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K-4 Missile Test: 3500 किमी तक मार सकेगी भारत की के-4 मिसाइल, स्वदेशी न्यूक्लियर सबमरीन INS Arihant से किया सफल टेस्ट

K-4 Missile Test: India Strengthens Sea-Based Nuclear Deterrence with INS Arihant Launch
K-4 Missile Test: India Strengthens Sea-Based Nuclear Deterrence with INS Arihant Launch

K-4 Missile Test: जब ऊपर आसमान में हलचल मची हो या जमीन पर शोर हो, तो समंदर के नीचे एक अलग ही शांति पसरी रहती है। इसी शांति के बीच भारत ने हाल ही में एक ऐसा कदम उठाया, जिसकी गूंज दूर तक जाती है। जिस समय पूरी दुनिया सो रही थी, तब भारत ने अपनी मैरीटाइम न्यूक्लियर कैपेबिलिटी को और मजबूत करते हुए एक बड़ी उपलब्धि हासिल की। बंगाल की खाड़ी में देश की पहली स्वदेशी न्यूक्लियर सबमरीन आईएनएस अरिहंत से के-4 सबमरीन-लॉन्च्ड बैलिस्टिक मिसाइल का सफल यूजर ट्रायल किया। इस मिसाइल की मारक क्षमता करीब 3,500 किलोमीटर थी। इस ट्रायल के बाद भारत का न्यूक्लियर ट्रायड और मजबूत हुआ है।

हालांकि इस ट्रायल को लेकर रक्षा मंत्रालय या डीआरडीओ की तरफ से कोई औपचारिक बयान जारी नहीं किया गया है, लेकिन डिफेंस सूत्रों ने इसकी पुष्टि की है। यह ट्रायल विशाखापट्टनम के तट से दूर समुद्री क्षेत्र में किया गया, जहां दिसंबर के मध्य में जारी नोटैम यानी नोटिस टू एयरमेन के जरिए बड़े इलाके को ट्रायल के लिए सुरक्षित घोषित किया गया था।

K-4 Missile Test: मुश्किल होता है समुद्र से मिसाइल परीक्षण

समुद्र के नीचे से बैलिस्टिक मिसाइल का परीक्षण तकनीकी रूप से बेहद मुश्किल माना जाता है। पनडुब्बी से छोड़ी जाने वाली मिसाइल पहले पानी के अंदर से गैस प्रेशर की मदद से बाहर निकलती है और फिर सतह के ऊपर आते ही उसका इंजन एक्टिव होता है।

के-4 मिसाइल को खास तौर पर भारत की अरिहंत क्लास न्यूक्लियर पनडुब्बियों के लिए डिजाइन किया गया है। यह दो-स्टेज सॉलिड फ्यूल रॉकेट पर आधारित बैलिस्टिक मिसाइल है, जिसकी लंबाई करीब 12 मीटर और वजन लगभग 17 टन बताया गया है। यह मिसाइल करीब दो टन तक का पेलोड ले जा सकती है, जिसमें न्यूक्लियर वारहेड भी शामिल हो सकते हैं।

मिसाइल में सटीकता के लिए एडवांस्ड इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम के साथ जीपीएस और नाविक सपोर्ट दिया गया है। सर्कुलर एरर प्रोबेबल यानी सीईपी बहुत कम होने की वजह से इसे हाई एक्युरेसी मिसाइल माना जाता है। इसके अलावा, इसमें मैन्यूवरेबल री-एंट्री व्हीकल की क्षमता भी है, जिससे यह मिसाइल डिफेंस सिस्टम को चकमा भी दे सकती है।

K-4 Missile Test: के-15 से के-4 तक का सफर

इससे पहले आईएनएस अरिहंत पर के-15 मिसाइलें तैनात थीं, जिनकी रेंज करीब 750 किलोमीटर थी। के-4 मिसाइल की तैनाती से इसकी रेंज में कई गुना इजाफा हुआ है। इससे भारत की मैरीटाइम न्यूक्लियर कैपेबिलिटी बढ़ी है। के-4 मिसाइल के जरिए समुद्र में तैनात पनडुब्बी से कहीं अधिक दूर तक लक्ष्य को भेदने की क्षमता मिलती है।

K-4 Missile Test: भारत के पास दो एसएसबीएन

भारत के पास इस समय दो ऑपरेशनल नाभिकीय बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियां हैं। आईएनएस अरिहंत पहली ऐसी पनडुब्बी है, जिसे 2016 में कमीशंड किया गया था और 2018 में यह पूरी तरह ऑपरेशनल हुई। इसके बाद अगस्त 2024 में भारत की दूसरी एसएसबीएन आईएनएस अरिघात को नौसेना में शामिल किया गया। यह पनडुब्बी पहले की तुलना में ज्यादा स्वदेशी तकनीक से लैस है और इसमें भी के-4 मिसाइल को लगाया गया है।

इसके अलावा, तीसरी न्यूक्लियर सबमरीन आईएनएस अरिधमन का निर्माण भी चल रहा है। यह भारत की तीसरी रिहंत क्लास की एस-4 स्वदेशी न्यूक्लियर-पावर्ड बैलिस्टिक मिसाइल सबमरीन है। नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी ने 2 दिसंबर को पुष्टि की थी कि यह सबमरीन अपने अंतिम ट्रायल चरण में है और बहुत जल्द कमीशन की जाएगी। यह सबमरीन आईएनएस अरिहंत और आईएनएस अरिघात से थोड़ी बड़ी (7,000 टन डिस्प्लेसमेंट) है, ज्यादा के-4 सबमरीन-लॉन्च्ड बैलिस्टिक मिसाइल (3,500 किमी रेंज) कैरी कर सकती है। इसमें बेहतर स्टेल्थ, एडवांस्ड सीएमएस और ऑप्टिमाइज्ड 83 मैगावॉट रिएक्टर से लैस। यह महीनों तक पानी के नीचे रहकर नौसेना को सेकंड-स्ट्राइक कैपेबिलिटी देगी।

इसके अलावा भारत की चौथी न्यूक्लियर-पावर्ड बैलिस्टिक मिसाइल सबमरीन कोडनेम एस-4 स्टार भी तैयार हो रही है। यह अरिहंत क्लास की आखिरी सबमरीन है। इसका निर्माण पूरा हो चुका है, अब हार्बर और सी ट्रायल्स की तैयारी चल रही है। इसकी कमीशनिंग 2026 के अंत या 2027 की शुरुआत में होने की उम्मीद है। इसका वजन करीब 7,000 टन है और इसमें 75 फीसदी इंडिजिनस कंटेंट है। इसमे 8 के-4 मिसाइल लॉन्च ट्यूब्स लगाए जा सकते हैं, जिनकी रेंज 3,500 किमी तक है। इसके बाद नेक्स्ट जेनरेशन एस5 क्लास सबमरीन बनाई जाएंगी, जिनमें 12-16 मिसाइल्स लगाई जा सकेंगी।

K-4 Missile Test: एटीवी प्रोग्राम के तहत तैयार हो रहीं पनडुब्बियां

भारत का एडवांस्ड टेक्नोलॉजी वेसल यानी एटीवी प्रोग्राम कई दशकों से चल रहा है। इसी प्रोग्राम के तहत अरिहंत क्लास और आगे की पनडुब्बियों को तैयार किया गया है। शुरुआती पनडुब्बियों में 83 मेगावाट का न्यूक्लियर रिएक्टर लगाया गया है, जबकि आगे आने वाली बड़ी पनडुब्बियों में ज्यादा क्षमता वाले प्रेसराइज्ड लाइट वाटर रिएक्टर लगाने की योजना है।

K-4 Missile Test: क्या है न्यूक्लियर ट्रायड

भारत की न्यूक्लियर ट्रायंगल अरेंजमेंट में जमीन, हवा और समुद्र तीनों शामिल हैं। जमीन आधारित बैलिस्टिक मिसाइलों में अग्नि-5 जैसी मिसाइलें शामिल हैं, जिनकी मारक क्षमता पांच हजार किलोमीटर से ज्यादा है। वायुसेना के पास राफेल, सुखोई-30 एमकेआई और मिराज-2000 जैसे लड़ाकू विमान हैं, जो विशेष हथियार ले जाने में सक्षम हैं। समुद्री में न्यूक्लियर सबमरीन सबसे सुरक्षित और भरोसेमंद मानी जाती हैं, क्योंकि इन्हें ढूंढना बेहद मुश्किल होता है।

ट्राई-सर्विस स्ट्रैटेजिक फोर्सेज कमांड के अधीन

इन न्यूक्लियर सबमरीन और मिसाइलों का ऑपरेशन ट्राई-सर्विस स्ट्रैटेजिक फोर्सेज कमांड के अधीन होता है। यह कमान देश की न्यूक्लियर एसेट्स के ऑपरेशन और कॉर्डिनेशन के लिए जिम्मेदार है। के-4 मिसाइल का परीक्षण इसी सिस्टम के तहत किया गया।

चीन और अमेरिका के पास भी हैं न्यूक्लियर सबमरीन

दुनिया में अमेरिका, रूस और चीन के पास बड़ी संख्या में न्यूक्लियर सबमरीन और इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलें हैं। चीन के पास जिन क्लास की पनडुब्बियां हैं, उनमें जेएल-2 और जेएल-3 जैसी लंबी दूरी की मिसाइलें तैनात हैं। अमेरिका के पास ओहायो क्लास एसएसबीएन हैं। भारत की पनडुब्बियां साइज और संख्या में भले ही कम हों, लेकिन के-4 जैसी मिसाइलों की तैनाती से उसकी मैरीटाइम न्यूक्लियर कैपेबिलिटी लगातार मजबूत होती जा रही है।

China Pakistan Grey Zone Warfare: ऑपरेशन सिंदूर के पीछे चीन की परछाईं? अमेरिकी रिपोर्ट में पाकिस्तान को मिली खुफिया मदद का दावा

China Pakistan Grey Zone Warfare

China Pakistan Grey Zone Warfare: ऐसे वक्त में जब भारत और चीन के संबंध सुधर रहे हैं, अमेरिका ने एक सनसखीखेज दावा किया है। ऑपरेशन सिंदूर को लेकर अमेरिका के रक्षा विभाग ने एक आकलन में दावा किया है कि इस ऑपरेशन के दौरान चीन ने पर्दे के पीछे रहकर पाकिस्तान की पूरी मदद की थी। यह मदद सीधे सैनिक भेजकर नहीं, बल्कि इंटेलिजेंस, इंफॉर्मेशन वॉरफेयर, साइबर एक्टिविटी, इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस और डिप्लोमैटिक मूव्स के जरिए की गई।

China Pakistan Grey Zone Warfare: क्या है ‘ग्रे-जोन स्ट्रैटेजी’?

