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युवाओं से बोले रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, विफलता से मत डरो, वही बनाती है असली लीडर

Viksit Bharat Youth Leadership

Viksit Bharat Youth Leadership: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का कहना है कि भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की यात्रा में देश के युवा सबसे बड़ी ताकत हैं। उन्होंने यह बात दिल्ली कैंट में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान वह उत्तर प्रदेश के 78 युवाओं से संवाद करते हुए कही। ये युवा विकसित भारत यंग लीडर्स डायलॉग 2026 में हिस्सा लेने के लिए नई दिल्ली आए हुए हैं।

Viksit Bharat Youth Leadership: ऊर्जा, सोच और इनोवेशन से भरपूर है युवा

रक्षा मंत्री ने युवाओं की उपलब्धियों की तारीफ करते हुए कहा कि आज का युवा ऊर्जा, सोच और इनोवेशन से भरपूर है। यही युवा भारत को विकसित भारत के लक्ष्य तक पहुंचाने में निर्णायक भूमिका निभा रहा है। उन्होंने भरोसा जताया कि युवाओं की आकांक्षाएं और उनकी मेहनत देश की दिशा और दशा बदलने में मदद कर रही हैं। भारत यंग लीडर्स डायलॉग 2026 कार्यक्रम युवा कार्य और खेल मंत्रालय की ओर से 10 से 12 जनवरी तक आयोजित किया जा रहा है। (Viksit Bharat Youth Leadership)

राजनाथ सिंह ने युवाओं से कहा कि बदलती तकनीक के इस दौर में मल्टीडिसिप्लिनरी लर्निंग को अपनाना बेहद जरूरी है। उन्होंने विशेष रूप से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम कंप्यूटिंग, बायोटेक्नोलॉजी और स्पेस रिसर्च जैसे क्षेत्रों का उल्लेख किया। रक्षा मंत्री ने कहा कि सीखने की प्रक्रिया कभी खत्म नहीं होती। व्यक्ति को नई तकनीकों से, अपनी गलतियों से और दूसरों के अनुभवों से लगातार सीखते रहना चाहिए। (Viksit Bharat Youth Leadership)

उन्होंने युवाओं को बड़ा सपना देखने की सलाह दी, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि सपना बोझ नहीं बनना चाहिए। रक्षा मंत्री के मुताबिक, संतुलन और निरंतर प्रयास ही सफलता की असली कुंजी है।

अपने संबोधन में राजनाथ सिंह ने चुनौतियों पर भी विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि जीवन में कठिनाइयां कोई अपवाद नहीं, बल्कि जीवन का स्वाभाविक हिस्सा हैं। उन्होंने कहा आसान समय में शांत रहना सरल होता है, लेकिन आलोचना और असफलता ही किसी व्यक्ति के असली चरित्र की परीक्षा लेती है। उन्होंने युवाओं से कहा कि डर का मतलब समस्याओं से भागना नहीं, बल्कि साहस, समझदारी और आत्मविश्वास के साथ उनका सामना करना है। (Viksit Bharat Youth Leadership)

रक्षा मंत्री ने युवाओं से अपील की कि वे चुनौतियों को बोझ न मानें, बल्कि अवसर के रूप में देखें। उनके अनुसार कठिन रास्ते इंसान को मजबूत, सहनशील और सक्षम बनाते हैं। शिकायत करने से समस्या हल नहीं होती, समाधान ढूंढने से होती है।

उन्होंने आत्मविश्वास पर जोर देते हुए कहा कि सच्चा आत्मविश्वास अहंकार से नहीं, बल्कि मेहनत और ईमानदारी से आता है। साथ ही उन्होंने विनम्र बने रहने की भी सलाह दी। राजनाथ सिंह ने कहा कि किसी भी व्यक्ति की सफलता में परिवार, शिक्षक और मित्रों का बड़ा योगदान होता है, इसलिए जमीन से जुड़े रहना बेहद जरूरी है। यह संवाद कार्यक्रम युवाओं को नेतृत्व, जिम्मेदारी और राष्ट्र निर्माण की भावना से जोड़ने की दिशा में एक अहम पहल माना जा रहा है।

इस अवसर पर देश के शीर्ष सैन्य और प्रशासनिक अधिकारी भी मौजूद रहे। कार्यक्रम में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान, नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी, थल सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी, वायु सेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह, रक्षा सचिव श्री राजेश कुमार सिंह सहित कई वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए। (Viksit Bharat Youth Leadership)

रक्षा सचिव बोले- डिफेंस एक्सपोर्ट पहुंचा 23,162 करोड़ रुपये के पार, 11 साल में हुई 35 गुना बढ़ोतरी

Aatmanirbharta in Defence
Defence Secretary Rajesh Kumar Singh

Aatmanirbharta in Defence: रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह का कहना है कि भारत की रक्षा तैयारियों और औद्योगिक क्षमता को मजबूत करने की दिशा में आत्मनिर्भरता अब सिर्फ एक नीति नहीं, बल्कि देश की जरूरत बन चुकी है। चंडीगढ़ में आयोजित डिफेंस स्किलिंग कॉन्क्लेव के उद्घाटन के दौरान उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि डिफेंस सेक्टर में आत्मनिर्भरता भारत की लॉन्ग टर्म स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी यानी दीर्घकालिक रणनीतिक स्वतंत्रता के लिए बेहद जरूरी है।

Aatmanirbharta in Defence: देश में बन मजबूत डिफेंस इंडस्ट्रियल इकोसिस्टम 

रक्षा सचिव ने कहा कि भारत इस समय अपने रक्षा और औद्योगिक सफर के एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। बीते एक दशक में डिफेंस प्रोडक्शन के क्षेत्र में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। पहले जहां भारत अपनी रक्षा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर था, वहीं अब देश में एक मजबूत डिफेंस इंडस्ट्रियल इकोसिस्टम खड़ा हो चुका है। इस इकोसिस्टम में डिफेंस पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग्स, प्राइवेट इंडस्ट्री, एमएसएमई और स्टार्टअप्स मिलकर काम कर रहे हैं। यह कॉन्क्लेव पंजाब सरकार, सोसाइटी ऑफ इंडियन डिफेंस मैन्युफैक्चरर्स और कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री के सहयोग से आयोजित किया गया। (Aatmanirbharta in Defence)

उन्होंने बताया कि आत्मनिर्भर भारत के विजन के तहत सरकार ने ईज ऑफ डूइंग बिजनेस और नीतिगत सुधारों पर खास ध्यान दिया है। इसका नतीजा यह हुआ है कि देश में स्वदेशी डिजाइन और मैन्युफैक्चरिंग को जबरदस्त बढ़ावा मिला है। आज भारत में यूएवी, सेंसर्स जैसे प्लेटफॉर्म से लेकर आर्टिलरी गन्स, आर्मर्ड व्हीकल्स और मिसाइल सिस्टम जैसे जटिल हथियार सिस्टम तक देश में ही बनाए जा रहे हैं। (Aatmanirbharta in Defence)

राजेश कुमार सिंह ने बताया कि अब तक 462 कंपनियों को 788 से ज्यादा इंडस्ट्रियल लाइसेंस जारी किए जा चुके हैं। इससे डिफेंस प्रोडक्शन में प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी तेजी से बढ़ी है। उन्होंने यह भी बताया कि भारत के रक्षा निर्यात को भी ऐतिहासिक उछाल मिला है। साल 2025 में रक्षा निर्यात 23,162 करोड़ रुपये को पार कर गया, जो 2014 की तुलना में करीब 35 गुना बढ़ोतरी को दर्शाता है। (Aatmanirbharta in Defence)

रक्षा सचिव ने स्वदेशी प्लेटफॉर्म्स के उदाहरण देते हुए कहा कि एलसीए तेजस, अस्त्र बियॉन्ड विजुअल रेंज मिसाइल, धनुष आर्टिलरी गन और आईएनएस विक्रांत जैसे प्लेटफॉर्म बताते हैं कि भारत में इंडस्ट्री, रिसर्च और स्किल्ड मैनपावर के बीच तालमेल लगातार मजबूत हो रहा है। उन्होंने दोहराया कि रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक लक्ष्य नहीं है, बल्कि यह भारत को रणनीतिक रूप से स्वतंत्र बनाने की दिशा में जरूरी कदम है। (Aatmanirbharta in Defence)

उन्होंने यह भी कहा कि बदलती ग्लोबल सप्लाई चेन और तेजी से आगे बढ़ती टेक्नोलॉजी भारत के लिए बड़ी चुनौती के साथ-साथ बड़े मौके भी लेकर आई है। अगर भारत सही समय पर सही निवेश करता है, तो वह डिफेंस प्रोडक्शन में ग्लोबल हब बन सकता है।

मानव संसाधन की भूमिका पर जोर देते हुए रक्षा सचिव ने कहा कि असली रणनीतिक स्वतंत्रता सिर्फ हथियार बनाने से नहीं आती। इसके लिए स्किल्स, टेक्नोलॉजी और इंटेलेक्चुअल कैपिटल पर भी देश का नियंत्रण होना जरूरी है। उन्होंने बताया कि स्किल इंडिया मिशन के तहत नेशनल स्किल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन और डायरेक्टरेट जनरल ऑफ ट्रेनिंग जैसी संस्थाएं रक्षा और एयरोस्पेस सेक्टर की मौजूदा और भविष्य की स्किल जरूरतों की मैपिंग कर रही हैं। (Aatmanirbharta in Defence)

उन्होंने पीएम-सेतु प्रोग्राम का भी जिक्र किया, जिसका उद्देश्य अकादमिक संस्थानों, इंडस्ट्री और डिफेंस आरएंडडी के बीच की दूरी को खत्म करना है। पांच साल में 60,000 करोड़ रुपये के बजट वाले इस प्रोग्राम के तहत सेंटर्स ऑफ एक्सीलेंस, ड्यूल अप्रेंटिसशिप, एआई आधारित ट्रेनिंग टूल्स और अग्निवीरों व वेटरन्स को स्किलिंग से जोड़ने की योजना है।

राजेश कुमार सिंह ने पंजाब की भूमिका पर भी प्रकाश डालते हुए कहा कि पंजाब में रक्षा उत्पादन की बड़ी संभावनाएं मौजूद हैं। अगर यहां एमएसएमई नेटवर्क, डिफेंस आरएंडडी से जुड़ाव और स्किल व टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत किया जाए, तो राज्य एक बड़ा डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग हब बन सकता है। (Aatmanirbharta in Defence)

