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Kargil Vijay Diwas 2025: ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय सेना का बड़ा कदम, रूद्र, भैरव और दिव्यास्त्र करेंगे दुश्मनों का सर्वनाश

26th Kargil Vijay Diwas: After Operation Sindoor, Indian Army Launches Rudra Brigades, Bhairav Commandos, and Divyastra Batteries to Crush Future Threats
Photo By Raksha Samachar

Kargil Vijay Diwas 2025: कारगिल युद्ध की 26वीं वर्षगांठ के अवसर पर सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने भारतीय सेना की तीन नई मिलिट्री फॉर्मेशंस बनाने का एलाान किया। ये हैं रुद्र ब्रिगेड, भैरव लाइट कमांडो बटालियन और दिव्यास्त्र बैटरियां। इनका मकसद भारतीय सीमाओं की सुरक्षा को और अधिक सशक्त बनाना है, साथ ही सेना को मॉडर्न वॉरफेयर के लिए तैयार करना है। सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने यह घोषणा द्रास स्थित कारगिल युद्ध स्मारक पर की, जहां जनरल द्विवेदी ने शहीद जवानों को श्रद्धांजलि दी और सेना के भविष्य की योजनाओं के बारे में विस्तार से बताया।। बता दें कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद सेना प्रमुख पहली बार सार्वजनिक तौर पर बोले हैं।

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Kargil Vijay Diwas 2025: क्या है भारतीय सेना की नई रूद्र ब्रिगेड?

भारतीय सेना आज केवल वर्तमान खतरों का मुकाबला नहीं कर रही, बल्कि खुद को एक आधुनिक और भविष्य के लिए तैयार सैन्य शक्ति के रूप में भी खुद को तेजी से ढाल रही है। इसी दिशा में सेना ने दो इन्फैंट्री ब्रिगेड को रुद्र ब्रिगेड में बदल दिया है, जिन्हें अब सीमाओं पर तैनात किया गया है। जनरल द्विवेदी ने कहा, “रुद्र ब्रिगेड हमारी सेना का भविष्य है। यह युद्ध के मैदान में हमें रणनीतिक बढ़त देगी, खासकर संवेदनशील इलाकों में।

रुद्र ब्रिगेड भारतीय सेना का नया कॉन्सेप्ट है, जिसे “ऑल आर्म्स ब्रिगेड” भी कहा जाता है। इसका मतलब है कि इसमें हर प्रकार की कॉम्बैट यूनिट्स एक साथ काम करेंगी। जैसे कि पैदल सेना (इन्फैंट्री), बख्तरबंद गाड़ियां (टैंक और आर्मर्ड व्हीकल), मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री, तोपखाना (आर्टिलरी), स्पेशल फोर्स, और अनमैन्ड एरियल सिस्टम्स जिनमें ड्रोन भी शामिल हैं। सूत्रों ने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद इन्हें बनाने की जरूरत समझी गई और प्रयोग के तौर पर दो इन्फैंट्री ब्रिगेड को रुद्र ब्रिगेड मे बदला गया। संतोषजनक परिणाम मिलने के बाद इसे बनाने का आधिकारिक एलान किया गया।

इन सभी को मिलाकर एक ऐसी ब्रिगेड बनाई गई है, जो किसी भी परिस्थिति में तुरंत कार्रवाई कर सके और सीमाओं पर होने वाले खतरों का जवाब सटीक रूप में दे सके। रुद्र ब्रिगेड को खासतौर पर तैयार किया गया लॉजिस्टिक्स सपोर्ट और बैटल सपोर्ट सिस्टम दिया गया है, जिससे इन्हें बॉर्डर एरिया में तैनात करना आसान हो गया है।

‘घातक’ भैरव लाइट कमांडो बटालियन

सेना प्रमुख ने बताया कि इसके साथ ही, भैरव लाइट कमांडो बटालियन का भी गठन किया गया है, जो दुश्मन को चौंकाने और सीमाओं पर तेजी से कार्रवाई के लिए पूरी तरह तैयार है। भैरव बटालियन एक तेज, फुर्तीली और खतरनाक स्पेशल फोर्स यूनिट है। इसका नाम भगवान शिव के उग्र रूप ‘भैरव’ पर रखा गया है। इसका मकसद सीमाओं पर चुपके से दुश्मन के इलाकों में घुसकर टारगेट को नष्ट करना है।

26th Kargil Vijay Diwas: After Operation Sindoor, Indian Army Launches Rudra Brigades, Bhairav Commandos, and Divyastra Batteries to Crush Future Threats
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यह बटालियन आधुनिक नाईट विजन डिवाइस, MP5 सबमशीन गन और स्वदेशी ड्रोन बम से लैस किया गया है। ये सैनिक रात के अंधेरे या कोहरे में भी दुश्मन को हैरान कर सकते हैं। इन्हें पहाड़ों, बर्फीले क्षेत्रों और दुर्गम जंगलों में काम करने के लिए ट्रेन किया गया है। भैरव कमांडो दुश्मन की सप्लाई लाइन को काट सकते हैं, उनके बंकरों पर अचानक हमला कर सकते हैं और जरूरी जानकारियां जुटा सकते हैं। ये स्पेशल फोर्सेस यूनिट्स रात के अंधेरे में मिशन पूरा करने के लिए बनाई गई हैं। मिसाल के तौर पर, अगर एलएसी या एलओसी पर तनाव बढ़ता है, तो भैरव कमांडो दुश्मन की सप्लाई लाइन काट सकते हैं, उनके ठिकानों को नष्ट कर सकते हैं, और तोपखाने के लिए सटीक कोर्डिनेट्स दे सकते हैं।

जनरल द्विवेदी ने कहा कि भैरव यूनिट्स दुश्मन को चौंकाने और उनके मनोबल को तोड़ने का काम करेंगी। ये भारतीय सेना की विशेष क्षमताओं को नई ऊंचाई तक ले जाएंगी।

दिव्यास्त्र बैटरियां: भारतीय सेना की आर्टिलरी की नई ताकत

जनरल द्विवेदी ने कहा, “दिव्यास्त्र हमारी तोपखाने की ताकत को कई गुना बढ़ाएगा। उन्होंने बताया कि आर्टिलरी में ‘दिव्यास्त्र बैटरियों’ और लॉयटर म्युनिशन बैटरियों के जरिए भारतीय सेना की मारक क्षमता को कई गुना बढ़ा दिया गया है। सेना की एयर डिफेंस को भी अब स्वदेशी मिसाइल प्रणालियों से लैस किया जा रहा है।

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दिव्यास्त्र भारतीय सेना के आर्टिलरी सिस्टम का नया नाम है। इसमें कई अत्याधुनिक हथियार प्रणाली शामिल हैं। इसमें लॉयटर मुनिशन बैटरीज और स्वदेशी मिसाइल सिस्टम शामिल हैं। लॉयटर मुनिशन, जिन्हें ‘कामिकाजे ड्रोन’ भी कहा जाता है, हवा में लंबे समय तक मंडराकर दुश्मन पर सटीक हमला कर सकते हैं। ये हथियार दुश्मन की हरकतों पर नजर रखते हैं और सही समय पर हमला करते हैं, जिससे सेना को युद्ध में बड़ी बढ़त मिलती है।

दिव्यास्त्र में आकाश और QRSAM जैसी स्वदेशी मिसाइलें भी शामिल हैं, जो एरियल अटैक का मुकाबला करती हैं। ये मिसाइलें न केवल सटीक हैं, बल्कि सस्ती भी हैं। यह भविष्य के युद्धों में गेम-चेंजर होगा।” हर पैदल सेना बटालियन में अब ड्रोन प्लाटून भी शामिल किए गए हैं, जो रियल-टाइम जासूसी और हमले में मदद करेंगे।

हर इन्फैंट्री बटालियन में ड्रोन प्लाटून

सेना प्रमुख ने यह भी बताया कि अब हर इन्फैंट्री बटालियन में अलग से एक ड्रोन प्लाटून होगी। इसका मकसद यह है कि किसी भी इलाके में दुश्मन की हलचल की तुरंत जानकारी मिल सके। ड्रोन प्लाटून के जरिए सैनिक बिना खतरे में पड़े दुश्मन की पोजिशन, मूवमेंट और हथियारों की स्थिति जान सकते हैं। यह तकनीक युद्ध के मैदान में भारतीय सेना को बड़ी बढ़त देती है।

ऑपरेशन सिंदूर पर बोले सेना प्रमुख

जनरल द्विवेदी ने हाल ही में संपन्न ऑपरेशन सिंदूर का भी उल्लेख किया। यह ऑपरेशन उस समय चलाया गया जब जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में 22 अप्रैल 2025 को एक बड़ा आतंकवादी हमला हुआ था, जिसमें 26 नागरिक मारे गए थे। जिसके जवाब में भारतीय सेना ने 6 और 7 मई की रात को पाकिस्तान और पीओजेके में 9 बड़े आतंकवादी ठिकानों को निशाना बनाया। यह हमला इस तरह से किया गया कि किसी भी निर्दोष नागरिक की जान नहीं गई। उन्होंने कहा, यह सिर्फ जवाब नहीं था, बल्कि एक साफ संदेश था “अब जो आतंकवाद को पनाह देंगे, वे बच नहीं पाएंगे।”

उन्होंने कहा कि 7 से 9 मई के बीच पाकिस्तान ने जो सैन्य कार्रवाई की, उसका भारतीय सेना ने तुरंत और सटीक जवाब दिया। हमारी आर्मी एयर डिफेंस एक मजबूत दीवार की तरह खड़ी रही, जिसे कोई ड्रोन या मिसाइल भेद नहीं सका। यह पूरा अभियान “राष्ट्रव्यापी समन्वय” का उदाहरण था, जहां सेना, वायुसेना, नौसेना और अन्य सरकारी विभाग एकजुट होकर खड़े हुए। उन्होंने कहा कि जो भी ताकतें भारत की संप्रभुता, एकता या जनता को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करेंगी, उन्हें करारा जवाब दिया गया है, और आगे भी दिया जाएगा।

सेना प्रमुख ने शुरू की तीन नई पहल

कारगिल विजय की 26वीं वर्षगांठ के अवसर पर सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने कारगिल युद्ध स्मारक पर तीन नई पहलों का उद्घाटन किया, जिन्हें ‘लेगेसी प्रोजेक्ट्स’ नाम दिया गया है। इन पहलों का उद्देश्य कारगिल युद्ध के नायकों की स्मृति को सहेजना और युवाओं को सैन्य इतिहास से जोड़ना है।

इंडस व्यू पॉइंट: युद्ध पर्यटन को मिलेगा बढ़ावा

इन परियोजनाओं में पहला है इंडस व्यू पॉइंट, जिसे बटालिक सेक्टर में स्थापित किया गया है। यहां से पर्यटक उस स्थान को देख सकते हैं जहां सिंधु नदी पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में प्रवेश करती है। सेना ने इसे बैटल एरिया टूरिज्म यानी युद्ध क्षेत्र पर्यटन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से विकसित किया है। यह स्थान न सिर्फ रणनीतिक रूप से अहम है, बल्कि कारगिल युद्ध के दौरान कई घटनाओं का साक्षी भी रहा है।

ई-श्रद्धांजलि पोर्टल: अब शहीदों को ऑनलाइन दी जा सकेगी श्रद्धांजलि

दूसरी पहल के रूप में सेना ने ई-श्रद्धांजलि पोर्टल की शुरुआत की है। यह एक डिजिटल मंच है, जहां देश के नागरिक अब किसी भी स्थान से कारगिल युद्ध के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित कर सकते हैं। यह पोर्टल न केवल भावनात्मक जुड़ाव का माध्यम है, बल्कि नई पीढ़ी को शहीदों की गाथा से जोड़ने का एक प्रयास भी है।

सेना के अनुसार, यह पोर्टल देशभर के युवाओं, स्कूली छात्रों, एनसीसी कैडेट्स और आम नागरिकों को वीरगति को प्राप्त सैनिकों के प्रति सम्मान प्रकट करने का एक आधुनिक माध्यम प्रदान करेगा।

QR-आधारित ऑडियो गेटवे: युद्ध स्मारक पर इतिहास अब डिजिटल रूप में

तीसरी पहल के तहत कारगिल युद्ध स्मारक पर QR-आधारित ऑडियो गेटवे लगाया गया है। इस तकनीक के जरिए स्मारक पर आने वाले लोग क्यूआर कोड स्कैन करके अपने मोबाइल फोन पर युद्ध से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां, वीर गाथाएं और ऐतिहासिक प्रसंग सुन सकते हैं। यह एक तरह का इंटरएक्टिव डिजिटल अनुभव है, जिससे युद्ध स्मारक की जानकारी और भावनात्मक असर और गहरा होगा।

युवाओं, वेटरन्स और सीमांत गांवों को जोड़ने की पहल

सेना प्रमुख ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि लद्दाख जैसे सीमांत इलाकों में सेना अब केवल सुरक्षा का काम नहीं कर रही, बल्कि विकास में भी भागीदार बन रही है। सेना की संचार प्रणाली का उपयोग अब दूरदराज के गांवों में मोबाइल नेटवर्क देने के लिए किया जा रहा है। इसके साथ ही, सीमांत गांवों में टूरिज्म को बढ़ावा देने, वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम को आगे ले जाने, और स्थानीय युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में सेना लगातार काम कर रही है।

Nyoma Airstrip in Eastern Ladakh: एलएसी पर चीन को टक्कर देने की तैयारी, अक्टूबर तक न्योमा एयरस्ट्रिप पर लैंड कर सकेंगे मिग-29 और सुखोई-30 फाइटर जेट

Nyoma Airstrip in Eastern Ladakh to Host MiG-29, Su-30 Jets by October Amid China Tensions
ये फोटो 2024 में न्योमा यात्रा के दौरान खींचा गया था, उस वक्त यहां निर्माण कार्य चल रहा था। फोटो- रक्षा समाचार

Nyoma Airstrip in Eastern Ladakh: भारत वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी पर चीन की बराबरी करने के लिए सेना की सभी अग्रिम चौकियों तक कनेक्टिविटी देने की दिशा में तेजी से काम कर रहा है। इसके साथ ही पूर्वी लद्दाख में स्थित रणनीतिक एयरबेस न्योमा (Nyoma) इस साल अक्टूबर तक पूरी तरह से ऑपरेशनल हो जाएगा। बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन ने न्योमा में इस कच्चे रनवे को पक्का करने का काम लगभग पूरा कर लिया है। यह रनवे लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल से मात्र 30 किलोमीटर की दूरी पर है। बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन (BRO) के महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल रघु श्रीनिवासन ने कहा, “हमारा लक्ष्य है कि अक्टूबर 2025 तक न्योमा एयरबेस का निर्माण पूरा हो जाए।”

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Nyoma Airstrip in Eastern Ladakh: न्योमा में बन रहा फाइटर एयरबेस

पूर्वी लद्दाख के न्योमा (Nyoma) इलाके में स्थित मुद एयरबेस को अक्टूबर 2025 तक पूरी तरह से तैयार कर लिया जाएगा। यह एयरबेस वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) से महज 30 किलोमीटर की दूरी पर है और समुद्र तल से लगभग 11,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। न्योमा एयरबेस का निर्माण पहले से मौजूद “एडवांस लैंडिंग ग्राउंड” (Advanced Landing Ground – ALH) को अपग्रेड कर किया जा रहा है। इस प्रोजेक्ट की लागत लगभग 218 करोड़ रुपये है। इस एयरबेस के चालू हो जाने के बाद भारतीय वायुसेना मिग-29 (MiG-29) और सुखोई-30 एमकेआई (Su-30 MKI) जैसे लड़ाकू विमान यहां से उड़ान भर सकेंगे।

उतर सकेंगे ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट भी

इसके अलावा, सी-130जे और एएन-32 जैसे ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट भी यहां से नियमित रूप से सैनिकों और सामान को ले जा सकेंगे। न्योमा में हवाई अड्डे को डेवलप करने का विचार 2010 में तब सामने आया था, जब भारतीय वायुसेना ने यहां एक एएन-32 ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट को सफलतापूर्वक लैंड किया था। लेकिन 2020 में भारत-चीन सीमा विवाद के बाद इस परियोजना पर तेजी से कााम शुरू हुआ।

लद्दाख में चौथा एयरबेस

न्योमा एयरबेस के बन जाने के बाद यह लद्दाख के डाउनहिल फ्लैट प्लेन्स (नीचे के समतल क्षेत्र) में स्थित दक्षिणी क्षेत्र का पहला वायुसेना अड्डा होगा। वहीं, न्योमा की ऊंचाई अपेक्षाकृत कम है, जिससे यह फिक्स्ड-विंग एयरक्राफ्ट के लिए ज्यादाा बेहतर है।

न्योमा एयरबेस को इस तरह से डेवलप किया जा रहा है ताकि युद्ध की स्थिति में एयरलिफ्ट (वायु मार्ग से सैनिकों और उपकरणों की आवाजाही) और हमलों में तेजी लाई सके और दुश्मन को आगे बढ़ने का मौका नहीं मिला। इसके पूरा होते ही यह लद्दाख का चौथा वायुसेना अड्डा बन जाएगा। इससे पहले लेह एक सक्रिय एयरबेस है, जबकि कारगिल और थॉईस (Thoise), जो सियाचिन के पास है, पहले से ही फुल-फ्लेज्ड हवाई पट्टियों से लैस हैं। इसके अलावा दौलत बेग ओल्डी (DBO) में एक मिट्टी का रनवे है जिसका इस्तेमाल विशेष अभियानों के लिए किया जाता है। हालांकि फुकचे (Fukche) और चुशूल (Chushul) में भी दो अन्य रनवे मौजूद हैं, जो एलएसी से मात्र 2–3 किलोमीटर की दूरी पर हैं, लेकिन युद्ध जैसे हालात में इनका इस्तेमाल संभव नहीं है।

