Vande Mataram 150 Years: भारत के राष्ट्रगीत “वंदे मातरम” के 150 साल पूरे होने के अवसर पर भारतीय सेना देशभर में विशेष मिलिट्री बैंड कार्यक्रम आयोजित करने जा रही है। यह आयोजन राष्ट्रव्यापी समारोहों के दूसरे चरण का हिस्सा है, जिसमें सेना 19 जनवरी से 26 जनवरी तक देश के प्रमुख सार्वजनिक स्थलों पर गरिमामय बैंड परफॉर्मेंस प्रस्तुत करेगी। इस पहल का उद्देश्य वंदे मातरम के ऐतिहासिक और भावनात्मक महत्व को सम्मान देना और आम नागरिकों के बीच देशभक्ति और एकता की भावना को मजबूत करना है।
सेना के मुताबिक, इन कार्यक्रमों के जरिए स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े उस गीत को नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाएगा, जिसने देश की आजादी की लड़ाई में लोगों को एकजुट किया था। वंदे मातरम की रचना 1875 में बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी और यह गीत लंबे समय तक आजादी के आंदोलन की पहचान बना रहा। संविधान सभा ने 1950 में इसे राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया था। (Vande Mataram 150 Years)
Vande Mataram 150 Years: 18 शहरों में परफॉरमेंस
दूसरे चरण के इस आयोजन के तहत सेना के विभिन्न कमांड्स के मिलिट्री बैंड बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, तेलंगाना, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, पश्चिम बंगाल, लद्दाख और राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली सहित कई राज्यों और केंद्र शासित क्षेत्रों में प्रस्तुति देंगे। पटना, गया, रांची, लखनऊ, प्रयागराज, देहरादून, रायपुर, गोपालपुर, बेंगलुरु, जबलपुर, मुंबई, पुणे, हैदराबाद, जयपुर और शिमला जैसे शहरों के साथ कारगिल और नईहाटी जैसे ऐतिहासिक महत्व वाले स्थान भी इस कार्यक्रम का हिस्सा होंगे। (Vande Mataram 150 Years)
नई दिल्ली स्थित इंडिया गेट पर 18 जनवरी को सेना के आर्मी सिम्फनी बैंड द्वारा एक विशेष प्रस्तुति निर्धारित की गई है। यह कार्यक्रम वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में होने वाले आयोजनों का प्रमुख आकर्षण माना जा रहा है। इसके बाद 19 से 26 जनवरी तक अलग-अलग स्थानों पर नियमित बैंड परफॉर्मेंस होंगी।
सेना के अधिकारियों के अनुसार, हर बैंड परफॉर्मेंस की अवधि लगभग 45 मिनट होगी और ये कार्यक्रम दोपहर 2 बजे से शाम 5 बजे के बीच आयोजित किए जाएंगे, ताकि आम लोग बड़ी संख्या में इसमें शामिल हो सकें। इन प्रस्तुतियों में वंदे मातरम के साथ अन्य देशभक्ति धुनें भी बजाई जाएंगी, जिन्हें सेना के अनुभवी म्यूजिशियन प्रस्तुत करेंगे। (Vande Mataram 150 Years)
यह आयोजन गणतंत्र दिवस सप्ताह के दौरान रखा गया है, जिससे इसका राष्ट्रीय महत्व और भी बढ़ जाता है। सेना का मानना है कि इस तरह के खुले सार्वजनिक कार्यक्रम न केवल सांस्कृतिक विरासत को सम्मान देते हैं, बल्कि सशस्त्र बलों और नागरिकों के बीच भावनात्मक जुड़ाव को भी मजबूत करते हैं। वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने पर यह पहल देशभर में एक साझा राष्ट्रीय भावना को जीवंत रूप देने का प्रयास है। (Vande Mataram 150 Years)
Indian Navy Training Deployment: भारतीय नौसेना की पहली ट्रेनिंग स्क्वाड्रन (1TS) दक्षिण-पूर्व एशिया के लिए लॉन्ग रेंज ट्रेनिंग डिप्लॉयमेंट पर रवाना हो रही है। यह डिप्लॉयमेंट 110वें इंटीग्रेटेड ऑफिसर्स ट्रेनिंग कोर्स (IOTC) का अहम हिस्सा है, जिसका उद्देश्य नौसेना के ऑफिसर ट्रेनीज को समुद्र में वास्तविक परिस्थितियों का व्यावहारिक अनुभव देना है। इस अभियान में भारतीय नौसेना के तीन जहाज और भारतीय तटरक्षक बल का एक जहाज शामिल हैं।
इस लॉन्ग रेंज ट्रेनिंग डिप्लॉयमेंट में आईएनएस तीर, आईएनएस शार्दुल, आईएनएस सुजाता और भारतीय तटरक्षक बल का आईसीजीएस सारथी शामिल हैं। ये सभी जहाज मिलकर ऑफिसर्स ट्रेनीज को मैरीटाइम नेविगेशन, ऑपरेशनल प्लानिंग, लॉजिस्टिक्स और इंटरनेशनल मैरीटाइम कोआपरेशन से जुड़ा अनुभव प्रदान करेंगे। यह यात्रा केवल ट्रेनिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य भारत और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के बीच समुद्री संबंधों को और मजबूत करना भी है।
Indian Navy Training Deployment: सिंगापुर, इंडोनेशिया और थाईलैंड में पोर्ट कॉल
स्क्वाड्रन की इस यात्रा के दौरान सिंगापुर, इंडोनेशिया और थाईलैंड में पोर्ट कॉल किए जाएंगे। इन देशों के बंदरगाहों पर रुकने के दौरान मेजबान नौसेनाओं और समुद्री एजेंसियों के साथ प्रोफेशनल बातचीत, ट्रेनिंग इंगेजमेंट और सहयोगी गतिविधियां आयोजित की जाएंगी। इन कार्यक्रमों के जरिए दोनों पक्षों के बीच आपसी समझ, भरोसा और समुद्र में साथ काम करने की क्षमता को बढ़ाया जाएगा।
पोर्ट विजिट्स के दौरान ऑफिसर्स ट्रेनीज स्ट्रक्चर्ड ट्रेनिंग एक्सचेंज में हिस्सा लेंगे, जहां नेविगेशन, कम्युनिकेशन, सेफ्टी प्रोसीजर्स और ऑपरेशनल बेस्ट प्रैक्टिसेज पर अनुभव साझा किया जाएगा। इसके साथ ही क्रॉस-डेक विजिट्स के माध्यम से ट्रेनीज को अन्य देशों के जहाजों की कार्यप्रणाली को नजदीक से देखने और समझने का अवसर मिलेगा। विषय विशेषज्ञों के साथ संवाद के जरिए समुद्री सुरक्षा, सर्च एंड रेस्क्यू और मानवीय सहायता जैसे मुद्दों पर भी चर्चा की जाएगी।
इस लॉन्ग रेंज ट्रेनिंग डिप्लॉयमेंट का एक अहम पहलू जॉइंट मैरीटाइम पार्टनरशिप एक्सरसाइज हैं। इन अभ्यासों के जरिए समुद्र में सामूहिक संचालन, तालमेल और इंटरऑपरेबिलिटीको बेहतर बनाने पर जोर दिया जाएगा। ऐसे अभ्यास भविष्य में किसी भी साझा समुद्री चुनौती से निपटने में उपयोगी साबित होते हैं।
110वें इंटीग्रेटेड ऑफिसर्स ट्रेनिंग कोर्स में इस बार छह अंतरराष्ट्रीय ऑफिसर ट्रेनीज भी शामिल हैं। यह भारत की उस नीति को दर्शाता है, जिसके तहत मित्र देशों के मिलिट्री पर्सनल को ट्रेनिंग देकर उनकी क्षमता बढ़ाने में सहयोग किया जाता है। इंटरनेशनल ट्रेनीज की मौजूदगी से इस डिप्लॉयमेंट को मल्टीनेशनल डाइमेंशन्स भी मिलता है और ट्रेनीज को अलग-अलग संस्कृतियों और कार्यशैलियों को समझने का अवसर मिलता है।
इस यात्रा में भारतीय सेना और भारतीय वायु सेना के कुछ कर्मियों को भी जहाजों पर तैनात किया गया है। इससे तीनों सेनाओं के बीच जॉइंटनेस और आपसी कॉर्डिनेशन को बढ़ावा मिलेगा। समुद्री अभियानों में थल और वायु की भूमिका को समझना आधुनिक सैन्य प्रशिक्षण का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
यह लॉन्ग रेंज ट्रेनिंग डिप्लॉयमेंट भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी का हिस्सा है, जिसके तहत दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों के साथ रणनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा सहयोग को मजबूत किया जा रहा है। समुद्री क्षेत्र में यह सहयोग एक मुक्त, खुले और समावेशी इंडियन ओशन रीजन की भारत की सोच को भी दर्शाता है।
भारतीय नौसेना के लिए इस तरह की ट्रेनिंग डिप्लॉयमेंट नई नहीं है, लेकिन हर बार इसका स्वरूप और दायरा और अधिक व्यापक होता जा रहा है। ऑफिसर ट्रनीज के लिए यह यात्रा समुद्र में लंबे समय तक ऑपरेशन, बदलते मौसम, अंतरराष्ट्रीय नियमों और विदेशी नौसेनाओं के साथ कॉर्डिनेशन जैसे पहलुओं को समझने का अवसर देती है।
IAF AWACS RFI: भारतीय वायुसेना ने अपनी हवाई निगरानी और एयरस्पेस मैनेजमेंट क्षमता को मजबूत करने के लिए छह एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल यानी अवॉक्स विमानों की खरीद के लिए रिक्वेस्ट फॉर इन्फॉर्मेशन (RFI) जारी की है। इस प्रस्ताव के तहत केवल विमान ही नहीं, बल्कि उनसे जुड़े ग्राउंड सेगमेंट इक्विपमेंट और जरूरी सुविधाओं को भी शामिल किया गया है।
