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क्या है ऑपरेशन रेंडर सेफ, जिसके लिए पहली बार पापुआ न्यू गिनी पहुंची भारतीय सेना, जहां आज भी है 80 साल पुराने बमों का खतरा

पापुआ न्यू गिनी के कई इलाकों में आज भी द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान छोड़े गए बम, मोर्टार राउंड और आर्टिलरी शेल जमीन के नीचे दबे हैं। खेती, सड़क निर्माण या घर बनाने के दौरान इनके मिलने का खतरा बना रहता है...

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📍नई दिल्ली | 21 Jun, 2026, 10:32 PM

Operation Render Safe 2026: हाल ही में भारतीय सेना ने पहली बार पापुआ न्यू गिनी में आयोजित बहुराष्ट्रीय सैन्य अभियान ऑपरेशन रेंडर सेफ-2026 में हिस्सा लिया। 15 से 19 जून तक ईस्ट न्यू ब्रिटेन प्रांत में आयोजित इस अभ्यास में भारतीय सेना बतौर पर्यवेक्षक शामिल हुई। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य बिना फटे गोला-बारूद यानी यूएक्सओ और युद्ध के बाद बचे विस्फोटक अवशेष यानी ईआरडब्ल्यू से लोगों को सुरक्षित रखना था।

भारतीय सेना की ओर से जारी जानकारी के अनुसार, इस भागीदारी का फोकस अनएक्सप्लोडेड ऑर्डनेंस यानी यूएक्सओ और एक्सप्लोसिव रेमनेंट्स ऑफ वॉर यानी ईआरडब्ल्यू से जुड़े रेकॉनिसेंस तथा डिस्पोजल ऑपरेशन पर रहा। भारतीय पर्यवेक्षक ने बहुराष्ट्रीय टीमों के साथ काम करने की प्रक्रिया, एक्सप्लोसिव ऑर्डनेंस डिस्पोजल यानी ईओडी विशेषज्ञता और अलग-अलग देशों के बीच इंटरऑपरेबिलिटी के तरीकों को देखा।

पापुआ न्यू गिनी के कई इलाकों में आज भी द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान छोड़े गए बम, मोर्टार राउंड और आर्टिलरी शेल जमीन के नीचे दबे हैं। खेती, सड़क निर्माण या घर बनाने के दौरान इनके मिलने का खतरा बना रहता है। इसी वजह से ऑस्ट्रेलिया के नेतृत्व में चलने वाले ऑपरेशन रेंडर सेफ में कई देशों की टीमें मिलकर ऐसे पुराने विस्फोटकों को खोजती हैं और उन्हें नियंत्रित तरीके से नष्ट करती हैं।

क्या है Operation Render Safe 2026

पापुआ न्यू गिनी के कई इलाकों में आज भी द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान छोड़े गए बम, मोर्टार राउंड और आर्टिलरी शेल जमीन के नीचे दबे हैं। ईस्ट न्यू ब्रिटेन का राबाउल और उसके आसपास का क्षेत्र प्रशांत युद्ध के समय एक प्रमुख सैन्य क्षेत्र रहा था। युद्ध समाप्त होने के कई दशक बाद भी खेती, सड़क निर्माण या घर बनाने के दौरान बम, मोर्टार राउंड, आर्टिलरी शेल, ग्रेनेड और अन्य विस्फोटक सामग्री मिलने की घटनाएं सामने आती रही हैं। इसी वजह से ऑस्ट्रेलिया के नेतृत्व में चलने वाले ऑपरेशन रेंडर सेफ में कई देशों की टीमें मिलकर ऐसे पुराने विस्फोटकों को खोजती हैं और उन्हें नियंत्रित तरीके से नष्ट करती हैं।

ऑपरेशन रेंडर सेफ का मकसद केवल पुराने बमों को नष्ट करना नहीं है। इस अभियान के तहत स्थानीय आबादी को ऐसे खतरनाक अवशेषों से बचाने, स्थानीय सुरक्षा एजेंसियों को ट्रेनिंग देने और विस्फोटक वस्तु मिलने पर अपनाई जाने वाली सुरक्षा प्रक्रिया के बारे में जागरूक करने पर भी काम किया जाता है।

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द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पापुआ न्यू गिनी, सोलोमन आइलैंड्स और प्रशांत महासागर के कई द्वीपों पर जापानी और मित्र राष्ट्रों की सेनाओं के बीच भीषण लड़ाई हुई थी। बड़ी संख्या में गोले और बम दागे गए थे। इनमें से कई विस्फोटक उस समय नहीं फटे और बाद में मिट्टी, जंगल या पानी के नीचे दब गए। स्थानीय लोग आज भी खेती, निर्माण कार्य, सड़क खुदाई और मछली पकड़ने के दौरान ऐसे अवशेषों के संपर्क में आ सकते हैं।

