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ऑपरेशन सिंदूर के बाद SCALP मिसाइल फिर चर्चा में? पाकिस्तान में तबाही के बाद भारत क्यों बढ़ा रहा है स्टॉक?

SCALP Cruise Missile Deal India France

SCALP Cruise Missile Deal: भारत और फ्रांस के बीच राफेल फाइटर जेट के अलावा स्कैल्प (SCALP) क्रूज मिसाइलों के लेकर भी बात हो सकती है। स्कैल्प मिसाइल पिछले साल हुए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान बेहद चर्चा में रही थीं। सूत्रों के मुताबिक, भारत और फ्रांस लगभग 300 मिलियन यूरो (करीब 2,700 करोड़ रुपये) की डील पर चर्चा हो रही है, जिसके तहत भारतीय वायु सेना के लिए बड़ी संख्या में स्कैल्प मिसाइलें खरीदी जा सकती हैं।

यह वही मिसाइल है, जिसका इस्तेमाल भारतीय वायु सेना ने पाकिस्तान के अंदर मौजूद आतंकवादी ठिकानों को पूरी तरह तबाह करने के लिए किया था। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान राफेल लड़ाकू विमानों से दागी गई इन मिसाइलों ने यह साबित कर दिया कि भारत अब दुश्मन की सीमा के भीतर गहराई तक जाकर सटीक हमला करने की पूरी क्षमता रखता है। (SCALP Cruise Missile Deal)

SCALP Cruise Missile Deal: जैश-लश्कर के मुख्यालयों को निशाना बनाया

मई 2025 की रात, जब भारतीय वायु सेना ने पाकिस्तान के अंदर आतंकी ठिकानों पर हमला किया, तब पूरी दुनिया की नजरें इस ऑपरेशन पर थीं। इस कार्रवाई में जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा के मुख्यालयों को निशाना बनाया गया। बहावलपुर और मुरिदके जैसे इलाकों में मौजूद आतंकी ढांचे को पूरी तरह नष्ट कर दिया गया।

इस ऑपरेशन में भारतीय वायु सेना ने राफेल फाइटर जेट्स से स्कैल्प क्रूज मिसाइल और ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइल दोनों का इस्तेमाल किया। जहां ब्रह्मोस ने तेजी से बड़े हमले किए, तो वहीं स्कैल्प मिसाइलों ने बेहद सटीक तरीके से बंकरों और मजबूत इमारतों को निशाना बनाया।

सूत्रों के मुताबिक, जिन टारगेट्स पर स्कैल्प मिसाइलें गिरीं, वहां पूरी तरह तबाही हुई और आतंकवादी संगठनों का इंफ्रास्ट्रक्चर जड़ से खत्म हो गया। (SCALP Cruise Missile Deal)

स्कैल्प मिसाइल आखिर है क्या?

स्कैल्प एक एयर-लॉन्च्ड स्टैंडऑफ क्रूज मिसाइल है। इसे फ्रांस और यूरोप की जानी-मानी रक्षा कंपनी एमबीडीए बनाती है। ब्रिटेन में इसी मिसाइल को स्टॉर्म शैडो के नाम से जाना जाता है।

इस मिसाइल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे दुश्मन की एयर डिफेंस रेंज से बाहर रहकर लॉन्च किया जा सकता है। यानी पायलट को खतरे वाले इलाके में घुसने की जरूरत नहीं पड़ती।

स्कैल्प मिसाइल की मारक क्षमता करीब 250 से 500 किलोमीटर तक मानी जाती है। यह मिसाइल बेहद कम ऊंचाई पर उड़ती है, पेड़ों की ऊंचाई के आसपास, ताकि दुश्मन के रडार इसे पकड़ न सकें। इसके अंदर एडवांस गाइडेंस सिस्टम होता है, जिसमें जीपीएस, टेर्रेन रेफरेंस नेविगेशन और इंफ्रारेड सीकर शामिल हैं। इसी वजह से यह मिसाइल “पिनपॉइंट एक्युरेसी” के लिए जानी जाती है। (SCALP Cruise Missile Deal)

पाकिस्तान के एयरबेस पर भी हुआ इस्तेमाल

ऑपरेशन सिंदूर के बाद जब हालात और तनावपूर्ण हुए, तब भारतीय वायु सेना ने स्कैल्प मिसाइलों का दोबारा बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया। यहां तक कि पाकिस्तान एयर फोर्स के कई एयरबेस को भी निशाना बनाया था।

सूत्रों के मुताबिक, भारतीय वायु सेना ने पाकिस्तान के 12 प्रमुख एयरबेस पर हमले किए। इन हमलों में रनवे, हैंगर, फाइटर जेट्स और जासूसी विमानों को जमीन पर ही तबाह कर दिया गया। स्कैल्प मिसाइलों ने यहां भी अपनी सटीकता और भरोसेमंद क्षमता साबित की। (SCALP Cruise Missile Deal)

अब क्यों जरूरी हो गई नई डील?

ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत की सुरक्षा सोच में बड़ा बदलाव देखा जा रहा है। अब सिर्फ जवाबी कार्रवाई नहीं, बल्कि डीप स्ट्राइक कैपेबिलिटी को मजबूत करने पर जोर है। इसी कड़ी में भारतीय वायु सेना अपने हथियार भंडार को और मजबूत करना चाहती है।

सूत्रों के अनुसार, वायु सेना अब स्कैल्प मिसाइलों का स्टॉक बढ़ाना चाहती है, ताकि भविष्य में किसी भी आपात स्थिति में पर्याप्त संख्या में ये मिसाइलें उपलब्ध रहें। इसी वजह से फ्रांस के साथ नई डील पर बातचीत चल रही है। (SCALP Cruise Missile Deal)

राफेल के साथ स्कैल्प का मजबूत कॉम्बिनेशन

स्कैल्प मिसाइल को खास तौर पर राफेल फाइटर जेट के साथ इस्तेमाल के लिए डिजाइन किया गया है। भारतीय वायु सेना के पास फिलहाल 36 राफेल विमान हैं, और ये सभी स्कैल्प से लैस हैं।

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि राफेल और स्कैल्प की जोड़ी भारत को ऐसी ताकत देती है, जिससे दुश्मन के सबसे सुरक्षित ठिकानों को भी बिना सीमा पार किए खत्म किया जा सकता है। (SCALP Cruise Missile Deal)

नौसेना के राफेल मरीन में भी होगा इस्तेमाल

भारत ने हाल ही में नौसेना के लिए 26 राफेल मरीन लड़ाकू विमानों का ऑर्डर दिया है। ये विमान अगले तीन से चार साल में भारत पहुंचेंगे और विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत से ऑपरेट करेंगे।

जानकारी के मुताबिक, स्कैल्प मिसाइल को इन राफेल मरीन विमानों में भी इंटीग्रेट किया जाएगा। इससे भारतीय नौसेना को समुद्र से जमीन पर गहरे हमले की क्षमता मिलेगी, जो हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की ताकत को और बढ़ाएगी। (SCALP Cruise Missile Deal)

मीटियोर मिसाइलों की भी तैयारी

स्कैल्प के साथ-साथ भारतीय वायु सेना मीटियोर एयर-टू-एयर मिसाइल की भी बड़ी खरीद की प्रक्रिया में है। मीटियर मिसाइल हवा में दुश्मन के लड़ाकू विमानों को लंबी दूरी से मार गिराने में सक्षम मानी जाती है। यानी राफेल फ्लीट को हवा और जमीन दोनों मोर्चों पर और ज्यादा घातक बनाया जा रहा है। (SCALP Cruise Missile Deal)

114 और राफेल की तैयारी

ऑपरेशन सिंदूर में राफेल के प्रदर्शन के बाद भारतीय वायु सेना का भरोसा इस विमान पर और मजबूत हुआ है। यही वजह है कि अब 114 अतिरिक्त राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद की योजना पर काम चल रहा है।

सूत्रों के मुताबिक, यह प्रस्ताव जल्द ही डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (DAC) के सामने रखा जा सकता है। अगर यह डील मंजूर हो जाती है, तो आने वाले 10 से 15 साल में भारतीय वायु सेना के पास करीब 200 राफेल विमान हो सकते हैं।

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि स्कैल्प मिसाइल की यह संभावित डील सिर्फ एक हथियार खरीद नहीं है। यह भारत और फ्रांस के बीच गहरे होते रणनीतिक रिश्तों का संकेत भी है। पिछले कुछ सालों में दोनों देशों के बीच सबमरीन, फाइटर जेट, इंजन और मिसाइल जैसे कई बड़े रक्षा सौदे हो चुके हैं। यह डील भारत की सैन्य तैयारी को नई धार देगी और यह साफ संदेश भी देगी कि भारत अब आतंकवाद और किसी भी सुरक्षा चुनौती से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है। (SCALP Cruise Missile Deal)

भारतीय नौसेना को मिल सकते हैं स्वदेशी मरीन इंजन, DAC की बैठक में 114 राफेल और P-8i को मिल सकती है हरी झंडी

Indigenous Marine Gas Turbine Engine for Indian Navy in DAC Meeting

DAC Meeting: अगले हफ्ते होने वाली डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल यानी डीएसी की बैठक में एक बड़ा और अहम फैसला लिया जा सकता है। माना जा रहा है कि डीएसी की बैठक 12 फरवरी को हो सकती है। बैठक में नौसेना के लिए स्वदेशी मरीन गैस टर्बाइन इंजन के डेवलपमेंट से जुड़े एक बड़े प्रोग्राम को मंजूरी मिलने की पूरी संभावना है। अगर ऐसा होता है, तो यह फैसला सिर्फ नौसेना के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश की रक्षा तैयारियों के लिहाज से एक ऐतिहासिक कदम माना जाएगा। (DAC Meeting)

यह प्रोग्राम खास तौर पर 24 से 28 मेगावॉट क्षमता वाले मरीन गैस टर्बाइन इंजन के स्वदेशी विकास से जुड़ा है। ऐसे इंजन नौसेना के बड़े युद्धपोतों, जैसे डिस्ट्रॉयर और फ्रिगेट में इस्तेमाल होते हैं। अभी तक भारत इन इंजनों के लिए विदेशों पर निर्भर रहा है, लेकिन अब तस्वीर बदलने की तैयारी है। (DAC Meeting)

DAC Meeting: क्या है यह मरीन गैस टर्बाइन प्रोग्राम?