चीन ने अपनी तरफ से 3,488 किलोमीटर लंबी विवादित सीमा पर अपने हवाई अड्डों को एडवांस बनाया है। उसने रनवे को लंबा किया। इसे देखते हुए भारत सरकार ने हाल के वर्षों में एलएसी के पास स्थित सभी एयरबेस और सैन्य ठिकानों को अपग्रेड करने पर फोकस किया है। इसमें रनवे की लंबाई बढ़ाना, पक्के हैंगर बनाना और आधुनिक सुविधाएं जोड़ना शामिल है। इसका उद्देश्य चीन के मुकाबले सैन्य तैयारियों को मजबूत करना है।

BRO का लक्ष्य, हर पोस्ट तक कनेक्टिविटी

बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन के महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल रघु श्रीनिवासन ने कहा, “आने वाले पांच वर्षों में भारत की सीमा पर कोई भी ऐसा हिस्सा नहीं होगा, जहां हम सेना की तैनाती न कर सकें। हमारा लक्ष्य है कि हर अग्रिम चौकी (Forward Post) तक पक्की सड़कें बनाई जाएं, जहां अभी तक पैदल रास्तों से ही पहुंचा जा सकता था।” उन्होंने बताया कि खासकर ऊंचाई वाले इलाकों में में सड़कें अब भी नहीं हैं। पूर्वोत्तर राज्य अरुणाचल प्रदेश में बीआरओ प्रमुख राजमार्गों का निर्माण कर रहा है, जिससे दूर-दराज की घाटियों को एक-दूसरे से जोड़ा जा सके। अब अरुणाचल प्रदेश में फ्रंटियर हाईवे (Arunachal Frontier Highway) का निर्माण भी शुरू हो चुका है।

उन्होंने कहा, “हम चीन से पीछे नहीं रहना चाहते। अगर हमें बराबरी करनी है तो लगातार काम करते रहना होगा। पहले हम सीमा से 40 किलोमीटर पीछे थे और हमें यह तक पता नहीं होता था कि चीन क्या कर रहा है। लेकिन अब हर साल हम एक कदम आगे बढ़ रहे हैं।”

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डबल लेन सड़कें और नए हाईवे

लेफ्टिनेंट जनरल रघु श्रीनिवासन ने कहा, “बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन का अगला लक्ष्य है कि जहां-जहां सड़कें बन चुकी हैं, उन्हें डबल लेन (Double Lane) किया जाए ताकि सैन्य तैनाती और रसद की सप्लाई और भी तेज और सुरक्षित हो सके। अभी तक जो सड़कें सिंगल लेन हैं, उन्हें डबल लेन में बदला जाएगा ताकि सेना की बड़ी गाड़ियां भी एक साथ आवाजाही कर सकें।”

इसके अलावा अन्य बड़ी परियोजनाओं में शिंकुन ला (Shinkun La) सुरंग भी शामिल है, जो दुनिया की सबसे ऊंचाई पर स्थित सुरंग बनाई जा रही है। यह सुरंग लद्दाख और हिमाचल प्रदेश के बीच पूरे साल भर संपर्क बनाए रखेगी और लद्दाख को जोड़ने वाला तीसरा वैकल्पिक मार्ग बन जाएगी।

डीबीओ तक वैकल्पिक सड़क

6,700 फीट की ऊंचाई पर स्थित दौलत बेग ओल्डी (डीबीओ) और डेपसांग तक वैकल्पिक सड़क अगले साल के अंत तक तैयार हो जाएगी। यह 18,000 फीट ऊंचे कराकोरम दर्रे के करीब है, जो चीन के शिनजियांग प्रांत को लद्दाख से अलग करता है। डीबीओ के पश्चिम में चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) बन रहा है, और कराकोरम राजमार्ग, जो गिलगित को शिनजियांग से जोड़ता है, भी इसके नजदीक है। इस वजह से डीबीओ की सामरिक अहमियत और बढ़ जाती है।

वर्तमान में डीबीओ तक पहुंचने के लिए दारबुक-श्योक-डीबीओ (डीएसडीबीओ) सड़क का इस्तेमाल होता है, जो एलएसी के समानांतर चलती है। लेकिन कई जगहों पर इस सड़क पर चीन की सीधी नजरें रहती हैं, जिससे यह रणनीतिक रूप से कम सुरक्षित है। इस समस्या को हल करने के लिए एक वैकल्पिक सड़क बनाई जा रही है, जिसका नाम है सासोमा-सासेर ला-सासेर ब्रांग्सा-गपशन-डीबीओ। यह सड़क 2026 तक तैयार हो जाएगी और जिसके बाद सियाचिन बेस कैंप से जवानों को डीबीओ तक पहुंचने में कुछ ही घंटे लगेंगे।

अभी तक डीबीओ पहुंचने के लिए सैनिकों को लगभग दो दिन का समय लगता है, क्योंकि उन्हें पहले लेह आना पड़ता है और फिर डीएसडीबीओ मार्ग से जाना पड़ता है। नई सड़क बनने से यह समय बहुत कम हो जाएगा। सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) द्वारा बनाई जा रही इस सड़क में नौ पुल हैं, जो अभी 40 टन तक के वाहनों को ले जा सकते हैं। सूत्रों के अनुसार, इन पुलों को क्लास-70 पुलों में बदला जाएगा, ताकि टैंक जैसे भारी सैन्य वाहनों की भी आवाजाही हो सके।

सासेर ला के नीचे सुरंग की योजना

नई सड़क मार्च से नवंबर तक चालू रहेगी, लेकिन सर्दियों में भारी बर्फबारी के चलते इसे बंद करना पड़ सकता है। इस समस्या को हल करने के लिए 17,800 फीट ऊंचे सासेर ला के नीचे एक सुरंग बनाने का प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है। अगर सरकार इस प्रस्ताव को मंजूरी देती है, तो इस सड़क को पूरा करने में चार से पांच साल लग सकते हैं। इस सुरंग के बनने से डीबीओ तक साल भर पहुंच संभव हो जाएगी, और भारत को दो रास्तों से इस महत्वपूर्ण ठिकाने तक पहुंचने का विकल्प मिलेगा।

Sasoma-DBO Road: चीन की नजरों में आए बिना डेपसांग और दौलत बेग ओल्डी में तेजी से तैनात हो सकेगी भारतीय सेना, 2026 के आखिर तक तैयार हो जाएगा नया रूट

Sasoma–DBO Road to Boost Army Access to Depsang Without Chinese Surveillance, Operational by End of 2026

Sasoma-DBO Road: पूर्वी लद्दाख में एलएसी से सटे डेपसांग और दौलत बेग ओल्डी (डीबीओ) को कनेक्ट करने के लिए एक वैकल्पिक सड़क मार्ग के निर्माण का काम तेजी से चल रहा है और इसके अक्टूबर-नवंबर 2026 तक पूरी तरह से शुरू होने की उम्मीद है। यह नया मार्ग ससोमा-सासेर ला-सासेर ब्रंगसा–गपशान-डीबीओ के रूट पर बनाया जा रहा है और यह मौजूदा दरबुक-श्योक-दौलत बेग ओल्डी (DSDBO) सड़क के लगभग समानांतर है। इस सड़क मार्ग को बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन बना रहा है। अभी तक भारतीय सेना दौलत बेग ओल्डी तक पहुंचने के लिए दरबुक–श्योक–दौलत बेग ओल्डी रोड का ही इस्तेमाल कर रही है, लेकिन इसके कई हिस्सों पर चीन की सीधी नजर है।

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Sasoma-DBO Road: नई सड़क की क्या है खूबियां

यह वैकल्पिक मार्ग करीब 130 किलोमीटर लंबा होगा, जिसमें कुल 9 पुल होंगे जो 40 टन भार वहन कर सकेंगे। वहीं, मौजूदा दरबुक–श्योक–दौलत बेग ओल्डी रोड 255 किलोमीटर लंबी है और इसमें 37 पुल हैं। नए मार्ग के बन जाने से लेह से दौलत बेग ओल्डी की दूरी 322 किलोमीटर से घटकर 243 किलोमीटर रह जाएगी और सफर का समय दो दिन से घटकर केवल 11–12 घंटे ही रह जाएगा। इनमें ससोमा–सासेर ला (52.4 किमी), सासेर ला–सासेर ब्रंगसा (16 किमी), सासेर ब्रंगसा–मुरगो (18 किमी) और सासेर ब्रंगसा–गपशन की दूरी 41.97 किमी है।

सूत्रों के अनुसार, “सूत्रों ने बताया, “ससोमा से सासेर ब्रांग्सा तक का काम पूरा हो चुका है और इसके आगे पूर्व की ओर, मुरगो और गपशान तक, 70 प्रतिशत से अधिक काम पूरा हो चुका है। हमें भरोसा है कि अगले साल अक्टूबर-नवंबर तक यह पूरा मार्ग चालू हो जाएगा।”

सूत्रों के अनुसार, 255 किलोमीटर लंबी डीएसडीबीओ सड़क 16,614 फीट की ऊंचाई पर दौलत बेग ओल्डी यानी डीबीओ में समाप्त होती है, जो 18,700 फीट ऊंचे कारोकारम पास से लगभग 20 किलोमीटर पहले है।

क्यों जरूरी है यह रोड

यह मार्ग सेना के लिए वैकल्पिक कम्यूनिकेशन लाइन तैयार करेगा, जिससे सैनिकों और हथियारों की फटाफट तैनाती की जा सकेगी। इसके अलावा सियाचिन क्षेत्र के लिए भी यह रास्ता अहम होगा, क्योंकि यह ससोमा से निकलता है जो नुब्रा घाटी में सियाचिन बेस कैंप के रास्ते में पड़ता है। ससोमा लेह से सियाचिन बेस कैंप के रास्ते पर पड़ता है। सूत्रों ने बताया, “इस मार्ग पर सासेर ब्रांग्सा तक लगभग सभी तरह के आर्टिलरी की लोड कैपेसिटी का परीक्षण पहले ही किया जा चुका है। इनमें बोफोर्स भी शामिल है।”

सूत्रों ने यह भी बताया, यहां मौजूद 40 टन क्षमता वाले पुलों को अब 70 टन में बदला जा रहा है, जिससे भारी बख्तरबंद वाहनों की तैनाती संभव होगी।

नया सड़क मार्ग ससोमा से शुरू हो कर वहां से यह सासेर ला (17,800 फीट ऊंचा दर्रा) और फिर नीचे उतरकर सासेर ब्रंगसा तक जाता है। यह स्थान पुराने समय में कश्मीर-शिनजियांग व्यापार मार्ग पर एक अस्थायी कैंपिंग साइट थी। यहां से सड़क दो दिशाओं में जाती है: एक रास्ता पूर्व की ओर मुरगो जाता है, तो दूसरा रास्ता उत्तर-पूर्व की ओर गपशान की ओर बढ़ता है। फिर आखिर में दोनों रास्तों का अंत वर्तमान 255 किलोमीटर लंबी दरबुक–श्योक–डबो (DSDBO) सड़क से अलग-अलग स्थानों पर होता है।

सुरंग बनाने की भी है योजना

सूत्रों ने बताया, इस हमारी तैयारी है कि इस सड़क मार्ग को हर मौसम के लिए उपयोगी बनाया जाए। इसके लिए बॉर्डर रोड आर्गेनइजेशन की सासेर ला पर 8 किलोमीटर लंबी सुरंग बनाने की भी योजना है, जो 17,660 फीट की ऊंचाई पर बनेगी। सुरंग बनने के बाद यह रास्ता बारी बर्फबारी में भी खुला रहेगा। फिलहाल यह सुरंग को लेकर विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (Detailed Project Report) तैयार की जा रही है, और इस सुरंग परियोजना के बनने में 4–5 साल लग सकते हैं।

प्रोजेक्ट हिमांक और प्रोजेक्ट विजयक पर जिम्मेदारी

लद्दाख में महत्वपूर्ण सड़कों के निर्माण और रखरखाव की जिम्मेदारी बीआरओ के पास है। बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन (BRO) की दो परियोजनाएं प्रोजेक्ट हिमांक और प्रोजेक्ट विजयक इस कार्य की जिम्मेदारी निभा रही हैं। भारत पूर्वी लद्दाख में चीन के साथ 832 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) साझा करता है। ससोमा से सासेर ब्रांग्सा तक का निर्माण कार्य बीआरओ के प्रोजेक्ट विजयक द्वारा किया जा रहा है, जिसमें 300 करोड़ रुपये की लागत आई है। सासेर ब्रांग्सा से डीबीओ तक सड़क और पुलों का निर्माण बीआरओ के प्रोजेक्ट हिमांक द्वारा किया जा रहा है, जिसकी लागत 200 करोड़ रुपये है।

इस सड़क मार्ग के बन जाने के बाद डीबीओ और दूसरी फॉरवर्ड पोस्टों पर सैनिकों, हथियारों और रसद की आवाजाही आसान हो जाएगी, क्योंकि सियाचिन बेस कैंप पास में है। सियाचिन बेस कैंप हाई एल्टीट्यूड और कम ऑक्सीजन स्तर के चलते तैनाती से पहले सैनिकों के लिए एक्लिमटाइजेशन का तीसरा फेज है।

मई 2020 में भारत और चीन के बीच तनाव बढ़ने के बाद इस वैकल्पिक मार्ग की जरूरत समझी गई और इसके निर्माण की योजना बनाई गई। गलवान घाटी उसी इलाके में है जहां से मौजूदा डीएसडीबीओ सड़क गुजरती है और इस इलाके में चीनी सेना की सीधी निगरानी रहती है। इस सड़क निर्माण को मई 2022 के बाद गति मिली जब राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (National Board for Wildlife) ने इस नए मार्ग को काराकोरम वन्यजीव अभयारण्य (Karakoram Wildlife Sanctuary) के 55 हेक्टेयर क्षेत्र से होकर गुजरने की अनुमति दी। यह स्वीकृति इस मार्ग के सामरिक महत्व को देखते हुए दी गई, क्योंकि मौजूदा DSDBO मार्ग किसी आपातकाल में खतरे की स्थिति में आ सकता है।

डेपसांग में सबसे ऊंचा एयरफील्ड

डेपसांग क्षेत्र सामरिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह सियाचिन और दौलत बेग ओल्डी एयरफील्ड से जुड़ा हुआ है, जो विश्व का सबसे ऊंचा एयरफील्ड है, जिसकी ऊंचाई 16,614 फीट (5,065 मीटर) है। इस क्षेत्र में भारी बख्तरबंद गाड़ियों की आवाजाही संभव है और चीन की कई सड़कें यहां तक पहुंच रखती हैं, जबकि भारत के पास केवल डीएसडीबीओ मार्ग ही था। वहीं, इस नए वैकल्पिक सड़क मार्ग के बनने से पूर्वी लद्दाख के सब सेक्टर नॉर्थ (Sub-Sector North-SSN) के डेपसांग प्लेंस और दौलत बेग ओल्डी जैसे अहम क्षेत्रों तक पहुंच आसान होगी।

LAC से सटे इस इलाके में 65 पेट्रोलिंग पॉइंट

लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) से सटे इस इलाके में कुल 65 पेट्रोलिंग पॉइंट हैं, जो काराकोरम पास से लेकर डेमचोक तक फैले हुए हैं। डेपसांग में अक्टूबर 2024 में हुए सैन्य गतिरोध के दौरान चीन ने पांच पेट्रोलिंग पॉइंट 10, 11, 11A, 12 और 13 तक भारतीय सेना की पहुंच को रोक दिया था। इन पांच पॉइंट्स का कुल क्षेत्रफल लगभग 952 वर्ग किलोमीटर है। ये सभी पॉइंट्स रणनीतिक दृष्टि से बेहद अहम माने जाते हैं, क्योंकि ये भारत की सीमा के अंदर होते हुए भी एलएसी के करीब हैं और चीनी गतिविधियों को रोकने के लिए यहां लगातार पेट्रोलिंग की जरूरत है।

TRF Terrorist Designation: आईएसआई और लश्कर की कठपुतली द रेजिस्टेंस फ्रंट पर बड़ी चोट! अमेरिका ने लगाया ग्लोबल टेरेरिस्ट का ठप्पा, पहलगाम हमले के बाद आईबी और रॉ पर मढ़े थे ये आरोप

TRF Terrorist Designation: US Declares ISI-Backed Lashkar Proxy a Global Threat After Pahalgam Attack, Exposes False Flag Claims Against RAW and IB

TRF Terrorist Designation: 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए नरसंहार के बाद अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आतंकवाद के खिलाफ भारत की बात को गंभीरता से सुना जा रहा है। अमेरिका ने ‘द रेजिस्टेंस फ्रंट’ यानी TRF को ‘विदेशी आतंकी संगठन’ (Foreign Terrorist Organization- FTO) और ‘वैश्विक आतंकवादी संस्था’ (Specially Designated Global Terrorist Entity) घोषित कर दिया है। भारत पहले ही जनवरी 2023 में गैरकानूनी गतिविधियों (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA के तहत आतंकवादी संगठन करार दे चुका है। द रेजिस्टेंस फ्रंट को लश्कर-ए-तैयबा का मुखौटा संगठन माना जाता है, जो पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के इशारों पर काम करता है। इसके द्वारा की गई ज्यादातर आतंकी गतिविधियों का लक्ष्य आम नागरिक, अल्पसंख्यक, पर्यटक और सुरक्षाबल रहे हैं।

Pahalgam Terror Attack: भारत ने दुनिया को दिखाए पाकिस्तान के हाथ होने के सबूत, TRF के इलेक्ट्रॉनिक सिग्नेचर दो जगहों पर किए ट्रेस

पहलगाम हमले में 26 निर्दोष नागरिकों की जान चली गई थी, और यह भारत में 2008 के मुंबई आतंकी हमलों के बाद सबसे बड़ा आतंकवादी हमला माना गया था।

TRF Terrorist Designation: क्या कहा अमेरिका ने अपने आधिकारिक बयान में

अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने इस फैसले की जानकारी देते हुए कहा कि द रेजिस्टेंस फ्रंट को आतंकी संगठन घोषित करने का फैसला अमेरिका की आतंकवाद के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस नीति’ का हिस्सा है। उन्होंने साफ कहा कि यह कदम राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की उस प्रतिबद्धता को दर्शाता है, जिसमें उन्होंने पहलगाम हमले के दोषियों को न्याय दिलाने का वादा किया था।

बयान में कहा गया है कि “यह कदम अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा हितों की रक्षा, आतंकवाद से लड़ने और पहलगाम हमले के लिए न्याय सुनिश्चित करने के उद्देश्य से उठाया गया है।”

इन नामों पर भी निगरानी

इस फैसले में लश्कर-ए-तैयबा के द रेसिस्टेंस फ्रंट (TRF), कश्मीर रेसिस्टेंस फ्रंट और कश्मीर रेसिस्टेंस को भी शामिल किया गया है। रूबियो के मुताबिक यह फैसला प्रशासनिक रिकॉर्ड की जांच और अटॉर्नी जनरल व ट्रेजरी सेक्रेटरी से सलाह के बाद लिया गया। इसकी जानकारी भी फेडरल रजिस्टर में प्रकाशित की जाएगी।

TRF Terrorist Designation: क्या है कानूनी आधार?