यह कदम ऐसे समय पर उठाया गया है, जब वायुसेना को उत्तर और पश्चिमी सीमाओं पर लगातार बढ़ती चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। मॉडर्न वॉरफेयर में हवा में दूर से निगरानी रखने वाले प्लेटफॉर्म की भूमिका काफी अहम मानी जाती है, क्योंकि इन्हीं के जरिए दुश्मन के विमानों, ड्रोन और मिसाइल गतिविधियों पर नजर रखी जाती है। (IAF AWACS RFI)
IAF AWACS RFI: चाहिए 10 घंटे की एंड्योरेंस क्षमता
आरएफआई में वायुसेना ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि इस प्रोजेक्ट के लिए कौन सा विमान प्लेटफॉर्म चुना जाएगा, लेकिन तकनीकी जरूरतों को काफी स्पष्ट तरीके से बताया गया है। आरएफआई के मुताबिक, चुने जाने वाले विमान में कम से कम 10 घंटे की एंड्योरेंस होनी चाहिए या फिर उसमें मिड-एयर रिफ्यूलिंग की क्षमता होनी जरूरी है। इसके अलावा विमान की सर्विस सीलिंग 45,000 फीट तक होनी चाहिए। (IAF AWACS RFI)
वायुसेना ने यह भी शर्त रखी है कि अवॉक्स विमान ऐसे एयरफील्ड से भी ऑपरेट करने में सक्षम हों, जो करीब 10,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित हों। यह जरूरत खास तौर पर भारत के हई एल्टीट्यूड इलाकों को ध्यान में रखते हुए रखी गई है, जहां से ऑपरेशन करना मुश्किल होता है। (IAF AWACS RFI)
मिशन सिस्टम की बात करें तो आरएफआई में एक एडवांस मिशन सूट की मांग की गई है। इसमें 360 डिग्री स्कैन करने की क्षमता होनी चाहिए, ताकि छोटे और धीमी गति से उड़ने वाले टारगेट्स से लेकर हाई-स्पीड और हाइपरसोनिक व्हीकल्स तक की पहचान की जा सके। इसके साथ ही सैटेलाइट बेस्ड नेविगेशन और कम्युनिकेशन सिस्टम, सुरक्षित डेटा लिंक और सेल्फ-प्रोटेक्शन मेजर्स भी जरूरी बताए गए हैं। (IAF AWACS RFI)
फिलहाल भारतीय वायुसेना के पास कुल पांच ऑपरेशनल AWACS/AEW&C प्लेटफॉर्म हैं। इनमें तीन बेरिएव ए-50 शामिल हैं, जो रूसी आईएल-76 एयरफ्रेम पर बने हैं और जिनमें इजरायली सेंसर लगे हैं। ये विमान करीब दो दशक पहले वायुसेना में शामिल किए गए थे। इसके अलावा वायुसेना के पास दो नेत्रा AEW&C विमान भी हैं। नेत्रा सिस्टम का तीसरा विमान अभी डीआरडीओ के सेंटर फॉर एयरबोर्न सिस्टम्स के पास है। (IAF AWACS RFI)
डीआरडीओ इस समय नेत्रा सिस्टम के और एडवांस वर्जन पर भी काम कर रहा है। नए मिशन सूट में करीब 15 एयरबोर्न सब-सिस्टम और कई ग्राउंड-बेस्ड एलिमेंट्स शामिल किए जाने की योजना है। इसका उद्देश्य वायुसेना की निगरानी क्षमता को और ज्यादा मजबूत बनाना है।
पिछले महीने डीआरडीओ ने अपने आईएसटीएआर (इंटेलिजेंस, सर्विलांस, टारगेट एक्विजिशन एंड रिकॉनिसेंस) प्रोग्राम के लिए कनाडा के बॉम्बार्डियर ग्लोबल 6500 ट्विन-इंजन बिजनेस जेट को प्लेटफॉर्म के रूप में चुना था। हालांकि यह प्रोग्राम अवॉक्स से अलग है, लेकिन इससे यह संकेत मिलता है कि भविष्य में बिजनेस जेट आधारित प्लेटफॉर्म्स पर भी ज्यादा भरोसा किया जा सकता है। (IAF AWACS RFI)
भारतीय वायुसेना की मौजूदा जरूरतों को देखते हुए उसे कुल 12 AEW&C/AWACS विमानों की जरूरत है। संसद की रक्षा संबंधी स्थायी समिति की एक रिपोर्ट में भी यह बात सामने आई थी कि वायुसेना ने छह-छह विमानों के दो अलग-अलग प्रोग्राम शुरू किए हैं, इसके अलावा एक स्पेशल रोल एयरक्राफ्ट का प्रस्ताव भी है। (IAF AWACS RFI)
अगर चीन और पाकिस्तान से तुलना की जाए तो वायुसेना का मौजूदा अवॉक्स बेड़ा पड़ोसी देशों के मुकाबले छोटा माना जाता है। चीन के पास इस समय करीब 20 शानक्सी केजे-500, चार केजे-200 और चार केजे-2000 अवॉक्स प्लेटफॉर्म हैं। वहीं पाकिस्तान के पास चार चीनी जेडडीके-03 कराकोरम ईगल और आठ स्वीडिश साब 2000 एराई प्लेटफॉर्म हैं। इनमें से एक विमान को लेकर यह दावा भी किया गया था कि उसे हालिया ऑपरेशन सिंदूर के दौरान नुकसान पहुंचा था। (IAF AWACS RFI)
वायुसेना के अधिकारियों का कहना है कि अवॉक्स केवल एक रडार विमान नहीं होता, बल्कि यह एक “सिस्टम ऑफ सिस्टम्स” होता है। इसमें रडार, आइडेंटिफिकेशन फ्रेंड या फो (आईएफएफ), इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस, कमांड एंड कंट्रोल और बैटल मैनेजमेंट जैसी क्षमताएं एक साथ काम करती हैं। इससे एयर डिफेंस, फाइटर कंट्रोल और संयुक्त अभियानों में काफी मदद मिलती है। (IAF AWACS RFI)
आरएफई जारी होने के बाद अब देशी और विदेशी एयरोस्पेस कंपनियों से जवाब मिलने की प्रक्रिया शुरू होगी। इसके आधार पर आगे का एक्विजिशन प्रोसेस तय किया जाएगा। (IAF AWACS RFI)
India joint CUAS grid: ड्रोन हमलों के बढ़ते खतरे को देखते हुए भारत अपनी सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत करने में जुट गया है। केंद्र सरकार जहां मिशन सुदर्शन चक्र के तहत एक व्यापक एयर डिफेंस शील्ड तैयार कर रही है, वहीं भारतीय सेनाएं अब एक अलग और खास जॉइंट काउंटर अनमैन्ड एरियल सिस्टम (CUAS) ग्रिड डेवलप करने की दिशा में काम कर रहे हैं। इस ग्रिड का उद्देश्य दुश्मन या संदिग्ध ड्रोनों की पहचान, निगरानी और उन्हें नाकाम करना है, ताकि देश के मिलिट्री और सिविल इंस्टालेशंस को किसी भी तरह के ड्रोन हमले से बचाया जा सके।
सूत्रों के मुताबिक, यह जॉइंट सीयूएएस ग्रिड मौजूदा एयर डिफेंस नेटवर्क से अलग होगा। इसका कारण यह है कि छोटे ड्रोन और अनमैन्ड एरियल सिस्टम्स की संख्या तेजी से बढ़ रही है और अगर इनकी निगरानी की जिम्मेदारी मौजूदा सिस्टम्स पर डाल दी जाए, तो वे जरूरत से ज्यादा बोझिल हो सकते हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए तीनों सेनाओं के सीयूएएस सिस्टम्स को जोड़कर एक अलग नेटवर्क खड़ा किया जा रहा है। (India joint CUAS grid)
India joint CUAS grid: IACCS से अलग होगा नया सीयूएएस नेटवर्क
भारतीय वायु सेना का इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम (IACCS) पहले से ही विमानों, मिसाइलों और बड़े एरियल खतरों की निगरानी करता है। लेकिन छोटे ड्रोन, लो-एल्टीट्यूड फ्लाइंग यूएवी और कम लागत वाले अनमैन्ड सिस्टम्स के लिए एक अलग सिस्टम होना चाहिए। इसी वजह से नया सीयूएएस ग्रिड IACCS से अलग रखा जाएगा, ताकि दोनों सिस्टम अपने-अपने उद्देश्य पर पूरी तरह फोकस कर सकें।
यह जॉइंट सीयूएएस ग्रिड जॉइंट एयर डिफेंस सेंटर्स (JADC) के साथ जोड़ा जाएगा, जहां थल सेना, वायु सेना और नौसेना तीनों के अधिकारी मिलकर ड्रोन मूवमेंट पर नजर रखेंगे। इसका इस्तेमाल दुश्मन ड्रोन के साथ-साथ किसी भी तरह के रॉग या अनऑथराइज्ड ड्रोन की पहचान के लिए किया जाएगा। (India joint CUAS grid)
पिछले 10 साल में खरीदे गए सिस्टम होंगे एक नेटवर्क में
पिछले पांच से दस सालों में तीनों सेनाओं ने बड़ी संख्या में काउंटर-ड्रोन और एयर डिफेंस सिस्टम खरीदे हैं। इनमें अलग-अलग रेंज के रडार, जैमर, एयर डिफेंस गन और अन्य काउंटर यूएएस तकनीक शामिल हैं। नए सीयूएएस ग्रिड में इन सभी सिस्टम्स को नेटवर्क के जरिए जोड़ा जाएगा, ताकि ड्रोन से जुड़ी हर जानकारी एक ही प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध हो सके।
इससे रियल टाइम मॉनिटरिंग संभव होगी और किसी भी संदिग्ध ड्रोन को समय रहते ट्रैक कर उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकेगी। अधिकारियों का कहना है कि यह ग्रिड ड्रोन खतरे से निपटने के लिए एक डेडिकेटेड स्ट्रक्चर देगा, जिससे रेस्पॉन्स टाइम कम होगा और कॉर्डिनेशन बेहतर बनेगा। (India joint CUAS grid)
ऑपरेशन सिंदूर से मिली अहम सीख
