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DAC Meeting 2025: डीएसी में 79 हजार करोड़ रुपये के डिफेंस डील्स को मंजूरी, डीप-स्ट्राइक वेपंस, Astra Mk-II और पिनाका को हरी झंडी

DAC Meeting 2025
DAC Meeting 2025: India Clears Rs 79,000 Crore Defence Proposals Focused on Drones, Lasers and Long-Range Strike

DAC Meeting 2025: सोमवार को हुई इस साल की आखिरी डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल यानी डीएसी की बैठक में तीनों सेनाओं के लिए तकरीबन 79,000 करोड़ रुपये के रक्षा प्रस्तावों को मंजूरी दी गई। यह बैठक रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में नई दिल्ली में हुई। इस फैसले से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना की ऑपरेशनल क्षमताओं में बड़ा इजाफा होगा। खास बात यह रही कि इस बैठक में एंटी-ड्रोन सिस्टम, लंबी दूरी के सटीक मार करने वाले हथियारों और आधुनिक सर्विलांस सिस्टम को प्राथमिकता दी गई।

रक्षा मंत्रालय की तरफ से जारी रिलीज के मुताबिक यह मंजूरी एक्सेप्टेंस ऑफ नेसेसिटी (एओएन) के तहत दी गई है। बता दें कि एओएन किसी भी बड़ी डिफेंस डील की पहली और सबसे अहम प्रक्रिया होती है। एओएन मिलने के बाद अब इन प्रोजेक्ट्स पर आगे की खरीद और कॉन्ट्रैक्ट प्रक्रिया शुरू की जा सकेगी। रक्षा मंत्रालय का कहना है कि इन फैसलों का मकसद सेना को भविष्य की जंग के लिए तैयार करना और स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देना है।

DAC Meeting 2025: सेना की जरूरतों पर खास फोकस

साल की आखिरी डीएसी बैठक में सबसे ज्यादा फोकस भारतीय सेना की जरूरतों पर रहा। हाल के सालों में दुनिया भर में हुए युद्धों से यह साफ हो गया है कि ड्रोन और प्रिसिजन गाइडेड हथियार अब किसी भी युद्ध का अहम हिस्सा बन चुके हैं। इन्हीं अनुभवों को ध्यान में रखते हुए सेना के लिए कई बड़े सिस्टम्स को मंजूरी दी गई।

सैन्य सूत्रों के मुताबिक सबसे अहम फैसला इंटीग्रेटेड ड्रोन डिटेक्शन एंड इंटरडिक्शन सिस्टम (IDD&IS) मार्क-II को लेकर लिया गया। यह एक एडवांस्ड काउंटर-ड्रोन सिस्टम है, जिसे खास तौर पर दुश्मन के ड्रोन को पहचानने, ट्रैक करने और नष्ट करने के लिए डिजाइन किया गया है। इसमें हाई-पावर लेजर वेपन सिस्टम लगा होगा, जो लंबी दूरी से ही ड्रोन को मार गिराने में सक्षम है। यह सिस्टम न सिर्फ ड्रोन की मूवमेंट को ट्रैक कर सकता है, बल्कि उनके कंट्रोल और नेविगेशन लिंक को भी जाम कर सकता है।

सेना सूत्रों के मुताबिक, इंटीग्रेटेड ड्रोन डिटेक्शन एंड इंटरडिक्शन सिस्टम मार्क-II की खासियत यह है कि यह कम पावर वाले, बार-बार फ्रीक्वेंसी बदलने वाले और नॉन-स्टैंडर्ड ड्रोन सिग्नल्स को भी पहचान सकता है। इसका मतलब यह है कि अगर दुश्मन एक साथ कई ड्रोन भेजता है, यानी ड्रोन स्वार्म अटैक करता है, तब भी यह सिस्टम काम करेगा। इसे टैक्टिकल बैटल एरिया के साथ-साथ देश के अंदरूनी इलाकों में मौजूद अहम सैन्य और नागरिक ठिकानों की सुरक्षा के लिए तैनात किया जाएगा।

DAC Meeting 2025: लो-लेवल लाइट वेट रडार की मंजूरी

ड्रोन खतरे से निपटने के लिए ही सेना को लो लेवल लाइट वेट रडार (इम्प्रूव्ड) यानी LLLR(I) को भी मंजूरी दी गई है। यह एक खास तरह का सर्विलांस रडार है, जिसे छोटे और बेहद नीचे उड़ने वाले ड्रोन और अनमैन्ड एरियल सिस्टम को पकड़ने के लिए तैयार किया गया है। आम रडार सिस्टम कई बार ऐसे छोटे ड्रोन को नहीं पकड़ पाते, लेकिन यह खास रडार इस कमी को दूर करेगा।

रक्षा मंत्रालय के अनुसार, यह रडार संवेदनशील सीमावर्ती इलाकों और अहम इंस्टॉलेशंस के आसपास तैनात किया जाएगा। इससे किसी भी संदिग्ध हवाई गतिविधि की समय रहते पहचान हो सकेगी और सेना को तुरंत कार्रवाई का मौका मिलेगा।

DAC Meeting 2025: लोइटरिंग म्यूनिशन से बढ़ेगी सेना की ताकत

डीएसी ने लोइटरिंग म्यूनिशन सिस्टम की खरीद को भी मंजूरी दी है। इसे आम भाषा में ‘कामिकाजे ड्रोन’ भी कहा जाता है। यह ड्रोन हवा में कुछ समय तक मंडराता रहता है और जैसे ही टारगेट दिखता है, सीधे उस पर हमला कर देता है। सेना का कहना है कि यह सिस्टम हाई वैल्यू टारगेट्स को बेहद सटीक तरीके से नष्ट करने में मदद करेगा।

यह लोइटरिंग म्यूनिशन पूरी तरह स्वदेशी होगा और इसे हाल ही में गठित शक्तिबाण और दिव्यास्त्र यूनिट्स को दिया जाएगा। इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर जैसे कठिन माहौल में भी यह सिस्टम काम करने में सक्षम होगा। सेना के अनुसार, इससे दुश्मन पर सिर्फ फिजिकल ही नहीं, बल्कि मानसिक दबाव भी बनेगा।

पिनाका के लिए 120 किलोमीटर रेंज के गाइडेड रॉकेट

सेना की डीप-स्ट्राइक क्षमता को और मजबूती देने के लिए पिनाका मल्टीपल लॉन्च रॉकेट सिस्टम (MLRS) के लिए लॉन्ग रेंज गाइडेड रॉकेट को मंजूरी दी गई है। अभी तक पिनाका की रेंज करीब 75 किलोमीटर तक थी, लेकिन नए गाइडेड रॉकेट की मदद से यह दूरी बढ़कर 120 किलोमीटर तक हो जाएगी।

रक्षा अधिकारियों के मुताबिक, यह रॉकेट पूरी तरह स्वदेशी तकनीक से तैयार किया गया है और इसमें चार अलग-अलग तरह के वॉरहेड्स लगाए जा सकते हैं। इससे सेना को दुश्मन के हाई वैल्यू टारगेट्स पर ज्यादा असरदार और सटीक हमला करने का विकल्प मिलेगा।

DAC Meeting 2025: नेवी को मिलेंगे और HALE ड्रोन

डीएसी बैठक में भारतीय नौसेना के लिए भी कई अहम फैसले लिए गए। नौसेना के लिए बोलार्ड पुल टग्स की खरीद को मंजूरी दी गई है। ये टग्स बंदरगाहों में जहाजों और पनडुब्बियों को सुरक्षित तरीके से बर्थिंग और अनबर्थिंग में मदद करते हैं। इससे नेवी ऑपरेशंस ज्यादा सुरक्षित और सुचारु हो सकेंगे।

इसके अलावा, हाई फ्रीक्वेंसी सॉफ्टवेयर डिफाइंड रेडियो (HF SDR) मैनपैक की भी मंजूरी दी गई है। यह सिस्टम बोर्डिंग और लैंडिंग ऑपरेशंस के दौरान लंबी दूरी की सुरक्षित कम्युनिकेशन सुनिश्चित करेगा।

सबसे अहम फैसला हाई एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस (HALE) रिमोटली पायलटेड एयरक्राफ्ट सिस्टम को लीज पर लेने का है। इससे हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉनिसेंस (ISR) क्षमता में बड़ा इजाफा होगा और मैरिटाइम डोमेन अवेयरनेस मजबूत होगी।

बता दें कि अभी भारतीय नौसेना के पास 2 हाई एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस रिमोटली पायलटेड एयरक्राफ्ट सिस्टम हैं। ये दोनों एमक्यू-9बी सीगार्जियन ड्रोन अमेरिका से लीज पर लिए गए हैं, जो 2020 से ऑपरेशनल हैं। हालांकि, इनमें से एक क्रैश हो गया था, जिसका रिप्लेसमेंट नेवी को मिल चुका है। ये ड्रोन हिंद महासागर में लगातार सर्विलांस और मैरीटाइम डोमेन अवेयरनेस के लिए इस्तेमाल हो रहे हैं। वहीं, अमेरिका से खरीदे गए 31 एमक्यू-9बी ड्रोन्स (जिनमें नौसेना के लिए 15 हैं) की डिलीवरी 2029 से शुरू होगी।

वायुसेना की मारक और ट्रेनिंग क्षमता बढ़ेगी

भारतीय वायुसेना के लिए भी इस डीएसी बैठक में कई महत्वपूर्ण प्रस्तावों को मंजूरी दी गई है। इनमें अस्त्रा मार्क-II एयर-टू-एयर मिसाइल शामिल है, जिसकी रेंज ज्यादा है और यह दुश्मन के विमानों को दूर से ही मार गिराने में सक्षम होगी। इसके अलावा स्पाइस-1000 लॉन्ग रेंज गाइडेंस किट्स को भी मंजूरी दी गई है, जिससे सटीक निशाना लगाया जा सकेगा।

स्पाइस-1000 लॉन्ग रेंज गाइडेंस किट्स को इजरायली कंपनी राफेल एडवांस्ड डिफेंस सिस्टम्स ने बनाया है। स्पाइस-1000 प्रिसिजन गाइडेड म्यूनिशन किट सामान्य अनगाइडेड बॉम्ब्स जैसे 450 किग्रा/1000 पाउंड एमके-83 को स्मार्ट ग्लाइड बॉम्ब में बदल देती हैं। इससे वायुसेना स्टैंड-ऑफ डिस्टेंस से हाई-वैल्यू टारगेट्स (बंकर्स, कमांड सेंटर्स आदि) पर सटीक हमला करने की क्षमता मिलेगी। देगी।

इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह 100 किलोमीटर तक की दूरी से हमला करने की क्षमता देती है, जिससे पायलट को दुश्मन की एयर डिफेंस के खतरे में जाने की जरूरत नहीं पड़ती। यह दिन हो या रात, किसी भी मौसम में काम करता है और जीपीएस या कैमरे की मदद से बहुत सटीक निशाना लगाता है। इसमें पंख (डिप्लॉयेबल विंग्स) भी होते हैं जिससे यह हवा में दूर तक ग्लाइड कर जाता है।

भारतीय वायु सेना के पास पहले से स्पाइस-2000 है जिसका इस्तेमाल 2019 की बालाकोट एयरस्ट्राइक में मिराज-2000 विमानों से किया गया था। स्पाइस-1000 की कुछ किट्स भी 2019 में आपात खरीद के तहत ली गई थीं। स्पाइस-1000 मिराज-2000, जगुआर, सु-30एमकेआई आदि पर इंटीग्रेट हो सकता है।

इसके अलावा डीएसी में वायुसेना के पायलटों की ट्रेनिंग को बेहतर बनाने के लिए एलसीए तेजस के लिए फुल मिशन सिम्युलेटर को मंजूरी दी गई है। वहीं, ऑटोमैटिक टेक-ऑफ और लैंडिंग रिकॉर्डिंग सिस्टम से एविएशन सिक्योरिटी को और मजबूत किया जाएगा।

DAC Meeting 2025: स्वदेशी रक्षा उत्पादन पर जोर

रक्षा मंत्रालय का कहना है कि इस पूरी प्रक्रिया में स्वदेशीकरण पर खास ध्यान दिया गया है। ज्यादातर सिस्टम्स देश में ही विकसित किए गए हैं या किए जा रहे हैं। इससे न सिर्फ सेना को आधुनिक हथियार मिलेंगे, बल्कि घरेलू रक्षा उद्योग को भी मजबूती मिलेगी।

DAC Meeting Approves Rs 79,000-Crore Defence Push, Boosts Drones, Pinaka and Precision Strikes

DAC Meeting Approves Rs 79,000-Crore Defence Push, Boosts Drones, Pinaka and Precision Strikes
DAC Meeting Approves Rs 79,000-Crore Defence Push, Boosts Drones, Pinaka and Precision Strikes (File Photo)

DAC Meeting 2025: In one of the largest defence procurement clearances of the year, the Defence Acquisition Council (DAC), chaired by Defence Minister Rajnath Singh, on December 29 accorded Acceptance of Necessity (AoN) for proposals worth nearly Rs 79,000 crore, significantly bolstering the operational capabilities of the Indian Army, Navy and Air Force.

The approvals underline India’s accelerating pivot towards counter-drone systems, long-range precision strikes and enhanced surveillance amid evolving battlefield threats.

