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Xenon Gas: अगर आप भी माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने की रखते हैं तमन्ना, तो पूरी हो सकती है आपकी ख्वाहिश, बस लगेगा एक हफ्ता!

Xenon Gas Explained: Climbing Mount Everest in Just 7 Days? Is It a Miracle or a Menace?
Credit: Sandro Gromen

Xenon Gas: हाल ही में चार ब्रिटिश पर्वतारोहियों ने माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई के दौरान जीनॉन गैस का इस्तेमाल करके इतिहास रच दिया। उन्होंने इस गैस की मदद से महज कुछ दिनों में एवरेस्ट की चढ़ाई पूरी कर ली, जो आमतौर पर हफ्तों लेती है। लेकिन इस नए तरीके ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या जीनॉन गैस माउंटेनियरिंग का भविष्य है, या इससे आने वाले खतरों को नजरअंदाज कर रहे हैं? आइए, इस गैस के बारे में विस्तार से जानते हैं, इसके फायदे, नुकसान, और माउंटेनियरिंग में इसके इस्तेमाल पर हो रही बहस को समझते हैं।

क्या है Xenon Gas?

जीनॉन (Xenon) एक रंगहीन, गंधहीन, और स्वादहीन नोबल गैस है, जो पृथ्वी के वायुमंडल में बहुत कम मात्रा में मौजूद होती है। यह उन छह नोबल गैसों में से एक है जो रासायनिक रूप से बहुत कम प्रतिक्रिया करती हैं। इसका मतलब है कि यह आसानी से किसी अन्य तत्व के साथ मिलकर यौगिक नहीं बनाती। जीनॉन का रासायनिक प्रतीक Xe है और इसका परमाणु क्रमांक 54 है। यह गैस हवा से निकाली जाती है, जिसमें यह लगभग 0.000009% (90 पार्ट्स पर बिलियन) की मात्रा में पाई जाती है।

Xenon Gas Explained: Climbing Mount Everest in Just 7 Days? Is It a Miracle or a Menace?
Credit: Sandro Gromen

जीनॉन (Xenon Gas) का सबसे ज्यादा इस्तेमाल औद्योगिक और चिकित्सा क्षेत्र में होता है। मसलन, यह हाई-इंटेंसिटी लैंप (जैसे कि कार की हेडलाइट्स और सिनेमा प्रोजेक्टर्स), लेजर तकनीक, और अंतरिक्ष यान के इंजनों में इस्तेमाल की जाती है। चिकित्सा में, जीनॉन का उपयोग एनेस्थीसिया (बेहोशी की दवा) के रूप में किया जाता है, क्योंकि यह तेजी से काम करती है और मरीज के शरीर से जल्दी बाहर निकल जाती है। लेकिन अब इसका इस्तेमाल माउंटेनियरिंग में होने लगा है, जिसने सबका ध्यान खींचा है।

Xenon Gas कैसे काम करती है?

जब हम ऊंचे पहाड़ों पर चढ़ते हैं, जैसे कि माउंट एवरेस्ट, तो हवा में ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है। इसे हाइपोक्सिया कहते हैं, यानी शरीर को जरूरी ऑक्सीजन नहीं मिल पाती। इससे सिरदर्द, थकान, चक्कर, और गंभीर मामलों में मौत भी हो सकती है। पर्वतारोही आमतौर पर इस कमी को पूरा करने के लिए ऑक्सीजन सिलेंडर का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन जीनॉन गैस एक नया विकल्प बनकर सामने आई है।

जीनॉन गैस (Xenon Gas) का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह शरीर में हाइपोक्सिया-इंड्यूस्ड फैक्टर (HIF) नामक प्रोटीन को सक्रिय कर देती है। यह प्रोटीन शरीर को कम ऑक्सीजन वाले माहौल में भी बेहतर ढंग से काम करने में मदद करता है। आसान भाषा में कहें, तो जीनॉन शरीर को यह सिखा देती है कि कम ऑक्सीजन में भी सांस लेना और काम करना कैसे है। इसके चलते पर्वतारोही तेजी से ऊंचाई पर अनुकूलन कर पाते हैं, जिसे आमतौर पर “एक्लिमटाइजेशन” कहा जाता है।

इसके अलावा, जीनॉन गैस (Xenon Gas) का कोई साइड इफेक्ट नहीं माना जाता, क्योंकि यह शरीर में रासायनिक प्रतिक्रिया नहीं करती और जल्दी बाहर निकल जाती है। लेकिन इसका असर कितना सुरक्षित है, इस पर अभी और रिसर्च की जरूरत है।

माउंट एवरेस्ट पर Xenon Gas का इस्तेमाल

माउंट एवरेस्ट, जो दुनिया की सबसे ऊंची चोटी (8,848 मीटर) है, पर चढ़ाई करना हर पर्वतारोही का सपना होता है। लेकिन यह बेहद मुश्किल और खतरनाक है। आमतौर पर पर्वतारोहियों को इस चढ़ाई के लिए हफ्तों की तैयारी करनी पड़ती है। वे धीरे-धीरे ऊंचाई बढ़ाते हैं ताकि उनका शरीर कम ऑक्सीजन वाले माहौल में ढल सके। इस प्रक्रिया में बेस कैंप से लेकर शिखर तक पहुंचने और वापस आने में 6 से 8 हफ्ते लग सकते हैं।

लेकिन हाल ही में चार ब्रिटिश पर्वतारोहियों ने जीनॉन गैस (Xenon Gas) का इस्तेमाल करके बेहद कम समय में चढ़ाई पूरी कर ली। उन्होंने लंदन से अपनी यात्रा शुरू की और एक हफ्ते से भी कम समय में एवरेस्ट की चढ़ाई पूरी कर ली। उन्होंने गैस को सांस के जरिए लिया और इसका असर इतना तेज था कि उनका शरीर जल्दी ही ऊंचाई पर ढल गया। यह एक रिकॉर्ड तोड़ उपलब्धि थी, लेकिन इसने कई सवाल भी खड़े किए।

महीनों की ट्रेनिंग, हाइपोक्सिक चैंबर सेशंस और जीनॉन गैस ट्रीटमेंट के बाद, चार ब्रिटिश आर्मी वेटरन्स ने लंदन से दुनिया की सबसे ऊंची चोटी तक की सबसे तेज चढ़ाई को सफलतापूर्वक पूरा किया। फर्टेनबाख एडवेंचर्स के मालिक लुकास फर्टेनबाख ने पुष्टि की कि चार वेटरन्स-मेजर गार्थ मिलर, कर्नल एलिस्टेयर स्कॉट कार्न्स, एंथनी जेम्स स्टैजिकर और केविन फ्रांसिस गॉडलिंगटन ने 21 मई को सुबह करीब 7:15 बजे स्थानीय समय पर माउंट एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचे। लुकास ने कहा, “हमारे पर्वतारोही अपने लक्ष्य को हासिल करने की राह पर हैं: लंदन से दुनिया की सबसे ऊंची चोटी तक और वापस, सबसे तेज चढ़ाई।” टीम ने 16 मई की दोपहर को लंदन के हीथ्रो एयरपोर्ट से उड़ान भरी और काठमांडू पहुंचकर अपनी ‘एवरेस्ट इन जस्ट 7 डेज’ expedition शुरू किया। वे 17 मई को दोपहर तक एवरेस्ट बेस कैंप पहुंच गए और 20 मई को रात 10:30 बजे अपनी चोटी की चढ़ाई शुरू की

Xenon Gas के फायदे

जीनॉन गैस (Xenon Gas) का इस्तेमाल माउंटेनियरिंग में कई तरह से फायदेमंद हो सकता है। जीनॉन गैस शरीर को कम ऑक्सीजन में जल्दी ढाल देती है। इससे पर्वतारोहियों को हाइपोक्सिया से होने वाली समस्याओं, जैसे सिरदर्द और थकान, से बचने में मदद मिलती है।

वहीं, पारंपरिक तरीके से चढ़ाई में हफ्तों लगते हैं, लेकिन जीनॉन की मदद से यह समय कुछ दिनों तक सिमट सकता है। इससे पर्वतारोहियों को मौसम की मार से बचने में भी मदद मिलती है। हाई एल्टटीट्यूड पर ज्यादा समय बिताने से हिमस्खलन, हाइपोथर्मिया (शरीर का तापमान गिरना), और गिरने का खतरा बढ़ता है। जीनॉन की वजह से कम समय में चढ़ाई पूरी होने से ये जोखिम कम हो सकते हैं। साथ ही, एवरेस्ट पर चढ़ाई में शेरपा गाइड्स की मदद ली जाती है, जो पर्वतारोहियों के लिए सामान ढोते हैं और रास्ता दिखाते हैं। कम समय में चढ़ाई होने से शेरपाओं को भी कम समय तक जोखिम में रहना पड़ता है।

Xenon Gas के नुकसान और खतरे

जीनॉन गैस (Xenon Gas) के फायदों के साथ-साथ इसके कुछ नुकसान और खतरे भी हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। वैज्ञानिकों का कहना है कि जीनॉन का शरीर पर लंबे समय तक असर अभी पूरी तरह समझा नहीं गया है। हाइपोक्सिया-इंड्यूस्ड फैक्टर को सक्रिय करने से शरीर में कई बदलाव होते हैं, जो बाद में नुकसानदायक हो सकते हैं। वहीं, कई पर्वतारोही मानते हैं कि एवरेस्ट पर चढ़ाई सिर्फ शारीरिक चुनौती नहीं, बल्कि एक मानसिक और आध्यात्मिक अनुभव भी है। जीनॉन का इस्तेमाल इस अनुभव को “छोटा” कर देता है, क्योंकि यह चढ़ाई को आसान बना देता है।

नेपाल सरकार का कहना है कि जीनॉन का इस्तेमाल माउंटेनियरिंग की नैतिकता के खिलाफ है। इससे पहाड़ों पर भीड़ बढ़ सकती है, जिससे कचरे और प्रदूषण की समस्या और गंभीर हो सकती है। वगीं, अगर जीनॉन की वजह से चढ़ाई का समय कम हो जाता है, तो शेरपाओं और स्थानीय गाइड्स की कमाई पर असर पड़ सकता है, क्योंकि उनकी सेवाओं की जरूरत कम हो जाएगी।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

जीनॉन गैस (Xenon Gas) के इस्तेमाल पर विशेषज्ञों की राय बंटी हुई है। मॉन्टगोमरी कॉलेज यूनिवर्सिटी, लंदन के प्रोफेसर ह्यू मॉन्टगोमरी, जो खुद एक पर्वतारोही भी हैं, कहते हैं कि जीनॉन शरीर में हाइपोक्सिया को सक्रिय करने का काम करती है, लेकिन इसके लंबे प्रभावों का अभी और अध्ययन करना बाकी है। उन्होंने कहा, “हमें यह समझना होगा कि यह गैस कैसे काम करती है और क्या यह वाकई सुरक्षित है।”

वहीं, नेपाल टूरिज्म डिपार्टमेंट से जुड़े हिमाल गौतम इसे गलत मानते हैं। उनका कहना है कि इससे न केवल पहाड़ों पर प्रदूषण बढ़ेगा, बल्कि शेरपाओं की आजीविका पर भी असर पड़ेगा। दूसरी तरफ, इस अभियान में शामिल एक ब्रिटिश पर्वतारोही लुकास फर्टेनबाख का कहना है, “जीनॉन ने दिखा दिया कि यह काम कर सकती है। यह माउंटेनियरिंग को आसान और सुरक्षित बनाती है।”

नैतिकता का सवाल

जीनॉन गैस (Xenon Gas) का इस्तेमाल माउंटेनियरिंग में एक नैतिक सवाल भी खड़ा करता है। माउंटेनियरिंग को हमेशा से एक चुनौतीपूर्ण खेल माना गया है, जिसमें शारीरिक और मानसिक ताकत की जरूरत होती है। लेकिन अगर जीनॉन जैसी गैस से यह आसान हो जाए, तो क्या यह इस खेल की मूल भावना को खत्म नहीं कर देगा?

कई पर्वतारोही मानते हैं कि एवरेस्ट पर चढ़ाई का असली मजा उसकी कठिनाई में है। अगर हर कोई जीनॉन लेकर कुछ दिनों में चढ़ाई कर लेगा, तो इस उपलब्धि का मूल्य कम हो जाएगा। इसके अलावा, यह भी सवाल है कि क्या जीनॉन का इस्तेमाल खेल में “डोपिंग” की तरह तो नहीं है? जैसे ओलंपिक में प्रदर्शन बढ़ाने वाली दवाओं पर बैन है, वैसे ही माउंटेनियरिंग में भी ऐसे नियम बनाए जाने चाहिए या नहीं?

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जीनॉन गैस (Xenon Gas) का माउंटेनियरिंग में इस्तेमाल अभी शुरुआती दौर में है। इसके फायदे और नुकसान को देखते हुए यह कहना जल्दबाजी होगी कि यह भविष्य है या नहीं। लेकिन यह साफ है कि इसके इस्तेमाल से माउंटेनियरिंग की दुनिया में एक नई बहस छिड़ गई है। अगर जीनॉन का इस्तेमाल बढ़ता है, तो हो सकता है कि भविष्य में ज्यादा लोग एवरेस्ट और अन्य ऊंचे पहाड़ों पर चढ़ने की हिम्मत करेंगे। इससे माउंटेनियरिंग को बढ़ावा मिल सकता है। लेकिन इसके साथ ही, सुरक्षा, पर्यावरण, और नैतिकता से जुड़े सवालों का जवाब ढूंढना भी जरूरी है। नेपाल सरकार और अंतरराष्ट्रीय माउंटेनियरिंग संगठनों को इस पर सख्त नियम बनाने की जरूरत होगी, ताकि इस गैस का सही और जिम्मेदारीपूर्ण इस्तेमाल हो।

Tri-Services Reform: डिफेंस रिफॉर्म्स की रफ्तार तेज, थिएटर कमांडर्स को मिली नई जिम्मेदारी, अब कमांडर ही लेंगे डिसिप्लिनरी एक्शन

Tri-Services Reform: Theatre Commanders Get Disciplinary Powers
CDS Anil Chauhan

Tri-services Reform: रक्षा मंत्रालय ने एक बड़ा फैसला लिया है। अब थिएटर कमांड जैसे ट्राय सर्विसेज ऑर्गेनाइजेशंस के कमांडरों को अपने अधीन काम करने वाले सैनिकों और अधिकारियों पर अनुशासन और प्रशासन से जुड़ी शक्तियां मिलेंगी। ये नए नियम 27 मई, 2025 से लागू हो गए हैं। इनका मकसद सेना, नौसेना और वायुसेना के बीच बेहतर तालमेल बनाना और ट्राय सर्विसेज ऑर्गेनाइजेशंस को और मजबूत करना है। यह कदम रक्षा क्षेत्र में सुधारों की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है, खासकर तब जब देश में थिएटर कमांड की घोषणा जल्द होने की उम्मीद है।

रक्षा मंत्रालय ने कहा, “इंटर-सर्विसेज ऑर्गनाइजेशन (कमांड, कंट्रोल और डिसिप्लिन) अधिनियम, 2023 के तहत बनाए गए नियमों को राजपत्र में प्रकाशित किया गया है। ये नियम 27 मई, 2025 से लागू हैं।” ये नियम ट्राय सर्विसेज ऑर्गेनाइजेशंस, जैसे थिएटर कमांड, को बेहतर ढंग से चलाने में मदद करेंगे। थिएटर कमांड में तीनों सेनाओं के जवान और अधिकारी एक साथ एक कमांडर के नेतृत्व में काम करते हैं।

पिछले साल मई में यह अधिनियम बनाया गया था, और अब इसके नियम लागू किए गए हैं। इन नियमों के तहत कमांडरों को अपने अधीन काम करने वाले सैनिकों पर अनुशासन और प्रशासन से जुड़े फैसले लेने का अधिकार मिलेगा। इससे पहले कमांडरों के पास ऐसी शक्तियां नहीं थीं।

Tri-services Reform: थिएटर कमांड क्या है?

