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INS Sindhughosh Decommissioned: 40 साल बाद हुई नौसेना के ‘ब्लैक होल’ की विदाई, भारत को मिली थी अंडरवॉटर स्ट्राइक पावर

INS Sindhughosh Decommissioned

INS Sindhughosh Decommissioned: भारतीय नौसेना के इतिहास का एक अहम अध्याय शुक्रवार को समाप्त हो गया। भारतीय नौसेना में ‘ब्लैक होल’ के नाम से मशहूर आईएनएस सिंधुघोष (S55) को औपचारिक रूप से सेवा से मुक्त कर दिया गया। मुंबई के नेवल डॉकयार्ड में सूर्यास्त के समय हुई इस परंपरागत सेरेमनी के साथ ही 40 साल तक समुद्र की गहराइयों में देश की सुरक्षा करने वाली इस पनडुब्बी ने अंतिम सलामी ली। यह वही पनडुब्बी थी, जिसने 1986 से लेकर 2025 तक भारतीय समुद्री सीमाओं की चुपचाप, लेकिन बेहद मजबूत तरीके से सुरक्षा की।

INS Sindhughosh Decommissioned: सिंधुघोष क्लास की लीड सबमरीन

आईएनएस सिंधुघोष उस दौर की पनडुब्बी है, जब भारत ने अंडरवॉटर वॉरफेयर में अपनी पहचान बनानी शुरू की। इसे भारतीय नौसेना की सिंधुघोष क्लास की लीड सबमरीन माना जाता है, जो रूसी किलो-क्लास डिजाइन पर बेस्ड थी। चार दशक की सेवा के दौरान इस पनडुब्बी ने कई अहम मिशन, लंबी पेट्रोलिंग, हथियार परीक्षण और कई अंतरराष्ट्रीय नौसैनिक अभ्यासों में हिस्सा लिया।

19 दिसंबर की शाम जैसे ही सूरज ढलने लगा, नौसेना की पुरानी परंपरा के अनुसार नेवल डॉकयार्ड में डीकमीशनिंग पेनेंट को नीचे उतारा गया। यह वही क्षण होता है, जब किसी युद्धपोत या पनडुब्बी को आधिकारिक रूप से ‘पे-ऑफ’ किया जाता है। इस मौके पर पश्चिमी नौसेना कमान के शीर्ष अधिकारी, पूर्व नौसैनिक अधिकारी, वेटरंस और सिंधुघोष पर सेवा कर चुके कई पुराने क्रू मेंबर्स मौजूद थे।

सेरेमनी के दौरान अधिकारियों ने पनडुब्बी के संग बिताए अहम पलों को याद किया। इन लोगों ने कभी इसी पनडुब्बी के अंदर महीनों तक समुद्र की गहराइयों में ड्यूटी की थी। उनके लिए यह सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि अपने जीवन के एक हिस्से को विदा करने जैसा था।

INS Sindhughosh Decommissioned: 1986 से शुरू हुआ सफर

आईएनएस सिंधुघोष को 30 अप्रैल 1986 को तत्कालीन सोवियत यूनियन के रीगा शिपयार्ड में भारतीय नौसेना में शामिल किया गया था। उस समय भारत अपनी पुरानी फॉक्सट्रॉट क्लास पनडुब्बियों को बदलने की तैयारी कर रहा था और सिंधुघोष क्लास इस दिशा में बड़ी पहल थी। यह पनडुब्बियां डीजल-इलेक्ट्रिक थीं, यानी सतह पर डीजल इंजन और पानी के नीचे बैटरियों से चलती थी।

करीब 72 मीटर लंबी यह पनडुब्बी सतह पर लगभग 2300 टन और पानी के नीचे करीब 3000 टन वजनी थी। यह 300 मीटर तक गहराई में गोता लगा सकती थी और लगभग 45 दिनों तक समुद्र में ऑपरेट कर सकती थी। इसमें करीब 53 नौसैनिकों का दल इस पर तैनात रहता था।

आईएनएस सिंधुघोष को कहते थे ‘ब्लैक होल’

सिंधुघोष क्लास को दुनिया की सबसे शांत पनडुब्बियों में गिना जाता है। नाटो देशों ने इन्हें ‘ब्लैक होल’ तक कहा, क्योंकि इनका नॉइज सिग्नेचर बेहद कम होता है। दुश्मन के सोनार के लिए इन्हें पकड़ना आसान नहीं होता। यही वजह थी कि भारतीय नौसेना के लिए यह पनडुब्बियां अंडरवॉटर स्ट्राइक और सर्विलांस का मजबूत हथियार बनी रहीं।

आईएनएस सिंधुघोष ने कई बार लंबी गश्त के दौरान अपनी स्टेल्थ क्षमता साबित की। बिना शोर किए दुश्मन के इलाके के पास जाकर निगरानी करना और जरूरत पड़ने पर हमले की तैयारी रखना, इसका मुख्य रोल था।

पहली बार क्रूज मिसाइल से लैस

आईएनएस सिंधुघोष की सबसे बड़ी खासियतों में से एक यह थी कि यह भारतीय नौसेना की पहली पनडुब्बी बनी, जिसे क्लब-एस क्रूज मिसाइल सिस्टम से लैस किया गया। 2003–04 के मिड-लाइफ रिफिट के दौरान इस पनडुब्बी में यह क्षमता जोड़ी गई। इसके बाद यह न केवल दुश्मन के जहाजों, बल्कि जमीन पर मौजूद टारगेट्स को भी सटीकता से निशाना बना सकती थी।

इस अपग्रेड के बाद सिंधुघोष की स्ट्राइक रेंज और मारक क्षमता में बड़ा इजाफा हुआ। बाद के सालों में क्लब मिसाइलों की टेस्ट फायरिंग और अभ्यासों में भी इस पनडुब्बी की अहम भूमिका रही।

चार दशकों की सेवा में आईएनएस सिंधुघोष ने कई ऑपरेशनल डिप्लॉयमेंट्स पूरे किए। इसने हिंद महासागर क्षेत्र में भारतीय नौसेना की मौजूदगी को मजबूत किया। मल्टीनेशनल एक्सरसाइज में हिस्सा लेकर इसने दूसरी नौसेनाओं के साथ इंटरऑपरेबिलिटी भी दिखाई।

हालांकि आईएनएस सिंधुघोष 2008 में एक मर्चेंट शिप से भी टकरा गई थी, लगभग एक महीने तक सेवा से बाहर रहने के बाद यह फिर वापस लौट आई। 2013 में पास ही खड़ी आईएनएस सिंधुरक्षक में हुए विस्फोट से इसे मामूली नुकसान पहुंचा था, लेकिन यह दोबारा ऑपरेशनल हो गई।

खरीदी थीं 10 सिंधुघोष क्लास पनडुब्बियां

भारत ने कुल 10 सिंधुघोष क्लास पनडुब्बियां खरीदी थीं। ये सभी 1986 से 2000 के बीच नौसेना में शामिल हुईं। पिछले कुछ वर्षों में उम्र पूरी कर चुकी कुछ पनडुब्बियों को धीरे-धीरे सेवा से हटाया जा रहा है। आईएनएस सिंधुध्वज (S56) को 2022 में और आईएनएस सिंधुरक्षक (S63) को पहले ही डीकमीशन किया जा चुका है। अब आईएनएस सिंधुघोष के जाने के बाद इस क्लास की केवल सात पनडुब्बियां ही ऑपरेशनल हैं।

इन पनडुब्बियों ने दशकों तक भारतीय नौसेना की अंडरवॉटर ताकत की रीढ़ का काम किया। इन्हीं के दम पर भारत ने समुद्र के नीचे चुपचाप निगरानी और स्ट्राइक की क्षमता विकसित की।

भारतीय नौसेना का फोकस अब नई पीढ़ी की पनडुब्बियों पर है, जिनमें ज्यादा स्टेल्थ, ज्यादा एंड्योरेंस और आधुनिक हथियार सिस्टम होंगे। स्कॉर्पीन क्लास पनडुब्बियां, आने वाला प्रोजेक्ट-75 (आई) और परमाणु पनडुब्बियां इसी दिशा में कदम हैं।

Bangladesh Political Unrest: चुनाव टालने के लिए मोहम्मद यूनुस ने चल दी अपनी आखिरी चाल! सत्ता न छोड़नी पड़े इसलिए बनाया भारत-विरोधी माहौल

Bangladesh Political Unrest

Bangladesh Political Unrest: बांग्लादेश में चरमपंथी कार्यकर्ता शरीफ ओस्मान हादी की मौत के बाद बांग्लादेश एक बार फिर अनिश्चितता के माहौल में है। बांग्लादेश में एक बार फिर हिंसा, अराजकता और भारत-विरोधी माहौल बनता दिख रहा है। लेकिन इस बार न तो वहां शेख हसीना हैं और न ही खालिदा जिया। वहां इस समय मोहम्मद यूनुस देश के कार्यवाहक है। बस अंतर इतना है कि वहां अगले साल की शुरुआत में चुनाव होने हैं और किसी चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकार को सत्ता सौंपनी है।

Bangladesh Political Unrest: हादी की हत्या के बाद मचा बवाल

बांग्लादेश में फिलहाल जो हिंसा भड़की है, उसके पीछे वजह 12 दिसंबर को हुई एक हत्या मानी जा रही है। जिसमें ढाका में 32 वर्षीय शरीफ उस्मान हादी की बाइक सवार नकाबपोश हमलावरों ने गोली मार कर हत्या कर दी थी। उसे इलाज के लिए सिंगापुर ले जाया गया था, जहां 18 दिसंबर को उसकी मौत हो गई। हादी उन युवाओं में शामिल था, जिसने अगस्त 2024 में हुए आंदोलन के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना के खिलाफ प्रदर्शन किया था। हादी एक नए राजनीतिक मंच से जुड़ा था और फरवरी में होने वाले चुनावों के लिए सक्रिय तौर पर प्रचार कर रहा था। हादी के मौत के बाद ढाका और कई अन्य शहरों में विरोध प्रदर्शन तेज हो गए।

इंकलाब मंच प्लेटफॉर्म के प्रवक्ता के तौर पर, हादी अपने कट्टर भाषणों और भारत विरोधी रुख के लिए जाने जाते थे, जिससे उनके कट्टर समर्थक और कट्टर दुश्मन दोनों बन गए थे।

