LUH RFI: रक्षा मंत्रालय ने भारतीय सेनाओं के नए टोही और निगरानी हेलिकॉप्टरों (रिकॉनिसेंस एंड सर्विलांस हेलिकॉप्टर – RSH) की खरीद प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसके लिए मौजूदा चेतक और चीता हेलिकॉप्टर बेड़े को बदलने की योजना के तहत रक्षा मंत्रालय ने रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन जारी की है। इसके तहत कुल लगभग 200 हेलिकॉप्टर खरीदे जाएंगे, जिनमें 120 भारतीय सेना और 80 भारतीय वायुसेना के लिए होंगे।
इन हेलिकॉप्टरों का इस्तेमाल दिन और रात में विभिन्न मिशनों के लिए किया जाएगा। इनका इस्तेमाल टोही और निगरानी, छोटे दस्ते या क्विक रिएक्शन टीम की तैनाती, ग्राउंड ऑपरेशंस में आंतरिक और बाहरी लोड ले जाना, अटैक हेलिकॉप्टर के साथ स्काउट मिशन, खोज और बचाव अभियान और सिविल एडमिनिस्ट्रशन को इमरजेंसी सपोर्ट जैसे कामों में किया जाएगा। आरएफआई में स्पष्ट किया गया है कि ये हेलीकॉप्टर ढलान वाले हेलीपैड, बर्फ, रेत और पानी से ढके क्षेत्रों में उतरने और उड़ान भरने में सक्षम होना चाहिए। इसके अलावा, इनमें आकाशीय बिजली से सुरक्षा, गोला-बारूद से बचाव और लंबे समय तक खुले में खड़े रहने की क्षमता होनी चाहिए।
LUH Vs H125M Helicopter: क्या भारतीय सेना की पसंद बनेगा HAL का लाइट यूटिलिटी हेलीकॉप्टर, या फ्रांस का H125M मार ले जाएगा बाजी? क्या होगा मेक इन इंडिया का? https://t.co/pbm8h4pCxy
LUH vs H125M Helicopter: Indian Army Choice – HAL or Airbus?#LUH#H125MHelicopter#LUHvsH125M…
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LUH RFI: नाइट विजन गॉगल से हों लैस
वहीं, ये नए हेलिकॉप्टर सिंगल या ट्विन इंजन डिजाइन के हो सकते हैं और इनमें अधिकतम पेलोड क्षमता, ऊंचाई पर उड़ान और विभिन्न मौसम परिस्थितियों में काम करने की क्षमता होनी चाहिए। फ्यूल सिस्टम की बात करें, तो इनमें हॉट रिफ्यूलिंग और प्रेशर रिफ्यूलिंग की सुविधा, साथ ही प्रोजेक्टाइल से सुरक्षा अनिवार्य होगी। कॉकपिट नाइट विजन गॉगल (NVG) से लैस होना चाहिए और इसमें ऑटो-पायलट, आधुनिक एवियोनिक्स और एडवांस कम्यूनिकेशन सिस्टम होना चाहिए।
LUH RFI: इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर के खतरों से सुरक्षा
साथ ही, नए हेलिकॉप्टर ऐसे होने चाहिए जो हथियारों और मिशन सिस्टम के साथ इंटीग्रेट किए जा सकें। इनमें रॉकेट, गन पॉड, एंटी-टैंक मिसाइल, एयर-टू-एयर मिसाइल और पिंटल माउंटेड गन लगाए जा सकें। इनके साथ सर्विलांस सिस्टम, लॉइटर म्यूनिशन और डायरेक्टेड एनर्जी वेपन जैसे एडवांस इक्विपमेंट भी जोड़े जा सकें। आरएफआई में कहा गया है कि प्लेटफॉर्म में सेल्फ-प्रोटेक्शन सूट जैसे लेजर वार्निंग रिसीवर (LWR), रडार वार्निंग रिसीवर (RWR) और मिसाइल अप्रोच वार्निंग सिस्टम (MAWS) लगाए जा सकें, ताकि इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर खतरों से भी सुरक्षा मिल सके।
Photo: HAL
‘मेक इन इंडिया’ और ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी को प्राथमिकता
सरकार ने इस खरीद प्रक्रिया में विदेशी निर्माताओं को भी मौका दिया है। सरकार ने आरएफआई में साफ किया है ‘मेक इन इंडिया’ और ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी (ToT) सबसे बड़ी प्राथमिकता होगी। मतलब, जो भी कंपनी ये हेलिकॉप्टर बनाएगी, उसे जरूरी तकनीक भारत को देनी होगी और यहां पर ही फैक्ट्री लगाकर उत्पादन करना होगा। ToT के तहत पावर प्लांट, रोटर सिस्टम, ट्रांसमिशन सिस्टम, एवियोनिक्स और बाकी जरूरी हिस्सों की तकनीक भारत लाई जाएगी, ताकि उनका निर्माण देश में हो सके। इसके साथ ही कंपनियों को यह भी बताना होगा कि हेलिकॉप्टर में कितनी स्वदेशी सामग्री इस्तेमाल होगी, वे किन कंपनियों के साथ साझेदारी करेंगी और उनकी उत्पादन क्षमता कितनी है।
ट्रायल इवैल्यूएशन ‘नो कॉस्ट, नो कमिटमेंट’ आधार पर
आरएफआई में बताया गया है कि ट्रेनिंग के लिहाज से सप्लायर्स को यह बताना होगा कि क्या हेलिकॉप्टर बिना किसी विशेष बदलाव के ट्रेनिंग मिशन के लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं। पायलट और तकनीकी कर्मचारियों के लिए ट्रेनिंग कार्यक्रम, सिम्युलेटर और वर्चुअल मेंटेनेंस ट्रेनर की उपलब्धता भी स्पष्ट करनी होगी। वहीं, यह खरीद प्रक्रिया ‘सिंगल स्टेज–टू बिड सिस्टम’ के तहत पूरी होगी, जिसमें टेक्निकल और फाइनेंशियल प्रपोजल अलग-अलग लिफाफों में जमा होंगे। तकनीकी मूल्यांकन के बाद हेलिकॉप्टरों का ट्रायल इवैल्यूएशन ‘नो कॉस्ट, नो कमिटमेंट’ आधार पर किया जाएगा। वहीं, कॉन्ट्रैक्ट के सप्लायर को लाइफ टााइम स्पेयर पार्ट्स और मैंटेनेंस इक्विपमेंट्स उपलब्ध कराने होंगे।
मार्च में, भारतीय वायुसेना पहले ही काफी संख्या में यूटिलिटी हेलिकॉप्टरों और अन्य डिफेंस प्लेटफॉर्म की खरीद की योजना बना चुकी थी। संसद में पेश स्थायी रक्षा समिति की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025-26 के लिए प्रमुख प्रस्तावित खरीद में लो-लेवल रडार, लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (LCA), लाइट यूटिलिटी हेलिकॉप्टर (LUH), मल्टी-रोल हेलिकॉप्टर और किराए पर लिए जाने वाले मिड-एयर रिफ्यूलिंग विमान शामिल हैं।
इसके अलावा, कैबिनेट सिक्योरिटी कमेटी ने हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड से 45,000 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य के 156 लाइट कॉम्बैट हेलिकॉप्टर (LCH) खरीदने को भी मंजूरी दी है। ये 156 हेलिकॉप्टर, जो क्षमता में RSH जैसे हैं, जो भारतीय सेना और भारतीय वायुसेना में बांटे जाएंगे। साथ ही, ये हेलीकॉप्टर चीन और पाकिस्तान सीमा पर मिशन में इस्तेमाल होंगे।
Bactrian Camels: लद्दाख के कठिन और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में रसद पहुंचाने और पेट्रोलिंग के लिए भारतीय सेना ने लद्दाख के नुब्रा इलाके के विश्व प्रसिद्ध दो कूबड़ वाले बैक्ट्रियन ऊंटों को औपचारिक रूप से अपने सिस्टम में शामिल किया है। लगभग एक दशक तक चले ट्रायल्स के बाद सेना ने यह फैसला किया है। वहीं, इन ऊंटों की खूबी है कि ये ऊंट लद्दाख की परिस्थितियों के लिए अनुकूल हैं और ऊंचाई वाले इलाकों में बिना किसी परेशानी के काम कर सकते हैं। वहीं सेना के इस फैसले के बाद सेना के लॉजिस्टिक नेटवर्क में बढ़ोतरी होगी और हाई-एल्टीट्यूड ऑपरेशंस की क्षमता बढ़ेगी।
साल 2016 में सेना ने को जरूरत महसूस हुई कि उन्हें एक ऐसा लॉजिस्टिक प्लेटफॉर्म चाहिए जो लद्दाख के ऊंचे और कठिन इलाकों में भारी सामान ढो सके, मौसम की चुनौतियों को झेल सके और सीमावर्ती चौकियों तक ‘लास्ट माइल’ डिलीवरी कर सके।
इसी के बाद डीआरडीओ की लद्दाख में लैब डिफेंस इंस्टीट्यूट ऑफ हाई एल्टीट्यूड रिसर्च (DIHAR) ने रिमाउंट एंड वेटरिनरी कॉर्प्स (RVC) के साथ मिलकर एक रिसर्च प्रोजेक्ट शुरू किया। इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य यह जाानना था कि क्या बैक्ट्रियन ऊंटों को ट्रेनिंग देकर ऊंचाई वाले इलाकों में सेना की ड्यूटी के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।
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Bactrian Camels: लद्दाख में रसद की चुनौतियां
लद्दाख की भौगोलिक और जलवायु परिस्थितियां बेहद चुनौतीपूर्ण हैं। कई बार यहां की ऊंची चोटियों, ठंडे मौसम और दुर्गम इलाकों में सेना को रसद पहुंचाने के लिए कई दिक्कतों को सामना करना पड़ता है। पिछले कुछ दशकों में लद्दाख में सड़कों का एक व्यापक जाल बिछाया गया है, लेकिन दूरदराज के चौकियों तक “लास्ट-माइल कनेक्टिविटी” अभी भी कुली पोर्टर्स और खच्चरों पर निर्भर है।
हाल के सालों में, सेना में ड्रोन और रोबो म्यूल्स का भी इस्तेमाल लॉजिस्टिक्स के लिए किया जा रहा है। लेकिन ऊंचाई वाले क्षेत्रों में कई बार विजिबिलिटी न होने से ड्रोन काम नहीं कर पाते। इसके अलावा, ड्रोन और रेडियो-कंट्रोल इक्विपमेंट्स दुश्मन के जवाबी हमलों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। इन समस्याओं को सुलझाने के लिए बैक्ट्रियन ऊंट अच्छा विकल्प हैं। सूत्रों ने बताया कि लद्दाख जैसे इलाकों में जहां सड़क नेटवर्क होने के बावजूद ‘लास्ट माइल’ चौकियों तक पहुंचना कठिन है, वहां बैक्ट्रियन ऊंट सेना के लिए एक साइलेंट वर्कहॉर्स बन सकते हैं।
Bactrian Camels की खूबियां
बैक्ट्रियन ऊंटों का वैज्ञानिक नाम कैमेलस बैक्ट्रियानस है। ये ऊंट मध्य एशिया का मूल निवासी है। ये ऊंट अपने दो कूबड़ों और छह फीट से कम ऊंचाई के लिए पहचाने जाते हैं। पुराने समय में ये ऊंट सिल्क रूट पर व्यापार के लिए महत्वपूर्ण साधन थे, जो मध्य एशिया को तिब्बत और भारत के लद्दाख से जोड़ता था। व्यापारिक मार्ग बंद होने के बाद कई ऊंटों को व्यापारियों ने लद्दाख के जंगलों में छोड़ दिया था। आज ये ऊंट विलुप्तप्राय प्रजाति (एंडेंजर्ड स्पीशीज) की सूची में हैं और लद्दाख में इनकी संख्या कुछ सौ तक सीमित है। वर्तमान में, ये मुख्य रूप से नुब्रा घाटी में पर्यटकों को सवारी (टूरिस्ट राइड्स) के लिए उपयोग किए जाते हैं।
बैक्ट्रियन ऊंटों की खासियत उनकी हाइपोक्सिया (कम ऑक्सीजन) और अत्यधिक ठंड में जीवित रहने की क्षमता है। ये ऊंट 150-200 किलोग्राम वजन को 14,000 फीट की ऊंचाई पर ऱबड़-खाबड़ रस्तों पर आसानी से ढो सकते हैं, जबकि म्यूल और पोनी केवल 60-80 किलोग्राम वजन ही ले जा सकते हैं। इतना ही नहीं, इन ऊंटों को कम भोजन और देखभाल की जरूरत होती है। वहीं, इनके साथ इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग का भी खतरा नहीं है।
सेना में शामिल होने की प्रक्रिया
डिफेंस इंस्टीट्यूट ऑफ हाई एल्टीट्यूड रिसर्च के अपने अनुसंधान के दौरान RVC के साथ मिल कर ऊंटों को कमांड एंड बिहेवियरल संबंधी ट्रेनिंग दी। उनका फिजिकल मेजरमेंट, एडॉप्टेशन फिजियोलॉजी और विभिन्न इलाकों व ऊंचाइयों पर भार ढोने की सहनशक्ति का अध्ययन किया गया। कुछ बैक्ट्रियन ऊंटों को सेना की यूनिट्स में भेजा गया, जहां उनका लोड कैरिंग ट्रायल हुआ, जिसमें अलग-अलग टेरेन पर वजन ढोने की क्षमता को जांचा गया। इसके अलावा उन्होंने पेट्रोलिंग, वजन ढोने और युद्ध के हालात जैसे टेस्ट (बैटल इनोकुलेशन टेस्ट्स) किए गए। इन परीक्षणों में यह देखा गया कि ये ऊंट बैटल कंडीशन ट्रेनिंग यानी गोलीबारी, धमाकों, धुएं और युद्ध जैसी की परिस्थितियों में कैसी प्रतिक्रिया करते हैं। वहीं, कुछ बैक्ट्रियन ऊंटों को ईस्टर्न लद्दाख में फॉरवर्ड लोकेशंस पर भी भेजा गया ताकि वास्तविक ऑपरेशनल कंडीशन्स में उनकी परफॉर्मेंस को परखा जा सके।