अमेरिकी दावे के मुताबिक, ऑपरेशन सिंदूर चीन और पाकिस्तान की साझा ग्रे-जोन वॉरफेयर स्ट्रैटेजी का एक अहम उदाहरण रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान ने जमीन पर दिखने वाले हमले, प्रॉक्सी एक्टिविटी और सैन्य दबाव बनाया, जबकि चीन बैकग्राउंड में रहकर पूरा माहौल अपने हिसाब से ढालता रहा।

ग्रे-जोन स्ट्रैटेजी का मतलब होता है ऐसा दबाव बनाना, जो आमने-सामने का युद्ध न करके, लेकिन दुश्मन देश को लगातार तनाव में रखे। इसमें सीधी लड़ाई नहीं होती, बल्कि साइबर अटैक, फेक न्यूज, डिसइंफॉर्मेशन, डिप्लोमैटिक प्रेशर, इकोनॉमिक कोएर्शन और प्रॉक्सी ताकतों का इस्तेमाल किया जाता है।

यूएस रिपोर्ट के अनुसार, ऑपरेशन सिंदूर इस ग्रे-जोन रणनीति का एक तरह से टेस्ट केस था। पाकिस्तान ने सामने रहकर काम किया और चीन ने उसे हर जरूरी जानकारी और सपोर्ट चुपचाप उपलब्ध कराया।

China Pakistan Grey Zone Warfare: पाकिस्तान फ्रंट पर, चीन बैकग्राउंड में

रिपोर्ट कहती है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने जो भी काइनेटिक एक्शन किया उसके पीछे चीन का पूरा हाथ था। लेकिन असल में उसकी रियल-टाइम सिचुएशनल अवेयरनेस चीन की मदद से बेहतर हुई थी।

चीन के सैटेलाइट कवरेज, इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस और सर्विलांस इनपुट्स ने पाकिस्तान को यह समझने में मदद की कि भारतीय सेना कहां तैनात है, किस इलाके में मूवमेंट हो रही है और किस समय कौन-सा एक्शन संभव है। इससे पाकिस्तान की टारगेटिंग और ऑपरेशनल कोऑर्डिनेशन बेहतर हुआ, जबकि चीन खुद किसी सैन्य कार्रवाई में सीधे शामिल नहीं दिखा।

China Pakistan Grey Zone Warfare: प्लॉजिबल डिनायबिलिटी’ की चाल

इस पूरी रणनीति का सबसे अहम पहलू था प्लॉजिबल डिनायबिलिटी, यानी जिम्मेदारी से बच निकलने की क्षमता। दुनिया की नजरों में पाकिस्तान ही मुख्य खिलाड़ी बना रहा, जबकि चीन ने खुद को बैकग्राउंड में रखकर काम किया।

यूएस अधिकारियों का मानना है कि चीन ने जानबूझकर ऐसा किया ताकि अंतरराष्ट्रीय मंच पर उस पर सीधा आरोप न आए। साथ ही उसने अपने डिप्लोमैटिक मैसेजिंग और ऑनलाइन इनफॉरमेशन कैंपेन के जरिए पाकिस्तान के नैरेटिव को आगे बढ़ाया।

इन कैंपेन का मकसद भारत के दावों पर सवाल उठाना, भ्रम पैदा करना और भारत के पक्ष में बनने वाली अंतरराष्ट्रीय सहमति को धीमा करना था।

भारत की ‘एस्केलेशन लिमिट’ को परखने की कोशिश

रिपोर्ट के मुताबिक, चीन इस पूरे घटनाक्रम के जरिए भारत की एस्केलेशन थ्रेशहोल्ड को परखना चाहता था। यानी यह देखना कि भारत किस हद तक प्रतिक्रिया देता है और किस बिंदु पर रुकता है।

चीन के लिए यह जरूरी था कि वह भारत पर दबाव बनाए, लेकिन ऐसा न हो कि मामला सीधे भारत-चीन युद्ध की तरफ चला जाए। इसीलिए पाकिस्तान को आगे रखकर प्रयोग किया गया।

भारत चीन की नजर में क्यों अहम है चुनौती?

यूएस आकलन में यह भी कहा गया है कि चीन अब भारत को सिर्फ एक पड़ोसी देश नहीं, बल्कि एक लॉन्ग-टर्म स्ट्रैटेजिक चैलेंज के रूप में देख रहा है। भले ही चीन का मुख्य फोकस अमेरिका-ताइवान क्षेत्र पर हो, लेकिन भारत को भविष्य में कंटेनमेंट टारगेट के तौर पर देखा जा रहा है।

खासकर हिमालयन फ्रंटियर और इंडियन ओशन रीजन में चीन भारत की बढ़ती ताकत को सीमित करना चाहता है। इसके लिए वह सीधे टकराव की बजाय अप्रत्यक्ष तरीकों को तरजीह दे रहा है।

पाकिस्तान बना चीन का ‘प्रेशर वॉल्व’

यूएस इंटेलिजेंस सोर्सेज के मुताबिक, पाकिस्तान चीन के लिए एक तरह का प्रेशर वॉल्व है। इसका मतलब है कि जब भी चीन भारत पर दबाव बनाना चाहता है, वह पाकिस्तान को आगे कर देता है।

इससे चीन को कई फायदे मिलते हैं। पहला, भारत का ध्यान चीन से हटकर पाकिस्तान की ओर चला जाता है। दूसरा, भारत-अमेरिका के बीच बढ़ता डिफेंस कोऑपरेशन कमजोर पड़ता है। तीसरा, चीन को अपने हाइब्रिड वॉरफेयर मॉडल्स को कम लागत में टेस्ट करने का मौका मिलता है।

एलएसी पर समझौता: शांति या रणनीति?

यूएस रिपोर्ट में अक्टूबर 2024 में भारत और चीन के बीच एलएसी पर हुए डिसएंगेजमेंट एग्रीमेंट को भी रणनीतिक नजरिए से देखा गया है। अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि यह कदम चीन की तरफ से तनाव कम करने का संकेत नहीं था।

बल्कि असल में चीन चाहता था कि पश्चिमी सीमा पर कुछ समय के लिए स्थिरता बनी रहे, ताकि भारत अमेरिका के साथ रक्षा सहयोग को और तेज न कर सके। यानी यह शांति नहीं, बल्कि रणनीतिक ब्रेक था।

साउथ एशिया से बाहर भी नजर

पेंटागन इस बात पर भी नजर रखे हुए है कि चीन दुनिया के करीब 20 देशों में भविष्य के लिए मिलिट्री बेसिंग या लॉजिस्टिक एक्सेस तलाश रहा है। इनमें पाकिस्तान, श्रीलंका और क्यूबा जैसे देश शामिल हैं।

अगर ऐसा होता है, तो इसका सीधा असर भारत की मैरीटाइम सिक्योरिटी और थल सुरक्षा पर पड़ेगा। खासकर हिंद महासागर क्षेत्र में भारत के लिए चुनौतियां और बढ़ सकती हैं।

भारत जानता था चीन ने की पीछे से मदद

हालांकि चीन के साथ देने का दावा करने वाला अमेरिका अकेला नहीं हैं। बल्कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सेंटर फॉर जॉइंट वॉरफेयर स्टडीज (CENJOWS) के डायरेक्टर जनरल मेजर जनरल (रिटायर्ड) अशोक कुमार ने कहा था कि चीन ने पाकिस्तान को रियल-टाइम सैटेलाइट जानकारी दी थी। जिससे पाकिस्तान को अपने एयर डिफेंस सिस्टम्स को पोजिशन करने में मदद की, ताकि भारत की गतिविधियों का पता लगाया जा सके।

वहीं इस साल जुलाई में डिप्टी चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ (कैपेबिलिटी डेवलपमेंट एंड सस्टेनेंस) लेफ्टिनेंट जनरल राहुल आर सिंह ने एक सेमिनार में कहा था कि चीन ने पाकिस्तान को रीयल-टाइम सैटेलाइट इंटेलिजेंस और सर्विलांस सपोर्ट मुहैया कराया था। उन्होंने कहा था कि डीजीएमओ लेवल की डी-एस्केलेशन टॉक्स के दौरान पाकिस्तानी पक्ष को भारतीय फोर्सेस की डिप्लॉयमेंट्स की लाइव जानकारी मिल रही थी। पाकिस्तानी डीजीएमओ ने बातचीत में कहा था, “हम जानते हैं कि आपका यह महत्वपूर्ण वेक्टर प्राइम्ड है और एक्शन के लिए तैयार है, इसे वापस पुल करें।” यह जानकारी इतनी सटीक और ताजा थी कि वह केवल चाइनीज सैटेलाइट्स, इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस और रीयल-टाइम मॉनिटरिंग से ही आ सकती थी।

लेफ्टिनेंट जनरल राहुल सिंह ने इसे “वन बॉर्डर, थ्री एडवरसरीज” की स्थिति करार दिया था, जिसमें सामने पाकिस्तान लड़ रहा था, बैकग्राउंड में चीन सपोर्ट दे रहा था और तुर्की ड्रोन्स सप्लाई कर रहा था। उनका कहना था कि चीन ने इस कॉन्फ्लिक्ट को अपने वेपन्स सिस्टम्स का “लाइव टेस्टिंग ग्राउंड” बना लिया, जहां जे-10सी फाइटर्स, पीएल-15 मिसाइल्स और एचक्यू-9 एयर डिफेंस सिस्टम्स की परफॉर्मेंस चेक की गई।

वहीं अमेरिकी रिपोर्ट ने बता दिया है कि भविष्य की जंग कैसी होगी? यूएस रिपोर्ट की सबसे अहम चेतावनी यह है कि भविष्य में भारत-चीन टकराव की शुरुआत सीधे युद्ध से नहीं होगी। पहले साइबर डिसरप्शन, इकोनॉमिक दबाव, इंफॉर्मेशन वॉरफेयर और प्रॉक्सी इंस्टेबिलिटी देखने को मिलेगी।

ऑपरेशन सिंदूर ने यह दिखा दिया है कि यह मॉडल कैसे काम करता है। यही वजह है कि भारत के लिए आने वाले सालों में सुरक्षा चुनौतियों और ज्यादा मुश्किल होने वाली है।

Indian Army Social Media Policy: सेना का बड़ा फैसला! जवानों के लिए सोशल मीडिया यूज करने के नियमों में किया ये बड़ा बदलाव