Bangladesh Political Unrest: पुलिस का दावा, भारत भागे आरोपी

बांग्लादेश पुलिस ने दावा किया कि हादी पर हमला करने वाले दो आरोपी भारत की ओर भाग गए हैं। इसी दावे के माहौल और गरमा गया और हादी के समर्थकों और कुछ कट्टर संगठनों ने इसे आधार बनाकर भारत के खिलाफ नारेबाजी शुरू कर दी।

देखते-ही-देखते प्रदर्शन भारत के राजनयिक ठिकानों तक पहुंच गए। ढाका स्थित भारतीय उच्चायोग के अलावा चटगांव, राजशाही, खुलना और सिलहट में मौजूद सहायक उच्चायोगों के बाहर भी प्रदर्शन हुए। हालात इतने बिगड़े कि एक दिन के लिए बांग्लादेशियों के लिए वीजा आवेदन केंद्र बंद करना पड़ा।

भारत ने तुरंत बांग्लादेश के राजदूत को तलब किया और अपने राजनयिक मिशनों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की।

Bangladesh Political Unrest: मीडिया को बनाया निशाना

इस पूरे घटनाक्रम में एक और बेहद गंभीर बात सामने आई। बांग्लादेश के दो सबसे बड़े और प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों पर हमला कियाा गया। ढाका में द डेली स्टार और प्रथम आलो के दफ्तरों में तोड़फोड़ और आगजनी की गई।

विडंबना यह है कि यही दोनों अखबार पहले शेख हसीना सरकार की आलोचना करते रहे थे और छात्र आंदोलन को भी समर्थन दिया था। अब इन्हें “भारत समर्थक” और “पुरानी सत्ता के सहयोगी” बताकर निशाना बनाया गया। डेली स्टार ने इसे “स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए काला दिन” करार दिया।

अंतरिम सरकार की मुश्किलें

फिलहाल बांग्लादेश में मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार है। अगस्त 2024 में शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद बनी इस सरकार का मुख्य काम चुनाव कराना और सुधार लागू करना है। लेकिन मौजूदा हालात में यह सरकार कानून-व्यवस्था संभालने में कमजोर पड़ती दिख रही है।

सड़कों पर गुस्सा है, राजनीतिक दल एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं और कट्टरपंथी संगठनों की सक्रियता बढ़ती दिख रही है। ऐसे में सवाल उठने लगे हैं कि क्या सरकार फरवरी में तय चुनाव शांतिपूर्ण तरीके से करा पाएगी?

क्या वक्त पर होंगे चुनाव?

बांग्लादेश चुनाव आयोग ने 12 फरवरी 2026 को आम चुनाव कराने की घोषणा की है। लेकिन भारत और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर इस बात पर है कि क्या यह चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष होंगे। भारत बार-बार कह चुका है कि वह बांग्लादेश में “फ्री, फेयर, इनक्लूसिव और क्रेडिबल” चुनाव चाहता है। यहां “इनक्लूसिव” शब्द खास तौर पर अहम है, क्योंकि इसका मतलब है कि शेख हसीना की अवामी लीग को भी चुनाव में हिस्सा लेने का मौका मिले।

हालांकि बांग्लादेश सरकार और उसके सलाहकार इस शब्द से बचते नजर आते हैं। उनका कहना है कि चुनाव का स्तर ऊंचा होना चाहिए, न कि किसी खास पार्टी की भागीदारी पर जोर दिया जाए।

चुनाव टालने की साजिश के आरोप

बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी ने मौजूदा हालात को लेकर चिंता जताई है। पार्टी के नेताओं का कहना है कि हिंसा और अराजकता चुनाव प्रक्रिया को पटरी से उतार सकती है। वहीं, शेख हसीना सरकार में मंत्री रह चुके कुछ नेताओं ने आरोप लगाया है कि अंतरिम सरकार जानबूझकर हालात बिगड़ने दे रही है, ताकि चुनाव टाले जा सकें। उनके मुताबिक भारत-विरोधी माहौल बनाकर अंतरराष्ट्रीय ध्यान खींचने की कोशिश भी की जा रही है।

भारत के लिए क्यों है चिंता की बात

भारत के लिए यह सिर्फ बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति का सवाल नहीं है। भारत को डर है कि अगर वहां हालात और बिगड़े, तो इसका असर सीमा पार भी पड़ सकता है। कट्टरपंथ, अवैध घुसपैठ और हिंसा का असर भारत के पूर्वी राज्यों, खासकर पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर पर पड़ सकता है।

इसके अलावा, अप्रैल-मई 2026 में पश्चिम बंगाल में भी चुनाव होने हैं। भारत सरकार नहीं चाहती कि बांग्लादेश की अशांति का कोई “स्पिलओवर” भारतीय राजनीति या सुरक्षा व्यवस्था पर पड़े।

रिटायर्ड मेजर जनरल सुधाकर जी ने इस हिंसा को एक बड़ी रणनीति का हिस्सा बताया हैं। उन्होंने कहा, “बांग्लादेश में हो रही घटनाओं का मूल मकसद भारत को उकसाना और उसे एक लंबे संघर्ष में खींचना है।”

उन्होंने संयम बरतने की अपील करते हुए तैयारी पर जोर दिया और भारत को जल्दबाजी में कोई कदम उठाने से बचने की सलाह दी। उन्होंने कहा, “इंतजार करें और देखें, अपनी जासूसी, निगरानी, ​​खुफिया संसाधनों को तैनात रखें ताकि पहले से कदम उठाने के विकल्प तैयार किए जा सकें और किसी भी अप्रत्याशित घटना को रोका जा सके।
मेजर जनरल सुधाकर जी का कहना है कि भारत को हर कीमत पर लंबे संघर्ष से बचना चाहिए।

हसीना के सत्ता छोड़ने के बाद भी जारी है हिंसा

साउथ एशियन यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर धनंजय त्रिपाठी ने कहा कि ये घटनाएं बहुत चिंताजनक हैं। उन्होंने कहा, “चिंता होनी चाहिए क्योंकि पड़ोस में जो कुछ भी होता है तो वह हमेशा चिंता का वजह होता है और खासकर पिछले एक साल में बांग्लादेश में जिस तरह की घटनाएं हो रही हैं, वे काफी खतरनाक हैं।”

उन्होंने हिंसा के एक पैटर्न की ओर इशारा किया जो शेख हसीना के सत्ता छोड़ने के बाद भी जारी है। प्रोफेसर त्रिपाठी ने कहा, “जिस तरह की हिंसा हमने शेख हसीना के सत्ता छोड़ने के बाद भी देखी है। हसीना के कार्यकर्ताओं और अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने की कोशिश की गई।”

हादी की मौत के बाद हुई हिंदा पर उन्होंने कहा, “यह भारत के लिए चिंताजनक स्थिति है क्योंकि भारत बांग्लादेश के साथ एक लंबी सीमा साझा करता है। शरीफ ओसामा की मौत के मामले में, बांग्लादेश के लोगों के एक वर्ग का आरोप है कि जो लोग जिम्मेदार पदों पर हैं, उनका कहना है कि ओसामा को मारने वाला व्यक्ति असल में भारत भाग गया है।”

हिंसा भारत के लिए अच्छा संकेत नहीं

त्रिपाठी ने कहा कि बीते दिन कुछ मीडिया हाउसों पर हमला हुआ, सिर्फ इसलिए कि उन्हें भारत समर्थक माना गया। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय उच्चायोग के आसपास हुए विरोध प्रदर्शन और इस तरह की घटनाएं बेहद चिंता पैदा करने वाली हैं।

उन्होंने चेतावनी दी कि यह सब ऐसे समय हो रहा है, जब बांग्लादेश में चुनाव नजदीक हैं। फरवरी में होने वाले चुनावों से पहले इस तरह की हिंसा देश के लिए ठीक संकेत नहीं है। उनके मुताबिक, मौजूदा हालात पर बहुत सतर्क नजर रखने की जरूरत है।

त्रिपाठी ने कहा कि भले ही यह घटनाक्रम बांग्लादेश के भीतर का मामला हो, लेकिन इसका असर भारत पर भी पड़ सकता है। भारत का बांग्लादेश में निवेश है और दोनों देशों के बीच लंबी सीमा साझा होती है। ऐसे में वहां की अस्थिरता भारत के हितों को प्रभावित कर सकती है।

त्रिपाठी ने आशंका जताई कि ये हिंसक तत्व सिर्फ बांग्लादेश तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि अपने प्रॉक्सी नेटवर्क के जरिए भारत में भी परेशानी खड़ी करने की कोशिश कर सकते हैं।

Operation Sindoor Kamikaze Drones: ऑपरेशन सिंदूर ने बदली जंग की तस्वीर, जानें कैसे कामिकेज ड्रोन बनेंगे दुश्मन का काल

Operation Sindoor Kamikaze Drones
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Operation Sindoor Kamikaze Drones: ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय सेनाओं की कामयाबी के साथ ही एक बड़ा सबक भी मिला है। सबक यह है कि भविष्य के युद्ध अब सिर्फ बंदूक और मिसाइलों से नहीं, बल्कि ड्रोन और तकनीक से लड़े जाएंगे। भारतीय सेना भी इस सबक को गंभीरता से ले रही है। सेना अब 850 कामिकेज ड्रोन खरीदने जा रही है, जिनकी कीमत करीब 2000 करोड़ रुपये होगी। इन्हें लोइटरिंग म्यूनिशन या सुसाइड ड्रोन भी कहा जाता है। यह प्रस्ताव दिसंबर 2025 के आखिरी सप्ताह में होने वाली डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल की बैठक में मंजूरी के लिए रखा जाएगा।

सेना के सूत्रों के मुताबिक, यह खरीद फास्ट-ट्रैक प्रक्रिया के तहत होगी और सभी ड्रोन स्वदेशी कंपनियों से लिए जाएंगे। इन ड्रोन्स को थलसेना, वायुसेना, नौसेना और स्पेशल फोर्सेस में तैनात किया जाएगा।

Operation Sindoor Kamikaze Drones: ऑपरेशन सिंदूर में ड्रोन ने कैसे उड़ाए पाकिस्तान के होश