मरीन गैस टर्बाइन इंजन किसी भी बड़े युद्धपोत का दिल माने जाते हैं। इन्हीं इंजनों की वजह से जहाज तेज रफ्तार से चल पाते हैं, लंबी दूरी तय कर सकते हैं और युद्ध जैसी स्थिति में तेजी से मूवमेंट कर सकते हैं।

भारतीय नौसेना अब चाहती है कि ऐसे अहम इंजन भारत में ही डिजाइन हों, भारत में ही बनें और भारत की जरूरतों के हिसाब से तैयार किए जाएं। इसी उद्देश्य से यह नया प्रोग्राम तैयार किया गया है, जिसे डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर 2020 की मेक-1 कैटेगरी में लाया गया है।

मेक-1 कैटेगरी का मतलब होता है कि सरकार खुद इस प्रोजेक्ट में बड़ा निवेश करती है, ताकि देश के भीतर इन्हें तैयार किया जा सके। (DAC Meeting)

कितनी होगी लागत और सरकार कितना पैसा देगी?

सूत्रों के मुताबिक, इस पूरे मरीन इंजन प्रोग्राम की लागत करीब 4,000 से 5,000 करोड़ रुपये हो सकती है। मेक-1 नियमों के तहत सरकार प्रोटोटाइप यानी शुरुआती नमूने बनाने की लागत का 70 फीसदी तक खर्च उठाएगी। बाकी 30 फीसदी लागत उस इंडस्ट्री पार्टनर को वहन करनी होगी, जो इस प्रोजेक्ट में शामिल होगा।

नियमों के मुताबिक, एक डेवलपमेंट एजेंसी को प्रोटोटाइप बनाने के लिए सरकार की ओर से अधिकतम 250 करोड़ रुपये तक की फंडिंग दी जा सकती है। लेकिन चूंकि यह एक बड़ा और अहम प्रोजेक्ट है, इसलिए इसमें कई चरणों में निवेश किया जाएगा। (DAC Meeting)

कितने इंजन बनेंगे और कहां होंगे इस्तेमाल?

इस प्रोग्राम के तहत सबसे पहले 4 प्रोटोटाइप इंजन बनाए जाएंगे। इन इंजनों को जमीन पर और बाद में जहाज पर टेस्ट किया जाएगा, ताकि यह देखा जा सके कि वे नौसेना की सभी जरूरतों पर खरे उतरते हैं या नहीं।

अगर ये प्रोटोटाइप सफल रहते हैं, तो इसके बाद शुरुआती तौर पर कम से कम 40 मरीन गैस टर्बाइन इंजन बनाने की योजना है। आगे चलकर यह संख्या और बढ़ सकती है, क्योंकि भारतीय नौसेना आने वाले वर्षों में कई नए युद्धपोत शामिल करने वाली है।

ये इंजन खास तौर पर डिस्ट्रॉयर और फ्रिगेट जैसे बड़े सरफेस कॉम्बैटेंट्स के लिए बनाए जाएंगे, जो नौसेना की ताकत की रीढ़ माने जाते हैं। (DAC Meeting)

अभी किन विदेशी इंजनों पर निर्भर है भारत?

फिलहाल भारतीय नौसेना के ज्यादातर बड़े युद्धपोत विदेशी गैस टर्बाइन इंजनों पर चलते हैं। इनमें मुख्य रूप से दो नाम आते हैं। उनमें एक यूक्रेन की कंपनी जोर्या-माशप्रोएक्ट और दूसरी अमेरिका की कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक (जीई)है।

इन कंपनियों के इंजन वर्षों से भारतीय नौसेना के जहाजों में लगे हुए हैं। लेकिन बीते कुछ सालों में वैश्विक हालात ने यह साफ कर दिया है कि विदेशी सप्लाई पर निर्भरता जोखिम भरी हो सकती है। युद्ध, प्रतिबंध या राजनीतिक तनाव की स्थिति में स्पेयर पार्ट्स और मेंटेनेंस पर असर पड़ सकता है। इसके अलावा, इस प्रोग्राम से भारत में हाई-टेम्परेचर मेटलर्जी, एडवांस्ड मटीरियल्स और प्रिसीजन इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों में बड़ी तकनीकी तरक्की होगी।

इसी वजह से नौसेना अब चाहती है कि भविष्य में ऐसे अहम सिस्टम्स पूरी तरह से स्वदेशी हों। (DAC Meeting)

पहले भी हुए हैं स्वदेशी प्रयास, लेकिन यह प्रोग्राम क्यों है अलग?

भारतीय नौसेना और डीआरडीओ पहले भी मरीन इंजन के क्षेत्र में स्वदेशी प्रयास कर चुके हैं। गैस टर्बाइन रिसर्च एस्टेब्लिशमेंट यानी जीटीआरई ने कावेरी इंजन का एक मरीन वर्जन डेवलप करने की कोशिश की थी।

इसके अलावा हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) और भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (बीएचईएल) जैसी सार्वजनिक कंपनियों ने भी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के जरिए लोकलाइजेशन पर काम किया है। हालांकि, सूत्रों के अनुसार मौजूदा मरीन इंजन प्रोग्राम का दायरा पहले से कहीं अधिक व्यापक रखा गया है। इस बार विकास की जिम्मेदारी सिर्फ सरकारी संस्थानों तक सीमित नहीं होगी, बल्कि प्राइवेट इंडस्ट्री की अगुवाई में, नौसेना की सक्रिय भागीदारी के साथ इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने की योजना है। इससे स्वदेशी तकनीक के विकास को नई गति मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। (DAC Meeting)

प्राइवेट इंडस्ट्री से क्या है उम्मीद?

पिछले साल के आखिर में नौसेना ने भारतीय प्राइवेट कंपनियों से संपर्क किया था और उनसे जानकारी मांगी थी कि क्या वे ऐसे हाई-पावर मरीन गैस टर्बाइन इंजन बना सकती हैं। कंपनियों से यह पूछा गया कि क्या उनके पास गैस टर्बाइन डिजाइन करने का अनुभव है। क्या वे फोर्जिंग, कास्टिंग और प्रिसीजन मशीनिंग जैसे अहम काम कर सकती हैं। साथ ही, क्या उनके पास टेस्टिंग फैसिलिटी और क्वालिटी कंट्रोल सिस्टम है और वे इंजन का मेंटेनेंस और लाइफ-साइकिल सपोर्ट कैसे देंगे। इस कवायद का मकसद यह समझना था कि भारतीय इंडस्ट्री इस चुनौती के लिए कितनी तैयार है। (DAC Meeting)

खुल सकती है निर्यात की संभावना भी

अगर भारत इस 24-28 मेगावॉट मरीन गैस टर्बाइन को सफलतापूर्वक विकसित कर लेता है, तो भविष्य में इसे इंडियन ओशन रीजन की मित्र नौसेनाओं को निर्यात भी किया जा सकता है। आज कई छोटे और मध्यम देश अपने युद्धपोतों के लिए भरोसेमंद और किफायती इंजन की तलाश में रहते हैं। ऐसे में भारत उनके लिए एक नया विकल्प बन सकता है। (DAC Meeting)

डीएसी बैठक में और किस पर हो सकती है चर्चा

डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (डीएसी) की होने वाली बैठक में वायुसेना के लिए 114 अतिरिक्त राफेल लड़ाकू विमानों की प्रस्तावित खरीद पर भी चर्चा होने की संभावना है। इस डील की अनुमानित लागत करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये बताई जा रही है, जिससे यह हाल के वर्षों की सबसे बड़ी रक्षा खरीद योजनाओं में शामिल मानी जा रही है। इसके अलावा डीएसी में भारतीय नौसेना के लिए छह अतिरिक्त पी-8आई समुद्री निगरानी और पनडुब्बी रोधी युद्धक विमान खरीदने का प्रस्ताव पर भी विचार हो सकता है।

फिलहाल भारतीय नौसेना के पास 12 पी-8आई विमान हैं, जिनका इस्तेमाल हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री निगरानी और पनडुब्बी रोधी अभियानों के लिए किया जाता है। नौसेना अपनी निगरानी क्षमता को और मजबूत करने के लिए छह और विमानों की जरूरत महसूस कर रही है। यह खरीद अमेरिका के फॉरेन मिलिट्री सेल्स (एफएमएस) रूट के जरिए की जानी है। (DAC Meeting)

अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट ने मई 2021 में इस बिक्री को मंजूरी दे दी थी और उस समय इसकी अनुमानित लागत करीब 2.42 अरब डॉलर बताई गई थी। हालांकि, लागत से जुड़े सवालों और पिछले साल डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के बाद बने राजनीतिक माहौल के कारण यह सौदा आगे नहीं बढ़ पाया।

इसके बावजूद बातचीत बंद नहीं हुई। सितंबर में अमेरिकी रक्षा विभाग और बोइंग के वरिष्ठ अधिकारी भारत आए थे और इस सौदे को लेकर विस्तृत चर्चा की गई थी। अब सूत्रों का कहना है कि डीएसी से मंजूरी मिलने की स्थिति में यह सौदा अगले वित्त वर्ष में औपचारिक रूप से साइन किया जा सकता है। (DAC Meeting)

पूंछ दौरे में अपने पुराने साथी से गले मिले सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी, ऑपरेशन सिंदूर के वेटरन को किया सम्मानित