अग्निपथ स्कीम का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि अग्निवीरों के रूप में देश को अनुशासित और तकनीकी रूप से ट्रेंड युवा मिल रहे हैं, जिन्हें डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग और स्ट्रैटेजिक सेक्टर में आसानी से शामिल किया जा सकता है। (Aatmanirbharta in Defence)

चर्चा में है 300 रुपये से कम का यह डिफेंस शेयर, नए शेयरों की लिस्टिंग से बाजार में मची हलचल

Defence Stocks Apollo Micro Systems Shares

Defence Stocks: डिफेंस सेक्टर की टेक्नोलॉजी कंपनी अपोलो माइक्रो सिस्टम्स लिमिटेड (एएमएसएल) ने स्टॉक एक्सचेंज को जानकारी दी है कि उसे नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) और बीएसई लिमिटेड से नए शेयरों को ट्रेडिंग के लिए अंतिम मंजूरी मिल गई है। इस खबर के बाद निवेशकों की नजर इस डिफेंस स्टॉक पर टिकी हुई है।

पिछले कारोबारी सत्र में अपोलो माइक्रो सिस्टम्स के शेयरों में गिरावट देखने को मिली थी। बीएसई पर कंपनी का शेयर 261.75 रुपये के मुकाबले गिरकर 253.15 रुपये पर बंद हुआ। वहीं एनएसई पर यह शेयर 262 रुपये के पिछले बंद स्तर के मुकाबले 262.25 रुपये पर बंद हुआ। कंपनी का कुल मार्केट कैप करीब 8,333 करोड़ रुपये बताया गया है। (Defence Stocks)

Defence Stocks: नए शेयरों को ट्रेडिंग की मंजूरी

कंपनी ने बताया है कि उसे 65.69 लाख नए इक्विटी शेयरों को स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्ट और ट्रेड करने की मंजूरी मिल गई है। ये नए शेयर 9 जनवरी शुक्रवार से एनएसई और बीएसई दोनों पर ट्रेडिंग के लिए उपलब्ध हो गए हैं।

इसके अलावा कंपनी ने एक और अहम जानकारी साझा की है। अपोलो माइक्रो सिस्टम्स ने कुल मिलाकर 1.21 करोड़ से ज्यादा नए इक्विटी शेयर बाजार में लिस्ट कर दिए हैं। ये शेयर प्रेफरेंशियल इश्यू के तहत जारी किए गए हैं। (Defence Stocks)

क्या है प्रेफरेंशियल इश्यू

सरल शब्दों में समझें, तो प्रेफरेंशियल इश्यू वह प्रक्रिया होती है, जिसमें कंपनी चुनिंदा निवेशकों को सीधे शेयर जारी करती है। इस मामले में ये शेयर प्रमोटर्स और नॉन-प्रमोटर्स दोनों को अलॉट किए गए हैं।

कंपनी की फाइलिंग के मुताबिक, ये नए शेयर वारंट्स को इक्विटी में कन्वर्ट करके जारी किए गए हैं। हर शेयर की फेस वैल्यू 1 रुपये रखी गई है, जबकि इन्हें 113 रुपये प्रति शेयर के प्रीमियम पर जारी किया गया है। (Defence Stocks)

8 जनवरी को मिली थी मंजूरी

स्टॉक एक्सचेंज को दी गई जानकारी में कंपनी ने साफ किया है कि एनएसई और बीएसई ने 8 जनवरी को इन नए शेयरों के लिए ट्रेडिंग अप्रूवल दिया था। इसके बाद अब ये शेयर बाजार में कारोबार के लिए उपलब्ध हो चुके हैं।

कैसा रहा है शेयर का प्रदर्शन 

अगर शेयर के पिछले प्रदर्शन की बात करें तो अपोलो माइक्रो सिस्टम्स का 52-वीक हाई 354.65 रुपये रहा है, जो 17 सितंबर 2025 को देखा गया था। वहीं, शेयर का 52-वीक लो 101.04 रुपये रहा है।

डिफेंस और एयरोस्पेस सेक्टर में काम करने वाली यह कंपनी हाल के वर्षों में निवेशकों के बीच चर्चा में रही है, खासकर सरकार के मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत जैसे अभियानों के चलते डिफेंस कंपनियों में बढ़ती दिलचस्पी के कारण। (Defence Stocks)

कंपनी क्या काम करती है

अपोलो माइक्रो सिस्टम्स एक टेक्नोलॉजी आधारित कंपनी है, जो एयरोस्पेस, डिफेंस और होमलैंड सिक्योरिटी से जुड़े प्रोजेक्ट्स पर काम करती है। कंपनी इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम्स, एम्बेडेड सॉल्यूशंस और मिशन-क्रिटिकल टेक्नोलॉजी सप्लाई करती है, जिनका इस्तेमाल डिफेंस प्लेटफॉर्म्स में होता है। (Defence Stocks)

निवेशकों की नजर क्यों है इस शेयर पर

नए शेयरों की लिस्टिंग से कंपनी के इक्विटी स्ट्रक्चर में बदलाव आता है, जिसका असर शेयर की कीमत और ट्रेडिंग वॉल्यूम पर पड़ सकता है। यही वजह है कि आने वाले सत्रों में निवेशक और बाजार विशेषज्ञ इस स्टॉक की चाल पर करीबी नजर बनाए रख सकते हैं। (Defence Stocks)

IAF को मिल सकता है बड़ा बूस्टर: भारत में बनेंगे नए 114 राफेल, फ्रांस से मेगा डील करीब

114 Rafale Fighters

114 Rafale Fighter Jet Deal: भारत और फ्रांस के बीच एक बार फिर बड़ी डिफेंस डील हो सकती है। भारतीय वायु सेना में कम होते स्क्वाड्रन को देखते हुए दोनों देशों के बीच मेगा राफेल डील को लेकर बातचीत आखिरी चरण में है। इस प्रस्ताव के तहत भारत अतिरिक्त राफेल फाइटर जेट्स का सौदा कर सकता है, ताकि वायु सेना की ऑपरेशनल जरूरतों को समय रहते पूरा किया जा सके।

इस डील को लेकर चर्चाएं जोरों पर हैं, क्योंकि अगले महीने फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के भारत दौरे की तैयारी चल रही है। माना जा रहा है कि उनके दौरे से पहले और उसके दौरान इस प्रस्ताव को लेकर राजनीतिक और रणनीतिक स्तर पर अहम फैसले लिए जा सकते हैं।

114 Rafale Fighter Jet Deal: डील हो सकती है गवर्नमेंट-टू-गवर्नमेंट 

भारतीय वायु सेना की सबसे बड़ी चुनौती इस समय स्क्वाड्रन की कमी है। वायु सेना के पास फिलहाल केवल 29 से 31 फाइटर स्क्वाड्रन ही बचे हैं, जबकि जरूरत 42 स्क्वाड्रन की है। पुराने मिग-21 और जैगुआर जैसे विमानों के धीरे-धीरे रिटायर होने से यह अंतर और बढ़ता जा रहा है। ऐसे में वायु सेना को तुरंत आधुनिक लड़ाकू विमानों की जरूरत है। (114 Rafale Fighter Jet Deal)

सूत्रों के मुताबिक, भारतीय वायु सेना ने सरकार को कम से कम 114 आधुनिक कॉम्बैट एयरक्राफ्ट की जरूरत का प्रस्ताव भेजा है। इसी जरूरत को पूरा करने के लिए राफेल जेट्स को एक भरोसेमंद विकल्प माना जा रहा है। राफेल पहले ही भारतीय वायु सेना में अपनी क्षमता साबित कर चुका है और ऑपरेशनल स्तर पर इसे पूरी तरह अपनाया जा चुका है।

इस डील की खास बात यह है कि यह गवर्नमेंट-टू-गवर्नमेंट यानी सरकार-से-सरकार के बीच होगी। इसका मतलब है कि खरीद प्रक्रिया अपेक्षाकृत तेज होगी और लंबी टेंडर प्रक्रिया से बचा जा सकेगा। साथ ही, इस सौदे में मेक इन इंडिया को भी अहम जगह दी जा रही है। (114 Rafale Fighter Jet Deal)

सूत्र बताते हैं कि इस डील के तहत खरीदे जाने वाले राफेल जेट्स का बड़ा हिस्सा भारत में ही बनाया जाएगा। इसके लिए फ्रांस की कंपनी दसॉ एविएशन और भारत की टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड के बीच पहले ही अहम समझौते हो चुके हैं। जून 2025 में टाटा और दसॉ के बीच राफेल फाइटर जेट के फ्यूजलाज बनाने को लेकर करार हुआ था।

हैदराबाद में टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स की एक नई मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी तैयार की जा रही है। इस प्लांट में राफेल के चार प्रमुख फ्यूजलाज सेक्शन बनाए जाएंगे। यह पहली बार होगा जब फ्रांस के बाहर राफेल का फ्यूजलाज तैयार किया जाएगा। इस यूनिट की सालाना उत्पादन क्षमता लगभग 24 फ्यूजलाज होगी और पहली डिलीवरी वित्त वर्ष 2027-28 से शुरू होने की उम्मीद है। (114 Rafale Fighter Jet Deal)

इसके अलावा, राफेल से जुड़े अन्य बड़े प्रोजेक्ट भी भारत में चल रहे हैं। हैदराबाद में ही एक इंजन प्रोडक्शन प्लांट लगाने की योजना है। वहीं, उत्तर प्रदेश के जेवर में एक बड़ा एमआरओ हब यानी मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल सेंटर बनाया जा जा रहा है। इन सभी परियोजनाओं के पूरा होने के बाद राफेल जेट की कुल वैल्यू का करीब 60 फीसदी हिस्सा भारत में ही तैयार होगा। (114 Rafale Fighter Jet Deal)

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस डील से भारत को केवल फाइटर जेट ही नहीं मिलेंगे, बल्कि कई क्रिटिकल टेक्नोलॉजी भी देश में आएंगी। इससे भारतीय रक्षा उद्योग को मजबूती मिलेगी, हजारों रोजगार पैदा होंगे और देश की एविएशन सप्लाई चेन मजबूत होगी।

राफेल डील का एक और अहम पहलू इसकी लागत है। यह सौदा कई दसियों अरब यूरो का हो सकता है। हालांकि, भारत के पास पहले से 36 राफेल जेट्स की कीमत का एक बेंचमार्क मौजूद है। इसके अलावा, हाल ही में भारतीय नौसेना के लिए 26 राफेल-मरीन विमानों का कॉन्ट्रैक्ट भी साइन किया गया है। इससे कीमत और शर्तों को तय करने में सरकार को सुविधा मिलेगी। (114 Rafale Fighter Jet Deal)

