📍नई दिल्ली | 16 Sep, 2025, 1:46 PM
MiG21 in 1965 War: अलविदा! मिग-21 सीरीज की इस कड़ी में हम बात कर रहे हैं, उस वक्त की, जब मिग को आए केवल दो साल ही हुए थे और भारत की सीमाओं पर एक दूसरे युद्ध ने दस्तक दे दी। 1962 की जंग से अभी उबर भी नहीं पाए थे कि पाकिस्तान ने भारत पर हमला बोल दिया। पाकिस्तान ने “ऑपरेशन जिब्राल्टर” शुरू किया, जिसके तहत पाकिस्तानी सैनिकों और घुसपैठियों ने जम्मू और कश्मीर में भारतीय क्षेत्र में प्रवेश कर अस्थिरता फैलानी की कोशिश की। वहीं, 65 की जंग केवल जमीनी लड़ाई तक सीमित नहीं थी, बल्कि आसमान में भी लड़ी गई थी। इसी युद्ध में पहली बार भारतीय वायुसेना ने अपने सुपरसोनिक जेट मिग-21 को जंग में उतारा। 1963 में सोवियत संघ से आए MiG-21 की भले ही इस जंग में सीमित भूमिका थी, लेकिन उनका युद्ध में उतरना ही जंग में एक अहम मोड़ साबित हुआ।
MiG21 in 1965 War: 1963 में थे केवल छह एयरक्राफ्ट
भारत ने 1962 में फ्रांसीसी मिराज-III और अमेरिकी F-104 स्टारफाइटर जैसे विमान खरीदने पर विचार किया था। लेकिन सौदा सोवियत संघ के साथ हुआ क्योंकि उन्होंने भारत को न सिर्फ विमान देने बल्कि लाइसेंस प्रोडक्शन की अनुमति भी दी। यह उस दौर में भारत के लिए आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम था।
पहले बैच के पायलट और इंजीनियर 1963 में कजाखस्तान के लुगोवाया एयरबेस में ट्रेनिंग लेकर लौटे थे और 28 स्क्वॉड्रन “द फर्स्ट सुपरसॉनिक्स” बनाई। हालांकि उस समय केवल छह मिग-21F13 (टाइप-74) विमान ही उपलब्ध थे और कोई ट्रेनर एयरक्रफ्ट भी नहीं था।
🚨 Indian Army rejects further induction of Sharang artillery guns after finding serious defects in metals & components supplied by DPSU AWEIL. A major blow to India’s artillery modernisation drive. 1/#Defence #IndianArmy #Sharang #DefenceNews #Military #AtmanirbharBharat… pic.twitter.com/mkfIOU46sH
— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) September 16, 2025
जब 1 सितंबर 1965 को पाकिस्तान की 7वीं डिवीजन और 2 टैंक रेजीमेंट ने चंब-जौरियन सेक्टर में हमला बोला। अचानक हुए इस हमले ने भारतीय 191 ब्रिगेड को चौंका दिया और उसे काफी नुकसान हुआ। पाकिस्तानी सेना के इस तेज दबाव ने भारतीय सैनिकों को मुनावर तवी नदी तक पीछे धकेल दिया। यहां भारतीय सेना ने 20 लैंसर्स की एक AMX-13 टैंक स्क्वॉड्रन और 3 महार रेजीमेंट के सहारे रीयर गार्ड एक्शन किया। इस कार्रवाई के दौरान भारतीय वायुसेना के वैम्पायर और मिस्टेयर विमानों ने भी एयर स्ट्राइक्स की, जिससे पाकिस्तानी पैटन टैंकों की रफ्तार धीमे हो गई।
पाकिस्तानी 7वीं डिवीजन के कमांडर ने तुरंत हवाई मदद मांगी। इसके जवाब में पाकिस्तान वायुसेना के F-86 सेबर जेट विमानों ने सीजफायर लाइन पार की और इस हमले के दौरान भारतीय वायुसेना के तीन पुराने वैम्पायर जेट मार गिराए।