द रेजिस्टेंस फ्रंट को आतंकी संगठन घोषित करने की प्रक्रिया अमेरिका के इमिग्रेशन एंड नेशनलिटी एक्ट की धारा 219 के तहत की गई है। इसके साथ ही, एग्जीक्यूटिव ऑर्डर 13224 के तहत इसे SDGT की सूची में भी डाला गया है। इससे टीआरएफ और उससे जुड़े किसी भी अन्य नाम या इकाई की संपत्ति अमेरिका में जब्त हो सकती है, साथ ही फंडिंग भी रोक दी जाती है, और कोई भी व्यक्ति या संस्था टीआरएफ से संपर्क रखने पर कानूनी कार्रवाई के दायरे में आ सकता है। FTO और SDGT घोषणा के तहत, टीआरएफ और इसके सदस्यों की संपत्ति को जब्त किया जा सकता है, और उनकी यात्रा और वित्तीय लेन-देन पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है।

साथ ही टीआरएफ के नेताओं के खिलाफ इंटरपोल रेड कॉर्नर नोटिस जारी हो सकते हैं, और जो भी देश टीआरएफ को समर्थन देते हैं, उन पर आर्थिक दबाव बनाया जा सकता है। इससे पहले भी अमेरिका ने हिजबुल मुजाहिदीन, जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा को आतंकी संगठनों की सूची में शामिल किया था।

लश्कर-ए-तैयबा: पाकिस्तान का सबसे घातक प्रॉक्सी

लश्कर-ए-तैयबा की स्थापना 1986-90 के बीच अफगानिस्तान के कुनार प्रांत में हुई थी। यह मरकज-उद-दावा-वल-इरशाद (Markaz-ud-Dawa-wal-Irshad (MDI) का मिलिट्री सैन्य विंग था, जिसे सोवियतों के खिलाफ तैयार किया गया था। बाद में यह संगठन पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के लिए भारत के खिलाफ एक “प्रॉक्सी टूल” बन गया।

लश्कर की हमेशा से रणनीति पाकिस्तान के बाहर हमलों पर केंद्रित रही है। इसने कभी भी पाकिस्तान के भीतर हमले नहीं किए, जिसके चलते इसे सरकार का भी खास माना जाता है। वहीं, आईएसआई के लिए यह संगठन बेहद उपयोगी साबित हुआ क्योंकि यह केवल बाहर हमले करता है, जिससे पाकिस्तान को यह कहने का मौका मिल जाता है, कि इसमें उसका हाथ नहीं है।

द रेजिस्टेंस फ्रंट: नाम बदला, मंशा नहीं

द रेजिस्टेंस फ्रंट को अक्टूबर 2019 में जम्मू-कश्मीर में भारत सरकार द्वारा अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के बाद बनाया गया था। इस अनुच्छेद के हटने के बाद जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त हो गया था। आतंकी संगठनों की साजिश थी कि अनुच्छेद 370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर में अशांति बनी रहे, जिसके चलते उस दौरान कई शैडो आतंकी संगठन भी सामने आए। TRF को लश्कर-ए-तैयबा का एक मोहरा माना जाता है, जिसे कश्मीर में आतंकवाद को “स्थानीय” रंग देने के लिए बनाया गया था। यह रणनीति पाकिस्तान की पुरानी चाल का हिस्सा है, जिसमें आतंकी संगठनों को नए नाम देकर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध से बचाने और स्थानीय समर्थन हासिल करने की कोशिश की जाती है।

किसने बनाया था द रेजिस्टेंस फ्रंट

द रेजिस्टेंस फ्रंट का गठन शेख सज्जाद गुल के नेतृत्व में हुआ, जो इसका सुप्रीम कमांडर है। इसके अलावा, संगठन के अन्य प्रमुख नेता जैसे मुहम्मद अब्बास शेख (संस्थापक, अब मृत) और बासित अहमद दार (चीफ ऑपरेशन कमांडर, अब मृत) ने इसके जरिए आतंकी गतिविधियां चलानी शुरू कीं। मुहम्मद अब्बास शेख को 2021 में मुठभेड़ में मार गिराया गया। वहीं, बासित अहमद डार (अबू कामरान) मई 2024 में मारा गया। जबकि शेख सज्जाद गुल अभी भी पाकिस्तान में मौजूद है, जिस पर भारत और अमेरिका दोनों ने इनाम घोषित किया है। जबकि अहमद खालिद इस संगठन का प्रवक्ता है। भारत ने जनवरी 2023 में TRF को गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत आतंकी संगठन घोषित किया था, और अब अमेरिका का यह कदम इसे वैश्विक स्तर पर आतंकी संगठन के रूप में मान्यता देता है।

सज्जाद गुल: पत्रकार की हत्या से लेकर साइबर जंग तक का सफर

सज्जाद गुल पहले एक पत्रकार था। 2018 में वरिष्ठ पत्रकार शुजात बुखारी की हत्या की साजिश में उसका नाम सामने आया। इसके बाद वह पाकिस्तान भाग गया और वहीं से “KashmirFight” नाम का डिजिटल नेटवर्क शुरू किया, जो अब टीआरएफ का प्रचार तंत्र बन गया है। KashmirFight के जरिए भारत सरकार के खिलाफ फर्जी मानवाधिकार का नैरेटिव खड़ा किया गया। यह वेबसाइट दिसंबर 2024 में आइसलैंड से रजिस्टर्ड की गई और NameCheap जैसी कंपनी के जरिए होस्ट की गई, ताकि असली पहचान छुपी रहे। इस मंच पर कश्मीरी पंडितों और सरकारी कर्मचारियों को धमकी देने वाले पोस्ट नियमित रूप से डाले जाते थे।

टीआरएफ और सज्जाद गुल के नेटवर्क ने Mastodon, Telegram, ChirpWire और BiP जैसे प्लेटफॉर्म्स पर भी साइबर गतिविधियां फैलाईं। ‘KashmirFight PUBLIC’ नाम के Telegram चैनल पर TRF हमलों की जिम्मेदारी लेता है और वीडियो व फर्जी दस्तावेज साझा करता है। इसके अलावा Jhelum Media House मीडिया प्लेटफॉर्म भी इस प्रोपेगेंडा में शामिल हैं। जिनका मकसद आतंक को आजादी की लड़ाई के रूप में दिखाना है। NIA और भारतीय साइबर एजेंसियों ने इन गतिविधियों की जांच शुरू की है और सज्जाद गुल को इंटरपोल नोटिस से ट्रैक करने की कोशिश जारी है।

टीआरएफ की आतंकी यूनिट ‘Falcon Squad’  

सूत्रों के मुताबिक, टीआरएफ की फॉल्कन स्क्वाड (Falcon Squad) एक विशेष टास्क फोर्स है, जिसमें पाकिस्तान की स्पेशल सर्विसेज ग्रुप (SSG) के पूर्व कमांडो तक शामिल रहे हैं। टीआरएफ और लश्कर-ए-तैयबा की प्रमोशन पॉलिसी में महिलाओं और परिवारों को “शहीदों के गौरव” से जोड़कर पेश किया जाता है। इसका उद्देश्य युवाओं को भावनात्मक रूप से प्रेरित कर कट्टरपंथ की ओर ले जाना है।

मुरीदके से बहावलपुर आया टीआरएफ

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के पंजाब प्रांत स्थित लश्कर के प्रमुख अड्डे मुरिदके और जैश-ए-मोहम्मद के गढ़ बहावलपुर पर जोरदार हमले किए थे। इसके बाद से पाकिस्तान में मौजूद आतंकी अड्डों में खलबली मची हुई है। अब जो इनपुट सामने आ रहे हैं, उनसे पता चलता है कि पाकिस्तान की सेना दोनों संगठनों को बहावलपुर में एक साथ ला रही रही है।

भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक, पाकिस्तान में मौजूद लश्कर-ए-तैयबा और उसका यह नया मुखौटा संगठन टीआरएफ अब अपना मुख्यालय मुरिदके से हटाकर बहावलपुर शिफ्ट कर रहे हैं। दोनों आतंकी संगठनों की इस हलचल पर भारतीय खुफिया एजेंसियां नजर बनाए हुए हैं। सूत्रों के मुताबिक, पाकिस्तान की सेना खुद इन संगठनों के नए मुख्यालय को एक ही जगह पर ला कर रही है, ताकि निगरानी और मदद दोनों आसानी से दी जा सकें।

टीआरएफ की आतंकी गतिविधियां

टीआरएफ ने 2019 में अपने गठन के बाद से जम्मू-कश्मीर में कई आतंकी हमलों को अंजाम दिया है। ये हमले नागरिकों, अल्पसंख्यकों, सुरक्षा बलों, और पर्यटकों को निशाना बनाते हैं। इसमें 22 अप्रैल 2025 को किया गया पहलगाम हमला सबसे घातक हमला था, जिसमें पहलगाम की बैसरण घाटी में 28 लोग मारे गए और 20 से अधिक घायल हुए। हमलावरों ने M4 कार्बाइन और AK-47 जैसे ऑटोमैटिक राइफल्स का इस्तेमाल किया। हमले में पर्यटकों, जिसमें एक नौसेना अधिकारी शामिल था, को निशाना बनाया गया। हमलावरों ने हिंदू पुरुषों को विशेष रूप से चुना, उनके नाम और धार्मिक पहचान की जांच की, और कुछ को कलमा पढ़ने के लिए मजबूर किया। यह हमला 2008 के मुंबई हमलों के बाद भारत में नागरिकों पर सबसे बड़ा हमला था।

रियासी हमला (9 जून 2024): रियासी जिले में हिंदू तीर्थयात्रियों के एक बस पर हमला किया गया, जिसमें 9 लोग मारे गए और 33 घायल हुए। यह बस शिव खोरी मंदिर से लौट रही थी। शुरुआत में TRF ने इसकी जिम्मेदारी ली, हालांकि बाद में लश्कर-ए-तैयबा से संबंध होने की बात सामने आई।

गांदरबल हमला (20 अक्टूबर 2024): सोनमर्ग के जेड-मोर्ह सुरंग निर्माण स्थल पर 7 लोग, जिसमें एक डॉक्टर और 6 मजदूर शामिल थे, मारे गए। TRF ने इस हमले को मिलिट्री इंफ्रास्ट्रक्चर के खिलाफ जवाबी कार्रवाई बताया। हमलावरों ने एक महीने पहले इस जग की रैकी की थी।

अनंतनाग हमला (13 सितंबर 2023): कोकेरनाग में भारतीय सेना के एक कर्नल, मेजर, और डीएसपी सहित तीन लोग मारे गए। यह हमला लश्कर के एक आतंकी रियाज अहमद के मारे जाने के जवाब में था।

बांदीपोरा हमला (8 जुलाई 2020): बीजेपी नेता और उनके परिवार के तीन सदस्यों की हत्या कर दी गई। TRF ने उन्हें “राजनीतिक कठपुतली” करार दिया।

टीआरएफ ने हाल के वर्षों में गैर-स्थानीय मजदूरों, पर्यटकों, और हिंदू-सिख समुदायों को निशाना बनाना शुरू किया है। इसकी वजह बताते हैं कि वे कश्मीर में बाहरियों के “अवैध कब्जे” और “जनसांख्यिकीय बदलाव” को रोकना चाहते हैं।

पहलगाम हमले से बदली रणनीति

जानकारों का कहना है कि पहलगाम हमला टीआरएफ की रणनीति में एक बड़ा बदलाव दिखाता है। इस हमले में “फाल्कन स्क्वाड” से जुड़े पांच आतंकियों ने कैमोफ्लैग पहना हुआ था और एडवांस विपंस का इस्तेमाल किया था। हमलावरों ने हेलमेट-माउंटेड कैमरे और संचार उपकरणों का इस्तेमाल किया, और हिंदू पुरुषों को धार्मिक आधार पर निशाना बनाया। सूत्रों का कहना है कि इस हमले की अगुवाई हाशिम मूसा (उर्फ आसिफ फौजी) ने की थी, जो कथित तौर पर पाकिस्तान के स्पेशल सर्विस ग्रुप का पूर्व कमांडो था। जबकि अन्य हमलावरों में अली भाई (पाकिस्तानी नागरिक) और दो भारतीय कश्मीरी शामिल थे। इस हमले की योजना लश्कर के वरिष्ठ कमांडर सैफुल्लाह कसूरी (उर्फ खालिद) ने बनाई थी, जो हाफिज सईद का करीबी सहयोगी है। हमलावरों के डिजिटल फुटप्रिंट लश्कर के मुजफ्फराबाद और कराची में सेफ हाउसेज तक ट्रेस किए गए।

जनरल असीम मुनीर: आतंक के खेल का मास्टरमाइंड

खुफिया सूत्रों का कहना है, पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर पहलगाम नरसंहार और इसके बाद के घटनाक्रमों के प्रमुख सूत्रधार हैं। उनका कहना है कि असीम मुनीर ने अपने कार्यकाल के दौरान कश्मीर में ‘हाइब्रिड वॉरफेयर’ को बढ़ावा देने के लिए टीआरएफ जैसे मुखौटा संगठनों का इस्तेमाल किया। उन्होंने इस हमले की टाइमिंग इस तरह तय की जिससे पाकिस्तान में इमरान की पार्टी पीटीआी पर चल रहे असंवैधानिक दमन से ध्यान भटकाया जा सके और “फील्ड मार्शल” बन कर किसी भी तरह के दमनकारी आरोपों से बचा जा सके। सूत्रों ने बताया कि असीम मुनीर ने खुद को फील्ड मार्शल घोषित करने के लिए आतंकी खतरे का बहाना बनाना चाहते थे, और सेना के भीतर अपनी पकड़ मजबूत करना चाहते थे।

वहीं, मुनीर के नेतृत्व में, पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ने कश्मीर में आतंकवाद को “स्थानीय प्रतिरोध” का रंग देने की कोशिश की, ताकि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत के खिलाफ नैरेटिव खड़ा किया जा सके। जानकार कहते हैं कि मुनीर की यह चाल न केवल क्षेत्रीय शांति को खतरे में डालती है, बल्कि यह भी बताती है कि पाकिस्तानी सेना अब एक “राज्य प्रायोजित आतंकी नेटवर्क” में तब्दील हो चुकी है। टीआरएफ जैसे मुखौटा संगठनों के जरिए वह अंतरराष्ट्रीय दबाव से बचते हुए आतंकवाद को नया नाम और चेहरा देने की कोशिश कर रहे हैं। साथ ही, अपनी व्यक्तिगत सत्ता की भूख के लिए आतंकवाद को एक रणनीतिक औजार बना चुके हैं।

टीआरएफ ने भारत पर मढ़े थे ये आरोप

वहीं, टीआरएफ ने कथित टेलीग्राम चैनल के जरिए पहलगाम हमले की जिम्मेदारी से इनकार किया और इसे भारत की खुफिया एजेंसी और रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (RAW) का “ब्लैक ऑपरेशन” करार दिया। संगठन ने दावा किया कि हमले की जानकारी हमले से 10 मिनट पहले “आधिकारिक रिकॉर्ड” में दर्ज की गई थी, और पहलगाम पुलिस स्टेशन की कथित ‘ढिलाई’ को “राज्य प्रायोजित झूठे हमले” का सबूत बताया। टीआरएफ ने यह भी दावा किया कि उसने भारतीय खुफिया एजेंसियों को हैक किया और “झूठे हमलों की योजना” को उजागर करने की धमकी दी।

27 अप्रैल 2025 को, टीआरएफ ने दावा किया कि उसने भारतीय खुफिया तंत्र में घुसपैठ की है, और “ऑपरेशन त्रिनेत्र” नामक एक कथित RAW दस्तावेज को लीक करने की धमकी दी, जो कथित तौर पर TRF को बदनाम करने के लिए बनाया गया था। टीआरएफ का दावा था कि रॉ की यह रिपोर्ट 16 अप्रैल 2025 की तारीख की थी और इसका मकसद पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठन द रेजिस्टेंस फ्रंट को एक बड़े नागरिक और सिक्योरिटी इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमले के लिए जिम्मेदार ठहराना था। इस रिपोर्ट में टीआरएफ को आईएसआई का मोहरा बताया गया था। दस्तावेज के अनुसार, ऑपरेशन त्रिनेत्र का मकसद एक ऐसे “जनसंहारक घटना” को अंजाम देना था, जिससे भारत अमेरिकी उपराष्ट्रपति सेनेटर वांस के भारत दौरे के दौरान आतंकवाद के खिलाफ अपनी वैश्विक स्थिति और नैरेटिव को मजबूत कर सके। हालांकि इन दावों की प्रामाणिकता की पुष्टि नहीं हो सकी, लेकिन सूत्रों का कहना है कि दरअसल ये टीआरएफ की साइबर प्रचार रणनीति का हिस्सा हैं।

Apache AH-64E Helicopters: भारतीय सेना की एविएशन कोर का दो साल का इंतजार खत्म! जल्द मिलने वाले हैं अपाचे अटैक हेलिकॉप्टर

AH-64E Apache Helicopters
Indian Air Force’s First Batch Of 4 Number Of Apache Attack Helicopters (File Photo)

Apache AH-64E Helicopters: भारतीय सेना की एविएशन कोर (AAC) की ताकत में जल्द ही एक बड़ा इजाफा होने जा रहा है। दुनिया के सबसे आधुनिक और घातक अटैक हेलिकॉप्टरों में से एक, अपाचे AH-64E अगले हफ्ते भारतीय सेना में शामिल होने जा रहे हैं। ये हेलिकॉप्टर सेना की एविएशन कोर को सौंपे जाएंगे, जो पहले से पूरी तरह से तैयार है। सूत्रों के अनुसार, पहले तीन अपाचे हेलिकॉप्टर रविवार या सोमवार को भारत पहुंचेंगे। ये हेलिकॉप्टर पाकिस्तान से सटी पश्चिमी सीमा पर तैनात किए जाएंगे।

Apache AH-64E हेलीकॉप्टर की डिलीवरी में देरी; भारत कर रहा अभी तक इंतजार, मोरक्को को मिल चुके हैं हेलीकॉप्टर!