थिएटर कमांड एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें सेना, नौसेना और वायुसेना के जवान एक ही कमांडर के नेतृत्व में काम करते हैं। इस कदम का उद्देश्य तीनों सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल और संयुक्त रणनीति को बढ़ावा देना है, ताकि युद्ध या अन्य रक्षा चुनौतियों में अधिक प्रभावी ढंग से कार्रवाई की जा सके। जल्द ही भारत में थिएटर कमांड की घोषणा होने की उम्मीद है।

रक्षा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, “यह सुधार लंबे समय से प्रतीक्षित था, खासकर तब जब से चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) की नियुक्ति हुई है।” CDS का पद 2019 में बनाया गया था, जिसका मुख्य उद्देश्य तीनों सेनाओं के बीच समन्वय स्थापित करना और रक्षा सुधारों को लागू करना था। इस दिशा में अगस्त 2023 में लोकसभा और राज्यसभा ने इस अधिनियम को पारित किया था, जिसे राष्ट्रपति की मंजूरी भी मिली थी।

पहले क्या समस्या थी?

अभी तक ट्राय सर्विसेज ऑर्गेनाइजेशंस, जैसे अंडमान और निकोबार कमांड या स्ट्रैटेजिक फोर्सेज कमांड, में कमांडरों के पास अपने अधीन सैनिकों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का अधिकार नहीं था। अगर किसी सैनिक या अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई करनी होती थी, तो उसे उसकी मूल सेवा (सेना, नौसेना या वायुसेना) में वापस भेजा जाता था। इससे समय और संसाधनों की बर्बादी होती थी।

उदाहरण के लिए, अंडमान और निकोबार कमांड, जो भारत का पहला ट्राय सर्विसेज ऑर्गेनाइजेशन है और 2001 में बनाया गया था, उसमें भी यही दिक्कत थी। अब नए नियमों से कमांडरों को यह शक्ति मिलेगी कि वे अपने संगठन में ही अनुशासन से जुड़े फैसले ले सकें।

नियमों का क्या फायदा होगा?

ये नियम ट्राय सर्विसेज ऑर्गेनाइजेशंस को और मजबूत करेंगे। अब कमांडर अपने अधीन सैनिकों पर वही अनुशासनात्मक और प्रशासनिक शक्तियां इस्तेमाल कर सकेंगे, जो सेना, नौसेना और वायुसेना के अपने-अपने अधिनियमों में हैं। इसका मतलब है कि अगर कोई सैनिक गलती करता है, तो उसे उसकी मूल सेवा में वापस भेजने की जरूरत नहीं पड़ेगी। कमांडर खुद कार्रवाई कर सकेंगे।

हालांकि, यह भी सुनिश्चित किया गया है कि सेना, नौसेना और वायुसेना की अपनी-अपनी खासियत और नियम-कायदे बरकरार रहेंगे। इससे तीनों सेनाओं की अलग-अलग पहचान और परंपराएं सुरक्षित रहेंगी।

यह शक्तियां मौजूदा सेना अधिनियम, 1950, नौसेना अधिनियम, 1957, और वायुसेना अधिनियम, 1950 के तहत दी गई अनुशासनात्मक और प्रशासनिक शक्तियों के समान होंगी। हालांकि, यह सुनिश्चित किया गया है कि प्रत्येक सेवा की विशिष्ट सेवा शर्तों में कोई बदलाव नहीं होगा।

वर्तमान में, ट्राय सर्विसेज ऑर्गेनाइजेशंस में सेवारत कर्मियों पर उनके संबंधित सेवा अधिनियम लागू होते हैं। उदाहरण के लिए, भारतीय सेना के जवान सेना अधिनियम, 1950 के तहत आते हैं, जबकि नौसेना और वायुसेना के कर्मी क्रमशः नौसेना अधिनियम, 1957 और वायुसेना अधिनियम, 1950 के तहत शासित होते हैं। नए नियमों के तहत, ट्राय सर्विसेज ऑर्गेनाइजेशंस के प्रमुखों को इन अधिनियमों के तहत सभी अनुशासनात्मक और प्रशासनिक शक्तियां दी जाएंगी, जिससे उन्हें अपने संगठन में सेवारत कर्मियों पर कार्रवाई करने का अधिकार मिलेगा।

थिएटर कमांड का एलान जल्द

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि थिएटर कमांड की घोषणा जल्द ही हो सकती है। ये कमांड क्षेत्रीय स्तर पर बनाए जाएंगे, जैसे कि उत्तरी सीमा, पश्चिमी सीमा या समुद्री क्षेत्र के लिए अलग-अलग कमांड। प्रत्येक कमांड में तीनों सेनाओं के जवान और अधिकारी एक कमांडर के नेतृत्व में काम करेंगे। यह न केवल रणनीतिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि इससे संसाधनों का बेहतर उपयोग और तुरंत फैसले लेने में भी मदद मिलेगी।

भारत ने 2001 में अंडमान और निकोबार कमांड के साथ ट्राय सर्विसेज ऑर्गेनाइजेशन की शुरुआत की थी। यह कमांड हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की रणनीतिक उपस्थिति को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके बाद, स्ट्रैटेजिक फोर्सेज कमांड जैसे अन्य संगठन बनाए गए, जो परमाणु हथियारों और अन्य रणनीतिक संपत्तियों के प्रबंधन के लिए जिम्मेदार हैं। हालांकि, इन संगठनों में अनुशासनात्मक और प्रशासनिक शक्तियों की कमी एक बड़ी बाधा थी, जिसे अब नए नियमों के माध्यम से दूर किया जा रहा है।

भारत में अभी कुछ ट्राय सर्विसेज ऑर्गेनाइजेशंस हैं, जैसे-

  • अंडमान और निकोबार कमांड 2001 में बना, जो हिंद महासागर में भारत की रणनीतिक स्थिति को मजबूत करता है।
  • स्ट्रैटेजिक फोर्सेज कमांड: परमाणु हथियारों और रणनीतिक संपत्तियों का प्रबंधन करता है।
  • सैन्य मामलों का विभाग: चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ के नेतृत्व में काम करता है।

नए नियमों के लागू होने से ट्राय सर्विसेज ऑर्गेनाइजेशंस की कार्यक्षमता में सुधार होगा। यह कदम न केवल सशस्त्र बलों के बीच बेहतर तालमेल सुनिश्चित करेगा, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा को भी मजबूत करेगा। विशेषज्ञों का कहना है कि थिएटर कमांड की स्थापना और इन नियमों का लागू होना भारत को आधुनिक युद्ध की चुनौतियों के लिए बेहतर ढंग से तैयार करेगा।

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रक्षा मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि इन नियमों का उद्देश्य प्रत्येक सेवा की विशिष्ट पहचान और परंपराओं को बनाए रखना है, ताकि सशस्त्र बलों की अनूठी संस्कृति और कार्यप्रणाली पर कोई असर न पड़े। यह कदम भारत की सैन्य रणनीति में एक नया अध्याय जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

AMCA Explained: आ रहा है चीनी चेंगदू जे-20 माइटी ड्रैगन का बाप! ‘मेड इन इंडिया’ स्टील्थ जेट एएमसीए को मिली हरी झंडी, 2026 तक प्रोटोटाइप तैयार!

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AMCA Explained: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने मंगलवार को एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) प्रोग्राम के लिए प्रोटोटाइप मॉडल को मंजूरी दे दी है। यह भारत का पहला स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ फाइटर जेट होगा, जिसका प्रोटोटाइप 2026-27 तक तैयार होने की उम्मीद है और 2028 तक पहली उड़ान भर सकता है। AMCA तैयार होने के बाद भारत उन चुनिंदा देशों (अमेरिका, चीन, रूस) की सूची में शामिल हो जाएगा, जिनके पास पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान हैं। वर्तमान में अमेरिका के पास F-22 रैप्टर और F-35 लाइटनिंग II, चीन के पास J-20, और रूस के पास सुखोई-57 जैसे विमान हैं।

AMCA क्या है और क्यों है खास?

एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) भारत का महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट है, जिसे रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) के तहत एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (ADA) डेवलप कर रही है। यह एक पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ फाइटर जेट है, जो मॉडर्न वॉरफेयर की जरूरतों को पूरा करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।

AMCA कार्यक्रम की शुरुआत 2010 में हुई थी, जिसे पहले मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (MCA) के नाम से जाना जाता था। यह भारत-रूस के संयुक्त FGFA (Fifth Generation Fighter Aircraft) कार्यक्रम के समानांतर शुरू हुआ था, लेकिन बाद में भारत ने FGFA से हटकर AMCA को प्राथमिकता दी। अक्टूबर 2010 में, रक्षा मंत्रालय ने फिजिबिलिटी स्टडी के लिए 90 करोड़ रुपये आवंटित किए। नवंबर 2010 में, ADA ने दो टेक्नोलॉजी डेमोंस्टेटर्स और सात प्रोटोटाइप के लिए 9,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त फंडिंग मांगी।

2013-2014 के बीच, AMCA के 9 डिज़ाइन कॉन्फ़िगरेशन्स (3B-01 से 3B-09) की स्टडी हुई, जिसमें CAD, विंड टनल टेस्टिंग, और रडार क्रॉस-सेक्शन (RCS) टेस्टिंग शामिल थी। 2014 तक, 3B-09 कॉन्फ़िगरेशन को अंतिम रूप दिया गया। 2015 में, Aero India में AMCA का बेसिक डिज़ाइन फाइनल हुआ। 2023 में डिज़ाइन का काम पूरा हुआ, और मार्च 2024 में कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) ने प्रोटोटाइप विकास के लिए ₹15,000 करोड़ की मंजूरी दी।

AMCA की कुछ प्रमुख विशेषताएं

AMCA एक 25 टन का ट्विन-इंजन जेट होगा, जो IAF के बाकी फाइटर्स से बड़ा होगा। शुरुआत में इसमें 75% स्वदेशी कंटेंट होगा, जो बाद में 85% तक बढ़ेगा।

एडवांस्ड स्टील्थ फीचर्स

AMCA में एडवांस्ड स्टील्थ फीचर्स होंगे, जो इसे रडार से छुपाने में मदद करेंगे। इसका लो इलेक्ट्रो-मैग्नेटिक सिग्नेचर रडार के लिए इसे डिटेक्ट करना मुश्किल बनाएगा। जेट की सतह पर खास मटेरियल यूज होगा, जो रडार सिग्नल को रिफ्लेक्ट करने की बजाय डायवर्ट करेगा। डायवर्टरलेस सुपरसोनिक इनलेट और सर्पेंटाइन एयर इनटेक डक्ट इंजनों को रडार से बचाएंगे।

6.5 टन का बड़ा इंटरनल फ्यूल टैंक

AMCA में 6.5 टन का बड़ा इंटरनल फ्यूल टैंक होगा, जो इसे लंबी दूरी के मिशंस के लिए फिट बनाएगा। इसका इंटरनल वेपन्स बे 1,500 किलो तक का पेलोड ले जा सकता है, जिसमें चार लॉन्ग-रेंज एयर-टू-एयर मिसाइल्स और कई प्रिसीजन-गाइडेड हथियार शामिल होंगे। इंटरनल वेपन्स बे और फ्यूल टैंक रडार सिग्नेचर को कम करते हैं, जो बाहर लगे हथियारों या टैंक्स के साथ मुमकिन नहीं है।

इंजन

AMCA का Mk1 वर्जन अमेरिकी GE F414 इंजन (98 किलोन्यूटन) के साथ उड़ेगा, जिसका प्रोडक्शन हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के साथ भारत में शुरू हो चुका है। Mk2 वर्जन में DRDO का गैस टरबाइन रिसर्च एस्टैब्लिशमेंट (GTRE) 110 किलोन्यूटन का देसी इंजन डेवलप करेगा। भारत फ्रांस की सैफरान SA कंपनी के साथ इस इंजन के लिए बातचीत कर रहा है।

AMCA में इंटीग्रेटेड व्हीकल हेल्थ मैनेजमेंट (IVHM) सिस्टम होगा, जो रियल-टाइम में जेट की कंडीशन चेक करेगा। ये सिस्टम मेंटेनेंस टाइम को कम करेगा और जेट को ज्यादा वक्त तक यूज करने में मदद करेगा। साथ ही, AMCA में एडवांस सेंसर और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम होगा, जो दुश्मन के विमानों का पता लगाने और उन्हें नष्ट करने में सक्षम होगा।

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भारत के लिए AMCA क्यों जरूरी है?

भारत का स्ट्रेटेजिक सिनारियो बेहद चुनौतीपूर्ण है। पाकिस्तान और चीन जैसे पड़ोसी देशों के साथ तनाव और उनकी बढ़ती सैन्य क्षमता भारत के लिए बड़ा खतरा है। भारतीय वायुसेना (IAF) को 41 स्क्वाड्रन की जरूरत है, लेकिन वर्तमान में केवल 29 स्क्वाड्रन ही सक्रिय हैं। खासकर तब जब पाकिस्तान अपनी वायुसेना को आधुनिक बना रहा है और चीन से J-10 औऱ J-20 स्टील्थ फाइटर जेट और एडवांस विपंस सिस्टम का इस्तेमाल कर रहा है औऱ LAC पर भारत के लिए चुनौती पेश कर रहा है।

AMCA का डेवलपमेंट इन चुनौतियों का जवाब है। यह न केवल भारतीय वायुसेना की कमी को पूरा करेगा, बल्कि इसे आधुनिक युद्ध की जरूरतों के लिए तैयार करेगा। AMCA अपने स्टील्थ फीचर्स, एडवांस्ड एवियोनिक्स और लेटेस्ट टेक्नोलॉजी के साथ इस गैप को भर सकता है। स्टील्थ का मतलब है कि ये जेट दुश्मन के रडार से बच सकता है, जो आज के युद्ध में बहुत बड़ा फायदा है।

पाकिस्तान अपनी वायुसेना को चीन की मदद से अपग्रेड कर रहा है, जिसमें J-20 जैसे स्टील्थ फाइटर भी शामिल हैं। दूसरी तरफ, चीन की वायुसेना पहले से ही पांचवीं पीढ़ी के जेट्स के साथ बहुत ताकतवर है। अगर AMCA सक्सेसफुल होता है, तो ये दोनों पड़ोसियों के खिलाफ भारत को बराबरी का मौका दे सकता है।

AMCA की टाइमलाइन

AMCA प्रोग्राम को अप्रैल 2024 में सरकार की मंजूरी मिली थी, और अब रक्षा मंत्री द्वारा प्रोटोटाइप मॉडल को हरी झंडी दिखाई गई है। इसकी टाइमलाइन इस तरह रहेगी:

  • 2026-27: पहला प्रोटोटाइप तैयार होगा।
  • 2028: पहली उड़ान की उम्मीद।
  • 2032: विमान का सर्टिफिकेशन पूरा होगा।
  • 2034: भारतीय वायुसेना में शामिल होने की योजना।

ADA जल्द ही एक एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EoI) जारी करेगी, जिसमें सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की कंपनियों को विकास प्रक्रिया में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया जाएगा। यह एक प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया होगी, जिसमें केवल भारतीय कंपनियां ही हिस्सा ले सकेंगी। यह कदम भारत के आत्मनिर्भर भारत अभियान को मजबूत करेगा।

AMCA का डेवलपमेंट दो चरणों में होगा:

  • पहला चरण: 75% स्वदेशी सामग्री के साथ शुरुआती मॉडल।
  • दूसरा चरण: 85% स्वदेशी सामग्री के साथ एडवांस मॉडल।

GE F414 इंजन का प्रोडक्शन HAL के साथ भारत में शुरू हो चुका है, जो AMCA के लिए समय पर इंजन सप्लाई सुनिश्चित करेगा।

क्या हैं चुनौतियां?