प्रस्ताव को आगे बढ़ाने के लिए सबसे पहले इसे डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल से मंजूरी लेनी होगी। इसके बाद लागत पर बातचीत होगी और अंत में कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी से अंतिम स्वीकृति जरूरी होगी। साथ ही, इस बड़े सौदे के लिए सालाना डिफेंस बजट में पर्याप्त प्रावधान भी करना होगा।

राफेल को लेकर वायु सेना का भरोसा हाल के ऑपरेशनल अनुभवों से भी जुड़ा है। हालिया अभियानों और अभ्यासों में राफेल ने अपनी एडवांस्ड एवियोनिक्स, लॉन्ग-रेंज हथियारों और नेटवर्क-सेंट्रिक वॉरफेयर क्षमताओं से अच्छा प्रदर्शन किया है। दो-फ्रंट थ्रेट यानी चीन और पाकिस्तान दोनों को एक साथ ध्यान में रखते हुए वायु सेना ऐसे प्लेटफॉर्म चाहती है, जो तुरंत तैनाती और लेटेस्ट टेक्नोलॉजी के साथ आएं। (114 Rafale Fighter Jet Deal)

अगर यह डील आगे बढ़ती है, तो भारत फ्रांस के बाद राफेल का सबसे बड़ा ऑपरेटर बन सकता है। पहले से मौजूद 36 राफेल, नौसेना के लिए ऑर्डर किए गए 26 राफेल-मरीन और प्रस्तावित नए विमानों को मिलाकर भारत के पास राफेल का बड़ा बेड़ा होगा। इससे ट्रेनिंग, स्पेयर पार्ट्स और मेंटेनेंस में भी आसानी होगी। (114 Rafale Fighter Jet Deal)

समुद्र की सुरक्षा के साथ अब सेहत की जिम्मेदारी, लक्षद्वीप में नेवी चलाएगी पांच दिन तक मल्टी-स्पेशियलिटी मेडिकल कैंप

Indian Navy Lakshadweep

Indian Navy Lakshadweep: भारतीय नौसेना एक बार फिर अपने सेवा भाव और सामाजिक जिम्मेदारी का उदाहरण पेश करने जा रही है। हिंद महासागर में स्थित केंद्र शासित प्रदेश लक्षद्वीप में भारतीय नौसेना 12 जनवरी से 16 जनवरी तक जॉइंट सर्विसेज मल्टी-स्पेशियलिटी मेडिकल कैंप का आयोजन कर रही है। इस पांच दिवसीय मेडिकल कैंप का आयोजन लक्षद्वीप के लोगों को बेहतर और विशेषज्ञ स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए किया जा रहा है।

इस विशेष मेडिकल कैंप का औपचारिक उद्घाटन भारतीय नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी करेंगे। यह कैंप न सिर्फ स्वास्थ्य सेवाओं बल्कि नागरिक और सैन्य सहयोग को भी और मजबूती देगा। (Indian Navy Lakshadweep)

Indian Navy Lakshadweep: लक्षद्वीप के लोगों तक इलाज पहुंचाने की पहल

लक्षद्वीप जैसे दूरदराज और द्वीपीय इलाके में रहने वाले लोगों के लिए विशेषज्ञ डॉक्टरों तक पहुंच आसान नहीं होती। ऐसे में भारतीय नौसेना का यह मेडिकल कैंप स्थानीय लोगों के लिए बड़ी राहत लेकर आया है। इस कैंप के जरिए मरीजों को न केवल सामान्य इलाज मिलेगा, बल्कि विशेषज्ञ और सुपर-स्पेशियलिटी डॉक्टरों से भी परामर्श लेने का मौका मिलेगा।

इस कैंप में मरीजों को मेडिकल कंसल्टेशन, इलाज और कुछ चुनिंदा सर्जिकल प्रक्रियाएं भी उपलब्ध कराई जाएंगी। इनमें खास तौर पर मोतियाबिंद (कैटरैक्ट) सर्जरी और कुछ सामान्य सर्जिकल ऑपरेशन शामिल हैं, जो मरीजों के जीवन की क्वॉलिटी को बेहतर बनाने में मदद करेंगे। (Indian Navy Lakshadweep)

नौसेना दिवस आउटरीच का है हिस्सा

भारतीय नौसेना पिछले कई वर्षों से नेवी डे आउटरीच एक्टिविटीज के तहत लक्षद्वीप में नियमित रूप से मेडिकल कैंप आयोजित करती रही है। पहले ये कैंप मुख्य रूप से प्राइमरी केयर और डेंटल सर्जरी तक सीमित थे, लेकिन समय के साथ स्वास्थ्य सेवाओं में हुई प्रगति और स्थानीय प्रशासन के सहयोग से इस पहल को अब मल्टी-स्पेशियलिटी मेडिकल कैंप के रूप में विस्तार दिया गया है।

स्थानीय लोगों की सकारात्मक प्रतिक्रिया और बढ़ती जरूरतों को देखते हुए इस कैंप को और व्यापक बनाया गया है, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों को फायदा मिल सके। (Indian Navy Lakshadweep)

मौजूदा स्वास्थ्य व्यवस्था को मिलेगा सहयोग

लक्षद्वीप में पहले से ही सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था मौजूद है, जिसमें जिला अस्पताल, कम्युनिटी हेल्थ सेंटर्स और प्राइमरी हेल्थ फैसिलिटीज शामिल हैं। भारतीय नौसेना का यह मल्टी-स्पेशियलिटी मेडिकल कैंप इन मौजूदा सेवाओं का विकल्प नहीं, बल्कि पूरक व्यवस्था के तौर पर काम करेगा।

इस कैंप का उद्देश्य स्थानीय स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना और उन मामलों में मदद करना है, जहां विशेषज्ञ इलाज की जरूरत होती है। कैंप के दौरान मरीजों का जल्दी डायग्नोसिस, समय पर इलाज और सही क्लीनिकल मैनेजमेंट पर खास जोर दिया जाएगा। (Indian Navy Lakshadweep)

पांच द्वीपों में पहुंचेगा मेडिकल कैंप

यह मेडिकल कैंप लक्षद्वीप के पांच प्रमुख द्वीपों में आयोजित किया जाएगा। इनमें अगत्ती, कवरत्ती, एंड्रोथ, अमीनी और मिनिकॉय शामिल हैं। इन द्वीपों में रहने वाले लोग सीधे इस कैंप से लाभ उठा सकेंगे, जिससे उन्हें मुख्य भूमि पर इलाज के लिए जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। (Indian Navy Lakshadweep)

तीनों सेनाओं के डॉक्टर देंगे सेवाएं

इस मेडिकल कैंप की एक बड़ी खासियत यह है कि इसमें भारतीय सेना, भारतीय नौसेना और भारतीय वायुसेना के अनुभवी डॉक्टर और विशेषज्ञ शामिल होंगे। यह एक जॉइंट सर्विसेज मेडिकल टीम होगी, जिसमें अलग-अलग क्षेत्रों के मेडिकल ऑफिसर्स और स्पेशलिस्ट शामिल रहेंगे।

तीनों सेनाओं के डॉक्टरों की भागीदारी से मरीजों को व्यापक और समन्वित इलाज मिलेगा। इससे स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता और प्रभावशीलता दोनों बढ़ेगी। (Indian Navy Lakshadweep)

मेडिकल कैंप में कई बेसिक और सुपर-स्पेशियलिटी क्षेत्रों में कंसल्टेशन की सुविधा दी जाएगी। इनमें डेंटल सर्जरी के साथ-साथ कुछ सुपर-स्पेशियलिटी सेवाएं भी शामिल हैं, इनमें कार्डियोलॉजी, एंडोक्राइनोलॉजी, नेफ्रोलॉजी, न्यूरोलॉजी,
गैस्ट्रोएंटरोलॉजी भी शामिल हैं। साथ ही, दिल, डायबिटीज, किडनी, नर्व सिस्टम और पाचन से जुड़ी बीमारियों का इलाज और परामर्श दिया जाएगा। (Indian Navy Lakshadweep)

सर्जरी से मरीजों को मिलेगा सीधा लाभ

इस कैंप के दौरान आउटपेशेंट कंसल्टेशन के साथ-साथ मोतियाबिंद की सर्जरी और कुछ सामान्य सर्जिकल प्रोसेस भी कि जाएंगे। ये सर्जरी स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारियों के साथ मिलकर की जाएंगी, ताकि सभी मेडिकल प्रोटोकॉल का पालन किया जा सके।

इन सर्जिकल प्रक्रियाओं से उन मरीजों को खास लाभ मिलेगा, जो लंबे समय से ऑपरेशन का इंतजार कर रहे थे। इससे उनकी रोजमर्रा की जिंदगी काफी हद तक आसान हो सकेगी। (Indian Navy Lakshadweep)

भारतीय नौसेना ने यह भी सुनिश्चित किया है कि कैंप खत्म होने के बाद मरीजों का इलाज अधूरा न रहे। मेडिकल टीमें मरीजों को फॉलो-अप के लिए जरूरी गाइडेंस देंगी, ताकि इलाज की निरंतरता बनी रहे। इसके साथ ही, कैंप में प्रिवेंटिव हेल्थकेयर और हेल्थ अवेयरनेस पर भी जोर दिया जाएगा। डॉक्टर समुदाय के लोगों से बातचीत कर उन्हें लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियों, मातृ और शिशु स्वास्थ्य, पोषण और सामान्य स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारी देंगे। (Indian Navy Lakshadweep)

सेवा और भरोसे की परंपरा को आगे बढ़ा रही नौसेना

भारतीय नौसेना लंबे समय से ह्यूमैनिटेरियन असिस्टेंस, डिजास्टर रिलीफ और कम्युनिटी सपोर्ट के क्षेत्र में सक्रिय रही है। लक्षद्वीप में आयोजित यह मेडिकल कैंप उसी परंपरा का हिस्सा है, जिसमें नौसेना सिर्फ समुद्री सुरक्षा ही नहीं, बल्कि समाज सेवा को भी अपनी जिम्मेदारी मानती है।

इस मेडिकल कैंप के उद्घाटन समारोह में भारतीय नौसेना के कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहेंगे। इनमें वाइस एडमिरल समीर सक्सेना, फ्लैग ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ, सदर्न नेवल कमांड, सर्जन वाइस एडमिरल आरती सरिन, डायरेक्टर जनरल आर्म्ड फोर्सेज मेडिकल सर्विसेज और सर्जन वाइस एडमिरल कविता सहाय, डायरेक्टर जनरल मेडिकल सर्विसेज (नेवी) शामिल हैं।

