Home Blog Page 45

K-4 Missile Test: पांच प्वाइंट्स में समझें भारत के लिए यह मिसाइल टेस्ट क्यों है खास, पढ़ें कैट-एंड-माउस गेम की पूरी कहानी

K-4 Missile Test Explained: Why India’s Submarine-Launched Nuclear Missile Is Crucial and How New Delhi Outsmarted Chinese Spy Ships
K-4 Missile Test Explained: Why India’s Submarine-Launched Nuclear Missile Is Crucial and How New Delhi Outsmarted Chinese Spy Ships

K-4 Missile Test: भारत ने हाल ही में बंगाल की खाड़ी में स्वदेशी न्यूक्लियर सबमरीन आईएनएस अरिहंत से 3,500 किलोमीटर तक मार करने वाली के-4 सबमरीन-लॉन्च्ड बैलिस्टिक मिसाइल का परीक्षण किया। खास बात यह 3,500 किमी रेंज वाली मिसाइल परमाणु हथियार ले जा सकती है। हालांकि यह टेस्ट पहले 3 दिसंबर को होना था, लेकिन श्रीलंका में चक्रवात आने की वजह से इसे टालना पड़ा। लेकिन इस बार भारत ने बेहद गोपनीय तरीके से इस परीक्षण का अंजाम दिया। आइए पांच प्वाइंट्स में समझते हैं इस बार ये टेस्ट क्यों है खास।

K-4 Missile Test: अब पॉन्टून नहीं, असली पनडुब्बी से टेस्ट

यह के-4 मिसाइल का आईएनएस अरिघात से दूसरा सफल परीक्षण है। इससे पहले नवंबर 2024 में इसी पनडुब्बी से के-4 का पहला टेस्ट किया गया था। शुरुआत में के-4 मिसाइल के ज्यादातर टेस्ट समुद्र में बनाए गए अंडरवाटर प्लेटफॉर्म यानी सबमर्सिबल पॉन्टून से किए जाते थे। लेकिन अब ऑपरेशनल न्यूक्लियर सबमरीन आने के बाद से सभी टेस्ट इसी से हो रहे हैं। वहीं, सबमरीन से बार-बार सफल लॉन्च होना इस बात का संकेत है कि यह सिस्टम अब धीरे-धीरे पूरी तरह ऑपरेशनल हो रहा है। (K-4 Missile Test)

INS अरिघात को अगस्त 2024 में भारतीय नौसेना में शामिल किया गया था। यह भारत की दूसरी स्वदेशी न्यूक्लियर बैलिस्टिक मिसाइल सबमरीन है और इसे खास तौर पर लंबी दूरी की परमाणु मिसाइलों के लिए तैयार किया गया है।

K-4 Missile Test: के-15 से कहीं ज्यादा लंबी मारक क्षमता

आईएनएस अरिघात से पहले भारत की पहली परमाणु पनडुब्बी आईएनएस अरिहंत पर मुख्य तौर पर के-15 मिसाइलें तैनात थीं। के-15 मिसाइल की रेंज करीब 750 किलोमीटर थी। इसके मुकाबले के-4 मिसाइल की रेंज करीब 3,500 किलोमीटर है। लंबी रेंज का फायदा यह है कि पनडुब्बी को दुश्मन के तट के बहुत करीब जाने की जरूरत नहीं पड़ती। इससे पनडुब्बी की सुरक्षा बढ़ती है और उसकी पहचान होने की संभावना कम हो जाती है। यही वजह है कि के-4 को भारत की समुद्री परमाणु क्षमता के लिए बेहद अहम माना जाता है। (K-4 Missile Test)

K-4 Missile Test: भारत की स्ट्रैटेजिक फोर्सेस कमांड का अहम रोल

इस पूरे टेस्ट को पूरी तरह गोपनीय रखा गया है। दरअसल यह भारत की स्ट्रैटेजिक फोर्सेस कमांड के तहत आता है, जिसे स्ट्रैटेजिक न्यूक्लियर कमांड भी कहा जाता है। यह भारतीय सशस्त्र बलों की एक विशेष ट्राई-सर्विसेज कमांड है, जो न्यूक्लियर कमांड अथॉरिटी का हिस्सा है और देश के परमाणु हथियारों के प्रबंधन, प्रशासन और ऑपरेशनल कंट्रोल के लिए जिम्मेदार है। यह कमांड 4 जनवरी 2003 को अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने बनाई थी, ताकि भारत की न्यूक्लियर ट्रायड (जमीन, हवा और समुद्र आधारित परमाणु क्षमता) को प्रभावी ढंग से संभाला जा सके। (K-4 Missile Test)

K-4 Missile Test: सेकंड स्ट्राइक कैपेबिलिटी हुई मजबूत

सेकंड स्ट्राइक कैपेबिलिटी परमाणु युद्ध की सबसे महत्वपूर्ण अवधारणा है। इसका मतलब है कि अगर कोई दुश्मन देश भारत पर पहला परमाणु हमला करता है और भारत के जमीनी ठिकाने, एयर बेस या कमांड सेंटर को नष्ट करने की कोशिश करता है, तब भी भारत के पास जवाबी परमाणु हमला करने की गारंटीड क्षमता बची रहेगी। यह क्षमता इसलिए जरूरी है, क्योंकि यह दुश्मन को पहला हमला करने से रोकती है। उसे पता होता है कि हमला करने पर भी वह खुद पूरी तरह तबाह हो जाएगा। इसे म्यूचुअल एश्योर्ड डिस्ट्रक्शन या क्रेडिबल डिटरेंस कहा जाता है। भारत की आधिकारिक नीति “नो फर्स्ट यूज” है, इसलिए सेकंड स्ट्राइक कैपेबिलिटी उसके लिए बेहद अहम है। (K-4 Missile Test)

K-4 Missile Test: चीनी वैसल्स को दिया गच्चा: कैट-एंड-माउस गेम की पूरी कहानी

रिपोर्ट्स के मुताबिक यह ट्रायल विशाखापट्टनम के तट से दूर समुद्री क्षेत्र में किया गया, जहां दिसंबर के मध्य में जारी नोटैम यानी नोटिस टू एयरमेन के जरिए बड़े इलाके को ट्रायल के लिए सुरक्षित घोषित किया गया था। दरअसल जब भी भारत कोई मिसाइल टेस्ट करने की योजना बनाता है, तो चीनी वैसल्स उस इलाके के इर्द-गिर्द एकत्रित हो जाते हैं, ताकि मिसाइल टेस्ट का डेटा जुटाया जा सके और चीन उन्हें अपनी मिसाइलों को अपग्रेड करने के लिए इस्तेमाल कर सके। कुछ दिनों पहले भी इस क्षेत्र में एक नहीं बल्कि चीन चीनी रिसर्च जहाज मौजूद थे।

सूत्रों का कहना है कि यह परीक्षण पहले 1 से 3 दिसंबर के बीच होना था, लेकिन 3 दिसंबर को टेस्ट रेंज के पास एक चीनी जहाज देखे जाने के बाद इसे टाल दिया गया। यह चाइनीज ओशन मिनरल रिसोर्सेज वेसल था, जिसे टेस्ट रेंज की दक्षिणी सीमा से करीब 115 नॉटिकल मील दूर देखा गया। हालांकि उस दौरान श्रीलंका में चक्रवात भी आ गया था, जो मिसाइल टेस्ट टालने की बड़ी वजह भी बना। (K-4 Missile Test)

भारत ने कई बार 1-4 दिसंबर, 17-20 दिसंबर, 22-24 दिसंबर में नोटैम जारी किए। जिनकी रेंज लगभग 3,000-3,500 किमी थी। हर बार नोटैम जारी होते ही चीन के 4-5 रिसर्च वैसल्स शी यान 6, शेन हाय यी हाओ, लान हाई 101, द यांग यी हाओ उस इलाके में पहुंच जाते थे। वहीं, चीन का एक लुयांग–III श्रेणी का डेस्ट्रॉयर, एक जियांगकाई–II फ्रिगेट और एक फुची क्लास टैंकर भी इस इलाके में थे। ये सभी जहाज चीन के 48वें एंटी-पायरेसी एस्कॉर्ट फोर्स का हिस्सा थे और उस समय गल्फ ऑफ एडन के पास तैनात थे। ये जहाज मिसाइल की ट्रैजेक्टरी, टेलीमेट्री डेटा, अकॉस्टिक सिग्नेचर और डेब्रिस कलेक्ट करने में सक्षम हैं। जिससे चीन भारत की मिसाइल टेक्नोलॉजी की जासूसी कर सकता है। (K-4 Missile Test)

भारत भी चीन की रणनीति को लगातार समझता रहा और जानबूझकर नोटैम जारी करता था, जैसे ही चीन के जहाज आते थे, फिर भारत नोटैम कैंसल कर देता था। इससे चीन के जहाज बेकार घूमते रहते, ईंधन बर्बाद होता और उनकी लोकेशन पता चल जाती। भारतीय नौसेना चीफ एडमिरल दिनेश त्रिपाठी ने भी कहा कि चीनी जहाजों की मौजूदगी में टेस्ट को “रीकैलिब्रेट” (समायोजित) करना अब सामान्य प्रक्रिया है।

जिसके बाद सभी फेक/डिकॉय नोटैम जारी के बाद, भारत ने बिना कोई नया नोटैम जारी किए 23 दिसंबर को टेस्ट कर दिया। हालांकि चीनी जहाज उस इलाके में जरूर थे, लेकिन उन्हें पता ही नहीं चला कि टेस्ट हो रहा है, क्योंकि कोई पूर्व चेतावनी नहीं थी। के-4 मिसाइल सफलतापूर्वक लॉन्च हुई, सभी पैरामीटर पूरे हुए, लेकिन कोई जासूसी डेटा चीन को नहीं मिल पाया। (K-4 Missile Test)

के-4 के बाद के-5 और के-6 की तैयारी

भारत की न्यूक्लियर ट्रायड में जमीन से मार करने वाली मिसाइलें, हवा से हमला करने वाले विमान और समुद्र से हमला करने वाली पनडुब्बियां शामिल हैं। समुद्र से दागी जाने वाली मिसाइलें इस ट्रायड का सबसे सुरक्षित हिस्सा मानी जाती हैं, क्योंकि पनडुब्बियां लंबे समय तक समुद्र के भीतर छिपी रह सकती हैं। (K-4 Missile Test)

के-4 मिसाइल का डेवलपमेंट भारत के डिफेंस रिसर्च फ्रेमवर्क के तहत किया गया है। इसे डीआरडीओ ने तैयार किया है। इसके कई अहम हिस्सों का निर्माण पुणे और नासिक स्थित डीआरडीओ की प्रयोगशालाओं में किया गया है।

मिसाइल का रॉकेट मोटर, प्रोपेलेंट और लॉन्च सिस्टम पूरी तरह स्वदेशी तकनीक पर आधारित है। के-4 एक सॉलिड फ्यूल मिसाइल है, जो पानी के भीतर से कोल्ड लॉन्च तकनीक के जरिए बाहर निकलती है और फिर हवा में अपने इंजन को एक्टिव करती है। (K-4 Missile Test)

के-4 मिसाइल की लंबाई करीब 10 से 12 मीटर है और इसका वजन 17 से 20 टन के बीच है। यह लगभग 2 टन तक का वारहेड ले जाने में सक्षम है। मिसाइल को इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह दुश्मन की मिसाइल डिफेंस सिस्टम को चकमा दे सके। यह मिसाइल इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम पर आधारित है और जरूरत पड़ने पर टर्मिनल फेज में दिशा बदलने की क्षमता भी रखती है।

वहीं, के-4 के बाद भारत के-5 और के-6 जैसी लंबी दूरी की मिसाइलों पर भी काम कर रहा है। के-5 की रेंज 5,000 किलोमीटर से ज्यादा बताई जाती है, जबकि के-6 को और भी लंबी दूरी के लिए विकसित किया जा रहा है।

इसके अलावा आईएनएस अरिघात के बाद भारत की तीसरी परमाणु पनडुब्बी आईएनएस अरिधमान पर भी काम अंतिम चरण में बताया जा रहा है। इसके 2026 की शुरुआत में नौसेना में शामिल होने की संभावना जताई जा रही है। इसके अलावा अरिहंत श्रेणी की अगली पनडुब्बियां भी निर्माणाधीन हैं। भविष्य में आने वाली नई पनडुब्बियों में ज्यादा मिसाइल ट्यूब और अधिक एडवांस रिएक्टर लगाए जाने की योजना है। इससे भारत की समुद्री क्षमता और मजबूत होगी। (K-4 Missile Test)

Tactical RPA RFI: सेना को चाहिए रेगिस्तान से लद्दाख तक 24,000 फीट पर उड़ने वाले टैक्टिकल ड्रोन, 8 घंटे रहें हवा में, बिना रनवे भरें उड़ान

Tactical RPA RFI Procurement- Indian Army Issues RFI for High-End Armed Drones for Plains and High Altitude Area
Tactical RPA RFI Procurement- Indian Army Issues RFI for High-End Armed Drones for Plains and High Altitude Area

