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INS Vaghsheer Sortie: सबमरीन की सॉर्टी लेने वाली देश की पहली महिला राष्ट्रपति बनीं द्रौपदी मुर्मू, सुखोई-30 और राफेल में भी भरी है उड़ान

President Droupadi Murmu INS Vaghsheer Sortie
President Droupadi Murmu INS Vaghsheer Sortie

INS Vaghsheer Sortie: भारतीय नौसेना के लिए आज का दिन बेहद यादगार रहा। भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भारतीय नौसेना की स्वदेशी कलवरी-क्लास सबमरीन आईएनएस वाघशीर पर सॉर्टी लेकर इतिहास रच दिया। वह देश की पहली महिला राष्ट्रपति और ऐसी दूसरी राष्ट्रपति हैं, जिन्होंने सबमरीन की सॉर्टी ली है। कर्नाटक के कारवार स्थित कडंबा नेवल बेस से उन्होंने इस पनडुब्बी पर सवार होकर समुद्र के भीतर डाइव की और करीब दो घंटे से ज्यादा समय तक सबमरीन के ऑपरेशनल डेमॉन्स्ट्रेशन देखे। इस दौरान राष्ट्रपति के साथ नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के. त्रिपाठी भी मौजूद रहे।

यह अवसर इसलिए भी खास रहा क्योंकि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू किसी सबमरीन पर सॉर्टी लेने वाली देश की दूसरी राष्ट्रपति बनीं। इससे पहले वर्ष 2006 में पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने सबमरीन में सॉर्टी ली थी। उन्होंने रूसी मूल की किलो-क्लास सबमरीन आईएनएस सिंधुरक्षक पर सॉर्टी ली थी। वहीं, कलवरी-क्लास की सबमरीन पर किसी राष्ट्रपति की यह पहली सॉर्टी भी मानी जा रही है। (INS Vaghsheer Sortie)

INS Vaghsheer Sortie: क्रू और सेलर्स से की बातचीत

राष्ट्रपति सुबह गोवा एयरपोर्ट से हेलिकॉप्टर द्वारा कारवार के कडंबा नेवल बेस पहुंचीं। वहां नौसेना के वरिष्ठ अधिकारियों ने उनका स्वागत किया। इसके बाद वे आईएनएस वाघशीर पर सवार हुईं। सॉर्टी के दौरान सबमरीन ने डाइव की और अलग-अलग ऑपरेशनल डेमॉन्स्ट्रेशन डिस्प्ले किए गए। राष्ट्रपति ने सबमरीन के भीतर मौजूद कंट्रोल रूम, नेविगेशन सिस्टम और क्रू की कैसे काम करता है, उसे नजदीक से देखा।

करीब दो घंटे से अधिक समय तक चली इस सॉर्टी के दौरान उन्होंने अफसरों और सेलर्स से बातचीत की और उनके अनुभवों को जाना। समुद्र के भीतर सीमित जगह, सख्त अनुशासन और उच्च तकनीक के बीच काम कर रहे जवानों को देखकर राष्ट्रपति ने उनके आत्मविश्वास और समर्पण की सराहना की। (INS Vaghsheer Sortie)

नौसेना हर खतरे से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार

सॉर्टी के बाद राष्ट्रपति ने विजिटर्स बुक में अपने अनुभव साझा करते हुए लिखा कि आईएनएस वाघशीर पर सेलिंग, डाइव और समय बिताना उनके लिए बेहद खास अनुभव रहा। उन्होंने लिखा कि सबमरीन द्वारा की गई कई सफल फायरिंग और चुनौतीपूर्ण ऑपरेशंस क्रू की बेहतरीन तैयारी और समर्पण को दर्शाते हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि वाघशीर के क्रू का अनुशासन, आत्मविश्वास और उत्साह यह भरोसा देता है कि भारतीय नौसेना और उसकी सबमरीन किसी भी खतरे और हर परिस्थिति में देश की रक्षा के लिए पूरी तरह तैयार हैं। (INS Vaghsheer Sortie)

President Droupadi Murmu INS Vaghsheer Sortie
President Droupadi Murmu INS Vaghsheer Sortie

जवानों के साथ समय बिताने से बढ़ा मनोबल

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू देश की सशस्त्र सेनाओं की सुप्रीम कमांडर हैं। उनका इस तरह से ऑपरेशनल प्लेटफॉर्म पर जाकर जवानों के साथ समय बिताना, सेनाओं के साथ उनके सीधे जुड़ाव को दिखाता है। इससे पहले नवंबर 2024 में वे स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत पर भी नौसेना का ऑपरेशनल डेमॉन्स्ट्रेशन देख चुकी हैं।

नौसेना के अधिकारियों के अनुसार, राष्ट्रपति की यह सॉर्टी जवानों के लिए मनोबल बढ़ाने वाली रही। इससे यह संदेश भी गया कि देश का सर्वोच्च संवैधानिक पद सशस्त्र बलों की तैयारियों को लेकर पूरी तरह सजग और भरोसेमंद है। (INS Vaghsheer Sortie)

प्रोजेक्ट–75 के तहत बनी है आईएनएस वाघशीर

आईएनएस वाघशीर प्रोजेक्ट–75 के तहत बनी कलवरी-क्लास की छठी और अंतिम सबमरीन है। इसे जनवरी 2025 में भारतीय नौसेना में शामिल किया गया था। यह डीजल-इलेक्ट्रिक अटैक सबमरीन है, जिसे मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड ने फ्रांस की नेवल ग्रुप के सहयोग से तैयार किया है।

यह सबमरीन एंटी-सर्फेस और एंटी-सबमरीन वॉरफेयर, इंटेलिजेंस जुटाने और समुद्री निगरानी जैसे अहम मिशनों के लिए डिजाइन की गई है। इसकी खासियत है कि यह लंबे समय तक समुद्र के भीतर रहकर चुपचाप ऑपरेशन कर सकती है। वाघशीर का मोटो ‘वीरता वर्चस्व विजय’ है, जो इसकी भूमिका और सोच को दर्शाता है। (INS Vaghsheer Sortie)

आईएनएस वाघशीर पर राष्ट्रपति की सॉर्टी को भारत की स्वदेशी रक्षा क्षमता के प्रतीक के रूप में भी देखा जा रहा है। कलवरी-क्लास सबमरीन प्रोग्राम के जरिए भारत ने पनडुब्बी निर्माण में बड़ी तकनीकी छलांग लगाई है। इस परियोजना से न सिर्फ नौसेना की ताकत बढ़ी है, बल्कि देश के शिपबिल्डिंग और डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को भी मजबूती मिली है।

नौसेना के अनुसार, इन सबमरीनों के आने से समुद्री सीमाओं की निगरानी और सुरक्षा पहले से कहीं ज्यादा प्रभावी हुई है। खास तौर पर हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती गतिविधियों के बीच इन प्लेटफॉर्म्स की भूमिका बेहद अहम मानी जाती है। (INS Vaghsheer Sortie)

INS Vaghsheer Sortie: जवानों के लिए खास दिन

वाघशीर के क्रू के लिए यह दिन खास रहा। राष्ट्रपति से सीधे संवाद और उनकी सराहना ने जवानों का उत्साह बढ़ाया। सेलर्स ने बताया कि सीमित जगह में, लंबे समय तक परिवार से दूर रहकर काम करना चुनौतीपूर्ण होता है, लेकिन ऐसे मौकों पर मिलने वाला सम्मान और भरोसा उनकी मेहनत को सार्थक बना देता है।

सु-30 एमकेआई और राफेल पर सॉर्टी

इसके अलावा वे देश की एकमात्र राष्ट्रपति हैं, जिन्होंने दो अलग-अलग फाइटर जेट सु-30 एमकेआई और राफेल पर सॉर्टी ली है। पहली हवाई सॉर्टी 8 अप्रैल 2023 को हुई थी। उस दिन राष्ट्रपति मुर्मू ने असम के तेजपुर एयर फोर्स स्टेशन से सुखोई-30 एमकेआई फाइटर जेट में उड़ान भरी। यह उड़ान करीब 30 मिनट की थी। इस दौरान विमान ने ब्रह्मपुत्र घाटी और हिमालय के पहाड़ी इलाकों के ऊपर उड़ान भरी।

दूसरी हवाई सॉर्टी उन्होंने इसी साल 29 अक्टूबर को ली थी। इस बार राष्ट्रपति मुर्मू ने हरियाणा के अंबाला एयर फोर्स स्टेशन से राफेल फाइटर जेट में उड़ान भरी। यह उड़ान भी लगभग 30 मिनट की रही। इस दौरान राफेल ने करीब 15,000 फीट की ऊंचाई हासिल की और 700 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ान भरी। राफेल भारतीय वायुसेना का सबसे आधुनिक लड़ाकू विमान माना जाता है, इसलिए यह सॉर्टी खास तौर पर महत्वपूर्ण रही। (INS Vaghsheer Sortie)

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने बनाए कई रिकॉर्ड

इन दोनों उड़ानों के साथ राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कई ऐतिहासिक रिकॉर्ड भी बनाए हैं। वे भारत की पहली राष्ट्रपति हैं जिन्होंने दो अलग-अलग फाइटर जेट सुखोई-30 एमकेआई और राफेल में सॉर्टी ली है। इससे पहले के राष्ट्रपति, जैसे एपीजे अब्दुल कलाम या प्रतिभा पाटिल, केवल सुखोई-30 एमकेआई में ही उड़ान भरी थी।

इतना ही नहीं, राष्ट्रपति मुर्मू राफेल फाइटर जेट में उड़ान भरने वाली पहली भारतीय राष्ट्रपति भी हैं। साथ ही वे दुनिया की पहली महिला राष्ट्रपति हैं, जिन्होंने सुखोई-30 एमकेआई और राफेल दोनों में हवाई सॉर्टी ली है। सुखोई-30 एमकेआई की सॉर्टी के मामले में वे कुल मिलाकर तीसरी राष्ट्रपति और दूसरी महिला राष्ट्रपति थीं, क्योंकि उनसे पहले प्रतिभा पाटिल इस विमान में उड़ान भर चुकी थीं। (INS Vaghsheer Sortie)

Somaliland Explained: इजरायल की सोमालीलैंड को मान्यता क्यों है तुर्की के लिए बड़ा झटका? अंकारा डिक्लेरेशन पर भारी पड़ा अब्राहम अकॉर्ड्स

Somaliland Explained: Why Israel’s Recognition of Somaliland Is a Major Setback for Turkey and the Ankara Declaration
Somaliland Explained: Why Israel’s Recognition of Somaliland Is a Major Setback for Turkey and the Ankara Declaration

Somaliland Explained: हॉर्न ऑफ अफ्रीका का इलाका लंबे समय से वैश्विक राजनीति का संवेदनशील केंद्र रहा है। लाल सागर, अदन की खाड़ी और बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट के पास स्थित यह इलाका न सिर्फ समुद्री व्यापार के लिए अहम है, बल्कि वैश्विक सैन्य और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का भी केंद्र बन चुका है। इसी इलाके में स्थित सोमालीलैंड एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय चर्चा में है, जब इजरायल ने इसे आधिकारिक रूप से एक स्वतंत्र राज्य के रूप में मान्यता दे दी।

इजरायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने कहा, यह मान्यता “अब्राहम अकॉर्ड्स की स्पिरिट में है”। वहीं, सोमालीलैंड के राष्ट्रपति अब्दिरहमान मोहम्मद अब्दुल्लाही ने घोषणा की कि उनका देश क्षेत्रीय शांति के लिए अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल होगा।

वहीं, इजरायल का यह फैसला सिर्फ सोमालीलैंड के लिए ऐतिहासिक नहीं है, बल्कि तुर्की के लिए इसे एक बड़ा कूटनीतिक और रणनीतिक झटका माना जा रहा है।

Somaliland Explained: सोमालीलैंड का क्या है इतिहास

सोमालीलैंड की कहानी हजारों साल पुरानी है। यह इलाका प्राचीन समय में ‘पंट की भूमि’ के नाम से जाना जाता था, जिसका जिक्र प्राचीन मिस्र के अभिलेखों में मिलता है। यहां से लोबान और मिर्र जैसे कीमती पदार्थों का व्यापार होता था। मध्यकाल में यह क्षेत्र आदल सल्तनत और बाद में इसाक सल्तनत के अधीन रहा, जहां स्थानीय कबीलों के नेतृत्व में शासन व्यवस्था चली।

19वीं सदी के अंत में यूरोपीय शक्तियां अफ्रीका में पहुंचीं। ब्रिटेन ने 1884 से 1886 के बीच इस क्षेत्र में स्थानीय कबीलों से संधियां कर ब्रिटिश सोमालीलैंड प्रोटेक्टोरेट की स्थापना की। इसका मकसद लाल सागर और अदन की खाड़ी के समुद्री मार्गों पर नियंत्रण बनाए रखना था। दक्षिणी सोमालिया इटली का उपनिवेश था जिसे इटालियन सोमालीलैंड कहाा जाता था। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन ने इटालियन हिस्से पर भी कब्जा कर लिया।

Somaliland Explained: 1960 को ब्रिटिश सोमालीलैंड को मिली आजादी

26 जून 1960 को ब्रिटिश सोमालीलैंड को आजादी मिली और यह कुछ ही दिनों के लिए एक स्वतंत्र राज्य बना। लेकिन 1 जुलाई 1960 को यह इटालियन सोमालीलैंड के साथ मिलकर सोमाली रिपब्लिक बना। यह एकीकरण ‘ग्रेटर सोमालिया’ की सोच से प्रेरित था, लेकिन प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर यह कभी पूरी तरह सफल नहीं हो सका।

1969 में जनरल सियाद बैरे ने सत्ता संभाली और सैन्य शासन लागू किया। इस दौरान उत्तर में बसे इसाक कबीले पर अत्याचार बढ़े। 1988 में हरगेइसा और बुराओ जैसे शहरों पर की गई बमबारी को आज भी एक बड़े नरसंहार के रूप में देखा जाता है।

Somaliland Explained: 1991 में गृहयुद्ध में फंस गया सोमालिया

1991 में सियाद बैरे के शासन के पतन के साथ ही सोमालिया गृहयुद्ध में फंस गया। उसी साल 18 मई को सोमालीलैंड ने ब्रिटिश काल की सीमाओं के आधार पर फिर से स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। इसके बाद जहां मोगादिशु और दक्षिणी सोमालिया अराजकता, मिलिशिया और अल-शबाब जैसे आतंकवादी संगठनों की चपेट में आ गए, वहीं सोमालीलैंड ने स्थानीय कबीलाई समझौतों के जरिए स्थिर शासन व्यवस्था खड़ी की।