AMCA का रास्ता आसान नहीं है। भारत के स्वदेशी डिफेंस प्रोजेक्ट्स का इतिहास, जैसे तेजस लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट, देरी और कॉस्ट ओवररन से भरा है। AMCA, जो फिफ्थ-जेनरेशन जेट है, DRDO, ADA और इंडस्ट्री पार्टनर्स के लिए और भी बड़ा टेस्ट होगा। स्टील्थ टेक्नोलॉजी, एडवांस्ड इंजन्स और एवियोनिक्स बनाने के लिए ढेर सारा पैसा, टेक्निकल स्किल्स और टाइम चाहिए।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, AMCA का प्रोटोटाइप 2026-27 तक तैयार हो सकता है और पहली फ्लाइट 2028 में हो सकती है। लेकिन डिफेंस मिनिस्ट्री का लेटेस्ट स्टेटमेंट साफ टाइमलाइन नहीं देता, जो चैलेंजेस को दिखाता है। सर्टिफिकेशन 2032 तक और IAF में इंडक्शन 2034 तक प्लान्ड है।

IAF की तुरंत जरूरतें भी चिंता का सबब हैं। सिर्फ 29 स्क्वाड्रनों के साथ, वायुसेना पहले से दबाव में है। AMCA को सर्विस में आने में कई साल लगेंगे। तब तक, भारत को राफेल या एक्स्ट्रा तेजस जेट्स जैसे ऑप्शंस पर भरोसा करना होगा। AMCA की सक्सेस पॉलिटिकल सपोर्ट, फंडिंग और DRDO, ADA और प्राइवेट इंडस्ट्री के बीच स्मूथ कोऑर्डिनेशन पर टिकी है।

क्यों चाहिए स्वदेशी फाइटर जेट?

भारत के पास विकल्प था कि वह अमेरिका का F-35 या रूस का Su-57 खरीद ले। ये दोनों विश्व स्तरीय फाइटर जेट्स हैं, लेकिन इनसे जुड़ी कई समस्याएं हैं। विदेशी जेट्स खरीदना बहुत महंगा है। साथ ही, उनके मेंटेनेंस और स्पेयर पार्ट्स के लिए हमेशा विदेशी सप्लायर्स पर निर्भर रहना पड़ता है। युद्ध के समय अगर सप्लाई चेन में रुकावट आती है, तो ये भारत के लिए बड़ा खतरा बन सकता है। इसके अलावा, विदेशी जेट्स में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर पाबंदियां होती हैं, यानी हम उन्हें अपनी जरूरतों के हिसाब से बदल नहीं सकते।

AMCA को भारत में ही बनाना ‘आत्मनिर्भर भारत’ मिशन का हिस्सा है। AMCA प्रोजेक्ट से नौकरियां बढ़ेंगी, टेक्निकल नॉलेज बढ़ेगा और भारत का एयरोस्पेस इकोसिस्टम मजबूत होगा। रक्षा मंत्रालय ने कहा है कि ADA जल्द ही इंडस्ट्री पार्टनर्स के साथ एक एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EoI) इश्यू करेगी। ये पार्टनरशिप इनोवेशन को तेज करेगी और AMCA को भारत की खास जरूरतों, जैसे हिमालय में हाई-एल्टिट्यूड फाइटिंग या इंडियन ओशन में मैरिटाइम ऑपरेशंस के लिए तैयार करेगी।

AMCA का सबसे बड़ा फायदा ये है कि ये 85 फीसदी स्वदेशी होगा। विदेशी जेट्स में अक्सर “ब्लैक बॉक्स” सिस्टम्स होते हैं या क्रिटिकल पार्ट्स की एक्सेस लिमिटेड होती है। लेकिन AMCA के साथ भारत को टेक्नोलॉजी पर फुल कंट्रोल मिलेगा। इससे स्वदेशी हथियार, सेंसर्स और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम्स को आसानी से फिट किया जा सकेगा। मिसाल के तौर पर, AMCA में भारत की बनी मिसाइलें और एडवांस्ड रडार सिस्टम्स लगाए जा सकते हैं, जो इसे IAF की जरूरतों के लिए परफेक्ट बनाएंगे।

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क्या AMCA बन सकता है डिटरेंट?

AMCA के तैयार होते ही पाकिस्तान और चीन को बड़ी चुनौती मिलेगी। इसके स्टील्थ फीचर्स, एडवांस्ड सेंसर्स और वेपन्स IAF को एयर-टू-एयर और एयर-टू-ग्राउंड मिशंस में बड़ा एज देंगे। पाकिस्तान के खिलाफ, AMCA मॉडर्नाइज्ड जेट्स और एयर डिफेंस सिस्टम्स को न्यूट्रलाइज कर सकता है। यह चीन के खिलाफ J-20 को तगड़ा जवाब दे सकता है, जिससे भारत को लद्दाख या अरुणाचल जैसे इलाकों में रणनीतिक बढ़त हासिल होगी।

Galwan Visit: नॉर्दन कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल प्रतीक शर्मा क्यों गए गलवान और देपसांग, क्या वहां इंडिया गेट बनाने की है तैयारी?

Galwan Visit: Northern Commander Lt Gen Prateek Sharma Visits Galwan and Depsang

Galwan Visit: भारतीय सेना की नॉर्दन कमांड के नए कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल प्रतीक शर्मा ने हाल ही में गलवान और देपसांग का दौरा किया। नॉर्दन कमांड का कार्यभार संभालने के बाद लेह में स्थित 14 कोर में यह उनका पहला आधिकारिक दौरा था, जिसमें उन्होंने फायर एंड फ्यूरी कॉर्प्स की यूनिट्स और फॉर्मेशन्स के साथ मुलाकात की और इलाके की सुरक्षा स्थिति का जायजा लिया। इस दौरे की खास बात यह रही कि वह गलवान घाटी भी गए, जहां 15 जून 2020 की देर रात भारत औऱ चीनी सैनिकों के बीच हुई हिंसक झड़प में भारतीय सेना के 20 जवान शहीद हो गए थे। वहीं गलवान को अगले महीने पर्यटकों के लिए भी खोला जाना है।

Galwan Visit: गलवान घाटी क्यों गए कमांडर?

लेफ्टिनेंट जनरल प्रतीक शर्मा ने 30 अप्रैल 2025 को ऑपरेशन सिंदूर के दौरान नॉर्दन आर्मी कमांडर का पदभार संभाला था। वे लेफ्टिनेंट जनरल एमवी सुचिंद्र कुमार की जगह पर नियुक्त हुए हैं, जो 30 अप्रैल को ही रिटायर हो गए। 22 मई 2025 को लेफ्टिनेंट जनरल प्रतीक शर्मा ने गलवान घाटी और आसपास के इलाकों का दौरा किया। कमांडर बनने के बाद यहां उनका यह पहला आधिकारिक दौरा था। यह इलाका लद्दाख में तैनात त्रिशूल डिविजन का हिस्सा है। इस दौरान उन्होंने लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (एलएसी) के पास तैनात जवानों से मुलाकात की और उनकी तैयारियों का जायजा लिया।

नॉर्दन कमांड के आधिकारिक एक्स हैंडल से साझा की गई तस्वीरों में लेफ्टिनेंट जनरल प्रतीक शर्मा को सैनिकों के साथ बातचीत करते और इलाके की स्थिति को समझते देखा जा सकता है। वहीं दूसरी फोटो में लेफ्टिनेंट जनरल प्रतीक शर्मा देपसांग बुल्ज में रॉक क्लांइबिंग इक्विपमेंट्स पहने जवानों की हौसला अफजाई करते दिख रहे हैं।

नॉर्दन कमांड ने अपनी पोस्ट में लिखा है, “सैनिकों की लगन की सराहना
लेफ्टिनेंट जनरल प्रतीक शर्मा, सेना कमांडर, #नॉर्दर्नकमांड ने #फायरफ्यूरीकॉर्प्स के तहत संरचनाओं और इकाइयों का दौरा किया ताकि परिचालन तैयारियों और सुरक्षा उपायों की समीक्षा की जा सके।
सेना कमांडर ने सैनिकों की लगन और समर्पण की तारीफ की और उन्हें परिचालन प्रभावशीलता और पेशेवरता के उच्चतम मानकों को बनाए रखने के लिए प्रेरित किया।”

रिटायर्ड मेजर जनरल सुधाकर जी, जो महार रेजिमेंट के पूर्व कर्नल और पूर्वी लद्दाख में 3 डिवीजन के कमांडर रह चुके हैं, उन्होंने कहा कि यह साइकोलॉजिकल वारफेयर का हिस्सा है। उन्होंने बताया कि कोई भी नया कमांडर उन क्षेत्रों में अवश्य जाता है, जहां तनाव या गतिरोध हो। यह सेना का रणनीतिक तौर-तरीका है। नॉर्दन कमांडर जैसे वरिष्ठ सैन्य अधिकारी इस इलाके का दौरा इसलिए करते हैं ताकि वे खुद वहां की स्थिति को समझ सकें और सैनिकों की तैयारियों का जायजा ले सकें।

क्या भव्य मेमोरियल बनाने की है तैयारी?

नॉर्दन कमांड के आधिकारिक एक्स हैंडल से साझा की गई तस्वीरों में लेफ्टिनेंट जनरल प्रतीक शर्मा अपने गलवान दौरे के दौरान वहां बने मेमोरियल भी गए। गलवान घाटी में गलवान नदी के किनारे शहीद स्मारक (मेमोरियल) का निर्माण 15 जून 2021 को पूरा हुआ था। यह स्मारक 15-16 जून 2020 को गलवान घाटी में भारत-चीन सैन्य झड़प में शहीद हुए 20 भारतीय सैनिकों की स्मृति में बनाया गया है। वहीं लगता है कि अब इस स्मारक को रेजांग-ला वॉर मेमोरियल की तरह भव्य बनाने की तैयारी है।

Galwan Visit: Northern Commander Lt Gen Prateek Sharma Visits Galwan and Depsang

नॉर्दन कमांड की तरफ से जारी एक फोटो में वॉर मेमोरियल के मॉडल को दिखाया गया है। जिसे देख कर अनुमान लगाया जा रहा है कि सरकार वहां शहीदों की याद में बड़ा मेमोरियल बनाने की तैयारी कर रही है। फोटो दो प्रोटोटाइप दिखाई दे रहे हैं। वहीं दूसरा प्रोटोटाइप कुछ खास दिखाई दे रहा हैं। उसमें इंडिया गेट बना हुआ दिखाई दे रहा है। संभव है कि वहां जाने वाले पर्यटकों को इंडिया गेट गलवान में भी देखने को मिल सकता है। वहीं लेफ्टिनेंट जनरल प्रतीक शर्मा के साथ फायर एंड फ्यूरी यानी 14 कोर के जीओसी लेफ्टिनेंट जनरल हितेश भल्ला भी पीछे खड़े दिखाई दे रहे हैं।

15 जून से खुलेगाा गलवान!

भारतीय थलसेना दिवस पर रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने ‘भारत रणभूमि दर्शन’ नाम का एक खास प्रोग्राम शुरू किया था। इस प्रोग्राम का मकसद रणक्षेत्र टूरिज्म को बढ़ावा देना है, ताकि लोग ऐतिहासिक युद्ध स्थलों को देख सकें और शहीदों की वीरता को जान सकें। इसके लिए एक वेबसाइट भी बनाई गई है, जिसका नाम ‘भारत रणभूमि दर्शन’ ही रखा गया है।

सेना से जुड़े सूत्रों ने बताया कि पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी को 15 जून 2025 से पर्यटकों के लिए खोलने की योजना है। यह क्षेत्र, जो वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के पास है, अभी यहां जाना प्रतिबंधित है। उन्होंने बताया कि मार्च में तापमान -5 डिग्री तक पहुंचने पर काम शुरू होगा, और मई के अंत तक पर्यटकों के लिए व्यवस्था तैयार हो जाएगी। गलवान घाटी में शहीद हुए सैनिकों की याद में एक मेमोरियल बनाया गया है। यह मेमोरियल दुर्बुक-श्योक-दौलत बेग ओल्डी (DSDBO) रोड पर श्योक गांव से करीब 100 किलोमीटर दूर है। DSDBO रोड, जो 256 किलोमीटर लंबी है, पर गलवान वॉर मेमोरियल KM 120 पोस्ट के पास स्थित है। अभी तक इस सड़क पर सिर्फ श्योक गांव तक ही आम लोगों को जाने की इजाजत थी। 2020 के बाद से इस इलाके में स्थानीय लोगों और सेना के अलावा किसी को भी आने की अनुमति नहीं दी गई थी। अब इस प्रोग्राम के जरिए लोग इन जगहों को देख सकेंगे और शहीदों को श्रद्धांजलि दे सकेंगे।

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इस रास्ते में अभी रहने-खाने की सुविधा नहीं है, लेकिन मौसम अनुकूल होने पर अस्थायी स्ट्रक्चर, कैफेटेरिया, गेस्ट हाउस और व्यू पॉइंट बनाए जाएंगे। स्थानीय लोग होम स्टे शुरू करने के इच्छुक हैं, और सिविल प्रशासन इस दिशा में काम कर रहा है। मेमोरियल को भी रिनोवेट किया जा रहा है। अभी गलवान जाने के लिए इनर लाइन परमिट जरूरी है, लेकिन पर्यटन शुरू होने पर इसे हटा दिया जाएगा, हालांकि रजिस्ट्रेशन अनिवार्य होगा। 15,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित गलवान के लिए 6 दिन का एक्लेमटाइजेशन जरूरी होगा, जिसकी पालना चेक पॉइंट्स पर सुनिश्चित की जाएगी।

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गलवान में तैनात सैनिकों को बेहद कठिन परिस्थितियों में काम करना पड़ता है। ऊंचाई पर स्थित यह इलाका ठंडा और दुर्गम है, जहां ऑक्सीजन की कमी और कठोर मौसम सैनिकों के लिए रोज की चुनौती है। ऐसे में कमांडर का दौरा सैनिकों के लिए एक बड़ा प्रोत्साहन होता है। यह दौरे यह भी सुनिश्चित करते हैं कि सैनिकों के पास जरूरी संसाधन, हथियार और तकनीक मौजूद हों, ताकि वे किसी भी स्थिति से निपट सकें।

Indian Parliamentary Delegation: भारत 32 देशों में ही क्यों भेज रहा सभी दलों के सांसदों का प्रतिनिधिमंडल? इससे पीएम मोदी की ग्लोबल इमेज को होगा क्या फायदा?

