Dalai Lama Reincarnation: The most respected and influential spiritual leader of the Tibetan Buddhism four days before his 90th birthday, Dalai Lama said that even after his death, Dalai Lama’s institution (Institution of the Dalai Lama) will continue to move and his rebirth will only recognize the Gaden Fhodrang Trust. That only the "Ganband Fordrung Trust" established by them will have the right to recognize the next embodiment i.e. rebirth.
This statement came when the whole world was worried about their age. On July 6, 2025 he will be 90 years old. In such a question was repeatedly rising whether the 14th Dalai Lama will continue to exist after this institution?
Dalai Lama Reincarnation: How does Dalai Lama rebirth
Dalai Lama is the most prominent religious leader of the Tibetan Buddhism. "Dai Lama" means "The Ocean of Knowledge". This post is based on a "Reincarnation Tradition" (Reincarnation System). In the Tibetan Buddhist tradition, it is believed that when someone renounces high souls such as Dalai Lama Deh, they rebirth. This birth is meant to fulfill the same purpose, i.e. spreading the message of compassion, non-violence and spirituality in the world. It is believed that his soul takes birth in a newborn child and after years of discovery, that child is identified as the next generation Dalai Lama. The tradition of Dalai Lama is based on the Tulku system, i.e. identifying the soul of the former birth and training it to make the new Dalai Lama. After the death of a large Buddhist Guru, his rebirth is discovered.
🚨 BIG BREAKING | Dalai Lama Declares Sole Authority Over His Reincarnation
🕊️ His Holiness the Dalai Lama has affirmed that only the Gaden Phodrang Trust — The foundation of the foundation of the foundation of him — Will have the exclusive authority to recognize his future reincarnation.
📜 In his... pic.twitter.com/gtgdQ6XBuS
— Raksha Samachar | 🇮🇳 (@RakshaSamachar) July 2, 2019
The tradition of Dalai Lama is 600 years old. The first Dalai Lama was born in Gadun Drupa, 1391. This order has been followed since. Every Dalai Lama is considered as the rebirth of the soul of the last Dalai Lama.
The 14th Dalai Lama was born on July 6, 1935 in Takser village of Tibet. When they were just two years old, Tibetan Dharmagurus regarded him as the rebirth of the 13th Dalai Lama Tubten Gaitso. Special signals were used to identify them. A senior monk showed the objects of the 13th Dalai Lama to the small Lhamo Dondupe, so he recognized that the next Dalai Lama is. At the age of two, he was declared the rebirth of the 13th Dalai Lama and in 1940 he was officially entrusted at the Potala Palace of Lhasa and formally established as the spiritual leader of the Tibetan people. In the 1950s, when China captured Tibet, in 1959, he took up to India. Since then, they are living in Niwasan in the Dharamshala of Himachal Pradesh, where Tibetan Administration is working in Tibetan by the name of Central Tibetan Administration.

What did Dalai Lama take his rebirth?
The Tibetan Spiritual Guru Dalai Lama has clearly abolished that the Dalai Lama Foundation will continue after his death, and his future rebirth will be identified only by Gaden Phodrang Trust. He made this statement in response to the appeals coming consistently for 14 years of Buddhist followers of Tibet, Himalayan region, Mongolia, Russia and China.
"From 1969 I have said that Dalai Lama should be a rebirth or not, it should be a decision of people connected to the Tibetan public and Buddhist tradition," said Dalai Lama in his official statement. "" He also reiterated that China or any external entity has no right to interfere with this process.
Dalai Lama clarified that according to the guidelines issued in September 24, 2011, Gaden Phodrang Trust, which is part of his office, will fulfill this process as per the religious traditions. For this, advice will be taken from Buddhist scriptures and "Surthi Lamas".
While Dalai Lama did not discuss the issue public, he received letters and messages from many places over the past 14 years. Mainland China’s Buddhists, including Tibetan, Tibetan, Member of Tibetan Deported Parliament, People of Central Tibetan Administration (CTA), Non-Governmental Organization (NGO), Buddhist Republic of Himalayan Region, Mongolia, Russia, and Asia, wrote them a letter. All of these stressed that Dalai Lama’s institution is required to continue. In particular, the Tibetans living in Tibet also appealed to different means. Considering all these requests, Dalai Lama announced that Dalai Lama’s institution will go further.
It is important that this statement was prepared in Dharamsala on 21 May 2025 and was officially issued on 2 July 2025.
