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चीन सीमा से 300 किमी दूर भारत की नई एयरस्ट्रिप रणनीति, जानें डुअल फ्रंट वार को देखते हुए कितनी है जरूरी

Assam Emergency Landing Facility

Assam Emergency Landing Facility: जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने असम के डिब्रूगढ़ जिले के मोरान इलाके में बने नए इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी पर भारतीय वायुसेना के सी-130जे सुपर हरक्यूलिस विमान से उतरकर इसे एक्टिव कर दिया। यह भारत की रक्षा तैयारी और बुनियादी ढांचे की सोच में आए बड़े बदलाव का संकेत था। अब देश के कुछ चुनिंदा नेशनल हाईवे सिर्फ गाड़ियों के लिए नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर लड़ाकू और ट्रांसपोर्ट विमानों के लिए भी रनवे का काम कर सकते हैं। (Assam Emergency Landing Facility)

मोरान में बना यह इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी यानी ईएलएफ पूर्वोत्तर भारत का पहला ऐसा हाईवे एयरस्ट्रिप है। यह नेशनल हाईवे-37 पर लगभग 4.2 किलोमीटर लंबा सीधा और मजबूत बनाया गया हिस्सा है। यह इलाका चीन सीमा से करीब 300 किलोमीटर की दूरी पर है, इसलिए रणनीतिक रूप से भी काफी अहम माना जा रहा है। (Assam Emergency Landing Facility)

Assam Emergency Landing Facility: आखिर हाईवे पर एयरस्ट्रिप की जरूरत क्यों?

युद्ध की स्थिति में दुश्मन की पहली नजर अक्सर एयरबेस पर होती है। अगर किसी कारण से स्थायी एयरबेस को नुकसान पहुंचता है या वे अस्थायी रूप से इस्तेमाल के लायक नहीं रहते, तो वायुसेना को वैकल्पिक रनवे की जरूरत पड़ती है। ऐसे में हाईवे पर बने ये इमरजेंसी लैंडिंग स्ट्रिप बहुत काम आते हैं।

इसके अलावा, अगर किसी विमान में उड़ान के दौरान तकनीकी खराबी आ जाए या ईंधन कम हो जाए और वह अपने बेस तक न पहुंच सके, तो वह इन हाईवे रनवे पर सुरक्षित उतर सकता है। प्राकृतिक आपदाओं जैसे बाढ़, भूकंप या चक्रवात के समय भी इनका इस्तेमाल राहत और बचाव कार्यों के लिए किया जा सकता है। (Assam Emergency Landing Facility)

मोरान एयरस्ट्रिप की क्या हैं खूबियां

प्रधानमंत्री के पहुंचने से पहले राफेल और सुखोई-30 जैसे फाइटर जेट्स ने यहां लैंडिंग कर अपनी क्षमता दिखाई। बाद में सी-130जे सुपर हरक्यूलिस जैसे भारी ट्रांसपोर्ट विमान ने भी सुरक्षित लैंडिंग की। इसके बाद एएन-32 ट्रांसपोर्ट विमान और एडवांस लाइट हेलीकॉप्टर ‘ध्रुव’ ने कैजुअल्टी इवैक्यूएशन ड्रिल का प्रदर्शन किया।

सी-130जे एक चार इंजन वाला टर्बोप्रॉप विमान है, जिसका अधिकतम वजन लगभग 74,000 किलोग्राम तक हो सकता है। इतने भारी विमान का हाईवे पर उतरना यह दिखाता है कि इस स्ट्रिप को खास इंजीनियरिंग मानकों के अनुसार तैयार किया गया है। (Assam Emergency Landing Facility)

कैसे बनाए जाते हैं ये इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी?

इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी कोई साधारण सड़क का हिस्सा नहीं होता। इसके लिए हाईवे का एक सीधा और लंबा हिस्सा चुना जाता है, जो आमतौर पर चार किलोमीटर से ज्यादा लंबा होता है।

इस हिस्से को खास तरीके से मजबूत किया जाता है ताकि वह तेज रफ्तार और भारी विमानों का भार सह सके। सड़क की सतह को हाई स्ट्रेंथ पेवमेंट से तैयार किया जाता है। दोनों ओर फेंसिंग और बैरियर लगाए जाते हैं ताकि ऑपरेशन के दौरान कोई वाहन, जानवर या आम लोग रनवे पर न आ सकें।

सड़क के बीच में सामान्य हाईवे की तरह डिवाइडर नहीं होता, क्योंकि विमान को एक सीधा और खुला रनवे चाहिए। इसके अलावा रनवे की तरह मार्किंग भी की जाती है, जिससे पायलट को लैंडिंग और टेकऑफ में आसानी हो। (Assam Emergency Landing Facility)

देशभर में कितनी ऐसी स्ट्रिप्स हैं?

रक्षा मंत्रालय की ओर से संसद में दी गई जानकारी के अनुसार, भारतीय वायुसेना ने देशभर में 28 स्थानों की पहचान की है, जहां इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी बनाई जानी है या बनाई जा चुकी है।

इनमें असम में 5, पश्चिम बंगाल में 4, राजस्थान, आंध्र प्रदेश और गुजरात में 3-3, तमिलनाडु, बिहार, जम्मू-कश्मीर और हरियाणा में 2-2, जबकि पंजाब और उत्तर प्रदेश में 1-1 स्थान शामिल हैं। (Assam Emergency Landing Facility)

राजस्थान के बाड़मेर क्षेत्र में 2021 में देश की पहली ऐसी हाईवे एयरस्ट्रिप का उद्घाटन किया गया था। उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल एक्सप्रेसवे और अन्य एक्सप्रेसवे पर भी फाइटर जेट्स की लैंडिंग का अभ्यास हो चुका है। आंध्र प्रदेश के अड्डंकी में भी हाल ही में ऐसी सुविधा सक्रिय की गई थी। (Assam Emergency Landing Facility)

सिर्फ सेना के लिए नहीं हैं ये एयरस्ट्रिप्स

हालांकि इनका मुख्य उद्देश्य सैन्य जरूरतों को पूरा करना है, लेकिन जरूरत पड़ने पर इनका इस्तेमाल नागरिक विमानों के लिए भी किया जा सकता है। अगर किसी पैसेंजर विमान में आपात स्थिति बन जाए, तो वह भी यहां उतर सकता है। मेडिकल इवैक्यूएशन या किसी विशेष टीम और उपकरण को तुरंत पहुंचाने के लिए भी इनका उपयोग किया जा सकता है। (Assam Emergency Landing Facility)

दुनिया में भी है यह व्यवस्था

हाईवे को एयरस्ट्रिप के रूप में इस्तेमाल करने का विचार नया नहीं है। शीत युद्ध के दौर में यूरोप के कई देशों ने इस मॉडल को अपनाया था। फिनलैंड, स्वीडन, स्विट्जरलैंड, जर्मनी और पोलैंड जैसे देशों में डुअल यूज हाईवे आम बात है। एशिया में भी कई देश इस प्रयोग को अपना चुके हैं। (Assam Emergency Landing Facility)

रणनीतिक सोच में बदलाव

मोरान में बना यह नया इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी सिर्फ एक सड़क परियोजना नहीं है। यह भारत की रक्षा नीति में उस सोच को दिखाता है, जिसमें नागरिक बुनियादी ढांचे को सैन्य जरूरतों के साथ जोड़ा जा रहा है।

इसे डुअल यूज इंफ्रास्ट्रक्चर कहा जाता है, यानी एक ही ढांचा सामान्य समय में आम लोगों के लिए और संकट के समय में सेना के लिए काम आता है। इससे अलग से बड़े खर्च की जरूरत भी कम पड़ती है और तैयारियां भी मजबूत रहती हैं। (Assam Emergency Landing Facility)

असम में बने इस नए एयरस्ट्रिप से खास तौर पर पूर्वोत्तर क्षेत्र में तेजी से प्रतिक्रिया देने की क्षमता बढ़ेगी। सीमा के पास स्थित इलाकों में मिलिटरी इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ाना आज की जरूरत है। स्पष्ट है कि आने वाले समय में देश के अलग-अलग हिस्सों में ऐसे और इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी देखने को मिल सकते हैं। (Assam Emergency Landing Facility)

असम में हाईवे पर उतरा सुपर हरक्यूलिस सी-130जे, पीएम ने क्यों चुना यही विमान? जानिए पूरी रणनीति

C-130J Super Hercules India

C-130J Super Hercules India: चीन से सटी वास्तविक नियंत्रण रेखा से तकरीबन 300 किमी दूर असम के डिब्रूगढ़ जिले के मोरान इलाके में नेशनल हाईवे-37 पर बनी 4.2 किलोमीटर लंबी इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी अब आधिकारिक रूप से सक्रिय हो गई है। यह पूर्वोत्तर क्षेत्र की पहली ऐसी इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी है, जो सीधे हाईवे पर तैयार की गई है। इसे नेशनल हाईवे-2 पर मोरान बाईपास के पास बनाया गया है। जरूरत पड़ने पर यहां फाइटर जेट और ट्रांसपोर्ट विमान सुरक्षित रूप से उतर और उड़ान भर सकते हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय वायुसेना के सी-130जे सुपर हरक्यूलिस विमान से यहां उतरकर इस एयर स्ट्रिप का उद्घाटन किया। सवाल उठता है कि इतने बड़े और अहम कार्यक्रम के लिए यही विमान क्यों चुना गया? (C-130J Super Hercules India)

C-130J Super Hercules India: क्या है सी-130जे सुपर हरक्यूलिस?