Indian Parliamentary Delegation: Why India is Sending All-Party MPs to 32 Nations and How It Boosts PM Modi's Global Image
Credit: India in Japan on X

Indian Parliamentary Delegation: 22 अप्रैल को पहलगाम में आतंकी हमले के बाद भारत ने पहले तो ऑपरेशन सिंदूर के जरिए पाकिस्तान में मौजूद आतंकी ठिकानों ध्वस्त किया, उसके बाद पाकिस्तानी सेना की जवाबी कार्रवाई का भी मुंहतोड़ जवाब दिया। वहीं पाकिस्तान को डिप्लोमेटिक स्तर पर घेरने की तैयारी है। जिसके तहत भारत ने पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक समर्थन जुटाने और आतंकवाद के प्रति अपनी जीरो टॉलरेंस नीति को मजबूत करने के लिए सात सर्वदलीय संसदीय प्रतिनिधिमंडल 32 देशों की यात्रा पर भेजा है। इनमें से तीन प्रतिनिधिमंडल अपनी यात्रा शुरू भी कर चुके हैं। इस मुहिम में 59 सांसद शामिल हैं, जिनमें से 31 सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) और 20 विपक्षी दलों से हैं। प्रत्येक प्रतिनिधिमंडल के साथ कम से कम एक पूर्व डिप्लोमेट भी शामिल है, जो डिप्लोमेटिक डायलॉग और स्ट्रेटेजिक कम्यूनिकेशन में मदद करेंगे।

Indian Parliamentary Delegation: बनाए सात प्रतिनिधिमंडल

इन सात प्रतिनिधिमंडलों का नेतृत्व देश के प्रमुख राजनेता कर रहे हैं। पहला समूह भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के बैजयंत जय पांडा के नेतृत्व में है, जबकि दूसरा समूह बीजेपी के ही रविशंकर प्रसाद के नेतृत्व में काम करेगा। तीसरे समूह की कमान जनता दल (यूनाइटेड) के संजय झा संभाल रहे हैं, और चौथे समूह का नेतृत्व शिवसेना के श्रीकांत शिंदे करेंगे। पांचवें समूह की अगुवाई कांग्रेस सांसद शशि थरूर को सौंपी गई है, जबकि छठा समूह द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) की सांसद कनिमोई करुणानिधि के नेतृत्व में है। सातवें और अंतिम समूह का नेतृत्व राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार) की नेता सुप्रिया सुले कर रही हैं।

इन देशों की करेंगे यात्रा

यह कूटनीतिक अभियान भारत के लिए कई मायनों में अहम है। इसका मुख्य उद्देश्य लश्कर के मुखौटा संगठन द रजिस्टेंस फ्रंट यानी TRF को UNSC की 1267 सेंक्शन्स कमेटी के तहत आतंकवादी संगठन घोषित करवाना है। पहलगाम आतंकी हमले में 26 पर्यटक मारे गए थे, और पहले उसकी जिम्मेदारी TRF ने ली थी, लेकिन बाद में खुद पर एक साइबर अटैक की बात कह कर अपनी बात से पलट गया था।

ये प्रतिनिधिमंडल 32 देशों और क्षेत्रों की यात्रा करेंगे, जिनका चयन खास रणनीति के तहत किया गया है। मध्य पूर्व में सऊदी अरब, कुवैत, बहरीन, संयुक्त अरब अमीरात, मिस्र और कतर जैसे देश शामिल हैं। यूरोप में यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, जर्मनी, इटली, डेनमार्क, यूरोपीय संघ, स्पेन, ग्रीस, स्लोवेनिया और लातविया इस अभियान का हिस्सा हैं। एशिया में इंडोनेशिया, मलेशिया, दक्षिण कोरिया, जापान और सिंगापुर जैसे देशों को चुना गया है। अफ्रीका से अल्जीरिया, लाइबेरिया, कांगो, सिएरा लियोन, इथियोपिया और दक्षिण अफ्रीका इस सूची में शामिल हैं। अमेरिका महाद्वीप से संयुक्त राज्य अमेरिका, पनामा, गुयाना, ब्राजील और कोलंबिया का चयन किया गया है। इसके अलावा, रूस भी इस सूची में शामिल है। इन देशों का चयन इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये या तो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के वर्तमान या भविष्य के सदस्य हैं या फिर भारत के प्रमुख रणनीतिक और व्यापारिक साझेदार हैं।

क्या है पूर्व राजनयिकों की राय

इन देशों के चयन के रणनीतिक महत्व को लेकर पूर्व राजनयिक प्रभु दयाल (रिटायर्ड), “भारत 32 देशों में संसदीय प्रतिनिधिमंडल भेज रहा है। इसका कारण यह है कि ये सभी देश निर्णय लेने की प्रक्रिया में बहुत महत्वपूर्ण हैं। ये देश या तो वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के सदस्य हैं या अगले साल या 2027 में इसके सदस्य बनेंगे।” प्रभु दयाल इससे पहले संयुक्त राज्य अमेरिका, संयुक्त राष्ट्र, पाकिस्तान, मिस्र और ईरान जैसे देशों में सेवाएं दे चुके हैं।

उन्होंने आगे कहा, “ये सभी देश इस साल, 2026 या 2027 में UNSC में डिसिजन मेकर के तौर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। आतंकवाद के मामले में इनका रुख हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये देश इस मुद्दे पर निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।”

चीन क्यों नहीं भेजा डेलीगेशन?

चीन UNSC का स्थायी सदस्य है, जबकि पाकिस्तान इसके 10 गैर-स्थायी सदस्यों में से एक है। फिर भी, भारत ने बीजिंग या इस्लामाबाद में कोई प्रतिनिधिमंडल नहीं भेजा। 25 अप्रैल को, पाकिस्तान और चीन ने UNSC पर दबाव बनाकर द रेसिस्टेंस फ्रंट (TRF) को प्रेस स्टेटमेंट से हटवाया, जबकि भारत ने इसका कड़ा विरोध किया था।

भारत TRF को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की 1267 सेंक्शन्स कमेटी के तहत आतंकवादी संगठन घोषित करवाने के लिए सक्रिय रूप से अभियान चला रहा है। इसके लिए भारत ने न्यूयॉर्क में एक टेक्निकल टीम भेजी थी, जो 1267 सेंक्शन्स कमेटी के मॉनिटरिंग टीम और संयुक्त राष्ट्र के सहयोगी देशों के प्रतिनिधियों के साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र कार्यालय काउंटर-टेरेरिज्म (UNOCT) और काउंटर-टेरेरिज्म कमेटी एक्जीक्यूटिव डायरेक्टरेट (CTED) के साथ बैठकें कर चुकी है।

UNSC चीन और पाकिस्तान का विरोध

पूर्व राजनयिक अनिल त्रिगुणायत (रिटायर्ड) ने बताया कि UNSC में 15 सदस्य हैं, और भारत के प्रतिनिधिमंडल इनमें से चीन और पाकिस्तान को छोड़कर बाकी सभी देशों की यात्रा कर रहे हैं। उन्होंने बताया, “ये प्रतिनिधिमंडल उन देशों में जा रहे हैं, जो हमारे रणनीतिक और व्यापारिक साझेदार हैं। TRF को आतंकवादी संगठन घोषित करने का मामला संयुक्त राष्ट्र में जाएगा, जहां पाकिस्तान इसका विरोध करेगा और चीन तकनीकी रूप से इसे रोकने की कोशिश करेगा। ऐसे में यह भारत के लिए महत्वपूर्ण है कि इन देशों को अपने पक्ष में लाया जाए, ताकि पाकिस्तान का असली चेहरा सामने आए।”

प्रभु दयाल ने आगे कहा, “पाकिस्तान से प्रायोजित आतंकवादी गतिविधियां हमारे लिए एक बड़ा मुद्दा बन रही हैं। हम इसे UNSC में मजबूती से उठाना चाहते हैं। इसलिए हम उन देशों तक पहुंच रहे हैं, जो या तो स्थायी सदस्य हैं या इस साल, अगले साल या 2027 में गैर-स्थायी सदस्य होंगे।” उन्होंने यह भी जोड़ा, “इस पहल का मुख्य उद्देश्य इन देशों को हमारी चिंताओं के प्रति जागरूक करना और आतंकवाद के मुद्दे पर निर्णय लेने में उन्हें अपने पक्ष में लाना है।”

UNSC के मौजूदा सदस्य

P5 देशों (अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और यूनाइटेड किंगडम) के अलावा, UNSC के 10 नॉन परमानेंट मेंबर्स में अल्जीरिया, डेनमार्क, ग्रीस, गुयाना, पाकिस्तान, पनामा, दक्षिण कोरिया, सिएरा लियोन, स्लोवेनिया और सोमालिया शामिल हैं।

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 6 जून 2024 को हुए मतदान में 2026-2027 के लिए सुरक्षा परिषद के पांच नए गैर-स्थायी सदस्यों का चयन किया है। ये देश हैं- कनाडा, जर्मनी, थाईलैंड, उगांडा, और वेनेजुएला। इनका कार्यकाल 1 जनवरी 2026 से शुरू होकर 31 दिसंबर 2027 तक चलेगा।

सुरक्षा परिषद में कुल 15 सदस्य होते हैं, जिनमें 5 स्थायी (चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन, और अमेरिका) और 10 गैर-स्थायी सदस्य शामिल हैं। गैर-स्थायी सदस्यों का चुनाव हर साल पांच सीटों के लिए होता है, ताकि दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व हो सके। इस बार कनाडा और जर्मनी पश्चिमी यूरोप और अन्य क्षेत्र से, थाईलैंड एशिया-प्रशांत से, उगांडा अफ्रीका से, और वेनेजुएला लैटिन अमेरिका और कैरिबियन क्षेत्र से चुने गए हैं।

ये नए सदस्य अल्जीरिया, गुयाना, दक्षिण कोरिया, सिएरा लियोन, और स्लोवेनिया की जगह लेंगे, जिनका कार्यकाल 31 दिसंबर 2025 को खत्म होगा। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद वैश्विक शांति और सुरक्षा के लिए अहम फैसले लेती है, और इन नए सदस्यों की भूमिका अगले दो सालों में महत्वपूर्ण होगी।

क्या यह कदम पीएम मोदी की छवि को और मजबूत करेगा?

सरकार से जुड़े सूत्रों का कहना है कि इस अभियान का मकसद साफ है, पाकिस्तान के आतंकवाद प्रायोजन को वैश्विक मंच पर उजागर करना और TRF को UNSC की 1267 सेंक्शन्स कमेटी के तहत आतंकवादी संगठन घोषित करवाना। लेकिन इस अभियान का एक और बड़ी खूबी है, जो राजनीतिक और कूटनीतिक दोनों रूप से महत्वपूर्ण है। वह है विपक्षी नेताओं की भागीदारी।

विपक्षी नेताओं का इस अभियान में शामिल होना भारत के आतंकवाद विरोधी रुख में एकता का प्रतीक है। शशि थरूर, कनिमोई करुणानिधि, और सुप्रिया सुले जैसे प्रमुख विपक्षी चेहरों का नेतृत्व वैश्विक समुदाय को यह संदेश देता है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भारत का राजनीतिक वर्ग एकजुट है। इससे न केवल भारत की कूटनीतिक ताकत बढ़ती है, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस छवि को भी मजबूत करती है, जिसमें वे सभी दलों को साथ लेकर चलने वाले नेता के रूप में दिखते हैं।

सूत्रों के मुताबिक, इस अभियान से मोदी की छवि को कई तरह से फायदा हो सकता है। सबसे पहले, यह वैश्विक मंच पर भारत को एक मजबूत और एकजुट राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत करता है, जहां सत्तारूढ़ और विपक्षी दल एक संवेदनशील मुद्दे पर कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे हैं। यह संदेश उन देशों के लिए खासा प्रभावी है, जो भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी को महत्व देते हैं। दूसरा, यह मोदी की कूटनीतिक रणनीति को और मजबूत करता है, जिसमें वे न केवल भारत की आवाज को वैश्विक मंच पर बुलंद करते हैं, बल्कि विपक्ष को भी राष्ट्रीय हितों के लिए साथ लाते हैं।

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इसके अलावा, यह अभियान मोदी सरकार की आतंकवाद के प्रति जीरो टॉलरेंस नीति को और मजबूत करता है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद विपक्षी नेताओं को इस अभियान में शामिल करना यह दर्शाता है कि भारत का यह कदम केवल एक सरकार का नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र का है। यह पूरी दुनिया को यह भरोसा होगा कि भारत आतंकवाद के खिलाफ अपनी लड़ाई में पूरी तरह प्रतिबद्ध और एकजुट है।

China-Bangladesh: क्या डोकलाम ट्राईजंक्शन पर फिर है चीन की नजर? इस बार बांग्लादेश भी है साथ, भारत ने ‘तीस्ता प्रहार’ से दिया जवाब

China-Bangladesh Eye Doklam Tri-Junction Again, India Responds with 'Teesta Prahar'
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China-Bangladesh: भारत और पाकिस्तान के बढ़ते तनाव के बीच चीन अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है। पहले तो चीन ने पांचवी बार अरुणाचल प्रदेश में कुछ जगहों के नाम बदले, जिसका भारत ने पुरजोर विरोध जताया। वहीं अब खबर यह है कि चीन अब बांग्लादेश को भारत के खिलाफ इस्तेमाल करने की योजना बना रहा है। हाल ही में चीनी सेना के अधिकारियों ने बांग्लादेश के रंगपुर जिले में एक पुराने हवाई अड्डे का दौरा किया, जो भारत की सीमा से मात्र 20 किलोमीटर दूर है। यह हवाई अड्डा भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों को जोड़ने वाले सिलिगुड़ी कॉरिडोर यानी ‘चिकन नेक’ से सिर्फ 135 किलोमीटर की दूरी पर है और डोकलाम ट्राईजंक्शन के पास है। भारतीय खुफिया एजेंसियां इस घटना पर नजर रख रही हैं और इसे भारत की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा माना जा रहा है।

China-Bangladesh: बांग्लादेश में चीन की बढ़ती मौजूदगी

चीन ने पहले पाकिस्तान को भारत के खिलाफ अपने हथियारों की ‘टेस्टिंग’ करने के लिए इस्तेमाल किया था। वहीं, अब वह बांग्लादेश को भी इसी तरह की रणनीति में शामिल करने की कोशिश कर रहा है। चीन की नजरें रंगपुर जिले में स्थित द्वितीय विश्व युद्ध के समय के लालमोनिरहाट हवाई अड्डे पर हैं। इस हवाई अड्डे को 1931 में एक सैन्य अड्डे के रूप में बनाया गया था और उस समय यह एशिया के सबसे बड़े हवाई अड्डों में से एक था। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान मित्र राष्ट्रों ने इस अड्डे से बर्मा और दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों में सैन्य अभियान चलाए थे।

हालांकि, 1971 में बांग्लादेश की आजादी के बाद इस हवाई अड्डे को बांग्लादेश वायु सेना (बीएएफ) का मुख्यालय बनाने की योजना बनी थी, लेकिन यह योजना धूल खाती रही। अब मार्च 2025 में ढाका ने इस हवाई अड्डे को फिर से डेवलप करने का फैसला किया है और इसके लिए चीन से मदद मांगी है।

भारत के लिए क्यों है खतरा?