Indian Army Social Media Policy
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Indian Army Social Media Policy: सेना ने सोशल मीडिया के इस्तेमाल को लेकर बड़ा फैसला किया है। सेना ने अपनी पुरानी सोशल मीडिया पॉलिसी में बड़ा बदलाव करते हुए सैन्य कर्मियों को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के इस्तेमाल को लेकर बड़ी राहत दी है। सेना ने जवानों और अफसरों को सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने की अनुमति दी है, लेकिन साथ ही कुछ प्रतिबंध भी लगाए हैं। सेना ये फैसला सेना प्रमुख के उस बयान के बाद लिया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि स्मार्टफोन आज के समय की जरूरत बन गया है, लेकिन जवानों को को सोशल मीडिया पर रिएक्ट और रेस्पॉन्ड के बीच अंतर समझना होगा।

Indian Army Social Media Policy: देखने और मॉनिटरिंग तक की परमिशन

रक्षा समाचार को मिली जानकारी के मुताबिक सेना की तरफ से हाल ही में नए दिशा-निर्देशों जारी किए हैं। जिनके मुताबिक अब सेना कर्मियों को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम के इस्तेमाल की अनुमति केवल देखने और मॉनिटरिंग तक ही होगी। इस नई व्यवस्था के तहत इंस्टाग्राम पर किसी भी तरह का कमेंट, राय या प्रतिक्रिया साझा करना पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा। यह संशोधित पॉलिसी तत्काल प्रभाव से लागू कर दी गई है। (Indian Army Social Media Policy)

Indian Army Social Media Policy: नहीं कर सकते संवाद या रिएक्ट

सेना की तरफ से जारी डॉक्यूमेंट में कहा गया है कि इंस्टाग्राम पर सेना कर्मियों की भूमिका अब केवल “पैसिव पार्टिसिपेशन” यानी निष्क्रिय भागीदारी तक सीमित रहेगी। इसका मतलब यह है कि जवान और अधिकारी प्लेटफॉर्म पर मौजूद जानकारी को देख सकते हैं, लेकिन किसी भी तरह से संवाद या रिएक्ट नहीं कर सकते। सेना के अनुसार, यह कदम राष्ट्रीय सुरक्षा और ऑपरेशनल सिक्योरिटी को ध्यान में रखते हुए उठाया गया है। (Indian Army Social Media Policy)

Indian Army Social Media Policy: व्हाट्सएप, टेलीग्राम को लेकर कही ये बात

साथ ही सेना ने इंस्टाग्राम के अलावा अन्य सोशल मीडिया और मैसेजिंग ऐप्स को लेकर भी पॉलिसी में स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए हैं। व्हाट्सएप, टेलीग्राम, सिग्नल और स्काइप जैसे मैसेजिंग ऐप्स पर केवल सामान्य और अनक्लासिफाइड जानकारी साझा करने की अनुमति दी गई है। यह जानकारी भी केवल जानकार लोगों के साथ ही साझा की जा सकती है। सही व्यक्ति की पहचान की पूरी जिम्मेदारी यूजर की होगी। किसी भी तरह की संवेदनशील, ऑफिशियल या ड्यूटी से जुड़ी जानकारी इन प्लेटफॉर्म्स पर साझा करने की अनुमति नहीं है। (Indian Army Social Media Policy)

Indian Army Social Media Policy: प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल केवल जानकारी के लिए

इसके अलावा यूट्यूब, एक्स यानी पूर्व में ट्विटर और क्वोरा जैसे प्लेटफॉर्म्स पर भी सेना कर्मियों को केवल पैसिव यूज की अनुमति है। इन प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल केवल जानकारी हासिल करने के लिए किया जा सकता है। किसी भी तरह का वीडियो अपलोड करना, पोस्ट लिखना, मैसेज डालना या कमेंट करना सख्त मना है। सेना का मानना है कि इन प्लेटफॉर्म्स पर एक्टिव भागीदारी से अनजाने में संवेदनशील जानकारियां लीक हो सकती हैं। (Indian Army Social Media Policy)

लिंक्डइन को लेकर सख्त

वहीं पॉलिसी डॉक्यूमेंट में लिंक्डइन को लेकर नीति और भी सख्त है। जवानों और अफसरों को लिंक्डइन का इस्तेमाल केवल रिज्यूमे अपलोड करने या संभावित एम्प्लॉयर और एम्प्लॉयी से जुड़ी सामान्य जानकारी प्राप्त करने के लिए ही करने की अनुमति है। इसके लिए भी अलग से अनुमति लेना जरूरी होगा।

पायरेटेड सॉफ्टवेयर वाली साइट्स से करें परेहज

इसके अलावा सेना ने अपने कर्मियों को कुछ खास तरह की वेबसाइट्स और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स से पूरी तरह दूर रहने की सलाह भी दी है। इसमें जनरल वेबसाइट्स, क्रैक या पायरेटेड सॉफ्टवेयर वाली साइट्स, फ्री मूवी वेबसाइट्स, टोरेंट और वीपीएन सॉफ्टवेयर से जुड़ी साइट्स, वेब प्रॉक्सी, अनॉनिमाइज्ड वेबसाइट्स, चैट रूम और फाइल ट्रांसफर साइट्स शामिल हैं। क्लाउड डेटा स्टोरेज वेबसाइट्स के इस्तेमाल को लेकर भी अत्यधिक सावधानी बरतने को कहा गया है। (Indian Army Social Media Policy)

भारतीय सेना की सोशल मीडिया पॉलिसी का मुख्य उद्देश्य हनीट्रैपिंग, डेटा चोरी और संवेदनशील सूचनाओं के लीक होने की घटनाओं को रोकना बताया गया है। पिछले कुछ सालों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जहां दुश्मन देशों की एजेंसियों ने सोशल मीडिया के जरिए सैनिकों से संपर्क कर उनसे जानकारियां हासिल करने की कोशिश की। इन्हीं घटनाओं को ध्यान में रखते हुए नीति को समय-समय पर सख्त किया जाता रहा है। (Indian Army Social Media Policy)

सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने कहा था- सोच-समझकर करें कम्युनिकेशन

पिछले महीने नवंबर में भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने यंग लीडर्स फोरम और चाणक्य डिफेंस डॉयलॉग में सोशल मीडिया के इस्तेमाल को लेकर बड़ी बात कही थी। उन्होंने कहा था कि आज की जेन जी डिजिटली फ्लुएंट और सोशली कांशस है। सेना में आने वाले नए एनडीए कैडेट्स को फोन से दूर रहना मुश्किल होता है और इसमें महीनों लग सकते हैं। उन्होंने सलाह दी थी कि सोशल मीडिया पर रिएक्ट करने की बजाय रिस्पॉन्ड करें और सोच-समझकर कम्युनिकेशन करें। उन्होंने कहा था कि स्मार्टफोन पर पूरी तरह पाबंदी सही नहीं है, बल्कि इस्तेमाल के नियम और जवाब देने का तरीका महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा था कि जवानों को ट्विटर आदि प्लेटफॉर्म पर निगरानी की अनुमति दी जा सकती है ताकि वे देख सकें कि दुनिया में क्या हो रहा है, लेकिन सार्वजनिक रूप से तुरंत जवाब देने से रुका जाए। सेना प्रमुख खुद सोशल मीडिया को मॉर्डन वॉरफेयर का हिस्सा मानते हैं और उनका मानना है कि इसका इस्तेमाल राष्ट्रहित में किया जाना चाहिए। (Indian Army Social Media Policy)

2020 में लगाया था 89 ऐप्स पर बैन

2018 और 2019 के दौरान तत्कालीन थल सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत ने सोशल मीडिया को लेकर संतुलित रुख अपनाने की बात कही थी। हालंकि वे खुद मोबाइल फोन नहीं रखते थे, लेकिन मानते थे कि स्मार्टफोन का इस्तेमाल रोका नहीं जा सकता। उन्होंने यह माना था कि सैनिकों को पूरी तरह सोशल मीडिया से दूर रखना संभव नहीं है, लेकिन इसके नियंत्रित इस्तेमाल की जरूरत है। उन्होंने जोर दिया था कि आधुनिक युद्ध में इंफॉर्मेशन वॉरफेयर महत्वपूर्ण है, और सोशल मीडिया को दुश्मन (जैसे प्रॉक्सी वॉर या आतंकवाद में) के खिलाफ फायदा उठाने के लिए इस्तेमाल करना चाहिए। लेकिन सैनिकों को ट्रेनिंग देकर जोखिम कम करने चाहिए। हालांकि, हनीट्रैप के बढ़ते मामलों के बाद सेना ने 2020 में कई लोकप्रिय 89 ऐप्स पर सख्त बैन लगाया था और अकाउंट डिलीट करने तक के निर्देश जारी किए गए थे।

गलवान घाटी में हुई झड़प के बाद सोशल मीडिया और डिजिटल ऐप्स को लेकर सेना अलर्ट हो गई थी। उस दौरान फेसबुक, इंस्टाग्राम, टिकटॉक, पबजी समेत कई दूसरी ऐप्स पर भी बैन लगाया गया था। सेना के मुताबिक, उस दौरान बड़ी संख्या में सैनिकों ने निर्देशों का पालन करते हुए किया और 13 लाख सैनिकों में सिर्फ 8 मामलों में ही निर्देशों का उल्लंघन पाया गया था। (Indian Army Social Media Policy)

यूनिफॉर्म में फोटो डालने पर रोक

2023 और 2024 में भी सेना की ओर से कई एडवाइजरी जारी की गईं, जिनमें जवानों को यूनिफॉर्म में फोटो डालने, रैंक या यूनिट की जानकारी साझा करने और जियो-टैगिंग का इस्तेमाल बंद रखने की हिदायत दी गई थी। अनजान फ्रेंड रिक्वेस्ट स्वीकार न करने और निजी जानकारी साझा न करने की बात भी कही गई थी। (Indian Army Social Media Policy)

Sanjay Jasjit Singh: पहली बार थिंक टैंक USI के चीफ बने नेवी अफसर, ऑपरेशन सिंदूर में मिला था सर्वोत्तम युद्ध सेवा मेडल

Sanjay Jasjit Singh USI
Vice Admiral Sanjay Jasjit Singh (Retd.)