The decisions were taken at a DAC meeting held in New Delhi, marking a decisive push towards future-ready, technology-intensive warfare, with a strong emphasis on indigenisation and force modernisation.

Army Focus: Counter-Drone Shield and Long-Range Firepower

For the Indian Army, the DAC cleared a series of high-impact proposals reflecting lessons from recent global conflicts, particularly the growing dominance of drones and precision-guided munitions.

A key clearance is for the Integrated Drone Detection & Interdiction System (IDD&IS) Mk-II, a next-generation counter-drone solution equipped with a high-power laser weapon. Designed to detect, track and neutralise hostile drones at extended ranges, the system integrates passive detection, wideband monitoring and precise electronic countermeasures.

Crucially, it can identify low-power, frequency-agile and non-standard drone signals, making it effective against swarm tactics and electronic warfare-enabled threats. The system will protect vital military assets in tactical battle areas as well as population centres in the hinterland.

Complementing this is the approval for Low Level Light Weight Radar (Improved) – LLLR(I), a specialised surveillance radar tailored to detect small, low-flying unmanned aerial systems that often evade conventional radars. Its induction is expected to significantly enhance situational awareness along sensitive borders and critical installations.

Precision Strike and Deep Reach Capabilities

The DAC also cleared procurement of Loiter Munition Systems, described by the Army as a major force multiplier. These “kamikaze drones” combine surveillance and strike capabilities, enabling precision engagement of high-value targets with minimal collateral damage. Indigenous loiter munitions will equip newly raised Shaktibaan and Divyastra units, allowing precision strikes deep into enemy territory even in electronically contested environments. Beyond physical damage, their psychological impact is seen as a key advantage.

Further enhancing deep-strike capacity, the DAC approved Long Range Guided Rocket Ammunition for the Pinaka Multiple Launch Rocket System (MLRS). While existing Pinaka rockets have a range of up to 75 km, the new guided rockets can strike targets up to 120 km away with high accuracy. Developed indigenously, the podded ammunition comes with four different warhead options, enabling tailored responses against high-value enemy targets.

Navy and Air Force: ISR, Mobility and Training Boost

For the Indian Navy, AoN was granted for procurement of Bollard Pull Tugs, essential for maneuvering ships and submarines in harbours, along with High Frequency Software Defined Radios (HF SDR) Manpack to ensure secure long-range communications during boarding and landing operations. The clearance to lease High Altitude Long Endurance (HALE) Remotely Piloted Aircraft Systems is particularly significant, as it will dramatically improve maritime Intelligence, Surveillance and Reconnaissance (ISR) and strengthen Maritime Domain Awareness across the Indian Ocean Region.

The Indian Air Force received approvals for Astra Mk-II beyond-visual-range air-to-air missiles, SPICE-1000 precision guidance kits, Full Mission Simulators for LCA Tejas, and an Automatic Take-off and Landing Recording System. Together, these acquisitions enhance standoff strike capability, air combat dominance, pilot training efficiency and aviation safety.

Strategic Signal

Taken together, the Rs 79,000-crore clearances reflect a strategic recalibration of India’s military posture-one that prioritises technological superiority, indigenous development and preparedness for multi-domain conflicts. With drones, precision strikes and electronic warfare redefining modern battlefields, the DAC’s decisions underscore India’s intent to stay ahead of emerging threats while strengthening self-reliance in defence manufacturing.

IAF S-400 Sudarshan First Image: भारतीय वायुसेना ने ऑपरेशन सिंदूर के बाद पहली बार दिखाई सुदर्शन एयर डिफेंस सिस्टम की झलक

IAF S-400 Sudarshan First Image
IAF S-400 Sudarshan Revealed: First Official Image Marks New Era in India’s Air Defence

IAF S-400 Sudarshan First Image: भारतीय वायुसेना के सबसे ताकतवर एयर डिफेंस सिस्टम एस-400 की पहली बार पूरी तस्वीर सार्वजनिक रूप से सामने आई है। यह फोटो वायुसेना की सालाना मैगजीन में प्रकाशित की गई है। इस सिस्टम को भारतीय वायुसेना में “सुदर्शन” नाम दिया गया है।

अभी तक एस-400 की तस्वीरें धुंधली या सैटेलाइट इमेजरी से थीं, लेकिन अब भारतीय वायुसेना ने खुद लॉन्चर की फुल, हाई-क्वालिटी इमेज रिलीज की है, जिसमें भारतीय वायुसेना का राउंडल भी साफ दिख रहा है। पहली बार इसका पूरा लॉन्चर सिस्टम दिखाया गया है। वायुसेना के सूत्रों के मुताबिक, एस-400 अब भारत के एयर डिफेंस आर्किटेक्चर का सबसे अहम स्तंभ बन चुका है। (IAF S-400 Sudarshan First Image)

एस-400 सुदर्शन को दुनिया के सबसे आधुनिक और ताकतवर सतह से हवा में मार करने वाले मिसाइल सिस्टम्स में गिना जाता है। यह सिस्टम एक साथ कई तरह के हवाई खतरों से निपटने में सक्षम है। इसमें फाइटर एयरक्राफ्ट, ड्रोन, क्रूज मिसाइल और बैलिस्टिक मिसाइल तक को पहचानने, ट्रैक करने और नष्ट करने की क्षमता है।

IAF S-400 Sudarshan First Image: भारत की हवाई ढाल में “गेम-चेंजर”

भारतीय वायुसेना के अनुसार, एस-400 सुदर्शन सिस्टम लड़ाकू विमानों, मानवरहित एरियल व्हीकल यानी यूएवी, क्रूज मिसाइलों और बैलिस्टिक मिसाइलों जैसे खतरों से निपटने के लिए तैयार किया गया है। इसकी खासियत यह है कि यह एक साथ कई टारगेट्स पर नजर रख सकता है और अलग-अलग ऊंचाई तथा दूरी पर मौजूद टारगेट को निशाना बना सकता है। यह सिस्टम भारत के वायु क्षेत्र के लिए एक मजबूत सुरक्षा कवच बनाता है। यही वजह है कि इसे भारत की हवाई ढाल में “गेम-चेंजर” माना जा रहा है। (IAF S-400 Sudarshan First Image)

वायुसेना के अधिकारियों का कहना है कि एस-400 के शामिल होने से भारत की एयर डिफेंस क्षमता में जबरदस्त बदलाव आया है। पहले जहां अलग-अलग सिस्टम अलग भूमिकाएं निभाते थे, वहीं एस-400 एक मल्टी-लेयर डिफेंस प्लेटफॉर्म के तौर पर काम करता है। इस सिस्टम की सबसे बड़ी ताकत इसकी लंबी रेंज और मल्टी-लेयर सुरक्षा है। इसका मतलब यह है कि कम ऊंचाई पर उड़ने वाले ड्रोन से लेकर ऊंची उड़ान भरने वाले फाइटर जेट और लंबी दूरी से दागी गई मिसाइलों तक, सभी के लिए एक ही सिस्टम काफी है। (IAF S-400 Sudarshan First Image)

IAF S-400 Sudarshan First Image: एक साथ कई खतरों से निपटने की ताकत

एस-400 की सबसे खास बात यह है कि यह एक साथ कई टारगेट्स को इंगेज कर सकता है। आमतौर पर पुराने एयर डिफेंस सिस्टम एक या दो टारगेट्स तक सीमित रहते थे, लेकिन एस-400 दर्जनों टारगेट्स को एक साथ ट्रैक कर सकता है। अगर दुश्मन एक साथ ड्रोन, मिसाइल और फाइटर जेट से हमला करता है, तो यह सिस्टम हर खतरे को उसकी प्राथमिकता के हिसाब से निपटाता है। (IAF S-400 Sudarshan First Image)

यह सिस्टम 400 किमी तक बैलिस्टिक मिसाइल्स, 250 किमी तक एयरक्राफ्ट्स, और शॉर्टर रेंज में ड्रोन्स/क्रूज मिसाइल्स को टारगेट कर सकता है। यह एक साथ 80 टारगेट्स ट्रैक और 36 को एंगेज करने की क्षमता रखता है।
इसमें मल्टी-लेयर्ड डिफेंस जिसमें 4 तरह की मिसाइल्स (40एन6, 48एन6ई3, 9एम96ई2) लगी हैं। (IAF S-400 Sudarshan First Image)

IAF S-400 Sudarshan First Image
IAF S-400 Sudarshan Revealed: First Official Image Marks New Era in India’s Air Defence

IAF S-400 Sudarshan First Image: सुदर्शन नाम का मतलब

भारतीय वायुसेना ने एस-400 को सुदर्शन नाम दिया है। सुदर्शन का अर्थ होता है- जो सब कुछ देख सके। यह नाम इस सिस्टम की क्षमताओं पर बिल्कुल सटीक बैठता है। एस-400 के रडार और सेंसर इतने ताकतवर हैं कि यह सैकड़ों किलोमीटर दूर से दुश्मन के विमान या मिसाइल को ट्रैक कर सकता है।

एक बार किसी टारगेट की पहचान हो जाने के बाद, यह सिस्टम बहुत कम समय में फैसला ले सकता है कि किस मिसाइल से उस खतरे को खत्म करना है। इससे रेस्पॉन्स टाइम बेहद कम हो जाता है, जो किसी भी आधुनिक युद्ध में सबसे अहम है। (IAF S-400 Sudarshan First Image)

पीएम मोदी ने इस साल 15 अगस्त को अनाउंस किया था कि मिशन सुदर्शन चक्र 2035 तक पूरे देश में लागू हो जाएगा। जिसमें मल्टी-लेयर्ड एयर डिफेंस शील्ड प्रोजेक्ट कुशा, आकाश, क्यूआरएसएएम मिसाइलें शामिल होंगी।

IAF S-400 Sudarshan First Image: ऑपरेशन सिंदूर में निभाई अहम भूमिका

ऑपरेशन सिंदूर में इसने अपनी ताकत दिखाई थी। दुश्मन के ड्रोन्स, क्रूज मिसाइल्स और एयरक्राफ्ट्स को इंटरसेप्ट किया। खुद एयरफोर्स चीफ ने कन्फर्म किया कि इसने 5-6 पाकिस्तानी फाइटर्स (जेएफ-17/एफ-16 क्लास) और एक अवॉक्स को 300 किमी की दूरी शूट डाउन किया। यह अब तक का सबसे लॉन्ग रेंज किल माना जा रहा है।

वायुसेना से जुड़े सूत्रों का कहना है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान एस-400 सुदर्शन की क्षमताओं को पूरी दुनिया ने देखा कि किस तरह जंग के दौरान एस-400 ने पाकिस्ताके जहाजों और मिसाइलों को निशाना बनाया। इस ऑपरेशन के दौरान यह सिस्टम पूरी तरह सक्रिय था और हवाई क्षेत्र की सुरक्षा में इसकी भूमिका काफी अहम रही।

सूत्रों के मुताबिक, इस दौरान एस-400 ने दुश्मन की कई हवाई गतिविधियों को समय रहते ट्रैक किया और उन्हें मार गिराया। इससे भारतीय वायुसेना को अपने लड़ाकू विमानों और अन्य अहम ठिकानों की सुरक्षा में बड़ी सहायता मिली। इस ऑपरेशनल अनुभव ने साबित किया कि यह सिस्टम असल जंग के हालात में भी भरोसेमंद है।

एस-400 के शामिल होने से भारतीय वायुसेना की डिटरेंस क्षमता यानी डर पैदा करने वाली ताकत में बड़ा इजाफा हुआ है। अब किसी भी दुश्मन देश को यह सोचने पर मजबूर होना पड़ेगा कि भारत के हवाई क्षेत्र में घुसना आसान नहीं है। (IAF S-400 Sudarshan First Image)

IAF S-400 Sudarshan First Image: इंटीग्रेटेड एयर डिफेंस की रीढ़

एस-400 सुदर्शन को भारत की इंटीग्रेटेड एयर डिफेंस सिस्टम का अहम हिस्सा माना जा रहा है। इसे अन्य रडार, मिसाइल सिस्टम और कमांड नेटवर्क से जोड़ा गया है, जिससे पूरे देश में एक मजबूत और जुड़ी हुई हवाई सुरक्षा व्यवस्था तैयार होती है। यह IACCS (इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम) से फुली इंटीग्रेटेड है और रियल-टाइम डेटा शेयरिंग करता है। इसका मतलब यह है कि किसी भी खतरे की जानकारी तुरंत पूरे सिस्टम में साझा होती है और जवाबी कार्रवाई तेजी से हो पाती है। यह आधुनिक युद्ध की जरूरतों के मुताबिक एक बड़ा बदलाव है।

इसे पंजाब के आदमपुर बेस, राजस्थान और सिलिगुड़ी ईस्टर्न सेक्टर में डिप्लॉय्ड किया गया है। यह चीन और पाकिस्तान दोनों फ्रंट्स पर डिटरेंस बढ़ाता है। 2018 में 35,000 करोड़ रुपये में 5 स्क्वॉड्रन्स की डील हुई थी, जिनमें से तीन ऑपरेशन हैं, बाकी दो की 2026 में डिलीवरी होगी। (IAF S-400 Sudarshan First Image)

IAF S-400 Sudarshan First Image: फोटो से रणनीतिक संदेश

एस-400 की पहली पूरी तस्वीर का सामने आना सिर्फ एक फोटो रिलीज नहीं है। यह एक रणनीतिक संदेश भी है। इससे यह साफ संकेत गया है कि भारत अब अपनी हवाई सुरक्षा क्षमताओं को लेकर पूरी तरह आश्वस्त है और दुनिया को यह दिखाने में हिचक नहीं रहा कि उसके पास क्या ताकत है। (IAF S-400 Sudarshan First Image)