मई 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान ने भारत की तरफ 500 से ज्यादा ड्रोन भेजे। जिनमें से कुछ टोही तो कुछ हमलावार ड्रोन थे। इनका भारतीय सेनाओं ने बखूबी जवाब दिया और उन्हें मार गिराया। भारतीय सेना ने भी पहली बार इस ऑपरेशन में बड़े पैमाने पर लोइटरिंग म्यूनिशन्स यानी कामिकेज ड्रोन का इस्तेमाल किया। पहलगाम आतंकी हमले के बाद शुरू हुए इस ऑपरेशन में भारत ने पाकिस्तान और पीओके में मौजूद आतंकी ठिकानों पर सटीक और जबरदस्त हमले किए।

सेना के सूत्र बताते हैं कि ड्रोन हमलों की वजह से पहले ही दिन 9 में से 7 आतंकी ठिकाने पूरी तरह तबाह हो गए। इन हमलों में खास बात यह रही कि बिना किसी पायलट को खतरे में डाले, दुश्मन के कमांड सेंटर, लॉन्च पैड और लॉजिस्टिक ठिकानों को निशाना बनाया गया। इस पूरे ऑपरेशन में ड्रोन ने वह काम किया, जो पहले फाइटर जेट या आर्टिलरी से किया जाता था। जिसमें खतरा कम था और लेकिन सटीकता और मारक क्षमता ज्यादा थी।

Pinaka MBRL: ड्रोन या FPV अटैक से बचाने के लिए सेना ने पिनाका रॉकेट लॉन्चर पर लगाया यह खास जुगाड़, ऑपरेशन सिंदूर के बाद उठाया यह कदम

वहीं, जब पाकिस्तान ने जवाबी कार्रवाई की कोशिश की और बड़ी संख्या में ड्रोन भेजे, तो भारतीय एयर डिफेंस सिस्टम ने उनमें से अधिकतर को हवा में ही मार गिराया। इसके बाद भारतीय ड्रोनों ने पाकिस्तानी सैन्य ठिकानों पर भी हमला किया।

Operation Sindoor Kamikaze Drones: क्या होते हैं कामिकेज ड्रोन?

कामिकेज ड्रोन ऐसे हथियार होते हैं जो उड़ते हुए ही टारगेट के ऊपर मंडराते रहते हैं। जैसे ही सही टारगेट दिखता है, यह ड्रोन खुद को उसी पर गिराकर विस्फोट कर देता है। इसमें पायलट की जान को कोई खतरा नहीं होता और हमला बेहद सटीक होता है।

सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, “आज के युद्ध में दुश्मन को हराने से ज्यादा जरूरी है उसकी सोच, कमांड और संसाधनों को पंगु बनाना। कामिकेज ड्रोन इसमें बेहद असरदार हैं।”

यूक्रेन-रूस युद्ध और नागोर्नो-कराबाख संघर्ष में इन ड्रोंस की भूमिका पहले ही दुनिया देख चुकी है। अब भारत भी इसी दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।

Operation Sindoor Kamikaze Drones: ऑपरेशन सिंदूर में कौन-कौन से कामिकेज ड्रोन हुए इस्तेमाल

ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय सेना ने अलग-अलग रेंज और भूमिकाओं वाले ड्रोन इस्तेमाल किए। इनमें सबसे अहम नाम स्काईस्ट्राइकर, नागास्त्र-1 और हारोप रहे। स्काईस्ट्राइकर ड्रोन भारत और इजरायल के संयुक्त सहयोग से बनाया गया है और इसका निर्माण बेंगलुरु में होता है। यह ड्रोन बिना शोर किए बेहद शांत तरीके से उड़ता है, लक्ष्य के ऊपर मंडराता है और सही समय पर सटीक हमला करता है। ऑपरेशन सिंदूर में इसका इस्तेमाल आतंकी ठिकानों और मूविंग टारगेट्स के खिलाफ किया गया।

नागास्त्र-1 भारत का पूरी तरह स्वदेशी कामिकेज ड्रोन है, जिसे नागपुर की सोलर इंडस्ट्रीज समूह ने बनाया है। यह ड्रोन पैदल सैनिक भी अपने साथ ले जा सकता है। इसकी खासियत यह है कि अगर मिशन बीच में रोकना हो, तो यह पैराशूट से सुरक्षित लैंडिंग भी कर सकता है। ऑपरेशन सिंदूर में इसका इस्तेमाल सीमावर्ती इलाकों में आतंकी लॉन्च पैड्स और छोटे ठिकानों के खिलाफ किया गया।

इसके अलावा लंबी दूरी और बड़े टारगेट्स के लिए इजरायली मूल के हारोप ड्रोन का भी इस्तेमाल हुआ। यह ड्रोन दुश्मन के रडार और एयर डिफेंस सिस्टम को निशाना बनाने में माहिर है। पाकिस्तानी सेना के ठिकानों पर हुए कई सटीक हमलों में इसकी अहम भूमिका रही।

भारतीय सेना के पास मौजूद प्रमुख कामिकेज और लोइटरिंग ड्रोन

फिलहाल भारतीय सेना के पास स्वदेशी और विदेशी, दोनों तरह के कामिकेज ड्रोन हैं। नागास्त्र-1 को सेना पहले ही शामिल कर चुकी है और इसके एडवांस वर्जन पर भी काम चल रहा है। स्काईस्ट्राइकर ड्रोन को भी सीमित संख्या में पहले ही शामिल किया जा चुका है।

इसके अलावा हारोप और हार्पी जैसे ड्रोन वायुसेना और थलसेना के पास पहले से मौजूद हैं, जिनका इस्तेमाल खास तौर पर दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम को निष्क्रिय करने के लिए किया जाता है। वहीं, सेना अब छोटे, मध्यम और लंबी दूरी के ड्रोन का ऐसा मिश्रण चाहती है, जिससे हर स्तर पर कमांडर को तुरंत हमला करने की क्षमता मिल सके।

हर बटालियन में बनेगी ‘अश्नि’ प्लाटून

सेना के सूत्रों के अनुसार, इस खरीद के बाद हर इन्फैंट्री बटालियन में एक अलग ‘अश्नि प्लाटून’ बनाई जाएगी। यह प्लाटून ड्रोन ऑपरेशन के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित होगी और सीधे दुश्मन के ठिकानों पर हमला कर सकेगी। ये प्लाटून आतंकवाद विरोधी अभियानों, सीमा पर निगरानी और दुश्मन के ठिकानों पर सटीक हमले में अहम भूमिका निभाएंगी।

सेना के सूत्रों का कहना है कि आने वाले समय में पैदल सेना सिर्फ राइफल और मशीनगन तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि ड्रोन ऑपरेटर भी उसकी पहचान बनेंगे।

इससे पहले जहां किसी लक्ष्य पर हमला करने के लिए ऊपर से अनुमति और भारी हथियारों की जरूरत होती थी, वहीं अब बटालियन स्तर पर ही फैसला लेकर तेजी से कार्रवाई की जा सकेगी।

30 हजार ड्रोन का लक्ष्य

850 कामिकेज ड्रोन की यह खरीद सिर्फ शुरुआत है। सेना आने वाले वर्षों में करीब 30 हजार लोइटरिंग म्यूनिशन शामिल करने की योजना पर काम कर रही है। इसका मकसद यह है कि हर इन्फैंट्री यूनिट के पास अपनी निगरानी और हमला करने की क्षमता हो। इससे युद्ध का तरीका पूरी तरह बदल जाएगा, जहां दुश्मन पर हमला करने से पहले उसकी हर गतिविधि को पहले ही देखा और समझा जा सकेगा। यह रणनीति खास तौर पर पाकिस्तान और चीन से आने वाले ड्रोन खतरों को ध्यान में रखकर बनाई जा रही है।

स्वदेशी कंपनियों को मिलेगा बड़ा मौका

इस पूरी डील की एक अहम बात यह है कि सभी ड्रोन भारतीय कंपनियों से खरीदे जाएंगे। इससे न सिर्फ रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता बढ़ेगी, बल्कि देश की निजी कंपनियों और स्टार्टअप्स को भी बड़ा मौका मिलेगा। इस 2000 करोड़ रुपये की डील से देश की निजी रक्षा कंपनियों, स्टार्टअप्स और सप्लाई चेन को बड़ा बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

रक्षा सूत्रों का कहना है कि ऑपरेशन सिंदूर ने साबित कर दिया है कि ड्रोन अब भविष्य का हथियार नहीं, बल्कि वर्तमान का निर्णायक हथियार बन चुके हैं।

पिछले कुछ वर्षों में पाकिस्तान और चीन दोनों ने ड्रोन क्षमताओं पर तेजी से काम किया है। पाकिस्तान ने कई बार सीमावर्ती इलाकों में ड्रोन के जरिए हथियार और ड्रग्स की सप्लाई की है। वहीं चीन स्वॉर्म ड्रोन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित सिस्टम पर निवेश कर रहा है।

भारतीय सेना का मानना है कि कामिकेज ड्रोन की बड़ी संख्या में तैनाती से इन खतरों का तुरंत और प्रभावी जवाब दिया जा सकता है।

Air Force Test Pilots School: IAF के ‘सीक्रेट टेस्ट स्कूल’ में तैयार हुई पहली ड्रोन टेस्ट टीम

Air Force Test Pilots School

Air Force Test Pilots School: बेंगलुरु में 19 दिसंबर को भारतीय वायुसेना के एयरक्राफ्ट एंड सिस्टम्स टेस्टिंग एस्टैब्लिशमेंट (ASTE) के तहत काम करने वाले एयर फोर्स टेस्ट पायलट्स स्कूल (AFTPS) में दो खास कोर्सों का वैलेडिक्टरी फंक्शन हुआ। इसमें पहला टेस्ट कोर्स (अनमैन्ड एरियल सिस्टम्स) यानी ड्रोन टेस्टिंग से जुड़ा कोर्स और 25वां प्रोडक्शन टेस्ट पायलट्स कोर्स सफलतापूर्वक पूरा करने वाले अधिकारियों को सम्मानित किया गया।

Fighter Pilot Shivangi Singh: स्क्वाड्रन लीडर शिवांगी सिंह को मिला क्वालिफाइड फ्लाइंग इंस्ट्रक्टर बैज, पहली बार किसी महिला फाइटर पायलट को मिला यह सम्मान

