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LCA Mk-1A Delivery Timeline: अगले साल मार्च में मिलेंगे पांच तेजस एमके-1ए और तीन एचटीटी-40 ट्रेनर एयरक्राफ्ट

LCA Mk-1A Delivery Timeline

LCA Mk-1A Delivery Timeline: हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड ने भारतीय वायुसेना के लिए हल्के लड़ाकू विमान एलसीए एमके-1ए और बेसिक ट्रेनर एचटीटी-40 की डिलीवरी का नया प्लान जारी किया है। कंपनी अब चालू वित्त वर्ष 2025-26 के आखिर तक वायुसेना को पांच एलसीए और तीन ट्रेनर एयरक्राफ्ट सौंपेगी। इससे पहले एचएएल ने दस लड़ाकू विमान और 12 ट्रेनर देने की बात कही थी।

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सूत्रों का कहना है कि डिलीवरी में बदलाव की वजह इंजन की सप्लाई में देरी, सप्लाई चेन की समस्याएं और कुछ जरूरी हथियारों के परीक्षण समय पर पूरे नहीं होना है। जिसके चलते प्रोडक्शन शेड्यूल पर असर पड़ा है। एचएएल अब इस देरी की भरपाई करने और उत्पादन तेज करने की कोशिश कर रहा है।

LCA Mk-1A कार्यक्रम में देरी की मुख्य वजह इंजन सप्लाई

एलसीए एमके-1ए कार्यक्रम के तहत वायुसेना ने कुल 180 विमान ऑर्डर किए हैं। पहला ऑर्डर फरवरी 2021 में 83 विमानों (73 फाइटर और 10 ट्रेनर) के लिए 48,000 करोड़ रुपये में और दूसरा ऑर्डर 62,000 करोड़ रुपये के सौदे के तहत अगस्त 2025 में 97 विमानों के लिए दिया था। इनमें से कई विमान अगले कुछ सालों में स्क्वाड्रन में शामिल होने वाले थे, लेकिन इंजन सप्लाई समय पर न मिलने से डिलीवरी में देरी हुई है। अमेरिकी कंपनी जीई एयरोस्पेस को इन विमानों के लिए एफ404-आईएन20 इंजन देने हैं।

लेकिन अभी तक जीई एयरोस्पेस की तरफ से एचएएल को केवल 5 इंजन ही मिले हैं। वहीं, अगले साल लगभग 20 इंजन मिलने की उम्मीद है। एचएएल का कहना है कि मार्च 2026 तक कम से कम पांच एमके-1ए देने की कोशिश की जाएगी। यह पहले ऑर्डर का हिस्सा है, जिसे अगले 4–5 सालों में पूरा किया जाएगा।

HTT-40 ट्रेनर विमान का भी यही हाल

बेसिक ट्रेनर एचटीटी-40 के लिए भी इंजन सप्लाई में बड़ी देरी हो रही है। इन विमानों में अमेरिकी कंपनी हनीवेल का टीपीई331-12बी टर्बोप्रॉप इंजन लगा है। हनीवेल को 88 इंजन सप्लाई करने हैं। वहीं, सितंबर 2025 में पहला इंजन आना था, लेकिन अब जनवरी 2026 में मिलने की संभावना है। मार्च 2026 तक चार और इंजन मिल सकते हैं। एचएएल को इस वित्त वर्ष में कुल 70 ट्रेनर विमानों के बड़े ऑर्डर में से 12 विमान देने थे, लेकिन इंजन न मिलने से इसमें भी देरी हो रही है।

वायुसेना इन दोनों विमानों पर काफी निर्भर है। एलसीए एमके-1ए वायुसेना के आने वाले सालों में रिटायर हो रहे पुराने एयरक्राफ्ट को रिप्लेस करेगा। वहीं, एचटीटी-40 से नए पायलटों की ट्रेनिंग होती है। इसी वजह से वायुसेना ने एचएएल से उत्पादन तेज करने को कहा है। एचएल ने पिछले महीने नासिक और बेंगलुरु में नए प्रोडक्शन लाइनें शुरू की हैं, ताकि डिलीवरी की रफ्तार बढ़ाई जा सके।

पिछले महीने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने नासिक में एलसीए एमके-1ए और एचटीटी-40 के नए प्रोडक्शन प्लांट्स का उद्घाटन किया था, ताकि प्रोडक्शन की रफ्तार बढ़ाई जा सके। एचएएल वायुसेना के लिए 70 एचीटी-40 ट्रेनर बना रहा है, जिनमें से दो ट्रेनर कैटेगरी बी इंजन यानी पुराने इंजनों के साथ उड़ान भर रहे हैं।

Russia R-37M Deal: भारतीय वायुसेना का सुखोई-30 होगा अवॉक्स किलर मिसाइलों से लैस? इन अल्ट्रा लॉन्ग-रेंज मिसाइलों के आगे कांपेंगे पाकिस्तानी जेट

Russia R-37M Deal
Russia R-37M

Russia R-37M Deal: भारत और रूस के बीच रक्षा सहयोग को लेकर एक बड़ी खबर सामने आई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक रूस अब भारतीय वायुसेना के सुखोई-30एमकेआई फाइटर जेट्स पर अपनी अल्ट्रा लॉन्ग-रेंज एयर-टू-एयर मिसाइल आर-37एम (एक्सेहेड) को इंटीग्रेट करने की अनुमति दे दी है। इस मिसाइल को रूस अपनी सबसे लंबी दूरी वाली “बियोंड विजुअल रेंज” मिसाइल कहता है। कहा जा रहा है कि दोनों देशों के बीच जारी बातचीत अब अंतिम चरण में है और शुरुआती चरण में भारत को लगभग 300 मिसाइलें मिल सकती हैं।

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इस मिसाइल के आने से सुखोई-30 की क्षमता में जबरदस्त बढ़ोतरी होगी। सुखोई-30 को आर-37एम जैसी मिसाइल मिलने से यह दुश्मन के हाई-वैल्यू एसेट्स जैसे अवॉक्स, टैंकर एयरक्राफ्ट और हाई-एंड फाइटर जेट्स को 200 से 300 किलोमीटर (लॉन्च की ऊंचाई और स्पीड पर निर्भर) की दूरी से निशाना बना सकेगा। ये दुनिया की सबसे लंबी रेंज वाली एयर-टू-एयर मिसाइलों में से एक हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार रूस भारत को जरूरी तकनीकी मदद भी देगा, ताकि विमान के एवियोनिक्स, फायर-कंट्रोल सिस्टम और रडार में जरूरी बदलाव किए जा सकें।

आर-37एम को रूसी वायुसेना ने पहले ही अपने सुखोई-35 और सुखोई-57 फाइटर जेट पर तैनात कर रखा है। यह मिसाइल हाइपरसोनिक स्पीड यानी मैक 6 (लगभग 7400 किमी/घंटा) तक उड़ान भर सकती है। जिससे टारगेट के पास पहुंचने में बहुत कम समय लगता है और इंटरसेप्ट करना मुश्किल होता है। इसमें इनर्शियल, मिड-कोर्स अपडेट और एक्टिव रडार होमिंग (फायर-एंड-फॉरगेट) सिस्टम लगा है। यह टर्मिनल फेज में एक्टिव सीकर से टारगेट को लॉक कर सकती है।

इसका हाई-एक्सप्लोसिव फ्रैगमेंटेशन वॉरहेड करीब 60 किलो का है और यह मिसाइल लगभग 4.2 मीटर लंबी है। रूस के अनुसार यह मिसाइल एक बार हवा में छोड़े जाने के बाद फायर-एंड-फॉरगेट मोड में काम करती है और इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग से बचते हुए टारगेट को लॉक कर सकती है।