INS Vaghsheer Sortie: सबमरीन की सॉर्टी लेने वाली देश की पहली महिला राष्ट्रपति बनीं द्रौपदी मुर्मू, सुखोई-30 और राफेल में भी भरी है उड़ान

President Droupadi Murmu INS Vaghsheer Sortie
President Droupadi Murmu INS Vaghsheer Sortie

INS Vaghsheer Sortie: भारतीय नौसेना के लिए आज का दिन बेहद यादगार रहा। भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भारतीय नौसेना की स्वदेशी कलवरी-क्लास सबमरीन आईएनएस वाघशीर पर सॉर्टी लेकर इतिहास रच दिया। वह देश की पहली महिला राष्ट्रपति और ऐसी दूसरी राष्ट्रपति हैं, जिन्होंने सबमरीन की सॉर्टी ली है। कर्नाटक के कारवार स्थित कडंबा नेवल बेस से उन्होंने इस पनडुब्बी पर सवार होकर समुद्र के भीतर डाइव की और करीब दो घंटे से ज्यादा समय तक सबमरीन के ऑपरेशनल डेमॉन्स्ट्रेशन देखे। इस दौरान राष्ट्रपति के साथ नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के. त्रिपाठी भी मौजूद रहे।

यह अवसर इसलिए भी खास रहा क्योंकि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू किसी सबमरीन पर सॉर्टी लेने वाली देश की दूसरी राष्ट्रपति बनीं। इससे पहले वर्ष 2006 में पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने सबमरीन में सॉर्टी ली थी। उन्होंने रूसी मूल की किलो-क्लास सबमरीन आईएनएस सिंधुरक्षक पर सॉर्टी ली थी। वहीं, कलवरी-क्लास की सबमरीन पर किसी राष्ट्रपति की यह पहली सॉर्टी भी मानी जा रही है। (INS Vaghsheer Sortie)

INS Vaghsheer Sortie: क्रू और सेलर्स से की बातचीत

राष्ट्रपति सुबह गोवा एयरपोर्ट से हेलिकॉप्टर द्वारा कारवार के कडंबा नेवल बेस पहुंचीं। वहां नौसेना के वरिष्ठ अधिकारियों ने उनका स्वागत किया। इसके बाद वे आईएनएस वाघशीर पर सवार हुईं। सॉर्टी के दौरान सबमरीन ने डाइव की और अलग-अलग ऑपरेशनल डेमॉन्स्ट्रेशन डिस्प्ले किए गए। राष्ट्रपति ने सबमरीन के भीतर मौजूद कंट्रोल रूम, नेविगेशन सिस्टम और क्रू की कैसे काम करता है, उसे नजदीक से देखा।

करीब दो घंटे से अधिक समय तक चली इस सॉर्टी के दौरान उन्होंने अफसरों और सेलर्स से बातचीत की और उनके अनुभवों को जाना। समुद्र के भीतर सीमित जगह, सख्त अनुशासन और उच्च तकनीक के बीच काम कर रहे जवानों को देखकर राष्ट्रपति ने उनके आत्मविश्वास और समर्पण की सराहना की। (INS Vaghsheer Sortie)

नौसेना हर खतरे से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार

सॉर्टी के बाद राष्ट्रपति ने विजिटर्स बुक में अपने अनुभव साझा करते हुए लिखा कि आईएनएस वाघशीर पर सेलिंग, डाइव और समय बिताना उनके लिए बेहद खास अनुभव रहा। उन्होंने लिखा कि सबमरीन द्वारा की गई कई सफल फायरिंग और चुनौतीपूर्ण ऑपरेशंस क्रू की बेहतरीन तैयारी और समर्पण को दर्शाते हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि वाघशीर के क्रू का अनुशासन, आत्मविश्वास और उत्साह यह भरोसा देता है कि भारतीय नौसेना और उसकी सबमरीन किसी भी खतरे और हर परिस्थिति में देश की रक्षा के लिए पूरी तरह तैयार हैं। (INS Vaghsheer Sortie)

President Droupadi Murmu INS Vaghsheer Sortie
President Droupadi Murmu INS Vaghsheer Sortie

जवानों के साथ समय बिताने से बढ़ा मनोबल

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू देश की सशस्त्र सेनाओं की सुप्रीम कमांडर हैं। उनका इस तरह से ऑपरेशनल प्लेटफॉर्म पर जाकर जवानों के साथ समय बिताना, सेनाओं के साथ उनके सीधे जुड़ाव को दिखाता है। इससे पहले नवंबर 2024 में वे स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत पर भी नौसेना का ऑपरेशनल डेमॉन्स्ट्रेशन देख चुकी हैं।

नौसेना के अधिकारियों के अनुसार, राष्ट्रपति की यह सॉर्टी जवानों के लिए मनोबल बढ़ाने वाली रही। इससे यह संदेश भी गया कि देश का सर्वोच्च संवैधानिक पद सशस्त्र बलों की तैयारियों को लेकर पूरी तरह सजग और भरोसेमंद है। (INS Vaghsheer Sortie)

प्रोजेक्ट–75 के तहत बनी है आईएनएस वाघशीर

आईएनएस वाघशीर प्रोजेक्ट–75 के तहत बनी कलवरी-क्लास की छठी और अंतिम सबमरीन है। इसे जनवरी 2025 में भारतीय नौसेना में शामिल किया गया था। यह डीजल-इलेक्ट्रिक अटैक सबमरीन है, जिसे मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड ने फ्रांस की नेवल ग्रुप के सहयोग से तैयार किया है।

यह सबमरीन एंटी-सर्फेस और एंटी-सबमरीन वॉरफेयर, इंटेलिजेंस जुटाने और समुद्री निगरानी जैसे अहम मिशनों के लिए डिजाइन की गई है। इसकी खासियत है कि यह लंबे समय तक समुद्र के भीतर रहकर चुपचाप ऑपरेशन कर सकती है। वाघशीर का मोटो ‘वीरता वर्चस्व विजय’ है, जो इसकी भूमिका और सोच को दर्शाता है। (INS Vaghsheer Sortie)

आईएनएस वाघशीर पर राष्ट्रपति की सॉर्टी को भारत की स्वदेशी रक्षा क्षमता के प्रतीक के रूप में भी देखा जा रहा है। कलवरी-क्लास सबमरीन प्रोग्राम के जरिए भारत ने पनडुब्बी निर्माण में बड़ी तकनीकी छलांग लगाई है। इस परियोजना से न सिर्फ नौसेना की ताकत बढ़ी है, बल्कि देश के शिपबिल्डिंग और डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को भी मजबूती मिली है।

नौसेना के अनुसार, इन सबमरीनों के आने से समुद्री सीमाओं की निगरानी और सुरक्षा पहले से कहीं ज्यादा प्रभावी हुई है। खास तौर पर हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती गतिविधियों के बीच इन प्लेटफॉर्म्स की भूमिका बेहद अहम मानी जाती है। (INS Vaghsheer Sortie)

INS Vaghsheer Sortie: जवानों के लिए खास दिन

वाघशीर के क्रू के लिए यह दिन खास रहा। राष्ट्रपति से सीधे संवाद और उनकी सराहना ने जवानों का उत्साह बढ़ाया। सेलर्स ने बताया कि सीमित जगह में, लंबे समय तक परिवार से दूर रहकर काम करना चुनौतीपूर्ण होता है, लेकिन ऐसे मौकों पर मिलने वाला सम्मान और भरोसा उनकी मेहनत को सार्थक बना देता है।

सु-30 एमकेआई और राफेल पर सॉर्टी

इसके अलावा वे देश की एकमात्र राष्ट्रपति हैं, जिन्होंने दो अलग-अलग फाइटर जेट सु-30 एमकेआई और राफेल पर सॉर्टी ली है। पहली हवाई सॉर्टी 8 अप्रैल 2023 को हुई थी। उस दिन राष्ट्रपति मुर्मू ने असम के तेजपुर एयर फोर्स स्टेशन से सुखोई-30 एमकेआई फाइटर जेट में उड़ान भरी। यह उड़ान करीब 30 मिनट की थी। इस दौरान विमान ने ब्रह्मपुत्र घाटी और हिमालय के पहाड़ी इलाकों के ऊपर उड़ान भरी।

दूसरी हवाई सॉर्टी उन्होंने इसी साल 29 अक्टूबर को ली थी। इस बार राष्ट्रपति मुर्मू ने हरियाणा के अंबाला एयर फोर्स स्टेशन से राफेल फाइटर जेट में उड़ान भरी। यह उड़ान भी लगभग 30 मिनट की रही। इस दौरान राफेल ने करीब 15,000 फीट की ऊंचाई हासिल की और 700 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ान भरी। राफेल भारतीय वायुसेना का सबसे आधुनिक लड़ाकू विमान माना जाता है, इसलिए यह सॉर्टी खास तौर पर महत्वपूर्ण रही। (INS Vaghsheer Sortie)

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने बनाए कई रिकॉर्ड

इन दोनों उड़ानों के साथ राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कई ऐतिहासिक रिकॉर्ड भी बनाए हैं। वे भारत की पहली राष्ट्रपति हैं जिन्होंने दो अलग-अलग फाइटर जेट सुखोई-30 एमकेआई और राफेल में सॉर्टी ली है। इससे पहले के राष्ट्रपति, जैसे एपीजे अब्दुल कलाम या प्रतिभा पाटिल, केवल सुखोई-30 एमकेआई में ही उड़ान भरी थी।

इतना ही नहीं, राष्ट्रपति मुर्मू राफेल फाइटर जेट में उड़ान भरने वाली पहली भारतीय राष्ट्रपति भी हैं। साथ ही वे दुनिया की पहली महिला राष्ट्रपति हैं, जिन्होंने सुखोई-30 एमकेआई और राफेल दोनों में हवाई सॉर्टी ली है। सुखोई-30 एमकेआई की सॉर्टी के मामले में वे कुल मिलाकर तीसरी राष्ट्रपति और दूसरी महिला राष्ट्रपति थीं, क्योंकि उनसे पहले प्रतिभा पाटिल इस विमान में उड़ान भर चुकी थीं। (INS Vaghsheer Sortie)

Somaliland Explained: इजरायल की सोमालीलैंड को मान्यता क्यों है तुर्की के लिए बड़ा झटका? अंकारा डिक्लेरेशन पर भारी पड़ा अब्राहम अकॉर्ड्स

Somaliland Explained: Why Israel’s Recognition of Somaliland Is a Major Setback for Turkey and the Ankara Declaration
Somaliland Explained: Why Israel’s Recognition of Somaliland Is a Major Setback for Turkey and the Ankara Declaration

Somaliland Explained: हॉर्न ऑफ अफ्रीका का इलाका लंबे समय से वैश्विक राजनीति का संवेदनशील केंद्र रहा है। लाल सागर, अदन की खाड़ी और बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट के पास स्थित यह इलाका न सिर्फ समुद्री व्यापार के लिए अहम है, बल्कि वैश्विक सैन्य और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का भी केंद्र बन चुका है। इसी इलाके में स्थित सोमालीलैंड एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय चर्चा में है, जब इजरायल ने इसे आधिकारिक रूप से एक स्वतंत्र राज्य के रूप में मान्यता दे दी।

इजरायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने कहा, यह मान्यता “अब्राहम अकॉर्ड्स की स्पिरिट में है”। वहीं, सोमालीलैंड के राष्ट्रपति अब्दिरहमान मोहम्मद अब्दुल्लाही ने घोषणा की कि उनका देश क्षेत्रीय शांति के लिए अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल होगा।

वहीं, इजरायल का यह फैसला सिर्फ सोमालीलैंड के लिए ऐतिहासिक नहीं है, बल्कि तुर्की के लिए इसे एक बड़ा कूटनीतिक और रणनीतिक झटका माना जा रहा है।

Somaliland Explained: सोमालीलैंड का क्या है इतिहास

सोमालीलैंड की कहानी हजारों साल पुरानी है। यह इलाका प्राचीन समय में ‘पंट की भूमि’ के नाम से जाना जाता था, जिसका जिक्र प्राचीन मिस्र के अभिलेखों में मिलता है। यहां से लोबान और मिर्र जैसे कीमती पदार्थों का व्यापार होता था। मध्यकाल में यह क्षेत्र आदल सल्तनत और बाद में इसाक सल्तनत के अधीन रहा, जहां स्थानीय कबीलों के नेतृत्व में शासन व्यवस्था चली।

19वीं सदी के अंत में यूरोपीय शक्तियां अफ्रीका में पहुंचीं। ब्रिटेन ने 1884 से 1886 के बीच इस क्षेत्र में स्थानीय कबीलों से संधियां कर ब्रिटिश सोमालीलैंड प्रोटेक्टोरेट की स्थापना की। इसका मकसद लाल सागर और अदन की खाड़ी के समुद्री मार्गों पर नियंत्रण बनाए रखना था। दक्षिणी सोमालिया इटली का उपनिवेश था जिसे इटालियन सोमालीलैंड कहाा जाता था। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन ने इटालियन हिस्से पर भी कब्जा कर लिया।