DIHAR के वैज्ञानिकों ने पाया कि ये ऊंट न केवल भारी वजन ढो सकते हैं, बल्कि युद्ध के माहौल में भी प्रशिक्षित होकर अच्छा प्रदर्शन करते हैं। इस सफलता के बाद, कुछ हफ्ते पहले DIHAR ने 14 प्रशिक्षित और तैनाती के लिए तैयार बैक्ट्रियन ऊंटों को सेना की 14 कोर यानी फायर एंड फ्यूरी को सौंपा। इसके साथ ही, ऊंटों की ट्रेनिंग और मैनेजमेंट के लिए स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसिजर्स और हेल्थ रिकॉर्ड भी सौंपे। सेना का कहना है कि कम भोजन और कम देखभाल के चलते ये ऊंट सेना के लिए कॉस्ट-इफेक्टिव साबित हो सकते हैं।
रेगिस्तानी ऊंटों से ज्यादा बेहतर
DIHAR ने बैक्ट्रियन ऊंटों की क्षमताओं को बेहतर समझने के लिए राजस्थान से तीन रेगिस्तानी ऊंटों (सिंगल-हंप्ड कैमल्स) को लेह लाया गया। रेगिस्तानी ऊंटों का इस्तेमाल सीमा सुरक्षा बल (BSF) राजस्थान और गुजरात में किया जाता है। दोनों की तुलना में पाया गया कि बैक्ट्रियन ऊंट लद्दाख की ठंडी और कम ऑक्सीजन वाली परिस्थितियों में रेगिस्तानी ऊंटों की तुलना में कहीं बेहतर प्रदर्शन करते हैं। उनकी दो कूबड़ों में संचित वसा (फैट) उन्हें लंबे समय तक एनर्जी देती है, जिससे वे लद्दाख के लिए अधिक उपयुक्त हैं।
ITBP की भी है तैयारी
सेना के अलावा, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) भी बैक्ट्रियन ऊंटों के इस्तेमाल का सोच रही है। लद्दाख में भारत-चीन सीमा पर तनाव और रणनीतिक महत्व को देखते हुए, ये ऊंट सेना और ITBP के लिए फायदेमंद हो सकते हैं। खास तौर पर उन इलाकों में जहां सड़कें नहीं पहुंचतीं या मौसम उपकरणों को प्रभावित करता है, वहां ये ऊंट महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
संरक्षण में मिलेगी मदद
लद्दाख में बैक्ट्रियन ऊंटों का इस्तेमाल फिलहाल अभी तक पर्यटन तक ही सीमित था। नुब्रा घाटी में पर्यटक इन ऊंटों पर सवारी का आनंद लेते हैं। वहीं, अगर सेना इनकाा इस्तेमाल करती है, तो इनके संरक्षण में भी मदद मिलेगी। करेगा, बल्कि इनकी उपयोगिता को एक नए स्तर पर ले जाएगा। यह कदम न केवल सैन्य रसद को मजबूत करेगा, बल्कि इस विलुप्तप्राय प्रजाति के प्रति जागरूकता भी बढ़ाएगा।
L-70 AD Guns: ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय सेना ने बड़ा सबक सीखते हुए अपने एयर डिफेंस को और मजबूत करने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। सेना ने अपनी पुरानी लेकिन कारगर L-70 एयर डिफेंस गन को लेटेस्ट ड्रोन जैमर तकनीक से जोड़ा है। इन DIWAR ऑल-बैंड ड्रोन जैमर को बेंगलुरु की कंपनी AvGarde Systems ने बनाया है, जिसे खासतौर पर दुश्मन के ड्रोन सिस्टम को नाकाम करने के लिए तैयार किया गया है।
L-70 गन मूल रूप से 1940 के दशक में स्वीडन द्वारा डिजाइन की गई एक 40 मिलीमीटर की एंटी-एयरक्राफ्ट गन है। यह गन भारतीय सेना के पास पिछले कई दशकों से है। सेना के पास लगभग ऐसी 1,000 गन हैं। भारतीय सेना ने समय के साथ इसे आधुनिक युद्ध की जरूरतों के मुताबिक अपग्रेड भी किया है। यह तोप शुरू में हवाई जहाजों और हेलिकॉप्टरों जैसे हवाई खतरों से निपटने के लिए बनाई गई थी। लेकिन समय के साथ युद्ध के तरीके भी बदले। अब दुश्मन छोटे ड्रोनों का इस्तेमाल करने लगे हैं, जो रडार से बच सकते हैं। इन ड्रोनों का आकार इतना छोटा होता है कि रडार इन्हें कई बार पक्षी समझ लेते हैं। ऐसे में L-70 तोप को और आधुनिक करने की जरूरत थी। भारतीय सेना ने इसे नई तकनीकों के साथ अपग्रेड किया है ताकि यह ड्रोनों जैसे नए खतरों से भी निपट सके।
— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) August 1, 2025
वहीं, अपग्रेड करने के बाद यह गन केवल जहाजों को ही नहीं, बल्कि ड्रोन, हेलिकॉप्टर और धीमी रफ्तार से उड़ने वाले दुश्मन विमानों को भी निशाना बना सकती है। इसे भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) और गन कैरिज फैक्ट्री, जबलपुर ने लेटेस्ट टेक्नोलॉजी से लैस किया है। यह गन हर मिनट में 240 से 330 गोले दाग सकती है और इसका असरदार रेंज 4 किलोमीटर तक है। इसकी ताकत यह है कि यह हवाई टारगेट्स को सीधे नष्ट कर सकती है, जिसे “हार्ड-किल” तकनीक कहा जाता है।
क्या है DIWAR ड्रोन जैमर?
DIWAR एक ऐसा इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम है जो दुश्मन के ड्रोन के सिग्नल को जैम कर देता है, जिससे उसका ऑपरेशन और नेविगेशन सिस्टम फेल हो जाता है। यह सिस्टम सॉफ्ट किल टेक्नोलॉजी पर काम करता है, जहां दुश्मन के ड्रोन को गिराने की बजाय उसकी कम्युनिकेशन लाइन को ही बंद कर दिया जाता है। यह जैमर 1 से 2 किलोमीटर तक प्रभावी है। यह ड्रोन जैमर 433 MHz, 900 MHz, 2.4 GHz, 5.8 GHz जैसे फ्रीक्वेंसी बैंड पर काम करता है, जो आमतौर पर ड्रोन के कम्युनिकेशन, वीडियो ट्रांसमिशन और नेविगेशन के लिए इस्तेमाल होते हैं। इसके अलावा यह GNSS यानी GPS, GLONASS, Galileo और BeiDou जैसी सेटेलाइट नेविगेशन सिस्टम को भी हैक या ब्लॉक कर सकता है। यह जैमर उन ड्रोनों को भी रोक सकता है जो तेजी से अपनी फ्रीक्वेंसी बदलते हैं, जिन्हें फ्रीक्वेंसी हॉपिंग स्प्रेड स्पेक्ट्रम (FHSS) ड्रोन कहते हैं। ये ड्रोन सामान्य जैमर से बच सकते हैं, लेकिन डीआईडब्ल्यूएआर की खास तकनीक इन्हें आसानी से पकड़ लेती है।
Photo: Indian Army
DIWAR जैमर से लैस हुई L-70
जब L-70 गन और DIWAR ड्रोन जैमर को एक साथ इस्तेमाल करते हैं, तो यह एक ऐसी सिस्टम बन जाता है जो दुश्मन के ड्रोन को पहले पता लगा सकता है, और उसके कम्युनिकेशन सिस्टम को जाम कर सकता है। वहीं अगर ड्रोन वो फिर भी उड़ता रहे तो L-70 गन उसे गोलीबारी से गिरा भी सकती है। कह सकते हैं कि यह गन अब हार्ड किल और सॉफ्ट किल दोनों सिस्टम से लैस हो गई है। जिसमें पहले इलेक्ट्रॉनिक जामिंग से ड्रोन को रोकने की कोशिश की जाती है और यदि वो असफल हो तो गोलीबारी से उसे गिरा दिया जाता है।
L-70 गनें छोटे और कम रडार सिग्नेचर वाले ड्रोनों को डिटेक्ट करने के लिए अपने रडार और इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सिस्टम का इस्तेमाल करती हैं। ये सिस्टम ड्रोनों को आसानी से ढूंढ लेते हैं। इसके बाद DIWAR जैमर ड्रोन के कंट्रोल और नेविगेशन सिग्नल को जाम कर देता है। इससे ड्रोन या तो रुक जाता है, वापस चला जाता है, या जमीन पर गिर जाता है। सूत्रों ने बताया कि मई 2025 में जम्मू में इस सिस्टम ने पाकिस्तान के ड्रोन हमलों को आसानी से नाकाम कर दिया था।
आजकल दुश्मन FHSS यानी फ्रिक्वेंसी हॉपिंग स्प्रेड स्पेक्ट्रम तकनीक वाले ड्रोन का इस्तेमाल कर रहे हैं। ये ड्रोन लगातार अपनी फ्रीक्वेंसी बदलते रहते हैं जिससे सामान्य जैमर उन्हें पकड़ नहीं पाते। लेकिन DIWAR ड्रोन जैमर विशेष तकनीक से ऐसे ड्रोन की पहचान कर उनके सभी संभावित फ्रीक्वेंसी को जाम कर सकता है।
खास बात यह है कि DIWAR जैमर नेटवर्क्ड सिस्टम के साथ भी काम कर सकता है, जिससे कई ड्रोनों को एक साथ रोका जा सकता है। इसकी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टेक्नोलॉजी ड्रोनों को तेजी से पहचानती और रोकती है। यह सिस्टम कम बिजली खर्च करता है और इसकी रेंज 1 से 2 किलोमीटर तक है। यह स्वार्म ड्रोनों को भी रोक सकता है।
L-70 में क्या-क्या बदला
L-70 गन को मॉडर्न बनाने का काम भारत की सरकारी कंपनी भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) ने जबलपुर के गन कैरिज फैक्ट्री में किया है। इस अपग्रेड में कई नई तकनीकें जोड़ी गईं। पहले L-70 में पुराने हाइड्रॉलिक सिस्टम थे, जिन्हें अब इलेक्ट्रिक ड्राइव से बदल दिया गया है। इससे गन का रखरखाव आसान हो गया है। साथ ही, इसमें एक इंटीग्रेटेड फायर कंट्रोल सिस्टम जोड़ा गया है, जिसमें डे-लाइट टेलीविजन कैमरा, थर्मल इमेजर, और लेजर रेंज फाइंडर शामिल हैं। ये सिस्टम दिन-रात और खराब मौसम में भी ड्रोनों को पकड़ने और निशाना बनाने में मदद करते हैं।
इसके अलावा, L-70 में एक ऑटोनॉमस बैलिस्टिक कम्प्यूटेशन सिस्टम भी जोड़ा गया है। यह सिस्टम गोली की रफ्तार और गन के झुकाव को ध्यान में रखकर हर गोली के लिए अपने आप कैलकुलेशन करता है। इससे हर शॉट की सटीकता बढ़ जाती है।
ऑपरेशन सिंदूर में L-70 ने दिखाया था जलवा
L-70 को देश का फर्स्ट एयर डिफेंस सिस्टम भी कहा जाता है। मई 2025 में जम्मू में हुए ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय सेना की L-70 गनों ने अपनी ताकत दिखाई थी। इस ऑपरेशन में पाकिस्तानी ड्रोनों को रोकने के लिए L-70 को अवगार्ड सिस्टम्स के डीआईडब्ल्यूएआर ड्रोन जैमर के साथ जोड़ा गया। जिससे ड्रोनों का कम्यूनिकेशन और नेविगेशन सिस्टम ब्लॉक हो गया। जिसके बाद L-70 की 40 मिलीमीटर गोलियों ने बचे हुए ड्रोनों को नष्ट किया।
Bhairav Vs Ghatak Platoon: 26वें करगिल विजय दिवस के मौके पर आर्मी चीफ जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने एक बड़ा ऐलान किया कि अब सेना में एक नई घातक और तेजतर्रार यूनिट तैयार की जा रही है, जिसका नाम होगा ‘भैरव लाइट कमांडो बटालियन’ (Bhairav Light Commando Battalion)। इस ऐलान के साथ ही ये सवाल भी पूछे जाने लगे कि क्या यह नई भैरव फोर्स पुरानी “घातक प्लाटून” को खत्म कर देगी, जो हर इन्फैंट्री बटालियन का एक खास हिस्सा हैं। लेकिन इन दोनों का मकसद दुश्मन पर तेज और असरदार हमला करना है, लेकिन दोनों की भूमिका, क्षमता और इस्तेमाल के तरीके अलग हैं। आखिर ‘घातक’ और ‘भैरव’ में क्या अंतर है? आइए जानते हैं…
Bhairav Vs Ghatak Platoon: घातक प्लाटून: हर बटालियन की सबसे खतरनाक यूनिट
घातक प्लाटून भारतीय सेना की हर इंफैंट्री बटालियन में मौजूद एक विशेष कमांडो टुकड़ी होती है। घातक प्लाटून की सबसे बड़ी खासियत है इनकी तेजी और चपलता। ये हथियारों के साथ-साथ बिना हथियारों के भी लड़ने में माहिर हैं। इन जवानों को बहुत खास मिशनों के लिए तैयार किया जाता है। इनका काम होता है दुश्मन के इलाके में चुपके से जाकर हमला करना, दुश्मन की डिफेंस लाइन को तोड़ना, आतंकवादियों से लड़ना, या सर्जिकल स्ट्राइक जैसे बड़े ऑपरेशन करना।
🚨 #BigStatement by COAS General Upendra Dwivedi on the 26th #KargilVijayDiwas 🇮🇳
🗣️ “We are rapidly advancing as a transformed, modern, and future-ready force.