यहां अपनी सरकार, संसद, मुद्रा, पुलिस, सेना और पासपोर्ट सिस्टम बनाई। समय-समय पर चुनाव हुए और सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण भी देखा गया।

Somaliland Explained: मान्यता की लंबी प्रतीक्षा

हालांकि तीन दशक से ज्यादा समय तक स्थिरता बनाए रखने के बावजूद सोमालीलैंड को अंतरराष्ट्रीय मान्यता नहीं मिल सकी। अफ्रीकी संघ और संयुक्त राष्ट्र लगातार सोमालिया की क्षेत्रीय अखंडता का समर्थन करते रहे। अधिकांश देशों ने मोगादिशु की फेडरल सरकार को ही वैध प्रतिनिधि माना।

इजरायल की मान्यता के बाद आया नया मोड़

इसी साल 26 दिसंबर को इजरायल ने सोमालीलैंड को आधिकारिक मान्यता देकर इस स्थिति को बदल दिया। दोनों पक्षों के बीच राजनयिक संबंध स्थापित करने, दूतावास खोलने और सहयोग बढ़ाने की घोषणा की गई। यह पहली बार था जब किसी संयुक्त राष्ट्र सदस्य देश ने सोमालीलैंड को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में स्वीकार किया।

सोमालीलैंड की राजधानी हरगेइसा है और आबादी करीब 60 लाख मानी जाती है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय मान्यता कई देशों से नहीं मिली है, लेकिन इजरायल के कदम ने इस मुद्दे को फिर से वैश्विक सुर्खियों पर ला दिया है।

इजरायल के इस फैसले को लाल सागर और यमन के समीप अपनी रणनीतिक स्थिति मजबूत करने के रूप में देखा जा रहा है। बर्बेरा बंदरगाह और आसपास का इलाका इस लिहाज से बेहद अहम माना जाता है।

तुर्की के लिए क्यों है ये बड़ा झटका

तुर्की पिछले एक दशक से हॉर्न ऑफ अफ्रीका में अपनी पकड़ मजबूत करता रहा है। सोमालिया में तुर्की का सबसे बड़ा विदेशी दूतावास, मोगादिशु में विशाल मिलिट्री ट्रेनिंग बेस, अरब सागर से लाल सागर तक समुद्री सुरक्षा में दखल, ये सभी तुर्की की उस रणनीति का हिस्सा रहे हैं, जिसके तहत अंकारा अफ्रीका में अपना दीर्घकालिक प्रभाव बढ़ाना चाहता है। ऐसे में सोमालीलैंड को इजरायल की मान्यता देने को तुर्की के लिए सिर्फ कूटनीतिक झटका नहीं, बल्कि उसकी पूरी क्षेत्रीय योजना के लिए चुनौती माना जा रहा है।

सोमालिया में तुर्की की गहरी पैठ

तुर्की का सोमालिया के साथ रिश्ता 2011 के अकाल संकट के दौरान मजबूती से सामने आया, जब राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोआन मोगादिशु पहुंचे। इसके बाद तुर्की ने सोमालिया में अस्पताल, सड़कें, स्कूल और बंदरगाह परियोजनाएं शुरू कीं। मोगादिशु में स्थित तुर्की दूतावास आज दुनिया में तुर्की का सबसे बड़ा दूतावास माना जाता है।

सैन्य स्तर पर, तुर्की ने सोमाली सेना को ट्रेनिंग देने के लिए तुर्कसोम मिलिटरी ट्रेनिंग बेस बनाया। यहां हजारों सोमाली सैनिकों को प्रशिक्षण दिया गया है। इसके अलावा तुर्की ने सोमालिया के साथ रक्षा सहयोग और समुद्री सुरक्षा समझौते भी किए हैं, जिससे लाल सागर और अदन की खाड़ी में उसकी भूमिका मजबूत हुई।

तुर्की की आधिकारिक नीति हमेशा स्पष्ट रही है, सोमालिया एक संप्रभु और एकीकृत देश है और सोमालीलैंड उसका अभिन्न हिस्सा है। अंकारा ने कभी भी सोमालीलैंड को अलग देश मानने का संकेत नहीं दिया। तुर्की के लिए यह सिर्फ एक कानूनी मान्यता नहीं, बल्कि उसके रणनीतिक निवेश और सैन्य मौजूदगी की सुरक्षा का मुद्दा भी है।

अगर सोमालीलैंड को व्यापक अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिलती है, तो इससे मोगादिशु की सरकार कमजोर होगी और तुर्की की वह स्थिति भी डगमगा सकती है, जो उसने सोमालिया की वैध सरकार के साझेदार के रूप में बनाई है।

2024 में अंकारा की कूटनीतिक जीत

जनवरी 2024 में जब इथियोपिया ने सोमालीलैंड के साथ बर्बेरा बंदरगाह को लेकर समझौता किया, तो इससे पूरे क्षेत्र में तनाव बढ़ गया। सोमालिया ने इसे अपनी संप्रभुता का उल्लंघन बताया। उस समय तुर्की ने मध्यस्थता की भूमिका निभाई और अंकारा में बातचीत कराई।

दिसंबर 2024 में अंकारा डिक्लेरेशन के जरिए इथियोपिया और सोमालिया के बीच तनाव कम किया गया। इथियोपिया ने सोमालिया की क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने की बात कही और सोमालीलैंड को लेकर समझौता ठंडे बस्ते में चला गया। इसे तुर्की की बड़ी कूटनीतिक सफलता माना गया था।

इज़रायल की मान्यता से बदला खेल

26 दिसंबर को इजरायल के सोमालीलैंड को मान्यता दिए जाने से यह संतुलन अचानक बदल गया है। तुर्की के लिए यह इसलिए बड़ा झटका है क्योंकि यह फैसला उसकी हालिया मध्यस्थता और नीति के विपरीत गया। अंकारा को आशंका है कि यह कदम अन्य देशों के लिए भी रास्ता खोल सकता है।

तुर्की के विदेश मंत्रालय ने इस फैसले को सोमालिया के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप बताया और कहा कि इससे क्षेत्रीय स्थिरता को नुकसान पहुंचेगा। मिस्र और सोमालिया के साथ मिलकर तुर्की ने संयुक्त बयान जारी कर इस कदम की निंदा की।

हॉर्न ऑफ अफ्रीका में रणनीतिक चिंता

हॉर्न ऑफ अफ्रीका वह इलाका है, जहां से बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट गुजरता है। बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य के जरिए दुनिया के करीब 12 प्रतिशत वैश्विक व्यापार और लगभग 30 प्रतिशत कंटेनर ट्रैफिक गुजरता है। यह रास्ता लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ता है और विश्व व्यापार के लिए बेहद अहम है। इस क्षेत्र में प्रभाव का मतलब है वैश्विक समुद्री व्यापार पर नजर। इसी वजह से तुर्की, चीन, अमेरिका और अब इज़रायल की गतिविधियां यहां लगातार बढ़ रही हैं।

तुर्की लंबे समय से इस इलाके में खुद को एक प्रमुख समुद्री सुरक्षा साझेदार के रूप में पेश करता रहा है। लेकिन अगर सोमालीलैंड में इज़रायल या अन्य देशों की सैन्य-रणनीतिक मौजूदगी बढ़ती है, तो तुर्की के लिए यह सीधे प्रभाव क्षेत्र में चुनौती होगी।

तुर्की-इजरायल के तनावपूर्ण संबंध

गाजा युद्ध और फिलिस्तीन मुद्दे को लेकर तुर्की और इजरायल के रिश्ते पहले से तनावपूर्ण रहे हैं। ऐसे माहौल में इजरायल का यह कदम तुर्की के लिए सिर्फ अफ्रीका तक सीमित मुद्दा नहीं है, बल्कि यह उसके व्यापक मध्य-पूर्व और अफ्रीका नीति से जुड़ जाता है।

तुर्की इसे इजरायल की उस रणनीति के रूप में देख रहा है, जिसके तहत वह लाल सागर और यमन के आसपास अपनी स्थिति मजबूत करना चाहता है।

लेकिन इजरायल की मान्यता ने इस संतुलन को झकझोर दिया। इससे सोमालीलैंड को अंतरराष्ट्रीय मंच पर नया आत्मविश्वास मिला और तुर्की की उस नीति को सीधी चुनौती मिली, जो सोमालिया की अखंडता पर आधारित थी।

तुर्की अब इस मुद्दे पर सोमालिया के साथ अपने सहयोग को और मजबूत करने की कोशिश करता दिख रहा है, ताकि क्षेत्रीय संतुलन उसके पक्ष में बना रहे।

अब्राहम अकॉर्ड्स का विस्तार

26 दिसंबर को इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इस मान्यता को “अब्राहम अकॉर्ड्स की स्पिरिट” बताया, जो 2020 में ट्रंप की मध्यस्थता से शुरू हुए समझौते हैं। सोमालीलैंड के राष्ट्रपति अब्दिरहमान मोहम्मद अब्दुल्लाही ने घोषणा की कि उनका देश अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल होगा। यह अब्राहम अकॉर्ड्स का ऐतिहासिक विस्तार है कि पहली बार कोई गैर-अरब, मुस्लिम-बहुल देश इसमें जुड़ा है।

अरब लीग ने जताया विरोध

सोमालिया की फेडरल सरकार ने इस फैसले को अपनी संप्रभुता पर हमला बताया। अफ्रीकी संघ, अरब लीग और मिस्र ने भी इस कदम की आलोचना की। तुर्की ने इसे क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरा बताते हुए कड़ा विरोध दर्ज कराया।

इसके बावजूद यह साफ है कि इजरायल की मान्यता ने हॉर्न ऑफ अफ्रीका की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है और पुराने समीकरणों को चुनौती दी है।

Indian Army New Winter Doctrine: पहलगाम हमले के बाद सर्दियों में कैसे सेना ने बदली रणनीति, अब आतंकवाद के लिए नहीं कोई ‘ऑफ-सीजन’

Indian Army New Winter Doctrine

Indian Army New Winter Doctrine: इस साल पहलगाम हमले के बाद भारतीय सेना ने अपनी पुरानी रणनीतियों में कई बदलाव किए हैं। यह बदलाव खासतौर पर पहलगाम आतंकी हमले के बाद सामने आया है, जिसके बाद सेना ने यह साफ कर दिया कि अब आतंकी सर्दियों की आड़ लेकर भारत में घुसपैठ नहीं कर सकेंगे।

पहलगाम अटैक से पहले सर्दियों में जिस तरह से पाकिस्तान समर्थित आतंकियों ने सरहद पार करके भारतीय इलाकों में घुसपैठ की थी और फिर वारदात को अंजाम दिया था। उसके बाद जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के खिलाफ भारतीय सेना की काउंटर-टेररिज्म की रणनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। सर्दियों को अब केवल मुश्किल मौसम नहीं, बल्कि ऑपरेशनल मौके के तौर पर देखा जा रहा है। इसे ही भारतीय सेना की नई विंटर डॉक्ट्रिन कहा जा रहा है।

आमतौर पर जम्मू-कश्मीर में दिसंबर और जनवरी के महीने, खासकर चिल्लई कलां के दौरान काउंटर-टेरर ऑपरेशंस की कम हो जाते हैं। भारी बर्फबारी, बंद रास्ते और बेहद ठंडे मौसम के चलते ऊंचाईं वाले इलाकों में सैन्य मूवमेंट सीमित रहता था। ऐसे हालात का फायदा उठाकर आतंकी ऊंचाई पर स्थित जंगलों और पहाड़ी इलाकों में छिप जाते थे, रीग्रुपिंग करते थे और अगली गर्मियों की तैयारी करते थे। (Indian Army New Winter Doctrine)

Indian Army New Winter Doctrine: पहलगाम हमले के बाद बदला सोच का तरीका

22 अप्रैल 2025 को पहलगाम इलाके में हुए आतंकी हमले के बाद सुरक्षा एजेंसियों ने पूरे हालात का दोबारा मुआयना किया। इस आकलन में यह बात साफ सामने आई कि आतंकवादी सर्दियों को एक “सेफ पीरियड” मानकर अपनी गतिविधियों की प्लानिंग करते हैं और दोबारा से संगठित करते हैं। इसी के बाद सेना ने तय किया कि अब सर्दियों में भी ऑपरेशंस उसी तेजी से चलाए जाएंगे, जैसी गर्मियों में होते हैं।

नई विंटर डॉक्ट्रिन लागू करके भारतीय सेना ने का आतंकियों को यह स्पष्ट तौर यह संदेश दे दिया है कि अब वे सर्दियों का फायदा नहीं उठा सकते। बर्फ, ठंड और दुर्गम इलाका अब सेना के लिए रुकावट नहीं, बल्कि ऑपरेशन का हिस्सा हैं। (Indian Army New Winter Doctrine)

Indian Army New Winter Doctrine
Indian Army Winter Operations: How Troops Are Fighting Terror and Denying Militants Shelter in Sub-Zero Cold

प्रोएक्टिव विंटर पोस्चर: अब कोई ब्रेक नहीं

इस डॉक्ट्रिन के तहत सेना ने प्रोएक्टिव विंटर पोस्चर अपनाया है। इसका मतलब है कि सर्दियों में ऑपरेशंस को कम करने की बजाय उन्हें और मजबूत किया गया है। किश्तवाड़, डोडा, राजौरी और पुंछ जैसे इलाकों में ऊंचाई वाले क्षेत्रों में अस्थायी विंटर बेस और सर्विलांस पोस्ट बनाई गई हैं।

पहले जिन इलाकों को सर्दियों में खाली कर दिया जाता था, अब वहां सैनिक लगातार तैनात हैं। बर्फ से ढके पहाड़, घने जंगल और संकरी घाटियों में अभी भी पेट्रोलिंग हो रही है। इससे आतंकियों के लिए किसी भी इलाके को सुरक्षित ठिकाना बनाना मुश्किल हो गया है। (Indian Army New Winter Doctrine)

दशकों से 1990 की इंसर्जेंसी से लेकर 2024 तक चिल्लई कलां आतंकवादियों की घुसपैठ के लिए सुरक्षित पीरियड या नेचुरल शील्ड की तरह काम करता था। भारी बर्फबारी से ऊंचे दर्रे बंद हो जाते थे, और सेना के बड़े ऑपरेशंस मुश्किल हो जाते थे। हिंटरलैंड जैसे जम्मू रीजन जैसे डोडा, किश्तवाड़ में सेना मुख्य रूप से डिफेंसिव रहती थी। इससे आतंकवादियों को मौसमी फायदा मिलता था और वे लोकल सपोर्ट के जरिए छिपकर सर्वाइव करते थे। इसे “टेम्परेरी लुल इन टेररिस्ट एक्टिविटी” भी कहा जाता था। (Indian Army New Winter Doctrine)