Chinese
दलाई लामा का यह बयान चीन के खिलाफ एक स्पष्ट संदेश है। चीन ने कई बार कहा है कि वह अगले दलाई लामा की नियुक्ति अपने नियंत्रण वाली धार्मिक संस्थाओं के जरिए करेगा। चीन सरकार “Golden Urn System” के तहत पुनर्जन्म प्रक्रिया को नियंत्रित करना चाहती है, जो एक तरह की पर्ची निकालने की प्रक्रिया है, जिसमें बालक का नाम रखा जाता है। लेकिन तिब्बती समुदाय और भारत इस कदम का सख्त विरोध करते हैं। दलाई लामा ने गदेन फोडरंग ट्रस्ट को अपने पुनर्जन्म की मान्यता देने का एकमात्र अधिकार देकर चीन के दावों को नकार दिया है। चीन द्वारा नियुक्त कोई भी दलाई लामा अवैध माना जाएगा। वहीं, इससे भारत की स्थिति को भी मजबूती मिलेगी, क्योंकि तिब्बती निर्वासित सरकार (गवर्नमेंट इन एक्साइल) हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में स्थित है। भारत को असली आध्यात्मिक उत्तराधिकारी की देखभाल करने वाला देश माना जाएगा। हालांकि, अगर चीन भविष्य में अपने तरीके से कोई दलाई लामा घोषित करता है, तो इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तनाव पैदा हो सकता है। उदाहरण के लिए, चीन पहले पंचेन लामा की नियुक्ति में हस्तक्षेप कर चुका है, और ऐसा ही कुछ यहां भी हो सकता है।
चीन ने बताया था दलाई लामा को “अलगाववादी”
चीन की सरकार 14वें दलाई लामा को “विभाजनकारी” (Splittist) और “अलगाववादी” बताती है। तिब्बत में दलाई लामा की तस्वीर रखना भी अपराध माना जाता है। 1989 में नोबेल शांति पुरस्कार पाने के बावजूद उनकी तस्वीरें सार्वजनिक रूप से दिखाने पर पाबंदी है। 2007 में चीन ने एक नया नियम बनाया जिसके तहत बिना सरकारी अनुमति के किसी बौद्ध नेता का पुनर्जन्म मान्य नहीं होगा। यानी चीन चाहता है कि दलाई लामा का उत्तराधिकारी सिर्फ उसकी मर्जी से घोषित हो। मार्च 2025 में, चीन के विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने दलाई लामा को “राजनीतिक निर्वासित” कहा, जिनका तिब्बती लोगों को प्रतिनिधित्व करने का कोई अधिकार नहीं है। इसलिए दलाई लामा की घोषणा चीन के उस एजेंडे को सीधी चुनौती देती है।
दलाई लामा की उम्र अब 90 साल के करीब है। वे जानते हैं कि उनके जाने के बाद क्या होगा, इसलिए वे अपनी शर्तों पर तैयारी कर रहे हैं। गदेन फोडरंग ट्रस्ट और बौद्ध धर्मगुरुओं के जरिए चयन प्रक्रिया को व्यवस्थित करके उन्होंने यह सुनिश्चित किया है कि राजनीतिक शक्तियां इस प्रक्रिया पर कब्जा न कर सकें। दलाई लामा दुनिया भर के बौद्ध समुदायों को एकजुट करने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि वे चीन के दावों को न मानें।
पंचेन लामा की क्या है भूमिका
पंचेन लामा को अमिताभ बुद्ध (बुद्ध के असीम प्रकाश के रूप) का अवतार माना जाता है, जो करुणा और ज्ञान का प्रतीक हैं। दूसरी ओर, दलाई लामा को अवलोकितेश्वर (करुणा के बुद्ध) का अवतार माना जाता है। पंचेन लामा गेलुग स्कूल में दलाई लामा के बाद दूसरा सबसे बड़ा आध्यात्मिक पद है। पंचेन लामाओं ने तिब्बती शासन में सलाहकार की भूमिका निभाई है, खासकर जब दलाई लामा नाबालिग होते थे या निर्वासित जीवन जी रहे होते थे।