MiG21 in 1965 War: 3 सितंबर को गिराया पहला पाकिस्तानी सेबर जेट
3 सितम्बर 1965 को इस इलाके के ऊपर एक जबरदस्त हवाई मुठभेड़ हुई। इस दौरान भारतीय वायुसेना ने अपना पहला हवाई शिकार किया। नं. 23 स्क्वॉड्रन (पैंथर्स) के फ्लाइट लेफ्टिनेंट ट्रेवर कीलर ने, विंग कमांडर जॉनी ग्रीन की अगुवाई वाले ग्नैट (Gnat) विमानों के फॉर्मेशन का हिस्सा रहते हुए, पाकिस्तान वायुसेना का एक F-86F सेबर जेट मार गिराया। यह भारतीय वायुसेना की 1965 युद्ध की पहली बड़ी हवाई सफलता थी।
हालांकि अभी तक MiG-21 जंग के मैदान में नहीं उतरे थे। 1965 तक भारतीय वायुसेना के पास मिग-21 की सीमित संख्या थी। शुरुआती स्क्वॉड्रन में पायलट नए थे और ट्रेनिंग भी पूरी तरह से नहीं हो पाई थी। इसके बावजूद तब स्थिति को संभालने के लिए मिग-21 को भी एक्टिव करना पड़ा।
MiG21 in 1965 War: पाकिस्तानी विमान लगातार कर रहे थे हमला
4 सितंबर 1965 को जौरियन-अखनूर सेक्टर में भारतीय मिग-21 पहली बार दुश्मन के खिलाफ ऑपरेशन में उतरे। जौरियां उस समय भीषण लड़ाई का केंद्र बन चुका था। पाकिस्तानी सेना की 7वीं डिवीजन भारतीय सेना पर लगातार दबाव बना रही थी। इसी बीच पाकिस्तान एयर फोर्स ने दिनभर में 31 हवाई मिशन जौरियां सेक्टर पर चलाए। सबसे बड़ा हमला पाकिस्तान एयर फोर्स के 15 स्क्वॉड्रन ‘कोब्राज’ ने किया, जिसकी अगुवाई उनके कमांडिंग ऑफिसर स्क्वॉड्रन लीडर इरशाद कर रहे थे। 12 F-86 सेबर जेट्स के इस पैकेज को तीन फॉर्मेशनों में बांटा गया था। हर फॉर्मेशन चार–चार विमानों का था, जो पांच–पांच मिनट तक बारी-बारी से भारतीय सेना के ठिकानों पर हमला कर रहे थे।
पहले दो फॉर्मेशन ने अख्नूर–जौरियां मार्ग पर भारतीय सेना के ट्रकों और गाड़ियों पर 2.75 इंच रॉकेट्स दागकर आग लगा दी। इसके बाद आखिरी फॉर्मेशन, जिसका नेतृत्व स्क्वॉड्रन लीडर मुनीरुद्दीन अहमद कर रहे थे, नापाम बम लेकर हमला करने पहुंचा। मुनीरुद्दीन अहमद को खुशमिजाज और हकलाने वाली आदत के लिए जाना जाता था। वे अपने चार सेबर विमानों को लेकर जौरियां में 200 फीट की ऊंचाई पर आए। उन्होंने एक बिल्डिंग को सैन्य ठिकाना समझकर “बम रिलीज, बम रिलीज़” का आदेश दिया। नापाम बम जमीन पर गिरते ही भयंकर आग के गोले में बदल गए।
MiG21 in 1965 War: हकला गया था पाकिस्तानी स्क्वॉड्रन लीडर
हमले के बाद अहमद ने अपने फॉर्मेशन का रेडियो चेक किया, लेकिन वाइपर-4, यानी फ्लाइट लेफ्टिनेंट नासिर बट्ट का कोई जवाब नहीं आया। तभी उन्होंने अपने दाईं ओर एक आग की लकीर और धुएं का ट्रेल देखा, जो उनके विमान के बहुत करीब से गुजरा था। यह हमला था – और पहली बार उन्होंने सामने भारतीय वायुसेना का नया मिग-21 देखा। मुनीरुद्दीन अहमद रेडियो पर हकलाते हुए चिल्लाया – “कॉन्टैक्ट विद म-म-म-मिग-21, बाय गॉड ही नियर्ली हैड मी!”