Apache AH-64E Helicopters: नगतलाव बेस पर तैनाती की तैयारियां

भारतीय सेना ने मार्च 2024 में जोधपुर के नजदीक नागतलाव में अपना पहला अपाचे स्क्वॉड्रन (451 आर्मी एविएशन स्क्वॉड्रन) तैयार किया था। ग्राउंड स्टाफ और पायलट्स की ट्रेनिंग भी पूरी हो चुकी है। हालांकि, सप्लाई चेन में दिक्कतों और दूसरी वजहों के चलते इन हेलिकॉप्टरों की डिलीवरी में देरी हुई। अब, लगभग दो साल बाद, सेना का इंतजार खत्म होने जा रहा है। ये हेलिकॉप्टर रेगिस्तानी इलाकों में दुश्मन के बख्तरबंद वाहनों (टैंकों) को निशाना बनाने में माहिर हैं और इन्हें “टैंक किलर” के नाम से भी जाना जाता है।

2020 में हुई थी डील, 2023 में मिलने थे हेलिकॉप्टर

भारत और अमेरिका के बीच 2020 में छह अपाचे हेलिकॉप्टरों की खरीद को लेकर समझौता हुआ था। यह डील अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पहले टर्म के दौरान भारत यात्रा के दौरान हुई थी। इससे पहले 2015 में भारतीय वायुसेना के लिए बोइंग कंपनी के साथ 22 AH-64E अपाचे हेलिकॉप्टरों की डील साइन हुई थी। वायुसेना को ये सभी 22 हेलिकॉप्टर जुलाई 2020 तक मिल चुके हैं। 2019 में पठानकोट एयरबेस (125 स्क्वॉड्रन, ग्लैडिएटर्स) पर पहले आठ हेलिकॉप्टर शामिल किए गए थे, जबकि बाकी हेलिकॉप्टरों की तैनाती असम के जोरहाट (137 स्क्वॉड्रन) में हुई। लद्दाख क्षेत्र में भी वायुसेना के अपाचे हेलिकॉप्टरों को तैनात किया गया था। हालांकि ऊंचाई वाले क्षेत्रों में इनकी ऑपरेशनल क्षमता को लेकर कुछ सवाल भी उठे हैं। लेकिन सेना के लिए खरीदे गए छह हेलिकॉप्टरों की डिलीवरी कोविड महामारी और अन्य सप्लाई चेन में दिक्कतों के चलते बार-बार टलती रही।

अत्याधुनिक तकनीक से लैस है अपाचे

अपाचे AH-64E हेलिकॉप्टर को दुनिया के सबसे आधुनिक और घातक अटैक हेलिकॉप्टरों में गिना जाता है। यह हेलिकॉप्टर दो जनरल इलेक्ट्रिक T700 टर्बोशैफ्ट इंजनों से लैस होता है। इसके नोज पर लगा सेंसर सूट लक्ष्य को ढूंढने, ट्रैक करने, और हमला करने में मदद करता है, जो दिन-रात, हर मौसम में काम करता है। इसमें लगे मॉडर्न टारगेट एक्विजिशन सिस्टम की मदद से यह दुश्मन के टैंक, बंकर और सैनिक ठिकानों को सटीकता से निशाना बना सकता है।

Apache AH-64E Delay: India Still Waiting, Morocco Receives First Batch!
Royal Moroccan Air Force Apache

अपाचे में नाइट विजन, लेजर और इंफ्रारेड आधारित सिस्टम होते हैं। इसमें 30 मिमी की ऑटोमैटिक तोप (cannon), 70 मिमी रॉकेट्स और हेलफायर मिसाइलें लगाई जा सकती हैं। भारतीय वायुसेना के अपाचे हेलिकॉप्टरों के साथ अमेरिका से हेलफायर लॉन्गबो मिसाइल, स्टिंगर मिसाइल और फायर कंट्रोल रडार भी शामिल थे। सेना को भी इसी तरह की क्षमताओं वाले हेलिकॉप्टर मिलेंगे।

रेगिस्तान में क्यों होगी तैनाती

सेना अधिकारियों के मुताबिक, अपाचे हेलिकॉप्टरों को राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों में तैनात किया जाएगा, जहां ये दुश्मन के टैंक और आर्मर्ड फॉर्मेशन के खिलाफ कार्रवाई में अहम भूमिका निभाएंगे। ये हेलिकॉप्टर दुश्मन की सीमा के भीतर घुसकर ऑपरेशन करने की क्षमता रखते हैं और इन्हें ‘उड़ता हुआ टैंक’ भी कहा जाता है।

भारतीय हेलिकॉप्टर ‘प्रचंड’ से तुलना

जहां अपाचे को रेगिस्तानी इलाकों के लिए उपयुक्त माना गया है, वहीं ऊंचाई वाले इलाकों के लिए भारतीय हल्के अटैक हेलिकॉप्टर LCH ‘प्रचंड’ को बेहतर बताया गया है। ‘प्रचंड’ को खासतौर पर ऊंचे पहाड़ी इलाकों में ऑपरेशन के लिए डिजाइन किया गया है। सूत्रों के अनुसार, ये हेलिकॉप्टर न केवल हमले (अटैक) के लिए, बल्कि टोही, सुरक्षा, और शांति मिशनों में भी उपयोगी होंगे। इनकी तैनाती से सेना की रणनीतिक ताकत बढ़ेगी, खासकर उन इलाकों में जहां त्वरित और सटीक हमले की जरूरत होती है।

ड्रोन को कर सकते हैं कंट्रोल

अपाचे AH-64E हेलिकॉप्टर एक और खूबी के लिए जाना जाता है। यह मानव रहित हवाई वाहन (ड्रोन) को रिमोट से नियंत्रित कर सकता है। इससे इसकी निगरानी, हमला और रीयल टाइम जानकारी हासिल करने की क्षमता और बढ़ जाती है।

अमेरिका में हो रही है अपाचे की जगह नई तकनीक की तैयारी

दिलचस्प बात यह है कि अमेरिका खुद अपने पुराने AH-64D और E वर्जन के अपाचे हेलिकॉप्टरों को हटाकर नई पीढ़ी के फ्लारा (FLRAA – Future Long-Range Assault Aircraft) प्रोग्राम पर काम कर रहा है। अमेरिकी सेना ने 2019 में इस प्रोग्राम की शुरुआत की और अब इसकी मैन्युफैक्चरिंग प्रक्रिया में प्रवेश कर चुका है। नया हेलिकॉप्टर MV-75 नाम से जाना जाएगा, जो ब्लैक हॉक हेलिकॉप्टर की भी जगह लेगा।

अपाचे हेलिकॉप्टर की खासियतें

अपाचे AH-64E, जिसे अपाचे गार्जियन भी कहा जाता है, दुनिया का सबसे उन्नत मल्टी-रोल अटैक हेलिकॉप्टर है। इसे बोइंग कंपनी बनाती है और यह पुराने Mi-35 हेलिकॉप्टरों की जगह लेगा।

अपाचे में मॉडर्नाइज्ड टारगेट एक्विजिशन डेजिग्नेशन सिस्टम (MTADS) है, जो दिन-रात और हर मौसम में लक्ष्य को ट्रैक करने की क्षमता देता है। इसका फायर कंट्रोल रडार हवा और जमीन दोनों तरह के 128 लक्ष्यों को एक मिनट से कम समय में पहचान सकता है और 16 लक्ष्यों पर हमला कर सकता है।

यह हेलफायर मिसाइल्स (AGM-114L-3 और AGM-114R-3), 70mm रॉकेट्स, और 30mm ऑटोमैटिक कैनन से लैस है, जो 1,200 राउंड गोला-बारूद ले जा सकता है। ये हथियार बख्तरबंद वाहनों, बंकरों, और दुश्मन की किलेबंदी को नष्ट करने में सक्षम हैं।

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नोज-माउंटेड सेंसर और नाइट विजन नेविगेशन इसे रात के अंधेरे में भी ऑपरेशन करने की क्षमता देते हैं। अपाचे ड्रोन जैसे MQ-1C ग्रे ईगल को रिमोटली कंट्रोल कर सकता है, जिससे टोही (रेकनोसन्स) और निगरानी की क्षमता बढ़ती है। यह रेगिस्तानी गर्मी, पहाड़ी इलाकों, और समुद्री वातावरण में प्रभावी ढंग से काम करता है। इसकी अधिकतम रफ्तार 365 किलोमीटर प्रति घंटा है। यह युद्धक्षेत्र की तस्वीरें रियल-टाइम में भेज और प्राप्त कर सकता है, जिससे कमांडरों को तुरंत जानकारी मिलती है।

Excalibur Artillery Ammunition: ऑपरेशन सिंदूर में देसी के साथ इस विदेशी हथियार ने भी दिखाया था अपना ‘कैलिबर’, 9 में 7 आतंकी ठिकाने किए थे तबाह!

Excalibur Artillery Ammunition: US-Made Precision Shells Helped Destroy 7 of 9 Terror Targets in Operation Sindoor

Excalibur Artillery Ammunition: भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ चार दिन चले ऑपरेशन सिंदूर में न केवल स्वदेशी हथियारों ने अपनी ताकत दिखाई थी, बल्कि उनमें से कुछ ऐसे विदेशी हथियार भी थे, जिन्होंने पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों पर सटीक हमला करके पाकिस्तानी सेना की कमर तोड़ दी थी। इन हथियारों से से कई अमेरिका से लिए गए थे। इन्ही में से एक हथियार था एक्सकैलिबर (Excalibur) आर्टिलरी एम्युनिशन, जिसने पाकिस्तान में जमकर तबाही मचाई। वहीं एक्सकैलिबर गोलों की सटीकता से प्रभावित होकर भारत अमेरिका से और ऐसे गोले खरीदने की योजना बना रहा है।

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Excalibur Artillery Ammunition: पीओके में जमकर बरपाया था कहर

सैन्य सूत्रों ने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सेना की आर्टिलरी ने पाकिस्तान और पीओके में जमकर कहर बरपाया था और आतंकी ठिकानों को निशाना बनाने में अहम भूमिका निभाई थी। इस दौरान बोफोर्स, M777 और इजराइली सॉल्टम तोपों का इस्तेमाल किया गया। ऑपरेशन से जुड़े सूत्रों ने बताया कि इस दौरान नौ आतंकी ठिकानों को टारगेट दिया गया था, जिनमें से सात को भारतीय सेना ने नष्ट किया था।

सूत्रों ने बताया, “पीओके में सात आतंकी शिविरों को खत्म करने में तोपों का बेहद सटीक और प्रभावी तरीके से इस्तेमाल किया गया था।”

दो मीटर तक की सटीकता

सूत्रों ने बताया, इस दौरान अमेरिका से खरीदे गए एक्सकैलिबर (Excalibur) आर्टिलरी एम्युनिशन ने बेहद सटीक हमले किए थे। इनकी सटीकता का अंदाजा इसी लगा सकते हैं कि एक्सकैलिबर एक GPS-गाइडेड आर्टिलरी एम्युनिशन है, और इसकी सटीकता इतनी अधिक होती है कि यह 2 मीटर के भीतर ही लक्ष्य को भेद सकता है। भारतीय सेना ने एयर डिफेंस यूनिट के साथ मिलकर आर्टिलरी ने नियंत्रण रेखा से 6 से 16 किलोमीटर की दूरी पर स्थित सभी सात आतंकी शिविरों को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया। भारतीय सेना की आर्टिलरी ने पाकिस्तान में मौजूद आतंकी ठिकानों को 2019 में सेना में शामिल किए गए एक्सकैलिबर गोला-बारूद के जरिए नष्ट किए। इन गोलों को M777 हॉवित्जर से दागा गया था। यह आर्टिलरी एम्युनिशन 50 किलोमीटर दूर तक के लक्ष्यों को सटीकता से भेदने में सक्षम है।

एक्सकैलिबर की क्या हैं खूबियां

एक्सकैलिबर का पहली बार इस्तेमाल 2007 में इराक में हुआ था, जहां इसने शहरी युद्ध में अपनी सटीकता साबित की। 2012 में अफगानिस्तान में, M777 हॉवित्जर ने Excalibur का इस्तेमाल कर 36 किमी की दूरी पर टारगेट को निशाना बनाया, जो मरीन कॉर्प्स के लिए रिकॉर्ड था।

M982 एक्सकैलिबर 155 मिमी तोप का गोला है, जो बहुत सटीक निशाना लगाता है। इसे अमेरिका की कंपनी Raytheon और स्वीडन की BAE Systems ने मिलकर बनाया है। यह गोला M777 जैसे लाइट आर्टिलरी हॉवित्जर से दागा जाता है। इसे खास तौर पर ऐसे युद्धों के लिए बनाया गया है कि शहरों में या सीमावर्ती इलाकों में आसपास की जगहों को नुकसान पहुंचाए बिना सटीक हमला किया जा सके।

Excalibur एक “स्मार्ट” गोला है, जो GPS और एक खास नेविगेशन सिस्टम की मदद से अपने लक्ष्य को ढूंढता है। यह सामान्य तोप के गोले से अलग है, क्योंकि यह उड़ते समय अपनी दिशा को ठीक कर सकता है। इसे M777, M109A6 पलाडिन, या अन्य आधुनिक तोपों से दागा जा सकता है। जहां सामान्य गोले 50-200 मीटर तक चूक सकते हैं, लेकिन यह मात्र 2 मीटर के भीतर ही लक्ष्य को निशाना बना सकता है।

इसकी रेंज की बात करें, तो M777 हॉवित्जर से यह 40 किलोमीटर तक मार कर सकता है। वहीं, अगर ज्यादा लंबी बैरल वाली तोप (जैसे 52-कैलिबर) हो, तो यह 50 किलोमीटर तक मार कर सकता है। जबकि कुछ खास वैरिएंट 70 किलोमीटर तक भी मार कर सकते हैं।

M777 हॉवित्जर से गोला जैसे ही निकलता है, वह एक साधारण गोले की तरह आगे बढ़ता है, लेकिन जैसे-जैसे वह अपनी अधिकतम ऊंचाई (apogee) पर पहुंचने वाला होता है, उसमें लगे छोटे-छोटे पंख (canards) अपने आप बाहर निकल आते हैं। ये पंख गोले को उड़ान के दौरान स्थिर रखते हैं और सही दिशा में आगे बढ़ने में मदद करते हैं।

इसके बाद गोला अपने अंदर लगे GPS सिस्टम से उपग्रहों से सिग्नल लेकर अपने लक्ष्य को ट्रैक करता है। अगर कभी GPS सिग्नल न मिले तो इसमें इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम भी होता है, जो गोले को उसकी दिशा और स्थिति बनाए रखने में मदद करता है। जैसे ही गोला अपने टारगेट के नजदीक पहुंचता है, तो यह लगभग सीधी दिशा (near-vertical angle) में नीचे गिरता है, ताकि ज्यादा से ज्यादा असर हो। इसके अंदर लगे फ्रैग्मेंटेशन वारहेड्स यानी टुकड़ों में बिखरने वाला विस्फोटक, लक्ष्य पर गिरते ही या उसके अंदर घुसकर या हवा में एक निर्धारित ऊंचाई पर फटता है।

एक्सकैलिबर गोले में तीन तरह के फ्यूज विकल्प जैसे हाइट ऑफ बर्स्ट, पॉइंट डिटोनेशन और डिले एंड पेनिट्रेशन होते हैं। इस गोले का वजन लगभग 48 किलो होता है और यह एक खास तकनीक (base-bleed) से काम करता है। इस तकनीक में गोले के पीछे से हल्की गैस निकलती है, जिससे हवा का घर्षण कम होता है और गोला लंबी दूरी तक जा सकता है।