वहीं, पारंपरिक रूप से, पंचेन लामा और दलाई लामा एक-दूसरे के पुनर्जन्म की पहचान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, क्योंकि दोनों की उम्र में लगभग 50 साल का अंतर होता है। यह रिश्ता गुरु-शिष्य की तरह होता है, जहां पंचेन लामा दलाई लामा के पुनर्जन्म की खोज में मदद करते हैं। पहले आधिकारिक पंचेन लामा, पंचेन लामा की परंपरा की शुरुआत 17वीं शताब्दी में हुई, जब 5वें दलाई लामा, न्गवांग लोबसांग ग्यत्सो, ने अपने गुरु लोबसांग चोकी ग्याल्त्सेन को पहला आधिकारिक पंचेन लामा घोषित किया। यह 1645 की बात है। लोबसांग चोकी ग्याल्त्सेन ताशिलहुनपो मठ (जो तिब्बत के शिगात्से में स्थित है) के प्रमुख थे। इसके बाद, कई अन्य लामाओं को मरणोपरांत पंचेन लामा की उपाधि दी गई, लेकिन आधिकारिक रूप से यह परंपरा 1645 से शुरू मानी जाती है। 10वें पंचेन लामा 1959 में दलाई लामा के निर्वासन के बाद तिब्बत में रहे, लेकिन बाद में चीन के साथ मतभेद के चलते वे नजरबंद रहे और 1989 में उनकी मृत्यु हो गई।
1995 में, दलाई लामा ने 6 साल के गेदुन चोएक्यी न्यिमा को 11वें पंचेन लामा के रूप में मान्यता दी थी, लेकिन चीन ने उन्हें हिरासत में ले लिया, और उनका पता आज तक अज्ञात है। इसके बाद चीन ने 5 साल के ग्यांचेन नोर्मा को अपना पंचेन लामा घोषित किया। यह चयन “स्वर्ण घड़ा” पद्धति (जो 1793 में किंग राजवंश द्वारा शुरू की गई पद्धति, जिसमें नामों को एक घड़े से निकाला जाता था) के आधार पर किया गया था। ग्यांचें नोर्मा अब 35 साल के हैं और हाल ही में, जून 2025 में, उन्होंने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात की, जहां उन्हें “तिब्बती बौद्ध धर्म के एकीकरण” और चीनीकरण (धर्म को चीनी विचारधारा के अनुरूप ढालना) को बढ़ावा देने के लिए उपयोग कर रहा है।
हालांकि तिब्बती निर्वासित समुदाय और दलाई लामा चीन के चयन को मान्यता नहीं दी है, लेकिन चीन का दावा है कि पंचेन लामा की नियुक्ति में उसका ऐतिहासिक अधिकार है। दलाई लामा ने कहा है कि जो लोग धर्म में विश्वास नहीं करते, वे लामा के पुनर्जन्म में दखल क्यों दें? उन्होंने अपनी किताब “वॉइस फॉर द वॉयसलेस” में तिब्बतियों से अपील की कि वे चीन की तरफ से चुने गए किसी उम्मीदवार को न मानें।
करमापा ने दी ‘दूसरे बुद्ध’ की उपाधि
दलाई लामा के 90वें जन्मदिन से पहले, तिब्बती बौद्ध धर्म की कर्मा काग्यु परंपरा के प्रमुख 17वें करमापा ओग्येन त्रिनले दोरजे ने भी एक भावुक पत्र जारी करते हुए दलाई लामा को ‘दूसरे बुद्ध’ की उपाधि दी। साथ ही, चीन द्वारा उनके पुनर्जन्म को नियंत्रित करने की कोशिशों को सख्ती से नकारा है।

करमापा ओग्येन त्रिनले दोरजे ने दलाई लामा को “सभी तिब्बती परंपराओं के लिए शरण और रक्षक” बताया और तिब्बत पर चीन के हिंसक कब्जे की निंदा की। उनका यह समर्थन इसलिए भी अहम है क्योंकि करमापा ओग्येन त्रिनले दोरजे का जन्म तिब्बत में हुआ था और उन्हें चीन और दलाई लामा दोनों ने ही मान्यता दी थी।
पत्र में करमापा ओग्येन त्रिनले दोरजे ने लिखा है कि जब तिब्बत की जनता अकेली थी और उनके पास कोई सहारा नहीं था, तब दलाई लामा “पूर्वजों के संदेशवाहक बनकर” आए। उन्होंने कहा कि दलाई लामा ने “बुद्ध के ज्ञान को धरती और आकाश के बीच जीवित रखा” और हिमालय से लेकर दुनियाभर में फैलाया।