ड्रोन खतरे की गंभीरता ऑपरेशन सिंदूर के दौरान साफ तौर पर सामने आई थी। इस ऑपरेशन के दौरान पाकिस्तान की ओर से तुर्की और चीनी मूल के ड्रोनों का इस्तेमाल कर भारतीय सैन्य और नागरिक ठिकानों को निशाना बनाने की कोशिश की गई थी। हालांकि, तीनों सेनाओं की सतर्कता और खासकर आर्मी एयर डिफेंस की तत्परता के चलते इन हमलों को नाकाम कर दिया गया।
इस दौरान भारतीय सेना की एल-70 और जेडयू-23 एयर डिफेंस गनों ने बड़ी संख्या में छोटे ड्रोन को मार गिराया। सूत्रों के अनुसार, इन गनों ने कम ऊंचाई पर उड़ रहे ड्रोन के खिलाफ बेहद शानदार प्रदर्शन किया। इसी अनुभव के आधार पर ड्रोन रोधी क्षमता को और मजबूत करने का फैसला लिया गया। (India joint CUAS grid)
आबादी वाले इलाकों में भी तैनात होंगी एयर डिफेंस गन
ड्रोन खतरे को देखते हुए भारतीय सेना अब आबादी वाले इलाकों में भी एयर डिफेंस गन तैनात करने पर काम कर रही है। इसका मकसद यह है कि अगर किसी शहर, महत्वपूर्ण इंस्टॉलेशन या रणनीतिक इलाके की ओर ड्रोन आता है, तो उसे वहीं रोका जा सके। छोटे ड्रोन अक्सर कम ऊंचाई पर उड़ते हैं और इन्हें पकड़ना मुश्किल होता है, इसलिए गन आधारित एयर डिफेंस सिस्टम को एक प्रभावी उपाय माना जा रहा है।
सेना से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि इस तरह की तैनाती से न सिर्फ सैन्य ठिकानों, बल्कि नागरिक इलाकों को भी अतिरिक्त सुरक्षा मिलेगी। ड्रोन के जरिए निगरानी, हमला या तस्करी जैसी गतिविधियों को रोकने में यह व्यवस्था अहम साबित हो सकती है। (India joint CUAS grid)
मिशन सुदर्शन चक्र के तहत व्यापक सुरक्षा कवच
जॉइंट सीयूएएस ग्रिड के साथ-साथ सरकार हाई लेवल पर मिशन सुदर्शन चक्र पर भी काम कर रही है। इस मिशन का उद्देश्य देश के लिए एक ऐसा एयर डिफेंस शील्ड तैयार करना है, जो हर तरह के एरियल खतरे से निपटने में सक्षम हो। इसके लिए पहले ही एक समिति बनाई जा चुकी है, जो विभिन्न पहलुओं पर काम कर रही है।
मिशन सुदर्शन चक्र के तहत मिसाइल, फाइटर एयरक्राफ्ट, ड्रोन और अन्य हवाई खतरों से सुरक्षा के लिए एक मल्टी-लेयर सिस्टम तैयार किया जा रहा है। इसमें सेंसर, रडार, कमांड एंड कंट्रोल और इंटरसेप्टर सिस्टम्स को इंटीग्रेट करने पर जोर दिया जा रहा है। (India joint CUAS grid)
तीनों सेनाओं में तालमेल बढ़ाने की जिम्मेदारी सीडीएस के पास
तीनों सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल और संयुक्त क्षमता विकसित करने की जिम्मेदारी चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ यानी सीडीएस के पास है। सीडीएस का मुख्य काम थल सेना, वायु सेना और नौसेना के बीच एकीकरण को बढ़ाना और संयुक्त ऑपरेशन्स को मजबूत करना है। जॉइंट सीयूएएस ग्रिड इसी दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।
अधिकारियों का कहना है कि ड्रोन जैसे नए खतरों से निपटने के लिए अलग-अलग नहीं, बल्कि संयुक्त रूप से काम करना जरूरी है। सीयूएएस ग्रिड तीनों सेनाओं की क्षमताओं को एक प्लेटफॉर्म पर लाकर इस जरूरत को पूरा करेगा। (India joint CUAS grid)
Zorawar Light Tank Delay: भारतीय सेना के लिए तैयार किया जा रहा स्वदेशी लाइट टैंक जोरावर एक बार फिर तय समय पर सेना को नहीं मिल पाएगा। यूजर ट्रायल्स के लिए दो प्रोटोटाइप टैंकों की डिलीवरी की समय-सीमा आगे बढ़ा दी गई है। पहले इन्हें 2025 की शुरुआत में सौंपे जाने की बात कही गई थी, फिर इसे सर्दियों तक टाला गया और अब नई जानकारी के मुताबिक यह डिलीवरी 2026 की गर्मियों में होने की उम्मीद जताई जा रही है।
Zorawar Light Tank Delay: इसलिए बढ़ी डिलीवरी की समयसीमा
सूत्रों के मुताबिक, जोरावर प्रोजेक्ट में कोई बड़ी तकनीकी दिक्कत नहीं है, बल्कि ट्रायल्स के दौरान सामने आए सुधारों और सिस्टम फाइन-ट्यूनिंग की वजह से समय-सीमा बदली गई है। डीआरडीओ का कहना है कि प्रोजेक्ट सही दिशा में आगे बढ़ रहा है और टैंक का फुल इंडक्शन 2027 तक शुरू कर दिया जाएगा। (Zorawar Light Tank Delay)
बताया जा रहा है कि जोरावर का एक प्रोटोटाइप पूरी तरह तैयार है, जबकि दूसरा प्रोटोटाइप निर्माण के अंतिम चरण में है। पहले से तैयार प्रोटोटाइप पर डेवलपमेंटल ट्रायल्स पूरे किए जा चुके हैं। इनमें रेगिस्तान, ऊंचाई वाले इलाके और ठंडे मौसम में टैंक की क्षमता को परखा गया।
सितंबर 2024 में राजस्थान के महाजन फील्ड फायरिंग रेंज में जोरावर के डेजर्ट ट्रायल्स किए गए थे। इसके बाद दिसंबर 2024 में लद्दाख के न्योमा इलाके में हाई-एल्टीट्यूड ट्रायल्स हुए, जहां माइनस तापमान और कम ऑक्सीजन की स्थिति में टैंक की परफॉर्मेंस जांची गई। इन ट्रायल्स में टैंक की मोबिलिटी, इंजन परफॉर्मेंस और सस्पेंशन सिस्टम को खास तौर पर देखा गया। (Zorawar Light Tank Delay)
अक्टूबर 2025 में पोखरण में जोरावर पर नाग एमके-2 एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल का सफल फायरिंग टेस्ट भी किया गया। यह मिसाइल टॉप-अटैक मोड में टारगेट को भेदने में सफल रही। इसकी मारक क्षमता लगभग 4 से 10 किलोमीटर बताई गई है और यह फायर-एंड-फॉरगेट तकनीक पर आधारित है। (Zorawar Light Tank Delay)
यूजर ट्रायल्स को पहले सितंबर 2025 में शुरू करने की योजना थी, लेकिन अब इसे आगे बढ़ाकर 2026 कर दिया गया है। सेना को दो प्रोटोटाइप मिलने के बाद यूजर ट्रायल्स शुरू होंगे, जो करीब 12 से 18 महीने तक चल सकते हैं। इन ट्रायल्स के दौरान टैंक को गर्मी, सर्दी और ऊंचाई वाले इलाकों में अलग-अलग परिस्थितियों में परखा जाएगा। (Zorawar Light Tank Delay)
जोरावर लाइट टैंक को खास तौर पर हाई-एल्टीट्यूड इलाकों के लिए डिजाइन किया गया है। इसका वजन लगभग 25 टन है, जिससे इसे एयरलिफ्ट करना आसान होता है। भारतीय वायुसेना के सी-17 ग्लोबमास्टर विमान से एक साथ दो जोरावर टैंक ले जाए जा सकते हैं। यह क्षमता लद्दाख और अरुणाचल जैसे दूरदराज इलाकों में तेजी से तैनाती के लिए अहम मानी जाती है। (Zorawar Light Tank Delay)
टैंक में फिलहाल 760 हॉर्सपावर का कमिंस इंजन लगाया गया है, जिससे इसका पावर-टू-वेट रेशियो करीब 30 हॉर्सपावर प्रति टन बनता है। यह हाई-एल्टीट्यूड में बेहतर एक्सीलरेशन और मोबिलिटी के लिए जरूरी है। भविष्य में प्रोडक्शन मॉडल्स में ज्यादा ताकतवर इंजन लगाने की भी योजना है।
हथियारों की बात करें तो जोरावर में 105 एमएम की मुख्य गन लगाई गई है, जिसे बेल्जियम की जॉन कॉकरिल कंपनी के टर्रेट के साथ जोड़ा गया है। इसके अलावा इसमें रिमोट-कंट्रोल मशीन गन, एडवांस फायर कंट्रोल सिस्टम और आधुनिक साइटिंग सिस्टम भी शामिल हैं। (Zorawar Light Tank Delay)
सुरक्षा के लिहाज से टैंक में मॉड्यूलर आर्मर दिया गया है, जिसे जरूरत के हिसाब से बदला जा सकता है। लो-प्रोफाइल डिजाइन की वजह से यह दुश्मन की नजर से बचने में भी मदद करता है। आगे चलकर इसमें एक्टिव प्रोटेक्शन सिस्टम जोड़ने की भी तैयारी है।
जोरावर लाइट टैंक की जरूरत 2020 के पूर्वी लद्दाख में चीन के साथ हुए तनाव के बाद और ज्यादा महसूस की गई थी। उस दौरान यह सामने आया कि भारी टैंक जैसे टी-72 और टी-90, ऊंचाई वाले इलाकों में पूरी क्षमता से काम नहीं कर पाते और उन्हें वहां तक पहुंचाने में काफी दिक्कतों का भी सामना करना पड़ा। दूसरी ओर चीन के पास ऐसे इलाकों के लिए हल्के टैंक पहले से मौजूद हैं। (Zorawar Light Tank Delay)
इसी जरूरत को देखते हुए डीआरडीओ और लार्सन एंड टुब्रो यानी एलएंडटी ने मिलकर जोरावर प्रोजेक्ट शुरू किया। एलएंडटी को टैंक के प्रोडक्शन की जिम्मेदारी दी गई है। पहले बैच में भारतीय सेना के लिए 59 टैंक बनाए जाने हैं, जबकि कुल जरूरत 350 से ज्यादा टैंकों की बताई जा रही है। पूरे प्रोजेक्ट की लागत करीब 17,500 करोड़ रुपये आंकी गई है।