Somaliland Explained: 1960 को ब्रिटिश सोमालीलैंड को मिली आजादी

26 जून 1960 को ब्रिटिश सोमालीलैंड को आजादी मिली और यह कुछ ही दिनों के लिए एक स्वतंत्र राज्य बना। लेकिन 1 जुलाई 1960 को यह इटालियन सोमालीलैंड के साथ मिलकर सोमाली रिपब्लिक बना। यह एकीकरण ‘ग्रेटर सोमालिया’ की सोच से प्रेरित था, लेकिन प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर यह कभी पूरी तरह सफल नहीं हो सका।

1969 में जनरल सियाद बैरे ने सत्ता संभाली और सैन्य शासन लागू किया। इस दौरान उत्तर में बसे इसाक कबीले पर अत्याचार बढ़े। 1988 में हरगेइसा और बुराओ जैसे शहरों पर की गई बमबारी को आज भी एक बड़े नरसंहार के रूप में देखा जाता है।

Somaliland Explained: 1991 में गृहयुद्ध में फंस गया सोमालिया

1991 में सियाद बैरे के शासन के पतन के साथ ही सोमालिया गृहयुद्ध में फंस गया। उसी साल 18 मई को सोमालीलैंड ने ब्रिटिश काल की सीमाओं के आधार पर फिर से स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। इसके बाद जहां मोगादिशु और दक्षिणी सोमालिया अराजकता, मिलिशिया और अल-शबाब जैसे आतंकवादी संगठनों की चपेट में आ गए, वहीं सोमालीलैंड ने स्थानीय कबीलाई समझौतों के जरिए स्थिर शासन व्यवस्था खड़ी की।

यहां अपनी सरकार, संसद, मुद्रा, पुलिस, सेना और पासपोर्ट सिस्टम बनाई। समय-समय पर चुनाव हुए और सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण भी देखा गया।

Somaliland Explained: मान्यता की लंबी प्रतीक्षा

हालांकि तीन दशक से ज्यादा समय तक स्थिरता बनाए रखने के बावजूद सोमालीलैंड को अंतरराष्ट्रीय मान्यता नहीं मिल सकी। अफ्रीकी संघ और संयुक्त राष्ट्र लगातार सोमालिया की क्षेत्रीय अखंडता का समर्थन करते रहे। अधिकांश देशों ने मोगादिशु की फेडरल सरकार को ही वैध प्रतिनिधि माना।

इजरायल की मान्यता के बाद आया नया मोड़

इसी साल 26 दिसंबर को इजरायल ने सोमालीलैंड को आधिकारिक मान्यता देकर इस स्थिति को बदल दिया। दोनों पक्षों के बीच राजनयिक संबंध स्थापित करने, दूतावास खोलने और सहयोग बढ़ाने की घोषणा की गई। यह पहली बार था जब किसी संयुक्त राष्ट्र सदस्य देश ने सोमालीलैंड को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में स्वीकार किया।

सोमालीलैंड की राजधानी हरगेइसा है और आबादी करीब 60 लाख मानी जाती है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय मान्यता कई देशों से नहीं मिली है, लेकिन इजरायल के कदम ने इस मुद्दे को फिर से वैश्विक सुर्खियों पर ला दिया है।

इजरायल के इस फैसले को लाल सागर और यमन के समीप अपनी रणनीतिक स्थिति मजबूत करने के रूप में देखा जा रहा है। बर्बेरा बंदरगाह और आसपास का इलाका इस लिहाज से बेहद अहम माना जाता है।

तुर्की के लिए क्यों है ये बड़ा झटका

तुर्की पिछले एक दशक से हॉर्न ऑफ अफ्रीका में अपनी पकड़ मजबूत करता रहा है। सोमालिया में तुर्की का सबसे बड़ा विदेशी दूतावास, मोगादिशु में विशाल मिलिट्री ट्रेनिंग बेस, अरब सागर से लाल सागर तक समुद्री सुरक्षा में दखल, ये सभी तुर्की की उस रणनीति का हिस्सा रहे हैं, जिसके तहत अंकारा अफ्रीका में अपना दीर्घकालिक प्रभाव बढ़ाना चाहता है। ऐसे में सोमालीलैंड को इजरायल की मान्यता देने को तुर्की के लिए सिर्फ कूटनीतिक झटका नहीं, बल्कि उसकी पूरी क्षेत्रीय योजना के लिए चुनौती माना जा रहा है।

सोमालिया में तुर्की की गहरी पैठ

तुर्की का सोमालिया के साथ रिश्ता 2011 के अकाल संकट के दौरान मजबूती से सामने आया, जब राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोआन मोगादिशु पहुंचे। इसके बाद तुर्की ने सोमालिया में अस्पताल, सड़कें, स्कूल और बंदरगाह परियोजनाएं शुरू कीं। मोगादिशु में स्थित तुर्की दूतावास आज दुनिया में तुर्की का सबसे बड़ा दूतावास माना जाता है।

सैन्य स्तर पर, तुर्की ने सोमाली सेना को ट्रेनिंग देने के लिए तुर्कसोम मिलिटरी ट्रेनिंग बेस बनाया। यहां हजारों सोमाली सैनिकों को प्रशिक्षण दिया गया है। इसके अलावा तुर्की ने सोमालिया के साथ रक्षा सहयोग और समुद्री सुरक्षा समझौते भी किए हैं, जिससे लाल सागर और अदन की खाड़ी में उसकी भूमिका मजबूत हुई।

तुर्की की आधिकारिक नीति हमेशा स्पष्ट रही है, सोमालिया एक संप्रभु और एकीकृत देश है और सोमालीलैंड उसका अभिन्न हिस्सा है। अंकारा ने कभी भी सोमालीलैंड को अलग देश मानने का संकेत नहीं दिया। तुर्की के लिए यह सिर्फ एक कानूनी मान्यता नहीं, बल्कि उसके रणनीतिक निवेश और सैन्य मौजूदगी की सुरक्षा का मुद्दा भी है।

अगर सोमालीलैंड को व्यापक अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिलती है, तो इससे मोगादिशु की सरकार कमजोर होगी और तुर्की की वह स्थिति भी डगमगा सकती है, जो उसने सोमालिया की वैध सरकार के साझेदार के रूप में बनाई है।

2024 में अंकारा की कूटनीतिक जीत

जनवरी 2024 में जब इथियोपिया ने सोमालीलैंड के साथ बर्बेरा बंदरगाह को लेकर समझौता किया, तो इससे पूरे क्षेत्र में तनाव बढ़ गया। सोमालिया ने इसे अपनी संप्रभुता का उल्लंघन बताया। उस समय तुर्की ने मध्यस्थता की भूमिका निभाई और अंकारा में बातचीत कराई।

दिसंबर 2024 में अंकारा डिक्लेरेशन के जरिए इथियोपिया और सोमालिया के बीच तनाव कम किया गया। इथियोपिया ने सोमालिया की क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने की बात कही और सोमालीलैंड को लेकर समझौता ठंडे बस्ते में चला गया। इसे तुर्की की बड़ी कूटनीतिक सफलता माना गया था।

इज़रायल की मान्यता से बदला खेल

26 दिसंबर को इजरायल के सोमालीलैंड को मान्यता दिए जाने से यह संतुलन अचानक बदल गया है। तुर्की के लिए यह इसलिए बड़ा झटका है क्योंकि यह फैसला उसकी हालिया मध्यस्थता और नीति के विपरीत गया। अंकारा को आशंका है कि यह कदम अन्य देशों के लिए भी रास्ता खोल सकता है।

तुर्की के विदेश मंत्रालय ने इस फैसले को सोमालिया के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप बताया और कहा कि इससे क्षेत्रीय स्थिरता को नुकसान पहुंचेगा। मिस्र और सोमालिया के साथ मिलकर तुर्की ने संयुक्त बयान जारी कर इस कदम की निंदा की।

हॉर्न ऑफ अफ्रीका में रणनीतिक चिंता

हॉर्न ऑफ अफ्रीका वह इलाका है, जहां से बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट गुजरता है। बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य के जरिए दुनिया के करीब 12 प्रतिशत वैश्विक व्यापार और लगभग 30 प्रतिशत कंटेनर ट्रैफिक गुजरता है। यह रास्ता लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ता है और विश्व व्यापार के लिए बेहद अहम है। इस क्षेत्र में प्रभाव का मतलब है वैश्विक समुद्री व्यापार पर नजर। इसी वजह से तुर्की, चीन, अमेरिका और अब इज़रायल की गतिविधियां यहां लगातार बढ़ रही हैं।

तुर्की लंबे समय से इस इलाके में खुद को एक प्रमुख समुद्री सुरक्षा साझेदार के रूप में पेश करता रहा है। लेकिन अगर सोमालीलैंड में इज़रायल या अन्य देशों की सैन्य-रणनीतिक मौजूदगी बढ़ती है, तो तुर्की के लिए यह सीधे प्रभाव क्षेत्र में चुनौती होगी।

तुर्की-इजरायल के तनावपूर्ण संबंध

गाजा युद्ध और फिलिस्तीन मुद्दे को लेकर तुर्की और इजरायल के रिश्ते पहले से तनावपूर्ण रहे हैं। ऐसे माहौल में इजरायल का यह कदम तुर्की के लिए सिर्फ अफ्रीका तक सीमित मुद्दा नहीं है, बल्कि यह उसके व्यापक मध्य-पूर्व और अफ्रीका नीति से जुड़ जाता है।

तुर्की इसे इजरायल की उस रणनीति के रूप में देख रहा है, जिसके तहत वह लाल सागर और यमन के आसपास अपनी स्थिति मजबूत करना चाहता है।

लेकिन इजरायल की मान्यता ने इस संतुलन को झकझोर दिया। इससे सोमालीलैंड को अंतरराष्ट्रीय मंच पर नया आत्मविश्वास मिला और तुर्की की उस नीति को सीधी चुनौती मिली, जो सोमालिया की अखंडता पर आधारित थी।

तुर्की अब इस मुद्दे पर सोमालिया के साथ अपने सहयोग को और मजबूत करने की कोशिश करता दिख रहा है, ताकि क्षेत्रीय संतुलन उसके पक्ष में बना रहे।

अब्राहम अकॉर्ड्स का विस्तार

26 दिसंबर को इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इस मान्यता को “अब्राहम अकॉर्ड्स की स्पिरिट” बताया, जो 2020 में ट्रंप की मध्यस्थता से शुरू हुए समझौते हैं। सोमालीलैंड के राष्ट्रपति अब्दिरहमान मोहम्मद अब्दुल्लाही ने घोषणा की कि उनका देश अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल होगा। यह अब्राहम अकॉर्ड्स का ऐतिहासिक विस्तार है कि पहली बार कोई गैर-अरब, मुस्लिम-बहुल देश इसमें जुड़ा है।

अरब लीग ने जताया विरोध

सोमालिया की फेडरल सरकार ने इस फैसले को अपनी संप्रभुता पर हमला बताया। अफ्रीकी संघ, अरब लीग और मिस्र ने भी इस कदम की आलोचना की। तुर्की ने इसे क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरा बताते हुए कड़ा विरोध दर्ज कराया।

इसके बावजूद यह साफ है कि इजरायल की मान्यता ने हॉर्न ऑफ अफ्रीका की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है और पुराने समीकरणों को चुनौती दी है।

Indian Army New Winter Doctrine: पहलगाम हमले के बाद सर्दियों में कैसे सेना ने बदली रणनीति, अब आतंकवाद के लिए नहीं कोई ‘ऑफ-सीजन’

Indian Army New Winter Doctrine

Indian Army New Winter Doctrine: इस साल पहलगाम हमले के बाद भारतीय सेना ने अपनी पुरानी रणनीतियों में कई बदलाव किए हैं। यह बदलाव खासतौर पर पहलगाम आतंकी हमले के बाद सामने आया है, जिसके बाद सेना ने यह साफ कर दिया कि अब आतंकी सर्दियों की आड़ लेकर भारत में घुसपैठ नहीं कर सकेंगे।

पहलगाम अटैक से पहले सर्दियों में जिस तरह से पाकिस्तान समर्थित आतंकियों ने सरहद पार करके भारतीय इलाकों में घुसपैठ की थी और फिर वारदात को अंजाम दिया था। उसके बाद जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के खिलाफ भारतीय सेना की काउंटर-टेररिज्म की रणनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। सर्दियों को अब केवल मुश्किल मौसम नहीं, बल्कि ऑपरेशनल मौके के तौर पर देखा जा रहा है। इसे ही भारतीय सेना की नई विंटर डॉक्ट्रिन कहा जा रहा है।

आमतौर पर जम्मू-कश्मीर में दिसंबर और जनवरी के महीने, खासकर चिल्लई कलां के दौरान काउंटर-टेरर ऑपरेशंस की कम हो जाते हैं। भारी बर्फबारी, बंद रास्ते और बेहद ठंडे मौसम के चलते ऊंचाईं वाले इलाकों में सैन्य मूवमेंट सीमित रहता था। ऐसे हालात का फायदा उठाकर आतंकी ऊंचाई पर स्थित जंगलों और पहाड़ी इलाकों में छिप जाते थे, रीग्रुपिंग करते थे और अगली गर्मियों की तैयारी करते थे। (Indian Army New Winter Doctrine)