Sanjay Jasjit Singh: नौसेना के रिटायर्ड वाइस एडमिरल संजय जसजीत सिंह को यूनाइटेड सर्विस इंस्टिट्यूशन ऑफ इंडिया (यूएसआई) का नया डायरेक्टर जनरल बनाया गया है। यूएसआई के इतिहास में पहली बार कोई नौसेना अधिकारी इस पद पर पहुंचा है। अब तक ये जिम्मेदारी ज्यादातर थलसेना के अफसरों के पास रही थी।

ये फैसला ऐसे वक्त आया है, जब सेना, नौसेना और वायुसेना तीनों के बीच तालमेल और साझा सोच को बहुत जरूरी माना जा रहा है। जंग अब सिर्फ जमीन, हवा या समंदर तक नहीं, साइबर, स्पेस और ड्रोन जैसे नए मोर्चे भी लड़ी जा रही है।

Sanjay Jasjit Singh: यूएसआई क्या है और क्यों है खास

यूएसआई भारत की सबसे पुरानी डिफेंस स्टडीज संस्था है, जो 1870 में शुरू हुई थी। आजादी के बाद ये शिमला से दिल्ली आई और धीरे-धीरे सबसे अहम मिलिट्री थिंक टैंक्स में गिनी जाने लगी। यहां सिर्फ किताबें या रिसर्च पेपर्स नहीं लिखे जाते, बल्कि अफसरों को स्ट्रैटेजी, वॉर स्टडीज और सिक्योरिटी पर सोचने-लिखने का मौका मिलता है।

यूएसआई की एक खास पहचान यह भी है कि यहां से निकले कई अफसर आगे चलकर डिफेंस सर्विसेज स्टाफ कॉलेज और दूसरी बड़ी सैन्य संस्थाओं की परीक्षाओं में सफल हुए हैं। यूएसआई की लाइब्रेरी और जर्नल्स काफी मशहूर हैं।

Sanjay Jasjit Singh: वेस्टर्न नेवल कमांड के चीफ पद से रिटायर

वाइस एडमिरल संजय जसजीत सिंह हाल ही में वेस्टर्न नेवल कमांड के चीफ पद से रिटायर हुए हैं। इससे पहले वो वाइस चीफ ऑफ नेवल स्टाफ जैसे बड़े रोल में भी रह चुके हैं। उनके करियर का बड़ा हिस्सा ऑपरेशंस, हथियारों के प्रोक्योरमेंट और आत्मनिर्भर भारत से जुड़ी डिफेंस पॉलिसीज पर काम करते हुए बीता है।

नौसेना में उन्होंने सिर्फ ऑपरेशंस की कमान नहीं संभाली, बल्कि कई अहम डॉक्युमेंट्स और डॉक्ट्रिन भी तैयार किए। वे नौसेना की प्रमुख डॉक्ट्रिन्स– इंडियन मैरिटाइम डॉक्ट्रिन (2009), स्ट्रैटेजिक गाइडेंस टू ट्रांसफॉर्मेशन (2015) और इंडियन मैरिटाइम सिक्योरिटी स्ट्रैटेजी (2015) के मुख्य ड्राफ्टर रह चुके हैं।

जब वे गोवा के नेवल वॉर कॉलेज के कमांडेंट थे तो उन्होंने नए अफसरों को मोर्डन वॉरफेयर की सोच से रूबरू करवाया। इसके अलावा वे ऑपरेशन संकल्प (एंटी-पायरेसी) और गल्फ ऑफ एडन में डिप्लॉयमेंट्स के दौरान उन्होंने इंडियन ओशन रीजन में भारत को मजबूत सिक्योरिटी प्रोवाइडर बनाया।

वाइस एडमिरल संजय जसजीत सिंह एनडीए के बेस्ट नेवल कैडेट (स्वॉर्ड ऑफ ऑनर) विजेता हैं। वे थर्ड जेनरेशन आर्म्ड फोर्सेस ऑफिसर हैं– उनके पिता एयर कमोडोर जसजीत सिंह वीर चक्र से सम्मानित हैं।

उनकी सबसे बड़ी पहचान ये है कि वो मैदान के अनुभव को स्ट्रैटेजिक सोच से जोड़कर देखते हैं। इसी वजह से डिफेंस एक्सपर्ट्स उन्हें “ऑपरेशनल और इंटेलेक्चुअल” दोनों दुनिया को जोड़ने वाला अफसर मानते हैं।

Sanjay Jasjit Singh: ऑपरेशन सिंदूर में निभाई थी अहम भूमिका

संजय जसजीत सिंह भारतीय नौसेना के एक अनुभवी फ्लैग ऑफिसर हैं, जो जुलाई 2025 में 39 साल की शानदार सेवा के बाद रिटायर हुए लिया। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जनवरी 2024 से जुलाई 2025 तक वे वेस्टर्न नेवल कमांड के फ्लैग ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ थे, जो भारतीय नौसेना की सबसे ताकतवर कमांड है। इस कमांड के पास अरब सागर और पश्चिमी तट की जिम्मेदारी की सुरक्षा की जिम्मेदारी है। पहलगाम आतंकी हमले के बाद, उन्होंने नौसेना की जहाजों, पनडुब्बियों, विमानों और कैरियर बैटल ग्रुप्स (आईएनएस विक्रमादित्य और आईएनएस विक्रांत) की तुरंत तैनाती की। इससे पाकिस्तानी नौसेना अपने कराची बंदरगाह से बाहर ही नहीं निकल सकी।

उनकी कमांड ने अरब सागर में पूरा कंट्रोल बनाए रखा, जिससे भारत की समुद्री सीमाएं सुरक्षित रहीं और पाकिस्तान को कोई जवाबी कार्रवााई नहीं करने दी। उनके नेतृत्व में पाकिस्तानी नौसेना केवल डिफेंसिव पोजिशन में रही। इसके अलावा ट्राई-सर्विस कोऑर्डिनेशन करते हुए वेस्टर्न नेवल कमांड ने वायुसेना और सेना के साथ मिलकर जॉइंट ऑपरेशंस किए, जिसमें मैरिटाइम सर्विलांस, एयर कवर और पोटेंशियल स्ट्राइक्स की तैयारियां शामिल थी।

Sanjay Jasjit Singh: मिला सर्वोत्तम युद्ध सेवा मेडल

ऑपरेशन सिंदूर में उनके इस योगदान के लिए उन्हें सर्वोत्तम युद्ध सेवा मेडल से सम्मानित किया गया। यह भारत का सबसे ऊंचा वॉरटाइम डिस्टिंग्विश्ड सर्विस अवॉर्ड है, और वे पहले नेवी ऑफिसर हैं जिन्हें यह मिला है। 2025 में सर्वोत्तम युद्ध सेवा मेडल तीनों सेनाओं के सात टॉप ऑफिसर्स को मिल था, जिनमें सिंह शामिल थे।

Sanjay Jasjit Singh: जॉइंटनेस को मिलेगा बूस्ट

संजय जसजीत सिंह की यूएसआई में नियुक्ति को सिर्फ एक प्रमोशन की तरह नहीं देखा जा रहा। ये सरकार और मिलिट्री लीडरशिप की उस सोच से जुड़ा है, जिसमें तीनों सेनाओं के बीच तालमेल और मजबूत करने की कोशिशें तेज हो गई हैं।

पिछले कुछ सालों में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) की पोस्ट बनी, थिएटर कमांड्स पर चर्चा शुरू हुई, ये सब इसी दिशा में उठाए गए कदम हैं। यूएसआई जैसे थिंक टैंक में नौसेना अफसर की लीडरशिप देना इस बात का संकेत है कि थल, जल, वायु तीनों को बराबरी की जगह मिलेगी।

यूएसआई की वर्किंग और रोल

यूएसआई सिर्फ सेमिनार्स या लेक्चर्स तक सीमित नहीं है। यहां सेना के सेवारत और रिटायर्ड अफसर, सिविल सर्विसेज के लोग और डिफेंस एक्सपर्ट्स मिलकर नेशनल सिक्योरिटी से जुड़े मुद्दों पर खुलकर बात करते हैं। चीन की बढ़ती ताकत, हिंद महासागर की स्ट्रैटेजिक बैलेंसिंग, टेररिज्म, नई टेक्नोलॉजीज, ये सब यहां डिस्कशन के टॉपिक हैं।

संस्था के संरक्षक तीनों सेनाओं के चीफ होते हैं, और चीफ ऑफ इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ अध्यक्ष की भूमिका निभाते हैं। तो यूएसआई की रिसर्च और बातचीत का असर सीधा पॉलिसी मेकिंग तक पहुंचता है।

नौसेना को होगा फायदा

भारत की सुरक्षा अब सिर्फ सीमाओं तक सीमित नहीं है। समुद्री व्यापार, एनर्जी सप्लाई और इंडो-पैसिफिक के बदलते समीकरण अब उतने ही अहम हैं, जितनी जमीन की हिफाजत। यूएसआई की कमान नौसेना अफसर के हाथ में आने से एक नया नजरिया सामने आ रहा है।

एक्सपर्ट्स मानते हैं कि संजय जसजीत सिंह के लीडरशिप में यूएसआई में नेवल सिक्योरिटी, नेवल डिप्लोमेसी और जॉइंट ऑपरेशंस पर ज्यादा गहराई से चर्चा होगी। आगे चलकर ये सोच नीतियों और मिलिट्री प्लानिंग को भी नया आकार दे सकती है।

संजय जसजीत सिंह 1 जनवरी 2026 से यूएसआई की जिम्मेदारी संभालेंगे। उनकी चुनौती होगी इतिहास और परंपरा को बरकरार रखते हुए संस्था को भविष्य के लिए तैयार करना। टेक्नोलॉजी बदल रही है, जंग की परिभाषा बदल रही है, ऐसे में थिंक टैंक्स की जिम्मेदारी पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है।

Army Day Parade 2026: ऑपरेशन सिंदूर की जीत से लेकर स्वदेशी हथियारों तक, जयपुर में पहली बार होगा ऐतिहासिक आर्मी डे शो

Indian Army Year Ender 2025

Army Day Parade 2026: 15 जनवरी 2026 को जयपुर एक बड़े एतिहासिक समारोह का गवाह बनने जा रहा है। इस बार 78वीं आर्मी डे परेड जयपुर के पब्लिक रोड (जगतपुरा की महल रोड) पर होगी। परेड की इस बार खास बात यह है कि इसमें दर्शकों को ऑपरेशन सिंदूर की झलक देखने को मिलेगी। भारतीय सेना ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान दिखाए अपने शौर्य को एक अनूठे माध्यम से दर्शकों के सामने रखेगी।

Army Day Parade 2026: करीब 40 मिनट की परेड

करीब डेढ़ किलोमीटर लंबे इस रास्ते पर करीब 40 मिनट की परेड देखने के लिए 25 हजार लोगों के बैठने का खास इंतजाम होगा। तीन-तीन लेवल की गैलरी बनाई जा रही हैं, ताकि छात्र, आम लोग, और खास मेहमान सेना के जज्बे और शौर्य को करीब से देख सकें। परेड में नेपाल आर्मी बैंड भी दूसरी बार शामिल होगा।