इसके अलावा लक्षद्वीप प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी और केंद्र शासित प्रदेश के एडमिनिस्ट्रेटर के सलाहकार भी कार्यक्रम में मौजूद रहेंगे। (Indian Navy Lakshadweep)

चीन की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ को काउंटर करने की तैयारी! 73 साल बाद भारतीय नौसेना को चाहिए एम्फीबियस एयरक्राफ्ट, जारी की RFI

Indian Navy Amphibious Aircraft RFI
Indian Navy Amphibious Aircraft RFI: ShinMaywa US-2

Indian Navy Amphibious Aircraft RFI: भारतीय नौसेना ने हिंद महासागर में चीन से मिल रही चुनौती को देखते हुए अहम फैसला लिया है। नौसेना की ऑपरेशनल जरूरतों को ध्यान में रखते हुए रक्षा मंत्रालय ने फिक्स्ड-विंग एम्फीबियस एयरक्राफ्ट के लिए रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन यानी आरएफआई जारी की है। नौसेना को ऐसे चार एम्फीबियस एयरक्राफ्ट की जरूरत है। इन विमानों की सबसे बड़ी खासियत यह होगी कि ये समुद्र, झील जैसी जल सतहों और तैयार रनवे दोनों से टेक-ऑफ और लैंडिंग कर सकेंगे। बता दें कि 1953 के बााद पहली बार नौसेना एम्फीबियस एयरक्राफ्ट का इस्तेमाल करेगी।

नौसेना का यह कदम ऐसे समय में आया है जब अंडमान-निकोबार द्वीप समूह की रणनीतिक अहमियत लगातार बढ़ रही है और हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की जिम्मेदारियां पहले से कहीं ज्यादा हो गई हैं। प्राकृतिक आपदाओं, खोज-बचाव अभियानों और दूरदराज वाले द्वीपों तक तुरंत पहुंचने के लिए ऐसे विमानों की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी। (Indian Navy Amphibious Aircraft RFI)

Indian Navy Amphibious Aircraft RFI: कितने विमान और कितने समय के लिए

7 जनवरी को भारतीय नौसेना की तरफ से जारी आरएफआई के अनुसार, भारतीय नौसेना चार एम्फीबियस एयरक्राफ्ट को लगभग चार सालों के लिए लीज पर लेना चाहती है। यह लीज वेट लीज कैटेगरी में होगी, यानी विमान के साथ-साथ क्रू, मेंटेनेंस और इंश्योरेंस जैसी सुविधाएं भी शामिल होंगी।

इस सिस्टम का फायदा यह होता है कि नौसेना को तुरंत ऑपरेशनल क्षमता मिल जाती है और लंबे समय तक इंफ्रास्ट्रक्चर या ट्रेनिंग का इंतजार नहीं करना पड़ता। (Indian Navy Amphibious Aircraft RFI)

अंडमान-निकोबार क्यों है सबसे अहम

हालांकि आरएफआई में यह स्पष्ट नहीं है कि इन जहाजों का इस्तेमाल कहां किया जाएगा, लेकिन भारतीय नौसेना के इस फैसले के पीछे सबसे बड़ा कारण अंडमान-निकोबार द्वीप समूह हैं। हाल ही में भारत सरकार का पूरा फोकस एएनआई यानी अंडमान-निकोबार आईलैंड्स पर है। यह द्वीप समूह भारत की मुख्य भूमि से करीब 1200 किलोमीटर दूर स्थित है और इसे रणनीतिक रूप से भारत का “अनसिंकेबल एयरक्राफ्ट कैरियर” भी कहा जाता है।

खास बात यह है कि अंडमान-निकोबार मलक्का स्ट्रेट के बेहद पास है, जहां से दुनिया का बड़ा हिस्सा समुद्री व्यापार करता है। वहीं, यहां से चीन का 80 फीसदी ऑयल इम्पोर्ट्स और 40 फीसदी ग्लोबल ट्रेड गुजरता है। यह मलक्का स्ट्रेट से 90-160 किमी दूर है, जो चीन की “स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स” स्ट्रैटेजी को काउंटर करता है।

पोर्ट ब्लेयर में भारत का एकमात्र ट्राई-सर्विस कमांड का मुख्यालय है, जो आर्मी, नेवी और एयर फोर्स को इंटीग्रेट करता है। यह 2001 में बनाया भारत का पहला थिएटर कमांड है। जहां नेवल बेस और एयरबेस दोनों मौजूद हैं। यहां से मैरीटाइम पैट्रोल, सबमरीन ट्रैकिंग, और जॉइंट ऑपरेशंस होते हैं। हाल के सालों में भारत सरकार ने यहां इंफ्रास्ट्रक्चर अपग्रेड किया है, ताकि चीन की बढ़ती चुनौती का सामना किया जा सके। यहां हाल में रनवे अपग्रेड, पोर्ट्स, और एयरफील्ड्स को डेवलप किया जा रहा है। (Indian Navy Amphibious Aircraft RFI)

ग्रेट निकोबार के साथ-साथ अंडमान-निकोबार में पहले से मौजूद सैन्य ढांचे को भी मजबूत किया जा रहा है। कैंपबेल बे में स्थित आईएनएस बाज नेवल एयर स्टेशन मलक्का स्ट्रेट की साउदर्न एंट्री पर नजर रखता है। इसके अलावा कार निकोबार, पोर्ट ब्लेयर, शिबपुर और कैंपबेल बे सहित कुल चार प्रमुख एयरबेस को अपग्रेड किया जा चुका है, जिससे पूरे द्वीपसमूह की सैन्य क्षमता कई गुना बढ़ गई है। (Indian Navy Amphibious Aircraft RFI)

सीडीएस ने किया अपग्रेडेड रनवे का उद्घाटन

पोर्ट ब्लेयर यानी श्री विजया पुरम से 535 किमी दक्षिण में कार निकोबार एयर फोर्स बेस में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने 2 जनवरी को ही अपग्रेडेड रनवे का उद्घाटन किया है। जिसमें 2.7 किमी लंबा और 43 मीटर चौड़ा रनवे बनाया गया है जो हेवी एयरक्राफ्ट जैसे फाइटर्स, ट्रांसपोर्टर्स को सपोर्ट करता है। साथ ही, कई एयरक्राफ्ट एक साथ पार्क, रिफ्यूल और टर्नअराउंड हो सकें इसके लिए रनवे को एक्सपेंड भी किया गया है। साथ ही, नया टैक्सी ट्रैक भी बनाया है, जो इमरजेंसी रनवे के रूप में यूज हो सकता है। इसके अलावा फ्यूल स्टोरेज, लॉजिस्टिक्स फैसिलिटी, और सपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर को भी बढ़ाया गया। यहां से मलक्का स्ट्रेट के साउदर्न एप्रोच पर नजर रखी जा सकती है। मैरीटाइम सर्विलांस, डिटरेंस, और रैपिड रिस्पॉन्स बढ़ाती है।

इस मेगा प्रोजेक्ट के तहत ग्रेट निकोबार में एक डीप-सी इंटरनेशनल ट्रांसशिपमेंट पोर्ट भी बनाया जा रहा है, जहां बड़े कंटेनर शिप सीधे आकर कार्गो उतार सकेंगे। अभी भारत का करीब 75 फीसदी ट्रांसशिप्ड कार्गो सिंगापुर, कोलंबो और दूसरे विदेशी पोर्ट्स पर हैंडल होता है। सरकार का मानना है कि ग्रेट निकोबार पोर्ट के चालू होने के बाद यह कार्गो भारत में ही हैंडल किया जा सकेगा, जिससे समय और लागत दोनों की बचत होगी और भारत को बड़ा आर्थिक फायदा मिलेगा।

प्रोजेक्ट का दूसरा अहम हिस्सा एक ग्रीनफील्ड इंटरनेशनल एयरपोर्ट है, जिसे इस तरह डिजाइन किया जा रहा है कि वहां वाइड-बॉडी एयरक्राफ्ट, यहां तक कि ए-380 जैसे बड़े विमान भी उतर सकें। यह एयरपोर्ट न सिर्फ सिविल एविएशन के लिए बल्कि जरूरत पड़ने पर मिलिट्री ऑपरेशंस में भी अहम भूमिका निभा सकेगा। इसके अलावा यहां एक आधुनिक टाउनशिप, पावर प्लांट और इकोनॉमिक जोन भी डेवलप किया जा रहा है, ताकि लंबी अवधि में यह इलाका आत्मनिर्भर बन सके। (Indian Navy Amphibious Aircraft RFI)

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट का एक बेहद अहम पहलू इसका मिलिट्री और स्ट्रैटेजिक रोल है। इस द्वीप पर नया एयरफील्ड और इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार होने से भारतीय नौसेना और वायुसेना को हिंद महासागर क्षेत्र में तेजी से एसेट्स डिप्लॉय करने की सुविधा मिलेगी। खासकर म्यांमार के कोको आइलैंड जैसे ठिकानों पर चीन की गतिविधियों पर नजर रखने में ग्रेट निकोबार की भूमिका बेहद अहम हो जाएगी। इसके जरिए भारतीय नौसेना और वायुसेना को हिंद महासागर क्षेत्र में तेजी से एसेट्स डिप्लॉय करने की क्षमता मिलेगी। ऐसे में यहां भारत की मजबूत मौजूदगी समुद्री सुरक्षा के लिहाज से बेहद जरूरी है। (Indian Navy Amphibious Aircraft RFI)

कई द्वीपों पर नहीं है रनवे

इन द्वीपों पर कई जगहों पर रनवे या एयरस्ट्रिप नहीं है। जहाज़ों के ज़रिये रसद पहुंचाने में कई बार दिन लग जाते हैं। ऐसे में एम्फीबियस एयरक्राफ्ट सीधे समुद्र पर उतरकर सैनिक, मेडिकल टीम, राहत सामग्री और उपकरण पहुंचा सकते हैं। अंडमान–निकोबार द्वीपसमूह में कुल मिलाकर करीब 500 से लेकर 836 द्वीप और छोटे-छोटे आइलेट्स शामिल हैं। इसमें कई निर्जन, चट्टानी और छोटे टापू भी गिने जाते हैं। इन सैकड़ों द्वीपों में से केवल 31 से 38 द्वीप ऐसे हैं, जहां स्थायी आबादी रहती है। इसके बावजूद, इतने बड़े द्वीपसमूह में वास्तविक रूप से काम करने लायक रनवे या एयरस्ट्रिप्स की संख्या बेहद कम है। (Indian Navy Amphibious Aircraft RFI)