Indian Army New Winter Doctrine: पहलगाम हमले के बाद बदला सोच का तरीका

22 अप्रैल 2025 को पहलगाम इलाके में हुए आतंकी हमले के बाद सुरक्षा एजेंसियों ने पूरे हालात का दोबारा मुआयना किया। इस आकलन में यह बात साफ सामने आई कि आतंकवादी सर्दियों को एक “सेफ पीरियड” मानकर अपनी गतिविधियों की प्लानिंग करते हैं और दोबारा से संगठित करते हैं। इसी के बाद सेना ने तय किया कि अब सर्दियों में भी ऑपरेशंस उसी तेजी से चलाए जाएंगे, जैसी गर्मियों में होते हैं।

नई विंटर डॉक्ट्रिन लागू करके भारतीय सेना ने का आतंकियों को यह स्पष्ट तौर यह संदेश दे दिया है कि अब वे सर्दियों का फायदा नहीं उठा सकते। बर्फ, ठंड और दुर्गम इलाका अब सेना के लिए रुकावट नहीं, बल्कि ऑपरेशन का हिस्सा हैं। (Indian Army New Winter Doctrine)

Indian Army New Winter Doctrine
Indian Army Winter Operations: How Troops Are Fighting Terror and Denying Militants Shelter in Sub-Zero Cold

प्रोएक्टिव विंटर पोस्चर: अब कोई ब्रेक नहीं

इस डॉक्ट्रिन के तहत सेना ने प्रोएक्टिव विंटर पोस्चर अपनाया है। इसका मतलब है कि सर्दियों में ऑपरेशंस को कम करने की बजाय उन्हें और मजबूत किया गया है। किश्तवाड़, डोडा, राजौरी और पुंछ जैसे इलाकों में ऊंचाई वाले क्षेत्रों में अस्थायी विंटर बेस और सर्विलांस पोस्ट बनाई गई हैं।

पहले जिन इलाकों को सर्दियों में खाली कर दिया जाता था, अब वहां सैनिक लगातार तैनात हैं। बर्फ से ढके पहाड़, घने जंगल और संकरी घाटियों में अभी भी पेट्रोलिंग हो रही है। इससे आतंकियों के लिए किसी भी इलाके को सुरक्षित ठिकाना बनाना मुश्किल हो गया है। (Indian Army New Winter Doctrine)

दशकों से 1990 की इंसर्जेंसी से लेकर 2024 तक चिल्लई कलां आतंकवादियों की घुसपैठ के लिए सुरक्षित पीरियड या नेचुरल शील्ड की तरह काम करता था। भारी बर्फबारी से ऊंचे दर्रे बंद हो जाते थे, और सेना के बड़े ऑपरेशंस मुश्किल हो जाते थे। हिंटरलैंड जैसे जम्मू रीजन जैसे डोडा, किश्तवाड़ में सेना मुख्य रूप से डिफेंसिव रहती थी। इससे आतंकवादियों को मौसमी फायदा मिलता था और वे लोकल सपोर्ट के जरिए छिपकर सर्वाइव करते थे। इसे “टेम्परेरी लुल इन टेररिस्ट एक्टिविटी” भी कहा जाता था। (Indian Army New Winter Doctrine)

Indian Army New Winter Doctrine: क्या है सर्विलांस-स्वीप-सर्विलांस मॉडल

नई विंटर डॉक्ट्रिन का बेस सर्विलांस-स्वीप-सर्विलांस मॉडल है। इसका मतलब है कि किसी भी इलाके में पहले लगातार निगरानी की जाती है। ड्रोन, थर्मल इमेजर और ग्राउंड सेंसर्स से मूवमेंट पर नजर रखी जाती है। जैसे ही पुख्ता इनपुट मिलता है, वहां ऑपरेशन चलाकर इलाके को क्लियर किया जाता है। इसके बाद भी निगरानी जारी रहती है, ताकि आतंकी दोबारा उसी इलाके में वापस न आ सकें।

इसका मतलब है कि इस मॉडल के बाद ऑपरेशंस अब लगातार चलते रहेंगे। सेना का मकसद सिर्फ आतंकियों को मार गिराना नहीं, बल्कि पूरे इलाके को लंबे समय तक सुरक्षित बनाए रखना है। (Indian Army New Winter Doctrine)

Indian Army New Winter Doctrine: ऊंचाई और ठंड वाले इलाकों में भी तैनाती

सर्दियों में ऑपरेशन चलाना शारीरिक और मानसिक सहनशक्ति की भी परीक्षा है। सैनिकों को घुटनों तक बर्फ में चलना पड़ता है, एवलांच संभावित इलाकों से गुजरना होता है और शून्य से काफी नीचे तापमान में रातें बितानी पड़ती हैं।

इसके लिए सेना ने स्पेशलाइज्ड विंटर वॉरफेयर सब-यूनिट्स को आगे बढ़ाया है। इन यूनिट्स को स्नो नेविगेशन, कोल्ड वेदर सर्वाइवल, एवलांच रिस्पॉन्स और ऊंचाई पर कॉम्बैट की विशेष ट्रेनिंग दी गई है। यही कारण है कि अब चिल्लई कलां के दौरान गश्त और ऑपरेशन लगातार जारी हैं। चिल्लई कलां में दिसंबर-जनवरी में भयंकर सर्दी पड़ती है और भारी बर्फबारी और मुश्किल मौसम के कारण वहां बड़े ऑपरेशंस कम या स्केल डाउन हो जाते थे। लेकिन इस बार ऐसा नहीं हैं। (Indian Army New Winter Doctrine)

Indian Army New Winter Doctrine: ऐसा क्या खास है चिल्लई कलां में?

चिल्लई कलां एक फारसी शब्द है, जिसमें “चिल्ला” का मतलब 40, और “कलां” मतलब बड़ा/मेजर होता है। यानी “बड़ी 40 दिनों की ठंड” पड़ती है। मध्य एशिया से आए सूफी संतों ने सर्दियों में 40 दिनों की एकांत साधना (चिल्ला) प्रथा शुरू की, जहां वे श्राइन में रहकर ध्यान करते थे। यह प्रथा कश्मीर में लोकप्रिय हुई और सबसे ठंडे 40 दिनों को “चिल्लई कलां” कहा जाने लगा। इसका जिक्र सूफी संतों की तजकीराओं (जीवनी ग्रंथों) में मिलता है।

कुछ इतिहासकार कहते हैं कि इसका इतिहास 1000 साल से ज्यादा पुराना है। ईरानी परंपरा में 21 दिसंबर की रात को “शब-ए-यल्दा” या “शब-ए-चेल्ले” (40 की रात) मनाया जाता है, जो कश्मीर तक पहुंचा। वहीं पहले बौद्ध काल में इसे “शिश्शर मास” भी कहा जाता था।

चिल्लई कलां कश्मीर घाटी की सर्दियों का सबसे कठिन और ठंडा दौर है, जो हर साल 21 दिसंबर से 31 जनवरी तक लगभग 40 दिनों तक चलता है। यह कश्मीर की सर्दियों का “पीक” पीरियड है, जब ठंड सबसे ज्यादा प्रचंड होती है। इस दौराान तापमान -10 डिग्री फ्रीजिंग पॉइंट से काफी नीचे चला जाता है और भारी बर्फबारी होती है, पानी की पाइपें जम जाती हैं, डल झील जैसी झीलें फ्रीज हो सकती हैं, और ऊंचे इलाकों में रास्ते बंद हो जाते हैं। (Indian Army New Winter Doctrine)

Indian Army New Winter Doctrine: टेक्नोलॉजी बनी सबसे बड़ी ताकत

नई विंटर डॉक्ट्रिन में टेक्नोलॉजी की भूमिका बेहद अहम है। ड्रोन से ऊंचे इलाकों की निगरानी की जा रही है, जहां पैदल पहुंचना जोखिम भरा हो सकता है। थर्मल इमेजिंग उपकरण बर्फ और अंधेरे के बीच भी हीट सिग्नेचर पकड़ लेते हैं। ग्राउंड सेंसर्स से जंगलों और घाटियों में हलचल का पता लगाया जा रहा है।

इन सभी उपकरणों को रियल-टाइम इंटेलिजेंस नेटवर्क से जोड़ा गया है, ताकि फील्ड यूनिट्स को तुरंत इनपुट मिल सके। हालांकि सेना के सूत्र साफ कहते हैं कि तकनीक मददगार है, लेकिन अंतिम फैसला और कार्रवाई जमीन पर मौजूद सैनिक ही करते हैं। (Indian Army New Winter Doctrine)

आतंकियों पर बढ़ रहा दबाव

हाल ही में जारी इंटेलिजेंस इनपुट्स के मुताबिक जम्मू रीजन में करीब 30 से 35 आतंकी सक्रिय बताए जाते हैं। लगातार चल रहे ऑपरेशंस के कारण इन्हें निचले और आबादी वाले इलाकों से पीछे हटकर ऊंचे और निर्जन क्षेत्रों में जाना पड़ा है। स्थानीय ओवरग्राउंड वर्कर्स और सपोर्ट नेटवर्क पर भी दबाव बढ़ा है।

सर्दियों में जब गांवों तक पहुंचना मुश्किल होता है, तब आतंकियों के लिए राशन, दवाइयां और कम्युनिकेशन बनाए रखना और भी कठिन हो जाता है। सेना का मानना है कि यही दबाव आतंकियों को कमजोर करता है। (Indian Army New Winter Doctrine)

जॉइंट और इंटीग्रेटेड अप्रोच

नई रणनीति में सेना अकेले काम नहीं कर रही है। जम्मू-कश्मीर पुलिस, सीआरपीएफ, स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप, फॉरेस्ट गार्ड्स, विलेज डिफेंस गार्ड्स और सिविल एडमिनिस्ट्रेशन के साथ मिलकर एक साझा सिक्योरिटी ग्रिड बनाया गया है।

इंटेलिजेंस शेयरिंग तेज हुई है और ऑपरेशन के बाद इलाके की सुरक्षा जिम्मेदारी तय की जाती है। इससे आतंकियों के लिए दोबारा घुसपैठ या वापसी की गुंजाइश कम हो जाती है। (Indian Army New Winter Doctrine)

ग्रामीण इलाकों में भरोसा कायम रखने की कोशिश

बर्फीले और दूरदराज के गांवों में सेना की मौजूदगी से स्थानीय लोगों में भी भरोसा बढ़ रहा है। पहले जो इलाके सर्दियों में अलग-थलग पड़ जाते हैं औऱ जिसका फादयाा आतंकी उठाते थे, अब वहं सेना की लगातार मौजूदगी देखने को मिल रही है। विलेज डिफेंस गार्ड्स से गांवों में सुरक्षा पुख्ता हो रही है। सेना लगातार ग्रामीणों से संपर्क रखती है, ताकि डर और अफवाह का माहौल न बने।

स्थानीय लोग भी अब संदिग्ध गतिविधियों की जानकारी तुरंत सुरक्षा बलों तक पहुंचा रहे हैं, जिससे ऑपरेशंस करने में आसानी हो रही है।

वहीं, नई विंटर डॉक्ट्रिन के जरिए सेना ने यह साफ कर दिया है कि आतंकवाद के लिए अब कोई “ऑफ-सीजन” नहीं होगा। बर्फ से ढकी पहाड़ियां, ठंडी रातें और सुनसान जंगल अब आतंकियों के लिए ढाल नहीं बनेंगे। (Indian Army New Winter Doctrine)

Indian Army Winter Operations: How Troops Are Fighting Terror and Denying Militants Shelter in Sub-Zero Cold

Indian Army New Winter Doctrine
Indian Army Winter Operations: How Troops Are Fighting Terror and Denying Militants Shelter in Sub-Zero Cold

Indian Army Winter Operations: As the Himalayas lock themselves in ice and the 40-day stretch of Chillai Kalan tightens its grip on Jammu and Kashmir, life in the mountains slows to a near standstill. Roads vanish under snow, villages retreat indoors, and silence settles over the forests of Kishtwar and Doda. But for the Indian Army, winter no longer signals a pause. This year, it marks an intensification.

Defence sources say the Army has expanded counter-terrorism operations deep into snowbound and high-altitude areas of Kishtwar and Doda, determined to deny Pakistani terrorists the seasonal refuge they have traditionally relied upon. In sub-zero temperatures and near-whiteout conditions, soldiers are climbing higher, staying longer, and watching closer.

Indian Army Winter Operations
Indian Army Winter Operations: How Troops Are Fighting Terror and Denying Militants Shelter in Sub-Zero Cold

Indian Army Winter Operations: Breaking the Winter Lull

For decades, Chillai Kalan from December 21 to January 31 has brought a tactical lull. Heavy snowfall cuts off mountain routes, forcing both civilians and terrorists into relative inactivity. This winter, however, marks a deliberate shift in doctrine.

Instead of scaling down, Army units have established temporary winter bases and surveillance posts in higher reaches that are usually vacated. Patrols now criss-cross frozen ridgelines, dense forests, and narrow valleys, ensuring that no area becomes a safe haven.

Military experts describe this as a clear evolution in counter-terror strategy—one that treats winter not as an obstacle, but as an operational advantage.

Indian Army Winter Operations: Chasing Shadows in High Altitudes

Operating in such conditions is not merely a tactical challenge but a test of endurance. Soldiers trek through knee-deep snow, navigate avalanche-prone slopes, and endure nights where temperatures plunge well below freezing. Visibility is often poor, and terrain unforgiving.