Tactical RPA RFI: ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय सेना अब भविष्य की जंग के लिए खुद को एक नए स्तर पर तैयार कर रही है। सीमाओं पर बदलते खतरे, ड्रोन युद्ध की बढ़ती भूमिका और चीन-पाकिस्तान जैसे पड़ोसियों की बढ़ती हिमाकत को देखते हुए सेना ने एक अहम कदम उठाया है। रक्षा मंत्रालय की ओर से टैक्टिकल रिमोटली पायलटेड एयरक्राफ्ट (टैक आरपीए) यानी मॉडर्न मिलिट्री ड्रोन के लिए रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन (आरएफआई) जारी की है।

आरएफआई के जरिए सेना यह जानना चाहती है कि भारत में कौन-कौन सी कंपनियां ऐसे एडवांस हथियारबंद ड्रोन बना सकती हैं, जो मैदानी इलाकों से लेकर ऊंचाई वाले पहाड़ी इलाकों में हर हालात में काम कर सकें। (Tactical RPA RFI)

Tactical RPA RFI: सेना को चाहिए 20 टैक्टिकल आरपीए ड्रोन

जारी आरएफआई के तहत सेना लगभग 20 टैक्टिकल आरपीए ड्रोन शामिल करने की योजना बना रही है। यह पूरी खरीद मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत के तहत होगी। सेना की योजना के मुताबिक इनमें से 10 ड्रोन मैदानी इलाकों के लिए होंगे, जबकि 10 को खास तौर पर ऊंचाई वाले और दुर्गम पहाड़ी इलाकों में तैनात किया जाएगा। सेना की तैयारी है कि ये ड्रोन ऐसे होने चाहिए, जो पंजाब और राजस्थान जैसे मैदानी इलाकों से लेकर लद्दाख और अरुणाचल की ऊंची चोटियों तक, हर जगह काम कर सकें। सेना चाहती है कि ये ड्रोन दिन-रात, हर मौसम और हर हालात में उड़ान भर सकें। (Tactical RPA RFI)

सेना की इस पहल को हाल के समय में सीमाओं पर बदले हालात से जोड़कर देखा जा रहा है। लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल और लाइन ऑफ कंट्रोल पर ड्रोन गतिविधियां लगातार बढ़ी हैं। इन ड्रोन का इस्तेमाल दुश्मन देश निगरानी से लेकर, हथियार गिराने और जासूसी में लगातार किया जा रहा है। ऐसे में भारतीय सेना के लिए यह जरूरी हो गया है कि वह सिर्फ जवाबी कार्रवाई न करे, बल्कि पहले से ही दुश्मन की हर चाल पर नजर रख सके। (Tactical RPA RFI)

Tactical RPA RFI: अपग्रेड करने का भी हो विकल्प

सेना के मुताबिक टैक्टिकल रिमोटली पायलटेड एयरक्राफ्ट एक मल्टी-रोल प्लेटफॉर्म होगा, जो एक साथ कई काम कर सके। इसमें निगरानी, जासूसी, इलेक्ट्रॉनिक निगरानी और जरूरत पड़ने पर सीधे हमले की क्षमता भी होनी चाहिए। ड्रोन का डिजाइन मॉड्यूलर होना चाहिए, ताकि भविष्य में बिना पूरे सिस्टम को बदले नए सेंसर और हथियार जोड़े जा सकें। सेना चाहती है कि ये ड्रोन आने वाले 15–20 साल तक तकनीकी रूप से एडवांस बने रहें, ताकि उन्हें अपग्रेड भी किया जा सके। (Tactical RPA RFI)

Tactical RPA RFI: झेल सकें 60 नॉट्स तक की तेज हवा

सेना ने आरएफआई में साफ किया है कि ये ड्रोन दिन और रात दोनों समय काम करने में सक्षम होने चाहिए। खराब मौसम, तेज हवा, बारिश, अत्यधिक ठंड और गर्मी जैसे हालात में भी ये काम कर सकें। ऊंचाई वाले इलाकों में ऐसे ड्रोन चााहिए जो 60 नॉट्स तक की तेज हवा झेल सकें, जबकि मैदानी इलाकों में इस्तेमाल किए जाने वाले 30 नॉट्स तक की हवा में भी स्थिर उड़ान भर सकें। (Tactical RPA RFI)

Tactical RPA RFI Procurement- Indian Army Issues RFI for High-End Armed Drones for Plains and High Altitude Area-1
Tactical RPA RFI Procurement- Indian Army Issues RFI for High-End Armed Drones for Plains and High Altitude Area-1

Tactical RPA RFI: माइनस 40 डिग्री सेल्सियस में भी करे काम

तापमान को लेकर भी सेना ने मानक तय किए हैं। ऊंचाई वाले इलाकों में ड्रोन को माइनस 40 डिग्री सेल्सियस से लेकर प्लस 30 डिग्री सेल्सियस तक काम करना होगा। वहीं मैदानी इलाकों में यह सीमा माइनस 20 से लेकर प्लस 45 डिग्री सेल्सियस तक रखी गई है। इसका मतलब है कि इन ड्रोन को सियाचिन जैसी ठंडी जगह और राजस्थान जैसी गर्म जगह पर भी समान रूप से सक्षम होना होगा। (Tactical RPA RFI)

Tactical RPA RFI: रेंज 400 किलोमीटर तक

ड्रोनों की उड़ान क्षमता को लेकर सेना ने कड़े मानक तय किए हैं। ड्रोन को सामान्य रेडियो कंट्रोल यानी लाइन ऑफ साइट मोड में कम से कम 120 किलोमीटर तक काम करना होगा। वहीं अगर सैटेलाइट कम्युनिकेशन का इस्तेमाल किया जाए, तो इसकी रेंज 400 किलोमीटर या उससे अधिक होनी चाहिए। इससे सेना को दूर-दराज के इलाकों में भी निगरानी और ऑपरेशन करने की सुविधा मिलेगी। (Tactical RPA RFI)

Tactical RPA RFI: 8 घंटे लगातार हवा में रहें ड्रोन

इसके अलावा आरएफआई की शर्तों में ऊंचाई को लेकर सेना में स्टैंडर्ड तय किए हैं। मैदानी इलाकों के लिए ड्रोन को कम से कम 14,000 फीट की ऊंचाई तक काम करने में सक्षम होना होगा। वहीं ऊंचाई वाले इलाकों के लिए यह सीमा 24,000 फीट तक रखी गई है। इसके साथ ही ड्रोन में कम से कम 8 घंटे लगातार हवा में रहने की क्षमता भी होनी चाहिए। ताकि लंबे समय तक निगरानी और मिशन को अंजाम दिया जा सके। (TACTICAL REMOTELY PILOTED AIRCRAFTS)

Tactical RPA RFI: रनवे पर निर्भरता नहीं

सेना ने यह भी स्पष्ट किया है कि ड्रोन को उड़ाने के लिए लंबे और पक्के रनवे की जरूरत नहीं होनी चाहिए। सीमावर्ती और दुर्गम इलाकों में ऐसी सुविधाएं हमेशा उपलब्ध नहीं होतीं। इसलिए ड्रोन या तो सीधे ऊपर उठकर यानी वीटीओएल मोड में उड़ान भर सके, या फिर 200 मीटर की कच्ची पट्टी से टेकऑफ कर सके। साथ ही कुछ मामलों में कैटापल्ट लॉन्च और पैराशूट के जरिए लैंडिंग का भी फीचर होना चाहिए। (TACTICAL REMOTELY PILOTED AIRCRAFTS)

50 किमी दूर से पहचानने की हो क्षमता

ड्रोन के सेंसर और पेलोड को लेकर भी सेना चाहती है कि ड्रोन में ऐसे कैमरे और सिस्टम लगाए जाएं, जो दिन और रात दोनों समय हाई-डेफिनिशन फोटो और वीडियो दे सकें। इसमें इलेक्ट्रो ऑप्टिक और इंफ्रारेड कैमरा, थर्मल सेंसर, और लेजर बेस्ड सिस्टम शामिल होंगे, जो अंधेरे, धुंध और खराब मौसम में भी दुश्मन की हलचल को पकड़ सकें। इनमें लेजर रेंज फाइंडर और लेजर डिजाइनटर भी होना चाहिए, ताकि जरूरत पड़ने पर सटीक हमला किया जा सके।

इसके अलावा ड्रोन को इंसानों और वाहनों को 40-50 किलोमीटर दूर से पहचानने और करीब 15 किलोमीटर से साफ तौर पर पहचानने में सक्षम होना चाहिए। (TACTICAL REMOTELY PILOTED AIRCRAFTS)

पकड़ सकें दुश्मन के सिग्नल 

आरएफआई में यह भी कहा गया है कि यह ड्रोन सिर्फ देखने वाला नहीं होगा, बल्कि सुनने वाला भी होगा। इसमें ईएलआईएनटी और कॉमइंट सिस्टम लगाए जाएंगे, जो दुश्मन के रेडियो, मोबाइल, रडार और कम्युनिकेशन सिग्नल को पकड़ सकें। सेना चाहती है कि ड्रोन 100 किलोमीटर दूर से भी ऐसे सिग्नल पकड़ सके। इससे दुश्मन की गतिविधियों की पहले से जानकारी मिल सकेगी। इसके अलावा ड्रोन में एफओपीईएन रडार भी होना चाहिए, जो जंगलों के अंदर छिपे टारगेट्स, बर्फीले इलाकों और पहाड़ी ढलानों पर मौजूद गतिविधियों को भी आसानी से पहचान सके। (TACTICAL REMOTELY PILOTED AIRCRAFTS)

जैमिंग और जीपीएस फेल होने पर भी उड़ान भरें ड्रोन

आज की जंग में दुश्मन सबसे पहले जीपीएस जैमिंग और साइबर अटैक करता है। सेना इसलिए चाहती है कि ड्रोन सिर्फ जीपीएस पर निर्भर न रहे। ड्रोन को जीपीएस, ग्लोनास, गैलीलियो और नाविक, चारों सिस्टम इस्तेमाल करने होंगे। अगर फिर भी जीपीएस सिग्नल खत्म हो जाए, तो ड्रोन आईएनएस, आईएमयू और विजुअल नेविगेशन से उड़ान जारी रख सके। वहीं, अगर हालात बहुत खराब हों, तो ड्रोन अपने आप सुरक्षित तरीके से वापस बेस पर लौट आए। (TACTICAL REMOTELY PILOTED AIRCRAFTS)

Tactical RPA RFI: हथियार भी ढो सकें ड्रोन

इन ड्रोनों को केवल निगरानी तक के लिए सीमित नहीं रखा गया है। सेना चाहती है कि यह ड्रोन 200 किलोग्राम तक हथियार ले जाने में सक्षम हो। इसमें एयर-टू-ग्राउंड मिसाइल, प्रिसिजन ग्लाइड बम, एंटी-टैंक हथियार और लॉइटरिंग म्यूनिशन शामिल हैं। यानी जरूरत पड़ने पर यह ड्रोन दुश्मन पर सीधा हमला भी कर सकेगा। (TACTICAL REMOTELY PILOTED AIRCRAFTS)

डेटा सुरक्षा सबसे अहम

आरएफआई में कहा गया है कि ड्रोन से मिलने वाला सारा डेटा बेहद संवेदनशील होगा। इसलिए सेना ने साफ कहा है कि सारा डेटा 256-बिट एईएस एन्क्रिप्शन से सुरक्षित होना चाहिए। अगर किसी कारण से ड्रोन गिर जाए या दुश्मन के हाथ लग जाए, तो उसमें मौजूद डेटा अपने आप नष्ट हो जाना चाहिए।

भारतीय सिस्टम से हो सके कनेक्ट

आरएफआई के मुताबिक यह ड्रोन भारतीय सेना के मौजूदा कमांड, कंट्रोल, कम्युनिकेशन और इंटेलिजेंस सिस्टम से कनेक्ट होना चाहिए। ताकि लाइव वीडियो और डेटा सीधे कमांड सेंटर तक पहुंचता रहे। इसे सेना के काउंटर-ड्रोन सिस्टम के साथ भी इंटीग्रेट किया जाएगा, ताकि पूरे बैटलफील्ड की एक साझा तस्वीर मिल सके। (TACTICAL REMOTELY PILOTED AIRCRAFTS)

भारतीय कंपनियों को प्राथमिकता

आरएफआई में कहा गया इस पूरी प्रक्रिया में भारतीय कंपनियों को प्राथमिकता दी जाएगी। आरएफआई के अनुसार, इसमें सिर्फ भारतीय कंपनियां या भारतीय कंपनी के साथ साझेदारी करने वाली विदेशी कंपनियां ही हिस्सा ले सकती हैं। कंपनियों से यह भी पूछा गया है कि ड्रोन में कितने प्रतिशत स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल किया जाएगा और भविष्य में मेंटेनेंस और सपोर्ट की व्यवस्था कैसे की जाएगी। इसके साथ ही कंपनियां यह भी बताएं कि भविष्य में किन-किन हिस्सों को और ज्यादा स्वदेशी बनाया जा सकता है। सरकार चाहती है कि सिर्फ ड्रोन खरीदे न जाएं, बल्कि देश में ही पूरा ड्रोन इकोसिस्टम तैयार किया जाए। (TACTICAL REMOTELY PILOTED AIRCRAFTS)