समारोह के दौरान कोर्स में शानदार प्रदर्शन करने वाले अधिकारियों को ट्रॉफी दी गई। पास आउट हुए अधिकारी अब भारतीय वायुसेना में बेहद अहम जिम्मेदारियां संभालेंगे। ये अधिकारी नए फाइटर जेट्स की टेस्ट फ्लाइंग और देश में बन रहे ड्रोन व अनमैन्ड एरियल सिस्टम्स की टेस्टिंग करेंगे। इससे भारत के डिफेंस एयरोस्पेस सेक्टर में आत्मनिर्भरता को और मजबूती मिलेगी।

एयर फोर्स टेस्ट पायलट्स स्कूल देश की इकलौती ऐसी संस्था है, जहां फिक्स्ड विंग विमान, हेलीकॉप्टर और ड्रोन सिस्टम्स के लिए टेस्ट पायलट और फ्लाइट टेस्ट इंजीनियर तैयार किए जाते हैं। यह स्कूल कई दशकों से भारतीय रक्षा विमानन से जुड़े बड़े प्रोजेक्ट्स में अहम भूमिका निभाता आ रहा है। यहां से ट्रेनिंग लेने वाले अधिकारी तेजस जैसे लड़ाकू विमान, ध्रुव हेलीकॉप्टर और अन्य आधुनिक प्लेटफॉर्म्स की टेस्टिंग में शामिल रहे हैं। इसके अलावा भारत के महत्वाकांक्षी अंतरिक्ष मिशन गगनयान से जुड़े कई अधिकारी भी इसी संस्थान से प्रशिक्षित हैं।

अब तक एयर फोर्स टेस्ट पायलट्स स्कूल से 47 फ्लाइट टेस्ट कोर्स, 24 प्रोडक्शन टेस्ट पायलट कोर्स और 4 ड्रोन टेस्ट कोर्स पास आउट हो चुके हैं। इस स्कूल को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मान्यता मिली हुई है और दुनिया की चुनिंदा टेस्ट पायलट ट्रेनिंग संस्थाओं में इसका नाम शामिल है। यहां मित्र देशों के अधिकारियों को भी ट्रेनिंग दी जाती है।

इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एयर मार्शल केएए संजीव, वीएसएम, डायरेक्टर जनरल (एयरक्राफ्ट), भारतीय वायुसेना थे। समारोह में वायुसेना के वरिष्ठ अधिकारी, डीआरडीओ, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) और फ्लाइट टेस्टिंग से जुड़ी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के प्रतिनिधि भी मौजूद रहे।

Exercise Harimau Shakti 2025: महाजन में भारत–मलेशिया ने बताया ‘हम साथ-साथ’, खत्म हुआ “बाघ की ताकत” सैन्य अभ्यास

Exercise Harimau Shakti 2025

Exercise Harimau Shakti 2025: राजस्थान के महाजन फील्ड फायरिंग रेंज में भारत और मलेशिया की सेनाओं के बीच चल रहा ‘हरिमाउ शक्ति-2025’ अभ्यास आज खत्म हो गया। यह इस अभ्यास का पांचवां संस्करण था। दो हफ्ते चले इस अभ्यास ने दोनों देशों के बीच भरोसा और साझेदारी को और मजबूत किया। आज पूरी दुनिया में जब सुरक्षा के समीकरण बदल रहे हैं ऐसे में भारत और मलेशिया की ये साझीदारी काफी अहम हो जाती है।

ये सैन्य अभ्यास 5 दिसंबर से 18 दिसंबर तक चला। इस अभ्यास में में भारतीय सेना की डोगरा रेजिमेंट के 120 जवानों ने हिस्सा लिया। वहीं मलेशियाई सेना की 25वीं बटालियन के 70 जवान इस अभ्यास में शामिल हुए। महाजन की रेगिस्तानी इलाके में इन सैनिकों ने लगभग असली जंग जैसी स्थितियों में खुद को आजमाया।

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हरिमाउ शब्द मलेशिया से लिया गया है। मलेशिया में मलय भाषा बोली जाती है, जिसमें हरिमाउ को अर्थ है बाघ। वहीं शक्ति हिंदी और संस्कृत का शब्द है, जिसका मतलब ताकत या पावर होता है। दोनों को मिला कर लिखा जाए तो इसका अर्थ होता है बाघ की ताकत। इस अभ्यास का उद्देश्य दोनों देशों की सेनाओं के बीच सहयोग बढ़ाना, आतंकवाद विरोधी कार्रवाई, जंगल युद्ध और संयुक्त राष्ट्र मिशन के तहत ट्रेनिंग करना है। हरिमाउ शक्ति अभ्यास की शुरुआत साल 2012 में हुई थी और यह बारी-बारी से भारत और मलेशिया में आयोजित होता है।

‘हरिमाउ शक्ति-2025’ अभ्यास का मकसद संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के अध्याय सात के तहत अनकन्वेंशनल ऑपरेशंस की तैयारी करना था। इसमें आतंकवाद, उग्रवाद और असिमेट्रिक वारफेयर जैसी आज की चुनौतियों पर खास ध्यान दिया गया। साथ ही, कानूनी प्रक्रिया, नियम और मानवीय पहलुओं को भी अभ्यास में शामिल किया गया, ताकि अगर कभी संयुक्त राष्ट्र के शांति मिशनों में साथ जाना पड़े, तो दोनों सेनाएं पूरी तरह तैयार रहें।

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अभ्यास के दौरान भारतीय और मलेशियाई सैनिकों ने मिलकर कई जॉइंट टैक्टिकल ड्रिल्स भी कीं। इनमें जॉइंट पेट्रोलिंग, इलाके पर कंट्रोल, तलाशी अभियान और टारगेट को निष्क्रिय करना जैसे टाास्क शामिल थे। इस सबका फायदा ये हुआ कि दोनों सेनाओं का आपसी तालमेल और रियल टाइम में साथ काम करने की क्षमता में बढ़ोतरी हुई।

वहीं अभ्यास के दौरान शहरी और अर्ध-शहरी इलाकों में आतंकवाद से निपटने के लिए भी खास ट्रेनिंग दी गई। इसमें इमारतों की तलाशी, संकरी गलियों में मूवमेंट, आम नागरिकों की सुरक्षा और सटीक ऑपरेशन जैसी टास्क शामिल थे। इससे जवानों को मुश्किल हालात में सही फैसला लेने का नया अवसर मिला।

‘हरिमाउ शक्ति-2025’ का एक बड़ा आकर्षण था एमआई-17 हेलीकॉप्टर से स्लिथरिंग ड्रिल और हेलीबोर्न ऑपरेशंस। आपातकालीन हालात में लो-होवर जंप और सैनिकों की तुरंत तैनाती की गई। साथ ही घात लगाकर हमला, कमांड पोस्ट एक्सरसाइज और लाइव फायरिंग के जरिए नेतृत्व, योजना और आधुनिक हथियारों के इस्तेमाल का भी अभ्यास हुआ।

वहीं, अभ्यास में केवल लड़ाई के हुनर ही नहीं, सैनिकों की शारीरिक और मानसिक फिटनेस का भी ध्यान रखा गया। आर्मी मार्शल आर्ट्स, कॉम्बैट रिफ्लेक्स शूटिंग, योग और फिटनेस की एक्टिविटीज को इसमें शामिल किया गया। इससे यह संदेश गया कि आज की जंग में ताकत के साथ दिमागी संतुलन भी उतना ही जरूरी है।

इस दौरान दोनों देशों के सैनिकों के बीच खेल प्रतियोगिताएं और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए गए। इससे आपसी समझ और दोस्ती और गहरी हुई। एक-दूसरे की संस्कृति, परंपराओं और तौर-तरीकों को करीब से जानने का मौका भी मिला।

भारतीय सेना ने साफ कहा कि ‘हरिमाउ शक्ति-2025’ भारत और मलेशिया के गहरे रक्षा सहयोग का बढ़िया उदाहरण है। इस अभ्यास ने दिखा दिया कि दोनों देश न सिर्फ अपने रिश्ते मजबूत कर रहे हैं, बल्कि क्षेत्रीय शांति और वैश्विक सुरक्षा की जिम्मेदारी भी साथ उठाने को तैयार हैं।

IIC Membership Controversy: आईआईसी में सदस्यता का खेल! सरकारी कर्मचारी बताकर NGO वर्कर को बनाया एसोसिएट मेंबर

IIC Membership Controversy
India International Centre/ PIc: Muskaan Amlani

IIC Membership Controversy: दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर (IIC) को देश की सबसे प्रतिष्ठित बौद्धिक और सांस्कृतिक संस्थाओं में गिना जाता है। यहां मेंबरशिप को लेकर एक नया विवाद सामने आया है। मामला एक एसोसिएट मेंबर के प्रोफेशन की गलत जानकारी से जुड़ा है। इस खुलासे से इंडिया इंटरनेशनल सेंटर की चयन प्रक्रिया और पारदर्शिता पर सवाल उठने लगे हैं।

इंडिया इंटरनेशनल सेंटर की वेबसाइट पर अगस्त 2024 में जो मेंबरशिप डॉक्यूमेंट अपलोड हुआ, उसमें मिस पोर्टिया बर्नाडाइन कॉनराड (मेंबर आईडी: ए-7841) का नाम एसोसिएट मेंबर के रूप में दर्ज है। उनके प्रोफेशन में लिखा है-“गवर्नमेंट इम्प्लॉयी।” यह लिस्ट 1 जून 2023 से 31 मई 2024 तक चुने गए लोगों की है।

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हालांकि, जब इसकी पड़ताल की गई तो पता चला कि पोर्टिया कॉनराड इस वक्त इंटरनेशनल बौद्धिस्ट कॉन्फेडरेशन (IBC) में इंटरनेशनल रिलेशंस डिवीजन की हेड हैं। इंटरनेशनल बौद्धिस्ट कॉन्फेडरेशन, एक अंतरराष्ट्रीय बौद्ध संगठन है, जिसका मुख्यालय दिल्ली में है। हालांकि इस संगठन को भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय से कुछ स्तर पर सहयोग मिलता है, लेकिन यह किसी सरकारी विभाग का हिस्सा नहीं है और इसके कर्मचारी सीधे तौर पर सरकारी कर्मचारी नहीं माने जाते।