👉 Under this, we are raising ‘RUDRA’ All Arms Brigades – integrated combat formations including Infantry, Mechanised… pic.twitter.com/HimtNXwgML
— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) July 26, 2025
हर बटालियन में करीब 20–30 जवानों की यह टीम बनाई जाती है, जिसमें सिर्फ सबसे फुर्तीले, ताकतवर और प्रशिक्षित जवानों को ही जगह मिलती है। इन सैनिकों को हथियारों से लेकर हाथ से लड़ाई (जैसे कराटे, जूडो, मार्शल आर्ट) तक की ट्रेनिंग दी जाती है। इन जवानों को स्नाइपर राइफल, मशीन गन और बम जैसे हथियार चलाने में महारत हासिल होती है। इन्हें ऊंचे पहाड़ी इलाकों, जंगलों, नदियों और बर्फीली जगहों पर ऑपरेशन करने की भी विशेष ट्रेनिंग दी जाती है। इसके अलावा इन्हें पैरा जंपिंग जैसे मुश्किल मिशनों के लिए भी तैयार किया जाता है।
Bhairav Vs Ghatak Platoon: घातक प्लाटून का इतिहास
घातक प्लाटून की शुरुआत 1962 में भारत और चीन के बीच हुए युद्ध के बाद हुई थी। उस समय सेना ने फैसला किया कि हर इन्फैंट्री बटालियन में एक खास कमांडो प्लाटून होनी चाहिए। इस प्लाटून में सबसे ताकतवर और तेज-तर्रार जवान चुने जाते थे। इनका काम था दुश्मन पर अचानक हमला करना, उनके डिफेंस को तोड़ना और गुप्त मिशनों को पूरा करना। समय के साथ इस कमांडो प्लाटून का नाम बदलकर “घातक प्लाटून” कर दिया गया। साथ ही, इनके प्रशिक्षण को और सख्त और खास बनाया गया ताकि ये और भी खतरनाक और कारगर बन सकें। आज घातक प्लाटून हर बटालियन की रीढ़ हैं और सेना के सबसे मुश्किल मिशनों में हिस्सा लेते हैं।
घातक प्लाटून ने कई बड़े और मुश्किल मिशनों में अपनी ताकत दिखाई है। 1999 के कारगिल युद्ध में ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव भी 18 ग्रेनेडियर्स की घातक प्लाटून में थे। उनकी टीम ने टाइगर हिल पर कब्जा करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई। उनकी बहादुरी के लिए उन्हें परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। 2016 में हुई सर्जिकल स्ट्राइक में घातक कमांडो ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में आतंकवादी ठिकानों पर सटीक और खतरनाक हमले किए। 2020 में गलवान घाटी में भारत और चीन की सेनाओं के बीच हुई झड़प में भी घातक प्लाटून के जवानों ने नजदीकी लड़ाई में अपनी ताकत दिखाई। ये जवान हर बार अपनी हिम्मत और कौशल से सेना का नाम रोशन करते हैं।
Photo: Raksha Samachar
घातक प्लाटून की खूबियां
घातक प्लाटून का चुनाव पूरी तरह बटालियन के भीतर से होता है। इसमें शामिल होने वाले सैनिक अपनी मर्जी से नामांकन देते हैं, फिर उनमें से सबसे बेहतर को चुना जाता है। यह गर्व की बात मानी जाती है क्योंकि यह यूनिट बटालियन की ‘सबसे घातक’ ताकत होती है। घातक प्लाटून का नेतृत्व आमतौर पर एक युवा अफसर करता है, जो कैप्टन या मेजर रैंक का होता है। इनके साथ जेसीओ, हवलदार और नायक रैंक के जवान होते हैं।
घातक प्लाटून को असली युद्ध के हालात के लिए तैयार किया जाता है। ये न सिर्फ हाथ से लड़ाई में माहिर होते हैं, बल्कि हथियारों का भी बेहतरीन इस्तेमाल जानते हैं। इन्हें यह भी सिखाया जाता है कि कैसे सीमित संसाधनों में जीना है, मैप पढ़ना है और दुर्गम जगहों में टिके रहना है।
क्यों बनाई जा रही है भैरव लाइट कमांडो बटालियन?
2025 में करगिल विजय दिवस के मौके पर सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने घोषणा की कि अब सेना “भैरव लाइट कमांडो बटालियन” नाम से एक नई विशेष कमांडो यूनिट तैयार कर रही है। इसका उद्देश्य यह है कि बॉर्डर के नजदीक दुश्मन को चौंका देने वाली कार्रवाई की जा सके।
भैरव यूनिट्स को ‘लाइट कमांडो बटालियन’ इसलिए कहा गया है क्योंकि ये सामान्य स्पेशल फोर्सेस (जैसे पैरा स्पेशल फोर्सेज) की तरह भारी हथियारों से लैस नहीं होंगी, लेकिन फिर भी ये बेहद फुर्तीली, घातक और आधुनिक टेक्नोलॉजी से लैस होंगी। इन यूनिट्स में ड्रोन्स, स्मार्ट गियर और लेटेस्ट कम्यूनिकेशन सिस्टम का इस्तेमाल किया जाएगा।
सेना प्रमुख के मुताबिक, भैरव यूनिट्स को खासतौर पर बॉर्डर इलाकों में घात लगा कर दुश्मन को चौंकाने वाली कार्रवाई करने के लिए तैयार किया गया है।
भैरव फोर्स की हर बटालियन में करीब 620 जवान
भैरव फोर्स में 40 से 50 इन्फैंट्री यूनिट्स होंगी, जिन्हें धीरे-धीरे बनाया जाएगा। हर बटालियन में करीब 620 जवान होंगे। ये यूनिट्स ड्रोन, नाइट विजन डिवाइस, एडवांस हथियार, GPS, और कम्युनिकेशन सिस्टम से लैस होंगी, जो इन्हें आधुनिक युद्ध के लिए तैयार करेंगे। भैरव फोर्स का काम होगा खास मिशनों में दुश्मन को नुकसान पहुंचाना। लेकिन यह स्पेशल फोर्सेज, जैसे पैरा एसएफ, की तरह बड़े और रणनीतिक मिशनों के लिए नहीं होगी। यह सीमा पर त्वरित और छोटे हमलों के लिए बनी हैं। कुछ भैरव यूनिट्स पहले ही बन चुकी हैं और सीमा पर तैनात होने के लिए तैयार हैं।
Bhairav Vs Ghatak Platoon: घातक और भैरव में क्या है अंतर?
घातक प्लाटून और भैरव यूनिट्स दोनों ही भारतीय सेना की आक्रामक रणनीति का हिस्सा हैं, लेकिन इनके काम करने के तरीके और स्केल में फर्क है। घातक प्लाटून बटालियन स्तर की यूनिट है, यानी हर इंफैंट्री बटालियन के पास खुद की घातक टीम होती है। ये सीमित संख्या में होते हैं और उनका इस्तेमाल बटालियन की जरूरतों के अनुसार होता है।
वहीं, भैरव यूनिट्स ब्रिगेड या उससे ऊपर के स्तर की स्केमेटिक फोर्स हैं। इन्हें अलग से खड़ा किया जा रहा है, और यह पूरी तरह एक नई कमांडो ब्रिगेड जैसी होंगी। घातक प्लाटून पारंपरिक युद्ध और आतंकवाद विरोधी अभियानों में अधिक इस्तेमाल होती हैं, जबकि भैरव फोर्स को खासतौर पर सीमावर्ती इलाकों में छोटे लेकिन सटीक हमले करने के लिए तैनात किया जाएगा। घातक फोर्स में शामिल सैनिक बटालियन के भीतर से ही चुने जाते हैं, जबकि भैरव बटालियन के लिए नए तरीके से चयन और प्रशिक्षण की योजना बनाई जा रही है। वहीं, घातक प्लाटून ज्यादातर जमीनी ऑपरेशंस को अंजाम देती है, जबकि भैरव यूनिट्स को डिजिटल युद्ध, ड्रोंस, निगरानी और फास्ट पेट्रोलिंग जैसे कामों के लिए ट्रेनिंग दी जा रही है।
क्या भैरव के बाद खत्म हो जाएगी घातक प्लाटून?
यह सवाल बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि कई लोगों को लगता है कि जब भैरव जैसी नई फोर्स बन रही है तो घातक प्लाटून की जरूरत नहीं रह जाएगी। लेकिन ऐसा नहीं है। सेना के सूत्रों के अनुसार, घातक प्लाटून बटालियन के सबसे करीबी और भरोसेमंद फोर्स मानी जाती है। घातक प्लाटून बटालियन के अंदर होती है और उसका दायरा सीमित होता है। उनका इस्तेमाल तुरंत और लोकल स्तर पर होता है।
दूसरी ओर, भैरव यूनिट्स को रणनीतिक स्तर पर तैनात किया जाएगा। दोनों की भूमिका अलग-अलग है और दोनों ही एक-दूसरे को पूरक बनाती हैं। सूत्रों ने बताया कि भारतीय सेना का उद्देश्य अपनी युद्ध क्षमता को और मजबूत करना है, न कि मौजूदा यूनिट्स को खत्म करना। भैरव लाइट कमांडो बटालियन को तैयार करना एक अतिरिक्त कदम है, जो सेना को और अधिक फुर्तीला बनाएगा।
नहीं, सेना ने साफ किया है कि भैरव, स्पेशल फोर्स जैसी नहीं होंगी, जैसे पैरा स्पेशल फोर्स या गरुड़ कमांडो होती हैं। लेकिन इनकी ट्रेनिंग और हथियार उन्हें एक ‘मिनी स्पेशल फोर्स’ जैसा बनाएंगे। भैरव एक स्टैंड-अलोन यूनिट होगी, जिसे जरूरत के हिसाब से सीमावर्ती क्षेत्रों या टारगेट ऑपरेशन में तैनात किया जाएगा। सूत्रों ने बताया कि नई भैरव लाइट कमांडो बटालियनें भारतीय सेना की पहले से मौजूद 10 पैरा स्पेशल फोर्स और 5 पैरा (एयरबोर्न) बटालियनों के अलावा होंगी। ये पुरानी यूनिट्स खास ट्रेनिंग और आधुनिक हथियारों से लैस हैं, और दुश्मन की सीमा के अंदर गुप्त ऑपरेशनों के लिए बनाई गई हैं।
रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल शंकर प्रसाद का मानना है, “घातक प्लाटून भारतीय सेना की रीढ़ हैं और उनकी भूमिका को कम नहीं किया जा सकता। भैरव फोर्स का गठन सेना की रणनीति को और मजबूती देगा, ताकि वह विभिन्न प्रकार की चुनौतियों का सामना कर सके। घातक प्लाटून नजदीकी लड़ाई और बटालियन-स्तर के मिशनों में माहिर हैं, जबकि भैरव फोर्स बड़े पैमाने पर हल्के और तेज हमलों के लिए है।”
जरूरी है ऐसी फोर्सेज का फॉर्मेशन
आज के जमाने के युद्ध पहले जैसे नहीं रहे। अब लड़ाई सिर्फ़ बंदूक और सैनिकों से नहीं होती, बल्कि इसमें टेक्नोलॉजी और ड्रोन से होती है, जिसमें तुरंत कार्रवाई की जरूरत होती है। चीन अपनी सेना को मार्शल आर्ट जैसी फुर्तीली लड़ाई की ट्रेनिंग दे रहा है और तिब्बत जैसे ऊंचे इलाकों में खास सैनिक तैनात कर रहा है। वहीं ऑपरेशन सिंदूर से भारत ने कई सबक सीखें हैं। जिसमें भारतीय सेना की रिस्ट्रक्चरिंग किए जाने की जरूरत महसूस हुई। ऐसे माहौल में भारत को भी अपनी सेना को हर मोर्चे के लिए तैयार रखना जरूरी है, चाहे वो जमीनी लड़ाई हो, सीमाओं की निगरानी हो या अचानक जवाब देने की जरूरत। घातक फोर्स जहां जरूरत पड़ने पर बटालियन की पहली पंक्ति में होते हैं, वहीं भैरव भारत की नई युद्ध शैली की नींव रखेंगी, जहां टेक्नोलॉजी और रणनीतिक चौकसी सबसे बड़ी ताकत होगी।
Op Mahadev LoRa Device: 22 अप्रैल को पहलगाम में आतंकी हमले के तीनों गुनहगारों को सुरक्षा बलों ने ऑपरेशन महादेव के जरिए अपने अंजाम तक पहुंचा दिया। इस हमले शामिल तीनों आतंकी पाकिस्तानी थे, जिससे यह भी साफ हुआ कि पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठन अभी भी घाटी में आतंक को हवा दे रहे हैं। ऑपरेशन महादेव में आतंकियों के पास से हथियारों का भारी जखीरा तो बरामद हुआ ही, साथ ही, इन आतंकियों के पास से LoRa कम्युनिकेशन डिवाइस, मोबाइल फोन और NADRA कार्ड जैसी चीजें मिलीं, जिसने सुरक्षा एजेंसियों को चौंका दिया।
Op Mahadev LoRa Device: क्या है लोरा (LoRa) डिवाइस?
