन ट्रायल्स में दिन और रात दोनों समय, और हर तरह के मौसम में इसके काम करने की क्षमता को परखा गया। इन ट्रायल्स में इसने क्रूज मिसाइल और ड्रोन जैसे टारगेट्स को बेहद सटीकता से मार गिराया। DRDO ने इसकी डिजाइनिंग में इस बात का ध्यान रखा है कि यह सिस्टम रेगिस्तान से लेकर पहाड़ तक सभी टेरेन में काम कर सके।

QRSAM के शामिल होने से भारत की सैन्य रणनीति में बड़ा बदलाव आएगा। खासकर जब फॉरवर्ड लोकेशन्स पर टैंक या इंफैंट्री की मूवमेंट हो रही हो, तब यह सिस्टम उनके साथ चलकर उन्हें हवाई हमलों से बचाने में सक्षम होगा।

अब तक भारतीय सेना को सीमावर्ती इलाकों में स्थायी रूप से स्थापित एयर डिफेंस सिस्टम्स पर निर्भर रहना पड़ता था। लेकिन QRSAM की तैनाती से ये सीमाएं खत्म हो जाएंगी।

QRSAM मिसाइल मैक 2.5-3 की सुपरसोनिक रफ्तार से निशाना बनाती है। यह मिड-कोर्स इनर्शियल नेविगेशन और टर्मिनल एक्टिव रडार होमिंग के जरिए सटीक निशाना लगाती है। इसका उच्च विस्फोटक प्री-फ्रैगमेंटेड वॉरहेड लक्ष्य को पूरी तरह नष्ट करने में सक्षम है।

पाकिस्तान का LY-80 और चीन का HQ-9 सिस्टम

सबसे पहले बात करें रेंज की। QRSAM की अधिकतम मारक दूरी 25 से 30 किलोमीटर तक है। वहीं पाकिस्तान का LY-80 सिस्टम चीन की मदद से बनाया एक लो-टू-मीडियम एयर डिफेंस सिस्टम है, जिसकी रेंज लगभग 40 किमी तक मानी जाती है। यह सिस्टम मोबाइल जरूर है, लेकिन इसके ट्रैकिंग और फायर कंट्रोल फीचर्स काफी हद तक पारंपरिक हैं। इसकी रडार क्षमता सीमित है और मल्टीटारगेट ट्रैकिंग की दक्षता QRSAM जैसी नहीं है।

दूसरी ओर चीन का HQ-9 सिस्टम लंबी दूरी के लिए डिजाइन किया गया है और यह S-300 की तकनीक पर आधारित है। HQ-9 के पास रेंज और एडवांस ट्रैकिंग सिस्टम जरूर हैं, लेकिन इसकी तैनाती प्रक्रिया धीमी और भारी है। यह सिस्टम स्थिर जगहों पर बेहतर काम करता है, जबकि मोबाइल वॉरफेयर की जरूरतें इससे पूरी नहीं होतीं।

QRSAM क्यों है अलग और बेहतर?

QRSAM को DRDO ने भारतीय सेना की खास जरूरतों को ध्यान में रखते हुए डिजाइन किया है। यह सिस्टम ट्रैक-व्हील-शूट कैपेबिलिटी से लैस है – यानी चलते वाहन से ही लक्ष्य को ट्रैक करके मिसाइल दागी जा सकती है। यह विशेषता पाकिस्तान और चीन के सिस्टम में नहीं मिलती।

QRSAM की मारक दूरी करीब 30 किलोमीटर है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी ताकत है इसकी तेज तैनाती (Quick Deployment), हाई मोबिलिटी (Mobility) और मल्टीटारगेट क्षमता। इसमें दो अत्याधुनिक रडार सिस्टम BSR और MFCR — लगे हैं, जो 360-डिग्री कवरेज और 120 किमी तक की ट्रैकिंग क्षमता देते हैं। साथ ही इसमें Electro-Optical Tracking System (EOTS) है, जो बिना रडार के भी लक्ष्य खोज सकता है। इसके विपरीत, पाकिस्तान के LY-80 की रडार क्षमता सीमित है और चीन का HQ-9 सिस्टम भले ही लॉन्ग रेंज रडार से लैस हो, लेकिन उसकी रिस्पॉन्स टाइम धीमा है और वह क्लोज-इन थ्रेट्स को उसी फुर्ती से पकड़ नहीं सकता। वहीं QRSAM का रिएक्शन टाइम 6 सेकंड से भी कम है, और यह मात्र छह सेकंड में टारगेट को लॉक और फायर कर सकता है। वहीं, ट्रांसपोर्ट से फायर मोड में स्विच करने में LY-80 / HQ-16 का रिएक्शन टाइम ज्यादा समय लेता है।

टारगेट एंगेजमेंट

अगर टारगेट एंगेजमेंट की बात करें, तो उसमें QRSAM ज्यादा एडवांस्ड है। यह UAVs, फाइटर जेट, ड्रोन, हेलिकॉप्टर और क्रूज मिसाइल तक को सटीकता से निशाना बना सकता है। पाकिस्तान का LY-80 भी एयरक्राफ्ट और क्रूज मिसाइल के लिए सक्षम बताया गया है, लेकिन इसकी मल्टी-टारगेट एंगेजमेंट क्षमता सीमित है। चीन का HQ-9 लॉन्ग रेंज एयर थ्रेट जैसे बड़े फाइटर जेट्स और बैलिस्टिक मिसाइल को टारगेट करता है, लेकिन यह सिस्टम नजदीक के, तेज़ी से मूव करने वाले टारगेट्स के लिए उतना असरदायक नहीं माना जाता।

देता है रीयल टाइम प्रोटेक्शन

अब बात मोबिलिटी की करें तो QRSAM का सबसे बड़ा फायदा यही है कि यह हाई मोबिलिटी व्हीकल पर आधारित है और इसमें ट्रैक-व्हील-शूट की क्षमता है, यानी सेना की टुकड़ी के साथ-साथ चलते हुए भी यह मिसाइल फायर कर सकता है। पाकिस्तान का LY-80 भले ही मोबाइल हो, लेकिन इसकी तैनाती में ज्यादा समय लगता है। चीन का HQ-9 सिस्टम भारी और स्थिर होता है, जिसकी तैनाती युद्ध के बीच में करना बेहद मुश्किल होता है। HQ-9 और LY-80 मुख्य रूप से फिक्स्ड बेस सुरक्षा के लिए उपयोग किए जाते हैं, वहीं QRSAM एक पूरी तरह मोबाइल फोर्स के साथ मूव कर सकता है और यह टैंक रेजिमेंट या इन्फैंट्री कॉलम के साथ रीयल टाइम प्रोटेक्शन देता है।

11 Years of India defence: तेजस से ब्रह्मोस तक, 11 साल में हुआ सेना का मेगा ट्रांसफॉर्मेशन, कैसे बना भारत एक आधुनिक सैन्य शक्ति

11 Years of India Defence: From Tejas to BrahMos, A Military Makeover
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11 Years of India defence: नरेंद्र मोदी सरकार के केंद्र में 11 साल पूरे होने के साथ, भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार ने भारतीय सेनाओं के आधुनिकीकरण और रक्षा क्षेत्र में तकनीकी प्रगति पर विशेष ध्यान दिया है। पिछले एक दशक में, अत्याधुनिक डिफेंस इक्विपमेंट्स की खरीद से लेकर स्वदेशी उद्योग को बढ़ावा देने तक, सरकार ने सेना को और अधिक शक्तिशाली और एडवांस बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाए हैं। “मेक इन इंडिया” और “आत्मनिर्भर भारत” पहल के तहत, भारत ने न केवल विदेशों से महत्वपूर्ण उपकरण खरीदे हैं, बल्कि स्वदेशी उत्पादन को भी बढ़ावा दिया है, जिससे विदेशी निर्भरता कम हुई है। आइए, पिछले 11 वर्षों में मोदी सरकार के कार्यकाल में भारतीय सेना, वायुसेना और नौसेना को कई अत्याधुनिक डिफेंस सिस्टम्स से लैस किया गया है। इसमें मिसाइल सिस्टम, लड़ाकू विमान, हेलिकॉप्टर, सबमरीन, रडार सिस्टम और स्मार्ट हथियारों की एक लंबी फेहरिस्त शामिल है।

11 Years of India defence: मिसाइल और एयर डिफेंस सिस्टम

भारत ने अपने एयर डिफेंस को मजबूत करने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। रूस से पांच रेजिमेंट्स एस-400 ट्रायम्फ एयर डिफेंस सिस्टम खरीदा गया, जिसकी रेंज 400 किलोमीटर है। यह सिस्टम भारत की हवाई सीमाओं को और सुरक्षित करने में सक्षम है। इसके अलावा, इज़रायल से बराक-8 मध्यम दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल (MRSAM) खरीदी गई, जिसकी रेंज 70 किलोमीटर है। इसे स्वदेशी सिस्टम्स के साथ इंटीग्रेट कर महत्वपूर्ण रक्षा ठिकानों की सुरक्षा सुनिश्चित की गई है।

स्वदेशी स्तर पर, आकाश सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल सिस्टम की कई यूनिट्स भारतीय सेना और वायुसेना के लिए खरीदी गईं, जिनकी रेंज 25 किलोमीटर है। भारतीय नौसेना के लिए ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल की 200 से अधिक यूनिट्स की खरीद के लिए लगभग 20,000 करोड़ रुपये का कॉन्ट्रैक्ट किया गया। इन मिसाइलों की रेंज 290 किलोमीटर है, और कुछ एडवांस संस्करणों की रेंज 450 किलोमीटर तक है।

छोटी दूरी के एयर डिफेंस को मज़बूत करने के लिए, रूस से इग्ला-एस मैन-पोर्टेबल एयर डिफेंस सिस्टम (MANPADS) भी खरीदा गया है। इसके साथ ही, भारतीय वायुसेना के पुराने लंबी दूरी के रडारों को आधुनिक एक्टिव अपर्चर फेज्ड ऐरे सिस्टम (Active Aperture Phased Array System) से बदलने के लिए लार्सन एंड टुब्रो के साथ 5,700 करोड़ रुपये का कॉन्ट्रैक्ट किया गया।

आर्टिलरी और स्मार्ट गोला-बारूद

BAE सिस्टम्स से 145 M777 अल्ट्रा-लाइट हॉविट्जर गन खरीदी गईं, जो पहाड़ी इलाकों में बेहद उपयोगी हैं। इसके अलावा 307 एडवांस ATAGS 155mm/52 कैलिबर तोप और 327 हाई मोबिलिटी 6×6 गन टोइंग वाहन की खरीद का 7,000 करोड़ का अनुबंध किया गया।

इसी दौरान 100 K9 वज्र-T गन भी शामिल की गईं, जिनका सौदा 2017 में 720 मिलियन डॉलर में हुआ था। इसके अतिरिक्त 114 स्वदेशी धनुष तोपें भी 2026 तक सेना में शामिल की जाएंगी। थल सेना 300 माउंटेड गन सिस्टम (MGS) और 400 टो गन सिस्टम (TGS) की खरीद की प्रक्रिया में है। ये सिस्टम भारत फोर्ज और टाटा द्वारा निर्मित किए जा रहे हैं।