दुनिया भर में यह मिसाइल अवॉक्स किलर के नाम से भी जानी जाती है, क्योंकि यह दुश्मन के एयरबोर्न रडार सिस्टम को दूर से ही इनैक्टिव कर सकती है। बता दें कि पाकिस्तान के जे-10सीई और जेएफ-17 ब्लॉक III जैसे लड़ाकू विमानों पर पहले से ही चीनी पीएल-15 मिसाइल लगी है, जिसकी रेंज 200 किलोमीटर से अधिक है। ऐसे में आर-37एम के आने से पाकिस्तान की मुसिबतें बढ़ सकती हैं।

यह इंटीग्रेशन भारत के सुपर सुखोई अपग्रेड कार्यक्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। इस कार्यक्रम के तहत भारतीय वायुसेना के 100 से अधिक सुखोई-30 लड़ाकू विमानों को आधुनिक हथियार, सेंसर और नई तकनीक से अपग्रेड किया जा रहा है। रूस का दावा है कि आर-37एम मिसाइल को सुखोई-30एसएम विमान पर पहले से टेस्ट किया जा चुका है और इस वजह से सुखोई-30एमकेआई पर इसे इंटीग्रेट करने में कम बदलाव करने पड़ेंगे। मिसाइल को विमान के फ्यूजलेज के नीचे दो जगहों पर लगाया जा सकेगा।

मिसाइल की पहली खेप मिलने के बाद भारत इसे सीमावर्ती इलाकों में हाई-टेंशन मिशनों में तैनात कर सकेगा। बता दें कि लंबी दूरी वाली बियोंड द विजुअल रेंज मिसाइलें मॉडर्न एरियल वारफेयर में निर्णायक भूमिका निभाती हैं और आर-37एम जैसी मिसाइलें आने के बाद दुश्मन के फाइटर जेट्स को दूर से ही गिराया जा सकेगा।

DSC A20 Diving Support Craft: भारतीय नौसेना को मिलेगा स्वदेशी डाइविंग सपोर्ट क्राफ्ट, अंडरवाटर मिशनों में बढ़ेगी ताकत

DSC A20 Diving Support Craft
DSC A20 Diving Support Craft

DSC A20 Diving Support Craft: भारतीय नौसेना 16 दिसंबर को कोच्चि में अपने पहले स्वदेशी डाइविंग सपोर्ट क्राफ्ट डीएससी ए20 को औपचारिक रूप से कमीशन करने जा रही है। यह कार्यक्रम साउदर्न नेवल कमांड की मौजूदगी में होगा, जहां फ्लैग ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ वाइस एडमिरल समीर सक्सेना जहाज को औपचारिक रूप से नौसेना को सौंपेंगे। डीएससी ए20 के कमीशन होने से नौसेना की अंडरवाटर सपोर्ट और डाइविंग क्षमता को मजबूती मिलेगी।

DSC A20 Diving Support Craft
DSC A20 Diving Support Craft

डीएससी ए20, पांच डाइविंग सपोर्ट क्राफ्ट की सीरीज का पहला जहाज है, जिसका निर्माण कोलकाता स्थित टिटागढ़ रेल सिस्टम्स लिमिटेड ने किया है। यह प्लेटफॉर्म पूरी तरह इंडिजिनस डिजाइन और मेड इन इंडिया पहल का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य तटीय जल में डाइविंग मिशन और अंडरवाटर ऑपरेशन करना है। इस शिप में इंटरनेशनल सेफ्टी मानकों के मुताबिक तैयार स्टेट-ऑफ-द-आर्ट डाइविंग सिस्टम लगाए गए हैं।

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इस जहाज की सबसे खास बात इसका कैटामरान हल डिजाइन है, जिससे इसे ज्यादा स्थिरता और बेहतर सीकीपिंग मिलती है। इससे जहाज तेज हवा या ऊंची लहरों में भी स्थिर बना रहता है। जहाज का वजन लगभग 390 टन है और इसे इंडियन रजिस्टर ऑफ शिपिंग के नेवल नियमों के मुताबिक बनाया गया है। इस वेसल की हाइड्रोडायनामिक टेस्टिंग और मॉडल एनालिसिस विशाखापत्तनम में स्थित नेवल साइंस एंड टेक्नोलॉजिकल लेबोरेटरी में की गई, ताकि ऑपरेशन के दौरान इसकी परफॉर्मेंस पूरी तरह विश्वसनीय रहे।

यह क्राफ्ट तटीय जल में डाइविंग ऑपरेशन्स के लिए खास तौर पर बनाया गया है। जहाज में स्टेट-ऑफ-द-आर्ट डाइविंग सिस्टम लगाया गया है, जिसमें हाइपरबेरिक चैंबर, सरफेस सप्लाई डाइविंग सिस्टम और एडवांस सेंसर लगे हुए हैं। नोसेना के मुताबिक, इस क्राफ्ट का उद्देश्य पानी के नीचे इंस्पेक्शन, साल्वेज एसिस्टेंस और जहाजों की अंडरवॉटर मरम्मत जैसे कामों को सुरक्षित और तेज बनाना है।

इस क्राफ्ट में नौसेना की कमांड क्लीयरेंस डाइविंग टीम्स को सपोर्ट देने की पूरी क्षमता है। खासकर बंदरगाहों, जहाजों के नीचे, पाइपलाइनों और अंडरवॉटर प्लेटफॉर्म की जांच जैसे मिशनों में यह महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। यह कोच्चि में रहेगा और साउदर्न नेवल कमांड के तहत ऑपरेशन करेगा।

F-16 upgrade for Pakistan: ऑपरेशन सिंदूर में भारत ने गिराए थे पाकिस्तान के 6 एफ-16? अमेरिकी अपग्रेड पैकेज से खुला नुकसान का राज

F-16 upgrade for Pakistan

F-16 upgrade for Pakistan: एक बड़ी प्रसिद्ध कहावत है, “सच कितना भी छिपाओ, देर-सवेर बाहर आ ही जाता है।” कुछ ऐसा ही हुआ है पाकिस्तान के मामले में। पाकिस्तान को अमेरिकी सरकार ने 686 मिलियन डॉलर का एफ-16 फाइटर जेट्स का अपग्रेड पैकेज मंजूर किया है। लेकिन इसके साथ ही एक बड़ा सवाल फिर चर्चा में है कि क्या ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के 6 या उससे ज्यादा एफ-16 फाइटर जेट्स को नुकसान पहुंचाया था। क्योंकि इतने बड़े पैकेज का मतलब यह है कि पाकिस्तान को अपने कम-से-कम छह एफ-16 जेट्स को बदलने या भारी मरम्मत कराने की जरूरत पड़ रही है।

अमेरिका के डिफेंस सिक्युरिटी कोआपरेशन एजेंसी (डीएससीए) के अनुसार यह पैकेज पाकिस्तान के एफ-16 बेड़े को सुरक्षित रखने, आधुनिक बनाने और 2040 तक उसकी उड़ान क्षमता बेहतर करने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इसमें लिंक-16 टैक्टिकल डेटा लिंक सिस्टम, क्रिप्टोग्राफिक मॉड्यूल, अपग्रेडेड एवियोनिक्स, ट्रेनिंग और व्यापक लॉजिस्टिक सपोर्ट शामिल है। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि यह पैकेज पाकिस्तान को “इंटरऑपरेबिलिटी” बनाए रखने में मदद करेगा, ताकि वह जॉइंट ऑपरेशंस में अमेरिकी और पार्टनर फोर्सेज के साथ काम कर सके। (F-16 upgrade for Pakistan