पूरे अंडमान-निकोबार में केवल चार रनवे

पूरे अंडमान–निकोबार क्षेत्र में केवल चार मुख्य एयरफील्ड ऐसे हैं, जहां से नियमित या रणनीतिक उड़ानें संभव हैं। इनमें पोर्ट ब्लेयर का वीर सावरकर इंटरनेशनल एयरपोर्ट सबसे अहम है, जो सिविल और सैन्य दोनों जरूरतों को पूरा करता है। इसके अलावा कार निकोबार में एयरफोर्स स्टेशन है, जो मुख्य रूप से मिलिट्री इस्तेमाल के लिए है। ग्रेट निकोबार के कैंपबेल बे में आईएनएस बाज नेवी एयर स्टेशन है, जो भारत का सबसे दक्षिणी एयरफील्ड माना जाता है, लेकिन इसका रनवे छोटा है और एक्सपेंड करने की प्रक्रिया चल रही है। उत्तरी अंडमान में शिबपुर के पास आईएनएस कोहासा एक फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस है, जहां सीमित लंबाई का रनवे मौजूद है। (Indian Navy Amphibious Aircraft RFI)

रनवे न होने से लॉजिस्टिक्स पर पड़ता है असर

वहीं, रनवे की इस कमी का सबसे बड़ा असर लॉजिस्टिक्स पर पड़ता है। अंडमान–निकोबार में ज्यादातर सप्लाई जहाजों के जरिए होती है। पोर्ट ब्लेयर से ग्रेट निकोबार जैसे दूरस्थ इलाकों तक जहाज से पहुंचने में दो से तीन दिन तक लग जाते हैं। मानसून, तूफान या खराब समुद्री हालात में यही सफर और लंबा हो जाता है या पूरी तरह रुक भी जाता है। ऐसे में जरूरी सामान, ईंधन, मेडिकल सप्लाई या स्पेयर पार्ट्स समय पर नहीं पहुंच पाते।

स्पेशल ऑपरेशंस के लिहाज से भी रनवे की कमी एक बड़ी बाधा है। मरीन कमांडो यानी मार्कोस या अन्य स्पेशल फोर्सेज को दूरस्थ द्वीपों पर तेजी से भेजना या वहां से निकालना आसान नहीं होता। इसी तरह मैरीटाइम पैट्रोल और सर्च एंड रेस्क्यू ऑपरेशंस में भी यह कमी साफ नजर आती है, क्योंकि कई इलाकों में कोई हवाई बेस ही मौजूद नहीं है। (Indian Navy Amphibious Aircraft RFI)

इसलिए जरूरत है एम्फीबियस एयरक्राफ्ट की

ऐसे में एम्फीबियस एयरक्राफ्ट की जरूरत सामने आती है। फिक्स्ड विंग एम्फीबियस एयरक्राफ्ट ऐसे विमान होते हैं, जो समुद्र या झील के पानी से भी उतर सकते हैं और सामान्य रनवे से भी ऑपरेट कर सकते हैं। ये रनवे की कमी को लगभग पूरी तरह कवर कर लेते हैं। ऐसे विमान सीधे समुद्र की सतह पर उतरकर सैनिकों, मेडिकल टीम, राहत सामग्री या जरूरी उपकरणों को पहुंचा सकते हैं। (Indian Navy Amphibious Aircraft RFI)

किस तरह के ऑपरेशन होंगे

आरएफआई में साफ तौर पर बताया गया है कि इन विमानों का इस्तेमाल किन-किन कामों के लिए किया जाएगा। इनमें सबसे अहम भूमिका लॉन्ग रेंज सर्च एंड रेस्क्यू (एलआर-एसएआर) की होगी। इसके अलावा इन विमानों का इस्तेमाल ऑपरेशनल लॉजिस्टिक सपोर्ट, स्पेशल ऑपरेशन, ह्यूमैनिटेरियन एड और डिजास्टर रिलीफ और कैजुअल्टी इवैक्यूएशन में किया जाएगा।

अंडमान-निकोबार और लक्षद्वीप जैसे इलाकों में किसी समुद्री हादसे, जहाज दुर्घटना या प्राकृतिक आपदा के समय यह विमान तुरंत मदद पहुंचाने में अहम साबित हो सकते हैं। (Indian Navy Amphibious Aircraft RFI)

समुद्र और जमीन दोनों से ऑपरेशन की क्षमता

एम्फीबियस एयरक्राफ्ट की सबसे बड़ी खासियत यह होती है कि वह समुद्र, झील और रनवे, तीनों जगह से ऑपरेट कर सकता है। नौसेना ने साफ किया है कि विमान को दिन और रात, दोनों समय उड़ान भरने में सक्षम होना चाहिए और उसे इंस्ट्रूमेंट फ्लाइट रूल्स (आईएफआर) सर्टिफिकेशन प्राप्त होना चाहिए। इसका मतलब यह है कि विमान खराब मौसम और कम विजिबिलिटी में भी सुरक्षित उड़ान भर सके। (Indian Navy Amphibious Aircraft RFI)

कोरोजन रेजिस्टेंट डिजाइन जरूरी

आरएफआई में यह भी कहा गया है कि विमान को समुद्री माहौल के अनुरूप बनाया गया होना चाहिए। समुद्र की नमक भरी हवा और नमी विमानों पर जल्दी असर डालती है, इसलिए कोरोजन रेजिस्टेंट डिजाइन अनिवार्य रखा गया है। इसके अलावा, विमान में आधुनिक नेविगेशन, कम्युनिकेशन और सुरक्षा सिस्टम होने चाहिए ताकि लंबी दूरी के ऑपरेशन के दौरान किसी भी आपात स्थिति से निपटा जा सके।

इसके साथ ही, विमान में एडवांस एवियोनिक्स, सुरक्षित कम्युनिकेशन सिस्टम, सैटेलाइट-आधारित नेविगेशन और सर्वाइवल इक्विपमेंट होना जरूरी बताया गया है। लॉन्ग रेंज सर्च एंड रेस्क्यू के लिए सेंसर और विजुअल एड्स की भी जरूरत रखी गई है, ताकि समुद्र में फंसे लोगों या दुर्घटनाग्रस्त जहाजों की पहचान तेजी से की जा सके। (Indian Navy Amphibious Aircraft RFI)

अंडमान में आपदा प्रबंधन के लिए अहम

अंडमान-निकोबार क्षेत्र भूकंप और सुनामी जोन में आता है। 2004 की सुनामी के दौरान यह महसूस किया गया था कि अगर ऐसे विमान उपलब्ध होते, तो राहत और बचाव कार्य और तेज हो सकता था। एम्फीबियस एयरक्राफ्ट समुद्र पर उतरकर सीधे प्रभावित इलाकों के पास पहुंच सकते हैं। जहां जहाजों से पहुंचने में दो-तीन दिन लगते हैं, वहीं एम्फीबियस एयरक्राफ्ट कुछ घंटों में ही काम पूरा कर सकते हैं। ग्रेट निकोबार, लिटिल अंडमान या हैवलॉक जैसे द्वीपों पर, जहां रनवे नहीं है, वहां यह क्षमता बेहद अहम हो जाती है। ह्यूमैनिटेरियन एड और डिजास्टर रिलीफ ऑपरेशंस में ये विमान पानी पर उतरकर सीधे बचाव और मेडिकल इवैक्यूएशन कर सकते हैं।

लॉन्ग रेंज सर्च एंड रेस्क्यू में भी इनकी भूमिका अहम होती है। ये दिन-रात, इंस्ट्रूमेंट फ्लाइट रूल्स के तहत उड़ान भर सकते हैं और हजारों किलोमीटर तक ऑपरेट कर सकते हैं। स्पेशल ऑपरेशंस में मार्कोस जैसे यूनिट्स को चुपचाप ड्रॉप या पिकअप करना भी इनके जरिए संभव होता है। एंटी-पाइरेसी और एंटी-नार्कोटिक्स ऑपरेशंस में ये विमान समुद्र पर उतरकर संदिग्ध गतिविधियों की जांच कर सकते हैं। (Indian Navy Amphibious Aircraft RFI)

नेवी के पास नहीं एम्फीबियस एयरक्राफ्ट

मिली जानकारी मुताबिक फिलहाल भारतीय नौसेना के पास कोई भी फिक्स्ड विंग एम्फीबियस एयरक्राफ्ट सर्विस में नहीं है। पिछले कई सालों से जापान के शिनमायवा यूएस-2 विमान को लेकर बातचीत चलती रही, लेकिन कीमत और अन्य शर्तों के कारण समझौता आगे नहीं बढ़ सका। इसी वजह से अब नौसेना ने लीज के रास्ते से तत्काल क्षमता हासिल करने का फैसला किया है।

भारतीय नौसेना का नेवल एविएशन, जिसकी औपचारिक शुरुआत 11 मई, 1953 को कोच्चि में हुई थी, उसने अपने पहले भारतीय नौसैनिक विमान के तौर पर शॉर्ट्स सीलैंड एम्फीबियस एयरक्राफ्ट को ऑपरेट किया थ। हालांकि, 1960 में इनका ऑपरेशन बंद कर दिया गया।

वहीं, इस आरएफआई को नौसेना की लॉन्ग टर्म एविएशन रोडमैप का हिस्सा मानी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि लीज पर लिए गए विमानों के ऑपरेशनल अनुभव के आधार पर भविष्य में स्थायी खरीद या स्वदेशी विकास का रास्ता भी खुलेगा। (Indian Navy Amphibious Aircraft RFI)

रक्षा मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि इस आरएफआई का जवाब केवल ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर्स या अधिकृत लेसर ही दे सकते हैं। लेसर का भारतीय यूनिट होना और विमान का मालिक होना आवश्यक है। आरएफआई के साथ ही लेसर से बजटरी अनुमान, दायित्व और बीमा विवरण, तथा डीएपी-2020 के प्रावधानों के अनुपालन की पुष्टि भी मांगी गई है। आरएफआई का जवाब मिलने के बाद नौसेना और रक्षा मंत्रालय इन प्रस्तावों का अध्ययन करेंगे। इसके बाद यह तय किया जाएगा कि किन विकल्पों को अगले चरण में ले जाया जाए। इसके बाद ही रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (आरएफपी) या अन्य औपचारिक प्रक्रिया शुरू होगी। (Indian Navy Amphibious Aircraft RFI)

Explainer: हाइपरसोनिक रेस में भारत की बड़ी छलांग, DRDO का 12 मिनट वाला स्क्रैमजेट टेस्ट क्यों है गेमचेंजर?