पोर्टिया कॉनराड का नाम 2025 में कई अंतरराष्ट्रीय बौद्ध सम्मेलनों, सेमिनारों और लेखों में इंटरनेशनल बौद्धिस्ट कॉन्फेडरेशन की वरिष्ठ अधिकारी के तौर पर आया है। जुलाई 2025 में काठमांडू पोस्ट में छपे एक लेख में भी उनका यही परिचय छपा था। रूस और दक्षिण एशिया के तमाम कार्यक्रमों में भी उन्होंने आईबीसी का प्रतिनिधित्व किया। सितंबर 2025 में रूस के कल्मीकिया में ‘थर्ड इंटरनेशनल बौद्धिस्ट फोरम’ हुआ था, वहां उन्होंने “बुद्ध धर्म और एआई टेक्नोलॉजी” पर प्रेजेंटेशन दिया था, वहां भी खुद को आईबीसी की सीनियर अफसर ही बताया।

आईआईसी की सदस्यता प्रक्रिया वैसे तो काफी सेलेक्टिव मानी जाती है। एसोसिएट मेंबरशिप के लिए लोग खुद अपने प्रोफेशन, योग्यता और अनुभव की जानकारी फॉर्म में भरते हैं। ये डिटेल्स सेल्फ-डिक्लेयर्ड होती हैं, और चयन समिति इन्हीं जानकारी के आधार पर फैसला लेती है। आमतौर पर इनके पेशे या बैकग्राउंड की गहराई से जांच नहीं होती।

अगर कॉनराड के करियर की बात करें, तो 2016-2018 में वो विदेश मंत्रालय में कंसल्टेंट रहीं, वहां उन्होंने साउथ एशिया सिक्योरिटी और पाकिस्तान-अफगानिस्तान मामलों पर काम किया। 2014-2016 में नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल (प्रधानमंत्री कार्यालय) में स्ट्रैटेजिक एनालिस्ट थीं। लेकिन 2018 के बाद से उनका सरकारी कनेक्शन खत्म हो गया। 2018-2019 में वो खुद आईआईसी में प्रोग्राम ऑफिसर भी रही हैं, तब पूर्व राजदूत श्याम सरन के साथ काम किया। श्याम सरन फिलहाल आईआईसी के अध्यक्ष हैं।

कॉनराड पहले इंस्टीट्यूट ऑफ पीस एंड कॉन्फ्लिक्ट स्टडीज (IPCS) में रिसर्च इंटर्न भी रह चुकी हैं। इसके बाद से उनका मुख्य जुड़ाव आईबीसी और रिसर्च संस्थानों से ही रहा है। उन्होंने जामिया मिलिया इस्लामिया से इंटरनेशनल स्टडीज में पीएचडी की है। हमारे पास मौजूद दस्तावेजों में उनका विजिटिंग कार्ड भी है, जिसमें उन्होंने खुद को इंटरनेशनल बौद्धिस्ट कॉन्फेडरेशन में हेड ऑफ इंटरनेशनल रिलेशंस डिवीजन लिखा है।

इस मामले पर आईआईसी और पोर्टिया कॉनराड की प्रतिक्रिया लेने के लिए मेल भेजा है। पोर्टिया कॉनराड की तरफ से जवाब मिल चुका है।

पोर्टिया कॉनराड की ओर से भेजे गए जवाब में उन्होंने कहा, “उनकी प्रोफेशनल डिटेल खुद उनके द्वारा एक लिखित पत्र के जरिए दी गई थी। उनका कहना है कि वे इंटरनेशनल बौद्धिस्ट कॉन्फेडरेशन से जुड़ी रही हैं, जो भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के तहत काम करता है। वहां वे रिसर्च कोऑर्डिनेटर के रूप में काम कर चुकी हैं और वर्तमान में भी इंटरनेशनल रिलेशंस डिवीजन की जिम्मेदारी संभाल रही हैं।”

पोर्टिया कॉनराड ने यह भी बताया कि वे वर्ष 2014 से अलग-अलग भूमिकाओं में सरकार से जुड़ी रही हैं, जिसे उन्होंने अपने “गवर्नमेंट सर्विस” से जुड़े अनुभव के तौर पर पेश किया है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि इंडिया इंटरनेशनल सेंटर की सदस्यता उन्हें सीधे उस समय के अध्यक्ष (प्रेजिडेंट) द्वारा दी गई थी। इसके पीछे वजह उन्होंने यह बताई कि वे पहले आईआईसी की कर्मचारी रह चुकी हैं और उनकी एजुकेशनल औफ क्वॉलिफिकेशंस इस सदस्यता के लिए पर्याप्त मानी गईं हैं।

अपने जवाब में उन्होंने यह भी जोड़ा कि उन्होंने अब अपनी डॉक्टरेट की पढ़ाई पूरी कर ली है, और यदि आवश्यक हो तो इस एजुकेशनल क्वॉलिफिकेशंस को भी उनके प्रोफाइल में शामिल किया जा सकता है।

आईआईसी में करीब 7,000 मेंबर हैं, जिनमें इंस्टीट्यूशनल मेंबर भी शामिल हैं। सदस्यता सभी राष्ट्रीयताओं के लिए खुली है, अगर व्यक्ति की रुचि शिक्षा, संस्कृति, विज्ञान या शासन में हो। लेकिन स्थायी सदस्यता बेहद सीमित है, यह सिर्फ उन्हीं को मिलती है, जिन्होंने शॉर्ट टर्म एसोसिएट मेंबरशिप (STAM) पूरी की हो। एसोसिएट मेंबरशिप ही आईआईसी में एंट्री का रास्ता है। हालांकि आईआईसी गैर-सरकारी संस्था है और अपने अबाउट पेज में आईआईसी ने स्पष्ट तौर पर यह लिखा भी है।

वेबसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक, आईआईसी की मेंबरशिप प्रक्रिया सख्त है। आवेदक को फॉर्म में प्रोफेशन, योग्यता वगैरह खुद भरनी होती है। इन एप्लिकेशन्स की जांच STAM चयन समिति करती है, जिसमें डायरेक्टर, एक्जीक्यूटिव कमेटी के मेंबर और सचिव होते हैं। समिति साल में दो-तीन बार बैठती है और अध्यक्ष को अपनी सिफारिश भेजती है।

इंडिया इंटरनेशनल सेंटर की सदस्यता को प्रतिष्ठा से जोड़कर देखा जाता है। यहां देश-विदेश के बड़े नौकरशाह, राजनयिक, जज, लेखक, कलाकार और विद्वान सदस्य हैं। यह सिर्फ एक सेंटर नहीं, बल्कि बौद्धिक विमर्श और नीति संवाद का बड़ा मंच है। ऐसे में अगर कोई गलत जानकारी देकर मेंबर बन जाता है, तो पूरी चयन प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठना लाजिमी है।

(यह रिपोर्ट सार्वजनिक दस्तावेजों, वेबसाइट्स और प्रकाशित सामग्री पर आधारित है।)

Sapta Shakti Command के आर्मी कमांडर ने की सर्वदा अग्रणी ब्रिगेड की तैयारियों की समीक्षा

Sapta Shakti Command

Sapta Shakti Command: पश्चिमी मोर्चे पर भारतीय सेना की ऑपरेशनल तैयारियों को और मजबूत करने के लिए सप्त शक्ति कमांड के आर्मी कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल मनजिंदर सिंह ने राजस्थान के बिरधवाल क्षेत्र में स्थित सर्वदा अग्रणी ब्रिगेड का दौरा किया। यह दौरा ब्रिगेड के चल रहे कॉम्बैट इंजीनियरिंग ट्रेनिंग कैंप के दौरान किया गया, जहां रीयल टाइम वॉर जैसी परिस्थितियों में यूनिट की तैयारियों और क्षमताओं का मूल्यांकन किया गया।

यह दौरा ऐसे समय में हुआ है, जब भारतीय सेना पश्चिमी मोर्चे पर किसी भी स्थिति से निपटने के लिए अपनी तैयारियों को लगातार मजबूत कर रही है। निरीक्षण का उद्देश्य यह देखना था कि ब्रिगेड युद्ध जैसी परिस्थितियों में कितनी तेजी और प्रभावी तरीके से काम कर सकती है।

दौरे के दौरान आर्मी कमांडर ने कॉम्बैट इंजीनियरिंग से जुड़े कई अभ्यासों को देखा। इनमें बाधाएं हटाने, रास्ते बनाने, फील्ड फोर्टिफिकेशन तैयार करने और सैनिकों की सुरक्षा से जुड़े अभ्यास शामिल थे। इन अभ्यासों को वास्तविक युद्ध जैसी परिस्थितियों में किया गया, ताकि सैनिकों की प्रतिक्रिया क्षमता और समन्वय की सही जांच हो सके। इससे यह साफ हुआ कि ब्रिगेड कठिन हालात में भी तेजी से और सटीक तरीके से काम करने में सक्षम है।

लेफ्टिनेंट जनरल मनजिंदर सिंह को ब्रिगेड की भूमिका, मौजूदा तैयारियों और सप्त शक्ति कमांड के तहत उसकी जिम्मेदारियों के बारे में भी जानकारी दी गई। उन्हें बताया गया कि आधुनिक तकनीक और नए इंजीनियरिंग उपकरणों के इस्तेमाल से ब्रिगेड की कार्यक्षमता में लगातार सुधार हो रहा है। आधुनिक संचार साधन और तकनीकी उपकरण सैनिकों को तेजी से फैसले लेने में मदद कर रहे हैं।

आर्मी कमांडर ने ब्रिगेड में चल रहे क्षमता विकास कार्यों की भी समीक्षा की। इन प्रयासों का मकसद सैनिकों की गति, सुरक्षा और संचालन क्षमता को और बेहतर बनाना है, खासकर रेगिस्तानी इलाकों में जहां चुनौतियां अलग तरह की होती हैं।

Sapta Shakti Command

निरीक्षण के दौरान उन्होंने अधिकारियों, जूनियर कमीशंड ऑफिसर्स और जवानों से बातचीत की और उनके अनुशासन, मेहनत और उच्च मनोबल की सराहना की। उन्होंने कहा कि बदलते युद्ध के स्वरूप को देखते हुए नियमित और यथार्थवादी प्रशिक्षण बहुत जरूरी है। साथ ही नई तकनीक को जल्दी अपनाना और सभी रैंकों के बीच तालमेल बनाए रखना भी उतना ही अहम है।

डिफेंस पीआरओ लेफ्टिनेंट कर्नल निखिल धवन ने बताया कि यह दौरा भारतीय सेना की उस सोच को दिखाता है, जिसके तहत हर फॉर्मेशन की तैयारियों को समय-समय पर परखा जाता है। बिरधवाल में चल रहा यह प्रशिक्षण शिविर इस बात को सुनिश्चित करता है कि कॉम्बैट इंजीनियर यूनिट्स किसी भी परिस्थिति में अग्रिम मोर्चे पर तैनात सैनिकों को पूरा समर्थन दे सकें।

Operation Sindoor Cognitive Warfare: ऑपरेशन सिंदूर के दौरान क्या था ‘अदृश्य युद्ध’? रक्षा मंत्री के बयान से खुला राज, क्या है “मास्किरोव्का” स्ट्रेटेजी?