Indian Army New Winter Doctrine: क्या है सर्विलांस-स्वीप-सर्विलांस मॉडल

नई विंटर डॉक्ट्रिन का बेस सर्विलांस-स्वीप-सर्विलांस मॉडल है। इसका मतलब है कि किसी भी इलाके में पहले लगातार निगरानी की जाती है। ड्रोन, थर्मल इमेजर और ग्राउंड सेंसर्स से मूवमेंट पर नजर रखी जाती है। जैसे ही पुख्ता इनपुट मिलता है, वहां ऑपरेशन चलाकर इलाके को क्लियर किया जाता है। इसके बाद भी निगरानी जारी रहती है, ताकि आतंकी दोबारा उसी इलाके में वापस न आ सकें।

इसका मतलब है कि इस मॉडल के बाद ऑपरेशंस अब लगातार चलते रहेंगे। सेना का मकसद सिर्फ आतंकियों को मार गिराना नहीं, बल्कि पूरे इलाके को लंबे समय तक सुरक्षित बनाए रखना है। (Indian Army New Winter Doctrine)

Indian Army New Winter Doctrine: ऊंचाई और ठंड वाले इलाकों में भी तैनाती

सर्दियों में ऑपरेशन चलाना शारीरिक और मानसिक सहनशक्ति की भी परीक्षा है। सैनिकों को घुटनों तक बर्फ में चलना पड़ता है, एवलांच संभावित इलाकों से गुजरना होता है और शून्य से काफी नीचे तापमान में रातें बितानी पड़ती हैं।

इसके लिए सेना ने स्पेशलाइज्ड विंटर वॉरफेयर सब-यूनिट्स को आगे बढ़ाया है। इन यूनिट्स को स्नो नेविगेशन, कोल्ड वेदर सर्वाइवल, एवलांच रिस्पॉन्स और ऊंचाई पर कॉम्बैट की विशेष ट्रेनिंग दी गई है। यही कारण है कि अब चिल्लई कलां के दौरान गश्त और ऑपरेशन लगातार जारी हैं। चिल्लई कलां में दिसंबर-जनवरी में भयंकर सर्दी पड़ती है और भारी बर्फबारी और मुश्किल मौसम के कारण वहां बड़े ऑपरेशंस कम या स्केल डाउन हो जाते थे। लेकिन इस बार ऐसा नहीं हैं। (Indian Army New Winter Doctrine)

Indian Army New Winter Doctrine: ऐसा क्या खास है चिल्लई कलां में?

चिल्लई कलां एक फारसी शब्द है, जिसमें “चिल्ला” का मतलब 40, और “कलां” मतलब बड़ा/मेजर होता है। यानी “बड़ी 40 दिनों की ठंड” पड़ती है। मध्य एशिया से आए सूफी संतों ने सर्दियों में 40 दिनों की एकांत साधना (चिल्ला) प्रथा शुरू की, जहां वे श्राइन में रहकर ध्यान करते थे। यह प्रथा कश्मीर में लोकप्रिय हुई और सबसे ठंडे 40 दिनों को “चिल्लई कलां” कहा जाने लगा। इसका जिक्र सूफी संतों की तजकीराओं (जीवनी ग्रंथों) में मिलता है।

कुछ इतिहासकार कहते हैं कि इसका इतिहास 1000 साल से ज्यादा पुराना है। ईरानी परंपरा में 21 दिसंबर की रात को “शब-ए-यल्दा” या “शब-ए-चेल्ले” (40 की रात) मनाया जाता है, जो कश्मीर तक पहुंचा। वहीं पहले बौद्ध काल में इसे “शिश्शर मास” भी कहा जाता था।

चिल्लई कलां कश्मीर घाटी की सर्दियों का सबसे कठिन और ठंडा दौर है, जो हर साल 21 दिसंबर से 31 जनवरी तक लगभग 40 दिनों तक चलता है। यह कश्मीर की सर्दियों का “पीक” पीरियड है, जब ठंड सबसे ज्यादा प्रचंड होती है। इस दौराान तापमान -10 डिग्री फ्रीजिंग पॉइंट से काफी नीचे चला जाता है और भारी बर्फबारी होती है, पानी की पाइपें जम जाती हैं, डल झील जैसी झीलें फ्रीज हो सकती हैं, और ऊंचे इलाकों में रास्ते बंद हो जाते हैं। (Indian Army New Winter Doctrine)

Indian Army New Winter Doctrine: टेक्नोलॉजी बनी सबसे बड़ी ताकत

नई विंटर डॉक्ट्रिन में टेक्नोलॉजी की भूमिका बेहद अहम है। ड्रोन से ऊंचे इलाकों की निगरानी की जा रही है, जहां पैदल पहुंचना जोखिम भरा हो सकता है। थर्मल इमेजिंग उपकरण बर्फ और अंधेरे के बीच भी हीट सिग्नेचर पकड़ लेते हैं। ग्राउंड सेंसर्स से जंगलों और घाटियों में हलचल का पता लगाया जा रहा है।

इन सभी उपकरणों को रियल-टाइम इंटेलिजेंस नेटवर्क से जोड़ा गया है, ताकि फील्ड यूनिट्स को तुरंत इनपुट मिल सके। हालांकि सेना के सूत्र साफ कहते हैं कि तकनीक मददगार है, लेकिन अंतिम फैसला और कार्रवाई जमीन पर मौजूद सैनिक ही करते हैं। (Indian Army New Winter Doctrine)

आतंकियों पर बढ़ रहा दबाव

हाल ही में जारी इंटेलिजेंस इनपुट्स के मुताबिक जम्मू रीजन में करीब 30 से 35 आतंकी सक्रिय बताए जाते हैं। लगातार चल रहे ऑपरेशंस के कारण इन्हें निचले और आबादी वाले इलाकों से पीछे हटकर ऊंचे और निर्जन क्षेत्रों में जाना पड़ा है। स्थानीय ओवरग्राउंड वर्कर्स और सपोर्ट नेटवर्क पर भी दबाव बढ़ा है।

सर्दियों में जब गांवों तक पहुंचना मुश्किल होता है, तब आतंकियों के लिए राशन, दवाइयां और कम्युनिकेशन बनाए रखना और भी कठिन हो जाता है। सेना का मानना है कि यही दबाव आतंकियों को कमजोर करता है। (Indian Army New Winter Doctrine)

जॉइंट और इंटीग्रेटेड अप्रोच

नई रणनीति में सेना अकेले काम नहीं कर रही है। जम्मू-कश्मीर पुलिस, सीआरपीएफ, स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप, फॉरेस्ट गार्ड्स, विलेज डिफेंस गार्ड्स और सिविल एडमिनिस्ट्रेशन के साथ मिलकर एक साझा सिक्योरिटी ग्रिड बनाया गया है।

इंटेलिजेंस शेयरिंग तेज हुई है और ऑपरेशन के बाद इलाके की सुरक्षा जिम्मेदारी तय की जाती है। इससे आतंकियों के लिए दोबारा घुसपैठ या वापसी की गुंजाइश कम हो जाती है। (Indian Army New Winter Doctrine)

ग्रामीण इलाकों में भरोसा कायम रखने की कोशिश

बर्फीले और दूरदराज के गांवों में सेना की मौजूदगी से स्थानीय लोगों में भी भरोसा बढ़ रहा है। पहले जो इलाके सर्दियों में अलग-थलग पड़ जाते हैं औऱ जिसका फादयाा आतंकी उठाते थे, अब वहं सेना की लगातार मौजूदगी देखने को मिल रही है। विलेज डिफेंस गार्ड्स से गांवों में सुरक्षा पुख्ता हो रही है। सेना लगातार ग्रामीणों से संपर्क रखती है, ताकि डर और अफवाह का माहौल न बने।

स्थानीय लोग भी अब संदिग्ध गतिविधियों की जानकारी तुरंत सुरक्षा बलों तक पहुंचा रहे हैं, जिससे ऑपरेशंस करने में आसानी हो रही है।

वहीं, नई विंटर डॉक्ट्रिन के जरिए सेना ने यह साफ कर दिया है कि आतंकवाद के लिए अब कोई “ऑफ-सीजन” नहीं होगा। बर्फ से ढकी पहाड़ियां, ठंडी रातें और सुनसान जंगल अब आतंकियों के लिए ढाल नहीं बनेंगे। (Indian Army New Winter Doctrine)

Indian Army Winter Operations: How Troops Are Fighting Terror and Denying Militants Shelter in Sub-Zero Cold

Indian Army New Winter Doctrine
Indian Army Winter Operations: How Troops Are Fighting Terror and Denying Militants Shelter in Sub-Zero Cold

Indian Army Winter Operations: As the Himalayas lock themselves in ice and the 40-day stretch of Chillai Kalan tightens its grip on Jammu and Kashmir, life in the mountains slows to a near standstill. Roads vanish under snow, villages retreat indoors, and silence settles over the forests of Kishtwar and Doda. But for the Indian Army, winter no longer signals a pause. This year, it marks an intensification.

Defence sources say the Army has expanded counter-terrorism operations deep into snowbound and high-altitude areas of Kishtwar and Doda, determined to deny Pakistani terrorists the seasonal refuge they have traditionally relied upon. In sub-zero temperatures and near-whiteout conditions, soldiers are climbing higher, staying longer, and watching closer.

Indian Army Winter Operations
Indian Army Winter Operations: How Troops Are Fighting Terror and Denying Militants Shelter in Sub-Zero Cold

Indian Army Winter Operations: Breaking the Winter Lull

For decades, Chillai Kalan from December 21 to January 31 has brought a tactical lull. Heavy snowfall cuts off mountain routes, forcing both civilians and terrorists into relative inactivity. This winter, however, marks a deliberate shift in doctrine.

Instead of scaling down, Army units have established temporary winter bases and surveillance posts in higher reaches that are usually vacated. Patrols now criss-cross frozen ridgelines, dense forests, and narrow valleys, ensuring that no area becomes a safe haven.

Military experts describe this as a clear evolution in counter-terror strategy—one that treats winter not as an obstacle, but as an operational advantage.

Indian Army Winter Operations: Chasing Shadows in High Altitudes

Operating in such conditions is not merely a tactical challenge but a test of endurance. Soldiers trek through knee-deep snow, navigate avalanche-prone slopes, and endure nights where temperatures plunge well below freezing. Visibility is often poor, and terrain unforgiving.

Yet patrols continue relentlessly. “The idea is simple,” a source explained. “No gaps, no sanctuaries.” The Army’s presence across multiple altitude bands, valleys, mid-slopes, and high ridges creates overlapping control grids, denying terrorists any movement corridor.

Indian Army Winter Operations: Cornered and Isolated

Intelligence assessments indicate that around 30 to 35 Pakistani terrorists are currently active in the Jammu region. Sustained operations over recent months have pushed these groups out of lower, inhabited areas and into higher, desolate terrain.

Cut off from overground workers and local sympathisers whose support has significantly dried up these terrorists are believed to be seeking temporary winter hideouts. Reports suggest attempts to coerce villagers for food and shelter, but heightened vigilance and community resistance have limited such efforts.

“Their isolation is growing,” an official said. “Winter only worsens their logistical and communication constraints.”

Indian Army Winter Operations: Technology Meets Terrain

Modern technology has become a critical ally in this winter campaign. Drone surveillance, ground sensors, thermal imagers, and surveillance radars are being used to detect movement, even in dense forests or during night hours.

Heat signatures picked up by thermal devices often guide patrols, while unmanned aerial systems scan areas too dangerous for foot movement. These tools, integrated into the Army’s intelligence network, allow commanders to act swiftly on actionable inputs.

Yet, technology complements not replaces the soldier’s instinct and terrain knowledge. “Machines help,” a senior officer noted, “but it’s the soldier who still walks the snow.”

Indian Army Winter Operations
Indian Army Winter Operations: How Troops Are Fighting Terror and Denying Militants Shelter in Sub-Zero Cold

Indian Army Winter Operations: Joint Forces, One Grid

The winter operations are marked by unprecedented coordination. Alongside the Army, the Jammu and Kashmir Police, CRPF, Special Operations Group, Forest Guards, Village Defence Guards (VDGs), and the civil administration form a seamless security grid.

Intelligence is pooled, verified, and acted upon jointly. Once an area is cleared, it remains under sustained surveillance, a cycle described by officials as “surveillance–operation–surveillance.” This approach ensures terrorists cannot slip back once pressure eases.

Villages at the Frontline

In remote hamlets tucked away in snowbound valleys, the Army’s presence carries reassurance. Village Defence Guards act as sentinels, alerting forces to suspicious movements, while soldiers regularly interact with locals to counter fear and intimidation.

For villagers, seeing troops braving the same harsh conditions reinforces trust. “They are here when no one else can be,” a resident of a remote Doda village said quietly.

Indian Army Winter Operations: No Season for Terror

As snow piles high on mountain passes and temperatures plunge further, the message from the security establishment is unmistakable: winter will no longer shield terrorism.

Through endurance, technology, coordination, and community trust, the Indian Army is transforming the quiet of Chillai Kalan into a season of vigilance. Every ridge is watched, every valley scanned, and every silence questioned.

In the stillness of frozen forests, the fight continues-step by step, patrol by patrol ensuring that even in the harshest winter, peace is pursued without pause.