Explainer DRDO Scramjet Engine Test
DRDO Scramjet Engine Test Marks Major Leap in India’s Hypersonic Missile Programme

DRDO Scramjet Engine Test: भारत ने हाइपरसोनिक मिसाइल तकनीक की दिशा में एक बहुत बड़ी छलांग लगाई है। डीआरडीओ की हैदराबाद स्थित प्रयोगशाला डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट लेबोरेटरी (डीआरडीएल) ने पहली बार फुल स्केल एक्टिवली कूल्ड लॉन्ग ड्यूरेशन स्क्रैमजेट इंजन कम्बस्टर का सफल ग्राउंड टेस्ट किया है। यह टेस्ट 12 मिनट से अधिक समय तक चला और पूरी तरह सफल रहा। यह टेस्ट स्क्रैमजेट कनेक्ट पाइप टेस्ट (एससीपीटी) फैसिलिटी में किया गया, जिसे पूरी तरह भारत में ही डिजाइन और डेवलप किया गया है।

DRDO Scramjet Engine Test: क्या है यह उपलब्धि और क्यों है इतनी खास

हाइपरसोनिक तकनीक को आज के समय में डिफेंस सेक्टर की सबसे जटिल और एडवांस तकनीकों में गिना जाता है। हाइपरसोनिक मिसाइल वह होती है जो मैक-5 यानी ध्वनि की रफ्तार से पांच गुना या उससे ज्यादा रफ्तार से उड़ान भर सकती है। यह रफ्तार करीब 6,100 किलोमीटर प्रति घंटा या उससे भी अधिक होती है।

डीआरडीओ का यह टेस्ट इसलिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें लॉन्ग ड्यूरेशन, यानी लंबे समय तक इंजन को स्थिर और सुरक्षित रूप से चलाकर दिखाया गया है। हाइपरसोनिक उड़ान में सबसे बड़ी चुनौती होती है बेहद ज्यादा तापमान, तेज हवा का दबाव और ईंधन के स्थिर दहन को बनाए रखना। (DRDO Scramjet Engine Test)

स्क्रैमजेट इंजन क्या होता है, आसान भाषा में समझिए

इस पूरी तकनीक का सबसे अहम हिस्सा है स्क्रैमजेट इंजन। स्क्रैमजेट का पूरा नाम है सुपरसोनिक कंबशन रैमजेट। यह एक ऐसा एयर-ब्रीदिंग इंजन है, जो वातावरण से ऑक्सीजन लेता है और उसी के जरिए ईंधन जलाकर थ्रस्ट पैदा करता है। सामान्य रॉकेट इंजन को अपने साथ ऑक्सीजन ले जानी पड़ती है, जिससे उसका वजन बढ़ जाता है और रेंज सीमित हो जाती है। स्क्रैमजेट इंजन इस समस्या को खत्म कर देता है, क्योंकि यह हवा से ही ऑक्सीजन लेता है। इससे मिसाइल हल्की होती है और ज्यादा दूरी तक उड़ान भर सकती है। (DRDO Scramjet Engine Test)

2,000 डिग्री सेल्सियस से भी ज्यादा तापमान

स्क्रैमजेट इंजन की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें इंजन के अंदर भी हवा सुपरसोनिक गति से बहती रहती है। यानी हवा को धीमा नहीं किया जाता, बल्कि उसी तेज रफ्तार में ईंधन मिलाकर दहन कराया जाता है। यही चीज इस इंजन को जटिल बना देती है। इतनी तेज हवा में आग को स्थिर बनाए रखना अपने आप में एक बहुत बड़ी वैज्ञानिक चुनौती है।

DRDO Scramjet Engine Test: एक्टिवली कूल्ड स्क्रैमजेट क्यों जरूरी है

इसके साथ ही दूसरी बड़ी समस्या होती है तापमान। हाइपरसोनिक स्पीड पर इंजन के अंदर का तापमान 2,000 डिग्री सेल्सियस से भी ज्यादा हो सकता है। यह तापमान स्टील के पिघलने के तापमान से कहीं अधिक होता है। अगर इंजन को सही तरीके से ठंडा न किया जाए, तो वह कुछ सेकंड में ही खराब हो सकता है। (DRDO Scramjet Engine Test)

इसी वजह से डीआरडीओ ने एक्टिवली कूल्ड स्क्रैमजेट इंजन विकसित किया है। इसमें कूलिंग के लिए किसी अलग सिस्टम का इस्तेमाल नहीं किया जाता, बल्कि खुद ईंधन को ही कूलेंट के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। ईंधन को इंजन की दीवारों के पास से गुजारा जाता है, जहां वह अत्यधिक गर्मी को सोख लेता है। इसके बाद वही ईंधन कंबशन के लिए इस्तेमाल होता है। इस तकनीक को एंडोथर्मिक फ्यूल सिस्टम कहा जाता है। (DRDO Scramjet Engine Test)

हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल क्यों है गेम चेंजर

इस टेस्ट को सिर्फ एक तकनीकी सफलता के तौर पर देखना इसकी अहमियत को कम करके आंकना होगा। असल में यह भारत के हाइपरसोनिक मिसाइल प्रोग्राम के लिए वह आधार तैयार करता है, जिस पर भविष्य की सबसे तेज और सबसे घातक मिसाइलें बनाई जा सकेंगी। हाइपरसोनिक तकनीक आने के बाद भारत भी दुनिया के सबसे ताकतवर देशों के क्लब में मजबूती से खड़ा हो सकता है।

अब तक दुनिया में दो तरह की मिसाइलें प्रमुख रही हैं। एक हैं बैलिस्टिक मिसाइलें, जो बहुत तेज होती हैं लेकिन उनके रास्ते का पहले से अनुमान लगाया जा सकता है। दूसरी हैं क्रूज मिसाइलें, जो रास्ता बदल सकती हैं लेकिन उनकी स्पीड अपेक्षाकृत कम होती है। हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल इन दोनों के बीच की दूरी को खत्म कर देती है। यह बेहद तेज भी होती है और जरूरत पड़ने पर रास्ता भी बदल सकती है। यही वजह है कि मौजूदा एयर डिफेंस सिस्टम के लिए इन्हें रोकना बेहद मुश्किल हो जाता है। यही वजह है कि अमेरिका, रूस और चीन इस तकनीक को लेकर बेहद गंभीर हैं। (DRDO Scramjet Engine Test)

DRDO Scramjet Engine Test: ग्राउंड टेस्ट का मतलब क्या है

9 जनवरी को हुआ यह टेस्ट इसलिए ऐतिहासिक है, क्योंकि इसमें पहली बार भारत ने फुल स्केल एक्टिवली कूल्ड स्क्रैमजेट इंजन को लंबे समय तक सफलतापूर्वक चलाकर दिखाया। इससे पहले अप्रैल 2025 में सब-स्केल इंजन का लंबी अवधि का टेस्ट किया गया था। अब फुल स्केल इंजन का 12 मिनट से ज्यादा चलना यह दिखाता है कि तकनीक अब प्रयोगशाला से निकलकर ऑपरेशनल स्टेज के बेहद करीब पहुंच चुकी है।

यह ग्राउंड टेस्ट भले ही जमीन पर किया गया हो, लेकिन इसका महत्व किसी फ्लाइट टेस्ट से कम नहीं है। हाइपरसोनिक तकनीक में पहले जमीन पर इंजन की स्थिरता और सुरक्षा साबित की जाती है, उसके बाद ही उड़ान परीक्षण किए जाते हैं। डीआरडीओ पहले ही 2020 में हाइपरसोनिक टेक्नोलॉजी डेमॉन्स्ट्रेशन व्हीकल (एचएसटीडीवी) का सफल फ्लाइट टेस्ट कर चुका है। अब स्क्रैमजेट इंजन का यह लंबी अवधि वाला टेस्ट उस दिशा में अगला बड़ा कदम है। (DRDO Scramjet Engine Test)

DRDO Scramjet Engine Test: भारत ने पहले भी किए हैं टेस्ट

भारत की हाइपरसोनिक यात्रा अचानक शुरू नहीं हुई है। पिछले दो दशकों से डीआरडीओ, इसरो, शैक्षणिक संस्थान और उद्योग मिलकर इस तकनीक पर काम कर रहे हैं। 2016 में इसरो ने स्क्रैमजेट इंजन का पहला एक्सपेरिमेंटल फ्लाइट टेस्ट किया था। 2020 में डीआरडीओ ने ओडिशा तट से एचएसटीडीवी उड़ाकर दुनिया को अपनी क्षमता दिखाई। इसके बाद हैदराबाद में एडवांस्ड हाइपरसोनिक विंड टनल और आईआईटी कानपुर में हाइपरवेलोसिटी टेस्ट फैसिलिटी जैसी अत्याधुनिक सुविधाएं विकसित की गईं। (DRDO Scramjet Engine Test)

DRDO Scramjet Engine Test: रक्षा मंत्री ने दी बधाई

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस उपलब्धि को भारत के हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल प्रोग्राम के लिए मजबूत आधार बताया है। वहीं डीआरडीओ के प्रमुख डॉ. समीर वी कामत ने इसे वैज्ञानिकों, उद्योग और शिक्षण संस्थानों की साझा मेहनत का परिणाम कहा है। यह संदेश भी साफ है कि भारत अब सिर्फ हथियार खरीदने वाला देश नहीं, बल्कि अत्याधुनिक हथियार बनाने वाला देश बन चुका है।

इस टेस्ट का एक बड़ा पहलू आत्मनिर्भर भारत से भी जुड़ा है। स्क्रैमजेट इंजन का डिजाइन, उसकी कूलिंग तकनीक, इस्तेमाल होने वाला ईंधन और टेस्ट फैसिलिटी सब कुछ भारत में ही डेवलप किया गया है। इसका मतलब है कि भविष्य में बनने वाली हाइपरसोनिक मिसाइलों के लिए भारत को किसी दूसरे देश पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। (DRDO Scramjet Engine Test)

LUH पर नेवी चीफ के बयान का यह है पूरा सच, जानिए किस हेलिकॉप्टर पर दांव लगा रही नौसेना