Army Day Parade 2026: ऑपरेशन सिंदूर की झांकी

इस बार परेड का सबसे बड़ा आकर्षण रहेगा ऑपरेशन सिंदूर। पहलगाम में आतंकी हमले के बाद भारतीय सेना ने जिस तरीके से जवाब दिया, उसकी झलक दुनिया के सामने रखी जाएगी। इस ऑपरेशन में इस्तेमाल हुए कुछ हथियार और सिस्टम पहली बार पब्लिक के सामने दिखेंगे। एक खास टेबल्यू (झांकी) भी होगी, जहां दिखेगा कि सेना ने किस तरह सटीक खुफिया जानकारी, आधुनिक हथियार और मजबूत एयर डिफेंस के सहारे दुश्मन के मंसूबे नाकाम किए।

Army Day Parade 2026: पहली बार भैरव बटालियन मार्च

साथ ही पहली बार भैरव बटालियन भी मार्च करती दिखेगी। यह यूनिट खास चुनौतियों के लिए तैयार की गई है। पहाड़ी इलाकों में ऑपरेशन, सीमापार कार्रवाई, आतंकवाद विरोधी मिशन इन सभी में इसके जवान माहिर हैं। भैरव बटालियन की मौजूदगी बताती है कि भारतीय सेना लगातार खुद को नए खतरे के हिसाब से बदल रही है।

Army Day Parade 2026: अपाचे और प्रचंड का फ्लाईपास्ट

जयपुर के आसमान में भी नजारे कम नहीं होंगे। स्वदेशी लाइट कॉम्बैट हेलीकॉप्टर प्रचंड, अमेरिकी अपाचे अटैक हेलीकॉप्टर, रुद्र और चेतक, ये सारे हेलीकॉप्टर जयपुर के आसमान में फ्लाईपास्ट करेंगे। प्रचंड पर सबकी खास नजर रहेगी। यह दुनिया का पहला अटैक हेलीकॉप्टर, जो सियाचिन जैसी 16 हजार फीट ऊंची जगहों पर भी ऑपरेशन कर सकता है। ऑपरेशन सिंदूर जैसे अभियानों में इसकी भूमिका बहुत अहम रही है।

Army Day Parade 2026: मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर भी मौजूद

इसके अलावा सेना दिवस परेड में टैंक, तोप और रॉकेट सिस्टम अपनी ताकत दिखाएंगे। टी-90 भीष्मा टैंक, एमबीटी अर्जुन, बीएमपी-2, के-9 वज्र, नागास्त्र-1 लॉइटरिंग म्यूनिशन, धनुष तोप, एम-777 अल्ट्रा लाइट हॉवित्जर, स्मर्च और ग्रैड मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर सभी मौजूद रहेंगे। एम-777 तोप तो खास ऑपरेशन सिंदूर से जुड़ी है, क्योंकि इसी ने दुर्गम इलाकों में आतंकी ठिकाने तबाह किए थे। इन हथियारों को देखकर हर कोई समझ पाएगा कि सेना किन साधनों के सहारे देश की हिफाजत करती है।

एयर डिफेंस सिस्टम भी परेड का हिस्सा होंगे। आकाश मिसाइल सिस्टम, एमआर-एसएएम, शिल्का और दूसरे सिस्टम्स की मौजूदगी साफ बताएगी कि भारत की हवाई सुरक्षा कितनी मजबूत है। ऑपरेशन सिंदूर के वक्त इन्हीं सिस्टम्स ने दुश्मन की हर चाल को नाकाम किया था।

परेड में रोबोटिक म्यूल, काउंटर-यूएएस सिस्टम भी शामिल

मौजूदा दौर की झलक दिखाते हुए, परेड में रोबोटिक म्यूल, काउंटर-यूएएस सिस्टम और आर्मी डॉग स्क्वॉड भी नजर आएंगे। रोबोटिक म्यूल मुश्किल इलाकों में जवानों के लिए सामान और हथियार ढोते हैं। काउंटर ड्रोन सिस्टम दिखाएंगे कि सेना ड्रोन जैसी नई चुनौतियों से कैसे निपट रही है।

रेजिमेंट्स, एनसीसी कैडेट्स और वेटरंस भी इस परेड का हिस्सा होंगे। असम रेजिमेंट, जम्मू-कश्मीर लाइट इन्फैंट्री, मद्रास रेजिमेंट, आर्टिलरी यूनिट्स, स्काउट्स भी परेड में मार्च करेंगे। परमवीर चक्र, अशोक चक्र, वीर चक्र विजेता और वीरता पुरस्कार पाने वाले सैनिक भी कदमताल करते दिखेंगे।

14 जनवरी को वेटरन्स डे के मौके पर पूर्व सैनिकों को सम्मानित किया जाएगा। 15 जनवरी को मुख्य परेड से पहले अलंकरण समारोह भी होगा।

शौर्य संध्या में 1000 ड्रोन का शो

वहीं, 15 जनवरी को शौर्य संध्या का आयोजन एसएमएस स्टेडियम में किया जाएगा, जिसमें मुख्य अतिथि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह होंगे। कार्यक्रम में लाइट एंड साउंड शो के जरिए ऑपरेशन सिंदूर पर आधारित हमले की री-एनैक्टमेंट दिखाई जाएगी। 1000 ड्रोन शो भारतीय सेना के इतिहास और ऑपरेशन सिंदूर की झलक को पेश करेंगे।

इसके अलावा 8 से 12 जनवरी तक भवानी इंस्टीट्यूट में ‘नो योर आर्मी’ एग्जिबिशन लगेगी, जहां मिसाइल-बॉम्ब सिमुलेटर और अलग-अलग इलाकों में सेना के ऑपरेशंस का डेमो दिखाया जाएगा।

बता दें कि भारतीय सेना दिवस हर साल 15 जनवरी को मनाया जाता है। 15 जनवरी 1949 को फील्ड मार्शल केएम कारियप्पा भारतीय सेना के पहले भारतीय कमांडर-इन-चीफ बने थे। उनकी याद में उस दिन को पहला आर्मी डे माना जाता है।

Republic Day 2026: 26 जनवरी परेड में दिखेंगे रोबोटिक म्यूल, FPV और कामिकाजे ड्रोन, हाई-टेक हथियारों के साथ दिखेंगी स्पेशल फोर्सेज

Republic Day 2026

Republic Day 2026: 2026 की गणतंत्र दिवस परेड कई मायनों में खास होगी। अगर आप 77वें गणतंत्र में जाने की सोच रहे हों, तो इस बार आपको काफी कुछ नया दिखने को मिलेगा। गणतंत्र दिवस परेड में भारतीय सेना की स्पेशल फोर्सेज का अंदाज बिल्कुल बदलने वाला है। इस बार कर्तव्य पथ पर कुछ ऐसा दिखेगा, जो अब तक सिर्फ फिल्मों या किसी विदेशी सेना की झलकियों में नजर आया है। बंदूकें और पुराने हथियारों तो होंगे ही, लेकिन उनके साथ-साथ अब वो आधुनिक टेक्नोलॉजी भी दिखेगी, जो आने वाले वक्त की जंग का चेहरा बदल देगी।

इस बार स्पेशल फोर्सेज रोबोटिक म्यूल्स, फर्स्ट पर्सन व्यू यानी एफपीवी ड्रोन, लोइटरिंग म्यूनिशन, अनमैन्ड ग्राउंड व्हीकल्स और लेटेस्ट इन्फैंट्री हथियारों का दम दिखाएंगी। इसका मकसद सिर्फ ताकत दिखाना नहीं है, बल्कि ये बताना भी है कि सेना अब तेजी से बदल रही है और हर नई चुनौती के लिए तैयार है। इसके अलावा ऑपरेशन सिंदूर की झलक भी गणतंत्र दिवस की परेड में देखने को मिल सकती है। (Republic Day 2026)

Republic Day 2026: परेड में देखने को मिल सकते हैं रोबोटिक म्यूल्स

सबसे पहले बात करते हैं रोबोटिक म्यूल्स यानी खच्चरों की। ये छोटे-छोटे रोबोटिक व्हीकल्स हैं, जो रिमोट से ऑपरेट होते हैं। भारतीय सेना में दो तरह के रोबोटिक म्यूल्स इस्तेमाल किए जा रहे हैं, पहले लॉजिस्टिक्स और दूसरे वेपन के साथ। ये म्यूल लाइट मशीन गन से लैस होंगे। लॉजिस्टिक्स म्यूल मुश्किल इलाकों में जवानों का बोझ हल्का करते हैं। पहाड़, बर्फ या घना जंगल, जवान जहां भी पैदल जाते हैं, वहां ये रोबोटिक म्यूल्स उनका साथ देते हैं। ये म्यूल्स राशन, गोला-बारूद से लेकर मेडिकल सामान तक सबकुछ ढो लेते हैं। 2024 में इन्हें स्पेशल फोर्सेज में शामिल किया गया था। हर पैरा यूनिट को पांच-पांच म्यूल मिल चुके हैं, और जल्द ही तीन और मिलने वाले हैं। परेड में ये म्यूल्स करीब 30 किलो तक का सामान लेकर चलते दिखेंगे। (Republic Day 2026)

खास बात यह होगी कि ये म्यूल्स पूरी गणतंत्र दिवस परेड में चलते हुए नहीं आएंगे बल्कि ये एक व्हीकल पर खड़े होंगे और वहीं से ही झुक कर राष्ट्रपति को सलामी देंगे। परेड में कुल आर रोबोटिक म्यूल होंगे, जिनमें चार लॉजिस्टिक म्यूल तो बाकी चार वेपन से लैस होंगे।

Republic Day 2026: एफपीवी ड्रोनों का जलवा

इसके बाद नंबर है एफपीवी यानी फर्स्ट-पर्सन व्यू ड्रोन का। नाम थोड़ा टेक्निकल है, लेकिन काम बड़ा जबरदस्त है। ऑपरेटर इन्हें ऐसे उड़ाता है जैसे वो खुद ड्रोन के अंदर बैठा हो। दुश्मन की लोकेशन देखनी हो, बंकर ढूंढने हों या सीधा हमला करना हो, ये ड्रोन सब कर सकते हैं। पिछले कुछ ऑपरेशन में साबित भी हो चुका है कि इनका साइज भले छोटा है, लेकिन असर बड़ा घातक है। अब भारतीय सेना ने इन्हें अपनी ताकत का हिस्सा बना लिया है। (Republic Day 2026)