Tactical RPA RFI: 18 मार्च 2026 तक का समय

रक्षा मंत्रालय ने आरएफआई का जवाब देने के लिए कंपनियों को 18 मार्च 2026 तक का समय दिया है। सके बाद सेना सभी जवाबों का अध्ययन करेगी, तकनीकी जरूरतें तय करेगी और फिर रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल जारी किया जाएगा। (TACTICAL REMOTELY PILOTED AIRCRAFTS)

Akash NG Missile को क्यों कहा जा रहा है “पुअर मैंस पैट्रियट”! कम रडार क्रॉस सेक्शन वाले ड्रोन को भी करेगी ढेर

Akash NG Missile Clears User Evaluation Trials With Extended Range and Sleeker Design
Akash NG Missile Clears User Evaluation Trials With Extended Range and Sleeker Design

Akash NG Missile: डीआरडीओ ने हाल ही में आकाश-न्यू जेनरेशन मिसाइल सिस्टम यानी आकाश-एनजी का सफल परीक्षण किया। इस परीक्षण के साथ ही आकाश-एनजी के यूजर इवैल्यूएशन ट्रायल्स सफलतापूर्वक पूरे हो गए हैं। जिसके बाद भारतीय वायुसेना में इस आधुनिक सतह-से-हवा मिसाइल सिस्टम को शामिल करने का रास्ता साफ हो गया है। ट्रायल्स के दौरान आकाश-एनजी मिसाइल ने अलग-अलग दूरी और ऊंचाई पर उड़ रहे हवाई लक्ष्यों को सटीक तरीके से इंटरसेप्ट किया।

डीआरडीओ की तरफ जारी जानकारी के मुताबिक, इन परीक्षणों में मिसाइल सिस्टम को रियलिस्टिक वारटाइम कंडीशंस में परखा गया। इसमें लंबी दूरी पर ऊंचाई से आने वाले हवाई खतरे और सीमा के पास बहुत कम ऊंचाई पर उड़ रहे लक्ष्यों को भी सफलतापूर्वक नष्ट किया गया। यह ट्रायल्स ओडिशा के तट के पास इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज में किए गए, जहां पूरी निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था के बीच ट्रायल संपन्न हुआ।

आकाश मिसाइल की कहानी कई दशक पुरानी है। डीआरडीओ ने 1980 के दशक के अंत में इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम के तहत आकाश मिसाइल के डेवलपमेंट का काम शुरू किया था। इस कार्यक्रम का नेतृत्व उस समय डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम कर रहे थे। शुरुआती दौर में इस मिसाइल को एक शॉर्ट-टू-मीडियम रेंज सरफेस-टू-एयर मिसाइल के रूप में डेवलप किया गया, ताकि देश के संवेदनशील इलाकों और महत्वपूर्ण ठिकानों को हवाई हमलों से सुरक्षित रखा जा सके।

1990 और 2000 के दशक में आकाश मिसाइल के कई डेवलपमेंटल ट्रायल्स किए गए। इसके बाद भारतीय वायुसेना और भारतीय थलसेना ने इसके व्यापक यूजर ट्रायल्स किए। इन परीक्षणों में मिसाइल की रेंज, सटीकता और एक साथ कई लक्ष्यों को मार गिराने की क्षमता को परखा गया। सफल परीक्षणों के बाद वर्ष 2014 में आकाश मिसाइल को भारतीय वायुसेना में शामिल किया गया और इसके अगले वर्ष इसे भारतीय थलसेना में भी तैनात किया गया।

आकाश मिसाइल सिस्टम को इस तरह डिजाइन किया गया था कि यह एक साथ कई एरियल टारगेट्स को ग्रुप मोड या ऑटोनॉमस मोड में निशाना बना सके। इसमें इलेक्ट्रॉनिक काउंटर-काउंटरमेजर्स यानी ईसीसीएम की सुविधा दी गई, जिससे यह दुश्मन के इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग सिस्टम को भी बेअसर कर सके। समय के साथ भारतीय वायुसेना और थलसेना ने आकाश मिसाइल की कई स्क्वाड्रन और रेजिमेंट तैयार कीं।

हालांकि बदलते युद्ध के स्वरूप और नई तकनीकों के चलते डीआरडीओ ने आकाश मिसाइल के एक और आधुनिक वर्जन पर काम शुरू किया। जहां पुराने आकाश मिसाइल की ऑपरेशनल रेंज लगभग 27 से 30 किलोमीटर थी, वहीं, आकाश-एनजी की रेंज बढ़कर करीब 70 किलोमीटर तक पहुंच गई है। यह बदलाव देश के एयर डिफेंस के लिहाज से एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

आकाश-एनजी मिसाइल का डिजाइन पहले के मुकाबले ज्यादा हल्का और स्लीक बनाया गया है। इसका मतलब है कि मिसाइल का आकार और वजन दोनों कम किए गए हैं, जिससे इसकी तैनाती और ऑपरेशन आसान हो गया है। इसके साथ ही इसका ग्राउंड सिस्टम फुटप्रिंट भी छोटा किया गया है, जिससे कम जगह में भी इसे तैनात किया जा सकता है।

इस नए मिसाइल सिस्टम में पूरी तरह स्वदेशी कु बैंड रेडियो फ्रीक्वेंसी सीकर लगाया गया है। यह सीकर टारगेट को लास्ट फेज में खुद पहचान कर उस पर लॉक करता है। इसकी खूबी यह है कि यह सीकर लो रडार क्रॉस सेक्शन टारगेट्स जैसे ड्रोन्स, क्रूज मिसाइल्स को टर्मिनल फेज में लॉक कर सकता है। इसके साथ ही आकाश-एनजी में नया लॉन्चर, मल्टी-फंक्शन रडार और कमांड, कंट्रोल एवं कम्युनिकेशन सिस्टम शामिल किया गया है, जिससे पूरे सिस्टम की प्रतिक्रिया क्षमता और सटीकता बढ़ गई है। इसमें एईएसए मल्टी-फंक्शन रडार (MFR), इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल ट्रैकिंग, 360° कवरेज, 20-70° एलिवेशन फीचर है। खास बात यह है कि रडार की मदद से एक बैटरी 10 टारगेट्स को एक साथ एंगेज कर सकती है।

आकाश-एनजी को कैनिस्टराइज्ड लॉन्चर सिस्टम के साथ डेवलप किया गया है। कैनिस्टराइज्ड सिस्टम का मतलब होता है कि मिसाइल को एक खास तरह के सील्ड कंटेनर में रखा जाता है। इससे मिसाइल को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है और जरूरत पड़ने पर तुरंत लॉन्च किया जा सकता है। इससे ट्रांसपोर्टेशन और स्टोरेज दोनों आसान होता है और मिसाइल की ऑपरेशनल रेडीनेस को बेहतर होती है।

डीआरडीओ के अधिकारियों के अनुसार, आकाश-एनजी को खासतौर पर भारतीय वायुसेना की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है। यह मिसाइल उन हवाई खतरों को रोकने में सक्षम है, जो तेज रफ्तार से उड़ते हैं और जिनका रडार क्रॉस सेक्शन यानी आरसीएस बहुत कम होता है। कम आरसीएस वाले टारगेट्स को रडार पर पकड़ना कठिन होता है, लेकिन आकाश-एनजी को इन्हीं परिस्थितियों को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया है।

आकाश-एनजी के यूजर इवैल्यूएशन ट्रायल्स से पहले इसके कई अहम फ्लाइट टेस्ट किए गए थे। इस मिसाइल का पहला परीक्षण 25 जनवरी 2021 को किया गया था, जिसमें इसकी बुनियादी क्षमताओं को परखा गया। इसके बाद मार्च और जुलाई 2021 में इसके और परीक्षण किए गए। जुलाई 2021 में एक्टिव सीकर से लैस मिसाइल ने एक हाई-स्पीड अनमैन्ड एरियल टारगेट को सफलतापूर्वक इंटरसेप्ट किया था।

जनवरी 2024 में आकाश-एनजी का एक और महत्वपूर्ण फ्लाइट टेस्ट किया गया। इस परीक्षण में मिसाइल ने कम ऊंचाई पर तेज गति से उड़ रहे एक अनमैन्ड एरियल टारगेट को निशाना बनाया। इस सफलता के बाद इसके यूजर ट्रायल्स का रास्ता साफ हुआ। हालिया यूजर इवैल्यूएशन ट्रायल्स में मिसाइल ने सभी प्रोविजनल स्टाफ क्वालिटेटिव रिक्वायरमेंट्स यानी पीएसक्यूआर को पूरा किया।

डीआरडीओ ने बताया कि इन ट्रायल्स में पूरे वेपन सिस्टम की कार्यक्षमता को परखा गया। इसमें मिसाइल, लॉन्चर, रडार और कमांड-एंड-कंट्रोल सिस्टम सभी शामिल थे। अलग-अलग प्रकार के हवाई खतरों के खिलाफ सिस्टम की प्रतिक्रिया और सटीकता को जांचा गया।

आकाश-एनजी प्रोजेक्ट को सितंबर 2016 में मंजूरी दी गई थी। यह मिसाइल सिस्टम एक क्लीन-शीट डिजाइन पर आधारित है, यानी इसे पुराने आकाश सिस्टम का संशोधित रूप नहीं बल्कि पूरी तरह नए सिरे से डिजाइन किया गया है। पुराने आकाश इंटरसेप्टर का बेस सोवियत काल की एसए-6 मिसाइल थी, जबकि आकाश-एनजी आधुनिक तकनीक पर आधारित है।

आकाश-एनजी में ड्यूल-पल्स सॉलिड रॉकेट मोटर का इस्तेमाल किया गया है। इस मोटर में दो अलग-अलग फेज में थ्रस्ट मिलता है, जिससे मिसाइल को बेहतर मैन्यूवर करने की क्षमता मिलती है। इसके साथ इसमें स्वदेशी एक्टिव रेडियो फ्रीक्वेंसी सीकर लगाया गया है, जिसकी वजह से लक्ष्य की दूरी बढ़ने पर भी सटीकता बनी रहती है। साथ ही डुअल-पल्स सॉलिड रॉकेट मोटर मिड-फेज में “साइलेंट कोस्टिंग” करके हीट सिग्नेचर कम करता है, जिससे दुश्मन के इंफ्रारेंड सेंसर्स से बचने में मदद मिलती है।

डुअल-पल्स सॉलिड रॉकेट मोटर का पहला पल्स (बूस्ट फेज) लॉन्च के 5-10 सेकंड में फुल थ्रस्ट देता है, जिससे मिसाइल की रफ्तार मैक 2.5+ तक पहुंच जाती है। फिर मोटर ऑफ हो जाती है और मिसाइल बैलिस्टिक ग्लाइड पर जाती है। वहीं कोस्टिंग फेज में स्पीड मेंटेन रहती है लेकिन एग्जॉस्ट प्लूम और हीट कम होती है। आखिरी 10-15 किमी पर दूसरा पल्स एक्टिवेट होता है, जो टर्मिनल मैन्यूवरिंग के लिए हाई एनर्जी देता है जिसमें तेज टर्न्स, हाई-जी पुल-अप किए जा सकते हैं।

इस डिजाइन से न सिर्फ रेंज बढ़ती है बल्कि एंटी-सैचुरेशन अटैक कैपेबिलिटी भी बूस्ट होती है। सैचुरेशन अटैक में अगर दुश्मन 10-20 ड्रोन्स/क्रूज मिसाइल्स एक साथ भेजता है, ताकि डिफेंस सिस्टम को ओवरलोड किया जा सके। लेकिन आकाश-एनजी की कोस्टिंग फेज में कम हीट/आईआर सिग्नेचर से दुश्मन के इंफ्रा-रेड सर्च एंड ट्रैक सेंसर्स को मिसाइल देर से डिटेक्ट होती है– इससे बैटरी के रडार को प्रायरिटी तय करने में ज्यादा वक्त मिलता है।

कु बैंड आरएफ सीकर के साथ मिलकर यह फीचर “होम-ऑन-जैम” मोड को सपोर्ट करता है। अगर दुश्मन जैमिंग करता है, तो मिसाइल जैम सिग्नल पर ही लॉक कर लेती है। डुअल-पल्स की एनर्जी सेविंग से टर्मिनल फेज में सीकर के लिए ज्यादा पावर बचती है, जो जैमिंग में भी एक्यूरेट रहता है।