Yet patrols continue relentlessly. “The idea is simple,” a source explained. “No gaps, no sanctuaries.” The Army’s presence across multiple altitude bands, valleys, mid-slopes, and high ridges creates overlapping control grids, denying terrorists any movement corridor.

Indian Army Winter Operations: Cornered and Isolated

Intelligence assessments indicate that around 30 to 35 Pakistani terrorists are currently active in the Jammu region. Sustained operations over recent months have pushed these groups out of lower, inhabited areas and into higher, desolate terrain.

Cut off from overground workers and local sympathisers whose support has significantly dried up these terrorists are believed to be seeking temporary winter hideouts. Reports suggest attempts to coerce villagers for food and shelter, but heightened vigilance and community resistance have limited such efforts.

“Their isolation is growing,” an official said. “Winter only worsens their logistical and communication constraints.”

Indian Army Winter Operations: Technology Meets Terrain

Modern technology has become a critical ally in this winter campaign. Drone surveillance, ground sensors, thermal imagers, and surveillance radars are being used to detect movement, even in dense forests or during night hours.

Heat signatures picked up by thermal devices often guide patrols, while unmanned aerial systems scan areas too dangerous for foot movement. These tools, integrated into the Army’s intelligence network, allow commanders to act swiftly on actionable inputs.

Yet, technology complements not replaces the soldier’s instinct and terrain knowledge. “Machines help,” a senior officer noted, “but it’s the soldier who still walks the snow.”

Indian Army Winter Operations
Indian Army Winter Operations: How Troops Are Fighting Terror and Denying Militants Shelter in Sub-Zero Cold

Indian Army Winter Operations: Joint Forces, One Grid

The winter operations are marked by unprecedented coordination. Alongside the Army, the Jammu and Kashmir Police, CRPF, Special Operations Group, Forest Guards, Village Defence Guards (VDGs), and the civil administration form a seamless security grid.

Intelligence is pooled, verified, and acted upon jointly. Once an area is cleared, it remains under sustained surveillance, a cycle described by officials as “surveillance–operation–surveillance.” This approach ensures terrorists cannot slip back once pressure eases.

Villages at the Frontline

In remote hamlets tucked away in snowbound valleys, the Army’s presence carries reassurance. Village Defence Guards act as sentinels, alerting forces to suspicious movements, while soldiers regularly interact with locals to counter fear and intimidation.

For villagers, seeing troops braving the same harsh conditions reinforces trust. “They are here when no one else can be,” a resident of a remote Doda village said quietly.

Indian Army Winter Operations: No Season for Terror

As snow piles high on mountain passes and temperatures plunge further, the message from the security establishment is unmistakable: winter will no longer shield terrorism.

Through endurance, technology, coordination, and community trust, the Indian Army is transforming the quiet of Chillai Kalan into a season of vigilance. Every ridge is watched, every valley scanned, and every silence questioned.

In the stillness of frozen forests, the fight continues-step by step, patrol by patrol ensuring that even in the harshest winter, peace is pursued without pause.

DAC meeting: डीएसी बैठक टली, अब 29 दिसंबर को होगी अहम मीटिंग, इमरजेंसी प्रॉक्यूरमेंट की डेडलाइन 15 जनवरी तक बढ़ी

DAC Meeting Approves Rs 79,000-Crore Defence Push, Boosts Drones, Pinaka and Precision Strikes
DAC Meeting Approves Rs 79,000-Crore Defence Push, Boosts Drones, Pinaka and Precision Strikes (File Photo)

DAC meeting: देश की सुरक्षा से जुड़े बड़े फैसलों पर मुहर लगाने वाली डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (डीएसी) की अहम बैठक शुक्रवार को नहीं हो सकी। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में होने वाली यह इस साल की आखिरी बैठक थी। लेकिन अच्छी बात यह है कि बैठक को इसी साल के लिए टाल दिया गया है। माना जा रहा है कि बैठक अगले हफ्ते हो सकती है। इस बैठक में देश की तीनों सेनाओं को उन सभी हथियारों और उपकरणों पर मुहर लग सकती है जिसकी उन्हें बेहद सख्त जरूरत है।

DAC meeting: क्यों टल गई आज की डीएसी बैठक

डिफेंस सूत्रों के मुताबिक, आज डीएसी की बैठक की औपचारिक शुरुआत तो की गई थी, लेकिन काउंसिल के सभी सदस्य मौजूद नहीं थे। सूत्रों ने बताया कि भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह विदेश दौरे पर थे। वह मिस्र की यात्रा से लौट रहे थे। डीएसी में तीनों सेनाओं के प्रमुखों की मौजूदगी जरूरी होती है, क्योंकि फैसले सामूहिक सहमति से लिए जाते हैं। ऐसे में जब सभी सदस्य उपलब्ध नहीं हो पाए, तो बैठक का एजेंडा आगे नहीं बढ़ाया गया। (DAC meeting)

रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि उनकी गैरमौजूदगी में इतने बड़े और संवेदनशील रक्षा सौदों पर चर्चा करना सही नहीं माना गया। इसी वजह से बैठक को टालकर 29 दिसंबर की नई तारीख तय की गई है। यानी इसी साल में ही यह बैठक फिर से होगी।

हालांकि बैठक में रक्षा मंत्रालय ने इमरजेंसी प्रॉक्योरमेंट (ईपी) की अंतिम तारीख को भी बढ़ाकर 15 जनवरी कर दिया है। यह फैसला इसलिए अहम माना जा रहा है, क्योंकि इसके जरिए सेना, नौसेना और वायुसेना को जरूरी हथियार और उपकरण जल्दी उपलब्ध कराए जाते हैं।

DAC meeting: क्यों बढ़ी इमरजेंसी प्रॉक्योरमेंट की डेडलाइन

डीएसी बैठक के टलने का सीधा असर इमरजेंसी प्रॉक्योरमेंट (ईपी) प्रक्रिया पर भी पड़ा है। पहले ईपी की अंतिम तारीख 19 नवंबर को खत्म हो चुकी थी। इसके बाद उम्मीद थी कि दिसंबर के आखिर तक पेंडिंग मामलों को निपटा लिया जाएगा। लेकिन चूंकि अब ईपी की समयसीमा को भी बढ़ाकर 15 जनवरी कर दिया गया है। तो उम्मीद है कि पेंडिंग मामलों को तेजी से आगे बढ़ाया जाएगा।

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DAC meeting: क्या है इमरजेंसी प्रॉक्योरमेंट, और यह कैसे करती है काम

जब देश की सीमाओं पर अचानक तनाव बढ़ता है, कोई बड़ा सैन्य ऑपरेशन होता है या युद्ध जैसे हालात बनते हैं, तब भारतीय सेना को इंतजार करने का वक्त नहीं होता। ऐसे समय में हथियार, गोला-बारूद, ड्रोन, मिसाइल, स्पेयर पार्ट्स और दूसरे जरूरी उपकरण तुरंत चाहिए होते हैं।

इसके लिए इमरजेंसी प्रॉक्योरमेंट प्रक्रिया का इस्तेमाल किया जाताा है, जिसके तहत सेना लंबी खरीद प्रक्रिया में पड़े बिना तुरंत जरूरी हथियार, गोला-बारूद और उपकरण खरीद सकती हैं। इसका इस्तेमाल तब किया जाता है, जब अचानक हालात बिगड़ते हैं या किसी बड़े ऑपरेशन के बाद हथियारों की तुरंत जरूरत महसूस होती है।

आमतौर पर डिफेंस डील्स में डीएपी–2020 (डिफेंस एक्विजिशन प्रोसिजर) जैसी लंबी प्रक्रिया अपनाई जाती है, जिसमें कई साल लग सकते हैं। लेकिन ईपी का मकसद सिर्फ एक होता है, कम से कम समय में सेना को जरूरत को पूरा करना।

‘ट्रांच’ में क्यों बांटा गया है ईपी को

अभी ईपी-6 चल रहा है, जिसकी डेडलाइन को बढ़ा कर 15 जनवरी 2026 कर दिया गया है। यानी इस तारीख तक सभी पेंडिंग कॉन्ट्रैक्ट्स को साइन करना होगा। इमरजेंसी प्रॉक्यूरमेंट एक बार में नहीं, बल्कि चरणों में दी जाती है। इन्हें ईपी–1, ईपी–2, ईपी–3 जैसे नाम दिए जाते हैं। हर ट्रांच एक खास हालात के लिए होती है, जैसे सीमा पर तनाव, चीन के साथ टकराव या किसी बड़े आतंकवाद विरोधी ऑपरेशन के बाद ईपी बनाई जाती है। हर ट्रांच में सरकार यह तय करती है कि कितने पैसे तक की खरीद होगी, कितने समय के लिए यह व्यवस्था लागू रहेगी और किन चीजों को प्राथमिकता दी जाएगी। (DAC meeting)

DAC meeting: क्या है पैसे का पूरा गणित?

ईपी के तहत हर एक कॉन्ट्रैक्ट की एक तय सीमा होती है। किसी भी एक सौदे की कीमत 300 करोड़ रुपये तक हो सकती है। यह सीमा हथियारों और उपकरणों, दोनों तरह की खरीद पर लागू होती है।

एक बार जरूरत तय हो जाने के बाद कॉन्ट्रैक्ट को 40 दिनों के अंदर फाइनल करना होता है। यही वजह है कि इसे फास्ट ट्रैक कहा जाता है। इसके बाद सप्लायर को 12 महीने, यानी एक साल के भीतर ऑर्डर की डिलीवरी करनी होती है।

अगर तय समय में डिलीवरी नहीं होती, तो अब सरकार उस कॉन्ट्रैक्ट को फोरक्लोज, यानी रद्द भी कर सकती है। हाल के समय में इस नियम को और सख्त किया गया है, ताकि कंपनियां देरी न करें।

हर ईपी ट्रांच का एक बजट फ्रेम होता है। ईपी–6 ट्रांच में कुल सीमा करीब 40 हजार करोड़ रुपये मानी गई है। यह पैसा एक ही सौदे में नहीं जाता, बल्कि कई छोटे–छोटे कॉन्ट्रैक्ट्स के जरिए खर्च होता है।

DAC meeting: स्वदेशी खरीद को क्यों मिलती है प्राथमिकता

ईपी में स्पष्ट नियम है कि जहां संभव हो, वहां भारतीय कंपनियों से ही खरीद की जाए। यानी इंडिजिनस सोर्स को पहली प्राथमिकता मिलती है। अगर किसी सिस्टम या हथियार के लिए आयात जरूरी हो, तो उसके लिए अलग से रक्षा मंत्रालय की मंजूरी लेनी पड़ती है। इसका मकसद सिर्फ तेजी नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर भारत को बढ़ावा देना भी है।

कितने समय के लिए होती है ईपी

आमतौर पर एक ईपी ट्रांच 3 से 6 महीने या फिर एक साल के लिए लागू रहती है। लेकिन अगर बातचीत चल रही हो और सौदे अधूरे हों, तो इसकी अवधि बढ़ाई भी जा सकती है। जैसे हाल ही में ईपी की समयसीमा नवंबर 2025 में खत्म हो गई थी, लेकिन इसे बढ़ाकर 15 जनवरी 2026 कर दिया गया, ताकि चल रही नेगोशिएशंस पूरी की जा सकें। (DAC meeting)

ईपी में असली पावर है किसके पास

इमरजेंसी प्रॉक्यूरमेंट की सबसे बड़ी ताकत तीनों सेनाओं के वाइस चीफ्स के पास होती है। सेना में यह पावर वाइस चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ के पास है। नौसेना में वाइस चीफ ऑफ नेवल स्टाफ यह अधिकार इस्तेमाल करते हैं। वायुसेना में यह जिम्मेदारी डिप्टी चीफ ऑफ एयर स्टाफ के पास होती है। यही अधिकारी ईपी के तहत कॉन्ट्रैक्ट को मंजूरी देते हैं और फाइनेंशियल पावर एक्सरसाइज करते हैं। इसमें हर कॉन्ट्रैक्ट 300 करोड़ रुपये तक का हो सकता है, और ये फास्ट-ट्रैक पर अप्रूव करते हैं। यानी 40 दिनों में कॉन्ट्रैक्ट फाइनल और 1 साल में  ऑर्डर की डिलीवरी करनी होती है।

डिप्टी चीफ्स का रोल आमतौर पर सपोर्टिंग जैसे प्लानिंग या तकनीकी सलाह देना होता है। सामान्य रक्षा खरीद में उनके पास अलग वित्तीय अधिकार होते हैं, लेकिन ईपी में मुख्य फैसला वाइस चीफ ही लेते हैं।

क्या करता है सर्विसेज प्रॉक्योरमेंट बोर्ड

ईपी के मामलों में एक अहम भूमिका होती है सर्विसेज प्रॉक्योरमेंट बोर्ड, यानी एसपीबी की। यह बोर्ड हेडक्वार्टर इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ के तहत काम करता है। एसपीबी की बैठकें चीफ ऑफ इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ टू द चेयरमैन चीफ्स ऑफ स्टाफ कमिटी (CISC) की अध्यक्षता में होती हैं। एसपीबी एक जॉइंट बोर्ड है, जिसमें तीनों सर्विसेज (आर्मी, नेवी, एयर फोर्स) के थ्री-स्टार या टू-स्टार लेवल ऑफिसर्स (जैसे डायरेक्टर जनरल्स या संबंधित ब्रांच हेड्स) और अन्य संबंधित प्रतिनिधि शामिल होते हैं।