सूत्रों का कहना है कि डिलीवरी में हो रही देरी का मकसद टैंक को जल्दबाजी में सेना को सौंपना नहीं, बल्कि हर सिस्टम को पूरी तरह परखकर ही आगे बढ़ना है। यूजर ट्रायल्स के दौरान सेना की ओर से जो भी सुझाव मिलेंगे, उन्हें फाइनल डिजाइन में शामिल किया जाएगा। (Zorawar Light Tank Delay)
Indian Army Chief Gen Upendra Dwivedi Addresses UAE National Defence College
India UAE defence cooperation: भारतीय थल सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी का कहना है, “आज की जंग सिर्फ सीमा पर आमने-सामने की लड़ाई की नहीं रही, बल्कि यह टेक्नोलॉजी, सूचना, साइबर स्पेस और तुरंत फैसलों की जंग बन चुकी है।” 5-6 जनवरी तक संयुक्त अरब अमीरात दौरे पर पहुंचे जनरल उपेंद्र द्विवेदी का यह संबोधन ऐसे समय में हुआ है, जब दुनिया भर में सुरक्षा चुनौतियां तेजी से बदल रही हैं और आधुनिक युद्ध का स्वरूप पहले से कहीं ज्यादा मुश्किल हो चुका है।
संयुक्त अरब अमीरात के यूएई नेशनल डिफेंस कॉलेज में अधिकारियों को संबोधित करते हुए जनरल द्विवेदी ने कहा कि आज की लड़ाइयां सिर्फ सीमा पर आमने-सामने की टक्कर तक सीमित नहीं रह गई हैं। अब युद्ध में टेक्नोलॉजी, सूचना, साइबर स्पेस, ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर की भूमिका लगातार बढ़ रही है। ऐसे में सेनाओं को केवल हथियारों से नहीं, बल्कि सोच, ट्रेनिंग और सहयोग से भी मजबूत होना होगा। (India UAE defence cooperation)
Indian Army Chief Gen Upendra Dwivedi Addresses UAE National Defence College
थल सेना प्रमुख ने कहा कि मौजूदा वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य बेहद अनिश्चित हो गया है। कई क्षेत्रों में भू-राजनीतिक तनाव बढ़ रहे हैं, नए तरह के खतरे सामने आ रहे हैं और पारंपरिक वॉरफेयर के साथ-साथ हाइब्रिड वॉरफेयर का खतरा भी बढ़ गया है। उन्होंने अधिकारियों को यह समझाया कि आज का दुश्मन हमेशा वर्दी में सामने खड़ा नहीं होता, बल्कि कई बार वह साइबर अटैक, फेक इंफॉर्मेशन, ड्रोन या प्रॉक्सी ग्रुप्स के जरिए नुकसान पहुंचाने की कोशिश करता है। (India UAE defence cooperation)
India UAE defence cooperation: आधुनिक युद्ध में टेक्नोलॉजी की भूमिका
जनरल द्विवेदी ने आधुनिक युद्ध में टेक्नोलॉजी को “गेम चेंजर” बताया। उन्होंने कहा कि ड्रोन, सैटेलाइट इमेजरी, रियल-टाइम इंटेलिजेंस, डेटा एनालिटिक्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब सैन्य ऑपरेशंस का अहम हिस्सा बन चुके हैं। भविष्य की सेनाएं वही होंगी जो टेक्नोलॉजी को तेजी से अपनाने और उसे जमीनी हालात के मुताबिक इस्तेमाल करने में सक्षम होंगी।
उन्होंने यह भी कहा कि टेक्नोलॉजी सिर्फ हथियारों तक सीमित नहीं है, बल्कि लॉजिस्टिक्स, ट्रेनिंग, कमांड एंड कंट्रोल और निर्णय लेने की प्रक्रिया में भी इसका बड़ा रोल है। सही जानकारी सही समय पर मिलना आज की जंग में सबसे बड़ी ताकत बन चुका है। (India UAE defence cooperation)
Indian Army Chief Gen Upendra Dwivedi Addresses UAE National Defence College
वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका पर जोर
अपने संबोधन में थल सेना प्रमुखने वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों की नेतृत्व भूमिका पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि बदलते युद्ध के माहौल में लीडरशिप की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। एक अच्छा मिलिटरी लीडर वही होता है जो अपने जवानों को नई चुनौतियों के लिए तैयार करे, उनमें आत्मविश्वास पैदा करे और तकनीक व परंपरा के बीच संतुलन बनाए रखे।
#GeneralUpendraDwivedi, #COAS, today addressed officers of the UAE National Defence College (NDC). In his address, the #COAS highlighted the evolving global security landscape & the changing character of modern conflicts, underscoring the impetus to technology in modern warfare.… pic.twitter.com/0zRoWimX8u
उन्होंने कहा कि आज के अधिकारी को सिर्फ मैदान में नहीं, बल्कि रणनीतिक सोच, इंटर-एजेंसी कोऑर्डिनेशन और अंतरराष्ट्रीय सहयोग में भी दक्ष होना चाहिए। (India UAE defence cooperation)
भारत-यूएई रक्षा सहयोग की अहमियत
जनरल द्विवेदी ने भारत और यूएई के बीच बढ़ते रक्षा सहयोग को क्षेत्रीय स्थिरता के लिए बेहद महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि भारत और यूएई दोनों ही देश शांति, स्थिरता और नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में विश्वास रखते हैं। ऐसे में दोनों देशों के बीच मजबूत द्विपक्षीय और बहुपक्षीय रक्षा सहयोग न सिर्फ आपसी हितों को मजबूत करता है, बल्कि पूरे क्षेत्र में शांति और सुरक्षा को भी बढ़ावा देता है।
उन्होंने संयुक्त सैन्य अभ्यास, ट्रेनिंग एक्सचेंज, डिफेंस एजुकेशन और मिलिटरी डॉयलॉग जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की जरूरत पर भी बल दिया। उनका कहना था कि सहयोगी प्रयासों से सेनाएं एक-दूसरे के अनुभवों से सीख सकती हैं और भविष्य की चुनौतियों के लिए बेहतर तैयारी कर सकती हैं। (India UAE defence cooperation)
इससे पहले यूएई पहुंचने पर उन्हें यूएई लैंड फोर्सेस की ओर से गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया था। उन्होंने वहां के वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों से मुलाकात कर ट्रेनिंग, मिलिटरी स्ट्रक्चर और भविष्य के सहयोग पर चर्चा की। इसके अलावा उन्होंने यूएई लैंड फोर्सेस म्यूजियम का भी दौरा किया, जहां यूएई की सैन्य परंपराओं और इतिहास की जानकारी ली। (India UAE defence cooperation)
Indian Army Chief Gen Upendra Dwivedi Addresses UAE National Defence College
अब श्रीलंका जाएंगे थल सेना प्रमुख
यूएई दौरे के बाद थल सेना प्रमुख 7-8 जनवरी तक श्रीलंका की आधिकारिक यात्रा पर रहेंगे। जहां वे श्रीलंका की सीनियर मिलिट्री और सिविल लीडरशिप से मुलाकात करेंगे। बातचीत के दौरान ट्रेनिंग कॉपरेशन, क्षमता निर्माण और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर चर्चा होगी। अपने श्रीलंका दौरे के दौरान भारतीय थल सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी वहां के डिफेंस सर्विसेज कमांड एंड स्टाफ कॉलेज में अधिकारियों को संबोधित करेंगे। इस दौरान वे आधुनिक सैन्य चुनौतियों, प्रशिक्षण और नेतृत्व से जुड़े विषयों पर अपने विचार साझा करेंगे। इसके साथ ही जनरल द्विवेदी आर्मी वॉर कॉलेज बुट्टाला भी जाएंगे, जहां वे ट्रेनिंग ले रहे अधिकारियों और जवानों से सीधे संवाद करेंगे और उनके अनुभवों को जानेंगे। (India UAE defence cooperation)
इस दौरे का एक भावनात्मक और महत्वपूर्ण पहलू भी होगा। सेना प्रमुख श्रीलंका में आईपीकेएफ वॉर मेमोरियल पर जाकर इंडियन पीस कीपिंग फोर्स के शहीद जवानों को श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे। यह स्मारक उन भारतीय सैनिकों की कुर्बानी की याद दिलाता है, जिन्होंने श्रीलंका में शांति स्थापना के दौरान अपने प्राण न्योछावर किए थे।
भारत और श्रीलंका के बीच रक्षा प्रशिक्षण और सैन्य शिक्षा को लेकर सहयोग लंबे समय से चला आ रहा है। दोनों देशों के बीच यह साझेदारी केवल औपचारिक नहीं, बल्कि भरोसे और आपसी समझ पर आधारित है। श्रीलंका के कई कैडेट और अधिकारी भारत में नेशनल डिफेंस अकादमी, इंडियन मिलिट्री अकादमी और ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकादमी में प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं। खासतौर पर श्रीलंकाई सेना के कैडेट भारत में प्री-कमीशनिंग ट्रेनिंग लेकर अपने सैन्य करियर की मजबूत नींव रखते हैं।