इसलिए आकाश एनजी को “पुअर मैंस पैट्रियट” भी कहा जा रहा है। जो न केवल सस्ता है बल्कि चीन और पाकिस्तान की हूथी स्टाइल ड्रोन स्वार्म स्ट्रैटेजी के खिलाफ भी बेहद असरदार हैं। ऑपरेशन सिंदूर में जैसे पुराने आकाश सिस्टम ने कई पाकिस्तानी ड्रोन मार गिराए थे, वहीं, आकाश एनजी वर्जन एलएसी पर चीन के हाई-स्पीड यूएवी जैसे डब्ल्यूजे-700) के लिए काल साबित होगा।

K-4 Missile Test: 3500 किमी तक मार सकेगी भारत की के-4 मिसाइल, स्वदेशी न्यूक्लियर सबमरीन INS Arihant से किया सफल टेस्ट

K-4 Missile Test: India Strengthens Sea-Based Nuclear Deterrence with INS Arihant Launch
K-4 Missile Test: India Strengthens Sea-Based Nuclear Deterrence with INS Arihant Launch

K-4 Missile Test: जब ऊपर आसमान में हलचल मची हो या जमीन पर शोर हो, तो समंदर के नीचे एक अलग ही शांति पसरी रहती है। इसी शांति के बीच भारत ने हाल ही में एक ऐसा कदम उठाया, जिसकी गूंज दूर तक जाती है। जिस समय पूरी दुनिया सो रही थी, तब भारत ने अपनी मैरीटाइम न्यूक्लियर कैपेबिलिटी को और मजबूत करते हुए एक बड़ी उपलब्धि हासिल की। बंगाल की खाड़ी में देश की पहली स्वदेशी न्यूक्लियर सबमरीन आईएनएस अरिहंत से के-4 सबमरीन-लॉन्च्ड बैलिस्टिक मिसाइल का सफल यूजर ट्रायल किया। इस मिसाइल की मारक क्षमता करीब 3,500 किलोमीटर थी। इस ट्रायल के बाद भारत का न्यूक्लियर ट्रायड और मजबूत हुआ है।

हालांकि इस ट्रायल को लेकर रक्षा मंत्रालय या डीआरडीओ की तरफ से कोई औपचारिक बयान जारी नहीं किया गया है, लेकिन डिफेंस सूत्रों ने इसकी पुष्टि की है। यह ट्रायल विशाखापट्टनम के तट से दूर समुद्री क्षेत्र में किया गया, जहां दिसंबर के मध्य में जारी नोटैम यानी नोटिस टू एयरमेन के जरिए बड़े इलाके को ट्रायल के लिए सुरक्षित घोषित किया गया था।

K-4 Missile Test: मुश्किल होता है समुद्र से मिसाइल परीक्षण

समुद्र के नीचे से बैलिस्टिक मिसाइल का परीक्षण तकनीकी रूप से बेहद मुश्किल माना जाता है। पनडुब्बी से छोड़ी जाने वाली मिसाइल पहले पानी के अंदर से गैस प्रेशर की मदद से बाहर निकलती है और फिर सतह के ऊपर आते ही उसका इंजन एक्टिव होता है।

के-4 मिसाइल को खास तौर पर भारत की अरिहंत क्लास न्यूक्लियर पनडुब्बियों के लिए डिजाइन किया गया है। यह दो-स्टेज सॉलिड फ्यूल रॉकेट पर आधारित बैलिस्टिक मिसाइल है, जिसकी लंबाई करीब 12 मीटर और वजन लगभग 17 टन बताया गया है। यह मिसाइल करीब दो टन तक का पेलोड ले जा सकती है, जिसमें न्यूक्लियर वारहेड भी शामिल हो सकते हैं।

मिसाइल में सटीकता के लिए एडवांस्ड इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम के साथ जीपीएस और नाविक सपोर्ट दिया गया है। सर्कुलर एरर प्रोबेबल यानी सीईपी बहुत कम होने की वजह से इसे हाई एक्युरेसी मिसाइल माना जाता है। इसके अलावा, इसमें मैन्यूवरेबल री-एंट्री व्हीकल की क्षमता भी है, जिससे यह मिसाइल डिफेंस सिस्टम को चकमा भी दे सकती है।

K-4 Missile Test: के-15 से के-4 तक का सफर

इससे पहले आईएनएस अरिहंत पर के-15 मिसाइलें तैनात थीं, जिनकी रेंज करीब 750 किलोमीटर थी। के-4 मिसाइल की तैनाती से इसकी रेंज में कई गुना इजाफा हुआ है। इससे भारत की मैरीटाइम न्यूक्लियर कैपेबिलिटी बढ़ी है। के-4 मिसाइल के जरिए समुद्र में तैनात पनडुब्बी से कहीं अधिक दूर तक लक्ष्य को भेदने की क्षमता मिलती है।

K-4 Missile Test: भारत के पास दो एसएसबीएन

भारत के पास इस समय दो ऑपरेशनल नाभिकीय बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियां हैं। आईएनएस अरिहंत पहली ऐसी पनडुब्बी है, जिसे 2016 में कमीशंड किया गया था और 2018 में यह पूरी तरह ऑपरेशनल हुई। इसके बाद अगस्त 2024 में भारत की दूसरी एसएसबीएन आईएनएस अरिघात को नौसेना में शामिल किया गया। यह पनडुब्बी पहले की तुलना में ज्यादा स्वदेशी तकनीक से लैस है और इसमें भी के-4 मिसाइल को लगाया गया है।

इसके अलावा, तीसरी न्यूक्लियर सबमरीन आईएनएस अरिधमन का निर्माण भी चल रहा है। यह भारत की तीसरी रिहंत क्लास की एस-4 स्वदेशी न्यूक्लियर-पावर्ड बैलिस्टिक मिसाइल सबमरीन है। नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी ने 2 दिसंबर को पुष्टि की थी कि यह सबमरीन अपने अंतिम ट्रायल चरण में है और बहुत जल्द कमीशन की जाएगी। यह सबमरीन आईएनएस अरिहंत और आईएनएस अरिघात से थोड़ी बड़ी (7,000 टन डिस्प्लेसमेंट) है, ज्यादा के-4 सबमरीन-लॉन्च्ड बैलिस्टिक मिसाइल (3,500 किमी रेंज) कैरी कर सकती है। इसमें बेहतर स्टेल्थ, एडवांस्ड सीएमएस और ऑप्टिमाइज्ड 83 मैगावॉट रिएक्टर से लैस। यह महीनों तक पानी के नीचे रहकर नौसेना को सेकंड-स्ट्राइक कैपेबिलिटी देगी।

इसके अलावा भारत की चौथी न्यूक्लियर-पावर्ड बैलिस्टिक मिसाइल सबमरीन कोडनेम एस-4 स्टार भी तैयार हो रही है। यह अरिहंत क्लास की आखिरी सबमरीन है। इसका निर्माण पूरा हो चुका है, अब हार्बर और सी ट्रायल्स की तैयारी चल रही है। इसकी कमीशनिंग 2026 के अंत या 2027 की शुरुआत में होने की उम्मीद है। इसका वजन करीब 7,000 टन है और इसमें 75 फीसदी इंडिजिनस कंटेंट है। इसमे 8 के-4 मिसाइल लॉन्च ट्यूब्स लगाए जा सकते हैं, जिनकी रेंज 3,500 किमी तक है। इसके बाद नेक्स्ट जेनरेशन एस5 क्लास सबमरीन बनाई जाएंगी, जिनमें 12-16 मिसाइल्स लगाई जा सकेंगी।

K-4 Missile Test: एटीवी प्रोग्राम के तहत तैयार हो रहीं पनडुब्बियां

भारत का एडवांस्ड टेक्नोलॉजी वेसल यानी एटीवी प्रोग्राम कई दशकों से चल रहा है। इसी प्रोग्राम के तहत अरिहंत क्लास और आगे की पनडुब्बियों को तैयार किया गया है। शुरुआती पनडुब्बियों में 83 मेगावाट का न्यूक्लियर रिएक्टर लगाया गया है, जबकि आगे आने वाली बड़ी पनडुब्बियों में ज्यादा क्षमता वाले प्रेसराइज्ड लाइट वाटर रिएक्टर लगाने की योजना है।

K-4 Missile Test: क्या है न्यूक्लियर ट्रायड

भारत की न्यूक्लियर ट्रायंगल अरेंजमेंट में जमीन, हवा और समुद्र तीनों शामिल हैं। जमीन आधारित बैलिस्टिक मिसाइलों में अग्नि-5 जैसी मिसाइलें शामिल हैं, जिनकी मारक क्षमता पांच हजार किलोमीटर से ज्यादा है। वायुसेना के पास राफेल, सुखोई-30 एमकेआई और मिराज-2000 जैसे लड़ाकू विमान हैं, जो विशेष हथियार ले जाने में सक्षम हैं। समुद्री में न्यूक्लियर सबमरीन सबसे सुरक्षित और भरोसेमंद मानी जाती हैं, क्योंकि इन्हें ढूंढना बेहद मुश्किल होता है।

ट्राई-सर्विस स्ट्रैटेजिक फोर्सेज कमांड के अधीन

इन न्यूक्लियर सबमरीन और मिसाइलों का ऑपरेशन ट्राई-सर्विस स्ट्रैटेजिक फोर्सेज कमांड के अधीन होता है। यह कमान देश की न्यूक्लियर एसेट्स के ऑपरेशन और कॉर्डिनेशन के लिए जिम्मेदार है। के-4 मिसाइल का परीक्षण इसी सिस्टम के तहत किया गया।

चीन और अमेरिका के पास भी हैं न्यूक्लियर सबमरीन

दुनिया में अमेरिका, रूस और चीन के पास बड़ी संख्या में न्यूक्लियर सबमरीन और इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलें हैं। चीन के पास जिन क्लास की पनडुब्बियां हैं, उनमें जेएल-2 और जेएल-3 जैसी लंबी दूरी की मिसाइलें तैनात हैं। अमेरिका के पास ओहायो क्लास एसएसबीएन हैं। भारत की पनडुब्बियां साइज और संख्या में भले ही कम हों, लेकिन के-4 जैसी मिसाइलों की तैनाती से उसकी मैरीटाइम न्यूक्लियर कैपेबिलिटी लगातार मजबूत होती जा रही है।

China Pakistan Grey Zone Warfare: ऑपरेशन सिंदूर के पीछे चीन की परछाईं? अमेरिकी रिपोर्ट में पाकिस्तान को मिली खुफिया मदद का दावा

China Pakistan Grey Zone Warfare

China Pakistan Grey Zone Warfare: ऐसे वक्त में जब भारत और चीन के संबंध सुधर रहे हैं, अमेरिका ने एक सनसखीखेज दावा किया है। ऑपरेशन सिंदूर को लेकर अमेरिका के रक्षा विभाग ने एक आकलन में दावा किया है कि इस ऑपरेशन के दौरान चीन ने पर्दे के पीछे रहकर पाकिस्तान की पूरी मदद की थी। यह मदद सीधे सैनिक भेजकर नहीं, बल्कि इंटेलिजेंस, इंफॉर्मेशन वॉरफेयर, साइबर एक्टिविटी, इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस और डिप्लोमैटिक मूव्स के जरिए की गई।

China Pakistan Grey Zone Warfare: क्या है ‘ग्रे-जोन स्ट्रैटेजी’?