DAC meeting: डीएसी बैठक टली, अब 29 दिसंबर को होगी अहम मीटिंग, इमरजेंसी प्रॉक्यूरमेंट की डेडलाइन 15 जनवरी तक बढ़ी

DAC Meeting Approves Rs 79,000-Crore Defence Push, Boosts Drones, Pinaka and Precision Strikes
DAC Meeting Approves Rs 79,000-Crore Defence Push, Boosts Drones, Pinaka and Precision Strikes (File Photo)

DAC meeting: देश की सुरक्षा से जुड़े बड़े फैसलों पर मुहर लगाने वाली डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (डीएसी) की अहम बैठक शुक्रवार को नहीं हो सकी। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में होने वाली यह इस साल की आखिरी बैठक थी। लेकिन अच्छी बात यह है कि बैठक को इसी साल के लिए टाल दिया गया है। माना जा रहा है कि बैठक अगले हफ्ते हो सकती है। इस बैठक में देश की तीनों सेनाओं को उन सभी हथियारों और उपकरणों पर मुहर लग सकती है जिसकी उन्हें बेहद सख्त जरूरत है।

DAC meeting: क्यों टल गई आज की डीएसी बैठक

डिफेंस सूत्रों के मुताबिक, आज डीएसी की बैठक की औपचारिक शुरुआत तो की गई थी, लेकिन काउंसिल के सभी सदस्य मौजूद नहीं थे। सूत्रों ने बताया कि भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह विदेश दौरे पर थे। वह मिस्र की यात्रा से लौट रहे थे। डीएसी में तीनों सेनाओं के प्रमुखों की मौजूदगी जरूरी होती है, क्योंकि फैसले सामूहिक सहमति से लिए जाते हैं। ऐसे में जब सभी सदस्य उपलब्ध नहीं हो पाए, तो बैठक का एजेंडा आगे नहीं बढ़ाया गया। (DAC meeting)

रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि उनकी गैरमौजूदगी में इतने बड़े और संवेदनशील रक्षा सौदों पर चर्चा करना सही नहीं माना गया। इसी वजह से बैठक को टालकर 29 दिसंबर की नई तारीख तय की गई है। यानी इसी साल में ही यह बैठक फिर से होगी।

हालांकि बैठक में रक्षा मंत्रालय ने इमरजेंसी प्रॉक्योरमेंट (ईपी) की अंतिम तारीख को भी बढ़ाकर 15 जनवरी कर दिया है। यह फैसला इसलिए अहम माना जा रहा है, क्योंकि इसके जरिए सेना, नौसेना और वायुसेना को जरूरी हथियार और उपकरण जल्दी उपलब्ध कराए जाते हैं।

DAC meeting: क्यों बढ़ी इमरजेंसी प्रॉक्योरमेंट की डेडलाइन

डीएसी बैठक के टलने का सीधा असर इमरजेंसी प्रॉक्योरमेंट (ईपी) प्रक्रिया पर भी पड़ा है। पहले ईपी की अंतिम तारीख 19 नवंबर को खत्म हो चुकी थी। इसके बाद उम्मीद थी कि दिसंबर के आखिर तक पेंडिंग मामलों को निपटा लिया जाएगा। लेकिन चूंकि अब ईपी की समयसीमा को भी बढ़ाकर 15 जनवरी कर दिया गया है। तो उम्मीद है कि पेंडिंग मामलों को तेजी से आगे बढ़ाया जाएगा।

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DAC meeting: क्या है इमरजेंसी प्रॉक्योरमेंट, और यह कैसे करती है काम

जब देश की सीमाओं पर अचानक तनाव बढ़ता है, कोई बड़ा सैन्य ऑपरेशन होता है या युद्ध जैसे हालात बनते हैं, तब भारतीय सेना को इंतजार करने का वक्त नहीं होता। ऐसे समय में हथियार, गोला-बारूद, ड्रोन, मिसाइल, स्पेयर पार्ट्स और दूसरे जरूरी उपकरण तुरंत चाहिए होते हैं।

इसके लिए इमरजेंसी प्रॉक्योरमेंट प्रक्रिया का इस्तेमाल किया जाताा है, जिसके तहत सेना लंबी खरीद प्रक्रिया में पड़े बिना तुरंत जरूरी हथियार, गोला-बारूद और उपकरण खरीद सकती हैं। इसका इस्तेमाल तब किया जाता है, जब अचानक हालात बिगड़ते हैं या किसी बड़े ऑपरेशन के बाद हथियारों की तुरंत जरूरत महसूस होती है।

आमतौर पर डिफेंस डील्स में डीएपी–2020 (डिफेंस एक्विजिशन प्रोसिजर) जैसी लंबी प्रक्रिया अपनाई जाती है, जिसमें कई साल लग सकते हैं। लेकिन ईपी का मकसद सिर्फ एक होता है, कम से कम समय में सेना को जरूरत को पूरा करना।

‘ट्रांच’ में क्यों बांटा गया है ईपी को

अभी ईपी-6 चल रहा है, जिसकी डेडलाइन को बढ़ा कर 15 जनवरी 2026 कर दिया गया है। यानी इस तारीख तक सभी पेंडिंग कॉन्ट्रैक्ट्स को साइन करना होगा। इमरजेंसी प्रॉक्यूरमेंट एक बार में नहीं, बल्कि चरणों में दी जाती है। इन्हें ईपी–1, ईपी–2, ईपी–3 जैसे नाम दिए जाते हैं। हर ट्रांच एक खास हालात के लिए होती है, जैसे सीमा पर तनाव, चीन के साथ टकराव या किसी बड़े आतंकवाद विरोधी ऑपरेशन के बाद ईपी बनाई जाती है। हर ट्रांच में सरकार यह तय करती है कि कितने पैसे तक की खरीद होगी, कितने समय के लिए यह व्यवस्था लागू रहेगी और किन चीजों को प्राथमिकता दी जाएगी। (DAC meeting)

DAC meeting: क्या है पैसे का पूरा गणित?

ईपी के तहत हर एक कॉन्ट्रैक्ट की एक तय सीमा होती है। किसी भी एक सौदे की कीमत 300 करोड़ रुपये तक हो सकती है। यह सीमा हथियारों और उपकरणों, दोनों तरह की खरीद पर लागू होती है।

एक बार जरूरत तय हो जाने के बाद कॉन्ट्रैक्ट को 40 दिनों के अंदर फाइनल करना होता है। यही वजह है कि इसे फास्ट ट्रैक कहा जाता है। इसके बाद सप्लायर को 12 महीने, यानी एक साल के भीतर ऑर्डर की डिलीवरी करनी होती है।

अगर तय समय में डिलीवरी नहीं होती, तो अब सरकार उस कॉन्ट्रैक्ट को फोरक्लोज, यानी रद्द भी कर सकती है। हाल के समय में इस नियम को और सख्त किया गया है, ताकि कंपनियां देरी न करें।

हर ईपी ट्रांच का एक बजट फ्रेम होता है। ईपी–6 ट्रांच में कुल सीमा करीब 40 हजार करोड़ रुपये मानी गई है। यह पैसा एक ही सौदे में नहीं जाता, बल्कि कई छोटे–छोटे कॉन्ट्रैक्ट्स के जरिए खर्च होता है।

DAC meeting: स्वदेशी खरीद को क्यों मिलती है प्राथमिकता

ईपी में स्पष्ट नियम है कि जहां संभव हो, वहां भारतीय कंपनियों से ही खरीद की जाए। यानी इंडिजिनस सोर्स को पहली प्राथमिकता मिलती है। अगर किसी सिस्टम या हथियार के लिए आयात जरूरी हो, तो उसके लिए अलग से रक्षा मंत्रालय की मंजूरी लेनी पड़ती है। इसका मकसद सिर्फ तेजी नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर भारत को बढ़ावा देना भी है।

कितने समय के लिए होती है ईपी

आमतौर पर एक ईपी ट्रांच 3 से 6 महीने या फिर एक साल के लिए लागू रहती है। लेकिन अगर बातचीत चल रही हो और सौदे अधूरे हों, तो इसकी अवधि बढ़ाई भी जा सकती है। जैसे हाल ही में ईपी की समयसीमा नवंबर 2025 में खत्म हो गई थी, लेकिन इसे बढ़ाकर 15 जनवरी 2026 कर दिया गया, ताकि चल रही नेगोशिएशंस पूरी की जा सकें। (DAC meeting)

ईपी में असली पावर है किसके पास

इमरजेंसी प्रॉक्यूरमेंट की सबसे बड़ी ताकत तीनों सेनाओं के वाइस चीफ्स के पास होती है। सेना में यह पावर वाइस चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ के पास है। नौसेना में वाइस चीफ ऑफ नेवल स्टाफ यह अधिकार इस्तेमाल करते हैं। वायुसेना में यह जिम्मेदारी डिप्टी चीफ ऑफ एयर स्टाफ के पास होती है। यही अधिकारी ईपी के तहत कॉन्ट्रैक्ट को मंजूरी देते हैं और फाइनेंशियल पावर एक्सरसाइज करते हैं। इसमें हर कॉन्ट्रैक्ट 300 करोड़ रुपये तक का हो सकता है, और ये फास्ट-ट्रैक पर अप्रूव करते हैं। यानी 40 दिनों में कॉन्ट्रैक्ट फाइनल और 1 साल में  ऑर्डर की डिलीवरी करनी होती है।

डिप्टी चीफ्स का रोल आमतौर पर सपोर्टिंग जैसे प्लानिंग या तकनीकी सलाह देना होता है। सामान्य रक्षा खरीद में उनके पास अलग वित्तीय अधिकार होते हैं, लेकिन ईपी में मुख्य फैसला वाइस चीफ ही लेते हैं।

क्या करता है सर्विसेज प्रॉक्योरमेंट बोर्ड

ईपी के मामलों में एक अहम भूमिका होती है सर्विसेज प्रॉक्योरमेंट बोर्ड, यानी एसपीबी की। यह बोर्ड हेडक्वार्टर इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ के तहत काम करता है। एसपीबी की बैठकें चीफ ऑफ इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ टू द चेयरमैन चीफ्स ऑफ स्टाफ कमिटी (CISC) की अध्यक्षता में होती हैं। एसपीबी एक जॉइंट बोर्ड है, जिसमें तीनों सर्विसेज (आर्मी, नेवी, एयर फोर्स) के थ्री-स्टार या टू-स्टार लेवल ऑफिसर्स (जैसे डायरेक्टर जनरल्स या संबंधित ब्रांच हेड्स) और अन्य संबंधित प्रतिनिधि शामिल होते हैं।

एसपीबी यह तय करता है कि जो चीज खरीदी जा रही है, वह वाकई जरूरी है या नहीं। इसे ही एक्सेप्टेंस ऑफ नेसेसिटी, यानी एओएन कहा जाता है। एओएन मिलने के बाद ही आगे खरीद की प्रक्रिया शुरू होती है। पहले यह काम एक अलग कमेटी करती थी, लेकिन अब एसपीबी के जरिए तीनों सेनाओं के बीच तालमेल सुनिश्चित किया जाता है। (DAC meeting)

DAC meeting: कैसे चलता है ईपी का पूरा प्रोसेस

सबसे पहले सेना, नौसेना या वायुसेना अपनी तत्काल जरूरत पहचानती है। इसके बाद मामला एसपीबी के पास जाता है, जहां से एओएन मिलती है। फिर डिफेंस फाइनेंस या इंटीग्रेटेड फाइनेंशियल एडवाइजर से सहमति ली जाती है।

इसके बाद सप्लायर से बातचीत होती है और वाइस चीफ की मंजूरी से कॉन्ट्रैक्ट साइन किया जाता है। यह सब काम 40 दिनों के भीतर पूरा करना होता है।

अगर कोई चीज विदेश से मंगानी हो, तो रक्षा मंत्रालय से विशेष अनुमति लेनी पड़ती है।

ईपी की पूरी ट्रांच को अंत में डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल, यानी डीएसी, से मंजूरी मिलती है, जिसकी अध्यक्षता रक्षा मंत्री करते हैं।

कैपिटल और रेवेन्यू प्रॉक्यूरमेंट में फर्क

ईपी के तहत दो तरह की खरीद होती है। एक होती है कैपिटल प्रॉक्यूरमेंट, यानी नए हथियार और बड़े सिस्टम खरीदे जाते हैं। वहीं, दूसरी होती है रेवेन्यू प्रॉक्यूरमेंट, जिसमें गोला-बारूद, स्पेयर पार्ट्स और मेंटेनेंस से जुड़ी चीजें आती हैं। ईपी का फोकस दोनों में होता है, लेकिन असली मकसद होता है सेना की ऑपरेशनल रेडीनेस, यानी युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार रहना। (DAC meeting)

DAC meeting: क्यों जरूरी मानी जाती है ईपी

इमरजेंसी प्रॉक्यूरमेंट की शुरुआत 2016 के उरी हमले के बाद हुई थी। इसके बाद गलवान घाटी में चीन के साथ तनाव के समय इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हुआ। हाल ही में ऑपरेशन सिंदूर के बाद भी ईपी की एक नई ट्रांच लाई गई।

इस व्यवस्था की वजह से सेना को वक्त पर जरूरी हथियार मिलते हैं और किसी भी आपात स्थिति में तैयारी में कमी नहीं रहती। हालांकि, इसके साथ यह भी साफ कर दिया गया है कि इंडस्ट्री को तय समय में सप्लाई करनी ही होगी, वरना कॉन्ट्रैक्ट रद्द हो सकता है।

पिछले कुछ सालों में भारत ने कई बार इमरजेंसी प्रॉक्योरमेंट का सहारा लिया है। ईपी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें न तो लंबा रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (आरएफपी) जारी किया जाता है और न ही ट्रायल जैसा लंबा प्रोसेस अपनाया जाता है। आमतौर पर एक डील की सीमा करीब 300 से 400 करोड़ रुपये तक होती है और हथियार छह महीने के भीतर सेना को मिल जाते हैं। सामान्य रक्षा सौदों में यही प्रक्रिया दो से तीन साल तक खिंच सकती है। (DAC meeting)

फास्ट ट्रैक परचेज का भी विकल्प

इसके अलावा डिफेंस इक्विपमेंट्स की तुरंत खरीद के लिए रक्षा मंत्रालय के पास एक और विकल्प होता है, जिसे फास्ट ट्रैक परचेज (एफटीपी) कहा जाता है। यह प्रक्रिया इमरजेंसी प्रॉक्यूरमेंट जैसी ही है, लेकिन इसमें हर सौदे की अधिकतम राशि की सीमा ज्यादा होती है। अगर ईपी की समयसीमा खत्म होने के बाद भी अगर कुछ सौदे अटके रहते हैं, तो उन्हें एफटीपी के तहत आगे बढ़ाया जाता है। (DAC meeting)

क्या है डीएसी और क्यों अहम है

डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल रक्षा मंत्रालय की सबसे हाई पर्चेज कमेटी होती है। इसकी अध्यक्षता रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह करते हैं। इसमें चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान, तीनों सेनाओं के प्रमुख, रक्षा सचिव और डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (डीआरडीओ) के चेयरमैन शामिल होते हैं।

डीएसी यह तय करती है कि सेना को किस तरह के हथियार और सिस्टम खरीदने हैं। एक बार डीएसी किसी प्रोजेक्ट को हरी झंडी दे देती है, तभी आगे कॉन्ट्रैक्ट नेगोशिएशन शुरू होते हैं। इसलिए डीएसी की मंजूरी को किसी भी रक्षा सौदे का पहला और सबसे अहम कदम माना जाता है। (DAC meeting)