Republic Day 2026: कामिकाजे ड्रोन और यूजीवी भी होंगे परेड में शामिल

इसके अलावा गणतंत्र दिवस परेड में लोइटरिंग म्यूनिशन या फिर कहें ‘कामिकाजे ड्रोन’ भी दिखेंगे। ये ड्रोन आसमान में घूमते रहते हैं, टारगेट मिलते ही सीधा हमला करते हैं और खुद को भी उड़ा देते हैं। नागास्त्र और जॉननेट जैसे ड्रोन ऑल-टेरेन व्हीकल्स पर लगे नजर आएंगे। इससे साफ है कि सेना अब ज्यादा सटीक और तेज असर वाले हथियारों पर फोकस कर रही है।

साथ ही यूजीवी यानी अनमैन्ड ग्राउंड व्हीकल्स भी इस बार परेड में होंगे। ये रोबोटिक गाड़ियां बिना किसी सैनिक के आगे बढ़ती हैं, इलाके की जानकारी जुटाती हैं, और कई बार हथियार से लैस होकर फायरिंग भी कर सकती हैं। स्पेशल फोर्सेज इन्हें आतंकवाद विरोधी ऑपरेशन, बॉर्डर पर निगरानी और दुश्मन के ठिकानों की टोह लेने के लिए इस्तेमाल कर रही हैं। (Republic Day 2026)

Republic Day 2026: दिखेंगे स्पेशल फोर्सेज के ये हथियार

अब बात हथियारों की करें तो स्पेशल फोर्सेज के पास टेक्नोलॉजी के साथ-साथ लेटेस्ट हथियार भी हैं। टैवर असॉल्ट राइफल और नई नेगेव एनजी-7 लाइट मशीन गन इस बार खास आकर्षण का केंद्र रहेंगे। नेगेव एनजी-7 को अक्टूबर 2025 में सेना में शामिल किया गया था। ये 7.62×51 मिमी कैलिबर की मशीन गन है और पहाड़ हो, रेगिस्तान या घना जंगल किसी भी हालात में भरोसेमंद मानी जाती है। (Republic Day 2026)

अगर परेड की लाइन-अप देखें तो सबसे आगे रग्ड टेरेन ट्रांसपोर्ट सिस्टम होंगे, जिन पर ड्रोन सिस्टम लगे होंगे। उनके पीछे ऑल-टेरेन व्हीकल्स में लोइटरिंग म्यूनिशन लगे नजर आएंगे। फिर हल्के स्पेशलिस्ट वाहन आएंगे, जिनमें कुछ पर भारी मशीन गन या एंटी-टैंक मिसाइल सिस्टम, तो कुछ सिर्फ ड्रोन और निगरानी के लिए। सबसे आखिर में रोबोटिक म्यूल्स का ग्रुप दिखाई देगा, जो दिखाएगा कि भारतीय सेना का तेजी से ट्रांसफॉर्मेशन हो रहा है। (Republic Day 2026)

ये सब सिर्फ एक परेड का हिस्सा नहीं है। ये दिखाता है कि भारतीय सेना अब पुराने स्टाइल की जंग से आगे बढ़ चुकी है। ड्रोन, रोबोट और अनमैन्ड सिस्टम अब सिर्फ सपोर्ट नहीं, असली लड़ाई का हिस्सा बन चुके हैं। ये प्रदर्शन युवाओं को भी ये समझाएगा कि अब सेना सिर्फ ताकत से नहीं, दिमाग और टेक्नोलॉजी से भी जंग लड़ रही है। (Republic Day 2026)

CAG on ECHS: कैशलेस का वादा, लेकिन भुगतान की मार; क्यों चरमरा रही है पूर्व सैनिकों की स्वास्थ्य योजना?

CAG on ECHS

CAG on ECHS: पूर्व सैनिकों के लिए बनाई गई एक्स-सर्विसमैन कंट्रीब्यूटरी हेल्थ स्कीम (ईसीएचएस) एक बार फिर सवालों के घेरे में है। 18 दिसंबर को संसद में पेश की गई सीएजी (कंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल) की रिपोर्ट ने ईसीएचएस की कमजोर कड़ियां उजागर कर दी हैं। रिपोर्ट में घोटाले या भ्रष्टाचार की बात इसमें नहीं है, लेकिन रिपोर्ट खुलकर कहती है कि लापरवाहियों और पैसों की तंगी ने ईसीएचएस को उसके असली मकसद से दूर कर दिया है।

ईसीएचएस की शुरुआत 2003 में इस सोच के साथ हुई थी कि देश की सेवा कर चुके सैनिकों और उनके परिवारों को रिटायरमेंट के बाद इलाज के लिए भटकना न पड़े। योजना का मकसद था कि कैशलेस, बिना लिमिट के इलाज, चाहे मरीज किसी भी राज्य में क्यों न हो। लेकिन सीएजी की रिपोर्ट बताती है कि यह वादा कागजों में तो कायम है, जमीनी लेवल पर लगातार कमजोर पड़ रहा है। (CAG on ECHS)

CAG on ECHS: अस्पतालों को भुगतान में हो रही देरी

सीएजी रिपोर्ट के मुताबिक ईसीएचएस के तहत जुड़े अस्पतालों को भुगतान में लगातार देरी हो रही है। इलाज से जुड़ी रकम के लिए जो बजट तय होता है, वह अक्सर कम पड़ जाता है। नतीजा यह होता है कि कई प्राइवेट अस्पताल महीनों तक भुगतान का इंतजार करते हैं और अंत में योजना से बाहर निकल जाते हैं।

पूर्व नौसेना प्रमुख रिटायर्ड एडमिरल अरुण प्रकाश ने इस पर कड़ी नाराजगी जताई है। उन्होंने कहा कि इलाज से जुड़े खर्च के लिए बजट की कमी की वजह से अस्पतालों को समय पर पैसा नहीं मिल पाता। इसका सीधा असर यह होता है कि अस्पताल ईसीएचएस छोड़ देते हैं और रिटायर्ड सैनिकों को आर्थिक परेशानी उठानी पड़ती है। (CAG on ECHS)

उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जब सीजीएचएस जैसी योजना केंद्र सरकार के कर्मचारियों, सांसदों, जजों और वरिष्ठ अधिकारियों के लिए ठीक से चलाई जा सकती है, तो पूर्व सैनिकों के इलाज के लिए पैसा जुटाना इतना मुश्किल क्यों है। उन्होंने कहा कि ईसीएचएस एक अजीब व्यवस्था बन गई है, जहां मेंबरशिप तो जरूरी है और पूर्व सैनिकों से 30,000 से लेकर 1,20,000 रुपये तक की रकम ली जाती है, लेकिन मंत्रालय की तरफ से इस योजना को सुचारू चलाने की जिम्मेदारी कहीं नहीं दिखती। (CAG on ECHS)

CAG on ECHS: कैशलेस योजना है तो लेकिन जेब से खर्च क्यों?

ईसीएचएस को कैशलेस कहा जाता है, लेकिन कई मामलों में पूर्व सैनिकों को इलाज के समय अपनी जेब से पैसे देने पड़ते हैं। कहीं अस्पताल योजना से बाहर हो चुका होता है, तो कहीं बिल का भुगतान अटका रहता है। ऐसे में मरीज या तो इलाज टालता है या मजबूरी में पैसा खर्च करता है। (CAG on ECHS)

रिटायर्ड कमांडर विक्रम डब्ल्यू. कारवे का कहना है कि अगर सरकार सच में पूर्व सैनिकों की परवाह करती है, तो ईसीएचएस की कार्यप्रणाली में तुरंत सुधार जरूरी है। अच्छे अस्पतालों को योजना से जोड़ना होगा और उनके बिल समय पर चुकाने होंगे, वरना भरोसा लगातार टूटता रहेगा। (CAG on ECHS)

CAG on ECHS: योजना पर बोझ बढ़ा, बजट जस का तस

वरिष्ठ नौसेना अधिकारी और रक्षा मामलों के जानकार महेंद्र नेगी ने कहा कि बीते कुछ सालों में ईसीएचएस के दायरे को बिना तैयारी के बढ़ा दिया गया। योजना का मूल मकसद पूर्व सैनिकों के लिए था, लेकिन अब इसमें तीनों सेनाओं के यूनिफॉर्मधारी पेंशनर्स और बड़ी संख्या में आश्रित भी जुड़ गए हैं। इसके मुकाबले बजट में कोई बड़ा इजाफा नहीं हुआ। (CAG on ECHS)

उनका कहना है कि अब जरूरत है कि ईसीएचएस की पूरी रिव्यू की जाए। बजट बढ़ाया जाए, लाभार्थियों की स्पष्ट कैटेगरी तय हो और जिन लोगों को सीजीएचएस में शामिल किया जा सकता है, उन्हें वहां शिफ्ट किया जाए। इससे ईसीएचएस पर दबाव कम होगा और योजना वाकई काम की बन पाएगी। (CAG on ECHS)

CAG on ECHS: राजनीति में पूर्व सैनिकों की प्राथमिकता कहां

पूर्व ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह और भी सीधा बोलते हैं। उनका कहना है कि सरकार की दिलचस्पी ईसीएचएस सुधारने में इसलिए कम है क्योंकि पूर्व सैनिक कोई ऑर्गनाइज्ड वोट बैंक नहीं हैं। न तो वे “लाड़ली बहनाएं” हैं और न ही एम्प्लॉयमेंट की मांग करने वाला बड़ा समूह। उन्होंने यह भी कहा कि सर्विस में मौजूद सीनियर अधिकारी भी अक्सर इस मुद्दे पर गंभीरता नहीं दिखाते। (CAG on ECHS)

CAG on ECHS: तीन राज्यों में ही खर्च का बड़ा हिस्सा

सीएजी रिपोर्ट और पूर्व अधिकारियों के मुताबिक, ईसीएचएस का 60 फीसदी खर्च सिर्फ दिल्ली, पंजाब, और हरियाणा में हो जाता है। जबकि, देशभर के करीब 18 लाख मुख्य लाभार्थियों में इन तीन राज्यों की हिस्सेदारी 24-26 फीसदी ही है। फिर भी, जालंधर, दिल्ली-I और दिल्ली-II जैसे रीजनल सेंटर्स नेशनल खर्च का बड़ा हिस्सा ले लेते हैं।

रिटायर्ड वाइस एडमिरल सुधीर पिल्लै बताते हैं, ये असंतुलन सिर्फ संख्या की वजह से नहीं है। इसमें बड़े प्राइवेट और सुपर-स्पेशलिटी अस्पताल, महंगे इलाज, ज्यादा कैंसर और हार्ट की बीमारियां, और रिटायरमेंट के बाद इन इलाकों में बसने की प्रवृत्ति भी शामिल है। (CAG on ECHS)