लोरा (LoRa) का पूरा नाम लॉन्ग रेंज (Long Range) है। यह एक ऐसी वायरलेस कम्यूनिकेशन टेक्नोलॉजी है जो लो-पावर में भी लंबी दूरी तक कम्यूनिकेशन करने की क्षमता रखती है। यह तकनीक विशेष रूप से उन क्षेत्रों में उपयोगी है, जहां मोबाइल नेटवर्क या इंटरनेट की सुविधा नहीं होती। लोरा डिवाइस का उपयोग सामान्य रूप से स्मार्ट सिटी, कृषि, और औद्योगिक निगरानी जैसे क्षेत्रों में होता है, लेकिन आतंकी संगठन इसे सीक्रेट कम्यूनिकेशन के लिए भी इस्तेमाल कर रहे हैं। LoRa यानी Long Range कम्युनिकेशन डिवाइस बिना किसी मोबाइल नेटवर्क या इंटरनेट के कई किलोमीटर तक डेटा ट्रांसफर करने में सक्षम होती है।
आतंकवादियों के इसके इस्तेमाल करने की वजह है कि यह तकनीक बेहद कम बिजली में काम करती है, पकड़ में आसानी से नहीं आती और इसे साधारण से उपकरण में भी छिपाया जा सकता है। यही वजह है कि ऑपरेशन महादेव में इस डिवाइस की बरामदगी ने सुरक्षा एजेंसियों की नींद उड़ा दी है। लोरा डिवाइस सैटेलाइट फोन की तरह आसानी से पकड़ में नहीं आते, क्योंकि ये रेडियो फ्रीक्वेंसी पर काम करते हैं और मोबाइल नेटवर्क पर निर्भर नहीं होते। वहीं, आतंकी इन उपकरणों को विशेष रूप से बनाए गए एन्क्रिप्टेड रेडियो (encrypted radio) में इस्तेमाल करते हैं, जिससे उनके संदेशों को सुनना मुश्किल होता है।
11 जुलाई को मिला पहला सिग्नल
22 अप्रैल 2025 को पहलगाम के बैसारन क्षेत्र में हुए आतंकी हमले में 26 नागरिकों की मौत हुई थी। हमले के बाद सेना और पुलिस ने सुरागों को तलाशना शुरू किया। 11 जुलाई को पहली बार LoRa डिवाइस का एक रेडियो सिग्नल पकड़ा गया और 17 दिन बाद 27 जुलाई को उसी तरह का एक और सिग्नल श्रीनगर के बाहरी इलाके में स्थित महादेव पीक से आया। इसी तकनीकी जानकारी के आधार पर सुरक्षाबलों ने महादेव के जंगलों में सर्च ऑपरेशन शुरू किया। 28 जुलाई की सुबह जब आतंकियों को एक तंबू के नीचे आराम करते हुए पाया गया, तो उन्हें घेर लिया गया और कुछ ही घंटों में तीनों को ढेर कर दिया गया।
घने जंगलों में ढूंढना चुनौतीपूर्ण
LoRa डिवाइस की मदद से ये आतंकवादी पाकिस्तान में बैठे अपने आकाओं से संपर्क में थे। इस डिवाइस ने मोबाइल फोन से जोड़कर उन्होंने रेडियो फ्रिक्वेंसी के जरिए संदेश भेजे, जिससे ट्रैक करना मुश्किल था। हालांकि इसकी सीमाएं हैं। LoRa डिवाइस से सिर्फ सिग्नल की दिशा और सामान्य क्षेत्र का अंदाज़ा लगाना संभव होता है। लेकिन इतनी भी जानकारी सुरक्षाबलों के लिए काफी थी। भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के पास ऐसी तकनीक है, जो इन उपकरणों के चालू होने पर उनकी अनुमानित लोकेशन (3-5 किलोमीटर के दायरे में) का पता लगा सकती है। लेकिन घने जंगलों में सटीक स्थान ढूंढना चुनौतीपूर्ण होता है।
NADRA कार्ड हुए बरामद
सूत्र बताते हैं कि ऑपरेशन महादेव के दौरान आतंकियों से मुठभेड़ के बाद जब तलाशी ली गई तो तीन मोबाइल फोन, तीन मोबाइल चार्जर, दो LoRa सेट, NADRA कार्ड की तस्वीरें, आधार कार्ड, 28-वॉट का सोलर चार्जर, GoPro हार्नेस, स्विस मिलिट्री पावर बैंक, एक M4 कार्बाइन राइफल, दो AK-47 राइफल, 17 राइफल ग्रेनेड और सिलाई का सामान, दवाइयां, स्टोव, सूखा राशन, और ढेर सारी चाय बरामद हुई। इनमें से NADRA कार्ड पाकिस्तान की नागरिक पहचान एजेंसी द्वारा जारी किए गए थे। इसका मतलब साफ था कि ये आतंकी पाकिस्तान के नागरिक थे और वहीं से प्रशिक्षित होकर भारत में घुसपैठ कर रहे थे। मोबाइल फोन से कई अहम जानकारियां मिलीं, जिनमें तस्वीरें, दस्तावेज, और कई ओवरग्राउंड वर्कस के मोबाइल नंबर शामिल थे। ये फोन फिलहाल राष्ट्रीय तकनीकी अनुसंधान संगठन (NTRO) की जांच में हैं, जो इनके डेटा का गहन विश्लेषण कर रहा है।
सूत्रों ने बताया कि पिछले कुछ सालों में, जम्मू-कश्मीर में आतंकियों और घुसपैठियों से LoRa डिवाइस बरामद हुए हैं। ये उपकरण पाकिस्तान में बैठे हैंडलर्स के साथ बातचीत के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। पिछले कुछ सालों में 50 से अधिक जवानों की हत्या करने वाले आतंकियों के पास लोरा डिवाइस मिले थे। वहीं, ये डिवाइस अक्सर सामान्य हार्डवेयर में छिपाए जाते हैं, ताकि इन्हें आसानी से न पहचाना जाए।
ऑपरेशन महादेव 28 जुलाई 2025 को जम्मू-कश्मीर के दाचीगाम जंगल में शुरू किया गया था, जिसमें भारतीय सेना, जम्मू-कश्मीर पुलिस, और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) ने हिस्सा लिया था।
आतंकियों के पास मिले आधार कार्ड
इस ऑपरेशन में भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने टेक्निकल सर्विलांस का भी इस्तेमाल किया था। केवल ह्यूमन इंटेलिजेंस पर भरोसा करने के बजाय उन्होंने सैटेलाइट इमेजरी, LoRa और सैटेलाइट फोन के रेडियो सिग्नल, और ड्रोन से निगरानी जैसी आधुनिक तकनीकों का सहारा लिया। साथ ही आतंकियों की लोकेशन पुख्ता करने के लिए हीट सिग्नेचर ड्रोन का भी इस्तेमाल किया गया।
वहीं, हर बार जब कोई कम्यूनिकेशन डिवाइस एक्टिव होती, उसका सिग्नल ट्रैक कर लिया जाता और उस इलाके में सर्च अभियान चलाया जाता। यह ऑपरेशन बेहद चुनौतीपूर्ण था क्योंकि महादेव का इलाका घने जंगलों, गुफाओं और ऊंची पहाड़ियों से घिरा हुआ है।
एक और अहम बात जो सामने आई, वह थी आतंकियों के पास से मिले भारतीय आधार कार्ड। ये कार्ड श्रीनगर और गांदरबल के नामों से थे। इससे यह आशंका और गहराई कि पाकिस्तान से आने वाले आतंकी भारतीय ओवर ग्राउंड वर्कर्स (OGWs) की मदद से या तो फर्जी आधार कार्ड बनवा लेते हैं या खरीद लेते हैं, ताकि वे स्थानीय दिखें और चेकपोस्ट पर शक न हो। सूत्रों का कहना है कि आतंकियों की यह रणनीति सुरक्षा बलों के लिए एक बड़ी सुरक्षा चुनौती बनती जा रही है।
गृहमंत्री अमित शाह ने लोकसभा में बताया था कि मारे गए तीनों आतंकी वही थे, जिन्होंने अप्रैल में बैसारन घाटी में नरसंहार किया था। उनकी पहचान चार चश्मदीदों ने की गई, जिनमें बैसारन हमले में बचे हुए लोग और दो स्थानीय लोग शामिल थे, जिन्होंने आतंकियों को शरण दी थी। आतंकियों में शामिल थे सुलेमान शाह (लश्कर-ए-तैयबा का ट्रेनिंग सेंटर मुरिदके से प्रशिक्षित कमांडर), हामिद अफगानी (अफगान मूल का आतंकी) और जिबरान (जो पहले भी Z-मोर सुरंग पर हमले में शामिल रहा था)।
Himgiri Project 17A: भारतीय नौसेना के लिए गुरुवार का दिन बेहद खास रहा है। कोलकाता में गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE) ने प्रोजेक्ट 17A के तहत अत्याधुनिक स्टेल्थ फ्रिगेट हिमगिरी को 31 जुलाई 2025 को भारतीय नौसेना को सौंप दिया। यह युद्धपोत ‘प्रोजेक्ट 17ए’ के तहत बनने वाले नीलगिरि क्लास फ्रिगेट्स में से तीसरा है और गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स लिमिटेड (GRSE) द्वारा बनाया गया पहला फ्रिगेट है। हिमगिरी को 14 दिसंबर 2020 को कोलकाता की हुगली नदी में लॉन्च किया गया था।
हिमगिरी का नाम भारतीय नौसेना के एक पुराने लैंडर-क्लास फ्रिगेट, INS हिमगिरी, से लिया गया है, जिसने 1974 से 2005 तक 30 साल तक देश की सेवा की। पुराना हिमगिरी एक भाप से चलने वाला वॉरशिप था, जिसे 6 मई 2005 को सेवा से हटा लिया गया। नया हिमगिरी आधुनिक तकनीक, स्टील्थ (रडार से बचने की क्षमता), और शक्तिशाली हथियारों से लैस है। खास बात यह है कि नए हिमगिरी को स्वदेश में ही डिजाइन और निर्मित किया गया है।
🚢 DELIVERED! HIMGIRI Joins Indian Navy 🇮🇳
🔹 Project 17A Milestone: Advanced stealth frigate HIMGIRI (Yard 3022) delivered by GRSE Kolkata
🔹 First P17A ship built by GRSE
🔹 Indigenous content: 75%
🔹 Over 200 MSMEs involved
🔹 14,000+ jobs supported (direct + indirect)
🛡️… pic.twitter.com/cjhJWuN3zL
— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) July 31, 2025
क्या है प्रोजेक्ट 17A
प्रोजेक्ट 17A को नीलगिरी क्लास के नाम से भी जाना जाता है। इस प्रोजेक्ट के तहत भारतीय नौसेना के लिए सात अत्याधुनिक स्टील्थ फ्रिगेट बनाने जाने हैं। ये फ्रिगेट शिवालिक-क्लास (प्रोजेक्ट 17) का अपग्रेड वर्जन हैं, जो पहले से ही नौसेना में एक्टिव है। प्रोजेक्ट 17A को 2015 में भारत सरकार ने मंजूरी दी थी, और इसका कुल खर्च लगभग 45,381 करोड़ रुपये (2023 में $8.1 बिलियन के बराबर) है। इन सात फ्रिगेट में से चार का निर्माण मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDL), मुंबई में हो रहा है, जबकि तीन का निर्माण GRSE, कोलकाता में हो रहा है। हिमगिरी GRSE का बनाया पहला फ्रिगेट है, जिसे 31 जुलाई 2025 को नौसेना को सौंपा गया। बाकी पांच फ्रिगेट 2026 के अंत तक चरणबद्ध तरीके से सौंपे जाएंगे।
इन फ्रिगेट की लंबाई 149 मीटर, वजन 6,670 टन, और गति 28 नॉट है। ये जहाज न केवल ताकतवर हैं, बल्कि एर्गोनॉमिक डिजाइन के साथ बनाए गए हैं, ताकि नाविकों को ऑपरेट करने में आसानी हो।
प्रोजेक्ट 17A के तहत बनाए जा रहे सात फ्रिगेट नीलगिरी, उदयगिरी, हिमगिरी, तारागिरी, दूनागिरी, विंध्यगिरी, और महेंद्रगिरी शामिल हैं। ये वॉरशिप ब्लू वॉटर में ऑपरेट करने के लिए बनाए गए हैं, जो पारंपरिक और गैर-पारंपरिक खतरों, जैसे पनडुब्बी हमले, हवाई हमलों, और सरफेस अटैक से निपट सकते हैं।
ब्रह्मोस से लैस है हिमगिरी