DAC meeting: 29 दिसंबर की बैठक से क्या उम्मीदें

अब सभी की नजर 29 दिसंबर को होने वाली डीएसी बैठक पर टिकी है। माना जा रहा है कि यह साल 2025 की आखिरी डीएसी बैठक होगी और इसमें कई बड़े प्रस्तावों पर चर्चा हो सकती है। रक्षा मंत्रालय से जुड़े सूत्रों के अनुसार, इस बैठक में स्वदेशी रक्षा परियोजनाओं को प्राथमिकता दी जाएगी, ताकि सरकार की आत्मनिर्भर भारत नीति को आगे बढ़ाया जा सके। (DAC meeting)

संभावना है कि बैठक में भारतीय सेना के लिए बड़ी संख्या में लॉइटरिंग म्यूनिशन, ड्रोन और काउंटर-ड्रोन सिस्टम पर फैसला लिया जा सकता है। इसके अलावा वायुसेना के लिए लंबी दूरी की एयर-टू-एयर मिसाइल, जैसे एस्ट्रा मार्क-2, और कुछ विदेशी सिस्टम पर भी चर्चा होने की उम्मीद है।

MRSAM और टैंक प्रोजेक्ट भी एजेंडे में

डीएसी बैठक में भारतीय नौसेना के लिए मीडियम रेंज सरफेस-टू-एयर मिसाइल सिस्टम (MRSAM) की खरीद का प्रस्ताव भी आ सकता है। इसका मकसद नौसेना के युद्धपोतों को हवाई खतरों से सुरक्षा देना है।

वहीं, भारतीय सेना अपने टी-90 टैंकों के स्वदेशी ओवरहॉल का प्रस्ताव भी रख सकती है। इसके तहत करीब 200 टैंकों को देश में ही आधुनिक बनाया जाएगा। इससे न सिर्फ विदेशी निर्भरता कम होगी, बल्कि घरेलू रक्षा उद्योग को भी बढ़ावा मिलेगा। (DAC meeting)

इस विदेशी सौदों पर भी हो सकती है चर्चा 

हालांकि सरकार का जोर स्वदेशी प्रणालियों पर है, लेकिन कुछ विदेशी सौदों पर भी चर्चा हो सकती है। इनमें अमेरिका से एमक्यू-9बी सी गार्जियन ड्रोन को लीज पर लेने का प्रस्ताव शामिल है। भारत पहले ही 31 ऐसे ड्रोन खरीदने का करार कर चुका है, जो 2028 से भारत में आने शुरू होंगे।

इसके अलावा वायुसेना के लिए मिड-एयर रिफ्यूलर एयरक्राफ्ट और कुछ विशेष हथियार प्रणालियों पर भी फैसला लिया जा सकता है।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा वैश्विक हालात को देखते हुए रक्षा खरीद में देरी भारत के लिए ठीक नहीं है। सीमाओं पर चुनौतियां बनी हुई हैं और तकनीक तेजी से बदल रही है। ऐसे में जरूरी है कि लंबित सौदों को जल्द से जल्द अंतिम रूप दिया जाए। (DAC meeting)

Indian Defence Stocks Rise: डिफेंस शेयरों में लगातार 5वें दिन भी उछाल, बीईएल से मझगांव डॉक तक तेजी

Indian Defence Stocks Rise for Fifth Straight Day Ahead of Key DAC Meeting, BEL and Mazagon Dock Gain
Indian Defence Stocks Rise for Fifth Straight Day Ahead of Key DAC Meeting, BEL and Mazagon Dock Gain

Indian Defence Stocks Rise:  शेयर बाजार में डिफेंस सेक्टर से जुड़ी कंपनियों के शेयरों में शुक्रवार को लगातार पांचवें कारोबारी दिन तेजी देखने को मिली है। इस तेजी की सबसे बड़ी वजह आज होने वाली डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (डीएसी) की अहम बैठक मानी जा रही है। बाजार में यह उम्मीद है कि इस बैठक में बड़े रक्षा सौदों को मंजूरी मिल सकती है, जिसका सीधा फायदा देश की डिफेंस कंपनियों को मिलेगा।

सुबह के कारोबार में निफ्टी इंडिया डिफेंस इंडेक्स करीब 1 फीसदी की बढ़त के साथ ट्रेड करता नजर आया। यह बढ़त बाकी सभी सेक्टोरल इंडेक्स से ज्यादा रही। पिछले पांच कारोबारी सत्रों में डिफेंस इंडेक्स में कुल मिलाकर अच्छी मजबूती देखी गई है, जिससे निवेशकों का भरोसा इस सेक्टर पर और बढ़ा है।

डिफेंस से जुड़ी बड़ी कंपनियों के शेयरों में भी मजबूती देखने को मिली। भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बीईएल) का शेयर 1 प्रतिशत से ज्यादा चढ़कर निफ्टी-50 में सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाले शेयरों में शामिल रहा। कंपनी को एयर डिफेंस सिस्टम, रडार और कम्युनिकेशन इक्विपमेंट से जुड़े नए ऑर्डर मिलने की उम्मीद है, जिस वजह से निवेशकों ने इसमें खरीदारी की है।

निफ्टी-50 से बाहर की कंपनियों में पारस डिफेंस एंड स्पेस टेक्नोलॉजीज, एमटार टेक्नोलॉजीज और मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स के शेयरों में 2 से 3 प्रतिशत तक की तेजी दर्ज की गई। खास तौर पर मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स के शेयरों में मजबूत खरीदारी देखी गई, क्योंकि कंपनी को भारतीय नौसेना से जुड़े नए शिपबिल्डिंग और सबमरीन प्रोजेक्ट्स मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।

डिफेंस सेक्टर में इस तेजी का सबसे बड़ा कारण आज होने वाली डीएसी मीटिंग मानी जा रही है। इस बैठक की अध्यक्षता रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह करेंगे। यह साल 2025 की आखिरी डीएसी बैठक है, इसलिए इसे काफी अहम माना जा रहा है। बाजार से जुड़ी रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस बैठक में करीब 80 हजार करोड़ रुपये तक के डिफेंस सौदों को मंजूरी मिल सकती है।

सूत्रों के अनुसार, इन सौदों में खास फोकस एयर डिफेंस और आईएसआर (इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉनिसेंस) क्षमताओं को मजबूत करने पर रह सकता है। हाल के महीनों में बदले वैश्विक हालात और क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों को देखते हुए सरकार इन क्षेत्रों में तेजी से निवेश बढ़ा रही है।

संभावना जताई जा रही है कि बैठक में मिसाइल सिस्टम, रडार, ड्रोन, काउंटर-ड्रोन टेक्नोलॉजी और निगरानी से जुड़े कई प्रस्तावों को मंजूरी मिल सकती है। इन सभी सेक्टर्स में भारतीय डिफेंस कंपनियां पहले से ही सक्रिय हैं, जिसका असर उनके शेयरों पर साफ दिखाई दे रहा है।

डिफेंस शेयरों में तेजी के पीछे सिर्फ घरेलू कारण ही नहीं, बल्कि वैश्विक जियो-पॉलिटिकल टेंशन भी एक बड़ी वजह है। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बढ़ते सैन्य तनाव और संघर्ष की खबरों के बीच निवेशक डिफेंस सेक्टर को एक सुरक्षित और मजबूत विकल्प के तौर पर देख रहे हैं।

ऐसे माहौल में ज्यादातर देश अपने रक्षा बजट और सैन्य तैयारियों पर ज्यादा खर्च करते हैं। इसका सीधा फायदा हथियार, इलेक्ट्रॉनिक्स, शिपबिल्डिंग और डिफेंस टेक्नोलॉजी से जुड़ी कंपनियों को मिलता है। इसी वजह से भारतीय डिफेंस शेयरों में लगातार खरीदारी बनी हुई है।

बाजार के जानकारों का कहना है कि डिफेंस शेयरों की आगे की चाल काफी हद तक आज की डीएसी बैठक के फैसलों पर निर्भर करेगी। अगर उम्मीद के मुताबिक बड़े रक्षा सौदों को मंजूरी मिलती है, तो आने वाले दिनों में इस सेक्टर में और मजबूती देखने को मिल सकती है।

हालांकि, कुछ निवेशक साल के अंत को देखते हुए सतर्क भी हैं, क्योंकि इस दौरान मुनाफावसूली की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद डिफेंस सेक्टर को लेकर लंबी अवधि का नजरिया अब भी सकारात्मक बना हुआ है।

पिछले कुछ वर्षों में सरकार की आत्मनिर्भर भारत नीति और डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग पर जोर की वजह से भारतीय रक्षा कंपनियों की ऑर्डर बुक मजबूत हुई है। डिफेंस एक्सपोर्ट में बढ़ोतरी, नई तकनीकों का विकास और सरकारी समर्थन ने इस सेक्टर को नई पहचान दी है।

इसी भरोसे के चलते डीएसी बैठक से पहले भी निवेशक डिफेंस शेयरों में दिलचस्पी दिखा रहे हैं। लगातार पांच दिन की तेजी इस बात का संकेत मानी जा रही है कि बाजार को इस सेक्टर से आगे भी सकारात्मक खबरों की उम्मीद है।

K-4 Missile Test: पांच प्वाइंट्स में समझें भारत के लिए यह मिसाइल टेस्ट क्यों है खास, पढ़ें कैट-एंड-माउस गेम की पूरी कहानी

K-4 Missile Test Explained: Why India’s Submarine-Launched Nuclear Missile Is Crucial and How New Delhi Outsmarted Chinese Spy Ships
K-4 Missile Test Explained: Why India’s Submarine-Launched Nuclear Missile Is Crucial and How New Delhi Outsmarted Chinese Spy Ships

K-4 Missile Test: भारत ने हाल ही में बंगाल की खाड़ी में स्वदेशी न्यूक्लियर सबमरीन आईएनएस अरिहंत से 3,500 किलोमीटर तक मार करने वाली के-4 सबमरीन-लॉन्च्ड बैलिस्टिक मिसाइल का परीक्षण किया। खास बात यह 3,500 किमी रेंज वाली मिसाइल परमाणु हथियार ले जा सकती है। हालांकि यह टेस्ट पहले 3 दिसंबर को होना था, लेकिन श्रीलंका में चक्रवात आने की वजह से इसे टालना पड़ा। लेकिन इस बार भारत ने बेहद गोपनीय तरीके से इस परीक्षण का अंजाम दिया। आइए पांच प्वाइंट्स में समझते हैं इस बार ये टेस्ट क्यों है खास।

K-4 Missile Test: अब पॉन्टून नहीं, असली पनडुब्बी से टेस्ट

यह के-4 मिसाइल का आईएनएस अरिघात से दूसरा सफल परीक्षण है। इससे पहले नवंबर 2024 में इसी पनडुब्बी से के-4 का पहला टेस्ट किया गया था। शुरुआत में के-4 मिसाइल के ज्यादातर टेस्ट समुद्र में बनाए गए अंडरवाटर प्लेटफॉर्म यानी सबमर्सिबल पॉन्टून से किए जाते थे। लेकिन अब ऑपरेशनल न्यूक्लियर सबमरीन आने के बाद से सभी टेस्ट इसी से हो रहे हैं। वहीं, सबमरीन से बार-बार सफल लॉन्च होना इस बात का संकेत है कि यह सिस्टम अब धीरे-धीरे पूरी तरह ऑपरेशनल हो रहा है। (K-4 Missile Test)

INS अरिघात को अगस्त 2024 में भारतीय नौसेना में शामिल किया गया था। यह भारत की दूसरी स्वदेशी न्यूक्लियर बैलिस्टिक मिसाइल सबमरीन है और इसे खास तौर पर लंबी दूरी की परमाणु मिसाइलों के लिए तैयार किया गया है।

K-4 Missile Test: के-15 से कहीं ज्यादा लंबी मारक क्षमता

आईएनएस अरिघात से पहले भारत की पहली परमाणु पनडुब्बी आईएनएस अरिहंत पर मुख्य तौर पर के-15 मिसाइलें तैनात थीं। के-15 मिसाइल की रेंज करीब 750 किलोमीटर थी। इसके मुकाबले के-4 मिसाइल की रेंज करीब 3,500 किलोमीटर है। लंबी रेंज का फायदा यह है कि पनडुब्बी को दुश्मन के तट के बहुत करीब जाने की जरूरत नहीं पड़ती। इससे पनडुब्बी की सुरक्षा बढ़ती है और उसकी पहचान होने की संभावना कम हो जाती है। यही वजह है कि के-4 को भारत की समुद्री परमाणु क्षमता के लिए बेहद अहम माना जाता है। (K-4 Missile Test)

K-4 Missile Test: भारत की स्ट्रैटेजिक फोर्सेस कमांड का अहम रोल

इस पूरे टेस्ट को पूरी तरह गोपनीय रखा गया है। दरअसल यह भारत की स्ट्रैटेजिक फोर्सेस कमांड के तहत आता है, जिसे स्ट्रैटेजिक न्यूक्लियर कमांड भी कहा जाता है। यह भारतीय सशस्त्र बलों की एक विशेष ट्राई-सर्विसेज कमांड है, जो न्यूक्लियर कमांड अथॉरिटी का हिस्सा है और देश के परमाणु हथियारों के प्रबंधन, प्रशासन और ऑपरेशनल कंट्रोल के लिए जिम्मेदार है। यह कमांड 4 जनवरी 2003 को अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने बनाई थी, ताकि भारत की न्यूक्लियर ट्रायड (जमीन, हवा और समुद्र आधारित परमाणु क्षमता) को प्रभावी ढंग से संभाला जा सके। (K-4 Missile Test)

K-4 Missile Test: सेकंड स्ट्राइक कैपेबिलिटी हुई मजबूत

सेकंड स्ट्राइक कैपेबिलिटी परमाणु युद्ध की सबसे महत्वपूर्ण अवधारणा है। इसका मतलब है कि अगर कोई दुश्मन देश भारत पर पहला परमाणु हमला करता है और भारत के जमीनी ठिकाने, एयर बेस या कमांड सेंटर को नष्ट करने की कोशिश करता है, तब भी भारत के पास जवाबी परमाणु हमला करने की गारंटीड क्षमता बची रहेगी। यह क्षमता इसलिए जरूरी है, क्योंकि यह दुश्मन को पहला हमला करने से रोकती है। उसे पता होता है कि हमला करने पर भी वह खुद पूरी तरह तबाह हो जाएगा। इसे म्यूचुअल एश्योर्ड डिस्ट्रक्शन या क्रेडिबल डिटरेंस कहा जाता है। भारत की आधिकारिक नीति “नो फर्स्ट यूज” है, इसलिए सेकंड स्ट्राइक कैपेबिलिटी उसके लिए बेहद अहम है। (K-4 Missile Test)