रक्षा सूत्रों के अनुसार, ऑपरेशन रेंडर सेफ में शामिल टीमें पहले संदिग्ध इलाकों की पहचान करती हैं। इसके बाद मेटल डिटेक्टर, सर्वे उपकरण और स्थानीय लोगों से मिली जानकारी के आधार पर वस्तु का पता लगाया जाता है। ईओडी विशेषज्ञ उस वस्तु की जांच करते हैं और यह तय करते हैं कि उसे वहीं नियंत्रित विस्फोट से नष्ट किया जाए या सुरक्षित स्थान पर ले जाकर डिस्पोज किया जाए। (Operation Render Safe 2026)

ईस्ट न्यू ब्रिटेन क्यों है संवेदनशील क्षेत्र

ईस्ट न्यू ब्रिटेन प्रांत का राबाउल क्षेत्र द्वितीय विश्व युद्ध में जापान के सबसे महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों में शामिल था। 1942 में जापानी सेना ने राबाउल पर कब्जा कर इसे अपने बड़े नौसैनिक और वायु सैन्य अड्डे के रूप में डेवलप किया था। यहां से जापानी सैन्य अभियान सोलोमन आइलैंड्स और दक्षिण-पश्चिम प्रशांत के कई हिस्सों तक ऑपरेट किए गए थे।

राबाउल के आसपास बड़ी संख्या में एयरफील्ड, गोला-बारूद डिपो, तटीय सुरक्षा ठिकाने और भूमिगत सुरंगें बनाई गई थीं। युद्ध के बाद कई इलाकों में छोड़ा गया सैन्य सामान वहीं रह गया। समय के साथ स्थानीय आबादी बढ़ी, खेत बने, स्कूल और घर बने, लेकिन जमीन के नीचे दबे पुराने विस्फोटकों का खतरा बना रहा।

ऑस्ट्रेलियाई डिफेंस फोर्सेस ने पहले भी ईस्ट न्यू ब्रिटेन में समुदायों के साथ संपर्क और जागरूकता कार्यक्रमों पर जोर दिया था। स्थानीय लोगों को बताया गया था कि किसी संदिग्ध धातु की वस्तु, पुराने बम या गोले जैसी चीज मिलने पर उसे छूना नहीं चाहिए और तुरंत स्थानीय प्रशासन या सुरक्षा एजेंसियों को सूचना देनी चाहिए।

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कैसे होता है ऑपरेशन

भारतीय सेना इस ऑपरेशन में ऑब्जर्वर के तौर पर शामिल हुई। इसका उद्देश्य बहुराष्ट्रीय ईओडी ऑपरेशन के प्रोसिजर को समझना और अलग-अलग देशों की सैन्य टीमों के अनुभवों से सीख लेना था।

भारतीय सेना के अनुसार, इस भागीदारी से यूएक्सओ और ईआरडब्ल्यू रेकॉनिसेंस, सेफ डिस्पोजल, टेक्निकल कॉर्डिनेशन और प्रोफेशनल मिलिट्री एक्सचेंज को बढ़ावा मिला। भारतीय पर्यवेक्षकों ने यह भी देखा कि दुर्गम इलाकों में ईओडी टीमों को किस तरह स्थानीय प्रशासन, स्वास्थ्य सेवाओं और सामुदायिक प्रतिनिधियों के साथ मिलकर काम करना पड़ता है।

ऐसे ऑपरेशन में सुरक्षा घेरा बनाना सबसे महत्वपूर्ण चरणों में शामिल होता है। किसी भी विस्फोटक वस्तु के पास जाने से पहले उसकी स्थिति, आकार, संभावित विस्फोटक क्षमता और आसपास की आबादी का आकलन किया जाता है। इसके बाद सुरक्षित दूरी तय की जाती है। यदि वस्तु को हटाना जोखिम भरा हो तो उसे उसी स्थान पर नियंत्रित विस्फोट के जरिए नष्ट किया जाता है। (Operation Render Safe 2026)