हिमगिरी और प्रोजेक्ट 17A के बाकी फ्रिगेट भी कई मायनों में खास हैं। ये युद्धपोत समुद्र में सभी तरह की चुनौतियों हवा, सतह, और पानी के नीचे होने वाले खतरों से से निपटने के लिए डिजाइन किए गए हैं। हिमगिरी में स्टील्थ तकनीक का प्रयोग किया गया है। हिमगिरी का डिजाइन रडार सिग्नल को कम करने के लिए बनाया गया है, जिससे इसे दुश्मन के रडार पर पकड़ना मुश्किल हो। इसका स्ट्रक्चर और साइज रडार तरंगों को अवशोषित और विक्षेपित करता है, जिससे यह “अदृश्य” जैसा बन जाता है। इसके इंफ्रारेड सिग्नेचर को इस तरह से तैयार किया गया है कि यह आधुनिक रडार और निगरानी सिस्टम से खुद को छुपा सके।
हिमगिरी में ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल (मैक 3 की गति), मध्यम दूरी की सतह-से-हवा मिसाइल (सर्फेस-टू-एयर मिसाइल), भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (BHEL) की बनाई 76 मिमी की ओटो मेलारा नौसैनिक कैनन, और 30 मिमी व 12.7 मिमी की तेजी से फायर करने वाली क्लोज-इन वेपन सिस्टम्स शामिल हैं। यह सभी हथियार और सेंसर इसे एक मल्टी-मिशन युद्धपोत बनाते हैं, जो समुद्री युद्ध, निगरानी, बचाव और सुरक्षा अभियानों को एकसाथ अंजाम दे सकता है।
तय समयसीमा में बना है हिमगिरी
हिमगिरी को भारतीय नौसेना के वारशिप डिजाइन ब्यूरो (WDB) ने डिजाइन किया है। इसकी देखरेख कोलकाता की वारशिप ओवरसीइंग टीम ने की है। प्रोजेक्ट 17A में इंटीग्रेटेड कंस्ट्रक्शन की कॉन्सेप्ट का इस्तेमाल किया गया हैं, जिसमें 300 टन के बड़े ब्लॉक पहले से तैयार किए जाते हैं और फिर जोड़े जाते हैं। इससे निर्माण समय कम होता है और क्वॉलिटी बेहतर रहती है। हिमगिरी तय समयसीमा यानी 37 महीनों में बनकर तैयार हुआ है।
Photo: Indian Navy
GRSE ने अपने बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर को आधुनिक बनाते हुए इसमें “गोलियथ” गैन्ट्री क्रेन, मॉड्यूलर वर्कशॉप, और गीला बेसिन शामिल की हैं। जिससे बड़े वॉरशिप बनााने में मदद मिलती है। यह युद्धपोत 75 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री से निर्मित है और इसके निर्माण में 200 से अधिक सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME) की भागीदारी रही है। इससे 4,000 से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष और 10,000 से ज्यादा को परोक्ष रोजगार मिला है।
हिमगिरी में CODOG (कम्बाइंड डीजल ऑर गैस) प्रोपल्शन सिस्टम लगाया गया है, जिसमें एक डीजल इंजन और एक गैस टरबाइन शामिल होते हैं। यह सिस्टम कंट्रोल करने योग्य पिच प्रोपेलर (CPP) के जरिए दोनों शाफ्ट्स को ऑपरेट करता है, जो इसे 28 नॉट (लगभग 52 किमी/घंटा) की स्पीड देता है। इसके साथ ही इसमें इंटीग्रेटेड प्लेटफॉर्म मैनेजमेंट सिस्टम (IPMS) जहाज के सभी सिस्टम को एक साथ जोड़ता है, जिससे ऑपरेट करना आसान होता है।
Trump Threat India: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत को एक बार फिर धमकी दी है। ट्रंप ने भारत पर रूस से हथियार और तेल खरीदने के लिए 25 प्रतिशत टैरिफ (आयात शुल्क) और पेनल्टी लगाने की चेतावनी दी है। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया मंच ट्रुथ सोशल पर लिखा, “भारत हमेशा से अपने ज्यादातर हथियार रूस से खरीदता रहा है और रूस का सबसे बड़ा ऊर्जा खरीदार है। इसलिए, 1 अगस्त से भारत को 25 प्रतिशत टैरिफ के साथ-साथ पेनल्टी भी देनी होगा।” लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि भारत के लिए अपने मिलिट्री इंफ्रास्ट्रक्चर को रूस से अलग करना न तो आसान है और न ही व्यावहारिक।
ट्रंप की इस धमकी के बावजूद भारत के लिए रूस से अपने सैन्य उपकरणों का रिश्ता तोड़ना लगभग असंभव है। भारत की सेना का एक बड़ा हिस्सा रूसी हथियारों पर निर्भर है, और यह रिश्ता दशकों पुराना है, जो रणनीतिक और आर्थिक साझेदारी पर टिका है।
Trump Threat India: ट्रंप की धमकी: टैरिफ और जुर्माना
डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया मंच ‘ट्रुथ सोशल’ पर लिखा: “भारत रूस से हथियारों और ऊर्जा का सबसे बड़ा खरीदार है… इसलिए 1 अगस्त 2025 से उस पर 25% टैरिफ और अतिरिक्त जुर्माना लगाया जाएगा।”
यह बयान उस समय आया है जब अमेरिका और यूरोपीय देश रूस-यूक्रेन युद्ध में रूस की आर्थिक मदद को लेकर भारत और चीन पर सवाल उठा रहे हैं।
भारत और रूस मिल कर बनाते हैं ब्रह्मोस
भारत की मिलिट्री ताकत का ज्यादातर हिस्सा रूस से खरीदे गए हथियारों पर टिका है। इसमें फाइटर जेट्स, टैंक, राइफलें, हेलीकॉप्टर और एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम शामिल हैं। इसके अलावा, भारत और रूस मिलकर ब्रह्मोस मिसाइल बनाते हैं, जिसने ऑपरेशन सिंदूर में अपनी ताकत दिखाई थी। यह मिसाइल की सटीकता और ताकत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इसने पाकिस्तान के सात एयरबेस को बुरी तरह से तबाह कर दिया था। और पाकिस्तान को कानोंकान खबर भी नहीं हो पई थी।
भारत की वायुसेना में सुखोई-30 एमकेआई जैसे लड़ाकू विमान, थलसेना में टी-90 टैंक, और नौसेना में कई जहाज और हेलीकॉप्टर रूसी मूल के हैं। जानकारों का अनुमान है कि भारत के मौजूदा सैन्य उपकरणों का 60 से 70 फीसदी हिस्सा रूस या पुराने सोवियत संघ से आता है। वहीं, यह निर्भरता केवल हथियारों तक सीमित नहीं है। बल्कि इनकी मेंटेनेंस, रिपेयर, और ओवरहॉलिंग की पूरी व्यवस्था भी रूसी तकनीक पर चलती है। भारत में कई कारखाने, जैसे चेन्नई के पास टी-90 टैंक बनाने वाली फैक्ट्री और लखनऊ के पास अमेठी में एके-203 राइफल बनाने वाली फैक्टरी सभी रूसी मदद से ही चल रहे हैं।
रूस देता है टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की सुविधा
रूस भारत की एक खास जरूरत को पूरा करता है, जो पश्चिमी देश नहीं करते। वह है टेक्नोलॉजी ट्रांसफर। रूस ने भारत को सिर्फ हथियार ही नहीं दिए, बल्कि उनकी टेक्नोलॉजी को भारत में बनाने की इजाजत भी दी। मिसाल के तौर पर, सुखोई-30 एमकेआई विमानों का ज्यादातर हिस्सा भारत में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) बनाता है। ब्रह्मोस मिसाइल का उत्पादन भी भारत और रूस की साझेदारी का नतीजा है।
वहीं, अमेरिका के साथ भारत का रिश्ता ज्यादातर खरीद-बिक्री तक ही सीमित रहा है। पिछले डेढ़ दशक में भारत ने अमेरिका से करीब 20 अरब डॉलर के हथियार खरीदे। इनमें जनरल इलेक्ट्रिक एफ-404 इंजन, बोइंग पी8-आई निगरानी विमान, सी-17 और सी-130जे ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट, और चिनूक, अपाचे, और एमएच-60आर अपाचे हेलीकॉप्टर शामिल हैं। लेकिन, अमेरिका ने इनमें से किसी भी बड़े हथियार की टेक्नोलॉजी भारत को नहीं दी है। जबकि यह भारत के लिए घाटे का सौदा है, क्योंकि स्वदेशी उत्पादन और आत्मनिर्भरता के लिए टेक्नोलॉजी ट्रांसफर जरूरी है।
शीत युद्ध से शुरू हुआ था रिश्ता
भारत और रूस (या पुराने सोवियत संघ) का सैन्य सहयोग शीत युद्ध के समय से शुरू हुआ। उस वक्त पश्चिमी देश भारत जैसे “गुटनिरपेक्ष” देश को एडवांस हथियार देने से कतराते थे। सोवियत संघ ने भारत पर भरोसा जताया और हथियारों की सप्लाई शुरू की। सोवियत हथियार न सिर्फ अच्छे थे, बल्कि पश्चिमी हथियारों से सस्ते भी थे। यह सौदा भारत जैसे विकासशील देश के लिए बहुत मायने रखता था।
रूस ने भारत को लाइसेंस के तहत हथियार बनाने की अनुमति दी, जिसके चलते भारत में डिफेंस प्रोडक्शन शुरू हुआ। आज भारत में आज भी हजारों सैनिक और इंजीनियर हैं जिन्होंने रूसी सिस्टम्स पर ट्रेनिंग ली हुई है। जो हथियारों की मेंटेनेंस, रिपेयर, और ओवरहॉलिंग का काम देखते हैं। यह सिस्टम इतनी गहराई तक पैठ बना चुका है कि अब किसी और देश के हथियार को रूसी हथियारों से बदलना आसान नहीं है।
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा हथियार खरीदार
स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) की रिपोर्ट्स के अनुसार 2010-2014 में भारत के कुल हथियार आयात का 72% रूस से था, जो 2015-2019 में घटकर 55% और 2020-2024 में 36% रह गया। इस दौरान भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा हथियार आयातक रहा।
2015-2019 में भारत के हथियार आयात में रूस का योगदान करीब 55% था, जिसमें सुखोई-30 एमकेआई विमान, टी-90 टैंक और ब्रह्मोस मिसाइल जैसे हथियार शामिल थे। 2020-2024 में यह हिस्सा 36% तक कम हुआ, क्योंकि भारत ने फ्रांस (28%) और इजराइल (34%) जैसे पश्चिमी देशों से आयात बढ़ाया। फिर भी, रूस भारत का सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्ता बना रहा, जिसके पास भारत के लिए सबसे ज्यादा लंबित ऑर्डर थे।
रूस से आयात में कमी की वजह भारत का स्वदेशी हथियार उत्पादन बढ़ाना और पश्चिमी सप्लायर्स की ओर रुख करना है। हालांकि, रूसी हथियारों की कम लागत और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की सुविधा के चलते भारत की निर्भरता पूरी तरह खत्म नहीं हुई।
भारत सरकार आत्मनिर्भर भारत के तहत स्वदेश में ही हथियार बनाने पर जोर दे रही है। तेजस लड़ाकू विमान, अर्जुन टैंक, और ध्रुव हेलीकॉप्टर जैसे प्रोजेक्ट इसकी मिसाल हैं। लेकिन, इनके पूरी तरह तैयार होने और पुराने रूसी हथियारों की जगह लेने में अभी वक्त लगेगा।
भारत का रूस से तेल आयात: सस्ता सौदा, बड़ी रणनीति