राइफल और छोटे हथियार

सेना के लिए 1.44 लाख सिग 716 बैटल राइफल्स खरीदी गईं, ताकि पुरानी इंसास राइफल्स को बदला जा सके। भारतीय सेना 2026 तक 114 धनुष तोप सिस्टम्स को शामिल करने की प्रक्रिया में है। इसके अलावा, 300 माउंटेड गन सिस्टम्स (MGS) और 400 टोड गन सिस्टम्स (TGS) की खरीद की प्रक्रिया भी चल रही है। सेना ने 100 के9 वज्र-टी तोपों को भी शामिल किया है, जिसके लिए 2017 में 720 मिलियन डॉलर का कॉन्ट्रैक्ट हुआ था।

वायुसेना के लिए लड़ाकू और परिवहन विमान

भारतीय वायुसेना को मज़बूत करने के लिए कई बड़े कॉन्ट्रैक्ट किए गए। 2016 में, फ्रांस के साथ 36 राफेल लड़ाकू विमान खरीदने का 60,000 करोड़ रुपये का कॉन्ट्रैक्ट हुआ। ये सभी विमान अब अंबाला और हासीमारा में तैनात हो चुके हैं। इसके अलावा, अक्टूबर 2024 में अमेरिका से 31 एमक्यू-9बी हाई एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्यूरेंस रिमोटली पायलटेड एयरक्राफ्ट सिस्टम (RPAS) खरीदने का कॉन्ट्रैक्ट हुआ, जिसकी लागत लगभग 3 बिलियन डॉलर है। ये ड्रोन निगरानी और हमले की क्षमताओं को बढ़ाएंगे।

हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) से वायुसेना को 180 तेजस लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट मिलेंगे, जिनमें से 40 विमान वर्तमान में ऑपरेट हो रहे हैं। 56 सी295 परिवहन विमान एयरबस डिफेंस एंड स्पेस से 21,935 करोड़ रुपये में खरीदे गए, ताकि वायुसेना के पुराने एवरो-748 विमानों को बदला जा सके।

2015 में, 22 अपाचे एएच-64 अटैक हेलीकॉप्टर अमेरिका से वायुसेना के लिए खरीदे गए थे। जबकि भारतीय सेना को अभी छह अपाचे हेलीकॉप्टर मिलने बाकी हैं।

वायुसेना को 15 चिनूक सीएच-47 हैवी-लिफ्ट हेलीकॉप्टर मिले, जिनका कॉन्ट्रैक्ट 2015 में हुआ। इसके अलावा, 151 एमआई-17वी-5 हेलीकॉप्टर भारत में असेंबल किए गए। 10 प्रचंड लाइट कॉम्बैट हेलीकॉप्टर 2023 में वायुसेना को और 5 भारतीय सेना को मिले। HAL के साथ 156 स्वदेशी प्रचंड हेलीकॉप्टर के लिए 53,000 करोड़ रुपये का कॉन्ट्रैक्ट भी हुआ।

निगरानी और समुद्री क्षमताएं

भारतीय नौसेना ने पिछले दशक में 6 कालवरी-क्लास स्कॉर्पीन पनडुब्बियों को शामिल किया। 2023 में, फ्रांस के साथ तीन अतिरिक्त स्कॉर्पीन पनडुब्बियों के लिए 38,000 करोड़ रुपये का कॉन्ट्रैक्ट हुआ। प्रोजेक्ट 17ए फ्रिगेट्स के तहत तीन जहाज़ शामिल किए गए हैं, और तीन और जल्द ही शामिल होंगे। P-8I पोसाइडन मैरीटाइम पेट्रोल एयरक्राफ्ट की 4 यूनिट और जोड़ी गई हैं। इससे पहले 8 विमान पहले से नौसेना के पास थे। अमेरिका से और 6 विमानों की खरीद पर चर्चा चल रही है। ये विमान समुद्री निगरानी, पनडुब्बी रोधी युद्ध और खुफिया कार्यों में अहम भूमिका निभाते हैं।

रक्षा सौदों में पारदर्शिता  

मोदी सरकार ने रक्षा खरीद प्रक्रिया को पारदर्शी और तेज़ बनाने की दिशा में भी काम किया है। रक्षा मंत्रालय ने समयबद्ध तरीके से कॉन्ट्रैक्टों को अंतिम रूप दिया, जिससे सेना की तत्काल ज़रूरतों को पूरा किया जा सके। विदेशी खरीद के साथ-साथ, स्वदेशी उत्पादन पर जोर देकर भारत ने रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम बढ़ाए हैं।

साथ ही, भारत रक्षा क्षेत्र में अपनी क्षमताओं को और बढ़ाने के लिए कई परियोजनाओं पर काम कर रहा है। नौसेना के लिए और पनडुब्बियों और जहाज़ों की खरीद, वायुसेना के लिए अतिरिक्त लड़ाकू विमान, और सेना के लिए आधुनिक तोपखाने की योजनाएं प्रगति पर हैं। स्वदेशी ड्रोन और मिसाइल सिस्टम्स का विकास भी तेज़ी से हो रहा है।

स्वदेशी उत्पादन को बढ़ावा

मोदी सरकार ने न केवल विदेशी रक्षा सौदों पर जोर दिया बल्कि भारतीय कंपनियों को भी आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रोत्साहित किया। HAL, भारत फोर्ज, टाटा, DRDO, L&T जैसे संस्थानों को मेक इन इंडिया नीति के तहत बड़े रक्षा अनुबंध मिले।

HAL का तेजस प्रोग्राम, DRDO का आकाश और नाग मिसाइल, भारत फोर्ज की ATAGS तोप, BEL का रडार सिस्टम, और बीएई के साथ पार्टनरशिप में बनी M777 तोपें इसका उदाहरण हैं।

“मेक इन इंडिया” और “आत्मनिर्भर भारत” के तहत, सरकार ने स्वदेशी रक्षा उत्पादन को प्रोत्साहन दिया है। तेजस, प्रचंड, और आकाश जैसे सिस्टम्स इसका उदाहरण हैं। HAL, भारत फोर्ज, और टाटा जैसे स्वदेशी कंपनियों ने डिफेंस इक्विपमेंट्स के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। HAL, भारत फोर्ज, टाटा, DRDO, L&T जैसे संस्थानों को मेक इन इंडिया नीति के तहत बड़े डिफेंस कॉन्ट्रैक्ट भी दिए गए। साथ ही, विदेशी कंपनियों के साथ साझेदारी कर प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को बढ़ावा दिया गया है।

नई टेक्नोलॉजी पर फोकस

भारत अब ‘स्मार्ट युद्ध’ की ओर बढ़ रहा है। यानी ऐसे हथियार और प्लेटफॉर्म जो तेजी से निर्णय लें, कम संसाधनों में ज्यादा प्रभाव डालें, और तकनीक के बल पर दुश्मन को चौंका दें। इसके लिए स्मार्ट गोला-बारूद, रडार से जुड़ी सटीकता, एआई-एनेबल्ड ड्रोन्स, और साइबर युद्ध क्षमताओं पर काम किया जा रहा है।

रक्षा मंत्रालय ने समय के साथ ऑपरेशनल कमांड स्ट्रक्चर को भी अधिक फुर्तीला और जॉइंट बनाया है। तीनों सेनाओं में समन्वय बढ़ा है। तेज निर्णय, आधुनिक लॉजिस्टिक्स और सटीक इंटेलिजेंस के कारण भारत अब सीमित समय में सीमित संसाधनों के साथ अधिक प्रभावी सैन्य प्रतिक्रिया देने में सक्षम हो चुका है।

Pakistan air defence failure: गुस्से में पाकिस्तान, ब्रह्मोस के आगे फेल हुए चीनी एयर डिफेंस सिस्टम, चीन बोला- ब्रह्मोस को रोकने के लिए नहीं किया डिजाइन

रक्षा क्षेत्र में भारत की बढ़ती ताकत

पिछले 11 वर्षों में, भारत ने रक्षा क्षेत्र में न केवल अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाई है, बल्कि वैश्विक मंच पर भी अपनी स्थिति को मजबूत किया है। अत्याधुनिक उपकरणों की खरीद और स्वदेशी उत्पादन के संयोजन ने भारत को एक मज़बूत रक्षा शक्ति के रूप में स्थापित किया है। यह प्रयास न केवल सशस्त्र बलों को सशक्त बना रहा है, बल्कि भारत को रक्षा निर्यात के क्षेत्र में भी एक नई पहचान दे रहा है।

Pakistan UNSC CTC Co-Chair: पाकिस्तान को यूएन में एंटी टेररिज्म कमेटी का उपाध्यक्ष बनाने से क्या पड़ेगा असर? पढ़ें 5 पॉइंट्स में

Pakistan UNSC CTC Co-Chair: 5 Key Impacts on India
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Pakistan UNSC CTC Co-Chair: पहलगाम आतंकी हमले और ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान को हाल ही में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) की आतंकवाद-रोधी समिति के उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया है। पाकिस्तान इन नियुक्तियों को एक बड़ी जीत की तौर पर देखा जा रहा है। वहीं, यह भारत के लिए खासतौर पर चिंताजनक है, क्योंकि पाकिस्तान पर लंबे समय से आतंकवाद को बढ़ावा देने और आतंकी संगठनों को पनाह देने का आरोप है। भारत सालों से सीमा पार आतंकवाद का शिकार रहा है, और पाकिस्तान की यह नियुक्ति न सिर्फ कूटनीतिक चुनौती है, बल्कि देश की सुरक्षा के लिए भी खतरा है।

Pakistan UNSC CTC Co-Chair: शहबाज शरीफ ने जताया गर्व

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इस नियुक्ति को अपने देश के लिए गर्व का क्षण बताया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि यह नियुक्ति दर्शाती है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को पाकिस्तान की आतंकवाद-रोधी कोशिशों पर पूरा भरोसा है। शरीफ ने दावा किया कि पाकिस्तान आतंकवाद से सबसे ज्यादा प्रभावित देशों में से एक है, जहां इसने 90,000 से ज्यादा लोगों की जान ली और 150 अरब डॉलर से अधिक का आर्थिक नुकसान हुआ। उन्होंने कहा कि आतंकवाद से लड़ने में पाकिस्तान का बलिदान बेजोड़ है।


पाकिस्तान के उप-प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार, साथ ही पूर्व विदेश मंत्री हिना रब्बानी खर जैसे नेताओं ने भी ऐसी ही बातें कही हैं। वे इसे अपनी कूटनीतिक जीत बता रहे हैं। लेकिन भारत ने इस नियुक्ति को लेकर कड़ा ऐतराज जताया है, इसे आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक लड़ाई के लिए हानिकारक बताया है।

क्या है पाकिस्तान की नियुक्ति की पृष्ठभूमि?