शनिवार को प्रधानमंत्री विशेष विमान से चाबुआ एयरफील्ड से उड़ान भरकर सीधे इस नई एयर स्ट्रिप पर उतरे। उनके विमान की लैंडिंग के साथ ही यह सुविधा आधिकारिक रूप से शुरू हो गई। प्रधानमंत्री के पहुंचने से पहले भारतीय वायुसेना के लड़ाकू विमानों ने यहां अभ्यास किया। पहले राफेल और सुखोई-30 ने लैंडिंग कर अपनी क्षमता दिखाई। इसके बाद सी-130जे ने रनवे को छुआ। प्रधानमंत्री के कार्यक्रम के दौरान फाइटर और ट्रांसपोर्ट विमानों ने टेकऑफ और लैंडिंग ड्रिल का प्रदर्शन किया।

सुखोई विमानों ने फ्लाई-पास्ट किया, फिर ओवरशूट करते हुए रनवे के ऊपर से दोबारा गुजरे और तीसरे विमान ने लैंडिंग की। राफेल ने भी इसी तरह अपनी ऑपरेशनल कैपेबिलिटी दिखाई। बाद में एएन-32 ट्रांसपोर्ट विमान भी यहां रनवे पर उतरा। लेकिन सबसे खास सी-130जे की लैंडिंग रही। (C-130J Super Hercules India)

सी-130जे एक आधुनिक टैक्टिकल एयरलिफ्टर है। इसे अमेरिका की कंपनी लॉकहीड मार्टिन बनाती है। भारत ने इसके कुल 12 विमान खरीदे हैं। यह विमान सैनिकों, हथियारों, राहत सामग्री और विशेष बलों को तेजी से एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने में सक्षम है। पहले छह विमान वर्ष 2008 में लिए गए थे और उसके बाद 2011 से 2019 के बीच छह और शामिल किए गए। आज ये सभी विमान उत्तर प्रदेश के हिंडन एयरबेस से ऑपरेट होते हैं और कई अहम अभियानों का हिस्सा रह चुके हैं। लेकिन इसे सिर्फ माल ढोने वाला विमान समझना भूल होगी। यह एक बहुउद्देश्यीय यानी मल्टी-रोल विमान है। (C-130J Super Hercules India)

कठिन इलाकों में काम करने की क्षमता

इसकी सबसे बड़ी है इसका कठिन इलाकों में काम करने की क्षमता। भारत का भूगोल बहुत विविध है। एक तरफ ऊंचे हिमालयी क्षेत्र हैं, दूसरी तरफ रेगिस्तान और समुद्री द्वीप। लद्दाख और अरुणाचल जैसे इलाकों में छोटे और ऊंचाई पर बने रनवे हैं। ऐसे स्थानों पर सामान्य विमान पूरी क्षमता से काम नहीं कर पाते। लेकिन सी-130जे कम लंबाई वाले और कच्चे रनवे पर भी उतर सकता है। दौलत बेग ओल्डी जैसे दुनिया के सबसे ऊंचे एयरस्ट्रिप पर भी इस विमान ने सफल लैंडिंग की है। गर्म और ऊंचाई वाले इलाकों में भी इसका प्रदर्शन बेहतर रहता है, जहां दूसरे विमानों की क्षमता आधी रह जाती है। (C-130J Super Hercules India)

C-130J Super Hercules India

स्पेशल ऑपरेशन के लिए है बेहद काम का

सी-130जे को भारतीय स्पेशल फोर्सेस की जरूरतों को ध्यान में रखकर खरीदा गया था। भारतीय विशेष बलों को ऐसे विमान की जरूरत थी जो चुपचाप, कम ऊंचाई पर और रात में भी सटीक उड़ान भर सके। इसमें इंफ्रारेड डिटेक्शन सिस्टम, नाइट विजन गॉगल्स के साथ काम करने की क्षमता, कम रोशनी में उतरने की सुविधा और इलेक्ट्रॉनिक सुरक्षा प्रणाली जैसी आधुनिक तकनीकें हैं।

यह दुश्मन की नजर से बचकर सैनिकों को किसी भी इलाके में उतार सकता है और जरूरत पड़ने पर तेजी से निकाल भी सकता है। इसलिए यह स्पेशल ऑपरेशन के लिए बेहद उपयोगी माना जाता है। (C-130J Super Hercules India)

C-130J Super Hercules India

आपदा के समय है सबसे भरोसेमंद

सी-130जे केवल ट्रांसपोर्ट विमान नहीं है। यह पैराड्रॉप कर सकता है, राहत सामग्री गिरा सकता है, सर्च एंड रेस्क्यू मिशन कर सकता है, और जरूरत पड़ने पर निगरानी मिशन भी पूरा कर सकता है। जरूरत पड़ने पर हवाई ईंधन भरने की सुविधा के साथ लंबी दूरी तक उड़ सकता है। खोज और बचाव अभियान, प्राकृतिक आपदाओं के समय राहत सामग्री पहुंचाना, घायलों को निकालना और निगरानी जैसे कई काम यह एक ही प्लेटफॉर्म से कर सकता है। 2011 में सिक्किम में आए भूकंप और बाद में उत्तराखंड की बाढ़ जैसी आपदाओं के दौरान इस विमान ने राहत कार्यों में अहम भूमिका निभाई थी।

यह मेडिकल इवैक्यूएशन यानी घायल लोगों को सुरक्षित स्थान पर ले जाने में भी सक्षम है। बड़े केबिन और मजबूत इंजन के कारण यह भारी उपकरण भी ले जा सकता है। (C-130J Super Hercules India)

कई देशों की वायुसेनाएं करती हैं इसका इस्तेमाल

भारतीय वायुसेना ने इसे अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियों में परखा है। हिमालय, रेगिस्तान और समुद्री क्षेत्रों में इसकी उड़ान और लैंडिंग का परीक्षण किया गया। इन सभी जगहों पर यह भरोसेमंद साबित हुआ। इसके अलावा अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान जैसे देशों की वायुसेनाएं भी इसी विमान का इस्तेमाल करती हैं। इससे संयुक्त अभ्यास के दौरान तालमेल बेहतर होता है।

सी-130जे की विश्वसनीयता भी इसकी बड़ी ताकत है। अमेरिका के फॉरेन मिलिट्री सेल्स कार्यक्रम के तहत इसकी खरीद समय पर और तय लागत में पूरी हुई। शुरुआती छह विमानों के अच्छे प्रदर्शन के बाद भारत ने छह और खरीदने का फैसला किया। (C-130J Super Hercules India)

रणनीतिक और कूटनीतिक कारण भी कम महत्वपूर्ण नहीं थे। यह भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग का एक बड़ा कदम था। कई दशकों बाद दोनों देशों के बीच इतना बड़ा रक्षा सौदा हुआ। भारत ने अपने सुरक्षा हितों को ध्यान में रखते हुए इसमें स्वदेशी तकनीकों को भी जोड़ा और जरूरत के अनुसार बदलाव किए। भविष्य में ‘मेक इन इंडिया’ के तहत इसके कुछ हिस्सों के निर्माण की संभावना भी जताई गई है।

सी-130जे की खासियत यह है कि यह रणनीतिक और सामरिक दोनों स्तर पर उपयोगी है। चीन सीमा के पास ऊंचाई वाले इलाकों में सैनिक और उपकरण पहुंचाने हों या किसी आपदा में तुरंत राहत पहुंचानी हो, यह विमान हर परिस्थिति में काम आता है। इसकी गति, विश्वसनीयता और बहुउपयोगिता इसे भारतीय वायुसेना के सबसे अहम विमानों में से एक बनाती है। (C-130J Super Hercules India)

पूर्वोत्तर में इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी क्यों जरूरी?

युद्ध की स्थिति में दुश्मन सबसे पहले एयरबेस को निशाना बनाता है। अगर मुख्य रनवे क्षतिग्रस्त हो जाएं, तो वैकल्पिक रनवे जरूरी होते हैं। देश में कई जगहों पर ऐसी सुविधाएं बनाने की योजना है। असम में बनी यह पहली इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी है।

असम की यह एयर स्ट्रिप रणनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। पूर्वोत्तर क्षेत्र संवेदनशील इलाका है और यहां तेज सैन्य तैनाती की जरूरत पड़ सकती है। ऐसी सुविधाएं सेना को तेजी से प्रतिक्रिया देने में मदद करती हैं। आपात स्थिति में विमान सीधे हाईवे पर उतरकर सैनिकों, राहत सामग्री या उपकरणों की आपूर्ति कर सकते हैं। इसके अलावा पूर्वोत्तर क्षेत्र बाढ़ और भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं से भी प्रभावित रहता है। ऐसे में यदि सामान्य एयरपोर्ट तक पहुंच संभव न हो, तो यह एयर स्ट्रिप राहत अभियान के लिए उपयोगी साबित हो सकती है। (C-130J Super Hercules India)

और कहां इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी बनाने की है तैयारी

संसद में दी गई जानकारी के अनुसार भारतीय वायुसेना ने देश के अलग-अलग राज्यों में कुल 28 स्थानों की पहचान की है, जहां ऐसी सुविधा बनाई जानी है। इनमें असम में 5, पश्चिम बंगाल में 4, राजस्थान, आंध्र प्रदेश और गुजरात में 3-3, तमिलनाडु, बिहार, जम्मू-कश्मीर और हरियाणा में 2-2, जबकि पंजाब और उत्तर प्रदेश में 1-1 स्थान शामिल हैं।

इनमें से कई स्थानों पर काम पूरा हो चुका है और कुछ जगहों पर अभ्यास भी किए जा चुके हैं। इससे पहले राजस्थान के बाड़मेर में 2021 में पहली इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी सक्रिय की गई थी।

दिल्ली-आगरा एक्सप्रेसवे और लखनऊ-आगरा एक्सप्रेसवे पर भी पहले वायुसेना अभ्यास कर चुकी है। आंध्र प्रदेश के अड्डंकी में भी ऐसी सुविधा हाल ही में शुरू की गई थी। (C-130J Super Hercules India)

 

IFR 2026 में पहली बार पूरे ‘लाव-लश्कर’ के साथ दिखेगा INS विक्रांत, जानें कैरियर बैटल ग्रुप में कौन-कौन से जंगी जहाज होते हैं शामिल

IFR 2026 INS Vikrant CBG

IFR 2026 INS Vikrant CBG: विशाखापत्तनम में 15 फरवरी से 25 फरवरी के बीच होने जा रहे इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू और एक्सरसाइज मिलन को लेकर तैयारियां अंतिम चरण में हैं। भारतीय नौसेना के इन दो बड़े मेगा इवेंट्स में भारतीय नौसेना का स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत पूरे लावलश्कर के साथ दिखाई देगा। इस दौरान वे शिप भी शोकेस होंगे जो आईएनएस विक्रांत के साथ कैरियर बैटल ग्रुप (सीबीजी) के साथ प्रमुख भूमिका में नजर आते हैं। यह पहली बार होगा जब इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू में स्वदेशी एयरक्राप्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत हिस्सा लेगा।

18 फरवरी को होने वाले इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू के मुख्य कार्यक्रम में भारतीय सेनाओं की सुप्रीम कमांडर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू समुद्र में तैनात युद्धपोतों की समीक्षा करेंगी। इस अवसर पर आईएनएस विक्रांत भारतीय नौसेना के “सेंटर ऑफ अट्रैक्शन” के रूप में रहेगा। यह भारत का पहला स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर है, जिसे देश में ही तैयार किया गया है। हालांकि इस दौरान विक्रांत सीबीजी की फॉर्मेशन में नहीं होगा, लेकिन सीबीजी में शामिल शिप जरूर दिखेंगे। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

IFR 2026 INS Vikrant CBG

IFR 2026 INS Vikrant CBG: क्या होता है कैरियर बैटल ग्रुप?