इतनी है एक गोले की कीमत

वहीं, इसकी कीमत की बात करें, करीब 68,000 से 100,000 डॉलर (56 लाख से 82 लाख रुपये) प्रति गोला है। यह पारंपरिक गोले (लगभग 800 डॉलर) से काफी महंगा है। एक्सकैलिबर को गाइड करने के लिए फायर सपोर्ट सेंसर सिस्टम वाला M707 नाइट व्हीकल इस्तेमाल किया जाता है, जो दुश्मन की लोकेशन, मौसम, ऊंचाई और समय जैसी जानकारियों को प्रोसेस कर गोले को अंतिम दिशा देता है। इस पूरे सिस्टम का सबसे बड़ा फायदा यह है कि किसी भी दूरी पर बेहद सटीक हमला किया जा सकता है, आसपास होने वाला नुकसान बहुत कम होता है, जिससे हर टारगेट पर कम गोले खर्च होते हैं।

अमेरिका से तुरंत चाहिए एक्सकैलिबर

वहीं, इसकी सटीकता से प्रभावित हो कर भारत ने अमेरिका से एक्सकैलिबर GPS-गाइडेड एम्युनिशन की आपातकालीन खरीद का अनुरोध किया है। ये गोले M777 लाइट हॉवित्ज़र से दागे जाते हैं और 40 किलोमीटर दूर तक 15-20 मीटर की सटीकता से निशाना साध सकते हैं।

सूत्रों ने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर ने M777 तोपों, एक्सकैलिबर गोला-बारूद और दूसरे मिलिट्री इक्विपमेंट्स का सपोर्ट मिला है, इससे यह संकेत मिलता है कि भारत अब सिर्फ भरोसे पर नहीं, बल्कि ठोस विश्वसनीयता पर जोर दे रहा है। हालांकि, इस दिशा में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि अमेरिका में ट्रंप प्रशासन से जुड़ी अनिश्चितताओं के बीच इस प्रक्रिया को बिना प्रभावित हुए कैसे आगे बढ़ाया जाए।

इसके अलावा भारत ने अमेरिका से ‘जेवलिन’ एंटी-टैंक मिसाइलें भी तुरंत खरीदने का प्रस्ताव रखा है। यह प्रस्ताव पहले से चल रही डील से अलग है। फरवरी 2025 में पीएम मोदी की अमेरिका यात्रा के दौरान इस डील का जिक्र हुआ था।

बता दें कि भारतीय सेना ने 2019 में एक्सकैलिबर गोलों की खरीद शुरू की थी। शुरुआत में भारत ने अक्टूबर 2019 में 1,200 एक्सकैलिबर गोले खरीदे। इनमें दो प्रकार के गोले शामिल थे, 500 गोले 20 मीटर की सटीकता (Circular Error Probable, CEP) वाले। और 700-800 गोले: 2 मीटर की सटीकता वाले। वहीं, 2020 में लद्दाख में भारत-चीन के तनाव के बाद, भारतीय सेना ने जून 2021 में $9.17 मिलियन मूल्य के एक्सकैलिबर Increment Ib गोलों की खरीद की थी। ये गोले GPS जैमिंग के खिलाफ बेहद कारगर हैं।

Excalibur Artillery Ammunition: US-Made Precision Shells Helped Destroy 7 of 9 Terror Targets in Operation Sindoor
M777 155 mm light howitzers (PIC: IAF)

 

M777 सबसे हल्की फील्ड हॉवित्जर

M777 हॉवित्जर को दुनिया का सबसे हल्का 155 मिमी तोपखाना कहा जाता है, जिसका वजन लगभग 7,500 पाउंड (4218 किग्रा) होता है। इसे हेलीकॉप्टर (जैसे चिनूक) या अन्य एयरक्राफ्ट द्वारा कहीं भी ले जाया जा सकता है। यह खासकर ऊबड़-खाबड़ इलाके या ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बेहद कारगर है। इसकी अधिकतम रेंज 24.7 किमी होती है, लेकिन एक्सकैलिबर जैसे खास गोलों के जरिए 30 किमी या उससे अधिक तक निशाना साध सकती है।

M777 हॉवित्जर डील की शुरुआत 2010 में हुई थी। 30 नवंबर 2016 को भारत और अमेरिका ने 737 मिलियन डॉलर (लगभग 5500 करोड़ रुपये) की डील पर दस्तखत किए। यह सौदा अमेरिका के फॉरेन मिलिट्री सेल्स प्रोग्राम के तहत हुआ था। इस डील में 145 M777 तोपें, लेजर इनर्शियल आर्टिलरी पॉइंटिंग सिस्टम (LINAPS), स्पेयर पार्ट्स, ट्रेनिंग, और लॉजिस्टिक सपोर्ट शामिल था। मई 2017 में पहली दो M777 तोपें भारत पहुंचीं। इन्हें राजस्थान के पोखरण फील्ड फायरिंग रेंज में टेस्ट किया गया। जिसके बाद भारत ने 145 M777 हॉवित्जर को 2019 में शामिल किया। इस सौदे में 2020 में 25 M777 हॉवित्जर अमेरिका से पूरी तरह तैयार (रेडी-बिल्ट) अवस्था में आयात की गईं। और 2022 में 120 तोपें भारत में महिंद्रा डिफेंस सिस्टम्स लिमिटेड के साथ मिलकर असेंबल की। जिसका मकसद पहाड़ी और सीमावर्ती क्षेत्रों में तैनाती था। भारत के पास M777 हॉवित्जर की सात रेजिमेंट्स हैं, यानी हर रेजिमेंट में 18 तोपें।

लेकिन M777 की खरीद इतनी भी आसान नहीं थी। 2014 में यह सौदा रद्द होने की कगार पर था, क्योंकि अमेरिका ने कीमत बढ़ा दी थी। 2017 में पोखरण टेस्टिंग के दौरान एक M777 की बैरल खराब हो गई थी, जिसकी वजह भारतीय ऑर्डनेंस फैक्ट्री बोर्ड (OFB) का गोला-बारूद बताया गया था।

M777 प्रति मिनट तेज रफ्तार से 4 राउंड (गोले) दाग सकता है। हालांकि, यह रेट केवल छोटी अवधि (1-2 मिनट) के लिए संभव है, क्योंकि इससे बैरल गर्म हो जाती है। वहीं, इसका निरंतर फायरिंग रेट प्रति मिनट 2 राउंड है।

Jaguar Fighter Crash: पूरी दुनिया में केवल भारतीय वायुसेना ही ऑपरेट कर रही है जगुआर, दुर्घटनाग्रस्त जेट अपग्रेड प्रोग्राम का रहा है हिस्सा!

Jaguar Fighter Crash: IAF Only Operator Worldwide, Crashed Jet Was Part of Upgrade Program

Jaguar Fighter Crash: 9 जुलाई 2025 को राजस्थान के चूरू जिले में भारतीय वायुसेना (IAF) का एक जगुआर ट्रेनर विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया। यह हादसा दोपहर करीब 1:25 बजे भानुड़ा गांव के पास एक खेत में हुआ, जिसमें विमान पर सवार दोनों पायलटों की मौत हो गई। यह इस साल जगुआर विमानों से जुड़ा तीसरा हादसा है, जिसके बाद भारतीय वायुसेना के पुराने हो चुके विमानों की लाइफ साइकिल और इनके मैंटेनेंस को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। वहीं वायुसेना सूत्रों का कहना है कि क्रैश हुआ जगुआर DARIN-II अपग्रेडेड फाइटर जेट था।

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भारतीय वायुसेना के मुताबिक, यह जगुआर ट्रेनर जेट सूरतगढ़ एयरबेस से नियमित प्रशिक्षण उड़ान पर था। दोपहर करीब 1:25 बजे, राजस्थान के चुरू जिले के भानुदा गांव (रतनगढ़ तहसील) में यह ट्रेनर जेट दुर्घटनाग्रस्त हो गया। हादसे की वजह तकनीकी खराबी बताई जा रही है। साथ ही वायुसेना ने दुर्घटना के कारणों की जांच के लिए कोर्ट ऑफ इंक्वायरी गठित कर दी है। चुरु प्रशासन का कहनाा है कि हादसे के तुरंत बाद पुलिस और प्रशासन की टीमें मौके पर पहुंचीं। बचाव और राहत कार्य शुरू किए गए, लेकिन विमान के मलबे में दोनों पायलटों के शव क्षत-विक्षत हालत में मिले। हालांकि किसी भी नागरिक संपत्ति को नुकसान नहीं हुआ है। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि पायलटों ने विमान को आबादी वाले इलाके से दूर ले जाकर लोगों की जान बचाने की कोशिश की।

Jaguar Fighter Crash: इस साल जगुआर का तीसरा हादसा

2025 में जगुआर विमानों से जुड़ा यह तीसरा हादसा है। इससे पहले 7 मार्च को हरियाणा के पंचकूला में एक जगुआर विमान दुर्घटनाग्रस्त हुआ था, जिसमें पायलट सुरक्षित बाहर निकल गया था। इसके बाद 2 अप्रैल को गुजरात के जामनगर के पास एक अन्य जगुआर विमान क्रैश हुआ, जिसमें पायलट फ्लाइट लेफ्टिनेंट सिद्धार्थ यादव की मौत हो गई थी। सिद्धार्थ ने भी विमान को आबादी से दूर ले जाकर कई लोगों की जान बचाई थी। जबकि दूसरा पायलट घायल हो गया था।

केवल भारतीय वायुसेना ही कर रही है ऑपरेट

SEPECAT Jaguar एक ट्विन-इंजन, ग्राउंड-अटैक फाइटर-बॉम्बर विमान है, जिसे ब्रिटेन और फ्रांस ने मिलकर बनाया था। यह विमान भारत के न्यूक्लियर ट्रायड का अहम हिस्सा है और इसका इस्तेमाल डीप पेनेट्रेशन स्ट्राइक मिशनों के लिए किया जाता है। भारतीय वायुसेना में इसे “शमशेर” (न्याय की तलवार) के नाम से जाना जाता है। इसकी डीप स्ट्राइक क्षमता और कम ऊंचाई पर उड़ान भरने के चलते इसी काफी वाहवाही भी मिली है। इसका ‘लो-लो-लो कॉम्बैट रेडियस ऑफ एक्शन’ 650 किलोमीटर है।

भारतीय वायुसेना ने 1979 में ब्रिटेन से 40 जगुआर सीधे खरीदे थे, जबकि हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) ने तकनीकी हस्तांतरण समझौते के तहत और 100 विमान भारत में बनाए। इस तरह 2008 तक कुल मिलाकर 160 जगुआर विमान वायुसेना के बेड़े में शामिल हो गए। वहीं, अप्रैल 2025 तक, भारतीय वायुसेना के पास 115 जगुआर विमान बचे हैं, जिनमें से 83 उड़ाने की हालात में हैं। इस समय जगुआर की छह स्क्वाड्रन (अंबाला, जामनगर, गोरखपुर, भुज, और सूरतगढ़) में हैं, जबकि इनमें से 30 ट्रेनर वेरिएंट हैं।

वहीं, भारतीय वायुसेना ही पूरी दुनिया में इस विमान की एकमात्र ऑपरेटर है। ब्रिटेन ने अपने जगुआर विमानों को 2007 तक रिटायर कर दिया था, जबकि फ्रांस ने 2005 में ही इनका ऑपरेशन बंद कर दिया था। ओमान, इक्वाडोर और नाइजीरिया जैसे अन्य देशों ने भी काफी पहले ही इन्हें सर्विस से बाहर कर दिया

भारत ने खरीदे थे पुराने स्पेयर पार्ट्स

2018 में, भारत ने फ्रांस, ओमान, और यूके से 31 डीकमीशन किए गए जगुआर एयरफ्रेम और स्पेयर पार्ट्स हासिल किए थे, ताकि बेड़े को कुछ और सालों तक चालू रखा जा सके। जगुआर विमानों की दुर्घटनाओं की वजहों में तकनीकी खराबी (जैसे अंडरपॉवर्ड रोल्स-रॉयस टर्बोमेका Adour Mk811 इंजन), पुराने एयरफ्रेम, और मैंटेनेंस को लेकर सवाल उठाए गए हैं। भारतीय वायुसेना ने इनके इंजनों को हनीवेल के F125-IN टर्बोफैन इंजनों से बदलने की योजना बनाई थी, जो 30% ज्यादा थ्रस्ट देता। लेकिन 2019 में ज्यादा लागत के चलते इसे रद्द कर दिया गया। Adour इंजन को सपोर्ट करने वाली कंपनी रॉल्स-रॉयस ने साफ कर दिया है कि वह केवल 2035 तक ही इन इंजनों के लिए मेंटेनेंस सपोर्ट देगी। सूत्रों का कहना है कि प्रत्येक विमान के लिए 190 करोड़ रुपये और एचएएल को अमेंडमेंट, टेस्टिंग और सर्टिफिकेशन के लिए अतिरिक्त 20 करोड़ रुपये की जरूरत थी।

DARIN अपग्रेड प्रोग्राम

वहीं, समय के साथ आधुनिक युद्ध की जरूरतों को पूरा करने और इसकी ऑपरेशनल लाइफ को लंबा करने के लिए जगुआर में तीन बड़े अपग्रेड भी किए गए। जैगुआर को DARIN (Display Attack Ranging Inertial Navigation) प्रोग्राम के तहत अपग्रेड किया गया।

पहला अपग्रेड DARIN-I 1980 के दशक में मिला। 1982 से HAL द्वारा बनाए गए सभी जगुआर विमानों में DARIN सिस्टम लगाया गया। इनमें नया नेविगेशन/अटैक सिस्टम जोड़ा। जिसके बाद कम ऊंचाई पर यह सटीक हमला करने में माहिर हो गया। जिसके बाद जैगुआर दुश्मन की डिफेंस लाइन को भेदने में माहिर हो गया। यह पहला बड़ा अपग्रेड था, जिसने जैगुआर की नेविगेशन और विपन डिलिवरी कैपेसिटी को एडवांस बनाया।

DARIN II

पहले अपग्रेड के बाद 1990 के दशक के अंत से 2000 के दशक की शुरुआत तक DARIN II अपग्रेड चला। जिसमें एडवांस इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर (EW) सूट, रडार वार्निंग रिसीवर्स (RWR), और नए हथियारों को इंटीग्रेट किया गया। साथ ही, ऑटोपायलट, नए डिस्प्ले, और HOTAS (Hands On Throttle And Stick) सिस्टम ने पायलटों के लिए विमान को कंट्रोल करना आसान बनाया। साथ ही, समुद्री हमले की क्षमता के लिए कुछ विमानों में सी ईगल और हार्पून जैसी एंटी-शिप मिसाइलें भी शामिल की गईं। इसका नतीजा था पूरी तरह से स्वदेशी DARIN-II, विमान को रनवे के टचडाउन पॉइंट तक अंधेरे में भी गाइडेंस देता है।

एक रिटायर्ड जगुआर पायलट कहते हैं, “अंबाला की जानी-मानी सर्दियों की धुंध में, जब आप अपना हाथ भी न देख पाएं, तब भी जगुआर आसानी से लैंड और टेकऑफ कर रहा था।”

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DARIN III

वहीं, 2011 में DARIN III अपग्रेड शुरू हुआ। भारतीय वायुसेना के डिप्टी चीफ, एयर मार्शल आरकेएस भदौरिया ने एचएएल बेंगलुरु में DARIN-III से लैस एक जगुआर उड़ाया और उसके बाद उन्होंने इस अपग्रेडेड सिस्टम को “इनिशियल ऑपरेशनल क्लीयरेंस” दे दी। यह अपग्रेड जगुआर को 21वीं सदी का सुपर फाइटर यानी आधुनिक युद्ध का योद्धा बनाने की कोशिश थी। इसमें ग्लास कॉकपिट, नया मिशन कंप्यूटर, इजरायली EL/M-2052 AESA रडार, और GPS-बेस्ड नेविगेशन सिस्टम शामिल हुए। इस अपग्रेड से जगुआर को दुश्मन के इलाके में बेहद सटीक बमबारी करने की क्षमता मिली। वहीं, न्यू जेनरेशन लेजर गाइडेड बम (NGLGBs), अमेरिका से 2010 में खरीदा गया Textron CBU-105 सेंसर फ्यूज्ड वेपन, रुद्रम-1, AIM-9 साइडविंदर, और ASRAAM जैसे हथियारों ने इसे मल्टीरोल फाइटर बनाया। सेंसर फ्यूज्ड वेपन टैंकों को नष्ट करने में माहिर है। यह हथियार हवा में कई “स्मार्ट बमलेट्स” में विभाजित हो जाता है, जो स्वचालित रूप से टैंक को खोजकर उसके टरेट (ऊपरी भाग) को भेदते हैं।

2031-32 तक बने रहेंगे सर्विस में

सूत्रों का कहना है कि 2025 तक, 50-60 जगुआर इस स्टैंडर्ड तक अपग्रेड हो चुके हैं, और यह प्रोसेस अभी जारी है। DARIN-II से लैस लगभग 60 जगुआर उसी सिस्टम के साथ काम करते रहेंगे, जबकि बाकी 60 विमान जो अभी भी पुराने DARIN सिस्टम से लैस हैं, उन्हें अब DARIN-III में अपग्रेड किया जाएगा। इस अपग्रेड के बाद जगुआर 2031-32 तक सर्विस में बने रहेंगे। हालांकि IAF के 30 ट्रेनर वेरिएंट में से सभी को DARIN III अपग्रेड नहीं मिला। सूत्रों का कहना है कि ट्रेनर जेट्स मुख्यतः ट्रेनिंग के लिए हैं, अक्सर पुराने स्टैंडर्ड्स पर ही रहते हैं।

HIMARS vs PINAKA: पाकिस्तान को क्यों चाहिए अमेरिका का यह रॉकेट सिस्टम? क्यों पिनाका ने उड़ा रखी है मुनीर की नींद? समझें पूरा समीकरण

HIMARS vs Pinaka: Pakistan is lobbying for US-made High Mobility Artillery Rocket System
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HIMARS vs PINAKA: जून में पाकिस्तानी फील्ड मार्शल और सेना प्रमुख आसिम मुनीर के अमेरिका दौरे के बाद पाकिस्तानी एयरफोर्स चीफ (PAF) जहीर अहमद बाबर सिद्धू अमेरिका पहुंचे। पाकिस्तानी सैन्य प्रमुखों का यह दौरा उनकी छटपटाहट दिखा रहा है कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद से वे काफी बैचेन हैं। बताया जाता है कि बाबर सिद्धू ने अमेरिका से कई एडवांस मिलिट्री प्लेटफॉर्म जिनमें F-16 ब्लॉक 70 फाइटर जेट्स और एयर डिफेंस सिस्टम की मांग की है। साथ ही पाकिस्तान AIM-7 स्पैरो एयर-टू-एयर मिसाइलें और अमेरिकी HIMARS (हाई मोबिलिटी आर्टिलरी रॉकेट सिस्टम) की बैटरियों भी खरीदना चाहता है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जिस तरह से भारतीय एयर डिफेंस सिस्टम ने पाकिस्तानी हमलों को नाकाम किया, उससे पाकिस्तान हैरान और परेशान है। पाकिस्तान अब अमेरिकी HIMARS पर नजरें गड़ा कर बैठा है।

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HIMARS vs PINAKA: अमेरिकी हथियारों में पाकिस्तान की अचानक रुचि क्यों?