पाकिस्तान फिलहाल संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) का दो साल के लिए अस्थायी सदस्य है, उसे हाल ही में इसकी दो अहम समितियों में जगह मिली है। उसे तालिबान प्रतिबंध समिति का अध्यक्ष और आतंकवाद-रोधी समिति का उपाध्यक्ष चुना गया है।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आतंकवाद-रोधी समिति (Counter-Terrorism Committee – CTC) का गठन 2001 में अमेरिका में हुए 9/11 आतंकी हमलों के बाद किया गया था। यह समिति आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक नियम बनाने, आतंकी संगठनों पर नजर रखने और देशों को आतंकवाद से लड़ने में मदद करने का काम करती है। इस समिति में उपाध्यक्ष की भूमिका बहुत अहम होती है, क्योंकि यह देशों को आतंकवाद से जुड़े नियमों और फैसलों को प्रभावित करने का मौका देती है। भारत ने कई बार संयुक्त राष्ट्र में सबूत दिए हैं कि पाकिस्तान आतंकवाद को समर्थन देता है। फिर भी, उसे यह पद मिलना चिंता का विषय है।

वहीं, पाकिस्तान को इस अहम पद पर नियुक्त करने के कई बड़े प्रभाव हो सकते हैं। इससे न केवल दुनिया में आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई प्रभावित होगी, बल्कि भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव को भी बढ़ा सकती है।

पाकिस्तान की छवि सुधारने की कोशिश

पाकिस्तान लंबे समय से आतंकवाद को समर्थन देने के लिए दुनिया की आलोचना झेल रहा है। इस नियुक्ति से उसे मौका मिलेगा कि वह खुद को आतंकवाद के खिलाफ लड़ने वाला देश दिखाए। यह एक तरह से उसकी छवि को चमकाने की कोशिश हो सकती है। वह यह दावा कर सकता है कि वह आतंकवाद से लड़ने में गंभीर है। हालांकि, भारत ने बार-बार सबूत दिए हैं कि पाकिस्तान आतंकी संगठनों जैसे लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद को संरक्षण देता है। भारतीय राजदूत अनुपमा सिंह ने विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक बैठक में कहा था कि इस नियुक्ति से पाकिस्तान को अपनी कथित “पीड़ित” छवि को और मजबूत करने का मौका मिल सकता है।

हाल ही में पहलगाम में हुए आतंकी हमले में अपनी संलिप्तता को लेकर पाकिस्तान इन हमलों पर पर्दा डाल सकता है या भारत के सबूतों को कमजोर कर सकता है। इससे भारत की आतंकवाद से लड़ाई कमजोर हो सकती है।

आतंकवाद-रोधी नियमों पर असर

यह समिति आतंकी संगठनों और लोगों को वैश्विक आतंकी सूची में डालने, आतंकवाद के लिए पैसे रोकने और देशों के बीच सहयोग बढ़ाने जैसे बड़े फैसले लेती है। पाकिस्तान इस पद का फायदा उठाकर इन फैसलों को अपने हित में मोड़ सकता है। उदाहरण के लिए, वह भारत के खिलाफ काम करने वाले आतंकी संगठनों पर कार्रवाई को कमजोर कर सकता है। पाकिस्तान भारत के खिलाफ सक्रिय आतंकी संगठनों पर कार्रवाई को कमजोर करने की कोशिश कर सकता है। इससे पहले भी पाकिस्तान ने चीन के समर्थन से UNSC की प्रस्ताव संख्या 1267 के तहत आतंकियों को सूचीबद्ध करने के प्रयासों को बार-बार बाधित किया है। अब उपाध्यक्ष के रूप में, उसका प्रभाव और बढ़ सकता है।

संयुक्त राष्ट्र की विश्वसनीयता पर उठे सवाल

इस नियुक्ति पर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं। एक देश, जिस पर आतंकवाद को बढ़ावा देने का आरोप है, उसे आतंकवाद-रोधी समिति में इतना बड़ा पद देना सही नहीं लगता। इससे यूएनएससी की साख पर सवाल उठ रहे हैं। यह उन देशों के लिए निराशा की बात है, जो आतंकवाद के खिलाफ मजबूत कार्रवाई चाहते हैं। इससे आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक लड़ाई कमजोर पड़ सकती है।

बढ़ सकता है भारत-पाक के बीच तनाव

पहलगाम हमले औऱ उसके बाद ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच पहले से ही रिश्ते तनावपूर्ण हैं। वहीं इस नियुक्ति के बाद पाकिस्तान यूएन में भारत के खिलाफ अपनी रणनीति धार दे सकता है। खासकर कश्मीर के मुद्दे पर, पाकिस्तान इस मंच का गलत इस्तेमाल कर सकता है और भारत को आतंकवाद के संदर्भ में बदनाम करने की कोशिश कर सकता है। भारत ने हमेशा कहा है कि कश्मीर उसका अभिन्न हिस्सा है, लेकिन पाकिस्तान इस मंच का इस्तेमाल अपनी कहानी को बढ़ावा देने के लिए कर सकता है।

पाकिस्तान हमेशा कश्मीर को यूएन जैसे मंचों पर उठाकर भारत को घेरने की कोशिश करता है। लेकिन इस नई भूमिका के साथ, वह कश्मीर को आतंकवाद से जोड़कर भारत को बदनाम कर सकता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है कि पहलगाम के बाद जब भारत ने पहलगाम हमले में शामिल टीआरएफ को लेकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में चर्चा के दौरान आतंकी लिस्ट में नाम शामिल करने की बात कही, तो चीन ने कथित तौर पर कुछ आतंकवादियों या संगठनों को सूचीबद्ध करने से रोकने की कोशिश की।

पहले भी, पाकिस्तान और चीन ने मिलकर यूएन की आतंकी सूची में आतंकियों को शामिल करने के प्रयासों को रोका है। अब इस पद के साथ, वह इसे और आसानी से कर सकता है। इससे भारत के खिलाफ सक्रिय आतंकी संगठनों पर वैश्विक कार्रवाई मुश्किल हो सकती है।

भारत की कूटनीति पर असर

भारत ने संयुक्त राष्ट्र और अन्य वैश्विक मंचों पर पाकिस्तान के आतंकवाद समर्थन को बेनकाब करने में काफी मेहनत की है। भारतीय राजनयिकों, पर्वतनेनी हरीश और अनुपमा सिंह ने बार-बार पाकिस्तान की नीतियों की आलोचना की है। लेकिन इस नियुक्ति से भारत के इन प्रयासों को झटका लग सकता है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह भारत की कूटनीतिक विफलता का प्रतीक हो सकता है, क्योंकि पाकिस्तान को इतना महत्वपूर्ण पद हासिल करने से रोकने में भारत नाकाम रहा।

हाल ही में भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ने के बाद, भारतीय सांसदों के सात शिष्टमंडलों ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) के सदस्य देशों का दौरा किया। इनमें से एक शिष्टमंडल का नेतृत्व कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने किया। शशि थरूर का कहना है, “यूएनएससी में कई आतंकवाद-रोधी समितियां हैं, और सदस्य देशों को बारी-बारी से इनकी जिम्मेदारी मिलती है। पाकिस्तान को उसकी सदस्यता के कारण यह भूमिका मिली है। लेकिन भारत का यूएन मिशन पाकिस्तान की हर गतिविधि पर कड़ी नजर रखेगा।”

Post Operation Sindoor: ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान ने नहीं, तो किसने लड़ी जंग? पहलगाम हमले के पीछे आसिम मुनीर नहीं तो कौन है मास्टरमाइंड?

इस नियुक्ति को भारत की कूटनीतिक हार के रूप में देखा जा रहा है। कुछ विशेषज्ञ कह रहे हैं कि भारत पाकिस्तान को यह पद लेने से रोकने में नाकाम रहा। इससे भारत की वैश्विक छवि पर असर पड़ सकता है।

Epstein Files: क्या हैं एपस्टीन फाइल्स? जिसे लेकर मस्क और ट्रंप की दोस्ती दुश्मनी में बदल गई? जानें Bromance से Breakup तक का सफर

Epstein Files: What Sparked the Musk-Trump Feud? From Bromance to Breakup Explained
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Epstein Files: चाणक्य नीति कहती है, “मित्र जब भरोसा तोड़े, तो वह शत्रु से भी अधिक हानिकारक होता है।” कुछ ऐसा ही इन दिनों दुनिया के दो सबसे चर्चित और प्रभावशाली चेहरों अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और दुनिया के सबसे अमीर शख्स एलन मस्क के बीच देखने को मिल रहा है। दोनों के बीच की यह ‘ब्रोमांस’ पिछले 10 महीनों से सुर्खियों में थी, लेकिन अब यह रिश्ता एक कड़वे झगड़े में बदल गया है। दोनों ने एक-दूसरे पर तीखे हमले किए हैं, और इस विवाद का केंद्र बनी हैं ‘एपस्टीन फाइल्स’ (Epstein Files)। आखिर क्या हैं ये फाइल्स, और और क्यों मस्क और ट्रंप की दोस्ती दुश्मनी में बदल गई?

Epstein Files: Bromance to Breakup: ट्रंप-मस्क की टूटी दोस्ती

साल 2024 में अमेरिका में हुए राष्ट्रपति चुनाव में एलन मस्क ने ट्रंप का खुला समर्थन किया था। इतना ही नहीं, उन्होंने ट्रंप के प्रचार में 200 मिलियन डॉलर भी खर्च किए थे। चुनाव जीतने के बाद ट्रंप ने मस्क को ‘Department of Government Efficiency (DOGE)’ का प्रमुख बनाया। इसके बाद मस्क व्हाइट हाउस की बैठकों से लेकर एयरफोर्स वन की उड़ानों तक, ट्रंप के साथ मौजूद दिखे।

मस्क ने DOGE के तहत कई बड़े फैसले लिए, जिनमें 10,000 से ज्यादा सरकारी कर्मचारियों की छंटनी और कई एजेंसियों, जैसे यूनाइटेड स्टेट्स एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट (USAID) में भारी कटौती शामिल थी। इन फैसलों की वजह से मस्क की आलोचना भी हुई, लेकिन ट्रंप ने हमेशा उनका साथ दिया।

मार्च में ट्रंप ने कांग्रेस के एक संयुक्त सत्र में मस्क की तारीफ करते हुए कहा, “एलन, तुम बहुत मेहनत कर रहे हो। तुम्हें इसकी जरूरत नहीं थी, लेकिन हम तुम्हारे काम की कद्र करते हैं।” इसके बाद ट्रंप ने व्हाइट हाउस के साउथ लॉन पर टेस्ला की गाड़ियों का एक शोकेस भी आयोजित किया, जहां उन्होंने मस्क की कंपनी का प्रचार किया। ट्रंप ने कहा, “मैं चाहता हूं कि लोग जानें कि देशभक्ति की सजा नहीं मिलनी चाहिए।” इस दौरान ट्रंप ने यह भी बताया कि उन्होंने खुद एक टेस्ला कार खरीदी है।