2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद भारत ने रूस से तेल आयात में जबरदस्त इजाफा किया। पहले रूस भारत के तेल आयात का सिर्फ 0.2% हिस्सा था, लेकिन अब वह सबसे बड़ा सप्लायर है। वित्तीय वर्ष 2022 में भारत ने रूस से 2.1% तेल खरीदा, जिसका मूल्य 18,000 करोड़ रुपये था। 2024 तक यह हिस्सा 35.1% हो गया, और मूल्य 4,20,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गयाा। 2025 में आयात 35% रहा, जिसका अनुमानित मूल्य 3,70,000 करोड़ रुपये है। जुलाई 2024 में भारत ने 23,500 करोड़ रुपये का 19.4 मिलियन टन तेल आयात किया, जो कुल आयात का 40% था। अक्टूबर में यह 18,000 करोड़ रुपये (19%) रहा, जबकि नवंबर में 55% की गिरावट आई। मई 2025 में आयात 1.96 मिलियन बैरल प्रतिदिन और जून में 2.08-2.2 मिलियन बैरल तक पहुंचा, जो दो साल का उच्चतम स्तर था। 2020-2025 के बीच भारत ने रूस से तेल आयात 96% की वार्षिक वृद्धि दर से बढ़ाया, जिसमें 2024-2025 में 4,50,000 करोड़ रुपये के फॉसिल फ्यूल शामिल थे।
वहीं, पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी कहते हैं कि रूस से तेल खरीदने से वैश्विक कीमतें $120-130 तक नहीं पहुंचीं। भारत ने मध्य पूर्व पर निर्भरता कम की, लेकिन ट्रंप की 25% टैरिफ और पेनल्टी लगाने की धमकी चुनौती है। रूस के शैडो टैंकर और भुगतान की जटिलताएं भी मुश्किलें बढ़ाती हैं। फिर भी, भारत ने अमेरिका, नाइजीरिया, और ब्राजील से आयात बढ़ाकर संतुलन बनाया। यह रणनीति भारत को आर्थिक और रणनीतिक लाभ दे रही है।
क्या होगा ट्रंप की धमकी का असर
ट्रंप की धमकी भारत के लिए नई चुनौती ला सकती है। अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगी अक्सर भारत और चीन पर रूस से तेल और हथियार खरीदने का आरोप लगाते हैं। उनका कहना है कि इससे रूस को यूक्रेन के खिलाफ युद्ध के लिए पैसा मिलता है। लेकिन, भारत ने हमेशा अपनी विदेश नीति में संतुलन बनाए रखा है। भारत न तो पूरी तरह पश्चिमी देशों पर निर्भर है, न ही रूस को छोड़ने को तैयार है। भारत के लिए रूस से तेल खरीदना आर्थिक रूप से फायदेमंद है, क्योंकि रूस सस्ता तेल देता है। इसी तरह, सैन्य उपकरणों के मामले में रूस की सस्ती और विश्वसनीय आपूर्ति भारत की रक्षा जरूरतों के लिए जरूरी है।
रणनीतिक और आर्थिक कारण
भारत और रूस का रिश्ता सिर्फ हथियारों का नहीं, बल्कि रणनीतिक साझेदारी का भी है। रूस भारत को न केवल हथियार देता है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी उसका साथ देता है। शीत युद्ध के बाद भी यह रिश्ता मजबूत रहा है। रूस से हथियार खरीदने की वजह से भारत को कई बार आलोचना का सामना भी करना पड़ता है। खासकर, यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों का दबाव बढ़ा है। लेकिन, भारत की भौगोलिक और रणनीतिक स्थिति ऐसी है कि उसे अपनी रक्षा के लिए रूस जैसे भरोसेमंद साथी की जरूरत है। भारत की सीमाएं दो बड़े पड़ोसियों चीन और पाकिस्तान से लगती हैं, और इनके साथ तनाव हमेशा बना रहता है। ऐसे में, रूसी हथियार सबसे कारगर साबित होते हैं।
इसके अलावा, रूस से हथियारों की आपूर्ति में देरी या यूक्रेन युद्ध की वजह से रूस की अपनी सीमाएं भी भारत के लिए चिंता का विषय हैं। फिर भी, भारत ने रूस के साथ अपने रिश्ते को बनाए रखा है, क्योंकि इसका कोई तुरंत विकल्प नहीं है।
क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स
साउथ एशिया एक्सपर्ट माइकल कुजेलमैन कहते हैं, “भारत का रूस और फ्रांस के साथ “नो-ड्रामा” रिश्ता है, जो अमेरिका के साथ अक्सर तनावपूर्ण रहता है। ट्रंप की व्यापार धमकियों के चलते भारत-अमेरिका रिश्तों पर सवाल उठे, खासकर जब ट्रंप ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत-पाकिस्तान तनाव में हस्तक्षेप किया। उनका मानना है कि भारत को रूस के साथ रिश्ता बनाए रखना चाहिए, क्योंकि वह भरोसेमंद है।”
आर्थिक हथियार की तरह इस्तेमाल
वहीं विदेश मामलों के जानकार, ब्रह्मा चेल्लानी भी इस बात से इत्तेफाक रखते हैं, वह कहते हैं, “ट्रंप की धमकियां दिखाती हैं कि अमेरिका रणनीतिक सुरक्षा में भरोसेमंद नहीं है। भारत को रूस के साथ सैन्य और तेल संबंध बनाए रखने चाहिए, क्योंकि यह दीर्घकालिक हितों के लिए जरूरी है।”
वह आगे कहते हैं, “पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत के सामानों पर 25% आयात शुल्क (टैरिफ) लगाने और रूस से तेल खरीद जारी रखने पर सजा के तौर पर अतिरिक्त टैक्स लगाने के फैसले से दोनों देशों के पहले से ही कमजोर हो चुके रिश्तों में और तनाव ला सकता है। यह अमेरिका की ओर से “सेकेंडरी टैरिफ” (दूसरे देश से व्यापार पर तीसरे देश को दंड) का पहला इस्तेमाल है, जिससे पता लगता है कि ट्रंप इसे आर्थिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं।”
वह कहते हैं, जब ट्रंप ने पहले भारत के ऑटो पार्ट्स, स्टील और एल्युमिनियम पर टैक्स लगाया था, तब भारत ने कोई कड़ा जवाब नहीं दिया। भारत ने विश्व व्यापार संगठन (WTO) को जवाबी कदमों की सूचना जरूर दी थी, लेकिन बातचीत का रास्ता चुना। लेकिन अब अमेरिका लगातार भारत के विशाल और बढ़ते बाजार में पूरी पहुंच की मांग कर रहा है, जिससे द्विपक्षीय व्यापार समझौता लंबे समय से अटका हुआ है।
झूठ बोल रहे हैं ट्रंप
ब्रह्मा चेल्लानी का कहना है कि पिछले साल भारत और अमेरिका के बीच कुल व्यापार 130 अरब डॉलर तक पहुंच गया था। इसके बावजूद ट्रंप का कहना है कि “हमने भारत के साथ वर्षों से ज्यादा व्यापार नहीं किया”, यह बयान न केवल झूठा है, बल्कि यह उनकी राजनीति में अतिशयोक्ति और भ्रम फैलाने की आदत को भी दिखाता है।
चीन के साथ उदार
चीन के साथ ट्रंप का रुख पूरी तरह बदलता रहा है। पहले जहां उन्होंने कड़ा रुख अपनाया था, वहीं अब बीजिंग में एक समझौते और राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात के लिए वह झुकाव दिखा रहे हैं। उन्होंने ताइवान के राष्ट्रपति लाई चिंग-टे पर भी दबाव डाला कि वह अपनी अमेरिका यात्रा को रद्द करें। आखिरकार, लाई ने अपनी पूरी लैटिन अमेरिका यात्रा ही रद्द कर दी।
यह कोई संयोग नहीं है कि अमेरिका के निशाने पर अब ब्राज़ील, भारत और दक्षिण अफ्रीका जैसे स्वतंत्र और उभरते लोकतांत्रिक देश हैं, जो ग्लोबल साउथ (दक्षिणी दुनिया) का प्रतिनिधित्व करते हैं। अमेरिका की “या तो हमारे साथ या हमारे खिलाफ” वाली सोच एक बार फिर उसकी विदेश नीति के केंद्र में आ रही है।
लेकिन ट्रंप का यह दबाव और धमकी का तरीका इन देशों पर काम करने वाला नहीं है। ये देश अपनी विदेश नीति और कारोबारी फैसले स्वतंत्र रूप से लेते हैं और किसी भी बड़े देश की धमकी से डरकर अपनी रणनीति नहीं बदलने वाले हैं।
Dhanush and Bofors in Drass. Photo By Raksha Samachar
Shaktibaan Artillery Regiments: थल सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस की 26वीं वर्षगांठ के मौके पर भारतीय सेना के मॉर्डनाइजेशन को लेकर कई बड़े एलान किए। सेना प्रमुख ने एलान किया कि थलसेना को फ्यूचर रेडी फोर्स बनाने के लिए ‘रुद्र’ ऑल-आर्म्स ब्रिगेड, ‘भैरव’ लाइट कमांडो बटालियन, ‘शक्तिबाण’ आर्टिलरी रेजीमेंट, ‘दिव्यास्त्र’ बैटरियों, ड्रोन से लैस इन्फेंट्री बटालियनों और स्वदेशी एयर डिफेंस सिस्टम की फॉर्मेशन की जा रही है। इनमें से शक्तिबाण रेजीमेंट भारतीय सेना की मॉडर्न वॉरफेयर स्ट्रेटेजी का हिस्सा है, जिसमें नई टेक्नोलॉजी और हथियारों को शामिल किया जाएगा। आइए, इसे आसान भाषा में समझते हैं कि यह रेजीमेंट क्या है और यह कैसे काम करेगी।
Shaktibaan Artillery Regiments: क्या है शक्तिबाण रेजीमेंट?
11.5 लाख जवानों वाली भारतीय सेना अब ‘शक्तिबाण’ आर्टिलरी रेजीमेंट की फॉर्मेशन कर रही है, जिसमें सर्विलांस के लिए ‘दिव्यास्त्र’ और लोइटरिंग म्यूनिशन बैटरियों शामिल होंगी। इसके साथ ही, दुनिया भर में जिस तरह से ड्रोन टेक्नोलॉजी की मांग बढ़ रही है, उसे देखते हुए, सेना की लगभग 400 इन्फेंट्री बटालियनों को चरणबद्ध तरीके से ड्रोन प्लाटून से लैस किया जाएगा। हर शक्तिबाण रेजीमेंट में एक ‘कंपोजिट बैटरी’ होगी, जिसमें ये सभी तकनीकें शामिल होंगी। इसका मतलब है कि इस रेजीमेंट में न केवल पारंपरिक आर्टिलरी भी शामिल होगी, बल्कि मॉडर्न वॉरफेयर की जरूरतों को पूरा करने के लिए ड्रोन और दूसरी टेक्नोलॉजी का भी इस्तेमाल करेगी।
क्यों जरूरत पड़ी Shaktibaan Regiments बनाने की?
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जब पाकिस्तान ने ड्रोन के जरिये भारत में घुसपैठ करने और गोपनीय जानकारी जुटाने की कोशिश की, तो भारतीय सेना को यह एहसास हुआ कि अब सिर्फ पारंपरिक हथियारों और तकनीकों से काम नहीं चलेगा। अब युद्ध के तरीके बदल चुके हैं और दुश्मन नई तकनीकों का इस्तेमाल कर रहा है। इसी चुनौती का सामना करने के लिए सेना में ‘शक्तिबाण’ जैसी आधुनिक रेजीमेंट की जरूरत महसूस हुई।
इसके साथ ही, चीन और पाकिस्तान दोनों मिल कर जिस तरह से साजिशें रच रह रहे हैं, यह भारत के लिए दोहरी चुनौती बन चुकी है। ऐसे में सेना को दोनों सीमाओं पर एक साथ तैयार रहना होता है। इसलिए अब ऐसी रेजीमेंट्स की जरूरत है जो तेजी से जवाब दे सकें, सटीक हमला कर सकें और ड्रोन जैसे नए खतरों का मुकाबला कर सकें। ‘शक्तिबाण’ रेजीमेंट इसी नई सोच और जरूरत का हिस्सा है।
क्या करेगी शक्तिबाण रेजीमेंट?