IAF Chief on Operation Sindoor: वायुसेना प्रमुख बोले- पाकिस्तान का नैरेटिव मनोहर कहानियों जैसा, ऑपरेशन सिंदूर में गिराए एफ-16 और जेएफ-17 समेत 10 फाइटर जेट

खास बात यह है कि ऑपरेशन सिंदूर होने के लगभग 8 महीने बाद अमेरिका ने पाकिस्तान को यह पैकेज दिया है। लेकिन भारत में इस पैकेज को अलग नजरिए से देखा जा रहा है। जानकारों का मानना है कि इतने बड़े पैकेज का एक महत्वपूर्ण कारण यह भी है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान के कई एफ-16 जेट हवा में और जमीन पर नष्ट हो गए थे। भारतीय वायुसेना ने भी बाद में इस बात की पुष्टि भी की थी।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद मई 2025 में भारतीय वायुसेना ने पहली बार स्वीकार किया था कि पाकिस्तान के कम से कम पांच विमान गिराए गए थे, जिनमें एफ-16 भी शामिल था। वायुसेना के डायरेक्टर जनरल एयर ऑपरेशंस एयर मार्शल एके भारती ने बताया था कि वायुसेना के रडार, एयर-डिफेंस सिस्टम और फाइटर जेट्स ने मिलकर यह कार्रवाई की। हालांकि उस समय पूरा ब्यौरा सार्वजनिक नहीं किया गया था।

कुछ महीनों बाद अगस्त 2025 में वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने बेंगलुरु में एक कार्यक्रम के दौरान बताया कि भारत के एफ-400 एयर डिफेंस सिस्टम ने 300 किलोमीटर से अधिक दूरी से पांच पाकिस्तानी विमानों को हवा में ही नष्ट किया। उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान के जैकोबाबाद एयरबेस पर खड़े कुछ एफ-16 और एक अवॉक्स विमान को भी नुकसान पहुंचा था। उनके बयान से पहली बार स्पष्ट हुआ कि नुकसान सिर्फ हवा में नहीं, बल्कि जमीन पर भी हुआ था।

वहीं, दो अक्टूबर को वायुसेना दिवस से पहले दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने साफ कहा कि ऑपरेशन सिंदूर में भारत ने “कुल नौ से दस पाकिस्तानी फाइटर जेट” नष्ट किए। उन्होंने कहा था, “मई में हुई झड़पों के दौरान भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के 10 से अधिक फाइटर जेट गिराए, जिनमें अमेरिका निर्मित एफ-16 और चीन-पाकिस्तान के बनाए जेएफ-17 भी शामिल थे।”

उन्होंने कहा था कि भारत के पास रडार ट्रैक, सैटेलाइट इमेजरी और विजुअल रिकॉर्डिंग सहित हर सबूत मौजूद है, और पाकिस्तान किसी भी दावे का एक भी प्रमाण पेश नहीं कर पाया है।

उन्होंने यह भी जोड़ा था कि एस-400 सिस्टम ने इस ऑपरेशन में “गेम चेंजर” की भूमिका निभाई, क्योंकि यह पहली बार था जब इतनी दूरी से किसी टारगेट को इंटरसेप्ट किया गया। वायुसेना प्रमुख ने 15 भारतीय विमान गिराने के पाकिस्तानी दावों को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा था कि यह “कल्पना” पर आधारित बयान है।

वहीं, अमेरिका की तरफ से पाकिस्तान को 686 मिलियन डॉलर का अपग्रेड पैकेज देने को लेकर विश्लेषकों का मानना है कि इतनी बड़ी राशि सिर्फ सामान्य अपग्रेड के लिए नहीं होती। इसमें ऐसे उपकरण और सिस्टम शामिल हैं जो अक्सर गंभीर नुकसान के बाद लगाए जाते हैं। इसके अलावा लिंक-16 सिस्टम जैसे इक्विपमेंट्स हाई वैल्यू विमानों पर ही लगाए जाते हैं, और पैकेज में इसकी संख्या भी काफी अधिक बताई गई है।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान के कुल 9 से 10 फाइटर एयरक्राफ्ट नष्ट हुए, जिनमें कई एफ-16 भी शामिल थे। यह नुकसान दो तरह से हुआ, कुछ विमान हवा में मार गिराए गए और कुछ जमीन पर खड़े-खड़े मिसाइल स्ट्राइक्स में तबाह हुए।

ऑपरेशन के पहले दिन 7 मई की रात को ऑपरेशन की पहली कार्रवाई हुई। रात लगभग डेढ़ बजे से लेकर सुबह चार बजे के बीच भारतीय वायुसेना ने पीओके और पाकिस्तानी पंजाब में मौजूद नौ आतंकी कैंपों को निशाना बनाया। जवाब में पाकिस्तान ने एफ-16 और जेएफ-17 विमान स्क्रैम्बल किए, पंजाब सेक्टर में तैनात एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम ने 300 किलोमीटर से ज्यादा दूरी से तीन लंबी दूरी की मिसाइलें दागीं। पहली मिसाइल ने बहावलपुर के ऊपर एक एफ-16 को हवा में ही निशाना बनाया। दूसरी मिसाइल ने मुजफ्फराबाद–कोटली क्षेत्र के एयरस्पेस में एक और एफ-16 मार गिराया। तीसरा टारगेट सियालकोट के पास, नियंत्रण रेखा से करीब 40 किलोमीटर अंदर, एक जेएफ-17 या एफ-16 बना।

वहीं, अगली सुबह यानी 8 मई को भारतीय वायुसेना ने सैटेलाइट और ड्रोन निगरानी से मिले ठोस इनपुट के आधार पर पाकिस्तान के चार प्रमुख एयरबेस जैकोबाबाद, भोलारी, रहीम यार खान और सरगोधा पर हमले किए। जैकोबाबाद एयरबेस पर मौजूद हैंगर बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए और उनमें खड़े चार एफ-16 तथा एक सी-130 एयरक्राफ्ट पूरी तरह नष्ट हो गए। भोलारी एयरबेस पर स्थित एफ-16 मेंटेनेंस हैंगर को भारी नुकसान पहुंचा और एक एफ-16 विमान वहां पूरी तरह बर्बाद हो गया। रहीम यार खान में रनवे पर खड़ा एक एफ-16 और दो जेएफ-17 मिसाइल हमले का निशाना बन गया। सरगोधा बेस पर स्थित एक एफ-16 और एक अवॉक्स एयरक्राफ्ट के भी हमले में तबाह होने की पुष्टि बाद में सामने आई।

9 मई को पाकिस्तानी वायुसेना ने एक आखिरी कोशिश करते हुए चक अमरू–सियालकोट सेक्टर में भारतीय ठिकानों के करीब आने की कोशिश की, लेकिन वहां तैनात एफ-400 ने एक और एफ-16 को हवा में ही ढेर कर दिया। इसके बाद पाकिस्तानी वायुसेना ने अपनी कोशिशें रोक दीं और युद्धविराम की मांग की। 10 मई को सैन्य कार्रवाई पूरी तरह थम गई।

India Russia Defence Cooperation: आखिर भारत ने रूसी सु-57 और ड्रोन्स में क्यों नहीं दिखाई दिलचस्पी? बड़ी डिफेंस डील न होने के पीछे यह है वजह

India Russia Defence Cooperation
Prime Minister of India Narendra Modi welcomed Russian President Vladimir Putin (Photo: X/@narendramodi)

India Russia Defence Cooperation: भारत और रूस के बीच रक्षा संबंध दशकों पुराने हैं, लेकिन इस बार जब राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा पर आए तो उम्मीद के मुताबिक उस हिसाब से रक्षा समझौते नहीं हुए, जैसे पहले देखने को मिलते थे। हालांकि रूस ने भारत को सु-57 फिफ्थ-जेनरेशन स्टेल्थ फाइटर, लॉन्ग-रेंज ड्रोन और नई सबमरीन की पेशकश तो की, लेकिन भारत की तरफ से प्रतिक्रिया बेहद सीमित रही।