यह लगातार जारी प्रशिक्षण सहयोग दोनों देशों की सेनाओं के बीच पेशेवर समझ, आपसी तालमेल और क्षेत्रीय सुरक्षा को मजबूत करने में अहम भूमिका निभा रहा है। (India UAE defence cooperation)
Pinaka Vs PULS: हाल ही में भारतीय सेना ने अपनी आर्टिलरी ताकत को यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम के लिए पुणे की डिफेंस कंपनी निबे डिफेंस एंड एयरोस्पेस लिमिटेड को करीब 292.69 करोड़ रुपये का इमरजेंसी ऑर्डर दिया है। यह ऑर्डर इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट के तहत दिया गया है, इसके तहत निबे कंपनी भारतीय सेना को एक ऐसा रॉकेट लॉन्चर प्लेटफॉर्म देगी, जिसमें अलग-अलग रेंज और कैलिबर के रॉकेट्स को एक ही सिस्टम से दागा जा सकेगा। हालांकि भारत के पास पहले से ही पिनाका मल्टी बैरल लॉन्चर सिस्टम है, लेकिन उसकी रेंज सीमित है, जबकि निबे से मिलने वाले यूनिवर्सल रॉकेट लांचर की रेंज 150 किलोमीटर और 300 किलोमीटर तक होगी। सवाल यह उठ रहा है कि क्या यूनिवर्सल रॉकेट लांचर सिस्टम पिनाका को रिप्लेस करेगा।
पुणे की प्राइवेट डिफेंस कंपनी निबे डिफेंस एंड एयरोस्पेस लिमिटेड यह मल्टी रॉकेट लॉन्चर सिस्टम इजरायल की दिग्गज रक्षा कंपनी एल्बिट सिस्टम्स के साथ साझेदारी कर भारत में बनएगी। यह सिस्टम इजरायल का प्रिसाइज एंड यूनिवर्सल लॉन्चिंग सिस्टम (पीयूएलएस) है। इस साझेदारी का मकसद इजरायली तकनीक को भारत में ही डेवलप करना है, ताकि भारतीय सेना को लंबी दूरी तक सटीक मार करने वाला आधुनिक रॉकेट सिस्टम मिल सके। अगर सेना इसे अपनाती है, तो यह भारत का पहला यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम होगा। (Pinaka Vs PULS)
Pinaka Vs PULS: निबे और एल्बिट का समझौता
निबे डिफेंस एंड एयरोस्पेस लिमिटेड ने जुलाई 2025 में नेशनल स्टॉक एक्सचेंज को दी गई जानकारी में बताया था कि उसने एल्बिट सिस्टम्स के साथ एक अहम समझौता किया है। इस समझौते के तहत पीयूएलएस (PULS) सिस्टम को भारत में बनाया जाएगा और जरूरत पड़ने पर इसे भारतीय सेना को सप्लाई किया जाएगा।
इस डील की सबसे खास बात यह है कि इसमें ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी (टीओटी) भी शामिल है। यानी सिर्फ असेंबली नहीं, बल्कि तकनीक भी भारत को मिलेगी। इससे मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत अभियान को बड़ा बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। साथ ही भारत को भविष्य में आर्टिलरी सिस्टम का निर्यातक देश बनाने की दिशा में यह एक मजबूत कदम माना जा रहा है। (Pinaka Vs PULS)
PULS
रखा जा सकता है “सूर्या” नाम
रक्षा सूत्रों के अनुसार, भारत में बनने वाले इस यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम को “सूर्या” नाम दिया जा सकता है। यह सिस्टम 300 किलोमीटर तक की दूरी पर मौजूद टारगेट को बेहद अचूक तरीके से निशाना बना सकता है।
निबे लिमिटेड ने पहले अपने बयान में कहा था कि यह यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चर मॉडर्न वॉरफेयर की तस्वीर बदल सकता है और इससे कंपनी ग्लोबल डिफेंस मार्केट में एक अहम खिलाड़ी बन सकती है।
इस कॉन्ट्रैक्ट के तहत निबे लिमिटेड भारतीय सेना को यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम, उससे जुड़े लॉन्चर, ग्राउंड इक्विपमेंट, एक्सेसरीज, एडवांस्ड प्रोजेक्टाइल्स और एम्युनिशन की सप्लाई करेगी। पूरी डिलीवरी 12 महीनों कई स्टेजेज में पूरी की जाएगी। (Pinaka Vs PULS)
क्या है यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम
यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम दरअसल एक ऐसा प्लेटफॉर्म है, जो अलग-अलग कैलिबर और अलग-अलग रेंज के रॉकेट्स और मिसाइलों को एक ही लॉन्चर से दाग सकता है। यही वजह है कि इसे यूनिवर्सल कहा जाता है। अभी तक सेना के पास मौजूद पिनाका में यह खूबी मौजूद नहीं है।
पीयूएलएस सिस्टम से 122 एमएम, 160 एमएम और 306 एमएम जैसे रॉकेट फायर किए जा सकते हैं। इसके अलावा 150 किलोमीटर और 300 किलोमीटर तक मार करने वाली लंबी दूरी की मिसाइलों को भी इसमें इंटीग्रेट किया जा सकता है। इससे सेना को हर दूरी के लिए अलग-अलग लॉन्चर रखने की जरूरत नहीं पड़ेगी। रॉकेट पॉड्स की संख्या और कॉन्फिगरेशन इस बात पर निर्भर करेगी कि किस तरह का रॉकेट इस्तेमाल किया जा रहा है। (Pinaka Vs PULS)
PULS हर इलाके के लिए तैयार
यह लॉन्चर सिस्टम 6×6 या 8×8 व्हील्ड व्हीकल चैसिस पर लगाया जा सकता है। इससे इसे पहाड़ी इलाकों, रेगिस्तानी क्षेत्रों और मैदानी इलाकों में आसानी से तैनात किया जा सकता है।
भारतीय सेना के लिए यह खास तौर पर इसलिए अहम है, क्योंकि उसे अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियों में ऑपरेशन करने पड़ते हैं। लद्दाख जैसे ऊंचाई वाले इलाकों से लेकर राजस्थान के रेगिस्तान और पूर्वोत्तर के पहाड़ी क्षेत्रों तक, हर जगह यह सिस्टम इस्तेमाल किया जा सकेगा। (Pinaka Vs PULS)
Pinaka Vs PULS: “शूट एंड स्कूट” क्षमता का क्या है फायदा
मॉडर्न वॉरफेयर में सबसे जरूरी है “शूट एंड स्कूट”। यानी फायर करने के तुरंत बाद अपनी जगह बदल लेना, ताकि दुश्मन की काउंटर फायर से बचा जा सके। यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम इसीलिए डिजाइन किया गया है। फायरिंग के बाद यह सिस्टम तुरंत मूव कर सकता है। लॉन्चर के पीछे एक रिमोटली कंट्रोल्ड और पावर्ड यूनिट लगी होती है। ऑटोमेटेड रीलोडिंग सिस्टम की मदद से यह लॉन्चर एक मिनट से भी कम समय में अपना मिशन पूरा कर सकता है। यह सिस्टम आधुनिक कमांड एंड कंट्रोल नेटवर्क से भी जुड़ सकता है और ड्रोन, रडार या फॉरवर्ड ऑब्जर्वर से सीधे टारगेटिंग डेटा ले सकता है। इसमें जीपीएस आधारित नेविगेशन सिस्टम है, जिससे गाइडेड रॉकेट्स की सटीकता बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। यही वजह है कि इसे आधुनिक नेटवर्क-सेंट्रिक युद्ध के लिए बेहद उपयुक्त माना जा रहा है। (Pinaka Vs PULS)
Pinaka MBRL
Pinaka Vs PULS: पिनाका है भारत का भरोसेमंद रॉकेट सिस्टम
भारत फिलहाल अपने स्वदेशी पिनाका मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम पर भरोसा करता है। पिनाका का नाम भगवान शिव के धनुष पर रखा गया है और इस सिस्टम ने 1999 के करगिल युद्ध में पहली बार अपनी ताकत दिखाई थी। ऊंचे पहाड़ी इलाकों में दुश्मन की चौकियों को तब पिनाका ने भारी नुकसान पहुंचाया था।
एक पिनाका लॉन्चर 44 सेकंड में 12 रॉकेट दाग सकता है, जबकि एक पूरी बैटरी 72 रॉकेट फायर कर सकती है। पिनाका एमके-1 की रेंज करीब 37.5 किलोमीटर है, जबकि पिनाका एमके-2 की रेंज 60 किलोमीटर से ज्यादा है। इसके अलावा पिनाका एक्सटेंडेड रेंज वर्जन 60 से 90 किलोमीटर तक मार कर सकता है। (Pinaka Vs PULS)
Pinaka Vs PULS
हालांकि पिनाका एक मजबूत और भरोसेमंद सिस्टम है, लेकिन इसमें यूनिवर्सल लॉन्च क्षमता नहीं है। पिनाका मुख्य रूप से एरिया बॉम्बार्डमेंट के लिए डिजाइन किया गया है, यानी यह बड़े इलाके में एक साथ भारी मात्रा में रॉकेट गिरा कर उसे तबाह कर सकता है।
वहीं पीयूएलएस एक मल्टी-कैलिबर और मल्टी-रेंज सिस्टम है, जो अचूक हमलों के लिए बनाया गया है। इसकी सबसे बड़ी ताकत इसकी 300 किलोमीटर तक की मारक दूरी और अलग-अलग तरह के हथियार दागने की क्षमता है। (Pinaka Vs PULS)
Pinaka Vs PULS: क्या पिनाका को मिलेगी चुनौती?