Indian Navy UH-M Helicopter

Indian Navy UH-M Helicopter: भारतीय नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी के एक बयान के बाद रक्षा जगत में हलचल तेज हो गई थी। यह चर्चा शुरू हो गई थी कि भारतीय नौसेना ने हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के बनाए लाइट यूटिलिटी हेलिकॉप्टर (एलयूएच) को खारिज कर दिया है। हालांकि, अब नौसेना से जुड़े सूत्रों ने इस पूरे मामले पर स्थिति साफ करते हुए कहा है कि नौसेना प्रमुख के बयान को गलत तरीके से समझा गया।

नौसेना सूत्रों के अनुसार, सच्चाई यह है कि एलयूएच कभी भी नौसेना के लिए बनाया ही नहीं गया था, इसलिए उसके नौसेना में शामिल होने या न होने का सवाल ही नहीं उठता। नौसेना की जरूरतें एलयूएच से बिल्कुल अलग हैं और नेवी चीफ के जवाब को गलत तरीके से पेश किया गया। (Indian Navy UH-M Helicopter)

Indian Navy UH-M Helicopter: एलयूएच क्यों नहीं है नौसेना के लिए उपयुक्त

सूत्रों के मुताबिक, भारतीय नौसेना को जिस यूटिलिटी हेलिकॉप्टर की जरूरत है, वह ट्विन-इंजन यानी दो इंजन वाला होना जरूरी है। समुद्र के ऊपर उड़ान के दौरान सुरक्षा सबसे बड़ा मुद्दा होता है। अगर सिंगल इंजन हेलिकॉप्टर में तकनीकी खराबी आ जाए, तो समुद्र में ऑपरेशन बेहद जोखिम भरा हो जाता है।

एचएएल का लाइट यूटिलिटी हेलिकॉप्टर एक सिंगल-इंजन प्लेटफॉर्म है। इसे खास तौर पर थल सेना और वायु सेना के लिए डिजाइन किया गया है, ताकि वह ऊंचाई वाले इलाकों, जैसे सियाचिन और पहाड़ी इलाकों में बेहतर प्रदर्शन कर सके। यही वजह है कि एलयूएच नौसेना की क्वालिटेटिव रिक्वायरमेंट्स पर खरा नहीं उतरता। (Indian Navy UH-M Helicopter)

नौसेना सूत्रों ने साफ किया कि एलयूएच को लेकर कोई औपचारिक नेवल इवैल्यूएशन हुआ ही नहीं था। कारण साफ था कि जब प्लेटफॉर्म की बुनियादी बनावट ही नौसेना की जरूरतों से मेल नहीं खाती, तो उसके ट्रायल या मूल्यांकन का कोई मतलब नहीं बनता। (Indian Navy UH-M Helicopter)

Indian Navy UH-M Helicopter: नेवी चीफ के बयान को गलत समझा

हाल ही में दिए गए एक इंटरव्यू में नेवी चीफ एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी ने कहा था कि एलयूएच नौसेना की जरूरतों को पूरा नहीं करता। इसी बयान को कुछ जगहों पर इस तरह पेश किया गया कि मानों नौसेना ने एलयूएच को टेस्ट करने के बाद रिजेक्ट कर दिया हो।

लेकिन नौसेना सूत्रों का कहना है कि यह बयान तकनीकी संदर्भ में था, न कि किसी औपचारिक रिजेक्शन के तौर पर। एलयूएच नौसेना की डिमांड लिस्ट में कभी रहा ही नहीं, इसलिए उसके खारिज होने की बात भी गलत है। (Indian Navy UH-M Helicopter)

चेतक हेलिकॉप्टर की जगह क्या आएगा

भारतीय नौसेना इस समय करीब 51 चेतक हेलिकॉप्टर ऑपरेट कर रही है, जिनमें से लगभग 45 अभी सर्विस कंडीशन में हैं। ये हेलिकॉप्टर कई दशक पुराने हैं और अब धीरे-धीरे अपनी टेक्निकल उम्र पूरी कर चुके हैं।

चेतक हेलिकॉप्टरों की जगह नौसेना को जिस नए प्लेटफॉर्म की जरूरत है, वह पूरी तरह मैरिटाइम ऑपरेशंस के लिए डिजाइन किया गया होना चाहिए। इसमें समुद्र में लैंडिंग, जहाज के डेक पर ऑपरेशन, साल्टी एटमोस्फियर से सुरक्षा और खराब मौसम में उड़ान जैसी क्षमताएं जरूरी हैं। (Indian Navy UH-M Helicopter)

एचएएल का नया प्लेटफॉर्म: यूएच-एम

नौसेना अब एचएएल द्वारा डेवलप किए जा रहे यूटिलिटी हेलिकॉप्टर– मरीन पर फोकस कर रही है। यह हेलिकॉप्टर खास तौर पर नौसेना की जरूरतों को ध्यान में रखकर डिजाइन किया जा रहा है।

सूत्रों के अनुसार, यूएच-एम एक डिजाइन एंड डेवलपमेंट केस है, क्योंकि इसकी जरूरतें एलयूएच से बिल्कुल अलग हैं। इसमें कई ऐसे फीचर्स शामिल किए जा रहे हैं, जो नौसेना के लिए जरूरी माने जाते हैं।

यूएच-एम में ट्विन-इंजन कॉन्फिगरेशन, बेहतर लैंडिंग गियर, एंटी-कोरोजन कोटिंग, फ्लोटेशन गियर, नेवी सेंसर्स/वेपंस इंटीग्रेशन, रोटर और टेल फोल्डिंग सिस्टम और मरीन एन्वायर्नमेंट को देखते हुए खास बदलाव किए जा रहे हैं। इसका मकसद यह है कि हेलिकॉप्टर आसानी से वॉरशिप्स के हैंगर में फिट हो सके और खुले समुद्र में सुरक्षित ऑपरेशन कर सके।

Indian Navy UH-M Helicopter: क्या होंगे UH-M में फीचर

सूत्रों ने बताया कि एलयूएच इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह वॉरशिप्स, जैसे फ्रिगेट, डिस्ट्रॉयर और एयरक्राफ्ट कैरियर से आसानी से उड़ान भर सके और वहां सुरक्षित तरीके से लैंड कर सके। समुद्र में उड़ान जमीन की तुलना में ज्यादा चुनौतीपूर्ण होती है, इसलिए इस हेलिकॉप्टर में कई खास बदलाव किए गए हैं, जो इसे सामान्य हेलिकॉप्टरों से अलग बनाते हैं। (Indian Navy UH-M Helicopter)

यूएच-एम में दो इंजन इसलिए जरूरी हैं कि समुद्र के ऊपर उड़ान के दौरान अगर एक इंजन में दिक्कत आ जाए, तो दूसरा इंजन हेलिकॉप्टर को सुरक्षित रख सकता है। यही वजह है कि नौसेना हमेशा ट्विन-इंजन हेलिकॉप्टर को प्राथमिकता देती है।

इस हेलिकॉप्टर का रोटर और टेल फोल्ड होने वाला है। इसका मतलब यह है कि उड़ान के बाद इसे मोड़कर जहाज के छोटे हैंगर में रखा जा सकता है। वॉरशिप्स पर जगह सीमित होती है, इसलिए यह सुविधा बेहद अहम मानी जाती है। फोल्ड होने के बाद इसकी चौड़ाई काफी कम हो जाती है, जिससे इसे स्टोर करना आसान हो जाता है। (Indian Navy UH-M Helicopter)

सथ ही, यूएच-एम को समुद्री माहौल को ध्यान में रखकर बनाया गया है। इसमें एंटी-कोरोजन कोटिंग दी गई है, ताकि नमक भरी हवा और समुद्र की नमी से हेलिकॉप्टर में जंग न लगे। इसके अलावा, इसका लैंडिंग गियर भी मजबूत बनाया गया है, ताकि जहाज के हिलते-डुलते डेक पर सुरक्षित टेकऑफ और लैंडिंग हो सके।

इस हेलिकॉप्टर में आगे की तरफ नोज-माउंटेड रडार लगाया गया है, जो समुद्र की निगरानी, टारगेट की पहचान, सर्च एंड रेस्क्यू और मौसम की जानकारी देने में मदद करेगा। यह रडार डीआरडीओ के सहयोग से डेवलप किया जा रहा है। यूएच-एम का इस्तेमाल सैनिकों और सामान को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने, घायल जवानों को निकालने, खोज-बचाव अभियान और जरूरत पड़ने पर लिमिटेड कॉम्बैट रोल्स के लिए भी किया जा सकेगा। (Indian Navy UH-M Helicopter)

कब आएगा UH-M का पहला प्रोटोटाइप

नवंबर 2025 में एचएएल के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर डीके सुनील कहा था कि यूएच-एम का पहला प्रोटोटाइप तैयार हो चुका है। उन्होंने बताया कि इस हेलिकॉप्टर की पहली उड़ान 2025-26 वित्तीय वर्ष में होने की योजना है। इसके बाद सर्टिफिकेशन, नौसेना के यूजर ट्रायल और कड़े परीक्षण किए जाएंगे, ताकि यह पूरी तरह ऑपरेशनल जरूरतों पर खरा उतर सके। (Indian Navy UH-M Helicopter)

एचएएल की योजना के मुताबिक, यूएच-एम की पहली डिलीवरी 2027 से शुरू हो सकती है। सभी ट्रायल्स पूरे होने और उत्पादन की रफ्तार बढ़ने के बाद 2027 से 2030 के बीच इसे बड़ी संख्या में नौसेना में शामिल किया जाएगा। भारतीय नौसेना पहले चरण में करीब 60 यूएच-एम हेलिकॉप्टर लेने की योजना बना रही है। यह खरीद बाय-इंडियन आईडीडीएम श्रेणी के तहत होगी। (Indian Navy UH-M Helicopter)

हालांकि नौसेना के पास एमएच-60आर जैसे बड़े और ताकतवर हेलिकॉप्टर भी हैं, लेकिन वे भारी और खास लड़ाकू भूमिकाओं के लिए हैं। जबकि यूएच-एमका रोल उनसे अलग होगा। यह रोजमर्रा के नौसैनिक कामों, लॉजिस्टिक सपोर्ट और तेज मिशनों में अहम भूमिका निभाएगा।

ध्रुव का मैरिटाइम वर्जन बनेगा नौसेना की रीढ़!