भारत और रूस के बीच रणनीतिक संबंधों का यह रिश्ता सोवियत काल से शुरू हुआ था। 1971 की भारत–सोवियत मैत्री संधि ने दोनों देशों को सुरक्षा, तकनीक और सैन्य सहयोग के एक नए दौर में प्रवेश कराया। इसी सिलसिले में 1973 में सोवियत नेता लियोनिद ब्रेजनेव भारत आए थे, जहां रक्षा साझेदारी को दीर्घकालिक रूप दिया गया। बाद में जब सोवियत संघ टूट गया और 1991 में रूस एक नए देश के रूप में उभरा, तब भारत और रूस ने अपने रिश्तों को नए सिरे से स्थापित किया।

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रूस के पहले राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन 1993 में भारत आए। उनका उद्देश्य सोवियत दौर में चले आ रहे सैन्य कार्यक्रमों को फिर से सक्रिय करना था। इस दौरान भारत ने रूस के साथ सैन्य-तकनीकी सहयोग को बहाल किया, मिग विमान और स्पेयर पार्ट्स की सप्लाई पर सहमति बनी और दोनों देशों ने सुरक्षा और आतंकवाद जैसे मुद्दों पर समझ विकसित की।

वहीं राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का दौर भारत–रूस रक्षा साझेदारी के लिए सबसे अहम माना जाता है। पुतिन पहली बार 2000 में भारत आए, जहां दोनों देशों ने रणनीतिक साझेदारी की औपचारिक घोषणा की। इसी यात्रा के बाद सु-30 लड़ाकू विमान का संयुक्त उत्पादन भारत में शुरू हुआ। पुतिन 2004 में फिर आए और ग्लोनेस जैसे रूसी नेविगेशन सिस्टम पर सहयोग शुरू हुआ, साथ ही ब्रह्मोस संयुक्त मिसाइल कार्यक्रम को और बढ़ाया गया। 2010 की यात्रा में दोनों देशों ने संबंधों को “विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी” का दर्जा दिया, जो आज भी लागू है। इसी दौरान भारत–रूस हेलीकॉप्टर निर्माण, न्यूक्लियर सहयोग और रक्षा अनुसंधान का ढांचा तैयार हुआ।

वहीं, 2014 में पुतिन एक बार फिर भारत आए और एचएएल में बन रहे सु-30एमकेआई बेड़े के विस्तार पर सहमति बनी। इसके साथ ही नौसेना के लिए नए फ्रिगेट निर्माण और संयुक्त सैन्य अभ्यास इंदिरा को भी और मजबूत किया गया। 2021 की उनकी बेहद महत्वपूर्ण यात्रा में S-400 एयर डिफेंस सिस्टम की डील को औपचारिक रूप दिया गया। यह वही सिस्टम है जो भारत की एयर डिफेंस क्षमता का बड़ा हिस्सा बन गया है। इस यात्रा में 2+2 डायलॉग की शुरुआत भी हुई, जो रक्षा और विदेश नीति का संयुक्त ढांचा है।

इसके बाद राष्ट्रपति दमित्री मेदवेदेव ने 2008 में भारत का दौरा किया और नौसेना के लिए मिग-29के विमान तथा न्यूक्लियर सहयोग को आगे बढ़ाया। यह समय दोनों देशों की सैन्य साझेदारी को और व्यापक बनाने का था, खासकर नौसेना और एविएशन सेक्टर में खूब प्रगति हुई।

वहीं, इस बार दिसंबर 2025 में व्लादिमीर पुतिन एक बार फिर भारत आए। हालांकि इस यात्रा से पहले रूस ने सु-57 फिफ्थ-जेनरेशन जेट, एस-500 एयर डिफेंस सिस्टम, गेरान सीरीज के लॉन्ग-रेंज ड्रोन्स और नई सबमरीन पर सहयोग बढ़ाने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन भारत ने इन प्रस्तावों में कोई खास रुचि नहीं दिखाई। हालांकि पुतिन की इस यात्रा में 19 व्यापारिक समझौते तो हुए, लेकिन कोई बड़ा रक्षा समझौता नहीं हुआ।

सरकारी सूत्रों के अनुसार, रूस ने पुतिन की यात्रा से पहले कई दौर की बातचीत में भारत को अपने प्रमुख हथियार प्लेटफॉर्म जैसे गेरान सीरीज के कामिकाजे ड्रोन, सु-57 एयरक्राफ्ट और सबमरीन को लेकर प्रस्ताव दिया था। वहीं भारत के इन प्रस्तावों को लेकर ज्यादा रूचि न दिखाने की वजह यह रही कि भारत फिलहाल “इंडिजिनस प्रोडक्ट्स” यानी स्वदेशी डिफेंस सिस्टम के विकास पर ज्यादा ध्यान दे रहा है और किसी बड़े विदेशी प्लेटफॉर्म पर तत्काल फैसला लेने की स्थिति में नहीं है। सूत्रों ने बताया कि भारत ने स्पष्ट संकेत दिए कि वह अब अपने स्वदेशी रक्षा निर्माण को मजबूत करने पर अधिक ध्यान दे रहा है।

हाल ही में लेह में आयोजित कार्यक्रम में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने बताया कि भारत का रक्षा उत्पादन 2014 में 46,000 करोड़ रुपये था, जो अब बढ़कर 1.51 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। वहीं, रक्षा निर्यात भी पिछले दस वर्षों में लगभग 24,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। यह बदलाव भारत के लिए एक पैराडाइम शिफ्ट माना जा रहा है।

रूस की तरफ से प्रस्तावित गेरान ड्रोन्स ईरान के शाहेद-136 का इंडिजिनाइज्ड वर्जन हैं। यूक्रेन युद्ध में रूसी सेना ने बड़े पैमाने पर इनका इस्तेमाल किया। लेकिन भारतीय सेनाओं ने इन्हें खरीदने में दिलचस्पी नहीं दिखायी। भारतीय विशेषज्ञों का मानना है कि भारत अपनी ड्रोन क्षमता स्वदेशी उद्योगों के साथ तेजी से विकसित कर रहा है और किसी विदेशी निर्भरता को बढ़ाना नहीं चाहता।

इससे पहले 29 अक्टूबर को मॉस्को में इंडिया-रशिया इंटर-गवर्नमेंटल कमिशन की वर्किंग ग्रुप मीटिंग हुई थी। इस बैठक में तीनों सेनाओं के सहयोग और डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर चर्चा हुई और एक प्रोटोकॉल भी साइन किया गया। लेकिन वहां भी किसी बड़ी डिफेंस डील पर सहमति नहीं बनी।

पुतिन की यात्रा के दौरान भारत और रूस के बीच 19 समझौते जरूर हुए, लेकिन ये सभी मुख्य रूप से व्यापार और आर्थिक सहयोग से जुड़े थे। सु-57 या एस-500 एयर डिफेंस सिस्टम जैसे हाई एंड हथियारों पर कोई संयुक्त घोषणा नहीं हुई। यह साफ दिखाता है कि भारत फिलहाल रूस के बड़े हथियार प्लेटफॉर्म के बजाय अपनी घरेलू क्षमता को प्राथमिकता दे रहा है।

Indian Army Op Sagar Bandhu: श्रीलंका में बाढ़ के बीच भारतीय सेना बनी मददगार, तैयार किया फुल फील्ड हॉस्पिटल, 5000 से ज्यादा मरीजों का किया इलाज