अमेरिकी दावे के मुताबिक, ऑपरेशन सिंदूर चीन और पाकिस्तान की साझा ग्रे-जोन वॉरफेयर स्ट्रैटेजी का एक अहम उदाहरण रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान ने जमीन पर दिखने वाले हमले, प्रॉक्सी एक्टिविटी और सैन्य दबाव बनाया, जबकि चीन बैकग्राउंड में रहकर पूरा माहौल अपने हिसाब से ढालता रहा।

ग्रे-जोन स्ट्रैटेजी का मतलब होता है ऐसा दबाव बनाना, जो आमने-सामने का युद्ध न करके, लेकिन दुश्मन देश को लगातार तनाव में रखे। इसमें सीधी लड़ाई नहीं होती, बल्कि साइबर अटैक, फेक न्यूज, डिसइंफॉर्मेशन, डिप्लोमैटिक प्रेशर, इकोनॉमिक कोएर्शन और प्रॉक्सी ताकतों का इस्तेमाल किया जाता है।

यूएस रिपोर्ट के अनुसार, ऑपरेशन सिंदूर इस ग्रे-जोन रणनीति का एक तरह से टेस्ट केस था। पाकिस्तान ने सामने रहकर काम किया और चीन ने उसे हर जरूरी जानकारी और सपोर्ट चुपचाप उपलब्ध कराया।

China Pakistan Grey Zone Warfare: पाकिस्तान फ्रंट पर, चीन बैकग्राउंड में

रिपोर्ट कहती है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने जो भी काइनेटिक एक्शन किया उसके पीछे चीन का पूरा हाथ था। लेकिन असल में उसकी रियल-टाइम सिचुएशनल अवेयरनेस चीन की मदद से बेहतर हुई थी।

चीन के सैटेलाइट कवरेज, इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस और सर्विलांस इनपुट्स ने पाकिस्तान को यह समझने में मदद की कि भारतीय सेना कहां तैनात है, किस इलाके में मूवमेंट हो रही है और किस समय कौन-सा एक्शन संभव है। इससे पाकिस्तान की टारगेटिंग और ऑपरेशनल कोऑर्डिनेशन बेहतर हुआ, जबकि चीन खुद किसी सैन्य कार्रवाई में सीधे शामिल नहीं दिखा।

China Pakistan Grey Zone Warfare: प्लॉजिबल डिनायबिलिटी’ की चाल

इस पूरी रणनीति का सबसे अहम पहलू था प्लॉजिबल डिनायबिलिटी, यानी जिम्मेदारी से बच निकलने की क्षमता। दुनिया की नजरों में पाकिस्तान ही मुख्य खिलाड़ी बना रहा, जबकि चीन ने खुद को बैकग्राउंड में रखकर काम किया।

यूएस अधिकारियों का मानना है कि चीन ने जानबूझकर ऐसा किया ताकि अंतरराष्ट्रीय मंच पर उस पर सीधा आरोप न आए। साथ ही उसने अपने डिप्लोमैटिक मैसेजिंग और ऑनलाइन इनफॉरमेशन कैंपेन के जरिए पाकिस्तान के नैरेटिव को आगे बढ़ाया।

इन कैंपेन का मकसद भारत के दावों पर सवाल उठाना, भ्रम पैदा करना और भारत के पक्ष में बनने वाली अंतरराष्ट्रीय सहमति को धीमा करना था।

भारत की ‘एस्केलेशन लिमिट’ को परखने की कोशिश

रिपोर्ट के मुताबिक, चीन इस पूरे घटनाक्रम के जरिए भारत की एस्केलेशन थ्रेशहोल्ड को परखना चाहता था। यानी यह देखना कि भारत किस हद तक प्रतिक्रिया देता है और किस बिंदु पर रुकता है।

चीन के लिए यह जरूरी था कि वह भारत पर दबाव बनाए, लेकिन ऐसा न हो कि मामला सीधे भारत-चीन युद्ध की तरफ चला जाए। इसीलिए पाकिस्तान को आगे रखकर प्रयोग किया गया।

भारत चीन की नजर में क्यों अहम है चुनौती?

यूएस आकलन में यह भी कहा गया है कि चीन अब भारत को सिर्फ एक पड़ोसी देश नहीं, बल्कि एक लॉन्ग-टर्म स्ट्रैटेजिक चैलेंज के रूप में देख रहा है। भले ही चीन का मुख्य फोकस अमेरिका-ताइवान क्षेत्र पर हो, लेकिन भारत को भविष्य में कंटेनमेंट टारगेट के तौर पर देखा जा रहा है।

खासकर हिमालयन फ्रंटियर और इंडियन ओशन रीजन में चीन भारत की बढ़ती ताकत को सीमित करना चाहता है। इसके लिए वह सीधे टकराव की बजाय अप्रत्यक्ष तरीकों को तरजीह दे रहा है।

पाकिस्तान बना चीन का ‘प्रेशर वॉल्व’

यूएस इंटेलिजेंस सोर्सेज के मुताबिक, पाकिस्तान चीन के लिए एक तरह का प्रेशर वॉल्व है। इसका मतलब है कि जब भी चीन भारत पर दबाव बनाना चाहता है, वह पाकिस्तान को आगे कर देता है।

इससे चीन को कई फायदे मिलते हैं। पहला, भारत का ध्यान चीन से हटकर पाकिस्तान की ओर चला जाता है। दूसरा, भारत-अमेरिका के बीच बढ़ता डिफेंस कोऑपरेशन कमजोर पड़ता है। तीसरा, चीन को अपने हाइब्रिड वॉरफेयर मॉडल्स को कम लागत में टेस्ट करने का मौका मिलता है।

एलएसी पर समझौता: शांति या रणनीति?

यूएस रिपोर्ट में अक्टूबर 2024 में भारत और चीन के बीच एलएसी पर हुए डिसएंगेजमेंट एग्रीमेंट को भी रणनीतिक नजरिए से देखा गया है। अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि यह कदम चीन की तरफ से तनाव कम करने का संकेत नहीं था।

बल्कि असल में चीन चाहता था कि पश्चिमी सीमा पर कुछ समय के लिए स्थिरता बनी रहे, ताकि भारत अमेरिका के साथ रक्षा सहयोग को और तेज न कर सके। यानी यह शांति नहीं, बल्कि रणनीतिक ब्रेक था।

साउथ एशिया से बाहर भी नजर

पेंटागन इस बात पर भी नजर रखे हुए है कि चीन दुनिया के करीब 20 देशों में भविष्य के लिए मिलिट्री बेसिंग या लॉजिस्टिक एक्सेस तलाश रहा है। इनमें पाकिस्तान, श्रीलंका और क्यूबा जैसे देश शामिल हैं।

अगर ऐसा होता है, तो इसका सीधा असर भारत की मैरीटाइम सिक्योरिटी और थल सुरक्षा पर पड़ेगा। खासकर हिंद महासागर क्षेत्र में भारत के लिए चुनौतियां और बढ़ सकती हैं।

भारत जानता था चीन ने की पीछे से मदद

हालांकि चीन के साथ देने का दावा करने वाला अमेरिका अकेला नहीं हैं। बल्कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सेंटर फॉर जॉइंट वॉरफेयर स्टडीज (CENJOWS) के डायरेक्टर जनरल मेजर जनरल (रिटायर्ड) अशोक कुमार ने कहा था कि चीन ने पाकिस्तान को रियल-टाइम सैटेलाइट जानकारी दी थी। जिससे पाकिस्तान को अपने एयर डिफेंस सिस्टम्स को पोजिशन करने में मदद की, ताकि भारत की गतिविधियों का पता लगाया जा सके।

वहीं इस साल जुलाई में डिप्टी चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ (कैपेबिलिटी डेवलपमेंट एंड सस्टेनेंस) लेफ्टिनेंट जनरल राहुल आर सिंह ने एक सेमिनार में कहा था कि चीन ने पाकिस्तान को रीयल-टाइम सैटेलाइट इंटेलिजेंस और सर्विलांस सपोर्ट मुहैया कराया था। उन्होंने कहा था कि डीजीएमओ लेवल की डी-एस्केलेशन टॉक्स के दौरान पाकिस्तानी पक्ष को भारतीय फोर्सेस की डिप्लॉयमेंट्स की लाइव जानकारी मिल रही थी। पाकिस्तानी डीजीएमओ ने बातचीत में कहा था, “हम जानते हैं कि आपका यह महत्वपूर्ण वेक्टर प्राइम्ड है और एक्शन के लिए तैयार है, इसे वापस पुल करें।” यह जानकारी इतनी सटीक और ताजा थी कि वह केवल चाइनीज सैटेलाइट्स, इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस और रीयल-टाइम मॉनिटरिंग से ही आ सकती थी।

लेफ्टिनेंट जनरल राहुल सिंह ने इसे “वन बॉर्डर, थ्री एडवरसरीज” की स्थिति करार दिया था, जिसमें सामने पाकिस्तान लड़ रहा था, बैकग्राउंड में चीन सपोर्ट दे रहा था और तुर्की ड्रोन्स सप्लाई कर रहा था। उनका कहना था कि चीन ने इस कॉन्फ्लिक्ट को अपने वेपन्स सिस्टम्स का “लाइव टेस्टिंग ग्राउंड” बना लिया, जहां जे-10सी फाइटर्स, पीएल-15 मिसाइल्स और एचक्यू-9 एयर डिफेंस सिस्टम्स की परफॉर्मेंस चेक की गई।

वहीं अमेरिकी रिपोर्ट ने बता दिया है कि भविष्य की जंग कैसी होगी? यूएस रिपोर्ट की सबसे अहम चेतावनी यह है कि भविष्य में भारत-चीन टकराव की शुरुआत सीधे युद्ध से नहीं होगी। पहले साइबर डिसरप्शन, इकोनॉमिक दबाव, इंफॉर्मेशन वॉरफेयर और प्रॉक्सी इंस्टेबिलिटी देखने को मिलेगी।

ऑपरेशन सिंदूर ने यह दिखा दिया है कि यह मॉडल कैसे काम करता है। यही वजह है कि भारत के लिए आने वाले सालों में सुरक्षा चुनौतियों और ज्यादा मुश्किल होने वाली है।

Indian Army Social Media Policy: सेना का बड़ा फैसला! जवानों के लिए सोशल मीडिया यूज करने के नियमों में किया ये बड़ा बदलाव

Indian Army Social Media Policy
AI Image

Indian Army Social Media Policy: सेना ने सोशल मीडिया के इस्तेमाल को लेकर बड़ा फैसला किया है। सेना ने अपनी पुरानी सोशल मीडिया पॉलिसी में बड़ा बदलाव करते हुए सैन्य कर्मियों को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के इस्तेमाल को लेकर बड़ी राहत दी है। सेना ने जवानों और अफसरों को सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने की अनुमति दी है, लेकिन साथ ही कुछ प्रतिबंध भी लगाए हैं। सेना ये फैसला सेना प्रमुख के उस बयान के बाद लिया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि स्मार्टफोन आज के समय की जरूरत बन गया है, लेकिन जवानों को को सोशल मीडिया पर रिएक्ट और रेस्पॉन्ड के बीच अंतर समझना होगा।

Indian Army Social Media Policy: देखने और मॉनिटरिंग तक की परमिशन

रक्षा समाचार को मिली जानकारी के मुताबिक सेना की तरफ से हाल ही में नए दिशा-निर्देशों जारी किए हैं। जिनके मुताबिक अब सेना कर्मियों को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम के इस्तेमाल की अनुमति केवल देखने और मॉनिटरिंग तक ही होगी। इस नई व्यवस्था के तहत इंस्टाग्राम पर किसी भी तरह का कमेंट, राय या प्रतिक्रिया साझा करना पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा। यह संशोधित पॉलिसी तत्काल प्रभाव से लागू कर दी गई है। (Indian Army Social Media Policy)

Indian Army Social Media Policy: नहीं कर सकते संवाद या रिएक्ट

सेना की तरफ से जारी डॉक्यूमेंट में कहा गया है कि इंस्टाग्राम पर सेना कर्मियों की भूमिका अब केवल “पैसिव पार्टिसिपेशन” यानी निष्क्रिय भागीदारी तक सीमित रहेगी। इसका मतलब यह है कि जवान और अधिकारी प्लेटफॉर्म पर मौजूद जानकारी को देख सकते हैं, लेकिन किसी भी तरह से संवाद या रिएक्ट नहीं कर सकते। सेना के अनुसार, यह कदम राष्ट्रीय सुरक्षा और ऑपरेशनल सिक्योरिटी को ध्यान में रखते हुए उठाया गया है। (Indian Army Social Media Policy)

Indian Army Social Media Policy: व्हाट्सएप, टेलीग्राम को लेकर कही ये बात

साथ ही सेना ने इंस्टाग्राम के अलावा अन्य सोशल मीडिया और मैसेजिंग ऐप्स को लेकर भी पॉलिसी में स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए हैं। व्हाट्सएप, टेलीग्राम, सिग्नल और स्काइप जैसे मैसेजिंग ऐप्स पर केवल सामान्य और अनक्लासिफाइड जानकारी साझा करने की अनुमति दी गई है। यह जानकारी भी केवल जानकार लोगों के साथ ही साझा की जा सकती है। सही व्यक्ति की पहचान की पूरी जिम्मेदारी यूजर की होगी। किसी भी तरह की संवेदनशील, ऑफिशियल या ड्यूटी से जुड़ी जानकारी इन प्लेटफॉर्म्स पर साझा करने की अनुमति नहीं है। (Indian Army Social Media Policy)

Indian Army Social Media Policy: प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल केवल जानकारी के लिए

इसके अलावा यूट्यूब, एक्स यानी पूर्व में ट्विटर और क्वोरा जैसे प्लेटफॉर्म्स पर भी सेना कर्मियों को केवल पैसिव यूज की अनुमति है। इन प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल केवल जानकारी हासिल करने के लिए किया जा सकता है। किसी भी तरह का वीडियो अपलोड करना, पोस्ट लिखना, मैसेज डालना या कमेंट करना सख्त मना है। सेना का मानना है कि इन प्लेटफॉर्म्स पर एक्टिव भागीदारी से अनजाने में संवेदनशील जानकारियां लीक हो सकती हैं। (Indian Army Social Media Policy)

लिंक्डइन को लेकर सख्त

वहीं पॉलिसी डॉक्यूमेंट में लिंक्डइन को लेकर नीति और भी सख्त है। जवानों और अफसरों को लिंक्डइन का इस्तेमाल केवल रिज्यूमे अपलोड करने या संभावित एम्प्लॉयर और एम्प्लॉयी से जुड़ी सामान्य जानकारी प्राप्त करने के लिए ही करने की अनुमति है। इसके लिए भी अलग से अनुमति लेना जरूरी होगा।