Army Chief Poonch Visit

Army Chief Poonch Visit: जम्मू-कश्मीर का पूंछ जिला हमेशा से भारतीय सेना के लिए रणनीतिक रूप से अहम रहा है। लाइन ऑफ कंट्रोल के पास बसे इस इलाके में सेना की तैनाती सिर्फ सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां सेना और आम लोगों के बीच एक गहरा रिश्ता भी है। जिसकी एक झलक शनिवार को देखने को मिली, जब भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी पूंछ पहुंचे।

भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी फॉरवर्ड इलाकों में तैनात जवानों की ऑपरेशनल तैयारी की समीक्षा करने पहुंचे थे, इस दौरान उन्होंने अपने पुराने साथियों से मुलाकात भी की।

Army Chief Poonch Visit: फॉरवर्ड एरिया में जवानों से मुलाकात

पूंछ पहुंचने के बाद जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने लाइन ऑफ कंट्रोल के पास तैनात जवानों से सीधे बातचीत की। उन्होंने सैनिकों की तैनाती, सतर्कता और तैयारियों का जायजा लिया। सेना प्रमुख ने जवानों के ऊंचे मनोबल, अनुशासन और प्रोफेशनल रवैये की सराहना की।

उन्होंने जवानों से कहा कि मौजूदा सुरक्षा हालात में उनकी भूमिका बेहद अहम है और देश को उन पर पूरा भरोसा है। इस तरह की मुलाकातें जवानों का हौसला बढ़ाती हैं, क्योंकि उन्हें यह एहसास होता है कि सेना का शीर्ष नेतृत्व उनकी मेहनत और चुनौतियों को समझता है। (Army Chief Poonch Visit)

कामसार गांव में की मुलाकात

इस दौरे के दौरान जनरल द्विवेदी पूंछ के कामसार गांव पहुंचे। यहां उनकी मुलाकात रिटायर्ड सुबेदार (ऑनरेरी कैप्टन) परवेज अहमद से हुई। परवेज अहमद जनरल द्विवेदी के पुराने साथी रहे हैं।

जनरल उपेंद्र द्विवेदी और परवेज अहमद ने 18 जम्मू एंड कश्मीर राइफल्स में साथ काम किया था। खासकर 2002 से 2005 के बीच, जब जनरल द्विवेदी इस बटालियन के कमांडिंग ऑफिसर थे, उस समय दोनों ने कई मुश्किल हालात में एक साथ देश की सेवा की। कश्मीर में यह दौर काफी संवेदनशील माना जाता है, जब आतंकवाद विरोधी ऑपरेशंस चरम पर थे।

सालों बाद जब दोनों मिले तो काफी भावुक हो गए। भारतीय सेना की यह खूबी है यहां रिश्ता सिर्फ ड्यूटी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह जिंदगी भर का साथ भी बन जाता है। (Army Chief Poonch Visit)

मार्च 1991 में भारतीय सेना की थी जॉइन

सुबेदार परवेज अहमद ने मार्च 1991 में भारतीय सेना जॉइन की थी। करीब 28 साल की सेवा के बाद वे मार्च 2019 में रिटायर हुए। अपने करियर के दौरान उन्होंने कई ऑपरेशनल जिम्मेदारियां निभाईं और ट्रेनिंग संस्थानों में इंस्ट्रक्टर के तौर पर भी काम किया।

सेना में रहते हुए उन्होंने कई स्पेशलाइज्ड कोर्स पूरे किए और अपनी मेहनत और अनुशासन के लिए सराहना भी पाई। रिटायरमेंट के बाद भी उनका रिश्ता सेना से खत्म नहीं हुआ। (Army Chief Poonch Visit)

ऑपरेशन सिंदूर में अहम भूमिका

रिटायर होने के बाद भी परवेज अहमद स्थानीय इलाके में सक्रिय रहे। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान, जब सुरक्षा हालात काफी संवेदनशील थे, उन्होंने तैनात जवानों की हर संभव मदद की।

उन्होंने लॉजिस्टिक्स सपोर्ट, स्थानीय समन्वय और इलाके की जानकारी के जरिए सेना को सहयोग दिया। यह सब उन्होंने अपनी जान को जोखिम में डालकर किया। उनकी स्थानीय पहचान और यूनिट के साथ पुराने संबंधों की वजह से सेना को काफी मदद मिली। (Army Chief Poonch Visit)

वेटरन अचीवर अवार्ड से सम्मानित

इन्हीं योगदानों को देखते हुए जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने परवेज अहमद को वेटरन अचीवर अवार्ड से सम्मानित किया। इस मौके पर उनके परिवार के सदस्य, पूर्व सैनिक और स्थानीय लोग भी मौजूद थे। यह सम्मान सिर्फ एक व्यक्ति के लिए नहीं था, बल्कि उन सभी वेटरन्स के लिए था, जो रिटायरमेंट के बाद भी देश और समाज के लिए योगदान देते रहते हैं।

स्थानीय लोगों से किया संवाद

इस यात्रा के दौरान सेना प्रमुख ने अन्य वेटरन्स, महिलाओं और बच्चों से भी मुलाकात की। बातचीत पूरी तरह अनौपचारिक रही। लोगों ने अपने अनुभव साझा किए और सेना के प्रति अपना भरोसा जताया।

पूंछ जैसे सीमावर्ती इलाकों में सेना सिर्फ एक सुरक्षा बल नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा होती है। यहां लगभग हर परिवार का कोई न कोई सदस्य सेना से जुड़ा रहा है। (Army Chief Poonch Visit)

Opinion: इंडो-पैसिफिक में दिखेगी भारत की समुद्री ताकत, विशाखापत्तनम में IFR और ‘मिलन’ कैसे बनेंगे गेम-चेंजर

IFR MILAN 2026 Indo-Pacific

IFR MILAN 2026 Indo-Pacific: हिंद महासागर में सजे सैकड़ों युद्धपोत, आसमान में लहराते दर्जनों देशों के झंडे और तट पर उमड़ती भीड़, यह दृश्य केवल सैन्य ताकत का प्रदर्शन नहीं होगा, बल्कि यह भारत की बढ़ती समुद्री कूटनीति का साफ संकेत देगा। एक ही शहर में इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू (IFR) और बहुपक्षीय नौसैनिक अभ्यास ‘मिलन’ का आयोजन, इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भारत की भूमिका को नए नजरिये से स्थापित करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

IFR MILAN 2026 Indo-Pacific: विशाखापत्तनम में सबसे बड़ा नौसैनिक जमावड़ा

साल 2016 में विशाखापत्तनम के तट पर 70 से ज्यादा भारतीय और विदेशी युद्धपोत एक साथ नजर आए थे। अब, दस साल बाद 2026 में, यह आयोजन पहले से कहीं ज्यादा बड़ा और राजनीतिक रूप से ज्यादा अहम होने जा रहा है। इस बार इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू के साथ-साथ नौसैनिक अभ्यास ‘मिलन’ भी विशाखापत्तनम में ही आयोजित होगा। इसे भारतीय महासागर क्षेत्र के सबसे बड़े नेवल डिप्लॉयमेंट्स में से एक माना जा रहा है। कार्यक्रम के दौरान समुद्र में युद्धपोतों की सलामी के साथ-साथ शहर की सड़कों पर अंतरराष्ट्रीय सिटी परेड और हाई-लेवल मैरीटाइम सेमिनार्स भी होंगी।

बेड़े के निरीक्षण यानी फ्लीट इंस्पेक्शन की परंपरा कोई नई नहीं है। ब्रिटेन के स्पिटहेड रिव्यू से लेकर अमेरिका के ‘ग्रेट व्हाइट फ्लीट’ तक, नौसेनाएं हमेशा अपने जहाजों की कतारों के जरिए दुनिया को राजनीतिक और रणनीतिक संदेश देती रही हैं। भारत ने भी 1953 में पहला प्रेसिडेंट फ्लीट इंस्पेक्शन आयोजित कर यह दिखाया था कि अब देश की नौसेना किसी वायसराय को नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रपति को सलामी देती है। (IFR MILAN 2026 Indo-Pacific)

समय के साथ-साथ भारत की समुद्री ताकत लगातार बढ़ती गई। स्वदेशी विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत से लेकर नीलगिरी और कोलकाता श्रेणी के युद्धपोतों तक, हर फ्लीट रिव्यू ने यह साबित किया कि भारत समुद्री शक्ति की सीढ़ियां लगातार चढ़ रहा है। 2001 में मुंबई के तट पर हुआ पहला इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू और 2016 का विशाखापत्तनम आयोजन इसी लंबी यात्रा के अहम पड़ाव रहे हैं। (IFR MILAN 2026 Indo-Pacific)

1995 में पोर्ट ब्लेयर से शुरू हुआ यह मिलन

अगर इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू को नौसैनिक कूटनीति का “शोकेस विंडो” कहा जाए, तो अभ्यास ‘मिलन’ को उसका “वर्कशॉप” कहना गलत नहीं होगा। साल 1995 में पोर्ट ब्लेयर से शुरू हुआ यह अभ्यास शुरुआत में सिर्फ पांच देशों तक सीमित था, लेकिन आज यह 40 से ज्यादा देशों की नौसेनाओं के लिए साझा मंच बन चुका है।

पिछले कुछ वर्षों में ‘मिलन’ ने कॉम्प्लेक्स नेवल एक्सरसाइज, कोआर्डिनेटेड पैट्रोलिंग और मानवीय सहायता व आपदा राहत (HADR) जैसे क्षेत्रों में वास्तविक सहयोग को मजबूत किया है। 2024 में 47 नौसेनाओं की भागीदारी और आईएनएस विक्रांत की मौजूदगी ने यह साफ संकेत दिया कि भारत क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे में एक भरोसेमंद और पसंदीदा साझेदार बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। (IFR MILAN 2026 Indo-Pacific)

