📍नई दिल्ली | 1 Jan, 2026, 3:53 PM
Indian Army Artillery: भारतीय सेना दुनिया की पहली ऐसी सेना बनने की तरफ बढ़ रही है, जो रैमजेट तकनीक से लैस 155 एमएम आर्टिलरी शेल का इस्तेमाल करेगी। इस टेक्नोलॉजी के सफल होने पर सेना की तोपों की मारक दूरी में करीब 30 से 50 प्रतिशत तक का इजाफा होगा, जबकि गोले की घातक क्षमता भी पूरी तरह बनी रहेगी।
डिफेंस सूत्रों के मुताबिक, यह प्रोजेक्ट पूरी तरह आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत डेवलप किया जा रहा है और इसमें भारतीय सेना, आईआईटी मद्रास और रक्षा अनुसंधान से जुड़े संस्थान मिलकर काम कर रहे हैं। यह तकनीक भविष्य में भारतीय आर्टिलरी की तस्वीर ही बदल सकती है।
Indian Army Artillery: आर्टिलरी को और ताकतवर बनाने पर फोकस
भारतीय सेना पिछले कुछ सालों से अपनी आर्टिलरी क्षमता को मजबूत करने पर खास फोकस कर रही है। सेना का मकसद सिर्फ ज्यादा दूरी तक मार करना नहीं है, बल्कि ज्यादा सटीकता, तेज प्रतिक्रिया और दुश्मन की काउंटर फायर से सुरक्षित रहना भी है। इसी वजह से सेना ने लंबी दूरी के रॉकेट, प्रिसिजन एम्यूनिशन और अब रैमजेट पावर्ड आर्टिलरी शेल जैसी एडवांस टेक्नोलॉजी पर काम शुरू कर दिया है।
डिफेंस सूत्रों का कहना है कि मॉडर्न वॉरफेयर में आर्टिलरी की भूमिका फिर से बेहद अहम हो गई है। रूस-यूक्रेन युद्ध ने यह साफ कर दिया है कि लंबी दूरी से सटीक और लगातार फायर करने वाली आर्टिलरी किसी भी युद्ध का रुख बदल सकती है। भारतीय सेना भी इन्हीं अनुभवों से सीख लेकर अपनी तैयारी कर रही है। (Indian Army Artillery)
Indian Army Artillery: क्या है रैमजेट तकनीक और कैसे काम करती है
रैमजेट तकनीक आम तौर पर मिसाइलों में इस्तेमाल की जाती रही है। ब्रह्मोस जैसी सुपरसोनिक मिसाइल भी इसी तकनीक पर काम करती है। अब इसी तकनीक को पहली बार आर्टिलरी शेल में इस्तेमाल करने की तैयारी हो रही है।
सूत्रों ने बताया कि इस प्रोजेक्ट पर काम साल 2020 से चल रहा है। इसमें डीआरडीओ, आईआईटी मद्रास और आर्मी टेक्नोलॉजी बोर्ड मिलकर काम कर रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में इस तकनीक के कई प्रोटोटाइप तैयार किए गए और अलग-अलग फायरिंग रेंज में उनके ट्रायल किए गए। एयरो इंडिया 2025 में इसका प्रोटोटाइप सार्वजनिक रूप से दिखाया गया था, जहां बताया गया कि रामजेट तकनीक से 155 एमएम गोले की रेंज को 60 से 80 किलोमीटर तक बढ़ाया जा सकता है। यह मौजूदा 30 से 45 किलोमीटर की रेंज के मुकाबले काफी बड़ी छलांग मानी जा रही है।
आईआईटी मद्रास के एयरोस्पेस इंजीनियरिंग विभाग से जुड़े वैज्ञानिकों के अनुसार, रैमजेट एक एयर-ब्रीदिंग इंजन होता है। इसमें न तो कोई कंप्रेसर होता है और न ही टरबाइन। यह इंजन तभी काम करता है, जब शेल पहले से तेज स्पीड में हो। जैसे ही 155 एमएम शेल को तोप से फायर किया जाता है, वह लगभग मैक-2 की रफ्तार पकड़ लेता है। इसी स्पीड पर पहुंचते ही रैमजेट इंजन एक्टिव हो जाता है। (Indian Army Artillery)
रैमजेट में आगे से आने वाली हवा खुद ही कंप्रेस हो जाती है। फिर उसमें फ्यूल जलाया जाता है, जिससे गैस फैलती है और शेल को लगातार आगे की ओर धक्का मिलता रहता है। इसका फायदा यह होता है कि शेल सिर्फ शुरुआती फायरिंग पर निर्भर नहीं रहता, बल्कि उड़ान के दौरान भी उसे अतिरिक्त ताकत मिलती रहती है। (Indian Army Artillery)
Indian Army Artillery: मौजूदा गोले में ही लग सकेगी नई तकनीक