पायरेटेड सॉफ्टवेयर वाली साइट्स से करें परेहज

इसके अलावा सेना ने अपने कर्मियों को कुछ खास तरह की वेबसाइट्स और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स से पूरी तरह दूर रहने की सलाह भी दी है। इसमें जनरल वेबसाइट्स, क्रैक या पायरेटेड सॉफ्टवेयर वाली साइट्स, फ्री मूवी वेबसाइट्स, टोरेंट और वीपीएन सॉफ्टवेयर से जुड़ी साइट्स, वेब प्रॉक्सी, अनॉनिमाइज्ड वेबसाइट्स, चैट रूम और फाइल ट्रांसफर साइट्स शामिल हैं। क्लाउड डेटा स्टोरेज वेबसाइट्स के इस्तेमाल को लेकर भी अत्यधिक सावधानी बरतने को कहा गया है। (Indian Army Social Media Policy)

भारतीय सेना की सोशल मीडिया पॉलिसी का मुख्य उद्देश्य हनीट्रैपिंग, डेटा चोरी और संवेदनशील सूचनाओं के लीक होने की घटनाओं को रोकना बताया गया है। पिछले कुछ सालों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जहां दुश्मन देशों की एजेंसियों ने सोशल मीडिया के जरिए सैनिकों से संपर्क कर उनसे जानकारियां हासिल करने की कोशिश की। इन्हीं घटनाओं को ध्यान में रखते हुए नीति को समय-समय पर सख्त किया जाता रहा है। (Indian Army Social Media Policy)

सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने कहा था- सोच-समझकर करें कम्युनिकेशन

पिछले महीने नवंबर में भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने यंग लीडर्स फोरम और चाणक्य डिफेंस डॉयलॉग में सोशल मीडिया के इस्तेमाल को लेकर बड़ी बात कही थी। उन्होंने कहा था कि आज की जेन जी डिजिटली फ्लुएंट और सोशली कांशस है। सेना में आने वाले नए एनडीए कैडेट्स को फोन से दूर रहना मुश्किल होता है और इसमें महीनों लग सकते हैं। उन्होंने सलाह दी थी कि सोशल मीडिया पर रिएक्ट करने की बजाय रिस्पॉन्ड करें और सोच-समझकर कम्युनिकेशन करें। उन्होंने कहा था कि स्मार्टफोन पर पूरी तरह पाबंदी सही नहीं है, बल्कि इस्तेमाल के नियम और जवाब देने का तरीका महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा था कि जवानों को ट्विटर आदि प्लेटफॉर्म पर निगरानी की अनुमति दी जा सकती है ताकि वे देख सकें कि दुनिया में क्या हो रहा है, लेकिन सार्वजनिक रूप से तुरंत जवाब देने से रुका जाए। सेना प्रमुख खुद सोशल मीडिया को मॉर्डन वॉरफेयर का हिस्सा मानते हैं और उनका मानना है कि इसका इस्तेमाल राष्ट्रहित में किया जाना चाहिए। (Indian Army Social Media Policy)

2020 में लगाया था 89 ऐप्स पर बैन

2018 और 2019 के दौरान तत्कालीन थल सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत ने सोशल मीडिया को लेकर संतुलित रुख अपनाने की बात कही थी। हालंकि वे खुद मोबाइल फोन नहीं रखते थे, लेकिन मानते थे कि स्मार्टफोन का इस्तेमाल रोका नहीं जा सकता। उन्होंने यह माना था कि सैनिकों को पूरी तरह सोशल मीडिया से दूर रखना संभव नहीं है, लेकिन इसके नियंत्रित इस्तेमाल की जरूरत है। उन्होंने जोर दिया था कि आधुनिक युद्ध में इंफॉर्मेशन वॉरफेयर महत्वपूर्ण है, और सोशल मीडिया को दुश्मन (जैसे प्रॉक्सी वॉर या आतंकवाद में) के खिलाफ फायदा उठाने के लिए इस्तेमाल करना चाहिए। लेकिन सैनिकों को ट्रेनिंग देकर जोखिम कम करने चाहिए। हालांकि, हनीट्रैप के बढ़ते मामलों के बाद सेना ने 2020 में कई लोकप्रिय 89 ऐप्स पर सख्त बैन लगाया था और अकाउंट डिलीट करने तक के निर्देश जारी किए गए थे।

गलवान घाटी में हुई झड़प के बाद सोशल मीडिया और डिजिटल ऐप्स को लेकर सेना अलर्ट हो गई थी। उस दौरान फेसबुक, इंस्टाग्राम, टिकटॉक, पबजी समेत कई दूसरी ऐप्स पर भी बैन लगाया गया था। सेना के मुताबिक, उस दौरान बड़ी संख्या में सैनिकों ने निर्देशों का पालन करते हुए किया और 13 लाख सैनिकों में सिर्फ 8 मामलों में ही निर्देशों का उल्लंघन पाया गया था। (Indian Army Social Media Policy)

यूनिफॉर्म में फोटो डालने पर रोक

2023 और 2024 में भी सेना की ओर से कई एडवाइजरी जारी की गईं, जिनमें जवानों को यूनिफॉर्म में फोटो डालने, रैंक या यूनिट की जानकारी साझा करने और जियो-टैगिंग का इस्तेमाल बंद रखने की हिदायत दी गई थी। अनजान फ्रेंड रिक्वेस्ट स्वीकार न करने और निजी जानकारी साझा न करने की बात भी कही गई थी। (Indian Army Social Media Policy)

Sanjay Jasjit Singh: पहली बार थिंक टैंक USI के चीफ बने नेवी अफसर, ऑपरेशन सिंदूर में मिला था सर्वोत्तम युद्ध सेवा मेडल

Sanjay Jasjit Singh USI
Vice Admiral Sanjay Jasjit Singh (Retd.)

Sanjay Jasjit Singh: नौसेना के रिटायर्ड वाइस एडमिरल संजय जसजीत सिंह को यूनाइटेड सर्विस इंस्टिट्यूशन ऑफ इंडिया (यूएसआई) का नया डायरेक्टर जनरल बनाया गया है। यूएसआई के इतिहास में पहली बार कोई नौसेना अधिकारी इस पद पर पहुंचा है। अब तक ये जिम्मेदारी ज्यादातर थलसेना के अफसरों के पास रही थी।

ये फैसला ऐसे वक्त आया है, जब सेना, नौसेना और वायुसेना तीनों के बीच तालमेल और साझा सोच को बहुत जरूरी माना जा रहा है। जंग अब सिर्फ जमीन, हवा या समंदर तक नहीं, साइबर, स्पेस और ड्रोन जैसे नए मोर्चे भी लड़ी जा रही है।

Sanjay Jasjit Singh: यूएसआई क्या है और क्यों है खास

यूएसआई भारत की सबसे पुरानी डिफेंस स्टडीज संस्था है, जो 1870 में शुरू हुई थी। आजादी के बाद ये शिमला से दिल्ली आई और धीरे-धीरे सबसे अहम मिलिट्री थिंक टैंक्स में गिनी जाने लगी। यहां सिर्फ किताबें या रिसर्च पेपर्स नहीं लिखे जाते, बल्कि अफसरों को स्ट्रैटेजी, वॉर स्टडीज और सिक्योरिटी पर सोचने-लिखने का मौका मिलता है।

यूएसआई की एक खास पहचान यह भी है कि यहां से निकले कई अफसर आगे चलकर डिफेंस सर्विसेज स्टाफ कॉलेज और दूसरी बड़ी सैन्य संस्थाओं की परीक्षाओं में सफल हुए हैं। यूएसआई की लाइब्रेरी और जर्नल्स काफी मशहूर हैं।

Sanjay Jasjit Singh: वेस्टर्न नेवल कमांड के चीफ पद से रिटायर

वाइस एडमिरल संजय जसजीत सिंह हाल ही में वेस्टर्न नेवल कमांड के चीफ पद से रिटायर हुए हैं। इससे पहले वो वाइस चीफ ऑफ नेवल स्टाफ जैसे बड़े रोल में भी रह चुके हैं। उनके करियर का बड़ा हिस्सा ऑपरेशंस, हथियारों के प्रोक्योरमेंट और आत्मनिर्भर भारत से जुड़ी डिफेंस पॉलिसीज पर काम करते हुए बीता है।

नौसेना में उन्होंने सिर्फ ऑपरेशंस की कमान नहीं संभाली, बल्कि कई अहम डॉक्युमेंट्स और डॉक्ट्रिन भी तैयार किए। वे नौसेना की प्रमुख डॉक्ट्रिन्स– इंडियन मैरिटाइम डॉक्ट्रिन (2009), स्ट्रैटेजिक गाइडेंस टू ट्रांसफॉर्मेशन (2015) और इंडियन मैरिटाइम सिक्योरिटी स्ट्रैटेजी (2015) के मुख्य ड्राफ्टर रह चुके हैं।

जब वे गोवा के नेवल वॉर कॉलेज के कमांडेंट थे तो उन्होंने नए अफसरों को मोर्डन वॉरफेयर की सोच से रूबरू करवाया। इसके अलावा वे ऑपरेशन संकल्प (एंटी-पायरेसी) और गल्फ ऑफ एडन में डिप्लॉयमेंट्स के दौरान उन्होंने इंडियन ओशन रीजन में भारत को मजबूत सिक्योरिटी प्रोवाइडर बनाया।

वाइस एडमिरल संजय जसजीत सिंह एनडीए के बेस्ट नेवल कैडेट (स्वॉर्ड ऑफ ऑनर) विजेता हैं। वे थर्ड जेनरेशन आर्म्ड फोर्सेस ऑफिसर हैं– उनके पिता एयर कमोडोर जसजीत सिंह वीर चक्र से सम्मानित हैं।

उनकी सबसे बड़ी पहचान ये है कि वो मैदान के अनुभव को स्ट्रैटेजिक सोच से जोड़कर देखते हैं। इसी वजह से डिफेंस एक्सपर्ट्स उन्हें “ऑपरेशनल और इंटेलेक्चुअल” दोनों दुनिया को जोड़ने वाला अफसर मानते हैं।

Sanjay Jasjit Singh: ऑपरेशन सिंदूर में निभाई थी अहम भूमिका

संजय जसजीत सिंह भारतीय नौसेना के एक अनुभवी फ्लैग ऑफिसर हैं, जो जुलाई 2025 में 39 साल की शानदार सेवा के बाद रिटायर हुए लिया। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जनवरी 2024 से जुलाई 2025 तक वे वेस्टर्न नेवल कमांड के फ्लैग ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ थे, जो भारतीय नौसेना की सबसे ताकतवर कमांड है। इस कमांड के पास अरब सागर और पश्चिमी तट की जिम्मेदारी की सुरक्षा की जिम्मेदारी है। पहलगाम आतंकी हमले के बाद, उन्होंने नौसेना की जहाजों, पनडुब्बियों, विमानों और कैरियर बैटल ग्रुप्स (आईएनएस विक्रमादित्य और आईएनएस विक्रांत) की तुरंत तैनाती की। इससे पाकिस्तानी नौसेना अपने कराची बंदरगाह से बाहर ही नहीं निकल सकी।

उनकी कमांड ने अरब सागर में पूरा कंट्रोल बनाए रखा, जिससे भारत की समुद्री सीमाएं सुरक्षित रहीं और पाकिस्तान को कोई जवाबी कार्रवााई नहीं करने दी। उनके नेतृत्व में पाकिस्तानी नौसेना केवल डिफेंसिव पोजिशन में रही। इसके अलावा ट्राई-सर्विस कोऑर्डिनेशन करते हुए वेस्टर्न नेवल कमांड ने वायुसेना और सेना के साथ मिलकर जॉइंट ऑपरेशंस किए, जिसमें मैरिटाइम सर्विलांस, एयर कवर और पोटेंशियल स्ट्राइक्स की तैयारियां शामिल थी।

Sanjay Jasjit Singh: मिला सर्वोत्तम युद्ध सेवा मेडल

ऑपरेशन सिंदूर में उनके इस योगदान के लिए उन्हें सर्वोत्तम युद्ध सेवा मेडल से सम्मानित किया गया। यह भारत का सबसे ऊंचा वॉरटाइम डिस्टिंग्विश्ड सर्विस अवॉर्ड है, और वे पहले नेवी ऑफिसर हैं जिन्हें यह मिला है। 2025 में सर्वोत्तम युद्ध सेवा मेडल तीनों सेनाओं के सात टॉप ऑफिसर्स को मिल था, जिनमें सिंह शामिल थे।

Sanjay Jasjit Singh: जॉइंटनेस को मिलेगा बूस्ट

संजय जसजीत सिंह की यूएसआई में नियुक्ति को सिर्फ एक प्रमोशन की तरह नहीं देखा जा रहा। ये सरकार और मिलिट्री लीडरशिप की उस सोच से जुड़ा है, जिसमें तीनों सेनाओं के बीच तालमेल और मजबूत करने की कोशिशें तेज हो गई हैं।