कैरियर बैटल ग्रुप का मतलब है एयरक्राफ्ट कैरियर के चारों तरफ तैनात ऐसे युद्धपोत, जो उसे हर दिशा से सुरक्षा देते हैं और जरूरत पड़ने पर हमला भी कर सकते हैं। यह एक मल्टी-लेयर्ड सिक्युरिटी घेरा होता है, जिसमें उसके साथ डेस्ट्रॉयर, फ्रिगेट, सपोर्ट शिप और कई बार पनडुब्बियां भी शामिल रहती हैं। सीबीजी केवल भारत में ही नहीं बल्कि दुनियाभर की नौसेनाएं जिनके पास एयरक्राफ्ट कैरियर हैं, वे इस ग्रुपिंग को ऑपरेट करती हैं।

भारतीय नौसेना का सीबीजी स्थायी रूप से तय नहीं होता। यह ऑपरेशन, खतरे के स्तर और अभ्यास के अनुसार बदलता रहता है। आमतौर पर इसमें 8 से 12 सरफेस वॉरशिप शामिल होते हैं। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

IFR 2026 INS Vikrant CBG

केंद्र में रहेगा आईएनएस विक्रांत

मिलन के सी फेज में आईएनएस विक्रांत ऑपरेशनल ड्रिल में भाग ले रहा है। करीब 45 हजार टन वजनी यह विशाल युद्धपोत 262 मीटर लंबा है और लगभग 28 नॉट्स की अधिकतम गति हासिल कर सकता है। इसमें करीब 1600 नौसैनिक तैनात रह सकते हैं। यह एक साथ लगभग 30 एयरक्राफ्ट ऑपरेट किया जा सकते हैं, इसमें मिग-29के फाइटर जेट, एमएच-60आर मल्टी रोल हेलीकॉप्टर, कामोव-31 अर्ली वार्निंग हेलीकॉप्टर, चेतक, रोमियो हेलीकॉप्टर और एएलएच ध्रुव जैसे प्लेटफॉर्म शामिल हैं। यह एसटीओबार सिस्टम पर आधारित है, जिसमें शॉर्ट टेक ऑफ और अरेस्टेड रिकवरी की सुविधा होती है।

इस बार का फ्लीट रिव्यू इसलिए भी खास माना जा रहा है क्योंकि लगभग छह दशक बाद किसी स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर को इस स्तर पर प्रदर्शित किया जाएगा।

इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू के तुरंत बाद 19 फरवरी से एक्सरसाइज मिलन 2026 शुरू होगी, जो 25 फरवरी तक चलेगी। यह अभ्यास विशाखापत्तनम और बंगाल की खाड़ी में दो चरणों हार्बर फेज और सी फेज में आयोजित किया जाएगा। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

सीबीजी में डेस्ट्रॉयर्स की भूमिका अहम

मिलन के सी फेज में आईएनएस विक्रांत अपने कैरियर बैटल ग्रुप के साथ ऑपरेशनल ड्रिल में भाग ले रहा है। यह ग्रुप एंटी सबमरीन वॉरफेयर, एयर डिफेंस और सर्च एंड रेस्क्यू जैसे अभ्यास करेगा। कैरियर बैटल ग्रुप में आमतौर पर डेस्ट्रॉयर, फ्रिगेट और एंटी सबमरीन वॉरफेयर जहाज शामिल होते हैं, जो मिलकर एक सुरक्षा घेरा बनाते हैं।

इसमें सबसे अहम भूमिका डेस्ट्रॉयर्स और फ्रिगेट्स निभाते हैं। डेस्ट्रॉयर्स के तौर पर कोलकाता क्लास या विशाखापत्तनम क्लास जैसे गाइडेड मिसाइल डेस्ट्रॉयर शामिल किए जाते हैं। उदाहरण के लिए आईएनएस कोलकाता (D63), आईएनएस मोरमुगाओ (D67) और आईएनएस सूरत (D69) जैसे बड़े युद्धपोत शामिल होते हैं। ये जहाज लंबी दूरी की एयर डिफेंस, एंटी-सबमरीन वॉरफेयर और एंटी-शिप मिसाइल क्षमता के लिए जाने जाते हैं और कैरियर को हवाई तथा समुद्री खतरों से बचाते हैं। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

एयरक्राफ्ट कैरियर को एस्कॉर्ट देते हैं फ्रिगेट्स

डेस्ट्रॉयर्स के बाद फ्रिगेट्स भी इस ग्रुप का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। तलवार क्लास के तहत आईएनएस ताबर, (F44) और आईएनएस तेग (F45) जैसे जहाज शामिल हो सकते हैं। इसके अलावा नीलगिरी क्लास (प्रोजेक्ट 17ए, शिवालिक क्लास (प्रोजेक्ट 17) और ब्रह्मपुत्र क्लास (प्रोजेक्ट 16ए) के 2 से 3 फ्रिगेट भी तैनात किए जाते हैं।

इमें शिवालिक क्लास स्टेल्थ मल्टी-रोल फ्रिगेट्स हैं, जो एयर डिफेंस, एंटी-शिप (ब्रह्मोस), एंटी-सबमरीन वारफेयर और लैंड अटैक में अहम भूमिका निभाते हैं। कैरियर बैटल ग्रुप में आमतौर पर दो नीलगिरी या शिवालिक क्लास फ्रिगेट्स शामिल किए जाते हैं। इनमें से आईएनएस शिवालिक (F47), आईएनएस सतपुड़ा (F48) और आईएनएस सहयाद्री (F49) प्रमुख हैं। वहीं, नीलगिरी क्लास में इन तीनों में से किसी भी दो जहाजों को अक्सर आईएनएस विक्रांत के साथ तैनात देखा जाता है। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

शिवालिक क्लास को भारतीय नौसेना की पहली स्टेल्थ फ्रिगेट श्रेणी माना जाता है। इन जहाजों का मुख्य काम एयरक्राफ्ट कैरियर को एस्कॉर्ट देना और बहुस्तरीय सुरक्षा प्रदान करना होता है। इनमें श्टिल-1 और बराक-1 जैसी एयर डिफेंस मिसाइल प्रणालियां लगी होती हैं, जो हवाई खतरों से सुरक्षा देती हैं।

शिवालिक क्लास के अलावा विक्रांत के साथ ब्रह्मपुत्र क्लास फ्रिगेट्स भी देखे जाते हैं। ब्रह्मपुत्र क्लास फ्रिगेट्स सीबीजी की उस सुरक्षा परत का हिस्सा होते हैं, जो समुद्र के नीचे से आने वाले खतरों पर लगातार नजर रखती है और पूरे समूह को सुरक्षित बनाए रखने में अहम योगदान देती है। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

नीलगिरी क्लास फ्रिगेट्स की बात करें, तो ये भारतीय नौसेना के सबसे आधुनिक स्टेल्थ गाइडेड मिसाइल युद्धपोत हैं। जो शिवालिक क्लास फ्रिगेट्स का अपग्रेडेड वर्जन हैं। इनमें बेहतर स्टेल्थ फीचर्स, कम रडार क्रॉस सेक्शन, आधुनिक सेंसर और अत्याधुनिक हथियार प्रणाली लगाई गई है। इसका मतलब है कि ये दुश्मन के रडार पर आसानी से पकड़ में नहीं आते और लंबी दूरी से सटीक वार करने में सक्षम हैं।

इस क्लास में कुल सात फ्रिगेट्स शामिल हैं। इनमें से तीन आईएनएस नीलगिरी (एफ33), आईएनएस हिमगिरी (एफ34) और आईएनएस उदयगिरी (एफ35) नेवी में कमीशन हो चुकी हैं। बाकी जल्द ही सेवा में शामिल हो जाएंगी। ये फ्रिगेट्स मल्टी रोल क्षमता वाली हैं। यानी ये हवा से आने वाले खतरे, समुद्र की सतह पर मौजूद दुश्मन जहाज और पानी के नीचे छिपी पनडुब्बियों – तीनों से मुकाबला कर सकती हैं। इनमें ब्रह्मोस एंटी शिप मिसाइल, बराक-8 सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल, 76 मिमी मुख्य तोप, टॉरपीडो और एंटी सबमरीन रॉकेट सिस्टम लगाए गए हैं। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

ब्रह्मपुत्र क्लास भारतीय नौसेना के ऐसे युद्धपोत हैं, जिनका मुख्य फोकस एंटी-सबमरीन वारफेयर यानी पनडुब्बी रोधी अभियान पर होता है। करीब 3,850 टन वजनी ये फ्रिगेट पुराने गोदावरी क्लास के अपग्रेडेड संस्करण माने जाते हैं और समुद्र के नीचे छिपे खतरों से निपटने में खास भूमिका निभाते हैं।

कैरियर बैटल ग्रुप में आमतौर पर दो ब्रह्मपुत्र क्लास फ्रिगेट्स शामिल किए जाते हैं। उदाहरण के तौर पर आईएनएस ब्रह्मपुत्र (F31), आईएनएस बेतवा (F39) और आईएनएस ब्यास (F37) जैसे जहाज इस श्रेणी में आते हैं। इन तीनों में से किसी भी दो को अक्सर आईएनएस विक्रांत के नेतृत्व वाले सीबीजी के साथ तैनात किया जाता है। इनमें टॉरपीडो और आरबीयू-6000 रॉकेट लॉन्चर जैसी प्रणालियां लगी होती हैं, जो अंडरवाटर टारगेट्स के खिलाफ प्रभावी मानी जाती हैं। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

IFR 2026 INS Vikrant CBG

इसके अलावा तलवार क्लास फ्रिगेट्स भी आईएनएस विक्रांत के कैरियर बैटल ग्रुप का अहम हिस्सा मानी जाती हैं। प्रोजेक्ट 11356 के तहत बनी ये रूसी डिजाइन वाली स्टेल्थ गाइडेड मिसाइल फ्रिगेट्स हैं, जिन्हें मल्टी-रोल भूमिका के लिए तैयार किया गया है। इनमें ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइल, श्टिल-1 एयर डिफेंस सिस्टम और एंटी-सबमरीन वारफेयर क्षमता मौजूद है।

2025-2026 की हाल की फॉर्मेशन और एक्सरसाइज की तस्वीरों तथा वीडियो विश्लेषण में अक्सर दो तलवार क्लास फ्रिगेट्स को विक्रांत के साथ देखा गया है। एक सामान्य फॉर्मेशन में केंद्र में आईएनएस विक्रांत होता है, दोनों ओर कोलकाता क्लास के डेस्ट्रॉयर तैनात रहते हैं, और तिरछी दिशा में शिवालिक क्लास, ब्रह्मपुत्र क्लास के साथ दो तलवार क्लास फ्रिगेट्स दिखाई देती हैं। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

ऑपरेशन सिंदूर 2025 के दौरान भी तलवार क्लास के जहाज, जैसे आईएनएस तबार, आईएनएस तेग और आईएनएस त्रिखंड, विक्रांत सीबीजी के साथ तैनात रहे। एक्सरसाइज कोंकण 2025 में भी आईएनएस तेग ने विक्रांत के साथ जॉइंट ऑपरेशन में हिस्सा लिया था।

तलवार क्लास के अन्य जहाजों में आईएनएस तलवार, आईएएस तरकश और हाल में शामिल आईएनएस तुशील भी आते हैं। हालांकि सीबीजी की संरचना हर मिशन के अनुसार बदलती रहती है, लेकिन ब्रह्मोस से लैस होने के कारण तलवार और नीलगिरी क्लास फ्रिगेट्स ज्यादा खतरे वाले ऑपरेशनों में मजबूत एंटी-शिप क्षमता देते हैं और विक्रांत के सुरक्षा घेरे को और मजबूत बनाते हैं।