आज इंडो-पैसिफिक क्षेत्र तेज सामरिक प्रतिस्पर्धा और जटिल सहयोग का केंद्र बन चुका है। चीन की तेजी से बढ़ती नौसैनिक मौजूदगी, पाकिस्तान की लगातार समुद्री गतिविधियां और अमेरिकी नौसेना की बदलती प्राथमिकताएं, क्षेत्र के कई देशों को असमंजस में डालती हैं। इसी बीच मालदीव से मॉरीशस और वियतनाम से इंडोनेशिया तक के तटीय देश समुद्री डकैती, अवैध मछली पकड़ने और जलवायु से जुड़ी आपदाओं जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। (IFR MILAN 2026 Indo-Pacific)

“कन्वीनिंग पावर” बनकर उभरा है भारत

ऐसे माहौल में भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी “कन्वीनिंग पावर” बनकर उभरती है, यानी अलग-अलग देशों की नौसेनाओं को एक मंच पर लाने की क्षमता। इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू पारदर्शिता और भरोसे का संदेश देता है, जबकि ‘मिलन’ अभ्यास उस भरोसे को जमीन पर उतारने का काम करता है। किसी भी उभरती शक्ति के लिए यह बेहद अहम होता है कि कितने देश उसके बुलावे पर एक साथ आने को तैयार हैं।

अक्सर यह सवाल भी उठता है कि इतने बड़े आयोजनों पर खर्च करना कितना सही है। आलोचक इन्हें “महंगा तमाशा” कहकर खारिज करते हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि समुद्री शक्ति केवल जहाजों और पनडुब्बियों से नहीं बनती, बल्कि साझेदारी, भरोसे और अंतरराष्ट्रीय मौजूदगी से भी बनती है। अगर भारत इन आयोजनों के साथ-साथ अपनी वास्तविक समुद्री क्षमता, दूरदराज समुद्री इलाकों में सतत मौजूदगी और घरेलू शिपबिल्डिंग को मजबूत करता रहा, तो इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू और ‘मिलन’ जैसे कार्यक्रम लंबे समय के लिए निवेश साबित होंगे। (IFR MILAN 2026 Indo-Pacific)

छोटी और मध्यम नौसेनाओं के लिए यह मंच सिर्फ ट्रेनिंग का जरिया नहीं, बल्कि भारत के साथ स्थायी रिश्ते बनाने का अवसर भी बन सकता है।

फरवरी 2026 में विशाखापत्तनम इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू, अभ्यास ‘मिलन’ और इंडियन ओशन नेवल सिंपोजियम (आईओएनएस) के चीफ्स कॉन्क्लेव की मेजबानी करेगा। समुद्र में कतारबद्ध युद्धपोतों से लेकर शहर की सड़कों पर निकलने वाली अंतरराष्ट्रीय परेड और कूटनीतिक बैठकों तक, हर स्तर पर दुनिया यह परखने की कोशिश करेगी कि भारत सिर्फ शान-ओ-शौकत दिखा रहा है या सचमुच क्षेत्रीय नेतृत्व की ओर बढ़ रहा है।

इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू और ‘मिलन’ जैसे आयोजन आने वाले सालों में इंडो-पैसिफिक की शक्ति-संतुलन की कहानी के अहम अध्याय बन सकते हैं। (IFR MILAN 2026 Indo-Pacific)

मलक्का स्ट्रेट के पास भारत-थाईलैंड की एयर एक्सरसाइज, अभ्यास में शामिल होंगे सुखोई-30 और ग्रिपेन

India Thailand Air Exercise Near Malacca Strait
India Thailand Air Exercise Near Malacca Strait

India Thailand Air Exercise: भारतीय वायु सेना और रॉयल थाई एयर फोर्स के बीच फरवरी में एक महत्वपूर्ण जॉइंट एयर एक्सरसाइज हो जा रही है, जो उत्तर मलक्का स्ट्रेट के पास, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के नजदीक की जाएगी।

यह अभ्यास 9 फरवरी को होना तय है और इसे भारत-थाईलैंड रक्षा संबंधों में एक नया और अहम कदम माना जा रहा है। अब तक दोनों देशों के बीच नौसेना स्तर पर सहयोग ज्यादा रहा है, लेकिन यह पहली बार है जब दोनों वायु सेनाएं इतने रणनीतिक इलाके में एक साथ अभ्यास करने जा रही हैं। (India Thailand Air Exercise)

India Thailand Air Exercise: कहां और कैसे होगा यह अभ्यास?

यह संयुक्त एयर एक्सरसाइज अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के ऊपर और उसके आसपास के क्षेत्र में की जाएगी, जो सीधे तौर पर मलक्का जलडमरूमध्य के पास स्थित है। यह इलाका बंगाल की खाड़ी और अंडमान सागर के संगम पर पड़ता है और इसे हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सबसे संवेदनशील जगहों में से एक माना जाता है।

भारतीय वायु सेना इस अभ्यास में अपने 4 से 6 सुखोई-30 एमकेआई लड़ाकू विमानों को उतारेगी, जो अंडमान के किसी एयरबेस से उड़ान भरेंगे। वहीं थाईलैंड की वायु सेना अपने ग्रिपेन फाइटर जेट्स के साथ इस अभ्यास में हिस्सा लेगी, जो थाई एयरबेस से ऑपरेट करेंगे। (India Thailand Air Exercise)

मिड-एयर रिफ्यूलिंग टैंकर एयरक्राफ्ट भी तैनात

यह अभ्यास केवल फाइटर बनाम फाइटर ट्रेनिंग तक सीमित नहीं होगा। भारतीय वायु सेना इसमें मिड-एयर रिफ्यूलिंग टैंकर एयरक्राफ्ट भी तैनात करेगी, जिससे लंबी दूरी तक ऑपरेशन की क्षमता को परखा जा सके।

इसके अलावा एयरबोर्न वार्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम यानी एडब्ल्यूएसीएस भी इस अभ्यास का हिस्सा होंगे। इनका काम आसमान से निगरानी करना, एयर ट्रैफिक को कंट्रोल करना और लड़ाकू विमानों को रियल-टाइम जानकारी देना होता है।

साथ ही, भारतीय नौसेना भी आसपास के समुद्री क्षेत्र में अपने युद्धपोत तैनात करेगी, ताकि अगर किसी तरह की आपात स्थिति पैदा हो, तो सर्च एंड रेस्क्यू ऑपरेशन तुरंत किए जा सकें। (India Thailand Air Exercise)

अभ्यास का क्या है मकसद?

इस जॉइंट एयर एक्सरसाइज का सबसे बड़ा उद्देश्य दोनों वायु सेनाओं के बीच इंटरऑपरेबिलिटी यानी आपसी तालमेल को मजबूत करना है। अलग-अलग देशों के एयरक्राफ्ट, अलग सिस्टम और अलग रणनीतियों के साथ काम करते हैं। ऐसे में यह अभ्यास यह समझने का मौका देगा कि संकट की स्थिति में दोनों सेनाएं कितनी तेजी से और कितनी सटीकता से साथ काम कर सकती हैं।

इसके अलावा, इसमें बेस्ट प्रैक्टिसेज शेयर की जाएंगी, यानी दोनों देश एक-दूसरे के ऑपरेशन तरीकों, टेक्निक और अनुभवों से सीखेंगे। लंबी दूरी की उड़ान, लॉजिस्टिक्स सपोर्ट, मिड-एयर रिफ्यूलिंग और रिमोट इलाकों में ऑपरेशन जैसी क्षमताओं को भी परखा जाएगा। (India Thailand Air Exercise)

मलक्का स्ट्रेट के पास अभ्यास क्यों खास है?

मलक्का जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। एशिया, यूरोप और मिडिल ईस्ट के बीच होने वाला करीब 80 फीसदी समुद्री व्यापार और तेल सप्लाई इसी रास्ते से गुजरती है।

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की लोकेशन भारत को इस पूरे इलाके पर नजर रखने की रणनीतिक क्षमता देती है। यहां होने वाला यह एयर अभ्यास साफ संकेत देता है कि भारत और उसके साझेदार देश हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा को लेकर गंभीर हैं।

यह अभ्यास यह भी दिखाता है कि भारत न सिर्फ अपने लिए, बल्कि पूरे क्षेत्र की स्थिरता और समुद्री सुरक्षा के लिए जिम्मेदारी लेने को तैयार है। (India Thailand Air Exercise)

नौसेना से आगे बढ़े डिफेंस रिलेशंस

भारत और थाईलैंड के बीच डिफेंस रिलेशंस पहले नौसेना तक सीमित माने जाते थे। दोनों देश मिलकर समुद्री गश्त, कोरपैट और अन्य नौसैनिक अभ्यास करते रहे हैं। लेकिन अब वायु सेना स्तर पर यह सीधा सहयोग इस रिश्ते को एक नई ऊंचाई पर ले जाता है।

यह अभ्यास भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी और आसियान देशों के साथ बढ़ते रक्षा संबंधों का भी हिस्सा है। थाईलैंड जैसे देश के साथ हवाई अभ्यास यह संदेश देता है कि भारत दक्षिण-पूर्व एशिया में एक भरोसेमंद सुरक्षा साझेदार बनकर उभर रहा है। (India Thailand Air Exercise)

आने वाले महीनों में और बड़े अभ्यास

सूत्रों के मुताबिक, यह अभ्यास सिर्फ शुरुआत है। फरवरी और मार्च 2026 में भारतीय वायु सेना फ्रांस, अमेरिका और ग्रीस जैसे देशों के साथ भी बड़े संयुक्त अभ्यास करने जा रही है। इससे यह साफ होता है कि भारतीय वायु सेना अपनी ग्लोबल रीच और ऑपरेशनल क्षमता को लगातार मजबूत कर रही है। (India Thailand Air Exercise)

अग्नि-3 मिसाइल टेस्ट क्यों है इतना अहम? चीन-पाकिस्तान तक मार, भारत की सेकंड स्ट्राइक ताकत कितनी मजबूत?