Indian Army Op Sagar Bandhu

Indian Army Op Sagar Bandhu: श्रीलंका में आई भीषण बाढ़ और चक्रवात दित्वाह ने जिस तरह तबाही मचाई, उसके बाद कई इलाके पूरी तरह से पानी में डूब गए। ऐसे मुश्किल समय में ऑपरेशन सागर बंधु के तहत भारतीय सेना की तरफ से भेजी गई मेडिकल और इंजीनियरिंग टीमें सबसे बड़ी उम्मीद बनकर सामने आई हैं। भारतीय सेना का यह मिशन 2 दिसंबर को शुरू हुआ और कुछ ही दिनों में इसने हजारों लोगों तक राहत पहुंचाई।

भारत की “नेबरहुड फर्स्ट” नीति और दोनों देशों के मजबूत मानवीय संबंधों की गहरी मिसाल भी बन गई है। श्रीलंका के संकट के समय भारत एक बार फिर पहले और सबसे भरोसेमंद मददगार के रूप में सामने आया है। (Indian Army Op Sagar Bandhu)

Indian Army Op Sagar Bandhu

Indian Army Op Sagar Bandhu: खाली पार्किंग लॉट में बनाया अस्पताल

चक्रवात दित्वाह से भारी तबाही मचने के बाद जब भारतीय सेना का दस्ता जब कोलंबो पहुंचा, तो उन्हें बाढ़ प्रभावित इलाके तक पहुंचने में लगभग 18 घंटे की लंबी और बेहद चुनौतीपूर्ण यात्रा करनी पड़ी। रास्ते टूटे हुए थे, कई जगह पानी भरा था और कम्युनिकेशन सिस्टम लगभग बंद था। अस्पताल बनाने के लिए मात्र एक खाली पार्किंग लॉट उपलब्ध था, जहां बिजली और पानी की व्यवस्था भी नहीं थी।

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न बिजली न पानी की व्यवस्था

स्थानीय प्रशासन के सहयोग से इंजीनियर और मेडिकल टीम ने रातभर काम किया और फील्ड हॉस्पिटल को तैयार किया। पोर्टेबल जेनसेट लगाकर लगातार बिजली की व्यवस्था की गई, ताकि सर्जरी, इमरजेंसी केयर और अन्य महत्वपूर्ण मेडिकल सेवाएं रुकें नहीं। पानी की सप्लाई बहाल करने में भी टीम ने स्थानीय अधिकारियों के साथ मिलकर काम किया और कम्युनिकेशन नेटवर्क को भी री-एक्टिवेट किया, जिससे भारत और श्रीलंका की एजेंसियों के साथ रियल-टाइम संपर्क संभव हो पाया।

ड्रोन की मदद से इलाके का एरियल सर्वे

सेना ने बताया कि अस्पताल तैयार करने के दौरान नई तकनीक का भी पूरा उपयोग किया गया। ड्रोन की मदद से इलाके का एरियल सर्वे किया गया, जिससे हॉस्पिटल का लेआउट तय करने में आसानी हुई। हीटिंग, वेंटिलेशन और एयर कंडीशनिंग ये युक्त टेंट (तापमान नियंत्रित मेडिकल टेंट) में ऑपरेशन थिएटर बनाया गया, जहां मरीजों की सर्जरी सुरक्षित माहौल में की जा सकती थी। सैंपल और ब्लड मूवमेंट के लिए विशेष टूल्स का उपयोग किया गया, जिससे डायग्नोस्टिक रिपोर्ट फटाफट मिल सके। (Indian Army Op Sagar Bandhu)

कुछ ही दिनों में यह फील्ड हॉस्पिटल मल्टी-स्पेशियलिटी सेंटर में बदल गया। यहां एक्स-रे, लैब, डेंटल केयर, फैमिली मेडिसिन और ऑर्थोपेडिक्स जैसी सुविधाएं उपलब्ध करा दी गईं।

Indian Army Op Sagar Bandhu

5000 से अधिक मरीजों का इलाज

सेना के मुताबिक, जाफना और कैंडी के पास बनाए पैरा फील्ड हॉस्पिटल ने कुछ ही दिनों में अपनी क्षमता साबित कर दी। यहां अब तक 5000 से अधिक मरीजों का इलाज किया गया है। 8 दिसंबर को अकेले 1,128 मरीज पहुंचे, जिनमें 73 छोटी और 4 सर्जरी की गईं। कुल मिलाकर 5 इमरजेंसी सर्जरी और 67 माइनर प्रक्रियाएं यहां पूरी की जा चुकी हैं। बाढ़ से तबाह लोगों को न सिर्फ इलाज मिला, बल्कि उनसे बातचीत कर सेना के जवानों ने उनका मनोबल भी बढ़ाया।स्थानीय लोगों ने इस हॉस्पिटल की काफी सराहना की है। वहीं श्रीलंका के राष्ट्रपति भी यहां बने इस अस्पताल का जल्द दौरा कर सकते हैं। (Indian Army Op Sagar Bandhu)

मेडिकल टास्क फोर्स में 85 विशेषज्ञ शामिल

भारतीय सेना की मेडिकल टास्क फोर्स में 85 विशेषज्ञ शामिल हैं जिनमें डॉक्टर, सर्जन, नर्सिंग स्टाफ, इंजीनियर, सिग्नलर्स और लॉजिस्टिक टीमें मौजूद हैं। यह टीम 24 घंटे काम कर रही है। इसी दौरान सिग्नल टीम ने एक क्षतिग्रस्त ऑप्टिकल फाइबर केबल भी ठीक किया, जिससे इलाके में मोबाइल नेटवर्क वापस चालू हो गया। यह स्थानीय लोगों के लिए बड़े राहत की बात थी। वहीं, सेना ने पीने का साफ पानी भी उपलब्ध कराया और जरूरत के मुताबिक मानव सेवा के अन्य कार्य किए। (Indian Army Op Sagar Bandhu)

Indian Army Op Sagar Bandhu
Lt Col Jagneet Gill, Contingent Commander of the Indian Army team deployed under Operation Sagar Bandhu in Sri Lanka

ठीक किए टूटे पुल

इसके साथ ही भारतीय सेना की इंजीनियर टास्क फोर्स ने श्रीलंका के कई हिस्सों में क्षतिग्रस्त पुलों की मरम्मत शुरू की। जाफना के पुलियाम्पोककनई ब्रिज से टूटी पैनलों को हटाकर रास्ता खोलने का काम किया गया। परंथन–कराच्ची–मुल्लैतिवु (ए35) रोड पर स्थित एक बड़े ब्रिज को हटाने और बदलने का काम भी शुरू हो चुका है। जरूरत पड़ने पर भारतीय वायुसेना के हेलीकॉप्टरों से बैली ब्रिज के पुर्जे एयरलिफ्ट किए गए, ताकि यातायात जल्द बहाल हो सके। (Indian Army Op Sagar Bandhu)

नौसेना और वायुसेना भी राहत में जुटीं

राहत सामग्री वितरण में भी भारतीय टीम ने बड़ी भूमिका निभाई। तमिलनाडु सहित भारत के विभिन्न हिस्सों से भेजी गई दवाइयां, भोजन, कपड़े और आवश्यक वस्तुएं प्रभावित परिवारों तक पहुंचाई गईं। अब तक लगभग 1,050 टन राहत सामग्री श्रीलंका को दी जा चुकी है। भारतीय नौसेना के जहाजों आईएनएस विक्रांत, उदयगिरि, सुकन्या, घड़ियाल और एलसीयू जहाजों ने लगातार सप्लाई पहुंचाई। हेलीकॉप्टरों ने बाढ़ से कटे क्षेत्रों में सामान और पुल के पार्ट्स गिराकर राहत पहुंचाई। एनडीआरएफ, नौसेना और वायुसेना की संयुक्त कार्रवाई से 450 से अधिक लोगों की जान बचाई जा सकी। (Indian Army Op Sagar Bandhu)