इसके अलावा इन फ्रिगेट्स की डिजाइन में स्टेल्थ फीचर्स शामिल हैं, जिससे रडार पर इनकी पहचान कम होती है। यही कारण है कि कैरियर बैटल ग्रुप में इनकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि ये न सिर्फ पनडुब्बियों और दुश्मन जहाजों पर नजर रखते हैं, बल्कि हवा से आने वाले हमलों से भी कैरियर की सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं।

वहीं डेस्ट्रॉयर और फ्रिगेट की बात करें, तो डेस्ट्रॉयर बड़े होते हैं और ज्यादा ताकतवर होते हैं। इनकी एयर डिफेंस, एंटी-शिप (ब्रह्मोस), एंटी-सबमरीन वारफेयर क्षमता छोटे फ्रिगेट्स के मुकाबले ज्यादा होती है। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

कॉर्वेट्स भी होते हैं कैरियर बैटल ग्रुप में

आईएनएस विक्रांत के कैरियर बैटल ग्रुप में अक्सर कॉर्वेट्स को भी शामिल किए जाते हैं। कॉर्वेट्स नौसेना में मध्यम आकार के युद्धपोत होते हैं, जो फ्रिगेट्स से छोटे लेकिन पेट्रोल क्राफ्ट या मिसाइल बोट्स से बड़े होते हैं। ये आमतौर पर 500 से 3,000 टन तक के डिस्प्लेसमेंट वाले होते हैं और मुख्य रूप से (तटीय और उथले समुद्र) में काम करने के लिए डिजाइन किए जाते हैं।

इनका मुख्य काम समुद्र के नीचे छिपी दुश्मन पनडुब्बियों का पता लगाना और उन्हें निष्क्रिय करना होता है। किसी भी एयरक्राफ्ट कैरियर के लिए सबसे बड़ा खतरा अक्सर दुश्मन की सबमरीन से होता है, इसलिए सीबीजी में एक मजबूत एंटी-सबमरीन लेयर बनाना जरूरी माना जाता है। कॉर्वेट्स एस्कॉर्ट ड्यूटी भी निभाते हैं। जब जहाजों का समूह एक साथ यात्रा करता है, तो कॉर्वेट्स उन्हें पनडुब्बी या दुश्मन जहाजों से बचाने में मदद करते हैं। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

कई कॉर्वेट्स ब्रह्मोस जैसी मिसाइलों से लैस होते हैं। इसके अलावा ये सीमित एंटी-एयर वारफेयर क्षमता भी रखते हैं, यानी कम ऊंचाई पर उड़ने वाले विमान, हेलिकॉप्टर या ड्रोन से सुरक्षा कर सकते हैं। इसके लिए सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलें, जैसे बराक सीरीज, लगाई जाती हैं। फ्रिगेट्स की तुलना में कॉर्वेट्स सस्ते, तेज और उथले पानी में ज्यादा प्रभावी होते हैं। हालांकि इनकी मारक क्षमता और लंबी दूरी तक संचालन की क्षमता कुछ कम होती है। इसी कारण इन्हें कम स्तर के बहु-भूमिका युद्धपोत कहा जाता है, लेकिन आधुनिक समुद्री सुरक्षा में इनकी अहमियत बहुत ज्यादा है।

कामोर्टा क्लास को प्रोजेक्ट 28 के नाम से भी जाना जाता है, भारतीय नौसेना की विशेष स्टेल्थ कॉर्वेट कैटेगरी है। इस क्लास के चारों जहाज आईएनएस कामोर्ता, आईएनएस कदमत्त, आईएनएस किल्टन और आईएनएस कवरत्ती सक्रिय सेवा में हैं। करीब 3,500 टन वजनी और 109 मीटर लंबे ये जहाज 25 नॉट्स से अधिक की रफ्तार पकड़ सकते हैं। इनमें आरबीयू-6000 रॉकेट लॉन्चर, वरुणास्त्र टॉरपीडो, एडवांस्ड सोनार सिस्टम और एंटी-सबमरीन हेलीकॉप्टर ऑपरेशन की क्षमता होती है। इनकी डिजाइन में स्टेल्थ फीचर्स शामिल हैं, जिससे रडार पर इनकी पहचान कम होती है और शोर स्तर भी कम रहता है। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

आईएनएस विक्रांत मुख्य रूप से वेस्टर्न कमांड से ऑपरेट होता है, जहां सबमरीन गतिविधियों की संभावना को ध्यान में रखते हुए एंटी-सबमरीन सुरक्षा बेहद अहम मानी जाती है। ऐसे में कामोर्टा क्लास कॉर्वेट्स सीबीजी के उस सुरक्षा घेरे का हिस्सा बनती हैं, जो समुद्र की सतह के नीचे से आने वाले खतरों पर नजर रखता है। हालांकि हर मिशन में इनकी संख्या तय नहीं होती, लेकिन खतरे के स्तर के अनुसार एक या दो कामोर्टा क्लास जहाज विक्रांत के साथ तैनात किए जा सकते हैं।

वहीं आईएनएस विक्रमादित्य के सीबीजी में आमतौर पर कोलकाता श्रेणी के डेस्ट्रॉयर, तलवार श्रेणी के फ्रिगेट और दीपक श्रेणी के टैंकर शामिल होते हैं। इस ग्रुप में कॉर्वेट्स हमेशा मुख्य हिस्सा नहीं होते, लेकिन जरूरत पड़ने पर इन्हें जोड़ा जा सकता है। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

रिप्लेनिशमेंट शिप्स होते हैं सीबीजी की लॉजिस्टिक्स रीढ़

फ्लीट सपोर्ट या रिप्लेनिशमेंट शिप्स किसी भी कैरियर बैटल ग्रुप की असली लॉजिस्टिक्स रीढ़ मानी जाती हैं। एयरक्राफ्ट कैरियर, डिस्ट्रॉयर और फ्रिगेट चाहे कितने भी आधुनिक क्यों न हों, अगर उन्हें समय-समय पर ईंधन, गोला-बारूद और जरूरी सामान न मिले, तो वे लंबे समय तक समुद्र में नहीं टिक सकते। यही काम ये सपोर्ट शिप्स करती हैं।

इनका सबसे अहम काम अंडरवे रिप्लेनिशमेंट यानी यूएनआरईपी होता है। इसका मतलब समुद्र में चलते हुए जहाजों को ही डीजल, एविएशन फ्यूल, गोला-बारूद, भोजन, पानी और जरूरी स्पेयर पार्ट्स पहुंचाना है। यह ट्रांसफर जहाज के बराबर चलकर या पीछे से किया जाता है। कई सपोर्ट शिप्स पर हेलिपैड और हैंगर भी होते हैं, जिससे हेलीकॉप्टर ऑपरेशन और मेडिकल इवैक्यूएशन जैसे काम भी किए जा सकते हैं। आपदा या मानवीय सहायता के समय ये जहाज एचएडीआर ऑपरेशन में भी अहम भूमिका निभाते हैं। आम तौर पर कैरियर बैटल ग्रुप में एक या दो ऐसी शिप्स शामिल होती हैं और वे फॉर्मेशन के पीछे सुरक्षित दूरी पर रहती हैं। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

आईएनएस विक्रांत के साथ अक्सर दीपक क्लास फ्लीट टैंकर तैनात की जाती है। इस क्लास की प्रमुख शिप है आईएनएस दीपक (A50) है। लगभग 27,500 टन वजनी यह जहाज बड़े पैमाने पर ईंधन और सप्लाई ट्रांसफर करने में सक्षम है और एक साथ कई जहाजों को यूएनआरईपी दे सकता है। इसके अलावा आईएनएस शक्ति (A57) भी जरूरत पड़ने पर विक्रांत सीबीजी का हिस्सा बनती है।

साथ ही, आईएनएस आदित्य (A59) और आईएनएस ज्योति (A58) जैसे टैंकर भी लंबे डिप्लॉयमेंट में सपोर्ट देते हैं। भविष्य में बड़े एचएसएल क्लास सपोर्ट जहाज भी शामिल होने वाले हैं, जिससे समुद्र में भारत की ब्लू-वाटर क्षमता और मजबूत होगी। कुल मिलाकर, ये फ्लीट सपोर्ट शिप्स ही वह ताकत हैं जो विक्रांत और उसके कैरियर बैटल ग्रुप को हफ्तों और महीनों तक समुद्र में सक्रिय बनाए रखती हैं। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

IFR 2026 INS Vikrant CBG

गुपचुप विक्रांत को सुरक्षा देती हैं सबमरींस

आईएनएस विक्रांत के कैरियर बैटल ग्रुप में सबमरीन्स भी शामिल होती हैं, लेकिन ये सरफस पर दिखाई नहीं देतीं। ये पानी के भीतर तैनात रहकर पूरे ग्रुप को अंडरवाटर सुरक्षा देती हैं। इनका मुख्य काम एंटी-सबमरीन वारफेयर यानी दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाना, उनका पीछा करना और जरूरत पड़ने पर उन्हें निष्क्रिय करना होता है। किसी भी एयरक्राफ्ट कैरियर के लिए सबसे बड़ा खतरा अक्सर दुश्मन की सबमरीन से माना जाता है, इसलिए सीबीजी में अंडरवाटर सुरक्षा बेहद अहम होती है।

ऑपरेशनल सिक्योरिटी के कारण भारतीय नौसेना हर मिशन में शामिल सबमरीन्स के नाम सार्वजनिक नहीं करती, लेकिन हाल की एक्सरसाइज और रिपोर्ट्स में देखा गया है कि आम तौर पर एक से तीन सबमरींस सीबीजी के साथ तैनात रहती हैं। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

विक्रांत के साथ सीबीजी में आदर्श तौर पर न्यूक्लियर पावर वाली अटैक सबमरीन, यानी एसएसएन, शामिल होनी चाहिए। चूंकि भारतीय नौसेना के पास कोई स्वदेशी ऑपरेशनल एसएसएन मौजूद नहीं है। इसी वजह से अभी सीबीजी की सुरक्षा के लिए कलवरी क्लास की डीजल-इलेक्ट्रिक अटैक सबमरीन, जिन्हें एसएसके भी कहा जाता है, तैनात की जाती हैं। खासकर आईएनएस विक्रांत के साथ इन्हीं पनडुब्बियों को लगाया जाता है।

दुनिया की बड़ी नौसेनाएं, जैसे अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस, अपने कैरियर ग्रुप के साथ एसएसएन तैनात करती हैं। इसका कारण साफ है। न्यूक्लियर प्रोपल्शन की वजह से ऐसी पनडुब्बियां लंबे समय तक पानी के अंदर रह सकती हैं। उन्हें बार-बार सतह पर आने की जरूरत नहीं पड़ती। उनकी रफ्तार भी ज्यादा होती है और वे कैरियर के साथ तेज रफ्तार में चल सकती हैं। दुश्मन की पनडुब्बियों को खोजने, उनका पीछा करने और जरूरत पड़ने पर हमला करने में एसएसएन बहुत प्रभावी मानी जाती हैं। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