डिफेंस सूत्रों के मुताबिक, रामजेट तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे मौजूदा 155 एमएम आर्टिलरी शेल पर ही रेट्रोफिट किया जा सकता है। यानी सेना को हर तोप के लिए अलग नया गोला विकसित करने की जरूरत नहीं होगी।
एक बार यह तकनीक पूरी तरह विकसित हो जाने के बाद इसे बोफोर्स, धनुष, के-9 वज्र, एटीएजीएस और एम-777 अल्ट्रा लाइट होवित्जर जैसी सभी 155 एमएम तोपों में इस्तेमाल किया जा सकेगा। इससे सेना को बहुत कम लागत में अपनी आर्टिलरी की क्षमता बढ़ाने का मौका मिलेगा। (Indian Army Artillery)
Indian Army Artillery: रेंज में जबरदस्त बढ़ोतरी की उम्मीद
डिफेंस सूत्र बताते हैं कि अभी भारतीय सेना की ज्यादातर 155 एमएम तोपों की प्रभावी रेंज करीब 30 से 40 किलोमीटर है। कुछ आधुनिक तोपें इससे थोड़ा ज्यादा भी मार कर सकती हैं। लेकिन रैमजेट पावर्ड शेल के आने से यही रेंज 50 से 80 किलोमीटर तक पहुंच सकती है।
कुछ अनुमानों में यह भी कहा जा रहा है कि भविष्य में इस तकनीक को और बेहतर बनाकर रेंज को 100 किलोमीटर से ज्यादा तक भी बढ़ाया जा सकता है। अगर ऐसा होता है, तो यह आर्टिलरी के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी बदलाव होगा। (Indian Army Artillery)
Indian Army Artillery: बेस-ब्लीड तकनीक से आगे
अब तक आर्टिलरी की रेंज बढ़ाने के लिए बेस-ब्लीड तकनीक का इस्तेमाल किया जाता रहा है। इसमें शेल के पीछे से गर्म गैस छोड़ी जाती है, जिससे हवा का खिंचाव कम होता है और रेंज करीब 10 से 20 फीसदी तक बढ़ जाती है। लेकिन बेस-ब्लीड से रेंज डबल करना संभव नहीं होता।
रैमजेट तकनीक इस मामले में कहीं ज्यादा प्रभावी है। इसमें शेल खुद इंजन की तरह काम करता है और लगातार थ्रस्ट देता है। यही वजह है कि इससे रेंज में 50 फीसदी या उससे ज्यादा की बढ़ोतरी संभव हो पाती है। (Indian Army Artillery)
Indian Army Artillery: सटीकता बढ़ाने पर भी फोकस
डिफेंस सूत्रों का कहना है कि जैसे-जैसे रेंज बढ़ती है, वैसे-वैसे गोले के बिखराव यानी डिस्पर्शन की समस्या भी बढ़ती है। इसी को ध्यान में रखते हुए आईआईटी मद्रास और अन्य संस्थान प्रिसिजन गाइडेंस किट पर भी काम कर रहे हैं।
भविष्य में रैमजेट पावर्ड 155 एमएम शेल में सैटेलाइट नेविगेशन आधारित गाइडेंस सिस्टम लगाया जा सकता है। इससे गोला बेहद सटीक तरीके से अपने टारगेट को निशाना बना सकेगा और सर्कुलर एरर बहुत कम हो जाएगा। (Indian Army Artillery)
Indian Army Artillery: फायरिंग रेंज में शुरुआती ट्रायल
डिफेंस सूत्रों के मुताबिक, इस प्रोजेक्ट पर काम पिछले कुछ वर्षों से चल रहा है। राजस्थान के पोखरण और ओडिशा के बालासोर जैसे फायरिंग रेंज में इसके शुरुआती ट्रायल किए गए हैं। कुछ परीक्षण पूरी तरह सफल रहे, जबकि कुछ में आंशिक दिक्कतें भी सामने आईं। लेकिन हर टेस्ट से मिले डेटा ने डिजाइन को और बेहतर बनाने में मदद की है।
करीब छह महीने पहले 76 एमएम के हाफ-स्केल मॉडल का सफल ट्रायल किया गया था। इससे यह साबित हुआ कि रैमजेट तकनीक आर्टिलरी शेल में काम कर सकती है। अब पूरा फोकस 155 एमएम शेल को पूरी तरह मैच्योर बनाने पर है।