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम पिनाका का विकल्प नहीं, बल्कि उसका सप्लीमेंट बनेगा। पिनाका अभी भी सेना की रॉकेट आर्टिलरी का अहम हिस्सा रहेगा, खास तौर पर मध्यम दूरी और एरिया फायर के लिए।
वहीं यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम लंबी दूरी और प्रिसिजन स्ट्राइक के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। इस तरह सेना के पास एक लेयर्ड आर्टिलरी कैपेबिलिटी होगी, जिसमें अलग-अलग रेंज और रोल के सिस्टम शामिल होंगे। (Pinaka Vs PULS)
Pinaka Vs PULS: पीयूएलएस को कई देशों ने चुना
एल्बिट सिस्टम्स का पीयूएलएस सिस्टम दुनिया के कई देशों का ध्यान खींच चुका है। नीदरलैंड और जर्मनी जैसे देशों ने भी इसे चुना है, क्योंकि यह अमेरिकी हिमार्स सिस्टम की तुलना में जल्दी उपलब्ध हुआ और लागत के लिहाज से भी ज्यादा किफायती साबित हुआ।
रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि पीयूएलएस भविष्य में और ज्यादा एडवांस मिसाइलों के साथ भी काम कर सकता है। यही वजह है कि इसे भविष्य के लिए तैयार प्लेटफॉर्म माना जा रहा है। (Pinaka Vs PULS)
Pinaka Vs PULS: भारतीय सेना को क्या होगा फायदा
पीयूएलएस या सूर्या सिस्टम के आने से भारतीय सेना की लंबी दूरी की मारक क्षमता में बड़ा इजाफा होगा। चीन और पाकिस्तान जैसे दो मोर्चों पर चुनौतियों का सामना कर रही सेना के लिए यह सिस्टम बेहद अहम माना जा रहा है। 300 किलोमीटर तक मार करने वाले रॉकेट और मिसाइलें सेना को दुश्मन के इलाके में गहराई तक मौजूद ठिकानों पर हमला करने का मौका देंगी। इससे सेना की रणनीतिक पकड़ और मजबूत होगी।जब अगले एक साल में यह सिस्टम पूरी तरह सेना में शामिल हो जाएगा, तो भारतीय सेना की फायर पावर और ऑपरेशनल तैयारी में इसका असर साफ तौर पर देखा जा सकेगा। (Pinaka Vs PULS)
Russia Arms Shahed Drones With MANPADS, Creating New Threat for Ukrainian Helicopters
Russia Shahed drone MANPADS: रूस-यूक्रेन युद्ध को शुरू हुए 3 साल 10 महीने हो चुके हैं। लेकिन जंग है कि खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। वहीं जंग में ड्रोन सबसे अहम हथियार बन चुके हैं, जिन्होंने पूरी दुनिया की सैन्य सोच को ही बदल दिया है। लंबे समय से चल रही ड्रोन वॉर में रोजाना नए नए इनोवेशन भी देखने को मिल रहे हैं। जंग में एक नया और खतरनाक इनोवेशन देखने को मिला है। पहली बार यह पुष्टि हुई है कि रूस ने अपने ड्रोन को मैनपैड्स से लैस किया है। जिसके बाद ये ड्रोन अब और घातक हो गया है।
पहली बार यह पुष्टि हुई है कि रूस ने अपने शाहेद कामिकाजे ड्रोन को मैन-पोर्टेबल एयर डिफेंस सिस्टम (MANPADS) से लैस कर दिया है। वहीं अब ये ड्रोन केवल जमीन पर नहीं, बल्कि हवा में उड़ रहे हेलीकॉप्टर और लो-फ्लाइंग एयरक्राफ्ट के लिए भी खतरा बन सकते हैं। यूक्रेनी रेडियो टेक्नोलॉजी एक्सपर्ट सेरही ब्रेस्ट्रेनोव ने इस नई तकनीक की पहचान की। यह ऐसा पहला मामला है, जब किसी शाहेद ड्रोन पर इग्ला या वर्बा जैसे मैनपैड्स जैसे मिसाइल सिस्टम को लगाया गया है। (Russia Shahed drone MANPADS)
Russia Shahed drone MANPADS: क्या है शाहेद ड्रोन और क्यों है खतरनाक?
शाहेद-136 ड्रोन मूल रूप से ईरान का बनाया एक वन-वे अटैक ड्रोन है, जिसे रूस बड़े पैमाने पर इस्तेमाल कर रहा है। रूस ने इन्हें गेरान-2 नाम दिया है। इन ड्रोन की खूबी यह है कि ये सस्ते होते हैं, लंबी दूरी तक उड़ान भर सकते हैं और सीधे टारगेट से टकराकर ब्लास्ट करते हैं।
अब तक इनका इस्तेमाल यूक्रेन के बिजली घरों, शहरों, सैन्य ठिकानों और इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमलों के लिए होता रहा है। लेकिन अब इस ड्रोन को रूस ने केवल “उड़ता हुआ बम” न रखकर, एयर डिफेंस प्लेटफॉर्म बनाने की कोशिश शुरू कर दी है। (Russia Shahed drone MANPADS)
Russia Shahed drone MANPADS: कैसे किया अपग्रेड
इस अपग्रेडेड शाहेद ड्रोन में एक कैमरा और रेडियो मॉडेम लगाया गया था। यह ड्रोन पूरी तरह ऑटोमैटिक नहीं था, बल्कि इसे रिमोट तरीके से कंट्रोल किया जा रहा था। मिसाइल को ड्रोन ऑपरेटर रिमोट से लॉन्च कर सकता है। यह ऑपरेटर रूसी इलाके से ड्रोन को कंट्रोल करता है। कैमरे से मिलने वाली लाइव वीडियो फीड के जरिए वह यह तय करता है कि कब और किस दिशा में मिसाइल दागनी है।
Russia Arms Shahed Drones With MANPADS, Creating New Threat for Ukrainian Helicopters
रूस ने समय-समय पर शाहेद ड्रोन में कई छोटे-छोटे बदलाव किए हैं। इनमें नए गाइडेंस सिस्टम, बेहतर कम्युनिकेशन लिंक और इलेक्ट्रॉनिक काउंटरमेजर्स शामिल हैं। इन बदलावों का मकसद यूक्रेनी एयर डिफेंस को चकमा देना और ड्रोन को ज्यादा असरदार बनाना रहा है। (Russia Shahed drone MANPADS)
Russia Shahed drone MANPADS: क्या है ड्रोन पर लगा मैनपैड्स?