K-4 Missile Test: चीनी वैसल्स को दिया गच्चा: कैट-एंड-माउस गेम की पूरी कहानी

रिपोर्ट्स के मुताबिक यह ट्रायल विशाखापट्टनम के तट से दूर समुद्री क्षेत्र में किया गया, जहां दिसंबर के मध्य में जारी नोटैम यानी नोटिस टू एयरमेन के जरिए बड़े इलाके को ट्रायल के लिए सुरक्षित घोषित किया गया था। दरअसल जब भी भारत कोई मिसाइल टेस्ट करने की योजना बनाता है, तो चीनी वैसल्स उस इलाके के इर्द-गिर्द एकत्रित हो जाते हैं, ताकि मिसाइल टेस्ट का डेटा जुटाया जा सके और चीन उन्हें अपनी मिसाइलों को अपग्रेड करने के लिए इस्तेमाल कर सके। कुछ दिनों पहले भी इस क्षेत्र में एक नहीं बल्कि चीन चीनी रिसर्च जहाज मौजूद थे।

सूत्रों का कहना है कि यह परीक्षण पहले 1 से 3 दिसंबर के बीच होना था, लेकिन 3 दिसंबर को टेस्ट रेंज के पास एक चीनी जहाज देखे जाने के बाद इसे टाल दिया गया। यह चाइनीज ओशन मिनरल रिसोर्सेज वेसल था, जिसे टेस्ट रेंज की दक्षिणी सीमा से करीब 115 नॉटिकल मील दूर देखा गया। हालांकि उस दौरान श्रीलंका में चक्रवात भी आ गया था, जो मिसाइल टेस्ट टालने की बड़ी वजह भी बना। (K-4 Missile Test)

भारत ने कई बार 1-4 दिसंबर, 17-20 दिसंबर, 22-24 दिसंबर में नोटैम जारी किए। जिनकी रेंज लगभग 3,000-3,500 किमी थी। हर बार नोटैम जारी होते ही चीन के 4-5 रिसर्च वैसल्स शी यान 6, शेन हाय यी हाओ, लान हाई 101, द यांग यी हाओ उस इलाके में पहुंच जाते थे। वहीं, चीन का एक लुयांग–III श्रेणी का डेस्ट्रॉयर, एक जियांगकाई–II फ्रिगेट और एक फुची क्लास टैंकर भी इस इलाके में थे। ये सभी जहाज चीन के 48वें एंटी-पायरेसी एस्कॉर्ट फोर्स का हिस्सा थे और उस समय गल्फ ऑफ एडन के पास तैनात थे। ये जहाज मिसाइल की ट्रैजेक्टरी, टेलीमेट्री डेटा, अकॉस्टिक सिग्नेचर और डेब्रिस कलेक्ट करने में सक्षम हैं। जिससे चीन भारत की मिसाइल टेक्नोलॉजी की जासूसी कर सकता है। (K-4 Missile Test)

भारत भी चीन की रणनीति को लगातार समझता रहा और जानबूझकर नोटैम जारी करता था, जैसे ही चीन के जहाज आते थे, फिर भारत नोटैम कैंसल कर देता था। इससे चीन के जहाज बेकार घूमते रहते, ईंधन बर्बाद होता और उनकी लोकेशन पता चल जाती। भारतीय नौसेना चीफ एडमिरल दिनेश त्रिपाठी ने भी कहा कि चीनी जहाजों की मौजूदगी में टेस्ट को “रीकैलिब्रेट” (समायोजित) करना अब सामान्य प्रक्रिया है।

जिसके बाद सभी फेक/डिकॉय नोटैम जारी के बाद, भारत ने बिना कोई नया नोटैम जारी किए 23 दिसंबर को टेस्ट कर दिया। हालांकि चीनी जहाज उस इलाके में जरूर थे, लेकिन उन्हें पता ही नहीं चला कि टेस्ट हो रहा है, क्योंकि कोई पूर्व चेतावनी नहीं थी। के-4 मिसाइल सफलतापूर्वक लॉन्च हुई, सभी पैरामीटर पूरे हुए, लेकिन कोई जासूसी डेटा चीन को नहीं मिल पाया। (K-4 Missile Test)

के-4 के बाद के-5 और के-6 की तैयारी

भारत की न्यूक्लियर ट्रायड में जमीन से मार करने वाली मिसाइलें, हवा से हमला करने वाले विमान और समुद्र से हमला करने वाली पनडुब्बियां शामिल हैं। समुद्र से दागी जाने वाली मिसाइलें इस ट्रायड का सबसे सुरक्षित हिस्सा मानी जाती हैं, क्योंकि पनडुब्बियां लंबे समय तक समुद्र के भीतर छिपी रह सकती हैं। (K-4 Missile Test)

के-4 मिसाइल का डेवलपमेंट भारत के डिफेंस रिसर्च फ्रेमवर्क के तहत किया गया है। इसे डीआरडीओ ने तैयार किया है। इसके कई अहम हिस्सों का निर्माण पुणे और नासिक स्थित डीआरडीओ की प्रयोगशालाओं में किया गया है।

मिसाइल का रॉकेट मोटर, प्रोपेलेंट और लॉन्च सिस्टम पूरी तरह स्वदेशी तकनीक पर आधारित है। के-4 एक सॉलिड फ्यूल मिसाइल है, जो पानी के भीतर से कोल्ड लॉन्च तकनीक के जरिए बाहर निकलती है और फिर हवा में अपने इंजन को एक्टिव करती है। (K-4 Missile Test)

के-4 मिसाइल की लंबाई करीब 10 से 12 मीटर है और इसका वजन 17 से 20 टन के बीच है। यह लगभग 2 टन तक का वारहेड ले जाने में सक्षम है। मिसाइल को इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह दुश्मन की मिसाइल डिफेंस सिस्टम को चकमा दे सके। यह मिसाइल इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम पर आधारित है और जरूरत पड़ने पर टर्मिनल फेज में दिशा बदलने की क्षमता भी रखती है।

वहीं, के-4 के बाद भारत के-5 और के-6 जैसी लंबी दूरी की मिसाइलों पर भी काम कर रहा है। के-5 की रेंज 5,000 किलोमीटर से ज्यादा बताई जाती है, जबकि के-6 को और भी लंबी दूरी के लिए विकसित किया जा रहा है।

इसके अलावा आईएनएस अरिघात के बाद भारत की तीसरी परमाणु पनडुब्बी आईएनएस अरिधमान पर भी काम अंतिम चरण में बताया जा रहा है। इसके 2026 की शुरुआत में नौसेना में शामिल होने की संभावना जताई जा रही है। इसके अलावा अरिहंत श्रेणी की अगली पनडुब्बियां भी निर्माणाधीन हैं। भविष्य में आने वाली नई पनडुब्बियों में ज्यादा मिसाइल ट्यूब और अधिक एडवांस रिएक्टर लगाए जाने की योजना है। इससे भारत की समुद्री क्षमता और मजबूत होगी। (K-4 Missile Test)

Tactical RPA RFI: सेना को चाहिए रेगिस्तान से लद्दाख तक 24,000 फीट पर उड़ने वाले टैक्टिकल ड्रोन, 8 घंटे रहें हवा में, बिना रनवे भरें उड़ान

Tactical RPA RFI Procurement- Indian Army Issues RFI for High-End Armed Drones for Plains and High Altitude Area
Tactical RPA RFI Procurement- Indian Army Issues RFI for High-End Armed Drones for Plains and High Altitude Area

Tactical RPA RFI: ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय सेना अब भविष्य की जंग के लिए खुद को एक नए स्तर पर तैयार कर रही है। सीमाओं पर बदलते खतरे, ड्रोन युद्ध की बढ़ती भूमिका और चीन-पाकिस्तान जैसे पड़ोसियों की बढ़ती हिमाकत को देखते हुए सेना ने एक अहम कदम उठाया है। रक्षा मंत्रालय की ओर से टैक्टिकल रिमोटली पायलटेड एयरक्राफ्ट (टैक आरपीए) यानी मॉडर्न मिलिट्री ड्रोन के लिए रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन (आरएफआई) जारी की है।

आरएफआई के जरिए सेना यह जानना चाहती है कि भारत में कौन-कौन सी कंपनियां ऐसे एडवांस हथियारबंद ड्रोन बना सकती हैं, जो मैदानी इलाकों से लेकर ऊंचाई वाले पहाड़ी इलाकों में हर हालात में काम कर सकें। (Tactical RPA RFI)

Tactical RPA RFI: सेना को चाहिए 20 टैक्टिकल आरपीए ड्रोन

जारी आरएफआई के तहत सेना लगभग 20 टैक्टिकल आरपीए ड्रोन शामिल करने की योजना बना रही है। यह पूरी खरीद मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत के तहत होगी। सेना की योजना के मुताबिक इनमें से 10 ड्रोन मैदानी इलाकों के लिए होंगे, जबकि 10 को खास तौर पर ऊंचाई वाले और दुर्गम पहाड़ी इलाकों में तैनात किया जाएगा। सेना की तैयारी है कि ये ड्रोन ऐसे होने चाहिए, जो पंजाब और राजस्थान जैसे मैदानी इलाकों से लेकर लद्दाख और अरुणाचल की ऊंची चोटियों तक, हर जगह काम कर सकें। सेना चाहती है कि ये ड्रोन दिन-रात, हर मौसम और हर हालात में उड़ान भर सकें। (Tactical RPA RFI)

सेना की इस पहल को हाल के समय में सीमाओं पर बदले हालात से जोड़कर देखा जा रहा है। लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल और लाइन ऑफ कंट्रोल पर ड्रोन गतिविधियां लगातार बढ़ी हैं। इन ड्रोन का इस्तेमाल दुश्मन देश निगरानी से लेकर, हथियार गिराने और जासूसी में लगातार किया जा रहा है। ऐसे में भारतीय सेना के लिए यह जरूरी हो गया है कि वह सिर्फ जवाबी कार्रवाई न करे, बल्कि पहले से ही दुश्मन की हर चाल पर नजर रख सके। (Tactical RPA RFI)

Tactical RPA RFI: अपग्रेड करने का भी हो विकल्प

सेना के मुताबिक टैक्टिकल रिमोटली पायलटेड एयरक्राफ्ट एक मल्टी-रोल प्लेटफॉर्म होगा, जो एक साथ कई काम कर सके। इसमें निगरानी, जासूसी, इलेक्ट्रॉनिक निगरानी और जरूरत पड़ने पर सीधे हमले की क्षमता भी होनी चाहिए। ड्रोन का डिजाइन मॉड्यूलर होना चाहिए, ताकि भविष्य में बिना पूरे सिस्टम को बदले नए सेंसर और हथियार जोड़े जा सकें। सेना चाहती है कि ये ड्रोन आने वाले 15–20 साल तक तकनीकी रूप से एडवांस बने रहें, ताकि उन्हें अपग्रेड भी किया जा सके। (Tactical RPA RFI)

Tactical RPA RFI: झेल सकें 60 नॉट्स तक की तेज हवा

सेना ने आरएफआई में साफ किया है कि ये ड्रोन दिन और रात दोनों समय काम करने में सक्षम होने चाहिए। खराब मौसम, तेज हवा, बारिश, अत्यधिक ठंड और गर्मी जैसे हालात में भी ये काम कर सकें। ऊंचाई वाले इलाकों में ऐसे ड्रोन चााहिए जो 60 नॉट्स तक की तेज हवा झेल सकें, जबकि मैदानी इलाकों में इस्तेमाल किए जाने वाले 30 नॉट्स तक की हवा में भी स्थिर उड़ान भर सकें। (Tactical RPA RFI)

Tactical RPA RFI Procurement- Indian Army Issues RFI for High-End Armed Drones for Plains and High Altitude Area-1
Tactical RPA RFI Procurement- Indian Army Issues RFI for High-End Armed Drones for Plains and High Altitude Area-1

Tactical RPA RFI: माइनस 40 डिग्री सेल्सियस में भी करे काम

तापमान को लेकर भी सेना ने मानक तय किए हैं। ऊंचाई वाले इलाकों में ड्रोन को माइनस 40 डिग्री सेल्सियस से लेकर प्लस 30 डिग्री सेल्सियस तक काम करना होगा। वहीं मैदानी इलाकों में यह सीमा माइनस 20 से लेकर प्लस 45 डिग्री सेल्सियस तक रखी गई है। इसका मतलब है कि इन ड्रोन को सियाचिन जैसी ठंडी जगह और राजस्थान जैसी गर्म जगह पर भी समान रूप से सक्षम होना होगा। (Tactical RPA RFI)

Tactical RPA RFI: रेंज 400 किलोमीटर तक

ड्रोनों की उड़ान क्षमता को लेकर सेना ने कड़े मानक तय किए हैं। ड्रोन को सामान्य रेडियो कंट्रोल यानी लाइन ऑफ साइट मोड में कम से कम 120 किलोमीटर तक काम करना होगा। वहीं अगर सैटेलाइट कम्युनिकेशन का इस्तेमाल किया जाए, तो इसकी रेंज 400 किलोमीटर या उससे अधिक होनी चाहिए। इससे सेना को दूर-दराज के इलाकों में भी निगरानी और ऑपरेशन करने की सुविधा मिलेगी। (Tactical RPA RFI)

Tactical RPA RFI: 8 घंटे लगातार हवा में रहें ड्रोन

इसके अलावा आरएफआई की शर्तों में ऊंचाई को लेकर सेना में स्टैंडर्ड तय किए हैं। मैदानी इलाकों के लिए ड्रोन को कम से कम 14,000 फीट की ऊंचाई तक काम करने में सक्षम होना होगा। वहीं ऊंचाई वाले इलाकों के लिए यह सीमा 24,000 फीट तक रखी गई है। इसके साथ ही ड्रोन में कम से कम 8 घंटे लगातार हवा में रहने की क्षमता भी होनी चाहिए। ताकि लंबे समय तक निगरानी और मिशन को अंजाम दिया जा सके। (TACTICAL REMOTELY PILOTED AIRCRAFTS)