भारत में स्वदेशी एसएसएन परियोजना अभी डिजाइन और विकास के चरण में है। माना जा रहा है कि 2030 के दशक में पहली स्वदेशी एसएसएन नौसेना में शामिल हो सकती है। रूस से लीज पर ली गई आईएनएस चक्रा अब सेवा में नहीं है और अगली लीज भी अभी समय ले रही है। इसलिए फिलहाल भारतीय नौसेना के पास सीबीजी के साथ स्थायी रूप से तैनात करने के लिए कोई एसएसएन उपलब्ध नहीं है।

ऐसी स्थिति में कलवरी क्लास की यानी स्कॉर्पीन क्लास डीजल-इलेक्ट्रिक अटैक सबमरींस महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। स्कॉर्पीन डिजाइन पर आधारित ये पनडुब्बियां काफी शांत यानी लो एकॉस्टिक सिग्नेचर वाली हैं। पानी के अंदर इनका पता लगाना आसान नहीं होता। इनके पास एंटी-शिप मिसाइल और भारी टॉरपीडो जैसे हथियार हैं। जरूरत पड़ने पर ये समुद्र में माइंस भी बिछा सकती हैं। इनकी सबसे बड़ी ताकत यह है कि ये दुश्मन की पनडुब्बियों की खोज और निगरानी कर सकती हैं, जिससे कैरियर की सुरक्षा मजबूत होती है।

कलवरी क्लास, यानी स्कॉर्पीन क्लास डीजल-इलेक्ट्रिक अटैक सबमरींस में आईएनएस कलवरी, आईएनएस खंडेरी, आईएनएस करंज, आईएनएस वेला और आईएनएस वाग्शीर जैसी सबमरींस शामिल हैं। लगभग 1,800 टन वजनी ये सबमरीन्स स्टेल्थ क्षमता से लैस हैं और एक्सोसेट मिसाइल तथा हेवीवेट टॉरपीडो दागने में सक्षम हैं। पूर्वी नौसैनिक बेड़े के साथ विक्रांत के संचालन के दौरान इन्हें प्राथमिक अंडरवाटर एस्कॉर्ट माना जाता है। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

जब आईएनएस विक्रांत समुद्र में ऑपरेशन पर निकलता है, तो उसके साथ डेस्ट्रॉयर, फ्रिगेट, फ्लीट टैंकर और एयर विंग के अलावा पनडुब्बियां भी तैनात रहती हैं। यही पनडुब्बियां समुद्र के नीचे एक सुरक्षा घेरा बनाती हैं। वे आसपास के क्षेत्र को साफ यानी सैनेटाइज करती हैं, ताकि कोई दुश्मन पनडुब्बी या जहाज पास न आ सके। हिंद महासागर के उथले और तटीय इलाकों में डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां काफी कारगर मानी जाती हैं। इसलिए मौजूदा हालात में विक्रांत के मुकाबले स्पीड कम होने के बाद भी कलवरी क्लास भारतीय सीबीजी के लिए एक प्रभावी समाधान साबित हो रही हैं।

अक्टूबर 2025 में हुई एक्सरसाइज कोंकण के दौरान एक कलवरी क्लास सबमरीन ने ब्रिटेन की नौसेना के साथ संयुक्त पनडुब्बी खोज अभ्यास में हिस्सा लिया था। इसी तरह ऑपरेशन सिंदूर 2025 के दौरान भी विक्रांत सीबीजी के साथ कवलरी क्लास सबमरीन्स की तैनाती देखी गई थी।

इसके अलावा शिशुमार क्लास और सिंधुघोष क्लास की कुछ पुरानी लेकिन सक्रिय सबमरींस भी जरूरत के अनुसार शामिल की जा सकती हैं। शिशुमार क्लास को टाइप 209/1500 के नाम से जाना जाता है। ये पुरानी जरूर हैं, लेकिन अब भी सक्रिय सेवा में है। इस श्रेणी में आईएनएस शाल्कि और आईएनएस शंकुश जैसी पनडुब्बियां शामिल हैं। अपनी विश्वसनीयता और ऑपरेशनल अनुभव के कारण ये अब भी नौसेना के बेड़े का हिस्सा बनी हुई हैं।

वहीं सिंधुघोष क्लास, जिसे किलो क्लास भी कहा जाता है, रूसी मूल की पनडुब्बियां हैं। इस श्रेणी में आीएनएस सिधुंरक्षक शामिल रही हैं। ये लंबी दूरी तक ऑपरेशन करने में सक्षम हैं और कई वर्षों तक भारतीय नौसेना की अंडरवाटर स्ट्राइक क्षमता का आधार रही हैं। हालांकि समय के साथ इनकी जगह धीरे-धीरे आधुनिक कलवरी क्लास पनडुब्बियां ले रही हैं, जो ज्यादा स्टेल्थ और एडवांस तकनीक से लैस हैं। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

अब दुश्मन के ड्रोनों को ‘बंदी’ बनाएगी भारतीय सेना! खरीदेगी ये खास ‘जाल’

Indian Army Drone Catcher System
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Indian Army Drone Catcher System: ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जिस तरह से पाकिस्तान ने खुफिया जानकारियां जुटाने के लिए सस्ते और छोटे ड्रोन इस्तेमाल किए थे, उसे देखते हुए भारतीय सेना भी कमर कस रही है। अब छोटे और कम दिखाई देने वाले दुश्मन ड्रोनों से निपटने के लिए सेना नई तैयारी कर रही है। रक्षा मंत्रालय ने सेना के लिए “ड्रोन कैचर सिस्टम” यानी डीसीएस खरीदने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसके लिए सेना की तरफ से रिक्वेस्ट फॉर इन्फॉर्मेशन यानी आरएफआई जारी की गई है। (Indian Army Drone Catcher System)

पिछले कुछ समय से कम रडार सिग्नेचर यानी लो-आरसीएस वाले ड्रोन और अनमैन्ड एरियल सिस्टम (यूएएस) का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। छोटे आकार और कम रडार पहचान के कारण इन्हें पकड़ना और गिराना पारंपरिक एयर डिफेंस सिस्टम के लिए चुनौती बनता जा रहा है। (Indian Army Drone Catcher System)

Indian Army Drone Catcher System: क्यों जरूरी हुआ ड्रोन कैचर सिस्टम?

आरएफआई के शुरुआत में साफ कहा गया है कि लो-आरसीएस ड्रोन, चाहे अकेले आएं या झुंड यानी स्वॉर्म में, अब एक बड़ा खतरा बन चुके हैं। हाल के ऑपरेशनों में भी ऐसे ड्रोन का इस्तेमाल देखा गया, जिसने सेना को अलग से “ड्रोन पकड़ने” वाली क्षमता डेवलप करने की जरूरत का अहसास कराया।

अब तक ज्यादातर सिस्टम ड्रोन को जाम करने या मार गिराने में एक्सपर्ट थे, लेकिन कई बार ऐसे हालात हो जाते हैं जिनमें ड्रोन को सही सलामत पकड़ना ज्यादा उपयोगी होता है। इससे उसकी तकनीक, कैमरा, डेटा और सोर्स के बारे में अहम जानकारी मिल सकती है। यही काम यह नया ड्रोन कैचर सिस्टम करेगा। (Indian Army Drone Catcher System)

ड्रोन कैचर सिस्टम में क्या-क्या होगा?

आरएफआई के मुताबिक यह सिस्टम तीन मुख्य हिस्सों से मिलकर बनेगा– ड्रोन सेंसर, ड्रोन कैचर और ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन (जीसीएस)। ड्रोन सेंसर इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे (ईएसए) टेक्नोलॉजी या उससे बेहतर तकनीक पर आधारित होगा। इसे 360 डिग्री कवरेज देना होगा और एक साथ कम से कम 20 ड्रोन को डिटेक्ट और ट्रैक करने की क्षमता रखनी होगी। यह भी शर्त रखी गई है कि ये सेंसर 0.01 वर्ग मीटर के छोटे आरसीएस वाले टारगेट्स को भी कम से कम 4 किलोमीटर की दूरी से पहचान सकें।

ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन इस पूरे सिस्टम का दिमाग होगा। सेंसर से मिली जानकारी यहीं आएगी, जहां माइक्रोप्रोसेसर के जरिए टारगेट की गणना की जाएगी और ड्रोन कैचर को निर्देश भेजे जाएंगे। जीसीएस में लैपटॉप या टैबलेट आधारित इंटरफेस होगा, जिसमें दुश्मन ड्रोन की दिशा, दूरी और ऊंचाई जैसी जानकारी दिखेगी। (Indian Army Drone Catcher System)

तीसरा और सबसे अहम हिस्सा है ड्रोन कैचर। यह खुद एक ड्रोन होगा, जो दुश्मन ड्रोन के पास जाकर उस पर जाल फेंकेगा और उसे निष्क्रिय करेगा। इसे पूरी तरह ऑटोनॉमस यानी स्वायत्त रूप से काम करने में सक्षम होना होगा।

सिर्फ जाल ही नहीं, इलेक्ट्रॉनिक हमला भी

इस सिस्टम में केवल जाल फेंककर ड्रोन पकड़ने की सुविधा ही नहीं होगी, बल्कि एक जैमर सबसिस्टम भी होगा । यह रेडियो फ्रीक्वेंसी डिनायल, सिलेक्टिव जीएनएसएस डिनायल और जीएनएसएस डीसैप्शन जैसी इलेक्ट्रॉनिक तकनीकों का इस्तेमाल करेगा।

अगर दुश्मन ड्रोन सैटेलाइट नेविगेशन या रेडियो सिग्नल के जरिए कंट्रोल हो रहा है, तो यह सिस्टम उसके सिग्नल को काट या भ्रमित कर सकता है। इससे ड्रोन अपना रास्ता भटक सकता है या जमीन पर गिर सकता है। (Indian Army Drone Catcher System)

हर इलाके में करे काम

सेना ने स्पष्ट किया है कि यह सिस्टम भारत के हर तरह के इलाके में काम करने योग्य होना चाहिए। इसमें मैदान, रेगिस्तान, तटीय इलाके और 4500 मीटर तक की ऊंचाई वाले पहाड़ी क्षेत्र शामिल हैं।

साथ ही, ये सिस्टम ऑपरेटिंग टेम्परेचर माइनस 15 डिग्री सेल्सियस से लेकर प्लस 45 डिग्री सेल्सियस के अलावा 95 प्रतिशत तक नमी में काम करना चाहिए। (Indian Army Drone Catcher System)

मौजूदा एयर डिफेंस सिस्टम के साथ इंटीग्रेशन

आरएफआई में यह भी कहा गया है कि ड्रोन सेंसर को “आकाशतीर” कमांड एंड रिपोर्टिंग मॉड्यूल के साथ इंटीग्रेट करने की क्षमता होनी चाहिए। इसका मतलब है कि यह सिस्टम अलग-थलग नहीं रहेगा, बल्कि सेना के मौजूदा एयर डिफेंस नेटवर्क का हिस्सा बन सकेगा।