MANPADS यानी मैन-पोर्टेबल एयर डिफेंस सिस्टम एक ऐसा मिसाइल सिस्टम होता है, जिसे आमतौर पर एक सैनिक कंधे पर रखकर हेलीकॉप्टर या लो-फ्लाइंग एयरक्राफ्ट पर दागता है। रूस के पास दो तरह के मैनपैड्स सिस्टम हैं, इनमें 9के38 इग्ला और 9के333 वर्बा (इग्ला का एडवांस वर्जन) है।
मैनपैड्स सिस्टम आमतौर पर इन्फैंट्री के लिए बनाए जाते हैं। इग्ला और वर्बा जैसी मिसाइलें इंफ्रारेड होमिंग तकनीक पर काम करती हैं, यानी ये टारगेट की गर्मी को पकड़कर उसे ट्रैक करती हैं। इनकी मारक दूरी करीब 5 से 6 किलोमीटर तक होती है और ये हेलीकॉप्टर या कम ऊंचाई पर उड़ रहे विमानों के लिए खतरनाक मानी जाती हैं। इन्हें ड्रोन पर लगाना तकनीकी रूप से आसान नहीं होता, लेकिन अब पहली बार इन्हीं मिसाइलों को एक ड्रोन के ऊपर फिट किया गया है। रूस ने यह प्रयोग करके यह दिखा दिया है कि वह नए-नए तरीकों से यूक्रेन के डिफेंस सिस्टम को चुनौती देना चाहता है। (Russia Shahed drone MANPADS)
Russia Arms Shahed Drones With MANPADS, Creating New Threat for Ukrainian Helicopters
ये मिसाइलें इन्फ्रारेड होमिंग तकनीक पर काम करती हैं, यानी ये हेलीकॉप्टर या विमान की गर्मी को पकड़कर लक्ष्य तक पहुंचती हैं। आमतौर पर इनकी मारक दूरी 5 से 6 किलोमीटर तक होती है।
इस नए सेटअप का मुख्य मकसद यूक्रेनी हेलीकॉप्टरों और विमानों को डराना और उनके इंटरसेप्शन मिशन को मुश्किल बनाना है। अब तक यूक्रेनी फोर्सेस शाहेद ड्रोन को खासकर रात के समय जमीन से एयर डिफेंस सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और फाइटर जेट या हेलीकॉप्टरों की मदद से गिराती रही हैं। (Russia Shahed drone MANPADS)
Russia Shahed drone MANPADS: यूक्रेन ने जारी की चेतावनी
यूक्रेन ने इस नए खतरे को लेकर यूक्रेनी आर्मी एविएशन के पायलटों को सीधे तौर पर चेतावनी भी दी है। उन्होंने कहा कि शाहेद ड्रोन के सामने से सीधे उड़ान भरते हुए उसे इंटरसेप्ट करने की कोशिश अब ज्यादा खतरनाक हो सकती है। खास तौर पर उन हेलीकॉप्टरों और लो-फ्लाइंग एयरक्राफ्ट के लिए जोखिम बढ़ गया है, जो इन ड्रोन को गिराने का काम करते हैं। वहीं, इसे देखते हुए यूक्रेन अपने इंटरसेप्शन तरीकों में भी बदलाव कर रहा है। (Russia Shahed drone MANPADS)
कोई बड़ा “गेम-चेंजर” नहीं
हालांकि, कई सैन्य विश्लेषकों का मानना है कि यह फिलहाल कोई बड़ा “गेम-चेंजर” नहीं है। शाहेद ड्रोन की स्पीड (150-200 किमी/घंटा) कम होती है, उसकी मैन्युवर करने की क्षमता सीमित है और मिसाइल को सही समय पर टारगेट पर लॉक कराना आसान नहीं होता। हेलीकॉप्टर फ्लेयर्स छोड़कर, दिशा बदलकर या जमीन की आड़ लेकर ऐसे हमलों से बच सकते हैं। यह आर-60 एयर-टू-एयर मिसाइल के पिछले प्रयोगों का ही नया रूप है।
Russia Shahed drone MANPADS: लागत है बेहद ज्यादा
इसके अलावा, लागत भी अहम है। एक साधारण शाहेद ड्रोन की कीमत अपेक्षाकृत कम मानी जाती है, जबकि इग्ला या वर्बा मिसाइल उससे कहीं ज्यादा महंगी होती है। एक शाहेद की कीमत लगभग 20 हजार डॉलर होती है, जबकि एक इग्ला की कीमत 80 हजार डॉलर के लगभग पड़ती है, जो रूस के लिए महंगा सौदा है, क्योंकि रूस रोजाना 100 से ज्यादा ड्रोन्स लॉन्च करता है।
यूक्रेनी सेना की अनमैन्ड सिस्टम फोर्सेस ने दावा किया है कि उन्होंने ऐसे ही एक अपग्रेडेड शाहेद ड्रोन को इंटरसेप्ट कर गिरा दिया है। बताया गया है कि 412वीं नेमेसिस ब्रिगेड के डार्कनोड बटालियन ने इस ड्रोन को गिराया था। ड्रोन को गिराने के बाद उसके मलबे में मैनपैड्स सिस्टम और उससे जुड़े अतिरिक्त उपकरण पाए गए थे। (Russia Shahed drone MANPADS)
Sainik Samachar 117 Years: भारतीय सशस्त्र बलों की आवाज मानी जाने वाली पत्रिका सैनिक समाचार के 117 साल पूरे हो गए हैं। यह केवल एक पत्रिका नहीं है, बल्कि भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना के शौर्य इतिहास का जीवित दस्तावेज है। अंग्रेजी शासनकल से लेकर आजाद भारत तक, दो विश्व युद्धों से लेकर आधुनिक रक्षा सुधारों तक, सैनिक समाचार ने हर दौर की कहानी अपने पन्नों में दर्ज की है।
Sainik Samachar 117 Years: उर्दू साप्ताहिक से शुरू हुआ सफर
सैनिक समाचार की शुरुआत 2 जनवरी 1909 को हुई थी। उस समय इसका नाम फौजी अखबार था और यह उर्दू भाषा का साप्ताहिक था। इसका प्रकाशन इलाहाबाद से होता था, जबकि संपादकीय कार्यालय शिमला में था। यह अखबार खास तौर पर भारतीय सेना के जवानों के लिए निकाला गया था, ताकि उन्हें सेना से जुड़ी खबरें, आदेश और सूचनाएं अपनी भाषा में मिल सकें।
उस दौर में बिजली हर जगह नहीं थी, इसलिए अखबार को इस तरह छापा जाता था कि उसे मिट्टी के तेल के लैंप की रोशनी में भी आसानी से पढ़ा जा सके। उस समय इसकी कीमत एक आना प्रति प्रति रखी गई थी और सालाना सदस्यता चार रुपये थी। उस समय यह राशि भी एक आम सैनिक के लिए सोच-समझकर खर्च की जाने वाली रकम मानी जाती थी। (Sainik Samachar 117 Years)
हिंदी और पंजाबी में विस्तार
1909 में ही फौजी अखबार के हिंदी और पंजाबी संस्करण भी शुरू किए गए। इन संस्करणों में केवल सैन्य समाचार ही नहीं, बल्कि गांवों के विकास, समाज सुधार और सामान्य ज्ञान से जुड़ी सामग्री भी छपती थी। इसका मकसद सैनिकों को सिर्फ युद्ध की जानकारी देना नहीं, बल्कि उन्हें जागरूक नागरिक बनाना भी था।
1911 में छपाई को लाहौर स्थानांतरित किया गया। इससे छपाई की लागत कम हुई और अखबार की कीमत घटकर तीन पैसे रह गई। इससे इसकी पहुंच और बढ़ गई। (Sainik Samachar 117 Years)
दोनों विश्व युद्धों में अहम भूमिका
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान फौजी अखबार की भूमिका और बढ़ गई। 1914 के बाद इसमें दैनिक सप्लीमेंट निकलने लगे और पन्नों की संख्या भी बढ़ा दी गई। युद्ध से जुड़ी ताजा खबरें सैनिकों तक तेजी से पहुंचाई जाने लगीं।
द्वितीय विश्व युद्ध के समय तो इस पत्रिका की लोकप्रियता चरम पर पहुंच गई। इसकी सर्कुलेशन तीन लाख से अधिक कापियों तक पहुंच गई। इस दौरान ‘जंग की खबरें’ नाम से विशेष सप्लीमेंट निकाले गए, जो कई भाषाओं में प्रकाशित होते थे। विदेशों में तैनात भारतीय सैनिकों के लिए काहिरा से रोमन उर्दू में संस्करण भी छापा गया।
इसी समय पत्रिका के स्टाफ की संख्या 15 से बढ़कर 60 हो गई। तस्वीरों के साथ खबरें छपने लगीं और दुनिया की अन्य घटनाओं, जैसे स्पेन का गृह युद्ध, की जानकारी भी सैनिकों तक पहुंचाई गई। (Sainik Samachar 117 Years)
आजादी के बाद बदला नाम
1947 में देश के बंटवारे के बाद कुछ समय के लिए इस पत्रिका का प्रकाशन रुका रहा। कर्मचारियों और प्रिंटरों के पाकिस्तान में जाने की वजह से मुश्किलें आईं, लेकिन जल्द ही इसे फिर से शुरू किया गया।
1954 में बड़ा बदलाव हुआ। पत्रिका को पखवाड़े में एक बार प्रकाशित करने का फैसला लिया गया और सभी संस्करणों के लिए एक ही नाम रखा गया सैनिक समाचार। इसके बाद यह नाम भारतीय सशस्त्र बलों के साथ स्थायी तौर पर जुड़ गया। (Sainik Samachar 117 Years)
बढ़ा भाषाओं का दायरा