लालमोनिरहाट हवाई अड्डा भारत के लिए कई कारणों से खतरा बन सकता है। यह हवाई अड्डा भारत की सीमा से बहुत करीब है और सिलिगुड़ी कॉरिडोर के नजदीक है। सिलिगुड़ी कॉरिडोर भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों असम, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, नगालैंड, मेघालय, त्रिपुरा, मणिपुर और सिक्किम को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ता है। यह कॉरिडोर सिर्फ 22 किलोमीटर चौड़ा है और कुछ जगहों पर तो यह चौड़ाई 17 किलोमीटर तक है। यह इलाका नेपाल, भूटान और बांग्लादेश से घिरा हुआ है, जिसके कारण इसे ‘चिकन नेक’ कहा जाता है।

भारतीय सेना के पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल अनिल आहूजा (रिटायर्ड) का कहना है, “अगर बांग्लादेश ने चीनी वायु सेना (पीएलएएएफ) या पाकिस्तानी वायु सेना (पीएएफ) को इस हवाई अड्डे तक पहुंच दे दी, तो यह भारत के लिए बहुत बड़ा खतरा होगा। इससे न सिर्फ हमारे उत्तर-पूर्वी राज्यों पर खतरा मंडराएगा, बल्कि अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, जो मलक्का स्ट्रेट के मुहाने पर हैं, वे भी प्रभावित होंगे। मलक्का स्ट्रेट चीन के लिए एक महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है, और अगर चीन वहां अपनी मौजूदगी बढ़ाता है, तो भारत की सामरिक स्थिति कमजोर हो सकती है।”

समुद्री सुरक्षा पर असर

लेफ्टिनेंट जनरल आहूजा ने यह भी बताया, बांग्लादेश में हवाई अड्डे तक पहुंच से चीन की वायु सेना को बंगाल की खाड़ी तक अपनी पहुंच बढ़ाने का मौका मिलेगा। अभी तक चीन के पास इतनी दूर तक पहुंचने की क्षमता नहीं थी। अंडमान और निकोबार द्वीप समूह भारत के लिए सामरिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि इससे भारत की हिंद महासागर में स्थिति मजबूत होती है। अगर चीन वहां तक अपनी वायु सेना को भेजने में सक्षम हो गया, तो भारत की समुद्री सुरक्षा पर गंभीर खतरा मंडरा सकता है।

बांग्लादेश के पास हैं चीनी हथियार

चीन पिछले कई सालों से बांग्लादेश को हथियारों की सप्लाई कर रहा है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिपरी) की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2019 से 2023 के बीच पाकिस्तान को 82 फीसदी हथियार चीन से मिले थे। हाल में हुए ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान ने चीनी हथियारों का जमकर इस्तेमाल किया था। इसमें जे-10सी और जेएफ-17 लड़ाकू विमान, पीएल-12 और पीएल-15 मिसाइलों के अलावा एचक्यू-9 एय़र डिफेंस सिस्टम शामिल थे।

बांग्लादेश की सेना में भी चीनी हथियारों की भरमार है। सिपरी के अनुसार, बांग्लादेश की सेना के 82 फीसदी हथियार चीन से आए हैं। इनमें मिंग-क्लास डीजल-इलेक्ट्रिक हमलावर पनडुब्बियां, शादिनोता-क्लास सी13बी कॉर्वेट्स, एमबीटी-2000 टैंक, वीटी-5 हल्के टैंक, एचक्यू-7 सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलें और 36 एफ-7बीजीआई लड़ाकू विमान शामिल हैं। इसके अलावा, चीन ने बांग्लादेश को छोटे और हल्के हथियार बनाने का लाइसेंस भी दिया है।

लेफ्टिनेंट जनरल आहूजा ने चेतावनी दी, “अगर बांग्लादेश ने चीन या पाकिस्तान को हवाई अड्डे तक पहुंच नहीं भी दी, तब भी यह खतरा बना रहेगा। अगर चीन ने बांग्लादेश को वही हथियार और हवाई मिसाइलें दीं, जो उसने पाकिस्तान को दी हैं, तो भारत के लिए खतरा बढ़ जाएगा। हमें इन पर कड़ी नजर रखने की जरूरत है।”

बांग्लादेशी नेताओं के बयान- खतरे की घंटी 

वहीं, बांग्लादेश की सरकार और वहां के नेताओं के बयान भी चिंता बढ़ा रहे हैं। बांग्लादेश के अंतरिम सरकार के प्रमुख मुहम्मद यूनुस के करीबी नेताओं ने हाल ही में भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों पर कब्जा करने की बात कही है। ये बयान भारत के लिए खतरे की घंटी हैं, क्योंकि अगर बांग्लादेश और चीन मिल गए तो तो भारत की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

भारतीय सेना के (रिटायर्ड) पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल सुब्रत साहा ने कहा, “शांतिकाल में इतने करीब एक हवाई अड्डा दुश्मन को हमारी गतिविधियों पर नजर रखने का मौका देता है। लेकिन युद्ध के समय यह दुश्मन के लिए एक कमजोरी भी बन सकता है, क्योंकि इसे आसानी से निशाना बनाया जा सकता है। हालांकि, बड़े ज्योस्ट्रेटेजिक के लेंस में देखें, तो उत्तर में चीन और दक्षिण में यूनुस का बांग्लादेश भारत के लिए एक बड़ी चुनौती है। अगर यह रिपोर्ट सही है, तो इसे जल्द से जल्द रोकना होगा।”

सिलिगुड़ी कॉरिडोर की सुरक्षा बेहद जरूरी

सिलिगुड़ी कॉरिडोर भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह उत्तर-पूर्वी राज्यों को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने का एकमात्र रास्ता है। अगर इस कॉरिडोर पर किसी तरह का हमला होता है या इसे बंद कर दिया जाता है, तो उत्तर-पूर्वी राज्यों का संपर्क मुख्य भारत से टूट सकता है। इस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति इसे और भी संवेदनशील बनाती है, क्योंकि यह तीन देशों नेपाल, भूटान और बांग्लादेश से घिरा हुआ है। यह नेपाल, भूटान, और बांग्लादेश की सीमाओं के साथ-साथ भारत-चीन-भूटान ट्राई-जंक्शन (Doklam area) के पास है।

अगर चीन और बांग्लादेश मिलकर इस क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाते हैं, तो भारत के लिए रणनीतिक चुनौतियां बढ़ जाएंगी। लालमोनिरहाट हवाई अड्डे का चार किलोमीटर लंबी रनवे, बड़ा टैक्सीवे और हैंगर किसी भी मिलिट्री ऑपरेशन के लिए इस्तेमाल हो सकता है। अगर चीनी या पाकिस्तानी वायु सेना को यहां से उड़ान भरने की अनुमति मिलती है, तो वे आसानी से सिलिगुड़ी कॉरिडोर को निशाना बना सकते हैं।

भारतीय सेना ने कसी कमर

सिलीगुड़ी कॉरिडोर को अहमियत भारत भी समझता है। चीन औऱ पाकिस्तान जिस तरह से इस कॉरिडोर से सटे रंगपुर पर नजरें गड़ाएं बैठे हैं, इस पर भारत की पूरी नजर है। इसी महीने मई 2025 में सिलीगुड़ी कॉरिडोर के पास भारतीय सेना ने एख मिलिट्री एक्सरसाइज “तीस्ता प्रहार” भी की थी। यह अभ्यास पश्चिम बंगाल के तीस्ता फील्ड फायरिंग रेंज में हुआ और इसका उद्देश्य क्षेत्र की सुरक्षा को मजबूत करना था। तीन दिन तक चले इस अभ्यास में पैदल सेना (इन्फैंट्री), तोपखाना, बख्तरबंद रेजिमेंट, मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री, स्पेशल फोर्सेज, आर्मी एविएशन, इंजीनियर और सिग्नल यूनिट्स ने हिस्सा लिया। इसमें आधुनिक हथियारों, जैसे हैवी आर्टिलरी और LMG, के साथ-साथ लेटेस्ट टेक्नोलॉजी का भी इस्तेमाल किया गया। अभ्यास का उद्देश्य प्रतिकूल परिस्थितियों में दुश्मन को परास्त करने की रणनीतियों को मजबूत करना और विभिन्न सैन्य इकाइयों के बीच तालमेल सुनिश्चित करना था।

Pakistan-Bangladesh Nexus: बड़ा खुलासा! बांग्लादेश में 1971 से पहले के हालात बनाना चाहती है पाकिस्तान की ISI, सिलिगुड़ी कॉरिडोर पर नजर

हालांकि अभी यह साफ नहीं है कि लालमोनिरहाट हवाई अड्डे को नागरिक उपयोग के लिए डेवलप किया जा रहा है या सैन्य उद्देश्यों के लिए। लेकिन यह साफ है कि भारत को अपनी सुरक्षा रणनीति को और मजबूत करना होगा। लेफ्टिनेंट जनरल साहा ने सुझाव दिया कि भारत को इस खतरे को शुरूआत में ही रोकना होगा। इसके लिए कूटनीतिक और सैन्य दोनों स्तरों पर कदम उठाने की जरूरत है। भारत को बांग्लादेश के साथ अपने संबंधों को बेहतर करने की कोशिश करनी चाहिए, ताकि वह चीन के प्रभाव में न आए। साथ ही, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में अपनी सैन्य मौजूदगी को और बढ़ाना होगा, ताकि बंगाल की खाड़ी में भारत की स्थिति मजबूत रहे।

Gen Munir Promotion!: क्या ऑपरेशन सिंदूर में हुई करारी हार को छोटा करने के लिए फील्ड मार्शल बने जनरल असीम मुनीर? 1965 की जंग में शिकस्त के बाद जनरल अयूब भी कर चुके हैं ऐसा

Munir Promotion: Field Marshal Rank to Mask Operation Sindoor Defeat, Echoes Ayub’s 1965 Move
Credit: AI Generated

Gen Munir Promotion!: पाकिस्तान एक बार फिर इतिहास के उस मोड़ पर खड़ा है, जहां सैन्य नेतृत्व और राजनीतिक स्थिरता दांव पर है। पाकिस्तान से आ रहीं रिपोर्ट्स के मुताबिक शहबाज शरीफ कैबिनेट ने सेना प्रमुख जनरल सैयद असीम मुनीर को फील्ड मार्शल का ओहदा देने का एलान किया है। विश्लेषकों का मानना है कि यह बिल्कुल वैसा ही जब 1965 में जनरल मोहम्मद अयूब खान खुद फील्ड मार्शल बन गए थे। यह तब हुआ था जब 1965 के भारत-पाक युद्ध में करारी हार के बाद छवि बचाने और सेना में असंतोष को दबाने के लिए ऐसा किया गया था। सूत्रों का दावा है कि ऑपरेशन सिंदूर (7-10 मई 2025) में भारत के हाथों करारी हार के बाद, अगर मुनीर को यह दर्जा न दिया जाता, तो सेना के भीतर बगावत की आशंका थी। आर्थिक संकट, बलूचिस्तान और TTP विद्रोह, और इमरान खान के समर्थकों का विरोध भी इस फैसला के पीछे बड़ी वजह है।

Gen Munir Promotion!: ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान की करारी हार

22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 26 लोग मारे गए, जिसके बाद भारत-पाक तनाव को चरम पर पहुंच गया। भारत ने इसका जवाब ऑपरेशन सिंदूर (7-10 मई 2025) के जरिए दिया। भारतीय सेना ने सटीक मिसाइल और हवाई हमलों के जरिए पाकिस्तान और पाक-अधिकृत कश्मीर (PoK) में आतंकी ठिकानों और सैन्य ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाया। भारत ने 9 आतंकी ठिकानों पर बमबारी करके जैश-ए-मोहम्मद (बहावलपुर में मारकज सुभान अल्लाह, मुजफ्फराबाद में सैय्यदना बिलाल), लश्कर-ए-तैयबा (मुरिदके में मारकज तैबा), और हिजबुल मुजाहिदीन के ठिकानों को नष्ट कर दिया। इसमें 100+ आतंकवादी मारे गए।

इसके अलावा भारत ने ऑपरेशन के तहत पाकिस्तान के 12 हवाई अड्डों को तबाह कर दिया। नूर खान एयर बेस (रावलपिंडी), मुरिद, रफीकी (झांग), स्कर्दू, जैकोबाबाद, सरगोधा, और भोली के हवाई अड्डों को निशाना बनाया गया। इसमें रडार सिस्टम, विमान हैंगर, और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर तबाह हो गए। पाकिस्तानी सेना प्रवक्ता लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ ने चार से छह अड्डों को नुकसान की पुष्टि की। इसके अलावा भारतीय ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों, स्कैल्प मिसाइलों, पाकिस्तान के चीनी मूल के HQ-9 और LY-80 एय़र डिफेंस सिस्टम को बेकार कर दिया। सियालकोट के पासरूर आर्मी कैंट, नूर खान बेस, और लाहौर के रडार सिस्टम नष्ट हुए। PoK और सीमावर्ती क्षेत्रों में कई पाकिस्तानी सैन्य चौकियां भी तबाह हुईं। सैटेलाइट तस्वीरों ने इन चौकियों को नुकसान की पुष्टि की।

इसके अलावा भारतीय हमले में पाकिस्तान के 5-7 फाइटर जेट और सैकड़ों ड्रोन भी निशाना बने। भारत ने गुजरात के कच्छ और जम्मू-कश्मीर में कई पाकिस्तानी ड्रोन मार गिराए। इन हमलों पाकिस्तान के 35-40 सैनिकों समेत 100+ आतंकवादी भी मारे गए। हालांकि पाकिस्तान ने पहले केवल 11 सैनिकों की मौत स्वीकारी थी। पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत की जवाबी कार्रवाई से पाकिस्तान इतना घबराया कि 9-10 मई की रात जनरल मुनीर ने प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को फोन कर हमलों की गंभीरता बताते हुए युद्धविराम करने की बात कही।