लेकिन 31 मई को मस्क ने DOGE से इस्तीफा दे दिया। इस मौके पर ट्रंप ने उन्हें व्हाइट हाउस का प्रतीक चिन्ह लगा एक सुनहरी चाबी भेंट की, जो उन्होंने कहा कि वह केवल “खास लोगों” को देते हैं।

दोस्ती में आनी शुरू हुई दरार

राजनीति में एक कहावत मशहूर है- न कोई स्थायी दोस्त होता है, न दुश्मन, सिर्फ हित स्थायी होते हैं। ट्रंप और मस्क की दोस्ती में भी यही दिखा। मस्क के DOGE छोड़ने के कुछ दिन पहले ही ट्रंप का एक महत्वाकांक्षी विधेयक, जिसे ‘वन बिग ब्यूटीफुल बिल एक्ट’ कहा गया, उस पर विवाद शुरू हुआ। मस्क ने एक इंटरव्यू में इस बिल की आलोचना करते हुए कहा कि यह बिल देश के बजट घाटे को और बढ़ाएगा, जो DOGE के मिशन के खिलाफ है।

3 जून को मस्क ने अपनी बात को और सख्ती से रखा। उन्होंने X पर कई पोस्ट किए, जिसमें उन्होंने बिल को “घिनौना” और “अनैतिक” बताया। मस्क ने लिखा, “इस बिल को रात के अंधेरे में इतनी जल्दबाजी में पास किया गया कि कांग्रेस के ज्यादातर सदस्य इसे पढ़ भी नहीं पाए।” उन्होंने अपने फॉलोअर्स से अपील की कि वे कांग्रेस के सदस्यों को फोन करके इस बिल को रद्द करने की मांग करें। उन्होंने इसे ‘disgusting abomination’ कहा।

Epstein Files की हुई एंट्री

मामला तब और गर्म हो गया जब मस्क ने ट्रंप पर व्यक्तिगत हमला बोला। इस पूरे विवाद में सबसे बड़ा धमाका तब हुआ जब मस्क ने ट्रंप पर Jeffrey Epstein से जुड़े होने का आरोप लगाया। 5 जून को मस्क ने X पर लिखा, “अब असली बम फोड़ने का वक्त है: @realDonaldTrump का नाम एपीस्टीन फाइल्स (Epstein Files) में हैं। यही वजह है कि इन्हें सार्वजनिक नहीं किया गया। गुड डे, DJT!”

मस्क (Epstein Files) के इन सनसनीखेज आरोपों ने पूरे अमेरिका में हलचल मचा दी। जेफरी एप्सटीन एक कुख्यात अमेरिकी फाइनेंसर और सेक्स ऑफेंडर थे, जिन्हें 2019 में जेल में रहस्यमयी परिस्थितियों में मृत पाया गया था। एप्सटीन पर नाबालिग लड़कियों के यौन शोषण और मानव तस्करी के गंभीर आरोप थे। 2008 में, उन्होंने फ्लोरिडा में वेश्यावृत्ति से संबंधित आरोपों को स्वीकार करते हुए 13 महीने की सजा भी काटी। लेकिन 2019 में, न्यूयॉर्क में उन पर फिर से सेक्स ट्रैफिकिंग के आरोप लगे। उसी साल, जेल में उनकी रहस्यमयी मौत हो गई, जिसे आधिकारिक तौर पर आत्महत्या बताया गया।

उनकी फाइल्स (Epstein Files) में कई बड़े नामों के शामिल होने की बात सामने आई थी, जिनमें राजनेता, व्यापारी और अन्य प्रभावशाली लोग शामिल थे। इन फाइल्स को अभी तक पूरी तरह से सार्वजनिक नहीं किया गया है, जिसके चलते कई तरह की अटकलें लगाई जाती रही हैं। मस्क का दावा है कि ट्रंप का नाम भी इन फाइलों में है और इसलिए यह डेटा सार्वजनिक नहीं किया जा रहा।

कहा जाता है कि एपस्टीन फाइल्स (Epstein Files) में कई लीगल डॉक्यूमेंट्स हैं। इनमें एप्सटीन के निजी जेट, जिसे “लोलिता एक्सप्रेस” के नाम से जाना जाता है, उनकी यात्रा के रिकॉर्ड भी हैं। इनमें उन लोगों के नाम हैं जो उनके साथ यात्रा करते थे। इसके अलावा एप्सटीन का “लिटिल ब्लैक बुक” या कॉन्टैक्ट लिस्ट, जिसमें कई प्रभावशाली लोगों जैसे पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन, डोनाल्ड ट्रंप, ब्रिटेन के प्रिंस एंड्रयू, और अन्य के नाम शामिल हैं। इसके अलावा सबूतों में एप्सटीन की संपत्तियों (न्यूयॉर्क और यूएस वर्जिन आइलैंड्स) से जब्त की गई वस्तुओं की सूची, जैसे नग्न तस्वीरों वाली सीडी, मसाज टेबल, और सेक्स टॉयज भी हैं।

इन फाइल्स में 250 से अधिक नाबालिग लड़कियों के यौन शोषण से जुड़े दावे शामिल हैं, जिन्हें एप्सटीन ने अपने न्यूयॉर्क, फ्लोरिडा और यूएस वर्जिन आइलैंड्स के घरों में कथित तौर पर शोषित किया।

28 फरवरी, 2025 को, अमेरिकी न्याय विभाग ने अटॉर्नी जनरल पाम बॉन्डी के नेतृत्व में “एप्सटीन फाइल्स: फेज 1” के तहत करीब 200 पेज के दस्तावेज जारी किए। इनमें फ्लाइट लॉग्स, एक भारी रेडैक्टेड कॉन्टैक्ट बुक, और एक साक्ष्य सूची शामिल थी। लेकिन ये दस्तावेज ज्यादातर पहले से सार्वजनिक जानकारी पर आधारित थे और इनमें कोई नया सनसनीखेज खुलासा नहीं था। पाम बॉन्डी ने दावा किया कि न्यूयॉर्क में एफबीआई फील्ड ऑफिस ने हजारों पेज के दस्तावेज छिपाए हैं, और उन्होंने एफबीआई निदेशक काश पटेल को इन सभी दस्तावेजों को 28 फरवरी, 2025 की सुबह 8 बजे तक सौंपने का आदेश दिया। बॉन्डी ने यह भी कहा कि पीड़ितों की पहचान की रक्षा के लिए कुछ जानकारी रेडैक्ट की जाएगी।

हालांकि, यह सच है कि ट्रंप का नाम एप्सटीन (Epstein Files) के फ्लाइट लॉग्स में कई बार आया है। रिकॉर्ड्स के अनुसार, ट्रंप ने 1990 के दशक में एप्सटीन के निजी जेट में कम से कम सात बार यात्रा की थी, जिसमें 1995 में उनके बेटे एरिक ट्रंप और 1994 में तत्कालीन पत्नी मारला मैपल्स और बेटी टिफनी ट्रंप के साथ उड़ानें शामिल थीं। लेकिन इन दस्तावेजों में ट्रंप पर कोई आपराधिक गतिविधि का आरोप नहीं है। ट्रंप ने कहा था कि उन्होंने 2004 में एक रियल एस्टेट विवाद के बाद एप्सटीन से संबंध तोड़ लिए थे और उसे अपने मार-ए-लागो क्लब से प्रतिबंधित कर दिया था। 2019 में, ट्रंप ने कहा कि वह एप्सटीन के “फैन” नहीं थे और पिछले 15 सालों से उनसे बात नहीं की थी।

आरोपों के बाद ट्रंप ने किया पलटवार

वहीं, ट्रंप ने भी पलटवार कर मस्क को धमकी दी। ट्रंप ने X पर लिखा, “एलन मेरे लिए बोझ बन रहा था। मैंने उसे DOGE से हटाया, और उसने मेरे इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) मैंडेट को खत्म करने के फैसले पर बवाल मचाया।” ट्रंप ने दावा किया कि मस्क को पहले से पता था कि वह EV मैंडेट को खत्म करने वाले हैं, और यह उनकी नाराजगी की असली वजह है।

ट्रंप ने यह भी कहा कि मस्क की मदद के बिना भी वह 2024 का चुनाव जीत सकते थे, खासकर पेन्सिलवेनिया जैसे महत्वपूर्ण राज्य में। उन्होंने मस्क पर “थैंकलेस” का आरोप लगाया। ट्रंप ने कहा, अगर उन्होंने सरकार की आलोचना बंद नहीं की, तो उनकी कंपनियों Tesla और SpaceX के सभी कॉन्ट्रैक्ट्स रद्द कर दिए जाएंगे।

जब एक यूजर ने कहा कि इससे NASA के प्रोजेक्ट्स जैसे इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर असर पड़ेगा, तो मस्क ने इसका जवाब और तल्खी से दिया। उन्होंने ट्रंप पर इम्पीचमेंट की मांग की और लिखा, “मेरे बिना ट्रंप चुनाव हार जाते।” मस्क ने यह भी कहा कि अगर ट्रंप उनकी कंपनियों के कॉन्ट्रैक्ट्स रद्द करेंगे, तो यह अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) के लिए खतरा बन सकता है। उन्होंने ट्रंप को चुनौती देते हुए लिखा, “Go ahead, make my day.”

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क्या खत्म हो गई दोस्ती?

ट्रंप पहले भी अपने सहयोगियों से झगड़ा कर बाद में मेल-मिलाप करते रहे हैं। लेकिन एलन मस्क जैसे हाई-प्रोफाइल व्यक्ति से इतनी बड़ी लड़ाई पहली बार हुई है। दूसरी तरफ मस्क ने यह तक कह दिया कि अब अमेरिका में एक नया राजनीतिक दल बनना चाहिए जो आम लोगों की बात करे। उन्होंने X पर एक पोल शुरू किया, जिसमें पूछा, “क्या अमेरिका में एक नई राजनीतिक पार्टी बनानी चाहिए, जो 80 फीसदी मध्यमार्गी लोगों का प्रतिनिधित्व करे?”

Post Operation Sindoor: ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान ने नहीं, तो किसने लड़ी जंग? पहलगाम हमले के पीछे आसिम मुनीर नहीं तो कौन है मास्टरमाइंड?