करमापा ने चीन को “आक्रामक हमलावर” कहा, जिन्होंने तिब्बत की “बर्फ को खून से लाल कर दिया।” उन्होंने दलाई लामा से पुनर्जन्म की अपील करते हुए कहा, “आप तब तक जीवित रहें, जब तक यह पृथ्वी और मेरु पर्वत टिके रहें।” यह बयान चीन के उस दावे पर सीधी चोट है, जिसमें वह कहता है कि अगला दलाई लामा उसकी निगरानी में चुना जाएगा। 2019 में भी करमापा ने चीन द्वारा तिब्बती परंपरा में हस्तक्षेप के खिलाफ चेतावनी दी थी। कई तिब्बती अनुयायियों की यह भी इच्छा है कि करमापा भारत लौटें, जिससे तिब्बती बौद्ध परंपरा को भारत में और बल मिलेगा और चीन को एक स्पष्ट संदेश जाएगा।
बता दें कि करमापा लामा तिब्बती बौद्ध धर्म के काग्यु स्कूल, विशेष रूप से कर्मा काग्यु शाखा, के सर्वोच्च आध्यात्मिक नेता हैं। वे पुनर्जन्म की एक प्राचीन परंपरा का हिस्सा हैं, जो लगभग 900 साल से चली आ रही है। करमापा को “बुद्ध की सभी गतिविधियों का अवतार” माना जाता है। 17वें करमापा की मान्यता को लेकर विवाद है। दलाई लामा ने उग्येन त्रिनले दोरजे को 17वें करमापा के रूप में मान्यता दी है, जो वर्तमान में अमेरिका में रहते हैं। पिछले साल जब दलाई लामा अमेरिकी इलाज के लिए गए थे, तो ज्यूरिख में दोनों की मुलाकात भी हुई थी। वहीं, दूसरे दावेदार, थाए दोरजे भी हैं, लेकिन शादी करने के बाद उनकी दावेदारी पर सवाल उठने लगे हैं।
क्या है अमेरिका का रुख?
अमेरिका ने तिब्बती मानवाधिकारों की रक्षा के लिए लगातार समर्थन जताया है। 2024 में, अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने रिजॉल्व तिब्बत अधिनियम (Resolve Tibet Act) कानून पर हस्ताक्षर किए, जिसमें चीन से तिब्बत को अधिक स्वायत्तता देने की मांग की गई। अमेरिकी सांसदों ने यह भी स्पष्ट किया है कि वे चीन के अगले दलाई लामा के चयन में हस्तक्षेप का विरोध करते हैं। वहीं 2020 में अमेरिकी कांग्रेस के बनाए तिब्बती नीति और सहायता अधिनियम (Tibetan Policy and Support Act – TPSA) में यह स्पष्ट किया गया है कि दलाई लामा के पुनर्जन्म (रीइनकार्नेशन) और उनके उत्तराधिकारी के चयन का निर्णय केवल तिब्बती बौद्ध नेताओं और तिब्बती लोगों के पास विशेष अधिकार है, न कि चीनी सरकार के पास। यह कानून चीन के किसी भी हस्तक्षेप को अस्वीकार करता है और चीनी अधिकारी अगर इस प्रक्रिया में दखल देते हैं, तो उन पर यों पर प्रतिबंध लगाने की चेतावनी देता है। इसके अतिरिक्त, इस अधिनियम में ल्हासा में एक अमेरिकी वाणिज्य दूतावास स्थापित करने का प्रावधान है और तिब्बत में मानवाधिकारों की स्थिति पर नजर रखने की बात कही गई है।
अगले दलाई लामा कहां पैदा होंगे?
मार्च 2025 में प्रकाशित अपनी किताब Voice for the Voiceless में दलाई लामा ने कहा, उनका उत्तराधिकारी चीन के बाहर पैदा होगा। वे 1959 से भारत में निर्वासित जीवन जी रहे हैं, और यह संकेत देता है कि अगला दलाई लामा भी किसी स्वतंत्र देश में पैदा हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि वे अपने उत्तराधिकारी की पहचान से जुड़े सभी नियम और प्रक्रिया लिखित रूप में छोड़ देंगे, ताकि आगे कोई भ्रम न हो। धर्मशाला में सोमवार को उन्होंने कहा कि उत्तराधिकार के लिए एक स्ट्रक्चर होगा, लेकिन इसकी विस्तृत जानकारी नहीं दी।

