बंकर में छुप गए थे मुनीर

वहीं, भारतीय सेना की जवाबी कार्रवाई इतनी जबरदस्त थी कि पूरी पाकिस्तानी सेना घुटनों पर आ गई। इन हमलों ने न केवल पाकिस्तानी सेना की कमजोरी उजागर की, बल्कि जनरल मुनीर की रणनीति पर भी सवाल उठाए। खुद पाकिस्तान की अवाम ने भी अपनी सेना की कायरता को जमकर कोसा। सूत्रों के अनुसार, भारतीय हमलों के दौरान असीम मुनीर को रावलपिंडी के जनरल हेडक्वार्टर्स (GHQ) में एक बंकर में छिपना पड़ा। इमरान खान के समर्थकों ने उनकी इस “कायरता” पर जमकर हमला बोला। पूरे पाकिस्तान में #MunirOut जैसे सोशल मीडिया कैंपेन चलाए गए।

1965 में भी हुआ था ऐसा

सूत्रों का कहना है कि पाकिस्तान के मौजूदा हालात 1965 की तुलना में कहीं अधिक मुश्किल और नाजुक हैं। अब जनरल मुनीर अपने पूर्ववर्ती जनरलों के तरह तख्तापलट तो कर नहीं सकते थे, क्योंकि अमेरिका अब ऐसा होने नहीं देगा। तो मुनीर के सामने अपनी छवि बचाने के लिए एक ही रास्ता था कि वह जनरल अयूब की तरह फील्ड मार्शल बन जाएं औऱ सेना के भीतर उठ ही नाराजगी पर कुछ लगाम कसने की कोशिश करें।

मोहम्मद अयूब खान 1951 में वे पाकिस्तान के पहले सेनाध्यक्ष बने थे। 1958 में, उन्होंने तख्तापलट के जरिए सत्ता पर कब्जा किया और राष्ट्रपति बन गए। इस तख्तापलट की वजह उन्होंने तत्कालीन सरकार की अस्थिरता, भ्रष्टाचार और राजनीतिक अराजकता को बताया और देश में मार्शल लॉ लागू कर दिया। लेकिन वहां की अवाम में सेना को लेकर नाराजगी शुरू हो गई। जिसके बाद अपनी साथ बचाने के लिए जनरल अयूब ने कश्मीर का सहारा लिया और कश्मीर में ऑपरेशन जिब्राल्टर शुरू किया, जिसमें पाकिस्तानी सेना ने घुसपैठियों को कश्मीर भेजा और विद्रोह भड़काने की कोशिश की। लेकिन यह योजना असफल रही, क्योंकि कश्मीरी अवाम ने इसका समर्थन नहीं किया, और भारतीय सेना ने घुसपैठियों को पकड़ लिया और मार गिराया। इससे पाकिस्तान बुरी तरह भड़क गया और ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम शुरू किया, जिसमें उसने जम्मू-कश्मीर के अखनूर सेक्टर पर कब्जा करने की कोशिश की। यह भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र था, क्योंकि यह जम्मू को कश्मीर घाटी से जोड़ता था। भारत ने इस हमले का जवाब न केवल कश्मीर में, बल्कि अंतरराष्ट्रीय सीमा पर आक्रामक कार्रवाई के साथ दिया।

भारतीय सेना ने पार की अंतरराष्ट्रीय सीमा

पाकिस्तान ने युद्ध को कश्मीर तक सीमित रखने की योजना बनाई थी, यह उम्मीद करते हुए कि भारत अंतरराष्ट्रीय सीमा पर हमला नहीं करेगा। लेकिन भारत ने 6 सितंबर 1965 को पंजाब में अंतरराष्ट्रीय सीमा पार करके लाहौर और सियालकोट सेक्टरों में हमला बोला। जहां पाकिस्तान ने अपनी अधिकांश सैन्य ताकत कश्मीर में लगा रखी थी, तो भारतीय सेना ने कश्मीर पर दबाव कम करने के लिए लाहौर और सियालकोट पर हमला बोल दिया। भारतीय सेना का लाहौर के बाहरी इलाकों में इच्छावाक नहर (Lahore Canal) तक पहुंच गई। इस दौरान, भारतीय सेना ने कई महत्वपूर्ण गांवों और कस्बों जैसे बुरकी पर कब्जा जमा लिया। यह पाकिस्तान के लिए एक बड़ा झटका था। हालांकि, भारतीय सेना ने लाहौर शहर पर कब्जा करने की कोशिश नहीं की। वहीं, भारतीय सेना ने सियालकोट सेक्टर में चविंडा और अन्य क्षेत्रों में भारी टैंक युद्ध लड़े, जो सबसे बड़े टैंक युद्धों में से एक था। युद्ध सितंबर 1965 में ताशकंद समझौते के साथ समाप्त हुआ, जिसमें दोनों पक्ष अपनी-अपनी सीमाओं पर वापस लौट गए। ताशकंद समझौता के तहत भारत ने हाजी पीर दर्रा जैसे कुछ क्षेत्रों को पाकिस्तान को वापस कर दिया।

1965 में भी चलाया जीत का प्रोपेगंडा

जैसे 2025 में जिस तरह से पाकिस्तान की हार हुई है, तब भी अयूब को करारी हार का सामना करना पड़ा था। पाकिस्तानी सेना का प्रचार तंत्र तेज हो गया औऱ 1965 के युद्ध को अपनी जीत बताना शुरू कर दिया। लेकिन पाकिस्तानी प्रचार ने दावा किया कि उसने लाहौर को “बचा लिया,” लेकिन वास्तव में भारतीय सेना ने रणनीतिक रूप से इन क्षेत्रों में दबाव बनाए रखा, जिससे पाकिस्तान को अपनी सेना को कश्मीर से हटाकर पंजाब में तैनात करना पड़ा। भारतीय सेना का लाहौर और सियालकोट तक पहुंचना अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए एक संदेश था कि भारत न केवल रक्षात्मक, बल्कि आक्रामक कार्रवाई करने में भी सक्षम है। वहीं, चविंडा की लड़ाई को पाकिस्तान में एक बड़ी जीत के रूप में प्रचारित किया गया। लेकिन वास्तविक परिणाम इसके उलट थे। खुद पाकिस्तानी सेना में ही जनरल अयूब की रणनीति पर सवाल उठने लगे, सेना में असंतोष बढ़ने लगा। इसी असंतोष को दबाने के लिए और बड़ी जीत का दिखावा करने के लिए जनरल अयूब ने खुद को फील्ड मार्शल घोषित कर दिया। इस तरह से पाकिस्तान को पहला स्वयंभू फील्ड मार्शल मिला।

1965 के बाद धीरे-धीरे कम होने लगी अयूब की लोकप्रियता

अयूब खान ने फील्ड मार्शल का दर्जा हासिल करके खुद को राष्ट्रीय नायक के रूप में स्थापित किया गया और युद्ध को “सफलता” के रूप में प्रचारित किया गया। यह सेना को एकजुट करने और उनके नेतृत्व में विश्वास बनाए रखने की कोशिश थी। यह अमेरिका जैसे सहयोगियों को यह दिखाने की भी कोशिश थी कि वह एक मजबूत क्षेत्रीय नेता हैं। 1965 के युद्ध ने पूर्वी पाकिस्तान में असंतोष को बढ़ाया, क्योंकि बंगाली आबादी को लगता था कि उनकी सुरक्षा को नजरअंदाज किया गया। यह 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम की एक बड़ी वजह बना। अयूब की लोकप्रियता 1965 के बाद धीरे-धीरे कम होने लगी। हालांकि फील्ड मार्शल का दर्जा अयूब की छवि को कुछ समय के लिए मजबूत करने में सफल रहा, लेकिन उन पर आर्थिक असमानता, भ्रष्टाचार के आरोप, और राजनीतिक दमन के आरोप लगने लगे। 1968-69 में विरोध प्रदर्शनों ने उन्हें सत्ता छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया। 1969 में, अयूब को सत्ता छोड़नी पड़ी, और जनरल याह्या खान ने मार्शल लॉ लागू कर दिया।

करगिल में हार के बाद मुशर्रफ ने किया था तख्तापलट

करगिल युद्ध में करारी हार के बाद तत्कालीन पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष जनरल परवेज मुशर्रफ ने 12 अक्टूबर 1999 को तख्तापलट करके तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की सरकार को उखाड़ फेंका और खुद सत्ता हथिया ली थी। मुशर्रफ 1998 से सेना प्रमुख थे, उन्होंने करगिल में घुसपैठ की योजना बनाई, जिसके बारे में नवाज शरीफ को पूरी जानकारी नहीं थी। करगिल युद्ध में पाकिस्तान को भारी नुकसान हुआ, और नवाज शरीफ ने अंतरराष्ट्रीय दबाव में सैनिकों को वापस बुलाया, जिससे सेना में असंतोष बढ़ा। 1999 में करगिल हार के बाद शरीफ ने मुशर्रफ को हटाने की कोशिश की, लेकिन सेना ने तख्तापलट कर शरीफ को अपदस्थ कर दिया। मुशर्रफ ने चीफ एग्जीक्यूटिव का पद संभाला और 2001 में राष्ट्रपति बने।

2025 में पाकिस्तान में आतंरिक चुनौतियां

मुनीर का फील्ड मार्शल बनने के पीछे भी यही वजह है। ऑपरेशन सिंदूर की हार ने उनकी स्थिति को कमजोर किया है, और सेना के भीतर बगावत की आशंका ने इस कदम को जरूरी बना दिया। ऑपरेशन सिंदूर में जिस तरह से नूर खान बेस, रडार सिस्टम, और सैन्य चौकियों की तबाही हुई उससे मुनीर की रणनीतिक कमजोरी साफ दिखी। उनके कार्यकाल में बलूचिस्तान में विद्रोही हमले और खैबर पख्तूनख्वा में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) की गतिविधियां बढ़ रही हैं। इससे सेना के मनोबल पर असर पड़ रहा है। अगर मुनीर को यह दर्जा न दिया जाता, तो तख्तापलट या बगावत की आशंका थी। इमरान खान समर्थकों ने मुनीर को “कायर” और “अक्षम” करार दिया है। #MunirOut अभियान ने उनकी स्थिति को और कमजोर किया है।

सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तानी सेना के कुछ वरिष्ठ अफसर मुनीर की भारत और अफगानिस्तान नीतियों को “आत्मघाती” मानते हैं। वह कहते हैं कि ऐसा करके मनीर को खुद को ‘सेफ’ कर लिया। मुनीर का कार्यकाल नवंबर 2025 में समाप्त हो रहा है। हालांकि उन्हें कार्यकाल खत्म होने के बाद जनरल का पद छोड़ना पड़ेगा, लेकिन वह आजीवन फील्ड मार्शल बने रहेंगे। इससे सेना में उन्हें जीवनभर ‘सम्मान’ मिलता रहेगा और सेना पर पकड़ बनी रहेगी। साथ ही, इससे चीन और रूस जैसे सहयोगियों को यह संदेश देने की कोशिश है कि पाकिस्तानी सेना एकजुट और ताकतवर है।

भारत की जीत को छोटा करने की कोशिश

ऑपरेशन सिंदूर में जिस तरह से भारतीय सेना ने शानदार प्रदर्शन करके पाकिस्तान की सैन्य ताकत को औकात दिखाई है, वह पाकिस्तान के गले नहीं उतर रही है। भारत ने पहलगाम हमले के बाद आतंकवाद के खिलाफ अपनी सख्त नीति को वैश्विक मंच पर मजबूती से रखा। ऑपरेशन सिंदूर से भारतीय सेना ने अपनी सटीक और आक्रामक जवाबी कार्रवाई की क्षमता का प्रदर्शन पूरी दुनिया के सामने किया है, इससे उसकी साख बढ़ी है। पाकिस्तान का यह कदम भारत के नैरेटिव, विशेष रूप से कश्मीर में आतंकवाद और पाकिस्तान की भूमिका को लेकर, को कमजोर करने की कोशिश हो सकता है।

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भारत में फील्ड मार्शल- सैन्य गौरव का प्रतीक

वहीं, पाकिस्तान के उलट भारत में फील्ड मार्शल का पद बेहद सम्मानजनक माना जाता है। यह पद केवल असाधारण योगदान के लिए दिया जाता है। अब तक केवल तीन सैन्य नायकों को यह दर्जा मिला है: सैम मानेकशॉ, कोडंडेरा एम. करियप्पा, और अर्जन सिंह। सैम मानेकशॉ को जनवरी 1973 में फील्ड मार्शल बनाया गया, उसी महीने वे सेना प्रमुख के पद से रिटायर हुए थे। 1971 के भारत-पाक युद्ध में उनकी रणनीति ने बांग्लादेश की स्थापना और पाकिस्तान की हार सुनिश्चित की। कोडंडेरा एम. करियप्पा, भारत के पहले सेना प्रमुख, उन्हें 1986 में यह दर्जा मिला, यानी उनके 1953 के रिटायरमेंट के 33 साल बाद। 1947-48 के भारत-पाक युद्ध में उनकी नेतृत्व क्षमता ने कश्मीर की सुरक्षा की। वहीं अर्जन सिंह, भारतीय वायुसेना के दिग्गज, को 2002 में मार्शल ऑफ द एय़रफोर्स बनाया गया। 1969 में रिटायर होने के बाद, 1965 के युद्ध में उनके नेतृत्व को सम्मानित किया गया।

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Army Chief Longewala Visit: भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने सोमवार को 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान अपनी ऐतिहासिक जीत के लिए प्रसिद्ध राजस्थान के लोंगेवाला में इंटरनेशनल बॉर्डर के नजदीक स्थित सैन्य चौकी का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर में अहम योगदान देने वाले सैनिकों की जमकर तारीफ की। जनरल द्विवेदी ने भारतीय वायुसेना (IAF) और सीमा सुरक्षा बल (BSF) के साथ मिलकर किए गए संयुक्त अभियान की समीक्षा भी की, जिसमें रेगिस्तानी इलाके में रणनीतिक तैयारियों और कॉर्डिनेशन पर विशेष ध्यान दिया गया। आर्मी चीफ के इस दौरे के दौरान उनके पीछे नजर आया एक खास वेपन सिस्टम जिसने सभी का ध्यान अपनी ओर खींचा। आर्मी चीफ ने उसी के आगे खड़े होकर वहां मौजूद जवानों को संबोधित किया। जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने लोंगेवाला के दौरे के दौरान इस जंग की वीरता को याद किया। उन्होंने कहा, “लोंगेवाला की जंग हमें सिखाती है कि हिम्मत और रणनीति के सामने कोई ताकत नहीं टिक सकती। आज भी हमारे सैनिक उसी जज्बे के साथ देश की रक्षा कर रहे हैं।”

Army Chief Longewala Visit: लोंगेवाला का क्या है ऐतिहासिक महत्व

लोंगेवाला भारत-पाकिस्तान सीमा के पास एक छोटा सा गांव है, जो रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। 1971 के युद्ध में, मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी के नेतृत्व में 120 भारतीय सैनिकों ने सीमित संसाधनों के बावजूद यहां 3000 से अधिक पाकिस्तानी सैनिकों और टैंकों को रोककर इतिहास रच दिया था। आज भी यह क्षेत्र रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह भारत-पाकिस्तान सीमा के करीब स्थित है और रेगिस्तानी युद्ध की तैयारियों के लिए एक प्रमुख केंद्र है। इस जीत ने भारतीय सेना की वीरता और रणनीतिक कुशलता को पूरी दुनिया के सामने प्रदर्शित किया। आज भी यह क्षेत्र भारतीय सेना के लिए एक प्रतीकात्मक और रणनीतिक स्थल है, जहां नियमित रूप से सैन्य अभ्यास और तैयारियां की जाती हैं।