इस तरह दुश्मन ड्रोन की जानकारी बड़े एयर डिफेंस सिस्टम तक भी पहुंचाई जा सकेगी और जरूरत पड़ने पर मिसाइल या अन्य हथियारों से भी कार्रवाई हो सकेगी। (Indian Army Drone Catcher System)

इंडिजिनियस कंटेंट पर जोर

आरएफआई में साफ कहा गया है कि कुल इंडिजिनियस कंटेंट यानी स्वदेशी सामग्री कम से कम 50 फीसदी होनी चाहिए, जो डिफेंस एक्विजिशन प्रोसिजर 2020 के नियमों के मुताबिक है।

इसका मतलब है कि कंपनियों को भारत में ही ज्यादा से ज्यादा निर्माण और तकनीक विकसित करनी होगी। इससे देश की रक्षा इंडस्ट्री को बढ़ावा मिलेगा और विदेशी निर्भरता कम होगी।

यह अभी शुरुआती चरण है। कंपनियों को 17 मार्च तक जानकारी और प्रपोजल जमा करने होंगे। इसके बाद तकनीकी मूल्यांकन, ट्रायल और फिर कॉन्ट्रैक्ट नेगोशिएशन की प्रक्रिया चलेगी। अगर सब कुछ तय समय पर आगे बढ़ा, तो आने वाले कुछ सालों में सेना के पास एक डेडिकेटेड ड्रोन कैचर क्षमता होगी। (Indian Army Drone Catcher System)

असम राइफल्स ने ऑर्डर कीं 1013 स्वदेशी ‘अस्मी’ कार्बाइन, लोकेश मशींस को मिली बड़ी कामयाबी

ASMI SMG
Assam Rifles Orders 1013 Indigenous ASMI Carbines from Lokesh Machines

ASMI SMG: अर्धसैनिक बल असम राइफल्स ने हैदराबाद की कंपनी लोकेश मशींस लिमिटेड को 1013 ‘अस्मी’ कार्बाइन की सप्लाई का ऑर्डर दिया है। टेक्नो-कमर्शियल इवैल्यूएशन के बाद कंपनी सबसे कम बोली लगाने वाली यानी एल-1 (L1) के तौर पर चुनी गई। ‘अस्मी’ सब-मशीन गन (एसएमजी) पूरी तरह स्वदेशी डिजाइन, विकास और निर्माण (आईडीडीएम) कैटेगरी के तहत बनाया गया है। इससे देश में छोटे हथियारों के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को मजबूती मिलती है।

ASMI SMG: स्पेशल फोर्सेज को ‘अस्मी’ सब-मशीन गन

यह लोकेश मशींस लिमिटेड की यह दूसरी बड़ी सफलता है। इससे पहले 6 अप्रैल 2024 को कंपनी ने भारतीय सेना की स्पेशल फोर्सेज के लिए 550 ‘अस्मी’ सब-मशीन पिस्टल का ऑर्डर हासिल किया था। उस समय कंपनी ने कई बड़ी कंपनियों को पीछे छोड़ते हुए लगभग 4.6 करोड़ रुपये का कॉन्ट्रैक्ट जीता था। यह ‘इंसास’ राइफल के बाद स्वदेशी छोटे हथियारों का पहला बड़ा ऑर्डर माना गया था। (ASMI SMG)

क्या है ‘अस्मी’ कार्बाइन?

‘अस्मी’ 9×19 मिमी कैलिबर की कॉम्पैक्ट कार्बाइन है। इसे करीब एक दशक से भी ज्यादा समय से सेवा में रही ब्रिटिश डिजाइन की स्टर्लिंग कार्बाइनों की जगह लेने के उद्देश्य से तैयार किया गया। पुराने हथियारों को बदलने की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी।

इस हथियार को बेहद कम लागत पर तैयार किया गया है। इसकी अनुमानित कीमत प्रति यूनिट 50 हजार रुपये से कम बताई जाती है। कम कीमत और भरोसेमंद डिजाइन के कारण इसे भविष्य में निर्यात के लिए भी उपयुक्त माना जा रहा है। (ASMI SMG)

किसने किया डिजाइन?

‘अस्मी’ का डिजाइन भारतीय सेना के कर्नल प्रसाद बंसोड़ ने तैयार किया। पिछले 75 वर्षों में वे ऐसे सैन्य अधिकारी हैं जिन्होंने स्वयं हथियार डिजाइन किया। इसका विकास डीआरडीओ के तहत आने वाली पुणे स्थित आर्मामेंट रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट (एआरडीई) में किया गया।

यह कार्बाइन लिमिटेड सीरीज प्रोडक्शन है और भारतीय सेना के अलावा एनएसजी, आईटीबीपी और बीएसएफ जैसी एजेंसियों को भी सीमित संख्या में दी जा चुकी है। (ASMI SMG)

क्यों है यह सौदा अहम?

असम राइफल्स पूर्वोत्तर क्षेत्र में तैनात देश का एक प्रमुख अर्धसैनिक बल है। वहां के दुर्गम इलाकों में हल्के और भरोसेमंद हथियारों की जरूरत होती है। ‘अस्मी’ कार्बाइन हल्की, कॉम्पैक्ट और नजदीकी मुकाबले में उपयोगी मानी जाती है। ऐसे इलाकों में इस तरह के हथियार होने से जवानों को फायदा मिलता है। वहीं, असम राइफल्स को अस्मी की सप्लाई इस बात का संकेत भी है कि स्वदेशी छोटे हथियारों पर सुरक्षा बलों का भरोसा बढ़ रहा है।

हाल ही में जिंदल डिफेंस ने ब्राजील की कंपनी टॉरस के साथ साझेदारी में टी-9 मशीन पिस्टल का भी ऑर्डर हासिल किया था। वह ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी के तहत भारत में निर्मित की जा रही है। इससे स्पष्ट है कि छोटे हथियारों के क्षेत्र में निजी कंपनियों की सक्रिय भागीदारी बढ़ रही है। (ASMI SMG)

मशीन गन भी बनाई

लोकेश मशीन टूल्स ने एआरडीई के साथ मिलकर 7.62×51 मिमी बेल्ट-फेड मीडियम मशीन गन (एमएमजी) भी विकसित की है। यह प्रति मिनट लगभग 800 राउंड फायर कर सकती है और इसकी प्रभावी मारक दूरी 1800 मीटर तक बताई जाती है। इसे जहाजों, बख्तरबंद वाहनों और हेलीकॉप्टर पर भी लगाया जा सकता है। (ASMI SMG)

कंपनी को अगस्त 2025 में 17.7 करोड़ रुपये का एक और ऑर्डर मिला था, जिसमें सेवा में मौजूद बेल्जियम मूल की मैग-58 मशीन गन के पुर्जों की सप्लाई शामिल थी। यह गन भारत में लाइसेंस के तहत निर्मित होती रही है।

सरकार लंबे समय से रक्षा क्षेत्र में विदेशी निर्भरता कम करने पर जोर दे रही है। छोटे हथियारों के क्षेत्र में पहले बड़े पैमाने पर आयात होता था। अब निजी उद्योग और अनुसंधान संस्थानों के सहयोग से स्वदेशी विकल्प सामने आ रहे हैं। (ASMI SMG)

From Battlefield to Flood Relief: Lt Gen Ata Hasnain Explains Military-Civil Fusion at AWC

Military-Civil Fusion in Disaster Management
Lt Gen S A Hasnain to Higher Command Course at AWC

Military-Civil Fusion: Officers attending the Higher Command Course at Army War College were treated to a thought-provoking session as Lt Gen Syed Ata Hasnain (Retd), Member of the National Disaster Management Authority (NDMA), delivered a detailed lecture on the growing importance of disaster risk management in India’s national security framework.

The lecture, titled “Disaster Risk Management as Subset of India’s National Security,” focused on the need to view disasters not merely as humanitarian crises but as serious national security concerns. Addressing senior military officers, Lt Gen Hasnain explained that India’s geographic and climatic conditions make it highly vulnerable to natural disasters such as floods, cyclones, earthquakes, and landslides. These events, he said, can disrupt governance, strain resources, and affect internal stability if not managed effectively.

Drawing from his operational experience and current role with the NDMA, he underlined that disaster preparedness must be proactive rather than reactive. According to him, armed forces cannot limit themselves to post-disaster relief operations. Instead, planning, coordination, and preparedness must begin well before calamities strike.

One of the key themes of his address was the importance of seamless coordination between military forces and civilian agencies. He emphasized that effective disaster response depends on strong cooperation between the armed forces, state administrations, disaster response units, and national-level agencies. Without proper communication and unified command structures, even well-equipped forces may struggle to deliver timely relief.

Lt Gen Hasnain highlighted the concept of “military-civil fusion” in disaster management. He explained that during emergencies, the armed forces often act as first responders due to their organizational strength, logistics capability, and rapid mobilization. However, long-term resilience can only be built when military expertise and civil planning mechanisms work in sync.

He also pointed out that disaster management today must be understood within the larger context of multi-domain security challenges. Modern security threats are not limited to conventional warfare. Climate change, environmental degradation, urban expansion in vulnerable areas, and infrastructure stress have increased the scale and frequency of disasters. Therefore, preparedness for such events is directly linked to national stability.

The session also included discussions on the importance of regular mock drills, joint training exercises, and integrated planning. Lt Gen Hasnain noted that shifting from a relief-based mindset to a resilience-based strategy requires institutional learning and sustained collaboration. He encouraged officers to think beyond traditional combat roles and appreciate the Army’s expanding responsibilities in safeguarding citizens during crises.

The Higher Command Course at the Army War College is designed to prepare senior officers for higher leadership roles. The inclusion of subjects such as disaster risk management reflects the evolving nature of military education in India. Officers are now being trained to address not only battlefield challenges but also complex internal and humanitarian situations.

Participants described the lecture as engaging and relevant, particularly in light of recent natural disasters across different parts of the country. The interaction that followed allowed officers to raise questions on coordination mechanisms, response timelines, and lessons learned from previous disaster relief operations.

Lt Gen Hasnain’s visit reinforced the Indian Army’s broader commitment to supporting national development and resilience. His address served as a reminder that national security today extends beyond defending borders- it also includes protecting communities from the growing impact of natural and environmental threats.

Future Battalion Commanders Ready: Senior Command Course Concludes at Army War College Mhow

Senior Command Course Army War College Mhow
Lieutenant General Harjeet Singh Sahi, Commandant of the Army War College

The Senior Command Course concluded on Thursday at Army War College, marking an important milestone for a new batch of mid-career officers preparing to take on higher command responsibilities in the Indian Army.

The closing ceremony was presided over by Lieutenant General Harjeet Singh Sahi, Commandant of the Army War College. Addressing the officers, he congratulated them on successfully completing what is considered one of the Army’s most demanding professional military education programmes. He underlined that modern battlefields are evolving rapidly and require leaders who can think strategically, adapt quickly, and operate effectively across multiple domains.