यही कारण है कि कई पूर्व सैनिकों को ईसीएचएस के साथ-साथ अलग से ग्रुप इंश्योरेंस या प्राइवेट हेल्थ कवर लेना पड़ रहा है।

सीएजी की चेतावनी साफ है

सीएजी की रिपोर्ट यह नहीं कहती कि ईसीएचएस पूरी तरह फेल हो चुकी है, लेकिन यह जरूर बताती है कि योजना थक चुकी है। बेनेफिशियरीज बढ़ते गए, लेकिन इंफ्रास्ट्रक्चर, स्टाफ, बजट और मॉनिटरिंग उसी पुराने ढर्रे पर चलते रहे। अगर समय रहते ठोस सुधार नहीं किए गए, तो ईसीएचएस सिर्फ नाम की हेल्थ स्कीम बनकर रह जाएगी। (CAG on ECHS)

DAC Meeting: 2025 खत्म होते-होते भारतीय सेनाओं को मिल सकती है बड़ी सौगात, चीन-पाकिस्तान की बढ़ेगी टेंशन

DAC Meeting 26 December

DAC Meeting: इस साल डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (डीएसी) की आखिरी बैठक जल्द जल्द हो सकती है। 26 दिसंबर को होने वाली इस बैठक में कई अहम हथियारों पर फैसला हो सकता है। माना जा रहा है कि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में होने वाली इस बैठक में मिसाइलों और रडार की खरीद पर मुहर लग सकती है। वजह भी साफ है, ऑपरेशन सिंदूर के बाद, सेना को लगा कि उनके पास जितनी तेजी से आधुनिक हथियार पहुंचने चाहिए, उतनी जल्दी नहीं पहुंच पा रहे। वहीं अब देरी की कोई गुंजाइश नहीं बची है।

DAC Meeting: इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट क्यों है जरूरी?

तो, इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट यानी ईपी का विकल्प सामने है। रक्षा मंत्रालय के पास ये खास व्यवस्था है, जिसमें अगर अचानक हालात बिगड़ते हैं या किसी बड़े ऑपरेशन के बाद हथियार की कमी साफ दिखती है, तो लंबी फाइलबाजी छोड़कर हथियारों की फटाफट खरीद हो सके। इसमें संख्या भले कम हो, लेकिन डिलीवरी जल्दी मिलती है। पिछला ईपी राउंड 19 नवंबर 2025 को खत्म हुआ था, लेकिन कुछ डील्स अभी भी अधूरी पड़ी हैं। अब 26 दिसंबर की बैठक में इन्हीं डील्स को आगे बढ़ाने और कुछ नए प्रस्तावों पर फैसला होना है। (DAC Meeting)

DAC Meeting: नौसेना को चाहिए MR-SAM मिसाइलें

नौसेना को एमआर-एसएएम (MRSAM) मिसाइलों की जरूरत है। नौसेना ने 700 से ज्यादा मीडियम रेंज सरफेस-टू-एयर मिसाइलें खरीदने की जरूरत बताई है। ये मिसाइलें दुश्मन के लड़ाकू विमान, हेलिकॉप्टर, ड्रोन और यहां तक कि दूसरी मिसाइलों को भी 70 किलोमीटर दूर से गिरा सकती हैं। पिछले दस साल से ये नौसेना के बड़े जहाजों पर लगी हैं, लेकिन अब स्टॉक कम पड़ रहा है। इन्हें डीआरडीओ और इजरायल की कंपनी आईएआई ने मिलकर बनाया है, और भारत डायनेमिक्स लिमिटेड इनका निर्माण करता है। एमआर-एसएएम थलसेना और वायुसेना में भी है, जिससे तीनों सेनाओं के पास साझा एयर डिफेंस सिस्टम मौजूद है। (DAC Meeting)

DAC Meeting: वायुसेना की नजर अस्त्र मार्क-2 पर

वहीं, वायुसेना की नजर इस बार अस्त्र मार्क-2 मिसाइलों पर है। वायुसेना की योजना है कि 600 से ज्यादा अस्त्र मार्क-2 खरीदें जाएं। ये मिसाइलें बियॉन्ड विजुअल रेंज एयर-टू-एयर कैटेगरी की हैं यानि दुश्मन का विमान आंखों से दिखे उससे बहुत पहले, करीब 200 किलोमीटर दूर से भी इन मिसाइलों का शिकार बन सकता है। वायुसेना में पहले से ही अस्त्र एमके-1 है, लेकिन मार्क-2 उससे कहीं ज्यादा लंबी रेंज और ताकतवर है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद साफ हो गया कि भविष्य के हवाई युद्धों में लंबी दूरी की मिसाइलें सबसे जरूरी होंगी। इससे हमारे फाइटर जेट्स अपनी सीमा के अंदर रहकर ही दुश्मन को निशाना बना पाएंगे और जोखिम भी कम होगा। (DAC Meeting)

स्पाइस बम और नए रडार भी एजेंडे में

वहीं, इस बैठक में सिर्फ मिसाइलें ही नहीं, बल्कि स्पाइस प्रिसिजन गाइडेड बम और नए रडार भी एजेंडे में हैं। इजरायल के बने स्पाइस बम 2019 के बालाकोट एयर स्ट्राइक में इस्तेमाल हो चुके हैं। ऑपरेशन सिंदूर के बाद इन्हें और खरीदने की जरूरत महसूस हुई। बैठक में 300 से ज्यादा स्पाइस सिस्टम्स का ऑर्डर दिया जा सकता है।

वहीं थलसेना ने हल्के और लो-लेवल रडार की मांग रखी है। असलेषा (3डी) और भरणी (2डी) रडार पहले से सेना के पास हैं, जिन्हें बीईएल ने बनाया है। अब सीमावर्ती इलाकों में निगरानी मजबूत करने के लिए इनकी संख्या और बढ़ाई जाएगी। ये रडार आकाशतीर कमांड एंड रिपोर्टिंग सिस्टम से भी जुड़े होते हैं, जिसने ऑपरेशन सिंदूर में शानदार काम किया था। (DAC Meeting)

डीएसी की बैठक में सिर्फ रक्षा मंत्री ही नहीं, बल्कि रक्षा राज्य मंत्री, सीडीएस, तीनों सेनाओं के प्रमुख, रक्षा सचिव और डीआरडीओ प्रमुख भी शामिल होते हैं। यहीं तय होता है कि कौन सा हथियार कब और कैसे खरीदा जाएगा। ईपी के तहत हर सिस्टम के लिए करीब 300 करोड़ रुपये तक का बजट रहता है, जिससे मिसाइल, गोला-बारूद, छोटे हथियार या एंटी-टैंक सिस्टम्स जैसी चीजें फटाफट खरीदी जा सकती हैं। (DAC Meeting)

अब अगर 26 दिसंबर की बैठक में प्रस्ताव पास हो जाते हैं, तो अगले कुछ महीनों में सेना, नौसेना और वायुसेना की ताकत में जबरदस्त इजाफा दिखेगा। एमआर-एसएएम से समुद्र की सुरक्षा मजबूत होगी, अस्त्र मार्क-2 से आसमान में बढ़त मिलेगी, और नए रडार से जमीन की निगरानी और पक्की होगी। कुल मिलाकर, ये बैठक सेना के लिए एक बड़ा टर्निंग पॉइंट बन सकती है। (DAC Meeting)

DESERT CYCLONE–II: अल-हमरा के रेगिस्तान में शहरी जंग की तैयारी कर रहीं भारत और यूएई की सेनाएं

DESERT CYCLONE–II

DESERT CYCLONE–II: भारत और यूएई की सेनाएं इस वक्त अल-हमरा में एक्सरसाइज डेजर्ट साइक्लोन-टू के साथ शहरी जंग के लिए खुद को तैयार कर रही हैं। ये अभ्यास अब अपने सबसे अहम मोड़ पर है। दोनों देशों के जवान मिलकर बिल्ट-अप इलाकों में ऑपरेशन की प्रैक्टिकल ट्रेनिंग ले रहे हैं। इस अभ्यास का असल मकसद एक-दूसरे की रणनीति को समझना, साथ काम करने का तरीका बेहतर बनाना और शहरी जंग की चुनौतियों से निपटने के लिए खुद को मजबूत करना है।

18 दिसंबर से 30 दिसंबर तक चलने वाला ये अभ्यास एक्सरसाइज डेजर्ट साइक्लोन का दूसरा एडिशन है। पहला वाला 2024 में भारत के राजस्थान के महाजन फील्ड फायरिंग रेंज में हुआ था।

DESERT CYCLONE–II

DESERT CYCLONE–II: इस बार पूरा फोकस शहरी युद्ध पर

अब युद्ध सिर्फ मैदानों तक सीमित नहीं रहा। शहर, कस्बे, भीड़-भाड़ वाले इलाके यही असली चुनौती बन गए हैं। इसी वजह से इस बार पूरा अभ्यास शहरी युद्ध यानी अर्बन कॉम्बैट पर केंद्रित है। दोनों सेनाएं इस अभ्यास में सीख रही हैं कि इमारतों को कैसे घेरना है, कमरों की तलाशी कैसे करनी है, और सबसे जरूरी कैसे बिना आम लोगों को नुकसान पहुंचाए दुश्मन को कैसे काबू में लाना है। साथ ही, आईईडी यानी इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस को पहचानना और उससे जुड़ी सुरक्षा का भी खास ध्यान रखा जा रहा है। (DESERT CYCLONE–II)

DESERT CYCLONE–II: प्लाटून लेवल पर संयुक्त ऑपरेशन

ट्रेनिंग को दो हिस्सों में बांटा गया है। शुरू में क्लासरूम में रणनीति और अनुभव शेयर किए, फिर वही बातें मैदान में उतरकर प्रैक्टिकल तौर पर आजमाई जा रही हैं। असली ट्रेनिंग में जवान बिल्डिंग में घुसने की तकनीक, पूरी इमारत को साफ करने की प्रक्रिया और प्लाटून लेवल पर संयुक्त ऑपरेशन सीख रहे हैं। दोनों सेनाएं अपने-अपने तरीके शेयर कर रही हैं, ताकि एक जैसी रणनीति और एसओपी तैयार की जा सकें। (DESERT CYCLONE–II)