यही वह क्षण था जब पाकिस्तान एयर फोर्स को आधिकारिक तौर पर पता चला कि भारतीय वायुसेना ने अब MiG-21 सुपरसोनिक जेट को भी युद्ध में उतार दिया है।
4 सितम्बर को मिग-21 की पहली उड़ान
भारतीय वायुसेना ने मिग-21 की 28 स्क्वॉड्रन द फर्स्ट सुपरसोनिक्स को तुरंत आदमपुर एयरबेस से पठानकोट भेज दिया था। स्क्वॉड्रन के कमांडर विंग कमांडर एमएसडी. ‘मल्ली’ वॉलेन और उनके फ्लाइट कमांडर स्क्वॉड्रन लीडर एके मुखर्जी ने 4 सितम्बर को अपनी पहली कॉम्बैट एयर पेट्रोल (CAP) उड़ान भरी।
विंग कमांडर एमएसडी “मैली” वॉलेन और स्क्वॉड्रन लीडर एके मुखर्जी की जोड़ी को पाकिस्तानी जहाजों को रोकने का आदेश मिला था। वॉलेन और मुखर्जी ने अपने MiG-21 T-76 वर्जन से कॉम्बैट एयर पेट्रोल शुरू किया। ये विमान दो के-13 एयर-टू-एयर मिसाइलों से लैस थे लेकिन इनमें गन नहीं थी। यह सोवियत यूनियन की उस समय की सोच थी कि मॉडर्न वॉरफेयर में मिसाइलें ही काफी होंगी।
चार पाकिस्तानी सेबर जेट्स को जौरियां पर थे, तभी MiG-21 ने उन्हें इंटरसेप्ट किया। लेकिन पहाड़ी इलाके की वजह से रडार क्लटर आ रहा था। तभी उनके साथी फ्लाइट लेफ्टिनेंट वीएस पाठानिया ने ग्नैट से एक सेबर को मार गिराया। वॉलेन ने अपनी के-13 मिसाइल से एक सबरे को निशाना बनाने की कोशिश की, लेकिन मिसाइल ग्राउंड क्लटर के चलते लक्ष्य से भटक गई। दूसरी मिसाइल भी नाकाम रही। गुस्से में वॉलेन ने सबरे को टक्कर मारने की कोशिश की, लेकिन अंतिम क्षण में उन्होंने विमान ऊपर खींच लिया और टक्कर से बच गए।
हालांकि उस दिन कोई दुश्मन विमान नहीं गिरा, लेकिन पाकिस्तानी पायलटों ने पहली बार भारतीय मिग-21 को आसमान में देखा और रेडियो पर घबराकर इसकी पुष्टि भी की। यह मिग-21 का भारतीय उपमहाद्वीप में पहला एरियल कॉम्बैट था।
यह पहली बार था जब पाकिस्तान को पक्के तौर पर मालूम चला कि भारत ने अपने नए सुपरसोनिक MiG-21 को युद्ध में उतार दिया है। भले ही वॉलेन अपने शिकार को मार नहीं पाए, लेकिन यह मुकाबला इस बात का एलान था कि अब आसमान में भारतीय वायुसेना के पास भी एक ऐसा लड़ाकू विमान है, जो पाकिस्तान के F-104 स्टारफाइटर का सीधा मुकाबला कर सकता है।
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उस समय भारतीय मिग-21PF (टाइप-76) वैरिएंट में केवल मिसाइलें थीं और कैनन (तोप) नहीं था। यही वजह थी कि वॉलेन और मुखर्जी दुश्मन को निशाना बनाते हुए भी अंतिम सफलता हासिल नहीं कर सके। बाद में इस गलती से सबक लेकर मिग-21 के अन्य वर्जन में कैनन और आधुनिक हथियार जोड़े थे।
खौफ में आया पाकिस्तान
इस घटना के बाद पाकिस्तान एयर फोर्स ने अपने कई कॉम्बैट एसेट्स को सिर्फ मिग-21 को ट्रैक और बाइट करने में लगा दिए। लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। पाकिस्तानी पायलट्स के बीच चर्चा होने लगी कि अगर मिसाइलें ठीक से काम कर जातीं या मिग-21 के पास गन होती, तो सेबर कभी बच नहीं पाता। यह डर आगे भी कायम रहा।
11 सितम्बर 1965 को पहला मैक-2 मुकाबला