Post Operation Sindoor: China’s Shadow War with India Exposed Through Pakistan’s Proxy Role
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Post Operation Sindoor: ऑपरेशन सिंदूर में आतंक के खिलाफ भारत ने जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाते हुए पाकिस्तान में मौजूद आतंकी ठिकानों को ध्वस्त किया। जिसके बाद पाकिस्तान ने भारत की पश्चिमी सीमा पर कई जगहों पर ड्रोन अटैक किए। ये ड्रोन अटैक राजस्थान से लेकर लद्दाख तक में किए गए। 6-7 मई से 10 मई 2025 तक चले इस संघर्ष में भारत ने पाकिस्तान को करारा जवाब दिया और पाकिस्तान के कई स्ट्रैटेजिक एयरबेसों को निशाना बनाया। वहीं, अब जो जानकारी सामने आ रही है, उससे लगता है कि इस जंग में पाकिस्तान अकेला नहीं था। बल्कि चीन ने पाकिस्तान को हर कदम पर मदद दी और यह भी अंदेशा लगाया जा रहा है कि पहलगाम हमले के पीछे भी चीन का ही हाथ था। भले ही लड़ाई पाकिस्तानी सेना लड़ रही थी लेकिन पर्दे के पीछे असली रिमोट चीन के पास था। चीन ने न केवल हथियार, खुफिया जानकारी, सैटेलाइट से निगरानी, साइबर वॉर में मदद की बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी पाकिस्तान को कूटनीतिक सहारा दिया।

Post Operation Sindoor: ऑपरेशन सिंदूर: कैसे शुरू हुई यह जंग?

22 अप्रैल 2025 को, जब कश्मीर के पहलगाम में एक बड़ा आतंकी हमला हुआ। इस हमले में 26 लोग मारे गए, जिनमें ज्यादातर पर्यटक थे। हमले की जिम्मेदारी द रेजिस्टेंस फ्रंट (TRF) ने ली, जो पाकिस्तानी आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा का एक हिस्सा है। भारत ने इस हमले को बहुत गंभीरता से लिया और 6-7 मई को ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया। इस ऑपरेशन में भारत ने पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में 9 जगहों पर आतंकी ठिकानों को नष्ट किया। भारत ने अपने राफेल, सुखोई-30 MKI, मिग-29 और मिराज 2000 जैसे फाइटर जेट्स का इस्तेमाल किया। इन जेट्स ने ब्रह्मोस मिसाइलें, SCALP क्रूज़ मिसाइलें और हारोप ड्रोन जैसे हथियारों से हमले किए।

दूसरी तरफ, पाकिस्तान ने अपने JF-17 और J-10C जेट्स से जवाबी हमले किए, जिसमें उसने चीन की बनी PL-15E मिसाइलें और CM-401 हाइपरसोनिक मिसाइलें दागीं।

पहलगाम हमले के पीछे चीन का हाथ?

पाकिस्तान के एक पूर्व सैन्य अधिकारी आदिल राजा ने खुलासा किया है कि पहलगाम हमला पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर ने चीन के इशारे पर करवाया था। आदिल राजा ने कहा कि चीन ने मुनीर को इस हमले का आदेश दिया, ताकि भारत पर दबाव बनाया जा सके। पहलगाम में हमले के बाद एक प्रतिबंधित हुवावे कंपनी के सैटेलाइट फोन का सुराग मिला था, जो चीन के Beidou नेविगेशन सिस्टम से जुड़ा था। इसका मतलब है कि पाकिस्तानी सेना और आतंकियों को चीन की सीधी मदद मिल रही थी।

चीन के हथियारों का हुआ इस्तेमाल

पाकिस्तान ने इस जंग में चीन के हथियारों और ड्रोनों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान के 81 फीसदी हथियार चीन से आते हैं। इस जंग में पाकिस्तान ने PL-15E मिसाइलें दागीं, जो पंजाब के होशियारपुर में बिना टारगेट को हिट किए गिर गईं। JF-17 जेट्स ने CM-401 हाइपरसोनिक मिसाइलें दागीं, जो भारत के एयर डिफेंस का निशाना बन गईं। पाकिस्तान ने चीन के CH-4 ड्रोन भी इस्तेमाल किए, लेकिन भारत के S-400 एयर डिफेंस सिस्टम ने इन्हें आसानी से नष्ट कर दिया।

चीन ने दी सैटेलाइट और खुफिया जानकारी

चीन ने पाकिस्तान को 5 सैटेलाइट्स की मदद दी, ताकि वह भारतीय सेना की गतिविधियों पर नजर रख सके। रिपोर्ट्स के मुताबिक, चीन ने पाकिस्तान को रियल-टाइम खुफिया जानकारी दी और जमीनी व हवाई ऑपरेशनों में मदद की। चीन ने सैटेलाइट कवरेज को भारत की ओर इस तरह से एडजस्ट किया ताकि पाकिस्तान को ऑपरेशनल एडवांटेज मिल सके।

सेंटर फॉर जॉइंट वारफेयर स्टडीज़ – CENJOWS के डायरेक्टर रिटायर्ड मेजर जनरल डॉ. अशोक कुमार ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान चीन की भूमिका पर कहा था, “चीन ने पाकिस्तान की मदद की ताकि वे अपने एयर डिफेंस रडार को दोबारा तैनात कर सकें और सैटेलाइट कवरेज को इस तरह एडजस्ट कर सकें कि भारत की ओर से होने वाली किसी भी हवाई गतिविधि की उन्हें पहले से जानकारी मिल जाए।”

उन्होंने यह भी खुलासा किया था, “इस युद्ध में चीन की मदद सिर्फ लॉजिस्टिक सपोर्ट तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह रणनीतिक स्तर पर भी थी। चीन ने अपने डिफेंस सिस्टम्स को भारत के खिलाफ असली युद्ध में टेस्ट करने का मौका देखा और उसी उद्देश्य से पाकिस्तान को एडवाइस, टेक्नोलॉजी और सैटेलाइट इंटेलिजेंस उपलब्ध कराई।” मेजर जनरल डॉ. अशोक कुमार के मुताबिक, “हम अब अपनी हर मिलिट्री स्ट्रेटेजी में दो फ्रंट को ध्यान में रखते हैं, चीन के पास जो भी सिस्टम या हथियार हैं, उसे मान लेना चाहिए कि कल वे पाकिस्तान के पास होंगे।” कुल मिला कर माना जाए कि चीन और पाकिस्तान के संबंध इतने घनिष्ठ हो चुके हैं कि भारत को अब हर संभावित हमले में दोनों को एक साथ सोचकर तैयारी करनी होगी।

चीन ने फैलाया प्रोपेगंडा

चीन ने इस जंग में इन्फॉर्मेशन वॉरफेयर भी शुरू किया। कॉग्निटिव वॉरफेयर स्ट्रेटेजी में दुश्मन लोगों के दिमाग को प्रभावित करके उनके खिलाफ झूठी कहानियां फैलाता है। चीन ने सोशल मीडिया और मीडिया के जरिए भारत को बदनाम करने की कोशिश की। चीनी मीडिया ने पाकिस्तान का साथ देते हुए पहलगाम हमले में उसकी भूमिका को नकारा और इसे भारत का “फॉल्स फ्लैग ऑपरेशन” बताया। चीनी सोशल मीडिया पर ऐसी खबरें फैलाई गईं कि पाकिस्तान ने भारत के राफेल जेट्स को मार गिराया, जो सच नहीं था। चीनी ब्लॉगर्स और “वूमाओ सैनिकों” (5 सेंट आर्मी), जो पैसे लेकर प्रचार करते हैं) ने पाकिस्तान की मदद की और भारत को इस तरह से पेश किया कि जैसे वह हमलावर है। ये लोग पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज पब्लिक रिलेशंस (ISPR) से सीधे जानकारी ले रहे थे।

संयुक्त राष्ट्र में चीन का समर्थन

चीन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में भी पाकिस्तान का साथ दिया। उसने तुर्की और बांग्लादेश के साथ मिलकर UNSC की काउंटर-टेररिज्म कमेटी 1267 में पहलगाम हमले की जिम्मेदार TRF (The Resistance Force) को बचाने की भी कोशिश की। इससे साफ है कि चीन हर मंच पर पाकिस्तान को बचाने की कोशिश कर रहा था।

भारत की जीत, चीन-पाकिस्तान की हार

चीन की सारी मदद के बावजूद, ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान हार गया। भारत ने न केवल 9 आतंकी ठिकानों को नष्ट किया, बल्कि पाकिस्तान की सेना को भी भारी नुकसान भी पहुंचाया। भारतीय वायुसेना ने 6 पाकिस्तानी फाइटर जेट्स, 2 हाई-वैल्यू सर्विलांस विमान, और एक C-130 मिलिट्री ट्रांसपोर्ट एय़रक्राफ्ट को भी नष्ट कर दिया। इसके अलावा, 10 से ज्यादा आर्म्ड ड्रोन, कई क्रूज़ मिसाइलें, और रडार साइट्स को भी निशाना बनाया। चीन के HQ-9B और HQ-16 एय़र डिफेंस सिस्टम भारत की मिसाइलों के सामने टिक नहीं पाए।

पाकिस्तान ने कहा कि भारत ने 19 जगहों पर हमला किया, जबकि भारत का दावा है कि उसने सिर्फ 11 जगहों को निशाना बनाया। शायद पाकिस्तान खुद को पीड़ित दिखाने के लिए ऐसा कह रहा है।

चीन की हकीकत सामने आई

यह पहली बार था जब चीन की हथियार प्रणालियों का असली जंग में टेस्ट हुआ। चीन की PL-15E मिसाइलें, CM-401 हाइपरसोनिक मिसाइलें, और HQ-9B सिस्टम सब नाकाम रहे। इससे सवाल उठ रहे हैं कि क्या चीन की तकनीक असली जंग में काम कर सकती है? यह चीन के हथियार निर्यात के लिए भी झटका है, क्योंकि अब दूसरे देश उस पर भरोसा करने से पहले दो बार सोचेंगे।

पाकिस्तान को क्यों इस्तेमाल कर रहा है चीन?