राजस्थान के पोखरण फील्ड फायरिंग रेंज में किए गए हालिया ट्रायल्स को काफी अहम माना जा रहा है। इन परीक्षणों के बाद डिफेंस से जुड़े अधिकारियों का मानना है कि तकनीक अब लगभग स्थापित हो चुकी है और इसे ऑपरेशनल इस्तेमाल के लिए तैयार किया जा रहा है। अच्छी बात यह भी है कि यह रैमजेट पावर्ड शेल मौजूदा 155 एमएम तोपों जैसे एटीएजीएस और धनुष के साथ बिना किसी बड़े बदलाव के इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे सेना को नई तोपें खरीदे बिना ही अपनी मारक क्षमता बढ़ाने का मौका मिलेगा।
सूत्रों के मुताबिक, यह प्रोजेक्ट अब अपने आखिरी चरण में पहुंच चुका है और इसे “ऑपरेशनल होने के बेहद करीब” माना जा रहा है। हालांकि अभी कोई तय तारीख घोषित नहीं की गई है, लेकिन मौजूदा प्रगति को देखते हुए माना जा रहा है कि इन शेल्स की इंडक्शन अगले कुछ सालों में हो सकता है। हालांकि अभी तक डीआरडीओ या भारतीय सेना की ओर से कोई आधिकारिक इंडक्शन डेट का एलान नहीं किया गया है। (Indian Army Artillery)
Indian Army Artillery: चैलेंज भी हैं बहुत
हालांकि इस पूरे प्रोजेक्ट में कुछ तकनीकी चुनौतियां भी रही हैं। 155 एमएम जैसे छोटे साइज के शेल में रैमजेट इंजन को फिट करना, अत्यधिक हीट को संभालना और लंबी दूरी पर स्टेबिलिटी बनाए रखना आसान काम नहीं है। सूत्रों के मुताबिक, इन्हीं पहलुओं पर अभी आखिरी स्तर की फाइन-ट्यूनिंग चल रही है। लागत को लेकर भी आकलन किया गया है और अनुमान है कि एक रैमजेट पावर्ड शेल की कीमत करीब 20 से 25 लाख रुपये हो सकती है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विकसित इसी तरह की तकनीक से काफी सस्ती मानी जा रही है। (Indian Army Artillery)
दुनिया में पहली बार इस्तेमाल की तैयारी
सूत्रों के अनुसार, आर्टिलरी से जुड़े बड़े प्रोजेक्ट्स में समय लगना आम बात है, लेकिन रैमजेट पावर्ड शेल के मामले में प्रगति अपेक्षा से तेज मानी जा रही है। डिफेंस एक्सपर्ट्स का कहना है कि अमेरिका, नॉर्वे और कुछ अन्य देश भी रैमजेट पावर्ड आर्टिलरी पर काम कर रहे हैं, लेकिन अब तक किसी भी देश ने इसे ऑपरेशनल स्तर पर नहीं अपनाया है। ऐसे में अगर भारतीय सेना इसे पहले अपनाती है, तो यह भारत को इस क्षेत्र में वैश्विक बढ़त दिला सकता है।
सूत्रों के अनुसार, भारतीय सेना इस तकनीक को सफल बनाने के बाद भविष्य में इसे मित्र देशों को निर्यात करने की संभावना भी देख रही है। कम लागत और ज्यादा क्षमता के कारण यह भारतीय डिफेंस इंडस्ट्री के लिए भी बड़ा अवसर बन सकता है।
रैमजेट पावर्ड शेल के आने से भारतीय सेना दुश्मन की सीमा के अंदर तक टारगेट पर हमला कर सकेगी, वह भी अपनी तोपों को आगे बढ़ाए बिना। इससे सेना दुश्मन की काउंटर-बैटरी फायर से ज्यादा सुरक्षित रहेगी।
डिफेंस सूत्र बताते हैं कि चीन और पाकिस्तान दोनों ही लंबी दूरी की आर्टिलरी पर तेजी से काम कर रहे हैं। ऐसे में यह तकनीक पहाड़ी और सीमावर्ती इलाकों में भारतीय सेना को रणनीतिक बढ़त दे सकती है। (Indian Army Artillery)
आत्मनिर्भर भारत की दिशा में बड़ा कदम
इस पूरे प्रोजेक्ट की सबसे अहम बात यह है कि इसे पूरी तरह स्वदेशी तकनीक के रूप में विकसित किया जा रहा है। इसमें विदेशी निर्भरता बहुत कम है। इससे न सिर्फ सेना की जरूरतें पूरी होंगी, बल्कि देश की तकनीकी क्षमता और डिफेंस इंडस्ट्री को भी मजबूती मिलेगी।
डिफेंस सूत्रों का कहना है कि आने वाले वर्षों में यह तकनीक भारतीय आर्टिलरी की पहचान बन सकती है। अगर सब कुछ योजना के मुताबिक चलता है, तो भारत दुनिया की पहली ऐसी सेना बन जाएगी, जो रैमजेट पावर्ड 155 एमएम आर्टिलरी शेल को ऑपरेशनल रूप से इस्तेमाल करेगी। (Indian Army Artillery)