Matsya 6000 Submersible: भारत ने बनाई पहली मानवयुक्त डीप-सी पनडुब्बी, समुद्रयान प्रोजेक्ट का है हिस्सा

Matsya 6000 Submersible
Matsya 6000 Submersible

Matsya 6000 Submersible: इंडिया इंटरनेशनल साइंस फेस्टिवल (IISF) 2025 में देश की पहली स्वदेशी मानवयुक्त डीप-सी पनडुब्बी मत्स्य 6000 सबमर्सिबल को पेश किया गया है। यह पनडुब्बी समुद्र के अंदर 6,000 मीटर की गहराई तक जा सकती है और इसमें तीन लोग बैठ सकते हैं।

यह पनडुब्बी समुद्रयान प्रोजेक्ट का हिस्सा है, जिसे नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओशन टेक्नोलॉजी ने तैयार किया है। इसका टाइटेनियम हुल बेहद मजबूत है और समुद्र के भीतर पड़ने वाले 600 गुना भारी दबाव को सहन कर सकता है।

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इसके साथ ही भारत अब उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया है, जिनके पास ऐसी डीप-सी मानवयुक्त तकनीक मौजूद है। इससे पहले यह क्षमता केवल अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, चीन, इटली, स्विट्जरलैंड और डेनमार्क के पास थी।

मत्स्य 6000 सबमर्सिबल का मुख्य उद्देश्य समुद्र तल का अध्ययन करना है। पूर्व नौसेना अधिकारी पीआर श्रीकांत ने बताया कि यह पनडुब्बी समुद्र की सतह के नीचे फैले तेल, खनिज और समुद्री जीवन का सर्वे करेगी। उनके मुताबिक पनडुब्बी में हाई-रिजॉल्यूशन कैमरा और सोनार लगे हैं, जो समुद्र तल का डेटा रिकॉर्ड करेंगे।

वैज्ञानिकों का कहना है कि भारत के एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन की औसत गहराई लगभग 3,741 मीटर (370 किमी या 200 नॉटिकल माइल्स) है। ऐसे में मत्स्य 6000 सबमर्सिबल गहरे समुद्र तक पहुंचकर ऐसे संसाधनों की जानकारी देगी, जो अब तक अनछुए थे।

इस साल पनडुब्बी ने 500 मीटर तक कई ड्राई टेस्ट पूरे किए, जिनमें इसके सभी सिस्टम और स्ट्रक्चर की जांच की गई। अब आगे समुद्री परीक्षण और लाइव ट्रायल किए जाएंगे, जिसमें इसे समुद्र में उतारा जाएगा।

Pakistan Army Wink Scandal: पाकिस्तानी सेना के डीजी आईएसपीआर ने महिला पत्रकार को मारी आंख, वीडियो वायरल होते ही मचा बवाल

Pakistan Army DG ISPR Scandal

Pakistan Army Wink Scandal: पाकिस्तान सेना के मीडिया विभाग डीजी आईएसपीआर की प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। जिसके बाद पाकिस्तानी सेना की प्रोफेशनल छवि को गंभीर सवालों के घेरे में खड़ी हो गई है। इस वीडियो में, पाकिस्तान आर्मी के प्रवक्ता लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ चौधरी को एक महिला पत्रकार को प्रेस ब्रीफिंग के बीच में आंख मारते हुए देखा गया। जिसके बाद सोशल मीडिया पर लाखों यूजर्स ने पाकिस्तान सेना की कड़ी आलोचना की।

वायरल वीडियो में पत्रकार अब्सा कोमल जनरल चौधरी से यह पूछते दिखाई देती हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान को “नेशनल सिक्योरिटी थ्रेट”, “एंटी-स्टेट” और “दिल्ली के इशारों पर चलने वाला” कहने का नया आधार क्या है। पत्रकार ने पूछा कि क्या यह रुख पहले के मुकाबले किसी बदलाव का संकेत देता है। इसी सवाल के जवाब में चौधरी ने कहा, “और एक चौथा पॉइंट भी जोड़ लीजिए… वो एक ‘जेह्नी मरीज’ भी हैं।” इतना बोलने के बाद उन्होंने मुस्कुराते हुए पत्रकार की तरफ आंख मारी।

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यह पूरी घटना विवाद की वजह बन गई। जैसे ही वीडियो सोशल मीडिया पर आया, उस पर कई यूजर्स ने लिखा कि एक वरिष्ठ सैन्य अधिकारी द्वारा महिला पत्रकार के सामने इस तरह का इशारा “अनप्रोफेशनल” और “अनुचित” है। एक यूजर ने लिखा, “डीजी आईएसपीआर महिला पत्रकार से फ्लर्ट कर रहा है? यह प्रेस कॉन्फ्रेंस थी या सस्ता मजाक?” एक अन्य यूजर ने कहा, “यही वजह है कि पाकिस्तान की संस्थाओं पर भरोसा खत्म होता जा रहा है।”

कुछ पत्रकार संगठनों और महिला अधिकार समूहों ने भी इस घटना पर चिंता जताई और इसे “लिंगभेदी व्यवहार” बताया। उनका कहना है कि वरिष्ठ अधिकारियों से अपेक्षा होती है कि वे प्रेस के सामने संयम, सम्मान और प्रोफेशनलिज्म का पालन करें। पाकिस्तान जैसे संवेदनशील राजनीतिक वातावरण में इस तरह का व्यवहार और भी गंभीर माना जाता है।

जनरल चौधरी पिछले कई महीनों से पाकिस्तान सेना का सबसे आक्रामक चेहरा बने हुए हैं। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत को लेकर उनके कई बयान चर्चा में रहे। उन्होंने कई बार दावा किया कि पाकिस्तान “कभी नागरिकों को निशाना नहीं बनाता” और भारत को “कड़े जवाब” की चेतावनी भी दी थी। भारत में उनके कई बयानों को भड़काऊ और तथ्यहीन बताया गया था।

एक और विवाद इस बात को लेकर भी उठ रहा है कि चौधरी का बैकग्राउंड किस तरह से लंबे समय से विवादों में रहा है। वे आतंकी वैज्ञानिक सुल्तान बशीरुद्दीन महमूद के बेटे हैं, जिन्हें ओसामा बिन लादेन से संबंधों के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आरोपी घोषित किया गया था।

वायरल घटना उस समय हुई है जब जनरल चौधरी लगातार इमरान खान पर तेज हमले कर रहे हैं। पिछले हफ्ते की मीडिया ब्रीफिंग में उन्होंने खान को “नरसिसिस्ट”, “मेंटली इल पर्सन” और “नेशनल सिक्योरिटी के लिए खतरा” कहा था। उन्होंने दावा किया कि खान अपने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए पाकिस्तान सेना के खिलाफ “डिजिटल नैरेटिव” तैयार कर रहे हैं। इसके जवाब में खान ने सेना प्रमुख असीम मुनीर को “मेंटली अनस्टेबल” कहा था। इस तनातनी के बाद डीजी आईएसपीआर का विंक कांड और भी संवेदनशील मुद्दा बन गया है।

पाकिस्तान की मीडिया दुनिया में यह भी चर्चा है कि सेना और पत्रकारों के रिश्ते पहले ही तनाव में हैं। कई पत्रकारों ने खुलकर कहा है कि प्रेस कॉन्फ्रेंस में डर का माहौल होता है और सेना के खिलाफ सवाल पूछना आसान नहीं। ऐसे में डीजी आईएसपीआर का महिला पत्रकार को आंख मारना न केवल प्रोटोकॉल का उल्लंघन माना जा रहा है, बल्कि यह प्रेस की गरिमा को ठेस पहुंचाने जैसा भी बताया जा रहा है।

घटना के बाद सोशल मीडिया पर यह मांग भी उठने लगी है कि पाकिस्तान सेना को इस मामले में आधिकारिक स्पष्टीकरण देना चाहिए। अब तक सेना की तरफ से कोई बयान जारी नहीं किया गया है। पाकिस्तान के अंदर भी कई लोग पूछ रहे हैं कि अगर इसी तरह की घटना भारत या किसी लोकतांत्रिक देश में होती तो क्या सेना का कोई अधिकारी बच पाता?