इतिहास का पहला मैक-2 (सुपरसोनिक) बनाम मैक-2 हवाई मुकाबला भी इसी युद्ध में हुआ। 11 सितंबर को पाकिस्तानी एयर फोर्स का एक F-104 स्टारफाइटर पश्चिमी क्षेत्र में भारतीय वायुसेना के दो MiG-21 से भिड़ गया। हालांकि यह मुठभेड़ लंबी नहीं चली और पाकिस्तानी एयर फोर्स का पायलट पेड़ के ऊपर-नीचे उड़ान भरते हुए भाग निकला। भारतीय मिग-21 अब सीधे-सीधे पाकिस्तानी स्टारफाइटर को चुनौती दे रहा था।
पठानकोट में दो मिग-21 पर हमला
पाकिस्तान को सबसे बड़ा खतरा मिग-21 से ही महसूस हुआ। यही वजह थी कि उन्होंने पठानकोट एयरबेस पर सबसे ज्यादा बमबारी की। 6 सितंबर को हुए एक हमले में पाकिस्तानी एयर फोर्स के विमानों ने वहां खड़े दो मिग-21 T-76 वर्जन को नष्ट कर दिया। यह पाकिस्तान की सोची-समझी रणनीति थी ताकि भारतीय वायुसेना अपने सुपरसोनिक फाइटर्स का ज्यादा इस्तेमाल न कर सके।
1965 के युद्ध में पाकिस्तानी एयर फोर्स को अमेरिका से मिले रडार सिस्टम ने बड़ा फायदा दिया। इसकी वजह से उनके पायलट्स को ग्राउंड कंट्रोल इंटरसेप्शन से बेहतर गाइडेंस मिलती थी। जबकि भारत के पास उस समय केवल अमृतसर का एक बड़ा रडार और ग्राउंड ऑब्जर्वर थे।
इसके अलावा पाकिस्तानी एयर फोर्स के पास AIM-9B साइडवाइंडर मिसाइल थी, जो भारतीय K-13 मिसाइल से ज्यादा एडवांस थी। पाकिस्तान ने 1965 में कम से कम तीन एयर-टू-एयर किल्स इन्हीं मिसाइलों से किए थे। लेकिन भारतीय मिग-21 पायलट्स ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने लगातार कॉम्बैट एयर पेट्रोल मिशन उड़ाए और पाकिस्तानियों को कभी भी बढ़त नहीं लेने दी।
हालांकि 1965 में मिग-21 की संख्या बहुत कम थी और युद्ध में कोई बड़ी जीत नहीं हुई, फिर भी इसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव बहुत गहरा पड़ा। पाकिस्तानी वायुसेना जान गई कि अब भारत के पास ऐसा सुपरसोनिक जेट है जो उनके स्टारफाइटर और सेबर को टक्कर दे सकता है।
1965 का युद्ध मिग-21 के लिए एक टेस्टिंग ग्राउंड साबित हुआ। पायलटों ने सीखा कि सुपरसोनिक जेट को ग्राउंड कंट्रोल इंटरसेप्शन के साथ कैसे सिंक करना है। इसके साथ ही, मिसाइलों की सीमाएं भी पता चलीं, जिससे भविष्य में मिग-21FL और मिग-21Bis जैसे वर्जन में सुधार किए गए।
50 डिग्री तक पहुंच जाता था कॉकपिट का टेंपरेचर
रिटायर्ड एयर मार्शल विक्रम सिंह का कहना है कि MiG-21 भारतीय वायुसेना को “बड़े खिलाड़ियों के क्लब” में ले गया। इसकी मैक-2 (ध्वनि से दोगुनी गति) और हवाई मिसाइल क्षमता ने इसे उस दौर का सबसे आधुनिक विमान बना दिया। हालांकि 1965 में इसकी संख्या कम थी, लेकिन 1971 में यही जेट पाकिस्तान के खिलाफ निर्णायक साबित हुआ।
वह बताते हैं कि मिग-21 उड़ाना आसान नहीं था। कॉकपिट छोटा था औऱ समझने में मुश्किल होती थी। राजस्थान की गर्मी में कॉकपिट का तापमान 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता था। लैंडिंग स्पीड 340 किमी/घंटा थी, जो बेहद चुनौतीपूर्ण थी। फिर भी भारतीय पायलटों ने इसे न सिर्फ संभाला बल्कि युद्ध में प्रभावी ढंग से इस्तेमाल किया।
अलविदा! मिग-21 सीरीज आगे भी जारी…