एसपीबी यह तय करता है कि जो चीज खरीदी जा रही है, वह वाकई जरूरी है या नहीं। इसे ही एक्सेप्टेंस ऑफ नेसेसिटी, यानी एओएन कहा जाता है। एओएन मिलने के बाद ही आगे खरीद की प्रक्रिया शुरू होती है। पहले यह काम एक अलग कमेटी करती थी, लेकिन अब एसपीबी के जरिए तीनों सेनाओं के बीच तालमेल सुनिश्चित किया जाता है। (DAC meeting)

DAC meeting: कैसे चलता है ईपी का पूरा प्रोसेस

सबसे पहले सेना, नौसेना या वायुसेना अपनी तत्काल जरूरत पहचानती है। इसके बाद मामला एसपीबी के पास जाता है, जहां से एओएन मिलती है। फिर डिफेंस फाइनेंस या इंटीग्रेटेड फाइनेंशियल एडवाइजर से सहमति ली जाती है।

इसके बाद सप्लायर से बातचीत होती है और वाइस चीफ की मंजूरी से कॉन्ट्रैक्ट साइन किया जाता है। यह सब काम 40 दिनों के भीतर पूरा करना होता है।

अगर कोई चीज विदेश से मंगानी हो, तो रक्षा मंत्रालय से विशेष अनुमति लेनी पड़ती है।

ईपी की पूरी ट्रांच को अंत में डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल, यानी डीएसी, से मंजूरी मिलती है, जिसकी अध्यक्षता रक्षा मंत्री करते हैं।

कैपिटल और रेवेन्यू प्रॉक्यूरमेंट में फर्क

ईपी के तहत दो तरह की खरीद होती है। एक होती है कैपिटल प्रॉक्यूरमेंट, यानी नए हथियार और बड़े सिस्टम खरीदे जाते हैं। वहीं, दूसरी होती है रेवेन्यू प्रॉक्यूरमेंट, जिसमें गोला-बारूद, स्पेयर पार्ट्स और मेंटेनेंस से जुड़ी चीजें आती हैं। ईपी का फोकस दोनों में होता है, लेकिन असली मकसद होता है सेना की ऑपरेशनल रेडीनेस, यानी युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार रहना। (DAC meeting)

DAC meeting: क्यों जरूरी मानी जाती है ईपी

इमरजेंसी प्रॉक्यूरमेंट की शुरुआत 2016 के उरी हमले के बाद हुई थी। इसके बाद गलवान घाटी में चीन के साथ तनाव के समय इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हुआ। हाल ही में ऑपरेशन सिंदूर के बाद भी ईपी की एक नई ट्रांच लाई गई।

इस व्यवस्था की वजह से सेना को वक्त पर जरूरी हथियार मिलते हैं और किसी भी आपात स्थिति में तैयारी में कमी नहीं रहती। हालांकि, इसके साथ यह भी साफ कर दिया गया है कि इंडस्ट्री को तय समय में सप्लाई करनी ही होगी, वरना कॉन्ट्रैक्ट रद्द हो सकता है।

पिछले कुछ सालों में भारत ने कई बार इमरजेंसी प्रॉक्योरमेंट का सहारा लिया है। ईपी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें न तो लंबा रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (आरएफपी) जारी किया जाता है और न ही ट्रायल जैसा लंबा प्रोसेस अपनाया जाता है। आमतौर पर एक डील की सीमा करीब 300 से 400 करोड़ रुपये तक होती है और हथियार छह महीने के भीतर सेना को मिल जाते हैं। सामान्य रक्षा सौदों में यही प्रक्रिया दो से तीन साल तक खिंच सकती है। (DAC meeting)

फास्ट ट्रैक परचेज का भी विकल्प

इसके अलावा डिफेंस इक्विपमेंट्स की तुरंत खरीद के लिए रक्षा मंत्रालय के पास एक और विकल्प होता है, जिसे फास्ट ट्रैक परचेज (एफटीपी) कहा जाता है। यह प्रक्रिया इमरजेंसी प्रॉक्यूरमेंट जैसी ही है, लेकिन इसमें हर सौदे की अधिकतम राशि की सीमा ज्यादा होती है। अगर ईपी की समयसीमा खत्म होने के बाद भी अगर कुछ सौदे अटके रहते हैं, तो उन्हें एफटीपी के तहत आगे बढ़ाया जाता है। (DAC meeting)

क्या है डीएसी और क्यों अहम है

डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल रक्षा मंत्रालय की सबसे हाई पर्चेज कमेटी होती है। इसकी अध्यक्षता रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह करते हैं। इसमें चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान, तीनों सेनाओं के प्रमुख, रक्षा सचिव और डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (डीआरडीओ) के चेयरमैन शामिल होते हैं।

डीएसी यह तय करती है कि सेना को किस तरह के हथियार और सिस्टम खरीदने हैं। एक बार डीएसी किसी प्रोजेक्ट को हरी झंडी दे देती है, तभी आगे कॉन्ट्रैक्ट नेगोशिएशन शुरू होते हैं। इसलिए डीएसी की मंजूरी को किसी भी रक्षा सौदे का पहला और सबसे अहम कदम माना जाता है। (DAC meeting)

DAC meeting: 29 दिसंबर की बैठक से क्या उम्मीदें

अब सभी की नजर 29 दिसंबर को होने वाली डीएसी बैठक पर टिकी है। माना जा रहा है कि यह साल 2025 की आखिरी डीएसी बैठक होगी और इसमें कई बड़े प्रस्तावों पर चर्चा हो सकती है। रक्षा मंत्रालय से जुड़े सूत्रों के अनुसार, इस बैठक में स्वदेशी रक्षा परियोजनाओं को प्राथमिकता दी जाएगी, ताकि सरकार की आत्मनिर्भर भारत नीति को आगे बढ़ाया जा सके। (DAC meeting)

संभावना है कि बैठक में भारतीय सेना के लिए बड़ी संख्या में लॉइटरिंग म्यूनिशन, ड्रोन और काउंटर-ड्रोन सिस्टम पर फैसला लिया जा सकता है। इसके अलावा वायुसेना के लिए लंबी दूरी की एयर-टू-एयर मिसाइल, जैसे एस्ट्रा मार्क-2, और कुछ विदेशी सिस्टम पर भी चर्चा होने की उम्मीद है।

MRSAM और टैंक प्रोजेक्ट भी एजेंडे में

डीएसी बैठक में भारतीय नौसेना के लिए मीडियम रेंज सरफेस-टू-एयर मिसाइल सिस्टम (MRSAM) की खरीद का प्रस्ताव भी आ सकता है। इसका मकसद नौसेना के युद्धपोतों को हवाई खतरों से सुरक्षा देना है।

वहीं, भारतीय सेना अपने टी-90 टैंकों के स्वदेशी ओवरहॉल का प्रस्ताव भी रख सकती है। इसके तहत करीब 200 टैंकों को देश में ही आधुनिक बनाया जाएगा। इससे न सिर्फ विदेशी निर्भरता कम होगी, बल्कि घरेलू रक्षा उद्योग को भी बढ़ावा मिलेगा। (DAC meeting)

इस विदेशी सौदों पर भी हो सकती है चर्चा 

हालांकि सरकार का जोर स्वदेशी प्रणालियों पर है, लेकिन कुछ विदेशी सौदों पर भी चर्चा हो सकती है। इनमें अमेरिका से एमक्यू-9बी सी गार्जियन ड्रोन को लीज पर लेने का प्रस्ताव शामिल है। भारत पहले ही 31 ऐसे ड्रोन खरीदने का करार कर चुका है, जो 2028 से भारत में आने शुरू होंगे।

इसके अलावा वायुसेना के लिए मिड-एयर रिफ्यूलर एयरक्राफ्ट और कुछ विशेष हथियार प्रणालियों पर भी फैसला लिया जा सकता है।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा वैश्विक हालात को देखते हुए रक्षा खरीद में देरी भारत के लिए ठीक नहीं है। सीमाओं पर चुनौतियां बनी हुई हैं और तकनीक तेजी से बदल रही है। ऐसे में जरूरी है कि लंबित सौदों को जल्द से जल्द अंतिम रूप दिया जाए। (DAC meeting)

Indian Defence Stocks Rise: डिफेंस शेयरों में लगातार 5वें दिन भी उछाल, बीईएल से मझगांव डॉक तक तेजी

Indian Defence Stocks Rise for Fifth Straight Day Ahead of Key DAC Meeting, BEL and Mazagon Dock Gain
Indian Defence Stocks Rise for Fifth Straight Day Ahead of Key DAC Meeting, BEL and Mazagon Dock Gain

Indian Defence Stocks Rise:  शेयर बाजार में डिफेंस सेक्टर से जुड़ी कंपनियों के शेयरों में शुक्रवार को लगातार पांचवें कारोबारी दिन तेजी देखने को मिली है। इस तेजी की सबसे बड़ी वजह आज होने वाली डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (डीएसी) की अहम बैठक मानी जा रही है। बाजार में यह उम्मीद है कि इस बैठक में बड़े रक्षा सौदों को मंजूरी मिल सकती है, जिसका सीधा फायदा देश की डिफेंस कंपनियों को मिलेगा।

सुबह के कारोबार में निफ्टी इंडिया डिफेंस इंडेक्स करीब 1 फीसदी की बढ़त के साथ ट्रेड करता नजर आया। यह बढ़त बाकी सभी सेक्टोरल इंडेक्स से ज्यादा रही। पिछले पांच कारोबारी सत्रों में डिफेंस इंडेक्स में कुल मिलाकर अच्छी मजबूती देखी गई है, जिससे निवेशकों का भरोसा इस सेक्टर पर और बढ़ा है।

डिफेंस से जुड़ी बड़ी कंपनियों के शेयरों में भी मजबूती देखने को मिली। भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बीईएल) का शेयर 1 प्रतिशत से ज्यादा चढ़कर निफ्टी-50 में सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाले शेयरों में शामिल रहा। कंपनी को एयर डिफेंस सिस्टम, रडार और कम्युनिकेशन इक्विपमेंट से जुड़े नए ऑर्डर मिलने की उम्मीद है, जिस वजह से निवेशकों ने इसमें खरीदारी की है।

निफ्टी-50 से बाहर की कंपनियों में पारस डिफेंस एंड स्पेस टेक्नोलॉजीज, एमटार टेक्नोलॉजीज और मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स के शेयरों में 2 से 3 प्रतिशत तक की तेजी दर्ज की गई। खास तौर पर मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स के शेयरों में मजबूत खरीदारी देखी गई, क्योंकि कंपनी को भारतीय नौसेना से जुड़े नए शिपबिल्डिंग और सबमरीन प्रोजेक्ट्स मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।

डिफेंस सेक्टर में इस तेजी का सबसे बड़ा कारण आज होने वाली डीएसी मीटिंग मानी जा रही है। इस बैठक की अध्यक्षता रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह करेंगे। यह साल 2025 की आखिरी डीएसी बैठक है, इसलिए इसे काफी अहम माना जा रहा है। बाजार से जुड़ी रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस बैठक में करीब 80 हजार करोड़ रुपये तक के डिफेंस सौदों को मंजूरी मिल सकती है।

सूत्रों के अनुसार, इन सौदों में खास फोकस एयर डिफेंस और आईएसआर (इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉनिसेंस) क्षमताओं को मजबूत करने पर रह सकता है। हाल के महीनों में बदले वैश्विक हालात और क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों को देखते हुए सरकार इन क्षेत्रों में तेजी से निवेश बढ़ा रही है।

संभावना जताई जा रही है कि बैठक में मिसाइल सिस्टम, रडार, ड्रोन, काउंटर-ड्रोन टेक्नोलॉजी और निगरानी से जुड़े कई प्रस्तावों को मंजूरी मिल सकती है। इन सभी सेक्टर्स में भारतीय डिफेंस कंपनियां पहले से ही सक्रिय हैं, जिसका असर उनके शेयरों पर साफ दिखाई दे रहा है।

डिफेंस शेयरों में तेजी के पीछे सिर्फ घरेलू कारण ही नहीं, बल्कि वैश्विक जियो-पॉलिटिकल टेंशन भी एक बड़ी वजह है। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बढ़ते सैन्य तनाव और संघर्ष की खबरों के बीच निवेशक डिफेंस सेक्टर को एक सुरक्षित और मजबूत विकल्प के तौर पर देख रहे हैं।

ऐसे माहौल में ज्यादातर देश अपने रक्षा बजट और सैन्य तैयारियों पर ज्यादा खर्च करते हैं। इसका सीधा फायदा हथियार, इलेक्ट्रॉनिक्स, शिपबिल्डिंग और डिफेंस टेक्नोलॉजी से जुड़ी कंपनियों को मिलता है। इसी वजह से भारतीय डिफेंस शेयरों में लगातार खरीदारी बनी हुई है।

बाजार के जानकारों का कहना है कि डिफेंस शेयरों की आगे की चाल काफी हद तक आज की डीएसी बैठक के फैसलों पर निर्भर करेगी। अगर उम्मीद के मुताबिक बड़े रक्षा सौदों को मंजूरी मिलती है, तो आने वाले दिनों में इस सेक्टर में और मजबूती देखने को मिल सकती है।