The course is designed to prepare officers for commanding battalions and equivalent formations. Over several weeks, participants underwent rigorous training that focused on operational planning, leadership under pressure, decision-making in uncertain scenarios, and managing complex military operations. Emphasis was also placed on contemporary warfare concepts, including the integration of land, air, cyber, space, and information domains.

This year’s batch included not only Indian Army officers but also 28 officers from friendly foreign nations and three officers from the Central Armed Police Forces. The diverse composition of the course added depth to discussions and strengthened professional bonds between participating countries. It also reflected India’s growing role in defence cooperation and joint preparedness initiatives.

The Army War College in Mhow is regarded as one of India’s premier institutions for higher military learning. Courses conducted here are aimed at building operationally competent and technologically adept leaders who can respond to dynamic security challenges.

In his address, Lt Gen Sahi described the Senior Command Course as more than just an academic programme. He said it is a platform that shapes leaders capable of navigating uncertainty and executing missions with clarity and resolve in increasingly complex operational environments.

With the completion of this course, the officers are now set to assume key command roles, carrying forward the Indian Army’s vision of maintaining high standards of professionalism and operational excellence.

भारतीय सेना को ATAGS की डिलीवरी में हो सकती है देरी? जानें फौज को कब मिलेंगी नई 155 एमएम गन?

ATAGS delivery delay

ATAGS delivery delay: भारतीय सेना के लिए तैयार की जा रही स्वदेशी एटीएजीएस यानी एडवांस्ड टोव्ड आर्टिलरी गन सिस्टम की डिलीवरी में करीब एक साल की देरी हो सकती है। मिली जानकारी के मुताबिक एटीएजीएस के बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन में एक साल तक की देरी हो सकती है। पहले भारतीय सेना को इनकी डिलीवरी इसी साल से शुरू होनी थी, लेकिन अब इंतजार लंबा खिंच सकता है।

ATAGS delivery delay: प्रोडक्शन क्लियरेंस का है इंतजार

एक चैनल से बातचीत में भारत फोर्ज के चेयरमैन बाबा कल्याणी ने कहा कि “एफओपीएम” यानी फर्स्ट ऑफ प्रोडक्शन मॉडल की प्रक्रिया चल रही है। इसका मतलब यह है कि गन का पहला प्रोडक्शन मॉडल तैयार किया जाता है और फिर भारतीय सेना उसकी पूरी जांच और निरीक्षण करती है। सेना यह देखती है कि गन तय मानकों के अनुसार काम कर रही है या नहीं। जब यह प्रक्रिया पूरी हो जाती है और सेना से मंजूरी मिल जाती है, तभी कंपनी बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन के लिए कच्चा माल मंगाने का ऑर्डर दे सकती है।

उन्होंने उम्मीद जताई कि मार्च तक यह प्रोडक्शन क्लियरेंस मिल जाएगा। उसके बाद सप्लाई चेन यानी पुर्जों और कच्चे माल की व्यवस्था करने में करीब चार से पांच महीने का समय लगेगा। इस हिसाब से एटीएजीएस का बड़े पैमाने पर उत्पादन सितंबर या अक्टूबर 2026 से शुरू होने की संभावना है। वहीं सूत्रों का कहना है कि अक्टूबर से भी काम शुरू होता है तो पहला बैच तैयार होने में छह महीने से ज्यादा का वक्त लग सकता है, ऐसे में भारतीय सेना को डिलीवरी के लिए थोड़ा लंबा इंतजार करना पड़ सकता है। (ATAGS delivery delay)

155 मिलीमीटर और 52 कैलिबर की आधुनिक तोप

एटीएजीएस भारत की पूरी तरह स्वदेशी 155 मिलीमीटर और 52 कैलिबर की आधुनिक तोप है। इसे डीआरडीओ ने भारत फोर्ज और टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड के साथ मिलकर डेवलप किया है। यह तोप भारतीय सेना की पुरानी बोफोर्स और अन्य गनों की जगह लेने के लिए बनाई जा रही है। इसकी मारक क्षमता लगभग 48 किलोमीटर तक बताई जाती है, यही खूबी इसे दुनिया की सबसे लंबी दूरी तक मार करने वाली टोव्ड आर्टिलरी गनों में शामिल करती है। (ATAGS delivery delay)

307 एटीएजीएस गनों की मंजूरी

सरकार ने वर्ष 2025 में करीब 307 एटीएजीएस गनों और 327 टोइंग व्हीकल्स की खरीद को मंजूरी दी थी। इस सौदे की कुल कीमत लगभग 6,900 से 7,000 करोड़ रुपये के आसपास थी। इस ऑर्डर में 60 प्रतिशत हिस्सेदारी भारत फोर्ज को और 40 प्रतिशत टाटा समूह को मिली है। कॉन्ट्रैक्ट पर दस्तखत मार्च 2025 में हुए थे और योजना के अनुसार सितंबर 2026 से डिलीवरी शुरू होनी थी।

लेकिन खुद बाबा कल्याणी के मुताबिक बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन इस साल अक्टूबर से ही होगा, जिससे उत्पादन की प्रक्रिया में देरी हो सकती है। हालांकि कुछ शुरुआती गन यूनिट्स की डिलीवरी या ट्रायल पहले ही पूरे किए जा चुके हैं। (ATAGS delivery delay)

ट्रायल करने में लगता है समय

एटीएजीएस जैसी एडवांस्ड तोप का निर्माण साधारण प्रक्रिया नहीं है। इसमें बैरल, रिकॉइल सिस्टम, ऑटोमेटिक लोडिंग सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल और डिजिटल फायर कंट्रोल सिस्टम जैसे कई जटिल हिस्से शामिल होते हैं। इन सभी को एक साथ जोड़कर पूरी तरह ट्रायल करना समय लेने वाला काम है।

इसके अलावा बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू करने के लिए फैक्ट्री लाइन की तैयारी, विशेष मशीनरी की स्थापना और कुशल कर्मचारियों की उपलब्धता भी जरूरी होती है। यदि इनमें से किसी भी चरण में देरी होती है, तो पूरी सप्लाई टाइमलाइन प्रभावित हो सकती है। वहीं, ज्योपॉलिटिकल वजहों से विदेश से आने वाले कुछ खास पुर्जे या विशेष स्टील की सप्लाई में देरी हुई तो इंतजार और बढ़ सकता है।

भारत फोर्ज ने अपनी हालिया तिमाही रिपोर्ट में यह जरूर कहा है कि डिफेंस सेक्टर में उसकी ऑर्डर बुक मजबूत बनी हुई है। कंपनी का कुल रक्षा ऑर्डर बुक हजारों करोड़ रुपये का बताया जा रहा है। (ATAGS delivery delay)

आर्टिलरी का भविष्य है एटीएजीएस

भारतीय सेना के लिए एटीएजीएस बेहद महत्वपूर्ण है। एटीएजीएस को भारतीय तोपखाने यानी आर्टिलरी का भविष्य माना जा रहा है। इसकी मारक क्षमता करीब 48 किलोमीटर तक बताई जाती है। खास तौर पर जब इसमें लंबी दूरी वाले विशेष गोले इस्तेमाल किए जाते हैं, तब यह इतनी दूर तक निशाना साध सकती है। यह तोप तेज रफ्तार से फायर कर सकती है। यह 30 सेकंड में छह राउंड तक दागने में सक्षम है। इसमें ऑटोमेटिक लोडिंग सिस्टम है, जिससे सैनिकों की मेहनत कम करनी पड़ती है और तेजी से लगातार फायरिंग की जा सकती है। यह रेगिस्तान से लेकर पहाड़ी इलाकों तक अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियों में काम कर सकती है।

एटीएजीएस को निर्यात बाजार में भी सफलता मिली है। आर्मेनिया को इस गन सिस्टम की सप्लाई का कॉन्टैक्ट पहले ही किया जा चुका है। (ATAGS delivery delay)

हालांकि डिलीवरी में अगर एक साल की देरी होती है तो सेना की आधुनिकीकरण योजना की रफ्तार थोड़ी धीमी पड़ सकती है। यानी नए हथियार और सिस्टम तय समय से थोड़ा देर से मिलेंगे।

लेकिन रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यह अतिरिक्त समय गुणवत्ता और भरोसेमंद कामकाज सुनिश्चित करने के लिए लिया जा रहा है, तो लंबे समय में यह बेहतर साबित होगा।

रक्षा क्षेत्र में सबसे जरूरी बात यह है कि उपकरण पूरी तरह जांचे-परखे हों, सुरक्षित हों और असली हालात में ठीक से काम करें। जल्दीबाजी में तैयार किए गए सिस्टम से जोखिम बढ़ सकता है। इसलिए अगर बेहतर गुणवत्ता के लिए थोड़ा इंतजार भी करना पड़े, तो उसे समझदारी भरा कदम माना जाता है। (ATAGS delivery delay)

DAC अप्रूवल के बाद भी करना होगा लंबा इंतजार! 2027 तक क्यों खिंच सकती है 114 राफेल डील की बात?

114 Rafale deal

114 Rafale deal: फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की अगले हफ्ते होने वाली भारत यात्रा से पहले भारतीय वायुसेना के लिए 114 राफेल लड़ाकू विमानों की बहुप्रतीक्षित डील को गुरुवार को डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल यानी डीएसी ने “एक्सेप्टेंस ऑफ नेसेसिटी” यानी एओएन दे दी है। इस सौदे की अनुमानित कीमत करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये बताई जा रही है। इसे भारत की अब तक की सबसे बड़ी फाइटर जेट खरीद माना जा रहा है।

लेकिन एओएन मिलने के बावजूद कॉन्ट्रैक्ट साइन होने में एक साल या उससे ज्यादा समय लग सकता है। आम लोगों के लिए यह सवाल स्वाभाविक है कि जब मंजूरी मिल गई, तो फिर देरी क्यों? इसका जवाब समझने के लिए पूरी प्रक्रिया को विस्तार से समझना जरूरी है। (114 Rafale deal)

114 Rafale deal: एओएन का मतलब क्या है?

एओएन का मतलब है कि सरकार ने सैद्धांतिक रूप में मान लिया है कि यह खरीद जरूरी है। यानी वायुसेना को 114 मल्टी रोल फाइटर एयरक्राफ्ट चाहिए और इस दिशा में आगे बढ़ा जाएगा। लेकिन एओएन मिलना अंतिम मंजूरी नहीं होती। इसके बाद कई और चरण पूरे करने होते हैं। (114 Rafale deal)

कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी की अंतिम मंजूरी

एओएन के बाद अंतिम मंजूरी कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (सीसीएस) से मिलती है। यह समिति प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में बैठती है। सूत्रों का कहना है कि इस मामले में सीसीएस की बैठक शुक्रवार को बुलाई जा सकती है, जहां इसे अंतिम मंजूरी दी जा सकती है। बड़े रक्षा सौदों पर यह समिति अंतिम फैसला लेती है।