Agni-3 missile test Explained

Agni-3 missile test Explained: 6 फरवरी को भारत ने अग्नि-3 बैलिस्टिक मिसाइल का सफल परीक्षण किया। खास बात यह थी इस मिसाइल की रेंज में पाकिस्तान और चीन के कुछ शहर बीजिंग और शंघाई भी आ सकते हैं। यह मिसाइल भारत के न्यूक्लियर ट्रायड का हिस्सा है और भारत को सेकंड स्ट्राइक कैपेबिलिटी देती है। इस मिसाइल का टेस्ट होना भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा, न्यूक्लियर डिटरेंस पॉलिसी और रणनीतिक संतुलन से सीधे जुड़ा है। खासकर ऐसे समय में, जब भारत के आसपास का सुरक्षा माहौल लगातार चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।

Agni-3 missile test Explained: अग्नि-3 टेस्ट में आखिर हुआ क्या?

6 फरवरी को ओडिशा के चांदीपुर स्थित इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज से अग्नि-3 इंटरमीडिएट रेंज बैलिस्टिक मिसाइल का परीक्षण किया गया। यह लॉन्च स्ट्रैटेजिक फोर्सेस कमांड (SFC) की निगरानी में हुआ, जो भारत की परमाणु ताकत को ऑपरेट करने और संभालने की जिम्मेदारी निभाता है।

टेस्ट के दौरान मिसाइल ने तय की गई दूरी तक बिल्कुल सही रास्ते पर उड़ान भरी और अपने सभी तकनीकी और ऑपरेशनल पैरामीटर्स को सफलतापूर्वक साबित किया। रक्षा सूत्रों के मुताबिक, लॉन्च के दौरान मिसाइल की स्पीड, दिशा, कंट्रोल सिस्टम, गाइडेंस और री-एंट्री सभी चीजें बिल्कुल तय मानकों के मुताबिक रहीं।

यह टेस्ट इसलिए भी अहम है क्योंकि अग्नि-3 पहले से ही भारतीय सेना का हिस्सा है। यह 2011 में भारतीय सेना का हिस्सा बनी थी। ऐसे में अग्नि-3 का फिर से टेस्ट करना यह सुनिश्चित करना था कि जरूरत पड़ने पर यह मिसाइल आज भी पूरी तरह भरोसेमंद और तैनाती के लिए तैयार है। (Agni-3 missile test Explained)

अग्नि-3 आखिर है क्या और कितनी है ताकतवर?

अग्नि-3 एक दो-चरण वाली सॉलिड फ्यूल बैलिस्टिक मिसाइल है, जिसे भारत ने पूरी तरह स्वदेशी तकनीक से डेवलप किया है। इसकी मारक क्षमता करीब 3,000 से 3,500 किलोमीटर तक मानी जाती है। भविष्य में इसकी रेंज को 5,000 किलोमीटर तक बढ़ाया जा सकता है। इस दूरी के साथ अग्नि-3 पूरे पाकिस्तान को, चीन के बड़े हिस्से को यहां तक कि बीजिंग जैसे अहम इलाकों तक और मध्य पूर्व के कई रणनीतिक ठिकानों को कवर करने में सक्षम है। यानी यह मिसाइल भारत को क्षेत्रीय नहीं, बल्कि रणनीतिक स्तर पर मजबूत बनाती है।

इस मिसाइल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम है। इसका पेलोड यानी वारहेड का वजन करीब 1,500 से 2,500 किलोग्राम तक हो सकता है। जरूरत पड़ने पर इसमें पारंपरिक वॉरहेड के साथ-साथ परमाणु वॉरहेड भी लगाया जा सकता है। यह एक न्यूक्लियर कैपेबल मिसाइल है, जिसमें करीब 150 से 250 किलोटन तक की न्यूक्लियर क्षमता वाला वॉरहेड फिट किया जा सकता है। इसी वजह से इसे भारत की परमाणु प्रतिरोधक क्षमता की रीढ़ माना जाता है।

अग्नि-3 की गति बहुत ज्यादा होती है। टर्मिनल फेज में 5-6 मैक (हाइपरसोनिक स्पीड) पकड़ लेती है, और एंटी-मिसाइल सिस्टम्स को चकमा दे सकती है। जिससे इसे इंटरसेप्ट करना यानी बीच में रोकना दुश्मन के लिए बेहद मुश्किल हो जाता है। (Agni-3 missile test Explained)

अग्नि-3 वजन करीब 50 टन

डिजाइन और स्ट्रक्चर के लिहाज से अग्नि-3 लगभग 17 मीटर लंबी है और इसका वजन करीब 50 टन है। यह एक रोड-मोबाइल मिसाइल है, यानी इसे ट्रक या रेल प्लेटफॉर्म से कहीं भी तैनात करके लॉन्च किया जा सकता है। यह क्षमता इसे दुश्मन के पहले हमले से काफी हद तक सुरक्षित बनाती है, क्योंकि इसकी लोकेशन लगातार बदली जा सकती है और इसे पहले से ट्रैक करना मुश्किल हो जाता है।

डिजाइन और स्ट्रक्चर के लिहाज से अग्नि-3 लगभग 17 मीटर लंबी है और इसका वजन करीब 50 टन है। यह एक रोड-मोबाइल मिसाइल है, यानी इसे ट्रक या रेल प्लेटफॉर्म से कहीं भी तैनात करके लॉन्च किया जा सकता है। यह क्षमता इसे दुश्मन के पहले हमले से काफी हद तक सुरक्षित बनाती है, क्योंकि इसकी लोकेशन लगातार बदली जा सकती है और इसे पहले से ट्रैक करना मुश्किल हो जाता है। (Agni-3 missile test Explained)

यह टेस्ट रूटीन नहीं, बल्कि रणनीतिक संदेश क्यों है?

अक्सर लोग सवाल करते हैं कि जब अग्नि-3 पहले से सेना में शामिल है, तो फिर इसका टेस्ट क्यों जरूरी था। इसका जवाब है– ऑपरेशनल रेडीनेस। परमाणु हथियारों और बैलिस्टिक मिसाइलों में सबसे अहम बात यह होती है कि वे आखिरी वक्त तक पूरी तरह भरोसेमंद रहें। सालों तक स्टोरेज में रहने के बाद भी अगर मिसाइल बिना किसी तकनीकी दिक्कत के लॉन्च हो जाए, तो ही वह असली ताकत कहलाती है।

अग्नि-3 का यह टेस्ट यह साबित करता है कि भारत की परमाणु प्रतिरोधक क्षमता सिर्फ कागजों में नहीं, बल्कि जमीन पर भी पूरी तरह तैयार है। यह दुश्मन देशों को साफ संदेश देता है कि भारत की सेकंड स्ट्राइक क्षमता मजबूत और विश्वसनीय है। (Agni-3 missile test Explained)

भारत की “नो फर्स्ट यूज” पॉलिसी

भारत की परमाणु नीति साफ है– “नो फर्स्ट यूज”। यानी भारत कभी पहले परमाणु हमला नहीं करेगा, लेकिन अगर उस पर हमला हुआ, तो जवाब इतना सख्त होगा कि दुश्मन दोबारा ऐसा सोच भी न सके।

इस नीति में अग्नि-3 जैसी मिसाइलों की भूमिका बेहद अहम हो जाती है। चूंकि यह रोड और रेल मोबाइल है, इसलिए इसे छिपाकर रखा जा सकता है। दुश्मन के पहले हमले में इसे पूरी तरह नष्ट करना आसान नहीं होता। यही वजह है कि अग्नि-3 भारत की सेकंड स्ट्राइक क्षमता को मजबूत बनाती है। (Agni-3 missile test Explained)

चीन और पाकिस्तान के संदर्भ में क्यों अहम है अग्नि-3?

अगर रणनीतिक नजरिए से देखा जाए, तो अग्नि-3 की रेंज और क्षमता सीधे तौर पर चीन और पाकिस्तान दोनों को ध्यान में रखकर बनाई गई है। पाकिस्तान के मामले में अग्नि-3 भारत को पूरी तरह निर्णायक बढ़त देता है, क्योंकि इसकी रेंज में पाकिस्तान का हर रणनीतिक ठिकाना आ जाता है।

चीन के संदर्भ में भी यह मिसाइल बेहद अहम है। इसकी मारक क्षमता चीन के कई अहम सैन्य और औद्योगिक इलाकों तक पहुंचने में सक्षम है। इससे भारत को रणनीतिक संतुलन बनाए रखने में मदद मिलती है, खासकर तब जब चीन अपनी मिसाइल और न्यूक्लियर ताकत लगातार बढ़ा रहा है। (Agni-3 missile test Explained)

अग्नि सीरीज में अग्नि-3 की जगह क्या है?

अग्नि-3, भारत की अग्नि मिसाइल सीरीज का एक अहम हिस्सा है। इस सीरीज में अलग-अलग रेंज की मिसाइलें शामिल हैं, जो मिलकर भारत को फुल स्पेक्ट्रम डिटरेंस देती हैं।

अग्नि-1 और अग्नि-2 कम दूरी के लिए हैं, जबकि अग्नि-4 और अग्नि-5 लंबी दूरी की जरूरतों को पूरा करती हैं। अग्नि-3 इन दोनों के बीच एक मजबूत कड़ी की तरह काम करती है, जो इंटरमीडिएट रेंज में भारत की जरूरतें पूरी करती है। (Agni-3 missile test Explained)

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को क्या फायदा?