Tactical RPA RFI: रनवे पर निर्भरता नहीं

सेना ने यह भी स्पष्ट किया है कि ड्रोन को उड़ाने के लिए लंबे और पक्के रनवे की जरूरत नहीं होनी चाहिए। सीमावर्ती और दुर्गम इलाकों में ऐसी सुविधाएं हमेशा उपलब्ध नहीं होतीं। इसलिए ड्रोन या तो सीधे ऊपर उठकर यानी वीटीओएल मोड में उड़ान भर सके, या फिर 200 मीटर की कच्ची पट्टी से टेकऑफ कर सके। साथ ही कुछ मामलों में कैटापल्ट लॉन्च और पैराशूट के जरिए लैंडिंग का भी फीचर होना चाहिए। (TACTICAL REMOTELY PILOTED AIRCRAFTS)

50 किमी दूर से पहचानने की हो क्षमता

ड्रोन के सेंसर और पेलोड को लेकर भी सेना चाहती है कि ड्रोन में ऐसे कैमरे और सिस्टम लगाए जाएं, जो दिन और रात दोनों समय हाई-डेफिनिशन फोटो और वीडियो दे सकें। इसमें इलेक्ट्रो ऑप्टिक और इंफ्रारेड कैमरा, थर्मल सेंसर, और लेजर बेस्ड सिस्टम शामिल होंगे, जो अंधेरे, धुंध और खराब मौसम में भी दुश्मन की हलचल को पकड़ सकें। इनमें लेजर रेंज फाइंडर और लेजर डिजाइनटर भी होना चाहिए, ताकि जरूरत पड़ने पर सटीक हमला किया जा सके।

इसके अलावा ड्रोन को इंसानों और वाहनों को 40-50 किलोमीटर दूर से पहचानने और करीब 15 किलोमीटर से साफ तौर पर पहचानने में सक्षम होना चाहिए। (TACTICAL REMOTELY PILOTED AIRCRAFTS)

पकड़ सकें दुश्मन के सिग्नल 

आरएफआई में यह भी कहा गया है कि यह ड्रोन सिर्फ देखने वाला नहीं होगा, बल्कि सुनने वाला भी होगा। इसमें ईएलआईएनटी और कॉमइंट सिस्टम लगाए जाएंगे, जो दुश्मन के रेडियो, मोबाइल, रडार और कम्युनिकेशन सिग्नल को पकड़ सकें। सेना चाहती है कि ड्रोन 100 किलोमीटर दूर से भी ऐसे सिग्नल पकड़ सके। इससे दुश्मन की गतिविधियों की पहले से जानकारी मिल सकेगी। इसके अलावा ड्रोन में एफओपीईएन रडार भी होना चाहिए, जो जंगलों के अंदर छिपे टारगेट्स, बर्फीले इलाकों और पहाड़ी ढलानों पर मौजूद गतिविधियों को भी आसानी से पहचान सके। (TACTICAL REMOTELY PILOTED AIRCRAFTS)

जैमिंग और जीपीएस फेल होने पर भी उड़ान भरें ड्रोन

आज की जंग में दुश्मन सबसे पहले जीपीएस जैमिंग और साइबर अटैक करता है। सेना इसलिए चाहती है कि ड्रोन सिर्फ जीपीएस पर निर्भर न रहे। ड्रोन को जीपीएस, ग्लोनास, गैलीलियो और नाविक, चारों सिस्टम इस्तेमाल करने होंगे। अगर फिर भी जीपीएस सिग्नल खत्म हो जाए, तो ड्रोन आईएनएस, आईएमयू और विजुअल नेविगेशन से उड़ान जारी रख सके। वहीं, अगर हालात बहुत खराब हों, तो ड्रोन अपने आप सुरक्षित तरीके से वापस बेस पर लौट आए। (TACTICAL REMOTELY PILOTED AIRCRAFTS)

Tactical RPA RFI: हथियार भी ढो सकें ड्रोन

इन ड्रोनों को केवल निगरानी तक के लिए सीमित नहीं रखा गया है। सेना चाहती है कि यह ड्रोन 200 किलोग्राम तक हथियार ले जाने में सक्षम हो। इसमें एयर-टू-ग्राउंड मिसाइल, प्रिसिजन ग्लाइड बम, एंटी-टैंक हथियार और लॉइटरिंग म्यूनिशन शामिल हैं। यानी जरूरत पड़ने पर यह ड्रोन दुश्मन पर सीधा हमला भी कर सकेगा। (TACTICAL REMOTELY PILOTED AIRCRAFTS)

डेटा सुरक्षा सबसे अहम

आरएफआई में कहा गया है कि ड्रोन से मिलने वाला सारा डेटा बेहद संवेदनशील होगा। इसलिए सेना ने साफ कहा है कि सारा डेटा 256-बिट एईएस एन्क्रिप्शन से सुरक्षित होना चाहिए। अगर किसी कारण से ड्रोन गिर जाए या दुश्मन के हाथ लग जाए, तो उसमें मौजूद डेटा अपने आप नष्ट हो जाना चाहिए।

भारतीय सिस्टम से हो सके कनेक्ट

आरएफआई के मुताबिक यह ड्रोन भारतीय सेना के मौजूदा कमांड, कंट्रोल, कम्युनिकेशन और इंटेलिजेंस सिस्टम से कनेक्ट होना चाहिए। ताकि लाइव वीडियो और डेटा सीधे कमांड सेंटर तक पहुंचता रहे। इसे सेना के काउंटर-ड्रोन सिस्टम के साथ भी इंटीग्रेट किया जाएगा, ताकि पूरे बैटलफील्ड की एक साझा तस्वीर मिल सके। (TACTICAL REMOTELY PILOTED AIRCRAFTS)

भारतीय कंपनियों को प्राथमिकता

आरएफआई में कहा गया इस पूरी प्रक्रिया में भारतीय कंपनियों को प्राथमिकता दी जाएगी। आरएफआई के अनुसार, इसमें सिर्फ भारतीय कंपनियां या भारतीय कंपनी के साथ साझेदारी करने वाली विदेशी कंपनियां ही हिस्सा ले सकती हैं। कंपनियों से यह भी पूछा गया है कि ड्रोन में कितने प्रतिशत स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल किया जाएगा और भविष्य में मेंटेनेंस और सपोर्ट की व्यवस्था कैसे की जाएगी। इसके साथ ही कंपनियां यह भी बताएं कि भविष्य में किन-किन हिस्सों को और ज्यादा स्वदेशी बनाया जा सकता है। सरकार चाहती है कि सिर्फ ड्रोन खरीदे न जाएं, बल्कि देश में ही पूरा ड्रोन इकोसिस्टम तैयार किया जाए। (TACTICAL REMOTELY PILOTED AIRCRAFTS)

Tactical RPA RFI: 18 मार्च 2026 तक का समय

रक्षा मंत्रालय ने आरएफआई का जवाब देने के लिए कंपनियों को 18 मार्च 2026 तक का समय दिया है। सके बाद सेना सभी जवाबों का अध्ययन करेगी, तकनीकी जरूरतें तय करेगी और फिर रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल जारी किया जाएगा। (TACTICAL REMOTELY PILOTED AIRCRAFTS)

Akash NG Missile को क्यों कहा जा रहा है “पुअर मैंस पैट्रियट”! कम रडार क्रॉस सेक्शन वाले ड्रोन को भी करेगी ढेर

Akash NG Missile Clears User Evaluation Trials With Extended Range and Sleeker Design
Akash NG Missile Clears User Evaluation Trials With Extended Range and Sleeker Design

Akash NG Missile: डीआरडीओ ने हाल ही में आकाश-न्यू जेनरेशन मिसाइल सिस्टम यानी आकाश-एनजी का सफल परीक्षण किया। इस परीक्षण के साथ ही आकाश-एनजी के यूजर इवैल्यूएशन ट्रायल्स सफलतापूर्वक पूरे हो गए हैं। जिसके बाद भारतीय वायुसेना में इस आधुनिक सतह-से-हवा मिसाइल सिस्टम को शामिल करने का रास्ता साफ हो गया है। ट्रायल्स के दौरान आकाश-एनजी मिसाइल ने अलग-अलग दूरी और ऊंचाई पर उड़ रहे हवाई लक्ष्यों को सटीक तरीके से इंटरसेप्ट किया।

डीआरडीओ की तरफ जारी जानकारी के मुताबिक, इन परीक्षणों में मिसाइल सिस्टम को रियलिस्टिक वारटाइम कंडीशंस में परखा गया। इसमें लंबी दूरी पर ऊंचाई से आने वाले हवाई खतरे और सीमा के पास बहुत कम ऊंचाई पर उड़ रहे लक्ष्यों को भी सफलतापूर्वक नष्ट किया गया। यह ट्रायल्स ओडिशा के तट के पास इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज में किए गए, जहां पूरी निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था के बीच ट्रायल संपन्न हुआ।

आकाश मिसाइल की कहानी कई दशक पुरानी है। डीआरडीओ ने 1980 के दशक के अंत में इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम के तहत आकाश मिसाइल के डेवलपमेंट का काम शुरू किया था। इस कार्यक्रम का नेतृत्व उस समय डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम कर रहे थे। शुरुआती दौर में इस मिसाइल को एक शॉर्ट-टू-मीडियम रेंज सरफेस-टू-एयर मिसाइल के रूप में डेवलप किया गया, ताकि देश के संवेदनशील इलाकों और महत्वपूर्ण ठिकानों को हवाई हमलों से सुरक्षित रखा जा सके।

1990 और 2000 के दशक में आकाश मिसाइल के कई डेवलपमेंटल ट्रायल्स किए गए। इसके बाद भारतीय वायुसेना और भारतीय थलसेना ने इसके व्यापक यूजर ट्रायल्स किए। इन परीक्षणों में मिसाइल की रेंज, सटीकता और एक साथ कई लक्ष्यों को मार गिराने की क्षमता को परखा गया। सफल परीक्षणों के बाद वर्ष 2014 में आकाश मिसाइल को भारतीय वायुसेना में शामिल किया गया और इसके अगले वर्ष इसे भारतीय थलसेना में भी तैनात किया गया।

आकाश मिसाइल सिस्टम को इस तरह डिजाइन किया गया था कि यह एक साथ कई एरियल टारगेट्स को ग्रुप मोड या ऑटोनॉमस मोड में निशाना बना सके। इसमें इलेक्ट्रॉनिक काउंटर-काउंटरमेजर्स यानी ईसीसीएम की सुविधा दी गई, जिससे यह दुश्मन के इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग सिस्टम को भी बेअसर कर सके। समय के साथ भारतीय वायुसेना और थलसेना ने आकाश मिसाइल की कई स्क्वाड्रन और रेजिमेंट तैयार कीं।

हालांकि बदलते युद्ध के स्वरूप और नई तकनीकों के चलते डीआरडीओ ने आकाश मिसाइल के एक और आधुनिक वर्जन पर काम शुरू किया। जहां पुराने आकाश मिसाइल की ऑपरेशनल रेंज लगभग 27 से 30 किलोमीटर थी, वहीं, आकाश-एनजी की रेंज बढ़कर करीब 70 किलोमीटर तक पहुंच गई है। यह बदलाव देश के एयर डिफेंस के लिहाज से एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

आकाश-एनजी मिसाइल का डिजाइन पहले के मुकाबले ज्यादा हल्का और स्लीक बनाया गया है। इसका मतलब है कि मिसाइल का आकार और वजन दोनों कम किए गए हैं, जिससे इसकी तैनाती और ऑपरेशन आसान हो गया है। इसके साथ ही इसका ग्राउंड सिस्टम फुटप्रिंट भी छोटा किया गया है, जिससे कम जगह में भी इसे तैनात किया जा सकता है।

इस नए मिसाइल सिस्टम में पूरी तरह स्वदेशी कु बैंड रेडियो फ्रीक्वेंसी सीकर लगाया गया है। यह सीकर टारगेट को लास्ट फेज में खुद पहचान कर उस पर लॉक करता है। इसकी खूबी यह है कि यह सीकर लो रडार क्रॉस सेक्शन टारगेट्स जैसे ड्रोन्स, क्रूज मिसाइल्स को टर्मिनल फेज में लॉक कर सकता है। इसके साथ ही आकाश-एनजी में नया लॉन्चर, मल्टी-फंक्शन रडार और कमांड, कंट्रोल एवं कम्युनिकेशन सिस्टम शामिल किया गया है, जिससे पूरे सिस्टम की प्रतिक्रिया क्षमता और सटीकता बढ़ गई है। इसमें एईएसए मल्टी-फंक्शन रडार (MFR), इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल ट्रैकिंग, 360° कवरेज, 20-70° एलिवेशन फीचर है। खास बात यह है कि रडार की मदद से एक बैटरी 10 टारगेट्स को एक साथ एंगेज कर सकती है।

आकाश-एनजी को कैनिस्टराइज्ड लॉन्चर सिस्टम के साथ डेवलप किया गया है। कैनिस्टराइज्ड सिस्टम का मतलब होता है कि मिसाइल को एक खास तरह के सील्ड कंटेनर में रखा जाता है। इससे मिसाइल को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है और जरूरत पड़ने पर तुरंत लॉन्च किया जा सकता है। इससे ट्रांसपोर्टेशन और स्टोरेज दोनों आसान होता है और मिसाइल की ऑपरेशनल रेडीनेस को बेहतर होती है।

डीआरडीओ के अधिकारियों के अनुसार, आकाश-एनजी को खासतौर पर भारतीय वायुसेना की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है। यह मिसाइल उन हवाई खतरों को रोकने में सक्षम है, जो तेज रफ्तार से उड़ते हैं और जिनका रडार क्रॉस सेक्शन यानी आरसीएस बहुत कम होता है। कम आरसीएस वाले टारगेट्स को रडार पर पकड़ना कठिन होता है, लेकिन आकाश-एनजी को इन्हीं परिस्थितियों को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया है।

आकाश-एनजी के यूजर इवैल्यूएशन ट्रायल्स से पहले इसके कई अहम फ्लाइट टेस्ट किए गए थे। इस मिसाइल का पहला परीक्षण 25 जनवरी 2021 को किया गया था, जिसमें इसकी बुनियादी क्षमताओं को परखा गया। इसके बाद मार्च और जुलाई 2021 में इसके और परीक्षण किए गए। जुलाई 2021 में एक्टिव सीकर से लैस मिसाइल ने एक हाई-स्पीड अनमैन्ड एरियल टारगेट को सफलतापूर्वक इंटरसेप्ट किया था।