Operation Sindoor Cognitive Warfare

Operation Sindoor Cognitive Warfare: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने गुरुवार को ‘एयर फोर्स कमांडर्स’ कॉन्क्लेव को संबोधित करते हुए बेहद अहम बात कही। उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र करते हुए कहा कि आम तौर पर दुश्मन के हमले के समय लोग डर जाते हैं, लेकिन जब पाकिस्तानी सेना ने भारत के ठिकानों पर हमला करने की कोशिश की, तो देश की जनता बिल्कुल शांत रही और अपने रोजमर्रा के कामों में लगी रही। दरअसल रक्षा मंत्री अप्रत्यक्ष रूप से इन्फॉरमेशन वॉरफेयर का जिक्र कर रहे थे। यानी कि उस दौरान पाकिस्तान की तरफ से भारतीय सेनाओं को लेकर तमाम तरह के झूठ फैलाए जा रहे तब भी भारत की जनता उन झूठों के फेर में नहीं पड़ी और भारतीय सुरक्षा बलों पर भरोसा जताते हुए शांत रही। यानी कि उन्होंने पाकिस्तान की तरफ से आ रही फेक न्यूज को नकार दिया था।

Operation Sindoor Cognitive Warfare: लगातार चेताते रहे हैं रक्षा मंत्री

हालांकि रक्षा मंत्री ने पहली बार ये बात नहीं बोली है। वे इससे पहले भी संकेतों के माध्यम से इस ‘अदृश्य’ युद्ध के बारे में जिक्र करते रहे हैं। सितंबर 2025 में कोलकाता में संयुक्त कमांडर्स सम्मेल में भी नराजनाथ सिंह ने कहा था कि पारंपरिक युद्ध से आगे बढ़कर इनफॉरमेशन वॉरफेयर, आइडियोलॉजिकल वॉरफेयर (जो कॉग्निटिव वॉरफेयर से जुड़ा है), पर्यावरणीय और जैविक युद्ध जैसे अपरंपरागत खतरों से निपटने के लिए सतर्क और तैयार रहने की बात कही थी। उन्होंने कहा था कि युद्ध का स्वरूप बदल रहा है, और ये “अदृश्य चुनौतियां” उतनी ही घातक हैं।

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इस साल जून में देहरादून में आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने सूचना युद्ध को 21वीं सदी की बड़ी चुनौती बताया था। उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान द्वारा फर्जी वीडियो, मनगढ़ंत खबरें और सोशल मीडिया पोस्ट से प्रोपगैंडा फैलाने का उदाहरण दिया था और लोगों से अपील की कि वे सामाजिक सैनिक बनें और जागरूकता फैलाकर इस युद्ध में योगदान दें। उन्होंने डेटा और सूचना को सबसे बड़ी ताकत व चुनौती बताया।

नवंबर के आखिर में हुए चाणक्य डिफेंस डायलॉग 2025 के समापन सत्र में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने बहुत साफ शब्दों में कहा था कि आज की दुनिया में सूचना युद्ध एक बहुत बड़ी चुनौती बन गया है। उन्होंने कहा कि भारत ऐसे पड़ोस में रहता है जहां खतरे कई तरह के हैं, जिनमें आतंकवाद, सीमा पार से चरमपंथ को मदद, हालात बदलने की कोशिशें, समुद्र में दबाव और अब सूचना युद्ध भी शामिल है। इन सब जटिल चुनौतियों से निपटने के लिए हमें हर समय सतर्क रहना होगा और अपना लक्ष्य बिल्कुल स्पष्ट रखना होगा। राजनाथ सिंह ने सूचना युद्ध को नई पीढ़ी के खतरनाक हथियार बताया, जिसमें साइबर हमले भी शामिल हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि आज के अनिश्चित दौर में रक्षा क्षेत्र में सुधार कोई विकल्प नहीं, बल्कि जरूरी रणनीति है, ताकि हमारी सेनाएं इन अदृश्य खतरों, खासकर सूचना युद्ध, से मजबूती से मुकाबला कर सकें। (Operation Sindoor Cognitive Warfare)

Operation Sindoor Cognitive Warfare: क्या है कॉग्निटिव वॉरफेयर?

रक्षा मंत्री की बात बिल्कुल सही है। आज की दुनिया में युद्ध का मतलब सिर्फ टैंक, मिसाइल और सैनिकों की लड़ाई नहीं रह गया है। अब एक ऐसा युद्ध भी चल रहा है, जो न तो दिखाई देता है और न ही इसकी आवाज सुनाई देती है। इस युद्ध को कॉग्निटिव वॉरफेयर, यानी दिमाग और सोच का युद्ध कहा जाता है। यह लड़ाई सीधे इंसान के मन, सोच, भावनाओं और फैसलों को निशाना बनाती है। इसका मकसद किसी देश को हथियारों से हराना नहीं, बल्कि उसकी एकता, आत्मविश्वास और फैसला लेने की क्षमता को कमजोर करना होता है।

फ्रांस की नौसेना के वरिष्ठ अधिकारी और नाटो के शीर्ष सैन्य कमांडर एडमिरल पियरे वांदिये के अनुसार, कॉग्निटिव वॉरफेयर का सबसे बड़ा निशाना इंसानी दिमाग है। इसमें समाज को तोड़ना, लोगों के मन में शक पैदा करना और सरकार व संस्थानों पर भरोसा कम करना शामिल है। यह युद्ध शांति, संकट और खुले युद्ध की सीमाओं को मिटा देता है। कई बार लोग यह समझ भी नहीं पाते कि वे ऐसे किसी हमले का शिकार हो चुके हैं।

पारंपरिक सूचना युद्ध से कहीं आगे है कॉग्निटिव वॉरफेयर

कॉग्निटिव वॉरफेयर दरअसल पारंपरिक सूचना युद्ध से कहीं आगे की चीज है। पहले सूचना युद्ध में झूठी खबरें या प्रोपेगंडा तक सीमित रहती थी, लेकिन अब सीधे यह कोशिश की जाती है कि लोग क्या सोचें, कैसे सोचें और कब फैसला लें। अमेरिकी सैन्य रणनीतिकार जॉन बॉयड ने कहा था कि किसी भी दुश्मन को हराने के लिए उसके फैसले लेने की प्रक्रिया को भ्रमित कर देना काफी होता है। आज इसी सोच को हथियार बना लिया गया है। दुश्मन यह कोशिश करता है कि सामने वाला देश सही समय पर सही फैसला न ले पाए। (Operation Sindoor Cognitive Warfare)

दिमाग अब लक्ष्य भी है और हथियार भी

आज इंसान का दिमाग ही नया युद्धक्षेत्र बन चुका है। दिमाग अब लक्ष्य भी है और हथियार भी। यानी दुश्मन न केवल लोगों के दिमाग को निशाना बनाता है, बल्कि उन्हीं लोगों की भावनाओं और सोच का इस्तेमाल हथियार की तरह करता है। अगर किसी देश की सोच को पहले ही कमजोर कर दिया जाए, तो जमीन, हवा या समुद्र में लड़ाई की जरूरत ही नहीं पड़ती। यही वजह है कि यह युद्ध अक्सर “ग्रे जोन” में लड़ा जाता है, यानी उस स्तर पर जहां खुले युद्ध का ऐलान तो नहीं होता, लेकिन नुकसान लगातार होता रहता है।

Operation Sindoor Cognitive Warfare: रूस की “मास्किरोव्का” स्ट्रेटेजी

रूस और चीन कॉग्निटिव वॉरफेयर में सबसे आगे माने जाते हैं। दोनों देश शांति के समय, संकट के समय और युद्ध के समय एक ही रणनीति पर काम करते हैं, दुश्मन की सोच को नियंत्रित करना। वहीं पाकिस्तान भी तेजी से कॉग्निटिव वॉरफेयर की रणनीति पर काम कर रहा है।

रूस की रणनीति उसकी पुरानी सैन्य परंपराओं से निकली है। रूस लंबे समय से धोखे और भ्रम की नीति अपनाता रहा है, जिसे वह “मास्किरोव्का” कहता है। इसका मतलब होता है दुश्मन को गुमराह करना, ताकि वह गलत फैसले ले। 2014 में क्रीमिया पर कब्जे के दौरान रूस ने बिना वर्दी वाले सैनिक भेजे, और वह इससे लगातार इनकार करता रहा, साइबर हमले किए और मनोवैज्ञानिक दबाव बनाया। नतीजा यह हुआ कि यूक्रेन और पश्चिमी देश समय रहते कोई ठोस कदम नहीं उठा पाए।

“रिफ्लेक्सिव कंट्रोल” स्ट्रेटेजी भी यूज करता है रूस

वहीं, रूस एक और तकनीक का इस्तेमाल करता है, जिसे “रिफ्लेक्सिव कंट्रोल” कहा जाता है। इसमें दुश्मन को सीधे आदेश नहीं दिए जाते, बल्कि उसे ऐसी जानकारी दी जाती है कि वह खुद वही फैसला करे जो रूस चाहता है। इसमें दुश्मन की सोच, आदतें, कमजोरियां और मनोविज्ञान तक का अध्ययन किया जाता है। रूस इस तरह से लंबे समय तक माहौल बनाता है, ताकि बिना गोली चलाए ही रणनीतिक फायदा मिल जाए। (Operation Sindoor Cognitive Warfare)