समय के साथ सैनिक समाचार को देश की कई भाषाओं को भी निकाला गया। इसका मलयालम संस्करण 1964 में शुरू हुआ। जबकि बंगाली संस्करण 1971 में आया। वहीं, असमिया, कन्नड़ और ओड़िया संस्करण 1983 में जोड़े गए।
आज सैनिक समाचार 13 भाषाओं में प्रकाशित होता है, जिनमें हिंदी, अंग्रेज़ी, उर्दू, पंजाबी, तमिल, तेलुगु, मराठी, मलयालम, बंगाली, असमिया, कन्नड़, ओड़िया और गोरखाली शामिल हैं। इतनी भाषाओं में प्रकाशित होने वाली यह दुनिया की गिनी-चुनी सैन्य पत्रिकाओं में से एक है।
वर्तमान में सैनिक समाचार रक्षा मंत्रालय के अधीन दिल्ली से प्रकाशित होता है। इसकी सर्कुलेशन लगभग 22,000 प्रतियों का है। इसमें डिफेंस से जुड़े ताजा अपडेट, सैन्य अभ्यास, पूर्व सैनिकों की कहानियां, सम्मान और वीरता से जुड़ी रिपोर्टें शामिल रहती हैं। यह पत्रिका जवानों, जेसीओ, एनसीओ और अधिकारियों के लिए आज भी उतनी ही उपयोगी है, जितनी सौ साल पहले थी। (Sainik Samachar 117 Years)
Sainik Samachar 117 Years: डिजिटल वर्जन की तैयारी
117वीं वर्षगांठ के मौके पर सैनिक समाचार के संपादक ने भविष्य की योजनाओं को लेकर अहम बातें साझा कीं। उनके अनुसार, “हम पूरी पत्रिका का कायाकल्प कर रहे हैं। बहुत जल्द यह ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और हमारे मोबाइल ऐप पर भी उपलब्ध होगी।
पाठकों के लिए कई नए सेक्शन जोड़े जाएंगे, खासकर रक्षा विषयों पर विस्तृत सामग्री दी जाएगी। पत्रिका की आर्थिक मजबूती के लिए विज्ञापन भी शुरू किए जाएंगे और पन्नों की संख्या में काफी बढ़ोतरी होगी। इसके साथ ही सैनिक समाचार अपने बैनर तले विभिन्न विषयों पर सेमिनार भी आयोजित करेगा।” (Sainik Samachar 117 Years)
Bhairav Ashni Battalion Indian Army: भारतीय सेना आज ऐसे दौर में कदम रख चुकी है, जहां युद्ध का मतलब सिर्फ सीमा पर गोली चलाना नहीं रह गया है। बदलते खतरे और भविष्य की चुनौतियों को देखते हुए सेना ने खुद को पूरी तरह नए रूप में ढालना शुरू कर दिया है। इसी बदलाव की सबसे बड़ी झलक राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों में दिखाई दी, जहां भारतीय सेना के नए भैरव कमांडोज और ‘अश्नि’ प्लाटून तैयार हो चुकी हैं और एक लाख से ज्यादा ड्रोन ऑपरेटिव्स के साथ भविष्य की जंग की तैयारी की जा रही है।
राजस्थान का नसीराबाद, बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर और श्रीगंगानगर अब सिर्फ मिलिट्री कैंटोनमेंट्स नहीं रहे हैं, बल्कि वे भारत के नए वार प्रिंसिपल्स की प्रयोगशाला बन चुके हैं। यहां सेना के जवानों को उस तरह की ट्रेनिंग दी जा रही है, जो भविष्य की लड़ाइयों में काम आएगी।
Bhairav Ashni Battalion Indian Army: बदलती जंग, बदलती सोच
सेना के अधिकारियों का कहना है कि आज की जंग पारंपरिक नहीं रही। अब दुश्मन सामने खड़ा हो, यह जरूरी नहीं। ड्रोन, साइबर हमला, इलेक्ट्रॉनिक जामिंग, सटीक मिसाइल स्ट्राइक और सूचना के जरिए भ्रम फैलाना, ये सब आज के युद्ध का हिस्सा हैं। इसे ही हाइब्रिड वॉरफेयर कहा जाता है।
ऐसे माहौल में वही सेना टिक पाती है, जो तेजी से फैसले ले सके, तकनीक को समझे और उन्हें जमीन पर तुरंत लागू कर सके। इसी सोच से भारतीय सेना ने अपने स्ट्रक्चर में बड़े बदलाव किए हैं। (Bhairav Ashni Battalion Indian Army)
नसीराबाद: जहां तैयार हो रहे फ्यूचर सॉल्जोर
राजस्थान का नसीराबाद अब सिर्फ ट्रेनिंग सेंटर नहीं, बल्कि सेना के भविष्य की नींव है। यहां जवानों को ड्रोन वॉरफेयर, नेटवर्क आधारित युद्ध, मल्टी-डोमेन ऑपरेशन और आधुनिक हथियारों की ट्रेनिंग दी जा रही है। यहां ट्रेनिंग सिर्फ किताबों या क्लासरूम तक सीमित नहीं है। जवानों को असली हालात जैसे माहौल में तैयार किया जाता है, ताकि जरूरत पड़ने पर वे बिना हिचक तुरंत कार्रवाई कर सकें। (Bhairav Ashni Battalion Indian Army)
Bhairav Ashni Battalion Indian Army: एक लाख ड्रोन वॉरियर होंगे तैयार
भारतीय सेना ने एक लाख से ज्यादा जवानों को ड्रोन ऑपरेशन में ट्रेनिंग दी है। यह अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है। ये ड्रोन ऑपरेटिव्स पैदल सेना, टैंक यूनिट, तोपखाने और स्पेशल फोर्स के साथ मिलकर काम करते हैं। अब ड्रोन सिर्फ निगरानी का साधन नहीं रहे। वे दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखते हैं, ठिकानों की पहचान करते हैं, रियल टाइम जानकारी देते हैं और जरूरत पड़ने पर हमला करने में भी मदद करते हैं। रेगिस्तान जैसे खुले इलाके में ड्रोन की भूमिका और भी अहम हो जाती है, जहां दूर-दूर तक फैला इलाका पारंपरिक तरीकों से कवर करना मुश्किल होता है। (Bhairav Ashni Battalion Indian Army)
भैरव कमांडोज: नाम में ही छिपा है संदेश
भैरव का नाम भारतीय परंपरा के उस योद्धा से लिया गया है, जो निर्भीक, तेज और निर्णायक होता है। यह कमांडोज सामान्य इन्फैंट्री की पैरा यूनिट से अलग है। इसके जवानों को हथियार चलाने के साथ-साथ ड्रोन ऑपरेशन, संचार व्यवस्था, मेडिकल इमरजेंसी, एक्सप्लोसिव डिस्पोजल और डिजिटल वॉरफेयर में भी माहिर बनाया जाता है। भैरव कमांडोज का मकसद कम समय में ज्यादा असर, कम संसाधनों में बड़ा परिणाम और पहली जीत सुनिश्चित कराना है। (Bhairav Ashni Battalion Indian Army)
राजस्थान का रेगिस्तान: असली परीक्षा
बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर, श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़ और अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे इलाके रणनीतिक रूप से बेहद अहम हैं। यहां मौसम कठोर है, दूरी लंबी है और संसाधन सीमित होते हैं। इन्हीं हालात में भैरव कमांडोज को तैयार किया गया है। ड्रोन के साथ मिलकर ये जवान दुश्मन की हर हलचल पर नजर रखते हैं और जरूरत पड़ने पर तुरंत जवाब देने की क्षमता रखते हैं। रेगिस्तान की गर्मी और कठिन हालात इन जवानों को कमजोर नहीं, बल्कि और मजबूत बनाते हैं। (Bhairav Ashni Battalion Indian Army)
अशनि प्लाटून: बिजली की तरह हमला
जहां भैरव कमांडोज मल्टी-कैपेबिलिटी एंड फ्लेक्सिबिलिटी दिखाती है, वहीं अश्नि प्लाटून सेना की तेज और आक्रामक ताकत है। ‘अश्नि’ का मतलब है बिजली तेज, अचानक और प्रभावी। इस प्लाटून का काम है दुश्मन की अग्रिम रक्षा को तोड़ना, अहम ठिकानों पर तुरंत वार करना और जंग का रुख पलट देना। ड्रोन और खुफिया जानकारी के सहारे अशनि बटालियन भविष्य की लड़ाइयों में अहम भूमिका निभाने वाली है। (Bhairav Ashni Battalion Indian Army)
Bhairav Ashni Battalion Indian Army: नया टीम कल्चर है पहचान
भैरव बटालियन और अश्नि प्लाटून में सबसे ज्यादा जोर टीमवर्क पर दिया जाता है। जवानों का कहना है कि नई पहचान और कठिन प्रशिक्षण ने उनमें आत्मविश्वास बढ़ाया है। रेगिस्तान में तैनात जवान खुद को सिर्फ जवान नहीं, बल्कि तकनीक से लैस योद्धा मानते हैं। उनके लिए ड्रोन और आधुनिक सिस्टम हथियार का ही हिस्सा हैं। (Bhairav Ashni Battalion Indian Army)
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