यूएच-एम को कई जानकार एएलएच ध्रुव का मैरिटाइम वर्जन भी मानते हैं। एचएएल पहले से ही ध्रुव हेलिकॉप्टर के अलग-अलग वेरिएंट बना चुका है और अब उसी अनुभव के आधार पर नौसेना के लिए नया प्लेटफॉर्म तैयार किया जा रहा है।

सूत्रों का कहना है कि यूएच-एम का इस्तेमाल चेतक हेलिकॉप्टरों की जगह किया जाएगा और यह पूरी तरह मेक इन इंडिया सोच के अनुरूप होगा। इससे नौसेना को इंपोर्ट पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा और घरेलू रक्षा उद्योग को भी मजबूती मिलेगी। (Indian Navy UH-M Helicopter)

नेवी चीफ का ईस्टर्न नेवल कमांड दौरा, समंदर में पूर्वी बेड़े की ऑपरेशनल तैयारियों का लिया जायजा

Indian Navy Operational Readiness Eastern Fleet

Indian Navy Operational Readiness: भारतीय नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी ने समुद्र में ईस्टर्न नेवल कमांड की यूनिट्स के साथ समय बिताकर उनकी ऑपरेशनल रेडीनेस की समीक्षा की। इस दौरान वे नौसेना के पूर्वी बेड़े के जहाजों पर सवार हुए और उनकी ऑपरेशनल रेडीनेस की समीक्षा की।

Indian Navy Operational Readiness: देखीं फ्लीट की तैयारियाां

चीफ ऑफ नेवल स्टाफ का यह दौरा ऐसे समय में हुआ है, जब समुद्री सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं और भारतीय नौसेना अपने हर फ्लीट की तैयारी को उच्चतम स्तर पर बनाए रखने पर विशेष ध्यान दे रही है। (Indian Navy Operational Readiness)

समुद्र में मौजूद यूनिट्स के साथ रहते हुए नौसेना प्रमुख ने मल्टी-थ्रेट एनवायरनमेंट में कई एडवांस्ड ऑपरेशनल ड्रिल्स देखीं। इन एक्सरसाइज में जटिल फ्लीट मैन्यूवर्स शामिल थे, जहां अलग-अलग वॉरशिप्स ने एक साथ तालमेल बनाकर अपनी मूवमेंट और पोजिशनिंग का प्रदर्शन किया। इसके अलावा विभिन्न हथियार प्रणालियों से वेपन फायरिंग भी की गई। साथ ही फ्लाइंग ऑपरेशंस के तहत हेलिकॉप्टर और अन्य एयर एसेट्स की गतिविधियों को भी प्रदर्शित किया गया। (Indian Navy Operational Readiness)

Indian Navy Operational Readiness Eastern Fleet

नौसेना प्रमुख को प्लेटफॉर्म्स और पर्सनल की ऑपरेशनल प्रिपेयर्डनेस की ब्रीफिंग दी गई। इस ब्रीफिंग में यह बताया गया कि किस तरह ईस्टर्न फ्लीट के जहाज और उनके क्रू फुल स्पेक्ट्रम मैरिटाइम ऑपरेशंस में प्रभावी ढंग से काम करने के लिए तैयार हैं। इसमें निगरानी, समुद्री नियंत्रण, संकट के समय प्रतिक्रिया और जटिल मिशनों को अंजाम देने की क्षमता को प्रमुखता से सामने रखा गया। (Indian Navy Operational Readiness)

अपने संबोधन में एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी ने ईस्टर्न नेवल कमांड की यूनिट्स की खुले दिल से सराहना की। उन्होंने कहा कि लगातार हाई ऑपरेशनल टेम्पो बनाए रखना आसान काम नहीं होता, लेकिन पूर्वी बेड़े की यूनिट्स ने इसे एक नियमित अभ्यास बना लिया है। उन्होंने इस बात की भी तारीफ की कि जहाजों को हमेशा बैटल-रेडी स्थिति में रखा गया है और हथियार प्रणालियों के इस्तेमाल में उच्च स्तर की प्रिसीजन दिखाई देती है। (Indian Navy Operational Readiness)

Indian Navy Operational Readiness Eastern Fleet

नौसेना प्रमुख ने यह भी कहा कि आधुनिक हथियारों, सेंसरों और अनमैन्ड सिस्टम्स का सही इस्तेमाल तभी संभव है, जब नौसैनिक अच्छी तरह प्रशिक्षित और मोटिवेटेड हों। उन्होंने सफेद वर्दी पहनने वाले पुरुषों और महिलाओं को भारतीय नौसेना की असली ताकत बताया, जो फुली नेटवर्क्ड ऑपरेशनल एनवायरनमेंट में सिस्टम्स का प्रभावी उपयोग करते हैं। (Indian Navy Operational Readiness)

ईस्टर्न फ्लीट पूरी तरह फुली नेटवर्क्ड ऑपरेशनल एनवायरनमेंट में काम करने की क्षमता रखता है। यानी जहाज, एयरक्राफ्ट, सेंसर्स और कमांड सिस्टम आपस में जुड़े हुए हैं और रियल टाइम में जानकारी साझा कर सकते हैं। इससे किसी भी चुनौती का जवाब तेजी और सटीकता के साथ दिया जा सकता है। (Indian Navy Operational Readiness)

Indian Navy Operational Readiness Eastern Fleet
The CNS interacted with VAdm Sanjay Bhalla, FOCINC (E)

इससे एक दिन पहले 7 जनवरी को नौसेना प्रमुख ने विशाखापत्तनम में ईस्टर्न नेवल कमांड का दौरा भी किया था। वहां उन्होंने फ्लीट कमांडर वाइस एडमिरल संजय भल्ला और वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बातचीत की और कमांड की कॉम्बैट रेडीनेस की समीक्षा की। इस दौरान उन्होंने आगामी फरवरी में होने वाली आईएफआर 2026, एक्सरसाइज मिलन 2026 और आइओएनएस कॉन्क्लेव ऑफ चीफ्स की तैयारियों पर भी चर्चा हुई। (Indian Navy Operational Readiness)

नौसेना प्रमुख ने दोहराया कि इस तरह की तैयारियां और प्रोफेशनलिज्म भारत के नेशनल मैरिटाइम इंटरेस्ट्स की सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय नौसेना हर परिस्थिति में, हर स्थान पर और हर तरीके से देश के समुद्री हितों की रक्षा के लिए पूरी तरह तैयार है। (Indian Navy Operational Readiness)

आईएनएस चिल्का में हुआ भारतीय नौसेना की पासिंग आउट परेड का आयोजन, 2,103 अग्निवीरों ने पूरी की ट्रेनिंग

Indian Navy Passing Out Parade

Indian Navy Passing Out Parade: ओडिशा के चिल्का स्थित आईएनएस चिल्का में पासिंग आउट परेड का आयोजन किया गया। हाल ही में 02/25 बैच के ट्रेनीज की 16 सप्ताह की शुरुआती ट्रेनिंग खत्म हुई है। बता दें कि सेरेमोनियल परेड का सूर्यास्त के बाद किया जाता है।

इस बैच में कुल 2,172 ट्रेनी शामिल थे। इनमें 2,103 अग्निवीर थे, जिनमें 113 महिला अग्निवीर शामिल रहीं। इसके अलावा 270 एसएसआर यानी मेडिकल असिस्टेंट, भारतीय नौसेना के 44 स्पोर्ट्स एंट्री कार्मिक और इंडियन कोस्ट गार्ड के 295 नाविक भी इस बैच का हिस्सा थे। सभी ट्रेनीज कठिन प्रशिक्षण पूरा कर औपचारिक रूप से सेना में कमीशन हुए। (Indian Navy Passing Out Parade)

इस अवसर पर साउदर्न नेवल कमांड के फ्लैग ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ वाइस एडमिरल समीर सक्सेना परेड के चीफ गेस्ट और रिव्यूइंग ऑफिसर रहे। परेड का संचालन कमोडोर बी दीपक अनील, कमांडिंग ऑफिसर, आईएनएस चिल्का ने किया। समारोह में वरिष्ठ नौसेना अधिकारी, भूतपूर्व सैनिक, खेल जगत की जानी-मानी हस्तियां, अन्य गणमान्य अतिथि और ट्रेनीज के परिजन भी मौजूद रहे। (Indian Navy Passing Out Parade)

परेड के दौरान ट्रेनीज ने अपने ड्रिल, अनुशासन और प्रोफेशनल स्किल्स का शानदार प्रदर्शन किया। खास बात यह रही कि महिला अग्निवीरों ने अपने पुरुष साथियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर परेड में भाग लिया।

परेड को संबोधित करते हुए वाइस एडमिरल समीर सक्सेना ने सभी ट्रेनीज को ट्रेनिंग पूरा करने पर बधाई दी। उन्होंने कहा कि नौसेना में सेवा केवल एक नौकरी नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी है। उन्होंने ट्रेनीज को अपनी प्रोफेशनल स्किल्स को लगातार निखारने, टेक्नोलॉजी के प्रति सजग रहने और नौसेना के मूल्यों ड्यूटी, ऑनर और करेज को हमेशा जीवन में अपनाने की सलाह दी। उन्होंने अग्निवीरों के माता-पिता का भी आभार व्यक्त किया और राष्ट्र सेवा में उनके योगदान की सराहना की। (Indian Navy Passing Out Parade)

इस मौके पर शानदार प्रदर्शन करने वाले प्रशिक्षुओं को मेडल और ट्रॉफी प्रदान की गईं। साशी बी केंचवागोल और जतिन मिश्रा को बेस्ट अग्निवीर (एसएसआर) और बेस्ट अग्निवीर (एमआर) के लिए चीफ ऑफ द नेवल स्टाफ रोलिंग ट्रॉफी और गोल्ड मेडल दिया गया। अनिता यादव को ओवरऑल बेस्ट महिला अग्निवीर के लिए जनरल बिपिन रावत रोलिंग ट्रॉफी प्रदान की गई। केशव सूर्यवंशी और सोनेन्द्र को क्रमशः बेस्ट नाविक (जीडी) और बेस्ट नाविक (डीबी) घोषित किया गया। (Indian Navy Passing Out Parade)

इससे पहले आयोजित वैलिडिक्टरी फंक्शन में खारवेल डिवीजन ने ओवरऑल चैंपियनशिप ट्रॉफी जीती, जबकि अशोक डिवीजन रनर-अप रहा। इस मौके पर आईएनएस चिल्का की बाइलिंगुअल ट्रेनीज मैगजीन अंकुर 2025 के दूसरे संस्करण का भी विमोचन किया गया, जिसमें अग्निवीरों के प्रशिक्षण अनुभव और उनके परिवर्तनकारी सफर को दर्शाया गया है। (Indian Navy Passing Out Parade)