यह कहानी 4 दिसंबर 1971 की रात की है, जब राजस्थान के थार रेगिस्तान की सर्द रेत में 120 भारतीय सैनिक एक बड़े खतरे का सामना करने को तैयार थे। 1971 का युद्ध मुख्य रूप से पूर्वी मोर्चे पर केंद्रित था, जहां भारत बांग्लादेश की आजादी के लिए लड़ रहा था। उस समय पश्चिमी मोर्चे पर शांति थी, लेकिन पाकिस्तान के राष्ट्रपति याह्या खान की योजना कुछ और थी। उन्हें पता था कि पूर्वी पाकिस्तान ज्यादा दिन नहीं टिकेगा, इसलिए उन्होंने पश्चिमी सीमा पर हमला करने का फैसला किया।

उनका निशाना थी भारत-पाक सीमा के पास लोंगेवाला की छोटी सी चौकी। इस चौकी पर सिर्फ 120 सैनिक तैनात थे, जो 23वीं बटालियन, पंजाब रेजिमेंट का हिस्सा थे। इनके कमांडर थे मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी। उनके पास कोई टैंक नहीं था। दूसरी ओर, पाकिस्तान की तरफ से 2000 से ज्यादा सैनिक, 40 टैंक और भारी तोपखाने उनकी तरफ बढ़ रहा था। मेजर चांदपुरी के सामने दो रास्ते थे, या तो रामगढ़ की ओर पीछे हट जाएं, या फिर डटकर मुकाबला करें। उन्होंने हार नहीं मानी और लड़ने का फैसला किया। जवानों ने तुरंत रणनीति बनाई। उन्होंने नकली एंटी-टैंक माइंस बिछाकर दुश्मन को भ्रम में डाला, अपनी पोजीशन ली और हमले का इंतजार किया। आधी रात को पाकिस्तानी टैंक चौकी के करीब पहुंच गए और लोंगेवाला की जंग शुरू हो गई।

नकली माइंस बिछा कर पाकिस्तान को दिया चकमा

रात के 12:30 बजे पहला गोला दागा गया। धमाकों से रेगिस्तान में उजाला हो गया, लेकिन भारतीय सैनिकों ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने तब तक गोली नहीं चलाई, जब तक दुश्मन के टैंक 15 से 30 मीटर की दूरी पर नहीं आ गए। फिर रिकॉइललेस राइफल्स से हमला बोला गया और दो टैंक तुरंत नष्ट कर दिए गए। पाकिस्तानी सेना की मुश्किलें यहीं शुरू हो गईं। उनके कई टैंक रेगिस्तान की नरम रेत में फंस गए। कुछ टैंकों ने कांटेदार तार देखे और सोचा कि वहां माइंस बिछी हैं। उन्होंने इंजीनियरों को बुलाने के लिए दो घंटे तक इंतजार किया, लेकिन बाद में पता चला कि यह भारतीय सैनिकों की चाल थी। ये दो घंटे जंग के लिए निर्णायक साबित हुए।

Army Chief Longewala Visit: Strela-10M and ZU-23 Anti-Aircraft Guns Spotted

मेजर चांदपुरी और उनके जवानों ने ऊंचे टीलों से दुश्मन पर नजर रखी। उस रात चांदनी थी, जिसके कारण विस्फोट की रोशनी में रेगिस्तान साफ दिख रहा था। भारतीय सैनिकों ने इसका फायदा उठाया और दुश्मन पर हमला जारी रखा। दूसरी तरफ, पाकिस्तानी सेना की हालत खराब थी। उनके पास सही नक्शे नहीं थे, रेगिस्तानी इलाके का अनुभव नहीं था, टैंकों का ईंधन खत्म हो रहा था और रात उनके लिए मुसीबत बन गई। भारतीय सैनिकों का गोला-बारूद और समय दोनों खत्म हो रहा था। लेकिन जैसे ही सुबह हुई और आसमान गड़गड़ाहट से गूंज उठा। भारतीय वायुसेना के हॉकर हंटर और एचएएल मारुत विमान मौके पर पहुंच गए। पाकिस्तान के पास कोई एयर डिफेंस नहीं था। भारतीय वायुसेना ने रॉकेट, मशीन गन और सटीक हमलों से दुश्मन पर कहर बरपाया। पायलटों ने इसे बाद में “टर्की शूट” कहा, क्योंकि दुश्मन के टैंक आसानी से निशाना बन गए थे। एक छोटे विमान में बैठे फॉरवर्ड एयर कंट्रोलर ने जेट्स को सटीक दिशा-निर्देश दिए। खतरों के बीच उतरते-चढ़ते उन्होंने टारगेट मार्क किए। देखते ही देखते रेगिस्तान पाकिस्तानी टैंकों का कब्रिस्तान बन गया। उस युद्ध में पाकिस्तान के 36 टैंक तबाह हो चुके थे, 100 से ज्यादा बख्तरबंद वाहन नष्ट हो गए थे।

स्ट्रेला-10M ने खींचा सभी का ध्यान

आर्मी चीफ का लोंगोवाला दौरा ऐसे समय में हुआ है, जब भारत अपनी सीमाओं पर बढ़ते खतरों का सामना कर रहा है। लेकिन इस बार पाकिस्तान के टैंक नहीं, बल्कि उसके ड्रोन हैं, जिन्हें भारत के एय़र डिफेंस सिस्टम ने मार गिराया। सेना प्रमुख के दौरे के दौरान उनके पीछे खड़े कॉम्बैट व्हीकल स्ट्रेला-10M ने सभी का ध्यान खींचा। कॉम्बैट व्हीकल 9K35 स्ट्रेला-10M (Strela-10M) है, जो एक शॉर्ट-रेंज सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल सिस्टम (SAM) है। इसे NATO में SA-13 Gopher के नाम से जाना जाता है। भारतीय सेना इस सिस्टम का उपयोग हवाई हमलों, खासकर निचली ऊंचाई पर उड़ने वाले विमानों, हेलीकॉप्टरों और ड्रोनों से अपनी टुकड़ियों की सुरक्षा के लिए करती है।

स्ट्रेला-10M को सोवियत संघ ने 1970 के दशक में बनाया था। भारतीय सेना ने इसे 1980 के दशक में अपने बेड़े में शामिल किया था और तब से यह सेना के एय़र डिफेंस का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुई है। यह सिस्टम निचली ऊंचाई पर उड़ने वाले हेलीकॉप्टरों, विमानों और ड्रोनों को आसानी से निशाना बना सकता है।

स्ट्रेला-10M एक ट्रैक वाले वाहन (MT-LB) पर लगी होती है, जो इसे रेगिस्तानी और पहाड़ी इलाकों में आसानी से ले जाने में मदद करता है। इस वाहन पर चार मिसाइल लांचर लगे होते हैं, जो 9M37 मिसाइलों से लैस होते हैं। ये मिसाइलें 5 किलोमीटर की दूरी और 3.5 किलोमीटर की ऊंचाई तक दुश्मन के हवाई लक्ष्यों को मार गिरा सकती हैं। इसकी खासियत यह है कि यह इन्फ्रारेड सेंसर और ऑप्टिकल गाइडेंस सिस्टम से लैस है, जिसके कारण यह रात में या खराब मौसम में भी काम कर सकती है।

भारतीय सेना ने स्ट्रेला-10M को किया अपग्रेड

भारतीय सेना में स्ट्रेला-10M का इस्तेमाल मुख्य रूप से मैदानी टुकड़ियों की सुरक्षा के लिए किया जाता है। यह सिस्टम ब्रिगेड स्तर पर तैनात कि जाता है, जहां यह दुश्मन के हवाई हमलों से सैनिकों और टैंकों को बचाने का काम करती है। भारत जैसे देश में, जहां अलग-अलग तरह के इलाके जैसे रेगिस्तान, पहाड़ और मैदान हैं, ऐसे हालात में स्ट्रेला-10M बेहद उपयोगी है। इसका ट्रैक वाला वाहन रेगिस्तान की रेत में भी आसानी से चल सकता है।

हाल के वर्षों में ड्रोन हमलों का खतरा बढ़ा है, जिसके चलते भारतीय सेना ने स्ट्रेला-10M को अपग्रेड करने का फैसला किया। 2024 में इस सिस्टम को आधुनिक बनाने का काम शुरू हुआ, जिसमें नए सेंसर और ड्रोन-रोधी तकनीकों को जोड़ा गया। आर्मी चीफ के दौरे के दौरान इस अपग्रेडेड सिस्टम को प्रदर्शित किया गया, जो यह दिखाता है कि सेना अपनी पुरानी तकनीकों को भी आधुनिक युद्ध के लिए तैयार कर रही है।

ZSU-23-2 एंटी-एयरक्राफ्ट गन भी दिखी

लोंगेवाला में आर्मी चीफ के आगे दो ZSU-23-2 एंटी-एयरक्राफ्ट गन भी देखी गईं। ये गन तेजी से फायरिंग करके हवाई लक्ष्यों को नष्ट करने में सक्षम है। जेनिटनाया उस्टानोव्का ZU-23 (Zenitnaya Ustanovka ZU-23) एंटी-एयरक्राफ्ट गन ने 7 से 10 मई के बीच चले ऑपरेशन सिंदूर में तुर्की और चीनी ड्रोनों को आसमान से मार गिराने में अहम भूमिका निभाई। ZSU-23 और स्ट्रेला-10M मिलकर किसी भी छोटे-मोटे हवाई खतरे का सामना करने में सक्षम हैं।

Pakistan Air Defence: पाक एयर डिफेंस की 2022 की चूक बनी भारत की जीत का हथियार! ऑपरेशन सिंदूर में ब्रह्मोस के आगे क्यों फेल हुआ पाकिस्तान का सुरक्षा कवच?

ZU-23 एक सोवियत-युग की 23mm ट्विन-बैरल एंटी-एयरक्राफ्ट गन है, जिसे 1960 में बनाया गया था। यह गन 2.5 किलोमीटर की ऊंचाई और 2 किलोमीटर की दूरी तक हवाई लक्ष्यों को नष्ट कर सकती है। इसकी फायरिंग रेट 2000 राउंड प्रति मिनट है। ड्रोनों और निचली ऊंचाई पर उड़ने वाले विमानों के लिए यह काल है। विशेषज्ञों का कहना है कि ZU-23 जैसे हथियार आधुनिक युद्ध में ड्रोन खतरों से निपटने के लिए बेहद जरूरी हैं।

AI in Operation Sindoor: कैसे भारत की ‘छतरी’ बना आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस? ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तानी हवाई हमलों को ऐसे किया नाकाम

AI in Operation Sindoor: How artificial intelligence Thwarted Pakistan Aerial Attacks
Credit: AI Image

AI in Operation Sindoor: पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के तहत प्रतिक्रियात्मक कार्रवाई करते हुए न केवल पाकिस्तान के 9 आतंकी ठिकानों को नष्ट किया बल्कि उसके कई सैन्य ठिकानों और एयर स्ट्रिप्स को भी नुकसान पहुंचाया। जिसमें पाकिस्तान ने ड्रोन और मिसाइलों के जरिए भारत पर हवाई हमला करने की कोशिश की थी, जिसके जवाब में भारत ने उसके सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। खास बात यह रही कि भारत और पाकिस्तान के बीच 6 से 10 मई के बीच हुए चार दिन के सैन्य संघर्ष में भारतीय वायुसेना और सेना ने जिस कुशलता से जवाब दिया, उसके पीछे एक अदृश्य लेकिन बेहद ताकतवर सहयोगी था एडवांस “आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस” यानी AI। जी हां, भारत के पास पहले से ही तैयार की गई AI आधारित टेक्नोलॉजी ही थीं जिन्होंने दुश्मन के ड्रोन और मिसाइल हमलों को हवा में ही निशाना बना दिया।

डिफेंस सूत्रों के अनुसार, भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान के कई हवाई ठिकानों और सैन्य इन्फ्रास्ट्रक्चर को सफलतापूर्वक निशाना बनाया और पाकिस्तान की ओर से आने वाले दर्जनों हवाई हमलों को नाकाम किया। इस पूरे ऑपरेशन में भारत की ‘स्पेस टेक्नोलॉजी’, ‘इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर’ और ‘कंप्यूटर साइंस’ का जबरदस्त कॉम्बिनेशन देखने को मिला।

AI in Operation Sindoor: क्या हुआ था उस 6 और 7 मई की रात?

15 मई की रात, जब पूरा देश नींद में था, तब पाकिस्तानी सेना (AI in Operation Sindoor) ने भारत की सीमा के पास अपने ड्रोन और मिसाइलों को तैनात किया। इन हथियारों का मकसद भारत के सैन्य ठिकानों को नुकसान पहुंचाना और सीमावर्ती इलाकों में दहशत फैलाना था। डिफेंस सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान ने इस हमले के लिए अत्याधुनिक ड्रोनों का इस्तेमाल किया, जो रात के अंधेरे में चुपके से सीमा पार कर सकते थे। इसके अलावा, कुछ मिसाइलें भी दागी गईं, जो भारत के रडार सिस्टम को चकमा देने के लिए डिजाइन की गई थीं।

लेकिन पाकिस्तान की यह चाल कामयाब नहीं हो सकी। भारत की सेना ने अपनी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI in Operation Sindoor) से लैस एयर डिफेंस सिस्टम का इस्तेमाल कर इन हमलों को न केवल रोका, बल्कि दुश्मन के ड्रोन और मिसाइलों को हवा में ही नष्ट कर दिया। रक्षा मंत्रालय के एक अधिकारी ने बताया कि इस ऑपरेशन में भारत की “क्लाउड-बेस्ड इंटीग्रेटेड एय़र कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम” ने अहम भूमिका निभाई। इस सिस्टम ने न सिर्फ दुश्मन के ड्रोन और मिसाइलों का पता लगाया, बल्कि उनकी लोकेशन ट्रैक करके उन्हें नष्ट करने के लिए सही समय पर सटीक कार्रवाई भी की।

मिशन सिंदूर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने कैसे की मदद?