सूत्रों का कहना है कि फ्रांस के राष्ट्रपति की यात्रा से पहले सरकार इसके सभी प्रोसिजर पूरे लेना चाहती है, ताकि बाद में डील में कोई रुकावट न आने पाए। हालांकि सूत्रों का कहना है कि सीसीएस की बैठक के बावजूद सरकारी स्तर पर पूरी फाइल प्रक्रिया, वित्तीय जांच और शर्तों की समीक्षा में समय लगना सामान्य बात है। इसलिए डील पर आखिरी महर लगने में एक साल तक का वक्त लग सकता है। (114 Rafale deal)

कीमत तय करना सबसे बड़ी चुनौती

114 राफेल की डील बहुत बड़ी है। इसमें केवल विमान ही नहीं, बल्कि हथियार पैकेज, ट्रेनिंग, स्पेयर पार्ट्स, मेंटेनेंस, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और भारत में मैन्युफैक्चरिंग सुविधा भी शामिल है।

फ्रांस की कंपनी दसॉ एविएशन से कीमत तय करने में लंबी बातचीत होगी। 2016 में जब 36 राफेल विमानों की डील हुई थी, तब भी कीमत और हथियार पैकेज को लेकर लंबी बातचीत चली थी। इस बार सौदा बहुत बड़ा है। इसमें सिर्फ विमान ही नहीं, बल्कि मीटियोर बीवीआर मिसाइल, स्कैल्प क्रूज मिसाइल, मेंटेनेंस पैकेज, ट्रेनिंग, स्पेयर पार्ट्स और लॉन्ग-टर्म सपोर्ट भी शामिल होंगे। हर चीज की अलग-अलग कीमत तय होती है। इसके अलावा रुपये और यूरो के बीच विनिमय दर में उतार-चढ़ाव भी अंतिम लागत को प्रभावित कर सकता है। इसलिए कॉन्ट्रैक्ट नेगोशिएशन कमेटी को हर बिंदु पर विस्तार से चर्चा करनी होगी। (114 Rafale deal)

सूत्रों के मुताबिक यह सौदा सरकार-से-सरकार यानी गवर्नमेंट-टू-गवर्नमेंट मॉडल पर होगा। प्रस्ताव के मुताबिक 114 में से लगभग 18 विमान सीधे फ्रांस से तैयार हालत में आएंगे, जबकि बाकी 96 विमान भारत में बनाए या असेंबल किए जाएंगे। यही “मेक इन इंडिया” वाला हिस्सा है, जो इस डील को और जटिल बनाता है। भारत में निर्माण के दौरान कम से कम 50 से 60 फीसदी स्वदेशी सामग्री का लक्ष्य रखा गया है। यही हिस्सा बातचीत को लंबा कर सकता है। (114 Rafale deal)

टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और ‘मेक इन इंडिया’ की शर्तें

इस डील का बड़ा हिस्सा ‘मेक इन इंडिया’ से जुड़ा है। भारत चाहता है कि ज्यादा से ज्यादा काम देश में हो। इसके लिए प्रोडक्शन लाइन लगानी होगी, इंजन और एवियोनिक्स सिस्टम के कुछ हिस्सों का स्थानीय निर्माण तय करना होगा, और भारतीय कंपनियों की भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी।

दसॉ एविएशन टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स के साथ साझेदारी कर रही है। लेकिन बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू करने से पहले फैक्ट्री, उपकरण, गुणवत्ता जांच और ट्रेनिंग जैसी कई तैयारियां करनी होंगी। इन सब पर लंब समझौता करना पड़ता है, जिसमें समय लगता है। (114 Rafale deal)

बजट और वैश्विक हालात का असर

इतने बड़े सौदे के लिए बजट का प्रबंधन भी अहम है। डिफेंस कैपिटल बजेट सीमित होता है और कई बड़े प्रोजेक्ट एक साथ चल रहे हैं। इसके अलावा डॉलर और यूरो के मुकाबले रुपये की कीमत में उतार-चढ़ाव भी कुल लागत को प्रभावित करता है।

ग्लोबल सप्लाई चेन की स्थिति, यूरोप में उत्पादन क्षमता और अन्य अंतरराष्ट्रीय ऑर्डर भी डिलीवरी शेड्यूल को प्रभावित कर सकते हैं। (114 Rafale deal)

वायुसेना के लिए क्यों जरूरी है यह डील?

एक और महत्वपूर्ण पहलू है भारतीय वायुसेना की मौजूदा स्थिति। स्वीकृत 42.5 स्क्वाड्रन की तुलना में अभी वायुसेना के पास लगभग 30 स्क्वाड्रन ही हैं। पुराने मिग-21 और अन्य विमान चरणबद्ध तरीके से बाहर हो रहे हैं। ऐसे में नए लड़ाकू विमानों की जरूरत तुरंत है। फिर भी प्रक्रिया को छोटा नहीं किया जा सकता, क्योंकि इतना बड़ा सौदा पारदर्शिता और नियमों के तहत ही आगे बढ़ता है। भारत की रक्षा खरीद प्रक्रिया “डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर” यानी डीएपी के तहत चलती है, जिसमें हर फेज का स्पष्ट स्ट्रक्चर होता है। (114 Rafale deal)

राफेल एक 4.5 पीढ़ी का ओम्नी रोल फाइटर है। यह हवा से हवा, हवा से जमीन, लंबी दूरी की स्ट्राइक और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध जैसे कई मिशन कर सकता है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान इसकी भूमिका को लेकर वायुसेना के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी सकारात्मक टिप्पणी की थी। (114 Rafale deal)

डिलीवरी कब शुरू हो सकती है?

सूत्रों का मानना है कि अगर बातचीत तेजी से चली तो 2026 के अंत तक बिजनेस निगोशिएशन्स पूरी हो सकती है और 2027 की शुरुआत में समझौते पर हस्ताक्षर संभव हैं। वहीं, आमतौर पर ऐसे सौदों में कॉन्ट्रैक्ट साइन होने के 3 से 4 साल बाद पहली डिलीवरी शुरू होती है। अगर 2027 में समझौता साइन होता है तो शुरुआती विमान 2030 के आसपास मिल सकते हैं। भारत में बनने वाले विमानों की पूरी डिलीवरी में 8 से 10 साल भी लग सकते हैं। (114 Rafale deal)

क्या देरी असामान्य है?

बड़े रक्षा सौदों में लंबी प्रक्रिया सामान्य बात है। पहले एमएमआरसीए टेंडर (2007) से लेकर 36 राफेल डील (2016) तक की कहानी भी लंबी रही थी। इस बार सरकार सरकार के बीच समझौता होने की संभावना है, जिससे प्रक्रिया कुछ तेज हो सकती है, लेकिन फिर भी एक साल का समय लगना असामान्य नहीं है। (114 Rafale deal)

HAL Dornier 228 Deal: 2,312 करोड़ में कोस्ट गार्ड को मिलेंगे 8 नए डॉर्नियर विमान, रक्षा मंत्रालय और एचएएल के बीच हुई डील

HAL Dornier 228 Deal

HAL Dornier 228 Deal: रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक और बड़ा कदम उठाते हुए रक्षा मंत्रालय ने हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) के साथ 2,312 करोड़ रुपये का महत्वपूर्ण कॉन्ट्रैक्ट साइन किया है। इस समझौते के तहत भारतीय तटरक्षक बल यानी इंडियन कोस्ट गार्ड के लिए आठ डॉर्नियर 228 विमान खरीदे जाएंगे। यह खरीद “बाय (इंडियन)” कैटेगरी के तहत की गई है, यानी ये विमान पूरी तरह भारत में बनाए जाएंगे।

ये सभी विमान एचएएल की ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट डिविजन, कानपुर में तैयार होंगे। डॉर्नियर 228 कोई नया विमान नहीं है। यह पिछले कई दशकों से भारतीय नौसेना, वायुसेना और तटरक्षक बल में इस्तेमाल हो रहा है। अब जो नए विमान मिलेंगे, वे पहले से ज्यादा आधुनिक और अपग्रेड उपकरणों से लैस होंगे। (HAL Dornier 228 Deal)

HAL Dornier 228 Deal

यह कॉन्ट्रैक्ट 12 फरवरी को नई दिल्ली में रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह की मौजूदगी में साइन किया गया। इन विमानों के साथ ऑपरेशनल रोल इक्विपमेंट भी मिलेगा। इसमें समुद्री निगरानी रडार, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इंफ्रा-रेड यानी ईओ/आईआर सिस्टम, कम्युनिकेशन सिस्टम और अन्य जरूरी सेंसर शामिल होंगे। ईओ/आईआर सिस्टम की मदद से दिन और रात दोनों समय समुद्र में गतिविधियों पर नजर रखी जा सकेगी। धुंध, खराब मौसम या अंधेरे में भी यह सिस्टम गर्मी के आधार पर नाव, जहाज या संदिग्ध गतिविधि को पहचान सकता है। (HAL Dornier 228 Deal)

डॉर्नियर 228 एक ट्विन-टर्बोप्रॉप विमान है। यह हल्का लेकिन मजबूत विमान है, जो समुद्री निगरानी, खोज और बचाव अभियान, प्रदूषण निगरानी, तस्करी रोकने और अवैध मछली पकड़ने जैसी गतिविधियों पर नजर रखने में मदद करता है। इसकी फ्लाइग रेंज 1,000 किलोमीटर से ज्यादा है और यह कई घंटों तक लगातार उड़ान भर सकता है। भारतीय तटरक्षक बल के लिए यह बहुत उपयोगी प्लेटफॉर्म माना जाता है।

भारत का एक्सक्लूसिव इकोनोमिक जोन यानी ईईजेड करीब 20 लाख वर्ग किलोमीटर से ज्यादा है। इतने बड़े समुद्री क्षेत्र की निगरानी आसान काम नहीं है। इन नए विमानों के जुड़ने से तटरक्षक बल की हवाई निगरानी क्षमता और मजबूत होगी। समुद्री डकैती, तस्करी, घुसपैठ या किसी जहाज से आई मदद पर तेजी से रेस्पॉन्स देना आसान होगा। (HAL Dornier 228 Deal)

इस कॉन्ट्रैक्ट का एक बड़ा फायदा यह भी है कि इससे देश में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। एचएएल की प्रोडक्शन सिस्टम मजबूत होगी और उसके साथ काम करने वाली छोटी और मध्यम उद्योग इकाइयों यानी एमएसएमई को भी काम मिलेगा। इसके अलावा मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल यानी एमआरओ के क्षेत्र में भी लंबे समय तक काम के अवसर बनेंगे।

यह सौदा आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया पहल को मजबूत करता है। सरकार का लक्ष्य है कि रक्षा क्षेत्र में विदेशी निर्भरता कम की जाए और ज्यादा से ज्यादा उपकरण देश में ही बनाए जाएं। डॉर्नियर 228 कार्यक्रम इसी दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।

इससे पहले आज डीएसी की बैठक में तटरक्षक बल के डॉर्नियर विमानों के लिए ईओ/आईआर सिस्टम खरीदने की जरूरत को भी मंजूरी दी गई है। इससे मौजूदा विमानों की क्षमता भी बढ़ाई जाएगी। (HAL Dornier 228 Deal)