सोशल मीडिया और राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह घटना पाकिस्तान की संस्थाओं में व्याप्त पितृसत्तात्मक सोच, प्रोफेशनल स्टैंडर्ड्स की गिरावट और तनावपूर्ण राजनीतिक हालात को बेनकाब करती है। एक ही वीडियो ने पाकिस्तान की सेना, मीडिया और राजनीति के बीच चल रही खाई को एक बार फिर सामने ला दिया है।

Mid Air refueller RFP India: भारतीय वायुसेना ने छह नए मिड-एयर रिफ्यूलर के लिए जारी किया आरएफपी, ये कंपनियां हैं दौड़ में सबसे आगे

Mid Air refueller RFP India
Mid Air refueller (Pic: IAF)

Mid Air refueller RFP India: भारतीय वायुसेना ने छह नए मिड-एयर रिफ्यूलिंग एयरक्राफ्ट के लिए रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल जारी किया है। यह सभी विमान सामान्य कमर्शियल पैसेंजर जेट से कन्वर्ट किए जाएंगे। इस प्रोजेक्ट में इजराइल एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड की टीम को सबसे मजबूत दावेदार बताया जा रहा है। दोनों ने पहले भी कई एयरक्राफ्ट कन्वर्जन प्रोजेक्ट में साथ काम किया है।

यह आरएफपी नवंबर में जारी किया गया था। इसके तहत भारतीय वायुसेना एक ऐसी क्षमता विकसित करना चाहती है, जो लंबी दूरी के मिशन को बिना जमीन पर उतरे पूरा करने में मददगार हो। मिड-एयर रिफ्यूलिंग की यह तकनीक किसी भी आधुनिक एयरफोर्स के लिए बेहद जरूरी मानी जाती है, क्योंकि यह लड़ाकू विमानों को हवा में ही ईंधन भरने की सुविधा देती है। इससे विमान लंबे ऑपरेशन कर पाते हैं और मुश्किल परिस्थितियों में भी अपनी मौजूदगी बनाए रखते हैं।

KC-135 Stratotanker India: अब लंबी दूरी तक मिशनों को अंजाम दे सकेंगे वायुसेना के फाइटर जेट्स, अमेरिकी एयर-टू-एयर रिफ्यूलिंग टैंकर पहुंचा भारत

वायुसेना का लक्ष्य करीब 12 मिड-एयर रिफ्यूलर शामिल करने का है। मौजूदा आरएफपी छह कन्वर्टेड एयरक्राफ्ट के लिए है। इसके बाद एक अलग आरएफपी छह नए बने रिफ्यूलर के लिए जारी किया जाएगा, जिनका निर्माण सीधे ओईएम (ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर) द्वारा किया जाएगा।

आरएफपी में यह नियम रखा गया है कि जिस कंपनी को यह काम मिलेगा, उसे कम से कम 30 फीसदी हिस्सा भारत में ही बनाना होगा। वहीं यह शर्त कई विदेशी कंपनियों के लिए मुश्किल बन जाती है। कारण यह है कि सिर्फ छह रिफ्यूलर विमान का ऑर्डर बहुत छोटा माना जाता है। इतनी कम संख्या के लिए भारत में बड़ी फैक्ट्री या प्रोडक्शन लाइन लगाना विदेशी कंपनियों के लिए महंगा और गैर-फायदेमंद हो सकता है। इस वजह से इजराइल एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड की टीम को सबसे मजबूत दावेदार माना जा रहा है, क्योंकि दोनों पहले से मिलकर ऐसे कन्वर्जन प्रोजेक्ट पर काम कर चुके हैं और भारत में ही निर्माण की क्षमता रखते हैं।

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भारत के पास फिलहाल छह रूसी आईएल-78 एमकेआई टैंकर हैं, जिन्हें 2003 में शामिल किया गया था। समय बीतने के साथ इन विमानों में मेंटेनेंस और सर्विसेबिलिटी से जुड़ी दिक्कतें आ रही हैं। स्पेयर पार्ट्स की कमी और पुरानी तकनीक के चलते ये अकसर उपलब्ध नहीं रह पाते हैं। इसके चलते नई रिफ्यूलिंग क्षमता को डेवलप करना वायुसेना की जरूरत बन गई है।

इजराइल एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ने अप्रैल 2022 में एक समझौता किया था, जिसके तहत वे भारत में कमर्शियल बोइंग 767 पैसेंजर जेट को मल्टी-मिशन टैंकर ट्रांसपोर्ट विमान में कन्वर्ट करेंगे। इसी तरह का मॉडल इटली और जापान की सेनाएं भी इस्तेमाल करती हैं। इजराइल एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज के पास कई सालों से पुराने कमर्शियल विमानों को लेटेस्ट रिफ्यूलिंग प्लेटफॉर्म में बदलने का अनुभव है। इस सेक्टर में यह कंपनी दुनिया की प्रमुख खिलाड़ियों में से एक है।

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भारत को हाल ही में अमेरिका की कंपनी मेट्रिया मैनेजमेंट से एक केसी-135 स्ट्रैटो टैंकर पट्टे पर मिला है। यह एक पूरी तरह वेट-लीज व्यवस्था है, जिसमें विमान चलाने से लेकर मेंटेनेंस तक का पूरा काम अमेरिकी कंपनी करेगी। इससे फिलहाल वायुसेना को कुछ राहत मिली है, लेकिन लंबे समय के लिए वायुसेना को अपने रिफ्यूलर शामिल करना जरूरी है।

वायुसेना के लड़ाकू विमान सुखोई-30 राफेल, और तेजस लंबी दूरी के मिशन कर सकते हैं। उत्तरी सीमा से लेकर समुद्री इलाकों तक, कई ऑपरेशन ऐसे हैं जहां मिड-एयर रिफ्यूलिंग की जरूरत पड़ती है। नए रिफ्यूलर आने के बाद इन मिशनों में वायुसेना की क्षमता और बढ़ जाएगी।

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पिछले दशक में वायुसेना कई बार टैंकर खरीदने का प्रयास कर चुकी है। यूरोप की एयरबस कंपनी का ए330 और अमेरिका का केसी-46 पेगासस पहले कंपटीशन में शामिल थे, लेकिन ऊंची लागत और तकनीकी चुनौतियों के चलते इन्हें मंजूरी नहीं मिल सकी। नए आरएफपी से उम्मीद है कि प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ेगी।

वायुसेना के एक अधिकारी के मुताबिक, यह परियोजना उन अधिकांश जरूरतों को पूरा करेगी जो आने वाले सालों में फोर्स को लंबी दूरी तक तैनाती करने में मदद करेंगी। वायुसेना लगातार उत्तरी और समुद्री मोर्चों पर अपनी मौजूदगी बनाए रखती है। ऐसे में अतिरिक्त रिफ्यूलिंग क्षमता उसके ऑपरेशन को मजबूती देगी।