पिछले कुछ सालों में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) की पोस्ट बनी, थिएटर कमांड्स पर चर्चा शुरू हुई, ये सब इसी दिशा में उठाए गए कदम हैं। यूएसआई जैसे थिंक टैंक में नौसेना अफसर की लीडरशिप देना इस बात का संकेत है कि थल, जल, वायु तीनों को बराबरी की जगह मिलेगी।

यूएसआई की वर्किंग और रोल

यूएसआई सिर्फ सेमिनार्स या लेक्चर्स तक सीमित नहीं है। यहां सेना के सेवारत और रिटायर्ड अफसर, सिविल सर्विसेज के लोग और डिफेंस एक्सपर्ट्स मिलकर नेशनल सिक्योरिटी से जुड़े मुद्दों पर खुलकर बात करते हैं। चीन की बढ़ती ताकत, हिंद महासागर की स्ट्रैटेजिक बैलेंसिंग, टेररिज्म, नई टेक्नोलॉजीज, ये सब यहां डिस्कशन के टॉपिक हैं।

संस्था के संरक्षक तीनों सेनाओं के चीफ होते हैं, और चीफ ऑफ इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ अध्यक्ष की भूमिका निभाते हैं। तो यूएसआई की रिसर्च और बातचीत का असर सीधा पॉलिसी मेकिंग तक पहुंचता है।

नौसेना को होगा फायदा

भारत की सुरक्षा अब सिर्फ सीमाओं तक सीमित नहीं है। समुद्री व्यापार, एनर्जी सप्लाई और इंडो-पैसिफिक के बदलते समीकरण अब उतने ही अहम हैं, जितनी जमीन की हिफाजत। यूएसआई की कमान नौसेना अफसर के हाथ में आने से एक नया नजरिया सामने आ रहा है।

एक्सपर्ट्स मानते हैं कि संजय जसजीत सिंह के लीडरशिप में यूएसआई में नेवल सिक्योरिटी, नेवल डिप्लोमेसी और जॉइंट ऑपरेशंस पर ज्यादा गहराई से चर्चा होगी। आगे चलकर ये सोच नीतियों और मिलिट्री प्लानिंग को भी नया आकार दे सकती है।

संजय जसजीत सिंह 1 जनवरी 2026 से यूएसआई की जिम्मेदारी संभालेंगे। उनकी चुनौती होगी इतिहास और परंपरा को बरकरार रखते हुए संस्था को भविष्य के लिए तैयार करना। टेक्नोलॉजी बदल रही है, जंग की परिभाषा बदल रही है, ऐसे में थिंक टैंक्स की जिम्मेदारी पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है।

Army Day Parade 2026: ऑपरेशन सिंदूर की जीत से लेकर स्वदेशी हथियारों तक, जयपुर में पहली बार होगा ऐतिहासिक आर्मी डे शो

Indian Army Year Ender 2025

Army Day Parade 2026: 15 जनवरी 2026 को जयपुर एक बड़े एतिहासिक समारोह का गवाह बनने जा रहा है। इस बार 78वीं आर्मी डे परेड जयपुर के पब्लिक रोड (जगतपुरा की महल रोड) पर होगी। परेड की इस बार खास बात यह है कि इसमें दर्शकों को ऑपरेशन सिंदूर की झलक देखने को मिलेगी। भारतीय सेना ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान दिखाए अपने शौर्य को एक अनूठे माध्यम से दर्शकों के सामने रखेगी।

Army Day Parade 2026: करीब 40 मिनट की परेड

करीब डेढ़ किलोमीटर लंबे इस रास्ते पर करीब 40 मिनट की परेड देखने के लिए 25 हजार लोगों के बैठने का खास इंतजाम होगा। तीन-तीन लेवल की गैलरी बनाई जा रही हैं, ताकि छात्र, आम लोग, और खास मेहमान सेना के जज्बे और शौर्य को करीब से देख सकें। परेड में नेपाल आर्मी बैंड भी दूसरी बार शामिल होगा।

Army Day Parade 2026: ऑपरेशन सिंदूर की झांकी

इस बार परेड का सबसे बड़ा आकर्षण रहेगा ऑपरेशन सिंदूर। पहलगाम में आतंकी हमले के बाद भारतीय सेना ने जिस तरीके से जवाब दिया, उसकी झलक दुनिया के सामने रखी जाएगी। इस ऑपरेशन में इस्तेमाल हुए कुछ हथियार और सिस्टम पहली बार पब्लिक के सामने दिखेंगे। एक खास टेबल्यू (झांकी) भी होगी, जहां दिखेगा कि सेना ने किस तरह सटीक खुफिया जानकारी, आधुनिक हथियार और मजबूत एयर डिफेंस के सहारे दुश्मन के मंसूबे नाकाम किए।

Army Day Parade 2026: पहली बार भैरव बटालियन मार्च

साथ ही पहली बार भैरव बटालियन भी मार्च करती दिखेगी। यह यूनिट खास चुनौतियों के लिए तैयार की गई है। पहाड़ी इलाकों में ऑपरेशन, सीमापार कार्रवाई, आतंकवाद विरोधी मिशन इन सभी में इसके जवान माहिर हैं। भैरव बटालियन की मौजूदगी बताती है कि भारतीय सेना लगातार खुद को नए खतरे के हिसाब से बदल रही है।

Army Day Parade 2026: अपाचे और प्रचंड का फ्लाईपास्ट

जयपुर के आसमान में भी नजारे कम नहीं होंगे। स्वदेशी लाइट कॉम्बैट हेलीकॉप्टर प्रचंड, अमेरिकी अपाचे अटैक हेलीकॉप्टर, रुद्र और चेतक, ये सारे हेलीकॉप्टर जयपुर के आसमान में फ्लाईपास्ट करेंगे। प्रचंड पर सबकी खास नजर रहेगी। यह दुनिया का पहला अटैक हेलीकॉप्टर, जो सियाचिन जैसी 16 हजार फीट ऊंची जगहों पर भी ऑपरेशन कर सकता है। ऑपरेशन सिंदूर जैसे अभियानों में इसकी भूमिका बहुत अहम रही है।

Army Day Parade 2026: मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर भी मौजूद

इसके अलावा सेना दिवस परेड में टैंक, तोप और रॉकेट सिस्टम अपनी ताकत दिखाएंगे। टी-90 भीष्मा टैंक, एमबीटी अर्जुन, बीएमपी-2, के-9 वज्र, नागास्त्र-1 लॉइटरिंग म्यूनिशन, धनुष तोप, एम-777 अल्ट्रा लाइट हॉवित्जर, स्मर्च और ग्रैड मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर सभी मौजूद रहेंगे। एम-777 तोप तो खास ऑपरेशन सिंदूर से जुड़ी है, क्योंकि इसी ने दुर्गम इलाकों में आतंकी ठिकाने तबाह किए थे। इन हथियारों को देखकर हर कोई समझ पाएगा कि सेना किन साधनों के सहारे देश की हिफाजत करती है।

एयर डिफेंस सिस्टम भी परेड का हिस्सा होंगे। आकाश मिसाइल सिस्टम, एमआर-एसएएम, शिल्का और दूसरे सिस्टम्स की मौजूदगी साफ बताएगी कि भारत की हवाई सुरक्षा कितनी मजबूत है। ऑपरेशन सिंदूर के वक्त इन्हीं सिस्टम्स ने दुश्मन की हर चाल को नाकाम किया था।

परेड में रोबोटिक म्यूल, काउंटर-यूएएस सिस्टम भी शामिल

मौजूदा दौर की झलक दिखाते हुए, परेड में रोबोटिक म्यूल, काउंटर-यूएएस सिस्टम और आर्मी डॉग स्क्वॉड भी नजर आएंगे। रोबोटिक म्यूल मुश्किल इलाकों में जवानों के लिए सामान और हथियार ढोते हैं। काउंटर ड्रोन सिस्टम दिखाएंगे कि सेना ड्रोन जैसी नई चुनौतियों से कैसे निपट रही है।

रेजिमेंट्स, एनसीसी कैडेट्स और वेटरंस भी इस परेड का हिस्सा होंगे। असम रेजिमेंट, जम्मू-कश्मीर लाइट इन्फैंट्री, मद्रास रेजिमेंट, आर्टिलरी यूनिट्स, स्काउट्स भी परेड में मार्च करेंगे। परमवीर चक्र, अशोक चक्र, वीर चक्र विजेता और वीरता पुरस्कार पाने वाले सैनिक भी कदमताल करते दिखेंगे।

14 जनवरी को वेटरन्स डे के मौके पर पूर्व सैनिकों को सम्मानित किया जाएगा। 15 जनवरी को मुख्य परेड से पहले अलंकरण समारोह भी होगा।

शौर्य संध्या में 1000 ड्रोन का शो

वहीं, 15 जनवरी को शौर्य संध्या का आयोजन एसएमएस स्टेडियम में किया जाएगा, जिसमें मुख्य अतिथि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह होंगे। कार्यक्रम में लाइट एंड साउंड शो के जरिए ऑपरेशन सिंदूर पर आधारित हमले की री-एनैक्टमेंट दिखाई जाएगी। 1000 ड्रोन शो भारतीय सेना के इतिहास और ऑपरेशन सिंदूर की झलक को पेश करेंगे।

इसके अलावा 8 से 12 जनवरी तक भवानी इंस्टीट्यूट में ‘नो योर आर्मी’ एग्जिबिशन लगेगी, जहां मिसाइल-बॉम्ब सिमुलेटर और अलग-अलग इलाकों में सेना के ऑपरेशंस का डेमो दिखाया जाएगा।

बता दें कि भारतीय सेना दिवस हर साल 15 जनवरी को मनाया जाता है। 15 जनवरी 1949 को फील्ड मार्शल केएम कारियप्पा भारतीय सेना के पहले भारतीय कमांडर-इन-चीफ बने थे। उनकी याद में उस दिन को पहला आर्मी डे माना जाता है।

Republic Day 2026: 26 जनवरी परेड में दिखेंगे रोबोटिक म्यूल, FPV और कामिकाजे ड्रोन, हाई-टेक हथियारों के साथ दिखेंगी स्पेशल फोर्सेज

Republic Day 2026

Republic Day 2026: 2026 की गणतंत्र दिवस परेड कई मायनों में खास होगी। अगर आप 77वें गणतंत्र में जाने की सोच रहे हों, तो इस बार आपको काफी कुछ नया दिखने को मिलेगा। गणतंत्र दिवस परेड में भारतीय सेना की स्पेशल फोर्सेज का अंदाज बिल्कुल बदलने वाला है। इस बार कर्तव्य पथ पर कुछ ऐसा दिखेगा, जो अब तक सिर्फ फिल्मों या किसी विदेशी सेना की झलकियों में नजर आया है। बंदूकें और पुराने हथियारों तो होंगे ही, लेकिन उनके साथ-साथ अब वो आधुनिक टेक्नोलॉजी भी दिखेगी, जो आने वाले वक्त की जंग का चेहरा बदल देगी।

इस बार स्पेशल फोर्सेज रोबोटिक म्यूल्स, फर्स्ट पर्सन व्यू यानी एफपीवी ड्रोन, लोइटरिंग म्यूनिशन, अनमैन्ड ग्राउंड व्हीकल्स और लेटेस्ट इन्फैंट्री हथियारों का दम दिखाएंगी। इसका मकसद सिर्फ ताकत दिखाना नहीं है, बल्कि ये बताना भी है कि सेना अब तेजी से बदल रही है और हर नई चुनौती के लिए तैयार है। इसके अलावा ऑपरेशन सिंदूर की झलक भी गणतंत्र दिवस की परेड में देखने को मिल सकती है। (Republic Day 2026)

Republic Day 2026: परेड में देखने को मिल सकते हैं रोबोटिक म्यूल्स

सबसे पहले बात करते हैं रोबोटिक म्यूल्स यानी खच्चरों की। ये छोटे-छोटे रोबोटिक व्हीकल्स हैं, जो रिमोट से ऑपरेट होते हैं। भारतीय सेना में दो तरह के रोबोटिक म्यूल्स इस्तेमाल किए जा रहे हैं, पहले लॉजिस्टिक्स और दूसरे वेपन के साथ। ये म्यूल लाइट मशीन गन से लैस होंगे। लॉजिस्टिक्स म्यूल मुश्किल इलाकों में जवानों का बोझ हल्का करते हैं। पहाड़, बर्फ या घना जंगल, जवान जहां भी पैदल जाते हैं, वहां ये रोबोटिक म्यूल्स उनका साथ देते हैं। ये म्यूल्स राशन, गोला-बारूद से लेकर मेडिकल सामान तक सबकुछ ढो लेते हैं। 2024 में इन्हें स्पेशल फोर्सेज में शामिल किया गया था। हर पैरा यूनिट को पांच-पांच म्यूल मिल चुके हैं, और जल्द ही तीन और मिलने वाले हैं। परेड में ये म्यूल्स करीब 30 किलो तक का सामान लेकर चलते दिखेंगे। (Republic Day 2026)