भारतीय सेना की ‘शक्तिबाण रेजीमेंट’ एक नई और खास तरह की आर्टिलरी यूनिट होगी, जिसे भविष्य के युद्धों की जरूरतों को देखते हुए तैयार किया गया है। इसका मकसद सेना को और ताकतवर, तेज और तकनीकी रूप से आधुनिक बनाना है।
1. ड्रोन से जंग की तैयारी:
रूस और यूक्रेन संघर्ष में देखा गया कि कैसे ड्रोन से सैन्य ठिकानों, टैंकों, रडार और सैनिकों को सटीक निशाना बनाकर नष्ट किया जा सकता है। भारत भी इसी दिशा में अपनी क्षमताओं को बढ़ा रहा है। शक्तिबाण रेजीमेंट न केवल ड्रोन हमले करेगी, बल्कि दुश्मन के ड्रोन को भी जाम, कन्फ्यूज या नष्ट करने में भी सक्षम होगी। इसमें ऐसे रडार और सेंसर लगाए जाएंगे, जो जो दुश्मन के ड्रोनों को ढूंढ कर उन्हें मार गिरा सकें। साथ ही, यह रेजीमेंट अपने खुद के ड्रोनों से दुश्मन की गतिविधियों पर निगरानी भी रखेगी और जरूरत पड़ने पर हमला भी करेगी।
2. ‘लॉइटर म्यूनिशन’ का इस्तेमाल:
लॉइटर म्यूनिशन एक ऐसा हथियार होता है जो उड़ता रहता है और जब सही मौका मिलता है, तब लक्ष्य पर हमला करता है। इसे ‘उड़ता हुआ बम’ कहा जा सकता है। शक्तिबाण रेजीमेंट के पास ये हथियार होंगे जो दुश्मन के छिपे ठिकानों पर अचानक हमला करने में मदद करेंगे।
3. नेटवर्क वॉरफेयर पर फोकस:
इस रेजीमेंट की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह केवल पारंपरिक आर्टिलरी रेजीमेंट नहीं होगी, बल्कि इसमें ड्रोन, सेंसर, सेटेलाइट लिंक और कंप्यूटर आधारित सिस्टम होंगे जो एक-दूसरे से कनेक्ट होंगे। इसका मतलब है कि पूरी रेजीमेंट एक नेटवर्क की तरह काम करेगी, जिससे जंग के मैदान में कहीं से भी फुर्ती और सटीक हमले किए जा सकेंगे। इस रेजीमेंट को इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह भारतीय सेना की बाकी टुकड़ियों से भी रीयल-टाइम (तत्काल) डेटा शेयर कर सके। उदाहरण के लिए, जब कोई ड्रोन किसी दुश्मन के ठिकाने का पता लगाएगा, तो उसकी जानकारी तोपों या मिसाइल यूनिट्स को तुरंत मिल जाएगी और वे सटीक हमला कर सकेंगी। इससे युद्ध के मैदान में तुरंत फैसला लिया जा सकेगा।
इसके अलावा, यह रेजीमेंट भारत के पहाड़ी और हाई एल्टीट्यूड इलाकों में भी काम करने में सक्षम होगी, जहां पारंपरिक हथियारों और सैनिकों की सीमाएं होती हैं।
Photo By Raksha Samachar
स्वदेशी हथियार होंगे शामिल
शक्तिबाण रेजीमेंट में इस्तेमाल होने वाले ज्यादातर हथियार, तकनीक और सिस्टम भारत में ही बनाए गए हैं। इससे एक तरफ सेना की ताकत बढ़ेगी और दूसरी तरफ देश की आत्मनिर्भरता को भी बढ़ावा मिलेगा। मिसाइल सिस्टम से लेकर काउंटर-ड्रोन टेक्नोलॉजी तक, सब कुछ ‘मेक इन इंडिया’ के तहत तैयार किया जाएगा।
शक्ति, सटीकता और रफ्तार होगी पहचान
शक्तिबाण रेजीमेंट दरअसल तीन सिद्धांतो पर काम करेगी। शक्ति यानी भारी मारक क्षमता, सटीकता यानी बिल्कुल निशाने पर हमला करने की ताकत, और रफ्तार यानी बेहद तेजी से प्रतिक्रिया देने की क्षमता। यही तीन बातें इसे दुश्मनों के घातक बना देती हैं। यह एक ऐसी आर्टिलरी यूनिट है जो आज के जमाने के नए तरह के खतरों का तुरंत और सही जवाब दे सकती है। अगर दुश्मन ड्रोन के झुंड भेजता है, इलेक्ट्रॉनिक तरीकों से सिस्टम को गड़बड़ करने की कोशिश करता है, या अचानक हमला करता है, तो शक्तिबाण रेजीमेंट उसे उसी समय रोकने और मुंहतोड़ जवाब देने में पूरी तरह सक्षम होगी।
सेना में अभी तकरीबन 250 से ज्यादा ब्रिगेड्स हैं। इनमें से हर एक ब्रिगेड में लगभग 3,000 सैनिक होते हैं। पहले ये ब्रिगेड्स अलग-अलग काम के लिए होती थीं। जैसे कोई इन्फैंट्री यानी पैदल सेना की थी, कोई टैंकों की, कोई तोपों की। लेकिन अब इन्हें मिलाकर एक साथ लड़ने लायक बनाया जा रहा है। इसका मतलब है कि एक ही ब्रिगेड में अब पैदल सैनिक, टैंक, तोप, ड्रोन और स्पेशल फोर्स सब होंगे। इनके साथ जरूरत के मुताबिक सामान पहुंचाने वाली टीम और तकनीकी मदद भी दी जाएगी।
पहले ये अलग-अलग ब्रिगेड्स सिर्फ युद्धाभ्यास या असली जंग के समय साथ आती थीं। लेकिन अब जो ‘रुद्र ब्रिगेड्स’ बन रही हैं, वे हमेशा एक साथ तैनात रहेंगी और सीमावर्ती इलाकों में खास ऑपरेशन के लिए तैयार रहेंगी। इस योजना को मंजूरी मिल चुकी है और दो ‘रुद्र ब्रिगेड्स’ पहले ही बन चुकी हैं।
यह बदलाव उस बड़ी योजना का हिस्सा है, जिसमें सेना की कुछ यूनिट्स को पूरी तरह तैयार ‘इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप्स’ में बदला जाना है। इन ग्रुप्स में 5,000 से 6,000 सैनिक होंगे और इनके पास हर तरह की लड़ाई के लिए जरूरी ताकत होगी। जैसे इन्फैंट्री, टैंक, आर्टिलरी, एयर डिफेंस, सिग्नल और इंजीनियरिंग टीमें। इनका नेतृत्व मेजर जनरल जैसे सीनियर अफसर करेंगे। हालांकि इस बड़े प्रस्ताव को सरकार की अंतिम मंजूरी अभी बाकी है।
Tiger Hill from Sando Top. Photo By Raksha Samachar
Sando Top in Drass: हाई एल्टीट्यूड इलाके द्रास में जहां सांस लेना भी चुनौती है, वहां सैंडो टॉप जैसी सैन्य चौकी पर जवान 24 घंटे तैनात रहते हैं। यह ऐसी जगह है जहां दुश्मन की नजर सीधे इस टॉप पर हमेशा बनी रहती है। 14200 फीट की ऊंचाई पर स्थित सैंडो टॉप, टाइगर हिल के बिल्कुल नजदीक है। टाइगर हिल लद्दाख की लाइफलाइन यानी श्रीनगर-लेह राजमार्ग (नेशनल हाइवे-1) की सुरक्षा में अहम भूमिका निभाती है। यह वही जगह है, जहां 1999 के कारगिल युद्ध में भारतीय सेना ने अपने अदम्य साहस से तिरंगा फहराया था। कारगिल विजय दिवल 2025 के दौरान रक्षा समाचार को सैंडो टॉप तक जाने का मौका मिला।
Sando Top in Drass: सैंडो टॉप की ऊंचाई 14 हजार फीट
द्रास से सैंडो टॉप पहुंचना आसान नहीं है। द्रास लगभग 10,800 फीट की ऊंचाई पर है, जबकि सैंडो टॉप की ऊंचाई 14 हजार फीट से ज्यादा है। सैंडो टॉप तक पहुंचने के लिए कोई पब्लिक ट्रांसपोर्ट नहीं उपलब्ध है। सैंडो टॉप द्रास सेक्टर का हिस्सा है, और यह इलाका सेना की कड़ी निगरानी में आता है। सैंडो टॉप तक पहुंचने के लिए पक्की सड़क बनाने का काम जारी है। लेकिन कई जगह रास्ता उबड़-खाबड़ है। लेकिन पूरा रास्ता चढ़ाई वाला है। हमें बताया गया कि सर्दियों में यह रास्ता पूरी तरह से बर्फ से ढक जाता है और द्रास से बिल्कुल कट जाता है। लगभग एक घंटे का सफर तय करके हम सैंडो टॉप पहुंचे।
माइनस 40 डिग्री तक पहुंच जाता है तापमान
सैंडो टॉप पर पहुंचते ही ऑक्सीजन की कमी महसूस होने लगी। यहां पहुंचते ही सबसे पहले सामना तेज चलती हवा से हुआ। यहां मौसम पल भर में बदल जाता है। थोड़ा चलते ही सांस फूलने लगती है। अंदाजा लगा सकते हैं कि कैसे इन मुश्किल हालात में हमारी सेना के जवान यहां तैनात रहते हैं। यहां से पूरा द्रास नजर आता है। यहां से श्रीनगर-लेह राष्ट्रीय राजमार्ग (NH-1) पूरी तरह से नजर आता है, जो लद्दाख की लाइफलाइन भी है। इसी लाइफलाइन को काटने के लिए पाकिस्तानी सेना ने कारगिल की चोटियों को पर कब्जा किया था। सर्दियों में यहा तापमान माइनस 40 डिग्री तक पहुंच जाता है और 15 फीट तक बर्फ जम जाती है। आगे की चौकियां (फॉरवर्ड पोस्ट) 7-8 महीनों के लिए पूरी तरह कटऑफ हो जाती हैं। इन चौकियों के लिए जरूरी सामान राशन, ईंधन और दवाइयों जैसी जरूरी चीजों को पहले ही जमा कर लिया जाता है, ताकि सैनिकों को कोई कमी न हो।
“ये दिल मांगे मोर”
सैंडो टॉप से 17000 फीट ऊंची टाइगर हिल बिल्कुल सामने दिखाई देती है। हालांकि द्रास से भी टाइगर हिल दिखती है, लेकिन कई पहाड़ियों के बीच उसे पहचान पाना मुश्किल होता है। हालाकिं लामोचेन व्यू प्वाइंट से भी टाइगर हिल दूर से दिखाई देती है। लेकिन वहां से उसकी कठिन चढ़ाई का अंदाजा लगा पाना मुश्किल होता है। सैंडो टॉप पहुंचने के बाद अहसास हुआ कि भारतीय सेना से कैसे इस दुश्कर कार्य का अंजाम दिया होगा। टाइगर हिल सिर्फ एक पहाड़ी नहीं है। बल्कि ये वो युद्धक्षेत्र है, जहां हमारे जवानों ने असंभव को संभव कर दिखाया। ठंड में ठिठुरते हुए, दुश्मन की गोलियों का सामना करते हुए हमारे देश के जवानों नामुमकिन हालातों से लड़कर भारत का तिरंगा बुलंद रखा। यही वह जगह है जहां कैप्टन विक्रम बत्रा ने बोला था “ये दिल मांगे मोर।”
Sando Valley View. Photo By Raksha Samachar
एक कंपनी करती थी 126 किलोमीटर LoC की निगरानी
कारगिल युद्ध से पहले सर्दियां आते ही यहां बनीं भारतीय पोस्टें खाली कर दी जाती थीं। जिसे सेना की भाषा में विंटर वैकेटेड पोस्ट कहा जाता है। इस दौरान लगभग छह महीने के लिए हमारे जवान नीचे मैदान में आकर मोर्चा संभालते थे। उस समय लगभग 120 जवानों की एक कंपनी 126 किलोमीटर लंबी लाइन ऑफ कंट्रोल की निगरानी करती थी। वहीं इसी तरह पाकिस्तानी सेना नॉर्दर्न लाइट इन्फैंट्री (एनएलआई) भी सर्दियों में अपनी ऊंचाई वाली पोस्ट खाली करके नीचे आ जाती थी। कहा जा सकता है कि यह एक अघोषित समझौता था, जो सालों से चला आ रहा था। वहीं जनरल मुशर्रफ ने साजिश रची और इसका फायदा उठाते हुए पाकिस्तानी सेना ने चुपचाप यहां की ऊंची चोटियों पर कब्जा कर लिया।
घातक प्लाटून ने टाइगर हिल पर किया था कब्जा
उस समय यहां 16 ग्रेनेडियर और 8 सिख तैनात थी 121 इन्फैंट्री ब्रिगेड का हिस्सा थी। लेकिन घुसपैठियों के भेष में आए पाकिस्तानी सैनिकों को भगाने में नाकामयाब रही और काफी जानोमाल का नुकसान उठाऩा पड़ा। जिसके बाद उस समय कर्नल रहे खुशाल सिंह ठाकुर (अब रिटायर्ड ब्रिगेडियर के नेतृत्व में 18 ग्रेनेडियर यहां पहुंची। उन्होंने सैंडो टॉप जाकर दुश्मन की टोह ली और टाइगर हिल पर हमले की योजना बनाई। टाइगर हिल पर कब्जे में 18 ग्रेनेडियर की घातक प्लाटून का अहम योगदान रहा। हाड़ जमा देने वाली ठंडी हवाएं, सीधी खड़ी चट्टानें और दुश्मन की गोलीबारी के बीच लेफ्टिनेंट बलवान सिंह (अब कर्नल) के नेतृत्व में घाटक प्लाटून ने टाइगर हिल की मुश्किल चढ़ाई शुरू की। इसमें ग्रेनेडियर योगेंद्र यादव जैसे वीर भी शामिल थे। रात के अंधेरे में, दुश्मन की भारी गोलीबारी के बीच, इन जवानों ने खड़ी चट्टानों को पार कर हमला शुरू किया। यह वही हमला था जिसने दुश्मन की ताकत तोड़ दी। ग्रेनेडियर योगेंद्र यादव को 15 गोलियां लगीं। उन्हें दो ग्रेनेड हमलों में भी चोटें लगीं। अपनी जान की परवाह न करते हुए टाइगर हिल पर तिरंगा फहराने में अहम भूमिका निभाई और इसके लिए उन्हें परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।
Point 5353 and Aftab Gap occupied by Pakistan. Photo By Raksha Samachar
पाकिस्तान चाह कर भी कुछ नहीं कर सकता
खैर बात सैंडो टॉप की करते हैं, तो सैंडो टॉप चारों दिशाओं से रिज से घिरा हुआ है। सामने की तरफ तीन रिज हैं, जिनमें टाइगर हिल रिज, त्रिशूल रिज और मार्पोला रिज। इन रिजों से ही लाइन ऑफ कंट्रोल भी गुजरती है। मार्पोला रिज में भारत और पाकिस्तान दोनों की सैन्य चौकियां हैं, और इसमें सबसे ऊंचा बिंदु है पॉइंट 5353, जो अभी भी पाकिस्तान के कब्जे में है। इस बिंदु से कुछ ही दूरी पर भारतीय पोस्ट भी मौजूद हैं। यहां दोनों सेनाएं आमने-सामने हैं। पॉइंट 5353 के नीचे थोड़ी दूरी पर भारतीय सेना की ज्ञान चौकी मौजूद है। पॉइंट 5353 के बगल में आफताब गैप है, जिस पर पाकिस्तान का कब्जा है। उसके बगल में पॉइंट 5240, पॉइंट 5130, पॉइंट 5100 हैं, जहां पर भारत बैठा है। भारतीय सेना ने पॉइंट 5353 की इस तरह से घेराबंदी कर रखी है कि यहां पाकिस्तान चाह कर अब कुछ नहीं कर सकता।