यूएक्सओ और ईआरडब्ल्यू में क्या है अंतर

यूएक्सओ यानी अनएक्सप्लोडेड ऑर्डनेंस ऐसे सैन्य गोला-बारूद को कहा जाता है जिसे फायर किया गया हो, गिराया गया हो या छोड़ा गया हो, लेकिन वह विस्फोट नहीं हुआ हो। इसमें बम, मोर्टार राउंड, आर्टिलरी शेल, रॉकेट और ग्रेनेड शामिल हो सकते हैं।

ईआरडब्ल्यू यानी एक्सप्लोसिव रेमनेंट्स ऑफ वॉर का दायरा बड़ा होता है। इसमें युद्ध के बाद बचे ऐसे सभी विस्फोटक अवशेष शामिल हो सकते हैं जो लोगों के लिए खतरा पैदा करें। इसमें बिना फटे गोले के अलावा छोड़ा गया गोला-बारूद, क्षतिग्रस्त विस्फोटक सामग्री और पुराने सैन्य भंडार भी आ सकते हैं।

पुराने विस्फोटक अक्सर देखने में जंग लगे लोहे के टुकड़े जैसे लगते हैं, लेकिन उनमें मौजूद फ्यूज और रासायनिक सामग्री कई बार बेहद संवेदनशील हो सकती है। बारिश, नमी, गर्मी, जंग और लंबे समय तक जमीन में दबे रहने से उनकी स्थिति बदल जाती है। यही वजह है कि ऐसे गोला-बारूद को सामान्य उपकरणों से हटाने की कोशिश नहीं की जाती। (Operation Render Safe 2026)

ईओडी टीम कैसे करती है काम

एक्सप्लोसिव ऑर्डनेंस डिस्पोजल टीमों का काम केवल बम निष्क्रिय करना नहीं होता। उनकी प्रक्रिया कई चरणों में चलती है। सबसे पहले रेकॉनिसेंस किया जाता है, जिसमें इलाके का सर्वे, स्थानीय लोगों से जानकारी और संदिग्ध स्थानों की पहचान शामिल होती है। इसके बाद विशेषज्ञ वस्तु की प्रकृति समझते हैं कि वह बम है, मोर्टार राउंड है, आर्टिलरी शेल है या किसी अन्य प्रकार का सैन्य विस्फोटक।

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इसके बाद जोखिम का आकलन किया जाता है। टीम देखती है कि वस्तु के आसपास घर, स्कूल, सड़क, बिजली की लाइन या पानी का सोर्स तो नहीं है। ऐसी स्थिति में नियंत्रित विस्फोट के लिए विस्फोटक चार्ज लगाया जाता है और आसपास के क्षेत्र को खाली कराया जाता है।

कुछ मामलों में विस्फोटक सामग्री को विशेष कंटेनर या सुरक्षित वाहन में रखकर अलग स्थान पर ले जाया जाता है। इस प्रक्रिया के दौरान मेडिकल सहायता, संचार व्यवस्था और इमरजेंसी इवैक्यूएशन की तैयारी भी रखी जाती है। ऑपरेशन रेंडर सेफ जैसे अभियान में यह काम जंगल, पहाड़ी और तटीय इलाकों में होता है, इसलिए लॉजिस्टिक्स भी बड़ी चुनौती होती है।

भारत के पास भी एक्सप्लोसिव ऑर्डनेंस डिस्पोजल से जुड़ी प्रशिक्षित सैन्य क्षमताएं हैं। सीमा क्षेत्रों, आतंकवाद प्रभावित इलाकों और पुराने सैन्य फायरिंग रेंज के आसपास संदिग्ध विस्फोटक सामग्री मिलने पर ऐसी विशेषज्ञ टीमें काम करती हैं। हालांकि पापुआ न्यू गिनी का ऑपरेशन अलग प्रकृति का है, क्योंकि वहां मुख्य चुनौती आठ दशक पुराने युद्धक अवशेष हैं जो बड़ी आबादी वाले क्षेत्रों के आसपास मौजूद हैं। (Operation Render Safe 2026)

स्थानीय लोगों की सुरक्षा पर फोकस

ऑपरेशन रेंडर सेफ का एक बड़ा हिस्सा सामुदायिक जागरूकता है। कई बार ग्रामीण इलाकों में बच्चे पुराने बम या गोले को धातु का टुकड़ा समझकर उठा लेते हैं। किसान खेत की खुदाई के दौरान इन्हें निकाल देते हैं। कुछ जगहों पर लोग अनजाने में ऐसे सामान को घरों के पास रख देते हैं। इसलिए ऑपरेशन के दौरान स्थानीय स्कूलों, गांवों और समुदायों को जागरूक किया जाता है। (Operation Render Safe 2026)

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