सैन्य जानकार बताते हैं कि ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय हथियारों ने जिस तरह से सटीक उनके आतंकी औऱ सैन्य ठिकानों पर सटीक हमले किए, उसके बाद से पाकिस्तान बौखलाया हुआ है। चीनी एयर डिफेंस सिस्टम HQ-9 और HQ-16 के फेल हो जाने के बाद पाकिस्तान को अपनी डिफेंस स्ट्रेटेजी पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है। HQ-9 और HQ-16 भारतीय ब्रह्मोस मिसाइलों और ड्रोन स्वार्म्स को रोकने में पूरी तरह विफल रहीं। यहां तक कि पाकिस्तान अपने प्रमुख सैन्य ठिकानों, जैसे कि गुजरांवाला और मियांवाली एयरबेस, और संदिग्ध परमाणु केंद्र किराना हिल्स पर किए गए हमलों का भी कोई प्रभावी जवाब नहीं दे पाया। भारतीय हरॉप लोइटरिंग म्यूनिशन्स ने एक LY-80 रडार को नष्ट कर दिया, और HQ-9P सिस्टम भारतीय ड्रोन्स और लो-फ्लाइंग SCALP मिसाइलों को ट्रैक करने में फेल हो गए।

HIMARS vs Pinaka: Pakistan is lobbying for US-made High Mobility Artillery Rocket System
HIMARS vs PINAKA: Chief of the Air Staff, Pakistan Air Force (PAF), Air Chief Marshal Zaheer Ahmad Babar Sidhu and United States Air Force officials.

चीनी हथियारों पर निर्भरता बनी हार की वजह

पिछले कुछ सालों से पाकिस्तान ज्यादातर हथियार चीन से खरीद रहा है। उसकी सैन्य शक्ति का 81% हिस्सा चीनी हथियारों पर निर्भर है। हाल ही में भारतीय सेना के डिप्टी चीफ ऑफ स्टाफ, लेफ्टिनेंट जनरल राहुल आर सिंह ने FICCI की कॉन्फ्रेंस में खुलासा किया था कि चीन ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान को भारतीय सैन्य गतिविधियों की “लाइव” सैटेलाइट जानकारी मुहैया कराई थी। इसके बावजूद, चीनी हथियार भारतीय हमलों का मुकाबला करने में नाकाम साबित हुए। पाकिस्तान के पास चीनी HQ-9P एयर डिफेंस सिस्टम है, लेकिन चीन का घरेलू HQ-9B सिस्टम कहीं ज्यादा एडवांस है, जिसकी रेंज 250-300 किमी है। इसका मतलब साफ है कि चीन ने पाकिस्तान को घटिया क्वॉलिटी के हथियार निर्यात किए, जो आधुनिक युद्ध की चुनौतियों का सामना करने में फेल हो गए।

इसके अलावा, चीन ने पाकिस्तान की हाइपरसोनिक मिसाइलों और एडवांस टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की मांग को भी ठुकरा दिया, जो इस्लामाबाद के लिए बड़ा झटका था। चीनी हथियारों को लेकर नाराजगी न केवल सेना में थी, बल्कि जनता भी खुश नहीं दिखी। पाकिस्तानी मीडिया और सोशल मीडिया पर चीनी हथियारों की गुणवत्ता और विश्वसनीयता पर सवाल उठाए गए। ऑपरेशन सिंदूर ने न केवल पाकिस्तान की सैन्य कमजोरियों की पोल खोल दी, बल्कि इस्लामाबाद को यह भी अहसास करा दिया कि उसकी चीन पर अत्यधिक निर्भरता उसकी युद्धक्षमता को खतरे में डाल रही है।

पाक को अपने पाले में करना चाहता है अमेरिका

सैन्य सूत्रों ने अमेरिका के पूर्व विदेश मंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रहे हैनरी किसिंजर के एक कथन का जिक्र करते हुए कहा, “अमेरिका का कोई दोस्त या दुश्मन नहीं है, उसके केवल अपने हित हैं।” वह कहते हैं, अमेरिका अब फिर से उन्हीं देशों की तरफ देख रहा है जिन्हें उसने 20वीं सदी के अंत में छोड़ दिया था। अमेरिका को अब उनकी फिर से पाकिस्तान की जरूरत है।

वह आगे कहते हैं, अमेरिका भारत को एक दशक बाद के लिए खतरा मानता है, और इसके अलावा, वह भारत की सैन्य क्षमताओं को लेकर भी चिंतित है। इसलिए उसने बांग्लादेश को भी इसमें शामिल कर लिया। पाकिस्तान हमेशा कुछ पाने को लालायित रहता है, और अब उसे अमेरिका अपने हिसाब से इस्तेमाल कर रहा है।

सूत्र कहते हैं कि अब पाकिस्तानियों को ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अहसास हुआ है कि इस ऑपरेशन में चीनी हथियारों के फेल हो गए हैं। इसलिए वे अमेरिकियों के साथ संबंध बनाने की कोशिश कर रहे हैं। या यूं कहें कि वे चीन का इस्तेमाल करके अमेरिका के संग अपनी नजदीकियां बढ़ा रहे हैं।

अमेरिका बीते एक दशक में पाकिस्तान के चीन के करीब जाने से नाखुश रहा है। लेकिन अब एयर चीफ सिद्दू की यह यात्रा पाकिस्तान की ओर से यह संकेत मानी जा रही है कि इस्लामाबाद अब चीन पर अपनी निर्भरता कम करना चाहता है और रक्षा खरीद में संतुलन बनाना चाहता है। विश्लेषकों का मानना है कि एयर मार्शल सिद्दू की यह यात्रा पाकिस्तान की एक रणनीतिक संतुलन नीति का हिस्सा है, ताकि वॉशिंगटन को यह भरोसा दिलाया जा सके कि पाकिस्तान अपने रक्षा संबंधों को दोबारा पटरी पर लाने के लिए तैयार है।

पाकिस्तान के पास चीन का A-100 MLRS सिस्टम

पाकिस्तान के पास चीन का A-100 MLRS सिस्टम (Multiple Launch Rocket System) है। लेकिन भारत के स्वदेशी मल्टी बैरल रॉकेट सिस्टम पिनाका के मुकाबले कम प्रभावी है। पाकिस्तान के पास मौजूद चीनी A-100 MLRS सिस्टम में फिक्स्ड ट्यूब्स लगे हैं। इनमें केवल 300 मिमी की रॉकेट ही फायर किए जा सकते हैं। यह सिस्टम फ्लैक्सिबल नहीं है, और ना ही यह अन्य कैलिबर रॉकेट्स के साथ काम कर सकता है।

जबकि पिनाका पॉड्स का सबसे बड़ा फायदा है- फ्लैक्सिबिलिटी। पिनाका के पॉड फ्रेम को इस तरह डिज़ाइन किया गया है कि उसमें अलग-अलग कैलिबर की लॉन्चर ट्यूब्स लगाई जा सकती हैं। यानी एक ही पॉड फ्रेम को बार-बार अलग-अलग तरह की ट्यूब्स से जोड़ा जा सकता है। पिनाका में अलग-अलग एमएम वाले वॉरहेड्स (हाई-एक्सप्लोसिव, क्लस्टर, एंटी-टैंक, और माइन-लेइंग) फायर किए जा सकते हैं। इस रॉकेट सिस्टम को DRDO ने विकसित किया है और इसका निर्माण टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स और L&T इसे बना रही हैं।

वहीं, पिनाका में जो लॉन्चर ट्यूब्स इस्तेमाल होती हैं, वे एक बार इस्तेमाल के बाद बदली जा सकती हैं। ये ट्यूब्स ई-ग्लास एपॉक्सी रेजिन से बनी होती हैं और फिलामेंट वाइंडिंग प्रोसेस से बनाई जाती हैं। इससे ट्यूब्स हल्की होती हैं और फायरिंग के बाद पॉड फ्रेम को फिर से प्रयोग में लाया जा सकता है।

जबकि चीनी A-100 में लगे फिक्स्ड ट्यूब्स को बदला नहीं जा सकता। सिस्टम पुराना हो या ट्यूब डैमेज हो, पूरी यूनिट को रिप्लेस करना पड़ता है। जिससे लागत बढ़ाती है और फ्लैक्सिबिलिटी घटती है।

इसके अलावा पाकिस्तान के भेजे जाने वाले A-100 सिस्टम में 10 ट्यूब्स होती हैं, जो केवल 300 मिमी रॉकेट्स फायर कर सकती हैं। जबकि रूस के Smerch सिस्टम में 12 ट्यूब्स होती हैं। पिनाका Mk-1, Mk-2 और Mk-1 एन्हैंस्ड के लिए 6 ट्यूब पॉड्स होते हैं और गाइडेड पिनाका के लिए 4 ट्यूब्स प्रति पॉड मतलब 8 ट्यूब प्रति लॉन्चर ट्यूब पॉड्स होते हैं।

चीनी दावे के अनुसार इसकी रेंज 120 किलोमीटर तक है, जबकि इंप्रोवाइज्ड रूसी Smerch की रेंज 90 किमी है। A-100 की सबसे बड़ी कमी यह है कि यह रूसी Smerch रॉकेट्स के साथ कंपेटिबल नहीं है, जबकि कई देश अभी भी रूसी रॉकेट्स का इस्तेमाल करते हैं। चीनी कंपनियां खुद कहती हैं कि A-100 का प्रोपल्शन सिस्टम और डिजाइन अलग है, इसलिए इसमें सिर्फ उनके बनाए स्पेशल रॉकेट्स ही इस्तेमाल हो सकते हैं। A-100 की रेंज भले ही 120 किमी हो, लेकिन इसकी सटीकता और आधुनिक युद्ध की जरूरतों को पूरा करने की क्षमता पिनाका से कम है।

HIMARS vs Pinaka: Pakistan is lobbying for US-made High Mobility Artillery Rocket System

HIMARS में क्यों है पाकिस्तान की रुचि?

दरअसल पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम (MBRLS) को अमेरिकी HIMARS के बराबर बताया है। यूक्रेन-रूस युद्ध में HIMARS ने 30 रूसी सैन्य ठिकानों को नष्ट किया, जिसके बाद इसे काफी भरोसेमंद माना जाने लगा। अमेरिका ने जून 2022 में यूक्रेन को पहले चार HIMARS (अब तक 40) सिस्टम दिए थे। इसके बाद यूक्रेन ने दावा किया कि उसने इनकी मदद से 100 से ज़्यादा हाई-वैल्यू टारगेट (महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों) को तबाह किया। HIMARS ने 100+ किमी दूरी से ही हाई एक्सप्लोसिव और GMLRS जैसे गाइडेड रॉकेट्स के जरिए रूस के सैन्य ठिकानों को टारगेट किया और सटीक हमले किए। पाकिस्तान इसे भारत की सटीक हमले की क्षमता के खिलाफ एक संभावित प्रतिरोधक के रूप में देखता है। पाकिस्तान इस सिस्टम को हासिल करके भारत की लॉन्ग-रेंज आर्टिलरी बढ़त को संतुलित करना चाहता है। यह सिस्टम गाइडेड रॉकेट फायर करता है और तेजी से लोकेशन (शूट-एंड-स्कूट- फायर करके तुरंत स्थान बदलना) बदल सकता है, जिससे जवाबी हमला करना मुश्किल होता है।

HIMARS को आप एक चलती-फिरती रॉकेट बैटरी कह सकते हैं। इसमें लगे रॉकेट जीपीएस की मदद से गाइडेड होते हैं, यानी ये बहुत सटीक होते हैं। एक HIMARS 6 जीपीएस गाइडेड रॉकेट्स (69 किमी रेंज) या 2 प्रेसिजन स्ट्राइक मिसाइल्स या 1 आर्मी टैक्टिकल मिसाइल (300 किमी रेंज) फायर कर सकता है। इसके रॉकेट्स का वजन लगभग 200 पाउंड होता है और हर रॉकेट 13 फीट से ज़्यादा लंबा होता है।

HIMARS की एक खास बात यह है कि इसे बहुत कम सैनिकों यानी 3 लोगों की टीम ही ऑपरेट कर सकती है। इतना ही नहीं, इसे दुबारा लोड करने में केवल 1 मिनट लगता है, यानी यह तेजी से फायरिंग के लिए फिर से तैयार हो जाता है। वहीं इसे M1140 6×6 व्हील ड्राइव वाले ट्रक पर लगाया जाता है। HIMARS ट्रक को इस तरह डिज़ाइन किया गया है कि वह पहाड़, रेगिस्तान, दलदली ज़मीन और बर्फीले इलाकों में भी आराम से चल सके। यही कारण है कि HIMARS को आज दुनिया के सबसे भरोसेमंद और घातक मोबाइल रॉकेट सिस्टम में गिना जाता है।

HIMARS में अलग-अलग क्षमता वाले कई तरह के रॉकेट और मिसाइल इस्तेमाल किए जाते हैं। इनमें सबसे पहला है GMLRS, यानी गाइडेड मल्टीपल लॉन्च रॉकेट सिस्टम, जिसकी रेंज करीब 69 किलोमीटर तक है। इसके बाद आता है ER GMLRS, यानी लंबी दूरी वाला वर्जन, जिसकी रेंज 150 किलोमीटर मानी जाती है।

अगर टैक्टिकल लेवल की बात करें, तो HIMARS में ATACMS नामक मिसाइल का इस्तेमाल भी किया जा सकता है, जिसकी मारक दूरी 300 किलोमीटर तक जाती है। लेकिन सबसे नई और एडवांस मिसाइल है PrSM (Precision Strike Missile), जो करीब 499 किलोमीटर या उससे भी अधिक दूरी तक सटीक वार करने में सक्षम है। इन सभी रॉकेटों की खासियत यह है कि ये जीपीएस गाइडेड होते हैं। अमेरिकी रक्षा निर्माता लॉकहीड मार्टिन के अनुसार, प्रत्येक रॉकेट लक्ष्य के महज 16 फीट के दायरे में गिरता है, जो इसे मॉडर्न वारफेयर के लिए एक बेहद सटीक और भरोसेमंद हथियार बनाता है।

क्या ऑपरेशन सिंदूर में हुआ था पिनाका का इस्तेमाल?