चीन पाकिस्तान को एक रणनीतिक मोहरे के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है। इसका मकसद है भारत को दबाव में रखना, ताकि चीन अपनी क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाएं पूरी कर सके। चीन, पाकिस्तान को अपने हितों के लिए इस्तेमाल कर रहा है। इसके पीछे कई कारण हैं। चीन, भारत को अपनी राह का रोड़ा मानता है। वह पाकिस्तान का इस्तेमाल करके भारत पर दबाव बनाना चाहता है। भारत की आर्थिक तरक्की और चीन से कई कंपनियों का भारत आना उसे परेशान कर रहा है।

वहीं, पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति चीन के लिए बहुत अहम है। यह चीन को हिंद महासागर तक पहुंच देता है, जिससे वह मलक्का स्ट्रेट की समस्या से बच सकता है। पाकिस्तान, चीन के “स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स” रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत वह भारत को घेरना चाहता है।

इसके अलावा, भारत में मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स का बढ़ना और चीन की अर्थव्यवस्था का कमज़ोर होना भी एक वजह है। चीन नहीं चाहता कि भारत निवेश के लिए एक सुरक्षित जगह बने, इसलिए उसने पाकिस्तान से आतंकी हमले करवाए।

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चीन की मदद के बावजूद, पाकिस्तान ने इस 4 दिनों की छोटी सी जंग में मुंह की खाई। भारत की स्वदेशी ब्रह्मोस मिसाइल और S-400 सिस्टम के आगे चीन के हथियार कमजोर साबित हुए। भारत ने साफ कर दिया कि वह किसी भी आतंकी हमले का मज़बूत जवाब देगा और आतंकियों व उनके समर्थक देशों में फर्क नहीं करेगा। भारत ने यह भी कहा कि वह परमाणु हथियारों के डर को स्वीकार नहीं करेगा।

Explained: यूक्रेन का Operation Spider Web क्यों है भारत के लिए बड़ा सबक? पढ़ें ‘ट्रोजन हॉर्स’ अटैक की पूरी कहानी

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Operation Spider Web: यूक्रेन और रूस के बीच पिछले तीन साल तीन महीने से युद्ध चल रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध की शुरुआत 24 फरवरी 2022 को हुई थी, जब रूस ने यूक्रेन पर बड़े पैमाने पर हमला शुरू किया। हालांकि दोनों देशों के बीच तनाव 2014 से ही चल रहा था, जब रूस ने क्रीमिया पर कब्जा कर लिया था और डोनबास क्षेत्र में संघर्ष शुरू हुआ था। कुल मिला कर दोनों के बीच पिछले 11 साल से तनाव जारी है। शांति विराम को लेकर दोनों पक्षों के बीच 2025 में अब तक दो प्रत्यक्ष (16 मई और 2 जून) बैठकें हो चुकी हैं। लेकिन युद्ध बंद करने को लेकर कोई ठोस नतीजा नहीं निकला। वहीं, दो जून की बैठक से ठीक पहले यूक्रेन ने रूस में ड्रोन से एक बड़ा हमला किया, जिसमें रूस के लगभग 41 स्ट्रैटेजिक बॉम्बर्स को खड़े-खड़े नष्ट कर दिया। इसे नाम दिया गया ऑपरेशन स्पाइडर वेब। इस ऑपरेशन ने न केवल रूस की सैन्य ताकत को बड़ा झटका दिया, बल्कि यह भी दिखाया कि आधुनिक युद्ध में छोटी और सस्ती तकनीकें कितनी प्रभावी हो सकती हैं। आइए, समझते हैं कि कैसे यूक्रेन ने रूस के एक तिहाई स्ट्रैटेजिक बॉम्बर विमानों को निशाना बनाया।

क्या था Operation Spider Web?

ऑपरेशन स्पाइडर वेब (Operation Spider Web) यूक्रेन की एक ऐसी सैन्य रणनीति थी, जिसमें छोटे-छोटे ड्रोन का इस्तेमाल करके रूस के सैन्य ठिकानों पर हमला किया गया। ये ड्रोन इतने छोटे और सस्ते थे कि इन्हें आसानी से छिपाया जा सकता था, लेकिन इनकी ताकत इतनी थी कि ये रूस के बड़े-बड़े स्ट्रैटेजिक बॉम्बर विमानों को नष्ट करने में सक्षम थे। अनुमान के मुताबिक एक ड्रोन की कीमत करीब 50000 रुपये है। यूक्रेन ने अपने 40,000 ड्रोन सैनिकों में से कुछ को इस मिशन के लिए चुना।

इस ऑपरेशन की सबसे खास बात यह थी कि इन ड्रोनों को रूस की सीमा के अंदर छिपाकर ले जाया गया और फिर वहां से हमला किया गया। यहां कि फ्रंटलाइन से 4000 किमी दूर साइबेरिया में मौजूद रूसी एयरबेस पर भी जहाजों को निशाना बनाया।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, यूक्रेन ने दावा किया कि इस हमले में रूस के 117 ड्रोन और 117 ऑपरेटर शामिल थे, जिन्होंने मिलकर 41 रूसी विमानों को तबाह कर दिया। इससे रूस के रणनीतिक बमवर्षकों के बेड़े का लगभग एक-तिहाई हिस्सा नष्ट हो गया। इन सैनिकों ने रूस की सीमा में घुसकर ड्रोनों को छिपाने और लॉन्च करने का काम किया। इस ऑपरेशन में यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर ज़ेलेंस्की ने भी अहम भूमिका निभाई। उन्होंने कहा, “यह हमारी सबसे बड़ी सफलता है। हमने दिखा दिया कि छोटे हथियार भी बड़े नुकसान पहुंचा सकते हैं।”

ऑपरेशन का पहला चरण: ड्रोनों को रूस में भेजना

ऑपरेशन (Operation Spider Web) की शुरुआत यूक्रेन के सैनिकों ने रूस की सीमा में घुसकर की। इसके लिए यूक्रेन ने खास तरह के ड्रोन इस्तेमाल किए, जिन्हें फर्स्ट-पर्सन व्यू (FPV) ड्रोन कहा जाता है। ये ड्रोन कैमरे से लैस होते हैं, जिससे ऑपरेटर दूर बैठकर ड्रोन को कंट्रोल कर सकता है और सीधे निशाना साध सकता है। इन ड्रोनों को रूस की सीमा में ले जाने के लिए यूक्रेन ने ट्रकों का इस्तेमाल किया।

इन ट्रकों को रूस की सीमा के पास ले जाया गया, जहां से सैनिकों ने ड्रोनों को छिपाने का काम शुरू किया। ड्रोनों को रूस के सैन्य ठिकानों के पास जंगलों, गांवों और छोटे-छोटे घरों में छिपाया गया। इस काम में स्थानीय लोगों की मदद भी ली गई, जो रूस के खिलाफ थे और यूक्रेन का समर्थन कर रहे थे। एक बार ड्रोन छिप जाने के बाद, सैनिकों ने इन्हें मोबाइल नेटवर्क के जरिए कंट्रोल करने की तैयारी शुरू की।

ऑपरेशन का दूसरा चरण: हमले की तैयारी

ड्रोनों को छिपाने के बाद यूक्रेन के सैनिकों ने रूस के सैन्य ठिकानों की सही जानकारी जुटाई। इसके लिए सैटेलाइट तस्वीरों और जासूसी का सहारा लिया गया। रूस के जो स्ट्रैटेजिक बॉम्बर विमान इस ऑपरेशन के निशाने पर थे, वे मुख्य रूप से पांच हवाई ठिकानों पर मौजूद थे जिनमें मुरमांस्क, इवानोवो, रियाज़ान, अमूर और इरकुत्स्क शामिल थे।

इन ठिकानों पर रूस के 41 विमान मौजूद थे, जिनमें से ज्यादातर स्ट्रैटेजिक बॉम्बर थे। ये विमान लंबी दूरी तक मिसाइल दागने में सक्षम थे और यूक्रेन के लिए बड़ा खतरा थे। यूक्रेन की रणनीति थी कि इन विमानों को नष्ट करके रूस की हवाई ताकत को कमजोर किया जाए। ड्रोन हमले में रूस के 57 अरब डॉलर के सैन्य विमानों को नष्ट कर दिया गया। रिपोर्ट्स के मुताबिक रूस के जो 41 एयरक्राफ्ट नष्ट हुए उनमें ए-50 अर्ली वार्निंग प्लेंस, TU-23M3, TU-95 जैसे स्ट्रैटेजिक बॉम्बर्स भी थे। रूस के पास अब 100 से कम स्ट्रैटेजिक बॉम्बर्स बचे हैं। यह रूस के स्ट्रैटेजिक बॉम्बर बेड़े का 34% हिस्सा था।

ड्रोनों को इन ठिकानों तक पहुंचाने के लिए यूक्रेन ने रात का समय चुना। सैनिकों ने ट्रकों के जरिए ड्रोनों को ठिकानों के पास पहुंचाया और फिर वहां से ड्रोनों को लॉन्च किया। ड्रोन इतने छोटे थे कि रूस के रडार सिस्टम इन्हें पकड़ नहीं सके। जैसे ही ट्रक लक्ष्य के पास पहुंचे, उनकी छत खुली और ड्रोन बाहर निकलकर एक साथ एयरबेस पर टूट पड़े। इन हमलों में छोटे-छोटे FPV ड्रोन इस्तेमाल हुए, जिनकी कीमत मात्र 40,000 से 50,000 रुपये के बीच थी, लेकिन असर टैंक या मिसाइल जितना था।

ऑपरेशन का तीसरा चरण: हमला और नुकसान

जब ड्रोन रूस के हवाई ठिकानों तक पहुंचे, तो उन्होंने एक साथ हमला शुरू कर दिया। ये सभी ड्रोन विस्फोटकों से लैस थे, जो विमानों को नष्ट करने के लिए काफी थे। यूक्रेन के सैनिकों ने 117 ड्रोनों का इस्तेमाल किया, जिसमें से हर ड्रोन ने एक विमान को निशाना बनाया।

हमले में रूस के 41 विमानों को नुकसान पहुंचा, जिसमें से कई पूरी तरह से नष्ट हो गए। रूस की वायु सेना और सुरक्षा बल इस हमले से हैरान रह गए, क्योंकि उन्हें उम्मीद नहीं थी कि इतने छोटे ड्रोन इतना बड़ा नुकसान कर सकते हैं। इस हमले में रूस के एक तिहाई स्ट्रैटेजिक बॉम्बर विमानों को नुकसान पहुंचा, जो रूस के लिए एक बड़ा झटका था।

ऑपरेशन की सफलता के पीछे क्या था?

इस ऑपरेशन (Operation Spider Web) की सफलता के पीछे कई कारण थे। पहला, यूक्रेन ने सस्ते और छोटे ड्रोनों का इस्तेमाल किया, जिन्हें रूस के रडार सिस्टम पकड़ नहीं सके। दूसरा, यूक्रेन ने रूस की सीमा के अंदर अपनी जासूसी और स्थानीय लोगों की मदद से सही जानकारी जुटाई। तीसरा, इस ऑपरेशन में यूक्रेन के सैनिकों ने बहुत साहस और समझदारी दिखाई। इस हमले की खास बात यह थी कि ड्रोन ट्रकों के अंदर छिपाकर रूस के अंदर भेजे गए थे। ये ट्रक रूस में सामान्य नागरिक ट्रकों की तरह चलाए जा रहे थे। अंदर छिपे ड्रोन को मोबाइल नेटवर्क के जरिए ऑपरेटर कंट्रोल कर रहे थे।

यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की ने कहा, “यह ऑपरेशन (Operation Spider Web) हमारी तकनीक और साहस का प्रतीक है। हमने दिखा दिया कि युद्ध में ताकत ही सब कुछ नहीं होती, रणनीति भी बहुत मायने रखती है।”

रूस के नुकसान का आकलन

यूक्रेन के जासूसी विभाग SBU के प्रमुख ने कहा कि “रूसी विमानों को बम सहित नष्ट किया गया।” रूस की सेना ने माना कि उनके रडार सिस्टम और एयर डिफेंस सिस्टम छोटे ड्रोनों को पकड़ने में नाकाम रहा। रूस के रक्षा मंत्रालय ने कहा कि वे अपनी सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करेंगे और भविष्य में ऐसे हमलों को रोकने के लिए नए कदम उठाएंगे।