सूत्रों ने बताया कि भारत ने पिछले कुछ सालों में अपने डिफेंस सिस्टम को मजबूत करने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टेक्नोलॉजी (AI in Operation Sindoor) पर काफी काम किया है। 2018 में, रक्षा मंत्रालय ने एक खास टास्क फोर्स बनाई थी, जिसका मकसद नेशनल सिक्योरिटी के लिए एआई टेक्नोलॉजी को बढ़ावा देना था। इसके बाद डिफेंस AI काउंसिल (DAIC) और डिफेंस AI प्रोजेक्ट एजेंसी (DAIPA) का गठन हुआ, ताकि सेनाओं में AI को प्रभावी रूप से लागू किया जा सके। इस टास्क फोर्स ने कई सरकारी और निजी कंपनियों के साथ मिलकर एआई-बेस्ड डिफेंस सिस्टम्स को डेवलप करने की दिशा में काम शुरू किया। 2022 तक, भारत ने 129 एआई-बेस्ड प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी, जिनमें से 77 पूरी हो चुकी हैं। इन प्रोजेक्ट्स पर करीब 100 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं।

इन प्रोजेक्ट्स में से एक अहम सिस्टम है “इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम” (AICCS), जिसने इस हमले को रोकने में बड़ी भूमिका निभाई। यह सिस्टम एआई (AI in Operation Sindoor) की मदद से दुश्मन के हथियारों का पता लगाने, उनकी लोकेशन ट्रैक करने और उन्हें नष्ट करने में सक्षम है। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यह सिस्टम इतना एडवांस है कि यह रात के अंधेरे में भी दुश्मन के ड्रोन और मिसाइलों को कैच कर सकता है। इसके अलावा, यह सिस्टम हवा में मौजूद सभी वस्तुओं को स्कैन करता है और यह तय करता है कि कौन सी वस्तु खतरा है और कौन सी नहीं।

सूत्रों ने बताया कि यह सिस्टम जमीन, समुद्र और आकाश से दुश्मन की किसी भी गतिविधि को रियल टाइम में पहचान सकता है और उस पर तुरंत जवाबी कार्रवाई कर सकता है। AICCS ने मिसाइल और ड्रोन को ट्रैक करके उन्हें टारगेट पर पहुंचने से पहले ही हवा में नष्ट कर दिया।

भारत में बने सिस्टम ने दिखाई ताकत

पिछले कुछ सालों में भारत ने अपनी डिफेंस टेक्नोलॉजी (AI in Operation Sindoor) को मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए हैं। रक्षा मंत्रालय ने निजी कंपनियों को भी इस क्षेत्र में काम करने के लिए प्रोत्साहित किया है। 2022 में, सरकार ने 70 डिफेंस कंपनियों को एआई प्रोजेक्ट दिए, जिनमें से 40 पूरे हो चुके हैं। इनमें से भारत की सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) ने एक AI आधारित सिस्टम विकसित किया है, जो दुश्मन के विमानों की गतिविधियों को पहचान कर अलर्ट जारी करता है। यह सिस्टम भारत के इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम (IACCS) में इंटीग्रेट किया गया, इस सिस्टम ने पाकिस्तानी ड्रोन और मिसाइलों को पकड़ने में अहम भूमिका निभाई।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि एआई टेक्नोलॉजी (AI in Operation Sindoor) ने भारत के डिफेंस सिस्टम को पूरी तरह से बदल दिया है। पहले, भारत को दुश्मन के हमलों का पता लगाने के लिए पारंपरिक रडार सिस्टम पर निर्भर रहना पड़ता था, जो कई बार चूक जाते थे। लेकिन अब, एआई की मदद से भारत न केवल दुश्मन के हमलों को रोक सकता है, बल्कि सटीक कार्रवाई कर जवाब भी दे सकता है।

वहीं, रक्षा मंत्रालय ने अब अपनी तैयारियों को और मजबूत करने का फैसला किया है। मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि वह एआई टेक्नोलॉजी को और डेवलप करने के लिए काम करेगा, ताकि भविष्य में ऐसे हमलों को और बेहतर तरीके से रोका जा सके।

रक्षा मंत्रालय ने यह भी कहा कि वह सेना के सभी अंगों में एआई टेक्नोलॉजी (AI in Operation Sindoor) को लागू करने की योजना बना रहा है। इसके लिए मंत्रालय ने कई निजी कंपनियों के साथ करार किए हैं, जो एआई-आधारित सिस्टम डेपलप करने में मदद करेंगी। मंत्रालय का लक्ष्य है कि 2030 तक भारत की पूरा डिफेंस सिस्टम एआई टेक्नोलॉजी पर आधारित हो।

Pakistan Propaganda: आखिर आतंक की फैक्टरी होने के बावजूद पाकिस्तान से क्यों प्रेम कर रहा है पश्चिमी मीडिया? ट्रंप ने भी बताया महान स्टेट

हालांकि, कुछ विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि एआई टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल सावधानी से करना चाहिए। अगर यह टेक्नोलॉजी गलत हाथों में पड़ जाए, तो यह देश की सुरक्षा के लिए खतरा भी बन सकती है। इसलिए, सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि इस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल केवल सही मकसद के लिए हो।

Pakistan Propaganda: आखिर आतंक की फैक्टरी होने के बावजूद पाकिस्तान से क्यों प्रेम कर रहा है पश्चिमी मीडिया? ट्रंप ने भी बताया ‘महान स्टेट’

Pakistan Propaganda: Why Does Western Media Back a Terror State? Trump Calls It 'Great'

Pakistan Propaganda: भारत और पाकिस्तान के बीच चल रहे तनाव के बीच एक हैरान करने वाला सवाल उठ रहा है। आखिर क्यों पश्चिमी मीडिया आतंकी गतिविधियों से जुड़े होने के बावजूद पाकिस्तान का समर्थन कर रहा है? ऑपरेशन सिंदूर में भारत ने पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों को नष्ट कर उसकी सैन्य ताकत को बड़ा झटका दिया, लेकिन इसके बाद भी पश्चिमी मीडिया और कुछ वैश्विक नेता पाकिस्तान की तरफदारी करते दिख रहे हैं। यहां तक कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की तुलना भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से की और पाकिस्तान को “महान देश” बताया। इस बीच, भारत को भी अपने नैरेटिव को मजबूत करने के लिए विपक्षी नेताओं को आगे करना पड़ रहा है। जिन्हें कई देशों की याात्रा पर भेजा जाएगा, जो वहां जा कर पाकिस्तान के झूठ के बेनकाब करेंगे।

Pakistan Propaganda: पाकिस्तान के साथ है पश्चिमी मीडिया!

पिछले कुछ दिनों में पश्चिमी मीडिया ने भारत के ऑपरेशन सिंदूर को लेकर एकतरफा रुख अपनाया है। हालांकि सभी से पहलगाम हमले की निंदा तो की, लेकिन पाकिस्तान को ज्यादा खरीखोटी नहीं सुनाई। भारत ने साफ तौर पर कहा कि उसने सिर्फ आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया, लेकिन पाकिस्तान ने दावा किया कि भारत ने आम नागरिकों पर हमला किया। पश्चिमी मीडिया ने पाकिस्तान के इस दावे को प्रमुखता दी, जबकि भारत के सबूतों को नजरअंदाज किया। मिनट मिरर की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कई पश्चिमी मीडिया हाउस ने भारत पर “झूठा नैरेटिव” बनाने का आरोप लगाया और पाकिस्तान की सैन्य कार्रवाई को “जवाबी हमला” बताकर उसकी तारीफ की।

एक्स पर कुछ पोस्ट्स में भी इस बात का जिक्र है कि पश्चिमी मीडिया लगातार भारत की सच्चाई को कमतर दिखा रहा है और पाकिस्तान के प्रोपेगैंडा को बढ़ावा दे रहा है। एक यूजर ने लिखा, “पश्चिमी मीडिया इस्लामिक आतंकवाद को समर्थन देता है और भारत के खिलाफ पाकिस्तान के झूठ को फैलाता है।”

ट्रंप ने पाकिस्तान को बताया महान देश

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में भारत-पाकिस्तान के बीच सीजफायर के एलान के बाद दोनों देशों के नेताओं की तारीफ की। लेकिन उनके बयान ने भारत में कई सवाल खड़े कर दिए। ट्रंप ने कहा, “मैं शहबाज शरीफ और नरेंद्र मोदी को अच्छी तरह जानता हूं। दोनों महान नेता हैं और पाकिस्तान एक महान देश है।” ट्रंप ने यह भी कहा कि वो भारत और पाकिस्तान दोनों के साथ ट्रेड बढ़ाना चाहते हैं।

इस बयान की भारत में कड़ी आलोचना हुई। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने एक इंटरव्यू में कहा, “ट्रंप का बयान निराशाजनक है। भारत और पाकिस्तान को एक समान बताना ठीक नहीं है। भारत ने हमेशा आतंकवाद के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है, जबकि पाकिस्तान आतंकी गतिविधियों को बढ़ावा देता रहा है।”

पाकिस्तान का झूठ तोड़ने की तैयारी

पाकिस्तान के नैरेटिव को काउंटर करने के लिए भारत को अब विपक्षी नेताओं को भी आगे करना पड़ रहा है। विदेश मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक, भारत ने अपने विपक्षी नेताओं को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भेजने का फैसला किया है, ताकि पाकिस्तान के झूठ को बेनकाब किया जा सके। भारत ने साफ कर दिया है कि वो किसी भी तरह के आतंकवाद को बर्दाश्त नहीं करेगा और पाकिस्तान को जवाब देने के लिए हर कदम तैयार है।

पाकिस्तान की साख पर सवाल

पाकिस्तान को आतंकी गतिविधियों का समर्थन करने वाला देश माना जाता है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने शहबाज शरीफ से साफ कहा कि पाकिस्तान को आतंकी संगठनों का समर्थन बंद करना होगा। लेकिन इसके बावजूद पश्चिमी मीडिया और कुछ नेताओं का रुख हैरान करने वाला है। द न्यूयॉर्क टाइम्स ने भी सीजफायर के बाद पाकिस्तान की तारीफ की, जबकि भारत ने कहा कि पाकिस्तान ने समझौते का उल्लंघन किया।

राफेल को लेकर फैलाया नैरेटिव

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान की तरफ से खबरें फैलाई गईं कि इस हमले में उसके चीनी जे-10सी ने एक राफेल मार गिराया है। हालांकि सूबत के नाम पर पाकिस्तान के पास कुछ नहीं था। सोशल मीडिया पर भी पुरानी फोटो शेयर मॉर्फ करके शेयर की जा रही थीं। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा शरीफ भी चैनलों पर सोशल मीडिया का हवाला देकर झूठी जानकारी दे रहे थे। वहीं इस सब के बावजूद पश्चिमी मीडिया इस नैरेटिव को फैलाने में पाकिस्तान का साथ दे रहा था।

खुद फ्रांस में ही राफेल को लेकर सवाल उठाए गए। भारत के ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने दावा किया कि उसने तीन राफेल जेट्स को मार गिराया। हालांकि, फ्रांस24 ने इस दावे की पुष्टि करने वाली कोई ठोस जानकारी नहीं दी, लेकिन उसने राफेल की परफॉर्मेंस पर बहस छेड़ दी।

पाकिस्तान के इस दावे को लेकर कई पश्चिमी मीडिया हाउस ने भी रिपोर्ट्स छापीं। सीएनएन ने एक फ्रांसीसी इंटेलिजेंस ऑफिसर के हवाले से कहा कि कम से कम एक राफेल जेट मार गिराया गया। लेकिन द वाशिंगटन पोस्ट ने साफ किया कि जो मलबा मिला, वो जरूरी नहीं कि राफेल का ही हो, वो मिराज 2000 का भी हो सकता है। फ्रांस24 ने इस बात पर भी जोर दिया कि फ्रांस सरकार और दसा एविएशन ने ऑपरेशन सिन्दूर के दौरान राफेल के कथित नुकसान पर कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है। हालांकि फ्रांस24 ने इस बात को हाइलाइट किया कि ये जियोपॉलिटिकल गेम का हिस्सा हो सकता है, जिसमें अमेरिका और चीन अपने-अपने हथियारों को बढ़ावा देना चाहते हैं। फ्रांस24 ने एक फ्रांसीसी एक्सपर्ट जेवियर टाइटलमैन के हवाले से इस मामले पर कहा, “वायरल तस्वीरों में जो मलबा दिख रहा है, वो एक ड्रॉप टैंक का है। राफेल जैसे जेट्स मिशन के दौरान हल्का होने के लिए ड्रॉप टैंक गिरा देते हैं। ये तस्वीरें इस बात का सबूत नहीं हैं कि कोई जेट मार गिराया गया।”

क्यों समर्थन कर रहा है पश्चिमी मीडिया?

रिटायर्ड लेफ्टिनेंट केजेएस ढिल्लन भी इस मामले को ज्योपॉलिटिक्स से जोड़ कर देख कर रहे हैं। वह कहते हैं, जिस तरह से कई देश भारत को यूनाइटेड नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल का परमानेंट मेंबर होते नहीं देखना चाहते, वैसे ही वहां का मीडिया भी भारत को आगे बढ़चा नहीं देखना चाहता। जब से भारत ने पश्चिमी देशों से हथियारों की खरीदारी कम की है, तब से उनके हित प्रभावित हुए हैं, औऱ वे भारत कमतर करके आंकना चाहते हैं।

अंतरराष्ट्रीय मामलों के प्रोफेसर रिजवान अहमद कहते हैं, पाकिस्तान खुद आतंक की फैक्टरी है। अमेरिका में आतंकी हमले हुए उनकी साजिश पाकिस्तान में ही रची गई। मुंबई टैरर अटैक हुआ, तो आतंकी पाकिस्तान से आए थे। ओसामा बिन लादेन मारा जाता है, तो पाकिस्तान में, जहां उसे पनाह मिली हुई थी। ऑपरेशन सिंदूर में जब भारत ने मुरीदके और बहावलपुर में आतंक के मदरसे नष्ट किए तो पाकिस्तान फिर से लश्कर के मदरसों को बनवाने की बात कह रहा है। जिसका खर्च पाकिस्तान सरकार उठाएगी। वह कहते हैं कि आखिर पश्चिमी मीडिया को यह बात कब समझ में आएगी। वह कहते हैं कि पाकिस्तान खुद को आतंक से पीड़ित होने की बात करता है। पहले आतंक को पालता है फिर खुद पर हमले भी करवाता है और कहता है हम पर आतंकी हमले हो रहे हैं। बलुचिस्तान में हो रहे हमलों पर भारत का हाथ होने की बात कहता है। जबकि भारत औऱ बलुचिस्तान का नक्शा कहीं आपस में मिलता ही नहीं। जबकि आतंक की फैक्टरी पीओके भारत से लगा हुआ है।

कई जानकारों का मानना है कि पश्चिमी मीडिया का ये रवैया जियोपॉलिटिकल हितों से प्रेरित है। भारत के बढ़ते वैश्विक प्रभाव से कुछ पश्चिमी देश असहज हैं और वो पाकिस्तान को एक काउंटर के तौर पर इस्तेमाल करना चाहते हैं। इसके अलावा, पाकिस्तान ने हमेशा से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर “पीड़ित” का नैरेटिव बनाया है, जिसे पश्चिमी मीडिया आसानी से स्वीकार कर लेता है। मून ऑफ अल्बामा की एक रिपोर्ट में कहा गया कि ट्रंप प्रशासन भारत-पाकिस्तान तनाव में तटस्थ रुख अपनाना चाहता है, ताकि दोनों देशों के साथ अपने आर्थिक हितों को बनाए रख सके।

Pakistan Air Defence: पाक एयर डिफेंस की 2022 की चूक बनी भारत की जीत का हथियार! ऑपरेशन सिंदूर में ब्रह्मोस के आगे क्यों फेल हुआ पाकिस्तान का सुरक्षा कवच?

वहीं, भारत ने साफ कर दिया है कि वो किसी भी विदेशी मध्यस्थता को स्वीकार नहीं करेगा। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, “भारत ने अपनी ताकत से पाकिस्तान को सीजफायर के लिए मजबूर किया। ये हमारा आंतरिक मामला है।”