DESERT CYCLONE–II

आईईडी, फर्स्ट एड और घायल साथियों की मदद

शहरी जंग में सबसे बड़ी टेंशन होती है कि अगर कोई साथी घायल हो जाए तो उसे सुरक्षित निकालना। इसी वजह से इस बार कैजुअल्टी इवैक्यूएशन और फर्स्ट एड पर जोर है। जवानों को सिखाया जा रहा है कि गोलियों या विस्फोट के बीच कैसे फौरन इलाज दें और साथी को सुरक्षित जगह तक पहुंचाएं। आईईडी की पहचान और उन्हें बिना नुकसान के डिएक्टिवेट करने की ट्रेनिंग भी दी जा रही है। (DESERT CYCLONE–II)

DESERT CYCLONE–II: ड्रोन और काउंटर-ड्रोन की एंट्री

इस बार ड्रोन और काउंटर-ड्रोन टेक्नोलॉजी ने एक्सरसाइज में नया मोड़ ला दिया है। अब शहरी जंग में ड्रोन निगरानी, हमला और इंटेल जुटाने का बड़ा जरिया बन चुके हैं। दोनों सेनाएं मिलकर सीख रही हैं कि ड्रोन को कैसे पहचानें, जैम करें या जरूरत पड़ने पर जवाबी कार्रवाई करें। आने वाले वक्त में ये स्किल्स बेहद काम आएंगी। (DESERT CYCLONE–II)

अल-हमरा: जंग की असली प्रैक्टिस वाली जगह

अल-हमरा यूएई का सबसे मॉडर्न सैन्य ट्रेनिंग एरिया है। यहां बिलकुल असली जैसे हालात मॉक सिटी, इमारतें, टावर, सड़कें, सबकुछ बनाए गए हैं। ये जगह पहले भी कई इंटरनेशनल एक्सरसाइज का हिस्सा रही है। रेगिस्तान के बीच ये इलाका शहरी और मरुस्थलीय, दोनों तरह के ऑपरेशन के लिए परफेक्ट है। (DESERT CYCLONE–II)

DESERT CYCLONE–II

दोनों सेनाओं की बराबर भागीदारी

भारत की तरफ से मेकेनाइज्ड इन्फैंट्री रेजिमेंट से 45 जवान हिस्सा ले रहे हैं। ये बीएमपी-2 जैसे इन्फैंट्री व्हीकल्स चलाने में माहिर हैं और शहरी-रेगिस्तानी इलाकों में ऑपरेशन का अच्छा अनुभव रखते हैं। वहीं, यूएई की 53वीं मेकेनाइज्ड इन्फैंट्री बटालियन भी शामिल है।

पहले एडिशन से क्या अलग है?

पहला एडिशन 2024 में राजस्थान में हुआ था, जहां फोकस कॉर्डन एंड सर्च, हेलीबोर्न ऑपरेशन और ज्वाइंट सर्विलांस सेंटर्स पर था। इस बार सारा ध्यान शहरी जंग की रियल ट्रेनिंग पर है। साफ है, दोनों देश बदलती सुरक्षा चुनौतियों के हिसाब से अपनी तैयारी को भी नया रूप दे रहे हैं। (DESERT CYCLONE–II)

अभ्यास क्यों है जरूरी

भारत और यूएई के बीच डिफेंस कोऑपरेशन तेजी से बढ़ रहा है। दोनों देशों के टॉप मिलिट्री अफसरों के दौरे और बातचीत इस रिश्ते को और मजबूत कर रहे हैं। डेजर्ट साइक्लोन-टू जैसे अभ्यास सिर्फ सैन्य नहीं, रणनीतिक रिश्ते में भी भरोसा बढ़ाते हैं। ये ट्रेनिंग शांति मिशन, आतंकवाद विरोधी ऑपरेशन और स्टेबिलिटी मिशन के लिए भी बहुत अहम है। दोनों सेनाएं खुद को ऐसे हालात के लिए तैयार कर रही हैं, जहां उन्हें साथ काम करना पड़ेगा। (DESERT CYCLONE–II)

Anjadip ASW: उथले समुद्र में दुश्मन पनडुब्बियों की अब खैर नहीं, भारत में बना तीसरा एंटी-सबमरीन जहाज नौसेना को सौंपा

Anjadip ASW Shallow Water Craft

Anjadip ASW Shallow Water Craft: चेन्नई में 22 दिसंबर को नौसेना को तीसरा एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट सौंपा गया। खास बात यह है कि इसे पूरी तरह भारत में, कोलकाता के गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (जीआरएसई) ने डिजाइन और तैयार किया है। जीआरएसई ने इस साल का अपना पांचवां युद्धपोत नौसेना को सौंपा।

‘अंजदीप’ उन आठ शैलो वॉटर वॉरशिप्स में से तीसरा है, जिसे जीआरएसई भारतीय नौसेना के लिए बना रहा है। इसमें 80 फीसदी से ज्यादा कंपोनेंट्स और सिस्टम्स देश में ही बने हैं।

Anjadip ASW: दुश्मन पनडुब्बियों के लिए बड़ी मुश्किल

एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट खासतौर पर उथले समंदर में दुश्मन की पनडुब्बियों को ढूंढकर खत्म करने के लिए डिजाइन किया गया है। आजकल पाकिस्तान और चीन की सबमरीन गतिविधियां तटीय इलाकों में बढ़ रही हैं। ऐसे में ‘अंजदीप’ जैसे जहाज नौसेना के लिए बेहद जरूरी हो गए हैं।

करीब 77 मीटर लंबा ये जहाज वॉटरजेट सिस्टम से चलता है। इसका वजन लगभग 900 टन, और रफ्तार भी 25 नॉट्स तक पहुंच जाती है। जहाज में तीन वॉटर जेट लगे हैं, तो ये उथले पानी में भी बड़ी आसानी से घूम सकता है और दिशा बदल सकता है। यह भारतीय नौसेना का अब तक का सबसे बड़ा वॉटरजेट वॉरशिप है। इसका डिजाइन भी खास है, यह कम शोर करता है, तो दुश्मन की पनडुब्बियों को इसकी मौजूदगी का पता चलना मुश्किल हो जाता है। (Anjadip ASW)

Anjadip ASW: आधुनिक हथियारों और सेंसर से लैस

‘अंजदीप’ में लेटेस्ट एंटी-सबमरीन हथियार लगे हैं, जिनमें हल्के टॉरपीडो, स्वदेशी रॉकेट और खास शैलो वॉटर सोनार सिस्टम शामिल हैं। यह सोनार समंदर के नीचे छिपी पनडुब्बियों को पहचानने में बहुत मदद करता है।

इतना ही नहीं, ये जहाज सिर्फ पनडुब्बी रोधी मिशनों तक सीमित नहीं है। ‘अंजदीप’ कोस्टल सर्विलांस, माइन बिछाने और दूसरे कई सुरक्षा मिशनों में भी काम आता है। असल में, यह एक मल्टी-रोल प्लेटफॉर्म है, जो शांति हो या संकट, दोनों में अपनी उपयोगिता साबित करेगा। जहाज पर कुल 57 लोग तैनात रहते हैं, जिनमें से 7 अफसर हैं। (Anjadip ASW)

सरकार और प्राइवेट कंपनियों का साझा कमाल

इस प्रोजेक्ट की एक खासियत यह भी है कि इसे पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल पर पूरा किया गया है। जीआरएसई ने तमिलनाडु के कट्टुपल्ली के एलएंडटी शिपयार्ड के साथ मिलकर ये जहाज बनाए हैं। इससे साफ है कि अब भारत में सरकारी और निजी कंपनियां मिलकर बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स भी आसानी से संभाल रही हैं।

इन जहाजों को इंडियन रजिस्टर ऑफ शिपिंग के नियमों के हिसाब से डिजाइन और बनाया गया है। यानी क्वालिटी और सेफ्टी को लेकर कोई समझौता नहीं। (Anjadip ASW)

Anjadip ASW Shallow Water Craft

चार एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट डिलीवर

‘अंजदीप’ भारतीय नौसेना की अर्णाला क्लास का तीसरा जहाज है, जिसे जीआरएसई बना रहा है। इस पूरे प्रोजेक्ट में 16 एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट बनाए जा रहे हैं। इनमें अर्णाला क्लास के आठ शिप जीआरएसई बना रहा है और बाकी माहे क्लास के आठ शिप कोचीन शिपयार्ड बना रहा है। अभी तक चार एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट अर्णाला, अंद्रोथ, अंजदीप और माहे डिलीवर हो चुके हैं। इनमें से तीन पूरी तरह नौसेना में शामिल हो चुके हैं। ‘अंजदीप’ के जनवरी 2026 में कमीशंड होने की उम्मीद है। (Anjadip ASW)

अंजदीप से पहले जीआरएसई ने 2025 में चार युद्धपोत सौंपे थे। इनमें एडवांस्ड गाइडेड मिसाइल फ्रिगेट हिमगिरी, सीरीज के पहले दो एंटी-सबमरीन शेलो वाटर क्राफ्ट और एंड्रॉथ, और सर्वे वेसल (लार्ज) इक्षक शामिल हैं। इन चारों को नौसेना में शामिल किया जा चुका है।

जीआरएसई अभी 12 और युद्धपोत बना रहा है, जिसमें दो पी17ए एडवांस्ड स्टील्थ फ्रिगेट, पांच एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट, एक सर्वे वेसल (बड़ा) और चार नेक्स्ट जेनरेशन ऑफशोर पेट्रोल वेसल शामिल हैं।

पुराने ‘अंजदीप’ की याद में रखा नाम

नए ‘अंजदीप’ का नाम पुराने आईएनएस अंजदीप के नाम पर रखा गया है, जो पेट्या क्लास का कोरवेट था और 2003 में रिटायर हुआ था। ये नाम कर्नाटक के करवार तट के पास के अंजदीप द्वीप से लिया गया है। (Anjadip ASW)

Anjadip ASW Shallow Water Craft

आत्मनिर्भरता की ओर एक और कदम

‘अंजदीप’ की डिलीवरी भारतीय नौसेना के लिए एक और अहम माइलस्टोन है। ऐसे प्लेटफॉर्म सिर्फ विदेशी चीज़ों पर निर्भरता कम नहीं करते, बल्कि देश के युवाओं को काम, नई टेक्निकल स्किल्स और डिफेंस इंडस्ट्री को भी आगे बढ़ाते हैं।

आगे भी भारतीय नौसेना कई और स्वदेशी जहाज अपने बेड़े में शामिल करने वाली है। ‘अंजदीप’ जैसे मॉडर्न शैलो वॉटर क्राफ्ट से भारत की तटीय सुरक्षा और पनडुब्बी रोधी ताकत और मजबूत होगी। (Anjadip ASW)