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ऑपरेशन सिंदूर में पिनाका का इस्तेमाल नहीं किया गया था। हां, अग्रिम मोर्चे पर इसकी तैनाती जरूर की गई थी। इसे रिजर्व में रखा गया था। सूत्र बताते हैं कि अगर इसका इस्तेमाल हो जाता, तो निश्चित तौर पर पाकिस्तान को मौजूदा से ज्यादा नुकसान उठाना पड़ता। एक सूत्र ने बताया कि पाकिस्तान को अंदेशा था कि भारत पिनाका का इस्तेमाल करेगा। जिससे वह काफी डरा हुआ था। यहां तक कि पाकिस्तान ने पिनाका की मूवमेंट पर नजर रखने के लिए ड्रोन भी भेजे थे। लेकिन उन्हें मार गिराया गया।

पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर (MBRL) के बारे में कहा जाता है कि एक पूरी बैटरी अगर पूरे दमखम के साथ इस्तेमाल की जाए, तो यह लगभग 1000 मीटर x 800 मीटर (0.8 वर्ग किलोमीटर) के इलाके को बरबाद कर सकता है। दरअसल एक पिनाका बैटरी में 6 लॉन्चर होते हैं, और प्रत्येक लॉन्चर में 12 रॉकेट्स होते हैं। यानी, एक बैटरी में कुल 72 रॉकेट्स होते हैं। ये 72 रॉकेट्स 44 सेकंड में फायर किए जा सकते हैं, जो एक बड़े क्षेत्र (सैन्य ठिकानों, हथियार डिपो, या सैनिकों की टुकड़ियों) को तुरंत तबाह कर सकते हैं। सेना सूत्रों के अनुसार, एक बैटरी एक बार में 7.2 टन विस्फोटक सामग्री दुश्मन के इलाके में गिरा सकती है। पिनाका को 8×8 टाट्रा या BEML-टाट्रा ट्रक पर लगाया जाता है, जो इसे तेजी से तैनात करने में मदद करता है। इसकी शूट-एंड-स्कूट क्षमता दुश्मन के जवाबी हमलों से बचाती है।

प्रत्येक रॉकेट में हाई-एक्सप्लोसिव फ्रैगमेंटेशन (HE-FRAG), क्लस्टर म्यूनिशन, या अन्य वॉरहेड्स होते हैं, जो बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाते हैं। एक बैटरी का हमला 1000 मीटर x 800 मीटर (लगभग 0.8 वर्ग किलोमीटर) के क्षेत्र को प्रभावी ढंग से नष्ट कर सकता है। यह क्षेत्र सैन्य ठिकानों, हथियार डिपो, या सैनिकों की टुकड़ियों को तबाह करने के लिए काफी बड़ा है। खासकर अगर क्लस्टर म्यूनिशन का इस्तेमाल किया जाए, तो यह सैकड़ों छोटे-छोटे विस्फोटकों में बंट जाता है, जो एक बड़े क्षेत्र में तबाही मचा सकता है।

पिनाका में कई देशों ने दिखाई रूचि

पिनाका की लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि फ्रांस, इंडोनेशिया, नाइजीरिया, सऊदी अरब, वियतनाम औरर कुछ यूरोपीय और दक्षिण-पूर्व एशियाई देश इसमें रूचि दिखा चुके हैं। वहीं, आर्मेनिया पिनाका MBRL का पहला विदेशी खरीदार है। 2023 में उसने भारत से 245 मिलियन डॉलर की डील के तहत पिनाका सिस्टम खरीदा था। ये सिस्टम आर्मेनिया को ईरान के रास्ते डिलीवर किए गए, ताकि वह अजरबैजान के खिलाफ अपनी रक्षा को मजबूत कर सके। सूत्र बताते हैं कि भारत अब हर साल 5,000 से ज्यादा पिनाका रॉकेट बनाने की क्षमता हासिल कर चुका है।

भारतीय सेना के पास 6 पिनाका रेजिमेंट

वहीं, भारतीय सेना के पास 2025 तक 6 पिनाका रेजिमेंट (108+ लॉन्चर) हैं, और 4 और रेजिमेंट ऑर्डर पर हैं। भारत ने 2025 में 10,147 करोड़ रुपये के कॉन्ट्रैक्ट्स के साथ पिनाका की गोला-बारूद क्षमता बढ़ाई, जिसमें एरिया डिनायल म्यूनिशन (ADM) और हाई-एक्सप्लोसिव प्री-फ्रैगमेंटेड (HEPF) रॉकेट्स शामिल हैं। भारत का लक्ष्य भारतीय सेनाओं में 2030 तक 22 पिनाका रेजिमेंट्स तैनात करना है।

HIMARS vs Pinaka: Pakistan is lobbying for US-made High Mobility Artillery Rocket System
Pinaka and HIMARS Showcase Firepower Together at Yudh Abhyas 2024

2024 में पिनाका औऱ HIMARS दिखे थे साथ-साथ

पिछले साल 2024 में पहली बार भारतीय सेना का पिनाका मल्टी बैरल रॉकेट सिस्टम और अमेरिकी सेना का HIMARS (हाई मोबिलिटी आर्टिलरी रॉकेट सिस्टम) एक ही फायरिंग रेंज पर एकसाथ गरजे थे। युद्ध अभ्यास 2024 में पहली बार भारत-अमेरिका ने लॉन्ग रेंज फायरपावर की ताकत दिखाई थी। सूत्रों ने बताया कि युद्ध अभ्यास 2024 के दौरान अमेरिका ने भारत को HIMARS सिस्टम बेचने का भी ऑफर दिया था।

Dalai Lama Succession: दलाई लामा के उत्तराधिकारी पर फूंक-फूंक कर कदम रख रही भारत सरकार, चीन के साथ रिश्तों पर काले बादल मंडराने का डर!

Dalai Lama Succession: India Treads Cautiously Amid China Tensions

Dalai Lama Succession: बातचीत में केंद्र सरकार में एक वरिष्ठ सूत्र कहते हैं, दूध का जला छाछ को भी फूंक-फूंक कर पीता है। बड़ी मुश्किल से अभी-अभी गलवान के पांच साल बाद भारत-चीन के संबंधों में थोड़ी तरावट आई है। पिछले साल 23 अक्टूबर को रूस के कजान में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन (BRICS Summit) के दौरान हुई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात हुई थी। जो पांच साल बाद पहली औपचारिक द्विपक्षीय बैठक थी। उसके बाद अभी 26 जून को ही चीन के किंगदाओ में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की रक्षा मंत्रियों की बैठक में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने चीनी रक्षा मंत्री एडमिरल डोंग जून मिले थे। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल ने चीनी विदेश मंत्री वांग यी से 23 जून 2025 को SCO के सुरक्षा से संबंधित सम्मेलन के दौरान मुलाकात की थी। कैलाश मानसरोवर यात्रा अभी-अभी बहाल हुई है, लेकिन तिब्बत के सर्वोच्च धार्मिक नेता दलाई लामा के उत्तराधिकारी को लेकर दिए बयान के बाद सरकार में कन्फ्यूजन की स्थिति है। वह कहते हैं कि समझ नहीं आ रहा कि इस मुद्दे पर क्या प्रतिक्रिया दें।

Explainer Dalai Lama Reincarnation: क्या फिर जन्म लेंगे दलाई लामा? तिब्बती सर्वोच्च गुरु के एलान के क्या हैं मायने? क्या उनका पुनर्जन्म बनेगा भारत-चीन टकराव की वजह?

तिब्बती बौद्ध धर्म के सर्वोच्च आध्यात्मिक नेता 14वें दलाई लामा ने हाल ही में अपने उत्तराधिकारी की खोज और चयन को लेकर अहम एलान किया है। उन्होंने साफ कर दिया है कि उनके उत्तराधिकारी का चयन पूरी तरह से उनकी मर्जी और गदेन फोडरंग ट्रस्ट के दिशा-निर्देशों के आधार पर होगा, जिसमें चीन की कोई भूमिका नहीं होगी। इस घोषणा के बाद भारत सरकार इस संवेदनशील मुद्दे पर बेहद सतर्कता के साथ कदम रख रही है, क्योंकि उसे डर है कि इस मसले के चलते दोनों देशों के बीच सुधरते रिश्तों पर फिर से काली छाया मंडरा सकती है।

Dalai Lama Succession: चीनी राजदूत शू फेइहोंग ने कही ये बात

दलाई लामा ने 2 जुलाई को धर्मशाला में दिए अपने वीडियो संदेश में स्पष्ट किया कि उनके उत्तराधिकारी की खोज उनकी मृत्यु के बाद शुरू होगी और यह प्रक्रिया पूरी तरह से तिब्बती बौद्ध परंपराओं के अनुसार होगी। उन्होंने यह भी कहा कि गदेन फोडरंग ट्रस्ट, जो एक गैर-लाभकारी संगठन है, इस प्रक्रिया को संभालेगा। दलाई लामा का यह बयान चीन के लिए एक बड़ा झटका है, जो लंबे समय से तिब्बत और वहां की धार्मिक परंपराओं पर अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।

चीन ने भी तुरंत इस घोषणा पर प्रतिक्रिया दी। भारत में चीन के राजदूत शू फेइहोंग ने कहा, दलाई लामा और अन्य प्रमुख लामाओं के पुनर्जन्म की प्रक्रिया को “कड़े धार्मिक अनुष्ठानों, ऐतिहासिक परंपराओं और चीनी कानूनों” के अनुसार पूरा करना होगा। उन्होंने यह भी दावा किया कि वर्तमान दलाई लामा का चयन भी 1792 में शुरू हुई स्वर्ण कलश (Golden Urn) प्रणाली के तहत हुआ था, और भविष्य में भी यही प्रक्रिया अपनाई जाएगी। चीन का कहना है कि इस प्रक्रिया में बीजिंग की मंजूरी जरूरी है।

इस मसले पर “वेट एंड वॉच” की नीति

भारत के लिए यह मुद्दा बेहद संवेदनशील है। भारत में तिब्बती शरणार्थियों की संख्या 66,000 से 85,000 के बीच है, जिनमें से अधिकांश धर्मशाला-मैकलॉडगंज में रहते हैं, जहां 14वें दलाई लामा रह रहे हैं। एक तरफ, भारत दलाई लामा को एक आध्यात्मिक नेता के रूप में सम्मान देता है और 1959 से धर्मशाला में तिब्बती सरकार-निर्वासन (Central Tibetan Administration) को शरण दे रहा है। दूसरी तरफ, भारत नहीं चाहता कि इस मुद्दे के कारण चीन के साथ उसके रिश्ते और खराब हों। पिछले नौ महीनों में भारत-चीन संबंधों में कुछ सुधार के संकेत दिखे हैं, खासकर गलवान घाटी में 2020 के टकराव के बाद। ऐसे में भारत इस मसले पर “वेट एंड वॉच” की नीति अपना रहा है।

हालांकि केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरन रिजिजू ने कहा, “दलाई लामा का स्थान केवल तिब्बतियों के लिए ही नहीं, बल्कि दुनियाभर में फैले उनके करोड़ों अनुयायियों के लिए अत्यंत सम्मान और आस्था का प्रतीक है। उनके उत्तराधिकारी को लेकर निर्णय लेने का पूरा अधिकार केवल और केवल दलाई लामा के पास है। इसमें किसी भी अन्य देश या सरकार का हस्तक्षेप स्वीकार नहीं किया जा सकता।”

वहीं, अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने कहा, “14वें दलाई लामा द्वारा उनकी संस्था के जारी रहने की पुष्टि से मुझे अत्यंत हर्ष और आध्यात्मिक संतोष मिला है। इस फैसले से हिमालयी क्षेत्र में रहने वाले लाखों लोगों और पूरी दुनिया में फैले उनके अनुयायियों को गहरी खुशी और आध्यात्मिक संबल मिला है। यह घोषणा हमारी आस्था को और भी दृढ़ करती है। यह लोगों की प्रतिबद्धता, सामूहिक ज्ञान और शांति के प्रति विश्वास को और सशक्त बनाती है।”

सूत्रों के अनुसार, भारत सरकार अभी इस मुद्दे पर खुल कर बोलने से से बच रही है। बुधवार 2 जुलाई को दलाई लामा के एलान के बाद और चीन का बयान आने के बाद भी सरकार ने इस मुद्दे पर चुप्पी साधे रखी। सूत्रों ने बताया कि भारत का यह मानना है कि यह एक धार्मिक मामला है, और इसमें किसी भी देश, खासकर चीन, का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। भारत ने पहले भी दलाई लामा को धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों की स्वतंत्रता दी है, लेकिन उन्हें भारत में कोई राजनीतिक गतिविधि करने की इजाजत नहीं है। सूत्रों ने बताया कि तिब्बत मसले से जुड़े भारत सरकार के अधिकांश अधिकारी चीन से संबंध बनाए रखने के पक्ष में हैं। वे नहीं चाहते कि नए-नए सुधरे रिश्तों में फिर से कोई आंच आए। हालांकि सरकार में अंदरखाने इस मुद्दे को लेकर चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है।

तिब्बत का “चीनीकरण” में जुटा चीन

तक्षसिला के इंडो-पैसिफिक अध्ययन कार्यक्रम से जुड़ी अनुष्का सक्सेना कहती हैं, चीन ने पिछले कुछ दशकों में तिब्बत को पूरी तरह से अपने नियंत्रण में लेने की कोशिश की है। उसने तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र का नाम बदलकर “शीजांग” (Xizang) कर दिया और वहां की धार्मिक प्रतिष्ठानों पर कड़ा नियंत्रण बना लिया है। बीजिंग ने यह सुनिश्चित करना चाहता है कि सभी जीवित लामाओं का चयन और उनकी गतिविधियां चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के नियमों के अनुसार हों। वह कहती हैं, 2016 में, चीन ने एक ऑनलाइन प्रणाली शुरू की थी, जिसके जरिए पुनर्जन्म का दावा करने वाले लामाओं की पहचान की जाती है। इस पूरे ढांचे का मकसद यह है कि तिब्बती धार्मिक संस्थाओं को भी चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के अधीन कर दिया जाए।

अनुष्का कहती हैं, चीन का दावा है कि दलाई लामा का उत्तराधिकारी वही होगा, जिसे वह स्वर्ण कलश प्रणाली के जरिए चुनेगा और जिसे बीजिंग की मंजूरी मिलेगी। लेकिन दलाई लामा ने साफ कर दिया है कि उनका उत्तराधिकारी स्वतंत्र दुनिया में पैदा होगा, न कि चीन में। उनकी किताब वॉयस फॉर द वॉयसलेस में भी उन्होंने इस बात पर जोर दिया है कि तिब्बती बौद्ध धर्म की वैधता केवल उनकी परंपराओं और अनुयायियों की आस्था पर आधारित होगी, न कि किसी सरकार के हस्तक्षेप पर। वह कहती हैं कि चीन की भी दलाई लामा की संस्था को भंग करने के रास्ते पर जाने की संभावना नहीं है।

भारत के सामने है दोहरी चुनौती

अनुष्का आगे कहती हैं, भारत के सामने इस मसले पर एक नैतिक और रणनीतिक दुविधा है। नैतिक रूप से, भारत को तिब्बती समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता का समर्थन करना चाहिए और दलाई लामा की पसंद को मान्यता देनी चाहिए। लेकिन रणनीतिक दृष्टिकोण से, यह कदम भारत-चीन संबंधों को नुकसान पहुंचा सकता है। वह कहती हैं कि नई दिल्ली के लिए सबसे आसान तरीका यह है कि वह इस मुद्दे से दूर रहे और यह तर्क दे कि यह एक धार्मिक मुद्दा है, न कि राजनीतिक।

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर भारत ने चीन द्वारा चुने गए उत्तराधिकारी को मान्यता देने से इनकार किया, तो बीजिंग इसे अपने आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप के रूप में देख सकता है। इससे दोनों देशों के बीच तनाव फिर से बढ़ सकता है, जैसा कि 2017 में दलाई लामा की अरुणाचल प्रदेश यात्रा के कुछ महीनों बाद 73 दिन तक चले डोकलाम सैन्य टकराव के दौरान देखा गया था।

दूसरी ओर, अगर भारत चीन के चुने हुए उत्तराधिकारी को मान्यता देता है, तो इस कदम से तिब्बती समुदाय और भारत के अपने लोगों के बीच असंतोष पैदा हो सकता है, जो दलाई लामा को बहुत सम्मान देते हैं। इसके अलावा, भारत का यह कदम तिब्बती शरणार्थियों के अधिकारों और उनकी धार्मिक स्वतंत्रता के सवाल को कमजोर कर सकता है।

सूत्र कहते हैं कि यह किसी से नहीं छुपा है कि भारत ने दलाई लामा को सभाएं आयोजित करने की स्वतंत्रता दी है। विदेशी अनुयायी उनसे मिलने धर्मशाला आते हैं। यहां तक कि पिछले साल पूर्व अमेरिकी सदन की स्पीकर नैंसी पेलोसी भी कुछ सांसदों के साथ दलाई लामा से मिली थीं। उनसे मिलने को लेकर भारत ने किसी को नहीं रोका है। वह कहते हैं कि यह तर्क कि भारत ने 2003 में तिब्बत पर चीनी संप्रभुता को स्वीकार किया था, यहां लागू नहीं होता है, और उत्तराधिकार के प्रश्न को क्षेत्रीय स्वायत्तता से अलग रखा जाना चाहिए।

चीन के इस सेंटर ने दी थी चेतावनी

चीन की तिब्बत नीति को आकार देने वाले बीजिंग स्थित चाइना तिब्बतोलॉजी रिसर्च सेंटर ने 2019 में चेतावनी दी थी कि अगर भारत “पारंपरिक” प्रक्रिया के माध्यम से दलाई लामा की नियुक्ति की अवहेलना करता है, तो द्विपक्षीय संबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। उस दौरान बारत सरकार ने कहा था कि कोई भी बुद्धिमान नेता या मित्र देश ऐसा नहीं करेगा, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि भारत इस मामले से दूर रह सकता है या सार्वजनिक तौर से चीनी चयन का समर्थन नहीं कर सकता है।

चीन इस मुद्दे को अपनी संप्रभुता (sovereignty) से जोड़कर देख रहा है। उसका मानना है कि दलाई लामा का उत्तराधिकारी चुनना उसका आंतरिक मामला है। बीजिंग ने पहले ही संकेत दे दिए हैं कि वह तिब्बत में किसी भी तरह के विरोध को बर्दाश्त नहीं करेगा। तिब्बत में पहले भी हिंसक विरोध प्रदर्शन हो चुके हैं, और चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के वेस्टर्न थिएटर कमांड की मजबूत मौजूदगी के चलते वह किसी भी स्थिति को नियंत्रित करने में सक्षम है।

चीन ने यह भी स्पष्ट किया है कि वह दलाई लामा की संस्था को खत्म करने की कोशिश नहीं करेगा, बल्कि वह अपने चुने हुए उत्तराधिकारी को वैधता देने की कोशिश करेगा। अगर दोहरे उत्तराधिकार की स्थिति बनती है, यानी एक दलाई लामा भारत और तिब्बती समुदाय द्वारा चुना जाए और दूसरा चीन द्वारा, तो यह स्थिति और जटिल हो सकती है।