खास बात यह होगी कि ये म्यूल्स पूरी गणतंत्र दिवस परेड में चलते हुए नहीं आएंगे बल्कि ये एक व्हीकल पर खड़े होंगे और वहीं से ही झुक कर राष्ट्रपति को सलामी देंगे। परेड में कुल आर रोबोटिक म्यूल होंगे, जिनमें चार लॉजिस्टिक म्यूल तो बाकी चार वेपन से लैस होंगे।

Republic Day 2026: एफपीवी ड्रोनों का जलवा

इसके बाद नंबर है एफपीवी यानी फर्स्ट-पर्सन व्यू ड्रोन का। नाम थोड़ा टेक्निकल है, लेकिन काम बड़ा जबरदस्त है। ऑपरेटर इन्हें ऐसे उड़ाता है जैसे वो खुद ड्रोन के अंदर बैठा हो। दुश्मन की लोकेशन देखनी हो, बंकर ढूंढने हों या सीधा हमला करना हो, ये ड्रोन सब कर सकते हैं। पिछले कुछ ऑपरेशन में साबित भी हो चुका है कि इनका साइज भले छोटा है, लेकिन असर बड़ा घातक है। अब भारतीय सेना ने इन्हें अपनी ताकत का हिस्सा बना लिया है। (Republic Day 2026)

Republic Day 2026: कामिकाजे ड्रोन और यूजीवी भी होंगे परेड में शामिल

इसके अलावा गणतंत्र दिवस परेड में लोइटरिंग म्यूनिशन या फिर कहें ‘कामिकाजे ड्रोन’ भी दिखेंगे। ये ड्रोन आसमान में घूमते रहते हैं, टारगेट मिलते ही सीधा हमला करते हैं और खुद को भी उड़ा देते हैं। नागास्त्र और जॉननेट जैसे ड्रोन ऑल-टेरेन व्हीकल्स पर लगे नजर आएंगे। इससे साफ है कि सेना अब ज्यादा सटीक और तेज असर वाले हथियारों पर फोकस कर रही है।

साथ ही यूजीवी यानी अनमैन्ड ग्राउंड व्हीकल्स भी इस बार परेड में होंगे। ये रोबोटिक गाड़ियां बिना किसी सैनिक के आगे बढ़ती हैं, इलाके की जानकारी जुटाती हैं, और कई बार हथियार से लैस होकर फायरिंग भी कर सकती हैं। स्पेशल फोर्सेज इन्हें आतंकवाद विरोधी ऑपरेशन, बॉर्डर पर निगरानी और दुश्मन के ठिकानों की टोह लेने के लिए इस्तेमाल कर रही हैं। (Republic Day 2026)

Republic Day 2026: दिखेंगे स्पेशल फोर्सेज के ये हथियार

अब बात हथियारों की करें तो स्पेशल फोर्सेज के पास टेक्नोलॉजी के साथ-साथ लेटेस्ट हथियार भी हैं। टैवर असॉल्ट राइफल और नई नेगेव एनजी-7 लाइट मशीन गन इस बार खास आकर्षण का केंद्र रहेंगे। नेगेव एनजी-7 को अक्टूबर 2025 में सेना में शामिल किया गया था। ये 7.62×51 मिमी कैलिबर की मशीन गन है और पहाड़ हो, रेगिस्तान या घना जंगल किसी भी हालात में भरोसेमंद मानी जाती है। (Republic Day 2026)

अगर परेड की लाइन-अप देखें तो सबसे आगे रग्ड टेरेन ट्रांसपोर्ट सिस्टम होंगे, जिन पर ड्रोन सिस्टम लगे होंगे। उनके पीछे ऑल-टेरेन व्हीकल्स में लोइटरिंग म्यूनिशन लगे नजर आएंगे। फिर हल्के स्पेशलिस्ट वाहन आएंगे, जिनमें कुछ पर भारी मशीन गन या एंटी-टैंक मिसाइल सिस्टम, तो कुछ सिर्फ ड्रोन और निगरानी के लिए। सबसे आखिर में रोबोटिक म्यूल्स का ग्रुप दिखाई देगा, जो दिखाएगा कि भारतीय सेना का तेजी से ट्रांसफॉर्मेशन हो रहा है। (Republic Day 2026)

ये सब सिर्फ एक परेड का हिस्सा नहीं है। ये दिखाता है कि भारतीय सेना अब पुराने स्टाइल की जंग से आगे बढ़ चुकी है। ड्रोन, रोबोट और अनमैन्ड सिस्टम अब सिर्फ सपोर्ट नहीं, असली लड़ाई का हिस्सा बन चुके हैं। ये प्रदर्शन युवाओं को भी ये समझाएगा कि अब सेना सिर्फ ताकत से नहीं, दिमाग और टेक्नोलॉजी से भी जंग लड़ रही है। (Republic Day 2026)

CAG on ECHS: कैशलेस का वादा, लेकिन भुगतान की मार; क्यों चरमरा रही है पूर्व सैनिकों की स्वास्थ्य योजना?

CAG on ECHS

CAG on ECHS: पूर्व सैनिकों के लिए बनाई गई एक्स-सर्विसमैन कंट्रीब्यूटरी हेल्थ स्कीम (ईसीएचएस) एक बार फिर सवालों के घेरे में है। 18 दिसंबर को संसद में पेश की गई सीएजी (कंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल) की रिपोर्ट ने ईसीएचएस की कमजोर कड़ियां उजागर कर दी हैं। रिपोर्ट में घोटाले या भ्रष्टाचार की बात इसमें नहीं है, लेकिन रिपोर्ट खुलकर कहती है कि लापरवाहियों और पैसों की तंगी ने ईसीएचएस को उसके असली मकसद से दूर कर दिया है।

ईसीएचएस की शुरुआत 2003 में इस सोच के साथ हुई थी कि देश की सेवा कर चुके सैनिकों और उनके परिवारों को रिटायरमेंट के बाद इलाज के लिए भटकना न पड़े। योजना का मकसद था कि कैशलेस, बिना लिमिट के इलाज, चाहे मरीज किसी भी राज्य में क्यों न हो। लेकिन सीएजी की रिपोर्ट बताती है कि यह वादा कागजों में तो कायम है, जमीनी लेवल पर लगातार कमजोर पड़ रहा है। (CAG on ECHS)

CAG on ECHS: अस्पतालों को भुगतान में हो रही देरी

सीएजी रिपोर्ट के मुताबिक ईसीएचएस के तहत जुड़े अस्पतालों को भुगतान में लगातार देरी हो रही है। इलाज से जुड़ी रकम के लिए जो बजट तय होता है, वह अक्सर कम पड़ जाता है। नतीजा यह होता है कि कई प्राइवेट अस्पताल महीनों तक भुगतान का इंतजार करते हैं और अंत में योजना से बाहर निकल जाते हैं।

पूर्व नौसेना प्रमुख रिटायर्ड एडमिरल अरुण प्रकाश ने इस पर कड़ी नाराजगी जताई है। उन्होंने कहा कि इलाज से जुड़े खर्च के लिए बजट की कमी की वजह से अस्पतालों को समय पर पैसा नहीं मिल पाता। इसका सीधा असर यह होता है कि अस्पताल ईसीएचएस छोड़ देते हैं और रिटायर्ड सैनिकों को आर्थिक परेशानी उठानी पड़ती है। (CAG on ECHS)

उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जब सीजीएचएस जैसी योजना केंद्र सरकार के कर्मचारियों, सांसदों, जजों और वरिष्ठ अधिकारियों के लिए ठीक से चलाई जा सकती है, तो पूर्व सैनिकों के इलाज के लिए पैसा जुटाना इतना मुश्किल क्यों है। उन्होंने कहा कि ईसीएचएस एक अजीब व्यवस्था बन गई है, जहां मेंबरशिप तो जरूरी है और पूर्व सैनिकों से 30,000 से लेकर 1,20,000 रुपये तक की रकम ली जाती है, लेकिन मंत्रालय की तरफ से इस योजना को सुचारू चलाने की जिम्मेदारी कहीं नहीं दिखती। (CAG on ECHS)

CAG on ECHS: कैशलेस योजना है तो लेकिन जेब से खर्च क्यों?

ईसीएचएस को कैशलेस कहा जाता है, लेकिन कई मामलों में पूर्व सैनिकों को इलाज के समय अपनी जेब से पैसे देने पड़ते हैं। कहीं अस्पताल योजना से बाहर हो चुका होता है, तो कहीं बिल का भुगतान अटका रहता है। ऐसे में मरीज या तो इलाज टालता है या मजबूरी में पैसा खर्च करता है। (CAG on ECHS)

रिटायर्ड कमांडर विक्रम डब्ल्यू. कारवे का कहना है कि अगर सरकार सच में पूर्व सैनिकों की परवाह करती है, तो ईसीएचएस की कार्यप्रणाली में तुरंत सुधार जरूरी है। अच्छे अस्पतालों को योजना से जोड़ना होगा और उनके बिल समय पर चुकाने होंगे, वरना भरोसा लगातार टूटता रहेगा। (CAG on ECHS)

CAG on ECHS: योजना पर बोझ बढ़ा, बजट जस का तस

वरिष्ठ नौसेना अधिकारी और रक्षा मामलों के जानकार महेंद्र नेगी ने कहा कि बीते कुछ सालों में ईसीएचएस के दायरे को बिना तैयारी के बढ़ा दिया गया। योजना का मूल मकसद पूर्व सैनिकों के लिए था, लेकिन अब इसमें तीनों सेनाओं के यूनिफॉर्मधारी पेंशनर्स और बड़ी संख्या में आश्रित भी जुड़ गए हैं। इसके मुकाबले बजट में कोई बड़ा इजाफा नहीं हुआ। (CAG on ECHS)

उनका कहना है कि अब जरूरत है कि ईसीएचएस की पूरी रिव्यू की जाए। बजट बढ़ाया जाए, लाभार्थियों की स्पष्ट कैटेगरी तय हो और जिन लोगों को सीजीएचएस में शामिल किया जा सकता है, उन्हें वहां शिफ्ट किया जाए। इससे ईसीएचएस पर दबाव कम होगा और योजना वाकई काम की बन पाएगी। (CAG on ECHS)

CAG on ECHS: राजनीति में पूर्व सैनिकों की प्राथमिकता कहां

पूर्व ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह और भी सीधा बोलते हैं। उनका कहना है कि सरकार की दिलचस्पी ईसीएचएस सुधारने में इसलिए कम है क्योंकि पूर्व सैनिक कोई ऑर्गनाइज्ड वोट बैंक नहीं हैं। न तो वे “लाड़ली बहनाएं” हैं और न ही एम्प्लॉयमेंट की मांग करने वाला बड़ा समूह। उन्होंने यह भी कहा कि सर्विस में मौजूद सीनियर अधिकारी भी अक्सर इस मुद्दे पर गंभीरता नहीं दिखाते। (CAG on ECHS)

CAG on ECHS: तीन राज्यों में ही खर्च का बड़ा हिस्सा

सीएजी रिपोर्ट और पूर्व अधिकारियों के मुताबिक, ईसीएचएस का 60 फीसदी खर्च सिर्फ दिल्ली, पंजाब, और हरियाणा में हो जाता है। जबकि, देशभर के करीब 18 लाख मुख्य लाभार्थियों में इन तीन राज्यों की हिस्सेदारी 24-26 फीसदी ही है। फिर भी, जालंधर, दिल्ली-I और दिल्ली-II जैसे रीजनल सेंटर्स नेशनल खर्च का बड़ा हिस्सा ले लेते हैं।

रिटायर्ड वाइस एडमिरल सुधीर पिल्लै बताते हैं, ये असंतुलन सिर्फ संख्या की वजह से नहीं है। इसमें बड़े प्राइवेट और सुपर-स्पेशलिटी अस्पताल, महंगे इलाज, ज्यादा कैंसर और हार्ट की बीमारियां, और रिटायरमेंट के बाद इन इलाकों में बसने की प्रवृत्ति भी शामिल है। (CAG on ECHS)

यही कारण है कि कई पूर्व सैनिकों को ईसीएचएस के साथ-साथ अलग से ग्रुप इंश्योरेंस या प्राइवेट हेल्थ कवर लेना पड़ रहा है।

सीएजी की चेतावनी साफ है

सीएजी की रिपोर्ट यह नहीं कहती कि ईसीएचएस पूरी तरह फेल हो चुकी है, लेकिन यह जरूर बताती है कि योजना थक चुकी है। बेनेफिशियरीज बढ़ते गए, लेकिन इंफ्रास्ट्रक्चर, स्टाफ, बजट और मॉनिटरिंग उसी पुराने ढर्रे पर चलते रहे। अगर समय रहते ठोस सुधार नहीं किए गए, तो ईसीएचएस सिर्फ नाम की हेल्थ स्कीम बनकर रह जाएगी। (CAG on ECHS)