हालांकि, इस हमले से रूस को बड़ा नुकसान हुआ। रूस के स्ट्रैटेजिक बॉम्बर विमान लंबी दूरी तक हमला करने में सक्षम थे, और इनका नष्ट होना रूस की सैन्य ताकत के लिए एक बड़ा झटका था। विशेषज्ञों का कहना है कि रूस को इन विमानों को दोबारा बनाने में कई साल लग सकते हैं, क्योंकि ये विमान बहुत महंगे और जटिल होते हैं।

आधुनिक युद्ध में ड्रोन गेम-चेंजर

ऑपरेशन सिंदूर में (Operation Spider Web) जिस तरह से पाकिस्तान ने भारत पर हमला करने के लिए सस्ते ड्रोनों का इस्तेमाल किया औऱ जिस तरह से यूक्रेन ने रूस के बॉम्बर्स नष्ट किए, उसने यह साबित कर दिया कि आधुनिक युद्ध में ड्रोन एक गेम-चेंजर साबित हो सकते हैं। ये ड्रोन न केवल सस्ते होते हैं, बल्कि इन्हें कहीं भी छिपाकर हमला करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इस ऑपरेशन ने दुनिया भर की सेनाओं को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि वे अपनी सुरक्षा व्यवस्था को कैसे बेहतर करें।

सैन्य विशेषज्ञों का कहना है कि इस ऑपरेशन (Operation Spider Web) ने यह साफ कर दिया है कि आने वाले युद्धों में ड्रोन और ‘छल’ (Trojan Horse) जैसे हमले निर्णायक भूमिका निभाएंगे। यूक्रेन के इस प्रयोग ने युद्ध की परिभाषा ही बदल दी है। उनका कहना है कि भविष्य में ड्रोन युद्ध और बढ़ेगा। छोटे और सस्ते ड्रोन बड़े हथियारों को नष्ट करने में सक्षम होंगे, जिससे युद्ध की रणनीति पूरी तरह से बदल जाएगी। यूक्रेन ने इस ऑपरेशन के जरिए यह दिखा दिया कि तकनीक और रणनीति का सही इस्तेमाल किसी भी सेना को मजबूत बना सकता है, चाहे वह कितनी भी छोटी क्यों न हो।

भारत में ड्रोन टेक्नोलॉजी

भारत ने हाल के वर्षों में ड्रोन तकनीक पर काफी ध्यान दिया है। भारतीय सेना ने DRDO के जरिए स्वदेशी ड्रोन विकसित किए हैं, जैसे कि रुस्तम-2 और घटक। इसके अलावा, भारत ने इजरायल और अमेरिका से ड्रोन खरीदे हैं, जैसे कि हैरन और प्रेडेटर ड्रोन। 2023 में भारत ने ड्रोन नियमों को आसान बनाया, जिसके बाद निजी कंपनियां भी ड्रोन बनाने में सक्रिय हो गई हैं।

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हालांकि, भारत को अभी भी बड़े पैमाने पर ड्रोन ऑपरेशन और सस्ते FPV ड्रोनों के इस्तेमाल में काफी काम करने की जरूरत है। यूक्रेन का यह ऑपरेशन भारत को एक रोडमैप देता है कि कैसे सस्ते ड्रोन का इस्तेमाल बड़े दुश्मन के खिलाफ किया जा सकता है।

Russia Su-57E India offer: रूस का भारत को बड़ा ऑफर, Su-57E में लगा सकेंगे सुपर-30 वाले कॉन्फिगरेशन, पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर की कमी होगी पूरी

Su-57 fighter jet India
Su-57 Stealth Fighter

Russia Su-57E India offer: फाइटर जेट्स की कमी से जूझ रहे भारत को रूस ने अपनी पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ फाइटर जेट Su-57E देने का एक नया और आकर्षक प्रस्ताव सामने रखा है। इस बार रूस ने वादा किया है कि इस जेट में भारत की अपनी तकनीक और हथियार सिस्टम को शामिल किया जाएगा। रूस की सरकारी रक्षा कंपनी रोस्टेक के सूत्रों के मुताबिक, Su-57E में भारत के सुपर-30 जेट्स के लिए बनाई जा रही तकनीक, जैसे GaN-बेस्ड AESA रडार और भारत में बना मिशन कंप्यूटर, डाला जाएगा। इससे भारतीय वायुसेना (IAF) इस जेट में अपने स्वदेशी हथियार, जैसे एस्ट्रा मिसाइल और सटीक निशाने वाले हथियारों का इस्तेमाल कर सकेगी।

Russia Su-57E India offer: Su-57E और सुपर-30 का कनेक्शन

Su-57E का यह प्रस्ताव भारतीय वायुसेना के मौजूदा Su-30MKI जेट्स के अपग्रेड प्रोग्राम, जिसे सुपर-30 कहा जा रहा है, उससे जुड़ा है। सुपर-30 में GaN-बेस्ड एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड ऐरे (AESA) रडार और भारत में बनाए मिशन कंप्यूटर जैसे एडवांस सिस्टम लगाए जा रहे हैं। रूस ने कहा है कि Su-57E में भी यही तकनीक इस्तेमाल की जाएगी, ताकि दोनों जेट्स में समानता रहे। इससे न सिर्फ रखरखाव आसान होगा, बल्कि भारतीय वायुसेना को अपने हथियारों, जैसे एस्ट्रा मिसाइल और प्रेसिजन-गाइडेड हथियारों, को Su-57E में आसानी से इस्तेमाल करने में मदद मिलेगी।

रोस्टेक सूत्रों ने बताया, “Su-57E भारत के लिए एक ऐसा प्लेटफॉर्म हो सकता है, जिसमें सुपर-30 के लिए बनाए गए सिस्टम का इस्तेमाल हो। यह भारत की अपनी तकनीक को युद्ध के लिए तैयार करने में मदद करेगा, साथ ही पांचवीं पीढ़ी का फाइटर जेट भी देगा।” यह रणनीति भारत को एडवांस एवियोनिक्स और विपन सिस्टम को जोड़ने में मदद देगी, जो भविष्य में भारत के अपने प्रोग्राम, जैसे AMCA, के लिए फायदेमंद होगा।

HAL नासिक में होगा प्रोडक्शन

रूस ने Su-57E के प्रोडक्शन के लिए हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के नासिक प्लांट को चुना है। यह वही प्लांट है, जहां 220 से ज्यादा Su-30MKI जेट्स बनाए जा चुके हैं। नासिक में पहले से मशीनरी और इक्विपमेंट्स मौजूद होने से इसके बनाने में लागत भी कम आएगी। लेकिन, भारत की तकनीक को इस जेट में जोड़ने और इसे पूरी तरह तैयार करने में 3-4 साल का वक्त लग सकता है।

इस बीच, रूस ने तुरंत 20-30 Su-57E जेट्स देने का प्रस्ताव रखा है। इससे भारतीय वायुसेना को तुरंत पांचवीं पीढ़ी का जेट मिलेगा, जो उसकी मौजूदा कमी को पूरा करेगा। साथ ही, नासिक में प्रोडक्शन शुरू होने से भारत में नौकरियां बढ़ेंगी और एयरोस्पेस इंडस्ट्री को बढ़ावा मिलेगा, जिससे ‘आत्मनिर्भर भारत’ को बढ़ावा मिलेगा।

फाइटर जेट्स की कमी

भारतीय वायुसेना इस समय फाइटर जेट्स की कमी से जूझ रही है। पुराने मिग-21 जेट्स रिटायर हो रहे हैं, और स्वदेशी तेजस जेट की डिलीवरी में देरी हो रही है। वायुसेना को 42 स्क्वाड्रन चाहिए, लेकिन अभी केवल 31 हैं। दूसरी तरफ, चीन और पाकिस्तान अपनी हवाई ताकत बढ़ा रहे हैं। चीन का J-20 फाइटर जेट पहले से सर्विस में है, और पाकिस्तान 2029 तक J-31 हासिल करने की योजना बना रहा है।

ऐसे में Su-57E तुरंत एक फायदे का सौदा हो सकता है। यह जेट स्टील्थ (रडार से बचने की क्षमता), सुपरमैन्यूवरेबिलिटी (जेट की तेज गति और चपलता), और एडवांस रडार सिस्टम के साथ आता है। हालांकि, इसकी स्टील्थ क्षमता अमेरिका के F-35 से कम मानी जाती है, लेकिन यह हाइपरसोनिक हथियार ले जाने और 360-डिग्री थ्रस्ट वेक्टरिंग (जेट को किसी भी दिशा में तेजी से मोड़ने की क्षमता) जैसी खूबियों से लैस है। वहीं, जब तक भारत का अपना AMCA जेट तैयार नहीं हो जाता, यह भारतीय वायुसेना के लिए एक ताकतवर हथियार साबित हो सकता है।

AMCA की चुनौतियां

भारत का महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट, एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA), एक स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी का फाइटर जेट है। लेकिन इसका पहली टेस्ट उड़ान 2029 में होगी, और प्रोडक्शन 2034-35 से पहले शुरू नहीं होगा। इस लंबी समयसीमा के कारण भारतीय वायुसेना को एक अंतरिम जेट की जरूरत है, और Su-57E इस कमी को पूरा कर सकता है।

Su-57E की खासियतें

Su-57E एक ताकतवर फाइटर जेट है, जो अपनी खास विशेषताओं के लिए जाना जाता है। इसका स्टील्थ डिजाइन रडार से बचने की अच्छी क्षमता देता है, हालांकि यह अमेरिका के F-35 से थोड़ा कम है। इसकी 360-डिग्री थ्रस्ट वेक्टरिंग तकनीक सुपरमैन्यूवरेबिलिटी प्रदान करती है, जिससे यह हवा में तेजी से दिशा बदल सकता है। साथ ही, यह हाइपरसोनिक मिसाइलों और भारी हथियार ले जाने में सक्षम है। इसका GaN-बेस्ड AESA रडार दुश्मन के विमानों और मिसाइलों को दूर से ही पकड़ लेता है। भारत के अपने सिस्टम, जैसे एस्ट्रा मिसाइल और मिशन कंप्यूटर, इसे और ताकतवर बनाएंगे। सुपर-30 जेट्स के साथ समानता होने से रखरखाव और ट्रेनिंग भी आसान होगी।

Su-57E को लेकर यह हैं चुनौतियां

हालांकि रोस्टेक का यह प्रस्ताव आकर्षक है, लेकिन इसमें कुछ चुनौतियां भी हैं। पहली, भारत में Su-57E को पूरी तरह तैयार करने में 3-4 साल लगेंगे। इस दौरान वायुसेना को रूस से खरीदे गए जेट्स पर निर्भर रहना होगा। दूसरी, Su-57E की स्टील्थ क्षमता और इसके नए AL-51 इंजन की तैयारियों को लेकर कुछ सवाल हैं, क्योंकि यह इंजन अभी पूरी तरह डेवलप नहीं हुआ है।