हालांकि, कुछ निवेशक साल के अंत को देखते हुए सतर्क भी हैं, क्योंकि इस दौरान मुनाफावसूली की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद डिफेंस सेक्टर को लेकर लंबी अवधि का नजरिया अब भी सकारात्मक बना हुआ है।

पिछले कुछ वर्षों में सरकार की आत्मनिर्भर भारत नीति और डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग पर जोर की वजह से भारतीय रक्षा कंपनियों की ऑर्डर बुक मजबूत हुई है। डिफेंस एक्सपोर्ट में बढ़ोतरी, नई तकनीकों का विकास और सरकारी समर्थन ने इस सेक्टर को नई पहचान दी है।

इसी भरोसे के चलते डीएसी बैठक से पहले भी निवेशक डिफेंस शेयरों में दिलचस्पी दिखा रहे हैं। लगातार पांच दिन की तेजी इस बात का संकेत मानी जा रही है कि बाजार को इस सेक्टर से आगे भी सकारात्मक खबरों की उम्मीद है।

K-4 Missile Test: पांच प्वाइंट्स में समझें भारत के लिए यह मिसाइल टेस्ट क्यों है खास, पढ़ें कैट-एंड-माउस गेम की पूरी कहानी

K-4 Missile Test Explained: Why India’s Submarine-Launched Nuclear Missile Is Crucial and How New Delhi Outsmarted Chinese Spy Ships
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K-4 Missile Test: भारत ने हाल ही में बंगाल की खाड़ी में स्वदेशी न्यूक्लियर सबमरीन आईएनएस अरिहंत से 3,500 किलोमीटर तक मार करने वाली के-4 सबमरीन-लॉन्च्ड बैलिस्टिक मिसाइल का परीक्षण किया। खास बात यह 3,500 किमी रेंज वाली मिसाइल परमाणु हथियार ले जा सकती है। हालांकि यह टेस्ट पहले 3 दिसंबर को होना था, लेकिन श्रीलंका में चक्रवात आने की वजह से इसे टालना पड़ा। लेकिन इस बार भारत ने बेहद गोपनीय तरीके से इस परीक्षण का अंजाम दिया। आइए पांच प्वाइंट्स में समझते हैं इस बार ये टेस्ट क्यों है खास।

K-4 Missile Test: अब पॉन्टून नहीं, असली पनडुब्बी से टेस्ट

यह के-4 मिसाइल का आईएनएस अरिघात से दूसरा सफल परीक्षण है। इससे पहले नवंबर 2024 में इसी पनडुब्बी से के-4 का पहला टेस्ट किया गया था। शुरुआत में के-4 मिसाइल के ज्यादातर टेस्ट समुद्र में बनाए गए अंडरवाटर प्लेटफॉर्म यानी सबमर्सिबल पॉन्टून से किए जाते थे। लेकिन अब ऑपरेशनल न्यूक्लियर सबमरीन आने के बाद से सभी टेस्ट इसी से हो रहे हैं। वहीं, सबमरीन से बार-बार सफल लॉन्च होना इस बात का संकेत है कि यह सिस्टम अब धीरे-धीरे पूरी तरह ऑपरेशनल हो रहा है। (K-4 Missile Test)

INS अरिघात को अगस्त 2024 में भारतीय नौसेना में शामिल किया गया था। यह भारत की दूसरी स्वदेशी न्यूक्लियर बैलिस्टिक मिसाइल सबमरीन है और इसे खास तौर पर लंबी दूरी की परमाणु मिसाइलों के लिए तैयार किया गया है।

K-4 Missile Test: के-15 से कहीं ज्यादा लंबी मारक क्षमता

आईएनएस अरिघात से पहले भारत की पहली परमाणु पनडुब्बी आईएनएस अरिहंत पर मुख्य तौर पर के-15 मिसाइलें तैनात थीं। के-15 मिसाइल की रेंज करीब 750 किलोमीटर थी। इसके मुकाबले के-4 मिसाइल की रेंज करीब 3,500 किलोमीटर है। लंबी रेंज का फायदा यह है कि पनडुब्बी को दुश्मन के तट के बहुत करीब जाने की जरूरत नहीं पड़ती। इससे पनडुब्बी की सुरक्षा बढ़ती है और उसकी पहचान होने की संभावना कम हो जाती है। यही वजह है कि के-4 को भारत की समुद्री परमाणु क्षमता के लिए बेहद अहम माना जाता है। (K-4 Missile Test)

K-4 Missile Test: भारत की स्ट्रैटेजिक फोर्सेस कमांड का अहम रोल

इस पूरे टेस्ट को पूरी तरह गोपनीय रखा गया है। दरअसल यह भारत की स्ट्रैटेजिक फोर्सेस कमांड के तहत आता है, जिसे स्ट्रैटेजिक न्यूक्लियर कमांड भी कहा जाता है। यह भारतीय सशस्त्र बलों की एक विशेष ट्राई-सर्विसेज कमांड है, जो न्यूक्लियर कमांड अथॉरिटी का हिस्सा है और देश के परमाणु हथियारों के प्रबंधन, प्रशासन और ऑपरेशनल कंट्रोल के लिए जिम्मेदार है। यह कमांड 4 जनवरी 2003 को अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने बनाई थी, ताकि भारत की न्यूक्लियर ट्रायड (जमीन, हवा और समुद्र आधारित परमाणु क्षमता) को प्रभावी ढंग से संभाला जा सके। (K-4 Missile Test)

K-4 Missile Test: सेकंड स्ट्राइक कैपेबिलिटी हुई मजबूत

सेकंड स्ट्राइक कैपेबिलिटी परमाणु युद्ध की सबसे महत्वपूर्ण अवधारणा है। इसका मतलब है कि अगर कोई दुश्मन देश भारत पर पहला परमाणु हमला करता है और भारत के जमीनी ठिकाने, एयर बेस या कमांड सेंटर को नष्ट करने की कोशिश करता है, तब भी भारत के पास जवाबी परमाणु हमला करने की गारंटीड क्षमता बची रहेगी। यह क्षमता इसलिए जरूरी है, क्योंकि यह दुश्मन को पहला हमला करने से रोकती है। उसे पता होता है कि हमला करने पर भी वह खुद पूरी तरह तबाह हो जाएगा। इसे म्यूचुअल एश्योर्ड डिस्ट्रक्शन या क्रेडिबल डिटरेंस कहा जाता है। भारत की आधिकारिक नीति “नो फर्स्ट यूज” है, इसलिए सेकंड स्ट्राइक कैपेबिलिटी उसके लिए बेहद अहम है। (K-4 Missile Test)

K-4 Missile Test: चीनी वैसल्स को दिया गच्चा: कैट-एंड-माउस गेम की पूरी कहानी

रिपोर्ट्स के मुताबिक यह ट्रायल विशाखापट्टनम के तट से दूर समुद्री क्षेत्र में किया गया, जहां दिसंबर के मध्य में जारी नोटैम यानी नोटिस टू एयरमेन के जरिए बड़े इलाके को ट्रायल के लिए सुरक्षित घोषित किया गया था। दरअसल जब भी भारत कोई मिसाइल टेस्ट करने की योजना बनाता है, तो चीनी वैसल्स उस इलाके के इर्द-गिर्द एकत्रित हो जाते हैं, ताकि मिसाइल टेस्ट का डेटा जुटाया जा सके और चीन उन्हें अपनी मिसाइलों को अपग्रेड करने के लिए इस्तेमाल कर सके। कुछ दिनों पहले भी इस क्षेत्र में एक नहीं बल्कि चीन चीनी रिसर्च जहाज मौजूद थे।

सूत्रों का कहना है कि यह परीक्षण पहले 1 से 3 दिसंबर के बीच होना था, लेकिन 3 दिसंबर को टेस्ट रेंज के पास एक चीनी जहाज देखे जाने के बाद इसे टाल दिया गया। यह चाइनीज ओशन मिनरल रिसोर्सेज वेसल था, जिसे टेस्ट रेंज की दक्षिणी सीमा से करीब 115 नॉटिकल मील दूर देखा गया। हालांकि उस दौरान श्रीलंका में चक्रवात भी आ गया था, जो मिसाइल टेस्ट टालने की बड़ी वजह भी बना। (K-4 Missile Test)

भारत ने कई बार 1-4 दिसंबर, 17-20 दिसंबर, 22-24 दिसंबर में नोटैम जारी किए। जिनकी रेंज लगभग 3,000-3,500 किमी थी। हर बार नोटैम जारी होते ही चीन के 4-5 रिसर्च वैसल्स शी यान 6, शेन हाय यी हाओ, लान हाई 101, द यांग यी हाओ उस इलाके में पहुंच जाते थे। वहीं, चीन का एक लुयांग–III श्रेणी का डेस्ट्रॉयर, एक जियांगकाई–II फ्रिगेट और एक फुची क्लास टैंकर भी इस इलाके में थे। ये सभी जहाज चीन के 48वें एंटी-पायरेसी एस्कॉर्ट फोर्स का हिस्सा थे और उस समय गल्फ ऑफ एडन के पास तैनात थे। ये जहाज मिसाइल की ट्रैजेक्टरी, टेलीमेट्री डेटा, अकॉस्टिक सिग्नेचर और डेब्रिस कलेक्ट करने में सक्षम हैं। जिससे चीन भारत की मिसाइल टेक्नोलॉजी की जासूसी कर सकता है। (K-4 Missile Test)

भारत भी चीन की रणनीति को लगातार समझता रहा और जानबूझकर नोटैम जारी करता था, जैसे ही चीन के जहाज आते थे, फिर भारत नोटैम कैंसल कर देता था। इससे चीन के जहाज बेकार घूमते रहते, ईंधन बर्बाद होता और उनकी लोकेशन पता चल जाती। भारतीय नौसेना चीफ एडमिरल दिनेश त्रिपाठी ने भी कहा कि चीनी जहाजों की मौजूदगी में टेस्ट को “रीकैलिब्रेट” (समायोजित) करना अब सामान्य प्रक्रिया है।

जिसके बाद सभी फेक/डिकॉय नोटैम जारी के बाद, भारत ने बिना कोई नया नोटैम जारी किए 23 दिसंबर को टेस्ट कर दिया। हालांकि चीनी जहाज उस इलाके में जरूर थे, लेकिन उन्हें पता ही नहीं चला कि टेस्ट हो रहा है, क्योंकि कोई पूर्व चेतावनी नहीं थी। के-4 मिसाइल सफलतापूर्वक लॉन्च हुई, सभी पैरामीटर पूरे हुए, लेकिन कोई जासूसी डेटा चीन को नहीं मिल पाया। (K-4 Missile Test)

के-4 के बाद के-5 और के-6 की तैयारी

भारत की न्यूक्लियर ट्रायड में जमीन से मार करने वाली मिसाइलें, हवा से हमला करने वाले विमान और समुद्र से हमला करने वाली पनडुब्बियां शामिल हैं। समुद्र से दागी जाने वाली मिसाइलें इस ट्रायड का सबसे सुरक्षित हिस्सा मानी जाती हैं, क्योंकि पनडुब्बियां लंबे समय तक समुद्र के भीतर छिपी रह सकती हैं। (K-4 Missile Test)

के-4 मिसाइल का डेवलपमेंट भारत के डिफेंस रिसर्च फ्रेमवर्क के तहत किया गया है। इसे डीआरडीओ ने तैयार किया है। इसके कई अहम हिस्सों का निर्माण पुणे और नासिक स्थित डीआरडीओ की प्रयोगशालाओं में किया गया है।

मिसाइल का रॉकेट मोटर, प्रोपेलेंट और लॉन्च सिस्टम पूरी तरह स्वदेशी तकनीक पर आधारित है। के-4 एक सॉलिड फ्यूल मिसाइल है, जो पानी के भीतर से कोल्ड लॉन्च तकनीक के जरिए बाहर निकलती है और फिर हवा में अपने इंजन को एक्टिव करती है। (K-4 Missile Test)

के-4 मिसाइल की लंबाई करीब 10 से 12 मीटर है और इसका वजन 17 से 20 टन के बीच है। यह लगभग 2 टन तक का वारहेड ले जाने में सक्षम है। मिसाइल को इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह दुश्मन की मिसाइल डिफेंस सिस्टम को चकमा दे सके। यह मिसाइल इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम पर आधारित है और जरूरत पड़ने पर टर्मिनल फेज में दिशा बदलने की क्षमता भी रखती है।

वहीं, के-4 के बाद भारत के-5 और के-6 जैसी लंबी दूरी की मिसाइलों पर भी काम कर रहा है। के-5 की रेंज 5,000 किलोमीटर से ज्यादा बताई जाती है, जबकि के-6 को और भी लंबी दूरी के लिए विकसित किया जा रहा है।

इसके अलावा आईएनएस अरिघात के बाद भारत की तीसरी परमाणु पनडुब्बी आईएनएस अरिधमान पर भी काम अंतिम चरण में बताया जा रहा है। इसके 2026 की शुरुआत में नौसेना में शामिल होने की संभावना जताई जा रही है। इसके अलावा अरिहंत श्रेणी की अगली पनडुब्बियां भी निर्माणाधीन हैं। भविष्य में आने वाली नई पनडुब्बियों में ज्यादा मिसाइल ट्यूब और अधिक एडवांस रिएक्टर लगाए जाने की योजना है। इससे भारत की समुद्री क्षमता और मजबूत होगी। (K-4 Missile Test)