जनवरी 2024 में आकाश-एनजी का एक और महत्वपूर्ण फ्लाइट टेस्ट किया गया। इस परीक्षण में मिसाइल ने कम ऊंचाई पर तेज गति से उड़ रहे एक अनमैन्ड एरियल टारगेट को निशाना बनाया। इस सफलता के बाद इसके यूजर ट्रायल्स का रास्ता साफ हुआ। हालिया यूजर इवैल्यूएशन ट्रायल्स में मिसाइल ने सभी प्रोविजनल स्टाफ क्वालिटेटिव रिक्वायरमेंट्स यानी पीएसक्यूआर को पूरा किया।

डीआरडीओ ने बताया कि इन ट्रायल्स में पूरे वेपन सिस्टम की कार्यक्षमता को परखा गया। इसमें मिसाइल, लॉन्चर, रडार और कमांड-एंड-कंट्रोल सिस्टम सभी शामिल थे। अलग-अलग प्रकार के हवाई खतरों के खिलाफ सिस्टम की प्रतिक्रिया और सटीकता को जांचा गया।

आकाश-एनजी प्रोजेक्ट को सितंबर 2016 में मंजूरी दी गई थी। यह मिसाइल सिस्टम एक क्लीन-शीट डिजाइन पर आधारित है, यानी इसे पुराने आकाश सिस्टम का संशोधित रूप नहीं बल्कि पूरी तरह नए सिरे से डिजाइन किया गया है। पुराने आकाश इंटरसेप्टर का बेस सोवियत काल की एसए-6 मिसाइल थी, जबकि आकाश-एनजी आधुनिक तकनीक पर आधारित है।

आकाश-एनजी में ड्यूल-पल्स सॉलिड रॉकेट मोटर का इस्तेमाल किया गया है। इस मोटर में दो अलग-अलग फेज में थ्रस्ट मिलता है, जिससे मिसाइल को बेहतर मैन्यूवर करने की क्षमता मिलती है। इसके साथ इसमें स्वदेशी एक्टिव रेडियो फ्रीक्वेंसी सीकर लगाया गया है, जिसकी वजह से लक्ष्य की दूरी बढ़ने पर भी सटीकता बनी रहती है। साथ ही डुअल-पल्स सॉलिड रॉकेट मोटर मिड-फेज में “साइलेंट कोस्टिंग” करके हीट सिग्नेचर कम करता है, जिससे दुश्मन के इंफ्रारेंड सेंसर्स से बचने में मदद मिलती है।

डुअल-पल्स सॉलिड रॉकेट मोटर का पहला पल्स (बूस्ट फेज) लॉन्च के 5-10 सेकंड में फुल थ्रस्ट देता है, जिससे मिसाइल की रफ्तार मैक 2.5+ तक पहुंच जाती है। फिर मोटर ऑफ हो जाती है और मिसाइल बैलिस्टिक ग्लाइड पर जाती है। वहीं कोस्टिंग फेज में स्पीड मेंटेन रहती है लेकिन एग्जॉस्ट प्लूम और हीट कम होती है। आखिरी 10-15 किमी पर दूसरा पल्स एक्टिवेट होता है, जो टर्मिनल मैन्यूवरिंग के लिए हाई एनर्जी देता है जिसमें तेज टर्न्स, हाई-जी पुल-अप किए जा सकते हैं।

इस डिजाइन से न सिर्फ रेंज बढ़ती है बल्कि एंटी-सैचुरेशन अटैक कैपेबिलिटी भी बूस्ट होती है। सैचुरेशन अटैक में अगर दुश्मन 10-20 ड्रोन्स/क्रूज मिसाइल्स एक साथ भेजता है, ताकि डिफेंस सिस्टम को ओवरलोड किया जा सके। लेकिन आकाश-एनजी की कोस्टिंग फेज में कम हीट/आईआर सिग्नेचर से दुश्मन के इंफ्रा-रेड सर्च एंड ट्रैक सेंसर्स को मिसाइल देर से डिटेक्ट होती है– इससे बैटरी के रडार को प्रायरिटी तय करने में ज्यादा वक्त मिलता है।

कु बैंड आरएफ सीकर के साथ मिलकर यह फीचर “होम-ऑन-जैम” मोड को सपोर्ट करता है। अगर दुश्मन जैमिंग करता है, तो मिसाइल जैम सिग्नल पर ही लॉक कर लेती है। डुअल-पल्स की एनर्जी सेविंग से टर्मिनल फेज में सीकर के लिए ज्यादा पावर बचती है, जो जैमिंग में भी एक्यूरेट रहता है।

इसलिए आकाश एनजी को “पुअर मैंस पैट्रियट” भी कहा जा रहा है। जो न केवल सस्ता है बल्कि चीन और पाकिस्तान की हूथी स्टाइल ड्रोन स्वार्म स्ट्रैटेजी के खिलाफ भी बेहद असरदार हैं। ऑपरेशन सिंदूर में जैसे पुराने आकाश सिस्टम ने कई पाकिस्तानी ड्रोन मार गिराए थे, वहीं, आकाश एनजी वर्जन एलएसी पर चीन के हाई-स्पीड यूएवी जैसे डब्ल्यूजे-700) के लिए काल साबित होगा।

K-4 Missile Test: 3500 किमी तक मार सकेगी भारत की के-4 मिसाइल, स्वदेशी न्यूक्लियर सबमरीन INS Arihant से किया सफल टेस्ट

K-4 Missile Test: India Strengthens Sea-Based Nuclear Deterrence with INS Arihant Launch
K-4 Missile Test: India Strengthens Sea-Based Nuclear Deterrence with INS Arihant Launch

K-4 Missile Test: जब ऊपर आसमान में हलचल मची हो या जमीन पर शोर हो, तो समंदर के नीचे एक अलग ही शांति पसरी रहती है। इसी शांति के बीच भारत ने हाल ही में एक ऐसा कदम उठाया, जिसकी गूंज दूर तक जाती है। जिस समय पूरी दुनिया सो रही थी, तब भारत ने अपनी मैरीटाइम न्यूक्लियर कैपेबिलिटी को और मजबूत करते हुए एक बड़ी उपलब्धि हासिल की। बंगाल की खाड़ी में देश की पहली स्वदेशी न्यूक्लियर सबमरीन आईएनएस अरिहंत से के-4 सबमरीन-लॉन्च्ड बैलिस्टिक मिसाइल का सफल यूजर ट्रायल किया। इस मिसाइल की मारक क्षमता करीब 3,500 किलोमीटर थी। इस ट्रायल के बाद भारत का न्यूक्लियर ट्रायड और मजबूत हुआ है।

हालांकि इस ट्रायल को लेकर रक्षा मंत्रालय या डीआरडीओ की तरफ से कोई औपचारिक बयान जारी नहीं किया गया है, लेकिन डिफेंस सूत्रों ने इसकी पुष्टि की है। यह ट्रायल विशाखापट्टनम के तट से दूर समुद्री क्षेत्र में किया गया, जहां दिसंबर के मध्य में जारी नोटैम यानी नोटिस टू एयरमेन के जरिए बड़े इलाके को ट्रायल के लिए सुरक्षित घोषित किया गया था।

K-4 Missile Test: मुश्किल होता है समुद्र से मिसाइल परीक्षण

समुद्र के नीचे से बैलिस्टिक मिसाइल का परीक्षण तकनीकी रूप से बेहद मुश्किल माना जाता है। पनडुब्बी से छोड़ी जाने वाली मिसाइल पहले पानी के अंदर से गैस प्रेशर की मदद से बाहर निकलती है और फिर सतह के ऊपर आते ही उसका इंजन एक्टिव होता है।

के-4 मिसाइल को खास तौर पर भारत की अरिहंत क्लास न्यूक्लियर पनडुब्बियों के लिए डिजाइन किया गया है। यह दो-स्टेज सॉलिड फ्यूल रॉकेट पर आधारित बैलिस्टिक मिसाइल है, जिसकी लंबाई करीब 12 मीटर और वजन लगभग 17 टन बताया गया है। यह मिसाइल करीब दो टन तक का पेलोड ले जा सकती है, जिसमें न्यूक्लियर वारहेड भी शामिल हो सकते हैं।

मिसाइल में सटीकता के लिए एडवांस्ड इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम के साथ जीपीएस और नाविक सपोर्ट दिया गया है। सर्कुलर एरर प्रोबेबल यानी सीईपी बहुत कम होने की वजह से इसे हाई एक्युरेसी मिसाइल माना जाता है। इसके अलावा, इसमें मैन्यूवरेबल री-एंट्री व्हीकल की क्षमता भी है, जिससे यह मिसाइल डिफेंस सिस्टम को चकमा भी दे सकती है।

K-4 Missile Test: के-15 से के-4 तक का सफर

इससे पहले आईएनएस अरिहंत पर के-15 मिसाइलें तैनात थीं, जिनकी रेंज करीब 750 किलोमीटर थी। के-4 मिसाइल की तैनाती से इसकी रेंज में कई गुना इजाफा हुआ है। इससे भारत की मैरीटाइम न्यूक्लियर कैपेबिलिटी बढ़ी है। के-4 मिसाइल के जरिए समुद्र में तैनात पनडुब्बी से कहीं अधिक दूर तक लक्ष्य को भेदने की क्षमता मिलती है।

K-4 Missile Test: भारत के पास दो एसएसबीएन

भारत के पास इस समय दो ऑपरेशनल नाभिकीय बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियां हैं। आईएनएस अरिहंत पहली ऐसी पनडुब्बी है, जिसे 2016 में कमीशंड किया गया था और 2018 में यह पूरी तरह ऑपरेशनल हुई। इसके बाद अगस्त 2024 में भारत की दूसरी एसएसबीएन आईएनएस अरिघात को नौसेना में शामिल किया गया। यह पनडुब्बी पहले की तुलना में ज्यादा स्वदेशी तकनीक से लैस है और इसमें भी के-4 मिसाइल को लगाया गया है।

इसके अलावा, तीसरी न्यूक्लियर सबमरीन आईएनएस अरिधमन का निर्माण भी चल रहा है। यह भारत की तीसरी रिहंत क्लास की एस-4 स्वदेशी न्यूक्लियर-पावर्ड बैलिस्टिक मिसाइल सबमरीन है। नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी ने 2 दिसंबर को पुष्टि की थी कि यह सबमरीन अपने अंतिम ट्रायल चरण में है और बहुत जल्द कमीशन की जाएगी। यह सबमरीन आईएनएस अरिहंत और आईएनएस अरिघात से थोड़ी बड़ी (7,000 टन डिस्प्लेसमेंट) है, ज्यादा के-4 सबमरीन-लॉन्च्ड बैलिस्टिक मिसाइल (3,500 किमी रेंज) कैरी कर सकती है। इसमें बेहतर स्टेल्थ, एडवांस्ड सीएमएस और ऑप्टिमाइज्ड 83 मैगावॉट रिएक्टर से लैस। यह महीनों तक पानी के नीचे रहकर नौसेना को सेकंड-स्ट्राइक कैपेबिलिटी देगी।

इसके अलावा भारत की चौथी न्यूक्लियर-पावर्ड बैलिस्टिक मिसाइल सबमरीन कोडनेम एस-4 स्टार भी तैयार हो रही है। यह अरिहंत क्लास की आखिरी सबमरीन है। इसका निर्माण पूरा हो चुका है, अब हार्बर और सी ट्रायल्स की तैयारी चल रही है। इसकी कमीशनिंग 2026 के अंत या 2027 की शुरुआत में होने की उम्मीद है। इसका वजन करीब 7,000 टन है और इसमें 75 फीसदी इंडिजिनस कंटेंट है। इसमे 8 के-4 मिसाइल लॉन्च ट्यूब्स लगाए जा सकते हैं, जिनकी रेंज 3,500 किमी तक है। इसके बाद नेक्स्ट जेनरेशन एस5 क्लास सबमरीन बनाई जाएंगी, जिनमें 12-16 मिसाइल्स लगाई जा सकेंगी।

K-4 Missile Test: एटीवी प्रोग्राम के तहत तैयार हो रहीं पनडुब्बियां

भारत का एडवांस्ड टेक्नोलॉजी वेसल यानी एटीवी प्रोग्राम कई दशकों से चल रहा है। इसी प्रोग्राम के तहत अरिहंत क्लास और आगे की पनडुब्बियों को तैयार किया गया है। शुरुआती पनडुब्बियों में 83 मेगावाट का न्यूक्लियर रिएक्टर लगाया गया है, जबकि आगे आने वाली बड़ी पनडुब्बियों में ज्यादा क्षमता वाले प्रेसराइज्ड लाइट वाटर रिएक्टर लगाने की योजना है।

K-4 Missile Test: क्या है न्यूक्लियर ट्रायड

भारत की न्यूक्लियर ट्रायंगल अरेंजमेंट में जमीन, हवा और समुद्र तीनों शामिल हैं। जमीन आधारित बैलिस्टिक मिसाइलों में अग्नि-5 जैसी मिसाइलें शामिल हैं, जिनकी मारक क्षमता पांच हजार किलोमीटर से ज्यादा है। वायुसेना के पास राफेल, सुखोई-30 एमकेआई और मिराज-2000 जैसे लड़ाकू विमान हैं, जो विशेष हथियार ले जाने में सक्षम हैं। समुद्री में न्यूक्लियर सबमरीन सबसे सुरक्षित और भरोसेमंद मानी जाती हैं, क्योंकि इन्हें ढूंढना बेहद मुश्किल होता है।

ट्राई-सर्विस स्ट्रैटेजिक फोर्सेज कमांड के अधीन

इन न्यूक्लियर सबमरीन और मिसाइलों का ऑपरेशन ट्राई-सर्विस स्ट्रैटेजिक फोर्सेज कमांड के अधीन होता है। यह कमान देश की न्यूक्लियर एसेट्स के ऑपरेशन और कॉर्डिनेशन के लिए जिम्मेदार है। के-4 मिसाइल का परीक्षण इसी सिस्टम के तहत किया गया।

चीन और अमेरिका के पास भी हैं न्यूक्लियर सबमरीन

दुनिया में अमेरिका, रूस और चीन के पास बड़ी संख्या में न्यूक्लियर सबमरीन और इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलें हैं। चीन के पास जिन क्लास की पनडुब्बियां हैं, उनमें जेएल-2 और जेएल-3 जैसी लंबी दूरी की मिसाइलें तैनात हैं। अमेरिका के पास ओहायो क्लास एसएसबीएन हैं। भारत की पनडुब्बियां साइज और संख्या में भले ही कम हों, लेकिन के-4 जैसी मिसाइलों की तैनाती से उसकी मैरीटाइम न्यूक्लियर कैपेबिलिटी लगातार मजबूत होती जा रही है।