Dalai Lama Succession: India Treads Cautiously Amid China Tensions
Panchen Lama visits Jokhang Temple in Lhasa

तिब्बत में पंचेन लामा, कर सकते हैं बड़ा एलान

हालांकि चीन इस ऐलान पर पहले ही नजर रख रहा है। इसी साल 6 जून 2025 को बीजिंग में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और पंचेन लामा (ग्यालत्सेन नोरबू) की मुलाकात हुई थी। यह मुलाकात दलाई लामा के 90वें जन्मदिन (6 जुलाई 2025) से ठीक एक महीने पहले हुई, जिसे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। मुलाकात के दौरान पंचेन लामा ने सत्तारूढ़ चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CPC) के प्रति अपनी निष्ठा दोहराई। चीन ने 1995 में 11वें पंचेन लामा के रूप में नियुक्त किया था। शी जिनपिंग ने पंचेन लामा से तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र में जातीय एकता, धार्मिक सौहार्द, स्थिरता, विकास और प्रगति को बढ़ावा देने के लिए सक्रिय भूमिका निभाने का आग्रह किया। शी जिनपिंग ने पंचेन लामा से तिब्बती बौद्ध धर्म के “चीनीकरण” को बढ़ावा देने के लिए निरंतर प्रयास करने को कहा। यह चीन की उस नीति का हिस्सा है, जो 2012 से सभी धर्मों (बौद्ध धर्म और इस्लाम सहित) को चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के मार्गदर्शन में लाने की कोशिश कर रही है।

Dalai Lama Succession: India Treads Cautiously Amid China Tensions
Panchen Lama visits Jokhang Temple in Lhasa

ग्यालत्सेन नोरबू को चीन ने 1995 में 5 साल की उम्र में पंचेन लामा नियुक्त किया था, जबकि दलाई लामा द्वारा चुने गए पंचेन लामा गेधुन चोएक्यी न्यिमा को उसी समय चीन ने गायब कर दिया था। गेधुन अभी तक लापता हैं, और उन्हें दुनिया का सबसे कम उम्र का राजनीतिक बंदी माना जाता है। पंचेन लामा तिब्बती बौद्ध धर्म की गेलुग परंपरा में दलाई लामा के बाद दूसरा सबसे महत्वपूर्ण आध्यात्मिक नेता हैं। पंचेन लामा को बुद्ध के ज्ञान (प्रज्ञा) के अवतार अमिताभ बुद्ध का रूप माना जाता है, जबकि दलाई लामा को करुणा के अवतार अवलोकितेश्वर का रूप माना जाता है।

वहीं खास बात यह रही कि दलाई लामा के इस एलान के दौरान पंचेन लामा ने 1 जुलाई 2025 को पंचेन लामा ग्यालत्सेन नोरबू (एरदनी चोस-क्यी ग्याल-पो) ने दक्षिण-पश्चिम चीन के तिब्बती स्वायत्त क्षेत्र (Xizang Autonomous Region) की राजधानी ल्हासा स्थित जोखांग टेंपल का दौरा किया। यह मंदिर तिब्बती बौद्ध धर्म का सबसे पवित्र स्थल माना जाता है और लाखों बौद्ध श्रद्धालु इसे तीर्थ के रूप में देखते हैं। वहीं पंचेन लामा की इस यात्रा के चीन की तरफ से आधिकारिक फोटो भी जारी किए। सूत्रों ने बताया कि चीन जल्द ही पंचेन लामा के जरिए दलाई लामा के पुनर्जन्म को लेकर कोई आधिकारिक बयान जारी करवा सकता है। चीन यह दिखाना चाहता है कि वह तिब्बती बौद्ध धर्म की परंपराओं को “संविधान और कानून” के दायरे में रखते हुए आगे बढ़ा रहा है।

तिब्बती समुदाय को भारत से है उम्मीद

धर्मशाला में रहने वाले तिब्बती समुदाय और दुनिया भर में फैले तिब्बती बौद्ध अनुयायी इस मुद्दे को लेकर बहुत उम्मीदों के साथ भारत की ओर देख रहे हैं। 6 जुलाई को दलाई लामा के 90वें जन्मदिन के मौके पर धर्मशाला में एक बड़ा आयोजन होने वाला है, जिसमें धार्मिक अनुयायी, कलाकार, और विभिन्न धर्मों के प्रतिनिधि शामिल होंगे। इस आयोजन को दुनिया भर के तिब्बती बौद्ध अनुयायी भी उत्साह के साथ देखेंगे।

तिब्बती समुदाय का मानना है कि भारत को उनकी धार्मिक स्वतंत्रता और परंपराओं का समर्थन करना चाहिए। कई तिब्बती नेताओं ने भारत सरकार से अपील की है कि वह दलाई लामा के ट्रस्ट द्वारा चुने गए उत्तराधिकारी को मान्यता दे और चीन के किसी भी हस्तक्षेप को खारिज करे।

अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भी है नजर

इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भी नजर है। अमेरिका ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि वह दलाई लामा के उत्तराधिकारी के चयन को एक धार्मिक मामला मानता है, जिसमें किसी भी सरकार की भूमिका नहीं होनी चाहिए। 2019 में, अमेरिका ने इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र में उठाने की धमकी दी थी, और उसने तिब्बती स्वायत्तता और धार्मिक स्वतंत्रता का समर्थन करने की बात कही थी।

Dalai Lama Successor: दलाई लामा को तिब्बत में स्थायी रूप से रखने को तैयार है चीन! किसी भी लिंग या राष्ट्रीयता का हो सकता है उत्तराधिकारी

हालांकि, भारत ने इस मुद्दे पर अमेरिका की तरह खुलकर कोई रुख नहीं अपनाया है। भारत की नीति हमेशा से संतुलित रही है, और वह इस बार भी सावधानी के साथ आगे बढ़ना चाहता है। भारत का मानना है कि यह मामला धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़ा है, लेकिन वह इसे राजनीतिक रंग देने से बचना चाहता है।

Dalai Lama Successor: दलाई लामा को तिब्बत में स्थायी रूप से रखने को तैयार है चीन! किसी भी लिंग या राष्ट्रीयता का हो सकता है उत्तराधिकारी

Dalai Lama Successor: China Insists Control, Heir Can Be Any Gender or Nationality
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Dalai Lama Successor: तिब्बत के सर्वोच्च आध्यात्मिक नेता दलाई लामा के 90वें जन्मदिन के अवसर पर ऐलान किया कि उनके उत्तराधिकारी का फैसला गदेन फोडरांग ट्रस्ट ही लेगा, यानि अगले अवतार की खोजबीन का अधिकार इस ट्रस्ट के पास ही होगा। बुधवार को 15वें तिब्बती धार्मिक सम्मेलन में गदेन फोडरांग ट्रस्ट के वरिष्ठ अधिकारी सैमधोंग रिनपोछे ने कहा कि उनका उत्तराधिकारी किसी भी लिंग या राष्ट्रीयता का हो सकता है। वहीं, सेंट्रल तिब्बती प्रशासन (CTA) के सिक्योंग (निर्वाचित नेता) पेनपा त्सेरिंग ने कहा कि दलाई लामा तिब्बत की यात्रा करने के लिए तैयार हैं, बशर्ते उनकी स्वास्थ्य स्थिति अनुमति दे और चीन की ओर से कोई प्रतिबंध न हो।

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Dalai Lama Successor: क्या कहा सैमधोंग रिनपोछे ने?

धर्मशाला में आयोजित 15वें तिब्बती धार्मिक सम्मेलन में दलाई लामा के 24 सितंबर 2011 में बनाए गदेन फोडरांग ट्रस्ट के वरिष्ठ अधिकारी सैमधोंग रिनपोछे ने कहा, 14वें दलाई लामा का स्वास्थ्य अच्छा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि दलाई लामा ने अभी तक अपने उत्तराधिकारी (succession) के बारे में कोई लिखित निर्देश नहीं दिए हैं। उन्होंने साफ कहा कि दलाई लामा का पुनर्जन्म तय करने का अधिकार केवल गदेन फोडरंग ट्रस्ट के पास है।

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ट्रस्ट के वरिष्ठ अधिकारी और पूर्व कालोन त्रिपा (प्रधानमंत्री) रह चुके सैमधोंग रिनपोछे ने आगे कहा कि अगला दलाई लामा किसी भी लिंग या राष्ट्रीयता का हो सकता है, और उसका जन्म तिब्बत या चीन में होना अनिवार्य नहीं है। रिनपोछे ने चीन के उस दावे की निंदा की, जिसमें वह दलाई लामा के उत्तराधिकारी को चुनने का अधिकार रखता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह फैसला केवल तिब्बती बौद्ध परंपराओं के अनुसार ही लिया जाएगा और इसमें बाहरी हस्तक्षेप (विशेष रूप से चीन का) स्वीकार्य नहीं होगा।

रिनपोछे ने यह भी बताया कि दलाई लामा ने हमेशा ऐसी व्यवस्था पर काम किया है, जो उनके बाद भी तिब्बती समुदाय को एकजुट और आत्मनिर्भर बनाए रखे। उन्होंने कहा, “दलाई लामा का मानना है कि उनकी व्यक्तिगत भूमिका समय के साथ कम महत्वपूर्ण होनी चाहिए, ताकि तिब्बती लोग अपनी संस्कृति और धर्म को खुद संभाल सकें।”

दलाई लामा ने दिया वीडियो संदेश

सम्मेलन के दौरान आध्यात्मिक नेता दलाई लामा ने एक वीडियो संदेश में स्पष्ट किया कि उनकी संस्था, यानी दलाई लामा की परंपरा, भविष्य में भी जारी रहेगी। उन्होंने कहा, “मैं यह पुष्टि करता हूं कि दलाई लामा की संस्था बनी रहेगी।” यह बयान सुनते ही धर्मशाला की लाइब्रेरी में मौजूद सौ से अधिक भिक्षुओं ने तालियां बजाकर अपना उत्साह व्यक्त किया। इस सम्मेलन में दुनिया भर के पत्रकार, तिब्बती समुदाय के लोग, समर्थक, हॉलीवुड अभिनेता रिचर्ड गेरे भी मौजूद थे। दलाई लामा ने यह भी जोर देकर कहा कि उनके पुनर्जनन की प्रक्रिया का एकमात्र अधिकार गदेन फोडरांग ट्रस्ट के पास है, जो तिब्बती बौद्ध परंपराओं के अनुसार काम करता है। उन्होंने साफ कहा, “इस प्रक्रिया में कोई बाहरी हस्तक्षेप स्वीकार नहीं होगा।”

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चीन जाने के लिए तैयार हैं दलाई लामा

वहीं, सेंट्रल तिब्बती प्रशासन (Central Tibetan Administration, CTA) के सिक्योंग (निर्वाचित नेता) पेनपा त्सेरिंग ने दलाई लामा की तिब्बत यात्रा और पुनर्जन्म के मुद्दे पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि दलाई लामा तिब्बत की यात्रा करने के लिए तैयार हैं, बशर्ते उनकी सेहत इजाजत दे और चीन की ओर से कोई पाबंदी या शर्त न हो। यह यात्रा 1959 के बाद उनकी पहली तिब्बत यात्रा होगी।

हालांकि, पेनपा त्सेरिंग ने यह भी बताया कि चीन ने एक सख्त शर्त रखी है, यदि दलाई लामा तिब्बत जाते हैं, तो उन्हें वहां स्थायी तौर पर रहना होगा। वहीं, इस शर्त पर दलाई लामा का जवाब था, “अगर मुझे तिब्बत और चीन जाने का मौका मिलता है, तो मैं जरूर जाऊंगा, लेकिन मैं वहां स्थायी तौर पर नहीं रहूंगा, क्योंकि वहां स्वतंत्रता नहीं है।” लेकिन मैं वहां नहीं रहूंगा, क्योंकि वहां कोई स्वतंत्रता नहीं है।’ त्सेरिंग ने कहा, यह पुनर्जन्म से भी जुड़ा है जहां परम पावन कहते हैं ‘मैं एक स्वतंत्र दुनिया में जन्म लूंगा’। पेनपा त्सेरिंग ने इस बयान को दोहराते हुए कहा कि दलाई लामा का यह रुख तिब्बत के लोगों के हक में है और उनकी वापसी का मकसद केवल तीर्थयात्रा या सांस्कृतिक संरक्षण होना चाहिए, न कि चीन की शर्तों पर बंधना।

पेनपा त्सेरिंग ने चीन के पुनर्जन्म दावों का भी विरोध किया। उन्होंने कहा, “तिब्बती लोग कभी भी चीन के उस दावे को स्वीकार नहीं करेंगे, जिसमें वह दलाई लामा के उत्तराधिकारी को चुनने की बात करता है। यह प्रक्रिया पूरी तरह तिब्बती बौद्ध परंपराओं पर आधारित होगी।” उन्होंने सम्मेलन में मौजूद लोगों से अपील की कि वे एकजुट रहें और दलाई लामा की इच्छाओं को पूरा करने के लिए मिलकर काम करें।

पेनपा त्सेरिंग ने 6 जुलाई 2025 से शुरू होने वाले दलाई लामा की 90वें जन्मदिन के उत्सव को “करुणा का वर्ष” (Year of Compassion) के रूप में मनाने की बात कही।

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पहले भी जता चुके हैं तिब्बत वापसी की इच्छा

हालांकि यह पहली बार नहीं है जब दलाई लामा ने तिब्बत जाने की इच्छा जताई है। दलाई लामा ने कहा है कि वे ल्हासा के जोखांग मंदिर और पोटाला पैलेस जैसे पवित्र जगहों की तीर्थयात्रा करना चाहते हैं। 2014 में एक साक्षात्कार में, उन्होंने कहा था कि वह बिना किसी राजनीतिक मकसद के एक साधारण तीर्थयात्री के रूप में तिब्बत जाना चाहते हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वह तब तक नहीं लौटेंगे, जब तक वहां “वास्तविक स्वतंत्रता” नहीं होती। वह यह मानते हैं कि उनकी वापसी केवल तब होनी चाहिए जब तिब्बती लोगों को आत्म-सम्मान और सांस्कृतिक आजादी मिले।

1980 के दशक से, दलाई लामा ने पूर्ण स्वतंत्रता की मांग छोड़कर “मध्य मार्ग दृष्टिकोण” अपनाया, जिसमें तिब्बत के लिए वास्तविक स्वायत्तता की मांग की गई। 1987 की पांच सूत्री शांति योजना और 1988 के स्ट्रासबर्ग प्रस्ताव में, उन्होंने तिब्बत में स्वायत्त सरकार की स्थापना का प्रस्ताव रखा, जिसमें उनकी वापसी की संभावना शामिल थी।

1959 के बाद, दलाई लामा और चीन के बीच कई बार बातचीत हुई, लेकिन कोई ठोस नतीजा नहीं निकला। 1979 में डेंग शियाओपिंग के सुधारों के बाद, दलाई लामा के भाई ग्यालो थोंडुप के जरिए संपर्क हुआ। 1982, 1984, और 2002-2008 के बीच कई दौर की बातचीत हुई, लेकिन चीन ने दलाई लामा को “अलगाववादी” मानकर उनकी शर्तें ठुकरा दीं। 2002 में, दलाई लामा ने एक संक्षिप्त तीर्थयात्रा के लिए तिब्बत जाने की इच्छा जताई, लेकिन यह प्रस्ताव भी अस्वीकार हुआ। 2008 में तिब्बत में बड़े विरोध प्रदर्शनों के बाद, बातचीत फिर शुरू हुई, लेकिन बेनतीजा रही। चीन ने शर्त रखी कि दलाई लामा तिब्बत को चीन का हिस्सा मानें और “अलगाववादी गतिविधियां” छोड़ें।

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Chinese foreign ministry spokesperson Mao Ning

चीन ने दोहराया पुराना दावा

2 जुलाई 2025 दलाई लामा के उत्तराधिकार को लेकर दिए बयान के बाद चीन ने को फिर से दोहराया कि दलाई लामा के उत्तराधिकारी को चुनने का अधिकार उसके पास है। चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने कहा, “दलाई लामा और पंचेन लामा जैसे प्रमुख बौद्ध गुरुओं के पुनर्जन्म को ‘गोल्डन अर्न’ यानी सुनहरे कलश रस्म के जरिए और केंद्रीय सरकार की मंजूरी से चुना जाना चाहिए।” यह रस्म 1793 में किंग राजवंश के दौरान शुरू हुई थी, और चीन इसे अपनी सत्ता का आधार मानता है। जिसमें संभावित नामों को एक सुनहरे पात्र में रखा जाता है और लॉटरी के माध्यम से उत्तराधिकारी तय किया जाता है। निंग ने कहा कि चीन धार्मिक विश्वास की स्वतंत्रता की नीति का पालन करता है।

ऐसे होता है पुनर्जन्म

तिब्बती परंपरा में माना जाता है कि एक वरिष्ठ बौद्ध भिक्षु की आत्मा उसकी मृत्यु के बाद एक बच्चे के शरीर में पुनर्जन्म लेती है। दलाई लामा की वेबसाइट के अनुसार, 6 जुलाई, 1935 को वर्तमान किंघई प्रांत में एक किसान परिवार में जन्मे ल्हामो धोंडुप के रूप में 14वें दलाई लामा के पुनर्जन्म की पहचान भी दो साल बच्चे में की गई थी। दलाई लामा की वेबसाइट के अनुसार, एक वरिष्ठ भिक्षु की देखरेख में कई संकेतों के आधार पर एक खोज दल ने उनकी पहचान की थी। उन्हें अब दुनिया के सबसे प्रभावशाली धार्मिक व्यक्तियों में से एक माना जाता है। उन्हें 1989 में नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।