अग्नि-3 जैसे सफल टेस्ट भारत को उन चुनिंदा देशों की कतार में खड़ा करते हैं, जिनके पास भरोसेमंद इंटरमीडिएट रेंज बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता है। यह भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूत करता है और दुनिया को दिखाता है कि भारत अपनी सुरक्षा जरूरतों के लिए किसी पर निर्भर नहीं है।

साथ ही, यह टेस्ट ऐसे समय में हुआ है जब वैश्विक राजनीति में सैन्य ताकत का महत्व फिर से बढ़ गया है। ऐसे में भारत की यह क्षमता उसे एक जिम्मेदार लेकिन मजबूत शक्ति के तौर पर स्थापित करती है। (Agni-3 missile test Explained)

अग्नि-3 का यह टेस्ट सिर्फ एक तकनीकी उपलब्धि नहीं है। यह भारत की रणनीतिक सोच, आत्मनिर्भर रक्षा नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा की रीढ़ को मजबूत करने वाला कदम है।

यह टेस्ट यह भरोसा देता है कि भारत की परमाणु प्रतिरोधक क्षमता आज भी उतनी ही मजबूत और भरोसेमंद है, जितनी उसे होना चाहिए। बदलते सुरक्षा हालात में, अग्नि-3 जैसी मिसाइलें भारत को न सिर्फ सुरक्षित बनाती हैं, बल्कि दुश्मनों को साफ संदेश भी देती हैं कि भारत किसी भी चुनौती का जवाब देने के लिए पूरी तरह तैयार है। (Agni-3 missile test Explained)

114 राफेल जेट डील से पहले नया ट्विस्ट, अमेरिकी कानून के घेरे में आ सकता है राफेल!

Rafale ITAR impact on India

Rafale ITAR impact on India: राफेल फाइटर जेट के लिए अहम पार्ट बनाने वाली एक फ्रांसीसी कंपनी को अब एक अमेरिकी कंपनी ने खरीद लिया है। इसके बाद सवाल उठने लगे हैं कि क्या राफेल अब अमेरिका के आईटीएआर (इंटरनेशनल ट्रैफिक इन आर्म्स रेगुलेशंस) कानून के दायरे में आ सकता है। अगर ऐसा हुआ, तो इसका असर सिर्फ फ्रांस पर नहीं, बल्कि भारत जैसे उन देशों पर भी पड़ सकता है, जिन्होंने राफेल खरीदा है या खरीदने की तैयारी कर रहे हैं।

यह मामला इसलिए भी अहम है क्योंकि भारत इस समय राफेल से जुड़ी दो बड़ी योजनाओं पर काम कर रहा है- एक तरफ वायुसेना के लिए 114 नए राफेल लड़ाकू विमानों का प्रस्ताव है और दूसरी तरफ नौसेना के लिए राफेल मरीन की डील पर अमल शुरू हो चुका है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि असल मामला क्या है और भारत के लिए इसमें कितना जोखिम है। (Rafale ITAR impact on India)

Rafale ITAR impact on India: आईटीएआर-फ्री रहा है राफेल

मल्टी-रोल फाइटर जेट राफेल को फ्रांस की कंपनी दसॉ एविएशन बनाती है। यह विमान हवा से हवा, हवा से जमीन, समुद्री हमलों और यहां तक कि न्यूक्लियर मिशन के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है। राफेल की सबसे बड़ी खासियत यह मानी जाती रही है कि यह “आईटीएआर-फ्री” है।

आईटीएआर-फ्री होने का मतलब यह है कि इसमें अमेरिकी तकनीक या अमेरिकी कंट्रोल वाले पार्ट्स नहीं लगे होते। इसलिए अगर कोई देश राफेल खरीदता है, तो उसे अमेरिका से अलग से मंजूरी लेने की जरूरत नहीं पड़ती। यही वजह है कि भारत, मिस्र, ग्रीस, इंडोनेशिया जैसे देशों ने राफेल को खरीदा। (Rafale ITAR impact on India)

फ्रांसीसी सप्लायर को अमेरिका ने खरीदा

दिसंबर 2025 में अमेरिका की लोअर ग्रुप नाम की कंपनी ने फ्रांस की एलएमबी एयरोस्पेस नामक कंपनी को करीब 433 मिलियन डॉलर में खरीद लिया। एलएमबी एयरोस्पेस एक छोटी लेकिन रणनीतिक कंपनी है, जो हाई-परफॉर्मेंस फैंस और ब्रशलेस मोटर्स बनाती है। ये वही पार्ट्स हैं, जो राफेल के कूलिंग सिस्टम में इस्तेमाल होते हैं। इसके अलावा ये पार्ट्स फ्रांस की न्यूक्लियर सबमरींस में भी लगते हैं।

इस साल जनवरी में फ्रांसीसी सरकार ने इस सौदे को मंजूरी दे दी, लेकिन फ्रांस की संसद में इस पर जबरदस्त विरोध हुआ। विपक्षी नेताओं ने कहा कि इससे फ्रांस की डिफेंस आटोनॉमी खतरे में पड़ सकती है। उनका तर्क था कि अगर कोई अमेरिकी कंपनी किसी अहम सप्लायर की मालिक बन जाती है, तो भविष्य में उस पर अमेरिकी कानून लागू हो सकते हैं। (Rafale ITAR impact on India)

आईटीएआर क्या है और इससे डर क्यों लगता है?

आईटीएआर यानी इंटरनेशनल ट्रैफिक इन आर्म्स रेगुलेशंस अमेरिका का एक सख्त कानून है। इसके तहत अमेरिका यह तय करता है कि उसके कंट्रोल में आने वाली रक्षा तकनीक या पार्ट्स किस देश को दिए जा सकते हैं, किस शर्त पर दिए जा सकते हैं और किन हालात में रोके जा सकते हैं।

अगर किसी वेपन सिस्टम का कोई भी अहम हिस्सा आईटीएआर के दायरे में आ जाता है, तो उसके एक्सपोर्ट, अपग्रेड या थर्ड पार्टी ट्रांसफर के लिए अमेरिकी मंजूरी जरूरी हो जाती है। कई देशों का अनुभव रहा है कि संकट या राजनीतिक मतभेद के समय अमेरिका इस कानून का इस्तेमाल दबाव बनाने के लिए करता है।

राफेल की बिक्री में फ्रांस अब तक यह भरोसा देता रहा है कि यह विमान पूरी तरह से अमेरिकी प्रभाव से मुक्त है। लेकिन एलएमबी एयरोस्पेस की अमेरिकी खरीद के बाद यह सवाल उठ रहा है कि क्या भविष्य में राफेल के कुछ पार्ट्स पर आईटीएआर लागू हो सकता है। (Rafale ITAR impact on India)

क्या राफेल तुरंत आईटीएआर के तहत आ जाएगा?

डिफेंस सूत्रों और विशेषज्ञों की राय में इसका जवाब है- नहीं, कम से कम तुरंत नहीं। सिर्फ कंपनी का मालिक बदल जाने से किसी सिस्टम की कानूनी स्थिति अपने आप नहीं बदलती। मौजूदा राफेल विमानों पर इसका कोई तात्कालिक असर नहीं पड़ेगा।

लेकिन चिंता भविष्य को लेकर है। अगर आने वाले समय में एलएमबी के बनाए पार्ट्स को अमेरिकी कानूनों के तहत “डिफेंस क्रिटिकल” घोषित किया गया, या उनमें अमेरिकी तकनीक जोड़ी गई, तो आईटीएआर लागू हो सकता है। अमेरिका का पिछला रिकॉर्ड बताता है कि वह नियमों की व्याख्या अपने हित में करता है, जिससे अनिश्चितता बनी रहती है। (Rafale ITAR impact on India)

फ्रांस में क्यों मचा राजनीतिक बवाल?

फ्रांस में राफेल सिर्फ एक विमान नहीं, बल्कि राष्ट्रीय गर्व का प्रतीक है। फ्रांसीसी नेता अक्सर कहते हैं कि राफेल खरीदने का मतलब है वॉशिंगटन से आजादी। यही वजह है कि संसद में लगभग सभी दलों ने इस सौदे पर सवाल उठाए।

सरकार का कहना है कि उसने सौदे में सख्त शर्तें लगाई हैं। जैसे कि एलएमबी की मैन्युफैक्चरिंग फ्रांस में ही रहेगी, फ्रांसीसी मिलिट्री कॉन्ट्रैक्ट्स सुरक्षित रहेंगे और सरकार के पास वीटो का अधिकार होगा। लेकिन आलोचकों को डर है कि कागजों की शर्तें भविष्य की राजनीतिक हकीकत के सामने कमजोर पड़ सकती हैं। (Rafale ITAR impact on India)

भारत के लिए इसका क्या मतलब है?

भारत के पास इस समय 36 राफेल विमान हैं, जो भारतीय वायुसेना की ताकत का अहम हिस्सा हैं। इसके अलावा भारत ने 2025 में नौसेना के लिए 26 राफेल मरीन विमानों की डील साइन की है, जो स्वदेशी विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत पर तैनात होंगे।

सबसे बड़ा मामला 114 नए राफेल विमानों का है, जिन पर करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। भारत ने राफेल को इसलिए चुना था क्योंकि यह अमेरिकी नियंत्रण से मुक्त माना जाता था। अगर भविष्य में आईटीएआर की आशंका बढ़ती है, तो भारत के लिए स्पेयर्स, अपग्रेड और लॉन्ग-टर्म सपोर्ट को लेकर सवाल खड़े हो सकते हैं।

हालांकि, जानकारों का कहना है कि भारत के साथ फ्रांस का रिश्ता रणनीतिक है और फ्रांस भारत को भरोसे में लिए बिना कोई कदम नहीं उठाएगा। फिर भी, यह एक ऐसा जोखिम है जिसे पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। (Rafale ITAR impact on India)

अन्य देशों पर क्या असर पड़ सकता है?