आज इस रणनीति को साइबर हमलों, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और सोशल मीडिया प्रचार के साथ जोड़कर इस्तेमाल किया जाता है। इसका असर सेना के फैसलों से लेकर आम लोगों की राय तक पर पड़ता है। गलत जानकारी, फर्जी वीडियो और भ्रम फैलाकर पूरे सिस्टम को धीमा और कमजोर किया जाता है।

Operation Sindoor Cognitive Warfare: चीन की “थ्री वारफेयर” स्ट्रेटेजी

वहीं, चीन की रणनीति थोड़ी अलग है, लेकिन लक्ष्य वही है। चीन अपनी प्राचीन रणनीतिक सोच से प्रेरित है, जहां कहा गया है कि सबसे बड़ी जीत वह होती है, जिसमें दुश्मन बिना लड़े हार मान ले। चीन की सेना “थ्री वारफेयर” की नीति पर काम करती है। इसमें मनोवैज्ञानिक युद्ध, जनमत को प्रभावित करना और कानून की अपनी तरह से व्याख्या करना शामिल है।

चीन सिर्फ सेना तक सीमित नहीं रहता। वह सरकार, मीडिया, तकनीक, शिक्षा और संस्कृति सभी को इस रणनीति में शामिल करता है। चीन के लिए यह पूरे समाज की कोशिश होती है। घरेलू स्तर पर वह लोगों की सोच को नियंत्रित करता है और बाहर की दुनिया में अपनी कहानी फैलाता है। अंतरराष्ट्रीय कानून को भी अपने पक्ष में दिखाने की कोशिश करता है। दक्षिण चीन सागर और ताइवान से जुड़े मामलों में चीन लगातार यह दिखाने की कोशिश करता है कि वही सही है, जबकि बाकी देशों को आक्रामक या अस्थिर बताया जाता है। यह सब कॉग्निटिव वॉरफेयर का हिस्सा है, जिसमें दुनिया की सोच को अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश की जाती है। (Operation Sindoor Cognitive Warfare)

चीन अब नई तकनीक के जरिए इस युद्ध को और तेज कर रहा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, बड़े डेटा, ड्रोन, ऑटोमेशन और यहां तक कि दिमाग से जुड़ी रिसर्च को भी वह युद्ध की तैयारी में शामिल कर रहा है। चीन मानता है कि भविष्य के युद्ध का स्वरूप दिमाग पर नियंत्रण का होगा। इसलिए वह इंसानी भावनाओं, सोच और व्यवहार को समझने और प्रभावित करने पर भारी निवेश कर रहा है।

पाकिस्तान की फिफ्थ जेनरेशन वॉरफेयर (5GW) स्ट्रेटेजी

पाकिस्तान भी भारत के खिलाफ कॉग्निटिव वॉरफेयर में काफी सक्रिय है। यह तरीका उसने अपनी पारंपरिक सैन्य कमजोरियों को छिपाने के लिए अपनाया है और इसे हाइब्रिड वॉरफेयर का अहम हिस्सा बना लिया है। पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेस पब्लिक रिलेशंस (ISPR) के डायरेक्टर जनरल लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ चौधरी इनफॉरमेशन वॉरफेयर और कॉग्निटिव वॉरफेयर को फिफ्थ जेनरेशन वॉरफेयर (5GW) या हाइब्रिड वॉरफेयर का अहम हिस्सा बताते हैं।

पाकिस्तान की सेना की मीडिया इकाई ISPR इस पूरी रणनीति की रीढ़ है। ISPR और खुफिया एजेंसी आईएसआई मिलकर सोशल मीडिया पर झूठी खबरें, भ्रामक वीडियो, डीपफेक और बॉट नेटवर्क के जरिए भारत के खिलाफ लगातार नैरेटिव चलाते हैं। कश्मीर मुद्दे पर गलत जानकारियां फैलाना और भारतीय सेना की छवि खराब करना इसका प्रमुख उदाहरण है।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी पाकिस्तान ने बड़े पैमाने पर फर्जी वीडियो और सोशल मीडिया प्रोपगैंडा का इस्तेमाल किया। कई रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि इस क्षेत्र में पाकिस्तान भारत से आगे है, क्योंकि उसका सिस्टम ज्यादा केंद्रीकृत और आक्रामक है। चीन से मिलने वाली तकनीकी और साइबर मदद ने उसकी इस क्षमता को और मजबूत किया है। (Operation Sindoor Cognitive Warfare)

ग्रे जोन में कॉग्निटिव वॉरफेयर सबसे ज्यादा प्रभावी

कई सैन्य विशेषज्ञ मानते हैं कि आज दुनिया एक ऐसे दौर में पहुंच चुकी है, जहां शांति और युद्ध के बीच की रेखा लगभग मिट चुकी है। इसे ग्रे जोन कहा जाता है। इसी ग्रे जोन में कॉग्निटिव वॉरफेयर सबसे ज्यादा प्रभावी होती है। इसमें दुश्मन खुलकर युद्ध नहीं करता, बल्कि धीरे-धीरे समाज के भीतर अस्थिरता पैदा करता है। लोगों को यह एहसास भी नहीं होता कि वे किसी हमले का शिकार हो रहे हैं।

सोशल मीडिया बना सबसे आसान हथियार

नई तकनीक ने इस युद्ध को और खतरनाक बना दिया है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डीपफेक वीडियो, सोशल मीडिया बॉट्स और डेटा एनालिटिक्स की मदद से किसी भी देश के लोगों की भावनाओं को समझा और प्रभावित किया जा सकता है। अब फर्जी वीडियो, नकली भाषण और झूठी घटनाएं इतनी असली लगती हैं कि सच और झूठ में फर्क करना मुश्किल हो जाता है। सोशल मीडिया लोगों की भावनाओं को भड़काने का सबसे आसान हथियार बन गया है। गुस्सा, डर और नफरत सबसे जल्दी फैलती है, और दुश्मन इसी का फायदा उठाता है। (Operation Sindoor Cognitive Warfare)

सेना पर भी पड़ता है असर

सेना के स्तर पर भी कॉग्निटिव वॉरफेयर का असर गंभीर होता है। अगर कमांडर तक गलत जानकारी पहुंचे, या फैसला लेने की प्रक्रिया को भ्रमित कर दिया जाए, तो पूरी सैन्य कार्रवाई प्रभावित हो सकती है। आधुनिक सेनाएं डेटा, नेटवर्क और तकनीक पर निर्भर हैं, और यही निर्भरता उन्हें इस तरह के हमलों के प्रति कमजोर भी बनाती है। अगर किसी देश की सेना की सोच और आत्मविश्वास को पहले ही कमजोर कर दिया जाए, तो असली युद्ध की जरूरत ही नहीं पड़ती। यही इस युद्ध की सबसे खतरनाक बात है।

भारत के लोकतांत्रिक होने का दुश्मन को फायदा

भारत जैसे लोकतांत्रिक देश के लिए कॉग्निटिव वॉरफेयर एक बड़ी चुनौती है। इस तरह के हमलों के प्रति ज्यादा संवेदनशील होते हैं, क्योंकि वहां सूचना की आजादी होती है। लोग सोशल मीडिया पर खुलकर अपनी राय रखते हैं, जो बाद में उनके खिलाफ इस्तेमाल की जा सकती है। झूठी खबरें तेजी से फैलती हैं और सच अक्सर पीछे छूट जाता है। इसका असर समाज की एकता और स्थिरता पर पड़ता है। पिछले कुछ वर्षों में फेक न्यूज़, सोशल मीडिया के जरिए फैलाए गए झूठ और संस्थानों के खिलाफ दुष्प्रचार के कई उदाहरण सामने आए हैं। यह सभी घटनाएं इस बात का संकेत हैं कि भारत भी इस तरह के मानसिक युद्ध के दायरे में है। (Operation Sindoor Cognitive Warfare)

भारत की मानसिक मजबूती अभी कायम

हाल के ऑपरेशन सिंदूर के दौरान यह देखा गया कि कैसे तेज और सटीक सैन्य कार्रवाई के साथ-साथ सूचना और नैरेटिव पर भी नियंत्रण रखा गया। रक्षा मंत्री ने जिस तरह जनता के शांत व्यवहार और सेना पर भरोसे की बात कही, वह इस बात का संकेत था कि भारत की मानसिक मजबूती अभी कायम है। यही मजबूती किसी भी देश की सबसे बड़ी ढाल होती है।

कॉग्निटिव वॉरफेयर से निपटने के लिए केवल तकनीकी उपाय काफी नहीं हैं। इसके लिए समाज को मानसिक रूप से मजबूत बनाना जरूरी है। लोगों को यह समझना होगा कि हर दिखाई देने वाली खबर सच नहीं होती। मीडिया लिटरेसी, संस्थानों पर भरोसा और सही समय पर सही जानकारी देना भी बेहद जरूरी है। (Operation Sindoor Cognitive Warfare)

Pahalgam Terror Attack: पहलगाम हमले के आतंकियों के पास थे Xiaomi और Vivo के मोबाइल फोन

Pahalgam Terror Attack- NIA

Pahalgam Terror Attack: जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में 22 अप्रैल को हुए भीषण आतंकी हमले को लेकर राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी एनआईए की जांच में बड़ा खुलासा सामने आया है। जांच एजेंसी ने पाया है कि इस हमले में शामिल लश्कर-ए-तैयबा के आतंकियों ने चीनी कंपनियों के शाओमी और वीवो के एंड्रॉयड मोबाइल फोन इस्तेमाल किए थे। इनमें से दो मोबाइल पाकिस्तान के शहरों लाहौर और कराची से खरीदे गए थे।

एनआईए की ओर से जम्मू की एक अदालत में 1,597 पन्नों की चार्जशीट दाखिल की गई है। इसमें इस हमले से जुड़े छह आरोपियों के नाम दर्ज हैं। चार्जशीट के अनुसार, हमले में शामिल तीन पाकिस्तानी आतंकी मारे जा चुके हैं, जबकि दो स्थानीय लोगों को पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका है।

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जांच एजेंसी के मुताबिक, मारे गए तीन पाकिस्तानी आतंकियों की पहचान फैसल जट्ट उर्फ सुलेमान शाह, हबीब ताहिर उर्फ जिब्रान और हमजा अफगानी के रूप में हुई है। ये आतंकी पहलगाम हमले के बाद श्रीनगर के बाहरी इलाके में स्थित दाचीगाम जंगल में सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मारे गए थे।