साफ दिखाई देती है हमारी गतिविधि
त्रिशूल रिज की ओर एलओसी की दूरी करीब 8 किलोमीटर है, जबकि मार्पोला रिज की तरफ से पॉइंट 5353 से केवल 1 किलोमीटर से भी कम है। इसका मतलब है कि यहां हम जो भी गतिविधि कर रहे हैं, वह दुश्मन साफ-साफ देख सकता है। इसीलिए सेना की हर गतिविधि बेहद अनुशासित और रणनीतिक तरीके से होती है। हमें बताया गया कि सैंडो टॉप पर हमारी हर गतिविधि को दुश्मन साफ देख सकता है। यही वजह है कि यहां फोटोग्राफी पर सख्त पाबंदी है।
सैंडो टॉप की ऊंचाई और उसकी रणनीतिक स्थिति इसे बेहद संवेदनशील बनाती है। यहां हर कदम पर सतर्कता बरतनी पड़ती है। हमें बताया गया कि कुछ जगहें, जैसे पॉइंट 5353, नक्शे पर नहीं दिखाई देतीं और इन्हें सिर्फ लैंडमार्क के जरिए ही पहचाना जा सकता है। हमने बाइनोकुलर के जरिए रिज और चौकियों की स्थिति समझी। यहां से टाइगर रिज और ईस्टर्न रिज जैसे इलाके साफ दिखाई देते हैं, लेकिन कुछ हिस्से इतने संवेदनशील हैं कि उनकी जानकारी गोपनीय रखी जाती है।
26 साल बाद भी सेना की मजबूत मौजूदगी
1999 के मुताबले सैंडो टॉप पर अब बिजली की सुविधा है और हाई-स्पीड इंटरनेट भी उपलब्ध है। यह देखकर हैरानी होती है कि इतनी ऊंचाई पर, जहां सांस लेना मुश्किल है, वहां इंटरनेट की स्पीड शहरों जैसी है। लेकिन इन सुविधाओं के बावजूद, मौसम यहां का सबसे बड़ा दुश्मन है। जब हम सैंडो टॉप पहुंचे, धूप खिली थी। लेकिन 30 मिनट के भीतर ही मौसम ने ऐसी करवट ली कि काले बादल छा गए और तेज हवाएं चलने लगीं। ऐसा लगा कि अगर ज्यादा देर बाहर खड़े रहे तो हवा हमें उड़ा ले जाएगी।
सैंडो टॉप पर अब भारतीय सेना साल भर इन चौकियों पर डटी रहती है। सैंडो टॉप और आसपास की रिज पर सेना की मजबूत तैनाती है। टाइगर रिज, ईस्टर्न रिज और अन्य फर्म बेस कॉम्प्लेक्स 1999 के बाद से और मजबूत किए गए हैं। सेना की एक कंपनी अब छोटे-छोटे हिस्सों में बंटकर इलाके की सुरक्षा करती है। अब एक कंपनी को सिर्फ 13 किलोमीटर की एलओसी की जिम्मेदारी दी जाती है, जिससे किसी भी खतरे का तुरंत जवाब दिया जा सकता है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी सैंडो टॉप पर पाकिस्तान की तरफ से रेकी के लिए ड्रोन आए थे, लेकिन हमारे एयर डिफेंस सिस्टम ने उन्हें नाकाम कर दिया।
Dhanush Artillery Guns: भारतीय सेना ने कुछ साल पहले ही स्वदेश में बनी धनुष तोप को अपनी आर्टिलरी रेजीमेंट में शामिल किया है। जिसके बाद सेना की आर्टिलरी पावर में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है। लद्दाख और चीन-पाकिस्तान की सीमाओं पर स्वदेशी ‘धनुष’ तोप की तैनाती अब भारतीय सेना की ताकत बनेगी। दरअसल 1980 के दशक में स्वीडन से बोफोर्स FH77B हॉवित्जर की खरीद के बाद बरसों तक बोफोर्स भ्रष्टाचार घोटाला लंबे समय तक सेना की रक्षा खरीद प्रक्रिया को प्रभावित करता रहा। जिसके चलते लंबे समय तक सेना की आर्टिलरी क्षमता को मॉर्डेनाइज नहीं किया जा सका। वहीं भारत ने इसके बाद फैसला किया वह विदेशी खरीद पर निर्भर न रह कर स्वदेश में ही हथियार बनाएगा। द्रास स्थित कारगिल बैटल स्कूल में हमें धनुष गन को नजदीक से देखने का मौका मिला, जहां इन सभी का ट्रायल और ट्रेनिंग दी जाती है और सैनिकों को हाई एल्टीट्यूड वॉरफेयर के लिए तैयार किया जाता है।
— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) July 26, 2025
Dhanush Artillery Guns: बोफोर्स से आगे निकली ‘धनुष’
भारतीय सेना की आर्टिलरी क्षमता में इजाफे की शुरुआत बोफोर्स तोप से हुई थी, जिसे 1986 में स्वीडन से 1.4 बिलियन अमेरिकी डॉलर की कीमत में खरीदा गया था। बोफोर्स FH77B तोप 39-कैलिबर की बैरल और करीब 27 किलोमीटर तक मार करने में सक्षम है। वहीं, बोफोर्स घोटाले के बाद भारत ने रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को प्राथमिकता देते हुए 2000 के दशक की शुरुआत में ‘फील्ड आर्टिलरी रेशनलाइजेशन प्लान (FARP)’ की शुरुआत की। इसका उद्देश्य पुराने हथियारों को हटाकर 2030 तक 3,000 से 4,000 नई 155 मिमी/52 कैलिबर की तोपों से सेना को लैस करना था। बता दें कि धनुष एक 155 मिमी/45 कैलिबर की होवित्जर (howitzer) तोप है, जिसे बोफोर्स की टेक्नोलॉजी को आधार बनाकर एडवांस बनाया गया है।
स्वदेशी निर्माण और आत्मनिर्भरता की मिसाल
भारतीय आयुध निर्माणी बोर्ड (OFB) जिसे अब अब AWEIL (Advanced Weapons and Equipment India Ltd) के नाम से जाना जाता है, उसने बोफोर्स के डिजाइन को रिवर्स-इंजीनियर करके ‘धनुष’ तोप को बनाया है। यह तोप जबलपुर की गन कैरेज फैक्ट्री में बनाई जा रही है और इसमें 81% स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल हुआ है, जिसे भविष्य में 90% तक बढ़ाने का लक्ष्य है। धनुष तोप को 2016-17 में भारतीय सेना के लिए उत्पादन के लिए मंजूरी मिली। पहली धनुष तोप को आधिकारिक रूप से 2019 में सेना में शामिल किया गया, और तब से इसका उत्पादन जबलपुर के गन कैरिज फैक्ट्री में चल रहा है।
तकनीकी खूबियों से है लैस
वहीं इस तोप में बोफोर्स की सारी खूबियां तो हैं ही, बल्कि यह एडवांस टेक्नोलॉजी से भी लैस है। धनुष तोप 38 किलोमीटर तक सटीक फायर कर सकती है, जो बोफोर्स से 11 किलोमीटर ज्यादा है। इसके अलावा इसमें इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम, मजल वेलोसिटी रडार (गोली की रफ्तार नापने वाला यंत्र), और कम्प्यूटर-आधारित निशाना लगाने की टेक्नोलॉजी है, जिससे निशाना लगाने का समय 30 मिनट से घटकर 2 मिनट हो जाता है। भारतीय सेना के पीआरओ कर्नल अरविंद के मुताबिक, “धनुष की सटीकता (accuracy) और समय पर फायरिंग क्षमता ने युद्ध के मैदान में हमारी ताकत को कई गुना बढ़ा दिया है। यह आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक मजबूत कदम है।”
ऑपरेशन सिंदूर में शानदार प्रदर्शन
सूत्रों ने बताया, “धनुष ने ऊंचाई वाले क्षेत्रों में दुश्मन के ठिकानों पर सटीक प्रहार किए और ‘शूट एंड स्कूट’ (मारो और हटो) रणनीति में खुद को साबित किया।” नी दुश्मन की जवाबी कार्रवाई से पहले जगह बदलने की क्षमता रखती है। इसकी सेल्फ-प्रोपल्शन क्षमता (खुद चलने की क्षमता) इसे युद्ध के बाद जल्दी स्थान बदलने में मदद करती है, जो कि पहाड़ी युद्धक्षेत्रों में अत्यंत आवश्यक होता है। यानी यह तेजी से हमला कर खुद को सुरक्षित करने में सक्षम है।
Dhanush Gun: Photo By Raksha Samachar
114 तोपों की होनी है तैनाती
भारतीय सेना के पीआरओ कर्नल निशांत अरविंद के अनुसार, “1999 के कारगिल युद्ध में बोफोर्स ने शानदार प्रदर्शन किया था, और आज भी वह हमारे तोपखाने का हिस्सा है। लेकिन धनुष, जो कि भारत में पूरी तरह से बनी है, उससे भी आगे की क्षमताएं रखती है।” उन्होंने बताया कि धनुष एक 155 मिमी, 45 कैलिबर की लंबी बैरल वाली तोप है, जिसकी रेंज बोफोर्स से कहीं अधिक है। कर्नल निशांत अरविंद के मुताबिक, सेना की एक रेजिमेंट में पहले ही 18 धनुष तोपें शामिल हो चुकी हैं, और कुल 114 तोपों की तैनाती चीन और पाकिस्तान की सीमाओं पर प्रस्तावित है। बता दें कि भारतीय सेना में वर्तमान में लगभग 410 बोफोर्स FH-77B तोपें हैं। जिन्हें 10,000-13,000 फीट की ऊंचाई पर तैनात किया गया है।
आर्टिलरी मॉर्डेनाइजेशन में तेजी
सेना का ‘फील्ड आर्टिलरी रेशनलाइजेशन प्लान’ (FARP) पहले से ही चालू है, जिसके तहत 2030 तक लगभग 3000–4000 नई 155mm तोपों को शामिल किया जाना है। इस योजना के तहत AWEIL अब 52-कैलिबर टोड आर्टिलरी गन परियोजना की तैयारी कर रहा है। जिसके तहत 45 कैलिबर से 52 कैलिबर तोपों की ओर आगे बढ़ रहा है। कर्नल निशांत ने बताया, “अब हम मास फायरिंग (भारी संख्या में गोले दागना) की बजाय प्रिसीजन फायरिंग (सटीक निशाना) पर ध्यान दे रहे हैं। इससे सैन्य प्रभावशीलता तो बढ़ेगी ही, साथ ही गोला-बारूद की बचत भी होगी।”
वहीं, भारत अब धनुष की सफलता से उत्साहित हो कर अन्य स्वदेशी परियोजनाओं पर फोकस कर रहा है। दक्षिण कोरियाई तकनीक पर आधारित K9 वज्र को अब भारत में ही बनाया जा रहा है। इसके अलावा सेना अब 155mm/52 कैलिबर वाली नई ‘माउंटेड गन सिस्टम’ और ‘एडवांस टोइड आर्टिलरी गन सिस्टम (ATAGS)’ पर भी काम कर रही है। इससे भारत न केवल आत्मनिर्भर बनेगा, बल्कि भविष्य की किसी भी जंग के लिए तकनीकी रूप से तैयार भी रहेगा।
नेटवर्क युद्ध के लिए है तैयार
खास बात यह है कि धनुष को Army’s Artillery Combat Command and Control System (ACCCS) से जोड़ा गया है, जिससे सेना के सभी आर्टिलरी इक्विपमेंट्स एक नेटवर्क से जुड़ते हैं और युद्ध के दौरान रियल टाइम डाटा साझा करते हैं। यह भारतीय सेना की नेटवर्क वारफेयर का हिस्सा है। इसमें K9 वज्र तोप और माउंटेड दृष्टि सिस्टम भी शामिल हैं।
कारगिल युद्ध से लिया बड़ा सबक
कारगिल सेक्टर अब पहले से कहीं ज्यादा आधुनिक हथियारों और वाहनों से लैस है। अगर 1999 में भारतीय सेना के पास सीमित हथियार थे, तो आज भारतीय सेना 1999 की तुलना में कहीं अधिक ताकतवर और तकनीकी रूप से एडवांस है। कारगिल युद्ध ने भारत को अपनी रक्षा तैयारियों में कमियों को पहचानने का मौका दिया। उस समय की चुनौतियों ने भारत को स्वदेशीकरण के रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित किया। आज, धनुष और अन्य स्वदेशी हथियार उस सबक का परिणाम हैं।
Photo By Raksha Samachar
आज भारतीय सैनिकों के पास इजरायली नेगेव लाइट मशीन गन (LMG), स्वदेशी AK-203 राइफल और अमेरिकी SIG राइफल जैसे आधुनिक हथियार हैं। बर्फीले इलाकों में ऑपरेशन के लिए सेना को पोलारिस और स्वदेशी ‘कपित ध्वज’ जैसे ऑल-टेरेन वाहन मिले हैं, जो हाई एल्टीट्यूड और ग्लेशियरों इलाकों में तेजी से मूवमेंट में मदद करते हैं।
साथ ही, सेना के पास त्रिनेत्र और फर्स्ट पर्सन व्यू (FPV) ड्रोन जैसे स्वदेशी निगरानी उपकरण हैं। इसके अलावा Asteria AT-15 जैसे सिस्टम भी दुश्मन की हर हरकत पर नजर रखने में मदद करते हैं। यह सभी एक्विपमेंट्स कारगिल बैटल स्कूल में सक्रिय रूप से इस्तेमाल हो रहे हैं, जहां जवानों को हाई एल्टीट्यूड इलाकों में युद्ध और रणनीति की ट्रेनिंग दी जाती है। भारतीय सेना अब हर मोर्चे पर तैयार है, चाहे वह बर्फीली ऊंचाइयां हों या टेक्नोलॉजी से लैस युद्धभूमि। वहीं, धनुष जैसी तोपें भारत की इसी तैयारियों की मिसाल बन रही हैं। ये हथियार न केवल भारत की सैन्य ताकत को बढ़ाते हैं, बल्कि देश के आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता को भी दर्शाते हैं।
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