राफेल सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि कई देशों की वायुसेना का अहम हिस्सा है। मिस्र, ग्रीस, इंडोनेशिया जैसे देश भी इसे इसलिए चुनते हैं क्योंकि इसमें अमेरिकी दखल नहीं होता। अगर यह धारणा कमजोर पड़ती है, तो राफेल की भविष्य की एक्सपोर्ट अपील पर असर पड़ सकता है।

हालांकि फ्रांस के पास कुछ विकल्प हैं। वह या तो वैकल्पिक सप्लायर्स खोज सकता है, या एलएमबी एयरोस्पेस के मामलों में सख्त सरकारी नियंत्रण बनाए रख सकता है। भारत के लिए जरूरी है कि वह किसी भी नई डील में आईटीएआर से जुड़े क्लॉज को साफ-साफ समझे और अपने हित सुरक्षित रखे।

फिलहाल, फरवरी 2026 तक की स्थिति में कोई तात्कालिक खतरा नहीं दिखता। लेकिन आज के दौर में डिफेंस डील सिर्फ हथियार खरीदने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सप्लाई चेन और कानून भी उतने ही अहम हो गए हैं। लेकिन अमेरिकी कंपनी की खरीद ने यह दिखा दिया है कि ग्लोबल डिफेंस इंडस्ट्री में एक छोटा सा बदलाव भी बड़े रणनीतिक सवाल खड़े कर सकता है। (Rafale ITAR impact on India)

Big Boost to Army Air Surveillance: RFP Issued for 30 Lightweight Radars Worth Rs. 725 Crore

Indian Army Low Level Lightweight Radars RFP

The Indian Army, through the Ministry of Defence, has issued a Request for Proposal (RFP) for the procurement of 30 improved Low-Level Lightweight Radars (LLLR-I) and two Classroom Variant Radars (CRVs) at an estimated cost of about Rs 725 crore.

The RFP has been uploaded on the Indian Army’s website today and the procurement will be carried out under the Fast Track Procurement (FTP) process.

Why is this important?

The radars are intended for rapid induction and are required to be deployable across diverse terrains, including mountainous regions, high-altitude areas, plains, semi-deserts, deserts and coastal zones.

As per the RFP, the LLLR-I must be compatible for integration with the Akashteer Command and Reporting (C&R) module, including gateway hardware and inbuilt software. The system must also meet the Army Cyber Group’s evaluation criteria for onboarding onto the Army Data Network.

Envisaged as an air surveillance system, the LLLR-I will scan airspace to detect, track and prioritise aerial targets, with the capability to track hundreds of targets simultaneously. The radar should be able to designate a minimum of 20 tracks at a time to at least 10 command posts or weapon systems equipped with Target Data Receivers (TDRs) located up to 20 km away. Connectivity is to be supported through line, radio or radio relay, with scalability up to 20 TDRs.

The RFP mandates a minimum indigenous content of 60 per cent.

When will be this delivered?

In terms of delivery, the first batch of 15 LLLR-I systems and one CRV is to be delivered within 12 months from the date of advance payment, while the remaining systems must be supplied within the following six months.

The equipment is required to have a minimum service life of 10 years. Bidders must furnish details of the reliability model, reliability prediction and validation by the designer or manufacturer to ensure sustained performance throughout the service life.

What will be delivered?

The selected vendor will also be required to provide a comprehensive training package for operators, operator trainers and maintenance personnel. Maintenance training is to be conducted three to six months before the expiry of the warranty period of the first batch of delivered systems.

The LLLR-I system will comprise a search radar, Commander’s Display Unit (CDU), Target Designation System (TDS) and Power Supply Unit, and must offer flexibility in deployment to provide air defence support to Vulnerable Areas and Vulnerable Points (VA/VP).

“कभी सोचा नहीं था बिना हथियार लौटूंगा” – शोपियां पहुंचकर भावुक हुए रिटायर्ड आर्मी ब्रिगेडियर

Shopian Kashmir Peace

Shopian Kashmir Peace: कश्मीर 1990 और 2000 के दशक में डर, तनाव और आतंकवाद की खबरों से जुड़ा रहता था। खासकर दक्षिण कश्मीर का शोपियां इलाका, जहां हर कदम पर खतरा और हर मोड़ पर ऑपरेशन हुआ करता था। लेकिन अब उसी शोपियां से एक ऐसी कहानी सामने आई है, जिसने लोगों को भावुक भी किया और उम्मीद से भर भी दिया।

करीब 30 साल तक भारतीय सेना में सेवा दे चुके रिटायर्ड ब्रिगेडियर दीप भगत जब हाल ही शोपियां लौटे, तो वह किसी मिलिट्री ऑपरेशन में नहीं थे। इस बार न उनके हाथों में हथियार थे, न शरीर पर बुलेटप्रूफ जैकेट और न ही साथ में कोई सुरक्षा दस्ता। वह एक आम पर्यटक की तरह बाइक पर सवार होकर शोपियां पहुंचे थे। उनका यही अनुभव अब सोशल मीडिया पर लाखों लोगों के दिल को छू रहा है। (Shopian Kashmir Peace)

Shopian Kashmir Peace: “उस दौर में यह सोचना भी नामुमकिन था”

वीडियो में ब्रिगेडियर भगत कहते हैं कि जब वे 1990 और 2000 के दशक में कश्मीर में तैनात थे, तब उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि वे जीवन में कभी शोपियां वापस आएंगे और वह भी बिना हथियार के। उस दौर में शोपियां आतंकवाद और मुठभेड़ों के लिए जाना जाता था। हर कदम पर खतरा था और हर मूवमेंट पूरी तैयारी और हथियारों के साथ होती थी।

ब्रिगेडियर भगत बताते हैं कि करीब दो दशक पहले वह शोपियां में पूरे कॉम्बैट गियर में ऑपरेट कर रहे थे। हर मूवमेंट प्लानिंग के साथ होती थी। सड़कें खाली रहती थीं, माहौल तनाव से भरा होता था और हर पल सतर्क रहना जरूरी था। आज वही इलाका उन्हें खुले दिल से स्वागत करता दिखा। वीडियो में वह कहते हैं कि जब वह सेना में सर्विस थे, तब उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि वह अपने जीवन में शोपियां दोबारा बिना हथियार के देख पाएंगे। (Shopian Kashmir Peace)

 

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लेकिन उनकी यह हालिया यात्रा बिल्कुल अलग थी। इस बार वह एक आम नागरिक की तरह बाइक पर शोपियां पहुंचे। खुले रास्ते थे, आसपास शांति थी और स्थानीय लोगों ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया। उन्होंने कहा कि यह बदलाव देखकर उन्हें गर्व और सुकून दोनों महसूस हुआ। उनका कहना है कि यह बदलाव सिर्फ उनके लिए नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए उम्मीद का संकेत है। जिन इलाकों में कभी गोलियों की आवाज सुनाई देती थी, वहां आज सैलानियों की बातें और कैमरों की क्लिक सुनाई देती हैं। (Shopian Kashmir Peace)

शोपियां: आतंक से सेबों की खुशबू तक

अपने वीडियो में ब्रिगेडियर भगत ने कहा कि “शोपियां, जो कभी तनाव का नाम था, आज शांति के साथ मेरा स्वागत करता है। यही बदलाव है। यही उम्मीद है।”

कभी आतंकवाद का गढ़ माना जाने वाला शोपियां आज धीरे-धीरे अपनी नई पहचान बना रहा है। अब यह इलाका अपने सेब के बागानों, हरियाली और प्राकृतिक खूबसूरती के लिए जाना जाने लगा है।

पिछले कुछ वर्षों में शोपियां और इसके आसपास के इलाकों जैसे अहारबल और यूसमर्ग में पर्यटकों की संख्या बढ़ी है। यहां के झरने, पहाड़ और शांत माहौल लोगों को आकर्षित कर रहे हैं।

सुरक्षा हालात में सुधार, इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास और पर्यटन को बढ़ावा देने की कोशिशों ने इस इलाके की तस्वीर बदल दी है। (Shopian Kashmir Peace)

सोशल मीडिया पर भावनाओं का सैलाब

उनके वीडियो को 4.4 लाख से ज्यादा लोग देख चुके थे और हजारों लोगों ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया दी। कई लोगों ने भारतीय सेना और सुरक्षाबलों का धन्यवाद किया। कुछ लोगों ने अपने निजी अनुभव साझा किए और बताया कि उन्होंने हाल के वर्षों में कश्मीर की यात्रा की और खुद को पूरी तरह सुरक्षित महसूस किया।

एक यूजर ने लिखा कि वह फरवरी 2024 में दोस्तों के साथ बाइक से शोपियां, अहारबल और यूसमर्ग गया था और यह जगह न सिर्फ सुरक्षित थी, बल्कि बेहद खूबसूरत भी। पर्यटन बढ़ने का मतलब है कि लोगों का भरोसा लौट रहा है। होटल, होमस्टे, टैक्सी चालक और स्थानीय दुकानदारों की आमदनी बढ़ रही है। यह बदलाव धीरे-धीरे कश्मीर की अर्थव्यवस्था को भी मजबूत कर रहा है।

एक यूजर ने लिखा कि वीडियो देखकर साफ महसूस होता है कि ब्रिगेडियर भगत उन साथियों को याद कर रहे होंगे, जिन्होंने इस धरती पर शांति के लिए अपनी जान दे दी। कई लोगों ने राष्ट्रीय रायफल्स और स्पेशल फोर्सेस यूनिट्स का खास तौर पर जिक्र किया, जिन्होंने वर्षों तक कठिन परिस्थितियों में ऑपरेशन चलाए। (Shopian Kashmir Peace)

CAATSA का डर: रूस के SU-57 फाइटर जेट पर अमेरिका सख्त, भारत की डील पर भी है खतरा?