एनआईए को इन आतंकियों के पास से तीन एंड्रॉयड मोबाइल फोन मिले थे। इनमें दो शाओमी रेडमी नोट-9 और शाओमी रेडमी नोट-12 थे। जांच के दौरान शाओमी कंपनी ने पुष्टि की कि ये दोनों मोबाइल फोन पाकिस्तान के लाहौर और कराची में बेचे गए थे। यह जानकारी जांच में एक अहम सबूत के तौर पर सामने आई है।

तीसरा मोबाइल फोन वीवो कंपनी का है, जिसकी जांच अभी जारी है। एनआईए यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि यह फोन कहां से खरीदा गया था और इसका इस्तेमाल किस तरह किया गया।

इस तकनीकी जांच में नेशनल टेक्निकल रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (एनटीआरओ) भी एनआईए की मदद कर रहा है। एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि आतंकियों ने इन मोबाइल फोन के जरिए किस तरह योजना बनाई और पाकिस्तान में बैठे अपने हैंडलरों से संपर्क रखा।

चार्जशीट में प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा और उसके फ्रंट संगठन द रेजिस्टेंस फ्रंट (TRF) का नाम भी शामिल किया गया है। जांच एजेंसी का कहना है कि हमले की योजना, फंडिंग और संचालन पाकिस्तान से जुड़े आतंकी नेटवर्क के जरिए किया गया।

जांच में यह भी सामने आया है कि आतंकियों ने चीनी मूल के अल्ट्रा सैटेलाइट फोन का इस्तेमाल किया था, जिससे वे मोबाइल नेटवर्क न होने वाले इलाकों में भी पाकिस्तान से संपर्क कर पा रहे थे। इन सैटेलाइट डिवाइस में खास चिप्स और इंटरनल एंटीना लगे होते हैं, जो सीधे चीनी सैटेलाइट से जुड़ जाते हैं।

22 अप्रैल को पहलगाम के पर्यटन क्षेत्र के पास हुए इस हमले में 26 लोगों की मौत हुई थी और कई अन्य घायल हुए थे। इस हमले के बाद कश्मीर में बड़े पैमाने पर तलाशी अभियान चलाया गया और सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई। इस आतंकी हमले के बाद भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान के अंदर आतंकी ठिकानों पर कार्रवाई की थी।

Indian Army IKIGAI: जापानी दर्शन अब सेना की रणनीति में! सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने दिया नया इकीगाई मंत्र

Ikigai meaning and Indian Army IKIGAI framework
Army Chief General Upendra Dwivedi

Indian Army IKIGAI: आजकल “इकीगाई” (IKIGAI) शब्द काफी चर्चा में है। यह शब्द आम लोगों के जीवन दर्शन से लेकर मिलिट्री प्लेटफॉर्म्स तक सुनाई दे रहा है। जापान से निकला यह कॉन्सेप्ट अब भारत में भी चर्चा का विषय बन गया है, खासकर तब जब भारतीय थलसेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर इकीगाई से जुड़ा एक नया फ्रेमवर्क पेश किया। ऐसे में यह समझना जरूरी हो जाता है कि इकीगाई क्या है और इसका सेना से क्या संबंध है।

Indian Army IKIGAI: इकीगाई का यह है मतलब

इकीगाई एक जापानी शब्द है। यह दो शब्दों से मिलकर बना है। “इकी” का मतलब होता है जीवन और “गाई” का अर्थ होता है कारण या मूल्य। यानी इकीगाई का सीधा अर्थ है जीवन जीने का कारण। इसे आसान भाषा में समझें तो यह वह वजह है, जिसके लिए कोई व्यक्ति हर सुबह उठता है और अपने दिन की शुरुआत करता है।

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जापान में इकीगाई को बहुत साधारण तरीके से देखा जाता है। वहां इसे किसी बड़े लक्ष्य या ऊंचे पद से नहीं जोड़ा जाता। यह रोजमर्रा की छोटी-छोटी खुशियों से जुड़ा होता है, जैसे परिवार के साथ समय बिताना, पसंद का काम करना, बागवानी, संगीत या समाज के लिए कुछ करना। जापान के ओकिनावा इलाके में लोग लंबी और संतुलित जिंदगी जीते हैं और इसके पीछे इकीगाई को एक अहम वजह माना जाता है। (Indian Army IKIGAI)

Indian Army IKIGAI: पश्चिमी देशों के लिए यह है इकीगाई का अर्थ

वहीं, पश्चिमी देशों में इकीगाई को थोड़ा अलग तरीके से समझाया गया। वहां इसे चार सवालों के मेल के रूप में पेश किया गया। पहला, आपको क्या पसंद है। दूसरा, आप किस काम में अच्छे हैं। तीसरा, दुनिया को किस चीज की जरूरत है। और चौथा, किस काम से आप कमाई कर सकते हैं। इन चारों के बीच संतुलन को इकीगाई कहा गया। हालांकि जापान में इसका मूल अर्थ इससे कहीं ज्यादा सरल और निजी है। (Indian Army IKIGAI)

Indian Army IKIGAI: सेना प्रमुख ने पेश किया नया इकीगाई फ्रेमवर्क

इकीगाई केवल निजी जीवन तक सीमित नहीं रहा। दिसंबर 2025 में जापान की मेजबानी में हुए लैंड फोर्सेस समिट के दौरान भारतीय थलसेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने इसी विचार से प्रेरित होकर एक नया इकीगाई फ्रेमवर्क पेश किया। यह फ्रेमवर्क इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में थल सेनाओं के बीच सहयोग को मजबूत करने के लिए प्रस्तावित किया गया।

इस समिट में भारत के साथ-साथ जापान, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और फिलीपींस जैसे देशों के सेना प्रमुख और वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए। बैठक में इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की सुरक्षा, रणनीतिक सहयोग और साझा चुनौतियों पर चर्चा हुई। इसी मंच पर जनरल द्विवेदी ने बताया कि जैसे इकीगाई व्यक्ति को जीवन का उद्देश्य देता है, वैसे ही यह नया इकीगाई फ्रेमवर्क सेनाओं को साझा उद्देश्य के साथ काम करने की दिशा दिखाता है। (Indian Army IKIGAI)

सेना के संदर्भ में इकीगाई एक एक्रोनिम है, यानी हर अक्षर का एक अलग मतलब है। इसमें सेनाओं के बीच आपसी तालमेल, सूचना साझा करना, जॉइंट ट्रेनिंग, मानवीय सहायता, तकनीकी सहयोग, सुरक्षा साझेदारी और लॉजिस्टिक्स सहयोग जैसे पहलू शामिल हैं। इसका मकसद यह है कि अलग-अलग देशों की थल सेनाएं मिलकर क्षेत्रीय शांति और स्थिरता बनाए रखें। (Indian Army IKIGAI)

Ikigai meaning and Indian Army IKIGAI framework

IKIGAI फ्रेमवर्क के कंपोनेंट्स

I – Interoperability and Information Sharing: सेनाओं के बीच कंपैटिबिलिटी और इंटेलिजेंस शेयरिंग।
K – Knowledge and Professional Military Education: नॉलेज शेयरिंग और प्रोफेशनल ट्रेनिंग/एजुकेशन।
I – International Humanitarian Assistance and Disaster Relief (HADR): अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानवीय मदद और डिजास्टर रिलीफ (जैसे भूकंप, बाढ़ में सहायता)।
G – Generative Technological Partnerships: उभरती टेक्नोलॉजी (जैसे AI, ड्रोन) में पार्टनरशिप।
A – Assurance for Security Partnerships: सिक्योरिटी पार्टनरशिप्स में विश्वास और गारंटी।
I – Integrated Logistics and Sustainment: इंटीग्रेटेड लॉजिस्टिक्स और सपोर्ट सिस्टम (सप्लाई चेन मजबूत करना)।

जनरल द्विवेदी ने इस फ्रेमवर्क को तीन बुनियादी आधारों पर रखा। पहला, साझा चुनौतियों की पहचान। दूसरा, समान सिद्धांतों पर सहमति। और तीसरा, मिलकर ठोस कदम उठाना। यह विचार इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ती सुरक्षा चुनौतियों के बीच सहयोग को मजबूत करने पर केंद्रित है।

क्वाड समूह के सदस्य देश शामिल

यह समिट इसलिए भी अहम मानी गई क्योंकि इसमें क्वाड समूह के सदस्य देशों की भागीदारी रही। क्वाड में भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं। इन देशों के बीच समुद्री और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर पहले से ही सहयोग चल रहा है। लैंड फोर्सेस समिट में हुई चर्चा ने थल सेनाओं के स्तर पर भी सहयोग को नई दिशा दी।

भारतीय सेना की ओर से यह संदेश साफ था कि भारत एक मुक्त, खुला और इन्क्लूसिव इंडो-पैसिफिक क्षेत्र का समर्थन करता है। इसके लिए समान सोच वाले देशों के साथ मिलकर काम करना जरूरी है। इकीगाई फ्रेमवर्क इसी सहयोग को एक स्ट्रक्चर्ड रूप देता है। (Indian Army IKIGAI)

इकीगाई का मूल भाव है “उद्देश्य”

इस तरह देखा जाए तो इकीगाई का मूल भाव “उद्देश्य” है। व्यक्तिगत जीवन में यह खुशी और संतुलन देता है, जबकि सैन्य संदर्भ में यह सहयोग, साझा जिम्मेदारी और स्थिरता का रास्ता दिखाता है। जापान की संस्कृति से निकला यह विचार अब अंतरराष्ट्रीय सिक्योरिटी डॉयलॉग का हिस्सा बन चुका है।

इकीगाई आज केवल एक जीवन दर्शन नहीं, बल्कि अलग-अलग क्षेत्रों में अपनाया जाने वाला एक ब्रॉड आइडिया बन गया है। चाहे आम इंसान की रोजमर्रा की जिंदगी हो या देशों की सेनाओं के बीच रणनीतिक सहयोग, इकीगाई का अर्थ हर जगह उद्देश्य और संतुलन से जुड़ा हुआ है। (Indian Army IKIGAI)