P-8I Deal Stalled: महंगी कीमतों और टैरिफ के चलते अटकी नौसेना के ‘आंख और कान’ की डील! ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान नेवी को कर दिया था नजरबंद

P-8I Deal Stalled
Pic: Indian Navy

P-8I Deal Stalled: भारत ने अमेरिका से छह और पी-8आई पोसिडियन मैरीटाइम सर्विलांस विमान डील फिलहाल रोक दी है। इसकी पीछे वजह राजनीतिक और आर्थिक के साथ-साथ विमान की कीमतों में हुई बढ़ोतरी और टैरिफ वॉर बताई जा रही है। सरकार ने डील को निष्पक्ष तरीके से फिर से देखने के निर्देश दिए हैं, लेकिन अभी तक इसे पूरी तरह रद्द नहीं किया गया है।

पिछले सालों में भारतीय नौसेना ने मिलाकर 12 पी-8आई विमान खरीदे थे और इन्हें हिंद महासागर क्षेत्र में निगरानी, एंटी-सबमरीन और मैरीटाइम सर्विलांस के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। 2009 में भारत ने आठ विमान 2.2 बिलियन डॉलर में खरीदे थे और 2016 में चार और जहाज खरीदे। इसके बाद 2021 में छह अतिरिक्त विमानों के लिए अमेरिक ने अनुमति दी थी, लेकिन पिछले कुछ सालों में इनकी कीमतें बढ़कर 3.6 बिलियन डॉलर तक पहुंच गईं, जो 2021 के प्रस्तावित मूल्य से लगभग 50 फीसदी ज्यादा है। (P-8I Deal Stalled)

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सरकारी सूत्रों का कहना है कि अमेरिका ने सप्लाई चेन में दिक्कतों और प्रोडक्शन कॉस्ट में बढ़ोतरी को वजह बताते हुए कीमत घटाने से इंकार किया है। इसी बीच अमेरिका ने कुछ ट्रेड स्लिप और टैरिफ मुद्दों को लेकर दबाव भी डाला, जिनमें हाल का 25 फीसदी का टैरिफ निर्णय शामिल है, जिसके चलते द्विपक्षीय व्यापार माहौल पर भी असर पड़ा। इसे देखते हुए रक्षा मंत्रालय ने खरीद पर रोक लगाकर स्पेशल रिव्यू का आदेश दिया है। (P-8I Deal Stalled)

नौसेना की तकनीकी टीम अब मौजूदा 12 पी-8आई विमानों के जरिए इंडियन ओशन रीजन की निगरानी जारी रखेगी। अधिकारियों के अनुसार पी-8आई की क्षमताओं को देखते हुए नौसेना को नए विमानों की जरूरत थी, ताकि फ्लाइट आवर्स और कवरेज में सुधार हो सके। लेकिन लागत बढ़ने के चलते बजट और प्राथमिकताओं की समीक्षा जरूरी हो गई है। बढ़ी कीमत का असर रक्षा बजट पर होगा और इसलिए रक्षा मंत्रालय ने वैकल्पिक घरेलू विकल्पों पर भी ध्यान देने का फैसला किया है। इसके तहत हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड और डीआरडीओ के प्लेटफॉर्म पर जोर दिया जा रहा है, साथ ही अनमैन्ड एयर सिस्टम्स जैसे एमक्यू-9बी ड्रोंस को विकल्प माना जा रहा है। (P-8I Deal Stalled)

भारतीय नौसेना के पी-8आई पोसीडन विमान पिछले दस साल में कई बड़े सैन्य अभियानों में बेहद कारगर साबित हुए हैं। यह विमान न सिर्फ लंबी दूरी तक समुद्री निगरानी करते हैं, बल्कि इनमें वही हथियार लगे हैं जो दुनिया के सबसे ताकतवर मैरीटाइम पेट्रोल एयरक्राफ्ट में लगे होते हैं। ये विमान हवा में 10-12 घंटे तक रह सकते हैं, रडार, सोनार और सेंसर से रियल-टाइम डेटा शेयर करते हैं। (P-8I Deal Stalled)

भारत के पी-8आई उन चुनिंदा देशों के वर्जन में शामिल हैं जिन्हें अमेरिका ने पूरी कॉम्बैट क्षमता के साथ मंजूरी दी थी। इनमें एजीएम-84एल हार्पून मिसाइल और एमके-54 टॉरपीडो लगाए गए हैं, जो दुश्मन के जहाजों और पनडुब्बियों को निशाना बनाने में सक्षम हैं।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी आईएनएस विक्रांत के कैरियर ग्रुप के साथ पी-8आई ने पाक नेवी को अपने तटों तक सीमित रखा, जिससे वो डिफेंसिव मोड में रह गई। ये विमान अरब सागर और इंडियन ओशन रीजन में तैनात थे, जहां से उन्होंने पाकिस्तानी नौसेना की मूवमेंट को लगातार ट्रैक किया। (P-8I Deal Stalled)

साल 2017 के डोकलाम संकट में इन विमानों ने बेहद अहम भूमिका निभाई थी। उस दौरान पी-8आई ने पूर्वी सेक्टर में लगातार उड़ानें भरीं और सिक्किम-भूटान-चीन वाले त्रिकोणीय क्षेत्र के साथ बंगाल की खाड़ी में भी लंबे मिशन किए। इन विमानों ने चीन की नौसेना की गतिविधियों, खासकर उनकी पनडुब्बियों और सर्वे जहाजों की मूवमेंट को भी करीब से ट्रैक किया। अंडमान-निकोबार से उड़ान भरकर पी-8आई ने हिंद महासागर में मौजूद चीनी जहाजों पर भी कड़ी नजर रखी और यह सारी जानकारी नौसेना और भारतीय वायुसेना के साथ रियल-टाइम में साझा की गई। यह पहला मौका था जब भारत ने किसी एक्टिव कॉन्फ्रंटेशन की स्थिति में इन विमानों का इतने बड़े स्तर पर इस्तेमाल किया था। उस समय के नौसेना प्रमुख एडमिरल सुनील लांबा ने भी सार्वजनिक रूप से कहा था कि पी-8आई ने चीन की हर गतिविधि का पहले से पता लगाने में मदद की। (P-8I Deal Stalled)

इसके बाद कई मौकों पर इन विमानों ने भारत के रणनीतिक अभियानों को मजबूती दी। बालाकोट एयरस्ट्राइक के बाद पी-8आई ने अरब सागर में पाकिस्तान की पनडुब्बी को ट्रैक करके उसे सतह पर आने के लिए मजबूर किया। लद्दाख तनाव के दौरान रोजाना लंबी दूरी के मिशन उड़ाकर पी-8आई ने चीनी सेना की सप्लाई और मूवमेंट की निगरानी की। हिंद महासागर में चीन के “रिसर्च वेसल” के नाम पर काम कर रहे जहाजों पर भी इन विमानों ने लगातार नजर रखी। कुछ महीनों पहले ऑपरेशन सिंदूर में भी मालदीव के पास हुए ड्रोन बोट हमले के दौरान पी-8आई ने रियल-टाइम निगरानी साझा की। (P-8I Deal Stalled)

भारतीय नौसेना के पास अभी 12 पी-8आई विमान हैं और वे अब तक 45,000 से ज्यादा फ्लाइट ऑवर्स पूरे कर चुके हैं। नौसेना इन्हें अपनी “आंख और कान” कहती है, क्योंकि ये पूरे हिंद महासागर क्षेत्र में दुश्मन की हर छोटी-बड़ी गतिविधि को पकड़ लेते हैं। यही वजह है कि नौसेना इस फ्लीट को 18 तक बढ़ाने की योजना पर लंबे समय से काम कर रही है। (P-8I Deal Stalled)