Su-57 CAATSA sanctions India

Su-57 CAATSA sanctions India: भारत और अमेरिका के रिश्तों में फरवरी की शुरुआत काफी सकारात्मक मानी जा रही थी। ट्रेड डील के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारतीय सामानों पर टैरिफ 50 फीसदी से घटाकर 18 फीसदी कर दिए। भारत ने भी रूस से तेल खरीद कम करने का संकेत दिए। लेकिन इसी बीच एक नया खतरा सामने आ गया है, जो सीधे भारत की डिफेंस पॉलिसी और फाइटर जेट प्लानिंग पर असर डाल सकता है।

यह खतरा है काटसा (CAATSA) प्रतिबंधों का, जो अमेरिका अब रूस से सु-57 स्टेल्थ फाइटर जेट खरीदने वाले देशों पर लगाने की चेतावनी दे रहा है। ताजा मामला अल्जीरिया का है, लेकिन इसकी आंच भारत तक भी पहुंच सकती है। (Su-57 CAATSA sanctions India)

Su-57 CAATSA sanctions India: अल्जीरिया को क्यों दी अमेरिका ने चेतावनी

अमेरिका के विदेश मंत्रालय के अधिकारी रॉबर्ट पैलाडिनो ने अमेरिकी सीनेट की फॉरेन रिलेशंस कमेटी में साफ कहा है कि अल्जीरिया का रूस से हथियार खरीदना “बेहद चिंताजनक” है। उन्होंने इशारों में कहा कि अगर अल्जीरिया ने सु-57 स्टेल्थ फाइटर जेट का सौदा आगे बढ़ाया, तो उस पर काउंटरिंग अमेरिकाज एडवर्सरीज थ्रू सैंक्शंस एक्ट यानी CAATSA के तहत प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।

दरअसल, अल्जीरिया पिछले साल रूस से सु-57 खरीदने वाला दुनिया का पहला एक्सपोर्ट कस्टमर बना था। लीक दस्तावेजों के मुताबिक, अल्जीरिया ने रूस से करीब 12 सु-57 फाइटर जेट खरीदे हैं, जिनकी डिलीवरी 2024 से 2026 के बीच होनी है। नवंबर 2025 में यह भी खबर आई थी कि अल्जीरिया को पहले दो सु-57 मिल चुके हैं और वे ऑपरेशनल ड्यूटी पर भी लगाए जा रहे हैं। (Su-57 CAATSA sanctions India)

CAATSA क्या है और यह क्यों अहम है

CAATSA अमेरिका का वह कानून है, जिसके तहत रूस, ईरान और उत्तर कोरिया जैसे देशों से बड़े रक्षा सौदे करने वालों पर प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। इसका मकसद अमेरिका के विरोधी देशों की सैन्य और आर्थिक ताकत को कमजोर करना है। इस कानून के तहत अमेरिका न केवल सीधे प्रतिबंध लगा सकता है, बल्कि सेकेंडरी सैंक्शंस के जरिए उन देशों और कंपनियों पर भी कार्रवाई कर सकता है, जो प्रतिबंधित रूसी संस्थाओं से लेन-देन करते हैं।

इन प्रतिबंधों का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि अमेरिका उस देश को डिफेंस टेक्नोलॉजी, हथियार, इंजन और स्पेयर सप्लाई रोक सकता है। (Su-57 CAATSA sanctions India)

भारत कर रहा सु-57 खरीदने की तैयारी

हालांकि भारत अभी तक सु-57 का ग्राहक नहीं है, लेकिन रिपोर्ट्स के मुताबिक भारत इस फाइटर जेट को लेकर गंभीरता से विचार कर रहा है। भारतीय वायुसेना के सामने एक बड़ी चुनौती है पांचवीं पीढ़ी के स्टेल्थ फाइटर की कमी।

भारत का स्वदेशी स्टेल्थ फाइटर प्रोजेक्ट AMCA अभी डिजाइन और डेवलपमेंट फेज में है। इसके ऑपरेशनल होने में कम से कम 10 साल का समय लग सकता है। इसी गैप को भरने के लिए रूस ने भारत को सु-57 के को-प्रोडक्शन का ऑफर दिया है।

हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड यानी एचएएल इस ऑफर का मूल्यांकन कर रही है। भारत दो से तीन स्क्वाड्रन (करीब 36 से 54 विमान) खरीदने की योजना बना रहा है, ताकि AMCA आने तक वायुसेना की स्टेल्थ जरूरत पूरी की जा सके। (Su-57 CAATSA sanctions India)

तुर्की का उदाहरण: सबसे बड़ा सबक

CAATSA का सबसे बड़ा उदाहरण तुर्की है। तुर्की ने रूस से एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम खरीदा था। इसके बाद अमेरिका ने उस पर प्रतिबंध लगाए और उसे एफ-35 स्टेल्थ फाइटर प्रोग्राम से बाहर कर दिया।

यह तब हुआ जब तुर्की न सिर्फ अमेरिका का करीबी सहयोगी था, बल्कि नाटो का सदस्य भी था। तुर्की ने एफ-35 प्रोग्राम में करीब 1.4 बिलियन डॉलर का निवेश किया था, लेकिन फिर भी उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।

हालांकि एस-400 सौदे पर 2018 और 2022 में अमेरिका ने भारत पर CAATSA लगाने की धमकी दी थी, लेकिन उस दौरान बाइडन प्रशासन ने वेवर दे दिया था। वहीं, 2025 में सु-57 खरीदने की चर्चाओं के दौरान भी काटसा थोपने की चेतावनी दी गई, लेकिन अभी कोई सैक्शंस नहीं लगाए गए। लेकिन अब ज्योपॉलिटिकल हालात बदल चुके हैं। अमेरिका ने जिस तरह से रूसी तेल खरीदने को लेकर भारत पर दबाव बनाया और ऊंचा टैरिफ लगा कर ट्रेड डील को रोके रखा। वहीं रूसी तेल खरीद कम करने के बाद ट्रेड डील को अंजाम देने के बाद माना जा रहा है कि अगर भारत सु-57 खरीदने की कोशिश करता है, तो यह भारी पड़ सकता है। (Su-57 CAATSA sanctions India)

रूस की कंपनियां पहले से प्रतिबंधित

रूस की सरकारी रक्षा कंपनी रोस्टेक पहले से ही अमेरिका की प्रतिबंधित सूची में है। इसी कंपनी के तहत यूनाइटेड एयरक्राफ्ट कॉर्पोरेशन आती है, जो सु-57 बनाती है। अमेरिका के ट्रेजरी विभाग ने 2022 में रोस्टेक और उससे जुड़ी कई संस्थाओं पर कड़े प्रतिबंध लगाए थे। ऐसे में जो भी देश या कंपनी रोस्टेक से बड़ा सौदा करती है, उस पर सेकेंडरी सैंक्शंस का खतरा रहता है। (Su-57 CAATSA sanctions India)

अगर भारत पर काटसा लगा तो क्या होगा?

अगर भारत पर काटसा के तहत सख्त कार्रवाई होती है, तो इसका असर सिर्फ रूस से जुड़े सौदों तक सीमित नहीं रहेगा। इसका सीधा असर भारत-अमेरिका डिफेंस सहयोग पर पड़ सकता है। भारत ने अमेरिका से भी कई अहम रक्षा सौदे किए हैं। इनमें 31 एमक्यू-9बी ड्रोन, एएच-64ई अपाचे अटैक हेलिकॉप्टर, स्ट्राइकर इन्फैंट्री कॉम्बैट व्हीकल और जैवलिन एंटी-टैंक मिसाइल शामिल हैं।

सबसे अहम बात यह है कि भारत का स्वदेशी फाइटर जेट तेजस अमेरिकी कंपनी जीई 404 इंजन पर निर्भर है। आने वाले सालों में एचएएल को वायुसेना को 180 तेजस एमके-1ए विमान देने हैं और तेजस एमके-2 के लिए जीई 414 इंजन की डील भी करनी है। अगर काटसा के चलते अमेरिका इंजन सप्लाई या टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर रोक लगाता है, तो पूरा प्रोग्राम खतरे में पड़ सकता है। (Su-57 CAATSA sanctions India)

भारत को पहले मिल चुकी है छूट

हालांकि भारत का मामला अब तक अलग रहा है। भारत ने 2018 में रूस से पांच एस-400 रेजिमेंट खरीदीं, लेकिन उस पर काटसा लागू नहीं किया गया। 2022 में अमेरिकी संसद ने भारत को इस मामले में छूट देने की सिफारिश भी की थी। इसी तरह ईरान के चाबहार पोर्ट के लिए भी भारत को सीमित समय की छूट मिली।

यह दिखाता है कि अमेरिका भारत को रणनीतिक नजर से देखता है और कई बार विशेष रियायत देता रहा है। यहां तक कि डोनाल्ड ट्रंप ने एक समय भारत को एफ-35 देने का प्रस्ताव भी दिया था, जबकि भारत के पास एस-400 सिस्टम मौजूद है। (Su-57 CAATSA sanctions India)

फिर भी क्यों बढ़ी चिंता

इसके बावजूद चिंता इसलिए बढ़ी है क्योंकि डोनाल्ड ट्रंप ने यह भी दिखाया है कि वह सख्त फैसले लेने से पीछे नहीं हटते। रूसी तेल खरीद के मुद्दे पर उन्होंने भारत पर भारी टैरिफ लगाए थे। ऐसे में अगर भारत सु-57 सौदे की ओर बढ़ता है, तो उसे हर पहलू को बहुत सावधानी से देखना होगा।

वहीं, भारत आज एक नाजुक मोड़ पर खड़ा है। एक तरफ वायुसेना को तुरंत स्टेल्थ फाइटर की जरूरत है, दूसरी तरफ अमेरिकी डिफेंस सप्लाई और तेजस प्रोग्राम की मजबूरी भी है। सु-57 डील भारत को शॉर्ट टर्म में ताकत दे सकती है, लेकिन लॉन्ग टर्म में यह अमेरिका के साथ बने रणनीतिक संतुलन को बिगाड़ सकती है।

अब देखना यह होगा कि भारत रूस के ऑफर पर कितना आगे बढ़ता है, और क्या अमेरिका इस मामले में भी भारत के लिए अलग रास्ता निकालता है, या फिर काटसा की तलवार इस बार सच में लटकती है। (Su-57 CAATSA sanctions India)