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तीसरे इसके साथ भू-राजनीतिक जोखिम भी हैं। अमेरिका का CAATSA कानून रूस से हथियार खरीदने वाले देशों पर प्रतिबंध लगा सकता है, जो भारत के लिए समस्या बन सकता है। इसके अलावा, Su-30MKI प्रोग्राम में भारत को स्पेयर पार्ट्स और रखरखाव में कुछ दिक्कतें आई थीं, जो Su-57E डील में भी सामने आ सकती हैं। इन सब मुद्दों को हल करना होगा।

Explained: लद्दाख में क्यों तैनात की गई 72 Infantry Division? क्या है भारतीय सेना की चीन से निपटने की नई रणनीति

72 Infantry Division in Ladakh: India’s New Military Strategy to Counter China at the LAC – Explained

72 Infantry Division: भारतीय सेना अपने ऑर्डर ऑफ बैटल (ORBAT) में बड़ा बदलाव कर रही है। इसके लिए भारतीय सेना ने पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर लंबे समय तक सैन्य तैनाती के लिए एक नई डिवीजन 72 इन्फैंट्री डिवीजन (72 Infantry Division) बनाने का फैसला किया है। 72 इन्फैंट्री डिवीजन को लेह स्थित 14 फायर एंड फ्यूरी कॉर्प्स के तहत रखा जाएगा। इस कॉर्प्स को 1999 के कारगिल युद्ध के बाद बनाया गया था। यह कॉर्प्स सियाचिन से लेकर पूर्वी लद्दाख की सुरक्षा करती है।

भारतीय सेना 1999 के कारगिल युद्ध से पहले से ही पूर्वी लद्दाख के लिए एक अतिरिक्त डिवीजन मांग रही थी, लेकिन किसी भी सरकार (BJP या कांग्रेस) ने इस पर ध्यान नहीं दिया। माउंटेन स्ट्राइक कॉर्प्स बनाने को लेकर मंजूरी तो मिली, लेकिन बजट की कमी के कारण यह पूरी नहीं हुई। वहीं, 72 इन्फैंट्री डिवीजन उसी कॉर्प्स का हिस्सा है, जिसे अब नए इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप (IBG) के तहत बदला जा रहा है।

72 इन्फैंट्री डिवीजन को बनाने का फैसला 2017 में लिया गया था। उस समय इसे 17 माउंटेन स्ट्राइक कॉर्प्स (MSC) का हिस्सा बनाना था, जिसका मुख्यालय पानागढ़, पश्चिम बंगाल में है। लेकिन 2020 में गलवान घटना के बाद सेना ने अपनी रणनीति बदली। अब इस डिवीजन को 14 कॉर्प्स के तहत लद्दाख में तैनात किया जा रहा है। इसका मुख्यालय लेह में बनाया जा रहा है, जिसमें 25 अफसर, 30 जूनियर कमीशंड अफसर (JCOs) और 112 जवान होंगे।

72 Infantry Division में कोई नई भर्ती नहीं

72 इन्फैंट्री डिवीजन (72 Infantry Division) में 10,000 से 15,000 जवान होंगे। इसका नेतृत्व एक मेजर जनरल करेंगे। इस डिवीजन का गठन नए सैनिकों की भर्ती के बिना किया जा रहा है। इसके बजाय, सेना मौजूदा ब्रिगेड्स को फिर से संगठित कर रही है। 2020 के गलवान संघर्ष के बाद, सेना ने बरेली से 6 माउंटेन ब्रिगेड और मथुरा स्थित 1 स्ट्राइक कॉर्प्स के कुछ रिसोर्सेज को लद्दाख में ट्रांसफर किया था। इनमें आर्मर्ड व्हीकल्स, इन्फैंट्री फाइटिंग व्हीकल्स और सैनिक शामिल थे। अब इन यूनिट्स को 72 इन्फैंट्री डिवीजन में शामिल किया जाएगा।

इस डिवीजन में तीन से चार ब्रिगेड्स होंगी, जिनमें से प्रत्येक का नेतृत्व एक ब्रिगेडियर करेगा। इसका मुख्यालय पूर्वी लद्दाख में बनाया जा रहा है। एक ब्रिगेड मुख्यालय पहले ही काम शुरू कर चुका है, जबकि बाकी यूनिट्स पश्चिमी भारत में हाई एल्टीट्यूड वारफेयर की ट्रेनिंग ले रही हैं। यह डिवीजन 14 कॉर्प्स का हिस्सा होगी, जिसके पास 832 किलोमीटर लंबी LAC, द्रास-कारगिल-बटालिक सेक्टर में LoC, और सियाचिन ग्लेशियर की जिम्मेदारी है।

क्यों बनाई 72 Infantry Division?

72 इन्फैंट्री डिवीजन (72 Infantry Division) के गठन का फैसला 2020 के गलवान संघर्ष के बाद शुरू हुए सैन्य तनाव के बाद लिया गया। उस समय, सेना ने तत्कालीन जरूरतों को देखते हुए अस्थायी तौर पर काउंटर इंसर्जेंसी फोर्स (CIF) “यूनिफॉर्म फोर्स” को गलवान घाटी और उसके आसपास के महत्वपूर्ण क्षेत्रों की जिम्मेदारी संभालने के लिए पूर्वी लद्दाख में तैनात किया था। 72 डिवीजन की तैनाती पूरी होने के बाद CIF यूनिफॉर्म 16वीं कोर जम्मू के रियासी में अपनी पुरानी जगह पर वापस लौट जाएगी। यह डिवीजन 14 कॉर्प्स की बाकी दो डिवीजन 8 माउंटेन डिवीजन (LoC के लिए) और 3 इन्फैंट्री डिवीजन (LAC के लिए) के साथ मिलकर काम करेगी।

क्या बदलेगा इस डिवीजन से?

72 इन्फैंट्री डिवीजन (72 Infantry Division) के आने से लद्दाख में सेना की तैनाती में बड़ा बदलाव आएगा। सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि सेना LAC पर ज्यादा तेजी से जवाब दे सकेगी। पहले से मौजूद ब्रिगेड्स को इस डिवीजन के तहत नए सिरे से सिस्टेमैटिक किया जाएगा, जिससे कमांड सिस्टम बेहतर होगा। यह डिवीजन ऊंचाई वाले इलाकों में काम करने के लिए तैयार की जा रही है। लद्दाख में मौसम बहुत ठंडा रहता है और ऑक्सीजन की कमी होती है। इसके लिए सैनिकों को खास ट्रेनिंग दी जा रही है, ताकि वे इन हालातों में काम कर सकें। इस डिवीजन में टैंक और बख्तरबंद गाड़ियां भी होंगी, जो जरूरत पड़ने पर दुश्मन पर हमला करने में मदद करेंगी।

सेना की दूसरी सबसे बड़ी रिस्ट्रक्चरिंग

यह 2020 में चीन के साथ तनाव शुरू होने के बाद सेना की दूसरी सबसे बड़ी रिस्ट्रक्चरिंग है। अक्टूबर 2021 में, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में 545 किमी वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) को लखनऊ स्थित सेंट्रल कमांड के कंट्रोल में लाया गया था। बरेली में स्थित ‘उत्तर-भारत’ क्षेत्र को इन दो पहाड़ी राज्यों में LAC की सुरक्षा की जिम्मेदारी दी गई, और वेस्टर्न कमांड की एक महत्वपूर्ण स्ट्राइक डिवीजन को सेंट्रल कमांड को सौंपा गया। पहले, हिमाचल में LAC की सुरक्षा का जिम्मा चंडीमंदिर स्थित वेस्टर्न कमांड के पास था।

वहीं, वेस्टर्न कमांड के तीन मुख्य कॉर्प्स 2 स्ट्राइक कॉर्प्स (अंबाला), 11 कॉर्प्स (जालंधर), और 9 कॉर्प्स (योल, हिमाचल) का अब केवल फोकस “पश्चिम की ओर” रहेगा। इसका मतलब है कि इन तीनों कॉर्प्स का पूरा फोकस अब पाकिस्तान की ओर होगा।

2 स्ट्राइक कॉर्प्स (अंबाला, हरियाणा) में तैनात है, जिसका मुख्य काम हमला करना है। यह कॉर्प्स जरूरत पड़ने पर दुश्मन के इलाके में जाकर हमला करने के लिए तैयार रहती है। इसका मुख्यालय अंबाला में है और यह हरियाणा, पंजाब और राजस्थान के कुछ हिस्सों में सक्रिय है। इस कॉर्प्स में टैंक, बख्तरबंद गाड़ियां और हमलावर सैनिक होते हैं, जो तेजी से हमला कर सकते हैं।

11 कॉर्प्स का मुख्यालय जालंधर में है। यह कॉर्प्स पंजाब के इलाके में पाकिस्तान से लगने वाली सीमा की सुरक्षा करती है। इसका काम रक्षा करना और दुश्मन को रोकना है। यह कॉर्प्स जालंधर, अमृतसर, गुरदासपुर जैसे इलाकों में तैनात है।

9 कॉर्प्स का मुख्यालय योल (हिमाचल प्रदेश) में है। यह कॉर्प्स हिमाचल और जम्मू-कश्मीर के कुछ हिस्सों में सक्रिय है। इसका काम रक्षा करना और पहाड़ी इलाकों में सीमा की सुरक्षा करना है। यह कॉर्प्स खास तौर पर ऊंचाई वाले इलाकों में काम करने के लिए तैयार की गई है।

LAC पर चीन बना रहा इंफ्रास्ट्रक्चर

चीन ने LAC पर अपनी सैन्य मौजूदगी को लगातार मजबूत किया है। उसने लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश, खासकर तवांग, में सड़कें, शिविर, और दोहरे उपयोग (सैन्य और नागरिक) वाले गांव बनाए हैं। हाल ही में, पांगोंग त्सो झील के पास 400 मीटर लंबा एक पुल बनाया गया, जो खासतौर पर चीनी सेना की मोबिलिटी देने के लिए बनाया गया है। इसके अलावा, चीन ने कच्ची सड़कों को पक्का करने के अलावा और सर्विलांस सिस्टम को बढ़ाने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलप किया है।

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अक्टूबर 2024 से शुरू हुआ बातचीत का दौर

गलवान संघर्ष के बाद, भारत और चीन ने कई दौर की सैन्य और कूटनीतिक बातचीत की। 2021 में पांगोंग त्सो, गोगरा, और हॉट स्प्रिंग्स जैसे क्षेत्रों में डिसएंगेजमेंट पर सहमति बनी, लेकिन डेपसांग और डेमचोक जैसे क्षेत्रों में समस्याएं बनी रहीं। वहीं, 2024 के अंत में, भारत और चीन ने डेपसांग और डेमचोक में सैनिकों की वापसी पर सहमति जताई। अक्टूबर 2024 में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान मुलाकात की और बातचीत को फिर से शुरू करने को लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल और विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने भी चीनी अधिकारियों के साथ चर्चा की। भारत का रुख स्पष्ट है: सीमा पर शांति स्थापित किए बिना संबंध सामान्य नहीं हो सकते।